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                             जय माँ शारदे 
   
माता   मेरी    शारदे ,  देती   सदा   प्रकाश |
पंच लिखूँ दोहावली , सेवक  यहाँ  'सुभाष' ||

लिखी "बराई" "बाँसुरी"  , "कुंड"  "दीप"  हैं  नाम |
दोहावली "सुभाष" से   , माँ   को  किया  प्रणाम  ||

हैं  माता  आशीष   से,     दोहे   पाँच    हजार ||
पाँच  खंड  जिसके बने ,    मानूँ   माँ  उपकार ||
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कितना लिखा ,यह समय की गति ने ज्ञात ही नहीं होने दिया , सभी छंदों पर लिखा , पर सब बिखराव सा डायरियों में या पन्नों में बँधा रहा , वणिक पुत्र हूँ , सो द्रव्य की और ध्यान रहा , पर माँ शारदे का शुभाशीष भी अटूट पाया , संकलन की और ध्यान गया कि दोहे ही करीब  - पांच हजार  होगें , व अन्य छंद अलग से है , तब दोहा छंद संकलन कई भागों में है , दोहा दीप (एक हजार दोहे ) दोहा कुंड (एक हजार दोहे ) दोहा सुभाष ( एक हजार ), बुंदेली बराई , बुंदेली बांसुरी (एक हजार बुंदेली दोहे) शेष दोहे भी एक और बुक में समेटने  का प्रयास कर रहे हैं
इसी तरह कई ई बुकों में अपना साहित्य विषय बार तैयार किया  है , व कई छंद विशेषांक प्रकाशित किए है 
यह सब माँ शारदे की अनुकम्पा है |
एक बात मैं निसंकोच कहना चाहता हूँ कि मेरे साहित्यक मित्र आदरणीय सुरेन्द्र कौशिक जी गाजियाबाद ने सदैव , मार्गदर्शन किया है  , मैं आभार लिखकर उनके स्नेह  और मार्गदर्शन का  मूल्य नहीं देना चाहता हूँ , उनके स्नेह और सहयोग का सदा ऋणि रहना चाहता हूँ , आ० कौशिक जी के साथ हमने  कई छंदों की ई पत्रिका  सम्पादन व प्रकाशन किया है ,यह हमारे सभी साहित्यक मित्र जानते है 
सादर 
सुभाष सिंघई 
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लेखक का परिचय

नाम - सुभाष सिंघई 
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955 
जन्म स्थान - जतारा , जिला टीकमगढ़ (म०प्र०)
पिता का नाम -स्व० श्री कपूर चंद्र सिंघई 
माता का नाम - श्रीमति शीला देवी सिंघई 
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र  )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई 
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल (सागर )
       2 - शिल्पी सूर्या  - नितिन जैन ( खजुराहो ) 
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई 

लेखन की विधा - 
1 - दोहा , कुंडलिया , चौकड़िया , पदकाव्य  , इत्यादि सभी  छंद 
पाँच  हजार से अधिक  हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के  करीब कुंडलिया  , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है , 
कई  छंदों के   विधान सउदाहरण लिखे है , अनेक गूगल पर  भी आपको मिल जाएगें 

2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है 

 वर्तमान में  छंदों पर लेखन कर रहे है , छंद महल पटल से ई बुकों का प्रकाशन कर रहे हैं 

3- ब्लाग डाँट काम पर प्रकाशित  कृतिया - 

1- दोहा दीप (एक हजार दोहे ) 
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे ) 
3- दोहा सुभाष (एक हजार)
4- बुंदेली बराई ( एक हजार ) 
5. बुंदेली बांसुरी( एक हजार दोहे )
 6-मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य 
7 कलम से उद्गम. ( विभिन्न रचनाएँ )
8 -कुंडलिया कुंड 
9 गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
10- हिंदी छंद माला भाग एक व भाग दो 
11- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी 
12- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन , मुनि विचिन्त्य  शतक 
13- गर्भ से गमन तक 
14- बुंदेली  अहाने ‌
15- आलपिने 
16- जैनागम साहित्य सृजन 
17 - गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है 
18  - ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें हैं 
       व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है 
19  वर्तमान में सम्पादन - 
1- छंद महल ( हिंदी ई पत्रिका ) जिसके  30  विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके हैं 
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक  हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है 

20 - यूट्यूब - सृजन चैनल का‌‌ संचालन

21- कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
22- अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है

©®  सुभाष सिंघई 
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660 
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विषय - *पुस्तक *

वीणा   पुस्तक  धारिणी ,   नमो  शारदे  मात |
हंसवाहिनी दिव्य तुम , कवि मन नवल प्रभात || 1

अक्षर-अक्षर  ज्ञान है , पुस्तक लगे  अनूप  |
भक्ति भाव से पूजता  , माँ शारद का रूप ||2

पुस्तक   मेरी   मित्र  है , पुस्तक   मेरी  मात |
दिखला दे जब राह को , पुस्तक बनती तात ||3

पुस्तक में जो   खो गया , उभरे   बन  विद्वान |
पुस्तक उसकी  एक दिन , बन जाती पहचान ||4

वेद ग्रंथ या कुछ कहो  , पुस्तक और किताब |
माँ शारद सबमें मिलें , सीधा  सरल   हिसाब ||5

आना   मैया  शारदा , रख   सेवक की  शान  |
कलम सुभाषा कर सके , हिंदी  अभियुत्थान ||6
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माँ देवी दुर्गा 
करते सब है  आरती ,  मैया के दरबार  |
गरबा   खेले नारियाँ, कर  सुंदर शृंगार ||7

गरबा  पूजा आरती , यह   सब  मंगल काम |
जगराता  करते  भजन , लेकर   माता  नाम ||8

दीप जलाकर मध्य में, नाचें   देकर   ताल |
माँ  बहिनें  गरबा करें ,  देवी   के    पंडाल   ||9
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                   जननी माँ
मंदिर की देवी  लगे  ,   अमृत- सा   अनुराग  |
नहीं शब्द माँ पर  बने , बोल सकें हम  त्याग ||10

ममता माता की  अमर ,लगा न उस पर दाग  |
माता के आँचल रहे   ,अनुपम   सदा  पराग  ||11

माँ   की ममता  जानिए , जिसमें  है  मकरंद |
कवि भी लिखते हैं सदा , माँ  पर सुंदर   छंद‌ ||12

माँ  के  चरणों  में  सदा , दिखे   गंग की धार  |
हम जिसका न चुका सकें   माँ   ऐसा  उपकार ||13

आशीषों की बरसात भी, माँ  के  करते  हाथ |
बला   हटाने   पुत्र  की   ,  माता  चूमे   माथ ||14

नाम सभी जग में  करें  ,जो  करते   सम्मान  |
विपदा रहती दूर है  , जब  माँ का  हो ध्यान ||15

कभी भूलकर मत करें , माता ‌को नाराज | 
माता जीवन में सदा,  रहती    है आगाज ||16

प्रभुवर फल देते  नहीं, भटकें सकल जहान  |
जो   माता  को छोड़कर, होता  अंतर ध्यान  ||17

उन्नति माँ के हाथ में , यश   रहता  है‌ पैर |
माता अपने दूध से , सब कुछ करती खैर ||18

रहमत बरकत भी सदा , है‌ हसरत के साथ |
जन्नत  मां  के‌  पैर  में , बरकत  मां के  हाथ ||19

जन्नत  मां  के‌  पैर  में , बरकत  मां के  हाथ |
रहमत  रहती  नैन  में , हसरत‌‌ दिल के‌ साथ  || 20

बड़ा नहीं कोई  हुआ, रख ले  माँ    को पास |
रहते  सब माँ  पास हैं  , छोटे  सभी  सुभास ||21

माँ का रुतवा रख सके  ,  किसकी है औकात |
रुतवा  बेटा   मानती , कहती माँ  यह बात ||22

नहीं  छोड़ती  आज  भी , माता  मेरा  साथ | 
जग  मेले  की  भीड़  में, पकड़े  रहती हाथ ||23

माँ सबकी  चिन्ता  करे ,  सुत  रहते  निश्चिन्त |
भला बुरा सब जानती , मां की नजर अनन्त ||24

कह  सुभाष  संसार में  , भाग्यवान हैं लोग |
दवा बने मां की  नजर  , पास न आवें   रोग ||25

जहाँ हौंठ  ने ले लिया , माँ का पूरा नाम |
वहाँ साँस भी बोलती  , पूरे  चारों   धाम ||26

देवालय सी माँ  लगे  , अनुपम माँ अनुराग  |
शब्द  नहीं  ऐसे बने ,   वर्णन  कर दे  त्याग ||27

माँ  संतानो   के  लिऐ ,  इतना करती त्याग   |
त्याग  मूरती सब कहे ,  ममता  लगे  पराग   ||28

माँ  की  ममता  छाँव है  , लगती  बड़ी अनूप  |
शीत  लगे  वह  जेठ  में ,  पौष  माह   है  धूप ||29

माँ  की  महिमा  जानिए , माँ  पद  प्रभू समान |
आते ही जग में यहाँ  ,   माँ  ही  पहला  ज्ञान ||30

रख देती है  माँ  सदा , जब-जब शिर पर हाथ |
मिले सफलता काज में ,    ऊँचा  रहता  माथ ||31

उसका भी यश फैलता , जो  करता  है   मान  |
विनय करे माँ की सदा , रखता उसका ध्यान ||32

माँ को जिसने कर लिया, कर्मो‌  से नाराज | 
प्रभू  नहीं  स्वीकारते , पूजन  का आगाज ||33

रहमत  रब  देता  नहीं , मिले  उसे‌  फटकार |
जो मां से मुख मोड़कर , खोज रहा है  प्यार ||34

                 गुरु
शब्दों से हम क्या‌ लिखें , गुरु का रूप अनंत |
हाव भाव वाणी वचन ,  गुरुवर   सदा  वसंत ||35
 
गुरु   चरण में  जाइए     करते  वह उपकार | 
दर्शन उनके जब मिलें,    लीजे चरण पखार ||36

जगन्नाथ सम   मानिए , गुरु   का  पावन  हाथ |
भाग्यवान ही जानिए  ,जिसको गुरु का  साथ ||37

गुरु चरणों में जो झुके  ,  सबको   देते नेह |
पढ़ते गुरुवर है  सदा  , सबके‌ मन का गेह ||38

गुरु की महिमा जानिए , पद है  प्रभू समान |
गुरु करते जीवन शुरू , देकर  सच्चा ज्ञान ||39

गुरुवर रख देते सहज, जिसके  शिर पर हाथ |
यश  मिलता जग   में  उसे, उन्नत  रहता माथ ||40

विष्णु ब्रह्म  शंकर नमो  , तीन लोक शुचि धाम |
तीनों  हैं  गुरु रूप में , जिनको‌   कोटि   प्रणाम |41

जीवन  होता  है   शुरू , जहाँ   गुरु  के  पाद |
संरचना   जीवन  जहाँ , गुरु   होते   बुनियाद ||42
 
गुरुवर  हरियाली रहें  , जीवन  के हैं  सार |
गुरु चरणों में जो रहें  , हर  दिन है  त्योहार ||43

गुरुवर  बाँटे  ज्ञान जल  ,  जहाँ  शिष्य में प्यास |
शशि रवि नभ गुरु मानिए , जीवन   में उल्लास ||44

गुरुवर  विद्या  बिम्ब हैं , शिष्यों  को  अवलम्ब |
ज्ञान चक्र की हैं  धुरी , अनुशासन  के   खम्ब  ||45

पद पंकज  गुरु  जानिए , पावन  हैं  शिव गंग |
सप्त  सुरो   के  राग  सब , पूरण  ज्ञान   तरंग ||46

गुरुवर  का  सानिध्य  है  , ब्रह्मा    का   दरबार  |
देते रहते   ज्ञान जल  ,  शिष्यों   को   उपहार ||47

गुरुवर  के  पग  से  सदा , झरता   रहे  चरित्र |
शिष्य  उन्हें स्वीकार कर   , बनें  ज्ञान के  इत्र ||48


मात-पिता- गुरुदेव का , सँग में भारत  देश |
पहला    वंदन शारदे    , अष्ठ अंग  परिवेश ||49

सीमा-सैनिक-सैन्य बल , और साथ विज्ञान |
दूजा वंदन खेत पर , जो है‌ं श्रमिक किसान ||50

राह दिखाते   धर्म  की , मानवता   है  शान |
तीजा वंदन संत जन, जहाँ   अहिंसा   गान ||51

भारत की सब बेटियाँ ,  ‌सभी बहिन विद्वान |
चौथा वंदन  देवियाँ , जो भारत  की   शान ||52

सीमा पर बलिदान है , जिसका अमर सुहाग |
पंचम वंदन में नमन  , उनका  लखकर त्याग ||53
                      
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शिक्षक और समाज में , शिक्षक का पद श्रेष्ठ |
शिष्यों  को वह  बाँटता ,  अपना  ज्ञान यथेष्ट ||54

मिलती  शिक्षा ज्ञान की , और आचरण ताज  |
इन  दोनों  की  है  धुरी , शिक्षक और समाज ||55

गुरुवर  बाँटे  ज्ञान जल  ,‌ दे समाज  आगाज |
कह सकते  दोनों धुरी , शिक्षक और समाज ||56

मात-पिता जैसा यहाँ  , शिक्षक  का सम्मान |
जहाँ तपस्या माँ - पिता  , शिक्षक है वरदान ||57

शिक्षक की गरिमा सदा, आती बनकर  छाँव।
इनके   पीछे  जो चले  , कभी न थकते पाँव ||58

शिक्षक स्वयं प्रकाश है , ज्ञान पुंज है तेज |
तिमर हटे अज्ञान का , दिया  ईश ने भेज ||59

मात-पिता देते जनम , शिक्षक यहाँ विशेष |
ज्ञान बीज रोपण करें , गुरुकुल के परिवेश ||60
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बस्ता बोझा मानकर , फेका  था उस  पार |
वह बोरा अब  ढो रहे   ,बनकर  पल्लेदार ||61

भारी    बस्ता   को कहा , यह  थोड़ा  है  सार  |
उन्हें मिला है आजकल  , कुर्सी पर  अधिकार ||62

बस्ता  रखता  ज्ञान  है ,  देना   पड़ता  ध्यान |
समय अगर बस्ता दिया , बस्ता दे  तब  मान ||63

बस्ता   में   रहता   सदा ,  माँ  शारद  का नूर |
पृष्ठ -पृष्ठ को  खोलिए , ज्ञान   मिले   भरपूर ||64

सदाचरण  बस्ता  बँधे  , मिलती रहती  जीत |
जहाँ आचरण स्याह हो  , हार  बने तब मीत ||65

मिलते ज्ञानी‌   से   रहें , दिन बीतें जब चार |
‌सत्संगति से  एक दिन , पुष्प खिलें मनुहार ||66
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बापू का है  जन्म दिन ,  करता उनसे बात |
शामिल  होनें   आइये , बच्चे   बूड़े   तात ||66

बापू  हमको   मिल गई  , उनसे  अब सौगात | 
जन्म दिवस पर  आपके , वादों की  बरसात ||67

बापू  हम सब  आपका  , नाम  करें   उपयोग |
चल   जाती है गोटियाँ  , और   चलाते   लोग ||68

बापू   बंदर   आपके ,    हुए   तीन  से   चार |
उछल कूँद नेता करें    , आज  हमें  स्वीकार ||69

क ख ग नहीं   जानते , कैसा   गांधी   वाद |
वही आपके  नाम से  , रखें  निजी बुनियाद ||70
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जीवन   में जब-जब करें , यहाँ चुनौती   वार |
विजय सत्य की देखना   , झूठ झुकेगा  हार ||71

संघर्षों  को  देखकर ,    मत  घबरायें   आप |
साहस से कर सामना , मिले विजय की छाप ||72

मंजिल पर अधिकार है , जिनके पास प्रयास |
विजय सदा हँसती मिले  , आलस रहे  उदास ||73

रखे  अँधेरा लोग जब , तब रावण-सा  हाल |
यश नौका भी डूबती , विजय न देती  ताल ||74

विजय पर्व सब जानते , कहें  दशहरा नाम |
लंका में झंडा   सुनो  , फहरा   आए   राम ||75
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कवि लेखक चारों तरफ,   दिखते   हैं  भरपूर  |
धन्यबाद है  एफ बी,  उदित    किए   है  शूर ||76

पाठक भी अब कवि बने , अच्छी लगती बात |
माता का  आशीष है  , बढ़ती कवि कुल जात ||78

विनती मेरी  एक है , सभी   दीजिए  ध्यान |
आपस में  दो शब्द से , सबको   देना  मान ||79

कवि पाठक के मध्य में   , खिलते रहते फूल |
रहें मित्र के   रूप  में,   एक  नदी  ‌के  कूल  ||80

कविता की गंगा बहा  , करो   खूब  स्नान |
सबको भी  सहयोग दे , विनती है श्रीमान ||81

मुखपोथी पर मानिए , सब  है सबके  मित्र |
खुश्बू विखराते सदा ,   बनकर उम्दा   इत्र ||82

सभी गुणी जन फेस बुक, सबका है सम्मान |
सदा परस्पर प्रेम भी ,  सुनता सबका  गान || 83

स्वागत हम सबका करें ,   स्वीकारो   सत्कार |
कवि पाठक के मध्य में , सदा बहे   रस  धार ||84
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फेंके थे जो  खेत पर , कभी छांटकर आम | 
उगकर छाया  दे  रहे, और  फलों  से  दाम ||85

देख  रहे  हम  दूर  से  , तथा  कथित  सरदार |
वाह-वाह   करवा    रहे ,    पाल  जमूरे   चार ||86

फुदक-फुदक खाते रहें , मेढक  सम  अविराम |
नेता   कहें  ब्यान   में ,  मुझको   रहे   जुखाम ||87

नेता को  फुरसत नहीं , अफसर  करे  न  काम |
जनता  चोखट   पूँजकर , चढ़ा   रही  है   दाम ||88

घोषित  खुद है  देवता , खुद  ही  रखते‌  बीन |
खुद  की  पूजा  के  लिए ,  रखें  पुजारी  तीन ||89

चार   जमूरे    पालकर , बने     हुए   उस्ताद |
सेवा का  नाटक  करें ,  नहीं‌  मंत्र  कुछ याद ||90

मिलते हमको राह में  , तरह -तरह   के  लोग |
जिसको जितनी लालसा , उनको उतना रोग ||91

उपदेशक  है  ज्ञान के  ,  पीते  रात  शराब |
उनका जनता एक दिन , करती पूर्ण हिसाब ||92

बढ़ता है कब काफिला , हाथ पाँव को जोड़ |
सेवा  करना  सीख लो , मिलें   सैकड़ों  मोड़ ||93

नमक मिर्च‌‌ खुद डालकर‌, घृत का भी  दे होम |
पंचायत  में   पंच  ही  ,  करते   बात  विलोम ||94

वेश्याओं  सा  हाल है   , मन में  रखते ‌  खोट |
नेताओं   को  श्राप भी , कभी‌  न देता  चोट ||95

वही आज सबको चुने , जिसको चुना चुनाव |
जैसे   को  तैसा  हुआ , मिलता सबको घाव ||96

चापलूस  का जानिए  , फुसलाता  जब  कीट |
फिर कुछ दिन में देखिए , सिर पर करता‌ बीट ||97

चापलूस को‌‌ यदि मिले , जिस घर सुनो पनाह |
करता है वह‌ एक दिन , उस  दर  शीघ्र‌  गुनाह ||98

आडम्बर का कुछ दिवस , रहता है सम्मान |
फिर देखा  है एक दिन, वह‌ रोता शमशान ||99

अपनी- अपनी फाँकना , नहीं  वीरता  काज |
होता है  जब  सामना , खुल  जाता  है राज ||100

उल्टे-पुल्टे  काम  है ,  नहीं  आचरण   शुद्ध |
बनते   खुद  ही  देवता  , कहते हम  है  बुद्ध ||101

खाल पहनकर शेर की , चली किसी ने चाल |
सुनी  कहानी‌   एक है‌,  वही आज है  हाल ||102

नहीं  जरुरत आपको , फिर भी‌ मिले सलाह |
दे   जाते‌   है  मुफ्त‌ में, रखकर ‌ तुमसे  चाह ||103

चार कदम पर बीस टन,  जिसको है अभिमान |
कैसे  आए   पास  में ,   रक्षा   को   भगवान ||104

रावण से भी अधिक है , जिनको  अभी गुरूर |
उनकी लंका एक दिन , होगी   खाक  जरूर ||105

चापलूस   को‌  पालकर , जो‌  खो  देते‌  मित्र |
अंधा‌   उनको‌‌  मानिए , छोड़े  अच्छा   चित्र ||106

मुख  बोले  कुछ  और  ही , आँखें  बोलें  और |
समझो   ऐसा  आदमी , कहीं  न  पाता   ठौर ||107

जो सुभाष  दानी  बना   , करे‌ दान   का‌  शोर |
खोजो  तब यह आदमी , किस  कोने  से‌  चोर ||108

जिनकी मंशा  यह‌ रहे  , मिले घूरने   हूर |
चाहत  में  वह‌   घूमते , बने‌‌   हुए  लंगूर ||109

मौका  दूजों पर‌ मिले , हँसने  उठे  हिलोर |
खुद पर है जब बीतती ,  रहते दाँत‌ निपोर‌ ||110

हर घर में है बेटियाँ ,  होती  जहाँ  जवान |
पर दूजे  की देखकर , क्यों डगमग ईमान  ||?111

अपनी   डीगें  हाँकना , नहीं   वीरता  काम |
महफिल ऐसो की लगे , हो भांड़ो की शाम ||112

स्वयं   ढिढ़ोरा  पीटकर   , बतलाए    ईमान |
उतना  बेईमान  है ,   जितना   गाए    गान ||113

अपनी फितरत के लिए, देखे तिकड़मबाज |
चम्पी मालिस तक करें, और खुजाए खाज ||114

छोटा  मोटा  पद  मिला, करने   लगे    घमंड |
सड़ा  श्वान आता नहीं , जिस दिन पदवी झंड ||115
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नहीं दिखावा में पड़े , रखे   न मन  में मान |
संत सदा समभाव  से,  देता ‌सबको ज्ञान ||116

जहाँ दिखावा चल रहा , खुले एक दिन पोल |
भूसा  का  बोरा सदा , ले   जाता   है  झोल ||117

नहीं  दिखावा चल सके , दिख जाती  है फाड़ |
दौड़  लगाती   लोमड़ी ,  सुनकर  शेर  दहाड़‌ ||118

जहर हवा‌ में घुल गया  , मौसम  आज  उदास |
रूठ रहे हैं  आजकल, जो  थे कल तक खास ||119

गिला नहीं अब पालता , आज समय का फेर  |
सावधान  रहता सदा , करे‌   समय फिर‌‌  हेर  ||120

जो    पैदा   हालात   है  , नहीं  कहीं  उल्लास |
फिर भी‌‌ साहस तेल से ,  रखता  हरदम आस ||121

तम का घेरा हर जगह , सब कुछ  डावाँडोल |
बाहर कितनी   रोशनी , द्वार हृदय के  खोल ||122

बाहर कितनी रोशनी , बिखरी   है  अनमोल |
भीतर कुंडी क्यों चढ़ी ?, द्वार   हृदय के खोल |123

वहाँ सभी वर्बाद है , जिनकी थी  कुछ  साख |
चढ़ा जहाँ पर  फोवियो , उड़े वहाँ अब  राख ||124

लोग वहाँ अब क्या करें , जहाँ पले है  नाग |
सबको   रहते   काटते  ,   देते   रहते   दाग ||125

कीड़े खाकर छिपकली , छिपी राम तस्वीर |
वहाँ  बैठकर  सोचती  , बदलेगी   तकदीर ||126

आज मनुष का हाल है , करे पाप दिन रात |
राम नाम ले सोचता , मुझको  मिले प्रभात ||127

कर्म जहाँ  खोटे दिखे , राम   रहें  तब  दूर  |
करनी की भरनी  मिलेे ,पाप जुड़ें  भरपूर ||128

रुदन भरे   इंसानियत, दुखी  दया   है  आज | 
दानव दर  के  सामने , याचक लगती   लाज ||129

हाथ जोड़कर   घूमते    , संकट  हुए न  दूर |
मजदूरों के  हाथ में  , लिखा हुआ  मज़बूर ||130

ज्ञानी जी का जब हमें , दिखा रूप  विकराल |
समझ गया तत्काल मैं , इनमें   भरा  मलाल ||131

चिकनी रोटी   खा  रहे ,   नेता जी के  भक्त |
जयकारों  की जंग  में , दिखते  बड़े  सशक्त‌ ||132

सांड़  बने जो  मारते, सींग और खुर लात |
ऐसे ज्ञानी  एक दिन , खौ    बैठे  औकात ||133

कुछ लंकाएं बन गई  , भारत में ही आज |
एक बार हनुमान जी , करो  पूँछ से काज ||134

राम नाम सुनकर ‌यहाँ , भड़के   है जो  लोग |
एक बार फिर पूँछ का ,उन पर करो प्रयोग  ||135

लंकाएं भी  बन गई  , गली गली में  आज |
क्या कर दे हनुमान जी ,कैसे हो अब काज |136

भारत माता जय सुनें , भड़के जो भी  लोग |
समझाने का छोड़िए  , उन पर आप प्रयोग  ||137
~~~~

नहीं वचन कटु बोलिए, जब हो कुछ मतभेद |
नजर  मिलें जब प्रेम से, प्रकट  कर सकें खेद ||138

वाणी   कटुता   से  भरी  , मन  होता   बेचैन |
मिलने  पर    शर्मिंदगी , नीचें   झुकते    नैन ||139

बचपन में घुटते रहे ,  जिनके  सब  अरमान |
युवा   हुए  सैनिक  बने , सीमा पर बलिदान ||140

बचपन में भूखा रहा , जो   बालक  नादान |
वही आज सरकार को , दाता अन्न किसान |141

सर्दी   वर्षा     गर्मिया , देती     कष्ट    अनंत |
वह बचपन क्या कह सके , कैसा लगे बसंत ||142

नंगा बचपन;अब बड़ा , देख रहा  निज वस्त्र |
अधनंगा  अब भी रहे ,  लगे  चीथड़ा  त्रस्त ||143

बचपन की किलकारियाँ , युवा   बनी  बेहाल  |
भरती   है  सिसकारियाँ , नहीं काम की ताल ||144
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


हिंदी हम   सब   मानते, हिंदी  मेरी शान |
हिंदी का   परचम रहे , हिंदी    हिंदुस्तान ||145

हिंदी   हिंदुस्तान  में ,    फैले  अब साहित्य |
हिंदी का अनुभव करें , अनुपम है लालित्य ||146

हिंदी  हिंदुस्तान में ,  नहीं रगड़ का ध्यान |
समझाते  दो‌ एक  दो , फाईलुन  श्रीमान ||147

हिंदी‌  की    चिंदी   करें , नुक्ता-बिंदी   डाल |
खतना करते छंद की , हमको  यही  मलाल ||148

हिंदी   के  जो   छंद  में , नुक्ता  करे  प्रयोग  |
लगता हमको है उसे , अक्ल  अजीर्ण  रोग ||149

तुलसी  सूर  टटोलिए , पढ़े जरा  साहित्य |
नुक्ता नहीं प्रयोग है , फिर भी है लालित्य ||150

नुक्ता  उर्दू    फारसी , आधा   करता   वर्ण |
फिर नुक्ते से  छेद क्यों, करते   हिंदी  पर्ण ||151


मिला दिखावा अटपटा , कुछ हिंदी आचार्य |
समझाने का वह करें  ,  अरकानों से कार्य ||152
गणों को वह भी भूले |
फारसी  झूला    ‌झूले ||

करें दिखावा बंद अब  , ‌सभी श्रेष्ठ विद्वान |
छंदों  की खतना तजो , हिंदी  के श्रीमान ||153
चली अब कैसी क्रीड़ा |
बहुत है   मन में पीड़ा |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(आप यह राधे- राधे का‌ मंत्र अजमाकर देखें , यदि कहीं अनीति हो रही हो‌, और वहाँ आप राधे- राधे बोल दें, तब  सभी का ध्यान आपके बोल पर आ जाएगा कि राधे- राधे नाम सचेत कर रहा है | 

मिले भगत जब सामने , राधे -राधे  बोल |
नैन मिलें हरषें ह्रदय , मन के द्वारे  खोल ||154
हरे कृष्णा का नामा |
भाव में आए श्यामा ||

अवला हो जहाँ द्रौपदी , कातर करे पुकार |
राधे- राधे बोल कर, बनो  कृष्ण  अवतार ||155
हटा  दो पीड़ा  बाधा |
देखिए ताकत राधा ||

राधे- राधे बोलकर  , हम आए   जिस    द्वार |
मालिक आकर कह गया , गलती करूँ सुधार ||156
नाम का देखा छापा |
मिला है यहाँ  प्रतापा ||

राधे - राधे बोल से , कलयुग जाता डोल |
चिंतन के सँग चेतना ,मन की देता खोल ||157
बोलिए  राधे - राधे |
सभी जन सीधे साधे ||

हमने     बोला   सामने ,   राधे‌ -राधे   बोल |
चौकन्ना वह हो गया , पहना सच का खोल ||158
बोलता    सत्य  रहूगाँ |
नहीं    मैं  झूँठ  कहूगाँ ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~


दोहा लिखना सीखिए , शारद माँ धर ध्यान |
तेरह ग्यारह ही नहीं , होता   पूर्ण    विधान ||159

गेय‌ छंद दोहा लिखो , लय का रखिए ख्याल |
जहाँ कलन में  मेल हो , बन जाती है ताल ||160

चार चरण सब जानते  , तेरह  ग्यारह  भार |
चूक कलन से चल उठे , दोहा पर  तलवार ||161

अष्टम नौवीं ले  जहाँ , दो  मात्रा  का भार  |
दोहा   अटता है   वहाँ , गाकर  देखो यार ||162

जगण जहाँ  पर कर रहा  , दोहे का आरंभ |
गाकर ही खुद देखिए  , लय का टूटे    दंभ ||163

यदि देवों  के नाम हों    , जैसे  नाम. गणेश |
जगण यहाँ यदि लय रहे ,रख सकते परिवेश ||164

पचकल का प्रारंभ भी , लय‌ को जाता लील |
खुद गाकर ही देखिए , पता   चलेगी   ढील ||165

अब कलन ( समकल- विषमकल )को समझिए ~

तीन-तीन-दो  , से   करें ,    पूरा    अठकल     एक |
जोड़ रगण "दो- एक -दो"  , विषम  चरण तब  नेक ||166

चार - चार का जोड़ भी   , होता  अठकल. मान |
विषम चरण में यति  नगण    , सुंदर   देता  तान ||167
(रगण = 212 , नगण = 111)

विषम चरण यति जानिए , करे रगण से गान  |
अथवा करता हो नगण , दोहा   का   उत्थान ||168

यह   लय  देते है सदा , गुणी  जनों का शोध |
खुद गाकर  ही   देखिए , हो   जाएगा  बोध ||169

सम चरणों को जानिए , तीन - तीन- दो -तीन |
चार- चार सँग तीन से   , ग्यारह  लगे  प्रवीन ||170

'विषम' चरण के अंत में , रगण नगण दो लाल  |
जो चाहो   स्वीकारिए , पर 'सम'  रखता ताल || 171

षटकल का चरणांत भी , सम में करता  खेद  |
दोहा लय  खोता  यहाँ , लिखे 'सुभाषा ' भेद ||172

सम- सम से  चौकल बने , त्रिकल त्रिकल हो साथ |
दोहा   लय     में   नाचता ,  फैला    दोनों    हाथ ||173
~~~~~`~~

दोहा लिखना सरल है , चरण बना यह दीन | 
दोहा लिखना है सरल , चरण नहीं अब हीन ||174

दोहा लिखे आप सभी , नहीं  चरण तुक तान |
आप सभी दोहा लिखें , दिखे   चरण में गान ||175

भरपाई‌   मात्रा   करें ,    माने   दोहा  आप |
गलत राह पर जा रहे , छोड़ कलन के माप ||176
~~~~~

दग्धाक्षर न  कीजिए , दोहा   हो   प्रारंभ |
कहता पिंगल ग्रंथ है , सभी विखरते दंभ ||177
 
इनको‌  झ र भ ष जानिए , ह भी रहे समाय‌ |
पाँच वर्ण यह लघु सदा , निज हानी बतलाय ||178

पाँच वर्ण यह दीर्घ हो , करिये खूब प्रयोग |
कहत सुभाषा आपसे , दूर तभी सब रोग ||179

विशेष ~ 
दोहा में यदि कथ्य हो , तथ्य.  युक्त  संदेश |
अजर - अमर दोहा रहे , कोई  हो परिवेश ||180

तुकबंदी  दोहा  बना , नहीं तथ्य पर तूल |
ऐसे   दोहे   जानिए , होते   केवल.  भूल ||181

चार चरण दो पंक्तियाँ , अक्षर अड़तालीस |
दोहा   छंद सुहावना, है  स्वतंत्र  जगदीश   ||182

कलन छोड़ दोहा लिखा , लय अटके हर हाल | 
अठकल यदि निर्दोष हो , कभी न बिगड़े चाल || 183

हाथ  पाँव   चारों  चरण , भाव  मानिए  प्राण |
यदि हो   सामंजस्यता  , दोहा  है तब    बाण || 284

चरण विषम  में यति रगण, सम पदांत है ताल | 
विषम और  समकल सही,  दोहा वहाँ  निहाल ||185

दोहा  के   गुण  पर  कहें , चरण बनें  है  चार |
चारों  में  यदि  मेल हो  , पढ़ने  मिलता  सार  ||186

नगण -रगण की यति नहीं , कलन -भार सब दूर | 
चरण   भाव   जुड़ते  नहीं , तब   दोहा   है   धूर ||187

सभी सुनो अब श्रेष्ठवर ,     बनना    दोहकार |
वाचिक में   लेता  नगण , लघु दीर्घ   है  भार ||188

यदि   छंदों   में   गेयता , लाना    है  श्रीमान | 
मात्रा-कलन-विधान का , रखना होगा ध्यान  ||189

कुंडलिया  दोहा   लिखें , रहे   गेय   पहचान  | 
यही गेयता   छंद की , समझो   होती   जान ||190

उच्चारण  से  देख लो  ,   मात्राओं  का भार | 
ज्ञात सहज हो जायगा ,  यही एक  उपचार ||191

जगण चरण में आदि हो , लय को  जाता लील | 
ज्ञानी   करके   देख   लें , और  करें कुछ फील || 192

{फील आंग्ल है , क्षमा प्रार्थी हूँ )

उपसंहार 

विनय  करें हम आपसे , अधिक न जानें  ज्ञान |
पर जो कुछ भी जानता ,  साँझा  है   श्रीमान ||🙏193

दोहा में   लिखकर  यहाँ ,    बतलाया जो सार |
माता   मेरी  ‌ शारदे   , करती    कृपा   अपार ||194

नगर जतारा में रहूँ    , मेरा  नाम    सुभाष |
माँ शारद लिखवा रहीं , मन‌‌‌‌‌ में किया  प्रकाश ||195

सुभाष सिंघई 
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अनुस्वार( ं बिन्दु) और अनुनासिक ( ँ चंद्रबिन्दु)

हिंदी या  देशज लिखो,  रखो  शब्द   की  आन  |
अनुनासिक अनु स्वार के, कभी न बदलो गान ||196

अनुस्वार का  बिंदु जब , लघु वर्ण पर आय |
दो मात्रा  गिन लीजिए , उच्चारण  बतलाय ||197

अनुस्वार यदि दीर्घ पर , बढ़े   न   मात्रा  भार‌ |
बड़ा सरल है व्याकरण , निकले  यह ही सार ||198

अनुनासिक  लेता  नहीं , कोई   मात्रा   भार |
करते    इसे   प्रयोग  है  , देखा    छंदाकार ||199

शब्द लीजिए मंगलं , है  ल पर अनुस्वार |(मंगलम् )
उच्चारण यह कह  रहा   , है दो मात्रा भार ||200

च|र चरण दो पंक्तियाँ , अक्षर अड़तालीस |

दोहा   छंद सुहावना, है  स्वतंत्र  जगदीश   ||201


कलन छोड़ दोहा लिखा , लय अटके हर हाल | 

अठकल यदि निर्दोष हो , कभी न बिगड़े चाल || 202


हाथ  पाँव   चारों  चरण , भाव  मानिए  प्राण |

यदि हो   सामंजस्यता  , दोहा  है तब    बाण || 203


चरण विषम  में यति रगण, सम पदांत है ताल | 

विषम और  समकल सही,  दोहा वहाँ  निहाल ||204


दोहा  के   गुण  पर  कहें , चरण बनें  है  चार |

चारों  में  यदि  मेल हो  , पढ़ने  मिलता  सार  ||205


नगण -रगण की यति नहीं , कलन -भार सब दूर | 

चरण   भाव   जुड़ते  नहीं , तब   दोहा   है   धूर ||206


सभी सुनो अब श्रेष्ठवर ,     बनना    दोहकार |

वाचिक में   लेता  नगण , लघु दीर्घ   है  भार ||207


यदि   छंदों   में   गेयता , लाना    है  श्रीमान | 

मात्रा-कलन-विधान का , रखना होगा ध्यान  ||208


कुंडलिया  दोहा   लिखें , रहे   गेय   पहचान  | 

यही गेयता   छंद की , समझो   होती   जान ||209


उच्चारण  से  देख लो  ,   मात्राओं  का भार | 

ज्ञात सहज हो जायगा ,  यही एक  उपचार ||210


जगण चरण में आदि हो , लय में आती  ढ़ील  | 

नहीं साँच को आँच है , करे आप खुद फील || 211


सारांश- -हिंदी, बुंदेली, अवधी बृज ,इत्यादि कोई भी भाषा  हो , सबकी जनक देवभाषा संस्कृत है , और  संस्कृत का उच्चारण  के आधार पर विधि सम्मत उच्चारण मात्रा  विधान है ,

अनुस्वार स्वर के बाद आने वाला शब्द  है। इसकी ध्वनि नाक से आती है|
अनुस्वार दो शब्दों से मिलकर बना शब्द हैं, शाब्दिक अर्थ होता है अनु + स्वर (स्वर के बाद आने वाले)। स्वर के बाद आने वाले व्यंजन वर्ण को अनु्स्वार कहते है। हिंदी भाषा के अनुसार इसका प्रयोग चिन्ह बिंदु के रुप मे किया जाता है। इसकी ध्वनि नाक से आती है

अनुस्वार शब्द का प्रयोग–
देखा जाएं तो हिंदी वर्ण माला मैं पांच वर्ग होते हैं, इन वर्गों में पांचवे वर्ण को पंचमाक्षर कहते है। जो निम्न है: ङ्, ञ़्, ण्, न्, म् इन शब्दों की जगह अनुस्वार (ं) का प्रयोग होता है।

अनुनासिक का प्रयोग
जिस प्रकार अनुनासिक की परिभाषा में बताया गया है कि जिन स्वरों का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से किया जाता है, वे अनुनासिक कहलाते हैं और इन्हीं स्वरों को लिखते समय इनके ऊपर अनुनासिक के चिह्न चन्द्रबिन्दु (ँ) का प्रयोग किया जाता है।
यह ध्वनि (अनुनासिक) वास्तव में स्वरों का गुण होती है। अ, आ, उ, ऊ, तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है।

जैसे –
कुआँ, चाँद, अँधेरा आदि।

अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार (बिंदु) का प्रयोग

अनुनासिक के प्रयोग में आपने देखा कि हमने बताया अनुनासिक स्वरों का गुण होता है और अ, आ, उ, ऊ, तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है। यहाँ आपके मन में संदेह उत्पन्न हो सकता है कि स्वरों में तो इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ भी आते हैं तो अनुनासिक इन स्वरों वाले शब्दों में क्यों प्रयुक्त नहीं होता।

इसका एक कारण है और वह यह है कि जिन स्वरों में शिरोरेखा (शब्द के ऊपर खींची जाने वाली लाइन) के ऊपर मात्रा-चिह्न आते हैं, वहाँ अनुनासिक के लिए जगह की कमी के कारण अनुस्वार (बिंदु) लगाया जाता है।

इस नियम को उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे –
नहीँ – नहीं
मैँ – मैं
गोँद – गोंद

इन सभी शब्दों में जैसा कि हम देख रहे हैं कि शिरोरेखा से ऊपर मात्रा-चिह्न लगे हुए हैं – जैसे ‘नहीं’में ई, ‘मैं’में ऐ तथा ‘गोंद’में ओ की मात्रा का चिह्न है।

इन शब्दों पर जब हम अनुनासिक (ँ) का चिह्न लगा रहे हैं, तो पाते हैं कि उसके लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, इसीलिए इन सभी मात्राओं (इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ) के साथ अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) लगाया गया है।
यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग करने पर भी इन शब्दों के उच्चारण में किसी प्रकार का अंतर नहीं आता।

अनुस्वार और अनुनासिका में अंतर

1) अनुनासिका स्वर है जबकि अनुस्वार मूलत: व्यंजन। इनके प्रयोग के कारण कुछ शब्दों के अर्थ में अंतर आ जाता है।

जैसे –
हंस (एक जल पक्षी), हँस (हँसने की क्रिया)।
अंगना (सुंदर अंगों वाली स्त्री), अँगना (घर के बाहर खुला बरामदा)
स्वांग (स्व+अंग)(अपने अंग), स्वाँग (ढोंग)

2) अनुनासिका (चंद्रबिंदु) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जबकि अनुस्वार को वर्ण में बदला जा सकता है।

3) अनुनासिका का प्रयोग केवल उन शब्दों में ही किया जा सकता है, जिनकी मात्राएँ शिरोरेखा से ऊपर न लगी हों।

जैसे अ, आ, उ, ऊ, ऋ
उदाहरण के रूप में – हँस, चाँद, पूँछ

इसी तरह - चाँद दाँत शब्द सही है  , पर चांद दांत भी मित्रगण लिख देते है , और कहते है कि चाँद का चा दीर्घ  है इस पर अनुस्वार बिंदु चां करने से मात्रा भार तो बढ़ना नहीं है , तो चांद लिखने में परेशानी क्या है ? परेशानी कुछ नहीं है , यह चांद दांत मित्रगण लिख ही रहे है

पर उन्हीं से ईमानदारी से पूछा जाय तो  वह सही उच्चारण अनुनासिक से चाँद ही करते है , चांद नहीं करते है , पर लिखते चांद है , अनुस्वार लगाने से चान्द ही तो हो रहा है , जैसे किसी का नाम रविकांत( रविकान्त) है ( कांत = कांत का आशय है, प्रेमी , पति , स्वामी , प्रिय और रुचिकर )   , तब आप रविकान्त ही उच्चारण करते है , रविकाँत नहीं करते है |   इसीलिए विज्ञजन चाँद में अनुनासिक चंद्रबिंदु लगाते है , कि यह उच्चारण में सही शामिल हो सके , जो भी मित्र गण , अनुनासिक की जगह अनुस्वार लगाकर लेखन आगे बढ़ा देते है , वह उच्चारण करके खुद देख ले कि वह क्या उच्चारण कर रहे है ,
जैसे - काँव या कांव / दाँव या दांव / आँसू या आंसू ,
यदि कोई मित्र गूगल या किसी पुस्तक में " शुद्ध शब्द और अशुद्ध शब्द " सर्च करे , तब बहुत से शुद्ध अशुद्ध शब्दों की जानकारी प्राप्त कर सकता है ,
सादर
सुभाष सिंघई

दोहा में  ध्यान देने योग्य बातें (दोहे की बारीकियाँ ) सउदाहरण

अक्सर लेखक/ कविगण  दोहे के प्रथम चरण में त्रुटि कर जाते है , जिससे लय चली जाती है

नगण 111 मात्रा भार के शब्द (जैसे नमन न + मन  |कथन क+थन | सहज स+हज | सरल स+ रल  इत्यादि ) (जिसका मात्रा भार लघु गुरु (12) होता है  , व 13 की यति पर हम पहले पटल पर आलेख प्रस्तुत कर चुके है कि 12 लगा या रगण 212 से ही लय आती है
यह हम पूर्व के आलेखों में लिख चुके है

अब दोहे की बारीकियाँ या कह लीजिए या ध्यान देने योग्य बातें जो सउदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ

1 -दोहे के किसी भी चरण में (चारों में ) - पंचकल से प्रारंभ किया हुआ दोहा  लय नहीं देता है
जैसे - दोहे का प्रथम चरण यदि ऐसा लिखे -

हमारा रहे गान अब ×  (लय आ ही नहीं सकती है )
   5.   3. 
रहे हमारा गान अब √ ( लय आ गई है )
3.   5

एवं

सजनियाँ चली  गेह से  × (लय आ ही नहीं सकती है )
   5.          3
चली सजनियाँ गेह से  √( लय आ गई है )
  3.      5
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

2--षटकल का चरणांत भी लय नहीं देता है  -जैसे -

बात हमारी मानिए  , कहे अब रामलाल |
मिलकर सब करते रहे , हमारी देखभाल ||

उपरोक्त  के समचरणों में  (रामलाल व देखभाल ) षटकल से चरणांत है , अत: षटकल का चरणांत लय नहीं दे रहा है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

3 - आठवी- नौवी मात्रा सं‌युक्त हो जावें तब भी  लय‌ अटक जायेगी -
जैसे - माता की रही ×
(रही) में( ही ) आठवी नौवी मात्रा संयुक्त हो रही है , सो लय अटक रही है , अत:
        माता की अब तक रही √

इसीलिए   निर्दोष अठकल , सभी चरणों के प्रारंभ में  बनाया जाता है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
4- अठकल में पूरित जगण भी लय भंग करता है
जैसे "  सुभाष  " जगण शब्द है , अब इसे हम इस तरह प्रयोग करेगें तो अठकल में भी लय नहीं आयेगी

जैसे -- पूजो  सुभाष अब यहाँ  =13 (किंतु लय चली गई है )

(पूजे  )पूरित चौकल  शब्द है व सही है पर ( सुभाष ) पूरित जगण  है ) लय अटकाव आ‌ गया है

लेकिन -  अब सुभाष  पूजो यहाँ " | जगण शब्द इस तरह लय में आ जाता है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

5~ छंद में चौकल और जगण समझें

चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (1111~ 11 2~2 11,~22) मान्य रहते हैं।

(121) शब्द, जैसे सुभाष  प्रकाश प्रकार   आदि शब्द  है । जो
जगण है , यह जगण शब्द पूरित चौकल के बाद , प्रयोग करने से अटकाव प्रदान करते है

(जैसे -कहता सुभाष देखकर   ) यहाँ दो चौकल है पर लय इसलिए नहीं है कि (कहता ) चौकल के बाद सुभाष पूरित जगण है

पर इसे - (कह सुभाष अब देखकर ) लिखने से जगण शब्द लय में आ गया है
~~~~~~~~~~~~~~~~

6- चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता।
दोहे के प्रारंभ के चौकल में( 3+1 चलो  न  ) मान्य है परन्तु (1+3  न चलो  )मान्य नहीं है।
जैसे - चलो न
इसीलिए कोई भी छंद एक वर्ण से प्रारंभ नहीं किया जाता है

(‘चलो   न’ )पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है।
(चलो  और न )दो अलग अलग शब्द हैं।

वहीं चौकल में (‘न चलो ’) मान्य नहीं है क्योंकि न वर्ण चौकल की प्रथम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
~~~~~~~~~~~~~~

7- अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। (‘देश काज हित)  सही है जबकि (‘हित देश  काज ) गलत है क्योंकि( हित  देश )  पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
और पंचकल का प्रारंभ दोहा लय नहीं देता है

पूरित जगण अठकल की तीसरी या चौथी मात्रा से भी प्रारंभ हो सकता है क्योंकि 1 और 5 से वर्जित है तथा दूसरी मात्रा से प्रारंभ होने का प्रश्न ही नहीं है, कारण कि प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता। ‘
जैसे - अब सुभाष सबसे कहे |√
अब  सुभाष सब  में जगण तीसरी मात्रा से प्रारंभ हो कर ‘(अब सु ’) और ‘(भाष  )ये दो त्रिकल तथा( ‘सब ’ )द्विकल बना रहा है।=अठकल √

इसी तरह चौथी मात्रा से जगण प्रारंभ हो सकता है
जैसे  -( पाप सुभाष न देखना ) =13 √ ,
‘पाप सुभाष न’ में जगण चौथी मात्रा से प्रारंभ होकर ‘पाप सु  ’ और ‘भाष  न’ के रूप में दो खंडित चौकल बना रहा है।√ है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
8 - एक साथ तीन पूरित त्रिकल भी दोहे में लय नहीं देते है
जैसे - रुको नहीं बीर  

~~~~~~~~~~~~~~~

अब और गहरी और काव्य सौन्दर्य बीरीकी ~

शिल्प काव्य सौन्दर्य ~
काव्य सौन्दर्य कोई पुस्तक या विधान नहीं है , पर यह सृृजन   चेतना का शिल्प  है , ,  चूकिं आप सभी ने दोहे बहुत लिखे है  , अत: दोहो के माध्यम से ही अपनी बात रख रहा हूँ

यह चार   दोहे है , सभी में कुछ अंतर  है

चिंतन रहता जिस जगह, वहाँ  चेतना   प्राश |
जहाँ ज्योति दीपक जले, छीने कौन  प्रकाश ||(१)

चिंतन रहता जिस जगह, रहे   चेतना   प्राश |
जलता  दीपक है जहाँ ,  रहता वहाँ  प्रकाश ||(२)

~~~~~~~इसी तरह ~~~~

गए खोजने यार  हैं ,     मक्खी   है  किस दाल |
घर  की  देखी दाल  तो , निकला मकड़ी जाल || 3

गए  खोजने यार जब ,       मक्खी  है  किस दाल |
खुद की देखी‌ लौटकर   , निकला   मकड़ी  जाल || 4

आप अभिमत अभिव्यक्त  करें कि कौन दोहे  तुलनात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ है , चारों दोहे सही है , पर शिल्प काव्य सौन्दर्य में कौन श्रेष्ठ है
मेरा मत पहले दूसरे में दूसरे के साथ है
व तीसरे चौथे में चौथे के साथ है
अगर बात समझ में आ गई हो तो यही शिल्प सौन्दर्य है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

काव्य  की भाषा में दोहा -  दुहा हुआ निचोड़‌ है (रस है )
" नाम" के आधार पर दोहा का अर्थ " भगवान की कृपा , पूर्वाह्न " है |
पूर्वाह्न का अर्थ है - सबेरे से दोपहर तक का समय, (दिन का पहला भाग ) अर्थात " पहला शीर्ष" भाग

दोहा - स्वतंत्र , क्रिया प्रधान, अग्रणी,  , मजबूत इच्छा शक्ति वाला , सकारात्मक, ऊर्जावान, उद्यमी, उत्साही होता है
चार चरण - दो हाथ -दो पैर है  | "तत्य युक्त कथ्य इसके कर्म बोल है   , एक दोहा दूसरे दोहा पर आश्रित नहीं होता है , चार चरण में ही अपनी बात पूर्ण कह देता है |

मात्रा भार, कलन ,  तुकबंदी  के साथ  संदेश / कथ्य युक्त तथ्य परक होना चाहिए , यह विद्वानों का अभिमत है

दोहे की भाषा सरल सहज बोधगम्य होना चाहिए

कठिन शब्दों से भी दोहा श्रुतिकटुत्व की श्रेणी में चला जाता है

अलंकार सहज  स्वाभाविक रुप से आ रहे हो  , व बोधगम्य हो ,तभी लाना चाहिए , जबरदस्ती लाने से दोहा कथ्य से भटकने लगता है |

यह आलेख आप सम्हाल कर रख सकते है , यह दोहे की बारीकियाँ है , सादर

आलेख - सुभाष सिंघई

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बुंदेलखंड के गौरवमय तीर्थ और स्थान

बुंदेली   हम   लोग  है ,   राजा   है   श्रीराम |
नगर ओरछा धन्य है , बना   राम   से  धाम ||212

बेटी के हर   व्याह में , रहें   कुँवर  हरदौल |
भानेजन को भात दें, रखें बहिन का कौल ||213

जहाँगीर अद्भुत महल ,नगर ओरछा  पाट |
मंदिर देखो  चतुरभुज , नदी   बेतवा   घाट ||214

शिवशंकर  रक्षा  करें  , रह  कुंडेश्वर  धाम ||
प्रकट हुए थे कुंड से , रुप पिंड  धर श्याम ||215

विन्ध्यवासनी मातु भी  , करती  है उद्धार  |
बुंदेली हर आन का , करती   सदा  निहार  ||205

मैहर   बाली  शारदा , देती   रहती   ज्ञान |
बुंदेली  जन  मानता , उनको अपनी शान ||216

अछरु   माता  जाइये , बिगड़े बनते काज |
जो भी माथा  टेकते  , माता रखती  लाज ||217

पन्ना को सब जानते , रहते जुगल किशोर |
हीरा  उगले भू‌ सदा, विचरें   वन  में  मोर  ||218

निकट नदी पर  झर रहा , पांडव एक प्रपात |
पन्ना की  घाटी  सुनो , बनी जगत  विख्यात ||219

यहाँ   नेशनल   पार्क है   , सुंदर  अभ्यारण्य |
सभी तरह के जीव है  ,निर्भय जिनका पुण्य ||220

भीम  कुंड  है  बाजना, रहती पुण्य हिलोर |
गहराई ‌ को  नापने  , मिले न  इसका छोर  ||221

दर्श  जटाशंकर  करो  , मिटती है सब पीर |
शिव शम्भू धूनी रमा , रहते   है   इस  तीर ||222

दतिया माँ  पीताम्वरा ,  सबकी पालन हार  |
स्वर्गिक सुषमा है यहाँ ,रजकण है उपकार ||223

खजुराहो      कंदारिया ,      महादेव   विख्यात |
चरण शरण जिनको मिले ,सुखमय सब हालात ||224

खजुराहो   में  देखिए   , शांतिनाथ   भगवान |
करो मोक्ष की कामना , रखकर   भाव प्रधान ||225

जैन तीर्थ अनुपम यहाँ , जिसका  नाम अहार |
राँगा     भी  चाँदी  बना ,   कहता‌‌   साहूकार ||226

निकट पपौरा   तीर्थ  है , गिनो एक सौ आठ  |
मंदिर यहाँ विशाल है , पढ़ो   मोक्ष  का  पाठ ||227

बंधा  क्षेत्र  मशहूर है , अजितनाथ   का धाम |
मुगल यहाँ पर बँध गये , हुआ न भंजन काम ||228

कुंडलपुर महिमा अलग  , आदिनाथ का धाम |
कहलाते    बाबा   बड़े , बिगड़े   बनते   काम ||229

छत्रसाल   महराज  को , मिला   यहाँ आशीष |
राज्य मिला खोया हुआ ,कृपा  मिली जगदीश ||230

सोनागिर   पर्वत  चढ़ो , चंदाप्रभु   का   धाम |
मंदिर  यहाँ  विशाल है, जग में   इसका‌  नाम ||231

चलो देवगढ़ आप सब , हर कण जिसका पूज  |
कला केन्द्र अद्भुत दिखे  , मिले   न  कोई  दूज ||232

गुना   जिले    में     जानिए , चंदेरी    थूबौन |
अद्भुत अतिशय है यहाँ , करो   साधना मौन ||233

बड़ागाँव  सँग  सेंदपा ,  नैनागिरी  विशाल |
यहाँ   मदनपुर  नाबई , लखो यहाँ हर हाल ||234

पवा करगुवाँ तीर्थ भी , वंदनीय  है  धाम |
नगर जतारा भोंयरा , दर्श करो  अविराम ||235

चित्रकूट में राम का , रहा    बहुत    वनबास |
सती अनुसुइया है यहाँ , जिनके सब है दास ||236

कामदगिर की वंदना , और    कामतानाथ |
हरते जन की पीर है , रखकर अपना हाथ ||237

नदी‌‌   यहाँ   मंदाकिनी , और जानकी कुंड |
जन- जन के है  माथ पर , रामा ‌यहाँ त्रिपुंड ||238

धारा   है  हनुमान  की , वन है  यहाँ  प्रमोद |
राम नाम उच्चार कर , मन का कर लें शोध ||239

राजापुर में ले जनम , कविवर तुलसी दास |
रामचरित मानस लिखें , जग में करें उजास‌ ||240

कालिन्जर का किला , रखता   है  इतिहास |
नीलकंठ मंदिर यहाँ , जिनके   सब है ‌दास ||241

अजयपाल का अजयगढ़ , दुर्ग यहाँ का नूर |
अमन महल को देखिए , नजरों  से   भरपूर ||241

रानी लक्ष्मी का सुनो , झांसी‌  का  बलिदान |
आजादी  लाने  तजे , जिसने   अपने    प्रान ||242

वीर   महोबा  के रहे , आल्हा   ऊदल  शान |
अलबेले   रणबाँकुरे  , बल का गज़ब बखान ||243

खेतसिंह  महराज  का , देखो   गढ़कुण्डार |
अद्भुत ‌लगता है किला , भव्‍य  रहा दरबार ||244

बाला जी उन्नाव का , मंदिर   अनुपम  सूर्य  |
मड़खेरा भी जानिए , जिसका  अपना तूर्य || 245
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शेर हमेशा शेर है , बदले  नहीं स्वभाव |
गुर्राता है   जोर से , सहे  पिंजरा घाव ||246

शेर उसी को जानिए , छोड़े नहीं दहाड़ |
दुश्मन आए सामने , देवे  उसे  पछाड़ ||247

वन का राजा जानिए , ताकत रखता  शेर |
सदा चुनौती मानता , करता सबको   ढ़ेर ||248

शेर घास खाता नहीं , करता स्वयं शिकार |
मरा हुआ या दूसरा ,    करता नहीं निहार  ||249

रखो हौसला शेर सम , रखकर हाथी चाल |
श्वान सदा ही   भौकते, मत होना   बेहाल ||250
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चंदा-सी   बेटी     लगे   , बेटा    सूरजभान |
छोटी नातिन है  किरण, नाती घर  में  शान  ||251

सूरज उगता पूर्व में , निकट   कोण  ईशान |
रहते जहाँ   कुवेर है , धनपति श्री भगवान || 252

सूरज की किरणें सदा , तन को रखे  निरोग |
प्राण पवन पावन करें , बनते    सुंदर   योग ||253

सूरज से मिलता सदा , पेड़ों को आराम |
हरे रहें पत्ते सभी  , दें    छाया   विश्राम ||254

सूरज जिसके लग्न में , बैठा   हो   मुस्काय |
बाल न बाँका हो सके , पोथी यह  बतलाय ||255

खुद की मेहनत में रहें ,आकर के भगवान |
सूरज कभी न डूबता , जिस घर में  ईमान || 256
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पानी निर्गुण  संत  है , नहीं किसी   का दास |257
भेद भाव रखता नहीं , सबकी  हरता  प्यास ||

संत समागम साधना , संयम हो   प्रतिमान  |
ज्ञान दायनी  गंग तब  , प्यास करे अवसान  ||258

प्यास सदा  बढ़ती  रहे ,  लालच लोभी द्वार |
वहाँ  भागती दूर  है ,     जहाँ  तृप्त  दरबार ||259

हो   कुवेर  की सम्पदा ,   तीन   लोक  बरसात |
प्यास वहाँ बुझती नहीं , यदि लालच  दिन रात ||260

प्यास सदा हमको रहें , मिलता    जाए  ज्ञान |
आप सभी के साथ में ,  सीखूँ नव  प्रतिमान ||260
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जेठ अमावस पूजती ,  वट को   नारि विशेष  |
सदा करें पति की कुशल, ब्रह्मा  विष्णु महेश ||261

सदा सुहागिन वर मिले   , वट सावित्री पूज |
सावित्री का मान यह  , और न कारण दूज ||262

पूड़ी  मीठा अन्न भी , ले  चौवीस   प्रकार |
पूजन कर धागा लिए  , बाँधे  वह मनुहार ||262

सावित्री से खुश हुए , सुनी  कथा यमराज |
लौटाये पति प्राण थे , सत्यवान के   आज ||263

एक और संदेश  है , रखो   वृक्ष का  मान |
पूरे  जीवन भर हमें , करें कृपा  का  दान ||264

वट-बरगद-बरिया कहो , या कह लघु कैलाश |
महादेव का अंश  यह  , देता    सदा   प्रकाश ||265
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दया बसे सज्जन हृदय , या फिर संत-फकीर |
कह सुभाष यह पुष्प-सी , महकत रहे अबीर ||266

दया   रहित  मानव  कहा , होता   है  शैतान  |
पाप पुण्य के बेल की , करे   नहीं    पहचान ||267

सदा  दया उर  में बसा , मृदुता  भाव प्रधान |
जग में  जो  निस्हाय है , उनको   दीजे दान ||268

दया क्षमा करुणा जहाँ  , होते  मीठे  बोल |
आभूषण नर   के बनें , जो  होते  अनमोल ||269

दया धर्म मत  छोड़ना , हो   कोई   परिवेश |
महावीर  श्रीराम   का , सदा   रहा   संदेश ||270
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घुटन   जानिए  आग  है ,  साँसे  जहाँ  उधार |
पर  हिम्मत  से  आदमी ,   जी   लेता  संसार ||271

घुटन भरी है  जिंदगी , मत  सोचो‌  यह मित्र |
रहकर नव उल्लास से , खीचो ‌ सुंदर   चित्र ||272

चले  गए  जो  लोग है ,  जहर  हवा में घोल |
घुटन उसी  से  हो  रही , कहते‌‌ ज्ञानी  बोल ||273

घुटन जहाँ महसूस हो , मिलता हो यदि ताज |
एक घड़ी  में छोड़ दो ,   तीन लोक का राज ||274

घुटन   जिन्होनें  सीख ली , अपने  घुटने  टेक |
ऐसे   नर   संसार  में , कहे   न   जाते    नेक ||275
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बंशी की धुन को सुने, सुनकर   मिले   करार  |
राधा  होकर  बावली , करती   श्याम  निहार ||276

धुन के पक्के   लोग  ही , करते   है   उत्थान |
मिलते मंजिल पर सदा, अपना लिए निशान ||277

सूरदास  को  जानते  , युगल  नेत्र  थे   हीन |
पदावली   गाते  रहे , सदा  श्याम  धुन लीन ||278

अब मेरी धुन देखिए  , निकल गये  है  साल |
पर छंदो को आज भी, सीख  रहा ‌ हर   हाल ||279

मीरा की धुन है  अमर  , रहे    सुखद  परिणाम |
पिये  हलाहल में दिखे   , अमरत बनकर श्याम ||280
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नहीं   मिटाने  जाइये   , दूजों   की  तहरीर  
पर खींचों  तदबीर से , अपनी बड़ी लकीर ||281

राम नाम  आधार  की  , पकड़े  रहो  लकीर |
अपने करुणा भाव का ,   जिंदा रखो जमीर ||282

कर्मो के   आधार  पर , बनती   हाथ  लकीर |
करनी की भरनी मिले , बनकर   के तकदीर ||283

अवसर  पर जब  शूरमा , चला  न  पाएँ   तीर  |
सर्प  गमन के बाद  वह  , पीटत   रहें   लकीर ||284

मर्यादा   में    जो   रहे ,    लाँघे  नहीं  लकीर |
संकट  रहता  दूर   है, कहते    संत   फकीर  ||285

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जीवन में तू पर्यटक  , जगत   पर्यटन  धाम |
जाना इस  संसार  से  , भजकर  सीताराम ||286

करते  रहना   पर्यटन , धर्म कर्म   की राह  |
हो जाएगी एक दिन , तेरे   मन  की‌   चाह ||287

करे सुभाषा  पर्यटन , रोज  नहाता    गंग |
लहरें मन की मौज में ,  डुबकी लेता चंग ||288

पढ़ी ग्रंथ में योनियाँ ,   है   चौरासी  लाख |
करे पर्यटन जीव यह, लेकर अपनी साख  ||289
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सदा झुनझुना हम रहें , नेता  जी के द्वार  |
लोकतंत्र की रीढ़ हम , पर रहते   लाचार ||290
बजाते  मिलकर यारा |
लगाते   उनका  नारा ||🙏

थाम झुनझुना खुश रहें , हम सब भूलें पीर |
वह रक्षक बन देश के , खाते   रहते   खीर ||291
अमीरी उनकी ओली  |
फकीरी   मेरी  झोली ||

बजा झुनझुना हम रहे , उनके आते  काज |
दूल्हा है नेता यहाँ , नाच  रहे   हम   आज ||292
बराती    रहते    भूखे |
दिखे  तन-मन से सूखे ||

थमा झुनझुना हाथ में ,  चले   गए वह दूर |
पाँच साल में आयगें , बनकर फिर से शूर ||293
आरती सभी   करेगें |
उन्हीं के वोट  भरेगें ||🙏

नहीं सुभाषा बोलना , बजा झुनझुना खूब |
मेहनत में खाने मिले , उनकी   डाली दूब ||294
बजाते हरदम रहना |
मानना उनका कहना ||🙏
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अजब गजब सजने लगे , दोहों के दरबार |
दो चरणों को बाँटते ,  पटलों  के  सरदार ||295

नहीं विषय को खोजना , और भाव सब दूर |
तुक मुल्ला- सा काम है , कहें  करो भरपूर ||296

चरण   बाँटकर   छीनते  , सोचों  को   उस्ताद |
भाव शून्य कवि को करें ,  लेखक  को  बर्वाद  ||297

चरण खोजना प्रात से , नशा   बुरा    है  यार |
नहीं खोज अब कवि करे , चाहें  चरण उधार ||298

चार चरण में दो‌ चरण , मिल  जाते  हैं  दान |
तुक मुल्ला जी आपकी , रह   जाए पहचान  ||299

देकर भाव   उधार  में , आदत   गंदी   डाल |
कैसी   सेवा  कर   रहे , बना   रहे   हम्माल ||300

आदी कवि को कर रहे , चरण बाँटकर रोज |
सोच सभी  की मारते , गायब करते   ओज ||301

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हमारी गौरव गंगा नदी की पीड़ा -

गंगा माँ को कष्ट है ( दोहावली )

गंगा माँ का कष्ट है , कहते  तारण  हार |
फिर क्यो देते गंदगी , उसे सदा उपहार ||301

गंगा माँ  का कष्ट  है,   मुख  से  करते  गान  |
फिर क्यों  नाले डालकर , करते हो अपमान ||302

गंगा माँ का  कष्ट  है , कसती पाप  नकेल  |
फिर क्यों मैला डालते, करते हमसे   खेल ||303

गंगा माँ   का   कष्ट है ,  लेकर  मेरा नाम |
खूब  बनाते   योजना ,  गायब  होते  दाम ||304

गंगा माँ का  कष्ट  है , सुने   नहीं    सरकार |
क्या कोई बतलाएगा ,  कब   होगा   उद्धार  ||305
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चन्द्रबदन मृगलोचनी,  चपल  दामनी  रुप |
सुरभित गोरी  है वदन,  गुंजन कंठ अनूप ||306

पग  पायल  है नाचती  , निकसत मधु  झंकार |
कटि करधौनी नायिका   , लगती हँसत फुहार ||307

नथनी पहने  नायिका,    खिले गगन  में  चंद  |
तिल  होंठों  पर देखकर, कवि लिखते हैं छंद  ||308

गड्डे   गालो   पर   पड़े ,  उपमा   करती    सोच  |
गोरी के इस रूप पर   , कलम लिए कुछ लोच  ||309

नेत्र  सीप गोरी रखे  ,  काजल  कोर   कमाल |
माथे    बेंदी    झूमती ,    बिदिया भरे   उछाल  ||310

अधर किनारे  प्रेम के , गोरी   रस की  खान |
भौंह नयन पर है चढ़ी , जैसे    तीर  कमान ||311

झुमके झूलें  कर्ण  पर , माँग  भरी   सिंदूर |
रुप   राशी  सम्पन्न है , गोरी  लगती    हूर  ||312

गोरी  वचन  सु+भाष है , लगते मदिरा पान |
केश घटा घनघोर है ,  ग्रीवा   रजत   समान ||313

कोमल  किसलय   हस्त है , गोरी का मुख  नूर |
चूड़ी  बनी   सितार   है ,    राग  कहे    भरपूर ||314

नचती नागिन सी लगे , गोरी की  अब  चाल |
जिस घर उसका वास है , वह घर मालामाल ||315
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कठिन परीक्षा सत्य की,  होती कभी   न हार |
रोक सके मत सूर्य को  ,  बादल की भरमार ||316

कठिन परीक्षा सत्य की , लेता है  हर  काल |
सोना रहता है खरा , जला  सके  मत ज्वाल ||317

पानी या तूफान हो ,   रहे   सूर्य  का ओज |
कठिन परीक्षा सत्य की , सभी देखते रोज ||318

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जुमलों    की   बौछार है,   वादों की वरसात |
मेरे     हिंदुस्तान   में  , जनता   को   सौगात ||319

आज देश में चल रही , जुमलों   की   बौछार |
जनता जिसमें भीगती , करती जय-जयकार ||320

जुमलों की बौछार से , चल  जाता  है  काम |
जनता   सपने   देखती ,   नेता   को  आराम ||321

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कमी  देखते लेटकर ,  बिन फीते से  नाप |
करने  ओछे  काम की,  लेते जन है  छाप  ||322

शीशे का घर खुद बना , काम न करते  नेक |
समझदार भी लोग अब  , करते  पत्थर फेक ||323

लबरा दोदा फाँकते , अपनी-अपनी बात |
सूरज‌ उगता देखकर , कहते  होगी  रात ||324

(लबरा दोदा =झूठ बोलने बाला व 
सत्य झुठलाने बाला)

अपनी- अपनी बात  है , अपना-अपना ज्ञान |
गर्दभ पर   बोझा  रखा , समझे वह‌  सम्मान ||325

ओछे  जिनके कर्म सब ,  फैलाते  है   क्लेश |
कह सुभाष यह जानिए , लघुता   के  संदेश ||326

जन मानस को लूटते , रख दाता   परिवेश |
दुनिया में   तब  फैलते  , लघुता के  संदेश ||327

नीति  वचन  का  सार है , जनमानस का  शोध |
भरा कपट जिनके  ह‌ृदय , पग -पग पर अवरोध  ||328
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दिल के कोने में बसा , कोई मन का मीत |
सदा  रहा मैं  हारता , उसकी  देखी जीत ||329

कोई  मन  का  मीत  है‌, जो करता  है याद  |
हिचकी मुझको आ रही , दिल मेरा  नौशाद ||330
{नौशाद = खुश )
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बिना विचारें कर उठें , अपना  काम   तमाम‌ |
सिर पकडें वह लोग सब, छोड़ें  हाथ लगाम | |331

दूजे को सब  सोंपकर  , छोडें  निज का काम |
अब  वह  टेड़े  चल रहे  , छोड़ें    हाथ  लगाम ||332

छोड़ी  हाथ  लगाम  है , देख  रहे  सब  लोग | 
अहम् भाव जब से भरा , पाला   कटुता  रोग ||333

अपने  जब‌   करने  लगें , आकर पीछे  घात |
नहीं पाप  का काम है  , सम्मुख  देना   मात ||334

लोग सयाने  हो   गए ,   चापलूस की  बात | 
अवसर पर  छोड़े  नहीं  , पीछे  से  दें  घात ||335
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दीप जलाना नेह का , ले  समरसता  तेल |
मिले रोशनी ज्ञान की , सब जीवो से मेल ||336

रहे प्रकाशित अब अवध , सियाराम का नाम |
जनता का उद् घोष  है  , जय जय सीताराम ||337

रही प्रकाशित है  अवध , बनी  अनोखी  शाम |
जले    हजारों     हैं   दिये ,  बोलें   सीताराम ||338

सभी कार्य  आसान है , यदि श्रम से पहचान |
चढती   गिरती चीटियाँ , कर   लेती   उत्थान ||339

गलत कार्य भी कर रहे  , लेकर प्रभु का नाम |
कह सुभाष यह जानिए ,सब विनाश के काम ||340

जहाँ नीति को कह रहे , कलयुग  में   बेकार |
सब विनाश के काम है , नहीं   दिखे  उपचार ||341
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हर मुश्किल आसान है , यदि श्रम से पहचान |
चढती   गिरती चीटियाँ , कर   लेती   उत्थान ||342

करने को कुछ पग चलो , हर मुश्किल आसान |
पंछी   उड़ता जब गगन , बादल  से   पहचान ||343

आलस  जिससे  दूर  है , सृजन जहाँ  है पास |
हर मुश्किल आसान है , वहाँ  सफलता खास ||344

लेकर हरि  का  नाम भी , करते  काज  महान |
विपदाएं  भी  दूर  हों  ,   हर मुश्किल आसान ||345

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चीर दुशासन खींचता,  मिला उसे अधिकार | 
अंधो  के  दरबार   में ,   लुटती   रहती  नार  ||346

चीर  दुशासन  खीचता , नहीं   बड़़ी  है‌‌  बात |
गर्दभ  जिसका मित्र हो , उसे  मिलेगी  लात ||347

चीर  दुशासन   खीचता‌, सुनते  रहते  शोर  |
कोई   कृष्णा  सामने ,   नहीं  लगाता‌ जोर ||348

भाव समय की बात है , कौन   समझता  मोल |
कहीं भाव भी शून्य है  , कहीं  स्वर्ण  की  तोल ||349

एक भाव रावण दिखे , एक भाव श्रीराम |
दोनों शिव के भक्त है ,पर रावण बदनाम |350

कितने घातक हो गए , कल के अच्छे‌ लोग |
जहर उगलते रात दिन , फैलाते  अब‌  रोग ||351

कितने  घातक  हो  गए , मेरे   कल के‌  मित्र‌ | 
सज्जन पर फुसकारते,  हरकत करें विचित्र ||352

कितने  घातक हो  गए , उनके   देखे  बोल |
अंहकार सिर पर चढा‌, खुद  है  मिट्टी  मोल ||353

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जो लोग रामचरितमानस में कमी निकालते है , उनके लिए 

रामचरित तुलसी लिखा    , लिखवाया  हनुमान |
कमी न उसमें खोजना ,   देकर कटुक  निशान ||354

इतने  ज्ञानी क्या बने ,    जो  तुलसी  पर  चोट | 
दुस्साहस तब  भोगता ,  स्वयं  सृजन  में  खोट ||355

खुद का‌ लेखन  चूकता  , नहीं  रहे  वह  बात |
लगता श्री हनुमान को , अच्छी  लगे  न घात ||356

संगत  ऐसी‌   छोड़िए  , जो  है  कुंठित.  लोग | 
असर अलग ही दिखता , जिसको  कहते रोग ||357

मेरी  नेक  सलाह  है ,     छोड़ो    झूठी  शान  |
क्षमा मांगिए उस जगह , जिस दर पर हनुमान ||358

नहीं जाति का भी करें , निज मन कभी गुमान |
सबसे पहले अब बनो ,   फिर से  अब  इंसान ||359

मित्र   मानकर  दे  रहा , भैया   तुमको   राय |
पटलों की इस वाह में , नहीं   पकड़ना  हाय  ||360

रखिए अपनी आस्था , कण -कण में भगवान ||
श्रद्धा  की  रक्षा करें   , वीर   बली    हनुमान ||361

आगी   में  घी   डालना,  जिनका  रहता काम | 
लानत   सबकी   भोगते  ,   मोटे   चुगलीराम ||362

गुरु  को  कभी  न छेड़ना , गुरु होता  है   ईश |
मिट्टी का भी श्रेष्ठ है ,      गुरुवर  सदा‌  रहीश ||363

रामचरित तुलसी लिखा  , लिखवाया हनुमान |
घर का रहे न   घाट का, जो‌  नर करे  निशान ||364
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बदनामी  है  नर्क  सी, हर  पल  चुभती नोक  |
बद  अच्छा  बदनाम.  से , रहता  छाती  ठोक || 365

बद  अच्छा   बदनाम से ,  खुले  आम  है नाम |
बदनामी कालिख उड़े  , मुख को करती श्याम ||366

बद अच्छा बदनाम से , कर सकता  है  जाग  |
पर कब छूटा है  जगत  , बदनामी  का   दाग ||367

बद  अच्छा  बदनाम  से , बद छोड़े    इंसान ||
पर बदनामी दाग कब , गायब  करे  निशान ||368

बद अच्छा बदनाम से , बदल  सके  वह  ढंग  |
पर    बदनामी  दाग से  ,  जीवन   है   भदरंग ||369
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बड़ी कृपा भगवान की , दिखलाया‌  संसार |
लोग करें पुरुषार्थ जब  , बरसाते  उपकार || 370

बड़ी‌ कृपा भगवान की , जो हम उनके दास |
माने उनकी बात को , वह तब  रखते  पास ||371


बड़ी कृपा  भगवान की ,नेता कहते रोज |
जन‌सेवा में पा रहे  , मेवा की   वह डोज ||372
(आंग्ल डोज के‌ लिए 🙏)

बड़ी कृपा भगवान की , बोल   रहे  थे चोर |
पकड़ न पाई है पुलिस‌ , घटना के उस दोर ||373

बड़ी कृपा भगवान है  , उनका‌  सुना  व्यान |
पांच साल गायब रहे , फिर भी   है  श्रीमान ||374
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चिंता चिता समान है , सबको इसका ज्ञान |
फिर भी  चिंता रत रहें   , देखे   है  विद्वान ||375

धन वैभव सँग ज्ञान भी , फिर भी चिंता रोग |
चिंता चिता समान है ,    नहीं   सोचते ‌लोग ||376

चिंता   चिता‌  समान है  , होगा   ‌कोई   ज्ञान |
पर इनसे  सब  दूर  है  , महनत करे किसान |377

खूब किया है  राम ने , जग में जन कल्याण |
सुर नर की  रक्षा  किए , दांव लगाकर प्राण || 378

खूब   निभाया राम ने ,     जनता  से अनुराग | 
एक रजक के प्रश्न पर , सीता तक का त्याग ||379

अमरौती किसको मिली , जलती मरघट‌ खाल |
फिर  भी   टेड़े‌    चल  रहे ,  फूले   लल्लूलाल ||380

अमरौती किसको मिली , किसका‌‌ यहाँ मकान |
एक  किराएदार   तू ,       खाली‌  करे  दुकान ||381

ज्ञानी भूला ज्ञान को , योगी भूला ‌योग |
वैद्य डाक्टर खोजता , पाले घर में रोग ||382

लखकर कंचन  कामनी  , योगी भूले योग |
मैं मूली किस खेत की  , जो छोडू मैं भोग ||383

सब माया के मीत है , सबके अपने राग | 
अपने -अपने स्वर में , गाते अपनी फाग ||384

सब   माया को चाहते , रखते  माया  जोड़ |
पर माया चंचल दिखी ,  देती सबको छोड़ ||385

हमें  देखिए आप सब , हम है भोले संत |
सब माया के मीत है, पर  मैं माया  कंत ||😃🙏386
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मत ‌ सुभाष ज्ञानी  बनो , नहीं बजाओ ढोल |
मृदुता से संवाद कर   , बड़े  बोल  मत बोल ||387

किससे कहता कौन है , बड़े बोल मत बोल |
बडबोला जब ढोल हो  , होती  लम्बी  पोल ||388

बड़े बोल मत बोल तू ,  दिख जाती है झोल |
जितनी सीमित बात हो ,उतनी  बजनी तोल ||389

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दूजों की छवि  देखकर , नहीं   चलाओं  तीर |
खुद हिम्मत से कीजिए , अपनी बड़ी लकीर ||390

दूजों को‌ मत कोसिए  , खुद पर दीजे ध्यान |
अपनी बड़ी लकीर पर , कर सकते हो‌ मान ||391

कर्मों  से  खुद कीजिए , अपनी  बड़ी लकीर |
दूजों की मिटती नहीं ,   सोचें    से   तकदीर ||392

उनको भी हम क्या कहें , मन  में  पालें   पीर  |
ढोल   नगाड़ा   पीटते ,    मेरी   बड़ी  लकीर ||393

चले नापने दूज की ,  कितनी   बड़ी  लकीर |
खुद की मिटती देखकर , भौचक्के  है   बीर  ||394

हम अच्छे  दूजे  बुरे , खुद ही बने  बजीर |
वह कर सकते नहीं , अपनी बड़ी लकीर ||395
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सब माया में लीन है , अपना - अपना  गान |
कुछ माया के दास है , कुछ  माया‌  सुल्तान ||396

बाहर अंदर है अलग  , सब माया में लीन |
कथनी करनी फ़र्क  है , देकर  लेते  छीन ||397

मतलब  का  संसार  है , सत्य   देखता  बात | 
सब माया में लीन है   ,  हाय-हाय  दिन  रात ||398

माया   सबके घर बसी , ऊँचा  हो   या  दीन |
घनचक्कर पूरे  बने  ,  सब  मा़या  में   लीन ||399

मत सुभाष अब बोलना , नहीं   बाँटना ज्ञान |
सब  माया में लीन है , जिसमें हम सब गान ||400

छल छंदों का   घोंसला , तख्ती  पर हरि  नाम |
कह सुभाष यह जानिए, प्रलय काल के काम ||401

आज  दुशासन  देखिए , गिनती  गिनो  हजार |
प्रलय काल के काम को  , सजे  हुए   दरबार ||402
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राधे जैसी प्रीति की , दूजी नहीं मिशाल |
राधे श्यामा  हो गई ,  श्यामा‌‌   राधेलाल ||403

राधा मोहन मन बसी , राधा का मन श्याम  |
राधे श्यामा  है जगत  , सबसे  सुंदर  नाम ||404

मोहन में राधा घुली , राधा में हैं  श्याम |
राधा जैसी प्रीत का  ,पूरे  जग‌ में नाम ||405

सजनी   चंदा देखती , माँग   रही  वरदान |
सदा सुहागिन मैं रहूँ ,साजन की हो  आन  ||406

अधरों की मुस्कान से , बन जाते  हैं काम | 
वाणी में मृदुता अगर , जग में उसका नाम ||407

नहीं व्यंग्य की लाइए , अधरों  पर   मुस्कान |
ऐसा भी  मत बोलना , घायल  हो  अरमान ||408
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हिंदी दोहा दिवस , विषय कौड़ी 

फूटी कौड़ी है नहीं , करें   लाख   की बात | 
नेक काम उनको नहीं ,फूटी आँख सुहात ||409

मानव मन कमजोर है , कौड़ी  रहता‌ जोड़ |
जहाँ खर्च की बात हो , लेता मुख को मोड़ ||410

एक बात तो सत्य है ,  कौड़ी का है मोल |
यत्र तत्र   उपमा दिखे  , कोड़ी से हो तोल ||411
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कपट भाव की कामनी , कंचन रूप समान |
जहर भरी होती सदा  , अधरों की मुस्कान ||412

अधरों की मुस्कान हो , नैनों   में  हो लोच |
चेहरे पर मधु भाव हो , समझो ऊँची सोच ||413

अधरों की मुस्कान से , बन जाते  है काम |
वाणी में मृदुता अगर , जग में उसका नाम ||414

नहीं व्यंग्य की लाइए , अधरों  पर  मुस्कान |
वाणी भी  मत बोलना , घायल हो  अरमान ||415
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एक दोहा हास्य में -
कह सुभाष घायल हुआ , अधरों की मुस्कान |
कोतबाल वह  बन  गई  , मै  उसका  दीवान ||🙏😄416

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विषय - तुमसे अच्छा कौन है

तुमसे  अच्छा   कौन है,   मेरे    दीनानाथ ‌ |
जग में ईश्वर आप है    , नहीं छोड़ना हाथ  ||417

तुमसे अच्छा कौन है , है   करुणा  भंडार |
सुनकर दीन पुकार को  , कर देते उपकार ||418

तुमसे  अच्छा कौन  है , हे    मेरे  भगवान |
मुझको देना शरण तुम , मैं जग में  नादान ||419

दो दोहे कड़वे-प्रस्तुत है
तुमसे  अच्छा  कौन है ,  चमचे  बोले  बोल |
पर नेता का फोड़ते , यह ही  मिलकर. ढोल ||420

तुमसे अच्छा कौन है , खुश मत होना   आप |
कहने  बाले  एक  दिन , बनने   लगते   बाप ||421

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विषय- दौलत जिसके पास है

दौलत जिसके पास है , करो जरा पहचान |
अंदर से   कितना दुखी , और  रहे   हैरान ||422

दौलत जिसके पास है , खुद को समझे‌ शेर  |
गधा बना वह रात दिन , गिनता   रहता  ढेर ||423

दौलत जिसके पास है , नींद   रहे कुछ  दूर |
बीमारी  भी  हाय की ,  रहती‌‌   है    भरपूर ||424

दौलत जिसके पास है ,  दिखता है‌ कंजूस |
बातचीत व्यौहार से , रहता  सदा   खडूस ||425

दौलत जिसके पास हो‌, मन से यदि उदार |
तीन लोक की सम्पदा,  उसको तब‌ बेकार ||426
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विषय - चूक गए शैतान

राजनीति दंगल हुआ , चित्त हुए मलखान |
चमचागिरि‌ से दूर रह  , चूक  गए  चौहान ||427

सत्य‌ कहाँ जब सामने , लगी मिर्च-सी तेज |
चूक  गए  चौहान  हैं ,  बोले   सब.  रँगरेज ||428

मूंछे   अपनी   ऐंठते ,   खड़े   रहे  श्रीमान |
नहीं   बोल  मीठे  कहे , चूक  गए  चौहान ||429

रखवाली झूठी  दिखी   , चूक  गए  चौहान |
चिडियों ने भी खेत  को ,   बना दिया‌ मैदान ||430

लोग चतुर जो भी बनें , समझें खुद सुल्तान |
शक्ल एक दिन बोलती, चूक    गए. चौहान ||431

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विषय - केवट के श्रीराम

केवट के  श्रीराम  में ,  छिपा  हुआ  संदेश |
भक्ति भाव से ईश भी‌ , मिलते हर परिवेश ||432

केवट   के वट  बृक्ष  है   ,  केवट  के  श्रीराम |
छाया फल दाता रहें , और साथ  निज  धाम ||433

केवट के वट+यार  है , मिलें एक से काम  |
पार  उतारे  जगत  से , केवट  के  श्रीराम ||434

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विषय - कलश

जीवन को  जब देखता , सुख दुख भरा अपार |
शीत गर्म  अनुभव  मिलें , लगे   कलश  संसार ||435

जीवन शुभ मंगल कलश , कर लेते   है   लोग |
धर्म   कर्म   सद्भाव से , नित  नव करें  प्रयोग ||436

भरे हलाहल  आदमी , रिक्त  कलश  को देख   |
फिर क्यों अमरत चाहता , खींचे  मन  में रेख ||?437

यह तन भी जानो कलश , ईश्वर  का  उपहार |
प्राण समझना नीर को , कब  फूटे -कब  पार ||438

सद्कर्मो से जब  कलश , पुण्य   भरे  भरपूर |
यह जग या परलोक हो , ईश्वर    देता    नूर ||439

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विषय न्याय

न्याय नीति का खुल गया , भाषण से बाजार |
उच्च   मंच  से   बेंचना  , नेता   का  व्यापार ||440

नेता जी  बस  बेंचतें , करें   नहीं   उपयोग |
हावी है अब न्याय पर , आश्वासन का रोग ||441

हमको मिलता  न्याय है, कहते  तिकड़मबाज |
नेता   के   चमचे  करें , सदा  न्याय  पर राज ||442

मिला हमें भी न्याय है ,कहता सही सुभास |
गेह खेत सब बेचकर , ले  आए   है    पास ||443

एक न्याय देना प्रभू , जहाँ  विराजे   आप |
चरणों  में  लेना  मुझे , छूटें   जग के ताप ||444

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हिंदी दोहे , विषय - बालक

बालक होता है सरल ,रखता सत्य उजास  |
जब वह हो जाता बड़ा, झूठ करे परिहास ||445

बालक का बचपन बड़ा , उसकी लम्बी रेल |
ज्यों -ज्यों होता   है बड़ा ,  छोटे होते  खेल ||446

बालक में  भगवान   का , रहता    है    सारांश  |
यदि रहती लघु बालिका , तब   देवी   दिव्यांश ||447

बालक    सबको   मोहते ,   देते      है  आनंद |
फिर सिखलाते हम सभी , उनको छल के छंद ||448

तेरा‌  मेरा   सीखकर ,   बालक  बने   जवान |
हाय- हाय के गीत का , गाता   रहता    गान  ||449

(कुछ दोहों पर  मेरी कलम व्यंग्य में चली गई है )🙏

जिस बालक की कल्पना , लिखती कलम सुलेख |
खड़ा   खेत   पर  नग्न  वह  , मैं   आया   हूँ   देख ||450

उस  बालक के  पास में , देखा   खड़ा  अभाव |
किस्मत   उसके साथ भी , करती   रहे   दुराव ||451

कलम हकीकत लिख रही , नहीं समझिए तंज |
वह बालक जब   देखते ,  होता   मन में   रंज ||452

उस‌ बालक को कब मिले  , मानवता अधिकार |
महलो  बालो को   मिले , जो   आकर  उपहार ||453

शासन   की  भी  नीतियाँ , करती  है  उपहास |
वह बालक याचक बने ,      तैयारी  है   खास ||454

नेता जी भाषण कहें , बालक  कहें  भविष्य |
खड़े खेत पर जो मिले , उनको मिले तपिष्य ||455

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विषय‌ - विकार

मन में  नहीं   विकार हो , मीठे हों जब बोल |
संत हृदय वह आदमी , जग में है   अनमोल ||456

जो विकार को पालता ,रखता  है अभिमान  |
अंधकार उसके  हृदय , रहता   सीना   तान  ||457

धन से बढ़ता मद जहाँ , मद से बढ़ें विकार |
जब विकार मन में बसें , तब जीवन है खार ||458

काँटे  रहे  विकार  है , नहीं  बनें  वह  फूल |
सुख विकार में खोजना ,जीवन में है  भूल ||459

करता सदा विकार है , मन को बहुत अशांत |
जीवन में भी आपदा , आकर  करती क्लांत‌ ||460

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 विषय - यात्रा

जीवन   यात्रा  में    दिखें  , राहें   यहाँ   अनंत |
जब सुभाष पथ खोजता , मिले  न कोई  अंत ||461

यात्रा जाए कौन   कब , कहाँ   मिले आराम |
यात्री  सब  अंजान है , कहाँ    ढ़लेगी  शाम ||462

कहाँ समापन की जगह , खोजो नहीं  सुभाष  |
यात्रा बस  करते  रहो ,   रखो  राम  से  आश  ||463

कभी बिछड़कर हो मिलन , यह यात्रा का खेल |
पता नहीं इस बात का , कब  हो  किससे  मेल ||464

जीवन   यात्रा  में मिलें , कहीं  कुटिल  संताप |
कहीं धर्म  की  है शरण ,  कहीं  लुभाते  पाप ||465

कहाँ समापन की जगह , खोजो नहीं  सुभाष  |
यात्रा बस  करते  रहो ,   रखो  राम  से  आश  ||466

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विषय - किन्नर

किन्नर   सदा   समाज से ,  पाते   है अपमान |
फिर भी घर-घर पर करें , शुभ गीतों का गान ||467

किन्नर   आकर   दें   दुवाँ , लेते  अपना  नेंग |
नाचें   गाएँ   द्वार   पर  , लेकर अपनी‌   गेंग ||468

नर - नारी से कुछ अलग , किन्नर की पहचान |
वृहनिल्ला इतिहास में , मिलता नाम   सुजान ||469

सिर्फ विधाता जानता , इनका क्या   है राज |
नर-नारी से कुछ अलग,किन्नर बना  समाज ||470

नाम शिखंडी का सुना , था किन्नर में   शान  |
अर्जुन जैसे वीर  भी  , स्वयं  बने   प्रतिमान ||471

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हिंदी दोहा , विषय - दास

बनने का अवसर मिले , तब  बनना तुम दास |          

         भक्त दास   हनुमान से , बनो   राम के  खास ||472


भक्त शिरोमणि हो गए , जग में  श्री  रविदास |        

 गंगा चलकर  आ  गई  , खुद  ही उनके  पास ||473


जो भी दीन गरीब हों , कभी न   समझो दास |

अंधकार  के   कष्ट  में  , जुगनू  भरे  उजास ||474


जो  छोटों  को   देखकर , समझें  उनको दास  |

कहें 'सुभाषा'   वें सदा , पालें   खुद  ही   त्रास  ||475


हम दासों के दास हैं  , कहता   आज  सुभाष  |

राम  नाम जो पुंज का , रखता  ह्रदय प्रकाश ||476


मात -पिता गुरु के चरण , शरण राम  की पास |

नहीं सुभाषा'  चूकना , बनों   चरण  के   दास ||477

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विषय - उदास

गलियाँ  जहाँ  उदास  हों ,  लगे  हुए हों शूल  |

और बरसता हो जहर, वहाँ न खिलते  फूल ||478


गम के पत्थर   हों  लगे , रोता   हो विश्वास |

वहाँ    हौंसले   टूटते  , रहते   लोग  उदास ||479


हमसे   कहा  उदास  ने , आता नहीं   प्रकाश |

हँसने के  कारण नहीं , तब क्या करूँ सुभाष ||480


मात पिता  बेचैन   हों ,  बच्चें  रहें  उदास |

एक छोड़ तब सैकड़ों , आँसू  आए पास ||481


मैं हँस लूँ किस बात पर , करता प्रश्न सुभाष |

मानवता जब हर जगह , करे जहर का प्राश ||482


बहुत नसीहत मिल रहीं , होना नहीं उदास |

मैं हँस लूँ किस बात पर , खड़े सामने त्रास ||483

दिखे  नम्रता  नीर  में , पत्थर  में  अभिमान |

पत्थर  टूटे   चोट   से , नीर   न   टूटे  आन ||484

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विषय‌ - बाबू जी (पिता जी )

बाबू जी श्रीफल लगें , दिखते बड़े  कठोर |

नीर मृदुल भीतर भरा , लेता सदा हिलोर ||485


बाबूजी  हैं  बाँटते   , अनुशासन   का पाठ |

कड़क रखें चेहरा सदा , देनें सुत को‌ ठाठ || 486


बाबूजी छाती रखें ,   गहरी   और   विशाल |

जिसके अंदर सुत सदा , होता रहे निहाल ||487


अनुभव को साँझा करें  , सदा सुतों के साथ | 

बाबू जी जब तक रहें   , कोई  नहीं  अनाथ  ||488


नेक विरासत  के धनी‌,  बाबू   जी  भरपूर |

पथ अनुगामी जो बने ,  बनता जग में नूर  ||489

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ॐ नम: वेत्रवती (बेतवा)  पवित्रों पवित्राय वास्तुनिष्ठ मोक्ष जलधाराय‌  नमो नम: 

हिंदी दोहा  , विषय‌ बेतवा (नदी ) 

उद्गम  जानो      बेतवा ,       रायसेन    आबाद |

झिरी   बहेड़ा   ग्राम से  , इसकी शुचि बुनियाद ||490


रातापानी वन   झिरी ,   अभयारण्य  विहार |

यहीं  प्रकट है   बेतवा  , आगे  फिर  कोलार ||491


जलधारा शुचि बेतवा  , कितने तथ्य विशेष |

उत्तर   पूरव  में   बहे ,  रहे  वास्तु   परिवेश ||492


नदी  बेतवा  शान   है , गरिमा    मध्य  प्रदेश |

ठहरी‌ कुछ भोपाल में , आगे   बनी    विशेष ||493


विदिशा कुरबाई  बहे  , बीना     बाँटे  प्यार   |

राजघाट पर   बेतवा ,    करती   है    शृंगार ||494


ग्यारह  नदियाँ बेतवा , मिलकर   देती‌  मान  |

प्रमुख जामनी जानिए , सँग में  सुनो धसान ||495


है   हमीरपुर  पूर्व   में , यमुना  की  जलधार |

मिलन बेतवा जब करे‌ , दिखती है  जयकार ||496


पाँच शतक के मील का , लगता है अनुमान |

पावन करती एम पी ,    फिर यू पी प्रस्थान ||497

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हिंदी दोहा , विषय -गंगा

भू  पर  गंगा  अवतरण , भागीरथी   प्रयास |

देवलोक का मिल रहा  , धरती पर आभास |498


वर्णन कलम न कर सके , माँ गंगा  गुणगान |

कृपादायनी है सदा , अमरत जल शुचि मान  ||499


अनुष्ठान  प्रतिरुप   हैं , भागीरथ  परिणाम |

कहते सदा   त्रिदेव हैं , गंगा  हैं  खुद  धाम ||500


पतितो को पावन करें ,   भक्तों   को  दें  मान |

चलकर वह रविदास के , दिखीं कठौता आन ||501


जब तब नभ में सूर्य है , चंद्र  सितारे शान |

गंगा जी भू लोक में , सबको    हैं  वरदान ||502

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 , विषय - गणतंत्र


भारत के गणतंत्र को , करिए. सदा  प्रणाम |

मिलता इसको विश्व में , हरदम उच्च मुकाम  ||503


लोग सभी यह जानते , क्या  होते  अधिकार |

उज्ज्वल छवि इसकी यहाँ , मिलता सबसे प्यार ||504


संविधान शुचिता रखे   ,जनता   के   परिवेश |

सभी अनोखा मानते  , कहते  अनुपम  देश ||505


हर्ष  मनाते लोग है   , कहते शुभ   गणतंत्र |

यहाँ  प्रेम के बोल  ही , लगें  राष्ट्र  के  मंत्र ||506


सदा   हमारे  राष्ट्र में   , हर्षित  रहे  उमंग |

मानवता  अपनाइए   ,  कहते है   त्रय रंग ||507

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विषय अहिंसा

(विशेष-- मैं अहिंसा को  धर्म के सिद्धांतानुरुप

 परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूँ )

नहीं   अहिंसा  जानना , होती   है     डरपोक |

प्रतिरोधी हिंसा सहज , कर सकता यह लोक ||508


भाव वचन निज के  करम,  और सहज व्यापार |

यहाँ   अहिंसा   पालना ,   कहे   धर्म  का सार ||509


दुश्मन  आए   सामने , रखे   देश  पर  खोट |

यहाँ अहिंसा त्यागकर , करना उस  पर चोट ||510


नहीं   अहिंसा  बोलती ,    हिंसा   है   स्वीकार |

देश  धर्म की आन पर, उठ  सकती   तलवार ||511


प्रतिरोधी   हिंसा  जहाँ ,  वहाँ  अहिंसा  शान |

तथ्य सही रखता यहाँ , और  धर्म  का  गान ||512


आए  भारत भूमि पर , जितने   भी  अवतार |

किया अहिंसा भाव से   ,  दुष्टों   का   संहार ||513


कायरता   मत   जानिए , जहाँ  अहिंसा चित्र  |

आभूषण यह वीर का , समझो     मेरे   मित्र  ||514


अनाचार  दुश्मन करे  , हम जपते प्रभु   नाम |

नहीं अहिंसा यह कहे , कर ले   आप   विराम ||515

सारांश - धर्मानुसार , संत और साधु को - भाव हिंसा - वचन हिंसा - व्याापार हिंसा - प्रतिरोधी हिंसा , यह चारों हिंसा त्याज्य है 

पर  धर्म के अनुयायी गृहस्थ को - भाव - वचन - व्यापार हिंसा त्याज्य है , पर अनाचारी से प्रतिरोधी हिंसा ग्राह है | प्रतिरोधी हिंसा में अहिंसा धर्म की रक्षा का प्रतिनिधित्व होता है |

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हिंदी दोहा , विषय बालहठ


हठयोगी  का  देखते,  हठ  विलम्ब से  पूर्ण  |

पर जब आता बालहठ, कर उठते सब तूर्ण  ||(तूर्ण =शीघ्रता)516


लगता   सुंदर   बालहठ , तुतली जहाँ जुबान |

पूरण   करने   दौड़ते , घर  के  सभी सुजान ||517


चंद्र खिलौना   बालहठ , कान्हा दें   आवाज |

मात् यशोदा तब करें  ,  जल  थाली से काज ||518


पूरा   होता   बालहठ , बालक तब मुस्काय |

माँ की ममता   धन्य हो , रोम-रोम   हरषाय ||519


बचपन में था बालहठ , अब   हठ हैं कुछ भोग |

आगे    के  हठ   हैं   व्यसन , जो  लाएगे   रोग ||520

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  , विषय घड़ी

घड़ी   नहीं   है आपकी ,भली रहे वह  गेह |

चलती अपनी चाल है , रखे न कटुता  नेह ||521


घड़ी बदलती है  सदा  , समय काल का नाम |

पौने दो अब दो हुआ , आगे   त्रय   अविराम ||522


घड़ी- घड़ी में  लोग भी , बदले   अपना   रंग |

कह सुभाष हँसती घड़ी ,   देख सभी के ढ़ंग ||523


बड़ी घड़ी या लघु दिखे , समय सभी में एक |

घड़ी  एक  संसार  है , सुइयाँ   जिसमें  नेक ||524


घड़ी   कभी  बँधती  नहीं , बँध जाते है आप |

बार- बार   हो   देखते , कहाँ   घड़ी की माप ||525


टिक टिक करती है घड़ी , खटपट करते लोग |

चटपट करता काल है , मिटमिट कहता  रोग ||526


मरने की  आई  घड़ी , रोता   घर  परिवार |

बँधी घड़ी चलती रहे , अजब गजब संसार ||527

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विषय - मामा

माँ का ह्रदय उदार है ,मामा  ह्रदय  विशाल |

माँ जैसा ही   प्रेम  है , मामा  का  हर  हाल ||528


मामा में दो माँ  दिखें  , एक पिता-सा प्यार |

नहीं किसी की डाँट भी ,मामा  को स्वीकार ||529


मामा  रहता  दूर पर  , रखे बहिन का  ख्याल  |

बच्चों  की  चर्चा  करे  , लोगों   से ‌  तत्काल ||530


बुन्देला  मामा सुनो   , नाम  रहा      हरदौल |

मरकर भी  वह भात दे , भानेजन की  तौल ||531


शकुनी मामा- कंस  है  , मथुरा  दिल्ली  पार  |

सच्चे     मामा    ओरछा  ,  बुन्देला    दरबार ||532 

मामा जी अच्छे  बुरे  , कर   गय   दोनों  काम  |

कंस मारीच शकुनि हुए , जग में  कई बदनाम ||533


मामा जी मारीच थे , स्वर्ण   हिरण धर रूप |

माता सीता का  हरण, शामिल  लंका भूप ||534


मथुरा  में  मामा हुआ  , कंस  नाम   बदनाम |

आए  कष्ट निवारणे  , जग में  श्री घन श्याम  ||535


शकुनी   मामा  हो गए , कर  गय    बंटाधार |

महा युद्ध करवा गये , भानिज को   उसकार ||536


मामा थे  हरदोल  जू , सबकी   रखते   लाज |

मरकर भी वह आय थे  , भानेजन के काज ||537


मामा के घर हम गये , अपनी   माँ  के  साथ |

देते थे आशीष वह ,    सिर पर रखकर हाथ ||538

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  , विषय - परीक्षा

सदा   परीक्षा   दीजिए  , रखना   साहस   साथ | 

पास   फेल   चिंता   नहीं , रखना  उद्यम   हाथ ||539


कभी  परीक्षा  लूँ  स्वयं ,  क्या    पाई   पहचान  |

कभी   परीक्षा    दूँ   वहाँ ,   जहाँ   रहें   इंसान ||540


जगत परीक्षा कक्ष है,   सुख   दुख  रहें   सवाल |

यहाँ खोजना  हल पड़े , रखकर   साहस   ताल  ||541


समझों   जो  दाता   जगत , कहलाते   भगवान ||

कभी   परीक्षा   लें   उठें , क्या   करता   इंसान ||542


आज   परीक्षा में  अजब , आया  गजब सवाल |

क्या चलता तू नीति से , लिख   सुभाष तत्काल ||543


एक  परीक्षा  है  अजब , राजनीति का   खेल |

दुर्जन   होते   पास   है , सज्जन   होते   फेल ||544

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विषय कविता

बड़ी बात  लघु  रूप  से   ,  कविता  कहती सार |

कविता के शुचि भाव ही    , देते  सबको   प्यार ||545


कविता  लिखना अति सरल , भावों का  है  खेल |

शब्द चयन जब श्रेष्ठ हों ,  अनुपम  बनता   मेल ||546


कवि जब कविता को  लिखे, लिखकर होता धन्य  |

माँ   शारद का   पुत्र  बन ,   पाता   पुण्य  अनन्य ||547


कविता  उनसे  दूर  है , लेन - देन    जब  वाह |

भाव शून्य जब   तुक रहें   , अंधकार तब राह ||548


शीत   माह  की  धूप में , खिले सुबह से  बाग |

ऐसी ही  कविता  लगे ,  शुचिमय  बजते राग ||549


कविता  को सब जानिए , है  शारद  का  रूप |

जिसके चरणों   में झुके ,   जनता-ज्ञानी-भूप ||550


कविता की  आभा    सदा , देती   है  संदेश |

करती दर्पण काम यह , लिखती हर परिवेश ||551


कविता कवि मन भाव है , निर्झर होते गीत |

जहाँ हृदय कविता रहें, सबको लगती मीत ||552


कविता   छोटी  सी  रहे , या  होवें   विस्तार |

आँचल इसका है बड़ा , समझों  इस संसार ||553


कविता निकसत है हृदय , करता कवि दुलार |

कवि   कविता पूरक रहें , जानो   इस संसार ||554

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  , विषय - जय

जय उनकी होती सदा , जिनके   नेक विचार |

उन्हीं विचारों की झलक , जब  देते व्यवहार ||555


बोल उठें  जय लोग  भी , कर उठते  है  वाह |

परहित के शुभ भाव जो , मन में रखे अथाह ||556


जय बुलवाना बात कुछ , जय होना कुछ ओर |

नेता की जय शोर है  , प्रभु  की   करे  विभोर ||557


अभिवादन में कीजिए ,  जय- जय सीताराम  |

हो   जाए  प्रभु  नाम  से , एक  पंथ  दो काम ||558


जय  जैसे  शुभ कर्म   ही , करते है  उपकार  |

निज जय जो लगवा रहे , उस जय में है हार ||559

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होली पर रसिया दोहे

रंग बिरंगा   माह   है , गोरी  मन  मदहोश |

लौटे  प्रिय परदेश से , रोम - रोम में जोश ||560


गोरी  भावुक लग रही , सुलझाती है बाल |

टेसू    जैसे  लाल   हैं , उसके   गोरे गाल ||561


नैना चंचल हो गए ,   ले  काजल की कोर |

फागुन आया झूमकर , अब गोरी की ओर ||562


पग धरती पर नाचते , मिले पवन से ताल |

प्रेम मगन  गोरी  लगे , सबसे   मालामाल ||563


धरती  पीली लाल है , सुंदर   खिलते  फूल |

गोरी तन्मय गा रही , सुध बुध अपनी भूल ||564


छनछन पायल बज रही , थिरक रहे सब अंग |

अगड़ाई   भी  आ  गई , लेकर   नवल  उमंग ||565


फागुन के शुभ  माह में , प्रीतम गोरी पास |

तीन लोक की‌ सम्पदा , माने मन में   खास ||566


होली की मस्ती चढ़ी , मन में  बजे  मृदंग |

नेह पिया का चाहती , गोरी पुलकित अंग ||567


कोयलिया भी गा रही , बैठ आम की‌ शाख  |

एक गीत कीमत करे , गोरी  मन में   लाख ||668


प्रीतम   दर्शन   चाहती   , गोरी लगे अधीर |

मिलन नेह का जब मिले , तभी हटेगी पीर ||569


भँवरा भी मड़रा रहा , खिले पुष्प के पास |

गोरी भी यह सोचती , आए  प्रीतम खास ||570


रसिया मन भँवरा लगे , रहा  पुष्प को चूम |

गोरी निज मन देखती , ज्यों गीली हो भूम ||571

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विषय - रंग

आज हुए  भदरंग हैं , त्योहारों   के   रंग |

प्रेम भरी बातें दिखें , अब कटुता के संग ||572


फीके - फीके स्वाद में ,  जीते  हैं  मिष्ठान |

मरती जीती चासनी , मावा   खोता  शान ||573


मेंढ़क सिर पर कूँदते , चूहें  कुतरें  कान |

दूल्हें बने  सियार  है , गर्दभ  पाते  मान ||574


लाज शर्म   वैश्या   रखे , सती  चले  बेढंग |

कपट बजे अब ढोल से , सिकुड़ी रहे उमंग ||575


अब असत्य का शोर है , रखे  सत्य मुख बंद |

वाह- वाह अब  पा रहे ,  खींचा   तानी  छंद ||576


मिलते  नीम हकीम  हैं, जीते   तिकड़म   बाज  |

जब सुभाष सच बोलता , सिर पर गिरती गाज ||577


योगी   से   तप  दूर   है   , उत्कंठा   है   शांत |

झरने सूखे मिल रहे , दिखे   चंद्र अब   क्लांत ||578


समाधान हल  भूलकर , खोज  रहा   है ज्ञान |

प्रवचन करते  काग हैं  , हंस   बनें   यजमान ||579

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विषय किसान

दाता   है  जो   अन्न  का , देता    सप्त   अनाज |

कृषक कहें हम सब  उसे, नमन करें  शुभ आज ||580


जब अनाज दानें पकें  , कहता फसल किसान |

मिहनत का   फल मानता , ईश्वर   का  वरदान ||581


आता    गेह   अनाज जब ,  छाती जाती फूल |

तब   किसान   भी  भूलता , जो  पाए  है शूल |582

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विषय महुआ , हिंदी दोहे

महुआ की मधुरम  महक , मादकता चहुँ  ओर |

यौवन   लाया  बाढ़   है , बरस   प्रीति  घनघोर ||583


महुआ   टपके  रस भरें  , करें   नशीली   रात |

साजन  करते  प्रेम   से , बिन   बोले  ही बात ||584


बौराया  है  अब पवन ,   छू    महुआ  मकरंद |

कहता  है  हर   कान में , इस  रस   में आनंद ||585


महुआ फूला पेड़ पर , रस   में   गया   समाय |

टपक अवनि  की अंक में , लगता   है  बौराय ||586


महुआ का अब पेड़ ही , बोतल   बना  शराब |

जितनी चाहे पीजिए , रखता   कौन   हिसाब ||587

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विषय - मौसम , हिंदी दोहा

अलबेला मौसम रहे , मिलता   नहीं मिजाज |

कभी मिलाता सुर दिखे  , कभी  रहे नाराज ||588


रंग बदलता अब रहे , मौसम तुनिक मिजाज |

शीत धूप के  खेल  में , गिरा  देत    है  गाज ||589


गिरगिट जैसे  हो गये , अब  मौसम के अंग |

पता नहीं  किस राह में , कैसा   बदले   रंग ||590


मौसम भी अब है अजब , पता चले मत भेद |

कब हर्षित श्रीमान जी , कब   दे   डाले खेद ||591


मौसम का रुख जान लो , तभी कीजिए काम |

मौसम यदि विपरीत है , तब भजना हरि नाम ||592

एक मनोविनोद 

गोरी का मौसम सुनो , ऊपर चढ़ा मिजाज |

जैसे सूरज आसमा , पर   करता   है राज ||593

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विष़य घटना

घटना  भी  संदेश  दे , जो  कुछ होता आज |

यहाँ कर्म के फल उदित , समझों प्यारे राज ||594


भाग्य मनुज लिखता स्वयं, घटना है प्रतिरूप |

नाना विधि के भेद से   , इसके   रूप  अनूप ||595


जैसा बोया  आपने , फल  पाओ  हर  हाल |

घटना तो बस चिन्ह है , मिली जुली है ताल ||596

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छत्रसाल 

छत्रसाल अति वीर थे , सुन घोड़ों की टाप |

दुष्ट  शत्रु  सब काँपते , बैठ  सुमरते  जाप ||597


भूषण कवि लिखते यहाँ , कौन सराहूँ वीर |

छत्रसाल के सँग   शिवा , दोनों ही रणधीर ||598


मस्तानी को ले गया , जब बंगस भी दूर  |

छत्रसाल लाए छुड़ा , मान  दिया भरपूर ||599


दोहा  पढ़कर आ गये ,  सुनो  पेशवा   राव |(बाजीराव जी 

छत्रसाल की कर मदद , दिया पिता -सा भाव ||600

( वह दोहा था - "ज्यों गति भई गजेन्द्र की " बाला )

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विषय छवि

छवि बनती निज कर्म से , कहता है यह धर्म | 

सत्संगत  होता  सुखद,  कौन  जानता  मर्म ||601


छवि  समाज में शुभ बने  , रहती हरदम साथ |

आप   सदा   अजमाइये , जगन्नाथ तब हाथ ||602


छवि सुशील जिनकी रहे  ,  उनकी  रहती शान |

यदि कुशील की बन गई,  मिलता तब अपमान ||603


चार लोग जब भी जुड़े ,  करते सदा बखान |

जिनकी छवि में नेकता , रहती  सदा समान ||604


गोरी की छवि नैन से , बसी हृदय के द्वार |

प्रीतम हरदम देखता , करता  उससे प्यार ||605

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विषय - स्वागत

स्वागत मन से कीजिए , रखकर आदर भाव |

आदर  दे  बैठाइये ,   रंक   मिले   या    राव ||606


स्वागत करना  है सहज ,  दिल से करिए आप |

पाने   बाले  के  हृदय , आप   छोड़िए   छाप ||607


अतिथि देव आएँ जहाँ , स्वागत को वह देख |

बदले  में   व्यवहार   से , सुंदर   खीचें   रेख  ||608


संत हृदय सज्जन मिले , सदाचार   के   बिम्ब |

स्वागत उनका कीजिए , जाकर के अविलम्ब ||609


स्वागत सज्जन से  मिले , मिलता है  आनन्द | 

प्रेम लता बढ़ती हृदय   , खिलता है  मकरन्द।।610


स्वागत  सज्जन  बाँटता ,  दुर्जन   देता  खेद |

कह सुभाष   संसार में  , बहुत बड़ा यह भेद ||611

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विषय - लाडली

बेटी  होती   रोशनी,  घर  में  लगे  मिठास ।

होती  सबकी  लाडली , फूलों सी उल्लास ||612


बेटी माँ की  शान  है, बापू  की   है  आन |

दादी की वह लाडली , भाई की शुभ गान   ||613


जब भी   बेटी  लाडली,  जाती  है  ससुराल |

दो परिवारों के बीच में , सदा  मिलाती  ताल ||614


बेटी  घर  में चंद्र  हैं,  है  शीतल प्रतिमान |

सबकी रहती लाडली , घर में सुमधुर गान ||615


जिस दिन जाती लाड़ली , दूर पिया के गेह |

आँगन में बिखरा चले,  सबको अपना नेह ||616

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विषय - माँ

इधर उधर क्यों जा रहा , घर में कर विश्राम |

माँ के छूकर पैर तू ,      कर ले  चारों धाम ||617


माँ  की  ममता  छाँव है  , लगती  बड़ी अनूप  |

शीत  लगे  वह  जेठ  में ,  पौष  माह  में  धूप ||618


माँ को जिसने कर लिया, कर्मो‌  से नाराज | 

ईश   नहीं  स्वीकारते , पूजन  का आगाज ||619


जन्नत  माँ के‌  पैर  में , बरकत  माँ  के  हाथ |

रहमत  रहती  नैन  में , हसरत‌‌ दिल के‌ साथ  || 620


बड़ा नहीं इतना हुआ, रख लूँ माँ को पास |

रहता माँ के पास में , छोटा अभी  सुभाष ||621

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चाय पर दोहावली

आदर ‌ देकर   कीजिए , सदा अतिथि से बात |

पहले उसको  चाय की ,  दीजे   तुम  सौगात ||622


चलन चाय का हो गया ,बढ़ी   आज तादाद |

चुस्की लेकर सोचते  , कैसा  आया   स्वाद ||623


चाह चाय की है लगत , सोकर  उठते  लोग | 

फुर्ती आती सच सुनो   , भागे आलस  रोग ||624


भूख भागती जानते  , फिर भी पीते लोग |

सभी   चाहते चाय से , बनता रहे  सुयोग ||625


चाय शीत में है दवा , होता  अगर   जुखाम |

अदरख  बाली  पीजिए , मिटते रोग तमाम  ||626


नींद   चाय से भागती , फुर्ती    करे   प्रवेश |

इसे  पिलाना शिष्ट  है  , यत्र तत्र ‌ सब  देश || 627

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दोहे - विषय उँगली

उँगली माता की पकड़ , चलना  सीखो मित्र |

मिले पिता  के हाथ से , जीवन  के सब  इत्र ||628


उँगली को  हम दें  उठा , लगता तब  आसान |

खुद पर उँगली जब उठे , लगता   है अपमान ||629


जिसकी उँगली थामकर , बड़े   हुए कुछ लोग |

उसकी गरदन  काटने  , रचते  वही     कुयोग ||630


उँगली  होती हाथ में , गिनती   में  कुल  पाँच |

नहीं एक-सी  वह  रहें , पर सब करती  जाँच  || 631


उँगली जिस पर उठ गई , अर्थ   वहाँ   संदेह |

गिरता   है   विश्वास   भी , और   टूटता   नेह ||632

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 , विषय - रक्त

दान रक्त  का जो करे , आए   रोगी   काम |

तीरथ जैसा पुण्य है , कह सुभाष अविराम ||633


अवसर जब हो सामने ,  करो  रक्त का दान |

घा़यल का जीवन बचे , मन में हो अभियान ||634


एक बूँद भी रक्त की , कभी बचाती प्राण |

मानव सेवा धर्म है , और जगत  कल्याण ||635


रक्त बहे यदि देश हित , समझो पाया मान |

यह भी जानो धर्म है , माता  का  गुणगान  ||636


नहीं रक्त वह काम का, जो स्वारथ अपनाय |

परमारथ में जो लगे , पुण्य  कोटि  में  आय ||637

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जन्म दिवस

जन्मदिवस शुभकामना , देता    अपरम्पार  |

मंगलमय हो हर दिवस ,खुशियों की भरमार  ||638


भाव पुष्प की माल है, जन्म दिवस पर आज |

अनुकम्पा हो ईश की , सफल मनोरथ काज ||639


नेह नूर सबका मिले ,     सुंदर  हो  परिवेश |

जन्म दिवस शुभकामना , देता आज विशेष ||640


खुशियाँ बरसे नव सदा  , हर   दिन हो त्यौहार |

जन्म दिवस पर तुम रखो  , सुंदर सुखद विचार ||641


जन्म दिवस पर  कामना , खुशियाँ मिले अनेक |

सदा   साथ हो   आपके ,  विद्या  विनय  विवेक ||642

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विषय - ध्यान

एक तीर को साधना   , देना  उस पर ध्यान |

मंजिल होगी   पास में ,   रहे 'सुभाषा' मान ||643


भवसागर को पारकर , शरण मिले भगवान |

करना होगा तब तुम्हें , उसका  मन से ध्यान ||644


ख्याति   लाभ हमको मिले , मन में रहा विचार |

"खोट ध्यान" तब मानिए , जिसमें  सदा विकार ||645


ढ़ोगीं   पूजा    जो   करे  ,    होता  नहीं  निदान | 

ध्यान सुमन अर्पण करो , सब कुछ तब आसान ||646


आठ अंग है योग के , पहला जिसमें ध्यान | 

अंतिम जहाँ समाधि है , वहाँ मिलें भगवान ||647


योग के शेष छै अंग निम्न है - 

'यम' 'आसन' सँग 'धारणा' , सुनो  " नियम' का नाम |

अगला     ' प्रत्याहार ' है ,         षष्टम     प्राणायाम ||647

यम (सामाजिक नैतिकता)

 नियम  , आसन , प्राणायाम (आप सहज समझते ही है )

प्रत्याहार (स्थिर चित्त से  लीनता )

 धारणा (एक विषय पर अटल विश्वास |

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हिंदी दोहा , विषय - रथ

जय जगन्नाथ जी 

जगन्नाथ   जय बोलिए , पुरी   बना   है धाम |

त्रय रथ  निकलें ही सदा, जिसमें पीछें श्याम ||648


सभी यहाँ रथ देखिए  , होते   सदा   नवीन |

लौह कील लगती नहीं , दिखते कला प्रवीन ||649


लकड़ी होती नीम की , रथ होता निर्माण |

अक्षय तीजा से बने , मिलता यही प्रमाण ||650


पावन रथ यात्रा रहे , जो   जन लेते  खींच |

बुरीं बला सब भागती , अपनी आँखें मींच || 651


गुंडीचा मंदिर रहे , दिवस गिनो सब सात | 

रुकता रथ भी है यहाँ , खाने मौसी भात ||652

(गुंडीचा मंदिर भगवान की मौसी का मंदिर कहलाता है )जहाँ भोजन में विशेष रुप से भात बनता है | 

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विषय - साँप

सभी   तरह  के  देखिए , घुसे बाँह के  साँप |

जहर  उगलते   है सदा , लखकर जाते  काँप ||653


नाग पंचमी पर मरा , भूखा   प्यासा  साँप |

नेता सारा दूध पी , गये  भोग   को   चाँप ||654


सावन पावन चल रहा, साँप आयगें  द्वार |

शिवमंगल होवें सदा , रखिए सदा विचार ||655


साँप  गले  में  डालते , शंकर   जी   भगवान | 

प्रेम जहाँ  होता प्रकट  , जहर वहाँ  अवसान ||656


साँप   देखकर भागते , फिर भी पूजा रीति |

दुनिया में  मशहूर है ,  यह भारत की प्रीति ||657

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हिंदी दोहा -विषय - अनुज

अनुज   हमेशा  जानिए , अपना  बायाँ   हाथ |

दुनिया की यह कीमती , हीरा   समझें  साथ ||658


नहीं अनुज को त्यागना , गलती करना माफ |

यही एक दिन आपकी , राह   करेगें   साफ || 659


अनुज आपका विम्ब है , कह सकते  प्रतिमान |

दुनिया के हर  काज  में ,  बन जाता  पहचान ||660


दूर अनुज को कर दिया , दुश्मन तब मजबूत | 

साथ खड़ा बनता सदा   , बैरी  को   यमदूत ||661


पर कलियुग है आजकल , खिची आज दीवाल |

अनुज बने दुश्मन यहाँ    , पालें  रहें    मलाल ||662


अनुज ज्येष्ठ जोड़ी यहाँ , राम लखन आदर्श |

भरत   शत्रुघन  मानिए , अनुजों  में  उत्कर्ष ||663

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विषय - ऊबड़- खाबड़़

ऊबड़-खाबड़‌  मार्ग पर  , जब हम चलते  जाँय |

कैसी होती जिंदगी , किस - किस को  बतलाँय || 664


रूखड़ सूखड़ आदमी , ऊबड़- खाबड़ ज्ञान  | 

चढ़ा  करेला नीम   पर , लो   भाई   पहचान || 665


ऊबड़- खाबड़ है नदी   ,  बहती   चारों   ओर | 

पर   रखती है धार में , अपना   निश्चित   छोर ||666


ऊबड़ - खाबड़ भी मिलें ,  सबको बहुत  सलाह |

पर  सुभाष  तुम   खोजिए , सीधी   सच्ची  राह || 667


सब  पंचों   कै बीच में , ऊबड़ -खाबड़‌   ज्ञान | 

पत्ता- सा उड़ता रहे   , सभी   करें     पहचान ||668

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हिंदी दोहा , विषय - कामना

अच्छी रखिए  कामना  , अच्छे   करना काम | 

वयम् राष्ट्र जगता रहे , मिले  सुयश अविराम ||669


करें    कामना  कर्म से  , निकले   अच्छी थाप  |

धरती अम्बर तक बने  ,  जिसकी   सुंदर  छाप  || 670


सत्य अहिंसा   कामना  , दें जग को   संदेश | 

भारत का यह  मंत्र   हो  , संतोषी   परिवेश || 671


करें   परस्पर   कामना , शुचिता  की  हो  राह | 

बैर भाव   पनपे   नहीं  , बनें   सभी   की चाह || 672


यह भी रखिए  कामना , मत   भूलें  भगवान | 

सदा सहायी   वह  रहें ,  मन में हो   अरमान ||673


यह भी हो अब कामना , अपना     हिंदुस्तान  | 

नारी सैनिक सँग श्रमक , हर्षित रहें  किसान || 674


घटनाएँ अपयश भरी , मन में करती खेद | 

करूँ यहाँ पर कामना, खुलते   जाएँ भेद ||675


अपराधी को दंड  हो , रुकें   यहाँ   अपराध | 

मन से करता कामना , सुलझें  सभी विवाद || 676


दो  मुँह   बाले   बंद  हो , बातों  के  भंडार  |

इनकी विघटन कामना , फैलाती   है खार || 677

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हिंदी दोहा , विषय - लेखन

लेखन रहे सटीक  ही  ,  नजर   रखे जो  वक्र | 

जिंदा  कर दे जब कलम , पूरा    घटना चक्र ||678


लेखन में चलती कलम , जब   करती   है न्याय | 

लेखक लिखता सत्य है  , कुछ भी नहीं  छिपाय ||679


लेखन कवि का धर्म है , कविता या आलेख |

दर्पण सत्य समाज का , कहें गुणीजन देख ||680


लेखन सुख अनुभूति है , पढ़ ले सकल  समाज | 

धन्य  कलम तब   मानिए , करें   राष्ट्र यदि नाज || 681


लेखन उसको ही कहें , जिसमें हो   कुछ कथ्य |

कम शब्दों में  सार का , भरा  पड़ा   हो   तथ्य ||682

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हिंदी दोहा, विषय - प्रहार

बने संकुचित दायरे  , कुंठित  जहाँ  विचार | 

कह सुभाष देखे वहाँ , चलते   तंज   प्रहार || 683


गिरहवान   गंदा   रखें , पर   देते   उपदेश | 

दिखते द्वेष प्रहार है , जिसमें  रहते  क्लेश || 684


राष्ट्र घात जो भी करें , उन  पर  नहीं  प्रहार | 

ऐसे कुछ   नेता   दिखे , उनसे  करते प्यार || 685


आतंकी को "जी" लगा , दिखलाते जो प्यार |

वतन आन को तार कर , माँ  पर करें प्रहार || 686


वर्ग भेद सँग जातियाँ , इन पर   दिखे  प्रहार | 

आज टूट कर मिल रहीं  , समय हुआ तैयार ||687

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विषय - सुराज (सु+राज) = अच्छा राज

क्या स्वराज के बाद में , आया  अभी  सुराज | ?

मणिपुर घटना कह रही  , उत्तर  दे दो  आज ||688


बड़े लोग सब है बड़़े , मध्यम  अब  कमजोर | 

निर्धन कभी सुराज का , देख न  पाए   छोर || 689


सपना बना सुराज है , फिर भी रखते आस  | 

रामराज की  कल्पना , लोग  सहेजें   पास || 690


भगतसिंह   फाँसी    चढ़े , मरे  देश  के  नूर  | 

वह   स्वराज को   दे गये , पर सुराज है दूर || 691


वोटों की  चाहत रखे  , भीखों  का अनुदान | 

क्या कर पाए इस तरह, यह सुराज उत्थान || ? 692


हम तुम ही वादा  करें  , आपस में  भरपूर | 

लाएँ  भारत देश में   , अब सुराज का  नूर | 693

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हिंदी दोहा विषय - लालची

तृप्त न होता  लालची     ,प्यासा   रहे सदैव |

लोभ आदतें भी सदा  , बढ़ती  यहाँ  स्वमैव ||694


मानव मन जब लालची  , नभ-सा  है  आकार | 

छोर   न जिसका मिल सके , इतना है विस्तार || 695


दौलत  खोजे लालची , मन   को   रखे  चपेट | 

नीति कुनीति न जानता , बस  करता  आखेट || 696


नहीं   मानता  लालची , लालच  का यह जाल |

कर  देता है   एक  दिन , मानव   को  कंगाल || 697


कहे  सुभाषा   लालची , रखता   हाथ पसार  | 

नहीं  मान  सम्मान पर , करता कभी  विचार || 698

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हिंदी दोहा , विषय - अभियान

चंद्रयान अभियान ने , दिया सुखद परिणाम | 

हुआ विश्व में आज है , भारत का  फिर नाम ||699


जीवन में निश्चित करो , फिर छेड़ो अभियान |

करते रहना कर्म को , मदद   करें   भगवान || 700


चंद्रयान यह तीसरा , सफल हुआ अभियान | 

प्रज्ञा यह  विज्ञान की , धन्य  हुआ    प्रज्ञान || 701


धरती पर्वत आसमाँ , सब   पर है अभियान | 

अगला सूरज पर बना , हुआ सभी को भान ||702


जहाँ लक्ष्य को  ठान लो , चलो निशाना तान |

कह सुभाष बस नाम है , इसका ही अभियान || 703


जायेगा   अब एल-वन , माह   सितम्बर जान |

सूरज ग्रह पर रख नजर , इसरो का अभियान ||704

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विषय - शिक्षक

शिक्षक दिवस पर शिक्षक मित्रों एवं आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ 💐💐 5 सितम्बर 

रखता शिक्षक आचरण , शिक्षा प्रद आवाज |

मन में रखता चाह है  , शिक्षित  बने  समाज || 705


गुरुवर  बनकर ज्ञान का , करता  है  आगाज |

कह सकते शिक्षक सदा, करता सभ्य समाज ||708


मात-पिता जैसा यहाँ  , शिक्षक  का सम्मान |

जहाँ तपस्या माँ - पिता  , शिक्षक है वरदान ||709


शिक्षक की गरिमा सदा, आती बनकर  छाँव।

इनके   पीछे  जो चले  , कभी न थकते पाँव ||710


शिक्षक स्वयं प्रकाश है , ज्ञान पुंज है तेज |

तिमर हटे अज्ञान का , दिया  ईश ने भेज ||711


मात-पिता देते जनम , शिक्षक यहाँ विशेष |

ज्ञान बीज रोपण करें ,  विद्यालय  परिवेश ||712

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हिंदी दोहा, विषय- चार कदम

चार कदम के चिन्ह पग , बन जाते आदर्श | 

सज्जनता   देती   सदा,   प्रादर्शों  के  हर्ष || 713


चार कदम पर भी यहाँ , मिलते अच्छे  लोग |

जिनका अच्छा ध्येय हो , आते स्वयं सुयोग || 714


चार कदम के  चार सौ , तुम्हें   गिनाते दोष | 

रहते  ऐसे  मित्र   है  , संकट    में  खामोश ||715


चार कदम जब हम चलें , पूछें  लोग  हजार  | 

बन  जाता   है  कारवाँ , चलने    को  तैयार  || 716


चार कदम पर लड़खड़ा , गिरते  जो  श्रीमान | 

उनके  जीवन से   सदा , दूर   रहे    सम्मान ||  717

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विषय - शब्द

कह देते हैं शब्द ही , मन   के   पूरे  भाव 

इसीलिए करिए सदा , कहनें सही चुनाव ||718


शब्द -शब्द में सार हो , बाणी मधुर  सुगान | 

मुख से शीतल झिर झरे, नर पाता सम्मान || 719


शब्द  सुने गम्भीर भी , शब्द  बनें   है   तीर | 

मलहम बनते   शब्द ही , हरते मन की पीर || 720


शब्द   कराते  युद्ध  है , कहीं  लगाते आग | 

कहीं - कहीं कड़वें लगें , बनते  कहीं पराग || 721


कहीं शब्द के जाल में , घिर  जाते है  लोग |

वचन करें   पूरा सदा , स्वीकारें  सब  योग ||722

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विषय - शक्ति

मातृ शक्ति को है  नमन , करता   भारत   देश |

जय भी इसकी बोलता,  शुचि रखता परिवेश ||723


सैन्य शक्ति जो देश की , इस पर हमको मान |

सीमाओं  से     बोलते  , जय  हो   हिंदुस्तान || 724


सदा शक्ति कहते  यहाँ ,    है  देवी का रूप | 

पूजन करके  राम ने  ,   मारा  रावण   भूप ||725


देह शक्ति को मानिए ,   पौरुष का प्रतिमान | 

निर्बल की रक्षा करें , सबल    करे  उत्थान || 726


भाव भक्ति की शक्ति भी , रखती अपना नूर |

देख  समर्पण   ईश भी , फल   देते  भरपूर ||727

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फूटी कौड़ी है नहीं , करें   लाख   की बात | 
नेक काम उनको नहीं ,फूटी आँख सुहात ||728

मानव मन कमजोर है , कौड़ी  रहता‌ जोड़ |
जहाँ खर्च की बात हो , लेता मुख को मोड़ ||729

एक बात तो सत्य है ,  कौड़ी का है मोल |
यत्र तत्र   उपमा दिखे  , कोड़ी से हो तोल ||730

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विषय‌ - ठसक (हिंदी दिवस )

ठसक न धन की राखियो  , यह  हाथों  का मैल |
चला जाएगा  एक दिन , तुमको   पीछे   ठैल || 731

सदा   देखते   हम   ठसक , होती   चकनाचूर |
जब भी सम्मुख हो सबल , ठसक भागती दूर ||732

मानव भी करता गजब , रखता ठसक अजीब |
अपने  भी   सब   भागते , आते   नहीं  करीब ||733

ठसक जहाँ  विश्राम  ले    , होने   लगते  पाप  |
लगती  हाय  गरीब  की , जिसको कहते श्राप  ||734

ठसक किसी की  पालकर , दम भरते है लोग |
यह   होती   सबसे  बुरी , जानो   इसे  कुयोग ||735

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विषय - दिशा

दशा आज लाचार है , नहीं   दिशा का ज्ञान |
पश्चिम में वह देखते , कब  निकलेगा  भान ||736

व्यथा कथा बतला रही , कैसा था अवसान ||
भ्रमित दिशा के ज्ञान में , कैसा  था  इंसान ||737

दशा  बनाते हम सभी , होता    जब   निर्माण |
दिशा उसी से हो सहज , स्पंदन  करते  प्राण ||738

छू  लो   सब   ऊँचाइयाँ ,      गहराई   लो  नाप |
जाना है   किस राह से  , दिशा   समझिए आप ||739

गंग   कठौती   में  दिखे  , पत्थर  में  भगवान |
दिशा  बनाती  भावना , हर  मुश्किल  आसान ||740


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विषय - महान

मेरा  देश  महान है , जन गण मन अधि गान |
शांति   प्रेम   संदेश   ले  , आगे शुभ  विज्ञान ||741

नेता   बड़े   महान   है , करिए  प्रतिदिन गान |
चम्मच या चमचा बनें , रखिए  उनका ध्यान ||742

नेता     सदा  महान  है  , छाया  दें    भरपूर |743
शरणागत  जो भी रहे ,    बन जाता  है  नूर ||

जो महान सच्चा यहाँ , कब देते  हम  मान |
है शहीद  जो देश पर   ,  उनका भूले गान ||744

अब महान वह है यहाँ ,  जिनके चले प्रपंच |
धुआँधार  भाषण करें , खड़े  हुए  अब मंच ||745

सुभाष सिंघई
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विषय - मीन- मेख

मीन - मेख  करते   रहे,   पढ़ा   न   मन  का‌    लेख |
कह 'सुभाष' अब कुछ समय , निज के मन को देख ||746

कितने  गहरे  आप  हैं ,     और   आपका  ज्ञान  |
मीन-मेख निज की करें    , कह ' सुभाष' नादान ||747

निंदा  रस  में   मग्न  हैं ,  लिए  कुतर्की    ओट ||
मीन-मेख रख आचरण  , करें  धर्म   पर   चोट |748

नहीं कमी  खुद की  गिने , और ' सुभाषा ' खोट |
मीन-मेख  हथियार से  ,  करते  सब  पर   चोट ||749

कुछ ने घर  में  जानिए  ,  पाल लिया  है  रोग  |
मीन- मेख शब्दाबली , दिन   भर   करें  प्रयोग ||750

श्रद्धा को  अंधा कहें ,  देते  विविध   उपाधि |
मीन-मेख के सूरमा , पोषण   करते  व्याधि ||751

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विषय - दवा-( तंज / हास्य में)

नेता  जी  चाहें   दवा ,   मिलें   वोट ही वोट |
वैद्य  जहाँ  जनता बने  , सभी छिपाते खोट || 🙏752

बात हजम जब हो नहीं , करे पेट  भी  दर्द |
चुगली चूरन लें दवा  , हटे   आँत  की  गर्द ||🙏😂753

देशी  जाने सब  दवा , पर अजमाता कौन |
दूजों को है वैद्य  जी , खुद  पर  रहते मौन ||🙏754

नेता  देते  है दवा,  लालच  भरी   खुराक |
जनता को दे चाटनें , अनुदानों  की खाक  ||🙏755

मनमाने अब मूल्य है , फिर भी चुप सरकार |
मँहगी‌ मिलती  है  दवा , जनता    है ‌लाचार ||🙏756

असर दवा   करती  नहीं , बाँटे  जो  सरकार |
लाभ उसी से क्यों मिले , जो मिलती बाजार ||? 🙏757
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दवा पर सामान्य दोहे

चर्म रोग की है दवा‌,    नीम - निबौरी  तेल |
फोड़ा फुंसी पर लगे , रुके खाज का खेल ||758

शक्कर का जब रोग है , कभी   नहीं घबड़ाँय |
जामुन गुठली   है दवा  , संग‌‌  आँवला  खाँय ||759

शीत काल गुण खाइये , गर्म  रहे   तासीर |
घर  बैठे की है  दवा  , उम्दा   ‌बने   शरीर ||760

अदरक पीपरमूर   हो  , तुलसी   चीनीदाल |
है जुखाम की यह दवा , पीलो इसे  उबाल ||761

गाजर के सँग आँवला , रस को लिया बनाय‌‌ |
रक्तचाप की है‌ दवा ,    वैद्य  सदा‌  समझाय ||762

मक्के की रोटी दवा , लीवर    जब कमजोर |
सुनते  टी बी भागती , बिना‌ किये  कुछ शोर ||763

दाँतुन करिए  नीम की , करे  दवा  का ‌ काम |
पायरिया सब  दूर हो  , करिए  ‌‌ प्रात:   शाम ||764
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-विषय चाँदी

सोना चाँदी की दिखे  , हर मानव में चाह |
घर में  दौलत ढ़ेर हो ,   मंशा रखे अथाह ||765

तेरी   चाँदी  हो  गई‌,   कहने ‌का है  अर्थ |
पौ बारह तेरे  हुए ,  कारज  हुए  न व्यर्थ ||766

चाँदी‌  की पायल बनी  , चलकर दे झंकार |
कटि करधौनी भी बने , हँसती  हुई  फुहार ||767

चाँदी‌- सा चंदा लगे , नभ   से   करे   प्रकाश |
धवल चाँदनी है किरण , कहता कवि सुभाष ||768

सोना चाँदी के मुकुट , बाँधें   हैं श्री  श्याम |
राधा  बैठी पास  है , जन -जन करे प्रणाम ||769

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दोहे -हिंदी मुहावरो पर , कई मित्रों ने लिखा है ,

 एक प्रयास मेरा भी 👇 है , 🙏


कर सुभाष जग में  सदा , कुछ तो  ऐसे  काम |

मिले  आम  के साथ में , जब गुठली  के  दाम ||770


खोदा  जहाँ पहाड़ था , चुहिया निकली कूँद  |

हाथ मले  तब बैठकर , श्रम पर लगी फफूँद  || 771


मुँह में पानी आ गया  ,   था  ऊँचाई    फेर  |

यह   खट्टे  अंगूर    हैं  , कहे    लोमड़ी   हेर ||772


काजल की  थी कोठरी , लगें  वदन  पर   दाग  |

फिर क्यों उजला कह रहा ,मानव तन का भाग || 773


बीन बजाकर भैस की  ,कब बदली है  चाल |

ठुर्रा होती मूँग जब ,     कभी न गलती दाल || 774


अवसर हो जब सामने , बदले  गिरगिट रंग  |

खरबूजा को   देखकर , दूजा   लेत   उमंग  ||775


हरि भजनें  साधू   गया ,  ओटन लगा  कपास |

दुर्जन की संगत   सदा , भरती खूब    खटास ||776


चना अकेला फोड़ता , कहाँ  किसी  का भाड़ |

कब  लोहे के भी चने ,     चब सकते है  दाड़  ||777


दाल भात मूसर घुसे ,   अपनी   ढपली   राग |

घर की  वामी  छोड़कर , बाहर  खोजें    नाग ||778


कंगाली  में   भी   सदा ,  होता   गीला   चून  |

चक्की में डाला चना  , घुन  भी हो मजमून  ||779


आटे   में   थोड़ा  नमक , सब   देते  है  डाल  |

राई  का  पर्वत बना , करते    लोग   कमाल  || 780


गुड़  गोबर   भी  देखता ,  देखूँ    बंदर  बाट   |

तिल का बनता ताड़ है ,लुटती जग‌ की  हाट || 781


धुला दूध का कौन है ,   है   सब   कोल्हू  बैल | 

सभी  दूध के दांत भी ,  गिरकर   बनते   मैल ||782


कभी मिले खटिया खड़ी , कभी  टूटती खाट | 

चोर - चोर  भाई   बनें  , मौसेरों   की    हाट || 783


सांप मरे   लाठी  रहे ,  निष्कंटक  हो    राह  |

हर्र  फिटकरी मत लगे ,  रँग चौखे  की चाह  ||784


अब सुभाष  विनती करे , करो आँख  मत लाल |

पढ़कर  बस आनंद  लें ,  छोड़  बाल  की खाल ||785


गुड़  छोड़ा पर  गुलगुला ,  नहीं   करें  परहेज | 

घोर अमावस पर सुना ,  जुगनू  में    है  तेज || 786


नौ दिन चलकर है गिना , निकला   ढाई  कोष |

गाज स्वयं पर जब  गिरी , तब  आया है  होश || 787


मार   कुल्हाड़ी  पैर  पर , आगे  जाते    लोग | 

काजल की घुस कोठरी , काला  लाते  योग || 788

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कुछ धर्म पर दोहे

*राह* कहो या *रास्ता* , *पथ*  कह  दो   या *पंथ* |*मार्ग* कहो या *मग* कहो,  पर  मानो   शुचि   ग्रंथ ||789

*प्रचर*  *गमथ* *गतिपथ* कहो , *गुजर* *घाट* सब नेक |

एकभाव कहने    मिलें , हमको     शब्द  अनेक ||790


है   समर्थ  हिंदी   यहाँ , भाषा   है    अनमोल |

क  भाव  को   बोलने , भरे   पड़े   है   बोल ||791


यहाँ संत   सानिध्य   है , रत्ना   त्रय‌ का  गान |

यदि  गौरव हो निज हृदय, समझों  स्वाभिमान ||792


मर्यादा मत टूटवें , प्रभु   जी   विनती  मात्र |

समय दान  जो दे सके ,सेवा  हित हो  पात्र ||🙏793


सर्व साधु का हो नमन , शुभ मंदिर कल्याण |

धर्मातन की  रक्ष   हित , शुचिमय होवें प्राण ||🙏794


सदा सत्य की राह हो  , रहे   मूल   यह   मंत्र |

जिनकी छाया में बढ़े, भारत   का   गणतंत्र ||🙏795


उदित लोग जो कर रहे , आकर  अपना  वाद |

करे हानि वह धर्म की  , गलत रखें  बुनियाद ||🙏796


कुछ हम जब घटना सुने  , हिंसा का  उपयोग |

नहीं  बंधु ऐसा लगे    ,आया  भीषण  रोग ||797


सर्व साधु का नमन हो  , वर्तमान का मान |

सत्य स्वरुप तब जानकर,सबको  करो प्रनाम  ||🙏798


पंथ कहो या पथ कहो , कहाँ  अर्थ में भेद |

परम सत्य ही अब सुनो , सभी हटाओ खेद ||🙏799


संत जहाँ सच्चे मिले   , हम   सबके भगवान |

नत सुभाष मस्तक करो , रखो विनय श्रृद्घान  ||🙏800


धर्म काज हित एकता , दिल को रखना खोल |

धर्मातन का ध्यान रख , मीठे   बोलो    बोल ||🙏801


चलो अहिंसा  राह पर , संत  वाद को  छोड़ |

आगम ही  देगा सदा , जीवन  में शुचि  मोड़ ||802


नमो  सभी साधू  करो , रखो धर्म को  याद |

पालन रत्नात्रय  करो,  मन को रख आबाद ||803


संतवाद  यदि चल गया , श्रावक में हो फूट |

यही फूट फिर देखना  , कैसी  लाती   टूट ||804


तूँ तूँ मैं मैं  जिस जगह , सिर पर  करती राज |

विघटित  वहाँ समाज है,सिर पर गिरती गाज ||805


संत  नीर  होता   सदा  , देता  जाता  ज्ञान |

जहाँ ठहरता बाँटता, सबको  अमरत दान ||806


नीर  नहीं   है   टूटता,  कितना करो प्रहार |

फर्क संत  में जो करें , पाले   बंध   हजार ||807


आगम की  छाया रहे ,   मिलें   संत   अविराम |

भाग्यवान    श्रावक  रहें,  करें स्वयं   को  धाम ||808


देते है धर्मायतन , राष्ट्र  मनुज हित दान |

नहीं हेय कोई यहाँ , सभी  दान है मान ||809


तीर्थ पुराने जो अभी , कभी   नए थे गान |

रहे सदा आलोचकी , युग- युग में श्रीमान ||810


खुलती थैली सम्पदा , ऋषि चरण में आन |

दानी    देता   है   लुटा , पाता   है सम्मान ||811


आलोचक हो अब खड़े , करें दान  की बात |

पड़ जाएगा तब पता , कितनी जुड़ी जमात ||812


मेंढक   तुलते   हैं   नहीं , कितना   करो   प्रयास |

एक   चढातें   हम   जहाँ ,   दूजा    कूदे    खास ||🙏812


अजब-गजब अब भक्त है , सब   हैं चतुर सुजान |

पहले   अपना    देखते ,   नफा   और   नुकसान ||🙏814


जय -जय बोले उस जगह , जिधर मिले कुछ खास |

नहीं  पूछ हो जिस  जगह  , कह  उठते  वकबास ||🙏815


पूँछ  मीडिया  थामकर ,  अब   चलते   है   लोग |

योगदान  के   नाम    पर ,    देते      निंदा   रोग ||🙏816


आप  स्वयं क्या  कर  रहे , यह   मत   पूछो  बात |

भ्रम  फैलाने   में    सफल ,   देने   बस   आघात ||🙏817


दोष     गिनाते     घूमते ,   और  खोजते    दोष |

घोषित खुद  ही   वीर   है ,  बतलाते   है   जोश ||🙏818


अजब तरह के व्यान है , गजब  मिले   सामान |

मोवाइल पर चल रही  , अच्छी  आज    दुकान ||🙏819


ऐसा   उनने   गा   दिया , बैसा  था  वह  गान |

मीन  मेख   के  देवता ,   घर   से  बाँटे   ज्ञान ||🙏820


साधू  पर  संदेह   का , फेंक   रहे   है   जाल |

अपना  ज्ञान  परोसते  , दो  कोड़ी  का  माल ||🙏821


ऐसे    करते    बात   है ,   जैसे     ठेकेदार |

इनके  कंधे  है चढ़ा , आज  धर्म   का  भार 822

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कुछ कड़वें दोहे - 🙏

निंद  चुनिंदा  कर रहे  ,  लगे   बढ़ाने   क्रेज |

धर्म ध्यान सब  छोड़कर , बना रहे कवरेज ||823


तज  दर्शन पूजा समय , सामायिक    संज्ञान  |

मोबाइल  पर उस समय , डटे  मिले   श्रीमान ||824


अंध भक्त   उपमा  मिले,  संत   हुए    बेढंग  |

मोबाइल से   बज  रहे , कुंठित   आज मृदंग ||825


आयोजन सब  बंद हो, और साथ में   दान |

क्या पूजा   भी  छोड़ दूँ , बतला दो श्रीमान ||826


श्रमदानी  दानी  मिले  ,मिले    संत   विद्वान |

इनको मिलता मंच है  , नत मस्तक  सम्मान || 827


पर सेवा भी धर्म है ,     , जो भी करते कर्म |

पूजा सम  यह कर्म  है , यही   बोलता   धर्म ||828


फाँका   फूँकी  कर  रहे , बाँट रहे  जो ज्ञान |

गिरहवान में झाँकिए , आप कहाँ   श्रीमान ||829


संकट में   भी कर   रहे , पंथवाद की  बात  |

लोग समझते क्या नहीं , कहाँ  मारते लात ||830


तीस मार खाँ बन गये , पोस्ट   रहे   है चेंप |

अंगुली दूजों पर उठा , नहीं रखें निज झेंप ||831


आज पुराने तीर्थ है , कभी नए थे  लीन |

आज नए जो बन रहे , आगामी प्राचीन ||832


रक्षा पर भी सदियों  से  ,होते  रहे  सवाल |

जीर्णोद्धार के   समय , आते   रहे वबाल ||833


जिनमें   जैसा  अंश है , बैसे  रहे   विचार |

दाता देता है सदा , बिन   दाता  दे   खार ||834


आप खड़े हो जाइये , कितना   मिलता  दान |

संत रहे जब  मंच पर , प्रकट  होय  अरमान  ||835


आयोजन   मत    कीजिए , बाँट रहे संदेश |

जुड़े द्रव्य को दीजिए , अन्य जगह परिवेश ||836


आयोजन होगा नहीं , जुड़े  कहाँ    से  द्रव्य |

होगी नहीं प्रभावना  , जुड़े   न संख्या भव्य ||837


मोबाइल  के वीर तुम , करो एकता बात |

पंथ संत पर छोड़ दो , आप चलाना घात ||🙏838


वर्तमान समय पर संकेतात्मक दोहे 🙏

अवसर आगे आ  रहा  , पहचानो   श्रीमान  |

तब  सुभाष सबसे कहे  , मत चूको चौहान ||839


हमको सीधा जानकर , देते  दिल  पर  चोट |

रक्षक ही  अब  लूटता , मन में  रखता खोट ||840


आपस में मत  फेंकिए , अभी उठाकर  कीच |

फँसे आज   मझधार  में , सब तीरों  के  बीच ||841


निंदक भी   मेरी  सुने ,  तुम्हें   मिलेगी   छूट |

पहले   करिए   सामना , जो   आई   है  लूट ||842


श्रमणों को मत  कोसिये  , बने आज जो चित्र |

समझों   उनकी   चाल को , मेरे   प्यारे   मित्र ||843


लिखें मैथली जी शरण , पंचवटी के बीच |

जीवन में सुधरे नहीं , भाव भरें   जो नीच ||844


जहाँ न्याय की चाह हो  , वह ही काटे अंक   |

बिच्छू  राजा   जानिए  ,  चुपके  मारे  डंक  ||845


न्याय‌ वहाँ मिलता नहीं , जहाँ  पनपती   खोट |

कुटिल चाल खोजे  सदा , पहले  छिपने ओट ||846


टैक्स भरो या साथ दो  , या अर्पण हों   वोट |

युवा बैल हल में जुते   , मिले  पीठ  पर चोट ||847


सर्प काटकर भागता , रुके न कुछ पल खास  |

राजनीति  जब काटती ,   मिले न  पानी पास ||848


दौलत विद्या  गुणीजन , इनको है अभिशाप |

मंच न साँझा  कर सके , रखें  ज्ञान का‌  ताप ||849


जहाँ  इकठ्ठे   मंच हो ,  बन जाता   इतिहास |

पिछले पन्ने  देख लो   , कहता सही  सुभास ||🙏850

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कथ्य दोहे

रोनी सूरत त्यागकर  , हँसकर    खोलो   द्वार |

तुमको     टूटा    जानकर , वें    डालेगें   मार ||851


कुटिल चाल में फँस चले , जब भी अपना पैर |

पहले    पैर  निकालकर ,    आगे   पालो  वैर ||852


तीर  जहाँ   से   चल  गये , तुमको   देने   पीर |

पीर लौट  उनको  लगे ,  रखो  खोज   तदवीर ||853


हाय-हाय मत कीजिए , वाह   कीजिए  काम |

लौटे  तीर  कमान में , लो   साहस  को  थाम ||854


लोकतंत्र  का   देश  है , शक्ति   को   पहचान |

अवसर आए हाथ में ,    मत   चूकों   चौहान ||855

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बुंदेलखंड के दर्शनीय स्थल

बुंदेली   हम   लोग  है ,   राजा   है   श्रीराम |

नगर ओरछा धन्य है , बना   राम   से  धाम ||856


बेटी के हर   ब्याह में , रहें   कुँवर  हरदौल |

भानेजन को भात दें, रखें बहिन का कौल ||857


जहाँगीर अद्भुत महल ,नगर ओरछा  पाट |

मंदिर देखो  चतुरभुज , नदी   बेतवा   घाट ||858


शिवशंकर  रक्षा  करें  , रह  कुंडेश्वर  धाम ||

प्रकट हुए थे कुंड से , रुप पिंड  धर श्याम ||859


विन्ध्यवासनी मातु भी  , करती  है उद्धार  |

बुंदेली हर आन का , करती   सदा  निहार  ||860


मैहर   बाली  शारदा , देती   रहती   ज्ञान |

बुंदेली  जन  मानता , उनको अपनी शान ||861


अछरु   माता  जाइये , बिगड़े बनते काज |

जो भी माथा  टेकते  , माता रखती  लाज ||862


पन्ना को सब जानते , रहते जुगल किशोर |

हीरा  उगले भू‌ सदा, विचरें   वन  में  मोर  ||863


निकट नदी पर  झर रहा , पांडव एक प्रपात |

पन्ना की  घाटी  सुनो , बनी जगत  विख्यात ||864


यहाँ   नेशनल   पार्क है   , सुंदर  अभ्यारण्य |

सभी तरह के जीव है  ,निर्भय जिनका पुण्य ||865


भीम  कुंड  है  बाजना, रहती पुण्य हिलोर |

गहराई ‌ को  नापने  , मिले न  इसका छोर  ||866


दर्श  जटाशंकर  करो  , मिटती है सब पीर |

शिव शम्भू धूनी रमा , रहते   है   इस  तीर ||867


दतिया माँ  पीताम्वरा ,  सबकी पालन हार  |

स्वर्गिक सुषमा है यहाँ ,रजकण है उपकार ||868


खजुराहो      कंदारिया ,      महादेव   विख्यात |

चरण शरण जिनको मिले ,सुखमय सब हालात ||869


खजुराहो   में  देखिए   , शांतिनाथ   भगवान |

करो मोक्ष की कामना , रखकर   भाव प्रधान ||870


जैन तीर्थ अनुपम यहाँ , जिसका  नाम अहार |

राँगा     भी  चाँदी  बना ,   कहता‌‌   साहूकार ||871


निकट पपौरा   तीर्थ  है , गिनो एक सौ आठ  |

मंदिर यहाँ विशाल है , पढ़ो   मोक्ष  का  पाठ ||872


बंधा  क्षेत्र  मशहूर है , अजितनाथ   का घाम |

मुगल यहाँ पर बँध गये , हुआ न भंजन काम ||873


कुंडलपुर महिमा अलग  , आदिनाथ का धाम |

कहलाते    बाबा   बड़े , बिगड़े   बनते   काम ||874


महाराजा छत्रसाल को , मिला   यहाँ आशीष |

राज्य मिला खोया हुआ ,कृपा  मिली जगदीश ||875


सोनागिर   पर्वत  चढ़ो , चंदाप्रभु   का   धाम |

मंदिर  यहाँ  विशाल है, जग में   इसका‌  नाम ||876


चलो देवगढ़ आप सब , हर कण जिसका पूज  |

कला केन्द्र अद्भुत दिखे  , मिले   न  कोई  दूज ||877


गुना   जिले    में     जानिए , चंदेरी    थूबौन |

अद्भुत अतिशय है यहाँ , करो   साधना मौन ||878


बड़ागाँव  सँग  सेंदपा ,  नैनागिरि    विशाल |

यहाँ   मदनपुर  नाबई , लखो यहाँ हर हाल ||879


पवा करगुवाँ तीर्थ भी , वंदनीय  है  धाम |

नगर जतारा भोंयरा , दर्श करो  अविराम ||880


चित्रकूट में राम का , रहा    बहुत    वनबास |

सती अनुसुइया है यहाँ , जिनके सब है दास ||881


कामदगिर की वंदना , और    कामतानाथ |

हरते जन की पीर है , रखकर अपना हाथ ||882


नदी‌‌   यहाँ   मंदाकिनी , और जानकी कुंड |

जन- जन के है  माथ पर , रामा ‌यहाँ त्रिपुंड ||883


धारा   है  हनुमान  की , वन है  यहाँ  प्रमोद |

राम नाम उच्चार कर , मन का कर लें शोध ||884


राजापुर में ले जनम , कविवर तुलसी दास |

रामचरित मानस लिखें , जग में करें उजास‌ ||885


कालिन्जर का किला , रखता   है  इतिहास |

नीलकंठ मंदिर यहाँ , जिनके   सब है ‌दास ||886


अजयपाल का अजयगढ़ , दुर्ग यहाँ का नूर |

अमन महल को देखिए , नजरों  से   भरपूर ||887


रानी लक्ष्मी का सुनो , झांसी‌  हित. बलिदान |

आजादी  लाने  तजे , जिसने   अपने    प्रान ||888


वीर   महोबा  के रहे , आल्हा   ऊदल  शान |

अलबेले   रणबाँकुरे  , बल का गज़ब बखान ||889


खेतसिंह  महराज  का , देखो   गढ़कुण्डार |

अद्भुत ‌लगता है किला , भव्‍य  रहा दरबार ||890


बाला जी उन्नाव का , मंदिर   अनुपम  सूर्य  |

मड़खेरा भी जानिए , जिसका  अपना  तूर्य ||891


जन्में थे रावतपुरा ,     धन्य जगत  सरकार |

जिनका छिपरी जन्म है , नगर लिधौरा पार ||892


चर्चा में है आजकल , जय      बाघेश्वर धाम | 

जय-जय जनता बोलती , बनते उनके काम ||893


कल्पवृक्ष  है धामना ,      लगता बड़ा  अनूप | 

टीकमगढ़ लगता जिला , अद्भुत है यह रूप ||894


गुना बजरंगगढ़ सुनो , तीरथ बड़ा विशाल | 

दर्शन जो मानव करे , होता  वही  निहाल || 895


बाला जी उन्नाव  है , दतिया  है शुभ धाम |

माता है पीताम्वरा , सभी    जानते   नाम || 896


मड़खेरा मंदिर सूर्य है , अनुपम लगता खास |

जो भी जन आते यहाँ , पाते    यहाँ  उजास || 897


मऊ सानिया भी सुनो , छत्रसाल महराज |

रखी बुंदेलखंड की , जिनने    पूरी  लाज || 898


टीकमगढ़  नगरी मधुर , बुंदेलों की  शान |

दर्शनीय है थल यहाँ , जिनका अद्भुत गान ||899

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बहुत अभी कम ही लिखा, लिखना काफी और |

अभी  नहीं हम जानते ,       कब  आएगा दौर ||900

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बिल्ली का उपवास है , करते भजन सियार |
राजनीति  में    देखते    , गीध   भरें  हुंकार  ||901

यहाँ  धनुष  को तोड़ने , हो जाते  सब   एक | 
हश्र  बाद   में  देखते    ,     दावेदार  अनेक ||902

बदबू   देता   इंडिया ,  सुनते  आज   विचार |
यहाँ इंडिया मेक इन , फिर  क्यों  है  उपहार || 903

राजनीति में खप गए ,   ऐसे  कुछ   श्रीमान | 
भाषण सुनकर पीटते  , सिर अपना गुणवान ||905

चमचे     बुद्धू  जोड़कर  ,पाल  जमूरे    चार | 
राजनीति का चल पड़ा ,  खुला आज व्यापार ||  906

प्रजातंत्र में आजकल , चलते   कई   फरेब | 
जिसमें चलते  माफ  है , नेताओं   के   ऐब ||907
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कवि की और से पाठकों से निवेदन 🙏

गठबंधन में   कवि नहीं ,     ठगबंधन   से   दूर |
व्यंग्य लिखा करती कलम , सभी दलो पर पूर ||908

नहीं   टेंशन   लीजिए , सृजन न   काटे   वोट | 
जहाँ कमी कवि देखता , करें   व्यवस्था  चोट ||909

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श्वान सामने  जब रहे,  रहता  पूँछ   हिलाय |
समझों चमचा वह रहा,  नर तन  की पर्याय ||910

श्वान भौकता जब मिले, देख मनुज समुदाय |
समझों   नेता वह  रहा,  मानव  की   पर्याय ||911

श्वान सूँघता जब मिले , और झपट कर खा़य |
समझों रिश्वती लालची , था   मानव   पर्याय ||912

श्वान कान को कर खड़ा  , सूँघे शीश हिलाय |
समझों अफसर था पुलिस,वह मानव पर्याय ||913

मारो   पीटो  जोर से , श्वान   भाग मत  पाय |
कामचोर  था  आलसी, वह नर  की  पर्याय ||914

रोटी खाकर श्वान जब , खड़ा - खड़ा गुर्राय | 
समझों रहा    लठैत है , वह  मानव  पर्याय || 915

श्वान  आपको ‌देखकर , उल्टी  दौड़‌‌‌  लगाय | 
समझो पक्का चोर था , मानव   की पर्याय ||916
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लूटपाट   चारों  तरफ , मँहगाई   की मार |
नेता जी भाषण करें , काफी हुआ सुधार ||917
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

बीज  पपीता   बिक रहे , कहकर   काली   मिर्च |
ग्राहक भी   हँसता   गया ,  आज  बचा है   खर्च ||918
|| बोलिए धत् तेरे की ||

कविता चोरी हो रही ,    जिस   पर  नहीं लगाम |
"काव्य शिरोमणि" हो रहे , चोर  सभी अविराम ||919
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

दिल्ली में  दंगल हुआ , चित्त हुए मलखान |
चमचागिरि‌ से दूर रह  , चूक  गए  चौहान ||920
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

सत्य‌ कहा  जब सामने , लगी मिर्च-सी तेज |
समाचार भी है सरल  , नहीं  सनसनी खेज ||921
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

मूँछे   अपनी   ऐंठते ,   खड़े   रहे     श्रीमान |
नहीं न्याय की कह सके , हम सबके दीवान  ||922
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

रखवाली झूठी  दिखी   , चूक  गए  चौहान |
चिडियों ने भी खेत  को ,   बना दिया‌ मैदान ||923
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

लोग चतुर जो भी बनें , समझें खुद सुल्तान |
शक्ल एक दिन बोलती, चूक   गए. चौहान ||
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

न्याय नीति का खुल गया , भाषण से बाजार | 
उच्च   मंच  से   बेंचना  , नेता   का  व्यापार ||924
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

नेता जी  बस  बेंचतें , करें   नहीं   उपयोग |
हावी है अब न्याय पर , आश्वासन का रोग ||925
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

हमको मिलता  न्याय है, कहते  तिकड़मबाज |
नेता   के   चमचे  करें , सदा  न्याय  पर राज ||926
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

मिला हमें भी न्याय है ,कहता सही सुभास |
गेह खेत सब बेचकर , ले  आए   है    पास ||927
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

एक न्याय देना प्रभू , जहाँ  विराजे   आप |
चरणों  में  लेना  मुझे , छूटें   जग के ताप ||928
|| बोलिए  धत् तेरे की ||

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सत्य धर्म को मानकर  , सभी  निभाओं  फर्ज |
पर  अगले  भव के लिए, रखो  न कोई  कर्ज ||930

परिजन भी यदि कष्ट दें ,  तब करना  स्वीकार |
भ्रात  अगर हों सामने    , सह  लेना  सब  वार ||931

सदा त्रास  ही   भोगते    , स्वीकारो   संज्ञान  |
पिता हीन कुछ ज्येष्ठ भी  , घोषित  बेईमान ||932

एक विनय सबसे करूँ , रखना  हृदय टटोल |
कहीं फर्ज में चूक  हो  , रखो  क्षमा के  बोल ||933

कमी रहे  कुछ भाग्य में,  लोग करें  बदनाम  |
कर  लेना तब  याचना , क्षमापना   अविराम ||934

आयु बंध सबका लिखा , होगा जब अवसान |
पीड़ाएँ  सब    छोड़कर  ,  कर लेना  प्रस्थान ||935

नहीं  भुलाए   भूलता , हृदय जहाँ  ले  टूट |
अपनो  के षणयंत्र भी, बहुत  डालते  फूट ||936

परिवारों   में  देखता ,   लगे    हुए   आरोप |
पढ़कर मन विचलित रहे , मिलते गंदे  थोप ||937

परिजन जब बुनने लगें , षडयंत्रों  के  जाल | 
परेशान  करने   सदा  ,   होगें  खड़े  वबाल ||938

कटुता पर मेरी   विनय  , यदि हो शेष विशेष |
सभी चुका लो इस जनम , छोड़ो जरा न लेश ||939

पिछले भव के यदि  रहे  , देनदार    व्यवहार  |
सभी चुकाकर इस जनम, छोड़ो नहीं  उधार ||940

दोष आपको  दे सदा  , मिलकर  जब  परिवार |
निर्णय में   स्वीकार  लो ,  सभी  दंड   स्वीकार  ||941

सभी कहेगें भूलकर , करो   धर्म का ध्यान |
अच्छा  यह उपदेश है , और   धर्म   संज्ञान ||942

नहीं फर्ज को मानना , कहीं किसी पर कर्ज |
फर्ज नहीं   परिवार  में , कोई    करता दर्ज ||943

नहीं   हौसला   हारता , सत्य   न माने हार |
पर जब अपने सामने , हार  करो  स्वीकार ||944

मुखिया भी परिवार का  , सहना जाने  चोट |
रो   लेता  एकांत   में , फिर भी रखें न  खोट ||945

इत्र लगा जीवन जियो ,   करो  खूब  शृंगार |
मरकर निकली राख में , मिले न खुश्बू यार ||946

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व्हाट शाप पांच प्रकार की रोटी गद्य में खूब चली थी , तब मैनें सात प्रकार की रोटियाँ  दोहा में लिखी 

मोटी पतली जानते  ,  कुछ रोटी को यार |
पर रोटी के सात है  , कहता सभी प्रकार ||947

पहली रोटी जानिए , आप कीजिए ख्याल |
देती मैया  किस तरह , उसमें  ममता डाल ||948

भर जाता है पेट तब, मन  भी   रहे प्रसन्न |
मैया  का आशीष है  , इसी तरह का अन्न ||949

दूजी भी खाने मिले ,   करिए   रोटी  याद |
अपनेपन के भाव का , देती   पत्नी स्वाद ||950

पेट  भरे तब सच सुनो , उमड़े उस पर प्यार  |
मन की बगिया सींचती, घर में   करे   बहार  ||951

तीजी  रोटी  पुत्रवधु , जब भी  करे   परोश |
मिलता है कर्तव्य का  , उसमें हमको जोश ||952

पेट भरे  तब गर्व का  , होता   है  अहसास |
पुत्र   वधू की   रोटियाँ , जीवन में  उल्लास  ||953

होटल की  चौथी   सुनो , रोटी  खाते  लोग |
सदा भटकते स्वाद को  , मिले अंत  में रोग |/954

दाम खर्च  होते वहाँ ,    गड़बड़   होता   पेट |
अपने  तन का आदमी  , खुद करता आखेट ||955

रोटी    जानो   पाँचवी,   मिलवें   नौकर  हाथ |
समझों वह दिन आ गए , छूटा सब कुछ साथ ||956

छटवीं  रोटी  जानिए ,  करना हो खुद   थोप |
बूड़ापन भी साथ में , समझो  सब कुछ लोप ||957

भिक्षाटन की  सातवीं , रोटी जग में    जान |
दुर्दिन   यह  आए  नहीं , विनती है भगवान ||958

करता हूँ मैं प्रार्थना , ईश्वर    तुमसे   आज |
तीजी रोटी तक रहे , जीवन की बस लाज ||959

सुभाष सिंघई
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पाप न होते कर्म से ,    नहीं भाव से योग |
सज्जन होकर भी सदा , क्यों डरते है लोग |960

क्यों डरते है लोग वह , जो   होते  है  संत | 
मनसा बाचा कर्म से , करें  पाप  का  अंत ||961

क्यों डरते वह लोग है , जो रखते  है ज्ञान |
यह असार संसार है , जब  रखते है भान ||962
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ऊपर वाला  एक   है , हम सब उसके अंश |
आए शुचि अवतार भी , और चले शुभ वंश || 963

बारिश   पानी   एक है  , सबको   रहता  याद  |
ऊपर वाला  दे    सदा ,   तरह-तरह के  स्वाद ||964

नर-नारी   दो ध्रुव यहाँ   , मानवता   है   धर्म |
ऊपर वाला एक है  ,  सभी  समझ   लें   मर्म ||965

भूमि -बीज  आधार है , मिलन प्रकृति विस्तार |
ऊपर  वाले  की सदा ,  महिमा  लो  स्वीकार || 966

सुख-दुख केवल फल यहाँ , गति मानो दिन-रात | 
ऊपर    वाला   देखता   , लोग   करें खुद   घात || 967
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नारी  होती जहाँ सरल  , कहते  उसको  गाय‌  |
सीधा सच्चा यदि पुरुष ,फिर क्यों गधा कहाय  ||🙏968

नारी    हिरणी  मोरनी   , कवि  देते   सम्मान |
नर तो घोड़ा   बैल है   , यह    कैसै  संज्ञान || 😚969

पूजा रोली  आरती , प्रभू   चरणों   के  पास |
घंटा झालर नर बने ,     पिटें  दूर  से  खास  ||🙆‍♂️970

नारी   अबला    मानते ,  सबला नर को  मान |
फिर क्यों नर  तबला बना , पिटता फिरे जहान  || 🤭971

नारि   शक्ति  को  सदा , नमन   करे  सरकार |
प्रश्न  हमारा   है  यहाँ ,  क्या नर   यहाँ  उधार || 🤔972

कंधे  से कंधा  मिला , है  नारी   पग   गान  |
पर नर के कंधे दिखा , हमें अधिक सामान || 🙄973

वस्त्र पुरुष के अब पहिन , नारी करती काज |
पर नर पहनें साड़ियाँ  , क्या  बदले  में आज ||😚974

बनी लाड़ली नारियाँ , बहिन बनी  लें दाम |
नर सब सूखे हैं  रहत , रहें  खोजते काम || 🤑975

नारी को  देवी  कहें , और   करें  गुणगान |
नहीं पुरुष हैं  देवता , मिलता  रहता  ज्ञान  || 🤭976 

कहें   बचाओ  बेटियाँ  , सरकारी फरमान |                        क्या बेटो  को जान लें , इनका होगा  दान || 🤔 977

लक्ष्मी  होती   बेटियाँ , सभी  झुकाते  माथ |
क्या  घर  में  सबको लगे  , बेटे  भैरव नाथ ||🤔978

खूब पढ़ाओं  बेटियाँ ,  शासन यह समझाय |
क्या करना पतिदेव को , यह निर्णय ले पाय || 🙄979

पापा   की  होती  परी ,  बेटी  को  सम्मान |
कहें कबूतर बाप ही ,   सुन   बेटे का  गान || 🤔980

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बात हास्य तक मानिए , दोहा  मनो  विनोद |
पूजन जैसी योग्य है  , नारी  की  शुभ  गोद ||981

विषय - प्रहार ~तुषार

शीत काल में जब पड़े,   भू  पर  जहाँ  तुषार |
पवन  लहर तन  चीरती , करती  प्रबल प्रहार ||982

शीत काल में आपको , अक्सर   दिखे तुषार |
हिमकण गिरें जमीन पर ,करता  पवन प्रहार  ||983

कटुता  की   बातें  जहाँ , जानो  वहाँ  प्रहार  |
हटता  है  यह  प्रेम  से , लगता  जहाँ  तुषार  ||984

अब प्रहार  सब दूर हों , हटबें  सभी  तुषार |
न्याय धर्म  ईमान  का , गुंजित  रहे   प्रचार  ||985

ज्ञानी   मिलते चार जब , करते नहीं  प्रहार  |
हटते वहाँ तुषार सब , धर्म   दिखे   आधार  ||986

पड़ता  जहाँ  तुषार है  , पवन चले यदि  तेज |
थर-थर  काँपे   लोग  तब,    जैसे  टूटी  मेज ||987

गिरें  रुई  से ओस कण , धरती   लगती  श्वेत |
दे तुषार  नुकसान भी , कभी  सुखी हों  खेत ||988

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 तुमको किसने कह दिया

          तुमको किसने  कह दिया , सुधर गये वह लोग |                नफरत  का जिसने  यहाँ  ,  फैलाया  है  रोग ||989

    तुमको किसने  कह दिया , उनमें  हुआ सुधार  |जिसको  माता   भारती  , नहीं  हुई   स्वीकार ||990

           तुमको किसने  कह दिया , वह नेता अब फूल |               बोये जिसने है सदा , कदम- कदम पर   शूल ||991

            तुमको किसने  कह दिया , मानो  उनकी  बात |जो करते  है देश में  , हर   अवसर   पर घात || 992

         तुमको किसने  कह दिया , उनको दो सम्मान |अकल अजीरण रोग है , कुंठित जिनका ज्ञान ||993

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जाना सबको एक दि

      घोड़ा-गाड़ी-कार पर , राजा   रंक  निहार |                      जाना सबको एक दिन ,मरना अपनी बार |994

       जाना सबको एक दिन , मरकर मरघट  धाम |                पाप पुण्य का फैसला  ,तब  होगा  अविराम ||995

      जाना सबको एक दिन , अपने  हाथ  पसार |                   धन-दौलत को छोड़कर , बना  हुआ लाचार || 996

    जाना सबको एक दिन , अपना घर परिवार |                    छोड़ सभी   देगें तुम्हें , जलते  मरघट   द्वार ||997

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विषय - अनुराग

   पशु पक्षी पहचानते , मानव का  अनुराग |                         आकर बैठें प्रेम से ,  चरणों  के अनुभाग ||998

      मन  की पीड़ा को मिले , वचनों से अनुराग |                     अंदर जलती भी  बुझे , मन की  पूरी आग ||999

     निर्गुण से अनुराग कर, परम   ब्रम्ह में ध्यान |                   यह होती जब साधना ,   होता  मंगल  गान || 1000

   देखी   है  अनुराग की , होती अमरत धार |                      तन -मन को शीतल लगे , ऐसी चले फुहार || 1001

    दोहों में अनुराग से , कह   दो  कोई बात  |                       सुनने  बाले को लगे , मिली यहाँ सौगात ||1002

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उपसंहार 

   यत्र तत्र दोहे लिखे , जिनको   लिया  समेट |                     जुड़कर पांच हजार है , करता जन को भेट ||1003

   दो हजार भी और है , जिनको   रहा  उतार |                     भेंट करूँगा शीघ्र  ही  , पाने   सबका प्यार || 1004

   किए समाहित " कुंड"  में  , दोहे एक हजार |                      शेष "बराई" "दीप "में , उनको  किया शुमार ||1005

©® सुभाष सिंघई जतारा 

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