https://subhashsinghai.blogspot.com/दोहा कुंड , बुक चित्र पर क्लिक करें
अनुस्वार( ं बिन्दु) और अनुनासिक ( ँ चंद्रबिन्दु)
हिंदी या देशज लिखो, रखो शब्द की आन |
अनुनासिक अनु स्वार के, कभी न बदलो गान ||196
अनुस्वार का बिंदु जब , लघु वर्ण पर आय |
दो मात्रा गिन लीजिए , उच्चारण बतलाय ||197
अनुस्वार यदि दीर्घ पर , बढ़े न मात्रा भार |
बड़ा सरल है व्याकरण , निकले यह ही सार ||198
अनुनासिक लेता नहीं , कोई मात्रा भार |
करते इसे प्रयोग है , देखा छंदाकार ||199
शब्द लीजिए मंगलं , है ल पर अनुस्वार |(मंगलम् )
उच्चारण यह कह रहा , है दो मात्रा भार ||200
च|र चरण दो पंक्तियाँ , अक्षर अड़तालीस |
दोहा छंद सुहावना, है स्वतंत्र जगदीश ||201
कलन छोड़ दोहा लिखा , लय अटके हर हाल |
अठकल यदि निर्दोष हो , कभी न बिगड़े चाल || 202
हाथ पाँव चारों चरण , भाव मानिए प्राण |
यदि हो सामंजस्यता , दोहा है तब बाण || 203
चरण विषम में यति रगण, सम पदांत है ताल |
विषम और समकल सही, दोहा वहाँ निहाल ||204
दोहा के गुण पर कहें , चरण बनें है चार |
चारों में यदि मेल हो , पढ़ने मिलता सार ||205
नगण -रगण की यति नहीं , कलन -भार सब दूर |
चरण भाव जुड़ते नहीं , तब दोहा है धूर ||206
सभी सुनो अब श्रेष्ठवर , बनना दोहकार |
वाचिक में लेता नगण , लघु दीर्घ है भार ||207
यदि छंदों में गेयता , लाना है श्रीमान |
मात्रा-कलन-विधान का , रखना होगा ध्यान ||208
कुंडलिया दोहा लिखें , रहे गेय पहचान |
यही गेयता छंद की , समझो होती जान ||209
उच्चारण से देख लो , मात्राओं का भार |
ज्ञात सहज हो जायगा , यही एक उपचार ||210
जगण चरण में आदि हो , लय में आती ढ़ील |
नहीं साँच को आँच है , करे आप खुद फील || 211
सारांश- -हिंदी, बुंदेली, अवधी बृज ,इत्यादि कोई भी भाषा हो , सबकी जनक देवभाषा संस्कृत है , और संस्कृत का उच्चारण के आधार पर विधि सम्मत उच्चारण मात्रा विधान है ,
अनुस्वार स्वर के बाद आने वाला शब्द है। इसकी ध्वनि नाक से आती है|
अनुस्वार दो शब्दों से मिलकर बना शब्द हैं, शाब्दिक अर्थ होता है अनु + स्वर (स्वर के बाद आने वाले)। स्वर के बाद आने वाले व्यंजन वर्ण को अनु्स्वार कहते है। हिंदी भाषा के अनुसार इसका प्रयोग चिन्ह बिंदु के रुप मे किया जाता है। इसकी ध्वनि नाक से आती है
अनुस्वार शब्द का प्रयोग–
देखा जाएं तो हिंदी वर्ण माला मैं पांच वर्ग होते हैं, इन वर्गों में पांचवे वर्ण को पंचमाक्षर कहते है। जो निम्न है: ङ्, ञ़्, ण्, न्, म् इन शब्दों की जगह अनुस्वार (ं) का प्रयोग होता है।
अनुनासिक का प्रयोग
जिस प्रकार अनुनासिक की परिभाषा में बताया गया है कि जिन स्वरों का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से किया जाता है, वे अनुनासिक कहलाते हैं और इन्हीं स्वरों को लिखते समय इनके ऊपर अनुनासिक के चिह्न चन्द्रबिन्दु (ँ) का प्रयोग किया जाता है।
यह ध्वनि (अनुनासिक) वास्तव में स्वरों का गुण होती है। अ, आ, उ, ऊ, तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है।
जैसे –
कुआँ, चाँद, अँधेरा आदि।
अनुनासिक के स्थान पर अनुस्वार (बिंदु) का प्रयोग
अनुनासिक के प्रयोग में आपने देखा कि हमने बताया अनुनासिक स्वरों का गुण होता है और अ, आ, उ, ऊ, तथा ऋ स्वर वाले शब्दों में अनुनासिक लगता है। यहाँ आपके मन में संदेह उत्पन्न हो सकता है कि स्वरों में तो इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ भी आते हैं तो अनुनासिक इन स्वरों वाले शब्दों में क्यों प्रयुक्त नहीं होता।
इसका एक कारण है और वह यह है कि जिन स्वरों में शिरोरेखा (शब्द के ऊपर खींची जाने वाली लाइन) के ऊपर मात्रा-चिह्न आते हैं, वहाँ अनुनासिक के लिए जगह की कमी के कारण अनुस्वार (बिंदु) लगाया जाता है।
इस नियम को उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे –
नहीँ – नहीं
मैँ – मैं
गोँद – गोंद
इन सभी शब्दों में जैसा कि हम देख रहे हैं कि शिरोरेखा से ऊपर मात्रा-चिह्न लगे हुए हैं – जैसे ‘नहीं’में ई, ‘मैं’में ऐ तथा ‘गोंद’में ओ की मात्रा का चिह्न है।
इन शब्दों पर जब हम अनुनासिक (ँ) का चिह्न लगा रहे हैं, तो पाते हैं कि उसके लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, इसीलिए इन सभी मात्राओं (इ, ई, ए, ऐ, ओ और औ) के साथ अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) लगाया गया है।
यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग करने पर भी इन शब्दों के उच्चारण में किसी प्रकार का अंतर नहीं आता।
अनुस्वार और अनुनासिका में अंतर
1) अनुनासिका स्वर है जबकि अनुस्वार मूलत: व्यंजन। इनके प्रयोग के कारण कुछ शब्दों के अर्थ में अंतर आ जाता है।
जैसे –
हंस (एक जल पक्षी), हँस (हँसने की क्रिया)।
अंगना (सुंदर अंगों वाली स्त्री), अँगना (घर के बाहर खुला बरामदा)
स्वांग (स्व+अंग)(अपने अंग), स्वाँग (ढोंग)
2) अनुनासिका (चंद्रबिंदु) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जबकि अनुस्वार को वर्ण में बदला जा सकता है।
3) अनुनासिका का प्रयोग केवल उन शब्दों में ही किया जा सकता है, जिनकी मात्राएँ शिरोरेखा से ऊपर न लगी हों।
जैसे अ, आ, उ, ऊ, ऋ
उदाहरण के रूप में – हँस, चाँद, पूँछ
इसी तरह - चाँद दाँत शब्द सही है , पर चांद दांत भी मित्रगण लिख देते है , और कहते है कि चाँद का चा दीर्घ है इस पर अनुस्वार बिंदु चां करने से मात्रा भार तो बढ़ना नहीं है , तो चांद लिखने में परेशानी क्या है ? परेशानी कुछ नहीं है , यह चांद दांत मित्रगण लिख ही रहे है
पर उन्हीं से ईमानदारी से पूछा जाय तो वह सही उच्चारण अनुनासिक से चाँद ही करते है , चांद नहीं करते है , पर लिखते चांद है , अनुस्वार लगाने से चान्द ही तो हो रहा है , जैसे किसी का नाम रविकांत( रविकान्त) है ( कांत = कांत का आशय है, प्रेमी , पति , स्वामी , प्रिय और रुचिकर ) , तब आप रविकान्त ही उच्चारण करते है , रविकाँत नहीं करते है | इसीलिए विज्ञजन चाँद में अनुनासिक चंद्रबिंदु लगाते है , कि यह उच्चारण में सही शामिल हो सके , जो भी मित्र गण , अनुनासिक की जगह अनुस्वार लगाकर लेखन आगे बढ़ा देते है , वह उच्चारण करके खुद देख ले कि वह क्या उच्चारण कर रहे है ,
जैसे - काँव या कांव / दाँव या दांव / आँसू या आंसू ,
यदि कोई मित्र गूगल या किसी पुस्तक में " शुद्ध शब्द और अशुद्ध शब्द " सर्च करे , तब बहुत से शुद्ध अशुद्ध शब्दों की जानकारी प्राप्त कर सकता है ,
सादर
सुभाष सिंघई
दोहा में ध्यान देने योग्य बातें (दोहे की बारीकियाँ ) सउदाहरण
अक्सर लेखक/ कविगण दोहे के प्रथम चरण में त्रुटि कर जाते है , जिससे लय चली जाती है
नगण 111 मात्रा भार के शब्द (जैसे नमन न + मन |कथन क+थन | सहज स+हज | सरल स+ रल इत्यादि ) (जिसका मात्रा भार लघु गुरु (12) होता है , व 13 की यति पर हम पहले पटल पर आलेख प्रस्तुत कर चुके है कि 12 लगा या रगण 212 से ही लय आती है
यह हम पूर्व के आलेखों में लिख चुके है
अब दोहे की बारीकियाँ या कह लीजिए या ध्यान देने योग्य बातें जो सउदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ
1 -दोहे के किसी भी चरण में (चारों में ) - पंचकल से प्रारंभ किया हुआ दोहा लय नहीं देता है
जैसे - दोहे का प्रथम चरण यदि ऐसा लिखे -
हमारा रहे गान अब × (लय आ ही नहीं सकती है )
5. 3.
रहे हमारा गान अब √ ( लय आ गई है )
3. 5
एवं
सजनियाँ चली गेह से × (लय आ ही नहीं सकती है )
5. 3
चली सजनियाँ गेह से √( लय आ गई है )
3. 5
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
2--षटकल का चरणांत भी लय नहीं देता है -जैसे -
बात हमारी मानिए , कहे अब रामलाल |
मिलकर सब करते रहे , हमारी देखभाल ||
उपरोक्त के समचरणों में (रामलाल व देखभाल ) षटकल से चरणांत है , अत: षटकल का चरणांत लय नहीं दे रहा है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
3 - आठवी- नौवी मात्रा संयुक्त हो जावें तब भी लय अटक जायेगी -
जैसे - माता की रही ×
(रही) में( ही ) आठवी नौवी मात्रा संयुक्त हो रही है , सो लय अटक रही है , अत:
माता की अब तक रही √
इसीलिए निर्दोष अठकल , सभी चरणों के प्रारंभ में बनाया जाता है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
4- अठकल में पूरित जगण भी लय भंग करता है
जैसे " सुभाष " जगण शब्द है , अब इसे हम इस तरह प्रयोग करेगें तो अठकल में भी लय नहीं आयेगी
जैसे -- पूजो सुभाष अब यहाँ =13 (किंतु लय चली गई है )
(पूजे )पूरित चौकल शब्द है व सही है पर ( सुभाष ) पूरित जगण है ) लय अटकाव आ गया है
लेकिन - अब सुभाष पूजो यहाँ " | जगण शब्द इस तरह लय में आ जाता है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
5~ छंद में चौकल और जगण समझें
चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (1111~ 11 2~2 11,~22) मान्य रहते हैं।
(121) शब्द, जैसे सुभाष प्रकाश प्रकार आदि शब्द है । जो
जगण है , यह जगण शब्द पूरित चौकल के बाद , प्रयोग करने से अटकाव प्रदान करते है
(जैसे -कहता सुभाष देखकर ) यहाँ दो चौकल है पर लय इसलिए नहीं है कि (कहता ) चौकल के बाद सुभाष पूरित जगण है
पर इसे - (कह सुभाष अब देखकर ) लिखने से जगण शब्द लय में आ गया है
~~~~~~~~~~~~~~~~
6- चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता।
दोहे के प्रारंभ के चौकल में( 3+1 चलो न ) मान्य है परन्तु (1+3 न चलो )मान्य नहीं है।
जैसे - चलो न
इसीलिए कोई भी छंद एक वर्ण से प्रारंभ नहीं किया जाता है
(‘चलो न’ )पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है।
(चलो और न )दो अलग अलग शब्द हैं।
वहीं चौकल में (‘न चलो ’) मान्य नहीं है क्योंकि न वर्ण चौकल की प्रथम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
~~~~~~~~~~~~~~
7- अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। (‘देश काज हित) सही है जबकि (‘हित देश काज ) गलत है क्योंकि( हित देश ) पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
और पंचकल का प्रारंभ दोहा लय नहीं देता है
पूरित जगण अठकल की तीसरी या चौथी मात्रा से भी प्रारंभ हो सकता है क्योंकि 1 और 5 से वर्जित है तथा दूसरी मात्रा से प्रारंभ होने का प्रश्न ही नहीं है, कारण कि प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता। ‘
जैसे - अब सुभाष सबसे कहे |√
अब सुभाष सब में जगण तीसरी मात्रा से प्रारंभ हो कर ‘(अब सु ’) और ‘(भाष )ये दो त्रिकल तथा( ‘सब ’ )द्विकल बना रहा है।=अठकल √
इसी तरह चौथी मात्रा से जगण प्रारंभ हो सकता है
जैसे -( पाप सुभाष न देखना ) =13 √ ,
‘पाप सुभाष न’ में जगण चौथी मात्रा से प्रारंभ होकर ‘पाप सु ’ और ‘भाष न’ के रूप में दो खंडित चौकल बना रहा है।√ है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
8 - एक साथ तीन पूरित त्रिकल भी दोहे में लय नहीं देते है
जैसे - रुको नहीं बीर
~~~~~~~~~~~~~~~
अब और गहरी और काव्य सौन्दर्य बीरीकी ~
शिल्प काव्य सौन्दर्य ~
काव्य सौन्दर्य कोई पुस्तक या विधान नहीं है , पर यह सृृजन चेतना का शिल्प है , , चूकिं आप सभी ने दोहे बहुत लिखे है , अत: दोहो के माध्यम से ही अपनी बात रख रहा हूँ
यह चार दोहे है , सभी में कुछ अंतर है
चिंतन रहता जिस जगह, वहाँ चेतना प्राश |
जहाँ ज्योति दीपक जले, छीने कौन प्रकाश ||(१)
चिंतन रहता जिस जगह, रहे चेतना प्राश |
जलता दीपक है जहाँ , रहता वहाँ प्रकाश ||(२)
~~~~~~~इसी तरह ~~~~
गए खोजने यार हैं , मक्खी है किस दाल |
घर की देखी दाल तो , निकला मकड़ी जाल || 3
गए खोजने यार जब , मक्खी है किस दाल |
खुद की देखी लौटकर , निकला मकड़ी जाल || 4
आप अभिमत अभिव्यक्त करें कि कौन दोहे तुलनात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ है , चारों दोहे सही है , पर शिल्प काव्य सौन्दर्य में कौन श्रेष्ठ है
मेरा मत पहले दूसरे में दूसरे के साथ है
व तीसरे चौथे में चौथे के साथ है
अगर बात समझ में आ गई हो तो यही शिल्प सौन्दर्य है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
काव्य की भाषा में दोहा - दुहा हुआ निचोड़ है (रस है )
" नाम" के आधार पर दोहा का अर्थ " भगवान की कृपा , पूर्वाह्न " है |
पूर्वाह्न का अर्थ है - सबेरे से दोपहर तक का समय, (दिन का पहला भाग ) अर्थात " पहला शीर्ष" भाग
दोहा - स्वतंत्र , क्रिया प्रधान, अग्रणी, , मजबूत इच्छा शक्ति वाला , सकारात्मक, ऊर्जावान, उद्यमी, उत्साही होता है
चार चरण - दो हाथ -दो पैर है | "तत्य युक्त कथ्य इसके कर्म बोल है , एक दोहा दूसरे दोहा पर आश्रित नहीं होता है , चार चरण में ही अपनी बात पूर्ण कह देता है |
मात्रा भार, कलन , तुकबंदी के साथ संदेश / कथ्य युक्त तथ्य परक होना चाहिए , यह विद्वानों का अभिमत है
दोहे की भाषा सरल सहज बोधगम्य होना चाहिए
कठिन शब्दों से भी दोहा श्रुतिकटुत्व की श्रेणी में चला जाता है
अलंकार सहज स्वाभाविक रुप से आ रहे हो , व बोधगम्य हो ,तभी लाना चाहिए , जबरदस्ती लाने से दोहा कथ्य से भटकने लगता है |
यह आलेख आप सम्हाल कर रख सकते है , यह दोहे की बारीकियाँ है , सादर
आलेख - सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~कपट भाव की कामनी , कंचन रूप समान |
जहर भरी होती सदा , अधरों की मुस्कान ||412
अधरों की मुस्कान हो , नैनों में हो लोच |
चेहरे पर मधु भाव हो , समझो ऊँची सोच ||413
अधरों की मुस्कान से , बन जाते है काम |
वाणी में मृदुता अगर , जग में उसका नाम ||414
नहीं व्यंग्य की लाइए , अधरों पर मुस्कान |
वाणी भी मत बोलना , घायल हो अरमान ||415
~~~~~~
एक दोहा हास्य में -
कह सुभाष घायल हुआ , अधरों की मुस्कान |
कोतबाल वह बन गई , मै उसका दीवान ||🙏😄416
~~~~~~~~~~
तुमसे अच्छा कौन है, मेरे दीनानाथ |
जग में ईश्वर आप है , नहीं छोड़ना हाथ ||417
तुमसे अच्छा कौन है , है करुणा भंडार |
सुनकर दीन पुकार को , कर देते उपकार ||418
तुमसे अच्छा कौन है , हे मेरे भगवान |
मुझको देना शरण तुम , मैं जग में नादान ||419
दो दोहे कड़वे-प्रस्तुत है
तुमसे अच्छा कौन है , चमचे बोले बोल |
पर नेता का फोड़ते , यह ही मिलकर. ढोल ||420
तुमसे अच्छा कौन है , खुश मत होना आप |
कहने बाले एक दिन , बनने लगते बाप ||421
~~~~~~~~~~~~~~~
विषय- दौलत जिसके पास है
दौलत जिसके पास है , करो जरा पहचान |
अंदर से कितना दुखी , और रहे हैरान ||422
दौलत जिसके पास है , खुद को समझे शेर |
गधा बना वह रात दिन , गिनता रहता ढेर ||423
दौलत जिसके पास है , नींद रहे कुछ दूर |
बीमारी भी हाय की , रहती है भरपूर ||424
दौलत जिसके पास है , दिखता है कंजूस |
बातचीत व्यौहार से , रहता सदा खडूस ||425
दौलत जिसके पास हो, मन से यदि उदार |
तीन लोक की सम्पदा, उसको तब बेकार ||426
~~~~~~~~~~
राजनीति दंगल हुआ , चित्त हुए मलखान |
चमचागिरि से दूर रह , चूक गए चौहान ||427
सत्य कहाँ जब सामने , लगी मिर्च-सी तेज |
चूक गए चौहान हैं , बोले सब. रँगरेज ||428
मूंछे अपनी ऐंठते , खड़े रहे श्रीमान |
नहीं बोल मीठे कहे , चूक गए चौहान ||429
रखवाली झूठी दिखी , चूक गए चौहान |
चिडियों ने भी खेत को , बना दिया मैदान ||430
लोग चतुर जो भी बनें , समझें खुद सुल्तान |
शक्ल एक दिन बोलती, चूक गए. चौहान ||431
~~~~~~~~~~~~~~
विषय - केवट के श्रीराम
केवट के श्रीराम में , छिपा हुआ संदेश |
भक्ति भाव से ईश भी , मिलते हर परिवेश ||432
केवट के वट बृक्ष है , केवट के श्रीराम |
छाया फल दाता रहें , और साथ निज धाम ||433
केवट के वट+यार है , मिलें एक से काम |
पार उतारे जगत से , केवट के श्रीराम ||434
~~~~~~~~~~~~~
जीवन को जब देखता , सुख दुख भरा अपार |
शीत गर्म अनुभव मिलें , लगे कलश संसार ||435
जीवन शुभ मंगल कलश , कर लेते है लोग |
धर्म कर्म सद्भाव से , नित नव करें प्रयोग ||436
भरे हलाहल आदमी , रिक्त कलश को देख |
फिर क्यों अमरत चाहता , खींचे मन में रेख ||?437
यह तन भी जानो कलश , ईश्वर का उपहार |
प्राण समझना नीर को , कब फूटे -कब पार ||438
सद्कर्मो से जब कलश , पुण्य भरे भरपूर |
यह जग या परलोक हो , ईश्वर देता नूर ||439
~~~
न्याय नीति का खुल गया , भाषण से बाजार |
उच्च मंच से बेंचना , नेता का व्यापार ||440
नेता जी बस बेंचतें , करें नहीं उपयोग |
हावी है अब न्याय पर , आश्वासन का रोग ||441
हमको मिलता न्याय है, कहते तिकड़मबाज |
नेता के चमचे करें , सदा न्याय पर राज ||442
मिला हमें भी न्याय है ,कहता सही सुभास |
गेह खेत सब बेचकर , ले आए है पास ||443
एक न्याय देना प्रभू , जहाँ विराजे आप |
चरणों में लेना मुझे , छूटें जग के ताप ||444
~ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बालक होता है सरल ,रखता सत्य उजास |
जब वह हो जाता बड़ा, झूठ करे परिहास ||445
बालक का बचपन बड़ा , उसकी लम्बी रेल |
ज्यों -ज्यों होता है बड़ा , छोटे होते खेल ||446
बालक में भगवान का , रहता है सारांश |
यदि रहती लघु बालिका , तब देवी दिव्यांश ||447
बालक सबको मोहते , देते है आनंद |
फिर सिखलाते हम सभी , उनको छल के छंद ||448
तेरा मेरा सीखकर , बालक बने जवान |
हाय- हाय के गीत का , गाता रहता गान ||449
(कुछ दोहों पर मेरी कलम व्यंग्य में चली गई है )🙏
जिस बालक की कल्पना , लिखती कलम सुलेख |
खड़ा खेत पर नग्न वह , मैं आया हूँ देख ||450
उस बालक के पास में , देखा खड़ा अभाव |
किस्मत उसके साथ भी , करती रहे दुराव ||451
कलम हकीकत लिख रही , नहीं समझिए तंज |
वह बालक जब देखते , होता मन में रंज ||452
उस बालक को कब मिले , मानवता अधिकार |
महलो बालो को मिले , जो आकर उपहार ||453
शासन की भी नीतियाँ , करती है उपहास |
वह बालक याचक बने , तैयारी है खास ||454
नेता जी भाषण कहें , बालक कहें भविष्य |
खड़े खेत पर जो मिले , उनको मिले तपिष्य ||455
~~~~~~
मन में नहीं विकार हो , मीठे हों जब बोल |
संत हृदय वह आदमी , जग में है अनमोल ||456
जो विकार को पालता ,रखता है अभिमान |
अंधकार उसके हृदय , रहता सीना तान ||457
धन से बढ़ता मद जहाँ , मद से बढ़ें विकार |
जब विकार मन में बसें , तब जीवन है खार ||458
काँटे रहे विकार है , नहीं बनें वह फूल |
सुख विकार में खोजना ,जीवन में है भूल ||459
करता सदा विकार है , मन को बहुत अशांत |
जीवन में भी आपदा , आकर करती क्लांत ||460
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जीवन यात्रा में दिखें , राहें यहाँ अनंत |
जब सुभाष पथ खोजता , मिले न कोई अंत ||461
यात्रा जाए कौन कब , कहाँ मिले आराम |
यात्री सब अंजान है , कहाँ ढ़लेगी शाम ||462
कहाँ समापन की जगह , खोजो नहीं सुभाष |
यात्रा बस करते रहो , रखो राम से आश ||463
कभी बिछड़कर हो मिलन , यह यात्रा का खेल |
पता नहीं इस बात का , कब हो किससे मेल ||464
जीवन यात्रा में मिलें , कहीं कुटिल संताप |
कहीं धर्म की है शरण , कहीं लुभाते पाप ||465
कहाँ समापन की जगह , खोजो नहीं सुभाष |
यात्रा बस करते रहो , रखो राम से आश ||466
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
विषय - किन्नर
किन्नर सदा समाज से , पाते है अपमान |
फिर भी घर-घर पर करें , शुभ गीतों का गान ||467
किन्नर आकर दें दुवाँ , लेते अपना नेंग |
नाचें गाएँ द्वार पर , लेकर अपनी गेंग ||468
नर - नारी से कुछ अलग , किन्नर की पहचान |
वृहनिल्ला इतिहास में , मिलता नाम सुजान ||469
सिर्फ विधाता जानता , इनका क्या है राज |
नर-नारी से कुछ अलग,किन्नर बना समाज ||470
नाम शिखंडी का सुना , था किन्नर में शान |
अर्जुन जैसे वीर भी , स्वयं बने प्रतिमान ||471
~~~~~~~~~~~
बनने का अवसर मिले , तब बनना तुम दास |
भक्त दास हनुमान से , बनो राम के खास ||472
भक्त शिरोमणि हो गए , जग में श्री रविदास |
गंगा चलकर आ गई , खुद ही उनके पास ||473
जो भी दीन गरीब हों , कभी न समझो दास |
अंधकार के कष्ट में , जुगनू भरे उजास ||474
जो छोटों को देखकर , समझें उनको दास |
कहें 'सुभाषा' वें सदा , पालें खुद ही त्रास ||475
हम दासों के दास हैं , कहता आज सुभाष |
राम नाम जो पुंज का , रखता ह्रदय प्रकाश ||476
मात -पिता गुरु के चरण , शरण राम की पास |
नहीं सुभाषा' चूकना , बनों चरण के दास ||477
~~~~~~~~~~~
गलियाँ जहाँ उदास हों , लगे हुए हों शूल |
और बरसता हो जहर, वहाँ न खिलते फूल ||478
गम के पत्थर हों लगे , रोता हो विश्वास |
वहाँ हौंसले टूटते , रहते लोग उदास ||479
हमसे कहा उदास ने , आता नहीं प्रकाश |
हँसने के कारण नहीं , तब क्या करूँ सुभाष ||480
मात पिता बेचैन हों , बच्चें रहें उदास |
एक छोड़ तब सैकड़ों , आँसू आए पास ||481
मैं हँस लूँ किस बात पर , करता प्रश्न सुभाष |
मानवता जब हर जगह , करे जहर का प्राश ||482
बहुत नसीहत मिल रहीं , होना नहीं उदास |
मैं हँस लूँ किस बात पर , खड़े सामने त्रास ||483
दिखे नम्रता नीर में , पत्थर में अभिमान |
पत्थर टूटे चोट से , नीर न टूटे आन ||484
~~~~~~~~~~~
बाबू जी श्रीफल लगें , दिखते बड़े कठोर |
नीर मृदुल भीतर भरा , लेता सदा हिलोर ||485
बाबूजी हैं बाँटते , अनुशासन का पाठ |
कड़क रखें चेहरा सदा , देनें सुत को ठाठ || 486
बाबूजी छाती रखें , गहरी और विशाल |
जिसके अंदर सुत सदा , होता रहे निहाल ||487
अनुभव को साँझा करें , सदा सुतों के साथ |
बाबू जी जब तक रहें , कोई नहीं अनाथ ||488
नेक विरासत के धनी, बाबू जी भरपूर |
पथ अनुगामी जो बने , बनता जग में नूर ||489
~~~~~~~~~
ॐ नम: वेत्रवती (बेतवा) पवित्रों पवित्राय वास्तुनिष्ठ मोक्ष जलधाराय नमो नम:
हिंदी दोहा , विषय बेतवा (नदी )
उद्गम जानो बेतवा , रायसेन आबाद |
झिरी बहेड़ा ग्राम से , इसकी शुचि बुनियाद ||490
रातापानी वन झिरी , अभयारण्य विहार |
यहीं प्रकट है बेतवा , आगे फिर कोलार ||491
जलधारा शुचि बेतवा , कितने तथ्य विशेष |
उत्तर पूरव में बहे , रहे वास्तु परिवेश ||492
नदी बेतवा शान है , गरिमा मध्य प्रदेश |
ठहरी कुछ भोपाल में , आगे बनी विशेष ||493
विदिशा कुरबाई बहे , बीना बाँटे प्यार |
राजघाट पर बेतवा , करती है शृंगार ||494
ग्यारह नदियाँ बेतवा , मिलकर देती मान |
प्रमुख जामनी जानिए , सँग में सुनो धसान ||495
है हमीरपुर पूर्व में , यमुना की जलधार |
मिलन बेतवा जब करे , दिखती है जयकार ||496
पाँच शतक के मील का , लगता है अनुमान |
पावन करती एम पी , फिर यू पी प्रस्थान ||497
~~~~~~~~~~
भू पर गंगा अवतरण , भागीरथी प्रयास |
देवलोक का मिल रहा , धरती पर आभास |498
वर्णन कलम न कर सके , माँ गंगा गुणगान |
कृपादायनी है सदा , अमरत जल शुचि मान ||499
अनुष्ठान प्रतिरुप हैं , भागीरथ परिणाम |
कहते सदा त्रिदेव हैं , गंगा हैं खुद धाम ||500
पतितो को पावन करें , भक्तों को दें मान |
चलकर वह रविदास के , दिखीं कठौता आन ||501
जब तब नभ में सूर्य है , चंद्र सितारे शान |
गंगा जी भू लोक में , सबको हैं वरदान ||502
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
भारत के गणतंत्र को , करिए. सदा प्रणाम |
मिलता इसको विश्व में , हरदम उच्च मुकाम ||503
लोग सभी यह जानते , क्या होते अधिकार |
उज्ज्वल छवि इसकी यहाँ , मिलता सबसे प्यार ||504
संविधान शुचिता रखे ,जनता के परिवेश |
सभी अनोखा मानते , कहते अनुपम देश ||505
हर्ष मनाते लोग है , कहते शुभ गणतंत्र |
यहाँ प्रेम के बोल ही , लगें राष्ट्र के मंत्र ||506
सदा हमारे राष्ट्र में , हर्षित रहे उमंग |
मानवता अपनाइए , कहते है त्रय रंग ||507
~~~~~~
(विशेष-- मैं अहिंसा को धर्म के सिद्धांतानुरुप
परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूँ )
नहीं अहिंसा जानना , होती है डरपोक |
प्रतिरोधी हिंसा सहज , कर सकता यह लोक ||508
भाव वचन निज के करम, और सहज व्यापार |
यहाँ अहिंसा पालना , कहे धर्म का सार ||509
दुश्मन आए सामने , रखे देश पर खोट |
यहाँ अहिंसा त्यागकर , करना उस पर चोट ||510
नहीं अहिंसा बोलती , हिंसा है स्वीकार |
देश धर्म की आन पर, उठ सकती तलवार ||511
प्रतिरोधी हिंसा जहाँ , वहाँ अहिंसा शान |
तथ्य सही रखता यहाँ , और धर्म का गान ||512
आए भारत भूमि पर , जितने भी अवतार |
किया अहिंसा भाव से , दुष्टों का संहार ||513
कायरता मत जानिए , जहाँ अहिंसा चित्र |
आभूषण यह वीर का , समझो मेरे मित्र ||514
अनाचार दुश्मन करे , हम जपते प्रभु नाम |
नहीं अहिंसा यह कहे , कर ले आप विराम ||515
सारांश - धर्मानुसार , संत और साधु को - भाव हिंसा - वचन हिंसा - व्याापार हिंसा - प्रतिरोधी हिंसा , यह चारों हिंसा त्याज्य है
पर धर्म के अनुयायी गृहस्थ को - भाव - वचन - व्यापार हिंसा त्याज्य है , पर अनाचारी से प्रतिरोधी हिंसा ग्राह है | प्रतिरोधी हिंसा में अहिंसा धर्म की रक्षा का प्रतिनिधित्व होता है |
~~~~~~~~~~
हठयोगी का देखते, हठ विलम्ब से पूर्ण |
पर जब आता बालहठ, कर उठते सब तूर्ण ||(तूर्ण =शीघ्रता)516
लगता सुंदर बालहठ , तुतली जहाँ जुबान |
पूरण करने दौड़ते , घर के सभी सुजान ||517
चंद्र खिलौना बालहठ , कान्हा दें आवाज |
मात् यशोदा तब करें , जल थाली से काज ||518
पूरा होता बालहठ , बालक तब मुस्काय |
माँ की ममता धन्य हो , रोम-रोम हरषाय ||519
बचपन में था बालहठ , अब हठ हैं कुछ भोग |
आगे के हठ हैं व्यसन , जो लाएगे रोग ||520
~~~~~~~~~~~~
घड़ी नहीं है आपकी ,भली रहे वह गेह |
चलती अपनी चाल है , रखे न कटुता नेह ||521
घड़ी बदलती है सदा , समय काल का नाम |
पौने दो अब दो हुआ , आगे त्रय अविराम ||522
घड़ी- घड़ी में लोग भी , बदले अपना रंग |
कह सुभाष हँसती घड़ी , देख सभी के ढ़ंग ||523
बड़ी घड़ी या लघु दिखे , समय सभी में एक |
घड़ी एक संसार है , सुइयाँ जिसमें नेक ||524
घड़ी कभी बँधती नहीं , बँध जाते है आप |
बार- बार हो देखते , कहाँ घड़ी की माप ||525
टिक टिक करती है घड़ी , खटपट करते लोग |
चटपट करता काल है , मिटमिट कहता रोग ||526
मरने की आई घड़ी , रोता घर परिवार |
बँधी घड़ी चलती रहे , अजब गजब संसार ||527
~~~~~~~~~~~~~~~
माँ का ह्रदय उदार है ,मामा ह्रदय विशाल |
माँ जैसा ही प्रेम है , मामा का हर हाल ||528
मामा में दो माँ दिखें , एक पिता-सा प्यार |
नहीं किसी की डाँट भी ,मामा को स्वीकार ||529
मामा रहता दूर पर , रखे बहिन का ख्याल |
बच्चों की चर्चा करे , लोगों से तत्काल ||530
बुन्देला मामा सुनो , नाम रहा हरदौल |
मरकर भी वह भात दे , भानेजन की तौल ||531
शकुनी मामा- कंस है , मथुरा दिल्ली पार |
सच्चे मामा ओरछा , बुन्देला दरबार ||532
ट
मामा जी अच्छे बुरे , कर गय दोनों काम |
कंस मारीच शकुनि हुए , जग में कई बदनाम ||533
मामा जी मारीच थे , स्वर्ण हिरण धर रूप |
माता सीता का हरण, शामिल लंका भूप ||534
मथुरा में मामा हुआ , कंस नाम बदनाम |
आए कष्ट निवारणे , जग में श्री घन श्याम ||535
शकुनी मामा हो गए , कर गय बंटाधार |
महा युद्ध करवा गये , भानिज को उसकार ||536
मामा थे हरदोल जू , सबकी रखते लाज |
मरकर भी वह आय थे , भानेजन के काज ||537
मामा के घर हम गये , अपनी माँ के साथ |
देते थे आशीष वह , सिर पर रखकर हाथ ||538
~~~~~~~~~~~
सदा परीक्षा दीजिए , रखना साहस साथ |
पास फेल चिंता नहीं , रखना उद्यम हाथ ||539
कभी परीक्षा लूँ स्वयं , क्या पाई पहचान |
कभी परीक्षा दूँ वहाँ , जहाँ रहें इंसान ||540
जगत परीक्षा कक्ष है, सुख दुख रहें सवाल |
यहाँ खोजना हल पड़े , रखकर साहस ताल ||541
समझों जो दाता जगत , कहलाते भगवान ||
कभी परीक्षा लें उठें , क्या करता इंसान ||542
आज परीक्षा में अजब , आया गजब सवाल |
क्या चलता तू नीति से , लिख सुभाष तत्काल ||543
एक परीक्षा है अजब , राजनीति का खेल |
दुर्जन होते पास है , सज्जन होते फेल ||544
~~~~~~~~~
विषय कविता
बड़ी बात लघु रूप से , कविता कहती सार |
कविता के शुचि भाव ही , देते सबको प्यार ||545
कविता लिखना अति सरल , भावों का है खेल |
शब्द चयन जब श्रेष्ठ हों , अनुपम बनता मेल ||546
कवि जब कविता को लिखे, लिखकर होता धन्य |
माँ शारद का पुत्र बन , पाता पुण्य अनन्य ||547
कविता उनसे दूर है , लेन - देन जब वाह |
भाव शून्य जब तुक रहें , अंधकार तब राह ||548
शीत माह की धूप में , खिले सुबह से बाग |
ऐसी ही कविता लगे , शुचिमय बजते राग ||549
कविता को सब जानिए , है शारद का रूप |
जिसके चरणों में झुके , जनता-ज्ञानी-भूप ||550
कविता की आभा सदा , देती है संदेश |
करती दर्पण काम यह , लिखती हर परिवेश ||551
कविता कवि मन भाव है , निर्झर होते गीत |
जहाँ हृदय कविता रहें, सबको लगती मीत ||552
कविता छोटी सी रहे , या होवें विस्तार |
आँचल इसका है बड़ा , समझों इस संसार ||553
कविता निकसत है हृदय , करता कवि दुलार |
कवि कविता पूरक रहें , जानो इस संसार ||554
~~~~~~~~~~~~
जय उनकी होती सदा , जिनके नेक विचार |
उन्हीं विचारों की झलक , जब देते व्यवहार ||555
बोल उठें जय लोग भी , कर उठते है वाह |
परहित के शुभ भाव जो , मन में रखे अथाह ||556
जय बुलवाना बात कुछ , जय होना कुछ ओर |
नेता की जय शोर है , प्रभु की करे विभोर ||557
अभिवादन में कीजिए , जय- जय सीताराम |
हो जाए प्रभु नाम से , एक पंथ दो काम ||558
जय जैसे शुभ कर्म ही , करते है उपकार |
निज जय जो लगवा रहे , उस जय में है हार ||559
~~~~~~~~
रंग बिरंगा माह है , गोरी मन मदहोश |
लौटे प्रिय परदेश से , रोम - रोम में जोश ||560
गोरी भावुक लग रही , सुलझाती है बाल |
टेसू जैसे लाल हैं , उसके गोरे गाल ||561
नैना चंचल हो गए , ले काजल की कोर |
फागुन आया झूमकर , अब गोरी की ओर ||562
पग धरती पर नाचते , मिले पवन से ताल |
प्रेम मगन गोरी लगे , सबसे मालामाल ||563
धरती पीली लाल है , सुंदर खिलते फूल |
गोरी तन्मय गा रही , सुध बुध अपनी भूल ||564
छनछन पायल बज रही , थिरक रहे सब अंग |
अगड़ाई भी आ गई , लेकर नवल उमंग ||565
फागुन के शुभ माह में , प्रीतम गोरी पास |
तीन लोक की सम्पदा , माने मन में खास ||566
होली की मस्ती चढ़ी , मन में बजे मृदंग |
नेह पिया का चाहती , गोरी पुलकित अंग ||567
कोयलिया भी गा रही , बैठ आम की शाख |
एक गीत कीमत करे , गोरी मन में लाख ||668
प्रीतम दर्शन चाहती , गोरी लगे अधीर |
मिलन नेह का जब मिले , तभी हटेगी पीर ||569
भँवरा भी मड़रा रहा , खिले पुष्प के पास |
गोरी भी यह सोचती , आए प्रीतम खास ||570
रसिया मन भँवरा लगे , रहा पुष्प को चूम |
गोरी निज मन देखती , ज्यों गीली हो भूम ||571
~~~~~~~~
आज हुए भदरंग हैं , त्योहारों के रंग |
प्रेम भरी बातें दिखें , अब कटुता के संग ||572
फीके - फीके स्वाद में , जीते हैं मिष्ठान |
मरती जीती चासनी , मावा खोता शान ||573
मेंढ़क सिर पर कूँदते , चूहें कुतरें कान |
दूल्हें बने सियार है , गर्दभ पाते मान ||574
लाज शर्म वैश्या रखे , सती चले बेढंग |
कपट बजे अब ढोल से , सिकुड़ी रहे उमंग ||575
अब असत्य का शोर है , रखे सत्य मुख बंद |
वाह- वाह अब पा रहे , खींचा तानी छंद ||576
मिलते नीम हकीम हैं, जीते तिकड़म बाज |
जब सुभाष सच बोलता , सिर पर गिरती गाज ||577
योगी से तप दूर है , उत्कंठा है शांत |
झरने सूखे मिल रहे , दिखे चंद्र अब क्लांत ||578
समाधान हल भूलकर , खोज रहा है ज्ञान |
प्रवचन करते काग हैं , हंस बनें यजमान ||579
~~~~~~~~~~
दाता है जो अन्न का , देता सप्त अनाज |
कृषक कहें हम सब उसे, नमन करें शुभ आज ||580
जब अनाज दानें पकें , कहता फसल किसान |
मिहनत का फल मानता , ईश्वर का वरदान ||581
आता गेह अनाज जब , छाती जाती फूल |
तब किसान भी भूलता , जो पाए है शूल |582
~~~~~~~~~~~~
महुआ की मधुरम महक , मादकता चहुँ ओर |
यौवन लाया बाढ़ है , बरस प्रीति घनघोर ||583
महुआ टपके रस भरें , करें नशीली रात |
साजन करते प्रेम से , बिन बोले ही बात ||584
बौराया है अब पवन , छू महुआ मकरंद |
कहता है हर कान में , इस रस में आनंद ||585
महुआ फूला पेड़ पर , रस में गया समाय |
टपक अवनि की अंक में , लगता है बौराय ||586
महुआ का अब पेड़ ही , बोतल बना शराब |
जितनी चाहे पीजिए , रखता कौन हिसाब ||587
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अलबेला मौसम रहे , मिलता नहीं मिजाज |
कभी मिलाता सुर दिखे , कभी रहे नाराज ||588
रंग बदलता अब रहे , मौसम तुनिक मिजाज |
शीत धूप के खेल में , गिरा देत है गाज ||589
गिरगिट जैसे हो गये , अब मौसम के अंग |
पता नहीं किस राह में , कैसा बदले रंग ||590
मौसम भी अब है अजब , पता चले मत भेद |
कब हर्षित श्रीमान जी , कब दे डाले खेद ||591
मौसम का रुख जान लो , तभी कीजिए काम |
मौसम यदि विपरीत है , तब भजना हरि नाम ||592
एक मनोविनोद
गोरी का मौसम सुनो , ऊपर चढ़ा मिजाज |
जैसे सूरज आसमा , पर करता है राज ||593
~~~~~~~~~~~~
घटना भी संदेश दे , जो कुछ होता आज |
यहाँ कर्म के फल उदित , समझों प्यारे राज ||594
भाग्य मनुज लिखता स्वयं, घटना है प्रतिरूप |
नाना विधि के भेद से , इसके रूप अनूप ||595
जैसा बोया आपने , फल पाओ हर हाल |
घटना तो बस चिन्ह है , मिली जुली है ताल ||596
~~~~~~~
छत्रसाल अति वीर थे , सुन घोड़ों की टाप |
दुष्ट शत्रु सब काँपते , बैठ सुमरते जाप ||597
भूषण कवि लिखते यहाँ , कौन सराहूँ वीर |
छत्रसाल के सँग शिवा , दोनों ही रणधीर ||598
मस्तानी को ले गया , जब बंगस भी दूर |
छत्रसाल लाए छुड़ा , मान दिया भरपूर ||599
दोहा पढ़कर आ गये , सुनो पेशवा राव |(बाजीराव जी
छत्रसाल की कर मदद , दिया पिता -सा भाव ||600
( वह दोहा था - "ज्यों गति भई गजेन्द्र की " बाला )
~~~~~~~~~~
छवि बनती निज कर्म से , कहता है यह धर्म |
सत्संगत होता सुखद, कौन जानता मर्म ||601
छवि समाज में शुभ बने , रहती हरदम साथ |
आप सदा अजमाइये , जगन्नाथ तब हाथ ||602
छवि सुशील जिनकी रहे , उनकी रहती शान |
यदि कुशील की बन गई, मिलता तब अपमान ||603
चार लोग जब भी जुड़े , करते सदा बखान |
जिनकी छवि में नेकता , रहती सदा समान ||604
गोरी की छवि नैन से , बसी हृदय के द्वार |
प्रीतम हरदम देखता , करता उससे प्यार ||605
~~~~~~~
स्वागत मन से कीजिए , रखकर आदर भाव |
आदर दे बैठाइये , रंक मिले या राव ||606
स्वागत करना है सहज , दिल से करिए आप |
पाने बाले के हृदय , आप छोड़िए छाप ||607
अतिथि देव आएँ जहाँ , स्वागत को वह देख |
बदले में व्यवहार से , सुंदर खीचें रेख ||608
संत हृदय सज्जन मिले , सदाचार के बिम्ब |
स्वागत उनका कीजिए , जाकर के अविलम्ब ||609
स्वागत सज्जन से मिले , मिलता है आनन्द |
प्रेम लता बढ़ती हृदय , खिलता है मकरन्द।।610
स्वागत सज्जन बाँटता , दुर्जन देता खेद |
कह सुभाष संसार में , बहुत बड़ा यह भेद ||611
~~~~~~~~~~~~
बेटी होती रोशनी, घर में लगे मिठास ।
होती सबकी लाडली , फूलों सी उल्लास ||612
बेटी माँ की शान है, बापू की है आन |
दादी की वह लाडली , भाई की शुभ गान ||613
जब भी बेटी लाडली, जाती है ससुराल |
दो परिवारों के बीच में , सदा मिलाती ताल ||614
बेटी घर में चंद्र हैं, है शीतल प्रतिमान |
सबकी रहती लाडली , घर में सुमधुर गान ||615
जिस दिन जाती लाड़ली , दूर पिया के गेह |
आँगन में बिखरा चले, सबको अपना नेह ||616
~~~~~~~~~
इधर उधर क्यों जा रहा , घर में कर विश्राम |
माँ के छूकर पैर तू , कर ले चारों धाम ||617
माँ की ममता छाँव है , लगती बड़ी अनूप |
शीत लगे वह जेठ में , पौष माह में धूप ||618
माँ को जिसने कर लिया, कर्मो से नाराज |
ईश नहीं स्वीकारते , पूजन का आगाज ||619
जन्नत माँ के पैर में , बरकत माँ के हाथ |
रहमत रहती नैन में , हसरत दिल के साथ || 620
बड़ा नहीं इतना हुआ, रख लूँ माँ को पास |
रहता माँ के पास में , छोटा अभी सुभाष ||621
~~~~~~~~~~~~~~~
आदर देकर कीजिए , सदा अतिथि से बात |
पहले उसको चाय की , दीजे तुम सौगात ||622
चलन चाय का हो गया ,बढ़ी आज तादाद |
चुस्की लेकर सोचते , कैसा आया स्वाद ||623
चाह चाय की है लगत , सोकर उठते लोग |
फुर्ती आती सच सुनो , भागे आलस रोग ||624
भूख भागती जानते , फिर भी पीते लोग |
सभी चाहते चाय से , बनता रहे सुयोग ||625
चाय शीत में है दवा , होता अगर जुखाम |
अदरख बाली पीजिए , मिटते रोग तमाम ||626
नींद चाय से भागती , फुर्ती करे प्रवेश |
इसे पिलाना शिष्ट है , यत्र तत्र सब देश || 627
~~~~~~~~~~~~
उँगली माता की पकड़ , चलना सीखो मित्र |
मिले पिता के हाथ से , जीवन के सब इत्र ||628
उँगली को हम दें उठा , लगता तब आसान |
खुद पर उँगली जब उठे , लगता है अपमान ||629
जिसकी उँगली थामकर , बड़े हुए कुछ लोग |
उसकी गरदन काटने , रचते वही कुयोग ||630
उँगली होती हाथ में , गिनती में कुल पाँच |
नहीं एक-सी वह रहें , पर सब करती जाँच || 631
उँगली जिस पर उठ गई , अर्थ वहाँ संदेह |
गिरता है विश्वास भी , और टूटता नेह ||632
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दान रक्त का जो करे , आए रोगी काम |
तीरथ जैसा पुण्य है , कह सुभाष अविराम ||633
अवसर जब हो सामने , करो रक्त का दान |
घा़यल का जीवन बचे , मन में हो अभियान ||634
एक बूँद भी रक्त की , कभी बचाती प्राण |
मानव सेवा धर्म है , और जगत कल्याण ||635
रक्त बहे यदि देश हित , समझो पाया मान |
यह भी जानो धर्म है , माता का गुणगान ||636
नहीं रक्त वह काम का, जो स्वारथ अपनाय |
परमारथ में जो लगे , पुण्य कोटि में आय ||637
~~~~
जन्मदिवस शुभकामना , देता अपरम्पार |
मंगलमय हो हर दिवस ,खुशियों की भरमार ||638
भाव पुष्प की माल है, जन्म दिवस पर आज |
अनुकम्पा हो ईश की , सफल मनोरथ काज ||639
नेह नूर सबका मिले , सुंदर हो परिवेश |
जन्म दिवस शुभकामना , देता आज विशेष ||640
खुशियाँ बरसे नव सदा , हर दिन हो त्यौहार |
जन्म दिवस पर तुम रखो , सुंदर सुखद विचार ||641
जन्म दिवस पर कामना , खुशियाँ मिले अनेक |
सदा साथ हो आपके , विद्या विनय विवेक ||642
~~~~~
एक तीर को साधना , देना उस पर ध्यान |
मंजिल होगी पास में , रहे 'सुभाषा' मान ||643
भवसागर को पारकर , शरण मिले भगवान |
करना होगा तब तुम्हें , उसका मन से ध्यान ||644
ख्याति लाभ हमको मिले , मन में रहा विचार |
"खोट ध्यान" तब मानिए , जिसमें सदा विकार ||645
ढ़ोगीं पूजा जो करे , होता नहीं निदान |
ध्यान सुमन अर्पण करो , सब कुछ तब आसान ||646
आठ अंग है योग के , पहला जिसमें ध्यान |
अंतिम जहाँ समाधि है , वहाँ मिलें भगवान ||647
योग के शेष छै अंग निम्न है -
'यम' 'आसन' सँग 'धारणा' , सुनो " नियम' का नाम |
अगला ' प्रत्याहार ' है , षष्टम प्राणायाम ||647
यम (सामाजिक नैतिकता)
नियम , आसन , प्राणायाम (आप सहज समझते ही है )
प्रत्याहार (स्थिर चित्त से लीनता )
धारणा (एक विषय पर अटल विश्वास |
~~~~~
जय जगन्नाथ जी
जगन्नाथ जय बोलिए , पुरी बना है धाम |
त्रय रथ निकलें ही सदा, जिसमें पीछें श्याम ||648
सभी यहाँ रथ देखिए , होते सदा नवीन |
लौह कील लगती नहीं , दिखते कला प्रवीन ||649
लकड़ी होती नीम की , रथ होता निर्माण |
अक्षय तीजा से बने , मिलता यही प्रमाण ||650
पावन रथ यात्रा रहे , जो जन लेते खींच |
बुरीं बला सब भागती , अपनी आँखें मींच || 651
गुंडीचा मंदिर रहे , दिवस गिनो सब सात |
रुकता रथ भी है यहाँ , खाने मौसी भात ||652
(गुंडीचा मंदिर भगवान की मौसी का मंदिर कहलाता है )जहाँ भोजन में विशेष रुप से भात बनता है |
~~~~~~~~~
सभी तरह के देखिए , घुसे बाँह के साँप |
जहर उगलते है सदा , लखकर जाते काँप ||653
नाग पंचमी पर मरा , भूखा प्यासा साँप |
नेता सारा दूध पी , गये भोग को चाँप ||654
सावन पावन चल रहा, साँप आयगें द्वार |
शिवमंगल होवें सदा , रखिए सदा विचार ||655
साँप गले में डालते , शंकर जी भगवान |
प्रेम जहाँ होता प्रकट , जहर वहाँ अवसान ||656
साँप देखकर भागते , फिर भी पूजा रीति |
दुनिया में मशहूर है , यह भारत की प्रीति ||657
~~~~~~~
अनुज हमेशा जानिए , अपना बायाँ हाथ |
दुनिया की यह कीमती , हीरा समझें साथ ||658
नहीं अनुज को त्यागना , गलती करना माफ |
यही एक दिन आपकी , राह करेगें साफ || 659
अनुज आपका विम्ब है , कह सकते प्रतिमान |
दुनिया के हर काज में , बन जाता पहचान ||660
दूर अनुज को कर दिया , दुश्मन तब मजबूत |
साथ खड़ा बनता सदा , बैरी को यमदूत ||661
पर कलियुग है आजकल , खिची आज दीवाल |
अनुज बने दुश्मन यहाँ , पालें रहें मलाल ||662
अनुज ज्येष्ठ जोड़ी यहाँ , राम लखन आदर्श |
भरत शत्रुघन मानिए , अनुजों में उत्कर्ष ||663
~~~~~
ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर , जब हम चलते जाँय |
कैसी होती जिंदगी , किस - किस को बतलाँय || 664
रूखड़ सूखड़ आदमी , ऊबड़- खाबड़ ज्ञान |
चढ़ा करेला नीम पर , लो भाई पहचान || 665
ऊबड़- खाबड़ है नदी , बहती चारों ओर |
पर रखती है धार में , अपना निश्चित छोर ||666
ऊबड़ - खाबड़ भी मिलें , सबको बहुत सलाह |
पर सुभाष तुम खोजिए , सीधी सच्ची राह || 667
सब पंचों कै बीच में , ऊबड़ -खाबड़ ज्ञान |
पत्ता- सा उड़ता रहे , सभी करें पहचान ||668
~~~~~~~~~~~
अच्छी रखिए कामना , अच्छे करना काम |
वयम् राष्ट्र जगता रहे , मिले सुयश अविराम ||669
करें कामना कर्म से , निकले अच्छी थाप |
धरती अम्बर तक बने , जिसकी सुंदर छाप || 670
सत्य अहिंसा कामना , दें जग को संदेश |
भारत का यह मंत्र हो , संतोषी परिवेश || 671
करें परस्पर कामना , शुचिता की हो राह |
बैर भाव पनपे नहीं , बनें सभी की चाह || 672
यह भी रखिए कामना , मत भूलें भगवान |
सदा सहायी वह रहें , मन में हो अरमान ||673
यह भी हो अब कामना , अपना हिंदुस्तान |
नारी सैनिक सँग श्रमक , हर्षित रहें किसान || 674
घटनाएँ अपयश भरी , मन में करती खेद |
करूँ यहाँ पर कामना, खुलते जाएँ भेद ||675
अपराधी को दंड हो , रुकें यहाँ अपराध |
मन से करता कामना , सुलझें सभी विवाद || 676
दो मुँह बाले बंद हो , बातों के भंडार |
इनकी विघटन कामना , फैलाती है खार || 677
-------------
लेखन रहे सटीक ही , नजर रखे जो वक्र |
जिंदा कर दे जब कलम , पूरा घटना चक्र ||678
लेखन में चलती कलम , जब करती है न्याय |
लेखक लिखता सत्य है , कुछ भी नहीं छिपाय ||679
लेखन कवि का धर्म है , कविता या आलेख |
दर्पण सत्य समाज का , कहें गुणीजन देख ||680
लेखन सुख अनुभूति है , पढ़ ले सकल समाज |
धन्य कलम तब मानिए , करें राष्ट्र यदि नाज || 681
लेखन उसको ही कहें , जिसमें हो कुछ कथ्य |
कम शब्दों में सार का , भरा पड़ा हो तथ्य ||682
~~~~~~~~~~~~~
बने संकुचित दायरे , कुंठित जहाँ विचार |
कह सुभाष देखे वहाँ , चलते तंज प्रहार || 683
गिरहवान गंदा रखें , पर देते उपदेश |
दिखते द्वेष प्रहार है , जिसमें रहते क्लेश || 684
राष्ट्र घात जो भी करें , उन पर नहीं प्रहार |
ऐसे कुछ नेता दिखे , उनसे करते प्यार || 685
आतंकी को "जी" लगा , दिखलाते जो प्यार |
वतन आन को तार कर , माँ पर करें प्रहार || 686
वर्ग भेद सँग जातियाँ , इन पर दिखे प्रहार |
आज टूट कर मिल रहीं , समय हुआ तैयार ||687
~~~~~~~~~~~
विषय - सुराज (सु+राज) = अच्छा राज
क्या स्वराज के बाद में , आया अभी सुराज | ?
मणिपुर घटना कह रही , उत्तर दे दो आज ||688
बड़े लोग सब है बड़़े , मध्यम अब कमजोर |
निर्धन कभी सुराज का , देख न पाए छोर || 689
सपना बना सुराज है , फिर भी रखते आस |
रामराज की कल्पना , लोग सहेजें पास || 690
भगतसिंह फाँसी चढ़े , मरे देश के नूर |
वह स्वराज को दे गये , पर सुराज है दूर || 691
वोटों की चाहत रखे , भीखों का अनुदान |
क्या कर पाए इस तरह, यह सुराज उत्थान || ? 692
हम तुम ही वादा करें , आपस में भरपूर |
लाएँ भारत देश में , अब सुराज का नूर | 693
~~~~~~~~
तृप्त न होता लालची ,प्यासा रहे सदैव |
लोभ आदतें भी सदा , बढ़ती यहाँ स्वमैव ||694
मानव मन जब लालची , नभ-सा है आकार |
छोर न जिसका मिल सके , इतना है विस्तार || 695
दौलत खोजे लालची , मन को रखे चपेट |
नीति कुनीति न जानता , बस करता आखेट || 696
नहीं मानता लालची , लालच का यह जाल |
कर देता है एक दिन , मानव को कंगाल || 697
कहे सुभाषा लालची , रखता हाथ पसार |
नहीं मान सम्मान पर , करता कभी विचार || 698
~~~~~~~~~
चंद्रयान अभियान ने , दिया सुखद परिणाम |
हुआ विश्व में आज है , भारत का फिर नाम ||699
जीवन में निश्चित करो , फिर छेड़ो अभियान |
करते रहना कर्म को , मदद करें भगवान || 700
चंद्रयान यह तीसरा , सफल हुआ अभियान |
प्रज्ञा यह विज्ञान की , धन्य हुआ प्रज्ञान || 701
धरती पर्वत आसमाँ , सब पर है अभियान |
अगला सूरज पर बना , हुआ सभी को भान ||702
जहाँ लक्ष्य को ठान लो , चलो निशाना तान |
कह सुभाष बस नाम है , इसका ही अभियान || 703
जायेगा अब एल-वन , माह सितम्बर जान |
सूरज ग्रह पर रख नजर , इसरो का अभियान ||704
----------------
शिक्षक दिवस पर शिक्षक मित्रों एवं आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ 💐💐 5 सितम्बर
रखता शिक्षक आचरण , शिक्षा प्रद आवाज |
मन में रखता चाह है , शिक्षित बने समाज || 705
गुरुवर बनकर ज्ञान का , करता है आगाज |
कह सकते शिक्षक सदा, करता सभ्य समाज ||708
मात-पिता जैसा यहाँ , शिक्षक का सम्मान |
जहाँ तपस्या माँ - पिता , शिक्षक है वरदान ||709
शिक्षक की गरिमा सदा, आती बनकर छाँव।
इनके पीछे जो चले , कभी न थकते पाँव ||710
शिक्षक स्वयं प्रकाश है , ज्ञान पुंज है तेज |
तिमर हटे अज्ञान का , दिया ईश ने भेज ||711
मात-पिता देते जनम , शिक्षक यहाँ विशेष |
ज्ञान बीज रोपण करें , विद्यालय परिवेश ||712
~~~~~~~
चार कदम के चिन्ह पग , बन जाते आदर्श |
सज्जनता देती सदा, प्रादर्शों के हर्ष || 713
चार कदम पर भी यहाँ , मिलते अच्छे लोग |
जिनका अच्छा ध्येय हो , आते स्वयं सुयोग || 714
चार कदम के चार सौ , तुम्हें गिनाते दोष |
रहते ऐसे मित्र है , संकट में खामोश ||715
चार कदम जब हम चलें , पूछें लोग हजार |
बन जाता है कारवाँ , चलने को तैयार || 716
चार कदम पर लड़खड़ा , गिरते जो श्रीमान |
उनके जीवन से सदा , दूर रहे सम्मान || 717
~~~~~
कह देते हैं शब्द ही , मन के पूरे भाव
इसीलिए करिए सदा , कहनें सही चुनाव ||718
शब्द -शब्द में सार हो , बाणी मधुर सुगान |
मुख से शीतल झिर झरे, नर पाता सम्मान || 719
शब्द सुने गम्भीर भी , शब्द बनें है तीर |
मलहम बनते शब्द ही , हरते मन की पीर || 720
शब्द कराते युद्ध है , कहीं लगाते आग |
कहीं - कहीं कड़वें लगें , बनते कहीं पराग || 721
कहीं शब्द के जाल में , घिर जाते है लोग |
वचन करें पूरा सदा , स्वीकारें सब योग ||722
~~~~~~~~~~~~~~~~~~`
मातृ शक्ति को है नमन , करता भारत देश |
जय भी इसकी बोलता, शुचि रखता परिवेश ||723
सैन्य शक्ति जो देश की , इस पर हमको मान |
सीमाओं से बोलते , जय हो हिंदुस्तान || 724
सदा शक्ति कहते यहाँ , है देवी का रूप |
पूजन करके राम ने , मारा रावण भूप ||725
देह शक्ति को मानिए , पौरुष का प्रतिमान |
निर्बल की रक्षा करें , सबल करे उत्थान || 726
भाव भक्ति की शक्ति भी , रखती अपना नूर |
देख समर्पण ईश भी , फल देते भरपूर ||727
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ठसक न धन की राखियो , यह हाथों का मैल |
चला जाएगा एक दिन , तुमको पीछे ठैल || 731
सदा देखते हम ठसक , होती चकनाचूर |
जब भी सम्मुख हो सबल , ठसक भागती दूर ||732
मानव भी करता गजब , रखता ठसक अजीब |
अपने भी सब भागते , आते नहीं करीब ||733
ठसक जहाँ विश्राम ले , होने लगते पाप |
लगती हाय गरीब की , जिसको कहते श्राप ||734
ठसक किसी की पालकर , दम भरते है लोग |
यह होती सबसे बुरी , जानो इसे कुयोग ||735
~~~~~~~~
दशा आज लाचार है , नहीं दिशा का ज्ञान |
पश्चिम में वह देखते , कब निकलेगा भान ||736
व्यथा कथा बतला रही , कैसा था अवसान ||
भ्रमित दिशा के ज्ञान में , कैसा था इंसान ||737
दशा बनाते हम सभी , होता जब निर्माण |
दिशा उसी से हो सहज , स्पंदन करते प्राण ||738
छू लो सब ऊँचाइयाँ , गहराई लो नाप |
जाना है किस राह से , दिशा समझिए आप ||739
गंग कठौती में दिखे , पत्थर में भगवान |
दिशा बनाती भावना , हर मुश्किल आसान ||740
~~~~~~~~
मेरा देश महान है , जन गण मन अधि गान |
शांति प्रेम संदेश ले , आगे शुभ विज्ञान ||741
नेता बड़े महान है , करिए प्रतिदिन गान |
चम्मच या चमचा बनें , रखिए उनका ध्यान ||742
नेता सदा महान है , छाया दें भरपूर |743
शरणागत जो भी रहे , बन जाता है नूर ||
जो महान सच्चा यहाँ , कब देते हम मान |
है शहीद जो देश पर , उनका भूले गान ||744
अब महान वह है यहाँ , जिनके चले प्रपंच |
धुआँधार भाषण करें , खड़े हुए अब मंच ||745
सुभाष सिंघई
~~~~~~
विषय - मीन- मेख
मीन - मेख करते रहे, पढ़ा न मन का लेख |
कह 'सुभाष' अब कुछ समय , निज के मन को देख ||746
कितने गहरे आप हैं , और आपका ज्ञान |
मीन-मेख निज की करें , कह ' सुभाष' नादान ||747
निंदा रस में मग्न हैं , लिए कुतर्की ओट ||
मीन-मेख रख आचरण , करें धर्म पर चोट |748
नहीं कमी खुद की गिने , और ' सुभाषा ' खोट |
मीन-मेख हथियार से , करते सब पर चोट ||749
कुछ ने घर में जानिए , पाल लिया है रोग |
मीन- मेख शब्दाबली , दिन भर करें प्रयोग ||750
श्रद्धा को अंधा कहें , देते विविध उपाधि |
मीन-मेख के सूरमा , पोषण करते व्याधि ||751
~~~~~~~~~~~~
नेता जी चाहें दवा , मिलें वोट ही वोट |
वैद्य जहाँ जनता बने , सभी छिपाते खोट || 🙏752
बात हजम जब हो नहीं , करे पेट भी दर्द |
चुगली चूरन लें दवा , हटे आँत की गर्द ||🙏😂753
देशी जाने सब दवा , पर अजमाता कौन |
दूजों को है वैद्य जी , खुद पर रहते मौन ||🙏754
नेता देते है दवा, लालच भरी खुराक |
जनता को दे चाटनें , अनुदानों की खाक ||🙏755
मनमाने अब मूल्य है , फिर भी चुप सरकार |
मँहगी मिलती है दवा , जनता है लाचार ||🙏756
असर दवा करती नहीं , बाँटे जो सरकार |
लाभ उसी से क्यों मिले , जो मिलती बाजार ||? 🙏757
~~~~~~~~
चर्म रोग की है दवा, नीम - निबौरी तेल |
फोड़ा फुंसी पर लगे , रुके खाज का खेल ||758
शक्कर का जब रोग है , कभी नहीं घबड़ाँय |
जामुन गुठली है दवा , संग आँवला खाँय ||759
शीत काल गुण खाइये , गर्म रहे तासीर |
घर बैठे की है दवा , उम्दा बने शरीर ||760
अदरक पीपरमूर हो , तुलसी चीनीदाल |
है जुखाम की यह दवा , पीलो इसे उबाल ||761
गाजर के सँग आँवला , रस को लिया बनाय |
रक्तचाप की है दवा , वैद्य सदा समझाय ||762
मक्के की रोटी दवा , लीवर जब कमजोर |
सुनते टी बी भागती , बिना किये कुछ शोर ||763
दाँतुन करिए नीम की , करे दवा का काम |
पायरिया सब दूर हो , करिए प्रात: शाम ||764~
~~~~~~~~~~~~~~
सोना चाँदी की दिखे , हर मानव में चाह |
घर में दौलत ढ़ेर हो , मंशा रखे अथाह ||765
तेरी चाँदी हो गई, कहने का है अर्थ |
पौ बारह तेरे हुए , कारज हुए न व्यर्थ ||766
चाँदी की पायल बनी , चलकर दे झंकार |
कटि करधौनी भी बने , हँसती हुई फुहार ||767
चाँदी- सा चंदा लगे , नभ से करे प्रकाश |
धवल चाँदनी है किरण , कहता कवि सुभाष ||768
सोना चाँदी के मुकुट , बाँधें हैं श्री श्याम |
राधा बैठी पास है , जन -जन करे प्रणाम ||769
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दोहे -हिंदी मुहावरो पर , कई मित्रों ने लिखा है ,
एक प्रयास मेरा भी 👇 है , 🙏
कर सुभाष जग में सदा , कुछ तो ऐसे काम |
मिले आम के साथ में , जब गुठली के दाम ||770
खोदा जहाँ पहाड़ था , चुहिया निकली कूँद |
हाथ मले तब बैठकर , श्रम पर लगी फफूँद || 771
मुँह में पानी आ गया , था ऊँचाई फेर |
यह खट्टे अंगूर हैं , कहे लोमड़ी हेर ||772
काजल की थी कोठरी , लगें वदन पर दाग |
फिर क्यों उजला कह रहा ,मानव तन का भाग || 773
बीन बजाकर भैस की ,कब बदली है चाल |
ठुर्रा होती मूँग जब , कभी न गलती दाल || 774
अवसर हो जब सामने , बदले गिरगिट रंग |
खरबूजा को देखकर , दूजा लेत उमंग ||775
हरि भजनें साधू गया , ओटन लगा कपास |
दुर्जन की संगत सदा , भरती खूब खटास ||776
चना अकेला फोड़ता , कहाँ किसी का भाड़ |
कब लोहे के भी चने , चब सकते है दाड़ ||777
दाल भात मूसर घुसे , अपनी ढपली राग |
घर की वामी छोड़कर , बाहर खोजें नाग ||778
कंगाली में भी सदा , होता गीला चून |
चक्की में डाला चना , घुन भी हो मजमून ||779
आटे में थोड़ा नमक , सब देते है डाल |
राई का पर्वत बना , करते लोग कमाल || 780
गुड़ गोबर भी देखता , देखूँ बंदर बाट |
तिल का बनता ताड़ है ,लुटती जग की हाट || 781
धुला दूध का कौन है , है सब कोल्हू बैल |
सभी दूध के दांत भी , गिरकर बनते मैल ||782
कभी मिले खटिया खड़ी , कभी टूटती खाट |
चोर - चोर भाई बनें , मौसेरों की हाट || 783
सांप मरे लाठी रहे , निष्कंटक हो राह |
हर्र फिटकरी मत लगे , रँग चौखे की चाह ||784
अब सुभाष विनती करे , करो आँख मत लाल |
पढ़कर बस आनंद लें , छोड़ बाल की खाल ||785
गुड़ छोड़ा पर गुलगुला , नहीं करें परहेज |
घोर अमावस पर सुना , जुगनू में है तेज || 786
नौ दिन चलकर है गिना , निकला ढाई कोष |
गाज स्वयं पर जब गिरी , तब आया है होश || 787
मार कुल्हाड़ी पैर पर , आगे जाते लोग |
काजल की घुस कोठरी , काला लाते योग || 788
-**********
*राह* कहो या *रास्ता* , *पथ* कह दो या *पंथ* |*मार्ग* कहो या *मग* कहो, पर मानो शुचि ग्रंथ ||789
*प्रचर* *गमथ* *गतिपथ* कहो , *गुजर* *घाट* सब नेक |
एकभाव कहने मिलें , हमको शब्द अनेक ||790
है समर्थ हिंदी यहाँ , भाषा है अनमोल |
एक भाव को बोलने , भरे पड़े है बोल ||791
यहाँ संत सानिध्य है , रत्ना त्रय का गान |
यदि गौरव हो निज हृदय, समझों स्वाभिमान ||792
मर्यादा मत टूटवें , प्रभु जी विनती मात्र |
समय दान जो दे सके ,सेवा हित हो पात्र ||🙏793
सर्व साधु का हो नमन , शुभ मंदिर कल्याण |
धर्मातन की रक्ष हित , शुचिमय होवें प्राण ||🙏794
सदा सत्य की राह हो , रहे मूल यह मंत्र |
जिनकी छाया में बढ़े, भारत का गणतंत्र ||🙏795
उदित लोग जो कर रहे , आकर अपना वाद |
करे हानि वह धर्म की , गलत रखें बुनियाद ||🙏796
कुछ हम जब घटना सुने , हिंसा का उपयोग |
नहीं बंधु ऐसा लगे ,आया भीषण रोग ||797
सर्व साधु का नमन हो , वर्तमान का मान |
सत्य स्वरुप तब जानकर,सबको करो प्रनाम ||🙏798
पंथ कहो या पथ कहो , कहाँ अर्थ में भेद |
परम सत्य ही अब सुनो , सभी हटाओ खेद ||🙏799
संत जहाँ सच्चे मिले , हम सबके भगवान |
नत सुभाष मस्तक करो , रखो विनय श्रृद्घान ||🙏800
धर्म काज हित एकता , दिल को रखना खोल |
धर्मातन का ध्यान रख , मीठे बोलो बोल ||🙏801
चलो अहिंसा राह पर , संत वाद को छोड़ |
आगम ही देगा सदा , जीवन में शुचि मोड़ ||802
नमो सभी साधू करो , रखो धर्म को याद |
पालन रत्नात्रय करो, मन को रख आबाद ||803
संतवाद यदि चल गया , श्रावक में हो फूट |
यही फूट फिर देखना , कैसी लाती टूट ||804
तूँ तूँ मैं मैं जिस जगह , सिर पर करती राज |
विघटित वहाँ समाज है,सिर पर गिरती गाज ||805
संत नीर होता सदा , देता जाता ज्ञान |
जहाँ ठहरता बाँटता, सबको अमरत दान ||806
नीर नहीं है टूटता, कितना करो प्रहार |
फर्क संत में जो करें , पाले बंध हजार ||807
आगम की छाया रहे , मिलें संत अविराम |
भाग्यवान श्रावक रहें, करें स्वयं को धाम ||808
देते है धर्मायतन , राष्ट्र मनुज हित दान |
नहीं हेय कोई यहाँ , सभी दान है मान ||809
तीर्थ पुराने जो अभी , कभी नए थे गान |
रहे सदा आलोचकी , युग- युग में श्रीमान ||810
खुलती थैली सम्पदा , ऋषि चरण में आन |
दानी देता है लुटा , पाता है सम्मान ||811
आलोचक हो अब खड़े , करें दान की बात |
पड़ जाएगा तब पता , कितनी जुड़ी जमात ||812
मेंढक तुलते हैं नहीं , कितना करो प्रयास |
एक चढातें हम जहाँ , दूजा कूदे खास ||🙏812
अजब-गजब अब भक्त है , सब हैं चतुर सुजान |
पहले अपना देखते , नफा और नुकसान ||🙏814
जय -जय बोले उस जगह , जिधर मिले कुछ खास |
नहीं पूछ हो जिस जगह , कह उठते वकबास ||🙏815
पूँछ मीडिया थामकर , अब चलते है लोग |
योगदान के नाम पर , देते निंदा रोग ||🙏816
आप स्वयं क्या कर रहे , यह मत पूछो बात |
भ्रम फैलाने में सफल , देने बस आघात ||🙏817
दोष गिनाते घूमते , और खोजते दोष |
घोषित खुद ही वीर है , बतलाते है जोश ||🙏818
अजब तरह के व्यान है , गजब मिले सामान |
मोवाइल पर चल रही , अच्छी आज दुकान ||🙏819
ऐसा उनने गा दिया , बैसा था वह गान |
मीन मेख के देवता , घर से बाँटे ज्ञान ||🙏820
साधू पर संदेह का , फेंक रहे है जाल |
अपना ज्ञान परोसते , दो कोड़ी का माल ||🙏821
ऐसे करते बात है , जैसे ठेकेदार |
इनके कंधे है चढ़ा , आज धर्म का भार 822
~~~~~~~~~~~~~~~
निंद चुनिंदा कर रहे , लगे बढ़ाने क्रेज |
धर्म ध्यान सब छोड़कर , बना रहे कवरेज ||823
तज दर्शन पूजा समय , सामायिक संज्ञान |
मोबाइल पर उस समय , डटे मिले श्रीमान ||824
अंध भक्त उपमा मिले, संत हुए बेढंग |
मोबाइल से बज रहे , कुंठित आज मृदंग ||825
आयोजन सब बंद हो, और साथ में दान |
क्या पूजा भी छोड़ दूँ , बतला दो श्रीमान ||826
श्रमदानी दानी मिले ,मिले संत विद्वान |
इनको मिलता मंच है , नत मस्तक सम्मान || 827
पर सेवा भी धर्म है , , जो भी करते कर्म |
पूजा सम यह कर्म है , यही बोलता धर्म ||828
फाँका फूँकी कर रहे , बाँट रहे जो ज्ञान |
गिरहवान में झाँकिए , आप कहाँ श्रीमान ||829
संकट में भी कर रहे , पंथवाद की बात |
लोग समझते क्या नहीं , कहाँ मारते लात ||830
तीस मार खाँ बन गये , पोस्ट रहे है चेंप |
अंगुली दूजों पर उठा , नहीं रखें निज झेंप ||831
आज पुराने तीर्थ है , कभी नए थे लीन |
आज नए जो बन रहे , आगामी प्राचीन ||832
रक्षा पर भी सदियों से ,होते रहे सवाल |
जीर्णोद्धार के समय , आते रहे वबाल ||833
जिनमें जैसा अंश है , बैसे रहे विचार |
दाता देता है सदा , बिन दाता दे खार ||834
आप खड़े हो जाइये , कितना मिलता दान |
संत रहे जब मंच पर , प्रकट होय अरमान ||835
आयोजन मत कीजिए , बाँट रहे संदेश |
जुड़े द्रव्य को दीजिए , अन्य जगह परिवेश ||836
आयोजन होगा नहीं , जुड़े कहाँ से द्रव्य |
होगी नहीं प्रभावना , जुड़े न संख्या भव्य ||837
मोबाइल के वीर तुम , करो एकता बात |
पंथ संत पर छोड़ दो , आप चलाना घात ||🙏838
वर्तमान समय पर संकेतात्मक दोहे 🙏
अवसर आगे आ रहा , पहचानो श्रीमान |
तब सुभाष सबसे कहे , मत चूको चौहान ||839
हमको सीधा जानकर , देते दिल पर चोट |
रक्षक ही अब लूटता , मन में रखता खोट ||840
आपस में मत फेंकिए , अभी उठाकर कीच |
फँसे आज मझधार में , सब तीरों के बीच ||841
निंदक भी मेरी सुने , तुम्हें मिलेगी छूट |
पहले करिए सामना , जो आई है लूट ||842
श्रमणों को मत कोसिये , बने आज जो चित्र |
समझों उनकी चाल को , मेरे प्यारे मित्र ||843
लिखें मैथली जी शरण , पंचवटी के बीच |
जीवन में सुधरे नहीं , भाव भरें जो नीच ||844
जहाँ न्याय की चाह हो , वह ही काटे अंक |
बिच्छू राजा जानिए , चुपके मारे डंक ||845
न्याय वहाँ मिलता नहीं , जहाँ पनपती खोट |
कुटिल चाल खोजे सदा , पहले छिपने ओट ||846
टैक्स भरो या साथ दो , या अर्पण हों वोट |
युवा बैल हल में जुते , मिले पीठ पर चोट ||847
सर्प काटकर भागता , रुके न कुछ पल खास |
राजनीति जब काटती , मिले न पानी पास ||848
दौलत विद्या गुणीजन , इनको है अभिशाप |
मंच न साँझा कर सके , रखें ज्ञान का ताप ||849
जहाँ इकठ्ठे मंच हो , बन जाता इतिहास |
पिछले पन्ने देख लो , कहता सही सुभास ||🙏850
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रोनी सूरत त्यागकर , हँसकर खोलो द्वार |
तुमको टूटा जानकर , वें डालेगें मार ||851
कुटिल चाल में फँस चले , जब भी अपना पैर |
पहले पैर निकालकर , आगे पालो वैर ||852
तीर जहाँ से चल गये , तुमको देने पीर |
पीर लौट उनको लगे , रखो खोज तदवीर ||853
हाय-हाय मत कीजिए , वाह कीजिए काम |
लौटे तीर कमान में , लो साहस को थाम ||854
लोकतंत्र का देश है , शक्ति को पहचान |
अवसर आए हाथ में , मत चूकों चौहान ||855
~~~~~~~~~
बुंदेली हम लोग है , राजा है श्रीराम |
नगर ओरछा धन्य है , बना राम से धाम ||856
बेटी के हर ब्याह में , रहें कुँवर हरदौल |
भानेजन को भात दें, रखें बहिन का कौल ||857
जहाँगीर अद्भुत महल ,नगर ओरछा पाट |
मंदिर देखो चतुरभुज , नदी बेतवा घाट ||858
शिवशंकर रक्षा करें , रह कुंडेश्वर धाम ||
प्रकट हुए थे कुंड से , रुप पिंड धर श्याम ||859
विन्ध्यवासनी मातु भी , करती है उद्धार |
बुंदेली हर आन का , करती सदा निहार ||860
मैहर बाली शारदा , देती रहती ज्ञान |
बुंदेली जन मानता , उनको अपनी शान ||861
अछरु माता जाइये , बिगड़े बनते काज |
जो भी माथा टेकते , माता रखती लाज ||862
पन्ना को सब जानते , रहते जुगल किशोर |
हीरा उगले भू सदा, विचरें वन में मोर ||863
निकट नदी पर झर रहा , पांडव एक प्रपात |
पन्ना की घाटी सुनो , बनी जगत विख्यात ||864
यहाँ नेशनल पार्क है , सुंदर अभ्यारण्य |
सभी तरह के जीव है ,निर्भय जिनका पुण्य ||865
भीम कुंड है बाजना, रहती पुण्य हिलोर |
गहराई को नापने , मिले न इसका छोर ||866
दर्श जटाशंकर करो , मिटती है सब पीर |
शिव शम्भू धूनी रमा , रहते है इस तीर ||867
दतिया माँ पीताम्वरा , सबकी पालन हार |
स्वर्गिक सुषमा है यहाँ ,रजकण है उपकार ||868
खजुराहो कंदारिया , महादेव विख्यात |
चरण शरण जिनको मिले ,सुखमय सब हालात ||869
खजुराहो में देखिए , शांतिनाथ भगवान |
करो मोक्ष की कामना , रखकर भाव प्रधान ||870
जैन तीर्थ अनुपम यहाँ , जिसका नाम अहार |
राँगा भी चाँदी बना , कहता साहूकार ||871
निकट पपौरा तीर्थ है , गिनो एक सौ आठ |
मंदिर यहाँ विशाल है , पढ़ो मोक्ष का पाठ ||872
बंधा क्षेत्र मशहूर है , अजितनाथ का घाम |
मुगल यहाँ पर बँध गये , हुआ न भंजन काम ||873
कुंडलपुर महिमा अलग , आदिनाथ का धाम |
कहलाते बाबा बड़े , बिगड़े बनते काम ||874
महाराजा छत्रसाल को , मिला यहाँ आशीष |
राज्य मिला खोया हुआ ,कृपा मिली जगदीश ||875
सोनागिर पर्वत चढ़ो , चंदाप्रभु का धाम |
मंदिर यहाँ विशाल है, जग में इसका नाम ||876
चलो देवगढ़ आप सब , हर कण जिसका पूज |
कला केन्द्र अद्भुत दिखे , मिले न कोई दूज ||877
गुना जिले में जानिए , चंदेरी थूबौन |
अद्भुत अतिशय है यहाँ , करो साधना मौन ||878
बड़ागाँव सँग सेंदपा , नैनागिरि विशाल |
यहाँ मदनपुर नाबई , लखो यहाँ हर हाल ||879
पवा करगुवाँ तीर्थ भी , वंदनीय है धाम |
नगर जतारा भोंयरा , दर्श करो अविराम ||880
चित्रकूट में राम का , रहा बहुत वनबास |
सती अनुसुइया है यहाँ , जिनके सब है दास ||881
कामदगिर की वंदना , और कामतानाथ |
हरते जन की पीर है , रखकर अपना हाथ ||882
नदी यहाँ मंदाकिनी , और जानकी कुंड |
जन- जन के है माथ पर , रामा यहाँ त्रिपुंड ||883
धारा है हनुमान की , वन है यहाँ प्रमोद |
राम नाम उच्चार कर , मन का कर लें शोध ||884
राजापुर में ले जनम , कविवर तुलसी दास |
रामचरित मानस लिखें , जग में करें उजास ||885
कालिन्जर का किला , रखता है इतिहास |
नीलकंठ मंदिर यहाँ , जिनके सब है दास ||886
अजयपाल का अजयगढ़ , दुर्ग यहाँ का नूर |
अमन महल को देखिए , नजरों से भरपूर ||887
रानी लक्ष्मी का सुनो , झांसी हित. बलिदान |
आजादी लाने तजे , जिसने अपने प्रान ||888
वीर महोबा के रहे , आल्हा ऊदल शान |
अलबेले रणबाँकुरे , बल का गज़ब बखान ||889
खेतसिंह महराज का , देखो गढ़कुण्डार |
अद्भुत लगता है किला , भव्य रहा दरबार ||890
बाला जी उन्नाव का , मंदिर अनुपम सूर्य |
मड़खेरा भी जानिए , जिसका अपना तूर्य ||891
जन्में थे रावतपुरा , धन्य जगत सरकार |
जिनका छिपरी जन्म है , नगर लिधौरा पार ||892
चर्चा में है आजकल , जय बाघेश्वर धाम |
जय-जय जनता बोलती , बनते उनके काम ||893
कल्पवृक्ष है धामना , लगता बड़ा अनूप |
टीकमगढ़ लगता जिला , अद्भुत है यह रूप ||894
गुना बजरंगगढ़ सुनो , तीरथ बड़ा विशाल |
दर्शन जो मानव करे , होता वही निहाल || 895
बाला जी उन्नाव है , दतिया है शुभ धाम |
माता है पीताम्वरा , सभी जानते नाम || 896
मड़खेरा मंदिर सूर्य है , अनुपम लगता खास |
जो भी जन आते यहाँ , पाते यहाँ उजास || 897
मऊ सानिया भी सुनो , छत्रसाल महराज |
रखी बुंदेलखंड की , जिनने पूरी लाज || 898
टीकमगढ़ नगरी मधुर , बुंदेलों की शान |
दर्शनीय है थल यहाँ , जिनका अद्भुत गान ||899
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बहुत अभी कम ही लिखा, लिखना काफी और |
अभी नहीं हम जानते , कब आएगा दौर ||900
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नारी होती जहाँ सरल , कहते उसको गाय |
सीधा सच्चा यदि पुरुष ,फिर क्यों गधा कहाय ||🙏968
नारी हिरणी मोरनी , कवि देते सम्मान |
नर तो घोड़ा बैल है , यह कैसै संज्ञान || 😚969
पूजा रोली आरती , प्रभू चरणों के पास |
घंटा झालर नर बने , पिटें दूर से खास ||🙆♂️970
नारी अबला मानते , सबला नर को मान |
फिर क्यों नर तबला बना , पिटता फिरे जहान || 🤭971
नारि शक्ति को सदा , नमन करे सरकार |
प्रश्न हमारा है यहाँ , क्या नर यहाँ उधार || 🤔972
कंधे से कंधा मिला , है नारी पग गान |
पर नर के कंधे दिखा , हमें अधिक सामान || 🙄973
वस्त्र पुरुष के अब पहिन , नारी करती काज |
पर नर पहनें साड़ियाँ , क्या बदले में आज ||😚974
बनी लाड़ली नारियाँ , बहिन बनी लें दाम |
नर सब सूखे हैं रहत , रहें खोजते काम || 🤑975
नारी को देवी कहें , और करें गुणगान |
नहीं पुरुष हैं देवता , मिलता रहता ज्ञान || 🤭976
कहें बचाओ बेटियाँ , सरकारी फरमान | क्या बेटो को जान लें , इनका होगा दान || 🤔 977
लक्ष्मी होती बेटियाँ , सभी झुकाते माथ |
क्या घर में सबको लगे , बेटे भैरव नाथ ||🤔978
खूब पढ़ाओं बेटियाँ , शासन यह समझाय |
क्या करना पतिदेव को , यह निर्णय ले पाय || 🙄979
पापा की होती परी , बेटी को सम्मान |
कहें कबूतर बाप ही , सुन बेटे का गान || 🤔980
~~~~~~~~
बात हास्य तक मानिए , दोहा मनो विनोद |
पूजन जैसी योग्य है , नारी की शुभ गोद ||981
शीत काल में जब पड़े, भू पर जहाँ तुषार |
पवन लहर तन चीरती , करती प्रबल प्रहार ||982
शीत काल में आपको , अक्सर दिखे तुषार |
हिमकण गिरें जमीन पर ,करता पवन प्रहार ||983
कटुता की बातें जहाँ , जानो वहाँ प्रहार |
हटता है यह प्रेम से , लगता जहाँ तुषार ||984
अब प्रहार सब दूर हों , हटबें सभी तुषार |
न्याय धर्म ईमान का , गुंजित रहे प्रचार ||985
ज्ञानी मिलते चार जब , करते नहीं प्रहार |
हटते वहाँ तुषार सब , धर्म दिखे आधार ||986
पड़ता जहाँ तुषार है , पवन चले यदि तेज |
थर-थर काँपे लोग तब, जैसे टूटी मेज ||987
गिरें रुई से ओस कण , धरती लगती श्वेत |
दे तुषार नुकसान भी , कभी सुखी हों खेत ||988
~~~~~~~~~~~~~~~
तुमको किसने कह दिया , सुधर गये वह लोग | नफरत का जिसने यहाँ , फैलाया है रोग ||989
तुमको किसने कह दिया , उनमें हुआ सुधार |जिसको माता भारती , नहीं हुई स्वीकार ||990
तुमको किसने कह दिया , वह नेता अब फूल | बोये जिसने है सदा , कदम- कदम पर शूल ||991
तुमको किसने कह दिया , मानो उनकी बात |जो करते है देश में , हर अवसर पर घात || 992
तुमको किसने कह दिया , उनको दो सम्मान |अकल अजीरण रोग है , कुंठित जिनका ज्ञान ||993
~~~~~~~~~~
घोड़ा-गाड़ी-कार पर , राजा रंक निहार | जाना सबको एक दिन ,मरना अपनी बार |994
जाना सबको एक दिन , मरकर मरघट धाम | पाप पुण्य का फैसला ,तब होगा अविराम ||995
जाना सबको एक दिन , अपने हाथ पसार | धन-दौलत को छोड़कर , बना हुआ लाचार || 996
जाना सबको एक दिन , अपना घर परिवार | छोड़ सभी देगें तुम्हें , जलते मरघट द्वार ||997
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पशु पक्षी पहचानते , मानव का अनुराग | आकर बैठें प्रेम से , चरणों के अनुभाग ||998
मन की पीड़ा को मिले , वचनों से अनुराग | अंदर जलती भी बुझे , मन की पूरी आग ||999
निर्गुण से अनुराग कर, परम ब्रम्ह में ध्यान | यह होती जब साधना , होता मंगल गान || 1000
देखी है अनुराग की , होती अमरत धार | तन -मन को शीतल लगे , ऐसी चले फुहार || 1001
दोहों में अनुराग से , कह दो कोई बात | सुनने बाले को लगे , मिली यहाँ सौगात ||1002
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
यत्र तत्र दोहे लिखे , जिनको लिया समेट | जुड़कर पांच हजार है , करता जन को भेट ||1003
दो हजार भी और है , जिनको रहा उतार | भेंट करूँगा शीघ्र ही , पाने सबका प्यार || 1004
किए समाहित " कुंड" में , दोहे एक हजार | शेष "बराई" "दीप "में , उनको किया शुमार ||1005
©® सुभाष सिंघई जतारा
🌹🌹~~~~~🌹🌹~~~~~~~🌹🌹
Comments
Post a Comment