https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें , बुंदेली बाँसुरी (बुंदेली दोहें )





मैया मोरी  शारदे ,  देती   रऔ.   प्रकाश |
इतइँ  लिखूँ दोहावली , नौनीं   रचूँ  'सुभाष' ||

लिखी "बराई" "बाँसुरी"  , "कुंड"  "दीप"  हैं  नाम |
दोहावली "सुभाष" से   , माँ   को  किया  प्रणाम  ||

हैं  माता  आशीष   से,     दोहे   पाँच    हजार ||
पाँच  खंड  जिसके बने ,    मानूँ   माँ  उपकार ||
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करम पुटैया  बाँदियौ  , पाप  पुन्य खौं देख |
ऊपर बारौ है तकत ,लिखत भाग्य कौ लेख || 

ग्यान पुटैया जो दिखा  करतइ है    बतकाव |
ऊकै  मन कै ताड़  लौ ,  पैलउँ कैसे   भाव ||

बँदी  पुटैया  देख कैं , सब जानत   हैं  माल |
खुली तकैं चुटयात सब, जैसे  भाजी  दाल  ||

बँदी    पुटैया    रात  खौं , दद्दा  चापैं  रात | 
बहुयैं ‌समझें चापचा , दिखत फिरै ललचात ||

कितउँ पुटैया दइ चपा ,डुकरा रत अब  यैड़ | 
लरका  बहुुयैं रात दिन  ,भर रय आकैं  पैड़‌ || 

जौन  पुटैया  ताड़ कैं  , भड़या   लै  गय  रात | 
डुकरा हँस कत पाव भर,  थी पीतर की धात   ||
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भरैं  गौंड़ बब्बा  उयै , जौन   घौलना  हौत |
बक्र देत सब बात खौं, जीखौ संकट भौत ||

लोक देवता जानियौ  , बुंदेलन  की शान |
कहत गौंड़ बब्बा उनै , सबइ देत सम्मान ||

बिगरत जीकै काज है , संकट मुड़िया छाय |
तबइँ गौंड़ बब्बा लिगाँ  , मानव दौरत जाय‌ ||

पूज गौंड़ बब्बा सबइँ , देत  उनै   है  होम | 
आके  जब बै कात है , सबकै हरसै रोम ||

सुनत गौंड़ बब्बा हतै , ग्यानी ताकत नूर |
इसीलिए बन देवता , मदद करत भरपूर ||
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गुनताड़ौ ना लग रयौ  , भयी  कितै  है चूक |
जौ चुनाव में हार कै,  बन गय आज उलूक || 

गुनताड़ौ भवँ    फैल है , रै   गय दाँत  निपौर | 
खाँ ना पायै हैं लुचँइ , मौं कौ  छिन गवँ कौर ||

गुनताड़ौ  सब रवँ धरौ  ,   सौच न पायै  काम |
सड़ गइ अमियाँ टौकरी , बिकी न कौनउँ दाम ||

एक   रुपट्टी  गाँठ में   ,   तीन   अठन्नी  चात |
गुनताड़ौ उनकौ अजब , फिरबैं  मुड़ी कुकात ||

गुनताड़ौ बै रय करत,   मानी   नइयाँ  बात | 
उतै  धमाकौ  हौ गयौ , लुट  पिट गई बरात || 

गुनताड़ौ  यैसौ  करौ , जौन सफल हौ  जाय | 
नाँतर हालत हौत ज्यौं , लौट गुलैदौ    खाय ||

गुनताड़ौ है  श्याम कौ ,  कर  मनहारिन  देह  |
पैराबै  चुरियाँ   चलौ ,  आज   राधिका  गेह || 
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लच्छन   सीखौ चार ठौ , भलै   बुरय  कौ ज्ञान | 
जगजगात  जीवन जियौ, सुमरत रवँ  भगवान ||

साजै लच्छन सीख लौ, दद्दा‌ जब-जब  कात |
उतइँ   मताई बोल दै  , लरका  अब्बल आत  || 

लच्छन  लरका  दैख  कै , जब दद्दा  चिल्लात | 
कात   मताई  सूदरौ  ,  गुन सबखौं   बतलात ||

दैत उरानों  लोग  जब , लच्छन  लयै  बिगार |
पकर   लबुदिया  पीठ  में , दद्दा   मारत चार || 

लच्छन साजै कै रईं  ,    सगया  घर  में  देख  | 
भलौ मताई  मन रयै  , कत  सुभाष यह लेख ||

लच्छन साजै है मिलत ,  जितै हौंंय शुभ संत |
घर बारै   खुश  हौत   हैं , चर्चा करत  दिगंत ||

हास्य दोहा - 

नौनें लच्छन दय बता   , बिन्नु  गयीं  ससुरार |
कयी काम की नंद  नैं  ,दयीं  कनपटी   चार || 🙏
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उदना   मौरी   राखियौ ,    रामलला   जू  लाज |
जिदना  तुमरै  धाम में    , अटकैं   मौरै   काज || 

उदना कै  लानै  करत ,  दान   पुन्य  उपकार |
जौन  दिना  जाने  हमे ,   छौड़  इतै    संसार ||

उदना   बीदत   गट्ट  है ,  हौतइ  काम  तमाम  |
राम भजन जौ छौड़ कैं , करतइ  खौटे  काम ||

उदना रावन जान गवँ , कटै जौन दिन शीष |
हैं  अब मौरे सामने , परम   पिता  जगदीश || 

धरौ रात  उदना  सबइ , जिदना आतइ  मौत |
सदा  अकेले  जात हैं ,  घर  बारै   सब   रौत ||

उदना की  उदना लगी , जौ भी यह सब कात | 
ऊकौ   कैबौ   भी उयै , दुरगति  खौं  लै जात || 
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अनमने (उदास ) 

मत बैठौ  तुम अनमने ,  मुड़िया  नँईं  कुकाव |
मुइयाँ  पै  आबै  खुशी , काम करन खौं जाव ||

कभउँ  न रहियौ अनमने , मुइयाँ  रखौ  प्रसन्न |
चार  जनन में   बैठ लौ , मन   हौजै  तब  टन्न || 

घट बढ़  हौतइ बात  है , हौत   अनमने  लोग | 
सामै   बारै  की  सुनत ,  मन में  पनपत रोग || 

काम देखकर  अनमने , हौत  आलसी भौत |
गट्ट   बिदी-सी जान कैं , मुड़िया धर कैं रौत || 

जौन चीज ना मिल सकै , दुख तब भारी हौत |
चैरा  सै हौ  अनमने , मन  सें   भी  सब रौत || 

लछमन खौं  शक्ती  लगी , भयै  अनमने  राम |
लाबै   बूटी  तब  मिलौ  , बजरंगी  खौं  काम || 
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*नाँय* (इधर)  

नाँय  माँय  ना   हैरियौ ,  करियौ  सामै  बात  | 
भैंस न छौरी काउँ  की,    काहै  मौं लटकात ||

नाँय तनिक तुम आइयौ , आकै साँच बताव |
माते   लुकै पियाँर  में , कारण तौ समझाव || 

नाँय  आत तुम हौ नँईं , और  न   देखत   हाल | 
फिर भी मसकत रात दिन , इतै सूक गवँ ताल || 

नाँय  माँय जौ है करत , और भिड़ातइ  बात  | 
ऐसै लोगन से बचौ , सइ "सुभाष" अब कात || 

कछू लोग  ऐसे तकै ,   नाँय  न पातर खाँय | 
झूठी खाबै खौ खड़ै  , माँय   हमै  दिखलाँय ||

नाँय  धरम चर्चा चलै , माँय   काय खौं  जात | 
और  उबाड़ै  काम सब , करबै की  तुम कात || 
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विषय - खटका
 (बुंदेली में खटका अनेक संदर्भों में प्रयोग होता है  ,कुछ  खटका प्रस्तुत करने का मात्र  प्रयास किया है )

बिजली कौ खटका जितै  , जब 'सुभाष' चट हौत | 
उजयारौ    हौ   बल्फ   से  , नौनों   लगतइ  भौत || 

अगर कितउँ गड़बड़ लगै , कातइ  खटका मौय | 
काम बनै या   जै   बिगर , सब   सौचत है  दौय ||

चूहन के खटका चलै , लालच  में  बै आत |
घी चुपरी  रोटी रखैं ,तब जल्दी  बिद जात | 

मन में खटका पैड़  दव , ऊनै  यैंगर   आन |
अपनौ काम  निकारबै , लोग करत  पैचान ||

खटका घालत हम हतै ,बचपन में  था  खेल | 
कंचा  भगै    इनाम  लौ , जैसे   दौरत   रेल || 
 खटका = (एक खेल था खटका, जिसमें स्प्रिंग खीचनें से कंचा चलता था व जिस खाने में रुकता था वह इनाम हम जीत जाते थे ) 

कोरी घर  खटका चलै ,  उन्ना   बुनतइ  जात | 
हिंदी में  सब  जानतइ    , हथकरघा  कैलात || 

खटका हैं  ई देश में , यह   नेतन  की जात | 
खुड़का दें  कीखौ कितै   , दैकें  गैरी   घात || 

टपका कौ खटका बुरवँ , रातै नींद न आत | 
कौन घरी  का   गट्ट  हो , चिंता  में जी रात || 
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नऔ (नया )

नऔ साल कौ सूर्य जौ , सबखौं  दैय  प्रकाश | 
भौत-भौत   शुभकामना , दैतइ इतै   "सुभाष" ||

नऔ साल चौबीस में , सजौ  अयौध्या  धाम | 
जन्म भूमि पै आ रयै ,  टैन्ट  छोड़‌  कै   राम || 

नऔ  साल  नौनों लगौ ,  पर   रइ  ठंड   अपार | 
अच्छी आसौ  हौ फसल ,करबैं   सबइ  विचार ||

नऔ  कछू जब   आत   है  , दैत   पुरानौ  डार  | 
या धरतइ  कुठिया जितै ,    ढ़ँग से उयै  समार  || 

नऔ   मिलौ   है पद  उनै , मस्त  रयैं दिन रात |
कानन में  ठेंठा  दयैं  , अब   नइँ  उनै    सुनात || 

दो हल्के हास्य दोहे- 🙏

नऔ जौन मुल्ला बनत, अधिक खात है प्याज | 
जैइ   कहावत  है   सुनी , अधिक दैत आबाज  || 

उनकौ भवँ है ब्याव अब , सौफा नऔ  मलंग |
मलकत   ऊपै बैठ   कै , घर   में   दयै  उचंग ||
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बुंदेली-गुलगुलो (मुलायम)

कम्बल हौबें गुलगुलो , भौत मजा  है‌ आत |
ठंडन में  जब औढ़ लै‌, भीतर   खूब ततात ||

मिदरा पकरौ हात से , लगत  गुलगुलो भौत |
बा़यौलौजी   जब  पढ़ी  , सीखी हमनै  रौत || 

मालपुआ रस से भरै , मन जब-जब ललचात |
मौं में लगतइ गुलगुलो , भौत मजै से खात ||

साँप लगत है गुलगुलो , जीनै  पकरौ  हौय |
सब डरात है  दूर से,  काँट  लैय ना   मौय‌ || 

मन रखि़यौ सब गुलगुलो , सुनत रात है ज्ञान |
चार जनै जब जित जुरै , दैयँ   ‌भौत  सम्मान || 

मन तो  हौबे  गुलगुलो ,   नीचट   रबै   शरीर | 
प्रभू  भजन में मन लगे , रये  न कौनउँ   पीर || 
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बुंदेली , विषय - कोते (बदले में / बजाय )

गइया   के कोते   मिली, बछिया गुचकू मोय | 
भइया   बाँटन में सदा ,  यैसौ ही  अब  होय ||

पिसिया कै कौते दई   , गुड़ की परिया येक  |
लेन देन यह   बानियाँ , करत गाँव  में  नेक ||

खेत   छुड़ा   सरकार नें ,   डारौ  उमदा   रोड़ |
कोते  में  पइसा    दयै  , दई जगाँ  कछु छोड़ ||

खेत  बड़े  खौं मिल गयै , कोते  हमै   मकान |
मजलौ चाँप दुकान खौं , बगरा   रवँ है  शान || 

दद्दा ‌कै  कोते  गये   ,जब  हम    येक  बरात |
टंटौ  भयौ   दहेज पै , चल गय मुक्का  लात || 

जितै आस  टूटन  लगै  , कोते  मिलें न  दाम |
मिलै लँगोटी भूत की  ,   लौ हाथन से  थाम ||
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 बुंदेली दोहे - विषय-  नँईं /नँइँ( नहीं)

नँईं  जितै सुनबै   मिलै , बँईं  हऔ हौ जात |
अफरै में भी  आदमी  , रसगुल्ला दो खात  || 

मौड़ा  कर  रवँ है नँईं , मानत   कितै  मताइ | 
लैकै  बिलिया दै चटा , शक्कर डरी   मलाइ || 

नयी बहू नँइँ -नँइँ करै , कछु ना  चानै  मौय |
रात बलम   से कात है , लै    दौ चूरा  दौय ||

नँइँ कातइ पर है मिलत, जीखौं   साजौ सार |
सैंत -मैंत तब माल खौं,   कौन ‌ करत इंकार || ?

नँईं  -नँईं  कत  राधिका , पर भीतर मुस्कात | 
फूला लयँ सिंगार खौ , किशना   खूब मनात || 

हाँ  कैकैं  फिर नँइँ कयी , बदली जितै जुबान |
साँसउँ   इज्जत  जानियौ , ऊकी  धूर ‌ समान || 
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-सला (सलाह)

आज सला मोरी सुनौ   , बिस्तर  बोरी   बाँद |
चलौ  अजुदया धाम  खौं  , नौनें   उन्ना  धाँद || 

सला सूद से काम हौं , सबइ   सफल  हौ  जात | 
इक्कर जौ भी निग चलै , उल्टी  मौं  की  खात || 

घरवारे  दैं जौ  सला ,     ऊपै    करौ  विचार | 
कमी  लगै कौनउँ  कितै , कर  लौ उतै सुधार ||

सला गोट बूड़ै  करैं  , कभउँ  फेल नँइँ  हौत | 
जौ भी उनकी मानतइ , नँईं  कछू   बै  खौत || 

लगुयारै  भी दैं सला , परत नँईं  सड़ स्वाद |
बिना विचारे जौ चलै, गौड़त घर  में  खाद || 

कछू जनन खौं रोग है , सला उपत कै दैत |
कौनउँ उल्टौ  दै धरै ,   नँईं  मुफ्त में  लैत || 

सला मिलै उल्टी जितै , उतै  छाँव ना लैव  |
हात जौर लौ दूर सें ,   मुसकी  भरकै  दैव || 
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 बुंदेली दोहे - नसेनी (सीढ़ी)

चढ़ौ नसेनी आप जू  , कर्तव्यन की हौय |
मंजिल पौंचें सब जनै , नैंचें ना रय कौय || 

नौनें राखौ  आचरण , रखौ  सँभल कै पाँव |
बनै नसेनी कर्म फल , सबखौं मिलबै ठाँव ||

जितै नसेनी हौ लचर , हिलगत  राबै यैन |
चढ़बौ तब  बेकार है , धच्च  गिरै से  ठैन || 

पंती कौ मौं दैख कै , दादी   भी    हरषात |
स्वर्ण नसेनी स्वर्ग की , घर में  उयै दिखात ||

मोक्ष   नसेनी कात है , प्रभु   वाणी खौं जैन |
जौ पढ़कै गुन लैत है , उयै मिलत सुख चैन || 
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बुंदेली दोहा दिवस ,  विषय - राम 

आज अजुदया में तकौ  , राम नाम की भोर  | 
रामलला जू   पौच रय , जनम भूमि के दोर || 

धाम अजुदया  हो गयौ  , अब  मंदिर निर्माण |
रामलला के  हो रहे , आज   प्रतिष्ठित  प्राण || 

साँसी सबकै राम है , सब  राखत विस्वास |
राम नाम से सब तरें ,मिलबै  उनै   उजास‌ ||

राम रटै  सब भुन्सरा , गुरिया    फेरत संत  | 
राम नाम के जप्य से,जीवन सुफल अनंत  ||

खटिया पै सै जब उठत , लेत राम जौ नाम |
ऊकै जीवन में कभउँ , हौत  नँईं  खटकाम ||

धरती उर आकाश में , तकौ राम कौ नाम |
यैसी पूजा देख कै , देत राम   निज  धाम || 

राम सबइ  कै है इतै  ,भलौ करत सब  राम | 
रामामय संसार जौ  , सौ  सब करौ  प्रणाम  ||

राम-राम जू पौचबै  , राम आज  हैं  हर्ष | 
राम कृपा सब पै रयै  ,राम सदा  हो दर्श ||

पूस सुदी बारस सजी , दिन नौनों रवँ  सोम |
राम लला जै हौ गई   , आगे  अब हरिओम ||   100
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बुंदेली-कुजाने (पता नहीं)

लोग कुजाने काय‌ खौं , चैंकत सुनकै  बात | 
खरी-खरी जब हौत हैं , थुतरी खौं लटकात || 

लोग- लुगाई जब लरैं   , हल्ला भौत  मचात |
बकत कुजाने  काँय थे,  दौनउँ  नँईं   बतात || 

लगुयारै जौ भी दिखें , पूछौं   तौ  सकुचाँय  |
कात कुजाने का पतौ ,अपनी मुड़ी कुकाँय || 

कौनउँ  आकै जब घरै ,   परत दौइ जब पाँव |
लगत कुजाने कौन सौ ,    खेलत हम पै दाँव ||

आय  कुजाने काय खौं ,  नाते    रिस्तेदार  | 
कै रय हौनें  फैसला , पंच   जौर  लौ  चार || 

इतै कुजाने आय तुम , धर    गुदनारी  रूप | 
राधा कै रइ कृष्ण से , तुम छलियन के भूप || 
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बुंदेली    विषय -ततोस (गुस्सा)

भैस न छौरी काउँ ने , फिर भी रखें ततोस |
मैर भरै से बोल रय , उनखौ   नइयाँ  हौस ||

हारे  जितै    चुनाव है , उन  गाँवन  से  रोष |
दिख रवँ खूब ततोस है , दै रय सबखौ दोष ||

है ततोस मन में उनै , कट गइ उनकी  बात | 
करैं  खुंश  में  मुंश है , चला   रयै  है  लात || 

सैनिक बर्दी पैन कै , राखत  खूब ततोस |
दुश्मन पर जै सामने  , कर  दैं बें  बेहोस‌ || 

हौय तनिक -सी बात तो , भरियौ नँईं ततोस |
गुनताड़ौ अच्छौ करौ , रखकै   अपनौ  हौस || 
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विषय - भन्नाने/भुन्नाने(क्रोधित)

भुन्नाने   नेता दिखे , नँईं    मिले  हैं ‌ वोट |
सबने हाँ जू बोल कै , झटक लयै थै नोट ||

भुन्नाने   बब्बा  परै ,   सादै  खूब   चिमाइ |
नँईं तमाकू काल से , मौं की तलफ दबाइ  || 

भुन्नाने लरका बहू ,   रयँ हैं  गटा  निकार  |
फटफटिया लैने  अबइ , दद्दा दो कलदार ||

भुन्नाने पंडित  दिखै , दई  कथा  जब बाँच | 
दो घंटा मैनत  करी , नोट  मिले है    पाँच ||

भुन्नाने  अब साव है , ताव पकर रयँ आज |
मूर पचा रमुआ गयौ , टका न दवँ है ब्याज ||

भुन्नाने  बैठे    पिया , भुन्सारे    से        दोर |
बात समझ ना आ रई ,  गोरी  करे    निहोर  || 

सुभाष सिंघई 
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बुंदेली- बुरव (बुरा)

बुरव भलौ सब हौत है , पर जाऔ सब झेल |
करम सबइ के खेलतइ , रैचकुआ से   खेल ||

लगतइ सबखौं  है बुरव , दैखत जब यै हाल |
अगर  कुवाँ के   घाट पै ,  पानी  पीबै  ताल || 

साजौ लगतइ है बुरव, खता जात जब फूट |
यैसइ  सौचत धान है  ,  चाँउर  निकरैं कूट ||

बुरव   मानतइ   लोग   हैं, पसर  गैल में  जात | 
मन की धन जब हौय ना , थुतरी खौं बिचकात | 

बुरव आदमी  पुज रऔ , भलौ  दिखत  लाचार | 
कत "सुभाष " बों थान है  , जी खौं कत संसार || 

चउँवर  मौं  जीकौ चलत , रखतइ बुरय ‌विचार |
बैइ  चुनावन में     बनै   , मूँछन    के   सरदार || 
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बुंदेली विषय‌,,- लुगया ,(महिलाओं के साथ बैठने वाला पुरुष )

लुगया की अब काँ कयै , बातें   यैसी  कात | 
चार जजन के बीच में , कंडी-सो उतरात ||

लुगया खौ जब हौ समय , चार लुगाईं देख | 
उनमें जाकैं बैठतइ , बनत उनइँ  की  रेख || 

बात  पचा ना पात है , जौ भी लुगया हौय |
दुतापनी कै  काम में , माहिर  जानौ  औय || 

लुगया जौ भी हौत है , हौ   मरदेलू   काम | 
गुड़या कै   रै जात  है , हालौ हिलै न चाम ||

लुगया घर के काम में , चिपटे देखे   जात |
झाडू  पौंछा सब करै , टउँका करैं बिलात ||

लुगया की जो बात में , आकर कै फँस जात | 
कारज में  शंका   रयै ,   खट्टौ भी  बौ   खात || 

सुभाष सिंघई
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बुंदेली विषय - दुता ( चुगलखोर ) 

चुखरयाइ  करतइ दुता , लबरयाट कत बात | 
औसर   पै   चूकैं  नँईं,   करैं  पिठइयाँ घात || 

बात पचा  ना पात है , गुड़गुड़ पेट पिरात |
मन की धन करकै दुता , पाछै सेै मुस्कात ||

दुता न ठैरत  इक जगाँ , हर चौखट पै जात |
एक ठौल में चार ठौ , मिला -मिला कैं कात || 

राज ओरछा के दुता , भर  दय कान जुझार |
बिष मिल गवँ हरदौल खौं , रानी रइँ लाचार || 

दुता जितै जुर जात हैं , गप्पै  मारत  हूँक |
हौत खुपड़ मंजन उतै , कान दैत हैं  फूँक ||

ऊँट बिलैया लै गई , करतइ  दुता  कमाल |
करै झूठ खौं साँच वह , जीसैं  हौत बबाल ||

सुभाष सिंघई
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दोहे , बुंदेली विषय‌ -फँदकत ( रूठना)

फँदकत जो हर बात में ,  कित्तउँ   उयै   मनाव |
मिदरा -सो उचकत रयै ,   भौतइ   खाबै  भाव ||

फँदकत मिथला आ गयै , ऋषिवर परशूराम |
राम सुनै खौटीं  खरीं , फिर  भी करैं  प्रणाम ||

फँदकत फूफा व्याव में , कौनउँ  नँई  मनात | 
फुआ खचौरत बाद में , मड़वा   में लै ‌ आत ||

घरवारी फँदकत घरै , कात   बैन कौ व्याव |
नई धुतिया गोटा लगी , गदिया पै ही  लाव ||

हम 'सुभाष' फँदकत लिखैं , विषय कितै से लाय |
गंठयान  सी लग  रयी , फिर  भी‌   लिखवें  आय ||

फिरबैं  फँदकत  फूलकैं ,  फुकना बनै  दिखात  |
फुआ फुसक मड़वाँ तरैं  , फूफा  खौं  तुचकात ||

सुभाष सिंघई 
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विषय - गत (हालत ) 

गत गंगा उनकी तकी   ,   कीखौं   अब बतलाँय  |
फँसी घिची में डोर है    , कितउँ न अब जा पाँय ||

कउँ गत यैसी हौत  है  , घलत   कुलैया    पाँव |
चुखरयाइ  औदीं परत , कितउँ मिलत ना छाँव ||

गत में   देखी  है   कुगत , उलटी  हौतइ  चाल |
जौ भी नियत खराब कर, हड़पत सबको माल || 

गत 'सुभाष' बिगरै जितै , हौत  कुगत  भी खूब |
पल-पल मरतइ  आदमी , लाज शरम  से डूब ||

अपनी गत साजी लगै , यदि  नियत रत साफ | 
जितै बिगारी है तनिक , हाथ  लगत तब राख ||

गत   भी  मिलबे  देखबें ,  परै  खाट पै राँय |
समय बुढा़पै कौ रयै ,   रोटी  खौं  चिल्लाँय || 

सुभाष सिंघई 
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बुंदेली विषय - ठेलवौ (धक्का देना)

देख लऔ  है ठेलवौ  , कछू न निकरौ सार | 
बीदे  रय   बेकार   में ,   खाई  उल्टी  खार ||

जनता देखत ठेलवौ, नेतन   की   हिलगंट | 
भूखन मरत मजूर है , चमचा    घूमत  चंट || 

सीखौ जिनने   ठेलवौ  , भूले  रत  भगवान | 
खाज खुजा बै  घूमतइ , नईं राखत  पैचान || 

जौ सीखत है ठेलवौ  , कभउँ न पायै ‌सीख |
म्यारी मूड़ा ना बँदै  , माँगत  जग में   भीख || 

जौ जानत है  ठेलवौ  , उनकी  देखत  नीत | 
परसत लुचइँ न सामने  , आगें  दैतइ  प्रीत || 

नँईं  सीखयौ ठेलवौ    , बूड़े    बुजरक कात | 
आ जायै जो सामने ,   करौ  काम   मुस्कात ||

सुभाष सिंघई
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विषय - फदाली

दंद   फंद   सूझत  जियै ,  उयै ‌ फदाली‌‌  कात | 
जौ भी   बातन  में   फँसै  , खट्टौ  सूदौ   खात || 

जियै फदाली कात सब , करत   नँई   विश्वास | 
सुनकै देत   निकार  हैं , अपने  कान "सुभाष" || 

फाँका   फूँकी  कान में , चुगलन के भी  काम | 
करत   फदाली  खूब  है ,   भुन्सारे   से  शाम ||

छोटो   बड़़ौ   बतात है   , हौवें  कौनउँ  काम |
करत फदाली‌ यैब  है , सुबह   दुुपरिया शाम ||

मौं  से  मिठबोला रहत ,  रखें  कपट के  भाव |
नँई फदाली है   रखत , सँई ‌  सुनने  कौ  चाव ||

मिलत फदाली हर जगाँ,  मसकत गप्पें  चार |
बातें   महुआ  छेवला, जीमें   दिखे  न   सार ||
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विषय - खुद्दरौ 

यैबी‌‌   लैतइ   खुद्दरौ  ,   ठाड़ै   बैठे     आन |
आगी-सी परचात है , निजी    बगारत शान ||

भारत से   लै   खुद्दरौ  , जब भी पाकिस्तान |
घलतइ झापड़ गाल पै , परतइ लाल निशान || 

रावन नें   लवँ  खुद्दरौ ,   हरी   जानकी   माइ | 
कुल कौ हौ गवँ नाश तब, आ गइ याद मताइ || 

रचौ कंस   ने  खुद्दरौ , किशन  मारबें    यैन |
अरौ बीद गवँ तब  गरै , खुद की  हौ गइ ठैन ||

कालनेमि   नें   खुद्दरौ , रोपौ  आकै   आन |
दई गदा तब पीठ में ,   चीन   गयै  हनुमान ||

बररइ़या   से   खुद्दरौ  , जौ भी  आकै लेत |
बदले  में मौ सूजतइ‌  , डंक मुलक बा देत ||
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बुंदेली विषय - बीदे (फँसे) 

माते कै  हाते  लगत , जब भी   ठलुआचंद |
फँसा देत बै  काम में   , बीदे  रत   है   दंद ||

पाँउन में बीदे  गुथे   , घुँघरू बज-बज जात |
धुन पै नचते सब जनै,   मस्ती  में   मुस्कात ||

जौ हौतइ  हैं  आलसी , लैतइ   रात डकार |
बीदे रत सब खाज में, बैठ कुका   कैं द्वार || 

नौनीं  संगत जौन की , ऊकै  साजै  काम | 
बीदे पै हल्ला करें  ,      उनै‌‌  ‌नँई   आराम  ||

बीदे  बारे  आत है , सला   लैन भी   चार‌  |
जीकी बातन से नँईं  , निकरै कौनउँ  सार ||

बीदे  काम   निनौर  दै  , जग में   जौ   इंसान  |
ऊखौ  जानो  सब जनै , धरती‌  कौ   भगवान || 
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बेथा ( हथेली में अंगूठे से लेकर छिंगरी तक का फैलाव  ) 

धरौ तनिक सौ चेंपला , ऊँची करतइ बात |
बेथा भर कै पाँव से  , फटकारत है   लात ||

तनिक लाभ जित है दिखत , पौंचत लोग करीब |
बेथा भर तक   डार दें    ,   सबरै   अपनी  जीब ||

बेथा भर की डोर खौ , लोग  बता  दैं   साँप | 
तीर   धनैया कन लगै  ,  छत्ता की  ले काँप || 

बेथा  भर  कै पौध खौ , लबरा   कैं   दैं   झाड़‌ | 
धजी बना दें  साँप वह   , कर दें तिल को ताड़ ||

बेथा भर की कानिया , ड़ेड़  हाथ जब हौत | 
मजा लैत सब  गाँव है , बीदौ   बारौ    रौत ||

बेथा भर की बात खौं ,   जौ उँगरी से कात | 
स्यानौ कैतइ सब जनै , इज्जत भी बौ पात ||

आधी बेथा जीभ ने , कर  दवँ   भौत  कमाल |
कैं कै  भीतर  घुस गई , गुदवा दइ तन खाल || 

सुभाष सिंघई 
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विषय - कूत {संज्ञान ) 

कूत खाँड़़‌ जिनखौं नँईं , गुनिया बन  कै आत |
चार जनन  के बीच में , हुसयारी    दिखलात || 

मंत्र तंत्र जानत नँईं , नइयाँ   जिनखौ   कूत | 
बै अब बन कैं घोलना, भर - भर दैयँ भभूत ||

बै टकरा गय जौन से , परगवँ  सबरो  कूत | 
टूट  गयौ  है  चामरौ , अच्छौ दवँ जब खूत || 

कूत अबइँ  अब पर गयौ , कर्री बिद गइ गट्ट |
खड़ै तमासौ  दैख   रय , लोग  लगा  कै ठट्ट || 

लंका जलकै खाक है , पर गवँ सबखौ  कूत | 
आयै श्री  बजरंग जू   , इतै    राम   कै  दूत ||

बिना कूत ना डारियौ , कितउँ कभउँ  भी हात |
कर्री  बीदत गाँस है   ,   निपटानै   खुद  आत ||
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विषय- टोंचना 

मौं पै मारो   टोंचना  ,गये  भूल    उपकार  | 
खुलबायीं ती  हतकड़ी  ,  पुटया  थानेदार ||

अखर जात  है  टोंचना , जौ  सूदौ   दै आन |
बौ भी सबके सामनें  , जता- जता अहसान || 

नेकी करके डाल दो , कात  सयाने लोग | 
सूदौ  मौं पै    टोंचना ,   चूले  दैबे   जोग ||

नँईं  टोंचना हौंं सहन ,  चुभतइ   जैसे   तीर | 
पर उपकारी कौ बजन , सैत रात  सब  पीर || 

टौरत मन  खौं खूब हैं  , मित्र   टोंचना  देंय | 
पर मजबूरी रात सौ , उनखौ भी  सिर लेंय || 
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बुंदेली - टेसू ( पलाश )

गोरी  ऐसी   रामधइ    , जैसे    टेसू   फूल | 
बारन की लट गाल पै , नागिन -सी रइ झूल || 

टेसू घुर गवँ नाँद   में , रंग  नीचट है लाल |
गोरी हुरयारी बनी , कर रइ आज कमाल ||

गिरत आँग पै धार है , टेसू   बन   गय   रंग | 
कुछ  खुश्बू- सी आत है , मन में भरत उमंग ||

खेतन से सरसौं   हँसै , टेसू   पेड़न  लाल |
गोरी   दोड़े गैल  में  , आँखन करै सबाल ||

गोरी भी  अब लाल है , खूब भिड़ाने गाल |
टेसू के फूला घुरै , कर   रय आज कमाल ||

कहें श्याम भौंरा बने , खोज रहा मकरंद  |
फगुआ टेसू   रंग की , राधा  मुझे  पसंद ||
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बुंदेली विषय - फगुवारे / फगुवारी

राधा    फगवारी   बनी , फगवारे  हैं  श्याम |
दौइ भिड़ाने घूम रय ,  इक दूजै खौं  थाम  || 

फगवारी रइ भींज है , फगवारे    के   संग |
राधा- मोहन खेल रय ,धन्य आज सब रंग || 

फगवारी राधा बनी   , जब मोहन के साथ |
न्योरे  भोला ब्रम्ह जू  , झुका गयै  हैं माथ || 

फगवारी थी राधिका , मुस्का गय तब श्याम |
फगवारे बन  आ  गयै , बरसानें   शुभ ग्राम  || 

फगवारी सब गोपियाँ , ढूँड़ रयी  नदलाल |
नदी कुंज  में घूमती , कछू  देखती  ताल ||

फगवारी ये  जिंदगी , जाकै   रंग  अनेक |
फगवारे  सब कर्म है , मिलत एक से एक ||200

सुभाष सिंघई जतारा 
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हिंदी दिवस  - ठिठोली

आज ठिठोली  है कहाँ  ,  मिलें  पूछते   लोग |
आपस की तकरार के , उदित दिखें अब रोग ||

कहाँ गए वह दिन यहाँ , करिए जरा विचार | 
जहाँ ठिठोली रस भरी , बिखराती थी प्यार || 

कभी ठिठोली ने  यहाँ , देखे    हैं  संग्राम |
देखा है  इतिहास में  , भीषण थे  अंजाम  || 

जहाँ  ठिठोली रस भरी , अर्थ गलत  संज्ञान |
भरी हृदय में  सालती , बदला  दे   प्रतिदान ||

करें ठिठोली सालियाँ , जीजा जू  के  कान | 
जीजी रखती दूर  हैं  , दें अपनी    मुस्कान ||
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पैलाँ / पैलें  = प्रथम

पैलाँ पुजत गनेश जू ,  ,हौबे जब शुभ काज |
श्रीफल कलशा मेंं  थपै , उनकौ  पूरौ   राज || 

घर के  आगैं लोग भी , पैलाँ  नीम लगात |
बैद   कात हैं ऊ  घरै , रोग न कौनउँ आत‌  || 

करतइ  पैलाँ  छायरौ , तपन  परत जब यैन |
सुसताबै जौ आत है , मिलत उयै  सुक चैन ||

ढबुआ  पैलाँ  तानतइ ,  रखबारी    के  हेत |
कत किसान मौखौं उतै,  खूब   छायरौ   देत ||

नातेदारी  में  पुजैं  ,   समदी      पैलाँ   पैल |
फिर भी   गटा  तरेरतइ , जैसे  मरका   बैल ||

ससुरारै   जब जात  हैं   ,पैलाँ     सारी  आत |
जिज्जी ठाड़ी  पौर में  , आँखन   से बतयात  || 

परकम्मा  दइ भाव से  , शिव गौरा खौं घेर |
पैलाँ पूजै  गनेश  जू  , सबरै  रै  गय‌ ‌  हेर || 
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बुंदेली  विषय - बेर -बेर (बार-बार)

बेर- बेर ढूँकत   गली ,   बीने    बेर   नबेर |
शबरी कत प्रभु आइयै , करो न कोनउँ देर ||

बेर- बेर श्री राम कौ , रट रइ शबरी नाम |
बीन बेर जौरे रखें , कत है  हौ  गइ शाम ||

रखती    बेर  नबेर  है , शबरी  जौरें  ढ़ेर | 
बेर-बेर   रटना  रटै ,   करौ राम नँइँ देर || 

बेर-बेर का जन्म जौ  , मिट जाए  इस बेर |
भोग बेर कौ हाथ लयँ , शबरी  करती  हेर || 

बेर-बेर भी ताक रय , शबरी खौ श्री राम |
कै रय अब ई बेर में  , जाओ   मोरे धाम ||

लखन सिया श्री राम जू  , बेर - बेर  मुस्काँय |
शबरी   जूठै  बेर दे , फिर  भी खातइ  जाँय ||
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अलुआ ठलुआ जब जुरै , मसकत    बातें चार |
ओर छोर सड़ स्वाद की , मिलत कितउँ ना धार ||

बात सार की ना करैं , अलुआ ठलुआ हौंय |
मुड़ी पकर माथौ रगड़ , सबरै  बैठै      रौंय ||

अलुआ ठलुआ हात दैं , काम बिगर भी जात |
कत सुभाष सब रायतौ , बै  मिलकै  बगरात ||

अलुआ ठलुआ है फिरत , मूड़   जौरिया  बाँद |
गलती खौ साँसी कहत  , अपनी-अपनी  धाँद  ||

अलुआ ठलुआ खौजबौं , सब लौगन खौ आत  |
घूमत मिल जै हर   गली , रौथ   तमाकू   खात  ||

जब तब भी आबड़‌ बिदै , अलुआ ठलुआ लोग |
टारौ  अपनै     हात ‌से ,  जानौ  उनखौ   रोग  ||

किचड़ पिचिड़ जौ हैं करत , आकैं खातइ प्रान |
उनसे   सब  उकतात है , दैत न   उनपै  ध्यान ||

अलुआ ठलुआ की सुनौ , लगबै  यह  तासीर |
बगदर सै   भिन्नात  है , रखै न   मन   में धीर ||

बुझी आग उसकार दै , अलुआ ठलुआ आन |
समझौ इनकी जात कौ , जानौ  जौइ निशान ||

अलुआ ठलुआ  गौंच से , जियै चिपक है जात |
कौलत    उनकै  काम खौ , खूबइ मजा  उड़ात ||

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विषय - खलती (जेब)

खलती में पइसा धरै , भड़या लैतइ ताड़ |
पाछै लग कै लूट लै , काड़े लगा  जुगाड़‌  ||

खलती जी   की है भरी , दैत  मूँछ पै ताव |
चार जनै आकै झुकै ,   दैत  प्रेम सै  भाव ||

खलती में भरकै  कछू , बिड़ी तमाकू लोंग |
दिलदारी से बाँटतइ , करतइ  रुतबा  ढ़ोंग ||

खलती ईसुर खौल कै , उयै  दैत है  मोज |
दया प्रेम जौ  बाँटकै , पूजा   करतइ रोज ||

खलती ऊकी रत भरी‌, मिलत खूब  सम्मान |
लोकतंत्र   कै नाम    जौ , लूटत  हिंदुस्तान ||

खलती खाली दैख कै , पत्नी भी खिसयात |
ठलुआ  बँद गवँ भाग्य सै ,दौरे   में चिल्लात ||🙏😉

भइया   खलती  राखियौ , भरी  ज्ञान से हौय |
दया धर्म करुणा रयै ,  आन   टटौलै    कौय ||

खलती  में पइ़सा रखौ  , बखत परै में काम |
नईं  चपा इनखौ रखौ  , बनियौ     दाताराम ||

खलती घर परिवार में , भरी    सबइ की हौय |
ईसुर से भी है  विनय , कौउ न उस बिन रौय ||

खलती खाली हौय तौ ,  सबखौं  शंका  रात |
विपदा कौनउँ जब गिरै , कौन समारन आत ||

लापरवाही  हौ  जितै ,खलती तब कट जात |
सबरै   रौतइ  बैठ कै , अपनी मुड़ी  कुकात ||
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बुंदेली विषय - चुरियाँ

चुरियाँ बैचन खौ चलै , बृज गलियन में श्याम |
चीन गई तब राधिका , हँस   कै   पूछत  दाम ||

चुरियाँ बृज में बिक रयीं  , नीलीं  पीरी  लाल |
सब चटकीलीं लयँ फिरैं ,  चटकीले   गौपाल ||

चुरियाँ  राधा   पैरती , पैरा   रय   है  श्याम |
दृश्य मनोहर दैख कै ,  उजली हौ गइ शाम ||

इकटक राधा  ताकरइ ,      यैसइ   हैं गौपाल  |
फँसीं  हात   चुरियाँ   कयै , पैरा  दो  नदलाल  ||

चुरियाँ   पैरै  राधिका , फिर  मुख देखे श्याम |
जीभ चिढ़ा   ठेंगा  दिखा  , काती नइयाँ दाम ||

उठा-उठा  कै  गौपियाँ ,    चुरियाँ    रयीं थथोल |
कत 'सुभाष' अनुपम कथा, जीकौ कौइ न मोल ||

चुरियाँ   खनकत हात में , बजै   पैजना पाँव |
करदौनी  कम्मर   धँदी   , गोरी    घूमै    गाँव ||

बन्न - बन्न की   है मिलत ,  चुरियाँ  लैबै  जाव |
मन खौं जब नौनी लगत ,  हौत न उनकौ भाव ||

कथा   सुनी है  श्याम की , गय‌ राधा के  दोर |
उमदा   चुरियाँ    प्रेम  से ,  पैरा  आयै  भोर ||

चुरियाँ  पैरै  जब  धना , करबै  खूब   निहार |
खनकै पर चटकै  नँईं , सुंदर   हौत विचार ||

पैरै  प्रीतम नाम की ,  धना  भौत    मुस्कात |
चार जनन के  बीच में , चुरियाँ बजा  बुलात ||

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बुंदेली विषय - उँगइयाँ 

जितै उँगइयाँ हौं अलग, बिखर जात सब नाज |
फूट जितै  भी है मिलत, हौत   न   साजै काज ||

तकौ  उँगइया तुम तनिक , सब में  पौरें  तीन | 
झुककर करती काम है , फिर भी लगे न दीन ||

मुड़ै उँगइयाँ चार जब  , और  अँगूठा  सेठ | 
ठूसा बनकैं ठौक दै , दुश्मन  हो  यदि  हेठ || 

सदा  उँगइयाँ  हात   की  , राती  हैं  सम्पन्न |
पकरैं रहती काम खौं , घर  में  भरती  अन्न ||

बढ़ें उँगइया   हात   में    , बौ छिंगा  कैलात |
चतुर हौत   बौ  आदमी , पंडित जू जा कात ||

नँईं उँगइयाँ एक -सी ,    पर राती सब एक |
मिल जुरकै ही काम खौं , कर लेती हैं नेक ||
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विषय - चैतुआ 

चैत मास में चैतुआ , बनकै सबइ किसान |
पिसी काट हरसात हैं ,देख भरे खलिहान ||

बनकै कछू  मजूर भी , चैत काटबै जात |
कैलातइ   बे चैतुआ , परदेशे  जब आत  ||

जातइ  बनकै चैतुआ ,    संगै लय    परिवार |
काटें   पिसी किसान की ,  टैं हँसिया की धार ||

मैनत करतइ चैतुआ , जुड़ै भिड़ै दिन रात |
साल भरै कै नाज ‌के , बौरा भर -भर लात ||

रयैं  मेंड़ पै   चैतुआ , संगै  लय    परिवार |
परदेशी  कौ रूप धर , मैनत  करत अपार  ||

बैसे हम   सब  चैतुआ , धरती पै  कैलाँय |
पाप पुन्य काटै इतै , फिर ऊपर घर जाँय || 
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बुंदेली दोहें ,_चिनार =पहचान 

जब चिनार अच्छी बनै , तबइँ  करौ  विश्वास |
वर्ना  ऊसै  दूर  रवँ ,   हौबे   कितनउँ   खास ||

मतलब  अपनौ  गाँठबें , आकैं   करै  चिनार  |
सात कदम  दूरी रखौ , पक्कौ  करौ   विचार ||

लग्गा के तग्गा कभउँ , काढ़त  खूब  चिनार |
अपनौ काम सटाय कै , हैरत   एक  न वार ||

मिलत कभउँ परदेश में , गाँव  पुरा के   यार |
काम बड़े बै आत हैं  ,    हौबे   अगर  चिनार  || 

लोग कछू  कै   देत  है   , मौरी  नँईं   चिनार  |
कैसे कर दें काम हम , कर लौ तुमइँ  विचार ||

भलौ लगै जब आदमी   , ऊसैं  करौ  चिनार |
आड़ौ  आबै  जब  समय , ठाँड़ौ    राबै  द्वार ||
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बुंदेली विषय - पुसात ( पसंद )

दोंदा  यैड़ा   आदमी , बिल्कुल   नँईं    पुसात |
चरबदयायौ  जै करें  , मूड़़   अलग  से  खात || 

जौन   घिनापन   सै  रयैं ,  लेंगर  नँईं  पुसात |
सपरत  नइयाँ ठीक सै , बैठे  अलग  बसात ||

मूरा   के   सँगे   दही , जौ   भी  मानव  खात |
जहर बनत तब जानियौ , तन खौ नँईं  पुसात ||

सूपनखा कत राम से , मौखौ  अपुन  पुसात |
व्याय करावें आ गई ,   वरमाला  लयँ   हात ||

नेता छरकत राम सुन , वें  नँँइँ  हमें   पुसात |
निशाचरी  हम मानतइ , ‌यह सुभाष ‌है  कात ||

झूँठे  झंझट जौ करे ,  टंटौ    करत  बिलात  |
बगरातइ जौ रायतौ , कीखौं  आज  पुसात ||
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तूँ- तूँ रमतूला बजौ  , चारउँ   भइया  राम |
दूला बन रथ पै चढ़े, , चले जनक के धाम ||

दूला   के   आगें  बजै ,  जब रमतूला  तान |
गाँव भरै के लोग जुर , दैत   औइ  पै ध्यान || 

तूँ- तूँ   रमतूला  बजै , चलत हवा  में    नाद |
चालू    हुई  बरात  है , करत सबइ जन याद ||

पोलो रमतूला  रयै , गुड़ी  तनिक भी लेत |
फूँके  से तूँ तूँ   करै ,  सुर भी लामौ   देत ||

कत रमतूला काज में , सुन लौ अब  यह बात |
मोरी यह आबाज.  भी , रयै    सगुन   सौगात ||

पंगत में परसा भयौ    , कत रमतूला   तान |
भोजन करने सब जुटौ , मौं  पै रख  मुस्कान ||

है रमतूला कुछ अलग , टेड़़े  मौं  की   छाप |
ऊपर  से  तूँ - तूँ  करै ,  नँईं   बोलता   आप ||

ऐंड़ा - टैंड़ा आदमी , खुद भोरौ बतलायँ |
रमतूला -से   सूदरे , सब  मौं पै कैं आयँ ||
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विषय - चपिया

चपिया में माखन धरौ , श्याम लियौ है ताड़ |
बना लई तब लूटबै , अपनी‌   उतै   जुगाड़ ||

चपिया मुड़िया पै धरै  , निगती ग्वालन खेत |
रौक उनै मोहन कहैं, क्या हमखौं दधि देत ||?

चपिया अपनी चाँप कै , ग्वालिन रहे सचेत |
फिर भी पुटया  लें उसे  , मोहन  मुस्की देत ||

चपिया दधि से हो भरी, कर लें श्याम चिनार |
ग्वाले   सबरै  जौर कै   ,  लैबैं   उयै    उतार || 

चपिया राधा की सजी , दवँ   है रँग खौं डार |
छीनी जब श्रीकृष्ण नें , रँग गवँ तुरत लिलार ||

मटकी चपिया फोर कै , लीला  करें गुपाल |
ब्रम्हा हरिहर हँस कहै , धन्य आप नदलाल ||
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नदारौ ( निर्वाह )

नँईं नदारौ जब करे , दिवरानी   को  ढ़ंग |
न्यारी रोटी  दो बनन , काँतक राखौ संग ||

नंद नदारौ झेलबौ    , है  मुश्किल की बात |
रौत भुजाई रात दिन  , सास नँई समझात ||

नँईं नदारौ हौत है    , इकतरफा झुक जाँय |
चार ठौल  बातें  सुनै , लात अलग से खाँय ||

बउँ धन जब से आइ है ,  नँई नदारौ  गेह |
लरबै ठाँड़ी सास लौ , फरकत  ऊँकी देह ||

नँईं नदारौ हौ सकौ , घली    पीठ   पै  लात |
भगै विभीसन राम लौ , रावन की सह घात |

राम नदारौ हम रखें  , तनिक राखियौ आप |
चरनन की धूरा  मिलै, मिटवै भव  कौ ताप  ||
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बखेड़ा = झगड़ा करना 

भौत बखेड़ा हो गया , तनिक गम्म अब खाव |
खींचा तानी मत करौ ,  छोड़   दैव   बतकाव ||

करत   बखेड़ा जौन हैं , उनसे  रवँ सब दूर |
बररइयाँ   नँइँ   मानतइ , रयै  काटबै   शूर  ||

हड्डी थौरी  भी दिखै ‌, करत बखेड़ा  श्वान |
टूटत ऊपै  गिद्द से , रत   "सुभाष"  हैरान || 300

जौन  बखेड़ा चात है , भर दैतइ है  कान |
चुगला सबरै देख लौ   , दैत बात हैं तान ||

जौन लडन्कू नारि हौ ,  चार  हाथ रवँ दूर |
करै बखेड़ा  ब्याज में  , पतौ चलै नँइँ मूर ||

लै जौरा की  फौज से , हौत    बखेड़ा  खूब |
फसल मिलै नँइँ काटबें, कुचरत है वस दूब ||

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-सोमवार- (बुंदेली) -डटकै (जमकर)

डटकै खड़े जवान हैं ,    सीमा पै दिन रात |
भारत की रक्छा करत, वंदे  मातरम् गात ||

डटकै खड़े किसान हैं , तकैं खेत खलिहान |
नाज उगा दे रय हमें ,   दाता   अन्न सुजान ||

डटकै करत पढाइ हैं , जब  लरका दिन रात |
ज्ञानवान वह हैं बनत , सबसे   इज्जत पात ||

चार  दिना  हों व्याय कै , डटकै हौतइ  काम |
गिनत नहीं  दिन रात है , तकत न छाया घाम ||

डटकै पंगत खा गयै , लडुआ दयँ फटकार |
लय लोटा अब जा रहे ,  समदी खेतन हार ||🥰🙏

सुभाष सिंघई



बुंदेली - सुड़ी  (इल्ली)

खाने के सामान में , कुछ दिन  दैख न  पाँय |
परत औइ में जब सुड़ी , छान -छान मर जाँय ||

सुड़ी  एक से   सौ  बनें ,   बढ़कै  हौंय  हजार |
इनखौं   देती  नारियाँ   ,  सूपा   की  फटकार  ||

आटा मैदा चीकनों ,   पिसौ धरौ  हो  नाज |
हवा और पानी लगै , दिखै  सुड़ी कौ  राज ||

अकल अजीरन है जितै  , सुड़ी पिड़ी लो जान |
नँइँ  निकरत है बायरै ,  है "सुभाष"  खौं  ज्ञान || 

राजनीति में अब सुड़ी , सबखौं मुलक दिखात |
चमचा  जिनखौं कात हैं     , टाँड़ी   से उतरात ||
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विषय -पखा {दाड़ी के लम्बे बाल )

पखा रखा  लयँ खूब  है ,बन गय है हुश्यार |
मूँछें   अपनी  सूँट कैं   ,करें   नुकीली धार ||

सार हीन   लगबैं   पखा , रखबाई  - सी हौत |
जिनै समारत रवँ सदा , समय भौत भी खौत ||

अपनौ -अपनौ शौंक है ,पखा मानतइ  शान |
टुनया दो थौरो जितै ,  मिलन लगत  है ज्ञान ||

ठलुबाई के शौंक जै , जीखौ जब लग जायँ |
ऊँछत कंघा से पखा, बिखर - बिखर वें आ़यँ ||

डु करा भी  रखकै पखा , बना   लैत  पैचान | 
माला गुरिया डार   कै , भजत रात भगवान ||

पखा रखा कै देख लय , साँसी कात सुभाष |
खुजा - खुजा हैरान रयँ , लगी हमै ती  घास ||
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पलका 

चंदन को पलका बनौ , बिछौ अटरिया आन |
नौनों सब अब कै रई ,  गोरी   की   मुस्कान ||

पलका दयौ  ब्याय में ,  अच्छौ  दान दहेज |
दद्दा भी खुश हौत है , अपनी बिटिया भेज ||

पलका जब से आव है , गोरी   रइ     इठलाय |
बिछौ गुलगुलो सब लगत , हँसकैं खूब सुनाय ||

ठलुआ बालम जौन घर ,  पलका पौड़ै  रात  |
अचै -अचै  कै खात हैं  , परै-  परै  मुस्कात  || 

पलका कौ मड़वा  तरै    , नेग  ब्याय में हौत  | 
पखरइ करत नतैत है  , आनंदी  हो   भौत || 

परै  खाट कथरी   बिछा , रगड़त  नाक लिलार |
अब पलका पै  रय मलक , गुन गा रय ससुरार ||
छला ( सादा अँगूठी ) 

खूब नुगरियन में छला , डारत धना  किसान |
यह गाँवन की  नारियाँ , रखती मुख मुस्कान ||

सोने चाँदी के  छला , जब   भी   गढ़े सुनार |
सोचत यह   शृंगार  में , लगत भौत मनुहार ||

अष्टधातु के अब छला , बने   बनायै  आत |
जिनै पैर कै लोग भी , अपने   पौर सजात ||

पंडित जोशी   वैद  भी , अपनौ  ज्ञान   बतात |
कौन नुगरिया में छला , कीखौ   कितै  सुहात ||

डरत कान   में   है  छला , जब हौतइ है रोग |
वैद कात नस है दबत , लोग   मानतइ  योग ||
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बुंदेली दोहा  - किरा (कीड़ा लगा हुआ)

लबरन की लेखौ करौ ,किरा भटन   से आप  |
इनै  छाँट‌ कै फेंक दो ,   लगै  न  कौनउँ पाप ||

किरा भटन पै बन गई  , नौनीं - सी    कानात |
बैतुक के  भी आदमी,    हौतइ ‌‌  यैइ  जमात || 

कुत्ता   हौबे  जब किरा , भौतइ   बुरवँ बसात | 
बदबू  से  उल्टी  उठत  , दौरत  नाक   दबात ||

यैड़ा - टैड़ा   आदमी  , मान कभउँ  नँइँ  पाँय ‌ |
किरा बनै बै  घूमतइ ,  सबखौं  बुरय   बसाँय ||

चमचा आज समाज में , लगत किरा से आज |
हड़ियाँ खौं चाटत फिर  , सबइ बिगारत काज ||
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खिलकट (आधा पागल)

जितै‌ हौय खिलकट खड़ौ , निकर जावँ चुपचाप |
खुपड़चटौ  मत रोपियौ ,   बात समझियो  आप ||

खिलकट खौं समझाउनै  , कभउँ न सोचो बात |
बौ  जिद्दी रत हर समय , करतइ खुद  कौ  घात ||

खिलकटपन में सट गयी,  जीकी  उमर तमाम | 
बैइ  सयाने  बन  रयै ,  चाबैं   मुफ्त    सलाम ||

खिलकट जीखौ जानकै  ,हम कर दैतइ  माफ |  
बौइ  दरद दे एक दिन ,        मिले नँईं इंंसाफ ||

हो जातइ है हर जगाँ  ,   खिलकट की  पैचान |
समाधान   मिलता नँईं ,  कैसे   हौ   निपटान ||

खिलकट  लरबै खौं फिरै  , अपनी पूँछ उठाँय |
एक कहौ ना दो सुनो , बुजरक  ‌यह  समझाँय ||
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बुंदेली-कीचर (कीचड़)

कमल फूल कीचर खिले , मिलबै नँईं सुभाव |
एक   लगातइ   दाग है , एक   बताबै   चाव ||

कीचर सें  बचकैं  चलैं , तब बौ   करै घमंड |
सबइ लोग मौसें   डरैं  ,  हम दैं सबखौं दंड  || 

कीचर की बस जानिए , इतनी -सी औकात |
उचट चिपक ऊदम करे ,  तनिक देर दे घात ||

स्वारथ के संगे तकत  , अब कीचर को साथ |
दौनउँ के  मन   गंदगी , चलें  मिला  कैं हाथ ||

सज्जन पानी     जब मिले , तब   कीचर  गर्राय‌ |
क्रोधी सूरज देखकर , सिकुड़ सिमट वह जाय ||
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विषय गउ (गइया)

मिलत उयै वरदान है, गउ माँ जी घर  रात |
और लगत है गेह   में  , देवी जू   मुस्कात || 

घर में रत  तैतीस हैं , कोटि    जान लौ   देव |
सुख  साता पूरी रयै  , गउ  की जित हौ सेव ||

गउ  गौबर  खौं लीप कै, पावन करतइ गेह |
कंडा पाथत सब जनै , करत रखत से नेह || 

नँईं  अन्न बरबाद हौ  , गउ  पी   लैबे  धोन  |
पीकै वह आषीष दै ,  हँसत रात है   मौन || 

दूद   दही  घर  में रयै ,  भूक  भगै  सब  दूर |
गउ रखबै कौ   जौन घर, चलौ आव  दस्तूर  ||

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बुंदेली दोहे -गर्राट (अशालीन व्यवहार)

खुले आम तिरिया जितै , करन लगै गर्राट | 
घर की इज्जत के उतै , टूटै  चकिया पाट ||

चार दिना  की चाँदनी , करौ न बाराबाट | 
कर लौ नौनें काम सब , छोड़छाड़ गर्राट || 

पुंगन   के गर्राट  की , काँ लौं कैबें  बात |
घूमै  पूरै गाँव में  ,    पी  कै आदी   रात ||

चढ़ौ जिनै  गर्राट तौ  , वे बन गय सरपंच |
हिस्ट्रीशीटर जौ  रयै , बै  अब  सोना टंच ||

माते भी गर्राट में    , सुलगा गय है आग |
मड़ी कथूले की मुड़ी , ठोको ठाड़ों दाग ||

मोड़ी सपरन आइ जब , लहरें उठ गइँ घाट |
रामप्यारी ‌  कै  उठी  , जवानी  कौ   गर्राट ||

गलती माते जू करें , सबरे    साधें मौन |
लरका के गर्राट से , उरजट्टौ ले   कौन 

गुनताड़ों (हिसाब, उपाय)

गुनताड़ों दद्दा करत,   फिर  घर से डग देत |
नफा और नुकसान कौ , अंदाजा सब लेत ||

गुनताड़ों  करबौ  भलौ , बूडै बुजरक कात |
ईसै  नौनें   काम  हौ  , सबखौ भौत सुहात ||

गुनताड़ों  घर कै करें ,  कैसै    हौजे काम |
हर्र लगे ना फिटकरी , मिलबैं   चौखे दाम ||

गुनताड़ों    गुनिया करै , गुन लै चौखी बात |
चलत गैल फिर बौइ है , सबखौं लगै सुहात || 

गुनताड़ों सब सोच रय , जायैं  सागर पार |
लायै  सीता माइ खौं , लंका कै जा   द्वार || 

गुनतारो गवँ है निपुर ,बहुमत कितउँ न आवँ  |
लै जौरा  की  फौज  अब  , दोइ  पलीतन    पावँ  ||

गुनताड़ों  जातइ निपुर   , जीमे  दिखत  उलात |
अतपर में   रत आदमी , सतुआ  थूक   मचात ||

सुभाष सिंघई 
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दोहे,- गुम्मा

एक- एक गुम्मा जुरै  , तब बनतइ घर दोर |
यैसइ हम सब अब रहें , इस  बुंदेली   ठोर ||

हर गुम्मा नेंगर   रहें    , पर‌‌  कछु थोड़ी   दूर |
रखत बगल में  प्रेम है , कोशिश भी भरपूर ||

गुम्मा का गुन जानियो , तकियो  इसकी ओर  |
आँधी    पानी  झेलकैं   , देतइ   सबखौं ठोर ||

गुम्मा जो भी  पाथता , होतइ  बौ   मजदूर |
चुअत  पसीना भी पथे , मजदूरन कौ  नूर ||

पाथे गुम्मा  बाप  माँ , लरका   चटा बनाय |
घर की तिरिया संग दैं  ,गुम्मा खरा  पकाय  ||

गुम्मा ही  जुरकैं  सदा ,  खड़ी  करत दीवार  |
सबइ जनै अब ताकियो ,का होतइ  है प्यार ||

गुम्मा से  गुम्मा   जुरै ,     रयै  बीच   सीमेंट |
रेता   पानी   प्यार कौ , महकत  खूबइ  सेंट  ||
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बुंदेली दिवस  गुलेंदौ (महुआ का फल)

हम देखत ई दौर में , सबइ दैत  है  घात |
फौर गुलेंदौ सौ इतै , सबखौं  इतै डरात ||

पैला लगतइ फूल है , जीखौं महुआ कात | 
लगै गुलेदौ फल कबै , सबखौ भौत सुहात ||

फौर गुलेंदौ  लोग जब , धपरा जौर बिलात |
उनै पिरा कै तेल खौ , घर में सब लै आत ||

पकौ गुलेदौ सै करत , अब गरीब भी मेल |
उनै पिरा घर में रखत , कत है गुलिया तेल ||

है गरीब की आन यह ,     सुनौ गुलेंदौ आप |
बनत खूब पकवान है , पर रत गुलिया छाप ||

सुभाष सिंघई
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विषय - दाऊ (बड़े भाई का संबोधन)

दाऊ खौं मिलतइ सदा  , सब जिम्मे कौ  काम |
छोटे रत   निशचिंत  हैं ,    मिलत  उनै आराम ||

दाऊ खौं घर में सदा  , सबरै   इज्जत दैत | 
खरचा पानी खौं सबइ , पइसा पुटया लैत ||

दाऊ भी खुश हौत हैं , छोटन कौ लख नेह |
पूरौ करत उसार हैं , जौ भी   देखत   गेह || 

दद्दा  भी देबें सदा  , दाऊ   खौं   सम्मान |
सबसे पैला  दैत  है , उनखौं   पूरौ‌‌  ज्ञान || 

रुतबा  पूरौ   रात  है   , मानत    जिम्मेदार | 
घर बारे भी कात है  , दाऊ   बड़े    हुश्यार || 

दाऊ थे बलराम जू , छोटे   रय ते श्याम |
हक से डाँटत रय सदा , लेत रयै है नाम ||
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अप्रतियोगी दोहे -दराँच (दरार)

मन भी नाजुक होत है ,  जैसौ हौतइ काँच |
चोट लगै पै है दिखत , सबखौ साफ दराँच || 

भाई जब लौ एक रैं ‌, घर में घुसै ना आँच |
मन मैलौ जब भी हुयै,  दैखें  सबइ दराँच ||

पंचायत भी गइँ भिनक , करन लगे सब नाँच |
बँट समाज  पूरी गयी , दिखने   लगी  दराँच || 

पंडित जू घर में  कथा , गये भुंसरा   बाँच | 
देख दक्षिना  चुप रयै , मन में रखें  दराँच |‌|

समझौते खौं ल्याय तै , पंच शाम खौं पाँच |
पर बै उल्टौ कर गयै ,कर गय बड़ी  दराँच ||

सोनों तौ लैतइ चमक  , पाकैं  अच्छी आँच |
पर सीशा  तो टूट जै , लैकें    तुरत  दराँच |||
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बुंदेली दिवस - ततइया ( बर्र)

काट ततइया लै जितै , मिरची-सी लग जात |
‌यैसइ  कछु हैं  आदमी, जगन-तगन भिन्नात ||

मौड़ी थौरी तेज हौ , लोग ततइया कात |
सामै से उरजत नँई , सबरै बच कै रात ||

लछमन से हौनइँ  लगौ ,बातन कौ संग्राम |
बने ततइयाँ तब दिखै ,ऋषिवर परसूराम || 

काट ततइया लै जितै , घिस   लौ लोहा आप |
या निबुआ कौ रस लगा , दो फूँकन से भाप ||

लोग ततइया बन गयै , तनकइ पै  भिन्नात | 
छरकत ईसै  लोग हैं , साँसी कौउँ न कात ||

सुभाष सिंघई 
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  दोहे 
छरक (अरुचि, घृणा ) 

नेतन सैं सब गय  छरक, तक लय उनकै ढंग |
गिरगिट जैसे  रंग कै   ,  देखत   खूब   प्रसंग ||

लोगन की पैचान  में , तनिक  हौत   है  देर |
पोल खुले पै हो छरक , कोउँ करत नँइँ  हेर || 

मरका बैला  हौ जितै , लोग  छरक कै  रात |
नाँय माँय सब देखकैं ,चुपके  सैं कढ़ जात ||

दुष्टन सैं भी   हौ   छरक , कौन   बिदेबै  गट्ट |
तनिक बात पै आन कैं ,  पकरत कौचाँ चट्ट ||

रऔ छरक कैं सब जनै , देखौ जितै  शराब |
जौ पीतइ है आन कै  , उनके गलत हिसाब |

नँईं  धरम से हो छरक , बिनतुआइ भगवान |
हम  चरणन के  दास रयँ,  बनी रयै  पैचान ||400

-बुंदेली-224- मटिया चूले

मटिया चूले 

मटिया चूले हर घरै , मोखौं   नँईं बताब |
चटकी भींट दरार है, आकै नँईं सुनाब ||

कीकी अब अटकी परी , उनके घर खौं जाँय |
मटिया   चूले  देख कैं , गुन अवगुन बतलाँय  ||

मटिया चूले   फौर कै , बै फिर रयँ टपयात |
कत माटी चटकी हती ,   ऊपर से बरसात || 

मटिया चूले  की बनी , जौन  इतै    कानात |
मतलब हर घर में मिलै , कौनउँ खाँमी बात ||

मटिया चूले  लै चटक , बजन  नँई सह पात |
हड़़ियाँ  औदी गिर परै , खीर बगर सब जात ||
 
मटिया चूले  मन दिखे , तनिक बात में रूठ |
दूजन खौं दुख दैत हैं ,   खुद में राखत फूट ||


बुंदेली झिर

उन्नाव सूकत है नँई , मुलक दिनन   झिर रात |
कत सुभाष यैसी जगाँ , बबरा भजिया  खात ||

बिजली चमकत रात है , तड़-तड़ करतइ यैन |
घर से देखत झिर सबइ , जुरकै   भइया  बैन ||

दादुर झींगुर मोर सब , झिर से सब मुस्कात |
नचत गात अपने सुरन , करत  खूब उत्पात || 

झिर के संगै जब हवा , चले दिखा कैं यैड़ |
डारैं पैड़न की गिरैं ,     गिरकैं   भरबैं  पैड़़ || 

सावन -भादौ झिर लगै , हरसत सबइ किसान |
कुँआ-ताल- नदियाँ भरै , देखन   जाँय जवान || 
बुंदेली दिवस , विषय - खाँगे (विकलांग)

बजरंगी खाँगे भयै , लगौ   तीर  जब आँग  |
मान भरत कौ राख कै , कर लइ टेड़ी टाँग || 

लूले  खाँगे  हौत  हैं  , हौ   चुनाव की  मार |
रात तकै ना दिन दिखै , करतइ रयैं पिचार ||

उपनय  जौ दौरत रयैं  , हाँपत-सीसत  रात | 
उपटा   उनखौं है लगत , खाँगे  हौके  आत || 

दौइ जनै लरतइ जितै , करतइ जौन बचाव |
खाँगे हौतइ पाँव सै , कुचरत   देखत  न्याव || 

खाँगे  हौकै लौटतइ , सीमा से जब ज्वान |
पीठ ठौकतइ सब जनै , दैत भौत सम्मान ||

खाँगै  हौकै  भी लरै , दैयँ  जौन बलिदान |
परमवीर उनखौं कहैं , और   करै गुनगान ||

सुभाष सिंघई 

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विषय -नतैत ( रिस्तेदार )

कत नतैत से सब जनै , राजी   खुशी सुनावँ |
कछू खबर नौनीं अगर , सबखौ जल्द बतावँ || 

नौनें  जितै  नतैत हौ , भलौ  हौत   बतकाव |
इडुआ- टिडुआ हौ अगर , दैत कौउ नँइँ भाव ||

ब्याय काज में है जुरत , सबरै    जितै  नतैत |
सब मजाक में मस्त रत , अपनी-अपनी कैत || 

नातौ जौरत जौ सदा , दिल से    सबखौ   चात |
सइँ नतैत तब जानियौ , यह 'सुभाष' अब कात || 

दशरथ बनै नतैत थै , जनक पुरी सो  धाम | 
सीता   बनी   दुलैन   थी , दूला  थे श्रीराम ||
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बुंदेली विषय - फतूम ( किसान की बनियान )

भारत के मजदूर की ,    देखो  सभी फतूम |
कितउँ -कितउँ हैं  टोंकले , लगे चींथरा झूम  ||

किस्मत के मारे फिरत , चटनी रोटी खात |
पैरे फटी फतूम हैं‌ ,   मजदूरन की   जात ||

जब किसान हौं खेत में , पैरै  रात  फतूम |
काम खेत में हैं करत, चुअत पसीना लूम || 

चड्डी और फतूम है , मजदूरन   की  शान |
काम करत हैं रात दिन , अपने हिंदुस्तान ||

छिदना  बने फतूम में , नक्शा    हिंदुस्तान |
काम करत मजदूर की , आज बनी पैचान ||

इज्जत रखत फतूम है , पेट पीठ लै ढाँक |
रोटी टोरत हाथ पे , कोउ करत नँइँ  झाँक ||
~~~~~ , खुटखुट =चिन्ता/डर 

लगी रात खुटखुट सदा , काम बिलुर नँइँ जाय |
गंठयान  कछु   बीदबैं , घर  में   आफत आय ||

खुटखुट मन  में हो गई , सगया काय न आयँ  |
चुगलन नैं भर कान दय, यैसइ  आज दिखायँ ||

खुटखुट कै जौ काम हौ , डारौ कभउँ न हाथ  |
जौन   सुबीते कै  लगैं  , लैवँ  उनइँ कौ  साथ ||

परैं -परैं   खुटखुट   लगी ,   भुन्सारे   पंच्चात |
लगने   कर्रो  डाड़   है , सुनने    सबकी  बात ||

खुटखुट खौ चिन्ता कहत , लगतइ चिता समान |
झुलसत तन  मन है  सदा , लै कै   मानत   प्रान || 
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बुंदेली - गुचू/गुचूक_सी (छोटी सी)

धरे  गुचू -से श्याम हैं  , पर   करतइ  उत्पात |
दैन उरानौ गोपियाँ ,   जसुदा तब  खिसयात || 

रूप गुचू सो धर लओ , घुसबैं  खौ हनुमान |
लंका तकलइ घूम कै , सीता किस अस्थान || 

लगत गुचू -सौ है   भ्रमर , हौत  पुष्प  में बंद |
पिड़कै खौटत रात है    , कितै छिपौ मकरंद ||

हौत गुचू -सी  गुंचिनी , आधी  लाल  सफेद |
तौलत खूब सुनार  है , रखत  बजन के भेद ||

नौन गुचू -सो  है डरत , बनत  भौत है स्वाद |
खारै   रौनै  की   सुनौ , निश्चित  रत  तादाद ||

जितै गुचू -सी टाटरी,   गरम   दूध में  जाय‌ | 
फाड़ दैत तुरतइ उतै , तब पनीर बन  आय || 
`~~~~~~~~

अप्रतियोगी दोहे - तिगैला 

कात   तिगैला राह के , अंधी  करौ  न दोड़  |
सोच समझकर ही यहाँ , लइयौ आगे  मोड़ ||

नाँय -माँय की अब खबर , देत तिगैला  खूब |
चार  जनै   बैठे   मिलें , बनत  रहत मनसूब ||

गुइयाँ आपस  में  कयैं  , सबइ  तिगैला आवँ |
जुरकै सब खैलन चलै,  बरिया   पीपर छावँ  || 

सड़कन से सड़कन जितै  , अपनौ करें मिलान |
चौराहा    हौ  चार  से,      तीन  तिगैला  जान || 

चलत  नाक की सूद में , जो भी‌ अब इंसान | 
कयै   तिगैला रुक जरा ,  गैल करौ  पहचान ||

तीन  गैल   फूटें  जितै ,   उयै   तिगैला  कात |
जगन-तगन के आदमी ,सबइ उतै मिल जात ||
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सोमवार-29-7-24-विषय पीपर (पीपल)

बरिया पीपर  नीम   के , पेड़ लगाओ पाँच |
सबइ प्रदूषण दूर हौ  , बूड़ें  कत हैं   साँच ||

बरिया पीपर नीम हैं , जंगल के   तिरदेव |
इनै लगाकै ‌सब जनै , करौ खूब तुम सेव ||

बरिया पीपर हैं खड़े , बीत गये कई साल |
बचपन में खेला सदा   ,जहाँ कबड्डी ताल ||

बरिया  पीपर  पूजते ,   मानें  उनखौं  देव |
पर अब उनखौं काटते , मन में उगे  कुटेव || 

अब पीपर के  पेड़  पै  ,  होने  लगा  प्रहार |
ज़ालिम हौ गवँ आदमी , करत कुलैया वार || 

पीपर  के  पत्ता   हिलैं  , चलती  मंद समीर |
एक सुहाने गीत की ,   उभर जात   तस्वीर || 

छुटकुल पंछी  बैठते , जब  पीपर  की  डाल |
छाया   पाकर है हँसते  ,   लगते  मालामाल ||
~~~```

विषय जिज्जी

जिज्जी को जी है बड़ौ , भइयन की बन ढाल |
दद्दा- बाई चुप करै ,   जब भी   बिगरै  ताल ||

गलती जब  भइया करै , जिज्जी लैत सम्हाल |
अपने ऊपर दोष ले,    कत ना  करौ   बबाल ||

जिज्जी घर की शान शुभ  , है   मंगल वरदान |
आँगन की तुलसी बने  , सबइ   करौ  पहचान ||

जिज्जी  को सुख देख कै , खुश रत बाप मताइ |
भइयन भी मुस्कात है ,     हरसै   खूब  भुजाइ ||

जिज्जी  राखी  बाँधबै , छूबै   भइया   हाथ |
रक्षा  सबसें  माँगती ,     आगैं  करके  माथ ||

सुभाष सिंघई
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नौरता
नौ दिन पुरतइ नौरता , फिर ढिलिया कड़ जात |
जुरकैं सुअटा गाउतीं , सब  बिटियाँ  मुस्कात ||

क्वार सुदी परमा लगे , नवदुर्गा जब आँय |
जुरकै  कन्या नौरता , भौरइ  हौत  सजाँय ||

रंग बिरंगे चौक लग  , सजत   चौतरा  रेख  |
बनत राक्षस नौरता  ,    कन्या   पूजैं  देख || 

नारे सुअटा नौरता , जुरकै   कन्या    गाँय |
नौ दिन पूरे हौय जब , मिलकै हप्पू  खाँय ||

कुँवारी बिटिया गाँव की ,सब  गौरा कैलाँय |
पुजती राती नौरता ,       लोग देख हरषाँय ||

कन्या पूरै  नौरता ,  फल   इसका यह आय |
शिव-सा वर गौरा मिले , यैसौ  भाग्य मनाय ||
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विषय - लग्गर 

लग्गर रातइ एक-सो ,   करबे नईं  घमंड |
ऊकै घर में प्रेम की , जौति  जलै अखंड ||

लग्गर जो     निगता चले  , बन जातइ है  खास |
कछुआ अपनी  चाल से , हो गव इक दिन पास ||

लग्गर  राना   कर  रयै  , बुंदेली   पै   काम |
सब सुभाष इज्जत करत , आदर से लै नाम ||

लग्गर  लिख रय जो इतै , अपने  दोहा छंद |
सो साँसउ में कात हम , आतइ  है   आनंद ||

बुंदेली  लग्गर  बढ़ै,  बोली  भाषा  खास |
दूर- दूर तक फैलकें , हौबे     यैन विकास ||
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विषय - पान (तमाकू को जोड़कर विशेष दोहे) 

पान तमाकू बाइ से , कत  हौकें  लाचार | 
तौरे संगे मैं  थुकौ  , इज्जत हौ गइ  तार  ||

लोग पान  दूषित करें ,    तनिक   तमाकू   डाल |
खाकैं फिर थूकत फिरैं , करें न कुछ भी ख्याल ||

जितै  तमाकू बाइ जी  , लिपट प्यार जतलाँय  |
पान कात हर बेर ये  ,  लोगन   से   थुकबाँय ||

पान   तमाकू   मेल   जो , कीने   इतौ बनाव |
संगे  करकैं   गैल   में ,   लोगन से थुकबाव || 

संगत को जौ है असर , बात समझ गव पान |
थुकत फिरत कौनन डरौ , रौय गरै खौं तान ||

कहने का सारांश है , उदाहरण  यह पान |
संगत के छींटे पड़े , दिखे जगत को आन ||
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विषय - बंडी 

फसल नींदबे जात जब  , बंडी आबे काम |
छैरत नइयाँ भूम पै , ढकै कमर तक चाम ||

बिन कालर बंडी रयै  , गरौ  खुलौ  भी रात |
बाँहे  भी लगती नहीं , मिलबे  हवा बिलात ||

भौत पसीना   सोखती , बंडी   रत मजबूत |
हौ जातइ है रामधइ   , काम करत में कूत ||

विषय - बिछिया 

पाँव   अँगूठा के बगल , जौन   उगरियाँ   हौत |
पैरत  बिछिया ही  तुरत  , जलै गर्भ नस जौत ||
        {यह एक वैज्ञानिक पहलू है }

बिछिया पायल खौं गुनौ , कभउँ  न हलकौ जान |
देत   सुहागन   नारि की ,    पाँवन  सैं  पैचान ||

थौरो   राखत मौल   यह  , पर बजनी सम्मान |
बिछिया नारी पेर कैं  , राखत   है  मुस्कान  ||

बिछिया पायल पैर में , नकुआ में  नथ डार |
बिंदी लगा  लिलार  पै , सजे  सुहागन  नार ||
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विषय - मकोरा 

दिखें  मकोरा झाड़ियाँ , देखत मन ललचात |
काँटे चुभबै   हाथ में ,   पर सब टोरत खात  ||

ऊगड़‌  पथरी हो जगाँ , काँटन की रत झाड़ |
मिलत मकोरा फल उतै ,  फैली रातइ  बाड़ || 

मौं में जाकै जीभ खौं  , देत मकोरा  स्वाद |
चिनगुट्टी गुठली लगै ,  सबइ करत है याद  ||

बेरन  सँग नौनें  लगत , लोग मकोरा खाँयँ |
खटमिठ्ठे  तरुआ चपा , चूस-चूस.  मुस्काँयँ 

गुजर गयै‌ कइ साल है , नहीं   मकोरा  खाय |
पर अब जब चर्चा चली , जीभ मोइ ‌पनयाय ||

विषय - चपेटा 

आमैं -सामैं   बैठ कैं , गुइयाँ  करबैं   मेल  |
चले हथेली की कला , खिले  चपेटा खेल ||

पैल चपेटा थाम कै , उलटी गदिया  ल्याँय |
एक चपेटा  लें बचा , गोट   बना उचकाँय ||

चौपाला  हौबै   सबइ , जिनै  चपेटा कात |
छोटी  लगती गोटियाँ , मौड़ी खेलन जात ||

चैंचें पैंपे  हौय जब , हम तो कातइ  ठेट |
सबइ चपेटा चाप कैं , मौड़ीं भगै  चपेट || 
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विषय कुर्ता 

धोती कुर्ता छूट गय , अब   पैरत हैं पेंट |
शर्ट और टी शर्ट में, फिरत लगा कें सेंट ||

कुर्ता धोती शान थी , हतौ भौत सम्मान |
अब दद्दू देहात के , मिलबै ‌‌  सुनबै गान ||

नेता   भी   कुर्ता   तजै , पेंट  शर्ट   में   आँय |
बस सफेद को ख्याल रख , वोट माँगबें जाँय ||

चलौ पजामा के सँगै ,   कुर्ता आलीशान |
मिलत आज भी लोग है , पैरै करें गुमान ||

कुर्ता पै जाकट डटै   ,    पैरत  लम्बरदार |
जातइ है पंच्चात में ,   मूँछ  नुकीली  डार ||

सुभाष सिंघई
विषय - परदनी 

दद्दू    पैरें    परदनी ,   मेला   देखन    जाँय |
दौना थामैं   हाथ   में   , सेव  मगौरा   खाँय ||

पेर झकझकी परदनी , कुरता जाकट  धाँद  |
रौब जमाती  मूँछ भी   ,  लगबै  परमा चाँद   ||

पेर  परदनी  सेठ   जी  , बंजी  करबै  जाँय |
पइसा  माँगो ब्याज पै , टका तीन बतलाँय ||

पूजा में  भी    परदनी , पेरौ     यैसी  लीक |
नौनीं लगबै सभ्यता , लगत सबइ खौं नीक ||

अब भी चलतइ परदनी ,  यदि हौ कुरता संग |
जाकट  पैरें   होय   तो ,     रौबदार  तब  रंग ||500

विषय -,धुकधुकी 

मन में हो रइ धुकधुकी  ,   गटा लयै है फेर |
नागिन जा रइ  सामने ,  कर नँइँ पा रय हेर ||

बाँस कुँअन में डार लवँ , नँइँ मिल रइ है चीज |
उठत हृदय में धुकधुकी , मौं पै आ रइ  खीज || 

जब आँखन ने देखलइ  , बहती  जाती  लाश |
उठी हृदय में धुकधुकी , की कौ भयौ विनाश ||

उठत ‌भौत है धुकधुकी , जब जातइ शमशान |
जलत चिता को देखकैं  ,   टूटै   सबइ गुमान || 

काली माँ को क्रोध सुन ,चली धुकधुकी  ताल। 
कैसे उनने  पैनलइ ‌  ,      कटे   मुंड की माल॥ 

विषय  डाँस 
डांस करा दव डाँस ने , चुभा -चुभा के  डंक |
बैठ  कुका रय खाट  पै , तन में लाल कलंक ||

हरी घनी  हौ झाड़ियाँ ,    नमी   उतै जब हौय |
डाँस पनपतइ खूब तब  , जानत है सब कौय ||

नरदा  बुचकौ हौय तौ , डाँस बना लें  ठौर |
शामइ से  उबरात हैं , मुसकिल खाबौ कौर ||

चींथत  पूरी रात हैं ,    तनिक गम्म ना खाँय |
सूजा गुच्चत डाँस सब  , सबकी नींद भगाँय ||

मछरन के  जे बाप है , डाँस   धरौ  है  नाम |
जियै काट कैं  छौड़‌ दें , बौइ  खुजाबै  चाम ||

सुनत डाँस कौ नाम ही, मोय फुरौरी  आय |
काँट  चुकै  हैं  बै हमें , तन   पूरौ खुजलाय || 


विषय - छीताफल (सीताफल ) 

मिले विटामिन सी सुनो , जो छीताफल खात |
एंटी आकसीडेंट भी ,  भौत अधिक भी पात ||

कैलशियम   ई‌में   रयै ,   लौह   तत्व भरपूर |
फास्फोरस‌ शामिल रयै ,   छीताफल ‌है नूर ||

और बढ़ातइ इम्निटी ,  सबइ   डाक्टर कात |
छीताफल भी दैख कैं ,  खाबै मन ललचात ||

सीता जी की खोज यह ,सब जानत यह बात |
छीताफल लगबै मधुर , राम ;लखन से कात ||

बीजा जड़ पत्ते सुनौ , करें दवा  कौ  काम |
छीताफल सब खाइयै , कहियै   सीताराम ||

सीताफल टेशन  बनी   , निकट   हैदराबाद |
छीताफल की बौगिया  , मौखों   आबै याद || 

विषय - जलघरा 

बुंदेली  में   जलघरा , भैया   ऊखौं    कात |
पानी मुलकन जित रखें , निस्तारी में लात ||

घुसत जलघरा में लगे   , ठंडी   हमें   बयार |
नमी थथोलत  ही मिले, जौन  दिखै  दीवार ||

माटी के दिखबैं   घड़ा , गड़ी  डारिया   ‌हौय |
कुंडी और कसेड़िया , मिलें  जलघरा  सौय‌ ||

ब्याय वरातन जलघरा , ढीमर   भरबै  आत |
पानी रत तब लबलबा , पीबै जब हम जात ||

गरमी  कौ  मइना  रयै ,  निकट  जलघरा जाँय |
तन खौं  शीतलता मिलै , अपनी प्यास बुझाँय || 

गड़ी डारियाँ  जल भरीं ,  धरे  कसेड़ी  गुंड | 
कयैं  जलघरा ओइ खौं, पानू  जितै  प्रचंड ||

विषय - जैबौ ( भोजन करना )

जैबौ घर में जब करो ,सपर खोर के  आव |
पूजौ  घर में  देवता , रक्खो  शांत स्वभाव  || 

चार जनै जब   बैठ कै ,   जैबौ  करबैं  आन |
इक दूजे खौं प्रेम की , बोले   सबइ   जुवान ||

शाकाहारी भोज हो , जैबौ   रत सुखकार |
जैसौ हौतइ अन्न है ,   बैसइ आत विचार || 

जैबौ  हौबे  दूज घर ,       बड़े प्रेम से खाव |
हौबें कौनउँ भी कमी , नइँ  ऊखौं  बतलाव ||

जैबौ हौतइँ ब्याय में , लामी   लगत कतार |
भोजन के सँग गारियाँ , परसे सब मनुहार || 
विषय - छिड़िया ‌( सीढ़ी ) 

पैली ‌छिड़िया जब दिखत , कौनउँ मंदिर जाय‌ |
तीन बेर   छू हाथ से ,     अपनी  मुड़ी झुकाय‌ || 

पैली छिड़िया हौत शुभ , बनै लक्छ पौचात‌ | 
सौ सबरै‌‌  सम्मान से ,    ईखौं  मुड़ी झुकात || 

हौत‌ गाँव में चौतरा‌,  उनमें  छिड़िया   हौत |
उनमें  हौतइ नावता ,  ‌ भरत   देवता भौत ||

पैली छिड़िया कर्म की , यदि हौबे  मजबूत |
सफल काम सब हौत है , कयै स्वर्ग से दूत || 

छिड़िया नौनीं  वह लगै  , हिलै ‌न कौनउँ ईंट |
मजबूती    कै दैत ज्यों ,    बसकारै  में भींट ||

सुभाष सिंघई

विषय- चिया ‌( इमली का बीज )

बिच्छू ने काटो ‌जितै , चिया घिसौ चिपकाव |
जहर उतारे आपकौ,    भर भी   दैबे   घाव || 

चिया भिगौयैं चार दिन , छिलका देंय उतार |
पीसे मिसरी घी सहित  , ताकत पाँय अपार ||

चिया भूँज के पीस लें , करबें  मंजन  दंत |
सात दिना में हो चले , दाँत  पीलिया  अंत || 

ग्रेंहूँ  संग पीसो चिया  , रोटी खाएँ  आप |
हड्डी यदि कमजोर है ,मिटे रोग चुपचाप ||

स्वाद कसैला है चिया ,   लैव   तवा    पै भून |
फिर चटनी में पीस खा , साफ करौ तन खून  ||

विषय - टिक्कड़ ( मोटी रोटी)

टिक्कड़‌ हाथन से बना  , कंडी लैव जलाव  |
सेंकौ अँगरन पर उयै,    घी में  खूब डुबाव || 

टिक्कड़‌ घी में हो डुबीं , भटा टमाटर भर्त |
सूँटत सबरै बैठ कै ,    गिनती की लें शर्त || 

टिक्कड़‌ आटा दाल की , सतनाजी भी हौत  |
सेकें अच्छी  साधु जन , स्वाद   दैत है भौत ||

टिक्कड़ अँगरन में  सिकैं , अलट पलट कैं यैन |
खरी-खरी जब सेंक लै , तबइँ    परत   है  चैन ||

टिक्कड़ गक्कड़ खाय है , पर दो या हो तीन |
अफरा अच्छौ है चढ़त , बजै नींद  की  बीन || 

बन्न -बन्न कौ नाज हौ ,   लैव सबइ  खौं पीस |
टिक्कड़ ठौकों  हाथ सैं , और भजौ  जगदीस ||

सुभाष सिंघई

विषय - टीपना (कुंडली)

बनी हती ती टीपना , जब हौनें तो ब्या़य |
बिटिया बारे ले गयै , दै गय हमखौं भाव || 

पैल मिलातइ टीपना , पाछै  हो  बतकाव |
ब्याय बनत या ना बनै  , हौबें नईं छिपाव ||

हौय टीपना मंगली  , तनिक बिबूचन  आत |
मंगल दोनों ओर हों , जोग तबइँ  बन जात ||

बारह घर हों टीपना ,    नौ  ग्रह जीमें  रात |
सप्तवार  के संग में ,  केतु- राहु दिखलात ||

बना  दैत   है  टीपना ,     पंडित‌   जू   महराज |
करतइ  सगुन  मिलान है , सदा व्याय के काज || 

सुभाष सिंघई
विषय - बुखार 

बुखार को एक नए तरीके से लिखने का प्रयास किया है 

वैद्य - 
मेरी   पकड़ी  नब्ज  है ,    कहते  वैद्य दुलार |
छाती  बैठी   ठंड   है  , जिससे   चढ़ा बुखार ||😙

झाड़़ा फूकीं वाला- 
बुरी नजर तुझको  लगी , दूगाँ  सभी  उतार |
झाड़ा  देता मंत्र से ,     भागे  यहाँ बुखार ||😗

आशिक मित्र -
यह लगती कुछ आशिकी , हुआ किसी से प्यार |
अभी छोड़ उस नाम को , जिसका  चढ़ा बुखार || 😉

दारू ठेकेदार
नहीं दवा का  काम है , मेरा    सुनो विचार |
चार घूँट तू  मार ले  , उतरे  अभी   बुखार ||🥰

पत्नी - 
चार काम घर के करो , बनो  नहीं  बीमार |
जिससे  जाएगा उतर , चढ़ता  हुआ बुखार ||😚

पड़ोसन -
उतरे  अभी बुखार है , मैं   देती  हूँ   राय  |
मेरे  घर आकर पियो , तुलसी वाली चाय ||🤭

साहित्यक मित्र - 
सुन सुभाष  आराम कर   , दुआ करो   स्वीकार  |
उठा कलम लिख दो पटल  , हमको चढ़ा बुखार ||😄

उपसंहार 

ज्वर बोलो या ताप सब ,     या कह  इसे बुखार |
लोग     आयगें   देखने  ,  कर स्वागत   सत्कार ||🙏🤭

विषय - परदिया (दीवार )

जीव -ईश के बीच में , नईं   परदिया होय |
अंश ईश के जीव है , जानत है सब कोय ||

भक्त और भगवान में , नहीं परदिया काम |
आमै -सामै  बैठ कै , भजतइ उनकौ नाम ||

बँटबारे  की परदिया , जीं   खौं दैतइ  ठेस |
पर सुभाष संसार कै , यही  दिखै  परिवेस ||

दिखीं  धर्म में परदिया , अपने - अपने ज्ञान |
ऊपर   बारौ  एक है , रखत   नईं   संज्ञान ||

रखो देश में एकता , करो  काम  सब नेक |
ऊँच-नींच की परदिया , दैवँ तोड़कर फेक ||

जात -पात की परदिया , जीनै लइँ  हैं खैंच |
उनके  मन खौ जानियौ , राखत हैं   ये रैंच ||

सुभाष सिंघई

विषय - चिट‌  ( चोट का ‌ निशान ) 

तन की चिट से नइँ फरक ‌, पर मन की दुख देत |
भीतर  नदिया - सी बहे  ,      गीली ‌ रत है   रेत ||

बने  घाव की ‌चिट‌ अगर , चिंता   की नइँ   बात |
है चरित्र की चिट जितै ,      जीवन भर ‌दे  घात || 

चिट चिहरा पर जब बने , पूछत  है  सब लोग |
छवि बिगारत जानियौ , लगतइ ‌ बड़ौ  कुयोग || 

नईं बने चिट काउँ खौं ,      सबइ  बनै  बेदाग |
जीवन में   शुचिता   रयै ,      मीठे  हौबें  राग || 

चिट रावन खौं लग गई , बिगरौ सबइ चरित्र |
कुल कौ कर लवँ नाश है , खौयै परिजन मित्र ||

बुंदेली -चिरैया (चिड़िया)

आज चिरैया रइ फुँदक , फरै‌ आम की डाल  |
हल्का फुल्का चुग रयी ‌, रख  मस्तानी  चाल  ||

बैठ   चिरैया  आँगना    , प्यारी   लेती   धूप |
कंघी  करती चोंच से  ,   और   निखारे  रूप ||

चीं चीं की है  ध्वनि मधुर ,  नन्हें  मीठे बोल |
निडर  चिरैया  घूमती ,‌  लगे  हमें   अनमोल || 

छोटा रखती  घोंसला , पर चूजों का ध्यान |
सदा चिरैया पालकर ,   करती उन्हें जवान || 

गुन विशेष हम देखते , दिखती सदा प्रसन्न |
जहाँ चिरैया को मिले , खा  लेती  है  अन्न ||

-बुंदेली विषय -चिंटा (काला बड़ा चीटा)

चिंटा गुर   में  जब  लगत , टाँड़ी  से  उतरात  |
खा पी कैं बें  मस्त रत, डिगराँ   कौलत जात  ||

चिंटा की  टाँगें ‌तकौ  ,   कुछ लामी -सी  होय |
गड़ा - गड़ा कैं  हैं चलत ,तकतइ यह सब कोय‌ ||

चिंटा चिटियाँ   लेन  से , चलतइ  लें आनंद  |
रखतइ  अपनी एकता , इक मुठ्ठी   में   बंद  ||

चिंटा  करिया  हौत है , पर देखे कछु लाल |
हरे आम के पेड़ में    , पत्तन करें   कमाल ||

चिंटा  लगें  मिठाइ में ,    मिठया   रत    हैरान |
जगाँ -जगाँ पै जब  दिखत , झारत फिरे दुकान ||

चिंटा चुखरा चेंपला   , घर   में ‌जब   आ जात |
चटकी   चौतइयाँ  घुसै ,    करें   उतै   उत्पात  ||

बुंदेली - कुल्ल /कुल(बिलात, बहुत सारे )

विषय - कुल्ल / कुल ( बिलात, बहुत सारे )

कुल दिखतइ है  चौतरा ‌, मिलतइ जितै भभूत |
मनसा   पूरी    हौत   है   , दैतइ   लोग  सबूत || 

कुल  नेता  हैं आजकल   , टाँड़ी   से  उतरात |
ढूड़न जाओ एक तो , मुलकन अब दिखलात ||

अच्‍छा देखन मैं गया , मिले   हमें  कछु  नेक |
कु्ल्ल मिले भी   आदमी , झूठ रयै  जौ फेक ||

कुल्ल  साधु हैं आजकल , लगा  लेत अनुमान |
पूजत चरनन खौं सबइँ ,    प्राप्त करत हैं ज्ञान ||

कुल्ल भरे अवगुन जितै,  छरकत हैं तब लोग |
झकत कौउँ नइँ पास हैं ,    ऊखौं  मानत रोग || 

सुभाष सिंघई


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बुंदेली में मनहरण घनाक्षरी 

कुत्ता सोफा पै पसरौ  , बिस्कुट खाकैं अफरौ,
डुकरा बैठो   बायरैं ,  संगैं   बैठी   डुकरौ |

बउँ धन लैकैं कैयाँ , लैतइ  खूब बलैयाँ , 
आगें  पाँछै पौछत है ,     सब उकौ बुकरौ ||

किसमत खेले खेली  , कुत्ते  मिले  जलेबी , 
दद्दा रगड़‌ तमाकू ,       बैठो कोने कुकरौ |

रूखी सूकी दद्दा बाई , छ्प्पन  भोग लुगाई , 
माल पुआ कुत्ता खाबे,  घी को सब चुपरौ ||

विषय - कुपिया (खाली डिब्बा) 

बब्बा   कुपिया खौं    धरै , खूबइ  रये टटोल |
बची तमाकू है तकत , दबी आँख खौं  खोल ||

जोरू   कुपिया   में  धरैं  , लत्ता  लिपटौ   माल |
गुइयाँ  जीखौं ताक रइँ  ,समज न आ रइ खाल ||

कुपिया में भर कैं चलत ,जब   महगाँ  सामान |
नीचट ढकना गर खुलै , निपुर जात सब स्यान   ||

मन की कुपिया जब भरै , तबइँ आत मुस्कान  |
रीती   जीकी   रात   है  , रौतइ   बौ     इंसान ||

मन भी कुपिया जानियौ , ढ़डकत रत संसार |
करत छछौबा हर जगाँ , लालच  करैं  हजार ||

नौंन धना   मिरचें  धरैं ,  और भरत  हैं  दाल |
जग में कुपिया है भली , सच में करै  कमाल ||

सोमवार -30.12.24-बुंदेली *कुलंग* (बीमारी)

लाँकत बै सब लोग हैं , जिनखौं  हौत कुलंग |
बिजली -सी  तड़कन उठै ‌, कमर पैर के‌अंग ||

करयाई सें पाँव तक ,  दै  कुलंग जब   दर्द  |
घुटना जाँघै सब दुखत , लाँकैं   औरत  मर्द ||

तनिक खटाई खा गयै , आफत -सी आ जात |
आँसत  भौत  कुलंग है ,   याद  मताई  आत ||

झारन फूँकन सब करैं  , और डमा लगवात |
पर कुलंग मिटबै नईं , रुगया  रत  डिड़़यात  ||

खान- पान  देशी दवा , धीमो   असर दिखात |
है कुलंग जिनखों सुनौ ,    बौ परेज  से  रात ||600
 
विषय - कबा (अर्जुन पेड़)

भौत भरै गुन जानियौ , पेड़ कबा की छाल |
ई कै  सेवन  से  मिटैं ,   रोगन  के जंजाल ||

हृदय रोग शक्कर जियै , राज रहा मैं खोल |
कबा छाल ऊ कै लियै , है  सोने  की तोल ||

टी बी-  सूजन -दर्द   हो , और   पिराबे  कान |
कबा छाल से वैद्य जी , करतइ   खूब  निदान ||

कबा प्रकृति शीतल रयै , स्वाद   कसैला   होय |
रक्त रोग इससें  मिटैं ,    वात- पित्त- कफ रोय ||

मांसपेशियाँ  ठीक   हों , अल्सर  करता   दूर |
वैद्यराज    सब   जानते ,  कबा  पेड़ है   नूर ||

बूटी  है   संजीवनी ,  कबा  पेड़‌‌   की   छाल | 
ई कौ रस भी रोग खौं  , तन  से   देय निकाल || 
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-बुंदेली -कुकरी/कुकरे  (सिकुड़ी /सिकुड़े)

खूब उरइयाँ ले रयै  , अच्छी   पर रइ ठंड |
कुकरी  बैठी डोकरी, बक  रइ अंड  चबंड  ||

नयी  बऊँ कुकरी रयै, अधिक न बोले बोल |
जेठ ससुर के सामने ,    मौं ना पाबै खोल ||

अफसर ठाड़े दोर पै  , कुकरे  दिखें किसान |
तीन साल से नइँ दओ , कौनउँ अभी लगान ||

कुकरी   बैठी  डोकरी , लठिया गयी हिराय |
कौन जगाँ पै है  धरी ,    कौई  नईंं  बताय ||

छाती बै अब रय फुला , जिनको हो गवँ व्याय |
कुकरै क्वारे दिख रयै ,   मिल नइँ रओ हिराव || 

कुकरी कतकारी रहीं ,      भौर ‌‌ करौ  अस्नान  |
दूनर हो   गइँ  ठंड   में ,    ढूड़त   रइँ  भगवान ||

विषय‌- कचुल्ला (कटोरा)

लयै कचुल्ला हाथ में , डीगें    रय है मार |
भरौ सेर भर घी इतै , ले लौ सबइ उधार ||

तनिक कचुल्ला भर लऔ , चले बाँटबें खीर |
ऐसे  चिकना आदमी ,    दूध    बनाबें ‌‌  नीर || 

एक कचुल्ला नाज को , लबरा  करे‌ बखान |
देत सबइ खौं  नैवतो , आऔ सब जजमान ||

मौड़ा मौड़ी  गेह में , पकर  कचुल्ला  कात |
भूख लगी है जोर से ,    खाबै दैवँ  बिलात ||

तोता पिंजरा में पिड़ौ , चितकोटी है कात |
रखौ कचुल्ला सामने , देख  उयै  हरसात ||

बुंदेली -   बिबूचन (अड़चन)

घरै बिबूचन हो गई ,  रुक गय सबरै काम |
अब तो अगले साल ही , जा पाने है धाम ||

जौ भी नौनें काम में , देत बिबूचन डाल |
उयै देख ऐसो लगत ,   जैसे हौबे काल ||

बेरा हौबे काम की ,     आजैं  ठलुआ  गेह |
लगत बिबूचन गइ पसर, मौय‌ जताबें  नेह ||

नईं बिबूचन आत है , कै सुनकैं  कछु बात |
पकी खीर में  मारे   दे , आके अपनी लात  ||

देख बिबूचन सामने , लोग   पैल  निपटात |
करें सयाने भी खतम ,    पारत ‌नईं उलात ||

अबै  बिबूचन देश की , मोदी  जी   निपटात |
फिर भी कछु यह कात है , मौखों नईं पुसात || 
-बुंदेली विषय कुरा (अंकुर)

कुरा जात हैं खेत में , पकी  फसल के बीज |
पानी बरसे रात दिन , जै किसान तब खीज ||

उरदा  कटबै आय  तै , हौन लगी बरसात |
कुरा  गयै सब खेत में , बिगर गयै हालात ||

मूँग चना   गीले  करो,   पटका में  दो टाँग |
कुरा जाँय तब खाइयो , गठ   जै पूरौ आँग || 

बीज भूम में जब  डरै , नमी  मिलै कछु आन |
बाहर निकरत हैं कुरा , हरषित हौत  किसान ||

सड़े   बीज नेता लगैं ,    गयै  कुरा  इस  देश |
भारत की  बिगरी  जमी , बदल  रयै परिवेश ||

हल बाखर से जौत ‌कैं , खेत  हौत  तैयार |
बीज कुरा कै बाँयरैं , देतइ  खुशी  अपार ||
सोमवार -20.1.25-पिल्ला* (कुतिया का बच्चा )

नेता पिल्ला बन गये , है   चुनाव  इस ओर  |
तरवा चाटै आन कै ,  कइँ- कइँ  करबें दोर ||

पिल्ला- पिल्ली आजकल , चमचन कौ धर रूप |
आगें   पाछैं   डोलतइ ,   नेतन   की   लयँ   धूप || 

पिल्ला प्यारे हौत है ,   लरका   जिनै   खिलात | 
कूर - कूर मौं   से  कहत,  रोटी   उनै   खुआत ||

जड़कारें  पिल्ला  मिलें  , जितै  उरइयाँ  हौय |
लै बिठार पिल्ला सबइ  , हाथ फैरतइ   दौय || 

बन्न - बन्न के नाम के , पिल्ला  मिले बजार |
बड़े लोग पालत उनै ,  बिठलाबैं  निज कार ||

पिल्ला पल्ली में परै ,  पररइ  बेजाँ  ठंड |
कूँ कूँ दद्दा कर रयै , गुरसी  जला अखंड ||

सुभाष सिंघई

शनिवार-25.1.25-बुंदेली  *पुपला* (बिना दांत का)

पुपला की हम कब सुनै  ,  जौन देत आबाज  |
नईं कान भी कुछ सुनैै   ,कौन बता रवँ राज ||

थुथरी भी    पुचकी लगे  , परै नईं सर स्वाद  | 
बिना दाँत पुपला बकै , लगबै   हमें   फसाद ||

पुपला  करतइ बात जब , उचटत मौं पै थूक  | 
येसौ  लगतइ रामधइ ,  आज गयै  है  चूक   || 

पुपला हौकें भी सुनौ , जौन तमाकू खात |
थूकत में उन्ना उतइँ , ऊकै   सबइ भिड़ात || 

थुथरी  नईं चलाइयौ , कइ  पुपला से  ‌ठोक | 
मानौ नइयाँ थूकबै ,   सबइ  निपुर गइ रोक ||

बुंदेली दिवस - *ऊदम* (शैतानी )

लरका सब ऊदम करें , बिदा  लैत है गट्ट |
बाप मताई आन कै ,   सुरजा लैतइ झट्ट || 

ग्वालिन जाती गैल में , छेड़छाड़ के  काम  |
माखन माँगें नेग में ,   करबें  ऊदम श्याम  ||

ऊदम बचपन में करत , कभउँ   टोर लें टाँग |
आतइ घरै  लुलात है , तनिक खुजा के आँग  || 

ऊदम जब इस्कूल में ,   यार करत तै  चार |
बेंत घलत ते   हाथ में , परती गुड़ी  लिलार ||

भइ  छुट्टी  इस्कूल ‌से , ऊदम  से हो  चैन  ‌‌|
देख बिही  के पेड़ खौं  , हमने टोरी यैन ||

रकत चुचा घूँटै छिले , मौचे  मौरे पाँव |
पर ऊदम छोड़ो नइँ , जानत पूरो गाँव ||

-बुंदेली - *खदरा* (गड्डा)

खदरा कभउँ न खौदियो ,   दूजे  गिरे  लुलाँय  |
हँसी उड़ाबै लोग भी  ,  मौका   पर  ही  आँय || 

अँदरा भी खदरा बचा , चलत   जात है गैल |
चलतइ  राह टटोल है , नईं  रखत मन  मैल ||

खदरा   हौबें   गैल  में ,  अँदयारी   हौ  रात |
चूकत  पाँव  जमीन पै,  घायल हौत बिलात ||

खदरा खुदरय  देश में , जाति धर्म के खूब ||
नेता  भी  उसकार रय , गलत रखें मनसूब ||

बसकारे    खदरा   बनैं  , पानी    बरसत रात ||
उचट लगत कीचड़ मुलक , उन्ना सौइ  बसात ||
बुंदेली दिवस- *दुगइ * (दालान)

सासउँ  दुगइ मकान में , खूब ‌ काम  में  आत  |
झिरी   लगै बरसात  की , उन्ना  उतइँ  सुखात ||

आज दुगइ वीरान हैं  ,   ऊखरी मूसर  लोप |
मैनत करबै कौन अब ,   अपनो जी  दै  रोप ||

खुली -खुली सी रात है , घर की दुगइ सुजान |
चार लोग भी बैठ कै ,  खात    तमाकू   पान  ||

खपरीली हो जब दुगइ , हो लकड़ी को ठाट |
चार चीज खुरसी रयै ,   और रखी रय खाट ||

चुरिया बारौ आ़यँ जब ,     बैठ दुगइ में जाय |
बउअन बिटियन खौं उतइँ , चुरियाँ बौ पैनाय ||
बुंदेली - *नीं* (नींव)

पथरा नीं को चुप रहत , दिखत  कँगूरा चाह  |
हर्र    लगै ना   फिटकरी , मोरी    हौबें  वाह    ||

नीं के पथरा है कुटत , दुरमट.  सें दें खूत |
कर्री   छाती राखकैं  ,बने  रात  मजबूत ||

हर कामन की नीं बनै , लगत जितै हुश्यार |
बनबै पै   चर्चा  नईं  ,  दूर   रयै   सत्कार || 

सबसें   पैला नीं खुदे ,   जीपै बनत मकान |
जितनी गैरी ठोस हौ , रयँ  उतनी बलवान || 

आजादी की  नीं बनी , दबँ गय जितै शहीद |
लाभ कँगूरा   लै  रयै ,  रखें  बड़ी    उम्मीद || 

पथरा नीं के  कात सब  , हमरौ  हैं  अरमान |
रैबे   बारे आँय  जौ ,   सज्जन   हो  श्रीमान ||

बुंदेली विषय  *पुरा* (मोहल्ला)

पूरौ जुर गवँ है पुरा , मच रवँ हल्ला यैन |
जुड रइँ नदिया वेतबा , बाँदा  वारी कैन || 

पुरा भरै की औरतें , जुर  कैं   घर   में    आँइ |
कर रइ बिटियाँ की विदा , दे   आशीसन छाँइ ||

पुरा भरै में  फैल गवँ , पसर गऔ है  भात |
माते  लुकै  पियाँर   में , बैरी बनकें  कात ||

पुरा  सुहानौ  हौत  है , जितै   प्रेम से   रात |
चार  जनै   बैठे उठै  , सुख दुख कामें आत || 

जौन  पुरा में   हो चुगल ,  लेन न  दैबें   चैन |
तीन तिगाड़ौ   है करत , सबकी करतइ ठैन ‌||

-बुंदेली विषय - पुतरा

मोरे पुतरा मौंग जा ,    लिपटा  कैं कत माइ |
असुआ पौछे गाल कै , हित की करत दुहाइ ||

पुतरा कात मताइ है  , लिपटा   ले निज आँग |
अपने हाथन सूट दे ,   चोट  लगी  सब जाँग ||
धरे कदाँ  पै माँ  मुड़ी , पुतरा  कयँ  पुटयाय |
चिंता काहे खौ करत , लडुआ  खाबे  लाय ||

बूड़ी डुकरौ पूछती ,   कीकौ    पुतरा  आय |
गैल चलत में छेकतइ , लठिया मोइ छुड़ाय ||

नानी के जब घर गये , खूब   गइँ    हरसाय |
मोरो पुतरा कात रइँ ,   गरे   रयी  लिपटाय || 

हम सब पुतरा ही रये , उचकत रत  दिन रात |
चार घरी भी बैठ कें   , करत न ढँग की बात ||

-बुंदेली दिवस - *अबा* (ईंट का भट्टा)

अबा लगे  हैं कर्म के   , जलत  पाप  अंगार |
संत समागम हरि भजन , कर सकते है पार ||

कौनन कौनन घर अबा , करते हैं  बिखराव |
आगी   परचा   मंथरा , बाँटत  खट्टे    भाव  ||

मन के चुलघुस में जलें , अबा क्रोध के तेज |
है घमंड को  होम भी ,   धरी   बुराई   सेज ||

जितै अबा लगबें उतै , धघकत  अंदर आग |
करत तपस्या ईंट  है , बनत भवन  के भाग || 

माटी जब आकार ले ,    बनती  पहले  ईंट |
पकै  अबा में  लाल हो , तबइँ बनत है भींट ||

बुंदेली तला  {*तालाब*}

ढ़ीमर  मछली पालतइ , खोदत  उतइँ   मुरार |
भरौ रयै    पानी  तला  , गातइ  गीत   मलार ‌||

सपरे  हम खूबइ तला  , खूब लगाई  लोर |
डोड़ा पै चढ़कै उतइँ , भयँ है  खूब  विभोर ||

कमल खिलत है जब तला  , कमलगटा भी होत |
सब खातइ हैं  छील कैं    , मजा आत  है  भोत ||

माटी भी नौनीं तला  , करत खाद को काम |
कौस कात सब लोग हैं , खर्च  होत ना दाम ||

बुड़की लैबें गय‌‌ तला   , बचपन के दिन याद |
बै दिन अब गय है बिसर , लामी   है   तादाद || 

भरें लबालब जब तला ,  पानी  बरसें    यैन |
तब किसान खुश रात है,  छाती में  रत ‌चैन ||

-बुंदेली  *ओट*

करो ओट में चोट नइँ , खुलकैं कर लौ बात |
लबरयाट भी छोड़ दो , करौ न कौनउँ घात  ||

भड़या चोरी जब करत , लेत कितउँ है ओट |
सन्नाटे में घर घुसत     , दैत  चुरा   के  चोट || 

कभउँ बड़न की ओट में  , रक्छा भी हो जात |
तनक मनक गलती छुपे , आगे सीख सिखात ||

पानी   बरसे  गैल  में , ओट पेड़ की  लैत  |
तन बचात भीगें नहीं , मन में भी यह कैत ||

ईश्वर  ई संसार में  , हम तो खा रय चोट |
चरनन में अस्थान दो , राखो अपनी ओट ||
विषय - अकता‌ ( पहले )

अकता से कछु  आन कै , घेर जगाँ खौं लेत |
सबसे पाछे जात फिर ,   कछू  लेत ना देत || 

उकता भी उनसे गये , जो   अकता  से आत |
करत खुपड़‌ मंजन सबइ ,अन्न-बन्न  की  कात ||

घर में शादी ब्याह हो , खबर तनक   ही पात |
अकता से  आबें फुआ ‌, काम समारत जात ||

गये नहीं  ससुरार ‌है , अकता कैं लइ सोच |
करने जाकै  दोदरा , करने  खूब  निपोच‌ ||

हरि भजन साधू मिलन , जितै जुरौ मिल जाय |
अकता कै ही पौचियौ , आनद  मन  में   छाय  ||

अकता कैं ना बोलियौ , पैलाँ सुनियौ बात | 
बूड़े बुुजरक देखियौ  , बे सब कैसो  कात ||

बुंदेली विषय - अकूत ( बहुत सा )

पइसा धरैं  अकूत हैं  , सबरे   धन्ना   सेट |
लूटत रत हैं रात दिन , बढ़ा -बढ़ा  कैं  रेट ||

बे सब  लोभी जानियो, नकदी जितै अकूत |
पाई - पाई  जौरतइ  , बनके   करिया भूत ||

है अकूत नकदी जितै ,   जौरत भर कैं हाँप |
मर कैं भी रक्छा ‌करत , बनकें करिया साँप ||

ह़ै अकूत जब ग्यान तो , कर लौ प्रभु का ध्यान |
संतन कै पकरौ चरण ,   करौ   खूब  गुणगान ||

कछू जनै दोहा लिखत , भइया भौत अकूत |
ध्यान न देतइ दोष पै , दैतइ   ऊखौ   खूत ||🙏700

सुभाष सिंघई

विषय - अतपइ (आधा पाव)

अतपइ भर कौ जू  नहीं , करत सेर की बात |
जैसे पलना में परौ ,    लरका   घालत  लात ||

अतपइ अद्दा आजकल , चमचन कौ धर रूप |
राजनीति में घुस‌ गये  , पा  रय   उजली  धूप || 

अतपइ भर गुर चौंट ‌लो  , जितै मनन कौ ढ़ेर ||
कौउ न रौकत आदमी , लुचत जात   है ‌  सेर ||

अतपइ  भर को  बाँट भी , रत तो गोल मटोल |
पलवाँ पै चढ़ जात तौ , रखत  हतौ निज मोल ||

चल सुभाष हौरी खिले  , अतपइ भर ले भाँग |
बाँटो‌  घोटो ‌खाव जू ,   नशा  चढै  सब  आँग ||

अतपइ पउवा  सेर भर , अद्दा  देखे  बाँट |
और पसेरी मन तके, चौरी    पैला   छाँट ||

अतपर (बीच में)

अतपर के बे काम रत , जीमें  मचत उलात |
आदे पादे भी ‌दिखत ,   ‌‌‌ ‌‌नईं सार भी रात ||।

अतपर कौ बतकाव भी , भौत तासतइ मोय |
सार  कछू निकरत नईं , समझाबे  ना  कोय ||

पंचायत निपटत  नहीं , अतपर  में रत  बात |
लरन लगे लबरा जिते  , देन. लगत‌‌  हैं घात ||

छंद न अतपर को  लिखो , लय में रखो  विधान  |
करत कोउँ  संकेत   तो  , गुनौ ‌  तनिक‌ श्रीमान ||🙏

ज्ञानी है अब सब जनै ,   सबखौं   करत  प्रनाम  |
अतपर में   ना बोलनें   , रत मौखों अब  ध्यान ||🙏

सीखा दोहा रख  लगन ,बे  लिखतइ  निरदोष |
पर अतपर  में जो रहत , उनै  न  आबे ‌  होश || 🙏

विषय‌- अतर 

अतर महकतइ जब जितै ,खुश हो जातइ लोग |
आतइ कछु   मुस्कान है   ,जैसें  पा  लवँ  भोग |

समधी पै छिड़कौ अतर , मल दइ लाल गुलाल |
समदन   घूँघट डार  कै ,      तान गयी है गाल ||

जीजा होरी खेल रय , अतर  लयै  है  साथ |
सारी  खौ  पुटया   रयै ,  सूँगौ    मौरे  हाथ ||

अतर लगा कै घूम रइ , जीजा की  साराज |
रंग नहीं डलबा रयी ,  कै  रइ  हम  नाराज ||

अतर डली हम ल्याय है   , भैया   लाल गुलाल |
हँस गा कै अब  सब  मिलो , नौनें राखौ ख्याल ||
बुंदेली विषय - अथौ , ( शाम )

बैरा हो गइ है अथौ  , ढिलया रय‌ है काम |
थकै दिखै मजदूर‌ सब , चाहत है आराम ||

जैनी जन देखत अथौ  , अंथउँ करबे जात |
दाना कौनउँ अन्न कौ ,  नहीं रात खौ खात ||

सब दिन करतइ काम है , खेतन डटे किसान |
देख अथौ घर  लौटतइ ,  बारे    बूड़े   ज्वान ||

हो गइ बेरा ‌है अथौ , जुर    गइ भीड़ अथाइ |
चर्चा को है अब विषय  , कीकी भगी  लुगाइ ||🥰🙏

देख अथौ हम ले कलम , लिखतइ ‌रातइ छंद |
पर पंचायत छोड़कैं ,      मन से लें आनंद ||

बुंदेली - -इतइँ //इतइ (यहां)

सबखौं  दुनिया में इतइँ , मिलत करम से न्याय‌ |
 मीठे खौं  मीठो  मिले ,    खट्टौ   खट्ट   सुँगाय‌‌ ||

बुंदेली  सीखे  इतइँ ,    सबइ   जनन  के  संग‌ |
कछू दिनन में सीख कैं , मैं  भी   भवँ तौ‌   दंग ||

पाप पुन्य सबरै इतइँ ,   लोग  कमा  कैं जात |
बिधना तौलत खूब है  , नक्की फल बतलात ||

सबकै  मन में भी इतइँ , लगतइ खूब हिसाब |
फल भी सबरै जानतइ , कैसी   बने  किताब ||

आओ बैठौ सब इतइँ , कर लो मन से बात |
हराँ -हराँ चर्चा करौ ,  करियौ  नहीं  उलात ||

इतइँ आप हैं  हम इतइँ , लिखत इतइँ मन खोल |
गुर  जैसी  गुरयाइ- से  ,‌   सब    बुंदेली     बोल ||

24.3.25- सोमवार - काय (क्यों)

अब बोलत हो आन कें , पैल न बोले काय |?
चिड़ियाँ चुग गइँ खेत हैं , डूठा रयै दिखाय‌ ‌||

नेतन के घर झारतइ ,  चमचा बन रय काय |?
कौन बिदी है गट्ट अब  ‌, नस खौ रयै छिपाय‌  ||

नाक फुला के घूम रय , थुथरी बिगरी काय |?
कौन चुभी है बात अब, मौखों देवँ  ‌सुनाय ||

साँसी बातें छौड़ कैं , लबरयाट   है   काय |?
दौदा पच्ची है मची , सबइ   रयै  चिल्लाय‌ ||

सोचत  नेता काय नइँ , दयैं   दौंदरा  आज |
मंदिर मस्जिद कर रयै ,तनिक बची ना लाज ||



29.3.25- शनिवार - हुलहुलाट (हर्ष में जल्दबाजी )

हुलहुलाट में हाँ भरी , कीनौं  नइँ  विचार |
खट्टौ खा गय‌ पौच के , रै गय गटा पसार ||

हुलहुलाट जी में मचत , खबर खुशी की होइ  |
लेंगर   जाकैं   ‌देखनें ,  सोचत   सबरे ‌‌  सो़इ  ||

हुलहुलाट में लर गये, जब चुनाव थो गाँव |
हार गये सो रो रये ,   जमा  न   पाये पाँव ||

हुलहुलाट में ‌ देखतइ , छूटत  तनिक विवेक |
सोच नहीं   तब  पात है , कौन काम है नेक ||

हुलहुलाट सबखौं मचत , पर जो  करत विचार |
पाँव   बढ़ातइ सोच कै , ल्यात  जीत  ‌उपहार ||

बुंदेली विषय - तुचक ( सिकुड़ना ) 

अच्छे -अच्छे शूरमा , फूलै   फिरतइ  गैल |
वक्त परे पै जै तुचक , खूब कुकाबैं  मैल ||

पइसा  में फूले फिरत , जिनै चढ़त गर्राट |
गट्ट बिदै पै जै तुचक ,   करै  मताई‌ याद ||

फूली पल्ली गइ तुचक , पिल्ला परै दिखात |
येसइ मानव देह अब , अपनौ  हाल बतात ||

तुचक गयै सब यार अब  , कपन लगै हैं हाड़ ‌|
थौरे दिन सब कात है ,      रयै बैठ कैं  काड़ ||

तुचक गयै अब गाल है , पुपला मौं  है  आज |
गोरी जिनखौ पोत कै , कभँउँ करत ती नाज ||

बटुआ = पर्स

बटुआ में पैंला सबइ , चीजें धरैं  ‌समार |
धागा की ‌रत ती लरीं ,करबें‌ बंद किनार ||

बूड़ै बब्बा ‌साव जू  , बटुआ रयैं     चपाय ‌ ‌ |
लौंग सुपाड़ी लायची , सबखौं रयै खवाय ||

बटुआ देखे  गुलगुले , हमने  गोरी  पास |
पइसा जीमें थी रखत , चीजें पत्री खास ||

बटुआ लयँ जो हाथ में , रत ती ऊकी शान |
बडौ आदमी कात तै    , दैत   हतै सम्मान ||

घरै आयँ जब  आदमी , बटुआ  देबें खोल |
और सुपाड़ी दे कतर ,  मीठे   बोले   बोल ||

बटुआ-सी है जिंदगी , गुनियाँ   करत विचार |
खुलत बंद में नइँ पतौ , फट जे किते किनार ||


बुंदेली विषय - हरदौल 

शकुनी के सँग कंस भी , मम्मा  द्वय बदनाम |
पर मम्मा हरदौल खौं , सबरे   करत  प्रणाम ||

देव बने हरदौल हैं ,  जिनके गीत अपार |
गाती राती नारियाँ , व्याउ काज घर द्वार ||

धन्य ओरछा  है नगर , धन्य राम कौ धाम  |
धन्य वीर हरदौल हैं , अमर जगत में नाम ||

गाथा श्री    हरदौल की ,     बुंदेली जन गाँय |
भावी खौं माँ मानियौ,  जग खौ यह बतलाँय ||

नमन सुभाषा है करत , दौइ  जौरतइ  हाथ |
नाम लेत हरदौल कौ ,  धरत चरन में माथ ||

--फुकना/फूँकना (गुब्बारे)

फुकना से फूले फिरैं , फूफा देख बिआव | 
गटा तरेरे कत फुआ , हल्ला नईं  मचाव ||

जितने फूले फूँकना , तुचक समय पर जात |
कछू  फुट्ट भी पैल से , सबखौं  खूब दिखात ||

फुकना से ना फूलियो , ज्ञानी कत   है बात |
पइसा टिके  न हात पै , खर्चा सब हो जात ||

गुस्सा में भी आदमी,     फुकना- सो  जै फूल |
नँग-नँग फरकत से दिखें ,मचत हृदय में हूल ||

सूपनखा नकटी बनी , फुकना -सी गइ फूल |
फर्रानी ऐसी  फिरी ,    मिट गइ रावण चूल ||

(बुंदेली).  -गुड़या ( सिकुड़‌ना )

जो भी खुलकें बोलतइ , शरम न तनकइ  खात |
कैलातइ    बें   सूरमा     , करत  न गुड़या बात || 

गुडया कैं जो बौलतइ , खौ    देतइ   विश्वास |
चुप्पा कत सब लोग तब, खूब  हौत परिहास ||

दाड़ी में तिनका खुजा , गुड़या के रत चोर |
चर्चा हो बदमाश की ,  देखत सबकी ओर ||

चर्चा हौबे ब्याव की , मौड़ी   गुड़या  जात |
धीरे से सबकी सुनै , अपने  कान चढ़ात ||

गुड़या के उन्ना रखत , सूटकेश  में आज |
गये पुटइयन के दिना , और पुराने काज ||

सुभाष सिंघई 

पवारौ = { किसी वस्तु को बलात देना }

भारे को सुनतइ ‌इतै , करत पवारौ‌ लोग |
खाज मानतइ काज खौं , ठाड़ो बैठौ रोग ||

ब्यादें जितनी हैं  बिदीं , माँय पवारौ आप |
बाजे बजै न  खोपड़ी , बनै  राव चुपचाप ||

माँय‌ पवारौ काम  बै , घर में मचबै दाँद ‌| 
सला सूद हौबें नँईं  , चलबै  बैसइ धाँद ||

भइया हैसा माँग रवँ , सबइ पवारौ दाम  |
और कमा खा ले इतै , भुन्सारे से  शाम ||

लगे पवारौ -सौ जितै,      उतै न डारौ हाथ |
सार स्वाद भी नँइँ  मिलै , फूटै अपनौ माथ ||

काम पवारौ -सौ  नँइँ , कौनउँ करियौ आप |
बदनामी हातै लगै,      बिगरै  अपनी छाप 

बुंदेली - बुरय (खराब)

बुरय न हौतइ कोउ है   , समय बुरवँ जब आय |
अच्छौ   खासौ  आदमी  , फिरबें   मूँछ  मुड़ाय‌  ||

दास कबीरा गय हतै , करन बुरय की खोज |
अपने भीतर देख लवँ , खुदइँ बुरय को ओज ||

कर्म बुरय जब हौय तो , बुरय‌ मिलत परिणाम |
अँदयारे के काम में    ,काँसे    मिलबें    घाम ||

करें  बुराई  जौन  नर ,     बेइ   बुरय  लो जान |
कभउँ  न सुदरै  लोमड़ी , और  काग लो जान ||

बुरय बोल हैं मिर्च- से,   साँमै  ठसकी  आत |
लरबें खौं सूदै  फिरै ,   मौं   पै नर  झल्लात ||

बुरय  काम में हाथ भी , नहीं   भूल कैं डार |
बदनामी तब हौत है ,  जीकौ    नहीं समार ||

सुभाष सिंघई
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विषय - नीरौं- पास में)

प्रभु नों मन नीरौं रयै , करत भजन दिन रात |
कछु ना सूझत और है ,  कहे साधु की जात ||

नीरौं समधी रात है , समधन ले आ जात |
गप्पे फाँकत बैठ कैं , मूँछन ताव बतात ||

नीरौं  दुश्मन है भलौ , रात सजग सब लोग |
गलती कौनउ हौय ना , जुरबै   नहीं कुयोग || 

नीरौं कुत्ता हौय‌  तौ , ऊखौं  रवँ पुचकार |
ऐसइ ऐबी हौय नर , करियौ  उयै जुहार ||

सबसै नीरौं सुत लगै , फिर नाती भी आत |
बिटिया के संगे धना , नीरीं लगत जमात ||

नीरौं घर के सामने , कलुआ कुत्ता रात |
भौकत रत है रात दिन , गरौ फाड चिल्लात |

सुभाष सिंघई
 (बुंदेली)-कचरिया

पकी कचरिया देख कै , पंछी‌   खाबे   आत |
खा पीं कैं खुश हौत हैं , अपने सुर  से  गात ‌||

बिरबाई पै बेल चढ़ ,           बसकारें फर जात |
जिसके फल जब भी पकें , उनै कचरिया कात ||

कच्च कच्च दाँतन तरैं , निकरत है आबाज |
पकी चाय सूकी रयै , यही   कचरिया राज ||

हरी कचरिया है करइ ‌, पक कैं मीठी हौत |
रँग हल्कौ पीरो परै , स्वाद   देत  है  भौत ||

सूक कचरिया तेल में , तलकैं भी जब आत |
नमक मिरच  जब लें  भुरक, स्वाद भौत दे जात ||

सुभाष सिंघई

शनिवार -प्रतियोगिता  विषय -बींग (कमी)

नाक चढ़ी जिनकी रयै ,    सूँगें  रख्खी  हींग |
खत गइ डिबिया में रखी , जेइ काड़ दैं बींग ||

कमल नयन-सी आँख में  , बींग ढूँढ रय मित्र |
कत फरकत  जाँदा लगत , भद्दौ  लगबै चित्र ||

बींग लगातन का लगत , तरुआ तनिक हिलाय | 
कै दइ लरका है पियत , थुतरी  सोय    बसाय ||

कनआँ अपने   टैट को , भूलौ   रयै  बखान  |
कात फुली की बींग‌ है , ऊ   लरका में  मान ||

बींग बिगारौ  है करत , बिगरे साजो काम |
लोग-बाग   पाछें परैं , कर   दैबें  बदनाम ||

बुंदेली विषय - मड़बा 

नेग चार मड़बा तरैं , सबइ सगुन के  रात |
मम्मा दैतइ प्रेम से , भानेजन  कौ  भात ||

मड़बा मंगल हौत है ,       व्याय काज हो गेह |
लिपत पुतत पत्ता  डरत ,  बैठ करत सब नेह || 

मड़बा गाड़त पावने  , मान दान जो होय‌ |
हरदी हाते पीठ में , घालें  महिला   सो़य ||

हरे बाँस  मड़बा  लगै  ,  पत्ता  छाबैं  आम |
गीत गाउती जुर सबइ , हौतइ जौन तमाम  ||

पूजा हौबे मेर कीं  , जब मड़बा गड़‌ जात |
मंगल करबे काज सब , सबरै देव बुलात ||

मड़बा के जब नेग हों  , फुआ  बैठ जै  पैल |
काबे  हमें बताउने ,   आगें   सबखौ  गैल ||800

12.5.25-सोमवार बुंदेली --भैंरन्टा(अतृप्त भूखा)

भैरन्टा मुलकन मिलत, अपने दाँत निपोर |
गटा गिद्ध से  हैं रखत , जैसे खा जें   टोर ||

भैरन्टा    टपयात   हैं , अपनी   जीभ निकार |
मिलतन ही वह चाँट लें , टपका- टपका लार  ||

भैरन्टा ना   तृप्त हों , चाहे   जितनो खायँ |
सबइ डकारे फिर उतै , फैला हाथ मँगायँ ||

भैरन्टा की है नहीं ,   अलग    परे    से जात |
यह सुभाव समझो नियत , सूदी सच्ची कात ||

भैरन्टा की जात में        , नेतन खौं लौ मान |
कितनउँ खा जै देश को , पर भूखे रत आन ||

भैरन्टा  मन  रोग  है , होत   नईं    संतोष |
समझाबौं बेकार रत , है यह  जग में दोष ||

17.5.25- शनिवार(उजड्ड --लड़ाकू स्वभाव का)

लबरा ढोर गँवार खौं ,  मानत   सबइ   उजड्ड |
कत यह मूसरचंद हैं , और   अकल से  खड्ड ||

हौ उजड्ड से सामनौ , बरकत हैं सब लोग |
कौन  बीद कै लाय घर ,   ठाडै  बैठें  रोग ||

जितने  हौत  उजड्ड   हैं , लरबे   ठाँड़े   रात |
तबइँ मानतइ जे सुनो , खा लें जब दो लात ||

बन उजड्ड  लरबे फिरे  , बाँड़ी    पूँछ  उठाय |
थुथरी जो भी दे   मिटा , नाक रगड़बे  आय‌ ||

जब उजड्ड बन जात है , अपने घर को पूत |
भौत उरानै आत है ,        संगै  लयै सबूत ||

19.5.25-सोमवार बुंदेली --उट्टी(मित्रता तोड़ना))

उट्टी कट्टी कर लयी , अब नइँ   जाने पास |
लच्छन भी उनने  बुरय , पाल लये  हैं खास ||

उट्टी भारत राखतइ  , दुष्टन   में है   पाक |
ठान रार कटवाँ करे , वह तो अपनी  नाक ||

उट्टी  उनसे  सब करो ,   जौ  हौं  दारू खोर |
अपनो चलन सुदार कैं , तकौ न ऊकी ओर ||

खट्टी कड़वी बात से , उट्टी  भी  हो  जात |
रार बढ़ाकैं  लर परै , आपस नईं  पुसात || 

उट्टी उनसें ना करो  , जो कत साँसी बात |
चलत गैल ईमान के  , राखे भाव बिलात ||

सुभाष सिंघई

24.5.25- शनिवार   अटर (परिश्रम)

नहीं अटर के काम हौं  ,  कात आलसी लोग |
जादाँ जिद जब कर चलौ , चढ़ जै इनपै रोग ||

जिनपे होतइ नइँ अटर , करत बहाने आन |
एक जगाँ जै बैठ कैं   , पेलत सब पै  ज्ञान ||

माते मुखिया भी अटर , सबसे करवाँ लेत |
सुस्ताबे की टैम ही    , चिलम  तमाकू देत ||

दद्दा  सबके कात  हैं  , जी खौं नईं  चुराव  |
अटर करो मन से सबइ , फल भी नौनों पाव ||

अटर मटर में हौत है ,   छीलो पहले आप |
जोरू जैसी दे बना , खा लो फिर चुपचाप ||

सुभाष सिंघई

26.5.25-सोमवार बुंदेली कंठी (तुलसी माला)

कंठी पैरें है मिलत , साधू संत सुजान |
चंदन टीका माथ ‌पै , देतइ है पहचान ||

सूखी तुलसी  से बनी  , कंठी अच्छी हौत  |
भजन जाप सब ही करत  , धोक दैत हैं भौत ||

कंठी लेकर हाथ में , पैल झुकाऔ  माथ |
बोलो फिर मौं से वचन , दैवँ  भजन में साथ ||

कंठी की   हौ  शुद्धता , मिले हृदय में चैन |
नींद  सुहानी हौत है ,   जब भी आबै  रैन ||

विस्नू  प्रिया तुलसी रही , सौ लौ  विस्नू  नाम |
कंठी गुरिया फेरियौ , सफल हौंय सब काम ||

31.5.25- शनिवार  भन्ना (फुटकर पैसे)

चिल्लर सिक्का धात के, सब भन्ना कैलात |
मिलकै सब जै है बजत  , हम भी सब खनकात ||

भन्ना बजतइ जेब में , भारी भी हो जात |
कभउँ जेब भी फार दे, गिरकैं घूर समात ||

भन्ना के दिन बीत गय , बने सबइ इतिहास |
आज डिजीटल युग बना, लेन देन में खास ||

बूड़ी डुकरौ  जौर   कैं ,   भन्ना लाईं  पास |
गिन सुभाष कितने हुए , तौपे  है विश्वास ||

नन्ना  भन्ना बाँट रयँ , नाती पास बुलाँय |
टउका करवा चार ठौ , सबके हाथ थमाँय ||
2.6.25- सोमवार-बन्ना

बन्ना बन कैं  आ गये  , चारों    भइया   राम |
दशरथ के संगें  जनक , सबखौं करौं  प्रणाम ||

महादेव बन्ना बने ,    नंदी   पै   चढ़ आय  |
ब्रम्हा पढ़ रय भावरें ,    विस्नू भी हरसाय ||

किशन जसौदा सें कहें , मौरो व्याह कराव |
बन्ना मौखौ    मान कैं ,   बन्नी  राधा  लाव ||

बन्ना नारद गय बनन , धर बँदरा  को  रूप |
हँसी  करा कैं आ गये ,   बन ना  पाए  भूप ||

बन्ना जब भी नर बनत , मन भारी हरसात |
सबइ लोग इज्जत करत , आगें सब बिठलात  ||

सुभाष सिंघई

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7.6.25- शनिवार - भिनकत/भिनकती 

बात भिनकती है उतइँ ,   लबरयाट हो काम |
उल्टी सूदी  फाँक कैं , होय  सुबह कौ शाम ||

भौत भिनकती बउँ धना , मुलकन धमकी देत |
पिटिया धुतिया बाँद कैं ,    भगबें की वह केत ||

टेड़ी थुथरी कर धना , गयी  भिनकती खेत |
रोटी डुकरे चाँप कैं , पटक आँइ कछु केत ||

बात भिनकती पौंच गइ , ‌सुन रय लम्बरदार |
नईं सुदर हालात रय‌ , दिख रय सब लाचार ||

उतइँ भिनकती है मछौ , जितै गुरीरौ हौय |
दौरत सबखौं काटबै  , बचा न पाबै कौय ||

सुभाष सिंघई
9.6.25-सोमवार बुंदेली -नातर (नहीं तो)

भारत कातइ  पाक  सें , पुतरा  सुन ले  बात |
नातर खाबै खौं मिलें , हम सब  के  दो हात  ||

समझा कैं सब हार गयँ , ठेंटा खोलो कान |
नातर कड़जै अब  हवा , तोरी पाकिस्तान ||

नइँ करियौ तुम चीं पटा , चुखरयाइ दो फेंक |
नातर अब कनबूजरै , देंयँ   पाक  हम  सेंक |

कई बेर तै हार गवँ , अबकी  आखिर मान |
नातर बिद कै सामने , मर जै   पाकिस्तान  ||

भारत खौं गुस्सा भरौ , करियौ नईं   बबाल |
नातर तोरी पाक अब  , चिथ जै पूरी खाल ||

10.6.25-मंगलवार-हिंदी  चूना

स्वागत में आगे रहे ,     कत्था चूना पान |
लोंग सिपाड़ी लायची, दे सबको सम्मान ||

चूना खाते पान से   ,  तम्बाकू    में   डाल |
रगड़े उसको जोर से , थपकी की दें  ताल ||

कटनी  चूना खान है , देखे  ढेर अपार |
जाता पूरे देश में ,  अच्छा   कारोबार ||

दीवाली का हो समय ,जब भी पुते मकान |
चूना से बनते कलर ,    जाने सभी जहान ||

चूना में  है कैल्शियम , यह भू का  उपहार |
कहीं दवा में काम दे , करे    कहीं  उपचार ||
14.6.25- शनिवार  रचैया/रचनाकार ।

बड़े रचैया गीत के , मिलतइ इतै सुजान |
बुंदेली शुभ  शान की,  राखत सब पैचान ||

एक रचैया ईसुरी ,  लिख  चौकड़िया  छंद |
अमर नाम खौ कर गये , दे सबखौ आनंद ||

एक रचैया भी सुनौ , जगनिक जिनको नाम |
लिखकें आल्हा गा गये ,   नगर महोबा धाम ||

नगर ओरछा कवि भये , केशव जू महराज |
बड़े रचैया ग्रंथ के ,   कवियन  में  सरताज ||

भौत रचैया है मिलत , जिनके सुंदर गीत |
गातइ हैं सुर ताल से , राखत सबसे प्रीत ||

बनत रचैया हैं तबइँ , जब माँ खुश हौ जात |
लिखत प्रेम सै सब जनै , तब उमदा सब कात ||

सुभाष सिंघई 
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16.6.25-सोमवार बुंदेली रनवन (अस्त व्यस्त)

रनवन जिनकी जिंदगी , उनखौ चिंता रात |
ठिया ठौर भी ना रयै , दिखतइ है अकुलात ||

कछु ठैकै रनबन रयै , दाड़ी मूँछ बढ़ायँ ‌|
गप्पें मारें  बैठ कैं , दिखत  तमाकू खायँ ‌||

रनमन तन मन भी दिखे , जी भी रत बैचैन  |
बोलत बौ है कुछ अलग , कउँ मटकाबै नैन ||

रनवन जिनकै घर रयैं , भिनतक रत हर चीज |
लगतइ  सबखौ  है उतै ,    खौ गइ इतै तमीज ||

अनबन से रनवन कितउँ , तन मन सोइ दिखात |
चिन्ता में जी रात है , तन की    खाज खुजात ||

सुभाष सिंघई

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21.6.25- शनिवार भियाने/ भ्याने  (कल सुबह )

भ्याने कभउँ न आत है , जो रत है वह आज‌ |
जो करने सो कर चलो , रखकैं निज आबाज ||

पइसा माँगे साव से , बोले   भ्याने    आवँ |
गानौ रखकै‌ खूब तुम , रुपया सब  ले जावँ ||

टर गइ भ्याने बात है ,      उचट गई पंचाट  |
जौरो फिर से जोगना , और बिछाओ खाट ||

भ्याने   नेता आवने , सड़कें  हो रइँ साफ |
कल्लू से कइ आइयो , हौजे करजा  माफ ||

करौ आज की आज सब , भ्याने पै ना टार |
साजे काम बिगार दे , जो‌   टपकी  है  लार ||

सुभाष सिंघई 

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23.6.25-सोमवार बुंदेली - मछौं (मधुमक्खी)

लगत पेड़ पै जब  मछौ , छत्ता बड़ो    बनात |
भौत शहद निकरत उतै,  लोग टौर कैं आत || 

अगर छेड दो तुम मछौ , काटत ‌येसौ आन |
फुला आँग सब देत हैं , संकट में   हों प्रान ||

घर के बेड़ा सार में , कभउँ मछौ लग जायँ |
मिले धुआनी जब उयै, छोड़ मछौ तब आयँ ||

लोग मछौ भी पालतइ , शहद लेत हैं  जोर | 
बेंचें खूब बजार में , कर   लें   पइसा  ठोर ‌||

चिपके जब तन पै मछौ , भौत कुकातइ आँग |
सुइयाँ - सी लगबे बदन , मचत खूब है स्वाँग ||

सुभाष सिंघई 

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28.6.25- शनिवार विषय रसा  (सब्जी का रस)

सब्जी साजी हो बनीं ,   गरम मसालेदार |
रसा लगै तब चटपटौ , भरै जीभ में लार ||

परसइ़या जब आत है , कात रसा दो डार |
लुचइँ मीड़ कै सूटनैं , मजा पड़े  इस बार ||

परसइया पत्तल बिछा , दुनियाँ   देबे  डार |
रसादार सब्जी बनी , कातइ  भौत बहार ||

रसा रयै हर काम में , मन  में  तब   आनंद |
बरसत तब  सबके हृदय , सुंदर- सुंदर छंद ||

अगर रिसानी बात हो ,  उतइँ रसा सड़ जात |
जैसें   पथरीली   जगाँ,   अन्न नहीं उग पात ||

 बुंदेली - पोतनी (पीली मिट्टी)

है खदान में पोतनी ,       खोद  सबइ लै आत |
घर पोतत लीपत रहत , दिखती यह   मुस्कात ||

दीवाली पै पोतनी ‌, खरिया माटी लायँ |
छरिया की दीवार पै, उम्दा पोतत जायँ ||

जीवन में भी पोतनी ,भौत जरूरी मान |
बुरे काम सब पौत कैं , अच्छे करो सुजान ||

खोदन जाओ पोतनी , सब साजी ले आवँ |
कचरा माटी फेंक कै , घर पूरो चमकावँ ||

गुदर घरन में पोतनी , अच्छी ठंडक देत |
थोरो  पानी दे छिड़क , आनंदी सब लेत ||


5.7.25- शनिवार बढ़वाई (प्रशंसा)

बढ़वाई ‌   के  जोग  बे  , जय   बुंदेली    मंच |
जौन ललक से सीख कैं  , आज लिखत सौ टंच ||

बढवाई अच्छी लगै , सबखौं    ई ‌  संसार  |
तनिक बुराई काड़ दें , भबकैं  बन अंगार ||

बढ़वाई के बाद  भी , सुने   बुराई कान |
ऐसे मानस सीख कैं , भौत करत उत्थान ||

बढ़बाई उनकी रयी , जिनके नौनें काम |
नेता वीर सुभाष को , आजादी में  नाम ||

बढ़वाई  में राष्टपति ,   अब्दुल  साब कलाम |
जिनखौ झुक कैं देत ते  , आदर और सलाम ||

बढ़वाई बे रत सुनय  , फूलत रयँ  भी येन |
तुचकै खोटे कर्म सुन,  बोले  हो गइ  ठेन |||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०


7-.7 .25-सोमवार बुंदेली -धाक (प्रभाव)

धनुष टौर कैं  राम भी , अपनी  धाक जमात |
लछमन ताली दें बजा ,  सिया मनइँ हरषात ||

भारत ने इस बार भी , हरा  दऔ  है पाक  |
बन गइ हैं संसार में , फिर से   नौंनी धाक ||

धाक जमातन का लगत , कर लो नौनें काम |
चार जनै  तुमसे करैं,   आकें जय  सियराम ||

सुनौ विवेकानंद जब , गये शिकागो देश |
सम्मेलन में छा गये ,  जमा धाक परिवेश ||

धाक वही अच्छी रयै , कभउँ मिटे ना आन |
चार जनै मिलकैं सदा ,      दैत रयै सम्मान ||

12 जुलाई शनिवार -लीचड़/लीसड़ (बेकार निकम्मा)

लीसड़  हौबे आदमी ,     कीचड़  घाँइ बसात  |
टउका कौनउँ   नइँ करत ,  कंडा-सो उतरात  ||

लीसड़‌   हौतइ  आलसी , धरै हात पै हात |
ठलुआ ठेंगा बन करे   सबसें उल्टी  बात ||

लीसड़ बोलो एक दिन , मर कैं कौ ले जात |
सौ सब छोड़ो काम खौं ,  परे रहो ‌दिन रात ||

लीसड़  अपनी  बात में  , कात न कौनउँ सार |
लुड़का  सबरौ रायतौ  , कातइ  नईं   बघार ||

लीचड़  लबरा आलसी , कीचड़ ही लो मान |
फैलातइ यह गंदगी ,     दिखबें  खतरेजान ||

14 जुलाई सोमवार   बुंदेली - विषय - बजे भये 

बजे भये बे साव हैं  ,     सबखौं  देत उधार |
ब्याज टका बस तीन से  , देबें आँख पसार ||

बजे भये नेता रहत , अपने भारत देश |
करत दाम से काम हैंं, जो भी हौबे पेश ||

बजे भये दद्दा हते , करत हते ‌ते न्याय |
चार जनै भी आत ते , लैबें उनकी राय ||

बजे भये बे देवता , लगत रात दरबार |
अरजी सबकी है लगत , जो भी आबे द्वार ||

बजे भये पी एम है ,     नौनों उनकौं  नाम |
संत महात्मा देंख कैं , सादर करत प्रणाम ||

बजे भये जो लोग है  , सासउँ भौत डरात |
बट्टौ ना लगबें कभउँ , करें समर कैं बात ||

19.7.25- शनिवार गिरा(ग्रह नक्षत्र)

पैड़े पर गय हैं गिरा    , घर में आ रइँ ब्याद |
बरकै भी कितनौ किते,  काँतक मूड़ा साद ||

लरका खौ लग गयँ गिरा , टर गवँ आगें ब्याव |
पइसन खौं दम पार रयँ , घर  के  दौरें ‌‌  साव ||

कौन घड़ी कै शुभ गिरा , हौबें साजै  काम |
पंडित सें   पूछन गये ,    बब्बा राधेश्याम ||

साढ़े साती है लगौ , गिरा न   कौनउँ शांत |
दाँद मची घर में रयै , मुड़िया भी रय भ्रांत ||

कर्म रये साजे जिते , सबइ गिरा फल देत |
खोटे हौवें काम तो , उतर   चामरौ    लेत ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

सुभाष सिंघई
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21-.7 .25-सोमवार. बुंदेली-कसर(कमी)

कसर काड़ दइ बाइ ने ,दयीं लबुदिया चार |
टो डारौ है चामरौ ,          राखौ नईं उधार || 

कसर न राखी ब्याव में , सबइ वरतया कात |
फिर भी समदी ऐठ कै, पटक रऔ है लात || 

कोउ कसर ना रान दें , मन की धन कर लेत |
ऊपर से भोरे बनत ,        गाल बजा भी देत ||

कसर न कौनउँ रान दइ ,  बिन्नू गइँ ससुरार |
नंद  सुदारी   पैल है,    राखी सास   उधार ||

पढ़बै में हौबे कसर , फेल आत परिणाम |
रुइ- सो धुनकत बाप है, भुंसारे से  शाम ||

26.7.25- शनिवार - गुटान(छड़ी)

चलत जात डुकरा अबै ,  अपनी लयैं गुटान |
खुद ही करत उसार है,  धरत रात  सामान ||

गइया  बैला भैसियाँ , सींग दिखाबैं आन |
बब्बा  सूदौ हाँक दे , अपनी दिखा गुटान ||

लरका बिटियाँ दें तगाँ ‌, बब्बा  कहौ कहान |
खुदइँ दुकाँ कैं पूछतइ  , काँ हैं आज गुटान ||

बब्बा काबै देख लो , मोरी  आज गुटान | 
गुन ईमें भारी भरे , जानत सबइ जहान ||

लरका जब मानत नहीं , दमदौरा दें आन |
डुकरा खिसयाँ कैं उठे , गुच्चे कमर गुटान ||

28-.7 .25-सोमवार बुंदेली गुरयाई(मिठाई) 

गुरयाई   के  नाम  घर , चार  बतेसा  पास |
दो खा ल़यँ हैं नंद  ने , दो चटका गइ सास ||

बन रय घर में गुलगुला , पुरा परोसी टेर |
गुरयाई खौं  गुर नहीं   , मचौ बड़ौ अंधेर ||

गुरयाई ना मौं टिकै   , कत सब  खट्टी बात |
ससुर बड़ौ येड़़ा धरौ , बउँ धन सबसैं  कात ||

गुरयाई गौबर भयी , निपुरौ ‌‌ सबरौ स्यान ‌|
चट्ट बिलैया कर गई ,  लुकै धरै पकवान ||

बबरा चीला बन रयै , बसकारे में खूब |
गुरयाई डल तल रये, घी में रय है डूब ||


2.8.25- शनिवार  चाली (नटखट, चंचल)

चाली जीकौ मन रयै , तनिक  रुपत   ना पैर |
भटकत खटकत-सौ रयै, बात करत नइँ ठैर ||

ऊधम दमदौरा करे , चाली ‌काम बिगार ‌|
घरकइया हैरान रत , डाँटत हैं   हर बार ||

चाली की जो चाल में , आकर कैं बिद जात |
गंठयान बीदी रहत , नईं    निनुर   वह पात ||

चाली मौड़ी हो अगर , घर के रत हुशयार |
बिदा न लेबें  गट्ट जा , करतइ रात समार ||
4.8 .25-सोमवार बुंदेली - चलाफिरी (भागदौड़)

चलाफिरी सब देख रय , मची दिखत घुडदौड़ |
अच्छे भले चुनाव है ,     रय वोटन खौ फौड़ ||

चला फिरी करने परत , मोड़ी स्यानी ‌होय‌ | 
नौनो घर वर ढूँढ़बें  ,  रात दिना सब खोय ||

चला फिरी से हैं बनत , बिगरै लुड़कै काम |
‌सब मूड़ा सध जात हैं , भजकैं  राधेश्याम ||

चला फिरी जो नइँ करे, धरे हात ‌पै हात |
उनके काम नसात हैं  , कोउँ सुनै नइँ बात ||

चला फिरी मोरी रयी , रय‌ ज्ञानी हैं   संग |
ई सै राखत आज भी ,मन में भौत उमंग ||

~~~~कारौंच (कालिख)

लगी  हुई कारौंच  है , करकें खोटे कर्म |
नहीं छूट‌ रइ घिस रयै , बैठे हैं    बेंशर्म ||
 
जब चरित्र कारौंच नें , कर लवँ हैं अधिकार |
नईं छूटने कै दयी     ,        ज्ञानी नें  ई बार ||
 
कत चंदा खौं है लगी ,  चुगली की  कारौंच |
सौ निकरत हल्कौ बड़ौ  , लुका छिपा कैं चोंच ||

गंगा भी अब पाप की , नईं  धौत ‌कारौच |
कातइ  भौत बसात है , ई पापी की चौंच ||

11.8 .25-सोमवार बुंदेली -पाछे(पीछे)

आगें पाछे कोउँ   नइँ ,      लगा  देत   है हाथ  ‌|
करम भुगतने सब इतइँ , जौ चढ़ गवँ है  माथ ‌||

आगे चलबै डोकरा,   पाछे चलै दुलैन |
घूँघट से वह  ढूँक रइ ,  हौबे बारी रैन ||

मौ कैं आगे सइ रयैं ,  जौ हौं   जी के  भाव |
भौत बुरवँ सब जानियौ, पाछे कौ बतकाव ||

मौ पै चुगलू चुप रयी ,    पाछे   जौरे    दूत |
कान भरत कत जात है , परने सबखौ कूत ||

आगें    पाछे देख कें     , जो भी चलतइ राह |
धौकों कभउँ न खात हैं ,मिलत सबइ की चाह ||


16.8.25- शनिवार  कुरकुरी

मुइयाँ  खौं लटका रयै ,   दै  रय हैं आबाज  |
काबैं चानें  कुरकुरी ,   मोखों  पूड़ी   आज ||

हौतइ जौ भी मतलबी , अपनौ   काम  सटात | 
खातइ  पंगत कुरकुरी , लुचइ  पुआ सटकात  | 

बात कुरकुरी नइँ करें  ,   भौत बड़े    उस्ताद | 
ढिलुर पुलर बतकाव से   ,कर दें सदा फसाद  ||

काम बिगरतइ है जितै , मौं    टेड़ौ हौ  जात | 
कौनउँ कै दे कुरकरी , ऊखों   फिरै   पटात  || 

कछु लिखत है कुरकुरी , लेखन से कछु बात |
सबइँ जनै तारीफ में, लिखबे    मन से आत ||

18.8 .25-सोमवार बुंदेली -कुलिया(गली)

बे साता नइँ  देखतइ  ,  जी की   औंदी  बात |
कुलिया पुलिया घाट पै  , रचत रहत जो घात || 

कुलिया  बन रवँ  देश  है , नेता रय हैं  बाँट |
जात पात में बाँट कैं , रइयत खौं  रयँ चाँट ||

चुगला कुलिया में घुसौ,  नौंन मिर्च रवँ डार | 
खटमिठ्ठी   बातें करें  , सबखौं रवँ उसकार  || 

कुलिया में खिल्ली उड़े   , नेता  लरौ चुनाव |
जब्त जमानत   हो गई , ठंडौ  पर गवँ  ताव || 

पाकिस्ताँ जब  भी लरौ , गिरौ    कुआँ  में  राँट  |
भगतन  कुलिया में दिखो ,जब दइ  चटनी बाँट || 

कुलिया में पुलिया बनी ,धर दइ डलिया आन |
भड़या लैकें दौड़़ गवँ ,    हुलिया लइ‌  ‌पैचान ||


23.8.25- शनिवार खाऊँ (अधिक खानेवाला)

कैबे  से करबौ  अलग , खाऊँ अलापें  राग |
कर दें    सबरौ सौड़रा  , दें   बदनामी  दाग ||

खाँऊँ मलकत खात हैं   , फेर  पेट पै हात |
आतइ नहीं डकार है , लड़ुआ खातइ जात ||

कुम्भकरण खाऊँ हतौ , सोत हतो घुर्रात |
आतइ ‌नईं डकार थी , रामायन बतलात ||

चार कदम दूभर लगें , खाऊँ नइँ चल पात |
आलस भरकैं सोत है , तनकइ में   घुर्रात ||

खाऊँ खौ न्यौतौ मिले , भारी खुश हो जात |
का का खाबे में बनो ,    पैलाँ पतौ  लगात ||

25.8 .25-सोमवार बुंदेली खिचरी (खिचड़ी

खिचरी है गरमा गरम , पकते चाँउर दाल |
घी भी ऊमें डार के , मजा  मिले तत्काल ||

करती खिचरी हाजमा ,जल्दी भी घुर जाय |
स्वाद लगत नौनों भलौ, मजा भौत है आय‌ ||

तड़का लगै बघार का ‌ , खिचरी खुश्बू देत |
गरम मसालो डार कें , सबको मन हर लेत ||

अब खिचरी सरकार भी , चलें  पाँच तक साल |
गठबंधन    बोलत    इसे , स्वीकारें  हर  हाल ||

खिचरी खाबे वैद्य जी , मानत अच्छी चीज |
खा कै जल्दी ठीक हो , कातइ सबइ मरीज 
30.8.25- शनिवार  खुतैला(अधिक पिटने वाला)

पाक खुतैला जानियौ , खुत गवँ कइयक बार |
भारत ने मौं   मीड़ ‌  कै ,  दई   करारी   हार ||

कालनेमि भी बन गयौ, बड़ौ   खुतैला आन |
चटनी -सी बाँटत   रयै , वीर बली हनुमान ||

नईं खुतैला मानतइ , उचक-उचक कैं आत |
हात पाँव खाँगैं करे ,   पीठ कुका  कैं जात ||

हौत    खुतैला   बेशरम , जुआँ न   रैंगत कान | 
दाँत निपौरत रत ठुकत ,अधिक दैत नइँ ध्यान ||

तान देवँ कनबूजरे    , चायँ  बजा दो  गाल |
चायँ  रगड़ दो पीठ भी , बुरवँ  खुतैला हाल ||
1.9 .25-सोमवार बुंदेली खूसट (मनहूस)

खूसट खौं मनहू‌स  कत, शकल लगत है काग |
उगलत मौ से है जहर , लगत चौंच  भी  आग ||

मिलते खूसट हर जगाँ , रहें    पसारें   टाँग |
मजा देखबें  आत हैं ,     डार कुवाँ में भाँग ||

खूसट लीसड़ जलभुना  , लम्पट    लबरा श्वान  |
काम नसा दैं यह सबइ,  उपत - उपत ‌कैं आन  ||

खूसट सुनबै कब कथा ?, पर आकैं  जै बैठ |
पंडित खौं टौकत रयै  , कहै  सुनाओ‌    ठैठ ||

खूसट के दरसन भये ,     सूक गये है खेत |
नगदी लुट गइँ  हाथ से , झरै   मुडी पै रेत ||

6.9.25- शनिवार  गुर्र (बदले की भावना)

लोग  भजातइ   गुर्र ‌हैं , मौका अच्छौ ताड़ |
मजा देखबैं  आत हैं  ,समय खूब भी काड़ ||

चुप्पा   चुगला    चोटटा , साँप भजातइ गुर्र |
औसर तकँ कैं डंक दें , उड़ जातइ फिर फुर्र ||

गुर्र कभउँ नइँ राखियौ , है यह जलती आग |
मन के अंदर यह जलत , सूकत हृदय पराग ||

रात दिना बेचैन रत ,          गुर्र बाँध जो रात |
ऊ कै  मन खौ तब नहीं , कौनउँ काम पुसात ||

गुर्र धरौ नइँ मन सदा , कै दौ साम बात |
भैया  तोरो काम जो , मौखों नईं पुसात ||

दिनांक 8 सितम्बर 25  ,- बुंदेली- खपरा

बसकारे के पैल ही , खपरा सब पथ जात |
अबा लगा कें लें पका , फिर घर में ले आत ||

छप्पर छौनर  सब करें , खपरा लगे बिलात |
बूँद चुयैं नइँ एक भी ,    क्रम से उनै लगात ||

खपरा लगैं अटाइ में , या छपरी में आन |
यैसे हौत गरीब के , जानों  सबइ मकान ||

घर से बाहर हौय जब , कौनउँ न्यौता आयँ |
खपरा पलटे दौर कौ ,   संदेशों  दे    जायँ ||

बँदरा खपरा फौर दें , गिरतइ आन धचाक |
बसकारे में तब चुअत ,पानी करत मजाक  ||

बुंदेली झूट्टा (झूठा),

मिलते झुट्टा हर जगह , गप्पें   मारें  चार |
ठलुआ ठेंगा यह रहें , समय करें  बेकार ||

भिड़ा दैत यह बात खौं  , और लगा दें आग |
झुट्टा लीला पोप-सी , जीमें    दिखतइ   दाग ||

झुट्टा  खातइ कौल हैं , कर लो अब विश्वास |
कंडी -से उतरात पर ,बने फिरत खुद खास ||

झुट्टा की चल जायँ तो  , ‌   सत्य वहाँ फिर रौय |
फिर साँसी भी बात खौं  , सुनबै मिले न कौय‌ ||

झुट्टा भी पंचात में ,        बैठौ  रात    किनार |
खुसुर पुसुर करतइ रयै , लोगन खौं उसकार ||

15.9 .25-सोमवार बुंदेली , निछांउर (धन अर्पण करना)

नान निछांवर माँग रइ , समधी बुचकै कान |
हाँ-हाँ     हूँ -हूँ कर रयै , दै नइँ रयँ हैं ध्यान ||

नेग चार के बाद ही , करत निछांवर लोग |
मातिन नाँनें कात हैं , नौनों    जुरौ सुयोग ||

नेगन पैं किलकिल मची , फुआ करत है माँग |
पैल निछांवर सब करो,   नाँन  अड़ा रइ  टाँग ||

कामदार सब आत हैं  , रख कै   भारी आस |
मिले निछांवर सावँ कैं  , है वियाव जो खास ||

फूफा  भड़कौ है  फिरत , गिनें  नेग के  दाम |
ईसैं जाँदा  नाँउँ खौ,   मिली   निछांवर  शाम ||
अतिरिक्त बुंदेली - टपरा

टपरा डारत मेड पै ,  जितै बुबैं  हौं  खेत |
घरकइया कौनउँ रहत , रखनबाइ के हेत ||

टपरा में डुकरा परौ,   करें   ढौर हैरान |
लठिया लैकें हाँकबें ,  बाहर कै मैदान ||

टपरा देखे खेत में , बड़े    काम   में  आत |
बसकारौ जाड़े कटे  , रखनबाइ हित पात |

टपरा थुमियन से बनें , लें किसान जब तान |
पत्ता भूसा जैं  चिपक , बन जै अच्छी शान ||

घर के टपरा में कितउँ , खाड़ी खपरा होत |
ढकैं रात है धूप खौं , बसकारौ भी    भौत ||

सुभाष सिंघई
22.9 .25-सोमवार बुंदेली -बिलना  (बेलन)

बिलना सबको एक दिन , आकर इस संसार |
काल चका के पाट पै ,       होने  दुचरी यार ||
दुचरी = कुचली 

सुनो तखइया बानिया , वीरन   की तलवार |
यैसइ बिलना जानियौ , औरत कौ हथियार ||

बिल ना दैबें बाड़़ई , बिलना लिया खरीद |
बोले बिलना बिल नइँ , इतै करौ उम्मीद ||

चिमटा बिलना तंगरा , छरिया और कढ़ाइ |
थेंथौं हँसिया अमकटा , पटा रखें   घरबाइ ||

बैठी  जौरू जब हमें ,      अपने   गटा  दिखात |
बिलना पै जब हाथ हो , लोग खिसक तब जात ||

27.9.25- शनिवार  बिरौनी 

अँखियन कजरा डार कैं ,पलकै लयीं सँवार |
धनुष बरौनी दिख रयीं  , गोरी   के    शृंगार ||

नैन मटक्का चल रयै , दैय बिरौनी ‌साथ  | 
पलकों के संगै दिखे , खूब  लगाए हाथ || 

घनी बरौनी काजरी , मोर पंख की नाँइ |
जैसे बादर में छिपी , सूरज की परछाँइ ||

उड़ै गगन में बादरा , भरे    रात  है नीर |
लगै बरौनी औइ-सी , गोरी सुघड़ शरीर ||

ढकत  बरौनी आँख खौं , पलकन खौं दे आड़ |
पाइ गटन ने है मुफत ,        बैठे घरे जुगाड़ ||

बुंदेली निचाट = सत्य / सार, पक्का 

बहू कबै अब सास से  , कै रय.  बात निचाट‌ | 
इकड़ तिकड़ तुमने करी ,खड़ी करें हम खाट ||

हम निचाट ‌कत बात हैं  , अधकचरौ हौ ज्ञान |
ऊपर से अभिमान हो ,समझों  तब नुकसान ||

लगी हौय   पंचात तब , काने  परत   निचाट |
झूटौं झंडा नइँ गड़े ,       और  लगै  नें   हाट ||

सज्जन के   गुन   देख कैं , सबने   कही  निचाट |
ठोस बात यह ही करत  ,  जिसको मिले न काट ||

है  निचाट यह गप्प भी ,लबरा रवँ जौ फाँक |
हुई  उजागर बात खौं , कम रवँ हैं जौ आँक ||

पंडित जी बाँचें कथा , कै    रय‌   बात  निचाट |
अवनि  और आकाश हैं ,  चकिया के दो पाट ||

4.10.25- शनिवार - भर्रो (अव्यवस्था)

भर्रो खातो है जितौ  , खुली  मिलत  है छूट |
अपनौ हाथ निकार कै , खूब करत सब लूट ||

भर्रो  कातिक में दिखत , नईं मिलत है खाद |
नकली डीएपी बिकै    , खेत हौत    बरवाद ||

भर्रो मच गवँ व्याह में , कितउँ कड़ी कउँ दार |
बगरौ फिर रवँ रायतौ , फूफा    करें   किनार ||

भर्रो अफसर कर रयै , खाँ    बैठे  हैं   लाँच |
उल्टै सब कानून कर , रयै कथा - सी  ‌बाँच ||

नकल टीप कैं पास हैं  , रखत न कौनउँ ज्ञान |
सौलह दूनी आठ कत , बनै    फिरत विद्वान ||
 
11.10.25- शनिवार - गन्नैटी(चक्कर खाना)

घूमत रात किसान है , गन्नेटी-सी     खात |
मिलत नईं है यूरिया ,  ठेंगा सबइ दिखात ||

हँसी खुशी हम जात है , गन्नेटी खा आत ‌|
नेता भाषण में सदा , भारी   भीड़ बुलात ||

गन्नेटी हम खा आयँ हैं , उनकी गये वरात |
सबइ वरतिया लौट के , भूखन रयै बिलात ||

गन्नेटी में घूम रयँ ,    मिल नइँ रओ उकास |
अतपर टाँगें सावँ हैं , हमें   मान कैं   खास ||

गंठयान अब बीद गइ , नहीं निनुर रइ आज |
गन्नेटी हम खा रयै , चिपकी  लगबें    खाज

13.10 .25-सोमवार बुंदेली -बुचके (बंद)

बुचके राखत कान हैं ,     बैरा  बनकैं  रात |
बस मलतब की हैं सुनत , ऐं -ऐं ‌करकें बात ||

बुचके सबरे नेंग हैं , फूपा   गाल   फुलायँ |
मड़वा पैलाँ   गाड़‌ दो , रइ है  फुआ मनायँ ||

बुचके नरदा दौर में ,   चौतरफा    से   आन  |
उठ रइ भौत ‌सँड़ाध हैं  ,नकुआ दे  रयँ प्रान  || 

लेखन बुचके जो करे , देत लोग हैं टोक |
लिखबे बारे खौं लगे , हमें काय रयँ रोक ||

तुचके बुचके अक्ल सें , हौत न साजे काम |
खट्टौ खातइ हर जगाँ , हौत अलग बदनाम ||

18.10.25- शनिवार विषय - भदूना(मिट्टी का ढेर, घरौंदा)

धरे भदूना से घरै  ,   अक्कल    भैंस  चरायँ |
प्यासी पड़िया खौं तला , नुगरी ‌से दिखलायँ ||

नयी बऊ स्यानी कड़ी , भिनकौ रत तौ  दौर |
खुदौ सुदारौ   चौतरा ,   लयौ  भदूना  फौर ||

रखनबाइ  खौ भेज दवँ , सबने एक मजूर |
हतौ भदूना अक्ल कौ , बैठै   रवँ   बौ  दूर ||

कछू विधायक चुन गए , तकौ  भदूना छाप |
बौलत नइयाँ बे  सभा ,    बैठे रत चुपचाप ||

मौं सें बोलो   सब  जनै , नईं  भदूना   रावँ |
चार काम में हात दो , हुनर निजी बतलावँ ||

20.10 .25-सोमवार बुंदेली भबूत(पवित्र राख)

आज दिवारी को दिना , पूजन  करौ  अकूत |
धन  देवी आशीष की , सबरे   लेवँ    भबूत ||

रोग टोटका से अगर ,  बढ़तइ व्याधि अकूत |
तब गुनिया कछु पूजकैं , टीकत  माथ भबूत ||

दीवारी  दीपक जला , होम धूप दो आज |
दें भबूत सब देवता , जब   हो पूजा काज ||

दीवारी के बाद सब  ,ग्यारस‌   देव   जगात |
धूप दीप भी  देत हैं , शुभ भबूत  भी पात || 

मंत्र सिद्ध भी हौत हैं , जीखौं  आत जगात |
ले भबूत माथे लगा , धन्य स्वयं हौ जात ||

25.10.25- शनिवार  भब्बड़(अव्यवस्था)

भब्बड़ में सब देखतइ  , खुली रात है  छूट |
अपनौ हाथ बनात सब , खुली मचत है लूट ||

भब्बड़ हौतइ हाट में , जुरत सबइ जब आन |
अपनी- अपनी सब करत , लेत  देत सामान ||

भब्बड़ पंगत में भई , मच गइ  भागम भाग |
जितै धरी   पूड़ी   चुरी ,   नईं  उतै  है साग ||

भब्बड़ दफ्तर में मचौ, खा रय अफसर लाँच |
फिर भी गुन सरकार के  , बाबू  रयँ है  बाँच ||

कछू जनै भब्बड़ करैं , जान   बूझ के  आन |
अपनौ काम सटात हैं , भटका सबकौ ध्यान ||

लंका में भब्बड़ मची ,  कूँद  रयै  हनुमान  |
जला रयै सब पूँछ से  , रावन    है  हैरान ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

27.10 .25-सोमवार बुंदेली -मंसा(इच्छा)

मंसा राखत  सब जने, जपैं  राम कौ नाम |
गुरिया फेरत ही मिले, मिलबै उनकौ धाम |

मंसा  मन की है फसल ,   जित चाहे उग आत |
कितउँ सौचतइ है भलो , कितउँ लार टपकात ||

मंसा पूरण गय करन , ले   पूजा   सामान |
आशा राखत यैन हैं , अबइँ  सुनै भगवान ||

मंसा जी की है बुरइ , रत हैं    बै भैरात |
होत न खानागान है , ठाँटी हम भी  कात || 

मंसा से सब हौत है , मंसा करम  विधान |
मंसा से इज्जत मिले , कउँ  मंसा नादान ||


1.11.25- शनिवार  मरियल(दुबला पतला)

मरियल सुनतइ बैल है , नहीं दौड़ बें पात |
हल्को पतरो बे बजन , गाड़ी  में  ले जात ||

मरियल टट्टू से धरे , पर   हाँकत  जो    डींग |
ऊ सै कत तब सब जनै , अपनी तक लौ बींग ||

पैलवान   मरियल   धरौ , पर  रवँ है ललकार |
सबइँ देख कैं हँस रयै ,      ऊ कै देख विचार ||

दो आषाढ़  पर दूबरे ,   मरियल   गदहा     रात |
हरियाली लख बे कहत , कछू न अब हम खात ||

मरियल हौबे भाव तो , नईं रचत हैं  छंद |
बेतुक के बातें कहत , आबे  नइँ  आनंद ||

मरियल हौबे  आदमी , तब सबरै हैं  कात |
लगतइ यह है रोगिया , जैसे कछू  न खात ||

सुभाष सिंघई
3.11 .25-सोमवार बुंदेली मांद(गुफा)

मित्रन की उसकार से  ,घुसे  शेर की माँद |
गदबद दैके आ गये , नकुआ घुसी सडाँद ||

शेर माँद में रात है ,    बिल में   चूहा रात   |
घोड़ा रत घुड़साल में, हाथी खुल्लाँ खात ||

अगर शेर की माँद हो , अलगइ भौत बसात |
छरकत सबरै जीव हैं , कौउँ  लिगाँ नइँ जात ||

माँद घौसला बिल मिलें , जंगल में  इस्थान  |
पर हम सबके हौत है , कातइ जिनै  मकान ||

एक माँद में एक रत , रखत शेर है  शान |
जंगल कौ राजा रबै , राखत है    पैचान ||

8.11.25- शनिवार प्रतियोगिता-241- मोंगे (चुपचाप)√

रावन मोंगे रवँ तकत   गदा घली जब आन |
गटा  फार हेरत   रयौ , राम दूत   हनुमान || 

मोंगे    पैलाँ    लंकनी , हँस कै  दांत दिखात |
घली गदा  हनुमान की , लगी तबइँ चिचयात || 

मोंगें  नेता रै  गये   , सुन   चुनाव   परिणाम |
दस हजार  से हार   है , खर्च भयै  सब दाम ||

बातै कत जब बउँ धना ,सहन न  ऊकी हौत |
मोंगें  बैठौ  पौर  में   , डुकरा  मन में    रौत ||

मोंगें हौकें नइँ तकौ   , जित हों   खौटे काम |
चार  जनन कै बीच में ,  नइँ  हौने   बदनाम || 

माटी खाकैं स्वाद लवँ  , मोंगे   हो  गयँ  श्याम  |
जसुदा नें मौं खोल दवँ  , दिखा परौ  जगधाम || 

बुन्देली:-  रंदूला- (सेनानायक, प्रमुख) 

रंदूला नेता बनें ,     चौपट कर   रयँ   देश |
जगन-तगन से नोंच कैं , फैला रयँ विद्वेष ||

रंदूला  गुंडा  बनें ,     बिखरी  आज   समाज |
काम नसानें दिख रयै ,  लज्जित खुद है लाज ||

रंदूला बै हौत सइ ,    जिननों    हो    ईमान |
खातिर देश समाज की ,अरपन कर दे प्रान ||

रंदूला   आजाद   थे , भगत सिंह  सरदार |
गोली खा फाँसी चढ़े , आजादी   के  द्वार ||

रंदूला थे फौज के ,    नेता बोस  सुभाष |
सेना भी जयहिंद थी, करतइ रयी प्रकाश ||

रंदूला बे बन पात हैं , करबै  की  लौ ठान |
मिलत सफलता खूब है ,घटत कभउँ नइँ शान ||

15.11.25- शनिवार विषय रप्पू (धीरे -धीरे चलना

रप्पू -रप्पू हो चलत , धरैं ‌  पुटरिया   ‌मूड़‌ |
धना ‌कात मौखों जुरे, तुम जैसे  है   डूड़ ||

रप्पू- रप्पू हौत जब , भइया    कौनउँ      काम |
कभउँ भिनक कैं रात हैं , कितउँ हौत शुभ शाम ||

रप्पू -रप्पू है चलत ,    नयी  बहू जब  गैल |
सास कात जल्दी करौ , देवँ बदन खौं ठैल ||

मरियल  हौबे  बैलबा ,    रप्पू -रप्पू   जात |
अरइँ गुच्च तब सब उयै ,दौड़न खौं उकसात ||

रप्पू-रप्पू भी चलौ , कितउँ लगा लो दौड़ |
जाँ जैसौ  मौका परै , बैसौ  ले लौ  मौड़‌ ||

सुभाष सिंघई
बुंदेली टिड़़कौ =बुरा लगना 

टिड़कौ लग गवँ बात सुन , हेरौ  गटा  पसार |
जैसे कच्चौ लील जै ,   अबइँ  लगा फटकार ||

टिड़कौ समदी ब्याह में , भइ   इस्कूटर माँग |
सूटर लैकें आ गयै ,      बिटियाँ   बारे  टाँग  ||

यैड़ा भैड़ा तिरपटा ,  तन में   हौय   विकार |
लूला कुबड़ा भी गिनौ ,  टिड़कौ  मिलौ गवाँर ||

टिकड़ौ हौ गवँ आजकल , ज्यौ फूफा की ‌जात |
उतनो भागत दूर है , ज्यौ-ज्यौं     तेल   लगात |

टिड़कौ बैला- सो बने  , तान  लैत   है   सींग |
 झुट्टा  जब  बगरात है , चार जनन  में  डींग ||

टिड़कौ डुकरा हाथ से , मारे  लयी  गुटान |
डिबिया में चूना नईं , मचा   रयो    तूफान ||

टिड़कौ लग गँव ‌सास खौं , मिलौ उरानो आन |
तोरी मौड़ी दैत नइँ ,        सई काम पै  ध्यान ||

बुंदेली दुचरी = कुचली 

दुचरी थुथरी लग रयी , काट गई है  बर्र |
मौं पूरौ सूजौ धरौ , लगत भँजी  है गुर्र ||

बउँ  ने दुचरी सास है , मौं हौ गवँ अब बंद |
भूली है बउँ धन कथा , और भूल गइ छंद ||

दुचरी चटनी हौय जब , मिलै मसालो आन |
चीखत में नौनी लगत , कत हैं  सब इंसान ||

थाने मे दुचरी बनी , रयै    फटकिया  बंद |
कान पकर पैले डड़ा ,    भूले  सबरै   दंद ||

दुचरी भइ   इस्कूल में ,   रटै  पहाड़े  यैन |
फिर भी अटके बीच में , रोजाना भइ ठैन ||

सुभाष सिंघई
24.11.25-सोमवार बुंदेली गरय(भारी) 

पाँव गरय बउँ धन भयै , घर में भरी हुलास |
पूजन गयँ कुल देवता , आ रइ घरै  उजास‌‌ ||

गरय ‌धरै बोरा   घरै ,    जीेंमें  भरौ ‌अनाज |
कौ आकै खिसकात है , की खौं दें आबाज ||

गरय    बोल साधू  कबै,    झूठौं  जौ  संसार |
चौतरफा हैं   मतलबी, कर लौ तनिक विचार ||

गरय बोल कड़बें लगै , लोग   पचा  नइँ पात  |
जानत जा सब बात हैं , पर कौ यह अब कात ||

गरय बोल गम्भीर हौं  , अच्छे  हौबें  ख्याल |
तब सुभाष सब ग्राह हौं , राखत नईं  मलाल ||

29.11.25- शनिवार  फरचट (स्फूर्ति)

लरका फरचट है लगत , सगया कै गय आज |
भेजे हम अब सुतकरा , शुभ विवाह के काज ||

फरचट हौवें काम जब , मन   खुश हो  जात |
बचतइ अपनौ है समय , और सफलता पात ||

दिल्ली बाले कर रयै‌‌‌ , अब तो फरचट काम |
अब सरकारी योजना ,   दिखबें हमें तमाम ||

कैन- बेतबा लिंक को , फरचट हो रवँ  काम |
तीन  साल  में   ‌जोड़ने ,   देने ‌  ‌ है  अंजाम ||

जो नेता फरचट रयै ,  झटक लैत  है  वोट  |
जनता भी दे आत हैं , नइँ  देखत है  खोट ||

बुआ आयँ जब ब्याय में , फरचट हौबे  काम |
कत रत चिंता नइँ करौ , जुटे  सुबह से शाम ||

1.12.25-सोमवार बुंदेली --गमी(मृत्यु शोक) 

गमी खुशी संसार में , मानों  हैं  दिन रात |
एक आत मुठिया कसै ,एक पसारे जात ||

सबइ गमी में रौत है ,      रिश्ते सब बतलात |
जिंदा में नइँ चीनतइ , शकल देख भग जात ||

जौन घरै  हौबे  गमी , जुरकै    सबरै आत |
कौनउँ मन से रौत है ,कौनउँ शकल बनात ||

आबौ जाबौ है लगौ , गमी खुशी भी हौत |
हँसकै  खुशी मनात है , हौय‌ गमी तब रौत ||

मन में पलतइ जब गमी , हौत हरी दुख दैत |
सब सुभाष जिंदा रयै ,चैन   नईं   पर ‌ लैत ||

6.12.25- शनिवार ओलम (वर्णमाला)

दद्दा     गय  इस्कूल   में,    कै कें   आये  बात |
अटकत ओलम में तनिक , पढ़बौ भी नइँ आत ||

ओलम  में हम रट गये  , ग सें  गधा लो मान |
नइँ गणपति तब हम रटै ,   कैसे आता  ज्ञान ||

पैलाँ कैं  ओलम तकौ  , गलत हतै  उपमान |
भड़बूजा भड़या  रटै    , नईं रटै    भगवान ||

ओलम में मछली हती, नईं  हतौ   माँ   रूप |
चूहा चकिया चा चली , छोड़ चतुर्भुज  धूप ||

संसकार की बगिया में , ओलम  हुए  सुधार |
गधा और चूहा हटै , हट  गयँ  कयी  विकार ||

8.12.25-सोमवार बुंदेली--कगर(किनारा) 

सबइ कगर पै हैं खड़े , म्यारी  मूड़ा साद |
धक्का से बचबे दतै , नइँ हौं हम बरबाद ||

ईसुर कौ नौनों कगर ,  जानत  हैं सब लोग |
पर कछु छरकत रात हैं , नईं मिलातइ योग ||

नदी तला देखौ कुँआ , इनके कगर महान |
लोगन खौं ठाड़ौ करें ,    देत उनै जलपान ||

बहती जाती नाव हैं , भटकत ई संसार |
राम नाम ही दे कगर , और लगाए पार ||

बुरय करम के है कगर , देत भौत  नुकसान |
जिसमें कूँदत आदमी , व्यर्थ गमावत प्रान ||

13.12.25- शनिवार रमन्ना (गोचर,शिकारगाह)

हतै रमन्ना  डाँग में , जितै   चरत   ते   ढौर |
घास उगत ती खूब ही , और नचत ते मौर ||

सुनो रमन्ना वन हतै   , लिखे मिलत अभिलेख |
पर लोगन ने जौत लयँ , रयँ   हम   अब देख ||

वनबिलाव छिकरा हिरन , हते रमन्ना  शान |
और लड़इया खूब थे , घूमत ते   हर  थान ||

घने  रमन्ना  में   रयै  , सबइ तरा  के जीव |
तब शिकार भी हौत ते , हमने सुनै अतीव ||

उजड़ रमन्ना अब गयै , चली  गई  है शान |
हरियाली गायब हुई , अब दिखतइ मैदान ||

जंगल पेड़ पहाड़ ते , नरवाँ   झिरना   ताल |
ढौर रमन्ना  जात  ते  , हतै अभय हर हाल ||

15.12.25-सोमवार बुंदेली  -रिरके (खिसके, रपटना) 

रिरके- रिरके जो चलें  , सब जानत जा बात |
भटकत उनके पाँव है , चलत गैल जो खात ||

मोहन रिरके हैं हराँ ,   गयँ  राधा  के   पास | 
बोले तुम क्यों अनमनी  , काहे आज उदास ||

रिरके अजगर अब फिरत , नहीं तेज चल पात |
आबड़ ‌में बिड़ जात जो ,    उयै लील के खात ||

हम-बे रिरके तब हुई , उनसे नौनी बात |
राने है अब प्रेम से , नइँ करने  है  घात ||

रिरके- रिरके है  चलत  ,अब   पैसेंजर   रेल |
जैसे  धानी से  कड़त,  तिला नाज  को तेल  ||
विषय बकला 

बकला रक्षक जानिए , फल हौवें ‌या दार |
साजी रातइ चीज है , मितल हमें उपहार ||

टौ डारौ है चामरौ ,   बकला-सौ दवँ फौर |
बुलडोजर योगी पुलिस ,की खौं दैवें खौर ‌||

बकला फल को जब सड़े , बदबू भी तब देत |
फेंकत तब  है    बायरें,    नईं  हाथ   में लेत ||

बकला फल में हौत हैं , भीतर   गूदौ  रात |
खातइ सबरै प्रेम से , मजा भौत  है आत ||

5 जनवरी 25 , विषय बदान ( बांध )

ठाड़े  यार   बदान  पै , कुहरा  भारी   आज |
को सपरत ई ठंड में ,  खड़े कुका रय खाज ||

है बदान भारी बड़ी ,   पानी भरो अथाह |
नहरें खूबइ बह रहीं , पकर खेत की राह ||

पानी रोको काज हित , बन रयँ  आज बदान |
होय सिचाई खेत की ,   चाहत करे  किसान ||

राजघाट की देख लइ , हमने बड़ी बदान |
पानी भौत समात है , सबरे कात किसान ||

गोरी कात बदान पै , हम तो ले रय धूप |
खड़े कुकर रयँ ठंड में , बिगड़े मोरो रूप ||

10.6.26- शनिवार   बरबौ / बरबें (ईर्ष्या,जलन)

बरबें तन मन देख कै , दूजन कौ उत्थान |
ऐसे हौतइ कछु जनै ,  देत फिरत है प्रान |

अपनी से तुलना करत , देख   पराई नार |
बरबें सुंदर जान कै , टपका दें कछु लार ||

बरबौ है की बात कौ , कौ की खौं समझात |
अपनी-अपनी सोच है ,    घूमें  गदा हिरात ||

तीन  मिले लरका उयै , नौ नाती   है दूत  |
फिर भी बरबें बैठ कै , देख दूसरन  पूत ||

बरबें भावी  देवर की ,व्याह  लुगाई देख |
नौनें करतइ  काम हैं , ऊकी  बड्डी  रेख ||

12- .1.26-सोमवार बुंदेली--बरसी(बार्षिक श्राद्ध)

दद्दा खौं  रोटी दईं , बेई मठा में डार |
बरसी में मसकत लुचइँ , आकें रिश्तेदार ||

दद्दा की फोटू धरी , साफा  मूँछें  तान |
पूजा पंडित कर रयै, बैठा कैं जजमान ||

बरसी में अब बाइ की , याद करत है आन |
बउँ धन कत है रामधइ , सास हती भगवान ||

बरसी में पुरखा पुजैं  ,सबरे मुड़ी झुकात  |
चढ़त करइयाँ नाम की,  हलुआ पूड़ी खात ||

मानो बरसी  नेक है , पुरखा करतइ याद |
नइँ मानो तो कौन है ,      दैबें आशीर्वाद ||

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26.1.26-सोमवार बुंदेली -306-बेन(बहिन)

बेन जरुरी दीजिए , हे दाता भगवान |
मंगल होती गेह में , बनती हैं वरदान ||

लाती आपने भाग्य से , घर में भैया बेन |
कौ समझे ई बात खौ , ठाटी कै रयँ येन ||

दद्दा से कत बेन है , भइये उन्ना ल्याव |
मोरे पाछे  लाइयो , पैला इयें सजाव ||

राखी भइया दूज पै , खुश रातइ  है बेन |
घर भर कौ मंगल करत , हौन न दैतइ ठेन ||

बेन गेह की शान है , भइया है अरमान |
दोनों दद्दा बाइ के , कैलातइ संतान ||





लदी डार फल से अगर , नैचे खौं झुक जात |
साजे गुण जीमें भरे   , करत  प्रेम   से बात ||

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