अनमने (उदास )
मत बैठौ तुम अनमने , मुड़िया नँईं कुकाव |
मुइयाँ पै आबै खुशी , काम करन खौं जाव ||
कभउँ न रहियौ अनमने , मुइयाँ रखौ प्रसन्न |
चार जनन में बैठ लौ , मन हौजै तब टन्न ||
घट बढ़ हौतइ बात है , हौत अनमने लोग |
सामै बारै की सुनत , मन में पनपत रोग ||
काम देखकर अनमने , हौत आलसी भौत |
गट्ट बिदी-सी जान कैं , मुड़िया धर कैं रौत ||
जौन चीज ना मिल सकै , दुख तब भारी हौत |
चैरा सै हौ अनमने , मन सें भी सब रौत ||
लछमन खौं शक्ती लगी , भयै अनमने राम |
लाबै बूटी तब मिलौ , बजरंगी खौं काम ||
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*नाँय* (इधर)
नाँय माँय ना हैरियौ , करियौ सामै बात |
भैंस न छौरी काउँ की, काहै मौं लटकात ||
नाँय तनिक तुम आइयौ , आकै साँच बताव |
माते लुकै पियाँर में , कारण तौ समझाव ||
नाँय आत तुम हौ नँईं , और न देखत हाल |
फिर भी मसकत रात दिन , इतै सूक गवँ ताल ||
नाँय माँय जौ है करत , और भिड़ातइ बात |
ऐसै लोगन से बचौ , सइ "सुभाष" अब कात ||
कछू लोग ऐसे तकै , नाँय न पातर खाँय |
झूठी खाबै खौ खड़ै , माँय हमै दिखलाँय ||
नाँय धरम चर्चा चलै , माँय काय खौं जात |
और उबाड़ै काम सब , करबै की तुम कात ||
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विषय - खटका
(बुंदेली में खटका अनेक संदर्भों में प्रयोग होता है ,कुछ खटका प्रस्तुत करने का मात्र प्रयास किया है )
बिजली कौ खटका जितै , जब 'सुभाष' चट हौत |
उजयारौ हौ बल्फ से , नौनों लगतइ भौत ||
अगर कितउँ गड़बड़ लगै , कातइ खटका मौय |
काम बनै या जै बिगर , सब सौचत है दौय ||
चूहन के खटका चलै , लालच में बै आत |
घी चुपरी रोटी रखैं ,तब जल्दी बिद जात |
मन में खटका पैड़ दव , ऊनै यैंगर आन |
अपनौ काम निकारबै , लोग करत पैचान ||
खटका घालत हम हतै ,बचपन में था खेल |
कंचा भगै इनाम लौ , जैसे दौरत रेल ||
खटका = (एक खेल था खटका, जिसमें स्प्रिंग खीचनें से कंचा चलता था व जिस खाने में रुकता था वह इनाम हम जीत जाते थे )
कोरी घर खटका चलै , उन्ना बुनतइ जात |
हिंदी में सब जानतइ , हथकरघा कैलात ||
खटका हैं ई देश में , यह नेतन की जात |
खुड़का दें कीखौ कितै , दैकें गैरी घात ||
टपका कौ खटका बुरवँ , रातै नींद न आत |
कौन घरी का गट्ट हो , चिंता में जी रात ||
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नऔ (नया )
नऔ साल कौ सूर्य जौ , सबखौं दैय प्रकाश |
भौत-भौत शुभकामना , दैतइ इतै "सुभाष" ||
नऔ साल चौबीस में , सजौ अयौध्या धाम |
जन्म भूमि पै आ रयै , टैन्ट छोड़ कै राम ||
नऔ साल नौनों लगौ , पर रइ ठंड अपार |
अच्छी आसौ हौ फसल ,करबैं सबइ विचार ||
नऔ कछू जब आत है , दैत पुरानौ डार |
या धरतइ कुठिया जितै , ढ़ँग से उयै समार ||
नऔ मिलौ है पद उनै , मस्त रयैं दिन रात |
कानन में ठेंठा दयैं , अब नइँ उनै सुनात ||
दो हल्के हास्य दोहे- 🙏
नऔ जौन मुल्ला बनत, अधिक खात है प्याज |
जैइ कहावत है सुनी , अधिक दैत आबाज ||
उनकौ भवँ है ब्याव अब , सौफा नऔ मलंग |
मलकत ऊपै बैठ कै , घर में दयै उचंग ||
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बुंदेली-गुलगुलो (मुलायम)
कम्बल हौबें गुलगुलो , भौत मजा है आत |
ठंडन में जब औढ़ लै, भीतर खूब ततात ||
मिदरा पकरौ हात से , लगत गुलगुलो भौत |
बा़यौलौजी जब पढ़ी , सीखी हमनै रौत ||
मालपुआ रस से भरै , मन जब-जब ललचात |
मौं में लगतइ गुलगुलो , भौत मजै से खात ||
साँप लगत है गुलगुलो , जीनै पकरौ हौय |
सब डरात है दूर से, काँट लैय ना मौय ||
मन रखि़यौ सब गुलगुलो , सुनत रात है ज्ञान |
चार जनै जब जित जुरै , दैयँ भौत सम्मान ||
मन तो हौबे गुलगुलो , नीचट रबै शरीर |
प्रभू भजन में मन लगे , रये न कौनउँ पीर ||
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बुंदेली , विषय - कोते (बदले में / बजाय )
गइया के कोते मिली, बछिया गुचकू मोय |
भइया बाँटन में सदा , यैसौ ही अब होय ||
पिसिया कै कौते दई , गुड़ की परिया येक |
लेन देन यह बानियाँ , करत गाँव में नेक ||
खेत छुड़ा सरकार नें , डारौ उमदा रोड़ |
कोते में पइसा दयै , दई जगाँ कछु छोड़ ||
खेत बड़े खौं मिल गयै , कोते हमै मकान |
मजलौ चाँप दुकान खौं , बगरा रवँ है शान ||
दद्दा कै कोते गये ,जब हम येक बरात |
टंटौ भयौ दहेज पै , चल गय मुक्का लात ||
जितै आस टूटन लगै , कोते मिलें न दाम |
मिलै लँगोटी भूत की , लौ हाथन से थाम ||
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बुंदेली दोहे - विषय- नँईं /नँइँ( नहीं)
नँईं जितै सुनबै मिलै , बँईं हऔ हौ जात |
अफरै में भी आदमी , रसगुल्ला दो खात ||
मौड़ा कर रवँ है नँईं , मानत कितै मताइ |
लैकै बिलिया दै चटा , शक्कर डरी मलाइ ||
नयी बहू नँइँ -नँइँ करै , कछु ना चानै मौय |
रात बलम से कात है , लै दौ चूरा दौय ||
नँइँ कातइ पर है मिलत, जीखौं साजौ सार |
सैंत -मैंत तब माल खौं, कौन करत इंकार || ?
नँईं -नँईं कत राधिका , पर भीतर मुस्कात |
फूला लयँ सिंगार खौ , किशना खूब मनात ||
हाँ कैकैं फिर नँइँ कयी , बदली जितै जुबान |
साँसउँ इज्जत जानियौ , ऊकी धूर समान ||
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-सला (सलाह)
आज सला मोरी सुनौ , बिस्तर बोरी बाँद |
चलौ अजुदया धाम खौं , नौनें उन्ना धाँद ||
सला सूद से काम हौं , सबइ सफल हौ जात |
इक्कर जौ भी निग चलै , उल्टी मौं की खात ||
घरवारे दैं जौ सला , ऊपै करौ विचार |
कमी लगै कौनउँ कितै , कर लौ उतै सुधार ||
सला गोट बूड़ै करैं , कभउँ फेल नँइँ हौत |
जौ भी उनकी मानतइ , नँईं कछू बै खौत ||
लगुयारै भी दैं सला , परत नँईं सड़ स्वाद |
बिना विचारे जौ चलै, गौड़त घर में खाद ||
कछू जनन खौं रोग है , सला उपत कै दैत |
कौनउँ उल्टौ दै धरै , नँईं मुफ्त में लैत ||
सला मिलै उल्टी जितै , उतै छाँव ना लैव |
हात जौर लौ दूर सें , मुसकी भरकै दैव ||
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बुंदेली दोहे - नसेनी (सीढ़ी)
चढ़ौ नसेनी आप जू , कर्तव्यन की हौय |
मंजिल पौंचें सब जनै , नैंचें ना रय कौय ||
नौनें राखौ आचरण , रखौ सँभल कै पाँव |
बनै नसेनी कर्म फल , सबखौं मिलबै ठाँव ||
जितै नसेनी हौ लचर , हिलगत राबै यैन |
चढ़बौ तब बेकार है , धच्च गिरै से ठैन ||
पंती कौ मौं दैख कै , दादी भी हरषात |
स्वर्ण नसेनी स्वर्ग की , घर में उयै दिखात ||
मोक्ष नसेनी कात है , प्रभु वाणी खौं जैन |
जौ पढ़कै गुन लैत है , उयै मिलत सुख चैन ||
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बुंदेली दोहा दिवस , विषय - राम
आज अजुदया में तकौ , राम नाम की भोर |
रामलला जू पौच रय , जनम भूमि के दोर ||
धाम अजुदया हो गयौ , अब मंदिर निर्माण |
रामलला के हो रहे , आज प्रतिष्ठित प्राण ||
साँसी सबकै राम है , सब राखत विस्वास |
राम नाम से सब तरें ,मिलबै उनै उजास ||
राम रटै सब भुन्सरा , गुरिया फेरत संत |
राम नाम के जप्य से,जीवन सुफल अनंत ||
खटिया पै सै जब उठत , लेत राम जौ नाम |
ऊकै जीवन में कभउँ , हौत नँईं खटकाम ||
धरती उर आकाश में , तकौ राम कौ नाम |
यैसी पूजा देख कै , देत राम निज धाम ||
राम सबइ कै है इतै ,भलौ करत सब राम |
रामामय संसार जौ , सौ सब करौ प्रणाम ||
राम-राम जू पौचबै , राम आज हैं हर्ष |
राम कृपा सब पै रयै ,राम सदा हो दर्श ||
पूस सुदी बारस सजी , दिन नौनों रवँ सोम |
राम लला जै हौ गई , आगे अब हरिओम || 100
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बुंदेली-कुजाने (पता नहीं)
लोग कुजाने काय खौं , चैंकत सुनकै बात |
खरी-खरी जब हौत हैं , थुतरी खौं लटकात ||
लोग- लुगाई जब लरैं , हल्ला भौत मचात |
बकत कुजाने काँय थे, दौनउँ नँईं बतात ||
लगुयारै जौ भी दिखें , पूछौं तौ सकुचाँय |
कात कुजाने का पतौ ,अपनी मुड़ी कुकाँय ||
कौनउँ आकै जब घरै , परत दौइ जब पाँव |
लगत कुजाने कौन सौ , खेलत हम पै दाँव ||
आय कुजाने काय खौं , नाते रिस्तेदार |
कै रय हौनें फैसला , पंच जौर लौ चार ||
इतै कुजाने आय तुम , धर गुदनारी रूप |
राधा कै रइ कृष्ण से , तुम छलियन के भूप ||
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बुंदेली विषय -ततोस (गुस्सा)
भैस न छौरी काउँ ने , फिर भी रखें ततोस |
मैर भरै से बोल रय , उनखौ नइयाँ हौस ||
हारे जितै चुनाव है , उन गाँवन से रोष |
दिख रवँ खूब ततोस है , दै रय सबखौ दोष ||
है ततोस मन में उनै , कट गइ उनकी बात |
करैं खुंश में मुंश है , चला रयै है लात ||
सैनिक बर्दी पैन कै , राखत खूब ततोस |
दुश्मन पर जै सामने , कर दैं बें बेहोस ||
हौय तनिक -सी बात तो , भरियौ नँईं ततोस |
गुनताड़ौ अच्छौ करौ , रखकै अपनौ हौस ||
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विषय - भन्नाने/भुन्नाने(क्रोधित)
भुन्नाने नेता दिखे , नँईं मिले हैं वोट |
सबने हाँ जू बोल कै , झटक लयै थै नोट ||
भुन्नाने बब्बा परै , सादै खूब चिमाइ |
नँईं तमाकू काल से , मौं की तलफ दबाइ ||
भुन्नाने लरका बहू , रयँ हैं गटा निकार |
फटफटिया लैने अबइ , दद्दा दो कलदार ||
भुन्नाने पंडित दिखै , दई कथा जब बाँच |
दो घंटा मैनत करी , नोट मिले है पाँच ||
भुन्नाने अब साव है , ताव पकर रयँ आज |
मूर पचा रमुआ गयौ , टका न दवँ है ब्याज ||
भुन्नाने बैठे पिया , भुन्सारे से दोर |
बात समझ ना आ रई , गोरी करे निहोर ||
सुभाष सिंघई
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बुंदेली- बुरव (बुरा)
बुरव भलौ सब हौत है , पर जाऔ सब झेल |
करम सबइ के खेलतइ , रैचकुआ से खेल ||
लगतइ सबखौं है बुरव , दैखत जब यै हाल |
अगर कुवाँ के घाट पै , पानी पीबै ताल ||
साजौ लगतइ है बुरव, खता जात जब फूट |
यैसइ सौचत धान है , चाँउर निकरैं कूट ||
बुरव मानतइ लोग हैं, पसर गैल में जात |
मन की धन जब हौय ना , थुतरी खौं बिचकात |
बुरव आदमी पुज रऔ , भलौ दिखत लाचार |
कत "सुभाष " बों थान है , जी खौं कत संसार ||
चउँवर मौं जीकौ चलत , रखतइ बुरय विचार |
बैइ चुनावन में बनै , मूँछन के सरदार ||
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बुंदेली विषय,,- लुगया ,(महिलाओं के साथ बैठने वाला पुरुष )
लुगया की अब काँ कयै , बातें यैसी कात |
चार जजन के बीच में , कंडी-सो उतरात ||
लुगया खौ जब हौ समय , चार लुगाईं देख |
उनमें जाकैं बैठतइ , बनत उनइँ की रेख ||
बात पचा ना पात है , जौ भी लुगया हौय |
दुतापनी कै काम में , माहिर जानौ औय ||
लुगया जौ भी हौत है , हौ मरदेलू काम |
गुड़या कै रै जात है , हालौ हिलै न चाम ||
लुगया घर के काम में , चिपटे देखे जात |
झाडू पौंछा सब करै , टउँका करैं बिलात ||
लुगया की जो बात में , आकर कै फँस जात |
कारज में शंका रयै , खट्टौ भी बौ खात ||
सुभाष सिंघई
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बुंदेली विषय - दुता ( चुगलखोर )
चुखरयाइ करतइ दुता , लबरयाट कत बात |
औसर पै चूकैं नँईं, करैं पिठइयाँ घात ||
बात पचा ना पात है , गुड़गुड़ पेट पिरात |
मन की धन करकै दुता , पाछै सेै मुस्कात ||
दुता न ठैरत इक जगाँ , हर चौखट पै जात |
एक ठौल में चार ठौ , मिला -मिला कैं कात ||
राज ओरछा के दुता , भर दय कान जुझार |
बिष मिल गवँ हरदौल खौं , रानी रइँ लाचार ||
दुता जितै जुर जात हैं , गप्पै मारत हूँक |
हौत खुपड़ मंजन उतै , कान दैत हैं फूँक ||
ऊँट बिलैया लै गई , करतइ दुता कमाल |
करै झूठ खौं साँच वह , जीसैं हौत बबाल ||
सुभाष सिंघई
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दोहे , बुंदेली विषय -फँदकत ( रूठना)
फँदकत जो हर बात में , कित्तउँ उयै मनाव |
मिदरा -सो उचकत रयै , भौतइ खाबै भाव ||
फँदकत मिथला आ गयै , ऋषिवर परशूराम |
राम सुनै खौटीं खरीं , फिर भी करैं प्रणाम ||
फँदकत फूफा व्याव में , कौनउँ नँई मनात |
फुआ खचौरत बाद में , मड़वा में लै आत ||
घरवारी फँदकत घरै , कात बैन कौ व्याव |
नई धुतिया गोटा लगी , गदिया पै ही लाव ||
हम 'सुभाष' फँदकत लिखैं , विषय कितै से लाय |
गंठयान सी लग रयी , फिर भी लिखवें आय ||
फिरबैं फँदकत फूलकैं , फुकना बनै दिखात |
फुआ फुसक मड़वाँ तरैं , फूफा खौं तुचकात ||
सुभाष सिंघई
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विषय - गत (हालत )
गत गंगा उनकी तकी , कीखौं अब बतलाँय |
फँसी घिची में डोर है , कितउँ न अब जा पाँय ||
कउँ गत यैसी हौत है , घलत कुलैया पाँव |
चुखरयाइ औदीं परत , कितउँ मिलत ना छाँव ||
गत में देखी है कुगत , उलटी हौतइ चाल |
जौ भी नियत खराब कर, हड़पत सबको माल ||
गत 'सुभाष' बिगरै जितै , हौत कुगत भी खूब |
पल-पल मरतइ आदमी , लाज शरम से डूब ||
अपनी गत साजी लगै , यदि नियत रत साफ |
जितै बिगारी है तनिक , हाथ लगत तब राख ||
गत भी मिलबे देखबें , परै खाट पै राँय |
समय बुढा़पै कौ रयै , रोटी खौं चिल्लाँय ||
सुभाष सिंघई
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बुंदेली विषय - ठेलवौ (धक्का देना)
देख लऔ है ठेलवौ , कछू न निकरौ सार |
बीदे रय बेकार में , खाई उल्टी खार ||
जनता देखत ठेलवौ, नेतन की हिलगंट |
भूखन मरत मजूर है , चमचा घूमत चंट ||
सीखौ जिनने ठेलवौ , भूले रत भगवान |
खाज खुजा बै घूमतइ , नईं राखत पैचान ||
जौ सीखत है ठेलवौ , कभउँ न पायै सीख |
म्यारी मूड़ा ना बँदै , माँगत जग में भीख ||
जौ जानत है ठेलवौ , उनकी देखत नीत |
परसत लुचइँ न सामने , आगें दैतइ प्रीत ||
नँईं सीखयौ ठेलवौ , बूड़े बुजरक कात |
आ जायै जो सामने , करौ काम मुस्कात ||
सुभाष सिंघई
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विषय - फदाली
दंद फंद सूझत जियै , उयै फदाली कात |
जौ भी बातन में फँसै , खट्टौ सूदौ खात ||
जियै फदाली कात सब , करत नँई विश्वास |
सुनकै देत निकार हैं , अपने कान "सुभाष" ||
फाँका फूँकी कान में , चुगलन के भी काम |
करत फदाली खूब है , भुन्सारे से शाम ||
छोटो बड़़ौ बतात है , हौवें कौनउँ काम |
करत फदाली यैब है , सुबह दुुपरिया शाम ||
मौं से मिठबोला रहत , रखें कपट के भाव |
नँई फदाली है रखत , सँई सुनने कौ चाव ||
मिलत फदाली हर जगाँ, मसकत गप्पें चार |
बातें महुआ छेवला, जीमें दिखे न सार ||
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विषय - खुद्दरौ
यैबी लैतइ खुद्दरौ , ठाड़ै बैठे आन |
आगी-सी परचात है , निजी बगारत शान ||
भारत से लै खुद्दरौ , जब भी पाकिस्तान |
घलतइ झापड़ गाल पै , परतइ लाल निशान ||
रावन नें लवँ खुद्दरौ , हरी जानकी माइ |
कुल कौ हौ गवँ नाश तब, आ गइ याद मताइ ||
रचौ कंस ने खुद्दरौ , किशन मारबें यैन |
अरौ बीद गवँ तब गरै , खुद की हौ गइ ठैन ||
कालनेमि नें खुद्दरौ , रोपौ आकै आन |
दई गदा तब पीठ में , चीन गयै हनुमान ||
बररइ़या से खुद्दरौ , जौ भी आकै लेत |
बदले में मौ सूजतइ , डंक मुलक बा देत ||
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बुंदेली विषय - बीदे (फँसे)
माते कै हाते लगत , जब भी ठलुआचंद |
फँसा देत बै काम में , बीदे रत है दंद ||
पाँउन में बीदे गुथे , घुँघरू बज-बज जात |
धुन पै नचते सब जनै, मस्ती में मुस्कात ||
जौ हौतइ हैं आलसी , लैतइ रात डकार |
बीदे रत सब खाज में, बैठ कुका कैं द्वार ||
नौनीं संगत जौन की , ऊकै साजै काम |
बीदे पै हल्ला करें , उनै नँई आराम ||
बीदे बारे आत है , सला लैन भी चार |
जीकी बातन से नँईं , निकरै कौनउँ सार ||
बीदे काम निनौर दै , जग में जौ इंसान |
ऊखौ जानो सब जनै , धरती कौ भगवान ||
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बेथा ( हथेली में अंगूठे से लेकर छिंगरी तक का फैलाव )
धरौ तनिक सौ चेंपला , ऊँची करतइ बात |
बेथा भर कै पाँव से , फटकारत है लात ||
तनिक लाभ जित है दिखत , पौंचत लोग करीब |
बेथा भर तक डार दें , सबरै अपनी जीब ||
बेथा भर की डोर खौ , लोग बता दैं साँप |
तीर धनैया कन लगै , छत्ता की ले काँप ||
बेथा भर कै पौध खौ , लबरा कैं दैं झाड़ |
धजी बना दें साँप वह , कर दें तिल को ताड़ ||
बेथा भर की कानिया , ड़ेड़ हाथ जब हौत |
मजा लैत सब गाँव है , बीदौ बारौ रौत ||
बेथा भर की बात खौं , जौ उँगरी से कात |
स्यानौ कैतइ सब जनै , इज्जत भी बौ पात ||
आधी बेथा जीभ ने , कर दवँ भौत कमाल |
कैं कै भीतर घुस गई , गुदवा दइ तन खाल ||
सुभाष सिंघई
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विषय - कूत {संज्ञान )
कूत खाँड़़ जिनखौं नँईं , गुनिया बन कै आत |
चार जनन के बीच में , हुसयारी दिखलात ||
मंत्र तंत्र जानत नँईं , नइयाँ जिनखौ कूत |
बै अब बन कैं घोलना, भर - भर दैयँ भभूत ||
बै टकरा गय जौन से , परगवँ सबरो कूत |
टूट गयौ है चामरौ , अच्छौ दवँ जब खूत ||
कूत अबइँ अब पर गयौ , कर्री बिद गइ गट्ट |
खड़ै तमासौ दैख रय , लोग लगा कै ठट्ट ||
लंका जलकै खाक है , पर गवँ सबखौ कूत |
आयै श्री बजरंग जू , इतै राम कै दूत ||
बिना कूत ना डारियौ , कितउँ कभउँ भी हात |
कर्री बीदत गाँस है , निपटानै खुद आत ||
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विषय- टोंचना
मौं पै मारो टोंचना ,गये भूल उपकार |
खुलबायीं ती हतकड़ी , पुटया थानेदार ||
अखर जात है टोंचना , जौ सूदौ दै आन |
बौ भी सबके सामनें , जता- जता अहसान ||
नेकी करके डाल दो , कात सयाने लोग |
सूदौ मौं पै टोंचना , चूले दैबे जोग ||
नँईं टोंचना हौंं सहन , चुभतइ जैसे तीर |
पर उपकारी कौ बजन , सैत रात सब पीर ||
टौरत मन खौं खूब हैं , मित्र टोंचना देंय |
पर मजबूरी रात सौ , उनखौ भी सिर लेंय ||
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बुंदेली - टेसू ( पलाश )
गोरी ऐसी रामधइ , जैसे टेसू फूल |
बारन की लट गाल पै , नागिन -सी रइ झूल ||
टेसू घुर गवँ नाँद में , रंग नीचट है लाल |
गोरी हुरयारी बनी , कर रइ आज कमाल ||
गिरत आँग पै धार है , टेसू बन गय रंग |
कुछ खुश्बू- सी आत है , मन में भरत उमंग ||
खेतन से सरसौं हँसै , टेसू पेड़न लाल |
गोरी दोड़े गैल में , आँखन करै सबाल ||
गोरी भी अब लाल है , खूब भिड़ाने गाल |
टेसू के फूला घुरै , कर रय आज कमाल ||
कहें श्याम भौंरा बने , खोज रहा मकरंद |
फगुआ टेसू रंग की , राधा मुझे पसंद ||
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बुंदेली विषय - फगुवारे / फगुवारी
राधा फगवारी बनी , फगवारे हैं श्याम |
दौइ भिड़ाने घूम रय , इक दूजै खौं थाम ||
फगवारी रइ भींज है , फगवारे के संग |
राधा- मोहन खेल रय ,धन्य आज सब रंग ||
फगवारी राधा बनी , जब मोहन के साथ |
न्योरे भोला ब्रम्ह जू , झुका गयै हैं माथ ||
फगवारी थी राधिका , मुस्का गय तब श्याम |
फगवारे बन आ गयै , बरसानें शुभ ग्राम ||
फगवारी सब गोपियाँ , ढूँड़ रयी नदलाल |
नदी कुंज में घूमती , कछू देखती ताल ||
फगवारी ये जिंदगी , जाकै रंग अनेक |
फगवारे सब कर्म है , मिलत एक से एक ||200
सुभाष सिंघई जतारा
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हिंदी दिवस - ठिठोली
आज ठिठोली है कहाँ , मिलें पूछते लोग |
आपस की तकरार के , उदित दिखें अब रोग ||
कहाँ गए वह दिन यहाँ , करिए जरा विचार |
जहाँ ठिठोली रस भरी , बिखराती थी प्यार ||
कभी ठिठोली ने यहाँ , देखे हैं संग्राम |
देखा है इतिहास में , भीषण थे अंजाम ||
जहाँ ठिठोली रस भरी , अर्थ गलत संज्ञान |
भरी हृदय में सालती , बदला दे प्रतिदान ||
करें ठिठोली सालियाँ , जीजा जू के कान |
जीजी रखती दूर हैं , दें अपनी मुस्कान ||
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पैलाँ / पैलें = प्रथम
पैलाँ पुजत गनेश जू , ,हौबे जब शुभ काज |
श्रीफल कलशा मेंं थपै , उनकौ पूरौ राज ||
घर के आगैं लोग भी , पैलाँ नीम लगात |
बैद कात हैं ऊ घरै , रोग न कौनउँ आत ||
करतइ पैलाँ छायरौ , तपन परत जब यैन |
सुसताबै जौ आत है , मिलत उयै सुक चैन ||
ढबुआ पैलाँ तानतइ , रखबारी के हेत |
कत किसान मौखौं उतै, खूब छायरौ देत ||
नातेदारी में पुजैं , समदी पैलाँ पैल |
फिर भी गटा तरेरतइ , जैसे मरका बैल ||
ससुरारै जब जात हैं ,पैलाँ सारी आत |
जिज्जी ठाड़ी पौर में , आँखन से बतयात ||
परकम्मा दइ भाव से , शिव गौरा खौं घेर |
पैलाँ पूजै गनेश जू , सबरै रै गय हेर ||
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बुंदेली विषय - बेर -बेर (बार-बार)
बेर- बेर ढूँकत गली , बीने बेर नबेर |
शबरी कत प्रभु आइयै , करो न कोनउँ देर ||
बेर- बेर श्री राम कौ , रट रइ शबरी नाम |
बीन बेर जौरे रखें , कत है हौ गइ शाम ||
रखती बेर नबेर है , शबरी जौरें ढ़ेर |
बेर-बेर रटना रटै , करौ राम नँइँ देर ||
बेर-बेर का जन्म जौ , मिट जाए इस बेर |
भोग बेर कौ हाथ लयँ , शबरी करती हेर ||
बेर-बेर भी ताक रय , शबरी खौ श्री राम |
कै रय अब ई बेर में , जाओ मोरे धाम ||
लखन सिया श्री राम जू , बेर - बेर मुस्काँय |
शबरी जूठै बेर दे , फिर भी खातइ जाँय ||
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अलुआ ठलुआ जब जुरै , मसकत बातें चार |
ओर छोर सड़ स्वाद की , मिलत कितउँ ना धार ||
बात सार की ना करैं , अलुआ ठलुआ हौंय |
मुड़ी पकर माथौ रगड़ , सबरै बैठै रौंय ||
अलुआ ठलुआ हात दैं , काम बिगर भी जात |
कत सुभाष सब रायतौ , बै मिलकै बगरात ||
अलुआ ठलुआ है फिरत , मूड़ जौरिया बाँद |
गलती खौ साँसी कहत , अपनी-अपनी धाँद ||
अलुआ ठलुआ खौजबौं , सब लौगन खौ आत |
घूमत मिल जै हर गली , रौथ तमाकू खात ||
जब तब भी आबड़ बिदै , अलुआ ठलुआ लोग |
टारौ अपनै हात से , जानौ उनखौ रोग ||
किचड़ पिचिड़ जौ हैं करत , आकैं खातइ प्रान |
उनसे सब उकतात है , दैत न उनपै ध्यान ||
अलुआ ठलुआ की सुनौ , लगबै यह तासीर |
बगदर सै भिन्नात है , रखै न मन में धीर ||
बुझी आग उसकार दै , अलुआ ठलुआ आन |
समझौ इनकी जात कौ , जानौ जौइ निशान ||
अलुआ ठलुआ गौंच से , जियै चिपक है जात |
कौलत उनकै काम खौ , खूबइ मजा उड़ात ||
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विषय - खलती (जेब)
खलती में पइसा धरै , भड़या लैतइ ताड़ |
पाछै लग कै लूट लै , काड़े लगा जुगाड़ ||
खलती जी की है भरी , दैत मूँछ पै ताव |
चार जनै आकै झुकै , दैत प्रेम सै भाव ||
खलती में भरकै कछू , बिड़ी तमाकू लोंग |
दिलदारी से बाँटतइ , करतइ रुतबा ढ़ोंग ||
खलती ईसुर खौल कै , उयै दैत है मोज |
दया प्रेम जौ बाँटकै , पूजा करतइ रोज ||
खलती ऊकी रत भरी, मिलत खूब सम्मान |
लोकतंत्र कै नाम जौ , लूटत हिंदुस्तान ||
खलती खाली दैख कै , पत्नी भी खिसयात |
ठलुआ बँद गवँ भाग्य सै ,दौरे में चिल्लात ||🙏😉
भइया खलती राखियौ , भरी ज्ञान से हौय |
दया धर्म करुणा रयै , आन टटौलै कौय ||
खलती में पइ़सा रखौ , बखत परै में काम |
नईं चपा इनखौ रखौ , बनियौ दाताराम ||
खलती घर परिवार में , भरी सबइ की हौय |
ईसुर से भी है विनय , कौउ न उस बिन रौय ||
खलती खाली हौय तौ , सबखौं शंका रात |
विपदा कौनउँ जब गिरै , कौन समारन आत ||
लापरवाही हौ जितै ,खलती तब कट जात |
सबरै रौतइ बैठ कै , अपनी मुड़ी कुकात ||
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बुंदेली विषय - चुरियाँ
चुरियाँ बैचन खौ चलै , बृज गलियन में श्याम |
चीन गई तब राधिका , हँस कै पूछत दाम ||
चुरियाँ बृज में बिक रयीं , नीलीं पीरी लाल |
सब चटकीलीं लयँ फिरैं , चटकीले गौपाल ||
चुरियाँ राधा पैरती , पैरा रय है श्याम |
दृश्य मनोहर दैख कै , उजली हौ गइ शाम ||
इकटक राधा ताकरइ , यैसइ हैं गौपाल |
फँसीं हात चुरियाँ कयै , पैरा दो नदलाल ||
चुरियाँ पैरै राधिका , फिर मुख देखे श्याम |
जीभ चिढ़ा ठेंगा दिखा , काती नइयाँ दाम ||
उठा-उठा कै गौपियाँ , चुरियाँ रयीं थथोल |
कत 'सुभाष' अनुपम कथा, जीकौ कौइ न मोल ||
चुरियाँ खनकत हात में , बजै पैजना पाँव |
करदौनी कम्मर धँदी , गोरी घूमै गाँव ||
बन्न - बन्न की है मिलत , चुरियाँ लैबै जाव |
मन खौं जब नौनी लगत , हौत न उनकौ भाव ||
कथा सुनी है श्याम की , गय राधा के दोर |
उमदा चुरियाँ प्रेम से , पैरा आयै भोर ||
चुरियाँ पैरै जब धना , करबै खूब निहार |
खनकै पर चटकै नँईं , सुंदर हौत विचार ||
पैरै प्रीतम नाम की , धना भौत मुस्कात |
चार जनन के बीच में , चुरियाँ बजा बुलात ||
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बुंदेली विषय - उँगइयाँ
जितै उँगइयाँ हौं अलग, बिखर जात सब नाज |
फूट जितै भी है मिलत, हौत न साजै काज ||
तकौ उँगइया तुम तनिक , सब में पौरें तीन |
झुककर करती काम है , फिर भी लगे न दीन ||
मुड़ै उँगइयाँ चार जब , और अँगूठा सेठ |
ठूसा बनकैं ठौक दै , दुश्मन हो यदि हेठ ||
सदा उँगइयाँ हात की , राती हैं सम्पन्न |
पकरैं रहती काम खौं , घर में भरती अन्न ||
बढ़ें उँगइया हात में , बौ छिंगा कैलात |
चतुर हौत बौ आदमी , पंडित जू जा कात ||
नँईं उँगइयाँ एक -सी , पर राती सब एक |
मिल जुरकै ही काम खौं , कर लेती हैं नेक ||
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विषय - चैतुआ
चैत मास में चैतुआ , बनकै सबइ किसान |
पिसी काट हरसात हैं ,देख भरे खलिहान ||
बनकै कछू मजूर भी , चैत काटबै जात |
कैलातइ बे चैतुआ , परदेशे जब आत ||
जातइ बनकै चैतुआ , संगै लय परिवार |
काटें पिसी किसान की , टैं हँसिया की धार ||
मैनत करतइ चैतुआ , जुड़ै भिड़ै दिन रात |
साल भरै कै नाज के , बौरा भर -भर लात ||
रयैं मेंड़ पै चैतुआ , संगै लय परिवार |
परदेशी कौ रूप धर , मैनत करत अपार ||
बैसे हम सब चैतुआ , धरती पै कैलाँय |
पाप पुन्य काटै इतै , फिर ऊपर घर जाँय ||
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बुंदेली दोहें ,_चिनार =पहचान
जब चिनार अच्छी बनै , तबइँ करौ विश्वास |
वर्ना ऊसै दूर रवँ , हौबे कितनउँ खास ||
मतलब अपनौ गाँठबें , आकैं करै चिनार |
सात कदम दूरी रखौ , पक्कौ करौ विचार ||
लग्गा के तग्गा कभउँ , काढ़त खूब चिनार |
अपनौ काम सटाय कै , हैरत एक न वार ||
मिलत कभउँ परदेश में , गाँव पुरा के यार |
काम बड़े बै आत हैं , हौबे अगर चिनार ||
लोग कछू कै देत है , मौरी नँईं चिनार |
कैसे कर दें काम हम , कर लौ तुमइँ विचार ||
भलौ लगै जब आदमी , ऊसैं करौ चिनार |
आड़ौ आबै जब समय , ठाँड़ौ राबै द्वार ||
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बुंदेली विषय - पुसात ( पसंद )
दोंदा यैड़ा आदमी , बिल्कुल नँईं पुसात |
चरबदयायौ जै करें , मूड़़ अलग से खात ||
जौन घिनापन सै रयैं , लेंगर नँईं पुसात |
सपरत नइयाँ ठीक सै , बैठे अलग बसात ||
मूरा के सँगे दही , जौ भी मानव खात |
जहर बनत तब जानियौ , तन खौ नँईं पुसात ||
सूपनखा कत राम से , मौखौ अपुन पुसात |
व्याय करावें आ गई , वरमाला लयँ हात ||
नेता छरकत राम सुन , वें नँँइँ हमें पुसात |
निशाचरी हम मानतइ , यह सुभाष है कात ||
झूँठे झंझट जौ करे , टंटौ करत बिलात |
बगरातइ जौ रायतौ , कीखौं आज पुसात ||
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तूँ- तूँ रमतूला बजौ , चारउँ भइया राम |
दूला बन रथ पै चढ़े, , चले जनक के धाम ||
दूला के आगें बजै , जब रमतूला तान |
गाँव भरै के लोग जुर , दैत औइ पै ध्यान ||
तूँ- तूँ रमतूला बजै , चलत हवा में नाद |
चालू हुई बरात है , करत सबइ जन याद ||
पोलो रमतूला रयै , गुड़ी तनिक भी लेत |
फूँके से तूँ तूँ करै , सुर भी लामौ देत ||
कत रमतूला काज में , सुन लौ अब यह बात |
मोरी यह आबाज. भी , रयै सगुन सौगात ||
पंगत में परसा भयौ , कत रमतूला तान |
भोजन करने सब जुटौ , मौं पै रख मुस्कान ||
है रमतूला कुछ अलग , टेड़़े मौं की छाप |
ऊपर से तूँ - तूँ करै , नँईं बोलता आप ||
ऐंड़ा - टैंड़ा आदमी , खुद भोरौ बतलायँ |
रमतूला -से सूदरे , सब मौं पै कैं आयँ ||
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विषय - चपिया
चपिया में माखन धरौ , श्याम लियौ है ताड़ |
बना लई तब लूटबै , अपनी उतै जुगाड़ ||
चपिया मुड़िया पै धरै , निगती ग्वालन खेत |
रौक उनै मोहन कहैं, क्या हमखौं दधि देत ||?
चपिया अपनी चाँप कै , ग्वालिन रहे सचेत |
फिर भी पुटया लें उसे , मोहन मुस्की देत ||
चपिया दधि से हो भरी, कर लें श्याम चिनार |
ग्वाले सबरै जौर कै , लैबैं उयै उतार ||
चपिया राधा की सजी , दवँ है रँग खौं डार |
छीनी जब श्रीकृष्ण नें , रँग गवँ तुरत लिलार ||
मटकी चपिया फोर कै , लीला करें गुपाल |
ब्रम्हा हरिहर हँस कहै , धन्य आप नदलाल ||
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नदारौ ( निर्वाह )
नँईं नदारौ जब करे , दिवरानी को ढ़ंग |
न्यारी रोटी दो बनन , काँतक राखौ संग ||
नंद नदारौ झेलबौ , है मुश्किल की बात |
रौत भुजाई रात दिन , सास नँई समझात ||
नँईं नदारौ हौत है , इकतरफा झुक जाँय |
चार ठौल बातें सुनै , लात अलग से खाँय ||
बउँ धन जब से आइ है , नँई नदारौ गेह |
लरबै ठाँड़ी सास लौ , फरकत ऊँकी देह ||
नँईं नदारौ हौ सकौ , घली पीठ पै लात |
भगै विभीसन राम लौ , रावन की सह घात |
राम नदारौ हम रखें , तनिक राखियौ आप |
चरनन की धूरा मिलै, मिटवै भव कौ ताप ||
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बखेड़ा = झगड़ा करना
भौत बखेड़ा हो गया , तनिक गम्म अब खाव |
खींचा तानी मत करौ , छोड़ दैव बतकाव ||
करत बखेड़ा जौन हैं , उनसे रवँ सब दूर |
बररइयाँ नँइँ मानतइ , रयै काटबै शूर ||
हड्डी थौरी भी दिखै , करत बखेड़ा श्वान |
टूटत ऊपै गिद्द से , रत "सुभाष" हैरान || 300
जौन बखेड़ा चात है , भर दैतइ है कान |
चुगला सबरै देख लौ , दैत बात हैं तान ||
जौन लडन्कू नारि हौ , चार हाथ रवँ दूर |
करै बखेड़ा ब्याज में , पतौ चलै नँइँ मूर ||
लै जौरा की फौज से , हौत बखेड़ा खूब |
फसल मिलै नँइँ काटबें, कुचरत है वस दूब ||
~~~
-सोमवार- (बुंदेली) -डटकै (जमकर)
डटकै खड़े जवान हैं , सीमा पै दिन रात |
भारत की रक्छा करत, वंदे मातरम् गात ||
डटकै खड़े किसान हैं , तकैं खेत खलिहान |
नाज उगा दे रय हमें , दाता अन्न सुजान ||
डटकै करत पढाइ हैं , जब लरका दिन रात |
ज्ञानवान वह हैं बनत , सबसे इज्जत पात ||
चार दिना हों व्याय कै , डटकै हौतइ काम |
गिनत नहीं दिन रात है , तकत न छाया घाम ||
डटकै पंगत खा गयै , लडुआ दयँ फटकार |
लय लोटा अब जा रहे , समदी खेतन हार ||🥰🙏
सुभाष सिंघई
बुंदेली - सुड़ी (इल्ली)
खाने के सामान में , कुछ दिन दैख न पाँय |
परत औइ में जब सुड़ी , छान -छान मर जाँय ||
सुड़ी एक से सौ बनें , बढ़कै हौंय हजार |
इनखौं देती नारियाँ , सूपा की फटकार ||
आटा मैदा चीकनों , पिसौ धरौ हो नाज |
हवा और पानी लगै , दिखै सुड़ी कौ राज ||
अकल अजीरन है जितै , सुड़ी पिड़ी लो जान |
नँइँ निकरत है बायरै , है "सुभाष" खौं ज्ञान ||
राजनीति में अब सुड़ी , सबखौं मुलक दिखात |
चमचा जिनखौं कात हैं , टाँड़ी से उतरात ||
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विषय -पखा {दाड़ी के लम्बे बाल )
पखा रखा लयँ खूब है ,बन गय है हुश्यार |
मूँछें अपनी सूँट कैं ,करें नुकीली धार ||
सार हीन लगबैं पखा , रखबाई - सी हौत |
जिनै समारत रवँ सदा , समय भौत भी खौत ||
अपनौ -अपनौ शौंक है ,पखा मानतइ शान |
टुनया दो थौरो जितै , मिलन लगत है ज्ञान ||
ठलुबाई के शौंक जै , जीखौ जब लग जायँ |
ऊँछत कंघा से पखा, बिखर - बिखर वें आ़यँ ||
डु करा भी रखकै पखा , बना लैत पैचान |
माला गुरिया डार कै , भजत रात भगवान ||
पखा रखा कै देख लय , साँसी कात सुभाष |
खुजा - खुजा हैरान रयँ , लगी हमै ती घास ||
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पलका
चंदन को पलका बनौ , बिछौ अटरिया आन |
नौनों सब अब कै रई , गोरी की मुस्कान ||
पलका दयौ ब्याय में , अच्छौ दान दहेज |
दद्दा भी खुश हौत है , अपनी बिटिया भेज ||
पलका जब से आव है , गोरी रइ इठलाय |
बिछौ गुलगुलो सब लगत , हँसकैं खूब सुनाय ||
ठलुआ बालम जौन घर , पलका पौड़ै रात |
अचै -अचै कै खात हैं , परै- परै मुस्कात ||
पलका कौ मड़वा तरै , नेग ब्याय में हौत |
पखरइ करत नतैत है , आनंदी हो भौत ||
परै खाट कथरी बिछा , रगड़त नाक लिलार |
अब पलका पै रय मलक , गुन गा रय ससुरार ||
छला ( सादा अँगूठी )
खूब नुगरियन में छला , डारत धना किसान |
यह गाँवन की नारियाँ , रखती मुख मुस्कान ||
सोने चाँदी के छला , जब भी गढ़े सुनार |
सोचत यह शृंगार में , लगत भौत मनुहार ||
अष्टधातु के अब छला , बने बनायै आत |
जिनै पैर कै लोग भी , अपने पौर सजात ||
पंडित जोशी वैद भी , अपनौ ज्ञान बतात |
कौन नुगरिया में छला , कीखौ कितै सुहात ||
डरत कान में है छला , जब हौतइ है रोग |
वैद कात नस है दबत , लोग मानतइ योग ||
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बुंदेली दोहा - किरा (कीड़ा लगा हुआ)
लबरन की लेखौ करौ ,किरा भटन से आप |
इनै छाँट कै फेंक दो , लगै न कौनउँ पाप ||
किरा भटन पै बन गई , नौनीं - सी कानात |
बैतुक के भी आदमी, हौतइ यैइ जमात ||
कुत्ता हौबे जब किरा , भौतइ बुरवँ बसात |
बदबू से उल्टी उठत , दौरत नाक दबात ||
यैड़ा - टैड़ा आदमी , मान कभउँ नँइँ पाँय |
किरा बनै बै घूमतइ , सबखौं बुरय बसाँय ||
चमचा आज समाज में , लगत किरा से आज |
हड़ियाँ खौं चाटत फिर , सबइ बिगारत काज ||
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खिलकट (आधा पागल)
जितै हौय खिलकट खड़ौ , निकर जावँ चुपचाप |
खुपड़चटौ मत रोपियौ , बात समझियो आप ||
खिलकट खौं समझाउनै , कभउँ न सोचो बात |
बौ जिद्दी रत हर समय , करतइ खुद कौ घात ||
खिलकटपन में सट गयी, जीकी उमर तमाम |
बैइ सयाने बन रयै , चाबैं मुफ्त सलाम ||
खिलकट जीखौ जानकै ,हम कर दैतइ माफ |
बौइ दरद दे एक दिन , मिले नँईं इंंसाफ ||
हो जातइ है हर जगाँ , खिलकट की पैचान |
समाधान मिलता नँईं , कैसे हौ निपटान ||
खिलकट लरबै खौं फिरै , अपनी पूँछ उठाँय |
एक कहौ ना दो सुनो , बुजरक यह समझाँय ||
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बुंदेली-कीचर (कीचड़)
कमल फूल कीचर खिले , मिलबै नँईं सुभाव |
एक लगातइ दाग है , एक बताबै चाव ||
कीचर सें बचकैं चलैं , तब बौ करै घमंड |
सबइ लोग मौसें डरैं , हम दैं सबखौं दंड ||
कीचर की बस जानिए , इतनी -सी औकात |
उचट चिपक ऊदम करे , तनिक देर दे घात ||
स्वारथ के संगे तकत , अब कीचर को साथ |
दौनउँ के मन गंदगी , चलें मिला कैं हाथ ||
सज्जन पानी जब मिले , तब कीचर गर्राय |
क्रोधी सूरज देखकर , सिकुड़ सिमट वह जाय ||
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विषय गउ (गइया)
मिलत उयै वरदान है, गउ माँ जी घर रात |
और लगत है गेह में , देवी जू मुस्कात ||
घर में रत तैतीस हैं , कोटि जान लौ देव |
सुख साता पूरी रयै , गउ की जित हौ सेव ||
गउ गौबर खौं लीप कै, पावन करतइ गेह |
कंडा पाथत सब जनै , करत रखत से नेह ||
नँईं अन्न बरबाद हौ , गउ पी लैबे धोन |
पीकै वह आषीष दै , हँसत रात है मौन ||
दूद दही घर में रयै , भूक भगै सब दूर |
गउ रखबै कौ जौन घर, चलौ आव दस्तूर ||
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बुंदेली दोहे -गर्राट (अशालीन व्यवहार)
खुले आम तिरिया जितै , करन लगै गर्राट |
घर की इज्जत के उतै , टूटै चकिया पाट ||
चार दिना की चाँदनी , करौ न बाराबाट |
कर लौ नौनें काम सब , छोड़छाड़ गर्राट ||
पुंगन के गर्राट की , काँ लौं कैबें बात |
घूमै पूरै गाँव में , पी कै आदी रात ||
चढ़ौ जिनै गर्राट तौ , वे बन गय सरपंच |
हिस्ट्रीशीटर जौ रयै , बै अब सोना टंच ||
माते भी गर्राट में , सुलगा गय है आग |
मड़ी कथूले की मुड़ी , ठोको ठाड़ों दाग ||
मोड़ी सपरन आइ जब , लहरें उठ गइँ घाट |
रामप्यारी कै उठी , जवानी कौ गर्राट ||
गलती माते जू करें , सबरे साधें मौन |
लरका के गर्राट से , उरजट्टौ ले कौन
गुनताड़ों (हिसाब, उपाय)
गुनताड़ों दद्दा करत, फिर घर से डग देत |
नफा और नुकसान कौ , अंदाजा सब लेत ||
गुनताड़ों करबौ भलौ , बूडै बुजरक कात |
ईसै नौनें काम हौ , सबखौ भौत सुहात ||
गुनताड़ों घर कै करें , कैसै हौजे काम |
हर्र लगे ना फिटकरी , मिलबैं चौखे दाम ||
गुनताड़ों गुनिया करै , गुन लै चौखी बात |
चलत गैल फिर बौइ है , सबखौं लगै सुहात ||
गुनताड़ों सब सोच रय , जायैं सागर पार |
लायै सीता माइ खौं , लंका कै जा द्वार ||
गुनतारो गवँ है निपुर ,बहुमत कितउँ न आवँ |
लै जौरा की फौज अब , दोइ पलीतन पावँ ||
गुनताड़ों जातइ निपुर , जीमे दिखत उलात |
अतपर में रत आदमी , सतुआ थूक मचात ||
सुभाष सिंघई
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दोहे,- गुम्मा
एक- एक गुम्मा जुरै , तब बनतइ घर दोर |
यैसइ हम सब अब रहें , इस बुंदेली ठोर ||
हर गुम्मा नेंगर रहें , पर कछु थोड़ी दूर |
रखत बगल में प्रेम है , कोशिश भी भरपूर ||
गुम्मा का गुन जानियो , तकियो इसकी ओर |
आँधी पानी झेलकैं , देतइ सबखौं ठोर ||
गुम्मा जो भी पाथता , होतइ बौ मजदूर |
चुअत पसीना भी पथे , मजदूरन कौ नूर ||
पाथे गुम्मा बाप माँ , लरका चटा बनाय |
घर की तिरिया संग दैं ,गुम्मा खरा पकाय ||
गुम्मा ही जुरकैं सदा , खड़ी करत दीवार |
सबइ जनै अब ताकियो ,का होतइ है प्यार ||
गुम्मा से गुम्मा जुरै , रयै बीच सीमेंट |
रेता पानी प्यार कौ , महकत खूबइ सेंट ||
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बुंदेली दिवस गुलेंदौ (महुआ का फल)
हम देखत ई दौर में , सबइ दैत है घात |
फौर गुलेंदौ सौ इतै , सबखौं इतै डरात ||
पैला लगतइ फूल है , जीखौं महुआ कात |
लगै गुलेदौ फल कबै , सबखौ भौत सुहात ||
फौर गुलेंदौ लोग जब , धपरा जौर बिलात |
उनै पिरा कै तेल खौ , घर में सब लै आत ||
पकौ गुलेदौ सै करत , अब गरीब भी मेल |
उनै पिरा घर में रखत , कत है गुलिया तेल ||
है गरीब की आन यह , सुनौ गुलेंदौ आप |
बनत खूब पकवान है , पर रत गुलिया छाप ||
सुभाष सिंघई
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विषय - दाऊ (बड़े भाई का संबोधन)
दाऊ खौं मिलतइ सदा , सब जिम्मे कौ काम |
छोटे रत निशचिंत हैं , मिलत उनै आराम ||
दाऊ खौं घर में सदा , सबरै इज्जत दैत |
खरचा पानी खौं सबइ , पइसा पुटया लैत ||
दाऊ भी खुश हौत हैं , छोटन कौ लख नेह |
पूरौ करत उसार हैं , जौ भी देखत गेह ||
दद्दा भी देबें सदा , दाऊ खौं सम्मान |
सबसे पैला दैत है , उनखौं पूरौ ज्ञान ||
रुतबा पूरौ रात है , मानत जिम्मेदार |
घर बारे भी कात है , दाऊ बड़े हुश्यार ||
दाऊ थे बलराम जू , छोटे रय ते श्याम |
हक से डाँटत रय सदा , लेत रयै है नाम ||
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अप्रतियोगी दोहे -दराँच (दरार)
मन भी नाजुक होत है , जैसौ हौतइ काँच |
चोट लगै पै है दिखत , सबखौ साफ दराँच ||
भाई जब लौ एक रैं , घर में घुसै ना आँच |
मन मैलौ जब भी हुयै, दैखें सबइ दराँच ||
पंचायत भी गइँ भिनक , करन लगे सब नाँच |
बँट समाज पूरी गयी , दिखने लगी दराँच ||
पंडित जू घर में कथा , गये भुंसरा बाँच |
देख दक्षिना चुप रयै , मन में रखें दराँच ||
समझौते खौं ल्याय तै , पंच शाम खौं पाँच |
पर बै उल्टौ कर गयै ,कर गय बड़ी दराँच ||
सोनों तौ लैतइ चमक , पाकैं अच्छी आँच |
पर सीशा तो टूट जै , लैकें तुरत दराँच |||
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बुंदेली दिवस - ततइया ( बर्र)
काट ततइया लै जितै , मिरची-सी लग जात |
यैसइ कछु हैं आदमी, जगन-तगन भिन्नात ||
मौड़ी थौरी तेज हौ , लोग ततइया कात |
सामै से उरजत नँई , सबरै बच कै रात ||
लछमन से हौनइँ लगौ ,बातन कौ संग्राम |
बने ततइयाँ तब दिखै ,ऋषिवर परसूराम ||
काट ततइया लै जितै , घिस लौ लोहा आप |
या निबुआ कौ रस लगा , दो फूँकन से भाप ||
लोग ततइया बन गयै , तनकइ पै भिन्नात |
छरकत ईसै लोग हैं , साँसी कौउँ न कात ||
सुभाष सिंघई
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दोहे
छरक (अरुचि, घृणा )
नेतन सैं सब गय छरक, तक लय उनकै ढंग |
गिरगिट जैसे रंग कै , देखत खूब प्रसंग ||
लोगन की पैचान में , तनिक हौत है देर |
पोल खुले पै हो छरक , कोउँ करत नँइँ हेर ||
मरका बैला हौ जितै , लोग छरक कै रात |
नाँय माँय सब देखकैं ,चुपके सैं कढ़ जात ||
दुष्टन सैं भी हौ छरक , कौन बिदेबै गट्ट |
तनिक बात पै आन कैं , पकरत कौचाँ चट्ट ||
रऔ छरक कैं सब जनै , देखौ जितै शराब |
जौ पीतइ है आन कै , उनके गलत हिसाब |
नँईं धरम से हो छरक , बिनतुआइ भगवान |
हम चरणन के दास रयँ, बनी रयै पैचान ||400
-बुंदेली-224- मटिया चूले
मटिया चूले
मटिया चूले हर घरै , मोखौं नँईं बताब |
चटकी भींट दरार है, आकै नँईं सुनाब ||
कीकी अब अटकी परी , उनके घर खौं जाँय |
मटिया चूले देख कैं , गुन अवगुन बतलाँय ||
मटिया चूले फौर कै , बै फिर रयँ टपयात |
कत माटी चटकी हती , ऊपर से बरसात ||
मटिया चूले की बनी , जौन इतै कानात |
मतलब हर घर में मिलै , कौनउँ खाँमी बात ||
मटिया चूले लै चटक , बजन नँई सह पात |
हड़़ियाँ औदी गिर परै , खीर बगर सब जात ||
मटिया चूले मन दिखे , तनिक बात में रूठ |
दूजन खौं दुख दैत हैं , खुद में राखत फूट ||
बुंदेली झिर
उन्नाव सूकत है नँई , मुलक दिनन झिर रात |
कत सुभाष यैसी जगाँ , बबरा भजिया खात ||
बिजली चमकत रात है , तड़-तड़ करतइ यैन |
घर से देखत झिर सबइ , जुरकै भइया बैन ||
दादुर झींगुर मोर सब , झिर से सब मुस्कात |
नचत गात अपने सुरन , करत खूब उत्पात ||
झिर के संगै जब हवा , चले दिखा कैं यैड़ |
डारैं पैड़न की गिरैं , गिरकैं भरबैं पैड़़ ||
सावन -भादौ झिर लगै , हरसत सबइ किसान |
कुँआ-ताल- नदियाँ भरै , देखन जाँय जवान ||
बुंदेली दिवस , विषय - खाँगे (विकलांग)
बजरंगी खाँगे भयै , लगौ तीर जब आँग |
मान भरत कौ राख कै , कर लइ टेड़ी टाँग ||
लूले खाँगे हौत हैं , हौ चुनाव की मार |
रात तकै ना दिन दिखै , करतइ रयैं पिचार ||
उपनय जौ दौरत रयैं , हाँपत-सीसत रात |
उपटा उनखौं है लगत , खाँगे हौके आत ||
दौइ जनै लरतइ जितै , करतइ जौन बचाव |
खाँगे हौतइ पाँव सै , कुचरत देखत न्याव ||
खाँगे हौकै लौटतइ , सीमा से जब ज्वान |
पीठ ठौकतइ सब जनै , दैत भौत सम्मान ||
खाँगै हौकै भी लरै , दैयँ जौन बलिदान |
परमवीर उनखौं कहैं , और करै गुनगान ||
सुभाष सिंघई
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विषय -नतैत ( रिस्तेदार )
कत नतैत से सब जनै , राजी खुशी सुनावँ |
कछू खबर नौनीं अगर , सबखौ जल्द बतावँ ||
नौनें जितै नतैत हौ , भलौ हौत बतकाव |
इडुआ- टिडुआ हौ अगर , दैत कौउ नँइँ भाव ||
ब्याय काज में है जुरत , सबरै जितै नतैत |
सब मजाक में मस्त रत , अपनी-अपनी कैत ||
नातौ जौरत जौ सदा , दिल से सबखौ चात |
सइँ नतैत तब जानियौ , यह 'सुभाष' अब कात ||
दशरथ बनै नतैत थै , जनक पुरी सो धाम |
सीता बनी दुलैन थी , दूला थे श्रीराम ||
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बुंदेली विषय - फतूम ( किसान की बनियान )
भारत के मजदूर की , देखो सभी फतूम |
कितउँ -कितउँ हैं टोंकले , लगे चींथरा झूम ||
किस्मत के मारे फिरत , चटनी रोटी खात |
पैरे फटी फतूम हैं , मजदूरन की जात ||
जब किसान हौं खेत में , पैरै रात फतूम |
काम खेत में हैं करत, चुअत पसीना लूम ||
चड्डी और फतूम है , मजदूरन की शान |
काम करत हैं रात दिन , अपने हिंदुस्तान ||
छिदना बने फतूम में , नक्शा हिंदुस्तान |
काम करत मजदूर की , आज बनी पैचान ||
इज्जत रखत फतूम है , पेट पीठ लै ढाँक |
रोटी टोरत हाथ पे , कोउ करत नँइँ झाँक ||
~~~~~ , खुटखुट =चिन्ता/डर
लगी रात खुटखुट सदा , काम बिलुर नँइँ जाय |
गंठयान कछु बीदबैं , घर में आफत आय ||
खुटखुट मन में हो गई , सगया काय न आयँ |
चुगलन नैं भर कान दय, यैसइ आज दिखायँ ||
खुटखुट कै जौ काम हौ , डारौ कभउँ न हाथ |
जौन सुबीते कै लगैं , लैवँ उनइँ कौ साथ ||
परैं -परैं खुटखुट लगी , भुन्सारे पंच्चात |
लगने कर्रो डाड़ है , सुनने सबकी बात ||
खुटखुट खौ चिन्ता कहत , लगतइ चिता समान |
झुलसत तन मन है सदा , लै कै मानत प्रान ||
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बुंदेली - गुचू/गुचूक_सी (छोटी सी)
धरे गुचू -से श्याम हैं , पर करतइ उत्पात |
दैन उरानौ गोपियाँ , जसुदा तब खिसयात ||
रूप गुचू सो धर लओ , घुसबैं खौ हनुमान |
लंका तकलइ घूम कै , सीता किस अस्थान ||
लगत गुचू -सौ है भ्रमर , हौत पुष्प में बंद |
पिड़कै खौटत रात है , कितै छिपौ मकरंद ||
हौत गुचू -सी गुंचिनी , आधी लाल सफेद |
तौलत खूब सुनार है , रखत बजन के भेद ||
नौन गुचू -सो है डरत , बनत भौत है स्वाद |
खारै रौनै की सुनौ , निश्चित रत तादाद ||
जितै गुचू -सी टाटरी, गरम दूध में जाय |
फाड़ दैत तुरतइ उतै , तब पनीर बन आय ||
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अप्रतियोगी दोहे - तिगैला
कात तिगैला राह के , अंधी करौ न दोड़ |
सोच समझकर ही यहाँ , लइयौ आगे मोड़ ||
नाँय -माँय की अब खबर , देत तिगैला खूब |
चार जनै बैठे मिलें , बनत रहत मनसूब ||
गुइयाँ आपस में कयैं , सबइ तिगैला आवँ |
जुरकै सब खैलन चलै, बरिया पीपर छावँ ||
सड़कन से सड़कन जितै , अपनौ करें मिलान |
चौराहा हौ चार से, तीन तिगैला जान ||
चलत नाक की सूद में , जो भी अब इंसान |
कयै तिगैला रुक जरा , गैल करौ पहचान ||
तीन गैल फूटें जितै , उयै तिगैला कात |
जगन-तगन के आदमी ,सबइ उतै मिल जात ||
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सोमवार-29-7-24-विषय पीपर (पीपल)
बरिया पीपर नीम के , पेड़ लगाओ पाँच |
सबइ प्रदूषण दूर हौ , बूड़ें कत हैं साँच ||
बरिया पीपर नीम हैं , जंगल के तिरदेव |
इनै लगाकै सब जनै , करौ खूब तुम सेव ||
बरिया पीपर हैं खड़े , बीत गये कई साल |
बचपन में खेला सदा ,जहाँ कबड्डी ताल ||
बरिया पीपर पूजते , मानें उनखौं देव |
पर अब उनखौं काटते , मन में उगे कुटेव ||
अब पीपर के पेड़ पै , होने लगा प्रहार |
ज़ालिम हौ गवँ आदमी , करत कुलैया वार ||
पीपर के पत्ता हिलैं , चलती मंद समीर |
एक सुहाने गीत की , उभर जात तस्वीर ||
छुटकुल पंछी बैठते , जब पीपर की डाल |
छाया पाकर है हँसते , लगते मालामाल ||
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विषय जिज्जी
जिज्जी को जी है बड़ौ , भइयन की बन ढाल |
दद्दा- बाई चुप करै , जब भी बिगरै ताल ||
गलती जब भइया करै , जिज्जी लैत सम्हाल |
अपने ऊपर दोष ले, कत ना करौ बबाल ||
जिज्जी घर की शान शुभ , है मंगल वरदान |
आँगन की तुलसी बने , सबइ करौ पहचान ||
जिज्जी को सुख देख कै , खुश रत बाप मताइ |
भइयन भी मुस्कात है , हरसै खूब भुजाइ ||
जिज्जी राखी बाँधबै , छूबै भइया हाथ |
रक्षा सबसें माँगती , आगैं करके माथ ||
सुभाष सिंघई
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नौरता
नौ दिन पुरतइ नौरता , फिर ढिलिया कड़ जात |
जुरकैं सुअटा गाउतीं , सब बिटियाँ मुस्कात ||
क्वार सुदी परमा लगे , नवदुर्गा जब आँय |
जुरकै कन्या नौरता , भौरइ हौत सजाँय ||
रंग बिरंगे चौक लग , सजत चौतरा रेख |
बनत राक्षस नौरता , कन्या पूजैं देख ||
नारे सुअटा नौरता , जुरकै कन्या गाँय |
नौ दिन पूरे हौय जब , मिलकै हप्पू खाँय ||
कुँवारी बिटिया गाँव की ,सब गौरा कैलाँय |
पुजती राती नौरता , लोग देख हरषाँय ||
कन्या पूरै नौरता , फल इसका यह आय |
शिव-सा वर गौरा मिले , यैसौ भाग्य मनाय ||
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विषय - लग्गर
लग्गर रातइ एक-सो , करबे नईं घमंड |
ऊकै घर में प्रेम की , जौति जलै अखंड ||
लग्गर जो निगता चले , बन जातइ है खास |
कछुआ अपनी चाल से , हो गव इक दिन पास ||
लग्गर राना कर रयै , बुंदेली पै काम |
सब सुभाष इज्जत करत , आदर से लै नाम ||
लग्गर लिख रय जो इतै , अपने दोहा छंद |
सो साँसउ में कात हम , आतइ है आनंद ||
बुंदेली लग्गर बढ़ै, बोली भाषा खास |
दूर- दूर तक फैलकें , हौबे यैन विकास ||
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विषय - पान (तमाकू को जोड़कर विशेष दोहे)
पान तमाकू बाइ से , कत हौकें लाचार |
तौरे संगे मैं थुकौ , इज्जत हौ गइ तार ||
लोग पान दूषित करें , तनिक तमाकू डाल |
खाकैं फिर थूकत फिरैं , करें न कुछ भी ख्याल ||
जितै तमाकू बाइ जी , लिपट प्यार जतलाँय |
पान कात हर बेर ये , लोगन से थुकबाँय ||
पान तमाकू मेल जो , कीने इतौ बनाव |
संगे करकैं गैल में , लोगन से थुकबाव ||
संगत को जौ है असर , बात समझ गव पान |
थुकत फिरत कौनन डरौ , रौय गरै खौं तान ||
कहने का सारांश है , उदाहरण यह पान |
संगत के छींटे पड़े , दिखे जगत को आन ||
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विषय - बंडी
फसल नींदबे जात जब , बंडी आबे काम |
छैरत नइयाँ भूम पै , ढकै कमर तक चाम ||
बिन कालर बंडी रयै , गरौ खुलौ भी रात |
बाँहे भी लगती नहीं , मिलबे हवा बिलात ||
भौत पसीना सोखती , बंडी रत मजबूत |
हौ जातइ है रामधइ , काम करत में कूत ||
विषय - बिछिया
पाँव अँगूठा के बगल , जौन उगरियाँ हौत |
पैरत बिछिया ही तुरत , जलै गर्भ नस जौत ||
{यह एक वैज्ञानिक पहलू है }
बिछिया पायल खौं गुनौ , कभउँ न हलकौ जान |
देत सुहागन नारि की , पाँवन सैं पैचान ||
थौरो राखत मौल यह , पर बजनी सम्मान |
बिछिया नारी पेर कैं , राखत है मुस्कान ||
बिछिया पायल पैर में , नकुआ में नथ डार |
बिंदी लगा लिलार पै , सजे सुहागन नार ||
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विषय - मकोरा
दिखें मकोरा झाड़ियाँ , देखत मन ललचात |
काँटे चुभबै हाथ में , पर सब टोरत खात ||
ऊगड़ पथरी हो जगाँ , काँटन की रत झाड़ |
मिलत मकोरा फल उतै , फैली रातइ बाड़ ||
मौं में जाकै जीभ खौं , देत मकोरा स्वाद |
चिनगुट्टी गुठली लगै , सबइ करत है याद ||
बेरन सँग नौनें लगत , लोग मकोरा खाँयँ |
खटमिठ्ठे तरुआ चपा , चूस-चूस. मुस्काँयँ
गुजर गयै कइ साल है , नहीं मकोरा खाय |
पर अब जब चर्चा चली , जीभ मोइ पनयाय ||
विषय - चपेटा
आमैं -सामैं बैठ कैं , गुइयाँ करबैं मेल |
चले हथेली की कला , खिले चपेटा खेल ||
पैल चपेटा थाम कै , उलटी गदिया ल्याँय |
एक चपेटा लें बचा , गोट बना उचकाँय ||
चौपाला हौबै सबइ , जिनै चपेटा कात |
छोटी लगती गोटियाँ , मौड़ी खेलन जात ||
चैंचें पैंपे हौय जब , हम तो कातइ ठेट |
सबइ चपेटा चाप कैं , मौड़ीं भगै चपेट ||
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विषय कुर्ता
धोती कुर्ता छूट गय , अब पैरत हैं पेंट |
शर्ट और टी शर्ट में, फिरत लगा कें सेंट ||
कुर्ता धोती शान थी , हतौ भौत सम्मान |
अब दद्दू देहात के , मिलबै सुनबै गान ||
नेता भी कुर्ता तजै , पेंट शर्ट में आँय |
बस सफेद को ख्याल रख , वोट माँगबें जाँय ||
चलौ पजामा के सँगै , कुर्ता आलीशान |
मिलत आज भी लोग है , पैरै करें गुमान ||
कुर्ता पै जाकट डटै , पैरत लम्बरदार |
जातइ है पंच्चात में , मूँछ नुकीली डार ||
सुभाष सिंघई
विषय - परदनी
दद्दू पैरें परदनी , मेला देखन जाँय |
दौना थामैं हाथ में , सेव मगौरा खाँय ||
पेर झकझकी परदनी , कुरता जाकट धाँद |
रौब जमाती मूँछ भी , लगबै परमा चाँद ||
पेर परदनी सेठ जी , बंजी करबै जाँय |
पइसा माँगो ब्याज पै , टका तीन बतलाँय ||
पूजा में भी परदनी , पेरौ यैसी लीक |
नौनीं लगबै सभ्यता , लगत सबइ खौं नीक ||
अब भी चलतइ परदनी , यदि हौ कुरता संग |
जाकट पैरें होय तो , रौबदार तब रंग ||500
विषय -,धुकधुकी
मन में हो रइ धुकधुकी , गटा लयै है फेर |
नागिन जा रइ सामने , कर नँइँ पा रय हेर ||
बाँस कुँअन में डार लवँ , नँइँ मिल रइ है चीज |
उठत हृदय में धुकधुकी , मौं पै आ रइ खीज ||
जब आँखन ने देखलइ , बहती जाती लाश |
उठी हृदय में धुकधुकी , की कौ भयौ विनाश ||
उठत भौत है धुकधुकी , जब जातइ शमशान |
जलत चिता को देखकैं , टूटै सबइ गुमान ||
काली माँ को क्रोध सुन ,चली धुकधुकी ताल।
कैसे उनने पैनलइ , कटे मुंड की माल॥
विषय डाँस
डांस करा दव डाँस ने , चुभा -चुभा के डंक |
बैठ कुका रय खाट पै , तन में लाल कलंक ||
हरी घनी हौ झाड़ियाँ , नमी उतै जब हौय |
डाँस पनपतइ खूब तब , जानत है सब कौय ||
नरदा बुचकौ हौय तौ , डाँस बना लें ठौर |
शामइ से उबरात हैं , मुसकिल खाबौ कौर ||
चींथत पूरी रात हैं , तनिक गम्म ना खाँय |
सूजा गुच्चत डाँस सब , सबकी नींद भगाँय ||
मछरन के जे बाप है , डाँस धरौ है नाम |
जियै काट कैं छौड़ दें , बौइ खुजाबै चाम ||
सुनत डाँस कौ नाम ही, मोय फुरौरी आय |
काँट चुकै हैं बै हमें , तन पूरौ खुजलाय ||
विषय - छीताफल (सीताफल )
मिले विटामिन सी सुनो , जो छीताफल खात |
एंटी आकसीडेंट भी , भौत अधिक भी पात ||
कैलशियम ईमें रयै , लौह तत्व भरपूर |
फास्फोरस शामिल रयै , छीताफल है नूर ||
और बढ़ातइ इम्निटी , सबइ डाक्टर कात |
छीताफल भी दैख कैं , खाबै मन ललचात ||
सीता जी की खोज यह ,सब जानत यह बात |
छीताफल लगबै मधुर , राम ;लखन से कात ||
बीजा जड़ पत्ते सुनौ , करें दवा कौ काम |
छीताफल सब खाइयै , कहियै सीताराम ||
सीताफल टेशन बनी , निकट हैदराबाद |
छीताफल की बौगिया , मौखों आबै याद ||
विषय - जलघरा
बुंदेली में जलघरा , भैया ऊखौं कात |
पानी मुलकन जित रखें , निस्तारी में लात ||
घुसत जलघरा में लगे , ठंडी हमें बयार |
नमी थथोलत ही मिले, जौन दिखै दीवार ||
माटी के दिखबैं घड़ा , गड़ी डारिया हौय |
कुंडी और कसेड़िया , मिलें जलघरा सौय ||
ब्याय वरातन जलघरा , ढीमर भरबै आत |
पानी रत तब लबलबा , पीबै जब हम जात ||
गरमी कौ मइना रयै , निकट जलघरा जाँय |
तन खौं शीतलता मिलै , अपनी प्यास बुझाँय ||
गड़ी डारियाँ जल भरीं , धरे कसेड़ी गुंड |
कयैं जलघरा ओइ खौं, पानू जितै प्रचंड ||
विषय - जैबौ ( भोजन करना )
जैबौ घर में जब करो ,सपर खोर के आव |
पूजौ घर में देवता , रक्खो शांत स्वभाव ||
चार जनै जब बैठ कै , जैबौ करबैं आन |
इक दूजे खौं प्रेम की , बोले सबइ जुवान ||
शाकाहारी भोज हो , जैबौ रत सुखकार |
जैसौ हौतइ अन्न है , बैसइ आत विचार ||
जैबौ हौबे दूज घर , बड़े प्रेम से खाव |
हौबें कौनउँ भी कमी , नइँ ऊखौं बतलाव ||
जैबौ हौतइँ ब्याय में , लामी लगत कतार |
भोजन के सँग गारियाँ , परसे सब मनुहार ||
विषय - छिड़िया ( सीढ़ी )
पैली छिड़िया जब दिखत , कौनउँ मंदिर जाय |
तीन बेर छू हाथ से , अपनी मुड़ी झुकाय ||
पैली छिड़िया हौत शुभ , बनै लक्छ पौचात |
सौ सबरै सम्मान से , ईखौं मुड़ी झुकात ||
हौत गाँव में चौतरा, उनमें छिड़िया हौत |
उनमें हौतइ नावता , भरत देवता भौत ||
पैली छिड़िया कर्म की , यदि हौबे मजबूत |
सफल काम सब हौत है , कयै स्वर्ग से दूत ||
छिड़िया नौनीं वह लगै , हिलै न कौनउँ ईंट |
मजबूती कै दैत ज्यों , बसकारै में भींट ||
सुभाष सिंघई
विषय- चिया ( इमली का बीज )
बिच्छू ने काटो जितै , चिया घिसौ चिपकाव |
जहर उतारे आपकौ, भर भी दैबे घाव ||
चिया भिगौयैं चार दिन , छिलका देंय उतार |
पीसे मिसरी घी सहित , ताकत पाँय अपार ||
चिया भूँज के पीस लें , करबें मंजन दंत |
सात दिना में हो चले , दाँत पीलिया अंत ||
ग्रेंहूँ संग पीसो चिया , रोटी खाएँ आप |
हड्डी यदि कमजोर है ,मिटे रोग चुपचाप ||
स्वाद कसैला है चिया , लैव तवा पै भून |
फिर चटनी में पीस खा , साफ करौ तन खून ||
विषय - टिक्कड़ ( मोटी रोटी)
टिक्कड़ हाथन से बना , कंडी लैव जलाव |
सेंकौ अँगरन पर उयै, घी में खूब डुबाव ||
टिक्कड़ घी में हो डुबीं , भटा टमाटर भर्त |
सूँटत सबरै बैठ कै , गिनती की लें शर्त ||
टिक्कड़ आटा दाल की , सतनाजी भी हौत |
सेकें अच्छी साधु जन , स्वाद दैत है भौत ||
टिक्कड़ अँगरन में सिकैं , अलट पलट कैं यैन |
खरी-खरी जब सेंक लै , तबइँ परत है चैन ||
टिक्कड़ गक्कड़ खाय है , पर दो या हो तीन |
अफरा अच्छौ है चढ़त , बजै नींद की बीन ||
बन्न -बन्न कौ नाज हौ , लैव सबइ खौं पीस |
टिक्कड़ ठौकों हाथ सैं , और भजौ जगदीस ||
सुभाष सिंघई
विषय - टीपना (कुंडली)
बनी हती ती टीपना , जब हौनें तो ब्या़य |
बिटिया बारे ले गयै , दै गय हमखौं भाव ||
पैल मिलातइ टीपना , पाछै हो बतकाव |
ब्याय बनत या ना बनै , हौबें नईं छिपाव ||
हौय टीपना मंगली , तनिक बिबूचन आत |
मंगल दोनों ओर हों , जोग तबइँ बन जात ||
बारह घर हों टीपना , नौ ग्रह जीमें रात |
सप्तवार के संग में , केतु- राहु दिखलात ||
बना दैत है टीपना , पंडित जू महराज |
करतइ सगुन मिलान है , सदा व्याय के काज ||
सुभाष सिंघई
विषय - बुखार
बुखार को एक नए तरीके से लिखने का प्रयास किया है
वैद्य -
मेरी पकड़ी नब्ज है , कहते वैद्य दुलार |
छाती बैठी ठंड है , जिससे चढ़ा बुखार ||😙
झाड़़ा फूकीं वाला-
बुरी नजर तुझको लगी , दूगाँ सभी उतार |
झाड़ा देता मंत्र से , भागे यहाँ बुखार ||😗
आशिक मित्र -
यह लगती कुछ आशिकी , हुआ किसी से प्यार |
अभी छोड़ उस नाम को , जिसका चढ़ा बुखार || 😉
दारू ठेकेदार
नहीं दवा का काम है , मेरा सुनो विचार |
चार घूँट तू मार ले , उतरे अभी बुखार ||🥰
पत्नी -
चार काम घर के करो , बनो नहीं बीमार |
जिससे जाएगा उतर , चढ़ता हुआ बुखार ||😚
पड़ोसन -
उतरे अभी बुखार है , मैं देती हूँ राय |
मेरे घर आकर पियो , तुलसी वाली चाय ||🤭
साहित्यक मित्र -
सुन सुभाष आराम कर , दुआ करो स्वीकार |
उठा कलम लिख दो पटल , हमको चढ़ा बुखार ||😄
उपसंहार
ज्वर बोलो या ताप सब , या कह इसे बुखार |
लोग आयगें देखने , कर स्वागत सत्कार ||🙏🤭
विषय - परदिया (दीवार )
जीव -ईश के बीच में , नईं परदिया होय |
अंश ईश के जीव है , जानत है सब कोय ||
भक्त और भगवान में , नहीं परदिया काम |
आमै -सामै बैठ कै , भजतइ उनकौ नाम ||
बँटबारे की परदिया , जीं खौं दैतइ ठेस |
पर सुभाष संसार कै , यही दिखै परिवेस ||
दिखीं धर्म में परदिया , अपने - अपने ज्ञान |
ऊपर बारौ एक है , रखत नईं संज्ञान ||
रखो देश में एकता , करो काम सब नेक |
ऊँच-नींच की परदिया , दैवँ तोड़कर फेक ||
जात -पात की परदिया , जीनै लइँ हैं खैंच |
उनके मन खौ जानियौ , राखत हैं ये रैंच ||
सुभाष सिंघई
विषय - चिट ( चोट का निशान )
तन की चिट से नइँ फरक , पर मन की दुख देत |
भीतर नदिया - सी बहे , गीली रत है रेत ||
बने घाव की चिट अगर , चिंता की नइँ बात |
है चरित्र की चिट जितै , जीवन भर दे घात ||
चिट चिहरा पर जब बने , पूछत है सब लोग |
छवि बिगारत जानियौ , लगतइ बड़ौ कुयोग ||
नईं बने चिट काउँ खौं , सबइ बनै बेदाग |
जीवन में शुचिता रयै , मीठे हौबें राग ||
चिट रावन खौं लग गई , बिगरौ सबइ चरित्र |
कुल कौ कर लवँ नाश है , खौयै परिजन मित्र ||
बुंदेली -चिरैया (चिड़िया)
आज चिरैया रइ फुँदक , फरै आम की डाल |
हल्का फुल्का चुग रयी , रख मस्तानी चाल ||
बैठ चिरैया आँगना , प्यारी लेती धूप |
कंघी करती चोंच से , और निखारे रूप ||
चीं चीं की है ध्वनि मधुर , नन्हें मीठे बोल |
निडर चिरैया घूमती , लगे हमें अनमोल ||
छोटा रखती घोंसला , पर चूजों का ध्यान |
सदा चिरैया पालकर , करती उन्हें जवान ||
गुन विशेष हम देखते , दिखती सदा प्रसन्न |
जहाँ चिरैया को मिले , खा लेती है अन्न ||
-बुंदेली विषय -चिंटा (काला बड़ा चीटा)
चिंटा गुर में जब लगत , टाँड़ी से उतरात |
खा पी कैं बें मस्त रत, डिगराँ कौलत जात ||
चिंटा की टाँगें तकौ , कुछ लामी -सी होय |
गड़ा - गड़ा कैं हैं चलत ,तकतइ यह सब कोय ||
चिंटा चिटियाँ लेन से , चलतइ लें आनंद |
रखतइ अपनी एकता , इक मुठ्ठी में बंद ||
चिंटा करिया हौत है , पर देखे कछु लाल |
हरे आम के पेड़ में , पत्तन करें कमाल ||
चिंटा लगें मिठाइ में , मिठया रत हैरान |
जगाँ -जगाँ पै जब दिखत , झारत फिरे दुकान ||
चिंटा चुखरा चेंपला , घर में जब आ जात |
चटकी चौतइयाँ घुसै , करें उतै उत्पात ||
बुंदेली - कुल्ल /कुल(बिलात, बहुत सारे )
विषय - कुल्ल / कुल ( बिलात, बहुत सारे )
कुल दिखतइ है चौतरा , मिलतइ जितै भभूत |
मनसा पूरी हौत है , दैतइ लोग सबूत ||
कुल नेता हैं आजकल , टाँड़ी से उतरात |
ढूड़न जाओ एक तो , मुलकन अब दिखलात ||
अच्छा देखन मैं गया , मिले हमें कछु नेक |
कु्ल्ल मिले भी आदमी , झूठ रयै जौ फेक ||
कुल्ल साधु हैं आजकल , लगा लेत अनुमान |
पूजत चरनन खौं सबइँ , प्राप्त करत हैं ज्ञान ||
कुल्ल भरे अवगुन जितै, छरकत हैं तब लोग |
झकत कौउँ नइँ पास हैं , ऊखौं मानत रोग ||
सुभाष सिंघई
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बुंदेली में मनहरण घनाक्षरी
कुत्ता सोफा पै पसरौ , बिस्कुट खाकैं अफरौ,
डुकरा बैठो बायरैं , संगैं बैठी डुकरौ |
बउँ धन लैकैं कैयाँ , लैतइ खूब बलैयाँ ,
आगें पाँछै पौछत है , सब उकौ बुकरौ ||
किसमत खेले खेली , कुत्ते मिले जलेबी ,
दद्दा रगड़ तमाकू , बैठो कोने कुकरौ |
रूखी सूकी दद्दा बाई , छ्प्पन भोग लुगाई ,
माल पुआ कुत्ता खाबे, घी को सब चुपरौ ||
विषय - कुपिया (खाली डिब्बा)
बब्बा कुपिया खौं धरै , खूबइ रये टटोल |
बची तमाकू है तकत , दबी आँख खौं खोल ||
जोरू कुपिया में धरैं , लत्ता लिपटौ माल |
गुइयाँ जीखौं ताक रइँ ,समज न आ रइ खाल ||
कुपिया में भर कैं चलत ,जब महगाँ सामान |
नीचट ढकना गर खुलै , निपुर जात सब स्यान ||
मन की कुपिया जब भरै , तबइँ आत मुस्कान |
रीती जीकी रात है , रौतइ बौ इंसान ||
मन भी कुपिया जानियौ , ढ़डकत रत संसार |
करत छछौबा हर जगाँ , लालच करैं हजार ||
नौंन धना मिरचें धरैं , और भरत हैं दाल |
जग में कुपिया है भली , सच में करै कमाल ||
सोमवार -30.12.24-बुंदेली *कुलंग* (बीमारी)
लाँकत बै सब लोग हैं , जिनखौं हौत कुलंग |
बिजली -सी तड़कन उठै , कमर पैर केअंग ||
करयाई सें पाँव तक , दै कुलंग जब दर्द |
घुटना जाँघै सब दुखत , लाँकैं औरत मर्द ||
तनिक खटाई खा गयै , आफत -सी आ जात |
आँसत भौत कुलंग है , याद मताई आत ||
झारन फूँकन सब करैं , और डमा लगवात |
पर कुलंग मिटबै नईं , रुगया रत डिड़़यात ||
खान- पान देशी दवा , धीमो असर दिखात |
है कुलंग जिनखों सुनौ , बौ परेज से रात ||600
विषय - कबा (अर्जुन पेड़)
भौत भरै गुन जानियौ , पेड़ कबा की छाल |
ई कै सेवन से मिटैं , रोगन के जंजाल ||
हृदय रोग शक्कर जियै , राज रहा मैं खोल |
कबा छाल ऊ कै लियै , है सोने की तोल ||
टी बी- सूजन -दर्द हो , और पिराबे कान |
कबा छाल से वैद्य जी , करतइ खूब निदान ||
कबा प्रकृति शीतल रयै , स्वाद कसैला होय |
रक्त रोग इससें मिटैं , वात- पित्त- कफ रोय ||
मांसपेशियाँ ठीक हों , अल्सर करता दूर |
वैद्यराज सब जानते , कबा पेड़ है नूर ||
बूटी है संजीवनी , कबा पेड़ की छाल |
ई कौ रस भी रोग खौं , तन से देय निकाल ||
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-बुंदेली -कुकरी/कुकरे (सिकुड़ी /सिकुड़े)
खूब उरइयाँ ले रयै , अच्छी पर रइ ठंड |
कुकरी बैठी डोकरी, बक रइ अंड चबंड ||
नयी बऊँ कुकरी रयै, अधिक न बोले बोल |
जेठ ससुर के सामने , मौं ना पाबै खोल ||
अफसर ठाड़े दोर पै , कुकरे दिखें किसान |
तीन साल से नइँ दओ , कौनउँ अभी लगान ||
कुकरी बैठी डोकरी , लठिया गयी हिराय |
कौन जगाँ पै है धरी , कौई नईंं बताय ||
छाती बै अब रय फुला , जिनको हो गवँ व्याय |
कुकरै क्वारे दिख रयै , मिल नइँ रओ हिराव ||
कुकरी कतकारी रहीं , भौर करौ अस्नान |
दूनर हो गइँ ठंड में , ढूड़त रइँ भगवान ||
विषय- कचुल्ला (कटोरा)
लयै कचुल्ला हाथ में , डीगें रय है मार |
भरौ सेर भर घी इतै , ले लौ सबइ उधार ||
तनिक कचुल्ला भर लऔ , चले बाँटबें खीर |
ऐसे चिकना आदमी , दूध बनाबें नीर ||
एक कचुल्ला नाज को , लबरा करे बखान |
देत सबइ खौं नैवतो , आऔ सब जजमान ||
मौड़ा मौड़ी गेह में , पकर कचुल्ला कात |
भूख लगी है जोर से , खाबै दैवँ बिलात ||
तोता पिंजरा में पिड़ौ , चितकोटी है कात |
रखौ कचुल्ला सामने , देख उयै हरसात ||
बुंदेली - बिबूचन (अड़चन)
घरै बिबूचन हो गई , रुक गय सबरै काम |
अब तो अगले साल ही , जा पाने है धाम ||
जौ भी नौनें काम में , देत बिबूचन डाल |
उयै देख ऐसो लगत , जैसे हौबे काल ||
बेरा हौबे काम की , आजैं ठलुआ गेह |
लगत बिबूचन गइ पसर, मौय जताबें नेह ||
नईं बिबूचन आत है , कै सुनकैं कछु बात |
पकी खीर में मारे दे , आके अपनी लात ||
देख बिबूचन सामने , लोग पैल निपटात |
करें सयाने भी खतम , पारत नईं उलात ||
अबै बिबूचन देश की , मोदी जी निपटात |
फिर भी कछु यह कात है , मौखों नईं पुसात ||
-बुंदेली विषय कुरा (अंकुर)
कुरा जात हैं खेत में , पकी फसल के बीज |
पानी बरसे रात दिन , जै किसान तब खीज ||
उरदा कटबै आय तै , हौन लगी बरसात |
कुरा गयै सब खेत में , बिगर गयै हालात ||
मूँग चना गीले करो, पटका में दो टाँग |
कुरा जाँय तब खाइयो , गठ जै पूरौ आँग ||
बीज भूम में जब डरै , नमी मिलै कछु आन |
बाहर निकरत हैं कुरा , हरषित हौत किसान ||
सड़े बीज नेता लगैं , गयै कुरा इस देश |
भारत की बिगरी जमी , बदल रयै परिवेश ||
हल बाखर से जौत कैं , खेत हौत तैयार |
बीज कुरा कै बाँयरैं , देतइ खुशी अपार ||
सोमवार -20.1.25-पिल्ला* (कुतिया का बच्चा )
नेता पिल्ला बन गये , है चुनाव इस ओर |
तरवा चाटै आन कै , कइँ- कइँ करबें दोर ||
पिल्ला- पिल्ली आजकल , चमचन कौ धर रूप |
आगें पाछैं डोलतइ , नेतन की लयँ धूप ||
पिल्ला प्यारे हौत है , लरका जिनै खिलात |
कूर - कूर मौं से कहत, रोटी उनै खुआत ||
जड़कारें पिल्ला मिलें , जितै उरइयाँ हौय |
लै बिठार पिल्ला सबइ , हाथ फैरतइ दौय ||
बन्न - बन्न के नाम के , पिल्ला मिले बजार |
बड़े लोग पालत उनै , बिठलाबैं निज कार ||
पिल्ला पल्ली में परै , पररइ बेजाँ ठंड |
कूँ कूँ दद्दा कर रयै , गुरसी जला अखंड ||
सुभाष सिंघई
शनिवार-25.1.25-बुंदेली *पुपला* (बिना दांत का)
पुपला की हम कब सुनै , जौन देत आबाज |
नईं कान भी कुछ सुनैै ,कौन बता रवँ राज ||
थुथरी भी पुचकी लगे , परै नईं सर स्वाद |
बिना दाँत पुपला बकै , लगबै हमें फसाद ||
पुपला करतइ बात जब , उचटत मौं पै थूक |
येसौ लगतइ रामधइ , आज गयै है चूक ||
पुपला हौकें भी सुनौ , जौन तमाकू खात |
थूकत में उन्ना उतइँ , ऊकै सबइ भिड़ात ||
थुथरी नईं चलाइयौ , कइ पुपला से ठोक |
मानौ नइयाँ थूकबै , सबइ निपुर गइ रोक ||
बुंदेली दिवस - *ऊदम* (शैतानी )
लरका सब ऊदम करें , बिदा लैत है गट्ट |
बाप मताई आन कै , सुरजा लैतइ झट्ट ||
ग्वालिन जाती गैल में , छेड़छाड़ के काम |
माखन माँगें नेग में , करबें ऊदम श्याम ||
ऊदम बचपन में करत , कभउँ टोर लें टाँग |
आतइ घरै लुलात है , तनिक खुजा के आँग ||
ऊदम जब इस्कूल में , यार करत तै चार |
बेंत घलत ते हाथ में , परती गुड़ी लिलार ||
भइ छुट्टी इस्कूल से , ऊदम से हो चैन |
देख बिही के पेड़ खौं , हमने टोरी यैन ||
रकत चुचा घूँटै छिले , मौचे मौरे पाँव |
पर ऊदम छोड़ो नइँ , जानत पूरो गाँव ||
-बुंदेली - *खदरा* (गड्डा)
खदरा कभउँ न खौदियो , दूजे गिरे लुलाँय |
हँसी उड़ाबै लोग भी , मौका पर ही आँय ||
अँदरा भी खदरा बचा , चलत जात है गैल |
चलतइ राह टटोल है , नईं रखत मन मैल ||
खदरा हौबें गैल में , अँदयारी हौ रात |
चूकत पाँव जमीन पै, घायल हौत बिलात ||
खदरा खुदरय देश में , जाति धर्म के खूब ||
नेता भी उसकार रय , गलत रखें मनसूब ||
बसकारे खदरा बनैं , पानी बरसत रात ||
उचट लगत कीचड़ मुलक , उन्ना सौइ बसात ||
बुंदेली दिवस- *दुगइ * (दालान)
सासउँ दुगइ मकान में , खूब काम में आत |
झिरी लगै बरसात की , उन्ना उतइँ सुखात ||
आज दुगइ वीरान हैं , ऊखरी मूसर लोप |
मैनत करबै कौन अब , अपनो जी दै रोप ||
खुली -खुली सी रात है , घर की दुगइ सुजान |
चार लोग भी बैठ कै , खात तमाकू पान ||
खपरीली हो जब दुगइ , हो लकड़ी को ठाट |
चार चीज खुरसी रयै , और रखी रय खाट ||
चुरिया बारौ आ़यँ जब , बैठ दुगइ में जाय |
बउअन बिटियन खौं उतइँ , चुरियाँ बौ पैनाय ||
बुंदेली - *नीं* (नींव)
पथरा नीं को चुप रहत , दिखत कँगूरा चाह |
हर्र लगै ना फिटकरी , मोरी हौबें वाह ||
नीं के पथरा है कुटत , दुरमट. सें दें खूत |
कर्री छाती राखकैं ,बने रात मजबूत ||
हर कामन की नीं बनै , लगत जितै हुश्यार |
बनबै पै चर्चा नईं , दूर रयै सत्कार ||
सबसें पैला नीं खुदे , जीपै बनत मकान |
जितनी गैरी ठोस हौ , रयँ उतनी बलवान ||
आजादी की नीं बनी , दबँ गय जितै शहीद |
लाभ कँगूरा लै रयै , रखें बड़ी उम्मीद ||
पथरा नीं के कात सब , हमरौ हैं अरमान |
रैबे बारे आँय जौ , सज्जन हो श्रीमान ||
बुंदेली विषय *पुरा* (मोहल्ला)
पूरौ जुर गवँ है पुरा , मच रवँ हल्ला यैन |
जुड रइँ नदिया वेतबा , बाँदा वारी कैन ||
पुरा भरै की औरतें , जुर कैं घर में आँइ |
कर रइ बिटियाँ की विदा , दे आशीसन छाँइ ||
पुरा भरै में फैल गवँ , पसर गऔ है भात |
माते लुकै पियाँर में , बैरी बनकें कात ||
पुरा सुहानौ हौत है , जितै प्रेम से रात |
चार जनै बैठे उठै , सुख दुख कामें आत ||
जौन पुरा में हो चुगल , लेन न दैबें चैन |
तीन तिगाड़ौ है करत , सबकी करतइ ठैन ||
-बुंदेली विषय - पुतरा
मोरे पुतरा मौंग जा , लिपटा कैं कत माइ |
असुआ पौछे गाल कै , हित की करत दुहाइ ||
पुतरा कात मताइ है , लिपटा ले निज आँग |
अपने हाथन सूट दे , चोट लगी सब जाँग ||
़
धरे कदाँ पै माँ मुड़ी , पुतरा कयँ पुटयाय |
चिंता काहे खौ करत , लडुआ खाबे लाय ||
बूड़ी डुकरौ पूछती , कीकौ पुतरा आय |
गैल चलत में छेकतइ , लठिया मोइ छुड़ाय ||
नानी के जब घर गये , खूब गइँ हरसाय |
मोरो पुतरा कात रइँ , गरे रयी लिपटाय ||
हम सब पुतरा ही रये , उचकत रत दिन रात |
चार घरी भी बैठ कें , करत न ढँग की बात ||
-बुंदेली दिवस - *अबा* (ईंट का भट्टा)
अबा लगे हैं कर्म के , जलत पाप अंगार |
संत समागम हरि भजन , कर सकते है पार ||
कौनन कौनन घर अबा , करते हैं बिखराव |
आगी परचा मंथरा , बाँटत खट्टे भाव ||
मन के चुलघुस में जलें , अबा क्रोध के तेज |
है घमंड को होम भी , धरी बुराई सेज ||
जितै अबा लगबें उतै , धघकत अंदर आग |
करत तपस्या ईंट है , बनत भवन के भाग ||
माटी जब आकार ले , बनती पहले ईंट |
पकै अबा में लाल हो , तबइँ बनत है भींट ||
बुंदेली तला {*तालाब*}
ढ़ीमर मछली पालतइ , खोदत उतइँ मुरार |
भरौ रयै पानी तला , गातइ गीत मलार ||
सपरे हम खूबइ तला , खूब लगाई लोर |
डोड़ा पै चढ़कै उतइँ , भयँ है खूब विभोर ||
कमल खिलत है जब तला , कमलगटा भी होत |
सब खातइ हैं छील कैं , मजा आत है भोत ||
माटी भी नौनीं तला , करत खाद को काम |
कौस कात सब लोग हैं , खर्च होत ना दाम ||
बुड़की लैबें गय तला , बचपन के दिन याद |
बै दिन अब गय है बिसर , लामी है तादाद ||
भरें लबालब जब तला , पानी बरसें यैन |
तब किसान खुश रात है, छाती में रत चैन ||
-बुंदेली *ओट*
करो ओट में चोट नइँ , खुलकैं कर लौ बात |
लबरयाट भी छोड़ दो , करौ न कौनउँ घात ||
भड़या चोरी जब करत , लेत कितउँ है ओट |
सन्नाटे में घर घुसत , दैत चुरा के चोट ||
कभउँ बड़न की ओट में , रक्छा भी हो जात |
तनक मनक गलती छुपे , आगे सीख सिखात ||
पानी बरसे गैल में , ओट पेड़ की लैत |
तन बचात भीगें नहीं , मन में भी यह कैत ||
ईश्वर ई संसार में , हम तो खा रय चोट |
चरनन में अस्थान दो , राखो अपनी ओट ||
विषय - अकता ( पहले )
अकता से कछु आन कै , घेर जगाँ खौं लेत |
सबसे पाछे जात फिर , कछू लेत ना देत ||
उकता भी उनसे गये , जो अकता से आत |
करत खुपड़ मंजन सबइ ,अन्न-बन्न की कात ||
घर में शादी ब्याह हो , खबर तनक ही पात |
अकता से आबें फुआ , काम समारत जात ||
गये नहीं ससुरार है , अकता कैं लइ सोच |
करने जाकै दोदरा , करने खूब निपोच ||
हरि भजन साधू मिलन , जितै जुरौ मिल जाय |
अकता कै ही पौचियौ , आनद मन में छाय ||
अकता कैं ना बोलियौ , पैलाँ सुनियौ बात |
बूड़े बुुजरक देखियौ , बे सब कैसो कात ||
बुंदेली विषय - अकूत ( बहुत सा )
पइसा धरैं अकूत हैं , सबरे धन्ना सेट |
लूटत रत हैं रात दिन , बढ़ा -बढ़ा कैं रेट ||
बे सब लोभी जानियो, नकदी जितै अकूत |
पाई - पाई जौरतइ , बनके करिया भूत ||
है अकूत नकदी जितै , जौरत भर कैं हाँप |
मर कैं भी रक्छा करत , बनकें करिया साँप ||
ह़ै अकूत जब ग्यान तो , कर लौ प्रभु का ध्यान |
संतन कै पकरौ चरण , करौ खूब गुणगान ||
कछू जनै दोहा लिखत , भइया भौत अकूत |
ध्यान न देतइ दोष पै , दैतइ ऊखौ खूत ||🙏700
सुभाष सिंघई
विषय - अतपइ (आधा पाव)
अतपइ भर कौ जू नहीं , करत सेर की बात |
जैसे पलना में परौ , लरका घालत लात ||
अतपइ अद्दा आजकल , चमचन कौ धर रूप |
राजनीति में घुस गये , पा रय उजली धूप ||
अतपइ भर गुर चौंट लो , जितै मनन कौ ढ़ेर ||
कौउ न रौकत आदमी , लुचत जात है सेर ||
अतपइ भर को बाँट भी , रत तो गोल मटोल |
पलवाँ पै चढ़ जात तौ , रखत हतौ निज मोल ||
चल सुभाष हौरी खिले , अतपइ भर ले भाँग |
बाँटो घोटो खाव जू , नशा चढै सब आँग ||
अतपइ पउवा सेर भर , अद्दा देखे बाँट |
और पसेरी मन तके, चौरी पैला छाँट ||
अतपर (बीच में)
अतपर के बे काम रत , जीमें मचत उलात |
आदे पादे भी दिखत , नईं सार भी रात ||।
अतपर कौ बतकाव भी , भौत तासतइ मोय |
सार कछू निकरत नईं , समझाबे ना कोय ||
पंचायत निपटत नहीं , अतपर में रत बात |
लरन लगे लबरा जिते , देन. लगत हैं घात ||
छंद न अतपर को लिखो , लय में रखो विधान |
करत कोउँ संकेत तो , गुनौ तनिक श्रीमान ||🙏
ज्ञानी है अब सब जनै , सबखौं करत प्रनाम |
अतपर में ना बोलनें , रत मौखों अब ध्यान ||🙏
सीखा दोहा रख लगन ,बे लिखतइ निरदोष |
पर अतपर में जो रहत , उनै न आबे होश || 🙏
विषय- अतर
अतर महकतइ जब जितै ,खुश हो जातइ लोग |
आतइ कछु मुस्कान है ,जैसें पा लवँ भोग |
समधी पै छिड़कौ अतर , मल दइ लाल गुलाल |
समदन घूँघट डार कै , तान गयी है गाल ||
जीजा होरी खेल रय , अतर लयै है साथ |
सारी खौ पुटया रयै , सूँगौ मौरे हाथ ||
अतर लगा कै घूम रइ , जीजा की साराज |
रंग नहीं डलबा रयी , कै रइ हम नाराज ||
अतर डली हम ल्याय है , भैया लाल गुलाल |
हँस गा कै अब सब मिलो , नौनें राखौ ख्याल ||
बुंदेली विषय - अथौ , ( शाम )
बैरा हो गइ है अथौ , ढिलया रय है काम |
थकै दिखै मजदूर सब , चाहत है आराम ||
जैनी जन देखत अथौ , अंथउँ करबे जात |
दाना कौनउँ अन्न कौ , नहीं रात खौ खात ||
सब दिन करतइ काम है , खेतन डटे किसान |
देख अथौ घर लौटतइ , बारे बूड़े ज्वान ||
हो गइ बेरा है अथौ , जुर गइ भीड़ अथाइ |
चर्चा को है अब विषय , कीकी भगी लुगाइ ||🥰🙏
देख अथौ हम ले कलम , लिखतइ रातइ छंद |
पर पंचायत छोड़कैं , मन से लें आनंद ||
बुंदेली - -इतइँ //इतइ (यहां)
सबखौं दुनिया में इतइँ , मिलत करम से न्याय |
मीठे खौं मीठो मिले , खट्टौ खट्ट सुँगाय ||
बुंदेली सीखे इतइँ , सबइ जनन के संग |
कछू दिनन में सीख कैं , मैं भी भवँ तौ दंग ||
पाप पुन्य सबरै इतइँ , लोग कमा कैं जात |
बिधना तौलत खूब है , नक्की फल बतलात ||
सबकै मन में भी इतइँ , लगतइ खूब हिसाब |
फल भी सबरै जानतइ , कैसी बने किताब ||
आओ बैठौ सब इतइँ , कर लो मन से बात |
हराँ -हराँ चर्चा करौ , करियौ नहीं उलात ||
इतइँ आप हैं हम इतइँ , लिखत इतइँ मन खोल |
गुर जैसी गुरयाइ- से , सब बुंदेली बोल ||
24.3.25- सोमवार - काय (क्यों)
अब बोलत हो आन कें , पैल न बोले काय |?
चिड़ियाँ चुग गइँ खेत हैं , डूठा रयै दिखाय ||
नेतन के घर झारतइ , चमचा बन रय काय |?
कौन बिदी है गट्ट अब , नस खौ रयै छिपाय ||
नाक फुला के घूम रय , थुथरी बिगरी काय |?
कौन चुभी है बात अब, मौखों देवँ सुनाय ||
साँसी बातें छौड़ कैं , लबरयाट है काय |?
दौदा पच्ची है मची , सबइ रयै चिल्लाय ||
सोचत नेता काय नइँ , दयैं दौंदरा आज |
मंदिर मस्जिद कर रयै ,तनिक बची ना लाज ||
29.3.25- शनिवार - हुलहुलाट (हर्ष में जल्दबाजी )
हुलहुलाट में हाँ भरी , कीनौं नइँ विचार |
खट्टौ खा गय पौच के , रै गय गटा पसार ||
हुलहुलाट जी में मचत , खबर खुशी की होइ |
लेंगर जाकैं देखनें , सोचत सबरे सो़इ ||
हुलहुलाट में लर गये, जब चुनाव थो गाँव |
हार गये सो रो रये , जमा न पाये पाँव ||
हुलहुलाट में देखतइ , छूटत तनिक विवेक |
सोच नहीं तब पात है , कौन काम है नेक ||
हुलहुलाट सबखौं मचत , पर जो करत विचार |
पाँव बढ़ातइ सोच कै , ल्यात जीत उपहार ||
बुंदेली विषय - तुचक ( सिकुड़ना )
अच्छे -अच्छे शूरमा , फूलै फिरतइ गैल |
वक्त परे पै जै तुचक , खूब कुकाबैं मैल ||
पइसा में फूले फिरत , जिनै चढ़त गर्राट |
गट्ट बिदै पै जै तुचक , करै मताई याद ||
फूली पल्ली गइ तुचक , पिल्ला परै दिखात |
येसइ मानव देह अब , अपनौ हाल बतात ||
तुचक गयै सब यार अब , कपन लगै हैं हाड़ |
थौरे दिन सब कात है , रयै बैठ कैं काड़ ||
तुचक गयै अब गाल है , पुपला मौं है आज |
गोरी जिनखौ पोत कै , कभँउँ करत ती नाज ||
बटुआ = पर्स
बटुआ में पैंला सबइ , चीजें धरैं समार |
धागा की रत ती लरीं ,करबें बंद किनार ||
बूड़ै बब्बा साव जू , बटुआ रयैं चपाय |
लौंग सुपाड़ी लायची , सबखौं रयै खवाय ||
बटुआ देखे गुलगुले , हमने गोरी पास |
पइसा जीमें थी रखत , चीजें पत्री खास ||
बटुआ लयँ जो हाथ में , रत ती ऊकी शान |
बडौ आदमी कात तै , दैत हतै सम्मान ||
घरै आयँ जब आदमी , बटुआ देबें खोल |
और सुपाड़ी दे कतर , मीठे बोले बोल ||
बटुआ-सी है जिंदगी , गुनियाँ करत विचार |
खुलत बंद में नइँ पतौ , फट जे किते किनार ||
बुंदेली विषय - हरदौल
शकुनी के सँग कंस भी , मम्मा द्वय बदनाम |
पर मम्मा हरदौल खौं , सबरे करत प्रणाम ||
देव बने हरदौल हैं , जिनके गीत अपार |
गाती राती नारियाँ , व्याउ काज घर द्वार ||
धन्य ओरछा है नगर , धन्य राम कौ धाम |
धन्य वीर हरदौल हैं , अमर जगत में नाम ||
गाथा श्री हरदौल की , बुंदेली जन गाँय |
भावी खौं माँ मानियौ, जग खौ यह बतलाँय ||
नमन सुभाषा है करत , दौइ जौरतइ हाथ |
नाम लेत हरदौल कौ , धरत चरन में माथ ||
--फुकना/फूँकना (गुब्बारे)
फुकना से फूले फिरैं , फूफा देख बिआव |
गटा तरेरे कत फुआ , हल्ला नईं मचाव ||
जितने फूले फूँकना , तुचक समय पर जात |
कछू फुट्ट भी पैल से , सबखौं खूब दिखात ||
फुकना से ना फूलियो , ज्ञानी कत है बात |
पइसा टिके न हात पै , खर्चा सब हो जात ||
गुस्सा में भी आदमी, फुकना- सो जै फूल |
नँग-नँग फरकत से दिखें ,मचत हृदय में हूल ||
सूपनखा नकटी बनी , फुकना -सी गइ फूल |
फर्रानी ऐसी फिरी , मिट गइ रावण चूल ||
(बुंदेली). -गुड़या ( सिकुड़ना )
जो भी खुलकें बोलतइ , शरम न तनकइ खात |
कैलातइ बें सूरमा , करत न गुड़या बात ||
गुडया कैं जो बौलतइ , खौ देतइ विश्वास |
चुप्पा कत सब लोग तब, खूब हौत परिहास ||
दाड़ी में तिनका खुजा , गुड़या के रत चोर |
चर्चा हो बदमाश की , देखत सबकी ओर ||
चर्चा हौबे ब्याव की , मौड़ी गुड़या जात |
धीरे से सबकी सुनै , अपने कान चढ़ात ||
गुड़या के उन्ना रखत , सूटकेश में आज |
गये पुटइयन के दिना , और पुराने काज ||
सुभाष सिंघई
पवारौ = { किसी वस्तु को बलात देना }
भारे को सुनतइ इतै , करत पवारौ लोग |
खाज मानतइ काज खौं , ठाड़ो बैठौ रोग ||
ब्यादें जितनी हैं बिदीं , माँय पवारौ आप |
बाजे बजै न खोपड़ी , बनै राव चुपचाप ||
माँय पवारौ काम बै , घर में मचबै दाँद |
सला सूद हौबें नँईं , चलबै बैसइ धाँद ||
भइया हैसा माँग रवँ , सबइ पवारौ दाम |
और कमा खा ले इतै , भुन्सारे से शाम ||
लगे पवारौ -सौ जितै, उतै न डारौ हाथ |
सार स्वाद भी नँइँ मिलै , फूटै अपनौ माथ ||
काम पवारौ -सौ नँइँ , कौनउँ करियौ आप |
बदनामी हातै लगै, बिगरै अपनी छाप
बुंदेली - बुरय (खराब)
बुरय न हौतइ कोउ है , समय बुरवँ जब आय |
अच्छौ खासौ आदमी , फिरबें मूँछ मुड़ाय ||
दास कबीरा गय हतै , करन बुरय की खोज |
अपने भीतर देख लवँ , खुदइँ बुरय को ओज ||
कर्म बुरय जब हौय तो , बुरय मिलत परिणाम |
अँदयारे के काम में ,काँसे मिलबें घाम ||
करें बुराई जौन नर , बेइ बुरय लो जान |
कभउँ न सुदरै लोमड़ी , और काग लो जान ||
बुरय बोल हैं मिर्च- से, साँमै ठसकी आत |
लरबें खौं सूदै फिरै , मौं पै नर झल्लात ||
बुरय काम में हाथ भी , नहीं भूल कैं डार |
बदनामी तब हौत है , जीकौ नहीं समार ||
सुभाष सिंघई
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विषय - नीरौं- पास में)
प्रभु नों मन नीरौं रयै , करत भजन दिन रात |
कछु ना सूझत और है , कहे साधु की जात ||
नीरौं समधी रात है , समधन ले आ जात |
गप्पे फाँकत बैठ कैं , मूँछन ताव बतात ||
नीरौं दुश्मन है भलौ , रात सजग सब लोग |
गलती कौनउ हौय ना , जुरबै नहीं कुयोग ||
नीरौं कुत्ता हौय तौ , ऊखौं रवँ पुचकार |
ऐसइ ऐबी हौय नर , करियौ उयै जुहार ||
सबसै नीरौं सुत लगै , फिर नाती भी आत |
बिटिया के संगे धना , नीरीं लगत जमात ||
नीरौं घर के सामने , कलुआ कुत्ता रात |
भौकत रत है रात दिन , गरौ फाड चिल्लात |
सुभाष सिंघई
(बुंदेली)-कचरिया
पकी कचरिया देख कै , पंछी खाबे आत |
खा पीं कैं खुश हौत हैं , अपने सुर से गात ||
बिरबाई पै बेल चढ़ , बसकारें फर जात |
जिसके फल जब भी पकें , उनै कचरिया कात ||
कच्च कच्च दाँतन तरैं , निकरत है आबाज |
पकी चाय सूकी रयै , यही कचरिया राज ||
हरी कचरिया है करइ , पक कैं मीठी हौत |
रँग हल्कौ पीरो परै , स्वाद देत है भौत ||
सूक कचरिया तेल में , तलकैं भी जब आत |
नमक मिरच जब लें भुरक, स्वाद भौत दे जात ||
सुभाष सिंघई
शनिवार -प्रतियोगिता विषय -बींग (कमी)
नाक चढ़ी जिनकी रयै , सूँगें रख्खी हींग |
खत गइ डिबिया में रखी , जेइ काड़ दैं बींग ||
कमल नयन-सी आँख में , बींग ढूँढ रय मित्र |
कत फरकत जाँदा लगत , भद्दौ लगबै चित्र ||
बींग लगातन का लगत , तरुआ तनिक हिलाय |
कै दइ लरका है पियत , थुतरी सोय बसाय ||
कनआँ अपने टैट को , भूलौ रयै बखान |
कात फुली की बींग है , ऊ लरका में मान ||
बींग बिगारौ है करत , बिगरे साजो काम |
लोग-बाग पाछें परैं , कर दैबें बदनाम ||
बुंदेली विषय - मड़बा
नेग चार मड़बा तरैं , सबइ सगुन के रात |
मम्मा दैतइ प्रेम से , भानेजन कौ भात ||
मड़बा मंगल हौत है , व्याय काज हो गेह |
लिपत पुतत पत्ता डरत , बैठ करत सब नेह ||
मड़बा गाड़त पावने , मान दान जो होय |
हरदी हाते पीठ में , घालें महिला सो़य ||
हरे बाँस मड़बा लगै , पत्ता छाबैं आम |
गीत गाउती जुर सबइ , हौतइ जौन तमाम ||
पूजा हौबे मेर कीं , जब मड़बा गड़ जात |
मंगल करबे काज सब , सबरै देव बुलात ||
मड़बा के जब नेग हों , फुआ बैठ जै पैल |
काबे हमें बताउने , आगें सबखौ गैल ||800
12.5.25-सोमवार बुंदेली --भैंरन्टा(अतृप्त भूखा)
भैरन्टा मुलकन मिलत, अपने दाँत निपोर |
गटा गिद्ध से हैं रखत , जैसे खा जें टोर ||
भैरन्टा टपयात हैं , अपनी जीभ निकार |
मिलतन ही वह चाँट लें , टपका- टपका लार ||
भैरन्टा ना तृप्त हों , चाहे जितनो खायँ |
सबइ डकारे फिर उतै , फैला हाथ मँगायँ ||
भैरन्टा की है नहीं , अलग परे से जात |
यह सुभाव समझो नियत , सूदी सच्ची कात ||
भैरन्टा की जात में , नेतन खौं लौ मान |
कितनउँ खा जै देश को , पर भूखे रत आन ||
भैरन्टा मन रोग है , होत नईं संतोष |
समझाबौं बेकार रत , है यह जग में दोष ||
17.5.25- शनिवार(उजड्ड --लड़ाकू स्वभाव का)
लबरा ढोर गँवार खौं , मानत सबइ उजड्ड |
कत यह मूसरचंद हैं , और अकल से खड्ड ||
हौ उजड्ड से सामनौ , बरकत हैं सब लोग |
कौन बीद कै लाय घर , ठाडै बैठें रोग ||
जितने हौत उजड्ड हैं , लरबे ठाँड़े रात |
तबइँ मानतइ जे सुनो , खा लें जब दो लात ||
बन उजड्ड लरबे फिरे , बाँड़ी पूँछ उठाय |
थुथरी जो भी दे मिटा , नाक रगड़बे आय ||
जब उजड्ड बन जात है , अपने घर को पूत |
भौत उरानै आत है , संगै लयै सबूत ||
19.5.25-सोमवार बुंदेली --उट्टी(मित्रता तोड़ना))
उट्टी कट्टी कर लयी , अब नइँ जाने पास |
लच्छन भी उनने बुरय , पाल लये हैं खास ||
उट्टी भारत राखतइ , दुष्टन में है पाक |
ठान रार कटवाँ करे , वह तो अपनी नाक ||
उट्टी उनसे सब करो , जौ हौं दारू खोर |
अपनो चलन सुदार कैं , तकौ न ऊकी ओर ||
खट्टी कड़वी बात से , उट्टी भी हो जात |
रार बढ़ाकैं लर परै , आपस नईं पुसात ||
उट्टी उनसें ना करो , जो कत साँसी बात |
चलत गैल ईमान के , राखे भाव बिलात ||
सुभाष सिंघई
24.5.25- शनिवार अटर (परिश्रम)
नहीं अटर के काम हौं , कात आलसी लोग |
जादाँ जिद जब कर चलौ , चढ़ जै इनपै रोग ||
जिनपे होतइ नइँ अटर , करत बहाने आन |
एक जगाँ जै बैठ कैं , पेलत सब पै ज्ञान ||
माते मुखिया भी अटर , सबसे करवाँ लेत |
सुस्ताबे की टैम ही , चिलम तमाकू देत ||
दद्दा सबके कात हैं , जी खौं नईं चुराव |
अटर करो मन से सबइ , फल भी नौनों पाव ||
अटर मटर में हौत है , छीलो पहले आप |
जोरू जैसी दे बना , खा लो फिर चुपचाप ||
सुभाष सिंघई
26.5.25-सोमवार बुंदेली कंठी (तुलसी माला)
कंठी पैरें है मिलत , साधू संत सुजान |
चंदन टीका माथ पै , देतइ है पहचान ||
सूखी तुलसी से बनी , कंठी अच्छी हौत |
भजन जाप सब ही करत , धोक दैत हैं भौत ||
कंठी लेकर हाथ में , पैल झुकाऔ माथ |
बोलो फिर मौं से वचन , दैवँ भजन में साथ ||
कंठी की हौ शुद्धता , मिले हृदय में चैन |
नींद सुहानी हौत है , जब भी आबै रैन ||
विस्नू प्रिया तुलसी रही , सौ लौ विस्नू नाम |
कंठी गुरिया फेरियौ , सफल हौंय सब काम ||
31.5.25- शनिवार भन्ना (फुटकर पैसे)
चिल्लर सिक्का धात के, सब भन्ना कैलात |
मिलकै सब जै है बजत , हम भी सब खनकात ||
भन्ना बजतइ जेब में , भारी भी हो जात |
कभउँ जेब भी फार दे, गिरकैं घूर समात ||
भन्ना के दिन बीत गय , बने सबइ इतिहास |
आज डिजीटल युग बना, लेन देन में खास ||
बूड़ी डुकरौ जौर कैं , भन्ना लाईं पास |
गिन सुभाष कितने हुए , तौपे है विश्वास ||
नन्ना भन्ना बाँट रयँ , नाती पास बुलाँय |
टउका करवा चार ठौ , सबके हाथ थमाँय ||
2.6.25- सोमवार-बन्ना
बन्ना बन कैं आ गये , चारों भइया राम |
दशरथ के संगें जनक , सबखौं करौं प्रणाम ||
महादेव बन्ना बने , नंदी पै चढ़ आय |
ब्रम्हा पढ़ रय भावरें , विस्नू भी हरसाय ||
किशन जसौदा सें कहें , मौरो व्याह कराव |
बन्ना मौखौ मान कैं , बन्नी राधा लाव ||
बन्ना नारद गय बनन , धर बँदरा को रूप |
हँसी करा कैं आ गये , बन ना पाए भूप ||
बन्ना जब भी नर बनत , मन भारी हरसात |
सबइ लोग इज्जत करत , आगें सब बिठलात ||
सुभाष सिंघई
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7.6.25- शनिवार - भिनकत/भिनकती
बात भिनकती है उतइँ , लबरयाट हो काम |
उल्टी सूदी फाँक कैं , होय सुबह कौ शाम ||
भौत भिनकती बउँ धना , मुलकन धमकी देत |
पिटिया धुतिया बाँद कैं , भगबें की वह केत ||
टेड़ी थुथरी कर धना , गयी भिनकती खेत |
रोटी डुकरे चाँप कैं , पटक आँइ कछु केत ||
बात भिनकती पौंच गइ , सुन रय लम्बरदार |
नईं सुदर हालात रय , दिख रय सब लाचार ||
उतइँ भिनकती है मछौ , जितै गुरीरौ हौय |
दौरत सबखौं काटबै , बचा न पाबै कौय ||
सुभाष सिंघई
9.6.25-सोमवार बुंदेली -नातर (नहीं तो)
भारत कातइ पाक सें , पुतरा सुन ले बात |
नातर खाबै खौं मिलें , हम सब के दो हात ||
समझा कैं सब हार गयँ , ठेंटा खोलो कान |
नातर कड़जै अब हवा , तोरी पाकिस्तान ||
नइँ करियौ तुम चीं पटा , चुखरयाइ दो फेंक |
नातर अब कनबूजरै , देंयँ पाक हम सेंक |
कई बेर तै हार गवँ , अबकी आखिर मान |
नातर बिद कै सामने , मर जै पाकिस्तान ||
भारत खौं गुस्सा भरौ , करियौ नईं बबाल |
नातर तोरी पाक अब , चिथ जै पूरी खाल ||
10.6.25-मंगलवार-हिंदी चूना
स्वागत में आगे रहे , कत्था चूना पान |
लोंग सिपाड़ी लायची, दे सबको सम्मान ||
चूना खाते पान से , तम्बाकू में डाल |
रगड़े उसको जोर से , थपकी की दें ताल ||
कटनी चूना खान है , देखे ढेर अपार |
जाता पूरे देश में , अच्छा कारोबार ||
दीवाली का हो समय ,जब भी पुते मकान |
चूना से बनते कलर , जाने सभी जहान ||
चूना में है कैल्शियम , यह भू का उपहार |
कहीं दवा में काम दे , करे कहीं उपचार ||
14.6.25- शनिवार रचैया/रचनाकार ।
बड़े रचैया गीत के , मिलतइ इतै सुजान |
बुंदेली शुभ शान की, राखत सब पैचान ||
एक रचैया ईसुरी , लिख चौकड़िया छंद |
अमर नाम खौ कर गये , दे सबखौ आनंद ||
एक रचैया भी सुनौ , जगनिक जिनको नाम |
लिखकें आल्हा गा गये , नगर महोबा धाम ||
नगर ओरछा कवि भये , केशव जू महराज |
बड़े रचैया ग्रंथ के , कवियन में सरताज ||
भौत रचैया है मिलत , जिनके सुंदर गीत |
गातइ हैं सुर ताल से , राखत सबसे प्रीत ||
बनत रचैया हैं तबइँ , जब माँ खुश हौ जात |
लिखत प्रेम सै सब जनै , तब उमदा सब कात ||
सुभाष सिंघई
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16.6.25-सोमवार बुंदेली रनवन (अस्त व्यस्त)
रनवन जिनकी जिंदगी , उनखौ चिंता रात |
ठिया ठौर भी ना रयै , दिखतइ है अकुलात ||
कछु ठैकै रनबन रयै , दाड़ी मूँछ बढ़ायँ |
गप्पें मारें बैठ कैं , दिखत तमाकू खायँ ||
रनमन तन मन भी दिखे , जी भी रत बैचैन |
बोलत बौ है कुछ अलग , कउँ मटकाबै नैन ||
रनवन जिनकै घर रयैं , भिनतक रत हर चीज |
लगतइ सबखौ है उतै , खौ गइ इतै तमीज ||
अनबन से रनवन कितउँ , तन मन सोइ दिखात |
चिन्ता में जी रात है , तन की खाज खुजात ||
सुभाष सिंघई
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21.6.25- शनिवार भियाने/ भ्याने (कल सुबह )
भ्याने कभउँ न आत है , जो रत है वह आज |
जो करने सो कर चलो , रखकैं निज आबाज ||
पइसा माँगे साव से , बोले भ्याने आवँ |
गानौ रखकै खूब तुम , रुपया सब ले जावँ ||
टर गइ भ्याने बात है , उचट गई पंचाट |
जौरो फिर से जोगना , और बिछाओ खाट ||
भ्याने नेता आवने , सड़कें हो रइँ साफ |
कल्लू से कइ आइयो , हौजे करजा माफ ||
करौ आज की आज सब , भ्याने पै ना टार |
साजे काम बिगार दे , जो टपकी है लार ||
सुभाष सिंघई
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23.6.25-सोमवार बुंदेली - मछौं (मधुमक्खी)
लगत पेड़ पै जब मछौ , छत्ता बड़ो बनात |
भौत शहद निकरत उतै, लोग टौर कैं आत ||
अगर छेड दो तुम मछौ , काटत येसौ आन |
फुला आँग सब देत हैं , संकट में हों प्रान ||
घर के बेड़ा सार में , कभउँ मछौ लग जायँ |
मिले धुआनी जब उयै, छोड़ मछौ तब आयँ ||
लोग मछौ भी पालतइ , शहद लेत हैं जोर |
बेंचें खूब बजार में , कर लें पइसा ठोर ||
चिपके जब तन पै मछौ , भौत कुकातइ आँग |
सुइयाँ - सी लगबे बदन , मचत खूब है स्वाँग ||
सुभाष सिंघई
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28.6.25- शनिवार विषय रसा (सब्जी का रस)
सब्जी साजी हो बनीं , गरम मसालेदार |
रसा लगै तब चटपटौ , भरै जीभ में लार ||
परसइ़या जब आत है , कात रसा दो डार |
लुचइँ मीड़ कै सूटनैं , मजा पड़े इस बार ||
परसइया पत्तल बिछा , दुनियाँ देबे डार |
रसादार सब्जी बनी , कातइ भौत बहार ||
रसा रयै हर काम में , मन में तब आनंद |
बरसत तब सबके हृदय , सुंदर- सुंदर छंद ||
अगर रिसानी बात हो , उतइँ रसा सड़ जात |
जैसें पथरीली जगाँ, अन्न नहीं उग पात ||
बुंदेली - पोतनी (पीली मिट्टी)
है खदान में पोतनी , खोद सबइ लै आत |
घर पोतत लीपत रहत , दिखती यह मुस्कात ||
दीवाली पै पोतनी , खरिया माटी लायँ |
छरिया की दीवार पै, उम्दा पोतत जायँ ||
जीवन में भी पोतनी ,भौत जरूरी मान |
बुरे काम सब पौत कैं , अच्छे करो सुजान ||
खोदन जाओ पोतनी , सब साजी ले आवँ |
कचरा माटी फेंक कै , घर पूरो चमकावँ ||
गुदर घरन में पोतनी , अच्छी ठंडक देत |
थोरो पानी दे छिड़क , आनंदी सब लेत ||
5.7.25- शनिवार बढ़वाई (प्रशंसा)
बढ़वाई के जोग बे , जय बुंदेली मंच |
जौन ललक से सीख कैं , आज लिखत सौ टंच ||
बढवाई अच्छी लगै , सबखौं ई संसार |
तनिक बुराई काड़ दें , भबकैं बन अंगार ||
बढ़वाई के बाद भी , सुने बुराई कान |
ऐसे मानस सीख कैं , भौत करत उत्थान ||
बढ़बाई उनकी रयी , जिनके नौनें काम |
नेता वीर सुभाष को , आजादी में नाम ||
बढ़वाई में राष्टपति , अब्दुल साब कलाम |
जिनखौ झुक कैं देत ते , आदर और सलाम ||
बढ़वाई बे रत सुनय , फूलत रयँ भी येन |
तुचकै खोटे कर्म सुन, बोले हो गइ ठेन |||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
7-.7 .25-सोमवार बुंदेली -धाक (प्रभाव)
धनुष टौर कैं राम भी , अपनी धाक जमात |
लछमन ताली दें बजा , सिया मनइँ हरषात ||
भारत ने इस बार भी , हरा दऔ है पाक |
बन गइ हैं संसार में , फिर से नौंनी धाक ||
धाक जमातन का लगत , कर लो नौनें काम |
चार जनै तुमसे करैं, आकें जय सियराम ||
सुनौ विवेकानंद जब , गये शिकागो देश |
सम्मेलन में छा गये , जमा धाक परिवेश ||
धाक वही अच्छी रयै , कभउँ मिटे ना आन |
चार जनै मिलकैं सदा , दैत रयै सम्मान ||
12 जुलाई शनिवार -लीचड़/लीसड़ (बेकार निकम्मा)
लीसड़ हौबे आदमी , कीचड़ घाँइ बसात |
टउका कौनउँ नइँ करत , कंडा-सो उतरात ||
लीसड़ हौतइ आलसी , धरै हात पै हात |
ठलुआ ठेंगा बन करे सबसें उल्टी बात ||
लीसड़ बोलो एक दिन , मर कैं कौ ले जात |
सौ सब छोड़ो काम खौं , परे रहो दिन रात ||
लीसड़ अपनी बात में , कात न कौनउँ सार |
लुड़का सबरौ रायतौ , कातइ नईं बघार ||
लीचड़ लबरा आलसी , कीचड़ ही लो मान |
फैलातइ यह गंदगी , दिखबें खतरेजान ||
14 जुलाई सोमवार बुंदेली - विषय - बजे भये
बजे भये बे साव हैं , सबखौं देत उधार |
ब्याज टका बस तीन से , देबें आँख पसार ||
बजे भये नेता रहत , अपने भारत देश |
करत दाम से काम हैंं, जो भी हौबे पेश ||
बजे भये दद्दा हते , करत हते ते न्याय |
चार जनै भी आत ते , लैबें उनकी राय ||
बजे भये बे देवता , लगत रात दरबार |
अरजी सबकी है लगत , जो भी आबे द्वार ||
बजे भये पी एम है , नौनों उनकौं नाम |
संत महात्मा देंख कैं , सादर करत प्रणाम ||
बजे भये जो लोग है , सासउँ भौत डरात |
बट्टौ ना लगबें कभउँ , करें समर कैं बात ||
19.7.25- शनिवार गिरा(ग्रह नक्षत्र)
पैड़े पर गय हैं गिरा , घर में आ रइँ ब्याद |
बरकै भी कितनौ किते, काँतक मूड़ा साद ||
लरका खौ लग गयँ गिरा , टर गवँ आगें ब्याव |
पइसन खौं दम पार रयँ , घर के दौरें साव ||
कौन घड़ी कै शुभ गिरा , हौबें साजै काम |
पंडित सें पूछन गये , बब्बा राधेश्याम ||
साढ़े साती है लगौ , गिरा न कौनउँ शांत |
दाँद मची घर में रयै , मुड़िया भी रय भ्रांत ||
कर्म रये साजे जिते , सबइ गिरा फल देत |
खोटे हौवें काम तो , उतर चामरौ लेत ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
सुभाष सिंघई
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21-.7 .25-सोमवार. बुंदेली-कसर(कमी)
कसर काड़ दइ बाइ ने ,दयीं लबुदिया चार |
टो डारौ है चामरौ , राखौ नईं उधार ||
कसर न राखी ब्याव में , सबइ वरतया कात |
फिर भी समदी ऐठ कै, पटक रऔ है लात ||
कोउ कसर ना रान दें , मन की धन कर लेत |
ऊपर से भोरे बनत , गाल बजा भी देत ||
कसर न कौनउँ रान दइ , बिन्नू गइँ ससुरार |
नंद सुदारी पैल है, राखी सास उधार ||
पढ़बै में हौबे कसर , फेल आत परिणाम |
रुइ- सो धुनकत बाप है, भुंसारे से शाम ||
26.7.25- शनिवार - गुटान(छड़ी)
चलत जात डुकरा अबै , अपनी लयैं गुटान |
खुद ही करत उसार है, धरत रात सामान ||
गइया बैला भैसियाँ , सींग दिखाबैं आन |
बब्बा सूदौ हाँक दे , अपनी दिखा गुटान ||
लरका बिटियाँ दें तगाँ , बब्बा कहौ कहान |
खुदइँ दुकाँ कैं पूछतइ , काँ हैं आज गुटान ||
बब्बा काबै देख लो , मोरी आज गुटान |
गुन ईमें भारी भरे , जानत सबइ जहान ||
लरका जब मानत नहीं , दमदौरा दें आन |
डुकरा खिसयाँ कैं उठे , गुच्चे कमर गुटान ||
28-.7 .25-सोमवार बुंदेली गुरयाई(मिठाई)
गुरयाई के नाम घर , चार बतेसा पास |
दो खा ल़यँ हैं नंद ने , दो चटका गइ सास ||
बन रय घर में गुलगुला , पुरा परोसी टेर |
गुरयाई खौं गुर नहीं , मचौ बड़ौ अंधेर ||
गुरयाई ना मौं टिकै , कत सब खट्टी बात |
ससुर बड़ौ येड़़ा धरौ , बउँ धन सबसैं कात ||
गुरयाई गौबर भयी , निपुरौ सबरौ स्यान |
चट्ट बिलैया कर गई , लुकै धरै पकवान ||
बबरा चीला बन रयै , बसकारे में खूब |
गुरयाई डल तल रये, घी में रय है डूब ||
2.8.25- शनिवार चाली (नटखट, चंचल)
चाली जीकौ मन रयै , तनिक रुपत ना पैर |
भटकत खटकत-सौ रयै, बात करत नइँ ठैर ||
ऊधम दमदौरा करे , चाली काम बिगार |
घरकइया हैरान रत , डाँटत हैं हर बार ||
चाली की जो चाल में , आकर कैं बिद जात |
गंठयान बीदी रहत , नईं निनुर वह पात ||
चाली मौड़ी हो अगर , घर के रत हुशयार |
बिदा न लेबें गट्ट जा , करतइ रात समार ||
4.8 .25-सोमवार बुंदेली - चलाफिरी (भागदौड़)
चलाफिरी सब देख रय , मची दिखत घुडदौड़ |
अच्छे भले चुनाव है , रय वोटन खौ फौड़ ||
चला फिरी करने परत , मोड़ी स्यानी होय |
नौनो घर वर ढूँढ़बें , रात दिना सब खोय ||
चला फिरी से हैं बनत , बिगरै लुड़कै काम |
सब मूड़ा सध जात हैं , भजकैं राधेश्याम ||
चला फिरी जो नइँ करे, धरे हात पै हात |
उनके काम नसात हैं , कोउँ सुनै नइँ बात ||
चला फिरी मोरी रयी , रय ज्ञानी हैं संग |
ई सै राखत आज भी ,मन में भौत उमंग ||
~~~~कारौंच (कालिख)
लगी हुई कारौंच है , करकें खोटे कर्म |
नहीं छूट रइ घिस रयै , बैठे हैं बेंशर्म ||
जब चरित्र कारौंच नें , कर लवँ हैं अधिकार |
नईं छूटने कै दयी , ज्ञानी नें ई बार ||
कत चंदा खौं है लगी , चुगली की कारौंच |
सौ निकरत हल्कौ बड़ौ , लुका छिपा कैं चोंच ||
गंगा भी अब पाप की , नईं धौत कारौच |
कातइ भौत बसात है , ई पापी की चौंच ||
11.8 .25-सोमवार बुंदेली -पाछे(पीछे)
आगें पाछे कोउँ नइँ , लगा देत है हाथ |
करम भुगतने सब इतइँ , जौ चढ़ गवँ है माथ ||
आगे चलबै डोकरा, पाछे चलै दुलैन |
घूँघट से वह ढूँक रइ , हौबे बारी रैन ||
मौ कैं आगे सइ रयैं , जौ हौं जी के भाव |
भौत बुरवँ सब जानियौ, पाछे कौ बतकाव ||
मौ पै चुगलू चुप रयी , पाछे जौरे दूत |
कान भरत कत जात है , परने सबखौ कूत ||
आगें पाछे देख कें , जो भी चलतइ राह |
धौकों कभउँ न खात हैं ,मिलत सबइ की चाह ||
16.8.25- शनिवार कुरकुरी
मुइयाँ खौं लटका रयै , दै रय हैं आबाज |
काबैं चानें कुरकुरी , मोखों पूड़ी आज ||
हौतइ जौ भी मतलबी , अपनौ काम सटात |
खातइ पंगत कुरकुरी , लुचइ पुआ सटकात |
बात कुरकुरी नइँ करें , भौत बड़े उस्ताद |
ढिलुर पुलर बतकाव से ,कर दें सदा फसाद ||
काम बिगरतइ है जितै , मौं टेड़ौ हौ जात |
कौनउँ कै दे कुरकरी , ऊखों फिरै पटात ||
कछु लिखत है कुरकुरी , लेखन से कछु बात |
सबइँ जनै तारीफ में, लिखबे मन से आत ||
18.8 .25-सोमवार बुंदेली -कुलिया(गली)
बे साता नइँ देखतइ , जी की औंदी बात |
कुलिया पुलिया घाट पै , रचत रहत जो घात ||
कुलिया बन रवँ देश है , नेता रय हैं बाँट |
जात पात में बाँट कैं , रइयत खौं रयँ चाँट ||
चुगला कुलिया में घुसौ, नौंन मिर्च रवँ डार |
खटमिठ्ठी बातें करें , सबखौं रवँ उसकार ||
कुलिया में खिल्ली उड़े , नेता लरौ चुनाव |
जब्त जमानत हो गई , ठंडौ पर गवँ ताव ||
पाकिस्ताँ जब भी लरौ , गिरौ कुआँ में राँट |
भगतन कुलिया में दिखो ,जब दइ चटनी बाँट ||
कुलिया में पुलिया बनी ,धर दइ डलिया आन |
भड़या लैकें दौड़़ गवँ , हुलिया लइ पैचान ||
23.8.25- शनिवार खाऊँ (अधिक खानेवाला)
कैबे से करबौ अलग , खाऊँ अलापें राग |
कर दें सबरौ सौड़रा , दें बदनामी दाग ||
खाँऊँ मलकत खात हैं , फेर पेट पै हात |
आतइ नहीं डकार है , लड़ुआ खातइ जात ||
कुम्भकरण खाऊँ हतौ , सोत हतो घुर्रात |
आतइ नईं डकार थी , रामायन बतलात ||
चार कदम दूभर लगें , खाऊँ नइँ चल पात |
आलस भरकैं सोत है , तनकइ में घुर्रात ||
खाऊँ खौ न्यौतौ मिले , भारी खुश हो जात |
का का खाबे में बनो , पैलाँ पतौ लगात ||
25.8 .25-सोमवार बुंदेली खिचरी (खिचड़ी
खिचरी है गरमा गरम , पकते चाँउर दाल |
घी भी ऊमें डार के , मजा मिले तत्काल ||
करती खिचरी हाजमा ,जल्दी भी घुर जाय |
स्वाद लगत नौनों भलौ, मजा भौत है आय ||
तड़का लगै बघार का , खिचरी खुश्बू देत |
गरम मसालो डार कें , सबको मन हर लेत ||
अब खिचरी सरकार भी , चलें पाँच तक साल |
गठबंधन बोलत इसे , स्वीकारें हर हाल ||
खिचरी खाबे वैद्य जी , मानत अच्छी चीज |
खा कै जल्दी ठीक हो , कातइ सबइ मरीज
30.8.25- शनिवार खुतैला(अधिक पिटने वाला)
पाक खुतैला जानियौ , खुत गवँ कइयक बार |
भारत ने मौं मीड़ कै , दई करारी हार ||
कालनेमि भी बन गयौ, बड़ौ खुतैला आन |
चटनी -सी बाँटत रयै , वीर बली हनुमान ||
नईं खुतैला मानतइ , उचक-उचक कैं आत |
हात पाँव खाँगैं करे , पीठ कुका कैं जात ||
हौत खुतैला बेशरम , जुआँ न रैंगत कान |
दाँत निपौरत रत ठुकत ,अधिक दैत नइँ ध्यान ||
तान देवँ कनबूजरे , चायँ बजा दो गाल |
चायँ रगड़ दो पीठ भी , बुरवँ खुतैला हाल ||
1.9 .25-सोमवार बुंदेली खूसट (मनहूस)
खूसट खौं मनहूस कत, शकल लगत है काग |
उगलत मौ से है जहर , लगत चौंच भी आग ||
मिलते खूसट हर जगाँ , रहें पसारें टाँग |
मजा देखबें आत हैं , डार कुवाँ में भाँग ||
खूसट लीसड़ जलभुना , लम्पट लबरा श्वान |
काम नसा दैं यह सबइ, उपत - उपत कैं आन ||
खूसट सुनबै कब कथा ?, पर आकैं जै बैठ |
पंडित खौं टौकत रयै , कहै सुनाओ ठैठ ||
खूसट के दरसन भये , सूक गये है खेत |
नगदी लुट गइँ हाथ से , झरै मुडी पै रेत ||
6.9.25- शनिवार गुर्र (बदले की भावना)
लोग भजातइ गुर्र हैं , मौका अच्छौ ताड़ |
मजा देखबैं आत हैं ,समय खूब भी काड़ ||
चुप्पा चुगला चोटटा , साँप भजातइ गुर्र |
औसर तकँ कैं डंक दें , उड़ जातइ फिर फुर्र ||
गुर्र कभउँ नइँ राखियौ , है यह जलती आग |
मन के अंदर यह जलत , सूकत हृदय पराग ||
रात दिना बेचैन रत , गुर्र बाँध जो रात |
ऊ कै मन खौ तब नहीं , कौनउँ काम पुसात ||
गुर्र धरौ नइँ मन सदा , कै दौ साम बात |
भैया तोरो काम जो , मौखों नईं पुसात ||
दिनांक 8 सितम्बर 25 ,- बुंदेली- खपरा
बसकारे के पैल ही , खपरा सब पथ जात |
अबा लगा कें लें पका , फिर घर में ले आत ||
छप्पर छौनर सब करें , खपरा लगे बिलात |
बूँद चुयैं नइँ एक भी , क्रम से उनै लगात ||
खपरा लगैं अटाइ में , या छपरी में आन |
यैसे हौत गरीब के , जानों सबइ मकान ||
घर से बाहर हौय जब , कौनउँ न्यौता आयँ |
खपरा पलटे दौर कौ , संदेशों दे जायँ ||
बँदरा खपरा फौर दें , गिरतइ आन धचाक |
बसकारे में तब चुअत ,पानी करत मजाक ||
बुंदेली झूट्टा (झूठा),
मिलते झुट्टा हर जगह , गप्पें मारें चार |
ठलुआ ठेंगा यह रहें , समय करें बेकार ||
भिड़ा दैत यह बात खौं , और लगा दें आग |
झुट्टा लीला पोप-सी , जीमें दिखतइ दाग ||
झुट्टा खातइ कौल हैं , कर लो अब विश्वास |
कंडी -से उतरात पर ,बने फिरत खुद खास ||
झुट्टा की चल जायँ तो , सत्य वहाँ फिर रौय |
फिर साँसी भी बात खौं , सुनबै मिले न कौय ||
झुट्टा भी पंचात में , बैठौ रात किनार |
खुसुर पुसुर करतइ रयै , लोगन खौं उसकार ||
15.9 .25-सोमवार बुंदेली , निछांउर (धन अर्पण करना)
नान निछांवर माँग रइ , समधी बुचकै कान |
हाँ-हाँ हूँ -हूँ कर रयै , दै नइँ रयँ हैं ध्यान ||
नेग चार के बाद ही , करत निछांवर लोग |
मातिन नाँनें कात हैं , नौनों जुरौ सुयोग ||
नेगन पैं किलकिल मची , फुआ करत है माँग |
पैल निछांवर सब करो, नाँन अड़ा रइ टाँग ||
कामदार सब आत हैं , रख कै भारी आस |
मिले निछांवर सावँ कैं , है वियाव जो खास ||
फूफा भड़कौ है फिरत , गिनें नेग के दाम |
ईसैं जाँदा नाँउँ खौ, मिली निछांवर शाम ||
अतिरिक्त बुंदेली - टपरा
टपरा डारत मेड पै , जितै बुबैं हौं खेत |
घरकइया कौनउँ रहत , रखनबाइ के हेत ||
टपरा में डुकरा परौ, करें ढौर हैरान |
लठिया लैकें हाँकबें , बाहर कै मैदान ||
टपरा देखे खेत में , बड़े काम में आत |
बसकारौ जाड़े कटे , रखनबाइ हित पात |
टपरा थुमियन से बनें , लें किसान जब तान |
पत्ता भूसा जैं चिपक , बन जै अच्छी शान ||
घर के टपरा में कितउँ , खाड़ी खपरा होत |
ढकैं रात है धूप खौं , बसकारौ भी भौत ||
सुभाष सिंघई
22.9 .25-सोमवार बुंदेली -बिलना (बेलन)
बिलना सबको एक दिन , आकर इस संसार |
काल चका के पाट पै , होने दुचरी यार ||
दुचरी = कुचली
सुनो तखइया बानिया , वीरन की तलवार |
यैसइ बिलना जानियौ , औरत कौ हथियार ||
बिल ना दैबें बाड़़ई , बिलना लिया खरीद |
बोले बिलना बिल नइँ , इतै करौ उम्मीद ||
चिमटा बिलना तंगरा , छरिया और कढ़ाइ |
थेंथौं हँसिया अमकटा , पटा रखें घरबाइ ||
बैठी जौरू जब हमें , अपने गटा दिखात |
बिलना पै जब हाथ हो , लोग खिसक तब जात ||
27.9.25- शनिवार बिरौनी
अँखियन कजरा डार कैं ,पलकै लयीं सँवार |
धनुष बरौनी दिख रयीं , गोरी के शृंगार ||
नैन मटक्का चल रयै , दैय बिरौनी साथ |
पलकों के संगै दिखे , खूब लगाए हाथ ||
घनी बरौनी काजरी , मोर पंख की नाँइ |
जैसे बादर में छिपी , सूरज की परछाँइ ||
उड़ै गगन में बादरा , भरे रात है नीर |
लगै बरौनी औइ-सी , गोरी सुघड़ शरीर ||
ढकत बरौनी आँख खौं , पलकन खौं दे आड़ |
पाइ गटन ने है मुफत , बैठे घरे जुगाड़ ||
बुंदेली निचाट = सत्य / सार, पक्का
बहू कबै अब सास से , कै रय. बात निचाट |
इकड़ तिकड़ तुमने करी ,खड़ी करें हम खाट ||
हम निचाट कत बात हैं , अधकचरौ हौ ज्ञान |
ऊपर से अभिमान हो ,समझों तब नुकसान ||
लगी हौय पंचात तब , काने परत निचाट |
झूटौं झंडा नइँ गड़े , और लगै नें हाट ||
सज्जन के गुन देख कैं , सबने कही निचाट |
ठोस बात यह ही करत , जिसको मिले न काट ||
है निचाट यह गप्प भी ,लबरा रवँ जौ फाँक |
हुई उजागर बात खौं , कम रवँ हैं जौ आँक ||
पंडित जी बाँचें कथा , कै रय बात निचाट |
अवनि और आकाश हैं , चकिया के दो पाट ||
4.10.25- शनिवार - भर्रो (अव्यवस्था)
भर्रो खातो है जितौ , खुली मिलत है छूट |
अपनौ हाथ निकार कै , खूब करत सब लूट ||
भर्रो कातिक में दिखत , नईं मिलत है खाद |
नकली डीएपी बिकै , खेत हौत बरवाद ||
भर्रो मच गवँ व्याह में , कितउँ कड़ी कउँ दार |
बगरौ फिर रवँ रायतौ , फूफा करें किनार ||
भर्रो अफसर कर रयै , खाँ बैठे हैं लाँच |
उल्टै सब कानून कर , रयै कथा - सी बाँच ||
नकल टीप कैं पास हैं , रखत न कौनउँ ज्ञान |
सौलह दूनी आठ कत , बनै फिरत विद्वान ||
11.10.25- शनिवार - गन्नैटी(चक्कर खाना)
घूमत रात किसान है , गन्नेटी-सी खात |
मिलत नईं है यूरिया , ठेंगा सबइ दिखात ||
हँसी खुशी हम जात है , गन्नेटी खा आत |
नेता भाषण में सदा , भारी भीड़ बुलात ||
गन्नेटी हम खा आयँ हैं , उनकी गये वरात |
सबइ वरतिया लौट के , भूखन रयै बिलात ||
गन्नेटी में घूम रयँ , मिल नइँ रओ उकास |
अतपर टाँगें सावँ हैं , हमें मान कैं खास ||
गंठयान अब बीद गइ , नहीं निनुर रइ आज |
गन्नेटी हम खा रयै , चिपकी लगबें खाज
13.10 .25-सोमवार बुंदेली -बुचके (बंद)
बुचके राखत कान हैं , बैरा बनकैं रात |
बस मलतब की हैं सुनत , ऐं -ऐं करकें बात ||
बुचके सबरे नेंग हैं , फूपा गाल फुलायँ |
मड़वा पैलाँ गाड़ दो , रइ है फुआ मनायँ ||
बुचके नरदा दौर में , चौतरफा से आन |
उठ रइ भौत सँड़ाध हैं ,नकुआ दे रयँ प्रान ||
लेखन बुचके जो करे , देत लोग हैं टोक |
लिखबे बारे खौं लगे , हमें काय रयँ रोक ||
तुचके बुचके अक्ल सें , हौत न साजे काम |
खट्टौ खातइ हर जगाँ , हौत अलग बदनाम ||
18.10.25- शनिवार विषय - भदूना(मिट्टी का ढेर, घरौंदा)
धरे भदूना से घरै , अक्कल भैंस चरायँ |
प्यासी पड़िया खौं तला , नुगरी से दिखलायँ ||
नयी बऊ स्यानी कड़ी , भिनकौ रत तौ दौर |
खुदौ सुदारौ चौतरा , लयौ भदूना फौर ||
रखनबाइ खौ भेज दवँ , सबने एक मजूर |
हतौ भदूना अक्ल कौ , बैठै रवँ बौ दूर ||
कछू विधायक चुन गए , तकौ भदूना छाप |
बौलत नइयाँ बे सभा , बैठे रत चुपचाप ||
मौं सें बोलो सब जनै , नईं भदूना रावँ |
चार काम में हात दो , हुनर निजी बतलावँ ||
20.10 .25-सोमवार बुंदेली भबूत(पवित्र राख)
आज दिवारी को दिना , पूजन करौ अकूत |
धन देवी आशीष की , सबरे लेवँ भबूत ||
रोग टोटका से अगर , बढ़तइ व्याधि अकूत |
तब गुनिया कछु पूजकैं , टीकत माथ भबूत ||
दीवारी दीपक जला , होम धूप दो आज |
दें भबूत सब देवता , जब हो पूजा काज ||
दीवारी के बाद सब ,ग्यारस देव जगात |
धूप दीप भी देत हैं , शुभ भबूत भी पात ||
मंत्र सिद्ध भी हौत हैं , जीखौं आत जगात |
ले भबूत माथे लगा , धन्य स्वयं हौ जात ||
25.10.25- शनिवार भब्बड़(अव्यवस्था)
भब्बड़ में सब देखतइ , खुली रात है छूट |
अपनौ हाथ बनात सब , खुली मचत है लूट ||
भब्बड़ हौतइ हाट में , जुरत सबइ जब आन |
अपनी- अपनी सब करत , लेत देत सामान ||
भब्बड़ पंगत में भई , मच गइ भागम भाग |
जितै धरी पूड़ी चुरी , नईं उतै है साग ||
भब्बड़ दफ्तर में मचौ, खा रय अफसर लाँच |
फिर भी गुन सरकार के , बाबू रयँ है बाँच ||
कछू जनै भब्बड़ करैं , जान बूझ के आन |
अपनौ काम सटात हैं , भटका सबकौ ध्यान ||
लंका में भब्बड़ मची , कूँद रयै हनुमान |
जला रयै सब पूँछ से , रावन है हैरान ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
27.10 .25-सोमवार बुंदेली -मंसा(इच्छा)
मंसा राखत सब जने, जपैं राम कौ नाम |
गुरिया फेरत ही मिले, मिलबै उनकौ धाम |
मंसा मन की है फसल , जित चाहे उग आत |
कितउँ सौचतइ है भलो , कितउँ लार टपकात ||
मंसा पूरण गय करन , ले पूजा सामान |
आशा राखत यैन हैं , अबइँ सुनै भगवान ||
मंसा जी की है बुरइ , रत हैं बै भैरात |
होत न खानागान है , ठाँटी हम भी कात ||
मंसा से सब हौत है , मंसा करम विधान |
मंसा से इज्जत मिले , कउँ मंसा नादान ||
1.11.25- शनिवार मरियल(दुबला पतला)
मरियल सुनतइ बैल है , नहीं दौड़ बें पात |
हल्को पतरो बे बजन , गाड़ी में ले जात ||
मरियल टट्टू से धरे , पर हाँकत जो डींग |
ऊ सै कत तब सब जनै , अपनी तक लौ बींग ||
पैलवान मरियल धरौ , पर रवँ है ललकार |
सबइँ देख कैं हँस रयै , ऊ कै देख विचार ||
दो आषाढ़ पर दूबरे , मरियल गदहा रात |
हरियाली लख बे कहत , कछू न अब हम खात ||
मरियल हौबे भाव तो , नईं रचत हैं छंद |
बेतुक के बातें कहत , आबे नइँ आनंद ||
मरियल हौबे आदमी , तब सबरै हैं कात |
लगतइ यह है रोगिया , जैसे कछू न खात ||
सुभाष सिंघई
3.11 .25-सोमवार बुंदेली मांद(गुफा)
मित्रन की उसकार से ,घुसे शेर की माँद |
गदबद दैके आ गये , नकुआ घुसी सडाँद ||
शेर माँद में रात है , बिल में चूहा रात |
घोड़ा रत घुड़साल में, हाथी खुल्लाँ खात ||
अगर शेर की माँद हो , अलगइ भौत बसात |
छरकत सबरै जीव हैं , कौउँ लिगाँ नइँ जात ||
माँद घौसला बिल मिलें , जंगल में इस्थान |
पर हम सबके हौत है , कातइ जिनै मकान ||
एक माँद में एक रत , रखत शेर है शान |
जंगल कौ राजा रबै , राखत है पैचान ||
8.11.25- शनिवार प्रतियोगिता-241- मोंगे (चुपचाप)√
रावन मोंगे रवँ तकत गदा घली जब आन |
गटा फार हेरत रयौ , राम दूत हनुमान ||
मोंगे पैलाँ लंकनी , हँस कै दांत दिखात |
घली गदा हनुमान की , लगी तबइँ चिचयात ||
मोंगें नेता रै गये , सुन चुनाव परिणाम |
दस हजार से हार है , खर्च भयै सब दाम ||
बातै कत जब बउँ धना ,सहन न ऊकी हौत |
मोंगें बैठौ पौर में , डुकरा मन में रौत ||
मोंगें हौकें नइँ तकौ , जित हों खौटे काम |
चार जनन कै बीच में , नइँ हौने बदनाम ||
माटी खाकैं स्वाद लवँ , मोंगे हो गयँ श्याम |
जसुदा नें मौं खोल दवँ , दिखा परौ जगधाम ||
बुन्देली:- रंदूला- (सेनानायक, प्रमुख)
रंदूला नेता बनें , चौपट कर रयँ देश |
जगन-तगन से नोंच कैं , फैला रयँ विद्वेष ||
रंदूला गुंडा बनें , बिखरी आज समाज |
काम नसानें दिख रयै , लज्जित खुद है लाज ||
रंदूला बै हौत सइ , जिननों हो ईमान |
खातिर देश समाज की ,अरपन कर दे प्रान ||
रंदूला आजाद थे , भगत सिंह सरदार |
गोली खा फाँसी चढ़े , आजादी के द्वार ||
रंदूला थे फौज के , नेता बोस सुभाष |
सेना भी जयहिंद थी, करतइ रयी प्रकाश ||
रंदूला बे बन पात हैं , करबै की लौ ठान |
मिलत सफलता खूब है ,घटत कभउँ नइँ शान ||
15.11.25- शनिवार विषय रप्पू (धीरे -धीरे चलना
रप्पू -रप्पू हो चलत , धरैं पुटरिया मूड़ |
धना कात मौखों जुरे, तुम जैसे है डूड़ ||
रप्पू- रप्पू हौत जब , भइया कौनउँ काम |
कभउँ भिनक कैं रात हैं , कितउँ हौत शुभ शाम ||
रप्पू -रप्पू है चलत , नयी बहू जब गैल |
सास कात जल्दी करौ , देवँ बदन खौं ठैल ||
मरियल हौबे बैलबा , रप्पू -रप्पू जात |
अरइँ गुच्च तब सब उयै ,दौड़न खौं उकसात ||
रप्पू-रप्पू भी चलौ , कितउँ लगा लो दौड़ |
जाँ जैसौ मौका परै , बैसौ ले लौ मौड़ ||
सुभाष सिंघई
बुंदेली टिड़़कौ =बुरा लगना
टिड़कौ लग गवँ बात सुन , हेरौ गटा पसार |
जैसे कच्चौ लील जै , अबइँ लगा फटकार ||
टिड़कौ समदी ब्याह में , भइ इस्कूटर माँग |
सूटर लैकें आ गयै , बिटियाँ बारे टाँग ||
यैड़ा भैड़ा तिरपटा , तन में हौय विकार |
लूला कुबड़ा भी गिनौ , टिड़कौ मिलौ गवाँर ||
टिकड़ौ हौ गवँ आजकल , ज्यौ फूफा की जात |
उतनो भागत दूर है , ज्यौ-ज्यौं तेल लगात |
टिड़कौ बैला- सो बने , तान लैत है सींग |
झुट्टा जब बगरात है , चार जनन में डींग ||
टिड़कौ डुकरा हाथ से , मारे लयी गुटान |
डिबिया में चूना नईं , मचा रयो तूफान ||
टिड़कौ लग गँव सास खौं , मिलौ उरानो आन |
तोरी मौड़ी दैत नइँ , सई काम पै ध्यान ||
बुंदेली दुचरी = कुचली
दुचरी थुथरी लग रयी , काट गई है बर्र |
मौं पूरौ सूजौ धरौ , लगत भँजी है गुर्र ||
बउँ ने दुचरी सास है , मौं हौ गवँ अब बंद |
भूली है बउँ धन कथा , और भूल गइ छंद ||
दुचरी चटनी हौय जब , मिलै मसालो आन |
चीखत में नौनी लगत , कत हैं सब इंसान ||
थाने मे दुचरी बनी , रयै फटकिया बंद |
कान पकर पैले डड़ा , भूले सबरै दंद ||
दुचरी भइ इस्कूल में , रटै पहाड़े यैन |
फिर भी अटके बीच में , रोजाना भइ ठैन ||
सुभाष सिंघई
24.11.25-सोमवार बुंदेली गरय(भारी)
पाँव गरय बउँ धन भयै , घर में भरी हुलास |
पूजन गयँ कुल देवता , आ रइ घरै उजास ||
गरय धरै बोरा घरै , जीेंमें भरौ अनाज |
कौ आकै खिसकात है , की खौं दें आबाज ||
गरय बोल साधू कबै, झूठौं जौ संसार |
चौतरफा हैं मतलबी, कर लौ तनिक विचार ||
गरय बोल कड़बें लगै , लोग पचा नइँ पात |
जानत जा सब बात हैं , पर कौ यह अब कात ||
गरय बोल गम्भीर हौं , अच्छे हौबें ख्याल |
तब सुभाष सब ग्राह हौं , राखत नईं मलाल ||
29.11.25- शनिवार फरचट (स्फूर्ति)
लरका फरचट है लगत , सगया कै गय आज |
भेजे हम अब सुतकरा , शुभ विवाह के काज ||
फरचट हौवें काम जब , मन खुश हो जात |
बचतइ अपनौ है समय , और सफलता पात ||
दिल्ली बाले कर रयै , अब तो फरचट काम |
अब सरकारी योजना , दिखबें हमें तमाम ||
कैन- बेतबा लिंक को , फरचट हो रवँ काम |
तीन साल में जोड़ने , देने है अंजाम ||
जो नेता फरचट रयै , झटक लैत है वोट |
जनता भी दे आत हैं , नइँ देखत है खोट ||
बुआ आयँ जब ब्याय में , फरचट हौबे काम |
कत रत चिंता नइँ करौ , जुटे सुबह से शाम ||
1.12.25-सोमवार बुंदेली --गमी(मृत्यु शोक)
गमी खुशी संसार में , मानों हैं दिन रात |
एक आत मुठिया कसै ,एक पसारे जात ||
सबइ गमी में रौत है , रिश्ते सब बतलात |
जिंदा में नइँ चीनतइ , शकल देख भग जात ||
जौन घरै हौबे गमी , जुरकै सबरै आत |
कौनउँ मन से रौत है ,कौनउँ शकल बनात ||
आबौ जाबौ है लगौ , गमी खुशी भी हौत |
हँसकै खुशी मनात है , हौय गमी तब रौत ||
मन में पलतइ जब गमी , हौत हरी दुख दैत |
सब सुभाष जिंदा रयै ,चैन नईं पर लैत ||
6.12.25- शनिवार ओलम (वर्णमाला)
दद्दा गय इस्कूल में, कै कें आये बात |
अटकत ओलम में तनिक , पढ़बौ भी नइँ आत ||
ओलम में हम रट गये , ग सें गधा लो मान |
नइँ गणपति तब हम रटै , कैसे आता ज्ञान ||
पैलाँ कैं ओलम तकौ , गलत हतै उपमान |
भड़बूजा भड़या रटै , नईं रटै भगवान ||
ओलम में मछली हती, नईं हतौ माँ रूप |
चूहा चकिया चा चली , छोड़ चतुर्भुज धूप ||
संसकार की बगिया में , ओलम हुए सुधार |
गधा और चूहा हटै , हट गयँ कयी विकार ||
8.12.25-सोमवार बुंदेली--कगर(किनारा)
सबइ कगर पै हैं खड़े , म्यारी मूड़ा साद |
धक्का से बचबे दतै , नइँ हौं हम बरबाद ||
ईसुर कौ नौनों कगर , जानत हैं सब लोग |
पर कछु छरकत रात हैं , नईं मिलातइ योग ||
नदी तला देखौ कुँआ , इनके कगर महान |
लोगन खौं ठाड़ौ करें , देत उनै जलपान ||
बहती जाती नाव हैं , भटकत ई संसार |
राम नाम ही दे कगर , और लगाए पार ||
बुरय करम के है कगर , देत भौत नुकसान |
जिसमें कूँदत आदमी , व्यर्थ गमावत प्रान ||
13.12.25- शनिवार रमन्ना (गोचर,शिकारगाह)
हतै रमन्ना डाँग में , जितै चरत ते ढौर |
घास उगत ती खूब ही , और नचत ते मौर ||
सुनो रमन्ना वन हतै , लिखे मिलत अभिलेख |
पर लोगन ने जौत लयँ , रयँ हम अब देख ||
वनबिलाव छिकरा हिरन , हते रमन्ना शान |
और लड़इया खूब थे , घूमत ते हर थान ||
घने रमन्ना में रयै , सबइ तरा के जीव |
तब शिकार भी हौत ते , हमने सुनै अतीव ||
उजड़ रमन्ना अब गयै , चली गई है शान |
हरियाली गायब हुई , अब दिखतइ मैदान ||
जंगल पेड़ पहाड़ ते , नरवाँ झिरना ताल |
ढौर रमन्ना जात ते , हतै अभय हर हाल ||
15.12.25-सोमवार बुंदेली -रिरके (खिसके, रपटना)
रिरके- रिरके जो चलें , सब जानत जा बात |
भटकत उनके पाँव है , चलत गैल जो खात ||
मोहन रिरके हैं हराँ , गयँ राधा के पास |
बोले तुम क्यों अनमनी , काहे आज उदास ||
रिरके अजगर अब फिरत , नहीं तेज चल पात |
आबड़ में बिड़ जात जो , उयै लील के खात ||
हम-बे रिरके तब हुई , उनसे नौनी बात |
राने है अब प्रेम से , नइँ करने है घात ||
रिरके- रिरके है चलत ,अब पैसेंजर रेल |
जैसे धानी से कड़त, तिला नाज को तेल ||
विषय बकला
बकला रक्षक जानिए , फल हौवें या दार |
साजी रातइ चीज है , मितल हमें उपहार ||
टौ डारौ है चामरौ , बकला-सौ दवँ फौर |
बुलडोजर योगी पुलिस ,की खौं दैवें खौर ||
बकला फल को जब सड़े , बदबू भी तब देत |
फेंकत तब है बायरें, नईं हाथ में लेत ||
बकला फल में हौत हैं , भीतर गूदौ रात |
खातइ सबरै प्रेम से , मजा भौत है आत ||
5 जनवरी 25 , विषय बदान ( बांध )
ठाड़े यार बदान पै , कुहरा भारी आज |
को सपरत ई ठंड में , खड़े कुका रय खाज ||
है बदान भारी बड़ी , पानी भरो अथाह |
नहरें खूबइ बह रहीं , पकर खेत की राह ||
पानी रोको काज हित , बन रयँ आज बदान |
होय सिचाई खेत की , चाहत करे किसान ||
राजघाट की देख लइ , हमने बड़ी बदान |
पानी भौत समात है , सबरे कात किसान ||
गोरी कात बदान पै , हम तो ले रय धूप |
खड़े कुकर रयँ ठंड में , बिगड़े मोरो रूप ||
10.6.26- शनिवार बरबौ / बरबें (ईर्ष्या,जलन)
बरबें तन मन देख कै , दूजन कौ उत्थान |
ऐसे हौतइ कछु जनै , देत फिरत है प्रान |
अपनी से तुलना करत , देख पराई नार |
बरबें सुंदर जान कै , टपका दें कछु लार ||
बरबौ है की बात कौ , कौ की खौं समझात |
अपनी-अपनी सोच है , घूमें गदा हिरात ||
तीन मिले लरका उयै , नौ नाती है दूत |
फिर भी बरबें बैठ कै , देख दूसरन पूत ||
बरबें भावी देवर की ,व्याह लुगाई देख |
नौनें करतइ काम हैं , ऊकी बड्डी रेख ||
12- .1.26-सोमवार बुंदेली--बरसी(बार्षिक श्राद्ध)
दद्दा खौं रोटी दईं , बेई मठा में डार |
बरसी में मसकत लुचइँ , आकें रिश्तेदार ||
दद्दा की फोटू धरी , साफा मूँछें तान |
पूजा पंडित कर रयै, बैठा कैं जजमान ||
बरसी में अब बाइ की , याद करत है आन |
बउँ धन कत है रामधइ , सास हती भगवान ||
बरसी में पुरखा पुजैं ,सबरे मुड़ी झुकात |
चढ़त करइयाँ नाम की, हलुआ पूड़ी खात ||
मानो बरसी नेक है , पुरखा करतइ याद |
नइँ मानो तो कौन है , दैबें आशीर्वाद ||
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26.1.26-सोमवार बुंदेली -306-बेन(बहिन)
बेन जरुरी दीजिए , हे दाता भगवान |
मंगल होती गेह में , बनती हैं वरदान ||
लाती आपने भाग्य से , घर में भैया बेन |
कौ समझे ई बात खौ , ठाटी कै रयँ येन ||
दद्दा से कत बेन है , भइये उन्ना ल्याव |
मोरे पाछे लाइयो , पैला इयें सजाव ||
राखी भइया दूज पै , खुश रातइ है बेन |
घर भर कौ मंगल करत , हौन न दैतइ ठेन ||
बेन गेह की शान है , भइया है अरमान |
दोनों दद्दा बाइ के , कैलातइ संतान ||
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