https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें हिंदी छंद माला ,भाग 4

अनुक्रमण
93 - रासावलय छंद 
94 - महामंगलावती छंद
95. लीलाधिका छंद
96 कर्पूर छंद
97 बीथी छंद 
98- विभूति छंद
99 उज्ज्वल छंद 
100 महालक्ष्मी छंद
101 पाइता छंद 
102 ताटंक कुकुभ छंद में चंदेली बुंदेली इतिहास 
103 इंदिरा (, कनक मंजरी) छंद 
104 विजया( मनोरमा )छंद 
105 दीर्घ कंचन लेखा छंद
106 हेमंत छंद 
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93 रासावलय_छंद ( 21 मात्रिक ,  सममात्रिक चतुष्पदी छंद है )
#विधान- षटकल - चौकल , ‌ षटकल_ पंचकल. =(21 मात्रा)
पदांत पंचकल - रगण 212 या यगण- 122‌ (वाचिक कर सकते हैं )

#दोनों_षटकलों पर #यति_आभाष आवश्यक व विशेषता है, क्योंकि #षटकल इस छंद में #वलय  हैं , 
जो  #स्वतंत्र दिखने चाहिए  | 

जैसे -👇
करते यात्रा हैं     ❎  करते हैं यात्रा  ✅
लिखना सबको है ❎. लिखना है सबको ✅
 मेरा  जाना  रहे ❎.  जाना ही मम रहे ✅
 नहीं सोचते हैं ❎ नहीं सोच रखते ✅
शारद माता हैं  ❎ शारद हैं माता ✅
~~~~~
  कानन जाते रहे ❎ कानन में जा रहे ✅
अर्थात-#शब्द को तोड़कर वर्ण इधर उधर करके षटकलों का संज्ञान निषेध है 
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#रासावलय_छंद 
#विधान- षटकल - चौकल , ‌ षटकल_ पंचकल. =(21 मात्रा)
पदांत पंचकल - रगण 212 या यगण- 122‌ (वाचिक कर सकते हैं) 
(दोनों #षटकलों पर #यति_आभास आवश्यक )

संकेत हेतु  सिर्फ शारदे वंदना में षटकल आभाष‌ यति लगा रहा हूँ 

#शारदे_वंदना 
छंद    महल ,  शारद ,  अनुकम्पा ,  जानिए |
मातु   कृपा , करतीं  , सहज  आप , मानिए ||
अन्वेषण  ,  करते,   ग्रंथों   को  ,  खोजकर |
नए छंद ,   मिलते ,  लिखते   हैं ,  सोचकर ||

#गणपति_वंदना 
पधारिए   गणपति ,   स्वागत  है  तुम्हारा |
रिद्धि   सिद्धि   देवता , तुमको है पुकारा ||
लम्बोदर  पूष्णे  ,     बक्रतुंड    गजबदन |
एक दंत  देवा  ,    लम्बकर्ण    को  नमन ||

#राष्ट्र_वंदना 
सबसे   है   अच्छा  ,  हिन्दुस्ताँ   हमारा |
हम  इसके वासी ,  लेते   भी   सहारा ||
राष्टगान जन गण , ध्वज को दें आदरम् 
राष्ट्र  गीत    प्यारा ,   है   बंदे   मातरम् ||

मातृ   भूमि भारत , की    करते  वंदना |
नमन करें हर पल   ,  भावों  से अर्चना ||
रखते   हम   गौरव , आभूषण   धीरता |
दिखलाते सैनिक  , सीमा पर    वीरता ||

#छंद 
जहाँ   मिलें  ज्ञानी ,  उन्हें  मान दीजिए | 
विनय करें कर से  , और  ज्ञान लीजिए ||
यदि  विचार  सुंदर ,   अंतरमन   धारिए |
कुंठाएँ     अंदर ,  तब   विकार  मारिए ||

विनम्रता शुभ गुण,  मानव  का  सहारा |
सत्य शील  संयम , शुचिता का किनारा || 
साधु  संत  मिलते  , भला   करें  हमारा |
ज्ञान   दान   देकर , चमकाते    सितारा ||

सभ्य बोल अपने  , भरी‌ सभा बोलना |
लोग सुने  वादन , कंठ  पूर्ण  खोलना ||
वेद   ग्रंथ लाकर  ,  सदा   ज्ञान पाइए - 
सार मिला कितना , अपना मन तोलना |

हवा चली ठंडी ,   ताप   गया जानिए |
बोल कहे   मीठे ,   रार   हटी  मानिए ||
भ्रम भी सब छोड़ो, सत्य कथ्य बोलना |
मान  सभी   देंगे  , खार  नहीं  सोचना ||

अवसर शुभ आता ,  मिलती है बधाई ‌|
चूक  जहाँ    होती ,   आती  है  बुराई ||
लोग   सभी  चाहें , गीत    हों   सुरीले |
कर्म जहाँ  खोटे , लगते  फल  नशीले ||

सुभाष सिंघई 
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#रासावलय_छंद 
#विधान- षटकल - चौकल , ‌ षटकल_ पंचकल. =(21 मात्रा)
पदांत पंचकल - रगण 212 या यगण- 122‌ (वाचिक कर सकते हैं। 
(दोनों #षटकलो पर #यति_आभास आवश्यक )

#मुक्तक
लोगों  से  गाथा ,  बजरंगी    बोलते |
दहन  हुई  लंका , राज सभी खोलते |
राम नाम  लेकर  , कूदा  हर  गेह में -
जली  नहीं  मेरी , पूँछ   वहाँ  डोलते |

सत्यमेव जयते , नारा   है   हमारा |
विनम्रता संयम   रखते  हैं किनारा |
धैर्य सदा साधें , पर सतर्क भी रहें -
लगता है  भारत,चमकता सितारा |

नाच नहीं आता , आँगन को दोष क्यों |?
टेड़ा  यह  लगता , इतना भी रोष क्यों |
कोशिश से दूरी , रखते  जब आप   हैं - 
नाचें   जब  दूजे ,आता है जोश क्यों | ?

ऊँट   कहाँ   बैठे , कौन लोग जानते |
मन मर्जी करवट , उसकी ही  मानते |
इसी तरह मिलती , लोगों की आदतें -
शहद तजे मीठा ,   खाक रहें छानते |

राम लखन सीता ,   कानन   में  घूमते |
कंटक पथ के भी , पग आकर  चुमते ||
दुखी सभी   लगते , क्षमा दान  माँगते- 
चुभन दूर रखते   , चरणों   में   झूमते |

सुभाष सिंघई 
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#रासावलय_छंद 
#विधान- षटकल - चौकल , ‌ षटकल_ पंचकल. =(21 मात्रा)
पदांत पंचकल - रगण 212 या यगण- 122‌ (वाचिक कर सकते हैं। 
(दोनों #षटकलो पर #यति_आभास आवश्यक )

#गीतिका

दुनिया में  आकर  , कुछ करना चाहिए  |
करनी  से अच्छा  ,  कुछ भरना चाहिए |

पाली   है  आदत , मन का धन जानते , 
उनको भी  आगे ,   अब डरना चाहिए |

विपदाएँ  आतीं , मानव सिर  नाचती , 
कोशिश से पूरी  , तब  टलना चाहिए |

नियम नहीं कोई , शांत रहे  हम सदा , 
जो भी हों  कंटक , सब जलना चाहिए |

मतलब  जो साधें , दिखलाए  हेकड़ी , 
मिलकर ही उसको , तब दलना चाहिए |

यदि  गरीब सम्मुख , करता हो याचना , 
अन्न दान देकर , भय‌    हरना चाहिए | 

हो "सुभाष" सज्जन, मधुर वचन बोलता , 
उसे साथ  लेकर , तब    चलना  चाहिए |

सुभाष सिंघई 
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#रासावलय_छंद_गीत‌
#विधान- षटकल - चौकल , ‌ षटकल_ पंचकल. =(21 मात्रा)
पदांत पंचकल - रगण 212 या यगण- 122‌ (वाचिक कर सकते हैं। 
(दोनों #षटकलों पर #यति_आभास आवश्यक )

गीत पिता पर है , लिखता हूँ  भावना |
पिता बना रहना ,   होती   है साधना ||

फर्ज याद रहते , जिन्हें   रहे निभाता |
शीत ग्रीष्म वर्षा , खर्च सभी  चलाता ||
संतानों की  ही , चिंता   को  दिखाता |
निजी छोड़ चर्चा , उनकी ही   सुनाता |

स्वस्थ रहें   बच्चे , करता है कामना |
पिता बना रहना ,  होती  है साधना ||

चाह  रखे  पूरी , सबकी हो  भलाई |
निजी खर्च रोके , घर को दे  कमाई ||
सुता रहे सुत भी , पत्नी को सुनाए |
नहीं चाह मेरी ,   कोई  जो   बताए |

संकट से करता , चुपके से सामना |
पिता बना रहना , होती  है साधना ||

ताना दे पत्नी , हँसकर वह टालता  |
बेटों की चाहत , पूरी  वह   पालता |
कमीं नहीं होगी ,  पुरुषार्थ   करेगा |
भूख निजी छोड़े, सबकी वह भरेगा||

प्यार नहीं उसका , कोई अब मापना |
पिता बना रहना ,  होती   है साधना ||

सुभाष सिंघई 
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#शोधित 
विभोर जी पेज क्र ०.   214

#महामंगलावती_छंद 
( मदन विलासता ) प्राकृत भाषा का मात्रिक, (मापनी मुक्त) छंद है |
#विधान -पंचकल त्रिकल, पंचकल त्रिकल = 16 मात्रा 

कितनी सहजता है कि किसी भी प्रकार का पंचकल व किसी भी प्रकार का त्रिकल प्रयोग कर सकते हैं  , 
         किंतु 👇 
लेखन शब्द में यह न  कहें कि एक वर्ण आगे -पीछे का जोड़कर देख लीजिए कि  पंचकल- त्रिकल बन रहे हैं  यह कहना व ऐसा  सृजन गलत होगा | क्योंकि यति -पदांत पूरित जगण या चौकल निश्चित  बना रहा होगा  ,  जैसे - 

करना न काम , सुनता सुभाष ❎ 
फैला  जहान , भारी   उजास ❎ 
दिखे  अटकता , रहे  भटकता ❎
पैर   पटकता , और  बहकता ❎

ऊपर के दो पदों में यति और पदांत जगण बना रहे हैं व नीचे के पदो में यति और पदांत  दो - दो चौकल बन रहे है |
पटकता में नगण + ता है  ,और नगण का भार एक दो होता है , तब दो चौकल बन जाएंगे |

यह इस छंद में लेखन दुर्बलता होगी  , व ऐसे लेखन के लिए  , जिनमें यति -पदांत जगण/ चौकल है, उस छंद का  नाम अलग है, जो फिर कभी आयोजित करेंगे |
लेकिन इस महामंगलावती छंद में ऐसा सृजन ❎ वर्जित हैं |

#त्रिकल तीनों - नगण111  -गाल 21 -लगा 12  (  लय देगें )

#पंचकल 
 रगण -212  ||  तगण - 221.||  यगण - 122  प्रयोग कर सकते,
मेरा निजी मत -सृजन करते समय " रगण " अधिक सुविधा जनक लय देगा 
#स्पस्ट_शब्दों_में_पंचकल_त्रिकल_बनाएँ 
""लीजिए सदा "" या , ""सदा लीजिए "( यह दोनों सही है) ✅
"त्योहार सभी " या सभी त्योहार ( यह दोनों सही है ) ✅
लेकिन "यगण " में 
""हमारा यहाँ ""✅ सही है , किंतु "' यहाँ हमारा"" गलत है ❎
क्योंकि " यहाँ हमारा " में पंचकल , त्रिकल नहीं बन रहा है , दो चौकल बन रहे है‌ | जो गलत ❎ हैं 
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#माँ_शारदे_व_श्रीराम_वंदना 

शारदे नमन ,   आज मैं करूँ |
भावना शुद्ध ,   हृदय  में भरूँ ||
चरण में सदा ,   शीष मैं  धरूँ |
भक्ति आपकी ,प्राप्त कर तरूँ ||

राम की शरण , लीजिए सदा |
वंदना नमो ,     कीजिए सदा ||
हमारी विनय , राम   जी  सुने  |
मानकर दास  , मुझे अब चुने ||

#महामंगलावती_छंद
#विधान ~पंचकल त्रिकल, पंचकल त्रिकल = 16 मात्रा 

कीजिए आप  , हर्ष  से  मनन  |
छंद का सृजन , पूर्ण हो यतन ||
चाहते  सभी , यत्न  हो सफल |
सुनहरा आज, रहे कल सकल ||

जानता जगत  , वीर   हैं यहाँ |
भारती   पूत  , धीर  हैं   यहाँ ||
देश का  गान , बोलते    सदा |
प्रीति से  ज्ञान  ,खोलते  सदा ||

चल  रहे  लोग , जानते राह |
अंधता  रोग , करें सब दाह ||
सत्य की खोज,जो करें सदा |
पूर्णता बोध , वह   भरें सदा ||

आदमी यहाँ ,  खोजता   रहे |
कर्म का  उदय  , भोगता रहे ||
तृप्त हो    नहीं ,   रहे  नादान |
चाल में घुटन , कर उठे भान  ||

बोलिए  सत्य , संत सब कहें |
भाव से  वचन , बोलकर रहें ||
सत्य की जीत,   देखते  सभी |
आत्म का बोध , लेखते कभी ||

इस तरह का👇 लेखन भी सही है , क्योंकि उच्चारण में , विधान सही  है , लेकिन लेखन में  सतर्कता रखनी पडे़गी‌ |
   यदि सीधे तरीके से कहें तो, 
♥️ पाँचवीं छठी मात्रा संयुक्त नहीं होनी चाहिए ♥️

अभी जान लो , राम नाम को | ✅
जान अभी लो ,❎ ( क्योंकि दो चौकल बन रहे है ) पंचकल त्रिकल नहीं बन रहे हैं 
दर्श चाह से  ,   चलो धाम को ||
मिले जब हर्ष, , हाथ जोड़ लो |
पाप जब दिखे ,  राह मोड़ लो ||

सुभाष सिंघई 
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94 #महामंगलावती_छंद (#मुक्तक )
#विधान ~पंचकल त्रिकल, पंचकल त्रिकल = 16 मात्रा

राम जी कहें , प्रीति से सभी |
बात भी करें , नीति से सभी |
निष्कर्ष मिले , बात जो  करे - 
काम हों पूर्ण, कीर्ति  से सभी |

पाप का बाप , लोभ जानते |
छलें भी लोग , नहीं   मानते |
बोलता  ज्ञान , अनसुनी करें - 
स्वार्थ का कर्म , लोग ठानते |

गल्तियाँ जहाँ , लोग ढाँकते |
डींग तब वहाँ  सभी  हाँकते |
छिपाने लगें , झूठ का सिरा -
दोड़ते  फिरें , डगर  फाँदते |

हृदय में रखें  , सभी यह चाह |
दर्श से मिले ,  सदा  शुभ राह |
राम  को जपें , भक्त   दिन रात -
सहज हो प्राप्त , मोक्ष की थाह |

सामने  दिखे , है   यहाँ  झूठ |
खेत में खड़ा , लगे ज्यों  ठूठ |
सत्य तब कहो , लोग भी सुने - 
पूछना मित्र , क्यों रहा  रूठ |

सुभाष सिंघई 
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#महामंगलावती_छंद (#गीतिका  )
#विधान ~पंचकल त्रिकल, पंचकल त्रिकल = 16 मात्रा

राम को भजो , नाम सुख कार |
कराते     सदा , नाव  जग पार |

भटकते    रहे , सोच   में   सदा , 
चरण जो गहे ,   प्राप्त  हो प्यार |

समय से भजन , किया धर्म है , 
मिली  है   उसे , नेह  की  धार |

जाति भी नहीं , जानते   राम , 
जानिए   बेर  ,  बने   त्योहार |

केवटी   प्रेम , पा गया शिखर , 
राम पर चढ़ा ,गया वह  भार |

जानते सभी , गीध का त्याग , 
राम दे गए  ,   उसे जग तार |

भाष है मुझे , धर्म का मर्म , 
नम: कर रहा , राम दरबार |

सुभाष सिंघई
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#महामंगलावती_छंद (#गीत  )
#विधान ~पंचकल त्रिकल, पंचकल त्रिकल = 16 मात्रा

जानिए सभी , राम   नाम को |
धर्म के  सभी , आज काम को ||

त्याग दो कपट , बोल मधु बोल |
द्वार भी हृदय , सहज दो खोल ||
नेह   बरसात ,    बरसती    रहे |
आबाज मधुर ,  खनकती   रहे ||

जानिए आज ,  घनश्याम  को |
धर्म के  सभी , आज काम को ||

लोग भ्रम रखें , शूर  हम बली |
जानते  सभी , काम जो छली |
समय पर ढेर ,   सूरमा   दिखें  |
भागते फिरें , नहीं  कुछ लिखें ||

कष्ट  से  दूर ,  रखें   चाम को |
धर्म के  सभी , आज काम को ||

लोग जो वीर , खोलते   हाथ |
देखता जगत , गर्व का माथ ||
मानते    उसे , यही  दें साथ |
बोलते  उसे , आप  हैं  नाथ ||

जानता वीर , सुबह  शाम   को |
धर्म के  सभी , आज काम को ||

सुभाष सिंघई 
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मुक्तक 
चलेंगे   सभी  , करेंगे    नमन |
सुहाने भ्रात  ,   मिलेंगे लखन |
जहाँ सिय शील,शत्रुघन अनुज-
धैर्य के   भरत, राम के स्वजन |
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95 - #लीलाधिका_छंद (भागवत जाति ) 

13 मात्रा  - रगण- चौकल - चौकल.  ( वाचिक कर सकते हैं )

    #ध्यान रहे... रगण को भी तोड़ तो सकते हैं, किंतु रगण के अंदर यदि नगण का प्रयोग करना है , तब नगण (१११  २) का प्रयोग नहीं कर सकते। 2 + 111‌ ( नगण )का प्रयोग  कर सकते है  क्योंकि नगण का वाचिक भार  लघु - दीर्घ होता है  |
नमन कर × गलत होगा ( 122 ) बन रहा है
कर नमन √ सही होगा  212(रगण ) बन रहा है

शारदे माँ अब आकर |
शक्ति शुभ देना लाकर |
छंद  की  पढ़ता  गीता |
दास भी हो अब जीता ||

आइए  गणपति   देवा |
मैं करूँ अब प्रभु सेवा ||
आप  हैं  पूर्ण  सुहावन |
सिद्धि में शुभता पावन ||

राम   के   श्री  बजरंगी |
भक्त  के बनते   संगी ||
राम का  दर्शन   जाने |
राम प्रिय ही  पहचाने ||

जानिए  जग के दाता |
जोड़िए  उनसे नाता ||
दीन के प्रति पालक है |
राम  जी   उन्नायक है ||

आपने  जो  सोचा  है |
आ रहा क्यों लोचा है ||
यह रुकावट पहचानो |
दूर करना भी  ठानो  ||

बोलते हैं जब पत्थर |
कौन देता तब उत्तर ||
मंदिरों  में जो   जाते |
प्रश्न उत्तर सब पाते ||

आ रहे    हैं श्री   नेता |
देश के खास प्रणेता ||
जानिए उनका खाका |
डालते हैं जो  डाका  ||

बोल भी सुनिए हमारा |
जानता है  जग सारा  ||
कौन अब   कैसे  लूटे |
और कब  इनसे छूटे ||

सुभाष सिंघई
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#लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा  - रगण- चौकल - चौकल
#मुक्तक

बोलते बोल   सुहाना |
झूठ का रखें खजाना |
मित्र बनकर वह गाएँ -
हो अमर यह याराना |

छोड़कर फिर आ जाना |
बोलते      नेह   पुराना |
स्वार्थ की   करते  बातें -
है गजब अब भी गाना |

राम  को  भी जग जाने |
बात पर कुछ कब माने |
सोच  मानव चुप रहता -
खोजता  झूठ    बहाने |

श्याम से कहती  राधा |
है गई हट  सब  बाधा ||
आपकी   मैं    दीवानी -
भाव यह मन में साधा |

नाम   लेकर   मैं  बोला |
द्वार मन का अब खोला |
राम जब  आराध्य मिले -
भाव भी  तब ही तोला |

सुभाष सिंघई
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#लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा  - रगण- चौकल - चौकल
#गीतिका

जिंदगी  में कब  जाना |
राम को ही था   पाना ||

हाँसिए पर सब छोड़ा,
जीत था अपना गाना |

भूल पर थी कुछ भूलें ,
झूठ का था तब बाना |

रात जब आई काली
खोज करना है ठाना |

कौन यह जाने आगे ,
सामने   संकट नाना |

हार कर भी मत आओ,
खोज लेना कुछ दाना |

चल सुभाषा अब पथ पर ,
फल मिले  सौलह आना |

सुभाष सिंघई
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#लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा  - रगण- चौकल - चौकल
#गीत
लोभ को   सीधा  माना |
पाप  का   बाबा  जाना ||

लोभ के  सुनते  किस्से |
पाप ही  आता    हिस्से ||
लोभ भी कभी न  छोड़े |
लालसा के   रख घोड़े ||

ताप इनका  पहचाना |
पाप  का बाबा  जाना |

तोड़कर    रिश्ते रहता |
हाय भी हरदम कहता ||
झूठ से   द्रव्य कमाता |
कामना  छल से नाता ||

देखकर खूब ‌‌‌ ठिकाना |
पाप  का बाबा  जाना ||

लोभ की  देख सवारी |
जान  लेते   मक्कारी |
हानि  को सह लेते है |
दूसरो को कब देते है ||

सुना है सबका  गाना  |
पाप  का बाबा  जाना  ||

सुभाष सिंघई
एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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96#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपद 28 मात्राएँ - 15 ,  13
          #मापनी 4 4 4 3(गाल)  ,    6 4 3‌ ,(लगा या नगण )
(आल्ह छंद का द्वितीय (सम) चरण + दोहा छंद का  प्रथम ( विषम )चरण  उपरोक्त मापनी में आ जाता है | और इसे ही हम आयोजित कर रहे हैं |
मापनी में त्रिकल का रूप बदलकर अनेक तरह से लिखा जा सकता है ,‌जिसका आलेखन निकट भविष्य में करेंगे , किंतु सही लय ‌आल्ह (वीर ) छंद  का द्वितीय चरण +  दोहा का प्रथम  चरण से सुंदर गेयता आती है , जिसमें मापनी समाहित है।

यति के पहले 15 मात्रा का  शब्द संयोजन ( 4443 का इस तरह हो कि -तीन चौकल बने व त्रिकल में गाल हो ( वीर छंद के द्वितीय चरण जैसा ही बन जाएगा )

यति के बाद - 13 मात्राओं का शब्द संयोजन ( 643 का इस तरह कि षटकल चौकल व त्रिकल (" लगा " या नगण से पदांत हो) ,जो  दोहा के विषम चरण जैसा बन जाएगा   , उदाहरण  संरचना में देखें |

#शारदे_वंदना
माता शारद विनती आज , छंद महल आवाज हैं |
तेरे चरणों के सब दास , करते  तुझ  पर नाज हैं ||
प्राकृत भाषा का यह नूर  ,  छंद मिला  कर्पूर है |
पन्द्रा तेरह अनुसंधान , चार  पदों  का    नूर  है  ||

#गणपति_वंदना
गणपति देवा आओ आप , पूजा अब स्वीकारिए |
छंद महल में देने  छाप , शुभ चरणों को  डालिए ‌||
लेखन कवि का होवे नूर, आशाएँ‌‌    हम    पालते |
गणपति बप्पा आप महान , भार आप पर डालते ||

#छंद
देख रहे  दुनिया  की चाल,   बल ‌ खाती  उपहास है  |
रखती बिजली-सी रफ्तार , करती भी कुछ खास है ||
मानव भी चलता है तेज  , मन  में  पलते   ‌ओज से   |
बने कहानी तब कुछ खास, दुनिया में कुछ खोज से  |

जब तक चंदा सूरज गान , हम सबको ऐसा लगे |
ईश्वर रहता अपने  पास , भाव परम मन में जगे ||
जागी  किस्मत रखती शान , पूरे भी  अरमान से |
कर्म   हमारे   देते   साथ ,  सीखें    हिंदुस्तान ‌से ||

जाना  हमने  अपना   देश  , न्यारा  है भारत  वतन |
मिलकर देते हम सम्मान  , हिंद देश है ‌ शुभ गगन ||
गौरव पाते  वीर   शहीद ,  पूजे   वीर    जवान हम  |
देश सुरक्षा  पहले मान  ,‌  जाने    हिंदुस्तान ‌‌‌  ‌‌हम ||

करते हम सब  सुंदर काम ,  दोष नहीं हम डालते |
सहन न होते हैं   गद्दार ,  और  नहीं   हम  पालते ||
भारत माँ के  हम हैं वीर ,  धर्म   निभाना   जानते |
दुष्ट दलन का करते काम , उन्हें   मिटाना  ठानते ||

चिन्तित होकर बोले राम , आप  बली  हनुमान हैं |
सीता  मेरी मुझसे दूर  , जो मेरी  शुभ आन   हैं ||
व्याकुल हनुमत बोलें बोल , आप  हमारे  राम हैं |
सफल करेंगे सीता खोज , जाकर  लंका धाम हैं ||

सुभाष सिंघई

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#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपाद 28 मात्राएँ - 15 ,  13
          मापनी 4 4 4 3(गाल)  ,    6 4 3‌ ,(लगा या नगण )
(आल्हा छंद का द्वितीय (सम) चरण + दोहा छंद का  प्रथम ( विषम )चरण

#मुक्तक
पार लगाना  मेरी नाव , भक्त   सभी  उच्चारते |
जपते रहते हरदम  राम , आकर द्वार पुकारते |
दीनों के  हैं   दीनदयाल , पूरा  जग है जानता -
सुन लेते हैं दीन पुकार , आकर खूब   सँवारते |

कैसा कलयुग आया आज , लुट  जाती हैं नारियाँ |
रक्षक का अब भक्षक रूप, खूब चलाता  आरियाँ |
किस किसको हम बाँटे दोष, सदा यही हम सोचते -
जोकर जैसे  करते   ‌ स्वाँग  , देखी   जिम्मेदारियाँ |

तूफानों का सुनकर शोर, प्रथम भागती  बिल्लियाँ |
पत्थर से टकराकर खूब , मिटें बर्फ की सिल्लियाँ |
खालीपन हो जब भी पास , लड़  लेती  हैं जातियाँ -
करती भारी वह नुकसान , ज्यों खेतों में इल्लियाँ |

यारी में जो मिलते रोज , अपना  सुख-दुख बाँटते |
उनसे जलने  वाले लोग , श्वानों-सा   ही   काटते |
तिकड़मबाजी करते खूब , टुकड़ों में  हो मित्रता -
मंशा होती कभी न पूर्ण , तब खीझों  से  ‌डाँटते |

राम कहानी देखी एक , करती   हर  घर  वास  है |
षड्यंत्रों का बुनता जाल , चुगली जिसमें खास है |
पैदा घर में  होता  राम , हँसकर छल स्वीकारता-
टूट नहीं वह रखता चाह , सबको दे  उल्लास है |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~
#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपाद 28 मात्राएँ - 15 ,  13
          मापनी 4 4 4 3(गाल)  ,    6 4 3‌ ,(लगा या नगण )
(आल्हा छंद का द्वितीय चरण + दोहा छंद का  प्रथम ( विषम )चरण

#गीतिका 

जिसने देखा जग का रूप , अनुभव में वह खास हैं |
बाँटे  सबको  सच्चा ज्ञान ,   सभी  परीक्षा  पास  ‌हैं |

लोगों ने   धंधे  की ताल , जोड़ा   धन  भरपूर है ,
काम नहीं जब आती देह , होते  खूब  उदास हैं |

माना करुणा जिसके पास , सभी लोग सम्मान दें ,
निष्ठुर  पाता है  अपमान , और साथ  में त्रास हैं |

उपकारी हों जग के वीर , सभी लोग पहचानते ,
और विषेले   जाते   हार , पाते मन से ह्रास  हैं  |

आज "सुभाषा" बोले बोल , सब कहते अनमोल हैं ,
धर्म  दया का शुभ संज्ञान , रखते  पास  उजास हैं |

सुभाष सिंघई
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#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपाद 28 मात्राएँ - 15 ,  13
          मापनी 4 4 4 3(गाल)  ,    6 4 3‌ ,(लगा या नगण )
(आल्हा छंद का द्वितीय चरण + दोहा छंद का  प्रथम ( विषम )चरण

#गीत

भाव मिलन से उपजे प्रीत,‌  लग जाता दरबार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज उठती  झंकार है ||

सदा हृदय से होता गान,  होते   हर्ष   विभोर  हैं |
और निभाकर बोले बोल,जन मानस की ओर हैं ||
नहीं छुपाता  कोई राज , कह देते  सब ध्यान से |
और‌ सुहाने खिलते रंग , सबके सब कुछ ज्ञान से ||

सबके मन में रहता देश , अनुपम रहता प्यार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज उठती  झंकार है ||

देखे सबके अपने रंग ,   खिलते हैं  घर  बाग में |
नजरें सबकी सुंदर देख , आती सुर लय राग में ||
जोश हमारा  नजर  पसार , देता  तब  संदेश है |
सौम्य रखें हम तो व्यवहार, शुचिमय तब परिवेश है ||

प्रतिफल ईश्वर का यह दान , मिला सदा उपहार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज    उठती  झंकार है ||

लोग चलेंगे करते हर्ष , जब  पाते  शुभ ज्ञान हैं |
होता उनको सच्चा दर्श , करते    अनुसंधान हैं ||
आदर पाकर रखते सोच , यह दुनिया भी नूर है |
हालातों से लड़ती देख , कहें   समय भी शूर है ||

मृदु वाणी का देखा  खेल.   बुझ जाता    अंगार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज    उठती  झंकार है ||

सुभाष सिंघई

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97 ,-सममात्रिक चतुष्पदी छंद  19 मात्रिक
#बीथी_छंद ,  तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा‌
( रगण वाचिक कर सकते हैं , पदांत दीर्घ ही है)

#चौकल कलन संयोजना -
मातु शारदे आतीं  ❎ (इसमें प्रारंभ के दो चौकल नहीं बने )
माता शारद आतीं ✅ तीन चौकल है
नमन हमारा माता ✅ माता नमन हमारा ✅
यही भाव रहता है‌ ❎भाव यही रहता है ✅
किया घोष है सबने ❎ घोष किया है सबने

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#शारदे वंदना

करने  शारद   पूजन  भाव आया  |
चंदन, अक्षत, रोरी,  पुष्प   लाया ||
छंद  महल में  #बीथी  छंद गाते  |
मातु   कृपा से सब आनंद  पाते ||

गणपति वंदना

विनती गणपति सबकी मानते हैं  |
भक्त  सभी को अपना  ठानते हैं ||
त्रुटियाँ भी सबकी  पहचानते  हैं |
किसको क्या देना यह जानते  हैं ||

#छंद
छंद महल में  लिखने छंद आओ |
चाह समीक्षा सुंदर  भाव  लाओ ||
लेखन  सुंदर  होगा   राय  मानो |
संकेतों   को   सुंदर  वाह  जानो ||

दीन मिलेगा  तुमसे  भीख  मागे |
पैसा रुपया हित दिन रात जागे ||
दान यथोचित यदि दे काम उनको |
आ जाएगा  तब  आराम  उनको ||

नौ दिन चलकर ढ़ाई कोस आए |
क्या पाया है समझ न कोई पाए ||
ऐसी  करनी  जिनकी  देखते  हैं |
सनकी ही तब उसको  लेखते हैं ||

घास हरी जब गर्दभ  देखता है |
सावन भादों में वह  लेखता है ||
आज नहीं है हमने भोज पाया |
दिखता मुझको बाहर ढ़ेर साया ||

जिसकी लाठी   उसकी भैंस  होती |
अमुक कहावत मिलती बोझ ढ़ोती ||
ताकत   वालों ने   भी   मर्म जाना |
अनुपालन कर  आगे   दौर  ठाना  ||

दौड़ लगाता जीवन रेल जैसा |
हाल न पूछें  आगे खेल कैसा ||
आँधी पानी से  भी  जूझता  है |
नजर उठाता हलचल पूछता है ||

चलते जाते गिरते   उठ   रहे हैं |
पर कुछ घर के अंदर घुट रहे हैं ||
तोड़ी जिसने  सीमा श्राप पाया |
अपने अंदर  उसने पाप  लाया ||

जग में    कैसे-कैसे   रोग आए |
देखा    ऐसे   वैसे    लोग लाए ||
जब भी   जैसे  तैसे  हाल सुधरा |
थोक हुआ है फिर से माल खुदरा |
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#बीथी_छंद ,  तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा‌
( रगण वाचिक कर सकते हैं , पदांत यथावत  दीर्घ )
#मुक्तक

राई -राई    मानव   जोड़ता   है |
पैसा  पाकर रिश्ते     तोड़ता है |
लालच में आकर जब खार खाए -
दीवारों   सिर  अपना फोड़ता है |

भारत चमन सुहाना मानते हैं  |
पावन शिव गंगा को जानते हैं |
सीमा पर सैनिक सब देखते हैं-
मार गिराना  दुश्मन  ठानते  हैं |

नहीं अहिंसा कायर जानिए जी |
वीरों का  भूषण  है  मानिए जी |
प्रतिरोधी हिंसा यह मांँग करती -
करने  उसको सीधा ठानिए जी |

पाप नहीं  होता  है शस्त्र  लेना |
रक्षा  हित अपनाते भाव  देना |
दुश्मन सीमा पर जब  सामने हो -
निपटा  देती  सीधी  देश  सेना |

बाँस बरेली  उल्टे  लाद   लाएँ  |
उनको मूरख जग में लोग पाएँ |
साहू   साहूकारी   कर्म   जाने -
कोई सिखलाने क्यों  पास जाएँ |

सुभाष सिंघई
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#बीथी_छंद ,  तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा‌
( रगण वाचिक कर सकते हैं , यथावत पदांत दीर्घ )
#गीतिका

जो सीखे सिखलाना चाहिए जी |
गीत तराना   आना   चाहिए जी |

राहें   मंजिल  खोजें  एकता से ,
पथ पर चलते जाना चाहिए जी |

भजन न भूखा करता जानिएगा ,
पेट   जहाँ  है  खाना चाहिए जी |

हासिल जग में होता बात जानो ,
साहस रखकर पाना चाहिए जी |

सात सुरों का ज्ञानी चाहता है ,
हरदम‌ नूतन गाना चाहिए  जी |

सुभाष सिंघई
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बीथी_छंद ,  तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा‌
( रगण वाचिक कर सकते हैं , पदांत दीर्घ यथावत )

#गीत

सज्जन जब भी सबको राह मिलते |
अभिवादन  से  सुंदर  पुष्प खिलते ||

बात अनोखी जग यह जानता है |
प्राणी   नेह  नजर  पहचानता है |
अनुभव करता है सद्भावना का -
बात सरसता की वह  मानता है |

पुष्प कमल के मधुरम  दंड  हिलते |
अभिवादन से  सुंदर  पुष्प खिलते ||

वाणी  मानव की    है नीव   रखती |
स्वाद परम या कड़वा पान  चखती |
फल मिलता है   करनी का यहीं ही -
पीड़ा  भारी    या  आनंद   लखती |

मिलन  जहाँ हो देखी गाँठ‌ छिलते |
अभिवादन से  सुंदर  पुष्प खिलते ||

ईश्वर  आते  जो   भी   टेरते   हैं |
संत यहाँ  पर   माला  फेरते   हैं |
तपकर कुंदन   बनना   चाहते हैं -
तप के बल से  प्रभु  को घेरते हैं |

धर्म  सुई  से   अपने कर्म   सिलते |
अभिवादन से  सुंदर  पुष्प खिलते ||

सुभाष सिंघई एम‌. ए. हिंदी साहित्य ,
पूर्व भाषानुदेषक आई टी आई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र

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98- सममात्रिक चतुष्पदी  #विभूति_छंद 

#विधान- चौकल जगण, चौकल पंचकल =17 मात्रा ( पदांत दीर्घ) 

जगण 121 है , पंचकल में - रगण 212 या यगण 122 प्रयोग होगें।

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विशेष संकेत 

चौकल + जगण तो आराम से बन जाएगा , लेकिन त्रिकल से प्रारंभ कर  जगण यति बनाना है , तब सावधानी मार्ग निवेदित है 👇

गाल -दो लघु -गाल से =चौकल -जगण बन‌ जाएगा 

जैसे- गीत प्रतिमान , √ (एक चौकल एक जगण बन रहा है )

राष्ट्र ध्वज गान √   एक चौकल एक जगण बन रहा है )

इसी प्रकार 

दीर्घ या दो लघु - गाल - गाल √,

,जैसे - अब चाल बाज √, ( चौकल जगण बन रहे हैं। 

लेकिन 

लगा- दो लघु -गाल ×× 

जैसे - 

लगें जब  दाग ××  क्योंकि  दो जगण बन रहे हैं। 

कहें सब मित्र ××दो जगण बन रहे हैं , जबकि पहला चौकल चाहिए।

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सममात्रिक चतुष्पदी  #विभूति_छंद 

#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ

(जगण 121   , पंचकल में - रगण 212 या यगण 122 

शारदे वंदना 

आया  सुभाष , दर पर   शारदे |

चाहूँ   प्रकाश  , थोड़ा  सार दे ||

कर दो विकास  , विनती हमारी |

गाऊँ    सदैव  ,    गाथा तुम्हारी ||


जय‌ श्री  गणेश,  पूजा कीजिए |

मोदक प्रसाद , सुंदर   ‌लीजिए ||

पावन  विचार   , सुंदर   पाइए |

गणपति सदैव,   गाथा  गाइए  ||


लिखते विभूति , पावन छंद को |

रखते  विचार , पा  आनंद  को ||

होते   निहाल  ,  मिलते   सहारे |

लय यति विधान , के भी किनारे ||


गीत   प्रतिमान,      बंदे   सहारा |

और ध्वज गान , जनगण हमारा  ||

प्रखर अभिमान,  ध्वज है  तिरंगा |

सरिता   महान  ,  गंगा   अनंगा ||


रखिए विचार  ,  जो गतिमान हो |

विद्या   प्रदान , सँग अभियान हो |

नेह  तब दीप्त   ,जग  में  नूर  हो |

यश का सुहाग , शुभ  भरपूर  हो ||


लेना सलाह ,  ज्ञानी जब मिले |

करना विचार , मंथन तब खिले ||

मिलता    प्रमाण , पूरा  पिटारा |

साथ शुभ ज्ञान , होता   हमारा ||

सुभाष सिंघई 

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सममात्रिक चतुष्पदी  #विभूति_छंद   मुक्तक 

#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ

(जगण 121   , पंचकल रगण 212 या यगण 122 

देती    प्रकाश , गीता   हमारी |

पुस्तक महान , लगती सुखारी |

पढ़ते   विचार , जग में कर्म के - 

कृष्ण  उपदेश , लगें  उपकारी |


होता  सनेह ,  जिससे   हमारा |

देते     सदैव , उसको   सहारा |

मधुर तब बोल, मुख से निकलते -

सुखदा   विचार   पाते  किनारा |


राज यह नीति ,  गंदी  चाल है |

कटुता धकेल ,खुद की ढाल है |

आज कल बाप, को भी त्याग दे - 

अजब सब हाल, भी  बेहाल है |


सूरज   सदैव , उगता   लाल है |

ढले जब शाम , फिर से हाल है |

जीवन‌  प्रभार  , ऐसा  ही   ‌रहे - 

सुबह सँग शाम, समतल ताल है |


राह जब लोग ,  करते  खेल हैं |

मचाकर   शोर , करते   मेल हैं |

मेल  तब  फेल , ऐसा  जानिए -

सबको  खराब , ऐसा   तेल  है |

सुभाष सिंघई

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सममात्रिक चतुष्पदी  #विभूति_छंद  गीतिका 

#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ

(जगण 121   , पंचकल रगण 212 या यगण 122 

नैन  पट   खोल,  पढना  ‌सीख ले |

मन के    विकार , तजना ‌सीख ले  |


अब चाल   बाज , रखिए दूर   ही , 

उनका कचोट ,  करना   सीख ले‌ |


और  अनजान ,  मिलते लोग  हैं , 

राह    पर  मौन , रखना सीख ले |


अब जगत  मेल  , दिखता  श्राप है  

प्रकट अब राज ,  ढँकना ‌सीख  ले |


होते    विचार , ले   पहचान जो , 

तब हृदय धार  , गणना सीख ले |


प्रेम  अब खार , बनता  जा  रहा, 

ऐसा   लगाव ,   तजना सीख ले |


कहता "सुभाष" ,  जुड़ते योग हैं , 

अब  कर्म  श्रेष्ठ , अपना सीख ले |

सुभाष सिंघई

~~~~~~~~

सममात्रिक चतुष्पदी  #विभूति_छंद    गीत

#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ

(जगण 121   , पंचकल रगण 212 या यगण 122

#नवगीत_प्रारूप में 

 #नव_गीत प्रारुप में सृजन 


करते सुगान , अपना मान के |

चलते सदैव , ध्वज को तान के ||


है भी  तिरंग ,   झंडा   हमारा |

रख स्वाभिमान ,बनता सहारा ||

नमन कर गान , जनगण बोलते - 

आशय   सदैव इसका जान के - 

चलते   सदैव , ध्वज को  तान के ||


माने   महत्व,    जाने   वीरता |

सैनिक सलाम , की यह शौर्यता ||

देता   संकेत , साहस देश का - 

प्रखर शुभ सूर्य , चिह्न निशान के - 

चलते सदैव ,  ध्वज को  तान के ||


गति का  प्रतीक , अशोक चक्र है |

दुश्मन ‌   निगाह ,  को यह वक्र है |

रखते  प्रमाण ,    दुश्मन  तोड़ के - 

देंगे   सचोट‌   , मन में  ठान    के - 

चलते  सदैव , ध्वज को  तान के ||

सुभाष सिंघई

~~~~~~~~


99 उज्ज्वला छंद( सम मात्रिक , तैथिक जाति )

उज्ज्वला छंद विधान -  15 मात्रा,  प्रति चरण  

4 चरण  ,  दो दो या चारों चरण सम तुकांत 

मात्रा बाँट --

द्विकल + अठकल + 212  (रगण यथावत ) 

द्विकल में 2 या 11 रख सकते हैं 

तथा अठकल में 4 4 या 3 3 2 या 3  5  रख सकते ~~~~~~~~~~~~~हैं।

यथावत रगण तो 212 का होता ही है ,( रगण को तोड़ना निषेध )

हे माँ शारद  यह  अर्चना |

अब छंद महल में सर्जना ||

उज्ज्वला छंद शुचिता रहे |

शुभ लेखन में रुचिता रहे ||


हे  गणपति  बप्पा आइए |

अब मोदक भोग लगाइए ||

है  शुभाशीष की कामना |

स्वीकारो  वंदन  भावना ||


यह  दुनिया  का दस्तूर है |

बिन माँगे मिले  फितूर है ||

हम जिनको अपना मानते |

वे   नहीं हमें अब  जानते ||


जग में  कुछ अच्छे मित्र हैं |

शुभ जिनके दिखे चरित्र हैं ||

जब बनते अचछे  चित्र  हैं |

सच लगें    महकते  इत्र हैं ||


वह मिटते नहीं निशान हैं |

जो अपने   देते आन हैं ||

जब करते घातक वार हैं  |

तब लगतीं घातक धार हैं ||


जब कुछ अच्छा करना पड़े |

तब भरिए   साहस  के  घड़े ||

जो   नियम निभाते   हैं कड़े |

यश  द्वारे   हो   जाते  खड़े ||


निज की करना यदि वाचना |

कर ईश्वर  से   ही    याचना |

जब सफल   रहे  आराधना |

तब समझो  पूरी   साधना ||


मन कुटेव निज  सब दूर हों |

उर  में  करुणाँ  भरपूर  हों ||

प्रभु की  रहमत से शूर  हों |

बाधाएँ  सारी   चूर    हों ||


जो  लोग  मलाई  चाँटते |

वह नहीं किसी को बाँटत़े |

बस मतलब अपना जानते |

कुछ नहीं किसी की मानते ||


यह आया है अब शोध में |

जो  दौड़ लगाते क्रोध में ||

तब उनको लगती मोच है |

बन  जाती  गंदी  सोच है ||


सुभाष सिंघई 


~~~~~~~~~~~

मुक्तक 


जो लोग   कर्म से   दूर हैं |

वह कहते हम  मजबूर हैं  |

वह रखें हाथ पर हाथ ही - 

तब सोचें सदा फितूर हैं |


हैं   वीर     हमारे  देश  में  |

सैनिक साहस परिवेश में |

हैं मेहनत वीर  किसान भी -

जो सबके   बने   हृदेश हैं |


अब नहीं सर्प भी आ रहे |

तब सभी सपेरे   जा रहे |

अब विषधर नेता जी बने - 

वह बीन लिए खुद गा रहे |


हैं पंडा   जी जो   धर्म  के |

वह महारथी   हैं  कर्म के |

कह देते जो वह  सत्य है - |

तब  रोते    परदे शर्म के ||


जब चर्चा  करते  ज्ञान की |

तब यादें   ‌करें   सुजान की |

वह  काम याद कर भागते - 

सब  भूले कृपा  निधान की 


यदि गाँठ लगी  मजबूत है |

तब जानों यह शुभ दूत है |

जब दिखें गाँठ में गाँठ भी - 

तब मानों छल का भूत है |


जग में रहती पहचान  है |

जिसके दर पर ईमान है |

झुकते हैं आकर लोग भी-

कहते इस घर भगवान हैं |


जब हो जाते मतभेद हैं |

तब बढते  आगे खेद हैं | 

समझौता भी  होता नही -

सब व्यर्थ बहाते स्वेद हैं |


सब हरियाली  के  बोल हैं |

यह कथन बहुत अनमोल हैं |

पर जाते   हैं   तरु  काटने , 

वह गाल  बजाते   ढोल हैं |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~


गीतिका (अपदांत )


दशरथ   नंदन श्री राम हैं  |

खुद में शुभ पावन धाम हैं |


कुछ प्रभु की छाया लीजिए , 

यश में उनका   शुभ  नाम हैं |


हम  नाम   पुकारें  हर्ष से , 

जब करते  दुवा सलाम हैं |


आदर्श  हमेशा   पूजिए , 

यह भारत नूर ललाम हैं 


रवि -चंदा इनको  मानिए 

यह सुबह कहीं तो शाम हैं |


सब वेद ऋचाएं जानिए , 

यह सबमें मिलते आम हैं |


मत कीमत से भी तोलिए , 

यह खुद में ही खुद दाम है |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~~~~~


गीत 


ध्वज   रहे  तिरंगा शान है |

भारत का जनगण गान है ||


जय  भारत  माता बोलते |

हम ताकत को भी तोलते ||

सब  वचन  हमारे  हीर हैं |

जग में भी एक लकीर हैं ||


यह हम सबकी जग आन है |

भारत का  जनगण  गान है ||


जो टकराता वह चूर है |

जग जाने भारत नूर है ||

जो लक्ष्मण रेखा जानते |

वह झगड़ा कभी न ठानते ||


जग का यह अनुसंधान है |

भारत का जनगण गान है ||


आदर्शों में  रखते राम को |

प्रियता में राधा -श्याम को ||

है   मीरा - की भी साधना |

शुभ भक्ति काल आराधना ||


बजती  वंशी   शुभ तान है |

भारत का जनगण गान है ||

सुभाष सिंघई

~~~~~~~~~~

100 महालक्ष्मी छंद , वर्णिक छंद  , 9 वर्ण , मापनी युक्त ( चार पद )

 ( तीन रगण , 212×3 = 9 वर्ण , वाचिक करना निषेध है 

शारदे वंदना 


शारदे    दीजिए    दर्श को |

चाहता आपसे     हर्ष को ||

आपके  नेह  से    धन्य हों |

काज पूरे दिखें   अन्य हों ||

गणेश वंदना 

चाह है   दीन के काज हों |

देश  चाहे   सुखी राज हों | 

पुत्र  गौरी   सभी  जानते |

रूप  भी  मंगली  ‌‌मानते ||


लक्ष्मी वंदना 

विष्णु की अंगनी वाम है |

छंद भी  आपके नाम है ||

कीजिए धन्य भी दास को |

दीजिए नेह भी"भाष" को ||

`````````````````````

महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण 

छंद 

आइए  आप भी  मान से |

गाइए  गीत भी  शान से |

सत्यता साथ हो बोल में |

नेकता भार हो  तोल में |


सैनिकों  में   रहे   वीरता |

ज्ञानियों में  मिले   धीरता |

नारियाँ   भी रखें  शौर्यता |

पाक की   रोंदने   मूर्खता ||


खा रहे देश का अन्न हैं  |

छद्म है और  चौकन्न है ||

चाहते पाक की खैर हैं |

देश  से  ये रखें  बैर हैं ||


कामिनी बोलती प्यार है |

रागिनी गीत की  धार है ||

लोग भी जान शृंगार को |

चाहते हैं सदा  प्यार को ||

~~~~~~~~~~~~~~

महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण 

मुक्तक 

सत्य का  साथ ही लीजिए |

त्रुटियाँ   भी  सही कीजिए |

हर्ष भी  लोग दें   आपको - 

आप   सम्मान तो  दीजिए |


कौन क्या चाहता देश में |

बोलता  भी नहीं  शेष में |

काज भी रोष में तोड़ दे -

देखते  हैं  उसे क्लेश में |


है घना कोहरा  देख  लो |

पाप या पुण्य है लेख लो |

मानता कौन है आपकी - 

गाँठ  में घाव है  ‌रेख लो |


जो चले ज्ञान को बाँटने |

द्वेषता   दुश्मनी  पाटने |

मूर्खता सामने हो खड़ी - 

दौडती  है तभी   काटने |


चाहिए  शांति भी आज है |

बोल में  भी मिला  राज है |

कर्म को   देखते  हैं  सभी - 

ज्ञात होता   यही  बाज है |


~~~~~~~~~~

महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण 

गीतिका 

सोचता  हूँ जरा  आज में |

राम की नीति क्या राज में |


बोलते   राम को  मानते, 

देख लो आप आवाज में |


राम के नाम से जीत है , 

काज से दूर है  साज में |


घूमते शोर दें  राम का , 

बाँध  दें राम को ताज में |


हो चुनावी यहाँ साल भी , 

ले ध्वजा राम की काज में |

सुभाष सिंघई 

~~~~~~~

महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण 

गीत 

हर्ष का योग  भी पाइए |

गीत में    गेयता  लाइए ||


गीत में मीत- सा गान हो |

बोल में नेह   सम्मान हो |

हो लयों का नहीं भंज भी |

ताल से दूर हों   तंज भी ||


मस्त हो  आप भी गाइए |

गीत में    गेयता  लाइए ||


जोड़ से तोड़ से जो बने |

हैं मिले  कीच से वे सने ||

जो यहाँ कान को फोड़ते |

चाल को ताल को तोड़ते ||


छोड़  देना  नहीं   जाइए |

गीत में    गेयता  लाइए ||


छंद को   काटते  जोड़ते |

भाव का अर्थ जो  तोड़ते ||

छोड़ दो भी उन्हें  राह में |

दो कमी आप भी चाह में ||


  छंद   के  बंद्य   फैलाइए |                                                  गीत में    गेयता  लाइए ||

सुभाष सिंघई एम० ए० हिंदी साहित्य जतारा टीकमगढ़ म०प्र०~~~~~~~~~~~~~

~~~~~`

101 - पाइता छंद (वृहती जाति )

#सरल_विधान - #चार_दीर्घ , #चार_लघु_अंत_गा ( 9 वर्ण )

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

गण गणन- मगण भगण सगण = 9 वर्ण

                  222. 211. 112

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

#छंद‌

माता मेरा अब कहना |

तेरे    द्वारे  अब रहना |

भक्तों की भीड़ सहज है |

पाना चाहें   पद रज  है ||


हे माता शारद जय  हो |

विद्या वाणी सुरलय‌ हो ||

आशीषें  देकर जन  को |

स्वीकारो लेखक मन को ||


मेरे   देवा   गणपति  है |

देखे लम्बोदर  यति  है ||

हैं  दाता भी शुभ वर के |

सेवा कारी जग नर के ||


#मुक्तक 


माँ वीणा को  कर  रखतीं |

भक्तो  के  सम्मुख  रहतीं |

दे शब्दों   का शुभ वर भी -

आशीषें    पावन   भरतीं |


भोले बाबा  हम  भजते |

लीला न्यारी  शिव करते |

कैलासी हैं   हरिहर  जी -

पीड़ाएँ भी  झट   हरते |


बाधाओं को झटक चलो |

आगे का भी कटक दलो |

मौका आए जब  कर  में - 

हाथों से ही  पटक मलो  |


देखें आँखे  अचरज को  |

नेताओं की सजधज को | 

मक्कारी की गति रहती - 

खाते सीधा अब गज को |


काँटे   देखे  इस जग के  |

राहें    रोकें हर  मग  के  |

संसारी भी  हर   मन के |

मौका जानें हर  फन के ||


जाता हाथी कब मुड़ता |

तोड़ा रस्सा कब जुड़ता |

चालाकी की हरकत से- 

काला कागा खुद उड़ता |

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गीतिका 


मानों अच्छा बचपन है |

बाकी जानो हठपन है |


आना जाना सरल नहीं |

राहों में भी  धड़कन है |


देता धोखा जब  कपटी ,

होता  माथा  छनछन है | 


रोती बाजी जब पलटे, 

बोलें  आया भगवन है |


ऊँचे  टीले  जब  उड़ते , 

सोचों में भी कुड़पन है | 


सच्ची बोली जब सुनते , 

बोले  आई   तड़पन  है |


वारी   देखी खल जन की, 

रोते   देखी    लटकन  है |


सुभाष सिंघई 

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गीत 


कैसे  आ‌ता सुख  पल  है |

देखी  जाती    हलचल है |


लोगों का भी यह रुख है |

होता खट्टा  कुछ दुख  है |

पाई  जाती    दलदल है |

देखी  जाती   हलचल है ||


ताना जाता  सरकस‌ है |

बाँधा  जाता तरकस‌ है |

खेले  भू क्या समतल है |

देखी  जाती  हलचल है |


फूटे   लाते  बरतन  को  |

पाएँ  सीधे धड़कन  को ||

बोले   धीरे  अटकल है |

देखी  जाती   हलचल है |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र० 

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102 #चंदेली_बुंदेली_इतिहास

लावनी/ ताटंक छंद में -16 - 14 ( पदांत दो दीर्घ / तीन दीर्घ )


बुन्देली इतिहास पुराना , जिसको मन  से गाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


चंदेली  थी  राजाशाही ‌ ,   सदी   आठवीं ‌  से   जानो |

तेरह सौ सम्वत तक फैली  , तथ्य सही यह भी मानो ||

बुंदेली   यह  धरती  पहले  , जेजा    ही  कहलाई ‌थी |

राजपूत था वंश  सुनहरा , यश   गाथा   हरषाई ‌  थी ||


उनके निर्मित  तालाबों में , जल   धारा भी  पाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


तालाबों की  लम्बी  सूची  , निकले   अभिलेख  पुराने |

कुवाँ वाबड़ी अब भी दिखती ,दिखते हैं सभी‌ निशाने ||

हरित  धरा  भी चंदेलों  ने ,    पहले  यहाँ   सजाई  थी |

नहरें भी बनवाकर  सुंदर , पूरी   समझ   दिखाई   थी ||


हरी  भरी फसलों को मैं अब , पहले ही  लहराता ‌हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


कालिंजर का ‌किला पुराना ,   इतिहासों में   पाया है |

अब तक देखा खड़ा हुआ है , वैभव फिर से लाया है ||

लम्बी सूची मिली किलों की ,चंदेलों   का  साया   है |

जनहित और किसानों को भी , कैसे दीन्ही छाया है ||


कुछ जो किवदंती सुनते हैं , उनको चुनकर लाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


नगर जतारा किला पुराना ,जन श्रुति बीजक सुनते हैं |

ज्ञानी के सँग धन खोदा भी , अपने   ढ़ंग से  गुनते ‌हैं ||

सतमड़ियन के रखा छायरे , तला पार   की  बातें  हैं |

जो  बेटा   चंदेली आवे , धन    उखाड़   सौगातें    ‌हैं  ||


राज महोबा  किला सुहाना  , चंदेली   बतलाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


चंदेलों  के पहले राजा , शासक  गण प्रतिहारी ‌थे |

जो थी सामंतों की टोली ,  वीरा ही अधिकारी थे ||

बने बाद में शासक खुद ही, चंदेली   गौरव आया |

बनी योजना प्रथम सिंचाई , तालाबों को खुदवाया |


मैं चंदेली तालाबों को ,   जगह - जगह पर पाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


खजुराहो के   मंदिर देखो , यहाँ कला ‌है  सब न्यारी |

विश्व प्रसिद्ध धरोहर माने , जग के भी सब नर नारी ||

आल्हा    ऊदल   चंदेलों   के , सामंती   दरबारी   थे |

बड़े   लडै़या   महुँवा  वाले ,  मानें   पगड़ी  धारी   थे ||


कथा बहुत है पर मैं आगे , प्रमुख ‌रूप  ही लाता हूँ  |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


नुन्नुक योद्धा  चंदेली थे    , प्रतिहारी    सामंती   थे |

बने बाद में खुद ही शासक , ताकत में किवदंती थे ||

यशवर्मन विद्याधर ने भी , गजनी को ललकारा था |

रखी वीरता अपने अंदर , राजा रूप  निखारा था ||


चंदेली शासन की चर्चा , अभिलेखों   में  ‌पाता   हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


जया शक्ति की जेजा धरती , पहले यह कहलाई ‌है |

चंद्रवंश   चंदेली   राजा ,  यही  धरा  अपनाई  है ||

धंगदेव यशवर्धन जी ने  ,  खजुराहो   था  बनवाया  |

शिल्प कलाओं का मंदिर भी , तभी पत्थरों पर आया ||


कंदरिया जी महादेव  को , पहले शीष   झुकाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


चंदेली परमाल   हुए हैं  , अंतिम  शासक कहलाए |

आल्हा ऊदल जैसे योद्धा , हरदम   लड़ते ही पाए ||

पृथ्वी राजा दिल्ली वाले ,  चौहानी  कहलाते हैं |

चंदेलों से  लड़ते  रहते , खट्टा    मीठा   खाते    हैं ||


ऊदल मरते तब आल्हा का , तप करना बतलाता हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


सदी आठवीं से तेरह तक   , चंदेली   ध्वज ‌  छाया था |

शिल्प कला -रण कौशल-जनहित , चंदेलों ने लाया था ||

कुतुबुद्दीनी ऐबक  कारण ,   बिखरे   तब   चंदेली   थे | 

इसके  पहले   पृथीराज   से ,      टूटी    हुई  हवेली थे ||


जिए शान से जब तक थे , चंदेली   यश  गाता   हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||


इसके आगे  खेंगर आए , फिर   बुंदेले   छाए हैं |

गण कुंडारी राज हुआ है , और ओरछा पाए हैं ||

हिंदु राष्ट्र भी पहला घोषित, जेजा धरती कहलाई |

फिर बुंदेलों   से बुंदेली , आभा  मंडल  थी  आई ||


बुंदेलखंड  जाना जाता , मैं भी रखता नाता‌ हूँ |

वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||

सुभाष सिंघई ,जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

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इस छंद का प्रयोग  मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत काव्य  में है। 

103 #इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण

  #सुलभ_विधान 👇👇

( नगण  रगण.   रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति‌ दे सकते हैं,

111   212.     ‌‌‌212 ‌‌‌‌‌   1 2‌‌‌= 11‌ वर्ण 

#शारदे_वंदना 

नमन शारदे , मातु  को  करें |

जयति बोलते, शीष को धरें ||

सजल नैन   से , चाहते   रहें |

विनय‌ से सभी,भाव भी कहें ||

नमन को खड़ा , और दर्श को |

लगन भी खड़ी, देख  हर्ष को ||

महल छंद भी , आस है  लिए |

प्रबल भावना , खास से जिए   ||

#गणपति_वंदना 

शुभम्  मूर्ति है,  लोग  जानते |

प्रखर ज्ञान  के , बिम्ब  मानते ||

उदर आपका ,  रूप  है बड़ा |

भगत भाव से, दर्श को खड़ा ||


सतत चाह है, दीन काज हो |

सृजन देश में, सुखी राज हो |

प्रणव शीष में  , श्री गयंद  है |

सुयश मूर्ति से ,   देव  नंद है ||


#छंद

कथन सत्य हो , लोग मानते |

सरल भाव को , खूब जानते ||

चमन में हवा , साफ ही  बहे |

गगन में दिवा  , शीर्ष  ही रहे ||


चलन आज भी, झूठ‌ का रहे |

प्रलय सा दिखे,बाढ़- सा बहे ||

दमन भी करे , कष्ट   दे  कहे  |

अमन छोड़‌ दो , लोग हो ढहे |


खनन स्वर्ण का , खूब लाभ दे |

मनन में   सदा , ज्ञान आभ  दे ||

लगन   भी   रहे , सत्य‌ कर्म में |

मुदित  चाल भी , प्राप्त धर्म में ||


गलित मान हो , दर्प छोड़ दो |

दहन खोट  हो , राह मोड़  दो ||

कपट नर्क है , सत्य   मानिए |

गरल ‌सर्प  है , आप ‌जानिए ||


अदब जानिए ,  एक  नूर है |

सुयश भी  कहे , मान शूर है ||

शरद ताप-सा  ,पास सूर्य है |

वचन से कहे , शान तूर्य  है ||

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#इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण 

( नगण रगण रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति‌ दे सकते है

111   212 ‌‌‌212 ‌‌‌‌‌   1 2‌‌‌= 11‌ वर्ण 

#मुक्तक 

वचन  दीजिए ,  देश के लिए |

कथन कीजिए,  देश के लिए |

दमन ठानिए,  शत्रु का सदा - 

शपथ लीजिए, देश के लिए |


चमन है यहाँ ,  जानते  रहे |

वतन  भूमि है , मानते  रहे |

लगन भी सदा ,जागती‌‌ रही- 

मनन‌ से  कर्म , ठानते   रहे |


सहज कौन सा , प्रश्न आ गया |

कथन  बोलते , जश्न छा   गया |

चलन   आपके ,   देखता  रहा -

उधर   धुंध   भी , हुश्न पा ‌ गया |

~~~~~~`

#इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण 

( नगण रगण रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति‌ दे सकते है

111   212 ‌‌‌212 ‌‌‌‌‌   1 2‌‌‌= 11‌ वर्ण  #गीतिका 


प्रगति  भाष भी  , खूब आज हैं  |

चलित  फाइलें  , राज   काज  हैं |


मधुर ‌‌  बोलते , नाम  राम   ले , 

सुयश छाप  भी , और नाज है  |


नमन राम  से , आज‌  ‌जीत है , 

चलित यंत्र  है,  मस्त  साज है |


जगत‌   घूमते  , वेग चाल से  , 

कथन बोल में , शीष  ताज है |


गणन भी करें , पाँच‌ साल में , 

निलय खोजते   , वोट लाज है |


वचन झूठ भी , बोलते दिखें , 

दमन की रखें  , खूब गाज है |


अब "सुभाष" भी, देखभाल के, 

महल  छंद  के,  भी जहाज  हैं।


सुभाष सिंघई 

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#इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण 

( नगण रगण रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति‌ दे सकते है

111   212 ‌‌‌212 ‌‌‌‌‌   1 2‌‌‌= 11‌ वर्ण  #नव_गीत


मनन जो करे , भावना भरे |

वचन से  सधे , साधना करे ||


प्रगति भी दिखे , सत्य राह में |

मुदित हो सभी , नेक चाह  में |

अमन‌ को सदा, लोग‌‌   चाहते - 

प्रणत भाव से  , कामना करे |

वचन से  सधे , साधना करे ||


यतन  हर्ष से , योग खोजते |

सृजन गीत में , गान सोचते |

मुदित देह से , बोल भी सभी - 

सुपथ खोज की, चाहना धरे |

वचन से  सधे , साधना करे ||

 ‌

जगत में दिखे, जोड़ तोड़ है |

प्रलय शीत भी, धूप‌  मोड़‌‌ है |

गलित मान हो ,देखते सभी - 

उदय‌‌ भी कभी , याचना करे |

वचन से  सधे , साधना करे ||


सुभाष सिंघई  जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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104 -विजया ( मनोरमा ) छंद 18 मात्रा , सम चतुष्पदी छंद
तीन चौकल  👉444 + जगण + दीर्घ
( तीन चौकल का संयोजन रखे + जगण (121 )+ दीर्घ वर्ण।

चौकल कलन संयोजना -
मातु शारदे आतीं  ❎ (इसमें प्रारंभ के दो चौकल नहीं बने )
माता शारद आतीं ✅ तीन चौकल है
नमन हमारा माता ✅
यही भाव रहता है‌ ❎. भाव यही रहता है ✅
किया घोष है ❎.  घोष किया है ✅
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#शारदे_वंदना

शारद   वंदन  करता   #सुभाष है |
छंद महल को मिलता   प्रकाश है |
पूजन भी #कौशिक का निहाल है |
सृजन  सभी  का करता कमाल है ||

मोदक लाएँ   बप्पा   गणेश को |
शीष   झुकाएँ  गौरी-महेश  को ||
कलम उठाए  लेखन अशेष को |
भाव यही है  रहता  हृदेश   को ||

भारत   माँ   के  बेटे   महान हैं  |
सीमा पर  रहते   भी जवान हैं |
खेतों में भी दिखता किसान है |
बंदे   मातरम  यहाँ   सुगान है ||

दुश्मन भी ललकारें हुँकार से |
जाता  काँप हमारे  निहार से ||
घबरा जाता भारत  प्रहार से |
पीछे  हटता डर के बुखार से ||

राजाराम    दया   के   निधान  हैं |
करुँणा मन के खुद ही निशान हैं ||
सूरज   कुल के सुंदर  प्रतीक हैं |
दाता  जग के   प्रभुवर  नीक  हैं |

जिस मानव का रहता चरित्र है |
धरती का वह   हीरा  पवित्र है ||
दुनिया को लगता सरल मित्र है |
उड़ती खुश्बू‌ यह सुमन  इत्र है ||

कृष्ण कन्हैया ग्वाला सुजान  है |
राधा  के मन का भी  निधान है ||
मधु बजती है   बंशी  सुगान से  |
चलते स्वर भौहों के निशान  से  ||

सुभाष सिंघई
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#मुक्तक
अभिमानी का रहता विचार है |
मेरा ही अब ‌चलता   प्रहार  है |
लोगों  का वह जोड़े हुजूम भी -
भरता पल -भर में ही हुँकार है |

बीती  बातों का भी  हिसाब है |
ईश्वर के घर पर भी किताब है |
कर्म सभी ही रहते सचित्र हैं -
वह ही देता सबको खिताब है |

बाधाएँ भी  करती बखान हैं |
मानव के चरित्र ही निशान हैं |
होनी  अनहोनी   बेशुमार हैं -
कर्म तभी ही करता निदान है |

सुभाष सिंघई
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#गीतिका

विध्न निवारक देवा गणेश हैं |
माता   गौरी  बापू   महेश  हैं |

लम्बोदर गज मुख एक दंत हैं ,
पूजे जाते   हरदम  विशेष  हैं |

चढ़े प्रसादी मोदक सदैव ही ,
पूज्य प्रथम आभा में दिनेश हैं |

मूषक करें सवारी जहान में ,
मंगल मूरत बसते   हृदेश हैं |

नमन किया है जब भी सुभाष ने ,
बनकर आए गणपति कृपेश हैं  |

सुभाष सिंघई
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#गीत

कर्म   सदा  ही  रखते  निशान हैं |
करते रहते  फल  भी  प्रदान   हैं ||

करनी की भरनी खुद पुकारती |
क्या देना है सुख-दुख विचारती |
कर्म जहाँ शुभ मिलता प्रकाश है -
ग्रंथों  में   इसके  भी  बखान  हैं |
कर्म  सदा  ही रखते  निशान हैं ||

सोच  यहाँ पर  करती  प्रहार है |
ज्ञात करे वह क्या नव विचार है |
मानव भी घूमे  कुछ  तलाश में -
पाने खातिर क्या कुछ विधान है |
कर्म  सदा  ही  रखते  निशान हैं |

प्रकट करे  वह हसरत चरित्र से |
हरकत भी करता है  विचित्र  से |
देता  रहता  सबको  सुझाव भी -
खुद खोट न त्यागे जो निदान हैं |
कर्म  सदा  ही रखते  निशान हैं |

सुभाष सिंघई

105 #दीर्घ_कंचनलेखा_छंद‌

( प्राकृत भाषा का सम मात्रिक छंद )

मापनी :-- षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा 

चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत 

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 विशेष निवेदन -👏  बीस मात्रा के कई छंद हैं,  जिनमें आदि , यति और पदांत से , गणों के गठन से नाम बदल जाते हैं। 

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अत: निवेदन है कि सही विधान से छंद का अभ्यास /लेखन करें , मात्राएँ न गिनाएँ 👏या शब्दों को तोड़कर मात्राएँ इधर-उधर न करें |

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#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद‌

षटकल -👉 द्विकल चौकल , चौकल द्विकल , त्रिकल-त्रिकल  का 

चौकल- 👉 चारों तरह का ( पूरित जगण छोड़कर ) 


#कंचनलेखा छंद में 

षटकल + चौकल है , #स्पस्ट_षटकल व किसी भी तरह का #चौकल , इस छंद की विशेषता है ) पूरित जगण छोड़कर 


(स्पस्ट करने के लिए , तीन यतियाँ ( , ) व एक पदांत( | ) उदाहरण छंदों 👇 में लगा रहे हैं) वास्तव में एक मध्य यति एवं एक पदांत यति ही आवश्यक है।

#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद‌

#छंद 

मापनी-  षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा 

चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत 


छंद महल,  आना , हे शारद , माता |

विनती भी , करते , रखते हैं ,  नाता ||

ज्ञान सदा, देती , दया दृष्टि , रखकर |

कवि प्रसाद ,पाते, हर अक्षर, चखकर ||


लम्बोदर , गणपति , गणनायक , जग के |

रिद्धि-सिद्धि , दाता , दृष्टा हर  , मग के ||

पूजन है , तेरा ,       छंद महल , आओ | 

स्वागत सब, करते , कृपा साथ , लाओ ||


नहीं सुनें , गीता ,   जिनका   मन,  मैला |

जब विकार, दिखता , उनके उर‌ , फैला ||

मूरख   कब  , चेता ,   बोल  गए  ,  ज्ञानी |

क्षति  उल्टी ,  देता , करता  निज , हानी ||


दूर रहो ,  उनसे ,    जो खल हैं ,  नामी |

दिखे सभी , को भी , अंदर  से , कामी ||

छल जिनका, घातक, वार करें, हमको |

जिनके चुभ,  जाते , काँटे हम , सबको ||


खोजे जब , उपवन , नहीं कहीं ,मिलते |

पुष्प कमल, प्यारे , कीचड़ में ,खिलते ||

है   गरीब,  बस्ती , गुण  वाले , दिखते |

कभी ग्रंथ,  अच्छे , फुटपाथों,   बिकते ||


सोए कुछ , मानव ,   खाट   रखें ,  टूटी |

जागें  तब,  कहते,  किस्मत  है ,फूटी ||

कर्म  नहीं ,करते , भाग्य   श्रेष्ठ  , चाहें |

ज्ञान  धर्म , बातें   ,   दिखलाते , राहें ||


अच्छे हम,  ज्ञानी , बतलाते,   जग को |

कठिन राह ,चलते , भूले शुभ , मग को |

अजब यहाँ,  दुनिया ,सभी बने ,गुरुवर |

अंधों में , काणे ,   या   सूखे ,  तरुवर ||


राम चलें ,आगे ,   मध्य चलीं , सीता |

लखनलाल ,पीछे, लिए कर्म,   गीता ||

राहगीर ,बोले  , रवि शशि ध्रुव , तारा |

एक साथ ,करते, भू का जय ,कारा ||


व्याकुल  हैं, दशरथ , राम गमन, होता |

नर- नारी  , रोकें , सबका  मन ,रोता ||

कौशल्या ,हतप्रभ ,कहाँ   चली ,जाए |

पिता पुत्र ,हालत , किधर  पैर , धाए ||


हिंदु राज्य ,घोषित , पहला यह , जानो |

गढ़कुड़ार ,राजा ,   खेत  सिंह , मानो ||

वीर   रहा ,योद्धा , पकड़ शेर.  जबड़ा |

 खेंच  चीर , डाला , दाँव लगा,  तगड़ा ||

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#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद‌

मापनी-  षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा 

चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत 

#मुक्तक 

जब 'सुभाष',कहता, कान रखें ,  बुचके |

गुब्बारे   , फूले    , बन    जाते ,   तुचके |

अवगुण के , ग्राहक , लाखों की,  गिनती -

दुनिया का ,चक्कर , कई   मिले,  उचके |


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#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद‌

मापनी-  षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा 

चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत 

#गीत 


कौन यहाँ ,अपना , किसने है  ,जाना |

अपने दें ,घातें ,    सबने  यह  , माना ||


सुख में हैं, साथी , दुख में सब  , भागें |

संकट में ,छोड़े ,    घर जाकर , जागें ||

बनते हैं ,हितकर  ,जाल खूब ,  फेकें |

आग लगी ,देखे , रोटी  निज  , सेकें ||


 हैं  तेरे , हम  गाते    मधु   ,  गाना |

अपने दें,  घातें, सबने  यह ,  माना ||


वक्त कभी , होता , अपने सब,   होते |

मतलब भी, रखते , जगते भी , सोते |

स्वारथ जब , पूरा , बन जाते  , नूरी |

समय नहीं , मिलता , रख लेते , दूरी ||


कारण भी , वह  तब , बतलाते , नाना |

अपने दें , घातें ,    सबने  यह  , माना ||


चलती जब , गाड़ी , चढ़ जाते , अपने |

रुकने पर  , कहते , विखरे   हैं ,  सपने ||

अपना हित  ,पहले , लोग  यहाँ ,  देखें |

हित अनहित,  जाने , कर लेते  , लेखें ||


यह दुनिया , चकरी , सब हैं अब , साना |

अपने दें  ,घातें ,    सबने  यह ,  माना ||

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद‌

मापनी-  षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा 

चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत 

#गीतिका 


मतलब जब , सधता , गधा बने , बप्पा |

खुद अपने  ऊपर ,  छापें सब  ,ठप्पा ||


मायावी ,दुनिया , छल  का  है  ,गाना , 

सिक्के भी , खोटे , बन जाते, गप्पा  |( पाँसा)


ज्ञानी   भी  , बनते , बतलाते, अनुभव , 

कहते भी  ,हमने   , घूमा   हर , चप्पा |


नमक मिर्च ,लेकर , घावों  पर,   छिड़के , 

सबको भी ,  देते , बिन   माँगे , छप्पा |( छाप )


अब सुभाष ,कहता  , चुप रहना , सीखा , 

नहीं जगह , खाली , सभी जगह,  झप्पा | ( झपकी )


सुभाष सिंघई

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#शोधित 

हेमंत छंद 20 मात्रा 

 कोई भी वाचिक या यथावत  तीन पंचकल  + पदांत में  एक यथावत रगण 

#पंचकल के तीन गण होते हैं। 

#रगण- 212 ‌  ***     #यगण- 122‌‌   *** #तगण- 221‌

( कुछ छंदकार 15 मात्राएँ गण बंधन से मुक्त कर , पदांत मूलत: रगण से ही मानते हैं , पर देखा गया है, कि अपवाद छोड़कर लेखन में 15 मात्रा तक  सभी प्रकार के पंचकल थोड़ी सी सावधानी से  स्वत: आ ही जाते हैं, एवं अंत में रगण यथावत रखना होता है |


#हेमंत_छंद 

तीन पंचकल +यथावत  रगण 


दें  कृपा  छंद  को    संधान शारदे | 

आभाष सत्य का  विज्ञान  सार दे ||

हमारे भाव   को सदा  उत्थान दो  |

कलम से  सृजन में नवरंग गान दो  ||


दीवार   लाँघते  लंक हनुमान हैं |

राम के हैं दूत बली  बलवान  हैं ||

लंकनी बोलती कुछ आप मानिए  | 

लघु रूप जाइए दीर्घ मत ठानिए ||


मारकर लंकनी , गए    बजरंग  हैं |

मिल गई सिय मात भरते उमंग हैं ||

लंक जल खाक की दें खबर राम को |

बोलते  रहे  बस  राम के  नाम  को ||


विनय  भी  हमारी     सुनेंगे राम   जी |

चाह है मिले अब मोक्ष का  धाम जी ||

शरण    में   ‌रहूँगा  पालते    कामना |

भजन अब मैं करूँ भर रहा भावना ||


आचरण   राम  के , सृष्टि  में  धारिए |

कर्म भी श्याम  के  आज स्वीकारिए ||

युद्ध जब जरूरी धर्म  हित   कीजिए | 

अहिंसा भी कहे , चोट  अब  दीजिए ||

सुभाष सिंघई

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106 #हेमंत_छंद ( मुक्तक)

तीन पंचकल +यथावत  रगण 

 

देश की आन का   सम्मान  कीजिए |

कर्म  से  सभी का   उत्थान कीजिए |

भाव से   प्रेम से   दीन   को  दान दें - 

साथ प्रभु राम का, गुणगान कीजिए |


आभाष न सुभाष को मिला मानिए |

दुश्मनों के  गेह  भी यहाँ    जानिए |

तकरार   की   खार  से   दूर ही रहें - 

सदा हम खुश रहें सृजन को ठानिए |


आजकल देखते  भीड़  बीमार है |

सैकड़ों लोग हैं , एक न अनार है |

चाहते हैं सभी   हमें ही  प्राप्त हो - 

मिलेगा कहाँ जब नाव मझधार है |


युद्ध अब हो रहा , उपज अब भ्रांति है |

उठाने लाभ   को चल   रही   क्रांति है |

बँट रहा  विश्व अब दो भाग   हो   रहे - 

तमाशा  हो   रहा  कह  रहे   शांति  है |


ज्वाल जग जल रही सेंकते रोटियाँ |

एक    दूसरे  की   काटते   चोटियाँ |

हानि लाभ छोड़ा   चलाते   घात हैं - 

खेल के मैदान  जमी अब गोटियाँ |


शिव महा देव से   गंग है बोलती |

पाप के कर्म सब सृष्टि है घोलती |

मैं  बनूँ   पापनी  कौन   है  तारने - 

शिव कहे कुंभ में  मैं करूँ सोखती  |


सुभाष सिंघई

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#हेमंत_छंद ( गीतिका) 

तीन पंचकल +यथावत  रगण


दिख रहे आजकल कुछ भले देवता |

बन   विधाता  रहे अब  ढले देवता ||


आदमी बन रहा अब स्वयं  ईश है , 

रार की आग पर  हैं  जले देवता |


दूर कर काम को ढोल वस‌ पीटते , 

जानिए नाम को  हम फले ‌देवता |


स्वार्थ सब देखते मेल भी मानते , 

कर्म से दिख  रहे  वह गले देवता |


राज की नीति से फैली दुकान है , 

फूँक को मारकर  अब पले देवता |


तंत्र का मंत्र का कुछ नहीं ज्ञान है , 

बुदबुदा होंठ वस  है हले देवता |


चला जा सुभाषा तू भी दुकान में , 

मिलेंगे बहुत से  कुछ पले देवता |


सुभाष सिंघई

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#हेमंत_छंद ( गीत ) 

तीन पंचकल +यथावत  रगण


जीव   परमात्मा  का   अंश   जानिए |

झाँककर स्वयं  को आप  पहचानिए ||


अजब संसार में  दिख रहे  तमासे |

फूटते गली में    सभी के  बतासे ||

बच सका कौन है खोजना ठानिए |

झाँककर स्वयं  को आप पहचानिए ||


बिगड़ते  हाल है   लड़   पड़े  राह में |

जल उठे  बात सुन मतलबी डाह में ||

दूर हों  खल  जनों  से  बात  मानिए |

झाँककर स्वयं  को आप  पहचानिए ||


जगत में सभी के  मित्र भी देख लो |

कोन हैं  सहारे   बैठकर   लेख  लो |

नहीं तब उन्हीं ही प्रथम अब छानिए |

झाँककर स्वयं  को आप  पहचानिए ||


सुभाष सिंघई


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