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95 - #लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा - रगण- चौकल - चौकल. ( वाचिक कर सकते हैं )
#ध्यान रहे... रगण को भी तोड़ तो सकते हैं, किंतु रगण के अंदर यदि नगण का प्रयोग करना है , तब नगण (१११ २) का प्रयोग नहीं कर सकते। 2 + 111 ( नगण )का प्रयोग कर सकते है क्योंकि नगण का वाचिक भार लघु - दीर्घ होता है |
नमन कर × गलत होगा ( 122 ) बन रहा है
कर नमन √ सही होगा 212(रगण ) बन रहा है
शारदे माँ अब आकर |
शक्ति शुभ देना लाकर |
छंद की पढ़ता गीता |
दास भी हो अब जीता ||
आइए गणपति देवा |
मैं करूँ अब प्रभु सेवा ||
आप हैं पूर्ण सुहावन |
सिद्धि में शुभता पावन ||
राम के श्री बजरंगी |
भक्त के बनते संगी ||
राम का दर्शन जाने |
राम प्रिय ही पहचाने ||
जानिए जग के दाता |
जोड़िए उनसे नाता ||
दीन के प्रति पालक है |
राम जी उन्नायक है ||
आपने जो सोचा है |
आ रहा क्यों लोचा है ||
यह रुकावट पहचानो |
दूर करना भी ठानो ||
बोलते हैं जब पत्थर |
कौन देता तब उत्तर ||
मंदिरों में जो जाते |
प्रश्न उत्तर सब पाते ||
आ रहे हैं श्री नेता |
देश के खास प्रणेता ||
जानिए उनका खाका |
डालते हैं जो डाका ||
बोल भी सुनिए हमारा |
जानता है जग सारा ||
कौन अब कैसे लूटे |
और कब इनसे छूटे ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~
#लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा - रगण- चौकल - चौकल
#मुक्तक
बोलते बोल सुहाना |
झूठ का रखें खजाना |
मित्र बनकर वह गाएँ -
हो अमर यह याराना |
छोड़कर फिर आ जाना |
बोलते नेह पुराना |
स्वार्थ की करते बातें -
है गजब अब भी गाना |
राम को भी जग जाने |
बात पर कुछ कब माने |
सोच मानव चुप रहता -
खोजता झूठ बहाने |
श्याम से कहती राधा |
है गई हट सब बाधा ||
आपकी मैं दीवानी -
भाव यह मन में साधा |
नाम लेकर मैं बोला |
द्वार मन का अब खोला |
राम जब आराध्य मिले -
भाव भी तब ही तोला |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~
#लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा - रगण- चौकल - चौकल
#गीतिका
जिंदगी में कब जाना |
राम को ही था पाना ||
हाँसिए पर सब छोड़ा,
जीत था अपना गाना |
भूल पर थी कुछ भूलें ,
झूठ का था तब बाना |
रात जब आई काली
खोज करना है ठाना |
कौन यह जाने आगे ,
सामने संकट नाना |
हार कर भी मत आओ,
खोज लेना कुछ दाना |
चल सुभाषा अब पथ पर ,
फल मिले सौलह आना |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~
#लीलाधिका_छंद (भागवत जाति )
13 मात्रा - रगण- चौकल - चौकल
#गीत
लोभ को सीधा माना |
पाप का बाबा जाना ||
लोभ के सुनते किस्से |
पाप ही आता हिस्से ||
लोभ भी कभी न छोड़े |
लालसा के रख घोड़े ||
ताप इनका पहचाना |
पाप का बाबा जाना |
तोड़कर रिश्ते रहता |
हाय भी हरदम कहता ||
झूठ से द्रव्य कमाता |
कामना छल से नाता ||
देखकर खूब ठिकाना |
पाप का बाबा जाना ||
लोभ की देख सवारी |
जान लेते मक्कारी |
हानि को सह लेते है |
दूसरो को कब देते है ||
सुना है सबका गाना |
पाप का बाबा जाना ||
सुभाष सिंघई
एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
~~~~~~
96#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपद 28 मात्राएँ - 15 , 13
#मापनी 4 4 4 3(गाल) , 6 4 3 ,(लगा या नगण )
(आल्ह छंद का द्वितीय (सम) चरण + दोहा छंद का प्रथम ( विषम )चरण उपरोक्त मापनी में आ जाता है | और इसे ही हम आयोजित कर रहे हैं |
मापनी में त्रिकल का रूप बदलकर अनेक तरह से लिखा जा सकता है ,जिसका आलेखन निकट भविष्य में करेंगे , किंतु सही लय आल्ह (वीर ) छंद का द्वितीय चरण + दोहा का प्रथम चरण से सुंदर गेयता आती है , जिसमें मापनी समाहित है।
यति के पहले 15 मात्रा का शब्द संयोजन ( 4443 का इस तरह हो कि -तीन चौकल बने व त्रिकल में गाल हो ( वीर छंद के द्वितीय चरण जैसा ही बन जाएगा )
यति के बाद - 13 मात्राओं का शब्द संयोजन ( 643 का इस तरह कि षटकल चौकल व त्रिकल (" लगा " या नगण से पदांत हो) ,जो दोहा के विषम चरण जैसा बन जाएगा , उदाहरण संरचना में देखें |
#शारदे_वंदना
माता शारद विनती आज , छंद महल आवाज हैं |
तेरे चरणों के सब दास , करते तुझ पर नाज हैं ||
प्राकृत भाषा का यह नूर , छंद मिला कर्पूर है |
पन्द्रा तेरह अनुसंधान , चार पदों का नूर है ||
#गणपति_वंदना
गणपति देवा आओ आप , पूजा अब स्वीकारिए |
छंद महल में देने छाप , शुभ चरणों को डालिए ||
लेखन कवि का होवे नूर, आशाएँ हम पालते |
गणपति बप्पा आप महान , भार आप पर डालते ||
#छंद
देख रहे दुनिया की चाल, बल खाती उपहास है |
रखती बिजली-सी रफ्तार , करती भी कुछ खास है ||
मानव भी चलता है तेज , मन में पलते ओज से |
बने कहानी तब कुछ खास, दुनिया में कुछ खोज से |
जब तक चंदा सूरज गान , हम सबको ऐसा लगे |
ईश्वर रहता अपने पास , भाव परम मन में जगे ||
जागी किस्मत रखती शान , पूरे भी अरमान से |
कर्म हमारे देते साथ , सीखें हिंदुस्तान से ||
जाना हमने अपना देश , न्यारा है भारत वतन |
मिलकर देते हम सम्मान , हिंद देश है शुभ गगन ||
गौरव पाते वीर शहीद , पूजे वीर जवान हम |
देश सुरक्षा पहले मान , जाने हिंदुस्तान हम ||
करते हम सब सुंदर काम , दोष नहीं हम डालते |
सहन न होते हैं गद्दार , और नहीं हम पालते ||
भारत माँ के हम हैं वीर , धर्म निभाना जानते |
दुष्ट दलन का करते काम , उन्हें मिटाना ठानते ||
चिन्तित होकर बोले राम , आप बली हनुमान हैं |
सीता मेरी मुझसे दूर , जो मेरी शुभ आन हैं ||
व्याकुल हनुमत बोलें बोल , आप हमारे राम हैं |
सफल करेंगे सीता खोज , जाकर लंका धाम हैं ||
सुभाष सिंघई
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#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपाद 28 मात्राएँ - 15 , 13
मापनी 4 4 4 3(गाल) , 6 4 3 ,(लगा या नगण )
(आल्हा छंद का द्वितीय (सम) चरण + दोहा छंद का प्रथम ( विषम )चरण
#मुक्तक
पार लगाना मेरी नाव , भक्त सभी उच्चारते |
जपते रहते हरदम राम , आकर द्वार पुकारते |
दीनों के हैं दीनदयाल , पूरा जग है जानता -
सुन लेते हैं दीन पुकार , आकर खूब सँवारते |
कैसा कलयुग आया आज , लुट जाती हैं नारियाँ |
रक्षक का अब भक्षक रूप, खूब चलाता आरियाँ |
किस किसको हम बाँटे दोष, सदा यही हम सोचते -
जोकर जैसे करते स्वाँग , देखी जिम्मेदारियाँ |
तूफानों का सुनकर शोर, प्रथम भागती बिल्लियाँ |
पत्थर से टकराकर खूब , मिटें बर्फ की सिल्लियाँ |
खालीपन हो जब भी पास , लड़ लेती हैं जातियाँ -
करती भारी वह नुकसान , ज्यों खेतों में इल्लियाँ |
यारी में जो मिलते रोज , अपना सुख-दुख बाँटते |
उनसे जलने वाले लोग , श्वानों-सा ही काटते |
तिकड़मबाजी करते खूब , टुकड़ों में हो मित्रता -
मंशा होती कभी न पूर्ण , तब खीझों से डाँटते |
राम कहानी देखी एक , करती हर घर वास है |
षड्यंत्रों का बुनता जाल , चुगली जिसमें खास है |
पैदा घर में होता राम , हँसकर छल स्वीकारता-
टूट नहीं वह रखता चाह , सबको दे उल्लास है |
सुभाष सिंघई
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#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपाद 28 मात्राएँ - 15 , 13
मापनी 4 4 4 3(गाल) , 6 4 3 ,(लगा या नगण )
(आल्हा छंद का द्वितीय चरण + दोहा छंद का प्रथम ( विषम )चरण
#गीतिका
जिसने देखा जग का रूप , अनुभव में वह खास हैं |
बाँटे सबको सच्चा ज्ञान , सभी परीक्षा पास हैं |
लोगों ने धंधे की ताल , जोड़ा धन भरपूर है ,
काम नहीं जब आती देह , होते खूब उदास हैं |
माना करुणा जिसके पास , सभी लोग सम्मान दें ,
निष्ठुर पाता है अपमान , और साथ में त्रास हैं |
उपकारी हों जग के वीर , सभी लोग पहचानते ,
और विषेले जाते हार , पाते मन से ह्रास हैं |
आज "सुभाषा" बोले बोल , सब कहते अनमोल हैं ,
धर्म दया का शुभ संज्ञान , रखते पास उजास हैं |
सुभाष सिंघई
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#कर्पूर_छंद ,(प्राकृत भाषा का चतुष्पदी मात्रिक छंद )
प्रतिपाद 28 मात्राएँ - 15 , 13
मापनी 4 4 4 3(गाल) , 6 4 3 ,(लगा या नगण )
(आल्हा छंद का द्वितीय चरण + दोहा छंद का प्रथम ( विषम )चरण
#गीत
भाव मिलन से उपजे प्रीत, लग जाता दरबार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज उठती झंकार है ||
सदा हृदय से होता गान, होते हर्ष विभोर हैं |
और निभाकर बोले बोल,जन मानस की ओर हैं ||
नहीं छुपाता कोई राज , कह देते सब ध्यान से |
और सुहाने खिलते रंग , सबके सब कुछ ज्ञान से ||
सबके मन में रहता देश , अनुपम रहता प्यार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज उठती झंकार है ||
देखे सबके अपने रंग , खिलते हैं घर बाग में |
नजरें सबकी सुंदर देख , आती सुर लय राग में ||
जोश हमारा नजर पसार , देता तब संदेश है |
सौम्य रखें हम तो व्यवहार, शुचिमय तब परिवेश है ||
प्रतिफल ईश्वर का यह दान , मिला सदा उपहार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज उठती झंकार है ||
लोग चलेंगे करते हर्ष , जब पाते शुभ ज्ञान हैं |
होता उनको सच्चा दर्श , करते अनुसंधान हैं ||
आदर पाकर रखते सोच , यह दुनिया भी नूर है |
हालातों से लड़ती देख , कहें समय भी शूर है ||
मृदु वाणी का देखा खेल. बुझ जाता अंगार है |
गाया जाता जब भी गीत, बज उठती झंकार है ||
सुभाष सिंघई
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97 ,-सममात्रिक चतुष्पदी छंद 19 मात्रिक
#बीथी_छंद , तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा
( रगण वाचिक कर सकते हैं , पदांत दीर्घ ही है)
#चौकल कलन संयोजना -
मातु शारदे आतीं ❎ (इसमें प्रारंभ के दो चौकल नहीं बने )
माता शारद आतीं ✅ तीन चौकल है
नमन हमारा माता ✅ माता नमन हमारा ✅
यही भाव रहता है ❎भाव यही रहता है ✅
किया घोष है सबने ❎ घोष किया है सबने
✅
~~~~~~~~~~
#शारदे वंदना
करने शारद पूजन भाव आया |
चंदन, अक्षत, रोरी, पुष्प लाया ||
छंद महल में #बीथी छंद गाते |
मातु कृपा से सब आनंद पाते ||
गणपति वंदना
विनती गणपति सबकी मानते हैं |
भक्त सभी को अपना ठानते हैं ||
त्रुटियाँ भी सबकी पहचानते हैं |
किसको क्या देना यह जानते हैं ||
#छंद
छंद महल में लिखने छंद आओ |
चाह समीक्षा सुंदर भाव लाओ ||
लेखन सुंदर होगा राय मानो |
संकेतों को सुंदर वाह जानो ||
दीन मिलेगा तुमसे भीख मागे |
पैसा रुपया हित दिन रात जागे ||
दान यथोचित यदि दे काम उनको |
आ जाएगा तब आराम उनको ||
नौ दिन चलकर ढ़ाई कोस आए |
क्या पाया है समझ न कोई पाए ||
ऐसी करनी जिनकी देखते हैं |
सनकी ही तब उसको लेखते हैं ||
घास हरी जब गर्दभ देखता है |
सावन भादों में वह लेखता है ||
आज नहीं है हमने भोज पाया |
दिखता मुझको बाहर ढ़ेर साया ||
जिसकी लाठी उसकी भैंस होती |
अमुक कहावत मिलती बोझ ढ़ोती ||
ताकत वालों ने भी मर्म जाना |
अनुपालन कर आगे दौर ठाना ||
दौड़ लगाता जीवन रेल जैसा |
हाल न पूछें आगे खेल कैसा ||
आँधी पानी से भी जूझता है |
नजर उठाता हलचल पूछता है ||
चलते जाते गिरते उठ रहे हैं |
पर कुछ घर के अंदर घुट रहे हैं ||
तोड़ी जिसने सीमा श्राप पाया |
अपने अंदर उसने पाप लाया ||
जग में कैसे-कैसे रोग आए |
देखा ऐसे वैसे लोग लाए ||
जब भी जैसे तैसे हाल सुधरा |
थोक हुआ है फिर से माल खुदरा |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#बीथी_छंद , तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा
( रगण वाचिक कर सकते हैं , पदांत यथावत दीर्घ )
#मुक्तक
राई -राई मानव जोड़ता है |
पैसा पाकर रिश्ते तोड़ता है |
लालच में आकर जब खार खाए -
दीवारों सिर अपना फोड़ता है |
भारत चमन सुहाना मानते हैं |
पावन शिव गंगा को जानते हैं |
सीमा पर सैनिक सब देखते हैं-
मार गिराना दुश्मन ठानते हैं |
नहीं अहिंसा कायर जानिए जी |
वीरों का भूषण है मानिए जी |
प्रतिरोधी हिंसा यह मांँग करती -
करने उसको सीधा ठानिए जी |
पाप नहीं होता है शस्त्र लेना |
रक्षा हित अपनाते भाव देना |
दुश्मन सीमा पर जब सामने हो -
निपटा देती सीधी देश सेना |
बाँस बरेली उल्टे लाद लाएँ |
उनको मूरख जग में लोग पाएँ |
साहू साहूकारी कर्म जाने -
कोई सिखलाने क्यों पास जाएँ |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~
#बीथी_छंद , तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा
( रगण वाचिक कर सकते हैं , यथावत पदांत दीर्घ )
#गीतिका
जो सीखे सिखलाना चाहिए जी |
गीत तराना आना चाहिए जी |
राहें मंजिल खोजें एकता से ,
पथ पर चलते जाना चाहिए जी |
भजन न भूखा करता जानिएगा ,
पेट जहाँ है खाना चाहिए जी |
हासिल जग में होता बात जानो ,
साहस रखकर पाना चाहिए जी |
सात सुरों का ज्ञानी चाहता है ,
हरदम नूतन गाना चाहिए जी |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~
बीथी_छंद , तीन चौकल + रगण + दीर्घ = 19 मात्रा
( रगण वाचिक कर सकते हैं , पदांत दीर्घ यथावत )
#गीत
सज्जन जब भी सबको राह मिलते |
अभिवादन से सुंदर पुष्प खिलते ||
बात अनोखी जग यह जानता है |
प्राणी नेह नजर पहचानता है |
अनुभव करता है सद्भावना का -
बात सरसता की वह मानता है |
पुष्प कमल के मधुरम दंड हिलते |
अभिवादन से सुंदर पुष्प खिलते ||
वाणी मानव की है नीव रखती |
स्वाद परम या कड़वा पान चखती |
फल मिलता है करनी का यहीं ही -
पीड़ा भारी या आनंद लखती |
मिलन जहाँ हो देखी गाँठ छिलते |
अभिवादन से सुंदर पुष्प खिलते ||
ईश्वर आते जो भी टेरते हैं |
संत यहाँ पर माला फेरते हैं |
तपकर कुंदन बनना चाहते हैं -
तप के बल से प्रभु को घेरते हैं |
धर्म सुई से अपने कर्म सिलते |
अभिवादन से सुंदर पुष्प खिलते ||
सुभाष सिंघई एम. ए. हिंदी साहित्य ,
पूर्व भाषानुदेषक आई टी आई
जतारा टीकमगढ़ म०प्र
~~~~~~~~~~~~
98- सममात्रिक चतुष्पदी #विभूति_छंद
#विधान- चौकल जगण, चौकल पंचकल =17 मात्रा ( पदांत दीर्घ)
जगण 121 है , पंचकल में - रगण 212 या यगण 122 प्रयोग होगें।
~~~~~~~~~~~~
विशेष संकेत
चौकल + जगण तो आराम से बन जाएगा , लेकिन त्रिकल से प्रारंभ कर जगण यति बनाना है , तब सावधानी मार्ग निवेदित है 👇
गाल -दो लघु -गाल से =चौकल -जगण बन जाएगा
जैसे- गीत प्रतिमान , √ (एक चौकल एक जगण बन रहा है )
राष्ट्र ध्वज गान √ एक चौकल एक जगण बन रहा है )
इसी प्रकार
दीर्घ या दो लघु - गाल - गाल √,
,जैसे - अब चाल बाज √, ( चौकल जगण बन रहे हैं।
लेकिन
लगा- दो लघु -गाल ××
जैसे -
लगें जब दाग ×× क्योंकि दो जगण बन रहे हैं।
कहें सब मित्र ××दो जगण बन रहे हैं , जबकि पहला चौकल चाहिए।
~~~~~~~~~~~~~~~
सममात्रिक चतुष्पदी #विभूति_छंद
#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ
(जगण 121 , पंचकल में - रगण 212 या यगण 122
शारदे वंदना
आया सुभाष , दर पर शारदे |
चाहूँ प्रकाश , थोड़ा सार दे ||
कर दो विकास , विनती हमारी |
गाऊँ सदैव , गाथा तुम्हारी ||
जय श्री गणेश, पूजा कीजिए |
मोदक प्रसाद , सुंदर लीजिए ||
पावन विचार , सुंदर पाइए |
गणपति सदैव, गाथा गाइए ||
लिखते विभूति , पावन छंद को |
रखते विचार , पा आनंद को ||
होते निहाल , मिलते सहारे |
लय यति विधान , के भी किनारे ||
गीत प्रतिमान, बंदे सहारा |
और ध्वज गान , जनगण हमारा ||
प्रखर अभिमान, ध्वज है तिरंगा |
सरिता महान , गंगा अनंगा ||
रखिए विचार , जो गतिमान हो |
विद्या प्रदान , सँग अभियान हो |
नेह तब दीप्त ,जग में नूर हो |
यश का सुहाग , शुभ भरपूर हो ||
लेना सलाह , ज्ञानी जब मिले |
करना विचार , मंथन तब खिले ||
मिलता प्रमाण , पूरा पिटारा |
साथ शुभ ज्ञान , होता हमारा ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~
सममात्रिक चतुष्पदी #विभूति_छंद मुक्तक
#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ
(जगण 121 , पंचकल रगण 212 या यगण 122
देती प्रकाश , गीता हमारी |
पुस्तक महान , लगती सुखारी |
पढ़ते विचार , जग में कर्म के -
कृष्ण उपदेश , लगें उपकारी |
होता सनेह , जिससे हमारा |
देते सदैव , उसको सहारा |
मधुर तब बोल, मुख से निकलते -
सुखदा विचार पाते किनारा |
राज यह नीति , गंदी चाल है |
कटुता धकेल ,खुद की ढाल है |
आज कल बाप, को भी त्याग दे -
अजब सब हाल, भी बेहाल है |
सूरज सदैव , उगता लाल है |
ढले जब शाम , फिर से हाल है |
जीवन प्रभार , ऐसा ही रहे -
सुबह सँग शाम, समतल ताल है |
राह जब लोग , करते खेल हैं |
मचाकर शोर , करते मेल हैं |
मेल तब फेल , ऐसा जानिए -
सबको खराब , ऐसा तेल है |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~
सममात्रिक चतुष्पदी #विभूति_छंद गीतिका
#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ
(जगण 121 , पंचकल रगण 212 या यगण 122
नैन पट खोल, पढना सीख ले |
मन के विकार , तजना सीख ले |
अब चाल बाज , रखिए दूर ही ,
उनका कचोट , करना सीख ले |
और अनजान , मिलते लोग हैं ,
राह पर मौन , रखना सीख ले |
अब जगत मेल , दिखता श्राप है
प्रकट अब राज , ढँकना सीख ले |
होते विचार , ले पहचान जो ,
तब हृदय धार , गणना सीख ले |
प्रेम अब खार , बनता जा रहा,
ऐसा लगाव , तजना सीख ले |
कहता "सुभाष" , जुड़ते योग हैं ,
अब कर्म श्रेष्ठ , अपना सीख ले |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~
सममात्रिक चतुष्पदी #विभूति_छंद गीत
#विधान- चौकल जगण , चौकल पंचकल = 17 मात्राएँ , पदांत दीर्घ
(जगण 121 , पंचकल रगण 212 या यगण 122
#नवगीत_प्रारूप में
#नव_गीत प्रारुप में सृजन
करते सुगान , अपना मान के |
चलते सदैव , ध्वज को तान के ||
है भी तिरंग , झंडा हमारा |
रख स्वाभिमान ,बनता सहारा ||
नमन कर गान , जनगण बोलते -
आशय सदैव इसका जान के -
चलते सदैव , ध्वज को तान के ||
माने महत्व, जाने वीरता |
सैनिक सलाम , की यह शौर्यता ||
देता संकेत , साहस देश का -
प्रखर शुभ सूर्य , चिह्न निशान के -
चलते सदैव , ध्वज को तान के ||
गति का प्रतीक , अशोक चक्र है |
दुश्मन निगाह , को यह वक्र है |
रखते प्रमाण , दुश्मन तोड़ के -
देंगे सचोट , मन में ठान के -
चलते सदैव , ध्वज को तान के ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~
99 उज्ज्वला छंद( सम मात्रिक , तैथिक जाति )
उज्ज्वला छंद विधान - 15 मात्रा, प्रति चरण
4 चरण , दो दो या चारों चरण सम तुकांत
मात्रा बाँट --
द्विकल + अठकल + 212 (रगण यथावत )
द्विकल में 2 या 11 रख सकते हैं
तथा अठकल में 4 4 या 3 3 2 या 3 5 रख सकते ~~~~~~~~~~~~~हैं।
यथावत रगण तो 212 का होता ही है ,( रगण को तोड़ना निषेध )
हे माँ शारद यह अर्चना |
अब छंद महल में सर्जना ||
उज्ज्वला छंद शुचिता रहे |
शुभ लेखन में रुचिता रहे ||
हे गणपति बप्पा आइए |
अब मोदक भोग लगाइए ||
है शुभाशीष की कामना |
स्वीकारो वंदन भावना ||
यह दुनिया का दस्तूर है |
बिन माँगे मिले फितूर है ||
हम जिनको अपना मानते |
वे नहीं हमें अब जानते ||
जग में कुछ अच्छे मित्र हैं |
शुभ जिनके दिखे चरित्र हैं ||
जब बनते अचछे चित्र हैं |
सच लगें महकते इत्र हैं ||
वह मिटते नहीं निशान हैं |
जो अपने देते आन हैं ||
जब करते घातक वार हैं |
तब लगतीं घातक धार हैं ||
जब कुछ अच्छा करना पड़े |
तब भरिए साहस के घड़े ||
जो नियम निभाते हैं कड़े |
यश द्वारे हो जाते खड़े ||
निज की करना यदि वाचना |
कर ईश्वर से ही याचना |
जब सफल रहे आराधना |
तब समझो पूरी साधना ||
मन कुटेव निज सब दूर हों |
उर में करुणाँ भरपूर हों ||
प्रभु की रहमत से शूर हों |
बाधाएँ सारी चूर हों ||
जो लोग मलाई चाँटते |
वह नहीं किसी को बाँटत़े |
बस मतलब अपना जानते |
कुछ नहीं किसी की मानते ||
यह आया है अब शोध में |
जो दौड़ लगाते क्रोध में ||
तब उनको लगती मोच है |
बन जाती गंदी सोच है ||
सुभाष सिंघई
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मुक्तक
जो लोग कर्म से दूर हैं |
वह कहते हम मजबूर हैं |
वह रखें हाथ पर हाथ ही -
तब सोचें सदा फितूर हैं |
हैं वीर हमारे देश में |
सैनिक साहस परिवेश में |
हैं मेहनत वीर किसान भी -
जो सबके बने हृदेश हैं |
अब नहीं सर्प भी आ रहे |
तब सभी सपेरे जा रहे |
अब विषधर नेता जी बने -
वह बीन लिए खुद गा रहे |
हैं पंडा जी जो धर्म के |
वह महारथी हैं कर्म के |
कह देते जो वह सत्य है - |
तब रोते परदे शर्म के ||
जब चर्चा करते ज्ञान की |
तब यादें करें सुजान की |
वह काम याद कर भागते -
सब भूले कृपा निधान की
यदि गाँठ लगी मजबूत है |
तब जानों यह शुभ दूत है |
जब दिखें गाँठ में गाँठ भी -
तब मानों छल का भूत है |
जग में रहती पहचान है |
जिसके दर पर ईमान है |
झुकते हैं आकर लोग भी-
कहते इस घर भगवान हैं |
जब हो जाते मतभेद हैं |
तब बढते आगे खेद हैं |
समझौता भी होता नही -
सब व्यर्थ बहाते स्वेद हैं |
सब हरियाली के बोल हैं |
यह कथन बहुत अनमोल हैं |
पर जाते हैं तरु काटने ,
वह गाल बजाते ढोल हैं |
सुभाष सिंघई
~~~~~~
गीतिका (अपदांत )
दशरथ नंदन श्री राम हैं |
खुद में शुभ पावन धाम हैं |
कुछ प्रभु की छाया लीजिए ,
यश में उनका शुभ नाम हैं |
हम नाम पुकारें हर्ष से ,
जब करते दुवा सलाम हैं |
आदर्श हमेशा पूजिए ,
यह भारत नूर ललाम हैं
रवि -चंदा इनको मानिए
यह सुबह कहीं तो शाम हैं |
सब वेद ऋचाएं जानिए ,
यह सबमें मिलते आम हैं |
मत कीमत से भी तोलिए ,
यह खुद में ही खुद दाम है |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~
गीत
ध्वज रहे तिरंगा शान है |
भारत का जनगण गान है ||
जय भारत माता बोलते |
हम ताकत को भी तोलते ||
सब वचन हमारे हीर हैं |
जग में भी एक लकीर हैं ||
यह हम सबकी जग आन है |
भारत का जनगण गान है ||
जो टकराता वह चूर है |
जग जाने भारत नूर है ||
जो लक्ष्मण रेखा जानते |
वह झगड़ा कभी न ठानते ||
जग का यह अनुसंधान है |
भारत का जनगण गान है ||
आदर्शों में रखते राम को |
प्रियता में राधा -श्याम को ||
है मीरा - की भी साधना |
शुभ भक्ति काल आराधना ||
बजती वंशी शुभ तान है |
भारत का जनगण गान है ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~
100 महालक्ष्मी छंद , वर्णिक छंद , 9 वर्ण , मापनी युक्त ( चार पद )
( तीन रगण , 212×3 = 9 वर्ण , वाचिक करना निषेध है
शारदे वंदना
शारदे दीजिए दर्श को |
चाहता आपसे हर्ष को ||
आपके नेह से धन्य हों |
काज पूरे दिखें अन्य हों ||
गणेश वंदना
चाह है दीन के काज हों |
देश चाहे सुखी राज हों |
पुत्र गौरी सभी जानते |
रूप भी मंगली मानते ||
लक्ष्मी वंदना
विष्णु की अंगनी वाम है |
छंद भी आपके नाम है ||
कीजिए धन्य भी दास को |
दीजिए नेह भी"भाष" को ||
`````````````````````
महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण
छंद
आइए आप भी मान से |
गाइए गीत भी शान से |
सत्यता साथ हो बोल में |
नेकता भार हो तोल में |
सैनिकों में रहे वीरता |
ज्ञानियों में मिले धीरता |
नारियाँ भी रखें शौर्यता |
पाक की रोंदने मूर्खता ||
खा रहे देश का अन्न हैं |
छद्म है और चौकन्न है ||
चाहते पाक की खैर हैं |
देश से ये रखें बैर हैं ||
कामिनी बोलती प्यार है |
रागिनी गीत की धार है ||
लोग भी जान शृंगार को |
चाहते हैं सदा प्यार को ||
~~~~~~~~~~~~~~
महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण
मुक्तक
सत्य का साथ ही लीजिए |
त्रुटियाँ भी सही कीजिए |
हर्ष भी लोग दें आपको -
आप सम्मान तो दीजिए |
कौन क्या चाहता देश में |
बोलता भी नहीं शेष में |
काज भी रोष में तोड़ दे -
देखते हैं उसे क्लेश में |
है घना कोहरा देख लो |
पाप या पुण्य है लेख लो |
मानता कौन है आपकी -
गाँठ में घाव है रेख लो |
जो चले ज्ञान को बाँटने |
द्वेषता दुश्मनी पाटने |
मूर्खता सामने हो खड़ी -
दौडती है तभी काटने |
चाहिए शांति भी आज है |
बोल में भी मिला राज है |
कर्म को देखते हैं सभी -
ज्ञात होता यही बाज है |
~~~~~~~~~~
महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण
गीतिका
सोचता हूँ जरा आज में |
राम की नीति क्या राज में |
बोलते राम को मानते,
देख लो आप आवाज में |
राम के नाम से जीत है ,
काज से दूर है साज में |
घूमते शोर दें राम का ,
बाँध दें राम को ताज में |
हो चुनावी यहाँ साल भी ,
ले ध्वजा राम की काज में |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~
महालक्ष्मी छंद , रगण 212×3 = 9 वर्ण
गीत
हर्ष का योग भी पाइए |
गीत में गेयता लाइए ||
गीत में मीत- सा गान हो |
बोल में नेह सम्मान हो |
हो लयों का नहीं भंज भी |
ताल से दूर हों तंज भी ||
मस्त हो आप भी गाइए |
गीत में गेयता लाइए ||
जोड़ से तोड़ से जो बने |
हैं मिले कीच से वे सने ||
जो यहाँ कान को फोड़ते |
चाल को ताल को तोड़ते ||
छोड़ देना नहीं जाइए |
गीत में गेयता लाइए ||
छंद को काटते जोड़ते |
भाव का अर्थ जो तोड़ते ||
छोड़ दो भी उन्हें राह में |
दो कमी आप भी चाह में ||
छंद के बंद्य फैलाइए | गीत में गेयता लाइए ||
सुभाष सिंघई एम० ए० हिंदी साहित्य जतारा टीकमगढ़ म०प्र०~~~~~~~~~~~~~
~~~~~`
101 - पाइता छंद (वृहती जाति )
#सरल_विधान - #चार_दीर्घ , #चार_लघु_अंत_गा ( 9 वर्ण )
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गण गणन- मगण भगण सगण = 9 वर्ण
222. 211. 112
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#छंद
माता मेरा अब कहना |
तेरे द्वारे अब रहना |
भक्तों की भीड़ सहज है |
पाना चाहें पद रज है ||
हे माता शारद जय हो |
विद्या वाणी सुरलय हो ||
आशीषें देकर जन को |
स्वीकारो लेखक मन को ||
मेरे देवा गणपति है |
देखे लम्बोदर यति है ||
हैं दाता भी शुभ वर के |
सेवा कारी जग नर के ||
#मुक्तक
माँ वीणा को कर रखतीं |
भक्तो के सम्मुख रहतीं |
दे शब्दों का शुभ वर भी -
आशीषें पावन भरतीं |
भोले बाबा हम भजते |
लीला न्यारी शिव करते |
कैलासी हैं हरिहर जी -
पीड़ाएँ भी झट हरते |
बाधाओं को झटक चलो |
आगे का भी कटक दलो |
मौका आए जब कर में -
हाथों से ही पटक मलो |
देखें आँखे अचरज को |
नेताओं की सजधज को |
मक्कारी की गति रहती -
खाते सीधा अब गज को |
काँटे देखे इस जग के |
राहें रोकें हर मग के |
संसारी भी हर मन के |
मौका जानें हर फन के ||
जाता हाथी कब मुड़ता |
तोड़ा रस्सा कब जुड़ता |
चालाकी की हरकत से-
काला कागा खुद उड़ता |
~~~~~~~~~~~~
गीतिका
मानों अच्छा बचपन है |
बाकी जानो हठपन है |
आना जाना सरल नहीं |
राहों में भी धड़कन है |
देता धोखा जब कपटी ,
होता माथा छनछन है |
रोती बाजी जब पलटे,
बोलें आया भगवन है |
ऊँचे टीले जब उड़ते ,
सोचों में भी कुड़पन है |
सच्ची बोली जब सुनते ,
बोले आई तड़पन है |
वारी देखी खल जन की,
रोते देखी लटकन है |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~
गीत
कैसे आता सुख पल है |
देखी जाती हलचल है |
लोगों का भी यह रुख है |
होता खट्टा कुछ दुख है |
पाई जाती दलदल है |
देखी जाती हलचल है ||
ताना जाता सरकस है |
बाँधा जाता तरकस है |
खेले भू क्या समतल है |
देखी जाती हलचल है |
फूटे लाते बरतन को |
पाएँ सीधे धड़कन को ||
बोले धीरे अटकल है |
देखी जाती हलचल है |
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
~~~~~~~~~~~~~~
102 #चंदेली_बुंदेली_इतिहास
लावनी/ ताटंक छंद में -16 - 14 ( पदांत दो दीर्घ / तीन दीर्घ )
बुन्देली इतिहास पुराना , जिसको मन से गाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
चंदेली थी राजाशाही , सदी आठवीं से जानो |
तेरह सौ सम्वत तक फैली , तथ्य सही यह भी मानो ||
बुंदेली यह धरती पहले , जेजा ही कहलाई थी |
राजपूत था वंश सुनहरा , यश गाथा हरषाई थी ||
उनके निर्मित तालाबों में , जल धारा भी पाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
तालाबों की लम्बी सूची , निकले अभिलेख पुराने |
कुवाँ वाबड़ी अब भी दिखती ,दिखते हैं सभी निशाने ||
हरित धरा भी चंदेलों ने , पहले यहाँ सजाई थी |
नहरें भी बनवाकर सुंदर , पूरी समझ दिखाई थी ||
हरी भरी फसलों को मैं अब , पहले ही लहराता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
कालिंजर का किला पुराना , इतिहासों में पाया है |
अब तक देखा खड़ा हुआ है , वैभव फिर से लाया है ||
लम्बी सूची मिली किलों की ,चंदेलों का साया है |
जनहित और किसानों को भी , कैसे दीन्ही छाया है ||
कुछ जो किवदंती सुनते हैं , उनको चुनकर लाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
नगर जतारा किला पुराना ,जन श्रुति बीजक सुनते हैं |
ज्ञानी के सँग धन खोदा भी , अपने ढ़ंग से गुनते हैं ||
सतमड़ियन के रखा छायरे , तला पार की बातें हैं |
जो बेटा चंदेली आवे , धन उखाड़ सौगातें हैं ||
राज महोबा किला सुहाना , चंदेली बतलाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
चंदेलों के पहले राजा , शासक गण प्रतिहारी थे |
जो थी सामंतों की टोली , वीरा ही अधिकारी थे ||
बने बाद में शासक खुद ही, चंदेली गौरव आया |
बनी योजना प्रथम सिंचाई , तालाबों को खुदवाया |
मैं चंदेली तालाबों को , जगह - जगह पर पाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
खजुराहो के मंदिर देखो , यहाँ कला है सब न्यारी |
विश्व प्रसिद्ध धरोहर माने , जग के भी सब नर नारी ||
आल्हा ऊदल चंदेलों के , सामंती दरबारी थे |
बड़े लडै़या महुँवा वाले , मानें पगड़ी धारी थे ||
कथा बहुत है पर मैं आगे , प्रमुख रूप ही लाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
नुन्नुक योद्धा चंदेली थे , प्रतिहारी सामंती थे |
बने बाद में खुद ही शासक , ताकत में किवदंती थे ||
यशवर्मन विद्याधर ने भी , गजनी को ललकारा था |
रखी वीरता अपने अंदर , राजा रूप निखारा था ||
चंदेली शासन की चर्चा , अभिलेखों में पाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
जया शक्ति की जेजा धरती , पहले यह कहलाई है |
चंद्रवंश चंदेली राजा , यही धरा अपनाई है ||
धंगदेव यशवर्धन जी ने , खजुराहो था बनवाया |
शिल्प कलाओं का मंदिर भी , तभी पत्थरों पर आया ||
कंदरिया जी महादेव को , पहले शीष झुकाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
चंदेली परमाल हुए हैं , अंतिम शासक कहलाए |
आल्हा ऊदल जैसे योद्धा , हरदम लड़ते ही पाए ||
पृथ्वी राजा दिल्ली वाले , चौहानी कहलाते हैं |
चंदेलों से लड़ते रहते , खट्टा मीठा खाते हैं ||
ऊदल मरते तब आल्हा का , तप करना बतलाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
सदी आठवीं से तेरह तक , चंदेली ध्वज छाया था |
शिल्प कला -रण कौशल-जनहित , चंदेलों ने लाया था ||
कुतुबुद्दीनी ऐबक कारण , बिखरे तब चंदेली थे |
इसके पहले पृथीराज से , टूटी हुई हवेली थे ||
जिए शान से जब तक थे , चंदेली यश गाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
इसके आगे खेंगर आए , फिर बुंदेले छाए हैं |
गण कुंडारी राज हुआ है , और ओरछा पाए हैं ||
हिंदु राष्ट्र भी पहला घोषित, जेजा धरती कहलाई |
फिर बुंदेलों से बुंदेली , आभा मंडल थी आई ||
बुंदेलखंड जाना जाता , मैं भी रखता नाता हूँ |
वैभव कितना गौरवशाली , फिर से अब दुहराता हूँ ||
सुभाष सिंघई ,जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
~~~~~~~~~~~~~~~~
इस छंद का प्रयोग मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत काव्य में है।
103 #इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण
#सुलभ_विधान 👇👇
( नगण रगण. रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति दे सकते हैं,
111 212. 212 1 2= 11 वर्ण
#शारदे_वंदना
नमन शारदे , मातु को करें |
जयति बोलते, शीष को धरें ||
सजल नैन से , चाहते रहें |
विनय से सभी,भाव भी कहें ||
नमन को खड़ा , और दर्श को |
लगन भी खड़ी, देख हर्ष को ||
महल छंद भी , आस है लिए |
प्रबल भावना , खास से जिए ||
#गणपति_वंदना
शुभम् मूर्ति है, लोग जानते |
प्रखर ज्ञान के , बिम्ब मानते ||
उदर आपका , रूप है बड़ा |
भगत भाव से, दर्श को खड़ा ||
सतत चाह है, दीन काज हो |
सृजन देश में, सुखी राज हो |
प्रणव शीष में , श्री गयंद है |
सुयश मूर्ति से , देव नंद है ||
#छंद
कथन सत्य हो , लोग मानते |
सरल भाव को , खूब जानते ||
चमन में हवा , साफ ही बहे |
गगन में दिवा , शीर्ष ही रहे ||
चलन आज भी, झूठ का रहे |
प्रलय सा दिखे,बाढ़- सा बहे ||
दमन भी करे , कष्ट दे कहे |
अमन छोड़ दो , लोग हो ढहे |
खनन स्वर्ण का , खूब लाभ दे |
मनन में सदा , ज्ञान आभ दे ||
लगन भी रहे , सत्य कर्म में |
मुदित चाल भी , प्राप्त धर्म में ||
गलित मान हो , दर्प छोड़ दो |
दहन खोट हो , राह मोड़ दो ||
कपट नर्क है , सत्य मानिए |
गरल सर्प है , आप जानिए ||
अदब जानिए , एक नूर है |
सुयश भी कहे , मान शूर है ||
शरद ताप-सा ,पास सूर्य है |
वचन से कहे , शान तूर्य है ||
~~~~~~
#इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण
( नगण रगण रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति दे सकते है
111 212 212 1 2= 11 वर्ण
#मुक्तक
वचन दीजिए , देश के लिए |
कथन कीजिए, देश के लिए |
दमन ठानिए, शत्रु का सदा -
शपथ लीजिए, देश के लिए |
चमन है यहाँ , जानते रहे |
वतन भूमि है , मानते रहे |
लगन भी सदा ,जागती रही-
मनन से कर्म , ठानते रहे |
सहज कौन सा , प्रश्न आ गया |
कथन बोलते , जश्न छा गया |
चलन आपके , देखता रहा -
उधर धुंध भी , हुश्न पा गया |
~~~~~~`
#इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण
( नगण रगण रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति दे सकते है
111 212 212 1 2= 11 वर्ण #गीतिका
प्रगति भाष भी , खूब आज हैं |
चलित फाइलें , राज काज हैं |
मधुर बोलते , नाम राम ले ,
सुयश छाप भी , और नाज है |
नमन राम से , आज जीत है ,
चलित यंत्र है, मस्त साज है |
जगत घूमते , वेग चाल से ,
कथन बोल में , शीष ताज है |
गणन भी करें , पाँच साल में ,
निलय खोजते , वोट लाज है |
वचन झूठ भी , बोलते दिखें ,
दमन की रखें , खूब गाज है |
अब "सुभाष" भी, देखभाल के,
महल छंद के, भी जहाज हैं।
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~
#इंदिरा_छंद ( कनक मंजरी ) त्रिष्पुट जाति 11 वर्ण
( नगण रगण रगण लघु दीर्घ) 6 ,5 पर यति दे सकते है
111 212 212 1 2= 11 वर्ण #नव_गीत
मनन जो करे , भावना भरे |
वचन से सधे , साधना करे ||
प्रगति भी दिखे , सत्य राह में |
मुदित हो सभी , नेक चाह में |
अमन को सदा, लोग चाहते -
प्रणत भाव से , कामना करे |
वचन से सधे , साधना करे ||
यतन हर्ष से , योग खोजते |
सृजन गीत में , गान सोचते |
मुदित देह से , बोल भी सभी -
सुपथ खोज की, चाहना धरे |
वचन से सधे , साधना करे ||
जगत में दिखे, जोड़ तोड़ है |
प्रलय शीत भी, धूप मोड़ है |
गलित मान हो ,देखते सभी -
उदय भी कभी , याचना करे |
वचन से सधे , साधना करे ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
~~~~~~~~~~~~
104 -विजया ( मनोरमा ) छंद 18 मात्रा , सम चतुष्पदी छंद
तीन चौकल 👉444 + जगण + दीर्घ
( तीन चौकल का संयोजन रखे + जगण (121 )+ दीर्घ वर्ण।
चौकल कलन संयोजना -
मातु शारदे आतीं ❎ (इसमें प्रारंभ के दो चौकल नहीं बने )
माता शारद आतीं ✅ तीन चौकल है
नमन हमारा माता ✅
यही भाव रहता है ❎. भाव यही रहता है ✅
किया घोष है ❎. घोष किया है ✅
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#शारदे_वंदना
शारद वंदन करता #सुभाष है |
छंद महल को मिलता प्रकाश है |
पूजन भी #कौशिक का निहाल है |
सृजन सभी का करता कमाल है ||
मोदक लाएँ बप्पा गणेश को |
शीष झुकाएँ गौरी-महेश को ||
कलम उठाए लेखन अशेष को |
भाव यही है रहता हृदेश को ||
भारत माँ के बेटे महान हैं |
सीमा पर रहते भी जवान हैं |
खेतों में भी दिखता किसान है |
बंदे मातरम यहाँ सुगान है ||
दुश्मन भी ललकारें हुँकार से |
जाता काँप हमारे निहार से ||
घबरा जाता भारत प्रहार से |
पीछे हटता डर के बुखार से ||
राजाराम दया के निधान हैं |
करुँणा मन के खुद ही निशान हैं ||
सूरज कुल के सुंदर प्रतीक हैं |
दाता जग के प्रभुवर नीक हैं |
जिस मानव का रहता चरित्र है |
धरती का वह हीरा पवित्र है ||
दुनिया को लगता सरल मित्र है |
उड़ती खुश्बू यह सुमन इत्र है ||
कृष्ण कन्हैया ग्वाला सुजान है |
राधा के मन का भी निधान है ||
मधु बजती है बंशी सुगान से |
चलते स्वर भौहों के निशान से ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~
#मुक्तक
अभिमानी का रहता विचार है |
मेरा ही अब चलता प्रहार है |
लोगों का वह जोड़े हुजूम भी -
भरता पल -भर में ही हुँकार है |
बीती बातों का भी हिसाब है |
ईश्वर के घर पर भी किताब है |
कर्म सभी ही रहते सचित्र हैं -
वह ही देता सबको खिताब है |
बाधाएँ भी करती बखान हैं |
मानव के चरित्र ही निशान हैं |
होनी अनहोनी बेशुमार हैं -
कर्म तभी ही करता निदान है |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~
#गीतिका
विध्न निवारक देवा गणेश हैं |
माता गौरी बापू महेश हैं |
लम्बोदर गज मुख एक दंत हैं ,
पूजे जाते हरदम विशेष हैं |
चढ़े प्रसादी मोदक सदैव ही ,
पूज्य प्रथम आभा में दिनेश हैं |
मूषक करें सवारी जहान में ,
मंगल मूरत बसते हृदेश हैं |
नमन किया है जब भी सुभाष ने ,
बनकर आए गणपति कृपेश हैं |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~
#गीत
कर्म सदा ही रखते निशान हैं |
करते रहते फल भी प्रदान हैं ||
करनी की भरनी खुद पुकारती |
क्या देना है सुख-दुख विचारती |
कर्म जहाँ शुभ मिलता प्रकाश है -
ग्रंथों में इसके भी बखान हैं |
कर्म सदा ही रखते निशान हैं ||
सोच यहाँ पर करती प्रहार है |
ज्ञात करे वह क्या नव विचार है |
मानव भी घूमे कुछ तलाश में -
पाने खातिर क्या कुछ विधान है |
कर्म सदा ही रखते निशान हैं |
प्रकट करे वह हसरत चरित्र से |
हरकत भी करता है विचित्र से |
देता रहता सबको सुझाव भी -
खुद खोट न त्यागे जो निदान हैं |
कर्म सदा ही रखते निशान हैं |
सुभाष सिंघई
105 #दीर्घ_कंचनलेखा_छंद
( प्राकृत भाषा का सम मात्रिक छंद )
मापनी :-- षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा
चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
विशेष निवेदन -👏 बीस मात्रा के कई छंद हैं, जिनमें आदि , यति और पदांत से , गणों के गठन से नाम बदल जाते हैं।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अत: निवेदन है कि सही विधान से छंद का अभ्यास /लेखन करें , मात्राएँ न गिनाएँ 👏या शब्दों को तोड़कर मात्राएँ इधर-उधर न करें |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद
षटकल -👉 द्विकल चौकल , चौकल द्विकल , त्रिकल-त्रिकल का
चौकल- 👉 चारों तरह का ( पूरित जगण छोड़कर )
#कंचनलेखा छंद में
षटकल + चौकल है , #स्पस्ट_षटकल व किसी भी तरह का #चौकल , इस छंद की विशेषता है ) पूरित जगण छोड़कर
(स्पस्ट करने के लिए , तीन यतियाँ ( , ) व एक पदांत( | ) उदाहरण छंदों 👇 में लगा रहे हैं) वास्तव में एक मध्य यति एवं एक पदांत यति ही आवश्यक है।
#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद
#छंद
मापनी- षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा
चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत
छंद महल, आना , हे शारद , माता |
विनती भी , करते , रखते हैं , नाता ||
ज्ञान सदा, देती , दया दृष्टि , रखकर |
कवि प्रसाद ,पाते, हर अक्षर, चखकर ||
लम्बोदर , गणपति , गणनायक , जग के |
रिद्धि-सिद्धि , दाता , दृष्टा हर , मग के ||
पूजन है , तेरा , छंद महल , आओ |
स्वागत सब, करते , कृपा साथ , लाओ ||
नहीं सुनें , गीता , जिनका मन, मैला |
जब विकार, दिखता , उनके उर , फैला ||
मूरख कब , चेता , बोल गए , ज्ञानी |
क्षति उल्टी , देता , करता निज , हानी ||
दूर रहो , उनसे , जो खल हैं , नामी |
दिखे सभी , को भी , अंदर से , कामी ||
छल जिनका, घातक, वार करें, हमको |
जिनके चुभ, जाते , काँटे हम , सबको ||
खोजे जब , उपवन , नहीं कहीं ,मिलते |
पुष्प कमल, प्यारे , कीचड़ में ,खिलते ||
है गरीब, बस्ती , गुण वाले , दिखते |
कभी ग्रंथ, अच्छे , फुटपाथों, बिकते ||
सोए कुछ , मानव , खाट रखें , टूटी |
जागें तब, कहते, किस्मत है ,फूटी ||
कर्म नहीं ,करते , भाग्य श्रेष्ठ , चाहें |
ज्ञान धर्म , बातें , दिखलाते , राहें ||
अच्छे हम, ज्ञानी , बतलाते, जग को |
कठिन राह ,चलते , भूले शुभ , मग को |
अजब यहाँ, दुनिया ,सभी बने ,गुरुवर |
अंधों में , काणे , या सूखे , तरुवर ||
राम चलें ,आगे , मध्य चलीं , सीता |
लखनलाल ,पीछे, लिए कर्म, गीता ||
राहगीर ,बोले , रवि शशि ध्रुव , तारा |
एक साथ ,करते, भू का जय ,कारा ||
व्याकुल हैं, दशरथ , राम गमन, होता |
नर- नारी , रोकें , सबका मन ,रोता ||
कौशल्या ,हतप्रभ ,कहाँ चली ,जाए |
पिता पुत्र ,हालत , किधर पैर , धाए ||
हिंदु राज्य ,घोषित , पहला यह , जानो |
गढ़कुड़ार ,राजा , खेत सिंह , मानो ||
वीर रहा ,योद्धा , पकड़ शेर. जबड़ा |
खेंच चीर , डाला , दाँव लगा, तगड़ा ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद
मापनी- षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा
चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत
#मुक्तक
जब 'सुभाष',कहता, कान रखें , बुचके |
गुब्बारे , फूले , बन जाते , तुचके |
अवगुण के , ग्राहक , लाखों की, गिनती -
दुनिया का ,चक्कर , कई मिले, उचके |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद
मापनी- षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा
चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत
#गीत
कौन यहाँ ,अपना , किसने है ,जाना |
अपने दें ,घातें , सबने यह , माना ||
सुख में हैं, साथी , दुख में सब , भागें |
संकट में ,छोड़े , घर जाकर , जागें ||
बनते हैं ,हितकर ,जाल खूब , फेकें |
आग लगी ,देखे , रोटी निज , सेकें ||
हैं तेरे , हम गाते मधु , गाना |
अपने दें, घातें, सबने यह , माना ||
वक्त कभी , होता , अपने सब, होते |
मतलब भी, रखते , जगते भी , सोते |
स्वारथ जब , पूरा , बन जाते , नूरी |
समय नहीं , मिलता , रख लेते , दूरी ||
कारण भी , वह तब , बतलाते , नाना |
अपने दें , घातें , सबने यह , माना ||
चलती जब , गाड़ी , चढ़ जाते , अपने |
रुकने पर , कहते , विखरे हैं , सपने ||
अपना हित ,पहले , लोग यहाँ , देखें |
हित अनहित, जाने , कर लेते , लेखें ||
यह दुनिया , चकरी , सब हैं अब , साना |
अपने दें ,घातें , सबने यह , माना ||
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#दीर्घ_कंचनलेखा_छंद
मापनी- षटकल + चौकल ×2 = 20 मात्रा
चार पद , दो- दो या चारों पद सम तुकांत
#गीतिका
मतलब जब , सधता , गधा बने , बप्पा |
खुद अपने ऊपर , छापें सब ,ठप्पा ||
मायावी ,दुनिया , छल का है ,गाना ,
सिक्के भी , खोटे , बन जाते, गप्पा |( पाँसा)
ज्ञानी भी , बनते , बतलाते, अनुभव ,
कहते भी ,हमने , घूमा हर , चप्पा |
नमक मिर्च ,लेकर , घावों पर, छिड़के ,
सबको भी , देते , बिन माँगे , छप्पा |( छाप )
अब सुभाष ,कहता , चुप रहना , सीखा ,
नहीं जगह , खाली , सभी जगह, झप्पा | ( झपकी )
सुभाष सिंघई
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#शोधित
हेमंत छंद 20 मात्रा
कोई भी वाचिक या यथावत तीन पंचकल + पदांत में एक यथावत रगण
#पंचकल के तीन गण होते हैं।
#रगण- 212 *** #यगण- 122 *** #तगण- 221
( कुछ छंदकार 15 मात्राएँ गण बंधन से मुक्त कर , पदांत मूलत: रगण से ही मानते हैं , पर देखा गया है, कि अपवाद छोड़कर लेखन में 15 मात्रा तक सभी प्रकार के पंचकल थोड़ी सी सावधानी से स्वत: आ ही जाते हैं, एवं अंत में रगण यथावत रखना होता है |
#हेमंत_छंद
तीन पंचकल +यथावत रगण
दें कृपा छंद को संधान शारदे |
आभाष सत्य का विज्ञान सार दे ||
हमारे भाव को सदा उत्थान दो |
कलम से सृजन में नवरंग गान दो ||
दीवार लाँघते लंक हनुमान हैं |
राम के हैं दूत बली बलवान हैं ||
लंकनी बोलती कुछ आप मानिए |
लघु रूप जाइए दीर्घ मत ठानिए ||
मारकर लंकनी , गए बजरंग हैं |
मिल गई सिय मात भरते उमंग हैं ||
लंक जल खाक की दें खबर राम को |
बोलते रहे बस राम के नाम को ||
विनय भी हमारी सुनेंगे राम जी |
चाह है मिले अब मोक्ष का धाम जी ||
शरण में रहूँगा पालते कामना |
भजन अब मैं करूँ भर रहा भावना ||
आचरण राम के , सृष्टि में धारिए |
कर्म भी श्याम के आज स्वीकारिए ||
युद्ध जब जरूरी धर्म हित कीजिए |
अहिंसा भी कहे , चोट अब दीजिए ||
सुभाष सिंघई
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106 #हेमंत_छंद ( मुक्तक)
तीन पंचकल +यथावत रगण
देश की आन का सम्मान कीजिए |
कर्म से सभी का उत्थान कीजिए |
भाव से प्रेम से दीन को दान दें -
साथ प्रभु राम का, गुणगान कीजिए |
आभाष न सुभाष को मिला मानिए |
दुश्मनों के गेह भी यहाँ जानिए |
तकरार की खार से दूर ही रहें -
सदा हम खुश रहें सृजन को ठानिए |
आजकल देखते भीड़ बीमार है |
सैकड़ों लोग हैं , एक न अनार है |
चाहते हैं सभी हमें ही प्राप्त हो -
मिलेगा कहाँ जब नाव मझधार है |
युद्ध अब हो रहा , उपज अब भ्रांति है |
उठाने लाभ को चल रही क्रांति है |
बँट रहा विश्व अब दो भाग हो रहे -
तमाशा हो रहा कह रहे शांति है |
ज्वाल जग जल रही सेंकते रोटियाँ |
एक दूसरे की काटते चोटियाँ |
हानि लाभ छोड़ा चलाते घात हैं -
खेल के मैदान जमी अब गोटियाँ |
शिव महा देव से गंग है बोलती |
पाप के कर्म सब सृष्टि है घोलती |
मैं बनूँ पापनी कौन है तारने -
शिव कहे कुंभ में मैं करूँ सोखती |
सुभाष सिंघई
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#हेमंत_छंद ( गीतिका)
तीन पंचकल +यथावत रगण
दिख रहे आजकल कुछ भले देवता |
बन विधाता रहे अब ढले देवता ||
आदमी बन रहा अब स्वयं ईश है ,
रार की आग पर हैं जले देवता |
दूर कर काम को ढोल वस पीटते ,
जानिए नाम को हम फले देवता |
स्वार्थ सब देखते मेल भी मानते ,
कर्म से दिख रहे वह गले देवता |
राज की नीति से फैली दुकान है ,
फूँक को मारकर अब पले देवता |
तंत्र का मंत्र का कुछ नहीं ज्ञान है ,
बुदबुदा होंठ वस है हले देवता |
चला जा सुभाषा तू भी दुकान में ,
मिलेंगे बहुत से कुछ पले देवता |
सुभाष सिंघई
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#हेमंत_छंद ( गीत )
तीन पंचकल +यथावत रगण
जीव परमात्मा का अंश जानिए |
झाँककर स्वयं को आप पहचानिए ||
अजब संसार में दिख रहे तमासे |
फूटते गली में सभी के बतासे ||
बच सका कौन है खोजना ठानिए |
झाँककर स्वयं को आप पहचानिए ||
बिगड़ते हाल है लड़ पड़े राह में |
जल उठे बात सुन मतलबी डाह में ||
दूर हों खल जनों से बात मानिए |
झाँककर स्वयं को आप पहचानिए ||
जगत में सभी के मित्र भी देख लो |
कोन हैं सहारे बैठकर लेख लो |
नहीं तब उन्हीं ही प्रथम अब छानिए |
झाँककर स्वयं को आप पहचानिए ||
सुभाष सिंघई
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