https://subhashsinghai.blogspot.com/गौरव गढ़कुंडार (चित्र पर क्लिक करें ,दोहावली खुल जाएगी )

                                    
https://subhashsinghai.blogspot.com/ पर या बुक कवर पर क्लिक. करके आप ब्लाग खोलें - पढ़े व पसंद आने पर ब्लाग को फालो करने का निवेदन करते है व कमेंट- समीक्षा लिखने का भी आग्रह करते है ,सादर स्वागत है, 
आपकी प्रदत्त समीक्षा बुक के अंतिम पृष्ठों पर एडिट (जोड़ते) करते जाएगें  💐💐💐💐💐

  *जय_माँ_शारदे * (क्रमांक 1)
*गौरव गढ़कुंडार* 
  (दोहावली )
                       *लेखक-सुभाष सिंघई*  ✍️            
                एम•ए• (हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र )
                      जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
                मोबाइल - 9584710660
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

लेखक का परिचय

नाम - सुभाष सिंघई 
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955 
जन्म स्थान - जतारा , जिला टीकमगढ़ (म०प्र०)
पिता का नाम -स्व० श्री कपूर चंद्र सिंघई 
माता का नाम - श्रीमति शीला देवी सिंघई 
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र  )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई 
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल (सागर )
       2 - शिल्पी सूर्या  - नितिन जैन ( खजुराहो ) 
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई 

लेखन की विधा - 
1 - दोहा , कुंडलिया , चौकड़िया , पदकाव्य  , इत्यादि सभी सनातनी मात्रिक छंद 
चार  हजार के करीब हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के  करीब कुंडलिया  , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है 

2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है 

 वर्तमान में सनातनी मात्रिक छंद पर लेखन कर रहे है 

3- ब्लाग डाँट काम पर प्रकाशित  कृतिया - 
1- दोहा दीप (एक हजार दोहे )
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे ) 
3- बुंदेली बराई ( एक  हजार बुंदेली दोहे   ) 
4- मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य 
5- कलम से उद्गम ( विभिन्न सनातनी मात्रिक छंद  ) 
6 -कुंडलिया कुंड 
7 - गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
8- हिंदी छंद माला
9- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी 
10- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन , 
11- गर्भ से गमन तक (खंड काव्य )
12  गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है 
13 -ट्वीटर -  व ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें है व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है 
वर्तमान में सम्पादन - 
1- छंद महल (मासिक हिंदी ई पत्रिका ) जिसके  25 विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके है 
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक  हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है 

यूट्यूब - सृजन चैनल का‌‌ संचालन

कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है

©®  सुभाष सिंघई 
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
                     ई बुक प्रकाशन 
      https://subhashsinghai.blogspot.com/
 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पृ० क्र 2
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पृ० क्र 3
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~`~~~
पृ० क्र 4
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पष्ठ क्र० 5
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पृ० क्र 6
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पृ० क्र 7

जब मिलती इतिहास को , काव्य कुलों की धूूप |
जहाँ पड़े कवि  की  नजर , निखरे उसका रूप  ||

बहुत  लिखा कुंडार  पर , सबके  है  अभिलेख |
पर अब गढ़कुंडार पर  , खिची  काव्य  से  रेख ||

अनुपम जिनकी लेखनी , जिनका नाम सुभाष |
देते   गढ़कुंडार   पर ,     दोहा    छंद   प्रकाश ||

मात्  गजानन आपकी , सदा   रखेगीं   शान |
'अमर' करे अरदास अब , बढ़े   आपका मान ||

लिखकर दोहा छंद से ,  अमर  किया कुंडार |
देता   है   शुभकामना , अमर सिंह   खंगार ||

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पृष्ठ क्र० 8
आदरणीय आर• के• प्रजापति " साथी " जी की कलम से प्राप्त समीक्षा -शुभकामनाएँ 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पृष्ठ क्रमांक 9 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ आप समीक्षा  अवश्य प्रदान करें   , समीक्षा व शुभाशीष, अपने चित्र के साथ व्हाटशाप नम्बर 9584710660  भेंजें  , हम उन्हें क्रमशा: एडिट (जोड़ते ) करते जाएंगे 
सादर 
  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
                       ~~~~~~~~~~
        ©®लेखक-सुभाष सिंघई जतारा(टीकमगढ़)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

जिला निवाड़ी  शान है , अद्भुत   गढ़कुंडार |
शिल्प कला बेजोड़ है, होते चकित निहार‌ || 2
भव्य किला हम देखते , गौरव मय इतिहास |
            यहाँ  पराक्रम का सदा , देखा सतत् विकास || 3
एक पहाड़ी पर बना , अप्रतिम  दुर्ग विशाल |
           यहाँ शौर्य इतिहास है , जिसका उन्नत भाल || 4

नीर  बाबड़ी पास   में , हरे  प्यास   की  पीर  |
          मातु गजानन की कृपा , सूखे कभी   न नीर  || 7

छिपे  राज  हैं  दुर्ग में , मिलते  कथ्य अनेक |
गाथाएँ अद्भुत सुनीं  , तथ्य   एक   से   एक || 9

भूल भुलैया हैं यहाँ ,  दिखें    तिलस्मी  रूप |
          दरवाजे   दालान  सब , दिखते  भव्य अनूप || 11
रक्ष कवच खुद दुर्ग है , शिल्प  यहाँ   बेजोड़ |
शत्रु भेद जब चाहते,   मिले न उनको तो‌ड़ ||12

रनवासों के कक्ष भी , दिव्य   बने  मनुहार |
सभाकक्ष बैठक सहित, भव्य  करें  शृंगार  ||13
लघु पर्वत चहुँ दिश यहाँ , मध्य  दुर्ग  है  शान |
दुर्गम  रहती   राह थी   , नहीं    भेद  आसान ||15

अनजाना हो यदि पथिक , राहें   जाता  भूल |
भूल भुलैया भी   यहाँ , सभी  दिखें  प्रतिकूल ||16

चाहर दीवारी  लखो , दिखता  किला  अभेद |
शत्रु  दलन करते  रहे   , बने    गुर्ज  के  छेद || 17

दिन में भी  दिखता  यहाँ  , झीना  रहे  प्रकाश |
सभी सुरक्षा   के  कवच , देखे  यहाँ " सुभाष" ||18

लोहे   जैसी   खम्भ-सी , सभी  यहाँ  दीवाल |
अद्भुत है  कारीगिरी , जिसकी नहीं  मिसाल ||19

गाथाओं  में   दुर्ग  के ,   अद्भुत   सुने  रहस्य |
खोजी भी इतिहास के , चौंक गए लख दृश्य ||20

मिल जाते हैं देखने , कुछ-कुछ यदा  तिलस्म |
मातु गजानन की कृपा  , करें यहाँ शुभ रस्म ||21

सिद्ध गजानन  माँ  सदा  , हरती   हैं  संताप  |
श्रद्धा को  सम्मान दें ,  फल   देती चुपचाप ||22

राजा   थे   चंदेल   जू , यशवर्मन   था   नाम |
          नगर महोबा  का किला , रजधानी हित काम ||24

दूर- दूर तक राज था ,  नवम्  सदी  की  बात |
दुर्ग बना  कुंडार   का , हुआ   बहुत  विख्यात ||25

चंदेले   शासक   रहे   , पीढ़ी    कई ‌   गुजार |
ग्यारह  सौ   ब्यासी  हुए , राजा   जू   परमार ||26


खाँगर कुल के वीर थे , खेत सिंह था नाम |
लड़कर भूखे शेर से , दिया जीत परिणाम ||28

पृथ्वी जू चौहान ने ,  कहा सिंह  सच  नाम |
युग नायक भी मानकर ,सबने किया प्रणाम ||29

युग   नायक   होते  रहे , कहता  है  इतिहास |
आज उदाहरण दे रहा , सबको  यहाँ  सुभास ||30

वीर   शिवाजी  जानिए  , राणा   महा  प्रताप |
युग नायक बनकर यहाँ  , छोड़   गए हैं छाप ||31

छत्रसाल  युग   वीर  थे ,   बुंदेलों    के    नूर |
आल्हा ऊदल भी अमर , रहे   बनाफल  शूर ||32

युग  नायक  होते   रहे , कहने  का  सारांश |
खेतसिंह भी उस समय , रहे सदा  दिव्यांश ||33

कंधे  जिनके  खंभ   थे , छाती  रही विशाल |
सिंहों  जैसा   बल   रहा , हाथी  जैसी  चाल ||35

नेत्र   सूर्य के पुंज थे ,  उन्नत   रहता    भाल |
युद्ध कला रणबाँकुरा , खाँगर कुल का लाल ||36

सभी शौर्य के  चिन्ह  थे , अलबेली पहचान |
खेतसिंह   की  वीरता , पाती  थी  सम्मान  ||37

सत्ताईस   दिसम्बरी ,   ग्यारह   सौ   चालीस |
जूनागढ़    गुजरात.  में , जन्मा यह  रणधीश ||38

रूढ़देव थे  श्री पिता ,    कुँवर  किशोरी  मात् |
खाँगर क्षत्रिय कुल मिला , यश फैला दिन रात ||39

रूढ़देव   राजा   रहे , जूनागढ़   था  राज |
खेतसिंह भाई  बड़े , करें सुनिश्चित काज ||40

लघु भ्राता जयसिंह को , दे  गद्दी  का‌ भार |
पृथीराज चौहान  हित ,  थे  दिल्ली दरबार  ||41

खेत सिंह   की  शादियाँ ,  बना  गई  व्यवहार |
मिलती उनकी पत्नियाँ , गिनती में  कुल  चार ||42

पहली  थी  "तारावती" , हाड़ों  से  था    मेल |
दूजी  रानी  गौड़‌   थी , सुंदर     "आलनबेल" ||43

गहरवार तीजी  सुनीं  , "राजल दे " था  नाम |
चौथी कही  बघेल थी  , सुनी  "तेजसी" वाम || 44

उम्र रही बारह बरस , एक   बचाई   गाय |
हटे जानवर जंगली , अपनी पूँछ  छिपाय ||45

वजनी थी  बासठ किलो, खेत सिंह तलवार |
तब हाड़ा भी देखते  , इस योद्धा की   धार ||47

एक  शिला  को  चीरते , ऐसा  करें  प्रहार |
बड़ा अचम्भित तब हुआ , तारागढ़ दरबार ||48

वरण किया तारावती , मिलता  है उल्लेख |
हर्षित तारागढ़ हुआ ,  खेत सिंह को देख ||49

इसी  तरह की   शूरता , लख  पृथ्वी  चौहान |
वरकरार   रखते   सदा  , सेनापति का मान  ||50


लड़ी  लड़ाई  थी  बहुत , पृथ्वी नृप के साथ |
सदा  रहे  वह  दाहिने , बनकर  उनके हाथ ||52

अब लिखते हम हाल है  , जैजा    क्षेत्र  प्रदेश |
भुक्तिजैजाभ थे  हुए  , नामी   यहाँ  नरेश ||53

पहले से इस क्षेत्र को ,  कहें  जुझौतीदंड  |
फिर बुंदेली  राज  से  , है    बुंदेली  खंड ||54

पृथ्वी राजा  चाहते , दिल्ली   के  चौहान |
यहाँ जुझौती खंड का , बनने को सुल्तान ||55

परमार्दिक राजा   हुए , राज्य  महोबा नूर  |
आल्हा ऊदल साथ थे ,यहाँ  बनाफल शूर ||56

सन् ग्यारह सौ जानिए , इक्यासी का काल |
पृथ्वि  और परमार में ,  युद्ध हुआ विकराल ||57

(सही नाम परमार्दिक देव जू व प्रचलित नाम परमार )

ऊदल जिसमें प्राण तज , जाते  स्वर्ग सिधार |
आल्हा ने सन्यास को , किया  तभी  स्वीकार ||58

पृथीराज   चौहान   जब  , गए   महोबा   जीत |
किला मिला कुंडारगढ़  , थी स्वाभाविक  रीत  ||59

हर्ष हुआ चहुँ ओर था , खिला सुनहरा रूप‌ |
           जागीरा    रणबाँकुरा , नृप था  ‌दिव्य अनूप ||61

रजधानी कुंडारगढ़  ,   ले आई   नव  धूप |
ग्यारह सौ ब्यासी  बनें , खेत सिंह जी भूप ||62

प्रथम हिंदु गणराज्य था , पढ़ते  हम  अभिलेख |
तभी लिखा इस तथ्य को, इतिहासों  को   देख ||63
~~~


सन्  ग्यारह‌  सौ  बानवें,   हुआ   तराइन  युद्ध |
राजा   पृथ्वीराज  तब ,   गौरी   हाथ   निबद्ध ‌|| 64

दिल्ली मुगलों  की  हुई , पर   गौरी के  प्राण |
पृथीराज ने  ले  लिए , एक   चलाकर   बाण ||65
                 प्रश्न समाधान 
.             ~~~~~~~~~~~
दूसरा मत {जो सही भी लगता है ) 
जब  इतिहासकार भी राजाश्रय के हिसाब से  इतिहास लिखे तो ऐसा प्रश्न उठना स्वाभाविक है 

 सत्य यह है कि ’मोहम्मद गोरी, इस अधूरे नाम से आगे का  ज्ञान किस -किस को पता है , कह नहीं सकता हूँ 

दरअसल  मोहम्मद सहाबुद्दीन गोरी,और मुहम्मद गयासुद्दीन गोरी दो सगे भाई थे 
 छोटा भाई युद्ध करने के लिए आता था और बड़ा गजनी अफगानिस्तान में राज करता था

चौहान ने गजनी वाले मुहम्मद गोरी को मारा था और उसी समय चौहान भी वीरगति को प्राप्त हो गए थे

और दूसरे भाई को दस साल बाद जाट खोखर वीरों ने
मारा जिसकी मजार पाकिस्तान के किसी हिस्से में मौजूद है

बड़े भाई गोरी की मजार अफगानिस्तान में बनी हुई है और उसी मजार के पास दरवाजे के बगल मे ही पृथ्वीराज चौहान और चंद्रवरदायी कवि  को भी दफन किया गया था, और अभी तक जो मजार में जाता था , चौहान की छोटी दफ़्न जगह को जूते मारता था

 भारत के स्वाभिमानी श्री  शेर सिंह राणा ने (फूलन देवी को मारने के बाद , व जेल से फरार होकर (उस समाधि को तोड़ कर चौहान की अस्थियां भारत में कैसे  लाए थे , क्या यह कहानी लोग भूल गये है 

भारत के ये तथाकथित सेक्युलर इतिहासकार तो यह भी कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान को भारत में ही मारा गया था तो प्रश्न यह है कि फिर उनकी अस्थियां गजनी अफगानिस्तान  जाकर गोरी के मजार के दरवाजे पर कैसे दफ़्न हो गई ?

शेर सिंह राणा का जीवन परिचय 

जब से व्हाट्सएप नाम का जादू का पिटारा दुनिया में ईजाद हुआ है, तब से नाना प्रकार का ज्ञान, जानकारियां, सूचनायें, चरित्र हत्या, दुष्प्रचार से भरपूर ऑडियो-वीडियो क्लिप्स, कमेंट्स, किस्से-कहानियां हमारे दिमाग को हिलाए जा रहे हैं। ऐसी ही एक जानकारी हाल ही में मेरे देखने में आईं तो लगा कि इसे आमजन से साझा करना चाहिये। मैं इस पर अपना कोई मत प्रकट नहीं कर रहा हूं, लेकिन इसकी सच्चाई जानने की जिज्ञासा जरूर रखता हूं। सार रूप में वह बात यह है कि एक वीडियो मैंने देखा, जिसमें बताया गया है कि डकैत से सांसद बनी फूलन के प्रेमी-सह-हत्यारे ने देश की चर्चित व अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाली तिहाड़ जेल से फरार होकर अफगानिस्तान जाकर देश के गौरव पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां निकाली और भारत लाकर बाकायदा एक मंदिर बनवाकर उसमें स्थापित कर दीं।

 मूलत: रुड़की के रहने वाले राजपूत पंकज सिंह उर्फ शेरसिंह राणा ने 25 जुलाई 2001 को दिल्ली के सरकारी आवास में तत्कालीन सासंद फूलन की गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह हत्या उसने अस्सी के दशक में यूपी के बेहमई में फूलन द्वारा 22 राजपूतों को एक पंक्ति में खड़ा कर गोली मारकर हत्या कर देने के प्रतिशोध स्वरूप की थी। बाद में फूलन ने आत्म समर्पण कर दिया था और 11 साल जेल में बिताने के बाद मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा टिकट देकर उसे सांसद बना दिया था।
तयशुदा स्क्रिप्ट के मुताबिक शेरसिंह ने पहले फूलन से नजदीकी बढ़ाई , वहीं संभवत: तयशुदा स्क्रिप्ट के मुताबिक शेरसिंह ने पहले फूलन से नजदीकी बढ़ाई, उससे कथित तौर पर शादी भी की और अंतत: एक दिन मौत के घाट उतार दिया। घटना के दो दिन बाद ही शेरसिंह ने उत्तराखंड पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से बाद में उसे जेल भेज दिया गया। बताते हैं तब उसने फिल्मी अंदाज में कहा भी कि तिहाड़ की सलाखें उसे ज्यादा देर रोक नहीं पायेंगी। यह सही साबित हुआ करीब ढाई साल बाद। 27 फरवरी 2004 को उत्तराखंड पुलिस की वर्दी में तीन जवान कोर्ट वारंट के साथ तिहाड़ आये और अपने यहां पेशी का ऑर्डर दिखाकर शेरसिंह को ले गये। जब वह नहीं लौटा तो असलियत पता चली। यह और बात है कि 17 मई 2006 को शेरसिंह कोलकाता में फिर से पकड़ लिया गया और तब से तिहाड़ में ही है। इसी बीच उसने अफगानिस्तान जाकर अस्थियां लाने का कथित पराक्रम किया।

 बताया गया है कि पहले उसने रांची से फर्जी पासपोर्ट बनवाया और कोलकाता चला गया। वहां से बांग्लादेश का वीजा बनवाकर वहां चला गया। वहां बाकायदा यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया। फिर वहां से अफगानिस्तान का वीजा बनवाकर काबुल पहुंच गया। वहां करीब तीन माह रहकर उसने काबुल से कंधार तक पृथ्वीराज चौहान की समाधि खोजी और  योजना की। सवाल यह है कि जो काम सरकार को करना चाहिये था, वह शेरसिंह ने क्यों किया? 

बताया जाता है कि अफगानिस्तान में जहां मोहम्मद गोरी की कब्र है, उसके पास ही पृथ्वीराज चौहान की समाधि भी है। कब्र देखने आने वालों के लिये यह अनिवार्य है कि वे पहले चौहान की समाधि को जूते मारे, फिर कब्र के दर्शन करें। इसके लिये वहां पर बाकायदा जूते भी रखे गये। इस तथ्य ने शेरसिंह को राजपूत होने के नाते बैचेन किया हुआ था। इसी तथ्य से तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंतसिह भी परेशान हुए थे, जो कंधार विमान अपहरण के वक्त अफगानिस्तान गये थे। वहां तालिबान सरकार ने ही उन्हें यह बात बताई थी। वे भारत लौटकर भी कुछ कर नहीं पाये, जबकि इस घटना का जिक्र मीडिया में हुआ था।

शेरसिंह राणा ने अंतत: अवसर देखकर एक रात समाधि से अस्थियां निकाल लीं और भारत लौट आया। इस पूरे घटनाक्रम की उसने वीडियो शूटिंग भी की, जो दिखाई गई थी ,  भारत लौटकर उसने अपनी मां की मदद से गाजियाबाद के पिलखुआ में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर बनवाया और अस्थियों को वहां सुरक्षित रख दिया। हालांकि तब से लगाकर अब तक सरकारी या गैर सरकारी स्तर से इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं हो पायीं, क्योंकि इससे सरकार की किरकिरी भी होती ही।

इस वाकये के कुछ ही समय बाद कोलकाता से ही शेरसिंह राणा को 17 मई 2006 को गिरफ्तार भी कर लिया गया, जिसमें भी यह लगता है, जैसे राणा ने खुद ही ऐसा करवाया हो, क्योंकि इतना तो वह भी जानता था कि इस तरह तो उसे चोरों का जीवन ही जीना पड़ेगा, लेकिन फिर से जेल चला गया तो एक दिन छूट जाने का अवसर भी रहेगा ही।

पिलखुआ के मंदिर में रखी अस्थियाों की सत्यता परखना कोई मुश्किल बात नहीं है। पुरात्व विभाग आसानी से इतना तो पता कर ही सकता है कि वे कितनी पुरानी हैं? फिर, खुद भारत सरकार अफगानिस्तान सरकार से भी इसकी असलियत मालूम करवा सकती है। हालांकि, यह जरूर कठिन होगा, क्योंकि तब वहां की सरकार की मिट्टी पलीद होगी। यदि यह तथ्य किसी तरह प्रमाणित होता है तो शेरसिंह राणा की हत्या की सजा भले ही माफ न की जाये, जेल से फरार होने की सजा भी कम न की जाये, लेकिन देश का गौरव जान की बाजी लगाकर लौटाने का सम्मान तो हर हाल में मिलना चाहिये। जंग का कोई नियम नहीं होता, कोई मर्यादा नहीं होती और लुटेरों, आततायियों, आक्रमणकारियों के साथ तो बिलकुल नहीं, तब शेरसिंह शाबाशी से वंचित कैसे किया जा सकता है?

आखिरकार आजादी के गरम दल व गरम खून के सेनानियों ने भी अंग्रेजों से लोहा लेने में अंग्रेजों के तौर-तरीके ही अपनाये थे, जो कि कतई गलत नहीं थे तो शेरसिंह का यह दुस्साहसिक कदम भी सराहा जाना चाहिये।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

तब    दिल्ली आधीनता , खेत    सिंह   ने  त्याज्य |
खुद स्वतंत्र घोषित किया , अपना सब गण राज्य ||66

सन्  बारह   सौ बारही  , माह  अगस्ती  तीस‌ |
खेतसिंह  तन छोड़कर  , गए  धाम  जगदीश ||68

खेतसिंह   वंशावली  , का     मिलता     उल्लेख |
'नंद ' छत्र'- अरु 'खूब'‌है , 'मान' 'वरद' तक रेख ||69

अंतिम  हुरमतसिंह थे , रखें  शीष  पर ताज |
वर्ष एक सौ पैसठी , था  खांगर   कुल  राज ||70

खाँगर कुल की पीढ़ियाँ , करती   कई  सुधार  |
कई    प्रथाएँ   देखते ,   आज    बनी मनुहार ||71


लोक कथाएँ  भी सुनीं , और  लोक भी   गीत |
खाँगर कुल सम्राज्य की , जिनमें मिलती रीत ||73

आगे  मिलती  दो  कथा , दोनों   दिखें  विशेष |
पहली "केसर दे" व्यथा , जौहर  के    परिवेश ||74

केसर दे बलिदान भी , रखता लाज उजास |
मिलता गढ़कुंडार में , जौहर का  इतिहास ||75
समय बढ़ा आगे तभी  ,  मानसिंह जी  भूप |
          गद्दी गढ़कुंडार पर    , खाँगर   कुल के  रूप ||76

तब मोहम्मद बिन तुगल, आया   गढ़  कुंडार |
मानसिंह की  निज सुता , चाहे   वह उपहार ||77

हुआ  युद्ध भीषण  वहाँ , मानसिंह  को‌  हार |
"केसर दे" ने तब   किया  , जौहर  अंगीकार ||78

दासी के सँग नारियाँ , ' केसर दे' के साथ |
जौहर करने  कूँदती ,तिलक लगाकर माथ ||79

कैसे तब जौहर  किया , सुनने  मिलते  गीत |
'केसर दे' बलिदान की , जिसमें   जौहर रीत ||80

इस   घटना के  बाद   ही ,  देखा  गढ़कुंडार |
बुंदेली   साम्राज्य  का , यहाँ  हुआ   विस्तार‌ || 81

कथा दूसरी भी मिली , वह भी लिखता बात  |
जिसके आँचल में छिपी, भरी कालिमा रात ||82

'वरदाई' के बाद में  ,   हुरमतसिंह  का नाम |
अंतिम शासक ही हुए , खाँगर कुल अविराम ||83

हुरमत सिंह  खँगार  थे  , जब  राजा  कुंडार |
तभी  महोनी  राज  से ,    आए     सूबेदार ||84

थे   बुंदेला   वंश   के  , योद्धा सोहन  पाल |
पर वंचित थे राज से , मन  में  रखें  मलाल ||85

बीरपाल  भाई बड़े ,   थे सोहन  लघु भ्रात |
पर योद्धा के बाद भी , उसे  न  चाहें तात ||86
 
राजा हुरमत से कहे , मुझे   मिले  अधिकार |
बनूँ  महोनी   राज  का  , असली  सूबेदार ||87

बनी  मित्रता नींव तब , सोहन  पाते  राज |
काल चक्र के पर यहाँ , बने ढले  थे साज ||88

चले  शादियाँ  रीतियाँ ,  आपस  में  व्यवहार |
परिजन सोहनपाल के , खा  बैठे  तब  खार || 89

हेमवती   सोहन   सुता , हुरमत  सुत  का अंश  |
नागदेव  को   ब्हायने ,     आड़े    आया  वंश  || 90

कोई   कहे  समान  हम , कोई  कहता उच्च  | 
टकराहट में  शूरता , खाई   थी   तब  गच्च ||91

अपने -अपने  वंश    पर ,   दोनों   करते  मान  |
छाई थी तब कालिमा , जग को  इसका  भान ||92

कारण  दावे  हैं  अलग , अपनी -अपनी बात |
नहीं कल्पना कर सकी , उस दिन काली रात ||93

हुरमत- सोहनपाल   में ,   जीत   गई  थी  घात |
वध वरात परिणाम था , सिहर उठी   थी रात ||94

खाँगर क्षत्रिय  राज का , खाया  सूरज मात  |
बही  खून की धार थी , अक्षय  तीजा   रात  ||95

अधिपति  सोहनपाल थे , अब   राजा  कुंडार |
खाँगर क्षत्रिय   राज्य पर , बुंदेला   अधिकार ||96
 
आगे   का  इतिहास  है , खाँगर कुल  के  बाद |
बुंदेले    कुंडार    से ,     रखते   है    बुनियाद ||97

खाँगर कुल की थी यहाँ  ,मात   गजानन  नाथ |
बड़ा   विरोधाभाष   था ,    बुंदेलो   के   साथ ||98

विन्ध्यवासिनी  मात   है , बुंदेलों    का   धाम  |
बूँद  लहू  की   ही   चढ़ा  , था   बुंदेला   नाम ||99

विन्ध्यवासिनी से कहें  ,   बुंदेला अविराम |
मैया चल  कुंडारगढ़ , तुमकों   करूँ प्रणाम ||100

उड़ी  गिद्ध पर बैठकर ,  माता  तब  अविराम | 
जहाँ विराजी वह जगह  , गिद्धवासनी   धाम ||101

कालान्तर  में जब  हुए , राजा   रूद्र   प्रताप |
छोड़ा  गढ़कुंडार को  , तज   रजधानी  छाप  ||102

माह रहा वैशाख का  , शुक्ल पक्ष शुभ जान  |
पंद्रह सौ सन् सात में ,  बसे   ओरछा   आन ||103

(नोट - कुछ इतिहासकारों ने  "पंद्रह सौ सन् सात में " लिखा , तो कुछ ने  "पंद्रह सौ इकतीस में " लिखा है )
कवि नें  दोहे का चौथा चरण , दोनों प्रकार का लिख दिया है )

घटना क्रम कुछ भी रहा , दुर्ग न खोया शान |
वास्तुकार    भी   देखकर , रह  जाते   हैरान ||104
निचले हिस्से का  भवन  , तहखाना का‌ रूप |
लगता   जादूगर    यहाँ ,  बना  गए  है  कूप ||105

दरवाजे   हर मोड़ पर   , भू‌ल   भुलैया   राह |
कोई कहता धन यहाँ , अब भी  पड़ा अथाह ||106

चले गए कुछ लालची , लगा‌ न उनके हाथ |
बुरी नियत के भाव  से , रहे   फोड़ते  माथ ||107

एक कथा सुनते यहाँ , बहुत बड़ा आघात |
धन के लालच में यहाँ , गायब  पूर्ण  वरात ||108

एक जगह से दूसरी , जगह कहाँ  है  पार |
अनजाना तब आदमी , दिखता है लाचार ||109
              
जानकार की हो मदद , निचला तल तब देख |
लगता जैसे स्वप्न की , चलती  है   कुछ  रेख ||110

वापस कुछ आए नहीं , होते   स्वंय  शिकार |
तब से   नीचे बंद है ,   करना   वहाँ  विहार ||111

लेकिन नहीं   निराश हो , दुर्ग   देखिए   भव्य |
आँखें रहें   निहारती , ध्यान   बने   एकलव्य || 112

चारों तरफ विशाल है , सुषमा भू की  शान |
यहाँ   किले   से   देखिए , बड़े  दूर  मैदान || 113


सिंहद्वार  ही भव्य है , लगता है मनुहर  |
ऊँचाई  सब देखते , बीस फीट आकार ||115

सिंहद्वार के सामने , दो दिखते दीवान |
जिनको कहें चबूतरे , लगते आलीशान ||116

परकोटा की देखते , जो आकर दीवाल |
चौड़ाई छै फीट है , बनी   दुर्ग की  ढाल ||117

राजमहल के बाहरी , हिस्से में घुड़साल |
ग्यारह दरबाजे लगे , सौ फिट है हर हाल ||118

सिंहद्वार के बाद ही , दिखे बड़़ी  इक पौर |
जिसको कहते बैठका , मिले  बैठनें  ठौर ||119

दिखे तोपखाना यहाँ , आँगन बड़ा विशाल |
मिले कक्ष कुछ सीड़ियाँ ,भव्य सभी दीवाल ||120

एक बार   आ    देखिए ,  है    सिंदूरी   ताल |
खजुआ बैठक जाइ़ये , मुड़िया महल कमाल ||121
इंतजाम  अब   आधुनिक , हुए  यहाँ  तैयार |
कमरे थे चारों  तरफ‌ , जिनका  हुआ  सँवार || 122

माह दिसम्बर में यहाँ , उत्सव अब  हर  वर्ष |
जुड़कर भी अब आम जन, यहाँ मनाते हर्ष || 123

जग की भागमभाग में ,जब मन  होवे सून |
प्रकृति  निहारें दुर्ग   ‌से , पाए   यहाँ  सुकून || 124

शीतल जल की बावड़ी , कभी न सूखे झील  |
इतिहासों के पृष्ठ पर  , बनी आज भी  मील || 125

नमन शीष फिर कर रहा  , चरण  शारदा  मात |
गौरव  गढ़कुंडार   का , लिखता   जाता   ज्ञात ||126
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

*उपसंहार*
जूनागढ़     गुजरात   में ,  जैन  तीर्थ  गिरनार |
रुद्रदमन अभिलेख सब ,  पत्थर   दिए  उकार ||127

चंद्रगुप्त भी है लिखे , लिक्खे मिले अशोक |
शूर वीर जो लोग है ,  सबकों   दी  है धोक || 128
(धोक =अभिवादन  )

अडिग शिलाएँ  जो खड़ी , उनमें  उभरीं  रेख |
खाँगर भी उत्कीर्ण  है , शिलालेख अभिलेख ||129
खेतसिंह के थे पिता , रुढ़देव   जू नाम |
सोमेश्वर के मित्र थे , जन चर्चा है आम ||130

सोमेश्वर  के  पुत्र  थे , पृथीराज  चौहान |
खेतसिंह की तब रही, पृथ्वी से पहचान ||131

कहते  खांगर   जाति  में  , योद्धा   होते   शेर  |

निर्बल जब चाहें   मदद   , आनें  करें न  देर ||132

रहे  लड़ाकू   लोग यह , युद्ध  कला   रणवीर |
स्वाभिमान ऊँचा रखें ,  ले   अपनी  शमशीर ||133

चार विभाजन  वर्ण के , क्षत्रिय गुण भरपूर |                    
राज  किया  तो   देखते , रहे  सदा‌  है   नूर ||134

शूरवीर  प्रतिबिम्ब  थे , रखते अपनी शान |
एक बात सबसे बड़ी    , नारी का  सम्मान ||135

क्वांरी  माने   बेटियाँ ,   है  देवी   प्रतिमान |
पैर  पूजकर  दे  सदा , उनको भी पहचान ||136

मामुलिया साँझीं   प्रथा , सुअटा  गौनें   गीत |
खाँगर प्रचलित कर गए ,  बेटी हित की  रीत ||137

बहिना  ढिरियाँ ले चले  , भाई रक्षा   रीत |
बहिना-भाई रस्म में , दिखे आज भी प्रीत ||138
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मामुलिया = कन्याओं  द्वारा बबूल की टहनी पर लगे काँटों पर सभी तरह के फूल लगाना , सजाना , पूजन करना , तालाब में विसर्जन करना , व सभी क्रियाओं के अलग - अलग गीत गाना इत्यादि |

संदेश - लड़कियों को शिक्षा दी जाती है कि जीवन में आए कंटको पर भी फूल लगाना सीखो

सांझीं = कन्याओं द्वारा दीवाल/ द्वार पर गोलाकृति में गोबर लगाकर उस पर रंगों से देवी चित्र बनाकर , पूजना , गीत गाना इत्यादि |

संदेश -घर को सदैव देवी जैसा पवित्र मंदिर बनाकर रखना

सुअटा (नौरता) , ढ़िरिया घुमाना  ,विवाह के बाद  गौना का  होना तो सभी जानते ही है

सुअटा = राक्षस का चित्र दीवाल पर बनाकर , नौ दिन सामूहिक रुप से कन्याओं का  उसके सामने रंगीन चौंक पूरना , सजाना इत्यादि |

संदेश - दुष्ट जनों को भी  अपने प्रयास से  प्रसन्न करना सीखों 

ढिरिया= नौरता के अंतिम दिवस  एक छोटे मटके (डबला) में छेद करके उसमें दीपक जलाना , मोहल्ले के हर दरवाजों पर ले जाना , गीत गाना , कुछ भाई रक्षा करते है ,व कुछ उसे फोड़ने की फिराक में रहते है

संदेश - घर मुहल्ले गाँव को अपनी ओर से  प्रकाशित करो 

गौना = लड़की की शादी के  बाद , पहली विदा 

संदेश - बाल्यावस्था में शादी हो जाती थी , कुछ देख समझ नहीं पाती थी , पर वयस्क होने पर गौने में कुछ शादी जैसी रस्म दुवराह होती है , जिससे लड़की आनंद अनुभूति कर सके 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शोषित नारी के मिले , हमें बहुत   इतिहास |
परनारी सम्मान में   , खाँगर  भरें   उजास ||139


अब "केसर दे " कथा , पुन:   लिखूँ   मेैं  हाल |
तुगलक को ललकार कर , दिया युद्ध में ताल ||141

समय   चक्र की  बात  है , गीदड़   घेरें   शेर |
भितरघातियें  जग उठे , करें  नहीं  वह   देर ||142

मात गजानन दर गए , छिड़का उन पर खून |
खाँगर कुल वरदान पर , घायल किया प्रसून ||143
 
समय चैत्र नवरात्र थी   ,  मानसिंह   बलिदान |
होती  "देवल दे" सती  , नहीं   युद्ध  अवसान ||144

सुत   वरदाई सिंह ने ,  थामी  हाथ   कमान |
टूट पड़ा  था  शत्रु  पर , अपना  सीना  तान ||145

तुगलक का साला यहाँ , करता   रहता  खोज |
कैसे  जीते  युद्ध   हम ,  खुश हो शाह फिरोज ||146

कहती ' केसर दे'  यहाँ , दूँगी‌   मैं   बलिदान |
नहीं   मुगल छू   पायगा, मेरे   तन  की  आन ||147

युद्ध चला कई माह तक , हुआ युद्ध का अंत |
भितरघातिए   बन   गए , मुगलों के तब दंत ||148

मुगलों  से  तब  सामना  , युद्ध  हुआ  विकराल |
खाँगर शाका कर उठे , तिलक  लगाकर भाल ||149

(शाका = एक बलिदानी रस्म  , जिसमें पुरुष तिलक लगाकर , मारने या मरने के लिए , युद्ध में निकलते थे )
(स्त्रियाँ "जौहर "करती थी  व पुरुष "शाका " करते थे  )

जौहर 'केसर दे'  करे ,   देख  युद्ध  परिणाम |
मुगल देखते   रह गए  , अपने  सिर को थाम ||150

खाँगर   क्षत्रिय   शूरता , रही  सदा  जाँबाज |
दुश्मन दल पर टूटते , बनें   प्रलय  की  गाज ||151

एक कहावत है सुनी ,  कुछ न बोलें बैन  | (बैन =वचन)
खाँगर से दुश्मन डरे  , जहाँ   तरेरें   नैन  ||  152
तरेरे=क्रोध में  )

रखें एकता यह सभी  ,  खाँड़ा  रखें खँगार |
(खाँड़ा  =तलवार )
दुश्मन  देखें   सामने  , करें  आर या  पार ||153

इनकी इक शाखा बढ़ी , रखकर तेज प्रताप |
जहाँ देखने मिल गई  , पुन:   वीरता   छाप ||154

खाँगर कुल  राजा   हुए , नाम   मैदनी  राय  |
नगर  चंदेरी  राज   की ,  गाथा  रहे  सुनाय  ||155

सन्   पंद्रा   सौ     जानिए , आगे   अठ्ठाईस |
शीत जनवरी माह था  , लड़ा युद्ध यह धीश ||156

बावर सेना घेर कर , जब    बुनती   है  जाल   |
फँस जाते तब  मैदनी  , खाँगर  कुल के लाल  ||157

राणा साँगा का सुनो   , सेनापति   यह  शूर |
शाका करके युद्ध में  , चला  गया  था  नूर ||158

मणिमाला  रानी   प्रमुख , जौहर  अंगीकार |
नहीं हाथ मुगलों लगीं , पावन   रखे   विचार ||159

सौलह सौ क्षत्राणियाँ , जौहर  का   है  लेख |
कई मील से दिख उठी , तब लपटों की रेख ||160
खाँगर कुल योद्धा सभी , समय देखकर फर्क |
फिर जो  भी  राजा  बने , सबसे  रहे   सतर्क ||161

कुछ तो  बापिस  लोटकर , चले गये गुजरात |
इधर -उधर कुछ बस गए ,सहते- सहते  घात ||162

जंगल बसे सुजेन  कुछ , तो  कुछ  राजस्थान |
चले गए हर राज्य में , छिपा   रखी   पहचान ||163
(सुजेन =अशोक नगर का जंगल )

कहने    का   सारांश   है , रहे  सितारे   दूर |
स्वाभिमान घायल रहा , समय बना था क्रूर ||164

जगह- जगह पर फैलकर ,बने रहे खामोश |
फिर आजादी जंग में , इनको आया  जोश ||165

अठ्ठारह     संतानवें  , लम्पू   सिंह  खँगार |
गोरों  को  ललकारता  , दे  पिछौर से मार ||166
गोरों   ने लख शूरता , और   जान इतिहास |
दस अठ  सौ सत्तर बना, किया एक्ट  तब पास ||167
(दस अठ =अठारह ) 

एक  गाँव  में एक  ही ,   रहे   पूर्ण   परिवार |
चौकीदारी   काम  पर , रखकर अपनी  धार ||168

आजादी  के  बाद  ही ,  नष्ट    हुआ   कानून |
सन् बावन में मिल सका , बापिस इन्हें सुकून  ||169

माह  अगस्ती जानिए , है   दिनांक  इकतीस |
मुक्त इन्हें तब एक्ट  से ,  करते    सत्ताधीस ||170

ऊँचा-नीचा जो हुआ ,  समझा समय  "सुभास" |
लिख डाला कुंडारगढ़,   गौरव मय  इतिहास ||171


यही समय का खेल है ,  शूर  बनें   लाचार |
           पर इतना होता नहीं , सिंघा  बने    सियार ||172

घटना क्रम  सहते रहे  , साहस  हुआ न हीन  |
स्वाभिमान खोया नहीं  , रहकर भी  आधीन ||173

हस्ती  भी मिटती नहीं  , जो होते  बलवीर |
आ जाती पर म्यान में , समय देख शमशीर  ||174

नहीं प्राप्त कुछ भी हुआ , इन्हें  बनाकर दास |
कायरता सीखें   नहीं , खाँगर कुछ भी खास ||175

स्वाभिमान जिंदा रहा , अब भी   है पहचान |
मातु  गजानन  पूजते  , रखते  अपनी  शान ||176

छीन सका कब कौन है , रग में बहता  खून |
गुणीं  लिफाफा देखकर , पढ़   लेते मजमून ||177

अब भी है यह  साहसी , कायरता  से   दूर |
दूर   नहीं  है  वीरता , अब   भी है यह शूर ||178

फैल गए यह सब जगह , यथा-तथा है नाम |
खेंगर - राय - नकीब है ,मंडल - मिर्धा  राम ||179

कुछ लिखते परिहार है , लिखें जडेजा  बोध |
कितने हैं अब  नाम भी ,हुआ न मुझसे  शोध ||180

कलम हमारी पूछती   , क्या   आया  वरदान |
गौरव  गढ़कुंडार   का , लिख   पाया  सम्मान ||181

लिखने इस इतिहास को , चुना गया जो छंद |
दोहा   इसका   नाम  है‌ , जो   देता   आनंद ||182

कृपा  आपकी  शारदे , करता पुन:   प्रणाम |
हाथ जोड़ सबसे कहूँ ,   जय- जय सीताराम ||183
 
भूल- चूक की लेखनी , माता    करना  माफ‌  |
मिला हमें इतिहास जो , लिखा काव्य यह साफ || 184

नहीं किसी से राग है ,   नहीं  द्वेष  का  खेल  |
कलम रखे  इतिहास से , लिखने को बस मेल ||185

नमन - नमन है   फिर  नमन , शारद  बारम्बार |
जो लिक्खा इतिहास पढ़‌ , सभी  करें  स्वीकार || 186🙏
©® लेखक - ✍️ सुभाष सिंघई एम० ए०
( हिंदी साहित्य साहित्य , दर्शन शास्त्र )
निवासी - जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म० प्र)
सम्पर्क सूत्र:--० 9584710660
‌~~~~~~ ~~~~~~~~~~~
प्राप्त शुभकामनाएँ, 
लेखक सभी का हार्दिक अभिनंदन करता  है 💐💐🌹
~~~~~~~~~~~~~~
छंद महल समूह के अध्यक्ष एवं छंद महल हिंदी ई पत्रिका के सम्पादक आदरणीय सुरेन्द्र कौशिक जी गाजियाबाद से प्राप्त शुभकामनाएँ 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आदरणीय आशाराम वर्मा " नादान" जी  बुंदेली कवि
  पृथ्वीपुर जिला निवाड़ी ( मध्य प्रदेश ) जी का
बंधुओ!पावन बुंदेली माटी के ग्राम जतारा जिला टीकमगढ़ मध्य प्रदेश में जन्में विद्वान साहित्य मनीषी श्री सुभाष सिंघई जी किसी परिचय के मुहताज नहीं  हैं। श्री  सुभाष जी ने हिंदी ई पत्रिका " "गौरव गढ़कुंडार" में इतिहास को  बहुत ही सहज,सरल,मनोहारी भाषाशैली से  दोहा छंद लिखे हैं । सुभाष जी का इतिहास और साहित्य के प्रति जो आत्मिक प्रेम रहा वह आज एक विशाल वट वृक्ष बन कर,अनेकों छंद,हास्य व्यंग के लेखन के साथ -साथ राजनैतिक समीक्षाओं इत्यादि के रूप में पुष्पित और फलित हो रहा है।
      श्री सुभाष जी द्वारा दोहा छंद में रचित "गौरव गढ़ कुंडार"ई पत्रिका पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ,आपने पत्रिका का शुभारंभ गढ़ कुंडार की सिद्ध पीठ गजानन माता एवम बुंदेला राजाओं की कुल देवी गिद्ध वाहिनी और मां शारदे के आवाहन के साथ किया है जो एक श्रेष्ठ रचनाकार की पहचान होती है।
        आपने १८६ दोहा छंद में गढ़ कुंडार का इतिहास,वहां का मनोहारी अभेद्य किले की शिल्प कला एवम अनेक अनजानी विशेषताओं का जो उल्लेख किया वह मेरी दृष्टि में स्तुत्य एवम् प्रशंसनीय है। महराजा खेत सिंह जी के बल और पौरुष का बखान करते हुए दोहा क्रमांक ३४ देखा जा सकता है। दोहा --
अतुलित ताकत के धनी,योद्धा वीर खंगार।
पत्थर को भी चीरती, खेत सिंह  तलवार ।।
इसी प्रकार दोहा क्रमांक ३५ में खंगार कुल के रण बांकुरे महराजा खेत सिंह जी के बारे में रचनाकार कहता है 
कंधे जिनके खंभ से, छाती रही विशाल।
सिंहों  जैसा बल रहा, हाथी जैसी चाल ।।
ये महराजा खेत सिंह जी की प्रतिष्ठा में समर्पित दोहे सराहनीय हैं।
       कवि गढ़ कुंडार के इतिहास के पन्ने पलटते -  पलटते खंगार वंश की लोक कथाएं,लोक गीत,रानियों के द्वारा किया गया जौहर आदि तमाम रिबाजों के साथ -साथ नारी की रक्षा एवम् कन्या पूजन का भी उल्लेख करना कवि नहीं भूलता है।जो एक कवि,रचनाकार, साहित्यविद का मूल धर्म होता है ,जो सुभाष जी ने अपनी  कृति गौरव गढ़कुंडार में भली भांति प्रस्तुत किया है।मुझे यह कृति पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि रचनाकार ने अपने मन और बुद्धि कीं खिड़कियां  खोल कर जो इस "गौरव गढ़ कुंडार "ई पत्रिका की रचना की है वह जन -जन के ह्रदय में अपनी गहरी छाप छोड़ती हुई अमरता को प्राप्त होगी।
     मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूॅं कि आपकी कृति और आप इतिहास के गगन मंडल में ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान हों।
          इसी शुभकामना के साथ   - दोहे
  कवि सुभाष की कलम से, होता यह आभास ।
  गौरव गढ़ कुंडार " का , अमर  रहे  इतिहास।।
  गागर में  सागर  भरा ,  कर  सम्पूर्ण  बखान।
  अद्वतीय हो जगत  में , कहता  कवि "नादान" ।।
                              
                         शुभेच्छु      
            आशाराम वर्मा " नादान" बुंदेली कवि
                पृथ्वीपुर जिला निवाड़ी ( मध्य प्रदेश )
               दिनांक २६/१०/२०२२
                   फोन नं .9584804904
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Comments

Popular posts from this blog

https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें || "आदिनाथ गाथा "( अञ्जनेय छंद में )16 मात्रा, 11 वर्ण एवं जैनागम के स्वर (विभिन्न सृजन )

छंद महल , मनमोहन छंद विशेषांक माह फरवरी 2023 , अंक 22 ,_ बुक चित्र पर क्लिक करें