छंद महल , मनमोहन छंद विशेषांक माह फरवरी 2023 , अंक 22 ,_ बुक चित्र पर क्लिक करें
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6 - ब्लागडाट काम पर यह पत्रिका है हीं 💐
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भवदीय
सम्पादक मंडल
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 1 🎈
1-अनुक्रमणिका
2- सम्पादकीय
3- शारदे वंदना श्यामराव धर्मपुरीकर ,गंजबासौदा,विदिशा म.प्र.
8- आर के प्रजापति " साथी" जतारा
9- सुनील शर्मा "आकाश " नीमराना
16-सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर
19-अशोक मिश्र 'अनन्त' बाँदा यूपी
21- हरिओम श्रीवास्तव -भोपाल
24 संजीव नाईक इंदौर
29- राजीव नामदेव " राना लिधौरी"
30- धर्मपाल धर्म नीमराना
31-पंकज शर्मा "तरुण ".
32- रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार
36-जया शर्मा
37- डॉ. रजनी अग्रवाल "वाग्देवी रत्ना"वाराणसी (उ. प्र.)
42-निशि अग्रवाल
43 - बृजेश सिन्हा सागर
48-महेन्द्र प्रसाद दुबे "अमन " भदोही
49 गोकुलप्रसाद यादव "कर्मयोगी" (टीकमगढ़ )
53 - जे पी मधुकर
59-सुशील सरना
61-प्यारेलाल साहू
65- डा० सरिता गर्ग ' सरि' गाजियाबाद
67 - विनोद शर्मा पिपरिया म० प्र०
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सम्पादकीय 🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 2 🎈
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 3 🎈
🍒💐जय माँ शारदे 💐🍒
मनमोहन छंद पर आधारित मुक्तक:-
शारद माता, नित्य नमन।
शुभ मंगल वर, भाव गहन।
कृपा आपकी, मिले सहज -
अनुपम अद्भुत, करूँ सृजन।
स्वागत नूतन, नई पहल।
आओ सीखें, छंद नवल।
मनमोहन नव, करें सृजन -
अभिनंदन है, छंद महल।
एवं 👇
मनमोहन छंद पर आधारित गीतिका:-
प्रभु की सुंदर, गहूँ शरण।
फेरा मिटता, जन्म-मरण।
कृपा आपकी, मिले सहज,
भवसागर के, पार तरण।
करना नित ही, कर्म सरल,
दानी तो बस, वीर करण।
देना दाता, बुद्धि सहज,
दोषों का हो, नित्य जरण।
सपने जागें, सदा, हृदय,
कर्तव्यों का, करूँ वरण।
मिले कर्म से, त्राण सदय,
करते प्रभुवर, उदर भरण।
जय-जय प्रभु की, सदा नमन,
करुणा - सागर, गहूँ चरण।
👇
मनमोहन छंद पर आधारित मुक्तक:-
अरुणाचल से ,सूर्य उदय।
चलती पुरवा,पवन मलय।
जीवन बीते, कष्ट हरण-
सपने देखे, हृदय निलय।
रवि फैलाता, भोर किरण।
शंकर के कर, स्पर्श चरण।
जीवन देखे, सुखी सपन -
मन का हो अब, तमस हरण।
निर्धन असफल, नयन सजल।
शोषण करते, धनी सबल।
पंछी कलरव, हर्ष हृदय-
करें काम सब, मंत्र सफल ।
सभी लगाएं, वृक्ष सघन।
खिलता हर पल, यहाँ चमन।
जीवन सुंदर, हँसी अधर-
देश चाहता, आज अमन।
👇
मनमोहन छंद पर आधारित मुक्तक:-
मन में जगते, भाव सदय।
सपने सुंदर। , जगें हृदय।
लगता अनुपम, आज जगत-
हुआ सभी का, भाग्य उदय।
हरे-भरे हों, वन उपवन।
हरियाली हो, खूब सघन।
प्रमुदित सारा, दिखे जगत-
शाखों पर अब,खिले सुमन।
👇
मनमोहन छंद पर आधारित गीत:-
विधान- 8,3+3(नगण)
गाते भँवरे, सभी मगन।
बासंती यह, नवल सृजन।।
सरसी सरसिज, कमल सदल।
बंद हुआ अलि, प्रेम अटल।
गली-गली में, गीत मधुर -
भाव छुपाकर, नयन सजल।
भ्रमर करे यह, नव गुन-गुन।
बासंती यह, नवल सृजन।।
इतराते ये, मस्त सुमन।
बदला सबका, चाल- चलन।
मदमाते ये, उड़ें भ्रमर -
प्रकृति-नियति को, सदा नमन।
बासंती यह, नवल सृजन।।
कोयल गाती, स्वर मनहर।
भोर काल में, बजे गजर।
शीत काल का, घटा असर-
सूर्य -रश्मियां, हुईं प्रखर।
जीवन होता, खुश जन-मन।
बासंती यह, नवल सृजन।।
👇
बहे जिंदगी, प्रेम विरल।
बने जिंदगी, प्रेम महल।।
नव अभिनंदन,प्रेम नवल।
सादर वंदन, प्रेम धवल।
कहे जिंदगी, प्रेम अटल।
बने जिंदगी, प्रेम महल।।
ढाई आखर, प्रेम सुमन।
राधा मीरा, प्रेम मगन।
पिये जिंदगी, प्रेम गरल।
बने जिंदगी, प्रेम महल।।
पारिजात मन, प्रेम महक।
हृदय परिंदा, रहा चहक।
आज जिंदगी, प्रेम पटल।
बने जिंदगी, प्रेम महल।।
धरा गगन, प्रेम खलक।
अधर तराना,प्रेम फलक।
खिले जिंदगी, ,प्रेम कमल।
बने जिंदगी, प्रेम महल।।
👇
गौरीशंकर, सुखद मिलन।
सुंदर मिलते, धरा गगन।
प्यास बुझाए, गंग सजल।
धारण करते, कंठ गरल ।
महाशिवरात्रि , पर्व नमन।
अहोरात्र ये, जगें नयन।
अभिषेक करें, सब अविरल ।
बहती गंगा, यह कल-कल।
महाकाल की, हो जय-जय।
करना प्रभुवर, सदा अभय।
जय शिव शंकर, गहॣँ शरण।
सदा आपके, चरण वरण।
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🍒💐शारदे वंदना💐🍒
मात् शारदे तुझे नमन |
रहे वतन में सदा अमन ||
मन से निकले यही कथन |
भारत हरदम रहे चमन ||
माता तेरा करूँ भजन |
चरणों में नित रहूँ मगन ||
पूजा तेरी करे कलम |
छाए गहरा निकट न तम ||
वीणाधारी वस्त्र धवल |
पावन तेरे चरण कमल |
छंद रचूँ मैं सदा नवल |
कह सुभाष अब दास चपल ||
👇
अच्छी होती , नहीं कलह |
लोग लड़े भी, बिना बजह ||
अपना-अपना , कहें कथन |
खुद ही अपना , करें नमन ||
बनते जग में , सभी सरल |
भरें हृदय में , खूब गरल ||
नहीं पराया , करें सहन |
मन में रखते , सदा जलन ||
संत सदा ही , निर्मल जल |
उनके होते , सुंदर पल ||
राग द्वेश से , दूर वचन |
अमरत उनके , सदा कथन ||
👇
अधिकारों का , जहाँ हनन |
उन्नति करता , नहीं वतन |
यश उन्नति का , जहाँ बिगुल |
देश बने वह , सदा मुकुल ||
आर पार की, बात प्रखर |
आगे पीछे , नहीं जहर ||
सत्य सदा ही, करे चमक |
पुष्प छोड़ते , सदा महक ||
आज सामने , छंद महल |
करता नूतन ,सदा पहल ||
मित्र जुड़े सब ,करे सृजन |
चिंतन करते , करे मनन ||
👇
खल करता है , जहर वमन |
कुढ़ता रहता , रखे जलन |
ज्वाला भीतर , रखे दहक ~
उसका होता, नहीं शमन ||
जो होती है , बात सहज |
दुर्जन खाएं , वहाँ मगज |
बात घुमाता , करे चुभन -
बिन पानी का , दिखे जलज |
बात निराली , दिखे अलग |
नहीं सत्य से ,कभी बिलग ||
दर्शन जिनका सत्य सहज -
उनका करता , दर्शन जग |
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🍒💐श्रीगणेश वंदना💐🍒
लम्बोदर हे, उमा सुवन ।
मंगल दायक, सिद्धि सदन।
एकदन्त हे , शुभ्र वदन ।
काव्य दोष तुम, करो शमन ।१।
गणपति कर दो, शुद्ध सृजन ।
दो तुम सुन्दर , शब्द चयन ।
देश भक्ति उर , करो उदय ।
शान्त चित्त हों, लोग अभय ।२।
सर्वोपरि हो, देश अमन ।
गणपति तुम दो, मधुर वचन ।
भली सभी की, करो लगन ।
रहे न अन्तस, अल्प जलन ।३।
गणपति का हम, करें मनन ।
स्वीकारो तुम , दास नमन।
मोदक प्रिय हे, विघ्न हरण ।
कर दो कविता , मधुर श्रवण ।४।
👇
सरस्वती माँ, तुम्हें नमन ।
कर दो उत्तम, छन्द सृजन ।
देश भक्तिमय, लिखे कलम ।
उठें देश के, युवा कदम ।१।
विकसित हो सब , गाँव नगर ।
हो भविष्य की, शुभ्र डगर ।
मनोकामना , करो सफल।
सार्थक कर दो, शिल्प सरल ।२।
हन्स वाहिनी, शुभ्र वसन ।
वीणा धारी, रम्य वदन ।
माला कर में , हेतु जपन ।
पुस्तक धारे, हेतु पठन ।३।
कुन्द पुष्प सम, श्वेत बदन ।
हिम सम उत्तम,अङ्ग कलन ।
आसन बैठी, अम्ब कमल ।
है तुषार सी, बदन धवल ।४।
ब्रह्मा अच्युत, ध्यान धरत ।
शिव शनकादिक, विनय करत ।
हम अज्ञानी, करें विनय ।
प्रचुर शक्ति दो, करें विजय ।५।
👇
आधार छन्द मनमोहन मात्रिक ×२=,महामनमोहन छंद
अठकल +त्रिकल +नगण ×2
समान्त- अन,अपदान्त! गीतिका
सबसे प्यारा, हमें वतन, हम करते हैं , इसे नमन ।
देश करेंगे , अधिक प्रखर ,योजित करके, यज्ञ- हवन । १।
रहना हमको ,मिलन- जुलन , से स्वार्थों से ,सदा अलग ।हमें लगाना ,पौध हरित, जो दे छाया, गुणित- फलन ।२।
जाति भेद से ,रहें विलग, राष्ट्र धर्म हम, करें ग्रहण,
अब तो हमको, गरल वमन, हित करना है,सर्प यजन ३।
थाली - बैंगन ,सदृश मनुज, जो हो जाते, इधर -उधर,
हमें मिटाना, वक्ष उरग, करना होगा, शत्रु दहन ।४।
करना हमको, पूर्ण सपन ,वलिदानों का,घटित स्मरण,
शक्ति भक्ति के,मार्ग उभय, अपनाते हम, सत्य कथन ।५
कुन्तल सुन्दर, रम्य -वदन ।
रूप राधिका, सदृश -मदन ।
राधा बसतीं , कृष्ण- हृदय ।
राधा -केशव , पुण्य प्रणय ।१।
राधा मोहन, प्रीति- अमर ।
मोक्ष धाम की, सरल- डगर ।
है अकाम की, ज्योति- प्रखर।
पावन गङ्गा, सदृश- लहर ।२।
देख राधिका, कृष्ण -मगन ।
फुल्लित उर का, हुआ सदन ।
राधा माधव, वंद्य -उभय ।
विनय किये हो, भाग्य -उदय ।३।
राधा -माधव ,प्रकृति -सृजक ।
पी लें हम युग, चरण -उदक ।
पाप नष्ट की, युक्ति -सरल ।
नाशक भव के, सकल -गरल।४।
आस्था दात्री , भक्ति-अचल ।
कृष्ण भक्ति दे, हृदय - प्रबल ।
कर्म करें हम, त्याग फलन ।
फल देंगे हरि, वेद -कथन ।५।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _6 🎈
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शुभ कर्मों की करें पहल।
तब ही होगी खुशी चहल।।
दुख जाएंगे दूर टहल।
होगी सुख की भोर नवल।।
🌺🌺🌺
कल फिर होगी नई सहर।
मिट जाएगा दुष्ट कहर।।
आतंकी मिट पियें जहर।
तब खुशियों की बहे लहर।।
देखो मौसम रहा बदल,
अब झीलों में खिले कमल,
आया बसंत करो नमन~
वस्त्र न छोड़ो रहो संँभल।
🌺🌺🌺
उपवन में खिल रहे सुमन,
कुहरे की कम हुई घुटन,
बादल भी अब रहे भटक~
सर्दी की घट रही चुभन।
👇
अर्थव्यवस्था हुई तरक।
सबसे आगे गई सरक।।
दुश्मन का दिल गया धड़क।
कष्टों पर भी पड़ा फरक।।
🌸🌸🌸
शत्रु देश दिल धक धक धक।
हिंद तरक्की चक चक चक।।
देश बना मम सुखी बहुत।
शत्रु देश हैं दुखी बहुत।।
👇
#मनमोहन छंद त्रयी
डटे रहो तुम वीर अथक।
शत्रु न जाए इधर फटक।।
हुए दुष्ट हैं अधिक प्रबल।
गरिमा अपनी रहे धवल।।
🇳🇪🇳🇪🇳🇪
दुश्मन देते रहे चुभन।
अब वीरो! यह मिटे चलन।।
दुश्मन की दो नाक रगड़।
उनकी बदलो सोच झगड़।।
🇳🇪🇳🇪🇳🇪
कभी न उनके उठें नयन।
भारत मांँ का खिले चमन।।
सदा रहे तब अमिट अमन।
देश प्रथम है उसे नमन।।
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गीतिका आधार::-- सार छंद १६ १२ पर यति
चरणांत व पदांत गुरु गुरु
करें सामने मीठी बातें, छुरी पीठ में मारी।
काम कत्ल का करें निशा में, दिन में वेश पुजारी।।
सारे काले धंधे करते, रहते श्वेत वसन में।
ठाठ गुरू के रंग महल में, शिष्य परोसें नारी।।
कहीं किसी अबला की अस्मत, से सारे ये खेलें।
फिर मुँह नहीं खोलती अबला,डर जाती बेचारी।।
सारे नेता, पूर्ण प्रशासन, बैठे आंँखें मींचे।
कैसे खोलेंगे ये आंँखें, ये भी हैं व्यभिचारी।।
इज्जत मुश्किल आज बचानी, हर नारी डरती है।
शीतलता है नहीं भाड़ में,चहुँदिश अनल पसारी।।
👇
सबके रहते वे घट घट।
ढूंँढे बाहर मन नट खट।।
खोज उन्हें अंदर झट पट।
सुख अनुभव की हो खट खट।।
--::::--
तेरा प्रभु तेरे संँग संँग।
बसा हुआ तेरे हर अंँग।।
इन नयनों से नहीं दरश।
दिव्य ज्योति से दिखे सरस।।
--::::--
पथ दिखलाए वह हरदम।
रोक रहा वह गलत कदम।।
सत्य मार्ग को चुनकर चल।
हो जाएंँ सब मुश्किल हल।।
--::::--
मिले तुझे फिर चैन अमन।
पुष्प खिलेंगे हृदय चमन।।
होठों पर मुस्कान विमल।
हों दुश्मन भी सभी विफल।।
👇
मेरी राहें गईं बदल।
दिल मेरा है गया मचल।।
हुआ मान का बहुत शमन।
छोड़ दिया शुभ चाल चलन।।
--::::--
छोड़ चुका मैं सभी शरम।
बदल दिए हैं सभी करम।।
झोंक दिया व्यवहार अगन।
अब मैं चाहूँ चैन अमन।।
--::::--
सीने में जब जले अगन।
चल पड़ता हूँ दिशा पतन।।
क्रोध अगन में जले बदन।
तब सिर धुन कर करूंँ शमन।।
--::::--
जग में पूरित बहुत कलुष।
खड्ग न काटे नहीं धनुष।।
आज बना मैं भी समतर।
जहर काटता आज जहर।।
--::::--
ज्ञान बांँटता मैं हरदम।
कहीं किसी से स्वयं न कम।।
पोल खुली आँखें तब नम।
अब समझा मैं महा अधम।।
--::::--
दम्भ नहीं करना पल भर।
प्रभु की है हर दिशा नजर।।
देखे सब के सभी करम।
याद रखो सब छोड़ भरम।।
👇
सिया विदाई करें जनक।
देवों को जब पड़ी भनक।।
लेकर आए पावन रथ।
पुष्प बिछाए हैं हर पथ।।
--::::--
सखियांँ रोती बिलख-बिलख।
राम चन्द्र जी रहे निरख।।
द्रविभुत होते सब मन तल।
मुश्किल से सब रहे संँभल।।
--::::--
सीता की छवि है मनहर।
नयन सिया के झुके मगर।।
महि को महिजा रही निरख।
रखती है पग परख-परख।।
--::::--
दशरथ नंदन बड़े चपल।
देखें सिय को मचल-मचल।।
नेह रहा है बढ़ पल-पल।
मधुरिम है ब्रह्मांड सकल।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 7 🎈
कविगण करते,चहल-पहल।।
लिखते हैं ये , छंद नवल।
जैसे चमके, स्वच्छ धवल।।
छंद ज्ञान का ,यही पटल।
रहे नियम पर, खूब अटल।।
लोग लगाते, यहाँ अकल।
मन से सुन्दर,भाव निकल।।
छंद कार का ,छंद सृजन।
लिखते होकर, खूब मगन।।
नहीं भेद हो, नहीं जलन।
भाई लिखते, लिखें बहन।।
रहे यहाँ पर,अमन-चमन।
सबको करता,मंच नमन।।
छंदो का बस,मात्र चलन।
लिखते मात्रा,देख कलन।।
मनमोहन यह, छंद रतन।
आठ और छ:, रुके पतन।।
चरण अंत में ,मात्र नगण।
कभी न आए,रगण जगण।।
👇
मनमोहन छंद , 14 मात्रा भार ( अठकल-त्रिकल -नगण)
मनमोहन छंद आधारित "गीतिका"
-------------------------------------------
कष्ट बहुत माँ, किया सहन।
दिया मुझे जो, मातु जनन।
खूब निभाई, तुने धरम,
देख गर्भ में, फिर बचपन।
बड़ा किया है, बना युवक,
खून पसीना, दूध बदन।
कभी न आया, है पतझड़,
माँ के रहते, रहा चमन।
सभी वक्त था,चहल-पहल,
पाला-पोसा, किया जतन।
छोटा पौधा, अब तरुवर,
माँ के कारण, बढ़ा वजन।
मांँ करती थी, बहुत फिकर,
मातु चरण में ,करूँ नमन।
👇
मनमोहन छंद आधारित "गीत"
••••••••••••••••••••••••••••••••••
वायु प्रदूषित , यहाँ जहर।
चलो गाँव अब, छोड़ शहर।।
हरियाली है , हरी फसल।
बहती नदिया, जल अविरल।
ताल तलैया , झील नहर।
चलो गाँव अब, छोड़ शहर।।
बाग बगीचे , वन उपवन।
हरित धरा है, स्वच्छ गगन।
बैठ नदी तट, देख लहर।
चलो गाँव अब, छोड़ शहर।।
भाई चारा, प्रेम मधुर।
मदद करें सब, नहीं गुरुर।
उठ जाते हैं, सुबह पहर।
चलो गाँव अब,छोड़ शहर।।
शहरों में जो, बहे पवन।
अधिक प्रदूषित,लगे जलन।
पड़े स्वास्थ पर, खूब कहर।
चलो गाँव अब,छोड़ शहर।।
गंदा पानी, शोर अधिक।
रुके न पहिया,यहाँ तनिक।
भाग रहे हैं, नहीं ठहर।
चलो गाँव अब,छोड़ शहर।।
जिसका करते,अधिक जतन।
देकर अपना ,तन मन धन।
ईश्वर से भी, करे विनय,
फिर भी होता ,दिखे पतन।
कुदरत के कुछ,खेल चलन।
समझ न पाए, मानव मन।
अहंकार में, भूल डगर,
स्वयं उजाड़े, वह उपवन।
करे भरोसा, जो खुद पर।
कभी न देखे, इधर-उधर।
ईश्वर उसके, रहें सदन,
विष पीकर भी, बने अमर।
जब मन में हो,उथल-पुथल।
बुरे काम में, लगे अकल।
पावन कैसे, बने बदन,
छिड़के गंगा, लेकर जल।
👇
महा मनमोहन छंद (त्रिकल+अठकल+नगण)
गर्मी का कुछ दिखा असर, बस ठंडी की तनिक कसर।
दीन गरीबों लिए बहुत,---------गर्मी में हो गुजर बसर।।
गाँव-गाँव हर शहर शहर,-----खेत ताल या नदी नहर।
जहाँ कहीं भी रहे श्रमिक,------ ठंडी कुहरा बने जहर।।
गर्मी में ही कटे फसल,------- मजदूरों का यही असल।
काट पीट कर और मसल,---रोटी सबको भले अबल।।
बढ़िया मौसम रहे गरम,------सड़क किनारे गए ठहर।
इनका अपना एक धरम,-----उठ जाते हैं सुबह पहर।।
चले खेत में कसे कमर,-----श्रम से डरते नहीं तनिक।
मेहनत करते खूब अधिक,भारत के ये सभी श्रमिक।।
पर्वत ऊँचा उच्च शिखर,------लोग कांपते हैं थर थर।
चढ़ जाते हैं ये उसपर,------करें काम को बड़े निडर।।
देश चले इनके बल पर,------पूल बने या बने सड़क।
सीवर नाली रहे गटर,------घुस जाते हैं बिना धड़क।।
वीर सिपाही यही श्रमिक,लाल किला से ताज महल।
मंदिर मस्जिद ईश्वर घर,इनकी मेहनत का यह फल।।
घूस न पाते भेद बहुत,-------बाहर रहते इधर-उधर।
पाखंडी का भ्रष्ट धरम,-------ढाते उनपर दुष्ट कहर।।
जो करता है मेहनत श्रम,कहते उसको नीच अधम।
ऐसे आशा राम रहम,---तनिक न आती इन्हें शरम।।
👇
दिनांक-11-02-2023
मनमोहन छंद आधारित "गीत"
8+6, 14 मात्रा (अठकल+त्रिकल+नगण)
चली गाँव से, ज्यों पनघट।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
लिए घड़ा जल,चली भरन।
संग सहेली,---सब बन ठन।
इठलाती कुछ,अटक मटक।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
भोर सुनहरी,--लाल किरण।
मृग नयनी पग, तेज हिरण।
पहुँच गईं वे,----सरवर तट।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
सुन पायल की,छम छम छम।
पनहारन अब,----करो रहम।
व्याकुल करता,--सुन्दर लट।
पीछे चलते, ---कुछ नटखट।।
सुनो सुंदरी, जरा न डर।
कहाँ देखती, इधर- उधर।
राह दिखा दो, गया भटक।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
प्यास लगी है, शुष्क अधर।
देख जरा तुम ,एक नजर।
हमें पिला जल,अब झटपट।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
बोली ग्वालन ,सुनो मदन।
यमुना जी में,बुझा अगन।
चलो यहाँ से,अब सरपट।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
कृष्ण हमारे, तन मन धन।
वही हमारे , राज रतन।
नहीं खोलना, घूँघट पट।
पीछे चलते,कुछ नटखट।।
बजी बाँसुरी, अमन चमन।
देख गोपियाँ, हुईं मगन।
कहे श्याम अब,देख पलट।
पीछे चलते, कुछ नटखट।।
👇
महामनमोहन छंद (8+6)×2, 28 मात्रा
अठकल+त्रिकल+नगण
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धरती पीली नील गगन,------सरसो फूला खेत मगन।
बहे बसंती मंद पवन,----- -महुवा मादक मस्त चमन।।
फागुन आया आलस तन,----उन्मादी अब उठे लहर।
उन्मत भौंरे इधर-उधर,------फूलों पर ये,ठहर ठहर।।
हरे भरे हैं वन उपवन,-----पुलकित पौधे कली सुमन।
ऋतु बसंत की है हलचल,--नृत्य करे मन हृदय मदन।।
पंछी गाते गीत चहक,-------सभी दिशाएं गई महक।
नई नवेली दुल्हन मन,------गर्म तवे सा दहक दहक।।
पागल सा बन चले भ्रमर,----फागुन में ये गए सनक।
गुंजन करते डगर डगर,--लग जाए बस कहीं भनक।।
मास सुहाना सुनो सजन, आ जाओ अब छोड़ शहर।
हरा भरा है गाँव नगर,--------तुम्हें बुलाए नदी नहर।।
बैठ किनारे शाम पहर,--पवन चले जब सर सर सर।
कितना सुन्दर था वह पल,----लहरे खेतों में अरहर।।
आज पुराना है बरगद,----इसके नीचे वह कण रज।
जहाँ ठहरते थे हम सब,बगल ताल में खिले जलज।।
रंग बिरंगी सूर्य किरण,-----लगती प्यारी खूब सुबह।
गौरेया भी फुदक फुदक,--बैठा करती जगह-जगह।।
आम्र मंजरी हर तरुवर,पल्लव इनपर नव किसलय।
मादक है यह मास सरस,--करे सुगंधित लगे मलय।।
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गीतिका आधार छन्द -मनमोहन छन्द
समांत-आत पदांत-न कर्
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बेमतलब की , बात न कर।
अपनों से छुप, घात न कर।
काम सभी कर, देख समय,
बैठ फालतू, रात न कर।
लोभ हमेशा, रहे दुखित
सत्तर को तू ,सात न कर।
मूर्ख शराबी, पागलपन,
दूर रहे कुछ ,ज्ञात न कर।
लक्ष्य भेद तब, लगे सरल,
डाल-डाल फिर ,पात न कर।
रख सन्तोषी, शुद्ध जिगर,
किसी पेट पर,लात न कर।
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गीतिका आधार छन्द-मनमोहन छन्द
समांत-आना, पदांत-कायरपन
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हीन बताना कायरपन।
पीठ दिखाना कायरपन।
जोश भरा यदि,उत्तम कर,
दीन रुलाना, कायरपन।१
ग्रंथ ज्ञान शुभ,दायक सब,
आग लगाना कायरपन।२
कभी न जीते,शत्रु समर,
अश्रु बहाना,कायरपन।३
अपनी गति से, चले समय
व्यर्थ गँवाना, कायरपन।४
पता नहीं मत करो बहस,
कमी छिपाना,कायरपन।५
स्वार्थ सिद्ध में,खपा न तन,
ढोंग रचाना, कायरपन।६
कर्म धर्म से,बनो सुदृढ़,
द्वेष बढ़ाना,कायरपन।७
👇
मेघ गरजते,नित्य गगन।
मोर नाचते,सुखद मगन।
पथ देखूँ मैं, थके नयन।
कब आओगे,सुनो सजन।
प्रेम पुजारिन, करे विनय।
दर्शन दो प्रिय ,करो अभय।
जीवन पथ हो, मंगल मय।
सुख से भर दो,द्रवित हृदय।
बहे सुगन्धित, सर्द पवन।
कांप रहा हैं, पूर्ण बदन।
भूल गए पथ, क्यों प्रियतम ?
दिल में पलते, लाख वहम।
कैसे कर लूँ , दर्द सहन।
तन मन में सब,लगी अगन।
पथ कंटकमय,सुनो कथन।
देह त्यागकर, धसूं धरन।
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गीतिका समांत-आरी, पदांत-तुम्हें नमन
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हे त्रिपुरारी, तुम्हें नमन।
भव भय हारी, तुम्हें नमन।
नील कंठ प्रभु,गले गरल,
त्रिपुंड धारी, तुम्हें नमन।
गंग जटा में,त्रिशूल कर,
जय भंडारी,तुम्हें नमन।
सर्प गले में, अति विषधर,
बैल सवारी,तुम्हें नमन।
भाँग धतूरा, प्रिय मनहर,
चढ़े खुमारी, तुम्हें नमन।
शीश झुकाते,सुर मुनि नर,
सब पर भारी,तुम्हें नमन।
डमरू बाजे, डम डम डम,
खुश संसारी, तुम्हे नमन।
औघड़दानी, दो शुभ वर,
जग हितकारी, तुम्हें नमन।
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गर नर सच्चा,और सरल।
लोग पिलाते, उसे गरल।।
तन का लेते,छीन कफ़न।
नित्य सत्य को, करें दफन।।
लूट मार का,बढ़ा चलन।
राह कौनसी, चला वतन।।
जनता सारी,हुई विकल।
सब चीजों की,बिके नकल।।
नारी के तन,अल्प वसन।
प्रेम भाव से,हीन सदन।।
नेताओं के, सभी कथन।
विष शब्दों का, करें वमन।।
रोज उजाड़ें,खिले चमन।
कैसे उनको,करूँ नमन।।
रखो एक यह,देश सतत।
भूलो सारी,बात विगत।।
दीन जनों की,करो मदद।
देकर पैसे, वस्त्र रसद।।
शुभ कर्मों का,करो वरण।
सफल बनेगा, जन्म मरण।।
मात शारदे, चरण कमल।
सेवा करता,रहूँ अटल।।
"आकाश"सदा,चले कलम।
छंद लिखो मत,कभी अधम।।
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झूंठ दम्भ से,युक्त कथन।
मैं कर पाता,नहीं सहन।।
इसीलिए सब,मोड़ वदन।
चले गये हैं,छोड़ सदन।।
कठिन समय में,मित्र कथित।
धोखा देकर, करें व्यथित।।
आँखें मेरी,हुई सजल।
मगर हृदय में,भरा गरल।।
तन का मेरे,करे दहन।
अतिशय चिंता,सोच मनन।।
प्रश्न खड़ा है,एक अदद।
किससे माँगे , आज मदद।।
राहें दिखती,बड़ी कठिन।
काँटे पत्थर,धूल मलिन।।
सुमिरे मैंने,ईश चरण।
किया जीत का,सदा वरण।।
कर लो तुम भी,ईश भजन।
खुशियों से नित,भरे सदन।।
कविता का रस, मधुर तरल।
मन को करता, शुद्ध सरल।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _10 🎈
करता गुरु को,सदा नमन।
अंधकार का,किया दमन।
शिक्षा दी है, बहुत अहम्।
दूर किये हैं, भ्रमित वहम्।
जीवन रखना,सदा चमन।
सत्पथ पर ही,करो गमन।
रखना अपना ,प्रेम-अमन।
याद करो सब ,जन गण मन।
सीधे-सच्चे,मम गुरुजन।
सर्व हितैषी,कह हर जन।
सादा जीवन,मन दरपन।
करें देश पर,सब अरपन।
गुरु अच्छे तो,रहें शरण।
मंगल होगा,पड़ें चरण।
धर्म-कर्म में,बनें निपुण।
भजना चाहे, निगुण-सगुण।
👇
करता जन-मन सदा नमन।
गाते सुन्दर गीत सरल।
उठती मन में पीर तरल।
पीते हम सब शीत जहर।
जलते सारे बड़े शहर ।
कैसे भरते दीन उदर ।
बिगड़ी सबकी नीति डगर।
मौसम सारा गया बदल ।
फूले सरसो चना सरल ।
बहती सर-सर शीत पवन ।
सर्दी करती मीत गमन ।
धरती पहने बसन नवल।
सुन्दर लगता खिला कमल।
बौराया है आम चमन ।
करती दुनिया जिसे नमन ।
👇
आया मौसम यहां रमन ।
भागी सर्दी गयी गलन।
हल्का लगताअभी बदन।
सूर्य देव को करें नमन।
उतरा स्वेटर शाल गरम ।
करते पूजा पाठ धरम ।
करती जनता नीक करम।
मन की मिटती सभी शरम।
लगे सुहानी रात सजन ।
भौंरा गूंजे सुमन सुमन।
बहती सुन्दर मंद पवन ।
खिलते सारे यहां चमन ।
केलि काम का बढ़ा चलन ।
पशु पक्षी सब हुये गरम ।
घटा शीत का सभी गलन।
सभी वियोगी करें जलन।
👇
मीरा दिखती आज मगन ।
दर्शन करती खोल नयन।
कृष्ण मुरारी बने सजन ।
मीरा नाचे छनन छनन ।
मीरा त्यागा राज धरम।
लोक लाज का नहीं करम।
कृष्ण नाम की लगी लगन ।
अच्छा लगता भाव भजन ।
👇
सरस्वती को करें नमन ।
हे मां तम का करो दमन।
खिले देश का सदा चमन।
झूमे धरती और गगन।
भारत का हो नाम जगत ।
साधू सज्जन बने भगत ।
आतंकी का हुआ पतन ।
मरती जनता बिना जतन ।
आटा चावल हुआ खतम।
मारे मारे फिरे खसम ।
मंहगाई में देश भसम।
हे प्रभु इनको मिले रहम ।
👇
बड़ा निराला छंद महल।
देता सबको काम टहल।
करते रचना मान पहल।
नाम कमाते बना ग़ज़ल।
लिखते बढ़िया सभी सरल।
बहती कविता बनी तरल ।
मन को भाते गीत ग़ज़ल ।
मन बहलाते मीत फ़ज़ल।
अष्ट भुजी का, करें भजन ।
करती दुनिया , जिसे नमन ।
देखें सबका , नेह मिलन ।
देती माता , दया रतन।
माता रानी करें रहम ।
बनता सबका तभी करम।
अच्छा लगता , मातु दरश।
बहुत सुहाता चरण परश।
👇
आज जगत में , अर्थ प्रवर।
जिसकी लाठी , भैंस उधर ।
देते सबको , ज्ञान प्रखर।
नहीं सरल है ,आज डगर ।
आज न्याय है छिपा सघन ।
चले अन्याय, खोल बटन ।
लुटती इज्जत बीच सड़क।
फिर भी चलता तड़क भड़क।
मन में आयी , युक्ति सरल ।
सावधान हो , करें चहल ।
मात पिता दें ,सीख अगर ।
बच्चे पकड़े , ठीक डगर ।
लोकतंत्र का , रूप अटल ।
होते नेता , बहुत सरल ।
जीत चलाते , राज मगर ।
लूटेजनता , बीच डगर ।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 12🎈
कैसा आया आज चलन।
अपना दिखला रहे बदन।।
असुरों का हम करें दमन।
बच पायेंगे तभी पतन।।
अधिकारों का जहाँ हनन।
लगे क्रांति की वहीं अगन।।
करना होगा यही मनन।
नई दिशा में करें गमन।।
क्यों किससे हम करें जलन।
नफरत का हम करें दहन।।
लगे ईश से हमें लगन।
अपने भीतर रहें मगन।।
मेघा करते जोर घनन।
गर्मी से अब मिले शमन।।
फसलों से अब खिले चमन।
'हिम्मत' अब तो बुझे तपन।।
👇
गीतिका-
माता चरणों धरूँ कमल।
जीवन मेरा आज बदल।।
जीवन जाये आज सँवर।
दूर रहूँ मैं सदा नकल।।
आँगन मेरे यहीं उतर।
आँखें मेरी हुयी सजल।।
जाऊँ अब मैं बोल किधर।
दंभ मान को हाथ मसल।।
बढ़ते जायें तीव्र कदम।
निरखूँ तेरा रूप असल।।
तेरी मुझ पर रहे नजर।
विद्या धन को कहूँ असल।।
'हिम्मत' करती नित्य नमन।
रोपूँ हाथों नयी फसल।।
👇
बोलो मीठे सदा वचन।
खिला रहेगा यही चमन।।
दूर रहेगी सदा चुभन।
राह बिछेंगे सदा सुमन।।
आओ छू लें नया गगन।
बहती जिस पर स्वच्छ पवन।।
संग उठायें सभी कदम।
खायें सारे आज कसम।।
दूर करो माँ सभी वहम।
करना मुझ पर आप रहम।
पायें हरपल नयी डगर।
रहे लक्ष्य पर सही नजर।।
👇
मनमोहन छंद का द्विगुणित, 14,14 मात्रायें प्रति चरण
गीतिका-
करना इसका सदा मनन, जीवन है अनमोल रतन।
सत्कर्मों से करो सफल, नित उठ करना ईश भजन।।
रखो ध्यान ये तुम हरदम, रहे पास क्यों कभी अकड़।
मिले उसी में करो गुजर, तभी बचेंगे आप पतन।
भीतर अपने रोज उतर, जीवन जाये मान निखर।
करो स्वयं ही भ्रात पहल, अशुभ वृत्ति का करो दहन।।
छोड़ो सारी अगर मगर, नहीं फँसोगे बीच भँवर।
शाश्वत पर ही रहे नजर, सम भावों में करो रमन।।
देगा तुमको उच्च शिखर, त्यागो मन का सभी गरल।
'हिम्मत' बोलो कौन अमर, बस सच को ही करो नमन।।
👇
प्रेम दिवस गीत- विधा-गीत
प्रेम दिवस का, चला चलन।
दिखे सामने, आज पतन।।
पश्चिम की सब, करें नकल।
अपनी छोड़ी, गहन अकल।।
पहले देते, हाथ कमल।
फिर जाते हैं, वही बदल।।
मन में देते, बड़ी चुभन।
दिखे सामने, आज पतन।।
छोड़ी अपनी, लाज शरम।
अपना भूले, नेक धरम।।
सपने देते, हाथ मसल।
दृश्य देख हो,नयन सजल।।
बर्बादी बस, तन मन धन।
दिखे सामने आज पतन।।
जन-जन में अब, हुआ असर।
बोलो जायें, आज किधर।।
परिजन सारे, गये बिखर।
नाव पड़ी है, बीच भँवर।
'हिम्मत' मन में, बड़ी घुटन।
दिखे सामने, आज पतन।।
👇
हिंसा छोड़ो, मान जहर।
बरसाती ये, बड़ा कहर।
मन पर करती, बुरा असर।
मिलती काँटो, भरी डगर।।
कुंठन में फिर, रहे जकड़।
झूठी करता, फिरे अकड़।।
होती सच की नहीं पकड़।
तब पछताये, नाक रगड़।।
मानो इसको, सब दलदल।
समय रहे अब, स्वयं सँभल।
छोड़ो करना, अब तुम छल।
बहे शान्ति का शीतल जल।।
आयेंगे भू, देव उतर।
सुख से होगी, तभी बसर।।
जाये फिर से, धरा सँवर।
'हिम्मत' छू ले, सभी शिखर।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 13🎈
है गांधी को देश नमन।
आजादी दी यहां वतन।
नाची धरती और गगन।
अब बहती है मंद पवन।
इस भारत में यही चलन।
सब करते हैं देव नमन।
है भारत में सदा अमन।
खिलते ज्यों हैं पुष्प चमन।
करते खोटी बात वमन।
उनका करना सदा दमन।
हो दुष्टों का यहां शमन।
अच्छे करते यज्ञ हवन।
👇
कैसे जायें, धुंध असर।
भारी मुश्किल नहीं बसर।।
छोड़ी कोई, नहीं कसर।
लगता बाँधी, खूब कमर।।
सारे रखना, शांति वतन।
यह पथ होता, सदा अमन।।
अपना उपवन, सदा चमन।
नीला सारा,आज गगन।।
👇
चलना भाई, नेक डगर।
होगी जीवन , भली सहर।।
ये बरपाते, रोज कहर।
आता इनमें,खोट नजर।।
आये बादल , मेघ बरस।
क्यों हो कोई ,शेष तरस।
देखो सुन्दर चांद गगन।
जो भी देखे,हुए मगन।।
👇
पागल करता, चाह गलत।
चलता गलती,राह सतत।।
दुख की होती, नई सहर।
आखिर होता,खत्म कहर।।
बादल बरसे, गांव शहर।
हुए लबालब, नदी नहर।।
समझो सारे, छोड़ कलह।
हो समझौता,शीघ्र सुलह।।
👇
प्रेम श्रेष्ठ है,सार सकल।
प्रेम विरह में, रहे विकल।।
खुशबू देता, सदा चमन।
सदा शांति हो, प्रेम अमन।।
जीवन में हो, प्रेम रतन।
मिले सफलता, करें जतन।।
विधा मिले जब, करें मनन।
चिंतन करना ,सदा गहन।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 14🎈
रहे देश में, सदा अमन।
खिला खिला ये, रहे चमन।।
कहीं नहीं हो, तनिक दमन।
आओ सब मिल, करें नमन।।
जिम्मेदारी , करे वहन।
नेक जनों का, यही कहन।।
बुरी आदतें, करें दहन।
बस चिंतन हो, यही गहन।।
जन हित में नित,लगे लगन।
सद् कर्मों में,रहो मगन।।
मानस छूता, रहे गगन।
देश प्रेम की, जले अगन।।
कथनों में तुम, रखो वज़न।
खुले दिलों से,करें यजन।।
सुबह शाम नित, करो भजन।
सद् गुण धारी,बने सजन।।
प्रस्तोता
👇
मन मोहन छंद. एक बाल गीतिका
++++++++++++++++++++++
बच्चों का था, एक घटक।
बगिया पहुँचा, मटक मटक।।
पेड़ों पर थे, आम सघन।
तोड़ तोड़ सब, रहे गटक।।
बागवान अब, हुआ कुपित।
उसको बच्चे , गये खटक।।
जैसे उन पर, पड़ी नज़र।
कुछ कूदे कुछ, गये लटक।।
गिरे जोर से, हुई धमक।
जगह जगह कुछ, गये चटक।।
डर कर भागे, इधर उधर।
आम जेब के,गये पटक।।
जो थे पकड़े, करें विनय।
माफ करो हम, गये भटक।।
👇
महा मन मोहन छंद आधारित मुक्तक प्रयास
सादर समीक्षार्थ-
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जीवन क्रम हो, सदा सरल, और आचरण, बने विमल ।
अनुशाषित हो,चलें सुपथ, शुभ कर्मों पर, करें अमल ।
नहीं किसी का, करें हनन, नहीं किसी का, करें दमन,
निज कथनों पर, रहें अडिग, निर्णय क्षमता, दिखे अटल ।
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷
प्रभु चरणों में,लगे लगन, सद् कर्मों में,रहें मगन।
सुबह सवेरे, करें भजन, हम क्या हैं हो,नित्य मनन।
परम पिता से, सब मिलकर, करते हैं बस,यही विनय,
खुले हस्त से, करें यजन, मानस छूता, रहे गगन।
मन मोहन छंद आधारित
एक गीतिका, पदांत - अस कर.
===================
बहुत हो गया,अब बस कर,
रह जाना तू,मत फंस कर।
दुनियादारी, अजब विकट,
खुशियाँ अपनी,रख कस कर ।
छिपे बाँह में, कुछ विषधर,
निकल न जाये,वह डस कर ।
दिल से कोशिश,कर भरकस,
पार लगा ले,जस तस कर ।
ध्यान रहे बस,यह हर दम,
जीवन जीना,हँस हँस कर ।
बिसरा दे तू,सब अनबन
बने गरल को, चल रस कर ।
बातें जो हों,सहज सरल,
भर ले मन में,ठस ठस कर ।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌹 पृष्ठ क्रमांक _15 🎈
मातु शारदे, करूं नमन।
शुभ भावों के, चढ़ा सुमन।
हो जाती मैं, हर्ष मगन।
बन जाती हूं ,सरल अमन।।
तुम पहने हो ,वस्त्र धवल।
शीश धरूं मैं ,चरण कमल।।
मन हो जाता ,सहज सरल।
कृपा करो तुम, विमल अमल।।
मन भावो से उठे लहर |
सूर्य आगमन नई सहर।|
नहीं कहीं हो कोई कहर।
मिले न कोई दान जहर।।
बादल आते रोज उमड़ |
बिजली चमके सदा घुमड़।
वर्षा आती सघन सहज।
कीचड़ जमता,सड़क महज।।
👇
आया बसंत ,मस्त पवन।
सर्दी का अब, हुआ शमन।।
डाली डाली, खिले सुमन।
सबके मन है,शांति अमन।
तरुवर झूमे,गए महक।
चिड़िया सब ही, रही चहक।
साजन का मन, गया बहक।
सजनी कटि है ,रही लहक।।
👇
मनमोहन छंद आधारित गीत
गुरुवर मेरे ,करूं नमन।
जागृत बनती,सुन प्रवचन।।
आप सहज ही, सदा सरल।
वचन तुम्हारे ,मधुर तरल।।
देते हमको, ज्ञान अमल।
सध जाता है, ध्यान विमल।।
हो जाता है,क्रोध शमन।
जागृत बनती, सुन प्रवचन।।
तेरी वाणी,सुधा सरस।
लगे कल्याणी,हमें सहज।
तव दर्शन से, बनें विमल।
मन बन जाता, धवल अमल।।
मोह लोभ मद, मिटे सघन।
जागृत बनती,सुन प्रवचन।।
गुण गाऊँ तव,भाव प्रबल।
बन जाऊं मैं,सहज सबल।।
कट जाए सब, पाप कलुष।
बन जाऊं मैं ,सफल मनुज।।
तव गुण गाने , बनूं मगन।
जागृत बनती, सुन प्रवचन।।
ले ली मैंने ,आप शरण।
करती हूं मैं ,नमन चरण।।
प्रभु तुम तारण,सकल तरण।
भव बंधन का ,करो हरण।।
खिल जाए मम,हृदय चमन।
जागृत बनती सुन प्रवचन।।
👇
मन मोहन छंद आधारित मुक्तक द्वय -
जानकी पितु,जनक नृपति।
उनकी थी वह,सुंदर कृति।
राम संग था, हुआ लगन।
कितनी प्यारी,विश्व सुकृति।।
वर्षा आई ,मन प्रमुदित
मस्त पवन है ,सब पुलकित।
कोयल बागों,रही कुहुक,
पुष्प महकते,है सुरभित।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 16🎈
बहती रहती, खूब पवन।
शोर मचाता, शांत गगन।।
नदी बहाती, नीर तरल।
शिव पीते हैं, महा गरल।।
बन कर रहिये, खूब सरल।
शक्कर बन कर, घुलें तरल।।
शांत रहें अब, नहीं गरम।
रहिये बन कर, आप नरम।।
👇
कैसे आऊँ, पास सनम।
टूटे मुझपर, घोर सितम।।
मुश्किल अब है, रोज मिलन।
जलती दिल में, विरह अगन।।
पत्थर दिल हैं, गाँव नगर।
होगा कैसे, यहाँ बसर।।
बंदिश घर पर, आठ पहर।
मत आना तुम, अभी इधर।।
कब अब होगी, नई सुबह।
कब पाएगा, नेह निबह।।
ईश भाव रख, रहो सबल।
खिल जाएगा, प्रेम कमल।।
👇
भजो श्याम को, करो भजन।
भाव प्रेम में, रहो मगन।।
करते बेड़ा, पार सुगम।
मित्र सखा हैं, ईश परम।।
कुरुक्षेत्र में, युद्ध धरम।
गीता करती, दूर भरम।।
रुक्मणि का कर, लिया हरण।
प्रेम भाव से, किया वरण।।
मित्र सुदामा, गये महल।
आये प्रभु जी, द्वार टहल।।
दीन दशा लख, हुए विकल।
अश्रु आँख से, गए निकल।।
खेल खेलते, थे नटखट।
नाग कालिया, महा विकट।।
बड़ी समस्या, खड़ी निकट।
नाथ दिया प्रभु, ने झटपट।।
कृष्ण काल पर, करें कहर।
बैर भाव मत, सके ठहर।।
भक्त आपके, पड़े चरण।
नाथ लीजिए, हमें शरण।।
👇
महा मनमोहन छंद (८+६, अठकल + त्रिकल+नगण)
मीरा को है लगी लगन, निशदिन करती कृष्ण भजन।
इक तारा ले रहे मगन, उनके हैं बस श्याम सजन।।
छोड़े सुख सब राज महल, प्रेम डगर पर गयी निकल।
राह भक्ति की नहीं सरल, पीना पड़ता घोर गरल।।
प्रेम पिया की लगे सहज, मन में रहते श्याम महज।
पीड़ा ताने मिले बहुत, दुख के बादल रहे गरज।।
प्रेम पुजारन भक्ति सफल, साथ रहे प्रभु के हरपल।
बाधाओं के पार उतर, बही नदी सी वह अविरल।।
प्रभु में जिनके भाव सरल, पत्थर लगते उन्हें तरल।
अड़चन जाती सहज सुलझ, शाँत उदधि की हो हलचल।।
ईश्वर में यदि भक्ति अटल, मन को मिलता ज्ञान अमल।
दरस ईश का हो पल पल, बहे भक्ति की धार प्रबल।।
👇
देखा तेरा, रूप कमल।
दिल दीवाना, गया मचल।
होता मुझको, नहीं सबर-
दिल हाथों से, रहा फिसल। १
मिलना हमको, कहो किधर।
धड़क रहा है, जोर जिगर।
बेसब्री है, जान बहुत-
अब मुश्किल है, एक पहर। २
देखूँ तुमको, एक नजर।
खोज रहा हूँ, इधर उधर।
भटक रहा मन, करे जतन-
नही मिल रही, मुझे डगर।३
प्रियतम मिलना, नही सरल।
पीना होगा, हमें गरल।
बैरी जग है, एक तरफ-
तोड़ रहा है, स्वप्न महल।४
तुम आते जो, साथ अगर।
मिट जाता सब, संशय डर।
प्रेम रूप है, ईश सहज-
साहस संभव, करे सफर।।५
खुश रहना हर, हाल सनम।
भूल सभी अब, जुल्म सितम।।
बदले का तू, भाव न रख।
हुआ कहाँ क्या, जरा परख।।
मनमानी मत, हरगिज कर।
सब पर रखना, एक नजर।।
सीधी मिलती, नहीं डगर।
मिल जाएगी, ढूंढ मगर।।
मोहपाश में, गया जकड़।
बिना बात का, रहा अकड़।।
जल्दी में तू, भूल न कर।
देख रहे हैं, लोग इधर।।
सोच समझ कर, करो पहल।
पा जाओगे, राह सरल।।
दुनिया में है, उथल-पुथल।
आगे देखो, है दलदल।।
मत घबराना, तेज लहर।
उसको जाना, देख ठहर।।
अपने दिल की, सुनो सहज।
राम करेंगे, नहीं हरज।।
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शीत सुहानी, बड़ी सरल।
चिल्ला जाड़े,लगें गरल।
मंद मंद सी,चले लहर-
जैसे कोई ,बहे तरल।
मधुर शहद सा ,लगे नमक।
मीठे की भी , खूब धमक ।
रहें विरोधी, ये हरदम-
अच्छा देते, सदा सबक।
👇
ईश्वर को तुम, करो नमन।
भक्ति,प्रेम के ,चढ़ा सुमन।
करें साधना, धरा-गगन।
सबसे सुंदर,यह जन-धन।
सारे कारज, करें सफल।
दुखों की न हो,कभी दखल।
भक्ति-भाव से,बनें सरल।
पीना पड़े न , कभी गरल।
पापों से अब , करो शरम।
माला जप कर ,करो करम।
मानव का बस ,यही धरम।
ईश -वंदना, रहे परम।
इनकी महिमा, बड़ी सुखद।
जैसे होता , मधुर शहद।
जीवन कभी न, रहे दुखद।
जी लो जैसे , चार अदद।
👇
भ्रष्टाचारी , रहा पनप।
माल मुफ्त का,गया गड़प।
सारी दुनिया, रहा हड़प।
फिर भी बढ़ती ,रही तड़प।
लड़की छेड़े , छोड़ शरम।
आडे-टेढे, सभी करम।
लाज छोडकर,बना अधम।
दुराचार है, हुआ परम।
कडकों पर है, हुआ गरम।
पैसा देखा , रहा नरम।
झूठी खाता, रोज कसम।
है बस इसका, यही धरम।
बिगड़े सारे , चाल-चलन।
सदाचार का, हुआ पतन।
झूठ-पाप का,खिला चमन।
बढ़ती जाती, रोज सड़न।
निर्धन का है, हुआ दमन।
सदियों से है ,यही चलन।
अत्याचारी , करें हरण।
सारी दुनिया, हुई शरण।
जीवन में अब , जरा सँभल।
तू न दुखों के ,खिला कमल।
सदाचार का, करें अमल।
दुराचारी न , बने प्रबल।
इनका साहस ,करो विफल।
सदाचार कर , बनो सरल।
पियो नहीं तुम, कभी गरल।
सच को ही तू , सदा उगल।
👇
मुक्तक
कितना प्यारा,"छंद महल"।
रचता रहता , छंद नवल।
कविगण रहते,सभी प्रखर-
लिखते-लिखते,बने सफल।
छंद निराले, और सरल।
रोज सिखाता,छंद अटल।
भाव सलोने, मुक्त कथन-
छंद खिलाते,हृदय कमल।
सुंदर-सुंदर, सृजन विरल।
बहती धारा,यह अविरल।
रहते कवि-जन,साथ भवन-
ज्ञानी जन सब,बड़े सरल।
श्रम साधक है,हर जन मन।
श्रेष्ठ-श्रेष्ठ सब ,करें सृजन।
सृजन पुष्प में ,भरे महक-
रहे महकता, यह उपवन।
मनमोहक यह ,ज्ञान भवन।
शिक्षाप्रद यह ,बना सदन।
कदम कलम के ,बनें प्रबल-
दौड़ लगाते , पंगु बदन।
👇
मनमोहन छंद आधारित कुछ मुक्तक
यह बेकारी ,बड़ी चपल।
करें आंकड़े,सदा पहल।
निर्धनता भी,रही पसर-
जब बीमारी ,करे दखल।
बीमारी की , मार दुखद।
चट कर जाती ,सभी शहद।
बेकारी से , हो खलबल-
नहीं किसी की ,मिले मदद।
चिकित्सकों के , बड़े महल।
रहती हरदम,चहल-पहल।
ऊँचे -ऊंँचे, शुल्क अदद-
करे गरीबी , बडा़ खलल।
हर घर की है,यही खबर।
बीमारी का ,बढ़ा असर।
झाड़,फूंक भी,गये बिगड़ -
पगडी भी है, गई उतर।
👇
आज कुछ अलग से भाव की एक अलग सी रचना मनमोहन छंद में। कृपया आप सभी अपना आशीर्वाद दीजियेगा।🙏जय बजरंगबली 🙏
बजरंगबली ,जय जय जय।
कलियुग पर अब,करो विजय।
किस कारण से , अनिर्वचन-
रहते जबकि , आप अजय।
संकटमोचन, विध्न हरण।
मिले आपकी , सदा शरण।
आज पाप का, करो दमन-
करो शक्ति का,आज वरण।
प्रभु जी तुम हो ,बड़े प्रबल।
फिर क्यों पीना , पड़े गरल।
जीवन सबका, है विषमय-
आतंकी है, रहा मचल।
जब से आया, यह कलियुग।
लगता जैसे, असफल युग।
मानव छोड़े , धरम-करम-
कितना प्यारा , था सतयुग।
त्रेता ,द्वापर , गये निकल।
पर कलियुग है,बड़ा अटल।
त्राहि-त्राहि का , मचे गदर-
सभी कर्म हैं, हुए विफल।
मानवता को , गया निगल।
सभी शक्तियां,आज विफल।
इस युग का है ,बुरा असर-
हनुमत बाबा , करो दखल।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 18🎈
खुशियों की बस करें पहल।
रिश्तों में हो भरा चुहल।।
भाव शिल्प जब सधे सकल।
रच-रच रचना लिखें नवल।।
उनको पीना पड़ा गरल।
वाणी जिनकी नहीं सरल।।
खाना खाकर जरा टहल।
आओ चलते कहीं निकल ।।
कम होगी अब शीत लहर।
पछिया बहने लगी हहर।।
बाग बगीचे हुए मगन ।
धरती झूमी संग गगन ।।
👇
विधा -गीतिका
एक यहां पर, बना चलन ।
एक धरा है, एक गगन।
धर्म सभी हैं ,पृथक पृथक ।
एक हमारा , यही चमन।
बात सही है ,नहीं मिथक,
हम सब रहते खूब मगन।
अपना प्यारा, देश सरस,
दुश्मन रखते, सदा जलन।
स्वर्ग यहां वन, बाग सघन,
सुंदर- सुंदर, हैं उपवन।
भाषा बोली,अलग अलग,
दिल से दिल का, मधुर मिलन।
आया जग में,सजन मदन।
सुरभित होकर, बहा पवन।।
स्वागत में हैं ,वन उपवन।
स्वच्छ साफ हो,नील गगन ।।
तितली उड़ कर,मचल-मचल।
छलकाती मधु,मय छल-छल।।
गूँज रहा सब, है कानन।
भँवरे करते, हैं गुनगुन।।
कोयल गाती, गीत मगन।
महका-महका, है तन-मन।।
लगी मिलन की, पिया लगन।
परदेशी आ ,करो मिलन।।
प्रमिला श्री'तिवारी'
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🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 19🎈
क्रीड़ा कर रति,साथ मदन।
भरते सर्जक भाव भुवन।
मदमाये गुल बाग बगन।
वन उपवन में खिले सुमन।
जगा रही माँ, उठो ललन।
हे मेरे प्रिय, प्राण रतन।
सुंदर सुमुखी, भरे भवन।
करती नर्तन, मुग्ध मगन।
बाँदा यूपी
👇
गीतिका
वीणावादिनि तुम्हे नमन।
जड़ता का माँ करे दमन।
देख लीजिए एक नजर,
पापों का हो, पूर्ण हनन।
बुद्धि दीजिये मुझे प्रखर,
रचना करदे, मुग्ध मगन।
वीणा के स्वर, बजा मधुर,
शांति प्राप्त कर,सके वतन।
पावन वसुधा, नीर विमल,
यहाँ देवता , लिये शरन।
मुक्तक
ताक- झाँक मत, इधर- उधर।
करो नहीं तुम, अगर- मगर।
केवल इतना, सत्य उगल,
बता कारवाँ, लुटा किधर।।
अशोक मिश्र 'अनन्त'✍️ बाँदा यूपी
👇
समांत- आना पदांत-पागलपन
आँख लड़ाना पागलपन।
साख गिराना पागलपन।1
कर्मों का जब,मिले फलन,
अश्रु बहाना पागलपन।2
जिसका अच्छा चाल चलन,
मूर्ख बताना पागलपन।3
धर्म जाति का, भेद करण,
शीश कटाना पागलपन।4
धीरज रखिये पड़े बिपति,
होश गँवाना पागलपन।5
गलती करता, बालक जब,
रोष दिखाना पागलपन।6
लेट गया जो, पहन कफ़न,
दाग लगाना पागलपन।7
वीर सैनिकों, सदा नमन,
मान घटाना, पागलपन।8
करते आये, चीर हरण,
माफ कराना पागलपन।9
अशोक मिश्र 'अनन्त'✍️ बाँदा यूपी
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌹 पृष्ठ क्रमांक _ 20🎈
आँखें उनकी हुईं सजल।
जाने कैसे गईं पिघल।।
आते खुद पर आँच विकल।
हुआ तभी तो ज्ञान सकल।।
जनता पीती रोज गरल।
उनके सजते शीश महल।।
ठगा हुआ है यहाँ अकल।
सजा शीश पर ताज नकल।।
👇
जीवन सीधा , और सरल।
मिलता पग-पग यहाँ गरल।।
सज्जन हित अब,कहाँ जगत।
पग- पग बैठे , स्वार्थ भगत।।
खुद ही खुदका, करें जतन।
चमकेगा तब , जगत वतन।।
स्वारथ का सब ,करें वमन।
"माही" महके , तभी चमन।।
🍎
संकट में है आज वतन।
कुछ तो इसका,करें जतन।।
जलने वाली , धर्म अनल।
सद्भावों को , रही निगल।।
करना केवल, नेक करम।
यही मनुज का,आज धरम।।
बाकी सब कुछ,यहाँ भरम।
स्वारथ रहता , सदा गरम।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मनमोहन छंद , 14 मात्रा भार ( अठकल-त्रिकल -नगण) करो ईश को, सदा नमन।
अगर चाहिए, चैन अमन।।
व्यर्थ न मन में, रखो जलन।
प्रभु करते हैं, दुष्ट दलन।।
छूना चाहो, अगर गगन।
रहो कर्म में, सदा मगन।।
कभी न करना, कुपथ गमन।
इससे उजड़े, बसा चमन।।
इच्छाओं का, करो शमन।
विषयों का भी, करो दमन।।
विष का कभी न, करो वमन।
फिर महकेगा, खूब चमन।।
मन में रहे न, अहम वहम।
लाचारों पर, करो रहम।।
कथनी पर खुद, करो अमल।
जीवन में फिर, खिले कमल।।
👇
चली सुंदरी, पनघट पर।
सिर के ऊपर, घट रखकर।।
कदम बढ़ाती, वह सरपट।
पानी लाना, है झटपट।।
पनघट पर थे, दो नटखट।
कहा उन्होंने, कुछ अटपट।।
वह भी बोली, फिर चटपट।
हुई सुंदरी, से खटपट।।
वह बोली मत, करो कपट।
लिखवा दूँगी, अभी रपट।।
दोनों पर वह, पड़ी झपट।
बिगड़ैलों की, उठी चपट।।
नारी के हैं, फ़र्ज़ गहन।
पत्नी बेटी, मातु बहन।।
सबकी बातें, करे सहन।
पर दुष्टों का, करे दहन।।
नारी होती, बहुत सरल।
जल सी बहती, है कल कल।।
वर्षों इसने, पिया गरल।
किंतु आज यह, हुई सबल।।
छंदों के कुछ, नियम धरम।
पढ़कर होना, नहीं गरम।
पालन करिए, बिना शरम।
नियम न होते, कभी नरम।।
छंद शास्त्र है, शुद्ध परम।
इसमें कोई, नहीं भरम।
आवश्यक है, यति गति लय।
कितना भी फिर, लगे समय।।
जिसके मन में, हुआ अहम।
सिद्धि उसी से, गई सहम।
त्रुटि इंगित को, करें सहन।
और अध्ययन, करें गहन।।
बुद्धिमान है, वही असल।
करे किसी से, नहीं टसल।
ज्ञानी होते, शांत सरल।
शिव शम्भू ने, पिया गरल।
नया प्रयोग - समस्त वर्ण लघु (मात्रा रहित)
*********************************
डर डर कर मत, रह घर पर।
पथ पर चल पर, चल बचकर।
नल पर चलकर, झट भर जल।
घट भर सर पर, रखकर चल।।
कल कल कल कर, हरदम बह।
परम धरम यह, सच सच कह।
मत जप तप कर, पर हर भज।
असत कपट मद, छल मल तज।।
👇
अपना कोई, हो हमदम।
लेकिन दिल से,बहुत नरम।
मंत्र शांति का, यही परम।
एक गरम तो, एक नरम।।
सुबह शाम हो, चाय गरम।
रहें चैन से, मिलकर हम।।
पैसा धेला, पड़े न कम।
कभी सताए, हमें न गम।।
रोग न आएँ, कभी निकट।
तन मन कभी न, रहे चिकट।
समय न आए, कभी विकट।
लोकसभा का, मिले टिकट।।
समय आज है, बड़ा विकट।
मुझको देगा, कौन टिकट।
राजनीति में, नहीं दखल।
हिस्ट्रीशीट न, है खल दल।।
👇
पवन वेग है, सनन-सनन।
बादल गरजे, घनन-घनन।
बूँदें पड़तीं, झनन-झनन।
कँगना खनके, खनन-खनन।।
गाँव-गाँव औ,नगर-नगर।
पानी-पानी, डगर-डगर।
दादुर बोलें, टरर-टरर।
चूनर सरके, सरर-सरर।।
जलमय दिखती, सड़क-सड़क।
बिजुरी चमके, कड़क-कड़क।
पानी पहुँचा, निलय-निलय।
निलय-निलय सब, विलय-विलय।।
पानी-पानी, लहर-लहर।
बादल पहुँचे, शहर-शहर।
अफरातफरी, कहर-कहर।
त्राहिमाम प्रभु, ठहर-ठहर।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
शीर्षक- "सवेरा"
सुबह सवेरे, चहल-पहल।
सभी जागते, कुटी महल।
होने लगती, है हलचल।
योग साधना, और टहल।।
बहने लगते, कल कल नल।
महिलाओं के, दल पर दल।
भरने आते, नल पर जल।
कुछ धोते हैं, तन मल मल।।
कोई ढोता, दिखे वजन।
कोई बैठा, करे भजन।
सब अपने में, हुए मगन।
जिसको जिसकी, लगी लगन।।
गाय रँभाती, खड़ी विकल।
बछड़ा आया, दौड़ निकल।
बच्चे रोते, मचल-मचल।
कृषक चल पड़े, लेकर हल।।
बैलगाड़ियाँ, चरर-मरर।
रेलगाड़ियाँ, घरर-घरर।
चौराहे पर, चाय कड़क।
रुकी हुई थी, चली सड़क।।
कहीं कीर्तन, कहीं भजन।
घण्टी बाजी, टन टन टन।
विद्यालय में, जन-गण-मन।
शिक्षित हों सब, बढ़े वतन।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒
भारत मेरा, सौम्य वतन।
मान बढ़ाएं, करें जतन।।
बार बार हम, करें नमन।
खिला रहे यह, देश चमन।।
लहराएं यश, केतु गगन।
करें शत्रु का,सदा दमन।।
गलत नहीं हम, करें सहन।
सुन लो सारे, खरे वचन।।
डर को करतें, सदा दफन।
बुराइयों का, करें हवन।।
प्रगति शिखर पर, करें गमन।।
देश भक्ति में, रहें मगन।।
चौकस रहते, सदा नयन
मंथन हो हर, बार गहन।
विकास होता, तभी सघन।
मेरा प्यारा, देश रमन।।
जय जय बोले, जवां छगन।
समझे सबको, भ्रात-बहन।
नहीं किसी से, करे जलन।
सभी क्षेत्र में, रहे धवन।।
मुख पर हो बस, एक भजन।
रहे देश में, सदा अमन।।
प्रेम शांति की, बहे पवन।
हम सब तम का, करें दहन।
👇
काव्य कुंज है छंद महल।
खिले यहाँ नव छंद कमल।
सिंचन देते हैं गुरु जन,
क्यारी- क्यारी टहल-टहल।
प्यारा न्यारा पठन पटल।
है छंदों की चहल-पहल।
ज्ञान उपासक सभी सुजन,
उपजातें हैं ज्ञान फसल।
गुरुजन सक्षम और सबल।
शिक्षा देते सहज सरल ।
पिछड़े जो भी करे अहम,
जो धारे वह बने सफल।
नहीं झूठ की चले लहर।
सच्चाई पर रहे महर।
यहाँ नहीं है पत्र पदक,
लेखन पर बस रहे नजर।
मतिमानों को करें नमन।
निज दोषों का करें शमन ।
चलती जाए सतत कलम,
सुंदर सार्थक करें सृजन।
👇
सावन सरसा सरर-सरर।
बादल बरसे पहर पहर।।
भीगे-भीगे नगर- नगर।
बहकी-बहकी नजर-नजर।।
मौसम आया रमन-रमन।
प्रीत चुनरियां पहन-पहन।।
हिय बोले है सजन-सजन।
देखे सजनी मगन-मगन।।
बिंदी चमकी चमक-चमक।
कजरा पसरा सरक-सरक।।
गजरा महका महक-महक।
हृदय ज्वार में कसक-कसक।।
देख पिया की झलक-झलक।
दिल धड़का है धड़क-धड़क।।
कली खिली है चटक-चटक।
बजी घंटियां टनक-टनक।।
~~`~~~~~~~~~~~~~~~~~~
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कुछ मुक्तक आपके समीक्षार्थ ( आधार #मनमोहन छंद 14 मात्रा (8+6) पदांत नगण ) : --
1.
हर विपदा का, है कुछ हल ।
आज नहीं तो, जरूर कल ।
यद्यपि दिखता, बड़ा सुगम -
पर जीवन है, नहीं सरल ।
2.
निर्धन का है, आज मरण ।
मुश्किल होता, कभी भरण ।
भूख मिटेगी, पर उस पल -
करे कर्म रह, राम शरण ।
3.
नहीं आज है, लाज शरम ।
करें मोह में, भ्रष्ट करम ।
भूल चले हैं, धर्म वतन -
रुपिया पैसा, रहा धरम ।
4.
शोर मचा है, शहर शहर ।
घोल रहे सब, आज ज़हर ।
बना लक्ष्य है, हिंद धरम ।
लगे चुनावी, यार लहर ।
👇
#प्रियतम
दूर देश जब, गए सजन ।
सखी यहां तब, लगे न मन ।
सूनी सूनी, लगे डगर -
देखूं इत - उत, थके नयन ।
घनी उदासी, भरी सहर ।
दुखी दुखी हर, लगे पहर ।
रातें गुजरें, ले करवट -
प्यासे प्यासे, रहे अधर ।
उजड़ा उजड़ा, दिखा चमन ।
मुरझाए से, लगे सुमन ।
आएंगे अलि, कब प्रियतम -
बहे न ऑ॑सू, करूं जतन ।
नहीं चाहिए, अब ये धन ।
कह दूंगी अब, रहो वतन ।
बिना तुम्हारे, अब प्रियतम -
कब तक पीड़ा, करूं सहन ।
👇
निश्चल छंद - 16,7 पर यति चरणांत गुरु लघु
1.
अंहकार अरु क्रोध ज़हर हैं, करले पान ।
तू अपनों से सभी बड़ों का, कहना मान ।
बोल नहीं तू झूठ कभी यह, रखना भान ।
काम समय पर कर बन जाए, तेरी शान ।
2.
पैर बड़ों के छूना खुद का, है सम्मान ।
आज पिता माता गुरु से तुम, ले लो ज्ञान।
कुछ बातों का निज जीवन में, रखना ध्यान ।
देश धर्म पर तुम्हें सदा ही, हो अभिमान।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मनमोहन छंदाधारित गीतिका
मची हुई है उथल पुथल,
जाने कितनी है अटकल।
सभी देखते इधर उधर
बार बार क्यों रहे मचल।
धरती से तो अंबर तक
देखो कितनी चहल पहल।
काश मिले यदि आज सजन,
साथ रहें फिर हम हर पल।
जाएगी अब दशा पलट,
योग बनें है बड़े प्रबल।
संजीव नाईक इंदौर ✍️
👇
कर लेना बस,गुजर बसर,नहीं ताकना, इधर उधर,
भला करेंगे,राम भजन , व्यर्थ यार अब, तू मत डर।
जिसका जैसा, चाल चलन, नहीं बदलता, करो जतन,
भले काम का, मिले सुफल,भले काम ही, तू बस कर।
कीचड़ में ही, खिले कमल, कीचड़ हो या, हो दल दल,
अपने बस में, है हरदम,कोशिश करना जीवन भर।
अभियान चले, आज सतत, हों सब शिक्षित, करें जतन,
जाग्रत भी हो, अब हर जन, साक्षरता भी, हो घर घर।
चिंतन भी हो, और मनन,सबको लेना, है यह प्रण,
जीवन करना, सदा सुगम,चले जिंदगी,चले सफ़र।
*******-
संजीव नाईक इंदौर ✍️
👇
बोल रहा क्यों,अटक अटक,
ध्यान कहां है, गया भटक।
जो भी कहना,कह झटपट,
फिर बस जाना, शीघ्र सटक।
सुधा मिले या,मिले गरल,
चुप चाप अभी,यार गटक।
सीधा सादा, जीवन रख,
व्यर्थ सभी है,चटक मटक।
चलना है चल,चुप रह कर,
रह जा चाहे, यहीं लटक।
जाने किसका, है अब डर,
बात कौन सी,रही खटक।
मिले प्रेम तो,हासिल कर,
कर मत खाली,उठा पटक।
*******-
संजीव नाईक इंदौर ✍️
👇
मनमोहन छंदाधारित मुक्तक
जीवन में है, क्या उलझन।
सूख गया क्यों,मन उपवन।
रीत गए हैं,भाव कलश -
हुई स्वयं से, क्या अनबन।
*********
एक पहेली,मानव मन।
समझ सका है, कौन स्वजन।
होता हर्षित, कभी दुखित -
कैसे सुलझे,यह उलझन।
********संजीव नाईक इंदौर ✍
👇
मनमोहन छंदाधारित गीतिका
कौन हुआ है, यहां अमर,
मरने से है, क्यों फिर डर।
जन्म मृत्यु का, नियमित क्रम,
आत्मा करती, नित्य सफर।
हिम्मत देंगे,बस भगवन,
जरा भरोसा,उन पर कर।
कोशिश होती, सदा सफल,
मन में थोड़ा,धीरज धर।
छॅंट जाएगा,आज तमस,
हृदय उजाला,तू बस भर।
ताकत देगी, सदा कलम,
चला सतत बस,कागज पर।
बदल रहा है,मौसम अब,
ध्यान रखें सब, हो न कहर।
*********संजीव नाईक इंदौर ✍
👇
मनमोहन छंदाधारित गीतिका
समांत - अन, अपदांत।
अब तो छोड़ो,सब अनबन,
करो प्यार से, मधुर मिलन।
साथ रहें तो,कटे सफर,
सदा साथ में,रहें मगन।
सभी सुखी हों,अब हरदम,
खिला हुआ हो,हर गुलशन।
खत्म सदा हो,सब कच कच,
कटुता का भी,करें दमन।
जीवन सबका,रहे सफल,
मिलें सभी को, यहां स्वजन।
संजीव नाईक इंदौर ✍
~~~~~~~~~~~~~~~
मुक्तक
इच्छा रख तू मित्र प्रबल।
होगा तेरा काम सफल।।
राहें दिखतीं कठिन अगर-
रख कदमों को सँभल-सँभल।।
कहकर बातें नहीं फिसल।
रह बातों पर सदा अटल।।
वादा करके नहीं पलट-
सुखी रहेगा करे अमल।।
जीवन की यदि ठीक डगर।
होगी बढ़िया गुजर बसर।।
दौड़ा अपनी सही अकल-
मत कर ज्यादा अगर मगर।।
अगर काम पर नहीं पकड़।
ढीली करके चलो जकड़।।
मनुज अहम की बात न कर-
राम निकालें सभी अकड़।।
👇
गीतिका
इंद्र गये हैं, वहाँ बरस।
लोग रहे हैं, जहाँ तरस।।
नीरसता ढा, रही कहर,
नहीं जिंदगी, रही सरस।
झगड़े पर वो, गये उतर,
जब लोगों से, हुई बहस।
ओले पड़ते, नहीं अगर,
फसल न होती, तहस-नहस।
राहें आगे, बहुत कठिन,
पीछे को चल, अधिक न फँस।
ऐसी देखो, चली पवन,
कपड़े उड़ते, चले न बस।
देखो यारों, गाँव शहर,
काफी पीते, लोग चरस।
मीरा जी को, लगी लगन,
कब तक देंगे, कृष्ण दरस।
अब तो भाई, चुका करज,
हुआ देख अब, बहुत अरस।
मिली मुझे तब, दुआ बहुत,
किए गुरू के, चरण परस।
'अत्री' जगहा, कहीं दुखद,
किसी जगह छा, रहा हरस।
👇
मुक्तक
आयी गर्मी, बढ़ी तपन।
कम कर तन पर, मनुज वसन।।
दिनकर का मुख, लाल वरण-
मुश्किल होती, धूप सहन।।
लोग मजे से, लगे रहन।
एसी कूलर, बढ़ा चलन।।
जब हो गर्मी, बहुत अधिक-
रहे स्वेद में, पूर्ण बदन।।
घर से बाहर, देख बहन।
कितना सुंदर, लगे चमन।।
तपी हुई हैं, सड़क बहुत-
जूते चप्पल, चलो पहन।।
करें सभी पर, कृपा किशन।
रहे देश में, चैन अमन।।
आता बढ़िया, चाँद नजर-
जब होता है, साफ गगन।।
नीलगगन से, गिरे अगन।
तन-मन पैदा, करे जलन।।
लगती तन को, बहुत सुखद-
मंद-मंद जब, चले पवन।।
अच्छी बातें, करो ग्रहन।
बुरी बात को, करो दफन।।
मन में पैदा, भाव गलत।
नैतिकता का, करे पतन।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌿...🖋 🌻भार्या
मात पिता से, , मिले बदन।
सौंपे फिर यह, हाथ सजन।।
होता सुंदर, ,,, मधुर मिलन।
'रामा' करते, ,,,, रात जगन।।1।।
**************************
🌿...🖋 🌻जनक
देते हमको, ,,,,, जन्म जनक।
मिलता 'रामा', जगत फलक।।
लोग दिखाते, ,,,,, मूर्ख हनक।
क्यों ना लेते, ,,,,,, सही सबक।।2।।
**************************
"मन के मोती"...🖋
👇
**************************
गीतिका..🖋 तुकांत "अहर" अपदांत
🌷 मेरे गाँव शहर 🌷
🌿🌻
सुंदर मेरे गाँव शहर।
बहती इनमें प्रेम लहर।।
🌿🌻
जगमग रहती डगर डगर।
लोग सजाते आठ पहर।।1।।
🌿🌻
मिलता पानी यहाँ अमृत।
कलकल बहती नदी नहर।।2।।
🌿🌻
रहें यहाँ पर खुश सब जन।
नहीं उगलते लोग जहर।।3।।
🌿🌻
रहे सदा ही चैन अमन।
जाती आकर शांति ठहर।।4।।
🌿🌻
कर्म धर्म का मेल सकल।
विजय पताका रही फहर।।5।।
"मन के मोती"...🖋
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गीत..🖋 तुकांत "अमन" अपदांत
🌷 भारत भूमि 🌷
🌿🌻
धरती पर है एक चमन।
भारत भू को करूँ नमन।।
🌿🌻
खुशहाल यहाँ गाँव शहर।
जगमग रहते आठ पहर।।
सबके भीतर ,, राष्ट्र लहर।
विजय पताका रही फहर।।
होता सबमें ,,, प्रेम रमन।
भारत भू को करूँ नमन।।1।।
🌿🌻
कोई करता नहीं नकल।
मिलता पूरा रूप असल।।
उन्नत मेरा ,,,,, देश सकल।
दुनिया में है आज सफल।।
करें नहीं हम जहर वमन।
भारत भू को करूँ नमन।।2।।
🌿🌻
मन में मंदिर उच्च भवन।
करते हैं हम रोज हवन।।
सुंदर इसके वन उपवन।
मंद मंद यह बहे पवन।।
रहे सदा ही ,, चैन अमन।
भारत भू को करूँ नमन।।3।।
🌿🌻
जलती सबमें कर्म अगन।
मन में रहती सदा लगन।।
होते सारे शुद्ध शगन।
पंछी उड़ते नील गगन।।
दूर दूर तक ,,, करें गमन।
भारत भू को करूँ नमन।।4।।
🌿🌻
धरती पर है एक चमन।
भारत भू को करूँ नमन।।
"मन के मोती"...🖋
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महा मनमोहन छंद , 14 मात्रा भार ( अठकल-त्रिकल -नगण द्विगुणित
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...🖋 जीवन पथ
जीवन पथ है एक सफर, नहीं सभी आसान डगर।
काम करें जल में रहकर, निभे नहीं फिर बैर मगर।।
द्वेष भाव मन में रखकर, ,,,, उजड़े सब हैं ग्राम नगर।
खुशियाँ होती तब घर घर, मिलकर रहते सभी अगर।।
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"मन के मोती"...🖋
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छंद मिला है, नवल धवल ।
सिखा रहा है, छंद महल ।।
मन में होती, उथल पुथल ।
माँता शारद, करो सफल ।।
मनमोहन को, करें नमन ।
शव्द भाव दो, करूँ यतन ।।
पढ़े विद्व जन, होंय मगन ।
मन मंदिर में, खिले सुमन ।।
👇
सुन्दर लगते, वन-उपवन ।
कर संरक्षण, नहीं पतन ।।
देते स्वासें, शुद्ध पवन ।
बृक्ष देव हैं, करो नमन ।।
रोक कुल्हाड़ी, क्रूर करम ।
आय प्रदूषण, समझ मरम ।।
परस रोग वह, गरम-गरम ।
कर लेगा चट, जीवन दम ।।
वनचर नभचर, होंय बिकल ।
तरसे जल बिन, धरा सकल ।।
फल प्रसून बिन , सूनें वन ।
कूंक मोर भी, हुई सपन ।।
👇
करके देखूँ, एक पहल ।
करूँ पेश फिर, छंद महल ।।
शारद रचना, करे सफल ।
मन में फिर खिल, जाय कमल ।।
तक राहों में, इधर - उधर ।
बहते आँसू, आठ पहर ।।
प्रीतम तुम बिन,हदय विकल ।
ऋतु बसंत यह , जाये निकल ।।
👇
दी दाता ने, तुम्हें अकल ।
चलो सदा पथ, सँभल-सँभल ।।
नहीं किसी की, करो नकल ।
होगा निश्चित, काम सफल ।।
सच का सूरज, गया सटक ।
तम असत्य का, चटक-मटक ।।
मानवता का, अंत निकट ।
असुर असत् कब, लेय झपट ।।
👇
रही जिन्दगी, आज भटक ।
मीत स्वार्थी, गये सटक ।।
पल पल जाती, स्वांस अटक ।
पांव कबर में, रहे लटक ।।
मोहपाश ने, लिया जकड़ ।
समझ न पाया, छली पकड़ ।।
हुआ ज्ञान जब, लुटी फसल ।
परमारथ का, पा प्रतिफल ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पेड़ों से हो, भरा चमन।
साफ बहे है, तभी पवन।
सांसों में हो, नहीं जलन।
नव पीढ़ी का, तभी फलन।
अपना रखिये, साफ भवन।
उसमे करिये,सदा हवन।
हाथ जोड़ कर, करें नमन।
कोरोना का, करें शमन।
अब अकाल हो, नहीं मरण।
सब जीवन का, करें वरण।
बंजर भू का, करें हरण।
सबका करती, यही भरण।
👇
🌷 🌷 🌷🌷 🙏जय श्री राम 🙏🌷🌷🌷🌷
करके नवधा, भक्ति श्रवण।
पुलकित शबरी, कहे कवण।
दिया ज्ञान है, रखो शरण।
भव से होगा, तभी तरण।
मुनि मतंग को, किया नमन।
आज्ञा ले कुटि , किया गमन।
नींद न आती, करे शयन।
राम याद में, सजल नयन।
राम नाम की, लगी लगन।
गाती शबरी, खूब मगन।
करती रहती , रात जगन।
उर में जलती, विरह अगन।
सुमन बिछाती, डगर डगर।
ढली उमर ना, थके मगर।
भक्ति में शक्ति, निहित प्रबल।
निर्बल को भी, करे सबल।
मीठे - मीठे, बेर चखन।
शबरी चुन - चुन, लिये रखन।
आये देखो, राम लखन।
खायें राघव, भरे अखन।
नेह राम का, रहा बरस।
शबरी पायो, ईश दरस।
भक्ति न जाती, कभी विफल।
मिलता उसका, अंजु सुफल।।
👇
भोले बाबा, बड़े सरल।
परहित लीना, कंठ गरल।
सब देवों से , देव विरल।
लाता जिनका, रोष परल।
हे कैलाशी, करें नमन।
वास निरंतर, खुले गगन।
भस्म विभूषित, गौर बदन।
नेत्र खुला तो, भस्म मदन।
पावन गंगा, बहे जटन।
जिसके सुरम्य, बैठ तटन।
योगी मुनिजन, नाम रटन।
चौरासी का, फेर कटन।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#अपदांत_गीतिका ,,
उनको करता , सदा नमन |
जो रखवाली , करें वतन |
सीमा पर जो, डटे सजग ,
करें देश को , सदा चमन |
रक्षक बनकर, निशा गहन ,
रखें चौकसी , सहें तपन |
करें शीष को , सदा कमल ,
अर्पित करने , मात् चरन |
रक्षा करते , सभी प्रहर ,
सैनिक होते , वीर स्वजन |
'राना' सैनिक , फर्ज डगर ,
सदा निभाते , दिया वचन |
राजीव_नामदेव " राना_लिधौरी
👇
#गीतिका
दुनिया में है ,अजब चलन |
अपना माने , सही कथन ||
झुठलाते है , बात सहज,
दूजों से जो , रखें जलन |
अपना मतलब , रखें अजब ,
स्वारथ साधें , करें जतन |
दूजों को दें , सदा गरल ,
कटुता जैसै , कहें वचन |
सबको काँटे , कहें महज ,
खुद बनते है , पुष्प चमन ,
"राना" जिनका , नहीं सुयश ,
वें बनते है , आज गगन |
***
राजीव_नामदेव " राना_लिधौरी" टीकमगढ़
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
विधा:- गीतिका आधार:- मनमोहन छंद
*******************
जब मीरा को लगी लगन।
हरी को करने लगी मनन।।
कर मन में विश्वास अटल,
छोड़ दिया घर बार सदन।
राज पाठ तज बनी सरल,
भगवा धारण किये वसन।
करता था परिहास जगत,
मान कृष्ण को लिया सजन।
सुधा समझ पी गई गरल,
कर पति के सब जुर्म सहन।
मर कर भी हो गई अमर,
जीवन में सह कष्ट सघन।
करे नमन संसार सकल,
संग "धर्म" भी करे नमन।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
हो पापों का तुरत दहन।।
जीवन तब हो खिला चमन।
बाधाओं का तभी शमन।।१
प्यार करे है धरा गगन।
जब बढ़ जाती बहुत अगन।।
बरखा करती न्यून जलन।
बिरहन करती याद सजन।।२
माता तुझको करूं नमन।
मुझको तेरी लगी लगन।।
हरदम रहता मस्त मगन।
कर बैरी का तुरत दमन।।३
👇
तुमसे घर में चहल- पहल।
तुमसे लगता भवन महल।।
कभी दूर तुम हुई अगर।
लगे सुधा भी मुझे गरल।।०१
मुखड़ा जैसे खिला कमल।
जब भी देखूं,लिखूं गजल।।
सब पर ढाती रोज कहर।
करता पूरा शहर नकल।।०२
मंदिर जाओ बचे धरम।
इसमें कैसी लगे शरम।।
खोलो भाई कान अपन।
वरना फूटे दिखे करम।।०३
👇
इम्तहान है कर न नकल।
बेच रहा क्यों बची अकल।।
अपना पाला जरा बदल।
संस्कार पर करो अमल।।
देखो दर्पण दिखे शकल।
जिसमें कोई नहीं दखल।।
यही झूठ को गया निगल।
तटस्थ रहता नहीं चपल।।
नहीं चाहिए मुझे महल।
मैं सीधा हूं और सरल।।
सदा खिला ज्यों नील कमल।
जिसे देख है चहल- पहल।।
👇
जब भी वन में लगे अगन।
करो दौड़ कर जल्द शमन।।
बना रहेगा शुद्ध वतन।
खिले रहेंगे सभी चमन।।०१
थोड़ी सख्ती रहे अगर।
स्वर्ग की भाँति रहे नगर।।
ग्राम लगे ज्यों बड़ा शहर।
नहीं कहीं भी दिखे गदर।।०२
मुखड़ा चंदा धनुष कमर।
अंधा बहरा हुआ नगर।।
चौराहों पर मची गदर।
सुंदरता को लगी नजर।।०
घी खा भाई मगर असल।
हो पीला या रहे धवल।।
कंजूसों की छोड़ नकल।
श्रम कर जम कर,बना मसल।।०१
माया जोड़ी स्वर्ण रजत।
किया नहीं कुछ कहां गलत।।
फिर भी उधड़ी परत परत।
मिला नहीं तब ही बहुमत।।०२
स्वयं करो तुम प्रथम पहल।
प्रभु ने दी है बहुत अकल।।
रोनी तो मत बना शकल।
निश्चित होगा सखे सफल।।०३
पिपलिया मंडी जिला मंदसौर(mp)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मनहर लगता,छंद पटल ।
गुरुवर देते,सीख अटल॥
लेखन करते,शिष्य नवल।
चमके किस्मत,भाल धवल॥
शिष्य अज्ञानी,मूढ़ सरल।
पाते विद्या,घड़ा भरल॥
माँ कमलासन,बैठ कमल।
देख हमारे, छंद अमल॥
गुरु सिखलाते,शब्द चयन।
सीखें हमसब,दिव्य नयन॥
रहती यादें,नेक वचन।
हम सब तो हैं,विधा पचन॥
मात गिरा का,करें भजन।
छन्द काव्य में,बढ़े वज़न।।
गीत, ग़ज़ल में,रहें मगन।
ज्ञान पताका,उड़े गगन॥
पचन = पकानेवाला
👇
आया नूतन, साल बजट।
सबको भाया, राज्य गजट।।
बोल विरोधी, मीर्च नमक।
गाली देते, तमक - तमक।।
निर्मल सीता, शक्ति रमण।
आय-व्ययिक हैं,भक्ति रमण॥
खिले-खिले हैं, हिन्द चमन।
दुश्मन का हम, करें दमन॥
टी वी सस्ता, सुखी नयन।
कर मोबाइल,प्रिया चयन।।
खेल खिलौना, बाल मगन।
उड़े पताका, धरा गगन॥
हीरे भूषण, कान पहन।
धनी जिन्दगी,रहन सहन॥
अर्थव्यवस्था, नोट चमक।
नेताओं का, कोट गमक ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
खिले खिले हैं,सभी सुमन ।
महक रहा है,आज चमन ।।
पुलकित हर्षित,देख गगन ।
मन्द मन्द अब,चले पवन ।।
विनती करिए,नित्य नमन ।
जपूँ तुम्हें नित,करूँ हवन ।।
झिलमिल होता,द्वार भवन ।
सुखमय कर दो,प्रभो वतन ।।
नित्य सभ्यता,हुई नगन ।
पहने छोटे ,आज वसन ।।
रोते नित हैं,सभी अँगन ।
नीर बहाते ,देख नयन ।।
करते रहिए ,भ्रात जतन ।
अपने में नित ,रहें मगन ।।
पायेंगें हम,शाँति अमन ।
मानवता के,छुओ चरन ।।
👇
दर्शन प्रभु दें,आप अगर ।
जाऊँ क्यों मैं,इधर उधर ।।
करें नहीं हम,अगर मगर ।
नहीं छोड़ते ,प्रभो कसर ।।
सब पर रखते,प्रभो नजर ।
मानव जाता,नित्य मुकर ।।
जग के स्वामी,रखें खबर ।
सुधि लें वे हर ,एक पहर ।।
कण कण में है,वास असर ।
करते सबकी ,बुद्बि प्रखर ।।
कम में कर ले,मनुज बसर ।
दया सिन्धु प्रभु,करें अमर ।।
रखे न मन में,भाव अकड़ ।
चलते प्रभु हैं ,हाथ पकड़ ।।
निर्मल करते,तन मन उर ।
पाप मुक्त हो,जाय सुधर ।।
सच का करते,सदा वरण ।
प्रभु के केवल,शुद्ध चरण ।।
जाते जो नर,प्रभो शरण ।
करें कष्ट का,निराकरण ।।
👇
चले बाप का,हाथ झटक ।
घर से निकला,पैर पटक ।।
समझाने का,नहीं असर ,
गया मनुज है,राह भटक ।।
++++++++++++++++++
मन की पीड़ा,रही खटक ।
गले पास आ,गयी अटक ।।
फँसी नाव फिर,बीच भँवर ,
गिरा गगन से,गया लटक ।।
+++++++++++++++++++
देख रहा है,वह टक- टक ।
चोर गया अब,देख सटक ।।
मानवता जब,दिखे बिकट ,
जिन्दा मक्खी,जाँय गटक ।।
+++++++++++++++++++
झूमर जस वह,रहे मटक ।
लगता दर्पण,गया चटक ।।
बहता जाये,जल अविरल,
वायु नीर का,एक घटक ।।
👇
शुभता ले के,पथ पर चल ।
मन में रख तू ,भाव सरल ।।
अपने भी हो,जाँय विमुख ,
सत्य बात पर,करो अमल ।।
गंगा सा बह,कल कल कल ।
हँस कर पी लो,मित्र गरल ।।
कुछ करना है,दिखो अलग,
खिले कीच में ,भव्य कमल ।।
दर्पण में लख,यार सकल ।
व्यर्थ बोलता,मनुज चपल ।।
सच कहना हो,कहीं अगर ,
हो जाती तब,कुन्द अकल ।।
मानवता अब,चुकी बदल ।
औरों की मत,करो नकल ।।
सदा लक्ष्य पर,रखे नजर ,
होता है वह,यहाँ सफल ।।
अगर लगी है,कहीं अनल ।
डालें उस पर शीतल जल ।।
पाना जिसको,सही डगर,
याद करे प्रभु,को हर पल ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌹 पृष्ठ क्रमांक 34🎈
अत्याचारी नगर-नगर।
बेटी पर है बुरी नज़र?।
गाँव-गाँव औ शहर-शहर।
महानगर में मचा कहर।।
सही मार्ग से गये भटक।
चौराहों पर रहे मटक।
लड़की छेंड़े बीच सड़क।
आग हृदय में उठी भड़क।।
रखते हैं जो बुरी नजर ?
खुद को समझें बली प्रवर।
काल सभी पर रखे नज़र।
गिरे बड़े से बड़े सजर।।
अभी समय है ज़रा सँभल।
सदाचार का करें अमल।
अभी तजें जो कर्मं-अनय।
समय दे रहा तुम्हें समय।।
👇
श्याम-दर्श की रहे ललक।
अब दिखला दो एक झलक।।
रिमझिम अखियाँ रहीं बरस।
प्रभु-दर्शन को रहीं तरस।।
नैन-तपन अब करो शमन।
हृद-आँगन में खिले चमन।।
तव चरणों से रहूँ लिपट।
सदा तुम्हारे रहूँ निकट ।।
अब कुछ ऐसा करो यतन।
अष्टयाम नित करूँ भजन।।
दुष्प्रवृत्तियाँ करो दमन ।
जीवन में अब रहे अमन।।
👇
औरों की क्यों करे नकल?
जरा नकल में लगा अकल।
रूप सभी के अलग-अलग।
चाल-ढ़ाल हैं अलग थलग।।
बुरे संग ने लिया जकड़।
तेरी आदत गयी बिगड़।
गया उलझ यह जाल मकड़।
चलता है तू अकड़-अकड़।।
दुर्विचार से सदा झगड़।
इनसे हरदम रखो अकड़।
अन्तस कोठी नित्य रगड़।
सद्विचार की ड़ोर पकड़।।
गुणवानों के बैठ निकट।
अवगुण भागें कटा टिकट।
सद्विचार वे शान्ति सदन।
हाथ जोड़ कर करो नमन।।
बोल कड़क पर हृदय सरल।
वचन श्रवणकर करो अमल।
सत्संगत को रखो पकड़।
सदाचार से रहो जकड़।।
दुर्व्यसनों की हो न दखल।
सज्जनता का बने महल।
रखो भरोसा सदा अटल।
सद्कर्मों की उगे फसल।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌹 पृष्ठ क्रमांक 35🎈
विधा:- गीतिका
*******************
हवा वसन्ती,गाँव- शहर।
चले जोर से,लहर-लहर।।
फुलवारी में,खिली कुसुम,
महके हर पल,महर-महर।।
कली-कली का,हुआ रसिक,
गुनगुन गाता ,गीत भ्रमर।।
रवि की किरणें,हुईं चपल,
रंग बदलती,पहर-पहर।।
करे शीघ्रता,अग्नि जलन,
ज्वाला है अब,और प्रखर।।
आलस तज कर,धरा मगन,
नई वधू सी,गई सँवर।।
गदराई हैं,खूब फसल,
सरसों अलसी,चना मटर।।
होली की है, बात सरस,
फागुन का अति,हुआ असर।।
बैठी गोरी,दुखी बहुत,
परदेशी की,देख डगर।।
👇
मुक्तक-
*******
समरसता हो,मनुज हृदय।
प्रेम परस्पर,हो अतिशय।
वैर भाव का,नाम नगण,
जीवन हो तब, मंगलमय।।
मानवता का,धर्म पवित।
जन-जन के मन,रहे निहित।
आपस में सब ,रहें सहज,
भाईचारा हृद,हो विकसित।।
ईश एक है, नाम बहुत।
वही तारता, जहान च्युत।
तेरे - मेरे , ईष्ट पृथक,
कह हारो मत ,जीवन द्युत।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मातु शारदे रूप विमल |
श्वेत रंग है दुग्ध धवल ||
वीणा पुस्तक हस्त नवल |
अन्तर्मन को करें अमल ||
रहें नहीं मन में कुवचन |
करते हैं सब शुभाचरन ||
रहें विचार न जरा मलिन |
मां का वन्दन और यजन ||
👇
मन में मेरे , उठे लहर |
शाम सबेरे , आठ पहर ||
देखा करती जमा नजर |
आए मोहन , कब नटवर ||
मीरा के मन , लगी लगन |
मान श्याम को लिया सजन ||
निशिदिन करती ,रही भजन |
किया निछावर ,निज तनमन ||
सतसंगति में , रही मगन |
रही घूमती वह वनवन ||
रंग गेरुए, रंगे वसन |
है मनमोहन , राधा रमन ||
👇
उजला उजला नील गगन |
महक उड़ाती हुई पवन ||
स्वर्ण रश्मियाँ छुएँ बदन |
बासंती का गजब चलन ||
सरिताओं का नीर विमल |
खेतों में झूमती फसल ||
सरोवरों में खिले कमल |
भ्रमरों का मन हुआ चपल. ||
👇
प्रेम पंथ है , बहुत कठिन
उस पर चलना,नामुमकिन
जब बढ़ जाती,हिये ललक
पर बिन उड़ने ,लगें फलक
हो जाता है , जब असफल
नींद न आये , राजमहल
फूलों से भी , लगे चुभन
दिल में लगती, बहुत अगन.
जया शर्मा
दरिया में जल, रहा मचल
मस्त मछलियाँ,रहीं उछल
सूर्य रश्मियाँ, पड़ें नवल
स्वर्णिम आभा, क्षीर बिमल.
किंशुक फूले, फूल विजन
दहकें पलाश, लगे अगन
महके महुआ,वन उपवन
कूके कोयल ,करे भजन.
मन में होती,उथल पुथल
लड़की देखी ,गया मचल
लड़के होते ,बहुत विकल
मन में मचती ,है हलचल
गाते हैं वह, गीत विरह
ठंडी स्वासें, लें रहरह
घर में चाहे, मचे कलह
झगड़ा करते,बिना वजह.
जया शर्मा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🌹 पृष्ठ क्रमांक 37🎈
मंद-सुहानी, चले पवन।
आज शीत का, हुआ गमन।।
वसुधा पहने, पीत वसन।
सुरभित आँगन, खिला चमन।।
उपवन छाए, वृक्ष सघन।।
कलरव करते, विहग मगन।
छूना चाहें, भव्य गगन।।
सुख-वैभव से ,भरे भवन।।
प्रेम-भक्ति से, चढ़ा सुमन।
हाथ जोड़ कवि, करें नमन।।
कटुता का माँ, करो शमन।
करूँ शुद्ध मन, छंद सृजन।।
चंचल चपला, लगा लगन।
निरखे आनन, सौम्य बदन।।
मोहित करते, दिव्य नयन।
हुए बावरे, देख सजन।।
मुनिजन करते, नित्य हवन।
बैठ साथ में, करें मनन।।
निकले मुख से, यही कथन।
सत्य-धर्म पथ, करें गमन।।
👇
विधा-गीत
सुख-वैभव का किया दमन।
भूल गए क्या प्रीत सजन?
कंटक की है उगी फसल।
सरवर खिलते नहीं कँवल।।
अवसादित सी भोर नवल।
विरह-वेदना हुई सफल।।
मुरझाया सा लगे चमन।
भूल गए क्या प्रीत सजन?
गिरे शाख से शुष्क सुमन।
उपवन देता गहन चुभन।।
अंतस् व्यापित घोर घुटन।
नयनों में भर दिया रुदन।।
यादें देती मुझे तपन।
भूल गए क्या प्रीत सजन?
तुम्हें भुलाना नहीं सरल।
पीना पड़ता नित्य गरल।।
तुम बिन सूना लगे महल।
यहाँ नहीं अब चहल-पहल।।
करती "रजनी" आज मनन।
भूल गए क्या प्रीत सजन?
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
केंद्रीय बजट पर प्रतिक्रिया में एक व्यंग्य रचना
^
आया अबकी,खूब बजट,
पर विपक्ष को, लगा कपट ।
कहीं न कोई ,लाग लपट,
फिर क्यों निंदिया,गई उचट।
-
चिंतन कर लो, और मनन,
या फिर केवल ,करो भजन।
आपाधापी ,के पल क्षण ,
शंकाओं का,कहाँ शमन ?
-
मत विरोध में,पाँव पटक ,
तंग गली है ,अब न भटक ।
मन संशय में, गया अटक,
झेल न पाए, चटक मटक ।
-
लड़ने को है ,आतुर मन,
सूख रहा है,व्याकुल तन।
जब न कभी हो,बहिर्गमन ,
सूना लगता , लोक भवन।
-
हुई न कोई ,लो खटपट,
कैसे पाएँ , लोग निपट ,
एक छलावा ,रहा बजट ,
काम हो गया क्यों झटपट?
-
सुनना बाकी ,कड़े वचन,
कान बंद हों, मुँदे नयन ।
अंगारों से , जला चमन ,
फिर भी शीतल लगे पवन।
-
जादू देखा ,अजब विकट,
सौगातों का ,जिन्न प्रकट।
आम आदमी , चल अब हट,
देखो जाना , नहीं रपट।
👇
गीत एक जाते हुए मौसम का
------------------------------------
(छंद - मनमोहन- मात्राएँ 8+ त्रिकल +6 नगण)
^
धूप सुनहरी, रही निकल,
कहा शीत ने,अब घर चल।
-
बहुत दिनों तक,ताज पहन,
हों अपमानित, नहीं सहन।
राज कर लिया,छोड़ महल।
-
देख काँपते,सब थर थर,
बैठा रहता, भीतर डर।
हुए शीत से,सभी विकल।
-
थोड़े दिन तक, रुका गमन,
बदल रहा है, मानुष मन।
ठंड गुलाबी, लगे विमल।
-
भोले भाले, सभी सुजन,
ओढ़ रजाई करें भजन।
मौसम करता,उनसे छल।
-
हमको करना,याद सुहृद,
कम्बल, स्वेटर, लगे सुखद।
दण्ड ठंड का,खला न पल।
-
सूरज होगा, जहाँ प्रखर,
गर्म हवा ज्यों, हुई मुखर।
सके हमारी,दाल न गल।
-
इससे पहले, बढ़े उमस,
हमको जाना, हुए बिबस।
विदा हमारी,है दल- बल।
👇
गीतिका ~
चलो खिलाएँ,नित्य सुमन,
हर्षित होकर, खुलें नयन।
-
विहँसे तृण तृण,उड़ें विहग,
हर घर आँगन, हो उपवन।
-
सूरज चमके, सुबह सुबह,
मन को मुकुलित,करे गगन।
-
शीत विदा है ,भोर सुखद,
नव बसंत का,शुभागमन।
-
कर अभिनंदन,हँसें अधर,
रहे न कोई, कहीं चुभन।
-
बाँटें सबको, हर्ष प्रतुल,
सद्भावों को,करें नमन।
👇
गीत ~
कितनी भी हो,धार प्रबल,
तरणि तैरती, यदि भुजबल।
-
फिक्र देश की,दिन दुपहर,
तूफानों से, रहे निडर ।
परहित है कर्तव्य प्रखर ,
जन्म उसी का,हुआ सफल।
-
अंगारों पर, रखकर पग,
जो चुनता है, दुष्कर मग।
उसे याद करता यह जग
लिख देता जो पृष्ठ धवल।
-
नहीं जरूरी,हो मखमल,
खिला कीच में, सदा कमल।
सत्कर्मों के, संचित पल
हृदय पटल पर, राष्ट्र नवल!
-
मातृभूमि हित,अर्पित तन,
लोक हितैषी जिसका मन।
गाथा उसकी,सदा विमल
जो संकट में,रहे अटल।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 39🎈
मुक्तक युगल!
कितना सुंदर , आज दिवस।
नहीं शीत है , नहीं उमस।
त्रिविध गुणित बह , रहा पवन ,
तन-मन पुलकित , नयन अलस।
आज मगन है , धरा - गगन।
साँसों में है , मलय पवन।
विश्वासों का , सजल कलश ,
फिर भी संभव , नहीं मिलन।
👇
(१) कह कर जाते , बात मुकर।
नहीं देखते , फिर मुड़ कर।
पड़े जरूरत , झुकें तुरत ,
नर होते सखि! बड़े चतुर।
(२) मानो मेरी , बात सजन!
निर्जन आधी , रात सजन!
हो जाने दो , ज़रा सहर ,
फिर जाना घर , चले सजन!
👇
(१) तुम्हें बुलाती , हूँ नटवर!
आओ राधा , के प्रियवर!
करे दुशासन , चीर - हरण ,
लाज बचाओ , वृष्णि - प्रवर!
(२) भीष्म पितामह , सदृश सुभट।
हैं नाटक के , पात्र प्रकट।
लाज बचाओ , हे गिरिधर!
आज समस्या , महा विकट।
(१) आज हुआ कुछ , मन अनमन।
हो न सकेगा , सूर्य नमन।
शिथिल हुए हैं , अंग सकल ,
जी मिचलाता , हुआ वमन।
(२) एक गिलहरी , रही उतर।
डाली पर फल , रही कुतर।
बोल रही है , उछल - उछल ,
चंचलता हो , रही मुखर।
- जयकृष्ण पाण्डेय 'कोविद' , उन्नाव , उत्तरप्रदेश।✍️
👇
मंदिर में हैं , पंत प्रवर।
कर देंगें वे , हमें निडर।
जीवन होगा , प्रिये!सफल ,
प्यार हमारा , अजर अमर ।
चलो चलें हम , अभी नगर।
सिर्फ लगेंगे , तीन प्रहर।
जहाँ रात -दिन , चमक-दमक ,
घड़ी बोलती , ठहर - ठहर ।
👇
रक्खी तुम ने , नहीं कसर।
किसी तरह , हो रही गुजर।
फिर भी गाऊँ , गीत सनम!
राम तुम्हें दे , बड़ी उमर।
एक टीस है , अभी तलक।
राह देखती , खुली पलक।
आज तुम्हारा , जन्म-दिवस ,
मैंने धोए , नहीं चषक ।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 40🎈
शिव शम्भू का,नाम जपत,
मैया गौरी,राह तकत।
कब आओगे,ओ त्रिभुवन,
बाट जोहते,सजल नयन।।
विकल हृदय को,आस दरश,
बीत गए हैं,मास बरस।
आ भी जाओ,ओ भगवन,
सूना-सूना, हृदय भवन।।
चाह यही है,बन दुलहन,
साथ कैलाश, रहूं भवन।
जनम-जनम का,साथ सजन,
रोज करूॅ॑ मैं,यही भजन।।
👇
मात शारदे,करूॅ॑ नमन,
ज्ञान ध्यान माॅ॑,करूॅ॑ गहन।
हस्त जोड़ धर,शीश चरण,
आया माते, भक्त शरण।।
श्र्वेत वस्त्र है,कमल नयन,
माता मेरी,करो जतन।
नित्य करूॅ॑ मैं,नवल सृजन,
गीत लिखूं अरु, लिखूं भजन।।
दुविधा मेरी,करो हरण,
दुष्टो का माॅ॑,करो मरण।
माता देना, हमें वरद,
रहे हमारा, हृदय शरद।।
👇
झरने झरते,झर-झर-झर,
पत्ते हिलते,फर-फर-फर।
नदियाॅ॑ बहती,कल-कल-कल,
मौसम बदले,पल-पल-पल।।
कोयल कूके,कुह-कुह-कुह,
पंछी बोले,चुह-चुह-चुह।
भॅ॑वरे गाते,गुन-गुन-गुन,
कलियाॅ॑ बोली,सुन-सुन-सुन।।
मयूर नाचे,छनन छनन,
बादल डोले,भनन भनन।
खुशबू फैली,महक महक,
चले पवन भी,लहक लहक।।
जियरा बोले,सजन सजन,
नैन मिलाओ,मगन मगन।
मौसम कहता,खेल बलम,
करो न कोई,*प्रिया* जुलम।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 41🎈
दया भाव की, खास नजर।
बनूं सिपाही, प्रेम डगर।
मिटे झूठ का,घुला जहर;
बढी सदा ही, प्रीत लहर।।
***
आंखें लेती, यहां खबर।
जब जब पाती, बुरी खबर।
अपने पन की, बही लहर;
मन की हरती, सभी कहर।।
***
मित्र लगे जब खिला कमल।
और करें हॅंस, यहां पहल।
मन में गुनगुन, सरल तरल;
सिद्ध रहे मन, त्याग सफल।
***
जीवन की हो, एक नजर।
कोमल कोमल, लगे बजर।
ढूंढे सेवक, कहां कसर;
मन से त्यागा, अगर - मगर।।
***
मौलिक -स्वरचित
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देखूँ प्रभु की,एक झलक
आँसू से हों,भरे नयन
सच्चे मन से, हो सिमरन।
मीरा जैसी,नहीं लगन
होगा कैसे,महा-मिलन
मरने की तुम,करो पहल
जीवन होगा,तभी सफल।
दूर धरा को,छुए गगन
दोनों मिलकर,हुए मगन
झूम झूम के,बहे पवन
प्यारा लगता,है उपवन ।
उठता है जब,एक कदम
किस्मत बनती,तब हमदम
मन में जिसके,लगी लगन
छू सकता है, वही गगन ।
👇
जीवन तो है,एक सफर
कभी इधर तो, कभी उधर।
अपने बल पर, नहीं अकड़
सदा सत्य की, राह पकड़।।
कल क्या होगा,किसे खबर
कब लग जाये,बुरी नजर?
करो नहीं तुम,अगर मगर
सच्चे मन से,राम सिमर।।
बात पते की,करो अगर
होगा उसका,बडा़ असर।
पकडे़ रहना,नेक डगर
सच कहने से,कभी न डर।।
राम नाम का,बडा़ असर
जपना इसको, आठ प्रहर।
जी लेता जो,मर मर कर
उसका होता,नाम अमर ।।
👇
गौरा जी से,हुआ लगन
भोले बाबा, बडे़ मगन
बजी दुन्दुभी,आज गगन
सब देवों के, हर्षित मन।
चली बारात, उमा भवन
बाराती थे,अर्ध नगन
दूल्हे पर जब,पडी़ नजर
सखियाँ हँसती,रह रह कर
माता मैना,रहीं सुलग
पिता सोचते, खडे़ अलग
"निर्णय मैंने लिया गलत"
मान लिया जो,नारद मत
शिवजी हँसते,थे मन मन
दुनिया का है,यही चलन
भाते सबको,कमल नयन
निर्णय करते,देख वसन।
दिया सभी को,शुभ दर्शन
प्रकृति पुरुष का,हुआ मिलन
दोनों मिलकर,चले गगन
हम सब उनको,करें नमन ।
1-
मार दुखों की, पडे़ अगर
जीवन जाता ,और निखर
लकडी़ घिसकर ,ज्यों चन्दन
सोना तपकर, है कुन्दन
2-
वृक्ष बडे़ ही ,हैं सज्जन
औरों के हित ,सहें तपन
फूलों से नित,खिले चमन
खुशबू देता, है मधुवन
3-
सैर-सपाटा,तड़क भड़क
सीधी सच्ची, नहीं सड़क
झूठी सारी, चमक दमक
जाना इसमें,नहीं भटक
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 43🎈
#मनमोहन_छंद_आधार_मुक्तक
राष्ट्र प्रेम को, करे नमन |
मनुज मांगता सिर्फ अमन ||
बात मानले लोग अगर |
तो ख़ुश होगा बड़ा,वतन ||
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 44🎈
चन्दा तारे, नील गगन।
मिलकर रहते, खूब मगन।
मानुष के मन, रहे जलन,
काटा- काटी, और दमन।।
आओ मिल कुछ, करें पहल।
सब मिल बैठें, छंद महल।
आलस त्यागें, चले कलम,
हरदम होता, रहे नवल।।
उपवन में फल, फूल फलित।
भौरा बहके, देख ललित।
तितली भागे, इधर- उधर,
बच्चे देखें, पंख कलित।।
मुश्किल चलना, कठिन डगर।
सूख गये सुकुमार अधर।
आओ बैठें, छाँव विटप,
जाना मुझको, दूर नगर।।
मन को धोना, रगड़- रगड़।
रहे न मन मद, पुनः पकड़।
बांध अभी मन, रहे नरम,
वाणी में मत, दिखा अकड़।।
पंकज रखता, शील धवल।
अमित मनोहर, कीच कमल।
संगत में मत, रूप बदल,
अच्छे कर लो, कर्म फसल।।
👇
हुआ सहोदर, संग कपट।
आयी इक दिन, घड़ी विकट।।
चौसर में जब, हुए विफल।
धर्म झुका था, पाप प्रबल।।
हुआ सभा में, चीर हरण।
गई द्रोपदी, कृष्ण शरण।।
लाज बचाये, बढ़ा वसन।
द्रुपदसुता ने, किया नमन।।
करना इस पर, नहीं रहम।
तोड़ो इनका, लोभ अहम।।
रक्त बदन से, खींच पटक।
धोना मुझको, शीश अलक।।
रोई कृष्णा, हृदय अगन।
निर्झर धारा, नीर नयन।।
द्रुपदसुता के, प्रश्न प्रबल।
उत्तर में सब, हुए विफल।।
संकट में थे, प्राण सरस।
नैना जलधर, रहे बरस।।
लाज बचाओ, पडूँ चरण।
उठा न कोई, चीख श्रवण।।
👇
दशरथ के थे, चार सुवन।
खुशियां बरसे, खूब भवन।।
छवि मनमोहक, राम रतन।
कहती माता, कमल नयन।।
सीता माँ थी, सुता जनक।
मुख की आभा, रहे कनक।।
व्याह लिए प्रभु, तोड़ धनुष।
सिय मुख सुंदर, नयन तनुष।।
मातु कैकयी, कोप भवन।
माँग लिया फिर, आज वचन।।
मतिभ्रम हुआ, किया कपट।
भरत हेतु पद, लिया झपट।।
रघु का चौदह, बरस गमन।
या होऊँगी, स्वयं दहन।।
दशरथ सुनकर, गये सहम।
तुझको है बस, अहम-वहम।।
खूब निभाया, तात वचन।
राम चले वन, छोड़ सदन।।
माता रोवे, निरख सुवन।
दशरथ त्यागे, प्राण बदन।।
शीश खड़ाऊँ, सजल नयन।
हृदय समाहित, दर्द चुभन।।
पीर भरत, बिन, राम दरस।
पल पल जाये, नैन बरस।।
रावण ने सिय, किया हरण।
अपने हाथों, लिखा मरण।।
प्रेम निहित सिय, राम चरण।
मन न थके यह, करत वरण।।
रावण का प्रभु, किये दलन।
दैत्यों का फिर, हुआ शमन।।
चले अवध कर, पूर्ण वचन।
खुशियाँ छाई, राम मिलन।।
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अब बसंत है , शीत गमन ।
नूतन पल्लव, खिले चमन ।।
खुशबू देती , चले पवन ।
पावन दिन हैं , करे हवन ।।
खुशियाँ भरते , गाँव शहर ।
सुन्दर लगते , सभी पहर ।।
पात पात में , है सरगम ।
मौसम सुन्दर , है हरदम ।।
👇
विधा - मुक्तक
आधार - मनमोहन छंद
बहुत प्रदूषण , दुखी शहर ।
मिला हवा में , प्रबल जहर ।
जीना मुस्किल ,है दिन दिन ,
कैसे निकले , अष्ट पहर ।।
दिखे नहीं अब , साफ गगन ।
धुंध कोहरा , बने सघन ।
फिर भी मानव , बना निडर ,
नेता बैठे , बने मगन ।।
दूषित बनकर , चले पवन ।
कोई बचे न , कहीं भवन ।
तजे पुराने , चाल चलन ,
अब वो होते , कहाँ हवन ।।
जागो जागो , अब जन जन ।
बिगड़ रहा है , ये तन मन ।
सभी सुधारो , मिल कर कल ,
फिर से करदो , जगत चमन ।।
👇
गीत
आती खुशबू , अब हरपल ।
पेड़ पेड़ में , है हलचल ।
मधुमास बना , बहुत सुखद ।
मन मोहे अति ,सब गदगद ।।
भँवरे गूँजे , आकर दल ।
आती खुशबू , अब हरपल ।।
पुष्प खिले हैं , सजे सघन।
सुन्दर लगते , सब उपवन ।।
मन मोहक है ,धरा सकल ।
आती खुशबू ,अब हरपल ।।
नूतन पल्लव , सुन्दर अति ।
करे डाल पर ,कोयल गति ।।
मन को हरता ,सज कर तल ।
आती खुशबू ,अब हरपल ।।
👇
विधा - मुक्तक आधार - महा मनमोहन छंद
आया महिना फागुन अब , खुशियाँ भरते ये उपवन ।
चारों कोने रहे महक , खुशबू वाली बहे पवन ।
खुशी भरे सब निहार कर , दृश्य लगे ये बड़ा गजब ,
नाच रहे खग उड़ उड़ कर , दरखत लगते इन्हे भवन ।।
रंग रंग के पुष्प खिलत , मन को मोहे बड़ी महक ।
मोर पपीहा शोर बहुत , नाचे चिडियाँ रही चहक ।
कोयल के ये गीत गजब ,मन को हरते कर गद गद ,
पुष्प गंध मय चले पवन , भँवरे घूमे रहे बहक ।।
अब बसंत है सुन्दर ऋतु , सबका खिलता ये तन मन ।
भ्रमण भोर में करे बहुत ,स्वास्थ्य लाभ को ले जन जन ।
बड़े बड़े भी पैदल चल , सुखी रहे अब लोग सकल ,
प्राण वायु को करे ग्रहण , सुबह शाम बुक सब उपवन ।।
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विधा - महा मनमोहन छंद
तुम प्रभु मालिक रचा जगत , करता तुझको सदा नमन ।
सुन्दर सुन्दर हैं दरखत , सुन्दर सजते सब उपवन ।।
नदियाँ बहती सब कल कल ,सींच रही ये धरा सकल ।
हरियाली सब पर्वत पर , तुम ही देते लाकर जल ।।
सबके रक्षक हो प्रभु तुम , आप भरोसे जीवन सब ।
संकट आता दानव बन , तुम्ही बचाते आकर तब ।।
जीवन चाहे जल थलचर ,पल पल रखते आप नजर ।
भव से तारो पड़ा शरन , आप अमर प्रभु आप अजर ।।
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माँ गायत्री,करें नमन।
प्रज्ञा की हो, खान गहन।
दो विवेक हम, बनें सरल-
आदि शक्ति तुम, सत्य कथन।
करते हैं हम, रोज भजन।
तुझसे ही है, लगी लगन।
होती है जब, राह कठिन-
देती हिम्मत, करूँ सहन।
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कब आओगे लहर बहर
आया फगुआ चली लहर
रंगों से भीगे तन मन
जीते जी हो जाय मिलन।
मत लाना संदेश सनम
करूँ न शिकवा कोइ सितम
दिखलाना तुम मुझे दरश
चले न खुद पर मेरा वश।
इतनी सी है मुझे गरज
सुन लो मेरी प्रिय अरज
होली है मेरी प्रियतम
तुम बिन कटे नहीं हमदम।
👇
महा मनमोहन छंद आधारित मुक्तक
आया फागुन मास सरस, खेलेंगे हम फाग सजन।
गोरी होती आज मुखर, लाज त्याग बस कहे वचन।
रहती है वह सदा सरल, पर मौसम ने किया गजब-
समय बड़ा है आज सुलभ, तन मन में है लगी अगन।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 47🎈
करिए अब तो,जरा मनन।
अच्छे दिन का,करें चयन।।
बोलें मुख से, मधुर वचन।
सब समझेंगे, तुम्हें रतन।।
प्यारा हमको, सदा वतन।
इसकी उन्नति,करें जतन।।
दुष्टों का अब, करें दलन।
रहना अपने,देश ललन।।
सब वीरों को, करें नमन।
दुश्मन का वे, करें दमन।।
महके अपना, सदा चमन।
कायम रखना,सदा अमन।।
👇
शुभ शब्दों का, करें चयन।
मानस में फिर, करें वयन।।
मुख से होकर,बहें मधुर।
रहना फिर हो,सदा अधुर।।
रहना उस पर,सदा अटल।
चाहे पीना, पड़े गरल।।
समझेगा जो, अर्थ सुघड़।
तब पाएगा, नहीं उखड़।।
मुख से निकलें,वही वचन।
नहीं किसी का, करें दमन।।
अंतर्मन में, करें गमन
कष्ट वहीं पर, करें शमन।।
👇
जब उगता है,सूर्य गगन।
ऊर्जा पाता ,तभी चमन।।
करती धरती,अभिनंदन।
प्राणी करते, हैं वंदन।।
सूर्य किरण जब, हुई प्रखर।
जल में थल में, रही निखर ।।
आती पत्तों,से छनकर।
रहती है फिर, भी तनकर।।
चलती रहती, तृण-तृण पर।
मुस्काती़ हर,कण-कण पर।
चढ़ जातीं हैं, हर घर पर।
कब करती हैं,अगर मगर।।
रहे शीत में, सदा सिहर।
गर्मी में ये, रही विहर।।
हुई तेज तो, लगे अनल।
तपे देह तो,लगे गरल।।
कामिनी श्रीवास्तव'कीर्ति'
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आया बसंत, बहे पवन।
लगता सुन्दर,प्रकृति अवन।।
जीव-जंतु जन,दिखें मगन।
उठे हृदय में,प्रणय -अगन।।
महकें अतिशय,गली डगर।
मोहक लगतें ,गाँव नगर।।
विहँसे सुरभित,सभी कुसुम।
उड़तीं तितली,सुसुम-सुसुम।।
खिल उठी धरा, वन-उपवन।
होता मोहित ,मानव - मन।।
निशा स्वच्छ हो,स्वच्छ गगन।
टिम-टिम करते,अब उडगन।।
चहुदिशि उड़तें,मधुप-भ्रमर।
गुन - गुन करतें,सभी प्रहर।।
रोमांचित हो, मनुज बदन।
प्रेम जगाते, देव मदन।।
चिड़ियाँ चहकें, चारु चमन।
दृश्य दिखे ज्यों,हो मधुवन।।
कोकिल कूके, करे शमन।
शीत गया अब,हुआ'अमन'।।
👇
'दौलत'
दौलत महिमा,बड़ा प्रबल।
जिससे मानव ,रहे सबल।।
दौलत देता ,खुशी सकल।
स्वामी बनता, पुंज अकल।।
जीवन बगिया ,लगे चमन।
रहता है जब,अतुलित धन।।
होते सारे , कष्ट शमन।
जीवन में हो,चैन- अमन।।
दौलत बिन सब,दांव विफल।
दौलत से हर,यत्न -सफल।।
उत्तम रहता ,रहन - सहन।
करता सारे , भार - वहन।।
चाहे कर लो, बहुत रमन।
दौलत करता, नही गमन।।
असतो मा जन,सत्य गमय।
पछताओगे , अंत समय।।
👇
नदियाँ बहतीं,कल कल कल।
जन से कहतीं,चल चल चल।।
रुको नही तुम,चल प्रति पल।
जीवन हो जब, हो हलचल।।
सच्चे मन से, करो करम।
पाल न कोई, मनहि भरम।।
हर मानव से, रहो नरम।
मानवता है, मनुज धरम।।
कर्म करो तुम, चाह न फल।
भगवन देते , हैं प्रतिफल।।
कर्म माहि तव, केवल हक।
फल के लिए न,कर तकझक।।
कर्म करो नित, बनो सफल।
आलस से जन, बने विफल।।
पावन पथ पर,रख निज पग।
कुपथ कर्म से, रहो अलग।।
कहें कृष्ण प्रभु, यही वचन।
ब्रह्म सत्य हैं ,जग अड़चन।।
भजो ईश को, करो नमन।
देते जन को ,वही "अमन"।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 49🎈
मुक्तक
आँखें मत कर मित्र सजल।
बना जिंदगी गीत-गजल।
चलता चल मत रोक कदम,
मजल मारकर मिले मजल।१।
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जग में राहें कई नवल।
चुन कर कोई राह धवल।
चलता चल मत रोक कदम,
मिलें खार या मिलें कँवल।२।
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छोड़-छाड़कर अगर-मगर।
पथरीली या सरल डगर।
चलता चल मत रोक कदम,
जीवन करले जगर-जगर।३।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 50 🎈
हे माँ वाणी तुम्हें नमन!
रूप सुहावन, दीप्त नयन!
नित बाँटे माँ, ज्ञान गहन।।
देख सरल मन, भाव मगन!
वर दाती को, करूँ नमन।।
कर में पुस्तक, वसन धवल।
शोभन आसन, श्वेत कमल।।
आओ काव्या, छंद महल!
सृजनात्मकता, करो सहल!!
जग माया अति, घोर कहर!
बेधे मन को, तिक्त असर!!
डालो हे माँ, सुखद नजर!
मुझे दिखाओ, सही डगर!!
👇
प्रकृति का सानिध्य
शीत लहर ने, किया गमन।
बिहँस रहे घर, खेत, विजन।।
दूर गया अब, कुहिर सघन।
मुदित दिवाकर, चाँद, गगन।।
ठहर - ठहर कर, चले पवन।
रव गूँजे कर, सनन - सनन।।
तन पर शोभित, पीत वसन।
सुमति धरा यह, हुयी मगन।।
बदला सबका, रहन - सहन।
मन भावों का, खिला चमन।।
बसी हृदय में, प्रीत लगन।
प्रिया सजाई, सुखद सपन।।
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मनमोहन छंद [१४ मात्रा अंत नगण [१११ त्रिपल लघु ]
तुमसे कान्हा लगी लगन l
हे मनमोहन , तुम्हें नमन ll
राधा रानी लखे वसन l
हो जाती है सखे मगन ll
पिंगल रचना , करें चयन l
शब्दों में हो भाव गहन ll
आलौकिक हो अर्थ वसन l
अलंकार रस छंद सघन ll
कथ्य निरूपण प्रिये सबल l
सोचो ऐसा लगे नवल ll
गीत गीतिका प्रिये सजल l
रचना सुन्दर शब्द चपल ll
अष्टम षष्टम अंत नगण l
वर्जित मित्रों तगण भगण ll
अंत न आये कभी यगण l
मनमोहन में अंत नगण ll
👇
भावी पीढ़ी सृजन परम l
छन्दस सीखो प्रिये प्रथम ll
मातु पिता का ज्ञान धरम l
मिलता है सुख प्रिये चरम ll
श्रेष्ठ जनों को करो नमन l
देखो दर्पण करें गमन ll
मत सोचो तुम , कभी दमन l
विजय मार्ग है सखे शमन ll
नील गगन में करें भ्रमण l
मन में सीता राम रमण ll
रघुपति राघव सीय वरण l
दुनिया छूती मातु चरण ll
हे माँ लक्ष्मी करो तरण l
रावण आया सीय शरण ll
साधु रूप धरि किया हरण l
लंका सीता पड़े चरण ll
👇
राजनीति में, लगी लगन l
चंगू मंगू , हुए मगन ll
नेतागीरी , भाव भजन l
चला चुनावी ,जंग यतन ll
मायावी हैं , बोल वचन l
बिगुल बजा कर , चला ठगन ll
संग सारथी , कमलनयन l
मिलना किससे, करें चयन ll
पहने कपडे श्वेत धवल l
बातें करते , सदा नवल ll
शिक्षा सड़कें , भाव प्रबल l
मानवता "की" करें पहल ll
👇
मनमोहन छंद [लघु -लघु मात्रा भार में ]
शबनम मलयज , पहन वसन l
खगकुल नभ लखि , बहत पवन ll
उमड़ि घुमड़ि घट, दिखत सघन l
रवि रथ गति महि , सुखद गगन ll
बरबस नयनन , लखत मगन l
उपवन किसलय , कहत सजन ll
दस दिशि दिनकर , करत नमन l
रतिपति मति गति , सकल नयन ll
👇
सोमवार शिव , शिवा नमन l
मंगल हनुमत , उड़े गगन ll
तारा चन्द्रहि , भाव सुवन l
विस्मृत कामहिं , चंद्र चलन ll
यश वैभव सुख ,ज्ञान सफल l
महादशा बुध, बुद्धि प्रबल ll
नर इल नारी , इला प्रथम l
देखे बुध झट , बढे कदम ll
राजकिशोर मिश्र राज प्रतापगढ़ी✍️~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
पतझर मौसम,चली पवन।
उड़ते सूखे,पात सघन।।
बदला सा है ,रूप सरल।
नूतन कोपल,करे पहल।।
आया शुभ मधु , मास नजर।
पीली चादर,धरा लहर।।
कोयल मीठी,गान श्रवण।
सुनकर मानस, खुशी धरण।।
महके सारे,बाग चमन।
मन मोहक सी ,खिले सुमन।।
भँवरे गाते,गीत सतत।
प्रेम जगाये,जीव जगत।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 53🎈
महा मनमोहन छंद पर मुक्तक आपकी खिदमत में है----
(विधान- कुल 14 मात्रिक छंद,8+6 पर यति पदान्त नगण 111आवश्यक)
🌹मुक्तक🌹
मानव रखता कर्म सटिक, सेवा पावन धर्म पथिक |
सबको देता सीख श्रमिक, जिससे जाने मर्म पथिक|
परसेवा श्रम साध्य तपिश,लिखता सुन्दर छंद कविश
पाप पुण्य में भेद जटिल, हमसे कहता कर्म पथिक|
मन मस्त चला राह विकट, प्रेम लुटाता प्रेम पथिक|
चलता जाता निर्झर बन, प्यास बुझाता प्रेम पथिक|
उत्तम होती सोच अगर, रखते इतनी स्वच्छ समझ~
पल दो पल का यार मिलन, समझाता ये प्रेम पथिक|
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 54🎈
छंद आधारित गीतिका का प्रयास
समान्त-अन पदान्त -अपदान्त
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सुखमय सबका, रहे सदन
प्रभु का हर पल, करो मनन |
महकी हो हर, एक डगर
पुष्पों सजता, खिले चमन |
सच के पथ पर, बढ़ें कदम
बोलो मत तुम, मिथ्य वचन |
जीवन हो यह, सहज सरल
मन में हो बस, यही लगन |
नश्वर है यह, सर्व जगत
सच्चा है इक, यही कथन |
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 55🎈
पुष्प खिले अब ,वन उपवन।
झूम उठा है , जन मन तन।।
पवन बहे अब, सन सन सन।
दिखे सजा सा, हर मधुवन।।
हुआ मित्र है,शरद गमन।
बढ़ती देखो,मधुर तपन।।
भ्रमर हो रहे,सहज मगन।
पुष्प महकते,वन उपवन।।
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पाने दो प्रभु , पद रज कण।
भजन करूँ मैं,अब क्षण-क्षण।।
मैं क्या जानूँ , धरम करम।
तू ही है प्रभु , परम परम।।
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शांँति न पाऊँ, प्रभु तुम बिन।
जीवन बीते , दिन गिन गिन।।
मिले कृपा रख,सिर निज कर ।
करो नहीं प्रभु, अगर मगर।।
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गीत लिखूँ मैं , अब मनहर।
महक उठे सुन कर तरुवर।।
आस न माँगे , रघुवर वर।
चाह रहा बस , सरस नजर।।
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स्वासों में प्रभु राम बसत।
बिना राम मन काम फँसत।।
ध्यान लगा कर जप रघुवर।
भला करेंगे प्रभु हरि हर।।
मूर्ति साधना सहज सरल।
मन लगता बन तरल तरल।।
निराकार साधना कठिन।
आकुल रहता मन छिन छिन।।
रामायण जो रहत पढ़त।
भव नैया पर वही चढ़त।।
मूरख मतलब नहिं समझत।
भक्त मनहिं मन रहत गुनत।।
हनुमत गावत राम भजन।
सियाराम का करता मनन।।
लगी आस मन राम लगन।
अपनी धुन में रहत मगन।।
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नयन खुले तब~शिव शिव भज।
गुरु चरणों की ~ सिर रख रज।।
कट जायेंगे ~~ ~तब सब दुख।
शेष रहेंगे ~~~~ प्रियवर सुख।।
सभी बड़ों का~~~ वंदन कर।
हो जाओगे ~~~~आप अमर।।
गुरु गणेश के~~~चरण कमल।
सिद्ध करेंगे~~~~काज सकल।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 56🎈
अपने पथ पर,रखा कदम।
जग को भाया,रखा कदम।
आज सत्य की, पड़ी डगर,
फूक फूक कर, रखा क़दम।।
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कदम कदम पर,देख कदम।
पीले - पीले, पका कदम।
मन हर्षाया, कटी डगर,
देता शीतल छॉंव कदम।।
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कान्हा का यह, वहीं कदम।
वंशी - धर का,वृक्ष कदम।
इसके नीचे, रहे मचल,
बचपन का यह, खेल कदम।।
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मेरी बगिया , फ़ूल कदम।
झूले भौंरा, घूम कदम।
पावन निर्मल बही पवन,
कान्हा मन का , लखो कदम।।
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जग है झूठा,यार धरम।
अपना करना,सदा करम।
जीवन में तो,है उलझन।
सुलझाना ही,है अड़चन।।
घट घट वासी, हैं भगवन।
नित दिन करना,तू सुमिरन।
पार लगाते, सागर भव।
जीवन जीना हो सम्भव।।
जानो जीवन,का मतलब।
अपना करना,शुभ करतब।
पावन जीवन,हो धन धन।
झूठा तो है,बस यह मन।।
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पतझड़ का कर,अरे अन्त।
आया पावन,देख बसन्त।
धानी पहनी,देख चुनर।
कितनी लगती,रूप सुघर।।
पीली पीली,पहन वसन।
सरसो बोले झन झन झन।
गेहूॅं बाली,चना मटर।
देख हुआ मन चटर पटर।
गदराया है,अंग बदन।
मदमाया लख, यौवन मन।
भौंरा करता,गुन गुन गुन।
चूम रहा है,बाग सुमन।।
बदला अपना,रहन सहन।
धरा बसंती,पहन वसन।
महकाया है,वन उपवन।
धरती का है, हर्षित मन।।
कोयल बोले,लगे अगन।
परदेश पिया,बिरहन मन।
खोले जीवन,भेद रहन।
बहे पवन है सन सन सन।।
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दर्शन हरि का ,मूँद नयन ।
महकाए है,हृदय-चमन ।।
झूमे उर के ,भूमि-गगन ।
नाचूँ होकर,मस्त-मगन ।।
राधा-रानी, नित निधिवन ।
उर-कानन में ,श्याम-पवन ।।
करती हरि का ,सदा मनन ।
दुख का करते ,कृष्ण शमन।।
प्रिय है राधा , कहे मदन ।
शशि-मुख से ही,जगत् अयन।।
रट मन राधा , बुझे तपन ।
मिटते सारे , लोभ-जलन।।
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गोरी चलती , मटक-मटक ।
मस्ती में मग , गई भटक ।।
चट्टानों में , हुआ चटक ।
खुशियाँ गल में ,गई अटक ।।
तेरा मुझ पर , हुआ असर ।
सोचूं तुमको , आठ पहर ।।
माँ बरसाए , बहुत कहर।
चल प्रियवर अब ,छोड़ शहर।।
गाना कैसा , बिना बहर।
सुर भी तब तो , बने जहर।।
जब जाए उर, भाव ठहर।
समझो सब पर ,हुआ असर।।
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करना कुछ मत,अगर-मगर।
जानूँ लंबा , बहुत सफर ।।
भय बरसाता , सदा कहर ।
साहस रखना , आठ पहर।।
पाकर तुमको ,जनम सफल।
जीवन मेरा , गया बदल ।।
तुम में पाया, हृदय-कमल।
तुम बिन जाती,सदा मचल ।।
मोहन उर में, आठ पहर ।
मीरा पर यूँ, हुआ असर ।।
हरि में जीवन , करे बसर ।
छोड़े जप में, नहीं कसर।।
बादल गरजे , घनन-घनन ।
वात बहे कर ,सनन सनन ।।
पुहुप महकते ,चमन-चमन ।
अलि गुलशन में, हुए मगन।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 59 🎈
कान्हा जी से, लगी लगन ।
पागल मन ये , हुआ मगन ।
मन में जागी, प्रीत अगन ।
भूल गया मन , धरा गगन ।
मनमोहन तू, बड़ा चपल ।
तुझे निहारें , नैन सजल ।
हरदम लगता , रूप नवल ।
छलकें नैना , छल छल छल ।
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बड़ी कठिन है, प्रेम डगर ।
अद्भुत है ये , नैन नगर ।
छलिया है ये , मधुर शहर ।
मगर प्रेम है , अजर- अमर ।
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मधुशाला में, करे गमन ।
भोर काल में,करे वमन ।
अर्थ पंक में, करे शयन ।
कैसा है ये ,चंचल मन ।
चूड़ी करती, छन छन छन ।
मधुर पलों की, है धड़कन ।
पल-पल तड़पे, व्याकुल मन।
मन में मन का , है मधुबन
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स्वप्न लोक में, करे शयन ।
नयन लोक में, करे गमन ।
विगत पलों की, ये धड़कन ।
मौन विला का, है उपवन ।
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धर्म कर्म का, करें वरण ।
चलो चलें अब , ईश शरण।
कब छूटा है, जन्म - मरण ।
हर विपदा का, करें हरण।
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चलो घृणा का, करें शमन ।
हर उलझन का, करें दमन ।
मद में डूबा , आज पवन ।
ये जीवन का , नया चलन ।
* * * * *
रहे नवयुवक, आज भटक ।
मद मदिरा में, रहे अटक ।
काली गोली, रहे गटक ।
धन जीवन का, मुख्य घटक।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 60🎈
मन में मेरे, सजा सपन।
चलते फिरते,करूँ गमन।
काँधा तेरा, मिले सजन।
सुख जीवन में, रहे सघन।
*
पायल की हो,छनन -छनन।
मन रहता हो, सदा मगन।
महके अपना , सदा चमन।
खुशबू बिखरे,संग पवन ।
*
जीवन सुखमय, रहे सजन।
सबका प्यारा, रहे चलन।
कष्ट रहे ना, रहे तपन ।
सभी बुराई , करें दमन ।
*
लगे किसी की, नहीं नजर।
जीवन का हो, सुखी सफर।
चलें सदा हम, सत्य डगर।
इक दूजे की, रखें खबर।
प्यारा भारत,करूँ नमन।
गान करें नित,धरा गगन।
अर्पण इस पर,तन मन धन।
लगता प्यारा, मुझे वतन।
*
महके मेरा , सदा चमन।
गाती मन से,रहूँ मगन।
बदलें अपना,चाल चलन।
प्रभो नाम का, करें मनन।
*
सुखमय जीवन,रहे सघन।
सभी बुराई,करो दमन।
सत्य राह पर,चलो मगन।
पाप कर्म से,डरो सजन।
*
कीचड़ में ही,खिले कमल।
दुख में रहते,नयन सजल।
हर वादा हो, सदा अटल।
रचना अपनी, रहे नवल।
*
मोहन से ही, लगी लगन।
भजन करूँ नित, रहूँ मगन।
सुबह सवेरे, नित्य नमन।
अंतस मेरे ,बसे मदन।
*
जीवन का है, कठिन सफर।
कृपा करो तुम,अब गिरधर।
तुर्की में चहुँ,ओर कहर ।
रखना भगवन, सुभग नजर।
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गीतिका
करती हूँ मैं, सदा मनन।
हे! जगदीश्वर, तुम्हें नमन।
चलूँ सत्य की, सदा डगर
बुरी भावना , करूँ दफन।
तुम सा कोई, नहीं इधर
काम बनाते, सभी सघन।
जीवन होगा,सरल सुभग
रखो शीश कर, अगर मदन।
दूजे के सुख,को लखकर
होती कब है, मुझे जलन ।
कृपा तुम्हारी, मिले अगर
रहूँ मगन मैं,करूंँ भजन।
"मंजुल' चाहे,रात दिवस
रहे सहारा ,तव भगवन।
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नर तन पाया करो जतन।।
लगे नाम से सही लगन।
भक्ति भाव में रहो मगन।।
जग में रहना सदा सँभल।
जैसे जल में रहे कमल।
मन को अपने रखो अटल।
जाता है यह सदा मचल।।
जीवन अपना करो सफल।
नहीं भक्ति में पड़े खलल।।
बहो नदी की तरह तरल।
शिशु के जैसे बनो सरल।।
जग हित पीना पड़े गरल।
सुरसरि सम हो हृदय अमल।।
सेवा ही हो धर्म परम।
"प्यारे"करना नित्य करम।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 62🎈
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हुई त्रासदी, बहुत कहर।
रोते मानव, मिटे शहर।।
धरती काँपी, मरे मनुज,
पत्नी बच्चे, साथ अनुज।
रोते मानव, हुए विकल,
दबे हुए कुछ, रहे निकल।
हिलती धरती,लहर लहर,
हुई त्रासदी, बहुत कहर।।
तुर्क सीरिया, मचा रुदन,
भारत करता,तमस कदन।
पापी रोके , मार्ग गगन,
पर हममें थी, मदद लगन।
सफल हुए हम,सधी बहर,
हुई त्रासदी, बहुत कहर।।
हम हिन्दी सब, राम भगत,
भौचक मुस्लिम,अरब जगत।
मदद हमारी , देख मगन,
ईश कृपा से , बढे लगन।
बूँद प्रेम रस, बरस छहर,
हुई त्रासदी , बहुत कहर।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 63🎈
रंग - रॅंगीला, लगे गगन |
मनवा मेरा, हुआ मगन ||
गोरी झाॅंके, अगल - बगल |
भर पिचकारी, करे चुहल ||
फागुन आया, बहे पवन |
बासंती ये, कहे मिलन ||
रहते साजन, साथ अगर |
सुंदर लगता, बड़ा डगर ||
नैना ढूँढे, इधर- उधर |
श्याम सलोने, गए किधर ||
उपवन शोभे, कली सुमन |
अटक- मटक के, नाच मदन ||
जियरा करता, उथल - पुथल |
गाता भौरा, मचल - मचल ||
काला कागा, हुआ विकल |
गलियों में है, चहल - पहल ||
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 64🎈
विधा-मुक्तक
खतरे में है सदा वतन
कैसे कायम रहे अमन
देना सबको राय सहज
झूठे खुद के रहें कथन
दिल जाता है देख दहल
जब भी उनके नैन सजल
बातों का ही करें वजन
बस इतनी ही मिली अकल
दिल तो पाया नहीं महल
नैना जैसे खिले कमल
श्रम ही पूजा करें जतन
खुशियों का फिर रहे दखल
जब तक मतलब बने सरल
दें निर्बल को सदा मसल
अपनी अपनी गुजर बसर
है पीड़ा की कहाँ गजल
👇
छंद-महा मनमोहन , विधा-मुक्तक
सच्चाई की कभी डगर, होती क्या है यहाँ सरल
काँटे बोता सदा जगत, पर रहना है तुम्हें अटल
साहस से हर राह निकल, करके प्रतिपल यही मनन
कर जाती है दुआ असर, होगे क्यों तुम नहीं सफल
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 65🎈
नमन मंच
छंद महल
दिनांक -23/2 /2023
दिन -गुरुवार
विधा-मनमोहन छंद लिखने का प्रयास
आई सीता ,राम भवन
होकर नाचे ,सभी मगन
यश वैभव सुख, बरस गगन
भई सुगंधित, आज पवन।।
लगी राम से ,अजब लगन
हुई बुराई ,आज शमन
तोता रटता ,राम सुवन
सुंदर मुख है, कोटि बदन।।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 66🎈
विषय- सीता स्वयंवर , विधा- तांटक छंद
पुलकित सारे देव जगत के
मंगल बेला है आई |
धरती अंबर हैं आनंदित,
स्वर्णिम सी आभा छाई।
आमंत्रित नृप सभी सुशोभित,
राज महल में होते थे।
वैदेही वर ले उनको ये,
अवसर मत वो खोते थे।
किंतु लक्ष्य आसान नहीं था,
राजा सब घबराते थे।
खंडित करना दूर बहुत था ,
धनुष उठा नहीं पाते थे।
होकर विकल कहे विदेही ,
प्रभु यह कैसी माया है।
क्या वर कोई योग्य सिया के,
तुमने नहीं बनाया है।
लक्ष्मण के समझाने पर तब ,
रघुनंदन आगे आए
धनुष उठाकर माथ लगाया ,
शिव शंकर महिमा गाए।
जैसे ही प्रत्यंचा तानी ,
क्षण में ही धनु टूटा था ।
कोमल पुष्प समान हस्त से
धरती पर वह छूटा था।
मिला जानकी को वर सुंदर,
घड़ियां वो सुखदाई थी।
सिया राम की जोड़ी साजे,
सबसे मिली बधाई थी।
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🌹 पृष्ठ क्रमांक 67🎈
थोड़ी सी यदि करें पहल।
बने झोपड़ी नया महल।
मेहनत से मत रहो विलग,
हो जाती कोशिशें सफल।
जीवन में लग जाये लगन।
सदा लगन में रहो मगन।
गरमी जाड़ा भले तपन,
सबसे पहले करो भजन।
पानी जैसे रहो तरल।
नहीं किसी की करो नकल।
बाधाओं से भी मत डर,
सरिता जैसे बहो विमल।
नई चुनरिया नये वसन।
मौसम के अनुसार पहन।
धरती लेती रूप बदल,
मातृभूमि को करो नमन।
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