https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें || "आदिनाथ गाथा "( अञ्जनेय छंद में )16 मात्रा, 11 वर्ण एवं जैनागम के स्वर (विभिन्न सृजन )
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श्री आदिनाथ़ नम:
आदिनाथ गाथा ( अञ्जनेय छंद ) 16 मात्रा - 11 वर्ण
1~.मंगलाचरण एवं माँ जिनवाणी सरस्वती स्तुति
2~.तीर्थंकर चौबीसी
3.~वंदनीय मुनि जिनेश कुमार जी का आशीर्वाद
4.~आदिनाथ गाथा च्यवन कल्याणक
5.~भाग 2- स्वप्न फल
6~.भाग 3-जन्मोत्सव
7.~भाग 4 दिगंबर परम्परा
8.~भाग-5 विवाह व संतान
9~.भाग-6 राज्याभिषेक
10~.भाग-7 पदाभिषेक व कार्य
11~.भाग-8 व्यवस्था व बदलाव
12.~भाग-9 वैराग्य व कारण
13.~भाग-10अभिनिष्क्रमण
14.~भाग-11आदिनाथ पारणा
15.`भाग-12कैवल्य प्राप्ति
16~.भाग-13 मोक्ष कल्याणक
17.~आ. सुभाष सिंघई जी का आशीर्वाद
18.~ गाथा प्रेरक
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1.~नमस्कार महामंत्र
2.~हनुमानजी की कथा
3.~हनुमानजी पर गीत
4.~भक्तामर स्त्रोत
5.~इलाची कथा
6.~कालसौकरिक कथा
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1~पदमावती छंद ( णमोकार महामंत्र स्तुति )
2~ चौपाई गीत (दिव्य मंत्र नवकार हमारा)
3~भूषण छंद आधारित गीत-
शीर्षक- णमोकार महामंत्र (नवकार महामंत्र)
4 ~ सरसी छंद ( नमस्कार महामंत्र णमोकार
10- सरसी छंद आधारित गीत
11~गीतिका लावणी छंद.
12~ सार छंद, 16,12 मात्राएँ- (कर्म फल )
13- चौकड़िया छंद(ईसुरी छंद) ( कर्म गीत )
14 ~सुंदरी सवैया वर्णिक
(परम पूज्य गुरुदेव महाश्रमण जी)पर
15 ~सरसी छंद आधारित गीत-
1 7 - णमोकार महामंत्र पर 5 दोहे
18- दुर्मिल सवैया छंद-
19- मदिरा सवैया छंद
20~सुन्दरी सवैया
21- मत्तगयंद या मालती सवैया
22 - अहि वर्णिक छंद
23- सुमुखी सवैया(मानिनी,मल्लिका) सवैया छंद
24~ वागीश्वरी सवैया
25- छन्द- सम वर्णिक छन्द " क्रौंच सवैया
28- त्रिभंगी छंद.
31 - कुंडलिया छंद
32 रूपमाला छंद या मदन छंद आधारित सृजन
34. शालिभद्र की कथा
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1---;मंगलाचरण एवं माँ जिनवाणी सरस्वती स्तुति )
शुभ जिनवाणी शारद माता।
सकल ज्ञान की तुम्हीं प्रदाता।।
हाथ जोड़ करती मैं वंदन।।
चरण धरूँ भावों का चंदन।।
आदिनाथ प्रभु लिखने गाथा।
कलम उठा कर टेका माथा।।
दया दृष्टि माँ अपनी रखना।
जीवन मेरा पावन करना।।
अग जग में माँ अति कल्याणी।
दर्शन कर सुख पाते प्राणी।।
कर तेरे माँ कमल लुभाते।
वैभव इज्जत तुमसे पाते।।
भ्राँति जड़ों से सकल हिलाना।
सुखद धर्म की राह दिखाना।।
सुन्दर श्रेष्ठ लिखूँ माँ अक्षर।
लगें सभी को सदा शुभंकर।।
आशीषों से घट यह भर दो।
तरणी आकर मैया तर दो।।
नित्य हृदय में करो बसेरा।
'हिम्मत' चाहे नवल सवेरा।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा
कोलकाता, लाडनूँ
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जिनवर जी चौबीस हमारे।
करे राह में नित उजियारे।।
ऋषभ,अजित देवा हैं प्यारे।
संभव, अभिनंदन हैं न्यारे।।1।।
सुमति, पद्म को शीश नवाएँ।
प्रभु सुपार्श्व को रटते जाएँ।।
चंदा, शीतल अति सुखकारी।
सुविधिनाथ की महिमा न्यारी।।2।।
वासुपूज्य श्रेयांस रटें सब।
वैभव सम्मुख आएगा तब।।
विमल, अनंत भजो रे भाई।
धर्म, शान्ति, अर हैं सुखदाई।।3।।
कुंथु, मल्लि प्रभु जी उपकारी।
मुनि सुव्रत, नमि बाधाहारी।।
नेमिनाथ ये पार्श्व शुभंकर।
महावीर से भागे विषधर।।4।।
चौबीसी यह नित नर गाए ।
फेरा जग का तब मिट जाए।।
निर्मल पावन बनती काया।
'हिम्मत' खिलता भाग्य सवाया।।5।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा
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अर्हम्
साहित्य की विधाओं में महत्वपूर्ण विधा है काव्य। काव्य के माध्यम से कवि अपने भावों को अभिव्यक करता है।काव्य अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रहा है।
अनेक कवियों ने तीर्थंकरों, आचार्यों पर चरित्र काव्यों, भक्ति काव्यों की रचना की है।
श्रीमती हिम्मत चोरड़िया ने आंजनेय छंद में "आदिनाथ गाथा" की रचना की है।यह काव्य ग्रंथ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ नाथ के चरित्र पर आधारित है।
सहज,सरल व सुबोध भाषा में निबद्ध यह काव्य पाठक को गागर में सागर की अनुभूति कराने वाला सिद्ध हो सकता है। आदिनाथ गाथा पाठकों के हृदय में भगवान ऋषभ नाथ के प्रति श्रद्धा भावों को अंकुरित करने वाला हो।
श्रीमती हिम्मत चोरड़िया 'दिन दूना,रात चौगुना' ज्ञान का क्षयोपशम बढ़ाते हुए आध्यात्मिक विकास करती रहे। मंगलकामना।
मुनि जिनेश कुमार
पूर्वांचल कोलकाता
5.10.25
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नगर अयोध्या नाभी राजन।
मरुदेवा माता मन भावन।।
तिथि आषाढ़ी चौथ सुपावन।
च्यवन जीव आया जो आँगन।।1।।
सपने शुभ देखे माँ चौदह।
कहे दिगंबर थे वे सौलह।।
वृषभ, सिंह, लक्ष्मी देखा गज।
दिया दिखाई साथ धर्म ध्वज।।2।।
सूर्य चन्द्र था पद्म सरोवर।
क्षीर समुद्र कुंभ मनोहर।।
देव विमान दिखी द्वय माला।
करती थी वे सघन उजाला।।3।।
रत्न राशि शुभ था सिहांसन।
मत्स्य मीन देखी मनभावन।
धूम रहित देखी शुभ आगी।
देख सपन मरुदेवी जागी।।4।।
देखा अनुपम दिव्य नजारा।
बदलेगा अब भाग्य हमारा।।
सुन्दर सपने थे वे राजन।
एक-एक सारे मनभावन।।5।।
सुनकर बोले राजा तत्क्षण।
नाच उठेगा अपना प्राँगण।।
जीव पवित्र कुक्षि तव आया।
तन-मन मेरा सुन हर्षाया।।6।।
सकल विश्व होगा आलौकित ।
वही दुखों को करे पराजित।।
शेष यामिनी अब मत सोना।
सुखद बीज बालक में बोना।।7।।
इन सपनों का अर्थ बताएँ।
तभी समझ मेरे कुछ आएँ।।
सरस बात में रात कटेगी।
उलझन सारी दूर हटेगी।।8।।
दोहा-
सुनकर बोले नाभि तब, दुख का अब अवसान।
आए तेरे गर्भ में, तीर्थंंकर भगवान।।
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नाभिराय महाराज स्वप्न फल अवगत कराते हुए ,
मरुदेवा जी को
वृषभ हमें ऐसा बतलाए।
सुखद स्वप्न ये सुन्दर आए।।
बोधि बीज अब यहाँ फलेगा।
भरत क्षेत्र प्यारा महकेगा।।1।।
चार धर्म को ़हमें समझना।
गज का हमको ऐसा कहना।।
भव्य जीव के हैं यह रक्षक।
दूर हटेंगे सबके कंटक।।2।।
श्री का हरपल भोग करेंगे।
देकर वरषी दान तरेंगे।।
तीन लोक के हैं यह धारक।
माला कहती है जग तारक।।3।।
भामंडल प्रतिहार्य रहेगा।
सूरज सम ही तेज दिखेगा।।
होंगे चंदा सम अति शीतल।
महकेगा ये सारा जल-थल।।4।।
सिंह समान रहे बलशाली।
संयम की छलके अब प्याली।।
धर्म ध्वजा जग में फहराए।
देव विमान सदा मन भाए।।5।।
अगणित निधियों के ये स्वामी।
कुंभ सरिस प्रभु अन्तर्यामी।।
पद्म सरोवर सोहे सुन्दर।
करे देशना बैठ पद्म पर।।6।।
गहरे होंगे रत्नाकर सम।
दूर करेंगे जग का ये तम।।
भव्य जीव को अमल करेंगे।
तप आगी में करम जलेंगे।।।।7।।
मीन मत्स्य शुभ सुख की दाता।
दर्शन से मानव सुख पाता।।
सदा बिराजे शुभ सिंहासन।
आलौकित होगा यह आँगन।।8।।
दोहा-
भव्य जीव है गर्भ में, रखना हर पर ध्यान।
शुभ चिंतन हो हर समय, लेना है संज्ञान।।
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6--- भाग-3. जन्मोत्सव-
सजग रही माँ सारे ही क्षण।
होगा पावन भू का कण-कण।।
गर्भ काल ये पूर्ण हुआ जब।
युगल एक प्यारा आया तब।।1।।
चैत्र कृष्ण तिथि अष्टम आयी।
मध्य रात्रि सब के मन भायी।।
चौसठ इन्द्र सभी मिल आए।
निरख-निरख सारे हर्षाए।।2।।
रूप देख सारे थे पुलकित।
ऊर्जा हुई नवल संचारित।।
नारक जीव शान्ति कुछ पाए।
दौड़ यौगलिक घर में आए।।3।।
खूब मनाया सबने उत्सव.
खिले पेड़ खग सारे पल्लव।।
जन्मोत्सव मिल सभी मनाएँ।।
नाम रखें क्या आप बताएँ।।4।।
गर्भ काल बालक जब आया।
प्रथम स्वप्न न्यारा मन भाया।।
उरः प्रदेश बैल रेखांकित।
नाम नाभि देकर आनंदित।।5।।
सुमंगला शुभ नाम बताए।
सुता नाम सबके मन भाए।।
पुलकित थे सारे नर-नारी।
लगा सभी को अति मनहारी।।6।।
एक वर्ष का था जब बालक।
क्रीड़ा करता था सुखदायक।।
इन्द्र एक दिन मिलने आए।
अगणित वस्तु थाल में लाए।।7।।
इक्षु देख के मन ललचाया।
सुखद वंश इक्ष्वाकु कहाया।।
हुआ वंश का सफर सुहाना।
जाति बनी तब से यह नाना।।8।।
दोहा-
बढ़ी उम्र को देखकर, सोचा करें विवाह।
नाभि मातु चिंतन किए, खोलें नूतन राह।।
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इसे दिगंबर में बतलाए।
देव देवियाँ मिल सब आए।।
ग्राम प्रदक्षिणा तीन लगाए।
दर्शन खातिर वे ललचाए।।1।।
सौधर्मेंन्द्र गये अब घर में।
लिया ऋषभ को दोनों कर में।।
लाकर पांडुक शिला बिठाए।
जन्मोत्सव सब आज मनाए।।2।।
कुंभ हजार आठ सिर धारे।
जलाभिषेक किए मिल सारे।।
अलंकार से बदन सजाए ।
इन्द्र हाथ से तिलक लगाए।।3।।
नभ में गूँजा अब जयकारा।
हुआ विश्व में शुभ उजियारा।।
मिलकर सारे मंगल गाए।
सारे मिलकर शीश झुकाए।।3।।
नाम इन्द्र ने ऋषभ बताया।
नामकरण प्यारा मन भाया।।
बना महोत्सव वही निराला।
हर्षित नर-नारी सुर बाला।।4।।
लाकर छोड़े फिर से आँगन।
किया सभी ने उनको वंदन।।
नाम लगा वह सबको न्यारा।
हर जन का ही बना दुलारा।।5।।
बालक ने जब पाँव उठाए।
परिजन के मन को हर्षाए।।
इन्द्र अचानक मिलने आए।
अगणित वस्तु थाल में लाए।।6।।
इक्षु देख के मन ललचाया।
सुखद वंश इक्ष्वाकु कहाया।।
हुआ वंश का सफर सुहाना।
जाति बनी तब से यह नाना।।7।।
युवा हुए जब दोनों बालक।
हुए ब्याह के अब ये लायक।।
शादी कर निज फर्ज निभाएँ।।
नई रीति हम आज चलाएँ।।8।।
दोहा-
बढ़ी उम्र को देखकर, सोचा करें विवाह।
नाभि मातु चिंतन किए, खोलें नूतन राह।।
----०----
8-----भाग-5. विवाह व संतान
नहीं रहा शादी का प्रचलन।
बँधे सहोदर से ही बंधन।।
एक युगल सबको ही होता।
आगे चल वह स्वप्न सँजोता।।1।।
उनकी ही बनती फिर जोड़ी।
रीति मातु ने अब यह तोड़ी।।
एक सुता जब मिली अकेली।
अपने साथ उसे वह ले ली।।2।।
सँग मरुदेवा उसको लाई।
आकर सबको बात बताई।।
कभी अकेली रह न सकेगी।
पुत्र ऋषभ के साथ रहेगी।।3।।
ऋषभ सहर्ष उसे स्वीकारे।
सघन कष्ट से उसे उबारे।।
सुखद संगिनी उसे बनाया।
देख सुनंदा मन सरसाया।।4।।
द्वय पत्नी संग ब्याह रचाया।
अपना ही परिवार बढ़ाया।।
युगल पचास हुए जो न्यारे।
सुमंगला को हरपल प्यारे।।5।।
पुत्र भरत ब्राह्मी सँग आए।
सुत अठानवे बड़े लुभाए।।
रीति हटी ये आज पुरातन।
नाच उठा खुशियों से आँगन।।6।।
युगल सुनंदा एक बताए।
सौम्य सुन्दरी अति मन भाए।।
बाहुबली थे अति बलशाली।
लाए घर में शुभ खुशहाली।।7।।
वंश बेल ये लगे मनोहर।
लगते बच्चे सबको सुन्दर।।
सुख का सागर जो लहराया।
नेह सभी अपना छलकाया।।8।।
दोहा-
समय रहे कब एक सा, जब-जब बढ़े तनाव।
जनसंख्या जो बढ़ गई. , चाहे नव बदलाव।।
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कल्पवृक्ष थे सुख के साधन।
उनसे चलता सारा जीवन।।
जनसंख्या जो बढ़ी अचानक।
लगी व्यवस्था ही दुखदायक।।1।।
नित्य यौगलिक घर में आते।
दिक्कत अपनी सभी सुनाते।।
उदर भरें अब कैसे बोलें।
अपना मुख ये कुछ तो खोलें।।2।।
छीना झपटी बढ़ी वहीं पर।
हल बतलाए कोई आकर।।
नाभि हताश हुए सुन भारी।
बदले कैसे अब यह पारी।।3।।
दण्ड दिए जो किंचित राजन।।
बढ़ी वहीं भारी जो उलझन।।
करें उपाय पेट भरने का।
फिर ये काम नहीं करने का।।4।।
ऋषभ नाथ को बात बताई।
हुई न देखें यह भरपाई।।
समाधान कुछ हमें मिलेगा?
या इस विध ही काम चलेगा?5।।
ऋषभ सुने तो कुछ मुस्काए।
मुश्किल तब ही हल हो पाए।।
अपनी आदत आप सुधारें।
स्वतः समस्या खुद फिर हारें।।6।।
नई व्यवस्था काम करे तब।
चुनिए राजा मिल सारे अब।।
कहा ऋषभ ये आप सँभालें।।
तभी हटेंगी दुखद कुचालें।।7।।
करें पिता से आप निवेदन।
छलकाएँगे वे अपनापन।।
गये नाभि के पास सभी मिल।
कहा पुत्र है इसके काबिल।।8।।
दोहा-
किया अलंकृत देह को, किया वहीं अभिषेक।
दृश्य मनोरम देखने, आए देव अनेक।।
----०----
10--- भाग 7 पदाभिषेक व कार्य
पदाभिषेक हुआ था सुन्दर।
नाम विनीता दिया मनोहर।।
ऋषभ बने राजा मनहारी।
खूब फलेगी अब फुलवारी।।1।।
प्रथम काम ये ऐसा करना।
पेट सभी का श्रम से भरना।।
खूब अनाज हमें अब बोना।
सरस रेत से उपजे सोना।।2।।
तभी मिलेगा सबको भोजन।
दूर रहेगी सारी उलझन।।
कई उपाय नये बतलाए।
खेत काज उनको सिखलाए।।3।।
फसलें उनकी जो लहराईं।
पशुओं की नजरें ललचाईं।।
आकर धान सहित खा जाते।
नहीं सामना कुछ कर पाते।।4।।
छींकी को धर देना मुख पर।
दूर करो अपने सारे डर।।
बात ऋषभ की सबने मानी।
पशु जो पी न सके तब पानी।।5।।
हर्षित थे वे भोले हलधर।
खाएँगे अब सारे मिलकर।।
तनिक नहीं पशु खाने पाए।
देह वहीं उनकी अकुलाए।।6।।
बात बताने गए सभी मिल।
बढ़ी हमारी फिर से मुश्किल।
छींकी अब तक नहीं हटाई?
मुश्किल उनकी आप बढ़ाई।।7
जाकर उसको अभी हटाएँ।
छींकी हो तब किसविध खाएँ?
बनें कर्म अति आगे बाधक।
एक वर्ष बीते दुखदायक।।8।।
दोहा-
कृषि, मसि, असि का ज्ञान दे, किया बड़ा बदलाव।
तीन वर्ण बाँटे वहीं, देते नये सुझाव।।
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रहे सुरक्षित सारे ही जन।
आगे का अब हो यह चिंतन।।
शस्त्र चलाना तब सिखलाया।
वही वर्ग क्षत्रिय कहलाया।।1।।
हुआ वस्तु का जब उत्पादन।
लाभ उठाए सारे तब जन।।
वैश्य बनें तब कुछ व्यापारी।
शूद्र सदा श्रम के अधिकारी।।2।।
बने अग्नि नित ही हितकारी।
पका धान लगता मनहारी।।
रज के नूतन पात्र बनाएँ।
भोजन उसमें आप पकाएँ।।3।।
ग्राम व्यवस्था अब अपनाएँ।
रहने को घर एक बनाएँ।।
जंगल छोड़ सभी अब आएँ।
नवल अयोध्या को सरसाएँ।।4।।
दण्ड व्यवस्था सकल सुधारी।
अपराधों पर थी वह भारी।।
प्राणी लक्षण ज्ञान दिया नव।
बाहुबली पाए नव गौरव।।5।।
कला भरत को दी कुछ न्यारी।
लगी बहत्तर सबको प्यारी।।
गणित सुन्दरी को सिखलाई।
ब्राह्मी को लिपि नव बतलाई।।6।।
रीति नीति सुन्दर समझाई।
अभिनिष्क्रमण घड़ी जो आई।।
धर्म तीर्थ का करें प्रवर्तन।
देव किए सारे अभिनंदन।।7।।
बाँट दिया भूमंडल अपना।
पूर्ण करें बच्चे निज सपना।।
भरत विनीता को सँभलाए।
शेष तनय हिस्सा निज पाए।।
दोहा-
अभिनिष्क्रमण-
उचित समय अब जानकर, मन में किया विचार।
करूँ परम की साधना, पुत्रों को दूँ भार।।
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12----भाग-9. वैराग्य का कारण-
इसे दिगम्बर में बतलाए।
सुख से प्रभु क्यों ध्यान हटाए।।
एक रात दरबार लगाया।
नृत्य मनोहर वहाँ दिखाया।।1।।
नीलांजना बनी वह कारण।
काँप उठा सारा वह प्राँगण।।
नाच रही थी जो अति सुन्दर।
मौत सुला दी पल में आकर।।2।।
देख ऋषभ की बदली धारा।
मोह दुखद मैं करूँ किनारा।।
क्षणभंगुर ये जग का मेला।
चलना सबको छोड़ अकेला।।3।।
अब कल्याण करूँगा अपना।
पूर्ण करूँ जीवन का सपना।।
किया हाथ से सब बँटवारा।
भरत बनेगा शासक न्यारा।।4।।
बाहुबली शुभ राज करेगा।
पोदनपुर का ताज रखेगा।।
रक्षक बन ही राज्य सँभालें।
दूर करें मिल सभी कुचालें।।5।।
काम करें दोनों ही हितकर।
सबको जानें सदा बराबर।।
कभी किसी का बुरा न करना।
बहे अयोध्या में सुख झरना।।6।।
सारे जन ये बात सुने जब।
सुन बातें बेचैन हुए तब।
सचमुच बाबा छोड़ चलेंगे?
समाधान फिर कौन करेंगे।।7।।
क्षमता उन सी नहीं मिलेगी |
सूनी बगिया सकल रहेगी।।
ऋषभ नाथ का साथ निभाएँ।
चिंता अपनी सकल मिटाएँ।।8।।
दोहा-
साधक बनने के लिए, हुए सभी तैयार।
मत छोड़ें मझधार में, करें यही उपकार।।
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बार-बार सबको समझाए।
अपना प्रण सारे दोहराए।।
साथ रखें जब बाबा हम को।
दूर करेंगे सबके गम को।।1।।
चैत्र कृष्ण अष्टम तिथि आयी।
खुशियाँ सबके मन को भायी।।
चार हजार व्यक्ति सँग आए।
देख देव मन में हरषाए।।2।।
इन्द्र पालकी चल कर लाए।
देख सभी उसको चकराए।।
बैठें इसमें किया निवेदन।
करते सारे आज समर्थन।।3।।
आभूषण सुन्दर पहनाए।
कई सुगंधित लेप लगाए।।
सुखद पालकी सम्मुख लाए।
पकड़ हाथ उनको बैठाए।।4।।
आए सभी एक उपवन में।
विस्मित थे सारे निज मन में।।
दिए इन्द्र को सब आभूषण।
दूर करेंगे अपने दूषण।।5।।
किए हाथ से अपना लुंचन।
आकर किया सभी ने वंदन।।
मौन रहे बाबा जो दिन भर।
छोड़े वे दीक्षित घबराकर।।6।।
छोड़ दिए फिर वहीं अकेले।
पाले निशदिन कौन झमेले।।
बने कंदहारी कुछ आकर।
किए साधना अपनी जाकर।।7।।
मौन साधना मुनि जी करते।
परिषह सारे ही वे सहते।।
भिक्षा खातिर जाते घर-घर।
आते यूँ ही पुनः निकल कर।।8
दोहा-
कर्मों का बंधन प्रबल, चले न उन पर जोर।
आते निश्चित वे उदय, कर कितना ही शोर।।
----०----
कर्म सगे किसके कब होते।
उतने मिलते जो हम बोते।।
बिन भोगे कब हो छुटकारा।।
कितना रहे भले वह प्यारा।।1।।
आदिनाथ घूमे घर-घर में।
मिली न भिक्षा कहीं शहर में।।
पिछले भव का भारी बंधन।
एक वर्ष जो मिला न भोजन।।2।।
सुनी प्रजा की जहाँ शिकायत।
छींकी की जब दिए हिदायत।।
जाकर काम सभी को करना।
मुश्किल अपनी सारी हरना।।3।।
भूख प्यास से पशु अकुलाए।
जाकर अपनी बात बताए।।
छोड़ दिए हैं पशु सब खाना।
किए उपाय सभी हम नाना।4।|
समाधान जो ऋषभ बताए।
छींकी धर कर नहीं हटाए।।
भागे सुनकर वे सारे जन।
प्रबल बँधा कर्मों का बंधन।।5।।
ग्राम अयोध्या ऋषभ पधारे।।
चमके तब श्रेयांस सितारे।।
रत्न अश्व उनको दिखलाते |
थाली भर माणिक नित लाते।।6।।
परदादा जी दिए दिखायी।
श्यामल सी छवि मन को भायी।।
महल एक सौ आठ घड़े थे।
प्रभु सम्मुख श्रेयांस खड़े थे।।7।।
ग्राह्य इक्षु रस को बहराए।
देख पारणा सब हरषाए।।
सुखद तृतीया अक्षय प्यारी।
उत्सव बनी वही मनहारी।।8।।
दोहा-
किए साधना फिर कठिन, बीते वर्ष हजार।
अगणित सहकर कष्ट नित, करते रहे विहार।।
----०----
पुरिमतालपुर में जो आए।
देख अशोक ध्यान प्रभु ध्याए।।
अपना वहीं जमाया आसन।
सभी तोड़ने अपने बंधन।।1।।
तीन दिवस की किए तपस्या।
दूर हुई तब सभी समस्या।।
मिला सुखद कैवल्य निराला।
हुआ वहीं पर दिव्य उजाला।।2।।
ग्यारस कृष्ण पक्ष शुभ प्यारा।
फाल्गुन मास सरस था न्यारा।।
चौसठ इंद्र वहीं पर आए।
दुंदुभि अपनी देव बजाए।।3।।
बने महोत्सव आज सुहाना।
मिलकर आओ उसे मनाना।।
दूर-दूर से सब जन आए।
समवसरण देखे हर्षाए।।4।।
चकित हुई थी जनता सारी।
दुख दुविधाएं मिटें हमारी।।
मौन खोल प्रभु जी बोलेंगे।
राज परम के सब खोलेंगे।।5।।
तीर्थ स्थापना हुई मनोहर।
कहलाए प्रभु जी तीर्थंकर।।
सुनी देशना सुर नर सारे।
पाँच महाव्रत कुछ ने धारे।।6।।
'चक्र रत्न' संवाद मिला जब,
भरत कहे जाएँ सारे अब।।
परम ज्ञान पितु श्री जो पाएँ।
जाकर उत्सव वहीं मनाएँ।7।।
हुई सवार मातु हाथी पर।
करूँ ऋषभ से बातें जी भर।।
देख ठाठ माँ तब चकराई।
भीड़ अपार देख हरषाई।।8।।
दोहा-
बंधन सारे तोड़ कर, चली मातु उस पार।
ताले खोले मोक्ष के, करते सब जयकार।।
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ज्ञान प्रकाशित जब हो पाया।
जन-जन के मन को भी भाया।।
उपासना आकर जो करते।
सुख से गागर सारे भरते।।1।।
सुनी देशना जिसने आकर।
हटें सभी भव के सारे डर।।
मर्म समझ जो बदली धारा।
जीवन उनका नाथ सँवारा।।2।।
उग्र विहार सदा ही करते।
अग जग की वे पीड़ा हरते।।
कभी अनार्य क्षेत्र प्रभु जाते।
कभी युनान,ग्राम निज आते।।3।।
जैन धर्म का बिगुल बजाया।
आत्म तत्व उत्तम बतलाया।।
दया सदा मनहर कल्याणी।
सुखी हुए उससे सब प्राणी।।4।।
देखा ये अवसान निकट है।
करना न्यारा मंगल घट है।।
अष्टापद गिरि पर वे आए।
निराहार छह दिवस बिताए।।5।।
वहीं अयोगी प्रभु बन पाए।
मोक्ष गए सबके मन भाए।।
त्रयोदशी वह माघ निराला।
चहुँ दिशि छाया वहाँ उजाला।।6।।
वेद पुराण सभी सम्मत हैं।
पाले सदा कड़े प्रभु व्रत हैं।।
उन्हें प्रखर निर्ग्रंथ बताए।
चर्या उनकी कठिन दिखाए।।7।।
भ्रात सुभाष राह दिखलाई।
आदिनाथ पर मैं लिख पाई।
'हिम्मत' का लेना नित वंदन।
करूँ सदा पूजा अभिनंदन।।8।।
दोहा-
आत्म तत्व उत्तम सदा, जैन धर्म का सार।
जिसने इसको पा लिया, हुआ जगत से पार।।1।।
गुण की पूजा कीजिए, दें आडम्बर छोड़।
शिव सुन्दर जो आत्मा, वही सदा बेजोड़।।2।।
सम्यक दर्शन ज्ञान शुभ, और रहे चारित्र।
जिनशासन संदेश यह, जीवन रखो पवित्र।।3।।
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17- लेखिका का परिचय ~
नाम- हिम्मत चोरड़िया "प्रज्ञा"
पिता- रूपचंद जी नाहटा
माता-श्रीमती किस्तूरी देवी नाहटा
पुत्र वधु स्व. सदासुख जी चोरड़िया
सासू माँ- श्रीमती चंदा देवी चोरड़िया
पति-श्री निर्मल कुमार जी चोरड़िया
लाड़नूँ निवासी, कोलकाता प्रवासी
जन्म 5 जून 1960
शिक्षा-MA
गृहिणी
धार्मिक शिक्षा: समण संस्कृति संकाय जै.वि.भा द्वारा संचालित भाग 9 तक परीक्षा,विज्ञ की उपाधि। तत्व ज्ञान व तेरापंथ का षटवर्षीय व पंचवर्षीय कोर्स।तत्व प्रचेत व तेरापंथ प्रचेता की उपाधि।
तेरापंथ दर्शन में तीसरे व चौथे वर्ष में अखिल भारतीय स्तर पर तीसरा व चौथा स्थान।
प्रवक्ता उपासिका (धर्मसंघ को समय -समय पर अपनी सेवाएँ देना अपनी),ज्ञानशाला प्रशिक्षिका
प्रकाशित पाँच पुस्तकें-
1.माँ की याद, 2.मायड़ भाषा रा गीत, 3.सुनती हुई पदचाप (कविता संग्रह),4. मन की सरिता (1544 दोहा संकलन),5. सरगम (111 गीत व 41 गीतिकाओं का संकलन),
6. कुण्डलिया की पुस्तक प्रकाशक के अधीन
7.साझा काव्य संग्रह-'हिन्दी हाइकु कोश' में हाइकु प्रकाशित, 'सपनों की सेल्फी' में हाइकु प्रकाशित,'दिल्ली दर्पण'-में दोहे प्रकाशित
'अक्षर का संकल्प'-में दोहे प्रकाशित, माटी मेरे देश की-साझा संकलन में लाडनूँ पर लिखे गीत चयन, ऐ सखी !साजन कह मुकरी संकलन में मुकरियों को स्थान।
शासन माता महासति साध्वी प्रमुखा श्री कनक श्री जी पर लिखी स्क्रिप्ट का चयन रायपुर महिला मंडल द्वारा।
अनेक मंचों से 200+ सम्मान पत्र
विश्व रिकोर्ड में दर्ज पुस्तक 'आयुर्वेद को जानें'-में 51 दोहे इलायची पर शामिल।
'आयुष कीर्ति' अलंकरण से अलंकृत किया।
लेखन-दोहा,मुक्तक, कुण्डलिया, गीत, गीतिकाएँ, अनेक छंदबद्ध व छंदमुक्त रचनाएँ लिखना।
अनेक पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
अनेक मंचों पर अपनी सेवाएं देना।
अखिल भारतीय महिला मंड़ल के निर्देशन में दहिण हावड़ा महिला मंड़ल द्वारा 2025 का 'प्रेरणा सम्मान'
दा ब्रिटिश वर्ल्ड रिकार्ड सर्टिफिकेट-आचार्य महाप्रज्ञ जी पर लिखी 1121 कविताओं में सहभागिता
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18- आदिनाथ गाथा प्रेरक आदरणीय अग्रज
जिनवाणी माँ शारदे की कृपा हो साथ में गुरुजनों का श्रम हो तब असंभव भी संभव बन जाता है।
छंद महल जैसे पावन पटल पर आदरणीय सुभाष सिंघई जी भैया व आदरणीय सुरेन्द्र जी कौशिक भैया ने आंजनेय छंद चलाया।
उसी श्रृंखला में जैन कहानियाँ आदिनाथ पारणा,भक्तामर स्त्रोत की कथा, हनुमान जी की कथा, इलाची कुमार की कथा, कालसौकरिक की कथा व चौबीसी लिखी।
सचित्र भक्तामर कथा को देखकर आ. सुभाष भैया ने प्रेरणा दी बहन आप आदिनाथ के पंच कल्याणक लिखें। मैंने कहा भैया आप मार्गदर्शन करें तो लिख सकती हूँ। भैया की सहमति मिली विश्वास जग गया। आंजनेय छंद की शक्ति से कलम चलने लगी। मैं स्वयं नहीं जानती थी कि मैं कभी आदिनाथ की गाथा लिख पाऊँगी?
कुछ तथ्य मुझे ज्ञात थे क्योंकि उपासक यात्रा में जाती हूँ तो वही तथ्य बताती हूँ पर कुछ दिगम्बर तथ्यों से अनभिज्ञ थी। तब आ. सुभाष भैया बताए उस परम्परा में यह इस प्रकार है। दो परम्परा को लेकर चलना मुश्किल था। पर गुरु कृपा से वह भी संभव हुआ। भैया से नयी जानकारियाँ भी मिली।
लिखकर बहुत अच्छा लगा। अपना सौभाग्य मानती हूँ भगवान ऋषभनाथ का गुणगान कर अपने समय को सार्थक की।
इस आदिनाथ गाथा के प्रेरक आ. अग्रज सुभाष सिंघई जी जतारा, जिला टीकमगढ़ (म. प्र) हैं। इसे आज आ. सुभाष भैया को ही समर्पित कर रही हूँ।
आ.धर्मपाल जी भैया का आभार जिन्होंने मुझे छंदों का ज्ञान दिया जिससे मैं विधान सहित लेखन कर सकी। आ. सुरेंद्र कौशिक जी भैया का धन्यवाद जिन्होंने अपना अमूल्य समय देकर कहीं त्रुटि देखी वहीं सुधार करवाया।
अंत में आदिनाथ के चरणों में सभक्ति वंदन। कहीं कहने में मेरे भूल रही हो तो अल्पज्ञ समझकर क्षमा कर देना मुझे प्रभो। यह गाथा भक्ति वश होकर लिखी हूँ🙏🏼
दोहा-
त्रुटि हो तब यह विनय, पढ़ना इसे सुधार।
भक्ति भाव का यह सृजन, सभी करें स्वीकार।।
आदिनाथ के चरणों में कोटिशः वंदना
रचयित्री-
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
6.10.25
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1-- किसी धार्मिक आख्यान में , महापुरुष तीर्थंकर भगवान की जीवनी लिखने में बहुत ध्यान रखना पड़ता है , और जब बात एक ही धर्म की दो धाराओं गंगा - जमना की हो, तब सरस्वति धारा को आकर "प्रयागराज तीर्थ " समन्वय करके निर्माण करना पड़ता है |
एक संदेश देना, एक महापुरुष की जीवनी को प्रस्तुत करना , बहुत कठिन कार्य होता है |
लेकिन आदरणीया बहन हिम्मत चोरड़िया जी ने अपने दायित्व का भली भांति निर्वाह किया हैं ,दोनों धाराओं का संगम मां जिनवाणी सरस्वती की अनुकम्पा से सृजन को प्रयागराज तीर्थ बना दिया है
अंजनेय छंद में भी लिखना कोई सरल काम नहीं था , भगवान आदिनाथ की कृपा से एवं मोक्षगामी अंजना सुत हनुमत जी की कृपा से अंजनेय छंद में ही बहुत श्रेष्ठ लेखन " आदिनाथ गाथा " में बहन हिम्मत चोरड़िया जी ने किया है |
मैं उनके लेखन को उनके भावों को नमन वंदन व अभिनंदन करता हूँ
अशेष बधाई शुभकामनाएँ
शुभेच्छु
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
संयोजक एवं प्र० सम्पादक छंद महल हिंदी ई पत्रिका
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अंजनेय वर्णिक छंद
सकल दिशा में करे उजाला।।
मंगलकारी अति सुखकारी।
इसकी महिमा जग में न्यारी।।1।।
सब धर्मों में उत्तम मंगल।
हटते राहों के सब दंगल।।
तीस पाँच है इसमें अक्षर।
जाप करे मन के भागे डर।।2।।
अर्हत मुक्त सिद्ध गुरु आते।
उपाध्याय मुनि जी मन भाते।।
छोड़ सभी यह बंधन नाता।
केवल गुण को शीश नवाता।।3।।
चूर्ण कामना करता मन की।
दुविधा हरता है जीवन की।।
करे व्यक्ति की कब यह पूजा।
नहीं मंत्र इसके सम दूजा।।4।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाड़नूँ
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आंजनेय छंद
सुख की गागर मैया भरती।।
पिता महेन्द्र बड़े बड़ भागी।
हृदय सुन्दरी माँ अनुरागी।।1।।
प्रश्नकीर्ति उसके शत भाई।
पाती हरपल खुशी सवाई।।
राजकुमारी बड़ी हुई जब।
शादी का चिंतन करना अब।।2।।
विद्युतप्रभ का नाम बताए।
पवनंजय दूजे मन भाए।।
देख कुण्डली बोले सब जन।
पवनंजय से होगा बंधन।।3।।
जोड़ी निरख सभी हरषाए।
नियत समय बाराती आए।।
जागी उत्सुकता अब मन में।
पत्नी को निरखूँ उपवन में।।4।।
चर्चा करती मिलकर सारी।
दिखी अंजना मनहर प्यारी।।
विद्युतप्रभ को सौम्य बताई।
कई पवन जी को बतलाई।।5।।
विद्युतप्रभ ये मोक्ष वरेगा।
दुखद भोग का त्याग करेगा।।
पत्नी के मुख बोल सुनें जब।
आग बबूला हुए वहीं तब।।6।।
सोचा शादी तनिक न करता।
वंश दाग से नित मैं डरता।।
शादी कर परित्याग करूँगा।।
बोल कभी यह नहीं सहूँगा।।7।।
शादी कर वे नगर पधारे।
दुख से आकर कौन उबारे।।
महल अकेली लाकर छोड़ा।
बंधन अपना उससे तोड़ा।।8।।
बात कौन उसको बतलाए।
साजन महल नहीं क्यों आए।।
गलती हुई कहाँ पर कैसे।
करूँ सुधार वहीं पर वैसे।।9।।
बारह वर्ष रहा दुख भारी।
खिली नहीं मन की वह क्यारी।।
याद किया नित ही ईश्वर को।
भरो सुखों से इस गागर को।।10।।
करती रही भावना सुन्दर।
कर्म दोष मेरा है प्रभुवर।।
आया अवसर एक निराला।
टूटे सघन करम का ताला।।11।।
समाचार रावण भिजवाए।
वरुण उदण्ड सजा जो पाए।।
करो समर की अब तैयारी।
सबक वरुण को देना भारी।।12।।
उसे हरा कर घर मैं आऊँ।
बलशाली खुद को बतलाऊँ।।
चले पवन जी प्रीत निभाने।
आज शौर्य अपना दिखलाने।।13।।
किया पिता माँ को अब वंदन।
रखी वहीं पत्नी से अनबन।।
विदा करूँ आई तब बाहर।
शकुन दिखाया जीतो जाकर।।14।।
बड़े क्रोध में वचन सुनाए।
नहीं सामने फिर यह आए।।
नहीं पसंद तुम्हें मैं करता।
तुम्हें देख दुख मेरा बढ़ता।।15।।
सुने बोल जो कड़वे मुख से।
थी आकंठ स्वयं अति दुख से।।
कर्म दोष खुद का बस जाना।
जीत समर में प्रभो दिलाना।।16।।
रुके पवन जी देख अँधेरा।
तरु के निकट लगाया डेरा।।
देखी चकवी करती क्रंदन।
उलझा चकवे में भारी मन।।17।।
दृश्य निरख निज धारा मोड़ी।
बिन मतलब क्यों पत्नी छोड़ी।।
दिए कष्ट मैंने ही अगणित।
फिर भी किया सदा मेरा हित।।18।।
मनो दशा अपनी बतलाई।
सही राह तब मित्र बताई।।
विद्या के बल मिलकर आओ।
अपना जाकर फर्ज निभाओ।।19।।
एक घड़ी में महल पधारे।
आकर दुख को किया किनारे।।
दिए निशानी अपनी आकर।
रखो दूर मन के सारे डर।।20।।
हर्षित थी वह देख अँगूठी।
लगी चीज वह बड़ी अनूठी।।
भूल बात अब सब ही जाना।
जीवन सुख से हमें बिताना।।20।।
हुई प्रेम से सुबह विदाई।
गुप्त बात यह नहीं बताई।।
गर्भवती ये बात सुनी जब।
आग बबूला हुई सास तब।।21।।
मन की अपनी बात बताई।
रास नहीं किसको वह आई।।
काले कपड़े उसे दिए तब।
छोड़ो जंगल में जाकर अब।।22।।
साथ सखी ने बहुत निभाया।
धीरज उसको सदा बँधाया।।
बीच राह में देखे मुनिवर।
किए पास में दर्शन जाकर।।23।।
होगा पुत्र परम बलशाली।
देगा सबको वह खुशहाली।।
नहीं रहेगी अब मजबूरी।
दुख से समझो निश्चित दूरी।।23।।
आशीर्वाद लिया मुनिवर का।
लिया रासता अब पीहर का।।
वेष निरख सारे घबराए।।
नहीं ठहरने क्षण तू पाए।।24।।
उसे कड़ी फटकर लगाई।
कुलटा पापिन माँ बतलाई।।
हुई हताश चली वे जंगल।
रोको प्रभुवर सारे दंगल।।25।।
जन्मा एक मनोहर बालक।
वही हमारा रक्षक पालक।।
नाम रखा हनुमान निराला।
करता जग में वही उजाला।।26।।
निरख दृश्य मामा चकराए।
बिठा यान उनको घर लाए।।
युद्ध जीत पवनंजय आए।
मान सहित महलों में लाए।।27।।
कथा सीख दे हमें निराली।
रहे हमेशा रात न काली।।
कीर्तिवान भारी वह बनता।
देख दुखों को 'हिम्मत' रखता।।28।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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आप पवन सुत सदा सहारे।
चमकाते नित भाग्य सितारे।।
रामदूत अति हैं बलशाली।
भक्तन की नित करें रुखाली।।
सिया राम के सहज दुलारे।
चमकाते नित भाग्य सितारे।।
दुखभंजक वे मंगलकारी।
महिमा गाते सुर नर नारी।।
नवल अन्न से भरें भंडारे।
चमकाते नित भाग्य सितारे।।
निशदिन जो भी मन से ध्याता।
सातों सुख मानव नित पाता।।
सब जन के वे काज सँवारे।
चमकाते नित भाग्य सितारे।।
कामदेव सा तन मन सोहे |
दिव्य तेज सबका मन मोहे।।
'हिम्मत' मंदिर बजे नगारे।
चमकाते नित भाग्य सितारे।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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जैन धर्म की सुखद कहानी।
कितनों के मुख आज जबानी।।
कथा लगी यह बड़ी निराली।
सुने खुले तब किस्मत ताली।।1।।
आचारज थे एक प्रभावक।
पूजें नित उठ सारे श्रावक।।
मानतुंग जी नाम सुपावन।
भक्तामर लागे मनभावन।।2।।
हर्षदेव करते थे शासन।
सबका करते थे वे पालन।।
उन्हें बनारस अपना प्यारा।
लेखन लगता उनको न्यारा।।3।।
एक जैन उनके दरबारी।
करता बातें वह हितकारी।।
एक दिवस बोला राजन से।
निर्णय लेना खुद ही मन से।।4।।
मानतुंग जी ज्ञानी अनुपम।
यहाँ बुलाएँ देखें दमखम।।
नृप ने सच करने की ठानी।
आकर क्षमता यहाँ दिखानी।।5।।
दिया निमंत्रण आप पधारें।
हम सब की तरणी को तारें।।
मानतुंग जी सहज नकारे।
साथ चलें कह सब ही हारे।।6।।
किए प्रार्थना हाथ जोड़कर।
मिला आपको प्यारा अवसर।।
जिनशासन की शान बढ़ाएँ।
सर्वश्रेष्ठ इसको बतलाएँ।।7।।
बोले इसका नहीं प्रयोजन।
आत्म तत्व है अपना चिंतन।।
चमत्कार हम नहीं दिखाते।
सही राह सबको बतलाते।।8।।
बार-बार जो किया निवेदन।
छलकाया सारा अपनापन।।
साथ चलें अब दंभ मिटाना।
सत्य धर्म इनको समझाना।।9।।
किया प्रणाम सभी ने आकर।
आया दुर्लभ प्यारा अवसर।।
बोले राजा कहिए मुनिवर।
जैन धर्म है कैसे मनहर।।10।।
श्रेष्ठ सदा ब्राह्मण कहलाए।
रवि पूजा कर रोग मिटाए।।
कोढ़ असाध्य हुआ छूमंतर।।
हुई निरोगी काया मनहर।।11।।
मातु चंडिका निशदिन ध्याया।
बड़ा कमाल एक बतलाया।।
हस्त विछिन्न जोड़ दिखलाया।।
उच्च धर्म अपना बतलाया12।।
अपना धर्म हमें बतलाएँ।
समझ तभी सारे हम पाएँ।।
मानतुंग जी मौन धरे जब।
कारागृह में बंद करो अब।13।।
चवालीस तब कोष्ठ खुलाए।
बंदी मिलकर वहीं बनाए।।
उनके भीतर उन्हें बिठाए।
ताले सब मजबूत लगाए।14।।
तीन दिवस वे ध्यान लगाए।
ऋषभ नाथ जी मन में ध्याए।।
चौथे दिन फिर पद्य सुनाए।
साँकल अपनी तोड़ गिराए।।15।।
चवालीस सब पद्य निराले।
खुले बंद तब उनके ताले।।
कक्ष खोल खुद बाहर आए।
देख दृश्य सब ही चकराए।।16।।
रचित स्तोत्र प्यारा भक्तामर।
काटे फेरा भव भय का डर।।
सभी पद्य हैं ये सुखदायक।
बनें मंत्र ये सदा सहायक।।17।।
भक्तामर प्यारा मनभावन।
बरसाता खुशियों का सावन।।
प्रातः उठकर जो भी जपता।
पाप जाल 'हिम्मत' ये कटता।।18।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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आंजनेय छंद-
नामी नगर इलावर्धन था।
धनदत का प्यारा आँगन था।
कीर्तिवान था अति बलशाली।
धर्म परायण थी घरवाली।।1।।
मिला इलादेवी से शुभ वर।
पुत्र इलाची था अति सुन्दर।।
रहा पिता का सहज दुलारा।
लगता सबको ही वह प्यारा।।2।।
बुद्धिमान था वह अति भारी।
यश गाते थे सब नर नारी।।
पार हुआ जैसे ही बचपन।।
शादी करनी हो यह चिंतन।।3।।
उधर मंडली नट की आई।
कितने ही वह खेल दिखाई।।
मुखिया की बिटिया थी सुन्दर।
लगी इलाची को ही मनहर।।4।।
इससे मुझको शादी करना।
वरना मुझे कँवारा रहना।।
मात-पिता उसको समझाए।
नीच गौत्र उसका बतलाए।।5।।
जिद उसने अपनी ही ठानी।
वही बनें इस दिल की रानी।।
करो काम यह आप पिताजी।
हमें जीतनी अब यह बाजी।।6।।
मुखिया को सब बात बताई।
सुन मुखिया ने शर्त लगाई।।
सुन शर्तें सब हुई हताशा।
टूटी मन की अब सब आशा।।7।।
सीखो कला यहीं पर आकर।
करना अर्जन विद्या पाकर।।
जाति भोज सबको करवाना।
सपने अपने तभी सजाना।।8।।
मात-पिता फिर से समझाए।
लेकिन समझ नहीं ही आए।।
एक रात घर को वह छोड़ा।
नट नटनी से खुद को जोड़ा।।9।।
खूब मिला था उसको आदर।
खुश होते थे उसे बुलाकर।।
कुछ ही दिन में रंग जमाया।
सबको अपना वहाँ बनाया।10।।
सब जन आओ खेल दिखाने।
नृप का सेवक गया बुलाने।।
किस्मत अपनी मैं चमकाऊँ।
शर्त जीत अपनी अब आऊँ।।11।।
चढ़ा बाँस पे सबसे ऊपर।
हर्षित सारे उसे देखकर।।
कन्या भरती रही मनोबल।
हो जाएगी सब मुश्किल हल।।12।।
छल से इसको मार गिराओ।
इसे बाँस पर पुनः चढ़ाओ।।
तीन बार चढ़ खेल दिखाया।
नहीं इनाम हाथ कुछ आया।।13।।
शिथिल हुई उसकी जो काया।
सारा खेल समझ अब आया।।
चौथी बार चढ़ा फिर से जब।
एक नजारा देखा नव तब।।14।।
भिक्षा खातिर आए मुनिवर।
देखे नहीं नारि को पलभर।।
आभूषण से सजा बदन था।
भरा-भरा उसका यौवन था।।15।।
बदली अपनी जीवन धारा।
करूँ भोग का अब छुटकारा।।
बना आज मैं कितना पागल।
अभी करूँगा इसका मैं हल।।16।।
करूँ रमण मैं मेरे भीतर।
दुर्लभ पाया मैंने अवसर।।
पाया शुभ कैवल्य वहीं पर।
ज्ञान दिया तब नीचे आकर।।17।।
आज इलाची की कही कहानी।
हर जन को ये हमें सुनानी।।
भोग सदा दुखदायक होते।
लिप्त रहे वे हरपल रोते।।18।।
ऊपर उठे सदा जो मानव।
जीवन लगे सदा ही उत्सव।।
दूर रहें तब सारे तांडव।
'हिम्मत' पास रहेंगे माधव।।19।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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आंजनेय छंद-
कालसौकरिक एक कसाई।
हिंसा निशदिन मन को भाई।।
पंचशतक भैंसे नित मारे।
समझाते सब जन ही हारे।।1।।
तब राजा श्रेणिक घर आया।
देकर तर्क उसे समझाया।।
नर्क गमन से मुझे बचाओ।
अपना ये तुम फर्ज निभाओ।।2।।
महावीर की शुभ यह वाणी।
सुनकर सुख पाते हैं प्राणी।।
नरक यातना तभी टलेगी।
भैंस एक दिन नहीं कटेगी।।3।।
बोला अति मुश्किल है राजन।
यही पेट भरने का साधन।।
राह अन्य कुछ आप निकालें।
छुटकारा खुद दुख से पालें।।4।।
पकड़ कुएँ में उसे बिठाया।
बंद काम उसका करवाया।।
नहीं कसाई फिर वह माना।
काम करूँ उसने यह ठाना।।5।।
मैल, मृदा लेकर वो कहता।
भैंसा देख एक यह मरता।।
पंचशतक ढेले दिखलाए।
आज भैंस सब मार गिराए।।6।।
अपनी आदत नहीं सुधारी।
चकित देख सारे नर नारी।
पूछे राजन इसका कारण।
ऐसे उसने किया निवारण।।7।।
कुल का धंधा बहुत पुराना।
राजन मुश्किल इसे छुड़ाना।।
भले प्राण जाएँ इस तन से।
रीति निभाऊँ अपने मन से।।9।।
नरक यातना नहीं टलेगी।
करणी अपनी सँग चलेगी।।
श्रेणिक मन में यही विचारे।
कर्मों से ऋषि मुनि सुर हारे।।10।।
कथा हमें यह सीख सुनाए।
कर्म नहीं यह टलने पाए।।
काम करो तब झांको अंदर।
'हिम्मत' भरना होगा रोकर।।11।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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*******************भाग -3***********
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1-----पदमावती छंद ( णमोकार महामंत्र स्तुति )
10,8,14 मात्राभार ,32 मात्रा,अंत दो गुरु अनिवार्य
गीत- पदमावती छंद ( णमोकार महामंत्र स्तुति)
नवकार हमारा, सबल सहारा,
पावन जग में कहलाता।
निशदिन जो जपता,संकट कटता,
वीतराग सम बन जाता।।
करता रखवाली, है बलशाली,
पग - पग पर मंगलकारी।
भव-फेरा काटे, दुविधा पाटे,
सब मंत्रों पर है भारी।
है शुभ का दाता, भाग्य विधाता,
सुर मुनि के यह मन भाता।
नित उठ जो जपता, संकट कटता,
वीतराग सम बन जाता।।
है भव भयहारी, अति सुखकारी,
मिटें कामनाएँ सारी।
सब पाप हटाता, वैभव दाता,
महिमा है इसकी न्यारी।।
है नित्य सहायक, शुभ फलदायक,
मन का उपवन सरसाता।
नित उठ जो जपता, संकट कटता,
वीतराग सम बन पाता।।
अरिहंत उबारे, सिद्ध हमारे,
आचारज को हम ध्याएँ।
संतों को वंदन, श्रद्धा चंदन,
उपाध्याय के गुण गाएँ।
नव आशा भरता, मनुज न डरता,
पुष्प कमल सा खिल पाता।
निशदिन जो जपता,संकट कटता,
वीतराग सम बन जाता।।
मंत्र निराला, खोले ताला,
इसकी महिमा हम जानें।
रिद्धि-सिद्धि लाता, तमस भगाता,
दिव्य मंत्र इसको मानें।।
'हिम्मत' नित बोले, व्यर्थ न डोले,
जो नर हर क्षण यह गाता।
नित उठ जो जपता, संकट कटता,
वीतराग सम बन जाता।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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दिव्य मंत्र नवकार हमारा।
जाप जपा जो लिया किनारा।।
पाँद पदों की महिमा भारी।
करता रक्षा सदा हमारी।।
जीवन में भरता उजियारा।
जाप जपा जो लिया किनारा।
जंगल में भी मंगल करता।
सुमिरन से सारे दुख हरता।
देता प्रतिपल हमें सहारा।
जाप जपा जो लिया किनारा।।
सभी कामना होती पूरी।
विपदाओं से होती दूरी।
अर्पित इस पर जीवन सारा।
जाप जपा जो लिया किनारा।।
बंधन कर्मों के ये काटे।
जन्म-जन्म का फेरा पाटे।।
'हिम्मत' है ये सबसे न्यारा।
जाप जपा जो लिया किनारा।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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मात्राभार,14,14 अंत में दो लघु अनिवार्य
टोटल 28 मात्रा
शीर्षक- णमोकार महामंत्र (नवकार महामंत्र)
उत्तम है नवकार शरण,
आस्था से हर पल ही रट।
मन से भजता जो मानव,
संकट कटते सब झटपट।।
पूर्वों का है सार गजब,
दिव्य मंत्र हैं सब अक्षर।
इसमें पद हैं पाँच निहित,
करते मंगल पग-पग पर।।
सदा पुण्य का हो संचय,
हटे कर्म की चिकनाहट।
मन से भजता जो मानव,
संकट कटते सब झटपट।।1।।
पापों का यह करे शमन,
बलशाली अति भवभंजक।
रोग शोक का करे दहन,
मानो प्यारा मनरंजक।।
रहे देवता सदा निकट,
निर्मल बनता हर पल घट।
मन से भजता जो मानव,
संकट कटते सब झटपट।।2।।
सिद्ध साधु अरहत प्रभुवर,
आचारज को नित वंदन।
उपाध्याय ज्ञानी हितकर,
पाँचों हरते सब उलझन।।
सब मंत्रों से है ऊपर,
आत्मज्ञान को करे प्रकट।
मन से भजता जो मानव,
संकट कटते सब झटपट।।3।।
खुशियों से भरता गागर,
पार कराता भव सागर।
मन के तोड़े सकल भरम,
ऊँचे छूते सदा शिखर।।
'हिम्मत' भजती है प्रतिदिन,
खिली-खिली रहती चौखट।
मन से भजता जो मानव,
संकट कटते सब झटपट।।4।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नमस्कार महामंत्र
सरसी छंद आधारित गीत-
मात्रा भार भार 16,11. अंत गुरु लघु
मंगलकारी भयभंजक ये,
महामंत्र नवकार।
जाप जपें जो निशदिन इसका,
होता भव से पार।।
पाप विनाशक सुखदायक है,
कष्ट करें सब दूर।
चौरासी का फेरा काटे,
खुशियाँ दें भरपूर।।
पूर्वों का ये सार गजब का,
खोले शिवपुर द्वार।
जाप जपें जो निशदिन इसका,
होता भव से पार।।1।।
करें कामनाओं से ऊपर,
रहें सहायक. देव।
चूर-चूर बाधाएँ कर दे,
बनते काम स्वमेव।।
शब्द-शब्द में ज्ञान भरा है,
दिल में इसे उतार ।
जाप जपें जो निशदिन इसका,
होता भव से पार।।2।।
कर्मों के बंधन को काटे,
शाश्वत दे आनंद।
जंगल में भी मंगल रच दे,
मिट जाएँ सब द्वंद।।
पाँचों परमेष्ठी हैं प्यारे,
भरते मन उजियार।
जाप जपें जो निशदिन इसका,
होता भव से पार।।3।।
तीर्थ प्रवर्तक राह दिखाते,
सिद्ध सुखों की खान।
आचारज को कोटि वंदना,
उपाध्याय दें ज्ञान।
पाँच महाव्रतधारी मुनिजन,
'हिम्मत' लें आधार।।
जाप जपें जो निशदिन इसका,
होता भव से पार।।4।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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15 मात्रा आदि त्रिकल, अंत गुरु
मंत्र नवकार जपो भाई।
दिव्य अनुपम यह सुखदाई।।
कामना मेटें ये सारी।
खिला दे मन की यह क्यारी।।
पंच परमेष्ठी कहलाता।
कर्म से तोड़े यह नाता।
दूर करता सब कपटाई।
दिव्य अनुपम यह सुखदाई।।
पाप की काटे यह कारा।
सभी मंत्रों से है न्यारा।।
अलौलिक सुख ये बरसाता।
नहीं जग में फिर भरताता।।
सार पूर्वों का वरदाई।
दिव्य अनुपम यह सुखदाई।।
लगाता जड़ता पर ताला।
फेरना 'हिम्मत' तुम माला।।
सिद्ध अरिहंत साधु न्यारे।
लगे तीजे चौथे प्यारे।।
पाटते 'हिम्मत' ये खाई।
दिव्य अनुपम ये सुखदाई।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनू्ँ
तर्ज-आरती कुँज बिहारी की
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मात्राभार. 2122 2122. 2122 2. कुल 23 मात्रा
कामनाएँ ये मिटाता नित्य जप भाई।।
सार पूर्वों का कहा है विघ्न ये हरता।
जो जपे मन से इसे वह पार भव करता।।
ली शरण जिसने उसी की दूर कठिनाई।
कामनाएँ ये मिटाता नित्य जप भाई।।
ज्ञान से करते अरिहंत नित्य उजियारे।
तोड़ते वे कर्म कारा काम हों सारे ।
प्रात जो सुमिरन करेगा नष्ट कपटाई।
कामनाएँ ये मिटाता नित्य भज भाई।।
सिद्ध सुख के हैं सहारे सिद्धि के दाता।
पाप से गुरुवर उबारें जो निकट आता।।
सत्य जो पढ़ते पढ़ाते पाटते खाई।
कामनाएँ ये मिटाता नित्य जप भाई।।
दूर माया से रहे वे संत कहलाएँ।
पंच परमेष्ठी सुपावन प्रेम से गाएँ।
मंत्र से 'हिम्मत' मिलेगी दिव्य प्रभुताई।
कामनाएँ ये मिटाता नित्य जप भाई।।
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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द्विगुणित गंग आधारित गीतिका
मापनी-22122 22122
विषय- नवकार मंत्र
नवकार जप ले, आशा फलेगी।
प्राचीर दुख की जड़ से हिलेगी।।
शुभ मंत्र पावन, जग में निराला।
मन से जपे जो, बगिया सजेगी।।
ये पाप काटे, करता उजाला।
दुविधा दिलों की, सारी छँटेगी।।
उत्तम सभी से देता सहारा।
जयकार तूती, जग में बजेगी।।
छल कामनाएँ, सारी हटाता।
सुख-बाँसुरी तब,नित ही बजेगी।।
जपना सदा ही, दिन-रात इसको।
दुर्भावनाएँ मन की हटेगी।।
मुनि देव गाते, महिमा इसी की।
रातें अँधेरी, हिम्मत ढलेगी।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
तर्ज-लैला ओ लैला....
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करो सदा गुणगान,
जपो नित्य नवकार।
कट जाएँ छल पाप,
देता खुशी अपार।।1।।
पूर्वों का यह सार,
उत्तम मंत्र महान।
ताप रहें सब दूर,
इसको हृदय उतार।।2।।
सर्वश्रेष्ठ यह मंत्र,
भजना इसे सदैव।
तन-मन रहें निरोग,
मिटती द्वेष दरार।।3।।
पाते हम सब त्राण,
मिलता नया प्रकाश।
आधि-व्याधि सब मुक्त,
छँटे सकल अँधियार।।4।।
अक्षर- अक्षर मंत्र,
काटे कर्म अनंत।
रहें पाप मद दूर,
बनें मनुज अविकार।।5।।
'हिम्मत' रख नित ध्यान,
जपना इसे हमेश।
बनते रक्षक देव,
करना सदा विचार।।6।।
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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भुजंग प्रयात छंद (वर्णिक) आधारित गीत-
मात्राभार- 122 122 122 122
लगे ये सुधा सी भरी एक प्याली।
महावीर वाणी सदा ही निराली।।
सदा प्रेम से ही भला हो हमारा।
इसी प्रेम ने ही सभी को उबारा।।
रही त्याज्य हिंसा सदा गोलियाँ रे।
घृणा बीज बोते जली होलियाँ रे।।
बहे धार मैत्री छँटे रात काली।
महावीर वाणी सदा ही निराली।।1।।
नहीं वक्त खोना नहीं लौट आता।
चला साथ जो भी वही जीत पाता।।
प्रमादी बनें जो उसी को छलेगा।
लिया हाथ में तो नया ही रचेगा।
वहीं मान लेना सदा ही दिवाली।
महावीर वाणी सदा ही निराली।।2।।
सगे कर्म तेरे वही साथ जाते।
धृणा मान माया हमें ये डुबाते।।
दिखावा करें क्यों बड़े कष्टदाई।
धरो सादगी को हटेगी बुराई।।
जपा नाम 'हिम्मत' खुले भाग्य ताली।
महावीर वाणी सदा ही निराली।।3।।
(तर्ज-तुम्हीं मेरे मन्दिर..)
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
- सरसी छंद आधारित गीत
मात्राभार 16,11 अंत गुरु लघु से
आदिनाथ पारणा-
आयी आखातीज सुहानी,
करें ऋषभ गुणगान।
अहो दान गूँजा था नभ में,
मिला प्रथम जो दान।।
द्वारे- द्वारे घूमे प्रभुवर,
सुलभ कहाँ आहार।
हीरे मोती माणिक लाते,
करो आप स्वीकार।।
बाधा कर्मों की थी भारी,
भिक्षा से अंजान।
अहो दान गूँजा था नभ में,
मिला प्रथम जो दान।।1।।
हुआ पारणा पड़पोते से,
बनी तृतीया खास।
सींचा पर्वत अपने हाथों,
रचा नया इतिहास।।
आज पूर्ण ये हुआ मनोरथ,
किया इक्षुरस पान।
अहो दान गूँजा ये नभ में,
मिला प्रथम जो दान।।2।।
शुद्ध लाभ ही अक्षय रहता,
देता ये संदेश।
तप की महिमा सदा निराली,
दूर रहें सब क्लेश।।
ऋषभनाथ को याद करें हम,
हटतें सब व्यवधान।।3।।
आज बधाई दें हम सारे,
पावन इस त्योहार।
शुद्ध दान दें पुण्य कमाएँ,
वही धर्म का सार।।
'हिम्मत' वंदन आदिनाथ को,
धरें नित्य हम ध्यान।
अहो दान गूँजा था नभ में,
मिला प्रथम जो दान।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनू्ँ
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गीतिका लावणी छंद.
16 14 पर यति, अंत दो गुरु
महावीर अब फिर से आओ,
घना अँधेरा छाया है।
मानवता निष्प्राण हुयी है,
हिंसा में भरमाया है।।
मैत्री दूर हुयी अब दिल से,
आतंक ने डाला डेरा।
हुये स्वार्थ में अंधे सारे,
विकट काल अब आया है।।
अहं नाग अब सर चढ़ बैठा,
मौन सत्य ने धार लिया।
भैंस उसी की जिसकी लाठी,
अपना आज पराया है।।
नैतिकता की बात पुरानी,
सुनते आज किताबों में।
चौराहे पर नारी लूटे ,
तलवारों का साया है।।
आज विषमता फैली जग में,
असुर वृत्तियाँ जाग गई।
भोगवाद में उलझा मानव,
लगती प्यारी काया है।।
'हिम्मत' जागो अभी समय है,
धरती हमें बचानी है।
मानें हम सिद्धांत वीर के,
जीवन सार समाया है।
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
तर्ज-फूल तुम्हें भेजा...
कसमें वादे...
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सार छंद, 16,12 मात्राएँ-
कर्म किसे कब छोड़े जग में,
किया स्वयं ही पाते।
जैसा किया हाथ से हमने,
लौट वही फिर आते।।
आदिनाथ घर- घर घूमे थे,
नहीं मिली थी भिक्षा।
अन्तराय थी जो कर्मों की,
देते हमको शिक्षा।।
महावीर प्रभु को देखा है,
संकट कितने आए।
दोषी माना बस कर्मों को,
धीरज से सह पाए।।
अटल मानते जो कर्मों को,
नहीं कभी घबराते।
जैसा किया हाथ से हमने,
लौट वही फिर आते।।
महासती सीता को देखें,
घूमी थी वन- वन में।
राम सरीखे पति भी पाकर,
कष्ट सहे जीवन में।
हरिश्चंद्र राजा को देखें,
भरा डोम घर पानी।
राजपाट सब छूट गये थे,
बेची तारा रानी।।
उदय प्रबल हो जब कर्मों का,
क्या- क्या नहीं दिखाते।
जैसा किया हाथ से हमने,
लौट वही फिर आते।।
सीख हमें ये देते हर पल,
सगे नहीं ये अपने।
कब राजा से रंक बना दे,
नये दिखा दे सपने।।
सँभल-सँभल कर रहना हमको,
सदा अशुभ से डरना।
साक्षी तेरे कर्म सदा ही,
किया वही फिर भरना।।
'हिम्मत' उदाहरण हैं कितने,
पग- पग नाच नचाते।
जैसा किया हाथ से हमने,
लौट वही फिर आते।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
तर्ज-मेरे नयना सावन भादो..
तर्ज-रोते -रोते हँसना सीखो..
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
कर्म गीत (दो दिन का ये मेला)
चौकड़िया छंद(ईसुरी छंद)
16,12 पर यति,प्रारंभ व अंत चौकल से, प्रथम चरण में दो तुकांत, टोटल पाँच तुकान्त
चौकड़िया छंद आधारित. कर्म- गीत-
जाए फिर से हंस अकेला,
दो दिन का ये मेला।
कर्म नचाए नाच यहाँ पर,
करते सारे खेला।।
कोई हँसता कोई गाता,
कोई नीर बहाता।
कोई महलों का है वासी,
कोई खूब रुलाता।।
लिखा भाग्य में जिसके जितना,
उतना ही वह पाता।
जाना सब कुछ छोड़ यहीं पर,
क्यों जग में भरमाता।।
जाने की जब आए बेला,
चले न भाई ढ़ेला।
कर्म नचाए नाच यहाँ पर,
करते सारे खेला।।1।।
तू ही अपना सबल सहारा,
कर लो आज किनारा
डोरी ले ली जिसने हाथों,
बोलो कब फिर हारा।।
भाग्य विधाता खुद बन जाओ,
सुरभित जीवन सारा।
नेकी कर दुनिया से जाना,
बनो अटल ध्रुव तारा।।
कहता गुरु सुन ले रे चेला,
जीवन पानी रेला।
कर्म नचाए नाच यहाँ पर,
करता सारा खेला।।2।।
क्यों जीवन को व्यर्थ गवायेँ,
क्यों ममता भरमाएँ।
लिखें भाग्य अब अपने हाथों,
देव इसे ललचाएँ।।
जब जागेंगे तभी सवेरा,
गीत भक्ति के गाएँ।
'हिम्मत' पुन्य उदय में आए,
भीतर में रम जाएँ।
जो भी आकर बनता गेला,
उन्हें समय ने पेला।
कर्म नचाए नाच यहाँ पर,
करते सारे खेला।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
लय-मेरे नयना सावन...
2.रोते-रोते हँसना ...
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परम पूज्य गुरुदेव महाश्रमण जी
~ सुंदरी सवैया वर्णिक
सुंदरी सवैया 100 वर्ण चारों चरण सम तुकांत
प्रत्येक चरण में 25 वर्ण, 8 सगण एक गुरु
मापनी 112 112 112 112, 112 112 112 112 2
परम पूज्य गुरुदेव महाश्रमण जी को समर्पित-
सुन्दरी सवैया छंद आधारित गीत-
गुरुदेव दया करना इतनी,
दिल में करना नित आप बसेरा।
नव ज्ञान मिले प्रभुता वर लूँ,
मन का अब टूट गिरे तम घेरा।।
जड़ में अब चेतनता भर लूँ,
समता करुणा मन में रम जाए।
शुभ ज्योति जले तन की उजली,
मन की बगिया फिर से लहराए।।
सब भ्रान्ति हटें छल दूर रहें,
शुभदायक हो नित दिव्य सवेरा।।
नव ज्ञान मिले प्रभुता वर लूँ,
मन का अब टूट गिरे तम घेरा।।1।।
अभिमान हटे मन का गहरा,
जग में मुझको अब क्यों भरमाना।
वरदान यही बस दें मुझको,
भर लूँ निज हाथ विशेष खजाना।।
अब लौट चलूँ अपने घर में,
अब पावन हो यह जीवन मेरा।
नव ज्ञान मिले प्रभुता वर लूँ,
मन का अब टूट गिरे तम घेरा।।2।।
पहचान सकूँ जग नश्वरता,
सत के पथ मैं बढ़ती नित जाऊँ।
शुभ कर्म करूँ निज हस्त सदा,
हरि नाम सदा मुख से बस गाऊँ।।
सच 'हिम्मत' चाह फले मन की,
नित दर्शन हो मुझको प्रभु तेरा।
नव ज्ञान मिले प्रभुता वर लूँ,
मन का अब टूट गिरे तम घेरा।।3।।
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~
मात्राभार 16,11. अंत गुरु लघु
सच्चा साथी तू ही तेरा,
गाँठ बाँध इंसान।
माटी में मत खोना हीरा,
बनकर के नादान।।
रंगमंच ये दुनियाँ मानो,
सब कर्मों का खेल।
सब में एक ईश की सत्ता,
रखना सबसे मेल।।
भाग्य विधाता तू है अपना,
क्यों बनता अंजान।
माटी में मत खोना हीरा,
बनकर के नादान।।1।।
आकर माया में भरमाया,
करे घात पर घात।
परिजन के तू सुख के खातिर,
चले सतत दिन रात।।
संग कौन जाए रे भाई,
कर्म बड़े बलवान।
माटी में मत खोना हीरा,
बन कर के नादान।।2।।
तन भी तो कब हुआ तुम्हारा,
हंसा जाता छोड़।
जाग जाग तू आज समय पर,
विषयों से मुख मोड़।।
केवल चेतन सच्चा साथी,
उसको अपना मान।
माटी में मत खोना हीरा,
बनकर के नादान।।3।।
काल बुलावा कब आ जाए,
जाना फिर दरबार।
समता धारो अपने जीवन,
होगा तब उद्धार।।
'हिम्मत' सफल किया जीवन को,
बनता वही महान।
माटी में मत खोना हीरा,
बनकर के नादान।।4।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शीर्षक-क्षमा(संवत्सरी पर्व)
शृंगार छंद आधारित गीत-
मात्राभार16, प्रारम्भ त्रिकल,अंत गुरु लघु
पर्व ये आया आज महान,
करें हम सभी क्षमा का दान।।
द्वेष हम सारे जाएँ भूल
बढ़ाएँ जिनशासन की शान।।
शत्रुता जाएँ हम सब भूल,
प्रेम है सब धर्मों का मूल।
अहिंसा जग का है आधार,
क्षमा ही जीवन का शृंगार।।
जीव सारे हैं एक समान,
बढ़ाएँ जिनशासन की शान।।1।।
जगत में मैत्री है अनमोल,
नहीं पैसों से इसको तोल।
स्वार्थ को दें सारे ही छोड़,
भोग से लेना नाता जोड़।।
नेक हम बन जाएँ इंसान,
बढ़ाएँ जिनशासन की शान।।2।।
हृदय हो निर्मल सबका आज,
रूढ़ियाँ छोड़ें सकल समाज।
ज्योति से जगमग कर लें देह,
लुटा दें सब पर अपना नेह।।
मिले 'हिम्मत' फिर से पहचान,
बढ़ाएँ जिनशासन की शान।।3।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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णमो अरहंताणं-
श्री अर्हत् भगवंत ही, वैभव की हैं खान।
ज्ञानवान निर्ग्रंथ वे, जन-जन के भगवान।।1।।
णमो सिद्धाणं-
आत्मलीन रहते सदा, अजर अमर वे जान।
सिद्धिप्रदाता सिद्ध हैं, किया सत्य संधान।।2।।
णमो आयरियाणं-
आचारज हैं दीप सम, मन में भरें उजास।
हरें सकल अज्ञान को,भरते नव विश्वास।।3।।
णमो उवज्झायाणं-
श्रुत की देते वाचना,मंगलकारी नाम।
आगम वाणी नित कहें, लगते ललित ललाम।।
णमो लोए सव्वसाहूणं-
शुद्ध साधना मार्ग पर, संत चले अविराम।
बातें कहते ज्ञान की, हरते तमस तमाम।।5।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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112 112 122 122,
112 112 112 112
नवकार जपो मनवा नित ही,
सब पाप कटें अँधियार हटे।
यह मान अलौकिक शक्ति बड़ी,
सब द्वन्द मिटें कुविचार हटे।
दुविधा घटती क्षण में सबकी,
सुमरे मन से तकरार हटे।
नित 'हिम्मत' जो भजता इस को,
सब द्वेष छलाव विकार हटे।।1।।
विषय-समय
कर चिंतन मानव तू क्षण का,
अनमोल सदा यह जीवन में।
सुख सार छिपा इसमें गहरा,
यह याद रखो अपने मन में।
समझो इसकी हर चाल सदा,
भरता खुशियाँ तब आँगन में।
कब कौन खरीद सका इसको,
बिकता कब 'हिम्मत' ये धन में।।2।।
शुभ कर्म-
कब कौन टिका जग में कहना,
यह नश्वर है जग मान सदा।
शुभ कर्म करो नित जीवन में,
तब दूर रहें सब ही विपदा।।
सच मान सदा वह शक्ति बड़ी,
भ्रम का हटता तब ही परदा।
नित 'हिम्मत' याद करो मन से,
वह सक्षम सुन्दर है वरदा।।3।।
अंकन-
सपने अपने कर पूर्ण सभी,
मत बैठ यहाँ चुपचाप कभी।
सच भीतर शक्ति भरी तुझमें,
उसका करना तुम माप कभी।
करता श्रम से निज अंकन जो,
उसकी मिटती कब छाप कभी।
जग में तब 'हिम्मत' नाम रहे,
करता न विषाद विलाप कभी।।4।।
गुरु
गुरु के बिन ज्ञान नहीं मिलता,
कहते सब ग्रंथ यही हमको।
शुभ ज्योति सदैव विशेष जला,
करते नित दूर सदा मम को।।
अनुशासन की नव सीख मिले,
सच चूर्ण करे मन के तम को।
सब पूर्ण करें सपने गुरु जी,
अनुकूल करें हर दुर्गम को।।5।।
चिंतन
छल लोभ विनाश करे तन का,
नित चिंतन हो इसका मन में।
दुखदायक हैं हरते सुख को,
विष ये भरते नित जीवन में।
करते मन दुर्बल मानव का,
कब चैन मिले इनसे तन में।
लत 'हिम्मत' जो लगती इनकी,
वह लीन सदैव रहे धन में।।6 ।।
नवकार
नवकार सदा सुखदायक है,
वह विघ्न विनाशक मान सदा।
हितकारक मंगलदायक है,
सबको शुभ दे पहचान सदा।
पद पाँच विशेष कहें इसमें,
धरना इनका नित ध्यान सदा।
जपता नर 'हिम्मत' जो मन से,
भरता वह उच्च उड़ान सदा।।7।।
नवरंग
नव रंग भरो इस जीवन में,
तब नूतन ही इतिहास बनें।
तुम दूर रखो छल, आलस को,
तव काज तभी कुछ खास बनें।।
विपरीत चले इनसे मनवा,
सच मान तभी परिहास बनें।
जब 'हिम्मत' से नित काम करे,
जग ही उसका तब दास बनें।।8।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
7 भगण+गुरु 10 वर्ण या 12 वर्ण के बाद यति
कुल 22 वर्ण
मंत्र बड़ा नवकार सहायक,
जाप जपें सब कष्ट हटें।
जो सुमिरे मन से इसको नित,
तो क्षण में छल पाप कटें।
ज्ञान प्रकाशित ये करता नव,
जो इसको दिन रात रटें।
'हिम्मत' आस भरे नित नूतन,
ताप मिटें सब रोग घटें।। 1||
जाप जपो नवकार सदा,
सुख का दरिया नित द्वार बहे।
दूर रहें सब अंधड़ ये,
उठ भोर वही नित नाम कहे।।
मंत्र बड़ा यह पावन है,
दुविधा भय ये सब दूर रहे।
पुण्य फले इस जीवन में,
सब पाप विवाद कुचाल ढ़हे।।2||
कोकिल से मृदु बोल कहो,
तब गाँठ खुले सबके मन की।
आँगन खास अबीर उड़े,
तब आब बढ़े सच में तन की।
लोग सलाम विशेष करे,
नित चाह करे तव दर्शन की।
'हिम्मत' प्रीत बढ़े सबसे,
सब चाह करे उस आँगन की।।3।।
दूर हुआ अपनापन ये,
अब मानव कर्म करे छल से।
शस्त्र धरे नित हाथ नये,
सबको भयभीत करे बल से।
लुप्त हुई अब मानवता,
बस काम करे निज कौशल से।
'हिम्मत' दंगल रोज रचे,
मृदु बोल कहे बन कोयल से।।4।।
दीप जले घर आँगन में अब,
हों खुशियाँ सब के मन में।
भ्रांति मिटे मन निर्मल हो,
नव ज्योति जले अब जीवन में।
लाभ मिले शुभ का सबको नित,
दिव्य सुवास रहे तन में।
लोभ विकार हटें मन के सब,
क्यों फँसना इस बंधन में।।5||
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
20 - सुन्दरी सवैया 8 सगण
112×8+2गुरु=25 वर्ण
प्रभु पारस को भजना नित ही,
दुखभंजक वे भव पार उतारे।
सब रोग मिटे तन के मनवा,
मन में भरते नित ही उजियारे।
करते सब दूर विकार सदा,
शुभ मंगलदायक देव हमारे।
मनवांछित काज फले सबके,
प्रभु पावन पारस दिव्य सहारे।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
छंदवर्णिक छंद(वर्णवृत्त)
मात्राभार-
211 211 211 211,
211 211 211 22
सात भगण दो गुरु प्रति चरण 32 वर्ण
10,12 या 12,10 पर यति चारों चरण सम तुकान्त
कर्म किए जग में तुम आकर,
मान वही फिर से वह पाता।
छोड़ चले जब मानव ये तन,
लेकर बोल कहाँ कुछ जाता।
जो करता शुभ काम यहाँ पर,
मान वही जग में हरसाता।
नित्य बहे शुभ का दरिया घर,
ईश्वर के मन को अति भाता।।1।।
सुन्दर देह मिली हमको यह,
पुण्य अपार खिले यह मानो।
दीप शिखा उजली करले अब,
वक्त रहे खुद को पहचानो।
जीवन दुर्लभ है अपना यह,
बात विशेष कभी मत तानो।
व्यर्थ न मोह करो अब हिम्मत,
शाश्वत केवल ईश्वर जानो।।2।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
दो युग्म. विधान - सम वर्ण वृत्त छंद,
21वर्ण प्रति चरण, 12/9 पर यति विधान,
दो-दो या चारों चरण सम तुकान्त।
पिंगल सूत्र- ६(भगण) +मगण
मापनी- 211 211 211 211, 211 211 222
विषय-नवकार
विघ्नविनाशक मंगलदायक,
है नवकार सदा प्यारा।
चूर्ण करें सब पाप सदा वह,
मंत्र बड़ा यह है न्यारा।।
जाप जपे मन से इसका नित,
पीड़ मिटे क्षण में सारी।
'हिम्मत' उत्तम पावन है यह,
वैभव दे हमको भारी।।1।।
संकटमोचन राम सहायक,
हे हनुमान चले आना।
धर्म सभी जन भूल गये अब,
राह सही उनको लाना।।
बुद्धि विवेक मिले सबको नित,
टूट चले तम का घेरा।
क्यों हथियार चले अब 'हिम्मत',
पूर्ण करो सपना मेरा।।2।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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121 121 121 121 121 121 121 12
सुधार करे अपना जब मानव मान मुकाम विशेष मिले।
मृदंग बजे नित ये मन के सब भ्रांति हटें फिर दूर गिले।।
सशक्त कहें सब लोग तुम्हें जड़ से तब जान विषाद हिले।
मिठास भरे तब जीवन में नव नित्य सुरम्य प्रसून खिले।।1।।
विवाद करो मत दुर्जन से अवसाद भरे वह जीवन में।
अबोध बिगाड़ करे सब काज खटास भरे सबके तन में।
छलाव अनीति सदैव करे नित चूर रहे वह तो मन में।
अजीब दरार पड़े तब खास दुखी रहते सब आँगन में।।2।।
विवेक जगे जब भीतर का तब ही बहता सुख का झरना।
निखार विशेष करे मन का वह मान निशंक बड़ा गहना।
पवित्र रहे यह देह सदैव अधर्म दुराव नहीं करना।
अपूर्ण रहे न कभी घट जीवन 'हिम्मत' ज्ञान सदा भरना।3।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञाकोलकाता,लाडनूँ
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(विधान- वार्णिक, 23 वर्ण, 12, 11 पर यति, चार चरण,
चारों सम तुकांत, 122×7+12
कहो कौन तेरा यहाँ ये बताना,
किए कर्म दे साथ ये मानना।
नहीं देह तेरी यहीं ये जलेगी,
सदा भोग दे कष्ट ये जानना।
छले मोह माया हमेशा डुबाए,
कहे संत ज्ञानी नहीं तानना।
नहीं शत्रु कोई नहीं मित्र तेरा,
दिलों से यही बात स्वीकारना।।1।।
25- छन्द- सम वर्णिक छन्द " क्रौंच सवैया
211 22 , 2 112 2,-
11 111 111, 111 111 2
कर्म करो रे, पीड़ हरो रे,
हरपल उपवन, सुखमय करता।
साज बजेंगे, काज फलेंगे,
उलझन अनबन, सब यह चरता।।
मोक्ष मिलेगा, दीप जलेगा,
अजर अमर तब, नर यह बनता।
पाप हटेंगे, ताप मिटेंगे,
सघन कपट छल, उस पल जलता।।2।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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12 12 12 12 12 12 12 12
टोटल(16 वर्ण )
चारों चरण या दो चरण समतुकांत
वीर रस के लिए उत्तम
गुमान-
गुमान क्यों करें कभी सदा हमें यही छले।
विशाल ज्ञान दीप से प्रकाश खास ही जले।।
सुवास दे अपार ये पवित्रता रहे बनी।
नवीनता बनी रहे हटें सभी तनातनी।।1।।
सदैव बैर भाव को स्वमेव ही हटाइए।
गुमान क्यों करें कभी विषाद दे जलाइए।।
समस्त विश्व का सदा विकास हो विचारना।
अनीति के उसूल को अधर्म मान त्यागना।।2।।
दयालुता रहे सदैव धर्म मंत्र मानिए।
परोपकार पे टिकी धरा तमाम जानिए।।
तनाभिमान क्यों करें छलाव से सदा बचें।
सकून दे समाज को कहानियाँ नई रचें।।3।।
चलायमान हैं सभी विचार ये सदा करें
मुकाबला करें सदा नहीं कभी कहीं डरें।।
अनादि है अनंत है विराट ईश मानना।
तनाभिमान व्यर्थ है सदैव आप जानना।।4।।
न युद्ध को करो कभी न शस्त्र हाथ में धरो।
विवाद क्यों बढ़े कभी कठोर बात क्यों करो।
न बैर भाव पालना विशाल प्रेम को वरो।
अनीति हो जहाँ कहीं उसे न देख के डरो।।5।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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निंदा करें क्यों हम कभी,
ये दुर्गुणों की खान है।
बर्बाद करती है समय,
खोता मनुज पहचान है।।
देखे सदा निज दोष को,
ऊपर उठे वह आदमी।
शोधन करे जब हाथ से,
तब दूर होती है कमी।।
बचता सदा वह पाप से,
पाता जगत में मान है।
बर्बाद करती है समय,
खोता मनुज पहचान है।।1।।
ईर्ष्या करें क्यों हम कभी,
मानें बुराई यह बड़ी।
जो लत लगे इंसान को,
करता रहे वह हर घड़ी।।
जो लीन इसमें ही रहे,
समझो बड़ा नादान है।
बर्बाद करती है समय,
खोता मनुज पहचान है।।2।।
मन को लगाएँ काम में,
खाली कभी रहना नहीं।
मुख से बुराई कर कभी,
गंदा इसे करना नहीं।।
अनमोल जीवन ये मिला,
रखना हमें ये ध्यान है।
बर्बाद करती है समय,
खोता मनुज पहचान है।।
वरदान वाणी का मिला,
प्रभु का भजन बस कीजिए।
गुणगान औरों का करें,
सबको खुशी ये दीजिए।।
चुगली करे जो रात-दिन,
'हिम्मत' बुरा इंसान है।
बर्बाद करती है समय,
खोता मनुज पहचान है।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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28- त्रिभंगी छंद. 10,8,8,6 मात्राएँ
तुम सुनना सबकी, करना मन की,
कुछ भी बोलें, मत डरना।
पर को मत छलना, देख न जलना,
कपट कभी भी, मत करना।
तुम हो बलशाली, खुद के माली,
लक्ष्य बनाओ, खुद अपना।
निज कदम बढ़ाओ, नींद उड़ाओ,
खुली आँख में, हो सपना।।1।।
ये कर्म अटल हैं, देते फल हैं,
सोच समझ कर, कर्म करो।
जैसा हम करते, वैसा भरते,
यही सत्य है, सदा डरो।।
सब पर हैं भारी, लीला न्यारी,
क्या दिखला दें, समझ परे।
शुभ-शुभ ही करना,इनसे डरना,
करणी अपनी स्वयं भरे।।2।।
मत तीर चलाना, दिल न दुखाना,
सोच समझ कर, हम बोलें।
ये मीठी वाणी, है कल्याणी,
माप तोल कर मुख खोलें।।
अति क्यों हम बोलें, मिश्री घोलें,
कानों को वह, मधुर लगे।
सबके हितकारी, सँग मनहारी,
ऐसे बोलें, प्रीत जगे।।3।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता
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मापनी-212 212 212 212
गीत-
दीप से दीप अब हम जलाते चलें।
नफरतों को न यूँ हम बढ़ाते चलें।।
पाप का हर तरफ देखिए शोर है।
शस्त्र का मानिए हर तरफ जोर है।।
भूल बातें सभी प्रेम पर ध्यान दें।
एक सत्ता उसी की समझ मान दें।।
दानवों को सभी आज मिलकर दलें।
नफरतों को न यूँ हम बढ़ाते चलें।।1।।
है धरा ये वही दे हमें त्राण है।
आचमन से हुआ शुद्ध मन प्राण है।।
मान दें जिंदगी में सभी ठान लें
स्वर्ग सी पावनी भूमि को मान लें।।
नेक करते रहें हम बदी से टलें।
नफरतों को न यूँ हम बढ़ाते चलें।।2।।
कामना हर मनुज की यहाँ पुष्ट हो।
भावना से सभी जीव संतुष्ट हो।।
दुश्मनों की बदल दो सभी चाल को।।
शुभ्रता का तिलक भारती भाल को।
आज 'हिम्मत' न कोई किसी को छलें।
नफरतों को न यूँ हम बढ़ाते चलें।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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मापनीयुक्त मात्रिक
मापनी २२१२ १२२ २२१२ १२२
समान्त- आरें, अपदान्त! गीतिका
छल काम को तजें हम,
जीवन यहाँ सुधारें।
सोचें भला सभी का,
परमार्थ को विचारें।।1।।
है कौन बोल किसका,
कब कौन साथ जाता।
जो पाप में डुबाए,
उनको करें किनारें।2।।
शुभ कर्म जो करेगें,
जग में वही फलें सब।
रहते सुखी सदा वे,
पातें नई बहारें।।3।।
रख सोच उच्च अपनी,
नित ज्ञान को बढ़ाना।
जो तुम चले गलत तो,
गहरी बनें दरारें।।4।।
सबको शरण वही दे,
सबका वही सहारा।
है राम नाम सच्चा,
शुभ भाव से पुकारें।।5।।
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
तर्ज-इंसाफ की डगर पे बच्चों दिखाओ...
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31-कुण्डलिया छंद-
उत्तम यह नवकार है, काटे सारे पाप।
मंत्रों का ये मंत्र है, जपना निश दिन आप।।
जपना निश दिन आप, कामना सब हट जाएँ।
छूटें सब जंजाल, लाभ शुभता का पाएँ।|
'हिम्मत' देता त्राण, जाप करना है हरदम।
पूर्वों का ये सार, मंत्र सबसे है उत्तम।।1।।
जिनवर जी चौबीस को, करती कोटि प्रणाम।
राग- द्वेष को जीत कर, काटे कर्म तमाम।।
काटे कर्म तमाम, सत्य की राह दिखाते।
जड़ चेतन है भिन्न, तत्व का सार बताते।।
सिद्ध बुद्ध वे मुक्त, ध्यान 'हिम्मत' तू नित धर।
लेते कब अवतार, पूज्य हैं जग में जिनवर।।2।।
समता करुणा प्रेम ही, जग के हैं आधार।
महावीर के बोल ये, जीवन इन्हें उतार।।
जीवन इन्हें उतार, छोड़ दे हिंसा करना।
रख अटूट विश्वास, कर्म से है भव तरना।।
छोड़ो। 'हिम्मत' भोग, मोह छल माया ममता।
काल बड़ा विकराल, धार लो जीवन समता।।3।।
आओ अब अवतार लो, फिर से अब तुम वीर।
त्राहि- त्राहि सब ओर है, संकट है गंभीर।।
संकट है गंभीर, धरा पर खतरा भारी।
हिंसा चारों ओर, चले नित गोलाबारी।
'हिम्मत' करे पुकार, नहीं अब पाप बढ़ाओ।
मेटो हिंसा दंभ, वीर धरती पर आओ।।4।।
सुन्दर सी इस देह में, श्वास किराएदार।
कर्मों का भाड़ा चुका, रहे हंस दिन चार।।
रहे हंस दिन च्यार, छोड़ फिर आगे जाना।
जैसा तेरे कर्म, लौट कर वे ही आना।
'हिम्मत' यही निचोड़, पुण्य से मिलता अवसर।
करना मत बेकार, मिला तन जो ये सुन्दर।।5।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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32 रूपमाला छंद या मदन छंद आधारित सृजन
2122 2122 2122 21
प्रति चरण 24 मात्रा 14,10 पर यति, अंत गुरु,लघु
विषय-शाकाहार. गीत-
शुद्ध शाकाहार भोजन, श्रेष्ठ है आहार।
पुष्ट करता देह को ये, बात मन में धार।।
अन्य को निर्बल समझ कर, मत किसी को मार।
छीन लेते प्राण पल में, बोल क्या अधिकार।।
फूलने दें हम धरा को , दें सभी को प्यार।
पुष्ट करता देह को ये, बात मन में धार।।
क्यों किसी को मार कर हम, ले रहे हैं स्वाद।
कामना हम सब करें नित, हों सभी आबाद।।
रोग से दे मुक्ति हमको, जान गुण भंडार।
पुष्ट करता देह को ये, बात मन में धार।।
भावना भी शुद्ध रहती, कह रहा विज्ञान।
शक्तिशाली ये बनाता, दो समय पर ध्यान।
मान कुँजी ये सुखों की, मत बनो खूँखार।।
पुष्ट करता देह को ये, बात मन में धार।।
अन्न जैसा ले रहे हम, सोच वैसी मान।
व्यर्थ क्यों हिंसा करें हम, बन यहाँ बेभान।
हाथ मैत्री का बढ़ाएँ, खिल उठे संसार।।
पुष्ट करता देह को ये, बात मन में धार।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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मनहरण घनाक्षरी-
8,8,8,7 वर्ण पर यति (31 वर्ण)
चार चरण, प्रत्येक चरण में 16 व 15 के विराम से31 वर्ण वर्ण
चारों चरण सम तुकान्त
संयुक्त वर्ण एक ही गिना जाएगा।
अंत में लघु गुरु होने से लय अच्छी बनती है।
1.नवकार मंत्र-
मंत्र नवकार न्यारा, लगे हमें अति न्यारा,
जाप जपे नित उठ, खुशी भरपूर दे।
रोक शोक दूर करें, पाप ताप सब हरें,
भय भूत भागें सारे, मुख पर नूर दे।
कामना मिटाता सारी, जीवन की खिले क्यारी,
रामबाण औषधि है, दुख सारे चूर दे।
रटना 'हिम्मत' यही, ज्ञानियों ने यही कही,
शिवपुर द्वार खोले, गम सारे बूर दे।
2.दीपावली-
शुभ ये दिवाली आयी, सबके ये मन भायी,
खुशियाँ अपार लायी, रंगोली सजाइए।
गणपति पूजें सारे, भरें धन से भंडारे,
आरती लक्ष्मी की गाएँ, दीपक जलाइए।
महावीर याद करें, गौतम सा ज्ञान वरें,
जगमग ज्योत जले, तमस भगाइए।
दीपों की कतार प्यारी, फुलझरी लगे न्यारी,
'हिम्मत' ये मनहारी, पर्व को मनाइए।
3.गुरु-
गुरु मेरे ज्ञान दाता, रहे भाग्य के विधाता,
प्रथम हैं पिता-माता, दिया नित ज्ञान है।
धर्म पथ जो दिखाए, शूल राह के हटाए,
गुरु मेरे मन भाए, सच्चे भगवान है।
शोधन जो किए नित, देखे हरपल हित,
कैसे बढ़ें आगे हम, दिया खूब ध्यान है।
सुगम लेखन किया, अनमोल वक्त दिया,
'हिम्मत' वंदन करे, मिली पहचान है।
4.दीप-
दीप ज्ञान का जलाओ, भ्रान्ति मन की हटाओ,
जगमग ज्योति करे, वर ऐसा दीजिए।
भव-भय फेरा कटे, वासना का जाला हटे,
काम क्रोध छल घटे, अर्ज सुन लीजिए।
हटे तम की ये कारा, भरो तन उजियारा,
हर जन कहे न्यारा,दृष्टि ऐसी कीजिए।
गौतम सी बुद्धि मिले, चेतना के फूल खिले,
'हिम्मत' हटाना गिले, शारदे पसीजिए।
5.शाकाहार-
शाकाहार अपनाओ, सबको ये समझाओ,
शुद्ध रहे बुद्धि सदा, ग्रंथों का ये ज्ञान है।
जैसा खाएँ हम अन्न, मानो वैसा नित मन,
जग का आधार प्रेम, कहे भगवान है।
पर पीड़ा पहचानो, निज सम जीव मानो,
जिह्वा का ये स्वाद छोड़ो, बना क्यों बेभान है।
दूर सारे रोग रहें, वैद्य सारे हमें कहें,
'हिम्मत' जीवन धारो, गुणों की ये खान है।
6.कर्म-
हँसाते रुलाते कर्म, कहे हमें यह धर्म,
शुभ-शुभ कर्म करो, आगमों का ज्ञान है।
जैसा जग में जो करें, उन्हें खुद सारे भरें,
किसी को ये नहीं छोड़ें, पक्का ये विधान है।
भाग्य की पिटारी खोले, वन-वन सीता डोले,
इनको अचूक मान, अति बलवान है।
कर्म रेख हाथों तोड़े, प्रीत खुद से ही जोड़े
'हिम्मत' जो जीत लिए, बनें भगवान है।
7.बंधन-
बंधन ये मोह माया, तेरी नहीं है ये काया,
कैसे यहाँ भरमाया, जग ये असार है।
यहाँ नहीं कोई तेरा, मत करो मेरा-मेरा,
पग-पग लगा घेरा, करना विचार है।
चेतना को सत्य जानो, बाकी सब झूठ मानो,
बातें मेरी मत तानो, करना उद्धार है।
नहीं साथ कुछ जाता, किया फिर लौट आता,
जाग जा 'हिम्मत' अब, होना भव पार है।
8.मानव भव-
अनमोल हीरा पाया, पुण्य से ये मिली काया,
दया प्रेम भरा रहे, सेवा सदा कीजिए।
करे जो भी नर सेवा, मिले मान उसे मेवा,
हरि देता साथ उसे, सच मान लीजिए।
याचक न जाए खाली, मुख पर देना लाली,
झोली भरे आशीषों से, मन से पसीजिए।
माता-पिता भूलें नहीं, देश कभी छूटे नहीं,
'हिम्मत' ये याद रहे, प्रेम रस भीजिए।
9.माला
नित उठ फेरो मिला, काटती है कर्म जाला,
हटे जड़ता का ताला, खुले मोक्ष द्वार है।
नहीं कोई तेरा यहाँ, करो मत मेरा-मेरा,
तोड़ डालो जग फेरा, नैया होती पार है।
सच एक प्रभु नाम, रटो इसे आठों याम,
बन जाएँ सारे काम, सुखद संसार है।
करो इष्ट गुणगान, हटें सारी खींचातान,
'हिम्मत' ये देना ध्यान, सपने साकार है।।
10.गुमान-
1.किसका गुमान करें, पाप मान सदा डरें,
पीड़ा दूसरों की हरें, ऐसा काम कीजिए।
देह का गुमान छोड़ें, राग-द्वेष सारे तोड़़ें,
नाता हरि से ही जोड़ें, दुख में पसीजिए।
साथ नहीं कुछ जाना, किया हाथ फिर आना,
छूटे यहीं ये खजाना, गर्व छोड़ दीजिए।
बड़े -बड़े धराशायी, दंभ बड़ा दुखदायी।
सादगी ही सुखदायी, उससे ही रीझिए।।
--००--
2. देव घनाक्षरी
विधान -- -33 वर्णों के चार समतुकांत चरण, 16, 17 वर्णों पर यति अनिवार्य जबकि 8, 8, 8, 9 पर यति उत्तम।
प्रत्येक चरण के पदांत में ल ल ल अर्थात् तीन लघुवर्ण( नगण)लघु-लघु-लघु अनिवार्य।
अन्य वर्णों का भार अनिश्चित।
8,8,8,9 वर्णों के आधार पर हो तो प्रत्येक पंक्ति के प्रथम दो चरण समांत अनिवार्य।
देव घनाक्षरी छंद-
नवकार मंत्र-
मंत्र नवकार प्यारा, मंत्रों का ये मंत्र न्यारा,
चमकाता भाग्य तारा, करे दुखों का ये शमन।
जीवन आधार कहो, हर पल इसे गहो,
अविकारी तब बनें, लगा तू इससे लगन।
कामनाएँ सारी फलें, वासनाएँ सारी जलें,
देव सहायक रहें, पावन बनें तन-मन।
'हिम्मत' ये सुखदाई, माया मान दुखदाई,
चाहे निज की भलाई, नित करना सुमिरन।1।
महावीर वाणी-
महावीर की ये वाणी, सदा-सदा है कल्याणी,
सुन सुखी बनें प्राणी, मिले भव-भव शरण।
बनें क्यों प्रमादी हम, दूर रहें सारे गम,
जीवन सफल बनें, करें मुक्ति पथ वरण।
राग-द्वेष दुखदाई, धर्म खरी है कमाई,
बंधन की टूटे कारा, अवगुण करे हनन।
अनेकांत के उद्गाता, रखा दया से ही नाता,
'हिम्मत' नमन करो, पूजें नित उठ चरण।।2।।
संत वाणी-
सुनो सदा संत वाणी, अग जग में कल्याणी,
सुख पाए सारे प्राणी, खिल उठे तब चमन।
सत्य मार्ग वे दिखाते, भ्रम मन के भगाते,
ज्योति मन की जलाते, खुद में ही रहे मगन।
घर बार निज छोड़ा, नाता हरि से ही जोड़ा,
विकारों से मुख मोड़ा, सच का ही करे मनन।
प्रभु का वे जपे जाप, सहते सकल ताप,
'हिम्मत' प्रणाम करो, दूर करे सब चुभन।।3।।
प्रेम-
आपस में प्रेम करें, सदा पाप देख डरें,
गुण गाएँ प्रभु जी के, सोच रखें हम गहन।
भक्ति धारा नित बहे, सुख-दुख निज कहे,
बातें वीरता की करे, खिला-खिला रहे चमन।
बैर दंभ अब छोड़ें, नाता निज से ही जोड़ें,
जाना फिर खाली हाथ, यही करो सदा मनन।
दीप मन का जलाएँ, खुशी हाथों से लुटाएँ,
तम 'हिम्मत' भगाओ, अवगुण कर दफन।4।
--oo--
3.सूर घनाक्षरी-
गुरु-
प्रति चरण-- 30 वर्ण
8,8,8,6 पर यति अनिवार्य,पदांत में 122(यगण)या 212 (रगण) हो।
गुरु अँधियार हरे, बड़ा उपकार करे,
उड़ने आकाश देते, राह दिखलाते।
ईश रूप गुरु जानें, बातें कभी नहीं तानें,
चोटी निज हाथ रखें, सच बतलाते।
दीप मन का जलाते, शूल सारे वे हटाते,
कमियाँ शोधन करे, बाग सरसाते।
देना हमें सदा मान, देते नई पहचान,
'हिम्मत' वे ज्ञान देते, भाग्य चमकाते।।1।।
क्षमा धर्म-
आया मैत्री पर्व प्यारा, जैनियों का पर्व न्यारा,
क्षमा देना क्षमा लेना, भावना हमारी।
बैर-भाव सारा छोड़ें, भ्राँति मन की ये छोड़ें
दोष देखें अपने ही, खिले तब क्यारी।
बातें लम्बी मत तानों, धर्म सार पहचानो,
सुखद जीवन बनें, जानें नर नारी।
क्षमा धर्म है महान, करें दिल खोल दान,
'हिम्मत' न बात तान, कटे पाप भारी।2।।
तरंग-
उठे जब ये तरंग, जगे मन में उमंग,
उठे गिरे बार-बार, लगती सुहानी।
तट छोड़ दौड़ आती, सबके ये मन भाती,
सीख हमें खूब देती, थोड़ी जिंदगानी।
सुख-दुख सदा आते, कब ये ठहर पाते,
श्रम करो हर पल, बात क्यों भुलानी।
झूमो नाचो सारे आओ , एकता को अपनाओ,
'हिम्मत' ये बात धरो, छोड़ना निशानी।।3।।
पर्यावरण-
जब चाहे पेड़ काटे, बावड़ी तालाब पाटे,
कहीं पानी कहीं सूखा,पाते कष्ट भारी।
कारखाने गैसें छोड़े, पैसों से ही नाता जोड़े,
कितने ही रोग बढ़े, सुने न हमारी।
जहरीली हुई हवा, धरा लाल जैसे तवा,
जीव जन्तु प्यासे मरे, है मातु दुखारी ।
'हिम्मत' प्रकृति माता, जोड़ रखो निज नाता,
वक्त पर बुद्धि देना, चले न कटारी।।4।।
--oo--
4.अमत्ता घनाक्षरी
विधान -- -32 वर्णों के चार समतुकांत चरण, 16, 16 वर्णों पर यति अनिवार्य जबकि 8, 8, 8, 8 पर यति उत्तम।
इस घनाक्षरी के सृजन में ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह छंद डमरू घनाक्षरी छंद का ही एक रूप है । इस घनाक्षरी में अकारांत, इकारांत और उकारांत शब्दों का प्रयोग मान्य होता है। दीर्घ मात्रा वाला वर्ण मान्य नहीं है।
मधुर-मधुर कह, कटुक वचन सह,
जलन चुभन तज, अनबन तब कम।
जन-जन प्रिय बन, नित नर मत तन,
जनम सफल कर, बन अब हमदम।
वहम दलन कर, परदुख नित हर,
अमल बदन रख, मतकर मम-मम।
मृदु मृदु मधु सम, हरण सकल गम,
हरपल छवि शुभ, नर वह अनुपम।1।
--००--
सँभल-सँभल चल, वहम सकल दल,
जहर उगल मत, सफल जनम कर।
धवल अमल बन, नर अब मत तन,
प्रतिदिन श्रम कर, सुखद वचन धर।
कपट रहित कह,छल न चुभन सह,
सरल हृदय रख, हरपल मत डर।
नवल सृजन रच, कह नित सच-सच,
प्रभु गुण नित भज, निज कर भव तर।2।
--oo--
5.विजया घनाक्षरी-
8,8,8,8 वर्ण
चरणांत ल ल ल अर्थात नगण 111 आवश्यक*
यह 32 वर्णों के चार समतुकांत चरण, 8, 8, 8, 8 पर लिखा जाता हैं और इसमें यति अनिवार्य होते हैं ।
चारों चरणों के अंत में ल ल ल अनिवार्य।
अन्य वर्णों का भार अनिश्चित।
लय और प्रवाह मुख्य।
ध्यान रखें प्रारंभ के तीन 8 वर्णों की रचना में पदांत समांत हो ।
चारों चरण सम तुकांत हों।
नगणांत अर्थात ल ल ल का उदाहरण
बीत गया बचपन, खोखला हुआ बदन,
दूर हुए प्रियजन, मिले नित ही गरल।
रहूँ खुद में मगन, करूँ हरि के भजन,
लागी मन में लगन, बनूँ अब मैं सरल।
जीना लगे ये जहर, बात- बात हो कहर,
जीवन गया ठहर, मिले खाने को तरल।
कहो कैसे हो सफर, मौन धरे जो अधर।
'हिम्मत' माँगे नजर, अनुभव की खरल।।1।
--oo--
भाईचारा-
रहे जहाँ भाईचारा, सुख दुख का सहारा,
खिले भाग्य का सितारा, आपस में प्यार रहे।
जाति पाँति हटे सारी, खिले उपवन क्यारी,
बनें प्रेम के पुजारी, बना ये संसार रहे।
दिखे एकता विशाल, हटे सारी ही कुचाल,
ऊँचा रहे सदा भाल, शुद्ध ही आचार रहे।
गीत सारे मिल गाते, तन मन सरसाते,
खुशियाँ 'हिम्मत' पाते, बना परिवार रहे।2।
दीपावली-
दीपावली पर्व न्यारा, सबको लगे ये प्यारा,
बढ़ाती है भाईचारा, द्वार सारे सज रहे।
लगे अल्पना निराली, चहुँ दिशि खुशहाली,
खुले अब बंद ताली, तम सारे तज रहे।
होती घरों की सफाई, खूब बँटती मिठाई,
देते दिल से बधाई, मन साज बज रहे।
माँ से माँगे वरदान, गंतम सा मिले ज्ञान,
'हिम्मत' को मिले मान, लक्ष्मी जी को भज रहे।3।
--००--
6.कृपाण घनाक्षरी-
कुल वर्ण-32
गणावली 8,8,8,8
पदांत-गुरु,लघु
नहीं कोई है हमारा, छूटे धन यहीं सारा,
राम नाम दे सहारा, गीता का है यह ज्ञान।
हाथ से तू जैसा करे, मान वैसा फिर भरे,
पुण्य से ही पाप झरे, वक्त रहे पहचान।
कर्मों का है सारा खेला, चार दिन है ये मेला,
व्यर्थ मत बन गेला, देना हमें यह ध्यान।
प्रीत प्रभु से ये जोड़ो, विषयों से मुख मोड़ो।
कामना 'हिम्मत' छोड़ो, मिले तब भगवान।1।
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनूँ
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आधार आंजनेय छंद -
मात्राभार-11 वर्ण. 16 मात्रा
राजगृही था नगर सुहाना।
धनिक वास करते थे नाना।।
रहता था गोभद्र वहीं पर।
पत्नी भद्रा थी अति मनहर।।1।।
सुखद सुभद्रा सुता निराली।
घर में थी उससे खुशहाली।।
धन्य कुमार संग वह ब्याही।
पटरानी का पद वह पाई।।2।।
सूना अपना घर देखा जब।
धार लिया गोभद्र वहीं तब।।
अगर भाग्य से सुत मैं पाऊँ।
संयम का पथ मैं अपनाऊँ।।3।।
हुआ भाग्य से घर जो रोशन।
शालिभद्र से निखरा आँगन।।
अब पितु ने संयम स्वीकारा।
भव से अपना किया किनारा।।4।।
घोर साधना नित वे करते।
पाप बंध से हरपल डरते।।
उच्च देव गति मुनि जी पाए।
परिजन को वे नहीं भुलाए।।5।।
अजब पिता ने योग बनाया।
नित्य स्वर्ग से धन भिजवाया।।
डिबिया भर बत्तीस भिजाते।
कपड़े गहने उनमें आते।।6।।
एक पुत्र खातिर भिजवाते।
पाकर सबके मन हर्षाते।।
दूजे दिन कुछ काम न आती।
खाद्य वस्तु मन को ललचाती।।7।।
भद्रा हर पल फर्ज निभाया।
शालिभद्र पर नेह लुटाया।।
हुआ ठाठ से लालन-पालन।
महक उठा माता का आँगन।।8।।
यौवन देख किया माँ चिंतन।
जल्दी से करना गठबंधन।।
बहू बनीं बत्तीस दुलारी।
रहीं कुलीन सकल वे न्यारी।।9।।
सप्तभौम था महल निराला।
उनका था बस वही शिवाला।।
सकल काज भद्रा निपटाती।
नेह छाँव अपनी बरसाती।10।।
नेपाल से व्यापारियों का कंबल लेकर आना-
बुनकर अच्छे कंबल लाए।
घूम-घूम कर उन्हें दिखाए।।
ग्राहक उन्हें नहीं मिल पाए।
निर्धन की नगरी बतलाए।।11।।
रत्न जड़ित थे सारे कंबल।
श्रेणिक से भी मिला न संबल।।
गहन निराशा मन में छाई।
कैसे हो अब अधिक कमाई।।12।।
एक साथ कंबल बिक जाते।
तन मन तब ही ये हर्षाते।।
धूमिल अब ये आस हमारी।
मुरझाई मन की यह क्यारी।।13।।
सुनी हुई सब बात बताई।।
सुनो तुरंत उन्हें घर लाओ।
अपने कंबल यहाँ दिखाओ।।14।।
आए सब अब भद्रा के घर।
दिखलाए वे कंबल लाकर।।
बोली भद्रा है अति मनहर।
और दिखाएँ जो कुछ अंदर।।15।।
बोले रत्न जड़ित ये कंबल।
देखो झलक रहा है कौशल।।
आस लगा के हम सब आए।
नहीं अभी तब बिक ये पाए।।16।।
बोली इनसे काम न चलता।
व्यर्थ द्वेष बहुओं में बढ़ता।।
चाहूँ बस बत्तीस यहाँ पर।
एक-एक दूँ पास बुला कर।।17।।
भद्रा व व्यापारियों का संवाद-
ये सोलह ही हम पर भारी।
देखे इनको सब नर-नारी।।
नहीं खरीद सके खुद राजा।
बंद किए अपना दरवाजा।।18।।
थोड़ा सा अब धीरज धरिए।
दो-दो टुकड़े इनके करिए।।
बोली भद्रा सोच समझ कर।
मिला आज ये प्यारा अवसर।।19।।
किया हिसाब वहीं पर सारा।
लगा गेह सबको अति प्यारा।।
मुँह माँगा धन अब वे पाए।
श्रेष्ठ नगर न्यारा बतलाए।।20।।
बहुओं को कंबल देना-
बहुओं को निज पास बुलाई।
बढ़िया कंबल सभी बताई।।
पहन ओढ़ वे खुशी मनाई।
तन अपना वे खास सजाई।।21।।
दिवस दूसरा जो शुभ आया।
पाँव पोंछ कर उन्हें बहाया।।
देख महतरानी ललचाई।
बहते कंबल लेकर आई।।22।।
ओढ़ रत्न कंबल वह आई।
देख चेलना तब चकराई।।
श्रेणिक को सब बात बताई।
नृप ने भी निज कथा सुनाई।।23।।
कैसे कंबल सकल गँवाए।
बात गहन क्यों आप छिपाए ।।
नहीं रकम थी इतनी रानी।
चलो सुनें अब वहीं कहानी।।24।।
राजा श्रेणिक का भद्रा के घर आना-
भद्रा का तन मन सरसाया।।
गई सामने करने स्वागत।
चमक उठी मेरी ये किस्मत।।25।।
सिंहासन पर बैठें मालिक।
रचा आज घर मेरे स्वास्तिक।।
हुआ आगमन कैसे राजन?
बाग-बाग मेरा यह आँगन।।26।।
आवभगत की सबने भारी।
हुए चकित सारे नर नारी।।
शालिभद्र को निकट बुलाऊँ।
दर्शन उसको आज कराऊँ।।27।।
भद्रा का शालिभद्र को नीचे बुलाना-
सुत को तब आवाज लगाई।
सुखद भोर जो अब ये आई।।
आँगन राजन आज पधारे।
अपने चमके भाग्य सितारे।।28।।
नाथ आज अपने घर आए।
कृपा बड़ी हम पे बरसाए।।
नीचे आकर दर्शन करना।
खुशियों से झोली निज भरना।।29।।
शालिभद्र का नीचे आना-
शालिभद्र ने बात सुनी जब।
माल खरीद मातु लेना सब।।
ले लो माँ, तलघर में रखना।
सदा आप ही निर्णय करना।।30।।
शालिभद्र नीचे उतरो तुम।
सपना पूरा आज करो तुम।।
आए निज घर पालनहारे।
नाथ हमारे सबल सहारे।।31।।
'नाथ' सुना तो हुए अचंभित।
हुए तभी मन में आशंकित।।
भरा गेह में इतना वैभव।
नाथ और फिर कैसा गौरव।।32।।
कैसे रहा कहो मैं परवश?
चुभा विषैला तीखा तरकश।।
किया प्रणाम वहीं पे आकर।।
लाड लडाया आज वहीं पर।।33।।
श्रेणिक अपनी गोद बिठाए।
भरा स्वेद से तन तब पाए।।
गोद लगी ज्यों गरम अँगीठी।
चढ़ा त्याग शुभ रंग मजीठी।।34।।
विदा किए तुम ऊपर जाओ।
देख हमें यूँ मत घबराओ।।
चढ़े सीढ़ियाँ जब वे आकर।
पाया था असहाय वहीं पर।।35।।
याद पूर्व भव अपना आया।
मुनि को खीर स्वयं बहराया।।
मासखमण कर के वे आए।
सुलभ पारणा मुझसे पाए।।36।।
नाम सुखद था मेरा संगम।
धन्नो ग्वालिन रही मातु मम।।
खीर मधुर माँ से बनवाई।।
संत देख उनको बहराई।।37।।
हुआ पुण्य का शुभ ये बंधन।
मिला उच्च कुल भद्रा आँगन।।
रिद्धि-सिद्धि घर करे बसेरा।
आता हर दिन नया सवेरा।।38।।
मिला पुण्य से प्यारा अवसर।
वक्त न खोना है ये पल भर।।
एक-एक कर सब को छोड़ूँ।
विषयों से मुखड़ा निज मोड़ूँ।।39।।
बहन सुभद्रा तक संवाद पहुँचना-
समाचार फैला घर- घर में।
शालि सभी छोड़े पल भर में।।
बात सुभद्रा सुन चकराई।
क्यों दुखकर यह बेला आई।।40।।
एक यही है कुल उजियारा।
हम सब की अँखियों का तारा।।
आँखें हर पल नीर बहाती।
पीहर की नित याद सताती।।41।।
रोजाना ही गुमसुम रहती।
व्यथा स्वयं की किससे कहती।।
धन जी देख उसे घबराए।
नहीं समझ मन की वे पाए।।42।।
पति धन जी के साथ बातचीत करना-
स्नान कराती बूँद गिरी जब।
बोले मुझसे बात कहो सब।।
शालिभद्र अब संत बनेगा।
एक नारि वह नित्य तजेगा।।43।।
समझ भ्रात है तेरा कायर।
नारि एक छोडे़ वह क्यों कर।।
त्याग नारि सब करे किनारा।
यदि संयम की मन में धारा।।44।।
बोली कहना बड़ा सरल है।
वादे पे वह आज अटल है।।
समझा कर छोड़े नित रानी।
मत करिए बातें बचकानी।।45।।
उठे अचानक त्यों ही पट से।
छोड़ा सबको अब मैं झट से।।
तुम्हें वही करके दिखलाऊँ।
कायर कैसे यह बतलाऊँ।।46।।
बात बिगड़ती देखी जब से।
हाथ जोड़ समझाई तब से।।
इसे मजाक समझ लें स्वामी।
बनें न संयम के पथगामी।।47।।
वचनों से अब नहीं हटूँगा।
इस क्षण आठों यहीं तजूँगा।।
वस्त्र पहन कर नीचे आए।
वैभव अपना वे छिटकाए।।48।।
अपने ससुराल राजगृही में आना-
सीधे अब ससुराल पधारे।
शालिभद्र चल वहीं पुकारे।।
कायरता का त्याग करो तुम।
जो श्रेयस है उसे वरो तुम।।49।।
शालिभद्र जब दृश्य निहारा।
दुविधा से अब किया किनारा।।
चले साथ में दोनों मिलकर।
महावीर के आए दर पर।।50।।
मुनि बनना-
संयम के पथ को अपनाया।
राग-द्वेष मद दूर भगाया ।।
उत्कट तपः साधना करते।।
भव-भय की पीड़ा को हरते।।51।।
धन जी मुक्त हुए बंधन से।
दूर हुए सारी उलझन से।।
शुद्ध ज्ञान अब धन जी पाए।
जीवन कुंदन सा चमकाए।।52।।
शालिभद्र जी धारे अनशन।
महिने भर में तोड़े बंधन।।
हिम्मत की प्रभु दाद दिए थे।
दूर सभी अवसाद किए थे।।53।।
जैन धर्म का कथ्य निराला।
सुन कर खुले भाग्य का ताला।।
गहन भक्ति से कही कहानी।
सबके मुख हो आज जुबानी।।54।।
'हिम्मत' ने यह कथा सुनाई।
भूल अगर मेरी रह पाई।।
मुझको क्षमा आप कर देना।
विनय यही मेरी सुन लेना।।55।।
हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता, लाडनूँ
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