https://subhashsinghai.blogspot.com/श्री शिव जी को चम्पा और केतकी पुष्प नहीं चढ़ाए जाते है



ॐ नम: शिवाय 

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 श्री शिव  जी को चम्पा पुष्प , केतकी पुष्प 
कमल , कनेर पुष्प व तुलसी पत्र क्यों नहीं चढ़ाए जाते है ? 
समाधान उत्तर --चौपई (जयकरी छंद 21 गाल )के
 पुनीत रुप गागाल   221  में  

जयकरी छंद में पदांत - गाल  (पुनीत रुप में-- गागाल )
~~~~~~~~~~~~~ सामान्य  मान्यता 

रखती   सुंदर  चम्पा  फूल | खुश्बू   रखकर करती भूल ||
भँवरा कहता  उसको बाँझ  | चम्पा रोती    ढलती  साँझ ||
मिले पराग न  उसके  भाग |  करता भँवरा उसका त्याग ||
लगती चम्पा    उसको  हीन | खुश्बू   रंगत  लगते   दीन ||
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धार्मिक मान्यता (नारद जी से श्रापित चम्पा राधा जी के काम आई )

शिव को चम्पा से आनंद |  चम्पा खेली छल का छंद ||
बोली थी  नारद से   झूठ |  नारद जी तब जाते  रूठ  ||
देते    नारद  जी  है श्राप |    उतरे  तेरे    मद का ताप ||
मत पराग का होगा वास |    शिव आँगन से तेरा ह्रास ||

बुरी नियत का ले संज्ञान  |  आया   था  कोई  नादान ||
तब  देकर  चम्पा ने फूल |  जीवन में  की  भारी भूल ||
नारद  पूछें   तब  इंकार |     करे नहीं गलती स्वीकार ||
तब पराग का  सूखा नूर |     तब से चम्पा शिव से दूर ||

चम्पा  रोती  हरि  के   पास | मैं कहलाऊँ किसकी  खास ||
कहते   हरि  यदि तू   तैयार | राधा    कर  सकती  उद्धार ||
राधा   के  तू  आना    काम |  जिससे   मुझको है आराम |
राधा  पावन     इस  संसार |   मिले  उसे बस  मेरा प्यार ||

चम्पा  जाती   राधा   पास |  कहती कर‌‌लो मुझमें वास ||
अब तो हरि चरणों की धूल | सदा     सुधारें   ‌मेरी   भूल ||
राधा   चम्पा   बनके    फूल |  व्यंग्य बाण के सहती शूल ||
अपना     रखती छुपा  पराग | सिर्फ कृष्ण को देती भाग ||

भ्रमर  रहे  इस  नाते   दूर |  हरि ही   छूते  उसका  नूर ||
हरि का भँवरा  होता  दास | इस कारण मत जाए पास ||
राधा   रहती  चम्पा   फूल |  यादें हरि को यमुना कूल ||
चम्पा   उनको    है  स्वीकार | देते उसको अपना प्यार ||
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केतकी प्रसंग 

श्रीहरि -ब्रम्हा   है    तैयार |  पता लगाने  शिव आकार ||
ब्रम्हा    जाते    है   पाताल | भरें विष्णु जी नभ में चाल ||
श्रीहरि लौटे  खाली    हाथ |   नहीं   मिली  ऊँचाई नाथ ||
ब्रम्हा   लौटे  भरते   ओज  |     गहराई ली  हमने खोज  ||

कहें केतकी   सच है बात |  यहाँ  गवाही  दूँ  सौगात ||
कहते शिव है, करती पाप | सुनो  केतकी   मेरा श्राप ||
तुझे    डसेगें     मेरे    नाग | आज छोड़ता तुझसे राग ||
जग में तब से सहती शूल  |  नहीं केतकी चढ़ते  फूल ||

ब्रम्हा का भी गिरता  शीष |  झूँठ वचन जो बोला दीश |
बचे चार सिर   बोलें नाथ |  नहीं  हमारा  समझों साथ ||
ब्रम्हा का तब झुकता माथ |  क्षमा  माँगते    जोड़े  हाथ ||
महादेव   ही  जग  आधार |  जिनकी महिमा अपरम्पार ||

तब से ब्रम्हा   मुख है चार |  गिरा   पाँचवाँ   है  बेकार || 
नहीं बोलना  जग में  झूठ |  वर्ना  जाते  शिव जी रूठ ||
कहे  केतकी  मुझसे  भूल |  झूँठ उगा तन ,बनके  शूल ||
क्षमा   करो   हे , दीनानाथ | ‌सर्प  डसें  मत  मेरा   माथ ||

शिव कहते है  लेना पाल |  सर्प   रखेगें   तेरा ख्याल ||
नहीं झूँठ का   देना साथ |  देने पर  डस  लेगें   माथ ||
कहे  केतकी   जोड़े  हाथ  |  किस चरणों में जाऊँ नाथ ||
श्रीहरि ही  तब आए काम |  मिला केतकी  को आराम ||
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तुलसी प्रसंग 

कहें  प्रिया हरि तुलसी आन |  श्रीहरि जैसा   दें   सम्मान ||
करें नहीं  हरिहर  स्वीकार |  बेल  पत्र को   बस  दें प्यार  ||
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कमल , कनेर पुष्प प्रसंग 

शिव कनेर को  देते मान |  कहें लक्ष्मी की  ये  आन ||
शिवजी देते    है‌     संदेश | सबका अपना रहता वेश ||
लाल पुष्प में लक्ष्मी  मान | शिव खुद करते इनका गान ||
नहीं चढ़ाना शिव को आप | स्वीकारे   मत  इनकी जाप ||
(जाप =माला)
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सादर 
श्री शिव जी का संदेश 

किसने  समझा शिव  संदेश | क्या चाहें शिव  कैसा  वेश ||
जो भजते है शिव का  नाम |  उन   तक  मेरा   है  पैगाम ||
सदा    बुराई    देना    तोड़ | शिव के सम्मुख आना छोड़ ||
गरल आपका  कर लें  पान  | जग को अमरत  देते   दान ||

गरल कंठ  में  रखें  सम्हाल | नहीं   उतारे तन   में  काल ||
इस   लीला  से   दें   संदेश |  नहीं    बुराई   आवें     लेश ||
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सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ )म०प्र० 

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