https://subhashsinghai.blogspot.com/जय‌ माँ शारदे (कुंडलिया कुंड)

कुंडलिया कुंड ( चित्र क्लिक करें )
जय माँ शारदे , (पुन: क्लिक करें ) 

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रोला; दोहा में जुड़े ,  कुंडलिया    तब  रंग |
दोहा का चौथा चरण,   रोला   प्रथमा अंग ||
रोला प्रथमा अंग , तीन दो   चौकल चौकल |
                         ( 3244 या 3424,)
विषम चरण यति गाल , रखें रोला में प्रतिपल ||
दोहा  प्रथमा   शब्द  , अंत  में   लेता   चोला  |
है   कुंडलिया   रूप , जहाँ  क्रम दोहा  रोला  ||

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होती  चौकल से जहाँ , कुंडलिया   प्रारंभ | 
आगे जब रोला जुड़े , बना   रहे  तब  दंभ || 
बना रहे तब दंभ , निवेदन   समझो   प्यारे |
चौकल करे पदांत , नियम  से   रोला सारे  ||
जहाँ त्रिकल प्रारंभ, वहाँ लय मिलती रोती | 
इसीलिए प्रारंभ, सही  गति   चौकल होती || 
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षटकल अठकल से करो , कुंडलिया की आदि |
चरण उठा   पूरा रखो , नहीं  यहाँ   तब  व्याधि || 
नहीं  यहाँ तब व्याधि , किंतु जब   रोला  आए | 
चले  नियम  से  चाल , अंत  में   चौकल  लाए ||
हर मुश्किल आसान , जहाँ   से  दोहा  हलचल  | 
रखना चौकल  मान , बने जो षटकल अठकल || 

"दीवाली" षटकल गिनो , पर चौकल का भान |
"रहे हमेशा"  आठ  है , यह   समझों   संज्ञान || 
यह समझों संज्ञान   , अंत  में   चौकल बनता | 
कुंडलिया लय जान , सही   तब   रोला रहता || 
समझों  सही  विधान, छंद की यह  उजयाली |
लेखन  करना  श्रेष्ठ , लगे जब शुभ   दीवाली || 

सुभाष सिंघई , जतारा (टीकमगढ़) म०प्र० 
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( जय‌ ओरछा , जय रामराजा सरकार )
(जय‌ हरदौल जू )

बुंदेली   हम   लोग  है ,   राजा   है   श्रीराम |
नगर ओरछा धन्य है , बना   राम   से  धाम ||
बना  राम  से   धाम,   गणेशी    बाई   रानी |
गईं  अयोध्या आप , राम   को लाकर मानी ||
चली    पुष्प   नक्षत्र , कहानी  है  अलबेली |
लाए   थे  श्रीराम  , ओरछा     हम   बुंदेली ||

बेटी के   हर   व्याह में , आते    है   हरदौल |
भानेजन को भात दें, रखें  बहिन का  कौल ||
रखें बहिन का कौल , देखते  सदा   दिमानी |
सफल सभी हो काम,नाम की महिमा जानी ||
बुंदेली  यह  आन ,   कभी  मत  होती   हेटी |
लाला  श्री हरदौल  , सदा  खुश  रखते  बेटी ||

ॐ नम: शिवाय‌ , {कुंडलिया} जय हरिद्वार 

जानो शिव   दरबार  है , तीरथ   श्री   हरिद्वार |
नमन करे सब देखते , प्रकट   गंग   की   धार ||
प्रकट गंग की धार , सभी   जन   हर्षित  होते | 
मिले‌ मोक्ष का द्वार , लगाकर    नद ‌‌  में   गोते ||
कह सुभाष नादान  , शिवालय सुखकर मानो |
मिलता   परमानंद.  , शिवा   की    पैड़ी जानो ||

शंकर  जी  रक्षा  करें  , रह    कुंडेश्वर   धाम ||
प्रकट हुए थे कुंड से , रुप   पिंड  धर  श्याम ||
रुप पिंड धर श्याम , धान  को  जब था कूटा |
धन्ती   बाई   नैन  , लहू   को    देखे   छूटा ||
आए जब सब   लोग , हटाए   फैले  कंकर |
बनी ओखली   कुंड , प्रकट थे  भोले शंकर ||

लेखें   बाणासुर  सुता ,  ऊषा   जिसका   नाम |
कुंडेश्वर  में   वह  सदा  , आकर  करे   प्रणाम ||
आकर करे प्रणाम , आज भी अतिशय खिलता |
प्रातकाल अभिषेक , किया  ही  सबको मिलता ||
गहराई     पाताल ,   ऊँचाई       बढ़ती     देखें |
चावल   मानो   माप  , साल   दर  सालों  लेखें ||
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अब यही कुंडलिया बुन्देली में  

बुंदेली   है  हम  सबइ    राजा   जू   श्रीराम |
रजधानी है  ओरछा  ,    कैतइ सबरै   धाम ||
कैतइ  सबरै    धाम,   गणेशी    बाई   रानी |
गईं  अयोध्या  दौर , राम खौं ल्याकै   मानी ||
निगीं   पुष्प  नक्षत्र , किसायैं सब अलबेली |
ल्याये   थे  श्रीराम  , सबइ   जुरकै   बुंदेली ||
(रइयत =प्रजा)


बिटियन  के हर व्याह  में , आतइ  है हरदौल |
भानेजन खौं भात दें, रखत  बहिन कौ  कौल ||
रखत  बहिन कौ कौल , देखतइ ठाठ दिमानी |
सुफल हौत सब काज , बात ये   पंचन जानी ||
बुंदेली   दै    न्यौत  , अशीषें  माँगें   पिटियन |
लाला जू  है आत , भात खौ बाँटन  बिटियन ||

सुभाष सिंघई

श्री कुंडेश्वर धाम की महिमा , कुंडलिया छंद में

शंकर  जी  किरपा  करत  , रत कुंडेश्वर धाम |
कूँड़े  से भयते   प्रकट, धरै   रूप  थे  श्याम ||
धरै रूप  थे   श्याम , धान   मूसर  से   कूटा |
धन्ती   बाइ खटीक, खून  खौं तकबै   छूटा ||
जुरै  उतै  सब  लोग , हटाऔ कचरा  कंकर |
कूँड़ों बन  गव  कुंड , प्रकट थे  भोले शंकर ||

लेखें   बाणासुर   सुता ,     ऊषा  जीकौ   नाम |
वह कुंडेश्वर धाम में ,     करतइ   रोज   प्रणाम ||
करतइ  रोज प्रणाम , अबै भी अतिशय खिलता |
भुंसारे   अभिषेक , किया  ही  सबको मिलता ||
गैराई     पाताल ,   ऊँचाई       बढ़तइ     देखें |
चाँउर  बनतइ नाप  , साल   दर   सालों  लेखें ||
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बिना किसी नाम लिए 🙏

ले देकर  कुल   तीन  है  ,बस  उनके  ही पास |
पप्पू    बेटी  माँ  सुनो , तीनो   खासम   खास ||
तीनो   खासमखास  , शिकंजा  दल पर  कसते |
अद्भुत जिनका  गान , सभी अब सुनकर हँसते ||
लेकर   बापू    छाप , बने    है   दल  के  मेकर |
चल  जाता  है  काम , "सुभाषा" बस  ले  देकर ||

कविता का  मन साफ है , जब  भी  बोले बोल  |                लगती आभा- सी सदा , किरणें सब अनमोल ||            किरणें सब अनमोल , प्रखरता   सदा  दिखाती |   किसका  कैसा  रूप , आइना   बनकर  आती ||                कविता  से ही आज , सत्य की दिखती सविता |                 कवि के उजले भाव ,  आज भी पावन कविता ||

, गुरुघंटालों को भी नमन 🙏

पहले उनको  भी नमन , जो है   गुरुघंटाल |
माया फैला देश में   , हड़प   रहे  है   माल ||
हड़प रहे  है माल , सभी   को   मूर्ख बनाते |
चमचा  चेला  पाल , कथाएँ    नई   सुनाते  ||
कहता    यहाँ  सुभाष, हारते  नहले   दहले |
स्थापित  गुरुघंटाल , नमन अब उनको पहले ||

सुभाष सिंघई

आबादी  विस्फोट  पर,‌  सूझा  एक उपाय |
जनता से भी  पूछता  ,क्या‌ है  उनकी राय ||
क्या है उनकी राय  , रहें  दो तब  सरकारी  |
इसके  आगे   तीन , स्वयं की   जिम्मेदारी ||
सरकारी   अनुदान , बंद हो  सब  आजादी |
नही  किया सहयोग , घटाने  जब आबादी ||

आया था दामाद जब  ,अपनी  निज ससुराल |
आवभगत की सास ने, पूछा  घर का  हाल ||
पूछा घर  का   हाल , कहा यह  गेह  तुम्हारा |
इसको अपना जान ,समझना निज का सारा  ||
जगी सास जब भोर , काम पर उसको पाया |
भोला  था   दामाद , लगाकर   झाड़ू   आया ||😂🙏

आया    कैसा   वक्त  है , लोक तंत्र में आज |
राष्ट्रपति   सम्मान  की ,   छेड़   रहे  है‌ं लाज ||
छेड़   रहे  हैं   लाज ,  छोड़ते   सब   मर्यादा |
कटुता की यह   खार,देखते हम सब ज्यादा ||
संविधान    सौगंध ,   उठाते  जिनको  पाया |
करें प्रमुख पर घात , वक्त यह‌‌  कैसा  आया‌ ||

झूला टूटे  नेह के  , चकरी  करते  झूल |
रस जितने थे प्रेम के , गए सभी है भूल ||
गए  सभी   है भूल , देखते  दुनियादारी |
बोले  कटुता बोल  , भूल मर्यादा  सारी ||
यत्र-तत्र भी आज,बीज कटुता का फूला |
लगी प्रेम की डोर, नहीं अब  ऐसा झूला ||

पूनी  हों  जब शारदा ,  आशीषें    बरसात ||
लक्ष्मी जी  ऊनी रहें  , बढ़नें  को अकुलात ||
बढ़ने को अकुलात, करें खुद अनुभव प्रानी |
नहीं  थोपता   बात , बना   मैं  कोई   ज्ञानी ||
निज का अनुभव भान, तिजोड़ी  रही न सूनी |
यथा  योग्य  सम्मान , रखा   जब  ऊनी पूनी ||


कविता‌  से  अंजान हूँ ,  मैं   हूँ  लक्ष्मी पुत्र |
मौसी   मेरी   शारदे ,  रिश्ता   रखूँ   पवित्र ||
रिश्ता रखूँ  पवित्र ,  चाह  से  रिश्ता पाला |
रखता श्रद्धा भाव , छंद   से  जपता  माला ||
बतलाती   है  सार , शारदे   देती   सविता |
होकर लक्ष्मी पुत्र , लिखें हम यारो  कविता ||

  छंदों को समझा रहे, पटलों   पर  उस्ताद |                      हिंदी इनसे किस तरह, होगी अब आबाद ||                       होगी अब आबाद , सूत्र   भी  याद नहीं है |                      फिर भी रहे दहाड़ , गलत को कहें सही है ||                       रहता मौन सुभाष , कहें क्या हम बंदो को |                       उर्दू  के  उस्ताद , मिले   हिंदी  छंदो को ||

   हिंदी भी अब क्या करे ,  कौन   सुनेगा   माँग |               कुछ ज्ञानी अब तोड़ते , कलम  धार  से  टाँग ||                    कलम धार   से टाँग , रबड़-सी   खेंचा   तानी |                   करते  तोड़  मरोड़ , शब्द   पर  अब मनमानी ||               करता विनय सुभाष , करो  मत आकर  चिंदी |                   छेड़छाड़ का  काज   , नहीं  अब   कीजे हिंदी || 

 हिंदी हम  सब   मानते, हिंदी  मेरी शान |                          हिंदी का  परचम रहे , हिंदी    हिंदुस्तान |                           हिंदी हिंदुस्तान , हिंद  में   हिंदी   जलवा |                         पर करते कुछ लोग, सदा हिंदी को अगवा ||                     हिंदी  है सरताज  , नहीं  हो  सकती  चिंदीं |       ‌‌               विश्व दिवस सम्मान  , आज भी पाती हिंदी ||

 पढ़ने  वाले  सो  गए , कवि   रहा  है   जाग |                  कविता पढ़ता कौन है , किसको इससे राग ||                     किसको इससे राग, नजर  कवि  की त्राटक |                    धन्यवाद आभार , सभी   करने   को नाटक ||                  रचता  है   साहित्य,  कदम भी  रखता  बढ़ने |              पर जो लिखता बात, किसे अब फुरसत पढ़ने ||🙏

  कविता‌ से  देने  लगे, अजब  तरह  की खार |               चार  जमूरे    साथ  में ,  झगड़े  को    तैयार  ||                     झगड़े    को  तैयार   , छंद  सब  चीख रहे है |              तोड़े   हिंदी   टाँग ,      जमूरे   सीख  रहे  है ||                     किसको दे अब दोष , कहाँ पर खोजे सविता |              दिशा हीन जब राह, चले जब कवि की कविता || 

अखरी मेरी बात है , अखर गए हम आज |                      खतना छंदों  की हुई , खोला जब है  राज ||                        खोला जब है राज  , फारसी  से  समझाते |                       हिंदी के आचार्य ,  फाइलुन   फैलुन लाते ||                       गण हिंदी के भूल,  करें  अरकानों  शहरी |                     तब तो तुम उस्ताद, बात सच  मेरी अखरी ||

करनी अपनी  देखना , फिर करना तुम टोक |
अच्छी है‌‌ यदि आपकी‌,  कर सकते हो रोक‌‌ ||
कर   सकते  हो रोक , आपकी   बातें  मानें |
सही  नेक इंसान , जगत   भी  तुमको जानें ||
रखते‌ हो   यदि पोल , पडे़गी   उल्टी‌  भरनी |
रहना तब चुपचाप , ‌‌ सुधारो  अपनी  करनी ||

शिक्षा  मेरे   पास   है , डिग्री   का  अम्बार |
लिखता सिर्फ सुभाष हूँ ,पाने सबका प्यार ||
पाने सबका प्यार , नेह.  भी   सबको देता  |
नहीं रखूँ   मैं चाह , बनू    छंदों  का   नेता ||
करूँ शारदे गान , उन्हीं   से   माँगू   भिक्षा |
रहवे   दूर  गुरूर  , सदा  हो अच्छी  शिक्षा ||

मैं मैं   तू‌  तू हो रही ,   लेकर  कोई  बात |
शब्द बने तलवार है,   देने को  प्रतिघात ||
देने को प्रतिघात , निरर्थक समय गवाँते |
रोकें नहीं  प्रवाह,नया सब क्यो झुठलाते ||
रुके कभी मत वेग , बना लो कितने खेमैं |
जगत सदा गति शील , करो मत तू तू मैं मैं ||

रहते किस घर शेर है, किस घर  रहते  श्वान |
भौं-भौं और   दहाड़‌  से , हो  जाती पहचान ||
हो जाती पहचान , श्वान   ही   पूँछ  हिलाते |
करते शेर दहाड़  , सभी   को  खूब  सुनाते  ||
जहाँ नकलची स्वाँग, स्वयं को असली कहते  |
उस दर से लें भाग,  असलची जिस घर रहते ||

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कुंडलिया निवेदित है 


कीड़े  खाकर छिपकली , छिपी  राम  तस्वीर |

 वहाँ  बैठ  वह सोचती ,   बदलेगी  तकदीर ||

बदलेगी    तकदीर , आज  का मानव  देखा |

करके बहुत अनीति,   द्रव्य का करता लेखा || 

पर दे जाता  दान  , धर्म   के   मंचों   आकर |

क्या कट जाए  पाप , चले  जो कीड़े खाकर ||?(1)


टूटे  रिश्ते   जोड़ने ,   पहुँच  गए   शमशान |

हाथ जोड़ कहने लगे , मिले  क्षमा का दान ||

मिले क्षमा का दान , निकट मुरदे  के आया |

लिपटा शव से खूब, अश्रु भी बहुत बहाया  || 

करता प्रश्न   सुभाष , बैर के कब   घट फूटे |

मुरदे  को  दे मान ,    जुड़े  क्या  रिश्ते टूटे ||? (2)


जूते अब शोरूम में , बिकती सड़क किताब |

मिलता   दूध  उधार  है , आती नकद शराब ||

आती नगद शराब ,   श्वान अब   पाले जाते |

आवारा   है  गाय ,      गीत गधों के   गाते || 

भूखा  दिखे  किसान , खोजता  है  बलबूते |

लगे न कुछ भी हाथ , घूमकर  घिसता जूते || (3)


सदा  सहारे के यहाँ ,    जग में चलें न काम |

सभी सहारों में छिपे ,    पालन  हारे श्याम ||

पालन हारे श्याम , लोग क्यों भ्रम को रखते |

हम  पालें  घरवार ,   हमारा   दाना  चखते ||

मिलते सबको खूब ,  मदद के यहाँ किनारे |

रहते  सबके  राम , श्याम जी  सदा  सहारे ||(4)


कहते  ज्ञानी  जानिए  , दिन  हैं  केवल  सात |

सोमवार से  रवि  गिनो , समझो   मेरी   बात ||

समझों  मेरी  बात  , इन्हीं  में  जीवन  सिमटा |

जन्म मरण के कर्म , धरम भी आकर लिपटा ||

इन्हीं  दिनों  में रार ,  प्यार भी  सम्मुख  रहते |

समय न  हो  बेकार , सभी  यह  ज्ञानी कहते ||(5)


कहता अनुभव चुप रहो , याद रखो बस राम |

सदा  रुलाने   के  लिए  , अपने करते  काम ||

अपने करते काम ,    दंश  भी  वहाँ   चुभाते |

दवा   ‌लगे  बेकार , सभी  परिजन अकुलाते ||

रिश्तों की रख आन, गुणीजन  सब कुछ सहता |

समझे   ईश्वर    लेख ,   नहीं   दूजों    से कहता ||(6)


ताकत पर  बंधन रहे  , देने   चाल -विराम |

हाथी  पर अंकुश चले , घोड़ा डले  लगाम || 

घोड़ा डले  लगाम , जहाँ   पर  छुट्टा प्राणी |

मनमानी का राज , रखे कर्कष  वह वाणी ||

जंगल राजा शेर, कभी खुद लाता  शामत ||

जिस पर नहीं लगाम , व्यर्थ में खोता ताकत ||(7)


पढ़ता रहता है पिता, निज   बेटे  का चाव |

माँ बेटी की  आँख  के, पढ़ती   पूरे  भाव ||

पढ़ती पूरे भाव , नहीं   कुछ  पीछे छिपता |

चाल ढाल संज्ञान , सभी माँ को है दिखता ||

जहाँ पिता का रंग , पुत्र  पर आकर  चढ़ता |

कैसा क्या  है   हाल, जमाना  पूरा   पढ़ता ||(8)


बासी कढ़ी उबाल पर , जब दिखलाती रूप |

ढक्कन के नीचे रहे   ,  दिखे   सड़न विद्रूप || 

दिखे सड़न विद्रूप   , कहे   मैं  सबसे  आला |

आओ  मेरे पास , सभी   की   मैं  हूँ  खाला || 

कहें  गुणीजन  देख,   हुई  है     सत्यानासी |

है अब  बदबूदार , कढ़ी   यह  पूरी  बासी || (9)


डसकर कहते सभ्य हम, आज देश में साँप  |

मैं अच्छा   दूजे  बुरे   ,    नेता  भरते   हाँप ||

नेता  भरते   हाँप ,  लगे   हैं   छल के  मेले  |

नाग  बेंचते   दूध  ,  खोलकर  नए    तबेले ||

कैसे बचे‌ं  'सुभाष' ,खम्ब को पकड़ें कसकर |

नेताओं   को  छूट, मिली है आना  डसकर || (10)


झगड़ा झंझट झूठ सब,  झुँझलाना  भी छोड़‌ |

जहाँ झमेला   झाड़ हैं  , बिना   झेंप दो तोड़‌ ||

बिना झेंप दो तोड़ , जहाँ हो झिकझिक झंडा |

झुठलाओ सब दर्प  , बनो मत  आकर  पंडा ||

झगड़ालू   जो  झुंड , सामने  करते   रगड़ा |

नष्ट करों सब झट्ट , सभी  से  झंझट   झगड़ा ||( 11)


आँखें    भेंगी हैं  कहाँ,   काणें  करें  बखान |

दूजों पर   तत्पर  रहें ,  करने  को  अपमान ||

करने को अपमान , नाक निज खूब फुलाते |

करते कुढ़कर वार , गाल भी  वहाँ   बजाते ||

बाँटे  हरदम    खार , उड़ाए  कटुता  पाँखें  | 

रहें  खोजते   चूक  ,   गड़ाए काणें   आँखें ||(12)


झूठा जीते  इसलिए , सच रहता  है  मौन |

सभी सोचते दे समय , इनसे उलझे कौन ||

इनसे उलझे कौन , कुतर्की  सम्मुख आते |

करते सदा प्रलाप, सत्य को वह झुठलाते ||

अब यह है कलिकाल, आदमी खुद से रूठा |

सत़्य  माँगता न्याय , फैसला   करता  झूठा || (13)


नारी  के सिर ओढ़नी ,  लगे   मोरनी   बाग |

बिखरे केश सियारनी, रखे  जलन की आग ||

रखे जलन की आग , नैन  को है  मटकाती |

वहीं मोरनी लाज   , थामकर  चलती जाती ||

रूप   रंग  शृंगार ,   देह   भी  सब  मनुहारी |

पर रखती है लाज , ओढ़कर  सिर पर नारी ||(14)


हास्य व्यंग्य कुंडलिया 

कुत्ते  आकर द्वार पर , करें   जोर  से भौंक |

कहते वापिस व्यान लो ,गया तभी  में चौंक ||

गया तभी मैं चौंक, कहें सब धूमिल सुषमा |

नेता-श्वान समान ,  आपने क्यों  दी  उपमा || 

लेकर  नेता   वोट ,   सदा   ही  देते    बुत्ते |

पर हम तलवें चाट  , वफा   को  जाने कुत्ते  ||(15)


पापी करता  पाप है , खोटे  करता   कर्म |

पर लेता वह  आड़ है, जिसको कहते धर्म ||

जिसको कहते धर्म , मंच पर  पहने  माला |

मिले दान से मान , स्वयं को समझे आला ||

नहीं मिले  पर  चैन ,  रहे वस  आधाधापी |

कहता कवि "सुभाष",कहाँ सुख पाता पापी ||16)


परिभाषा मत पाप की , कहीं  खोजिए आप |

और   नहीं   बतलाइए , यहाँ  उठी  है   थाप ||

यहाँ  उठी  है थाप , पाप भी कब है  छिपता |

लाख छिपाते लोग,एक दिन सबको दिखता || 

कहता कवि " सुभाष",सदा ही रखना आशा |

जहाँ सत्य हो दर्श,  बोलती  खुद  परिभाषा ||(17)


दिखता हमको ज्ञान है , चले गधे अब लाद | 

करते  निजी  विवेचना, जो  मन में  ईजाद || 

जो मन में ईजाद ,     स्वयं को  माने  ज्ञानी |

करता रहे   प्रलाप ,   झूठ का पीकर पानी || 

देखा हाल 'सुभाष', सत्य कटु   को है लिखता |

करना मुझको माफ , लिखूँ मैं जो भी दिखता ||( 18)


ज्ञानी अब हम देखते  , देते  गजब  प्रमाण |

करते सदा कुतर्क है   ,गलत चलाते बाण ||

गलत चलाते बाण , बने  है  सबके आका |

अपना कहते सत्य,  बनाते जो भी खाका ||

देखे इन्हें 'सुभाष' , सोचता  कैसी  नादानी |

घायल सब   गुणवान , झूठ अब सच्चा ज्ञानी || (19)


देखा है साहित्य में  , मन  जब  भरे उड़ान |

माता शारद भी वहाँ ,   देती  उसको ज्ञान  ||

देती‌ उसको ज्ञान , विषय वह उम्दा रखता |

सार कहे साहित्य , तथ्य को ज्ञानी चखता || 

है 'सुभाष' संज्ञान , सभी कुछ रखता लेखा |

लिखता कवि अरमान , सृजन‌ में हमने देखा || (20)


रोते यहाँ गरीब है , सँग में दिखें अमीर |

दोनों को रहती सदा ,बस पैसे की पीर ||

बस पैसे की पीर , जोड़ना  पैसा रहता |

खर्चे  पर हो दर्द ,सदा वह पैसा कहता || 

पैसा होता शान  , हृदय में इसको  ढोते | 

है मंजर चहुँ ओर ,   सभी पैसे को रोते ||(21)


कीड़े नफ़रत के   भरे ,  उगलें   मेरे   देश |

बेर  छुहाँरे  बन गए ,   राजनीति  परिवेश ||

राजनीति  परिवेश, मिली उनको आजादी |

कुर्सी का  संग्राम , लड़़ा   है  पहने  खादी ||

बदला नहीं स्वभाव , अभी भी लगते सीड़े |

खट्टापन   है‌  साथ , छोड़ते  नफ़रत कीड़े ||(22)


कलियाँ खिलती है हृदय,करती दिखें विकास |

गोरी   होकर  वावरी  , कहती    यह मधुमास ||

कहती   यह   मधुमास , रंग   की   हैं  बौछारें |

प्रीतम   हमसे   दूर ,   चलें  दिल पर  तलवारें ||

नहीं सजन बिन नूर , कहाँ से   फूलें  फलियाँ |

फागुन है मधुमास  , अधूरी  फिर भी  कलियाँ (23)


कुण्डलियां छंद (हास्य रस में )


पत्नी माँगी   ईश से , मिले  सिंघई को गाय |

लेकिन आई  सिंघनी   , सूझें   नहीं  उपाय ||

सूझें  नहीं   उपाय  , सहज  कोई   बतलाए  |

भागूँ   कितनी    दूर  , श्रीमती   जब  गुर्राए ||

नर   कहलाते  बैल , सुभाषा विनती  इतनी |

कैसे  हो  निर्वाह   , सिंघनी   है यदि   पत्नी ||🤔🤓🙏(24)

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रंगत रूप  सुगंध  है ,  पर  चम्पा  में दाग |‌ 

ताना सहती बाँझ का , रखती नहीं पराग ||

रखती नहीं पराग , पास भी भ्रमर न आता |

कह  देता  रसहीन , मारकर ताना  जाता ||

अनुभव करे 'सुभाष',जहाँ है रस की संगत |

सब  लेते  है भाग, महकती महफिल रंगत ||5


झूठा जीते  इसलिए , सच रहता  है  मौन |

सभी सोचते दे समय , इनसे उलझे कौन ||

इनसे उलझे कौन , कुतर्की   बनकर आते |

करते सदा प्रलाप, सत्य को वह झुठलाते ||

अब यह है कलिकाल, आदमी खुद से रूठा |

सत़्य  माँगता न्याय , फैसला   करता  झूठा || 8


नारी  के सिर ओढ़नी ,  लगे   मोरनी   बाग |

बिखरे केश सियारनी, रखे  जलन की आग ||

रखे जलन की आग , नैन  को है  मटकाती |

वहीं मोरनी लाज   , थामकर  चलती जाती ||

रूप   रंग  शृंगार ,   देह   भी  सब  मनुहारी |

पर रखती है लाज , ओढ़कर  सिर पर नारी ||9


हास्य व्यंग्य कुंडलिया 

कुत्ते  आकर द्वार पर , करें   जोर  से भौंक |

कहते वापिस व्यान लो ,गया तभी  में चौंक ||

गया तभी मैं चौंक, कहें सब धूमिल सुषमा |

नेता-श्वान समान ,  आपने क्यों  दी  उपमा || 

लेकर  नेता   वोट ,   सदा   ही  देते    बुत्ते |

पर हम तलवें चाट  , वफा   को  जाने कुत्ते  ||10


पापी करता  पाप है , खोटे  करता   कर्म |

पर लेता वह  आड़ है, जिसको कहते धर्म ||

जिसको कहते धर्म , मंच पर  पहने  माला |

मिले दान से मान , स्वयं को समझे आला ||

नहीं मिले  पर  चैन ,  रहे वस  आधाधापी |

कहता कवि "सुभाष",कहाँ सुख पाता पापी ||11


परिभाषा मत पाप की , कहीं  खोजिए आप |

और   नहीं   बतलाइए , यहाँ  उठी  है   थाप ||

यहाँ  उठी  है थाप , पाप भी कब है  छिपता |

लाख छिपाते लोग,एक दिन सबको दिखता || 

कहता कवि " सुभाष",सदा ही रखना आशा |

जहाँ सत्य हो दर्श,  बोलती  खुद  परिभाषा ||12


दिखता हमको ज्ञान है , चले गधे अब लाद | 

करते  निजी  विवेचना, जो  मन में  ईजाद || 

जो मन में ईजाद , कौन अब पुस्तक पढ़ता |

लाँघें गधा पहाड़‌   ,  वहीं पर  मानव चढ़ता ||

देखा हाल 'सुभाष', सत्य कटु   को है लिखता |

करना मुझको माफ , लिखूँ मैं जो भी दिखता || 13


ज्ञानी अब गर्दभ बने , देते  गजब  प्रमाण |

करते सदा कुतर्क है   ,गलत चलाते बाण ||

गलत चलाते बाण , बने  है  सबके आका |

अपना कहते सत्य,  बनाते जो भी खाका ||

देखे इन्हें 'सुभाष' , सोचता  कैसी  नादानी |

घायल सब   गुणवान , गधे  है  सच्चे ज्ञानी || 14


आया पर्व  महान  था   ,    रामराज  गणतंत्र |

लला   विराजे गेह में ,    सुरभित   गूँजे  मंत्र ||

सुरभित  गूँजे   मंत्र , दिशाएँ  हर्षित थी सब ||

रामराज  साकार ,   इबारत लिखती थी तब  ||

सनातनी    परिवेश ,  तिरंगा नभ   में   छाया | 

लगता वहाँ सुभाष  ,राम  का  युग था आया || 15


जग में शिव ही सत्य शुभ, परम ब्रम्ह हैं  ज्ञान |

करते   सब  आराधना , पाते   शुभ   वरदान ||

पाते  शुभ वरदान   , नाम ले  हम  सब  जीते  |

संसारी   संताप ,  सभी का   शिव जी   पीते ||

हम  संसारी   भक्त ,     सहारा  पाते  मग  में | 

शिव स्वरूप आकार, सभी को दिखता जग में ||16


शंकर जी  का ब्याह शुभ , पार्वती के साथ |

बनी महाशिवरात्रि  है   , करने   पीले हाथ || 

करने पीले  हाथ , यही  दिन  शुभ ही मानें  |

अच्छा  लगे मुहूर्त  , दान  कन्या  का जानें ||

कहता यहाँ सुभाष ,अक्ल  है  मेरी  कंकर |

पर जाने दिन खास, उमा परिणय शिव शंकर || 17


देखा है साहित्य में  , मन  जब  भरे उड़ान |

माता शारद भी वहाँ ,   देती  उसको ज्ञान  ||

देती‌ उसको ज्ञान , विषय वह उम्दा रखता |

सार कहे साहित्य , तथ्य को ज्ञानी चखता || 

है 'सुभाष' संज्ञान , सभी कुछ रखता लेखा |

लिखता कवि अरमान , सृजन‌ में हमने देखा || 18


रोते यहाँ गरीब है , सँग में दिखें अमीर |

दोनों को रहती सदा ,बस पैसे की पीर ||

बस पैसे की पीर , जोड़ना  पैसा रहता |

खर्चे  पर हो दर्द ,सदा वह पैसा कहता || 

पैसा होता शान  , हृदय में इसको  ढोते | 

है मंजर चहुँ ओर ,   सभी पैसे को रोते ||19


कीड़े नफ़रत के   भरे ,  उगलें   मेरे   देश |

बेर  छुहाँरे  बन गए ,   राजनीति  परिवेश ||

राजनीति  परिवेश, मिली उनको आजादी |

कुर्सी का  संग्राम , लड़़ा   है  पहने  खादी ||

बदला नहीं स्वभाव , अभी भी लगते सीड़े |

खट्टापन   है‌  साथ , छोड़ते  नफ़रत कीड़े ||20

~~~

जूठन के मिष्ठान भी , कौन    बाँटता आज |

कुत्ते ही वस भौंककर , करें चाटकर काज || 

करें   चाटकर काज , सफाया   पूरा  करते |

जैसे   नेता   देश ,     पचाने  लड़ते - मरते || 

सोचे यहाँ "सुभाष", मची रहती  है   रूठन |

मिल जाए कुछ माल,भले हो वह भी जूठन ||


मोदी-नड्डा-शाह की , तिकड़ी करे कमाल |

पप्पू पप्पी पोनिया , दिखते  यहाँ  सवाल ||

दिखते यहाँ सवाल,विफल सब  होते नेता |

घिघ्घी-अड़गे-नाथ , फेल सब यहाँ प्रणेता |

पुरजेवाला साथ , कब्र अब  लगती खोदी |

रोए  पप्पू भाग्य , देखकर   सूरत   मोदी || 


वह दल अब क्या मिट रहा ,  ले पप्पू पहचान |

जिसमें   बूड़े    हैं जमे , फूटा  दिखे   मकान || 

फूटा  दिखे  मकान ,  पोनिया  भौंचक रहती |

पप्पी की भी नाक , नहीं अब  जनता‌  सहती |

आस बहूू की टूट , धरा  अब दिखती समतल |

रहा खाँग्रेस  नाम ,   कभी था कोई वह दल ||


सभी शिकारी मिल कहें  , करने चलो शिकार |

पर   मोदी   के सामने ,  सब   लगते   लाचार ||

सब   लगते     लाचार ,    बँधेगी   कैसे   घंटी |

पप्पू  देता  ताल ,    दिखे   पर   खाली   अंटी || 

मैडम   करें   विचार  , बनारस   सीट   निहारी |

कैसे  चलते   तीर ,    भूलते   सभी   शिकारी ||


आँखें    भेंगी हैं  कहाँ,   काणें करें बखान |

मोदी जी को देखकर , बनती नाक कमान ||

बनती नाक कमान , फूलकर ‌ होती चपटी |

ठगवंधन का खेल , खेलने  आए    कपटी || 

जनता की आबाज , हृदय में  मोदी‌   राखें | 

काणें करते रार ,   खुली जनता की आँखें ||

~~~~~

छाई  खुशी अपार   है , मिला  राम  का नेह |

जन्म भूमि  पर  जा रहे  , आप  पधारे  गेह ||

आप पधारे गेह , किन्तु   कुछ   ने   ठुकराया |

कहलाया दुर्भाग्य, जिन्हें कुछ समझ न आया ||

निजी   पैर   पर   वार ,  खोपड़ी  है   चकराई |

आगे  बंटाधार   ,अक्ल   में   कालिख    छाई ||


फूफाओं को   देखिए , साथ जरा   अंदाज |

नहीं अयोध्या जा रहे ,जहाँ राम का  काज  ||

जहाँ राम का काज   , वहाँ जो होगी  पूजा |

फूफा जी की पूँछ , दिखेगी  सबको  चूजा ||

चुभती‌ तिथि बाईस ,आज श्री आकाओं को |

लगती घर में  खैर , आजकल फूफाओं को ||🤑🙏


चम्पा फूला  बाइ में , तकत सबइ हैं दाग |

कात  बाँझ ठाटौ उयै  , तौमें  नँईं  पराग || 

तौमें  नँईं   पराग , लिगाँ ना भौरा  आता |

कै  देतइ रसहीन , उरानौं  भी भिजवाता || 

खुश्बू  साजौ रूप ,  लगै  पर यैडी लम्पा | 

सुनकै सिसकै खूब , बाइ जी फूला चम्पा ||


कुंडलिया ( श्री राम लला जू  की ही तरफ से निमंत्रण ) 


छाईं खुशियाँ  हैं रगड़, कात  राम रख नेह |

आऔ अब सबई जनै , धाम अजुदया गेह ||

धाम अजुदया गेह ,   बँटे है   पीरे  चाँवल |

सबरै जुर कैं लोग  ,दैंय सब मैया  आँचल ||

अभी लला हम राम , बधाईं  सबकी पाईं |

है दिनांक बाईस   रगड़ कै  खुशियाँ छाईं ||


ठंडा मौसम जब बने  , शीत लहर का जोर |

जल की बूँदें गिर कहें ,  मावठ  का है शोर || 

मावठ का है शोर ,  रजाई  लगती   प्यारी | 

करती घर के काम , काँपती थर-थर नारी ||

जलते खूब अलाव , ताप दें  लकड़ी कंडा | 

रहें  सजन सब गेह , देखकर मौसम ठंडा || 


वेेलेंटाइन‌ था दिवस , खुश थे फूल  गुलाब |

देखूँ सबकी प्रेमिका,किसका कहाँ हिसाब ||

किसका कहाँ  हिसाब,अधर मैं चूमूँ सबके |

छूकर सबके  गाल , मजे  हैं  न्यारे  तब के ||

था  गुलाब  तैयार , प्यार में  आई   साइन |

किस्मत का दिन खास , मानता वेलेंटाइन || 

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आदरणीय श्री त्रिलोक सिंह जी ठकुरेला द्वारा सम्पादित ~

समकालीन कुंडलिया शतक पढ़कर भावोद्गार 🌹

ठकुरेला   कविराय को ,   जाने    हिंदुस्तान |

कुंडलिया शुभ छंद का , बहुत किया उत्थान ||

बहुत किया उत्थान , लेखकों  को  पहचाना  |

सम्पादित   साहित्य ,‌ ‌सदा ही लगा  सुहाना  ||

कृति है समकालीन ,शतक कवियों का मेला |

कुंडलिया सब  श्रेष्ठ  ,चयन  करते  ठकुरेला ||


दिखते   हैं    साहित्य  में   , ठकुरेला जी  नूर  |

श्री त्रिलोक जी नाम शुभ , भावों  से  भरपूर  ||

भावों   से  भरपूर  , हृदय  से  सब  स्वीकारें |

सम्पादन  के शब्द   , आपका  सृजन निहारें || 

कुंडलिया एकत्र  , शतक कविगण है लिखते |

पुस्तक समकालीन , समाहित लेखक दिखते ||

सुभाष सिंघई ~

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आदरणीय श्री बिपिन पाण्डेय सर  जी द्वारा सम्पादित ~

इक्सीसवीं सदी की कुंडलियाँ पढ़कर भावोद्गार 🌹


कुंडलियाँ    इक्कीसवीं ,    सदी ;  देखकर हर्ष |

बिपिन पाण्डेय  जी सदा , हम  सबके   आदर्श ||

हम   सबके आदर्श , सदी   के  कविगण  जोड़े || 

सम्पादन  अधिभार  , सृजन   सब  श्रेष्ठ  निचोड़े  || 

समुचित कवि सम्मान , खिली सबकी मनकलियाँ 

है "सुभाष" की  राय ,   धरोहर   सब   कुंडलियाँ ||

सुभाष सिंघई 

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श्वेतवर्णा प्रकाशन और आदरणीय श्री 

राहुल  शिवाय जी का हार्दिक अभिनंदन 

व श्वेतवर्णा  प्रकाशन को हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹

श्री राहुल के  साथ में ,  है   शिवाय शुभ  नाम  |

दिखे  श्वेतवर्णा  शुभम्  , करे  प्रकाशन   काम || 

करे  प्रकाशन  काम ,   कहें  तो  यह  है  कैसा |

हिंदी  अभियुत्थान   ,   शारदे   पूजन    जैसा || 

पढ़े सभी साहित्य , हृदय हो   सदा  निराकुल |

पावन  बने   विचार , सोच   यह  रखते राहुल || 

सुभाष सिंघई 

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मंडलिया {अपवाद )
16 - 11 दो पंक्तियाँ सरसी छंद की , इसके बाद
, 11 ~16

ऐरे गैरे   नत्थू   खैरे,  मुखिया  दिखते   आज |
लोकतंत्र में   नोट तंत्र से,   बगुले करते  राज ||
बगुले करते राज , बना   हवेली   सबको लूटा |
किससे करें पुकार, सभी जगह है इनका खूँटा ||
कौन करेगा   खोज, सही नहीं अब दिखते फेरे |
फैले   लम्बरदार ,  सभी   ओर  ही नत्थू   खेरे ||
~~~~~~~~`~``~~~~~~~~~~~~

नेता की मुस्कान में , बहुत  छिपे  है  राज |
सरकारी  धन के  लिए , धरें  रुप है बाज ||
धरें रुप है बाज ,  बने है  फिर  भी  रक्षक |
जनता को लें काट, सुनहरे बनकर तक्षक ||
भाषण का  दें दान , बने   है  सर्प  गणेंता |
नहीं   फूटता मैंर ,  काटते   जब  है  नेता ||

मिलते ज्ञानी‌   से   रहें , दिन  बीतें  जब.  चार |
‌सत्संगति से  एक दिन ,  पुष्प  खिलें मनुहार ||
पुष्प खिलें मनुहार , खुश्बू    भीनी    महकेगी |
आभा   पा    मकरंद ,     चंद्र   सी   चमकेगी ||
मिलता सभी सुभाष , लगे सब मधुवन खिलते |
सद्गुण का  व्यवहार , सिखाते  ज्ञानी   मिलते ||

दोहा   को   मिलने  लगा , दो  चरणों  का दान |               वि बनना कितना सरल, समझो अब श्रीमान ||                समझो  अब  श्रीमान ,  भाव  कवि  के सोते है  |              तुक  मुल्ला-सा  काम ,  सहज में  सब होते‌‌  है  ||               मिल  जाता   सम्मान , पीटते   अपना    लोहा |              मिला जुला जब  गान,‌वहाँ तब  किसका दोहा ||? 

  चूरण  जैसा   बाँटते ,  चरण  आज.  सरदार. |                  दोहों   के  सजने लगे, अजब- गजब दरबार ||                  अजब-गजब  दरबार,करे कवि का अब मर्दन  |                 तुक  का   देते  काम, पकडकर उनकी  गर्दन  ||                   आदत गंदी   डाल ,    कराएं    दोहा   पूरण |                     देते    है  अनुदान  ,   चरण  के  अपने  चूरण ||

 कवि को अब‌  मिलने लगा,  दो चरणों का दान |                दोहा में   तुक जोड़कर ,    तुक मुल्ला  पहचान ||               तुक मुल्ला   पहचान ,   नहीं   करना    हैरानी  |             आदत   बने   खराब , चरण   का  खोजे पानी  ||                लत अब   गंदी   डाल , कहें   लेखक   को  रवि |         घूमें   वह.  दिन   रात   ,  चरण  पाने  को कवि ||

 आया संकट कान पर , कितना उस पर भार |                     चश्मा डंडी  झुमकियां ,  रहती‌  सदा  सवार ||                   रहती सदा सवार , मास्क भी अब लटकाया |                   खूँटे  से  हालात , कान  भी‌  समझ न पाया ||                   नर  ने ‌  बीड़ी  पेन ,   जनेऊ.  यहाँ  चढ़ाया |                    हेड  फोन   तैयार ,  चिपकने   सीधा‌   आया ||

ढोता  बोझा  आदमी , गर्दभ  बना  सवार |

दान  भिखारी  बाँटता , दानवीर   लाचार ||

दानवीर  लाचार , काग  को  पहले  खाना |

कोयल सहती भूख , लोमड़ी चुगती दाना ||

राजनीति परिवेश,यही  सब उल्टा  होता.|

गधे  बने  सरपंच , गुणीजन  बोझा  ढोता ||


एक शृंगार रस कुंडलिया 

चंचल है यदि कामनी ,   कंचन रूप समान |

जहर भरी तब देखिए  , अधरों की मुस्कान ||

अधरों की मुस्कान ,   कटीले  जिसके  नैना |

चेहरे  पर  मधु भाव  , बने  हों उसकी  सेना ||

कह  सुभाष  नादान , महकता   पूरा अंचल |

नारी  की  पग  चाल , नैन भी जिसके चंचल ||


अपने  जब‌   करने  लगे , आकर पीछे  घात |

नहीं पाप  का काम है  , सम्मुख. देना   मात ||

सम्मुख   देना  घात , भरोसा  कभी न करना |

देना  सभी  जवाब.   नहीं  तुम  मन में डरना ||

कहता ‌  यहाँ  सुभाष , मानिए.   झूठे   सपने | 

घाती आए. काम , कभी   वह.  होवें   अपने ||

~~~~~~~~~~~~~~~

जो लोग रामचरित मानस में कमी खोजते है , उनके लिए‌


लिखते रामचरित सुनो  , कविवर तुलसीदास |

लिखवाई.  हनुमान.  ने , यह   श्रद्धा  विश्वास ||

यह   श्रद्धा  विश्वास , प्रश्न  को  नहीं   उठाना |

नहीं काव्य में  दोष , अधूरी   बुद्धि  बतलाना ||

मिलता  है  परिणाम , रोग   घर  द्वारे  दिखते |

क्षमा लीजिए मांग , कथ्य सुभाष सच लिखते ||

~~~~~~~~~~~~~~~

विषय - तर्पण 

तर्पण पुरखों  का  करो , पर मत जाओं भूल | 

जीवन में वह  बृक्ष है , जिनके  तुम  हो  फूल ||

जिनके हो तुम फूल , सदा  वह  साथ तुम्हारे | 

कभी  न   तुमसे  दूर , रहे  वह  सदा   हमारे ||

कह सुभाष कवि जैन,हृदय से करो  समर्पण |

कभी न जाना भूल ,   उन्हें तुम करके  तर्पण ||

सुभाष ‌सिंघई

                 

कुंडलिया

उखरी में मुड़िया धरें , खुद.  कन्छेदीलाल |
मूसर जी से कह रहे,रखियो मोरो  ख्याल ||
रखियो मोरो ख्याल , रगड़ कै उनखौ कुटने |
फुकली उड़ने दाल,   लगी ना मौं से छुटने ||
कहत सुभाषा यार , चिमाने   रइयो  बखरी |
नहीं काढ़ियों बात , ,कभउँ न मौं से उखरी ||√

{अंतिम शब्द का यहाँ भावार्थ उखड़ी बात है )

मुड़िया  उखरी में  धरें , रय‌ है‌ दाँत निपोर |
अटपट्टे सब काम है‌, काँ    ढूढों  है  ठोर ||
काँ ढूढों है ठोर , कैथ सी   चटनी  बँटने |
मूसर जी की मार   , तिरूला पूरे  छँटने ||
परौ सुभाषा सोच , बोलने बोली उड़िया |
मुख खौं लेने फार , फटाका होने मुड़िया ||

उखरी में मुड़िया धरे, ऐसे है‌ ‌  कइ लोग |
मूसर से कुटवें सदा , जोरत है खुद योग ||
जोरत है खुद योग , सबइ खौ है  हैरानी |
लुटे   पिटे से   रात , जुरै ना  पीवे पानी ||
दिखे तरइयाँ भोर , करै सब बाते अखरी |
कभउँ न चेते लोग , बात भी करते उखरी |

टपरा में डुकरा परो , लाघों  प्यासो     आज |
चार  कुचइयाँ माँगने, लगा   रहा   आबाज ||
लगा रहा आबाज , बऊ   जब बन   गइ बैरी |
बिरचुन खौं तब पीस, डुकइयाँ   लाई  कैरी ||
सास ससुर खौं देख, बऊ जब.  ठूसे  चपरा  |
बिकते खपरा  गेह. बिखरते  थुमिया   टपरा ||

अब यही कुंडलिया  हिंदी में ~

टपरा   में लेटा   पिता , भूखा  प्यासा आज |
चार  रोटियाँ   माँगने ,  लगा  रहा   आबाज ||
लगा   रहा आबाज , बहू   बहरी बन जाती  |
बेरों को   तब पीस, डोकरी   बिरचुन लाती   ||
सास ससुर को देख, बहू  जब बनती चपरा  |
बिक जाता  है  गेह , उड़े सब लकड़ी टपरा ||
~~~~~~~~~

लूअर मौ में दाब कै , नकुआ धुआँ निकार |
और करेजौ  बारबे ,  जुर गय ठलुआ चार ||
जुर गय ठलुआ चार, खाँस रय बैठे डुकरा |
धरै तमाकू  जीभ  , बनै   है  रौथत  बुकरा ||
जुरै  कहाँ से भाग , डुकइया   कैवें   दूभर | 
कढ़ै  बतेसा थूक  , दबायैं  मौ   में  लूअर ||

यही कुंडलिया खड़ी हिंदी में

बीड़ी मुख में डालते , धुवाँ   निकाले   लार  |
हृदय यहाँ पर जल रहा , बैठे फुरसत यार ||
बैठे    फुरसत   यार ,  खाँसते   बूड़ें  बावा |
कुछ तम्बाकू डाल , थूक  का उगले मावा ||
जुड़े कहाँ से योग  , लगी है  लत की कीड़ी |
फिर भी दावें औठ ,  मजे से   पीते  बीड़ी ||

हिंदी जौरत हाथ खौ  ,  सामू   रखतइ   माँग |
काय टोरतइ लै कलम  , भज्जा  मोरी    टाँग ||
भज्जा मोरी टाँग ,  रबड़-सी   खिच्चू  करतइ  |
करकें मोय अशुद्ध , वरतनी    ठूँसा  भरतइ ||
विनतुआइ   है आज , करौ  नइँ  हिंदी  चिंदी |
लिखतइ इतै सुभाष , बचन दो  भज्जा हिंदी ||

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मंडलिया {अपवाद) 16-11

गड़िया घुल्ला धरै  धुरइयाँ,  पौच  गओ    स‌सुरार |
रात बियारी मिली कुचइयाँ,  गिनती की कुल चार ||
गिनती की कुल चार , देख सास खौ झट से बोलो |
ल्याये  है   छै    सेर , जरा पोटली   पसरा  खोलो ||
तब   बोली  साराज,  पावनें  गलत करौ न कुल्ला ||
पैलउँ  लय है तौल  , खोल तुमारे  गड़िया   घुल्ला ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

गड़िया घुल्ला खौ  धरै , चलै  धुरइ  स‌सुरार |
रात  बियारी मिल गई , उतै   कुचइयाँ  चार ||
उतै कुचइयाँ चार , सास से   झट  से   बोलो |
ल्याये  है   छै  सेर ,   पोटली  जाकै    खोलो ||
तब   बोली  साराज,  पावने कर  लो  कुल्ला ||
चार  सेर   है  तौल,    तुमारे  गड़िया   घुल्ला ||
~~~~~~~~

  पगड़ी तगड़ी बाँधना  ,  नेता जी अब आप |                        जीत हार में आपकी  , यहाँ    लगेगी  छाप ||                           यहाँ  लगेगी  छाप ,  हुआ  है  भारी   दंगल |                        राहु केतु के  ठौर , दिखें सबको शनि मंगल ||                        क्या होगा परिणाम, हुई   है  टक्कर  तगड़ी |                   जागे  जहाँ  नसीब,  उसी के सिर पर पगड़ी || 


सजनी सजधज सोचती ,साजन अमर सुहाग |

करवा  चौथ   सुहावना ,  प्रीतम  से  अनुराग ||

प्रीतम   से   अनुराग , रीति    वह पूरा  करती |

साक्षी   होता  चाँद , मगन वह पति में  रहती ||

सजन उमर वह दीर्घ , सदा‌ करती  है  बजनी |

सात जनम का साथ ,  कामना करती सजनी ||


उनकी   झोली  में   टिकिट , आकाओं  ने डाल |

भेज    दिया   मैदान   में , खूब   ठोकिए  ताल || 

खूब   ठोकिए  ताल ,    लुटाओं  जोड़ा     पैसा | 

हुनर   दिखाओं    खूब , तोड़  तुम रखते कैसा ||

अगर किसी की नाक,लगे कुछ भिनकी तुनकी |

पूरी‌ कर   दो ‌ साफ  , पकड़   कर  पूरी‌  उनकी‌‌  ||


वंदन चरणों  का करें   ,वोटर   देव  समान | 

नेताजी अभिनय करें  , माँग   रहे  वरदान || 

माँग रहे  वरदान , खड़े हैं   याचक  बनकर |

भूखा वोटर आज , खड़ा  दरबाजे  तनकर || 

पूछें  कुछ भी बात , मिले  वादों   का चंदन |

खुशी उसी को मान ,  कराये  वोटर   वंदन ||


जिनको भूत सवार है , लड़ना   हमें   चुनाव | 

उसको तब मत रोकना ,देकर   कोई   भाव ||

देकर कोई  भाव , मान  यदि   वह    जायेगा |

देगा   तुमको दोष , ताव   भी    दिखलायेगा || 

कर लो बंद सलाह , देख लो लड़ना किनको |

जोड़ो उनसे हाथ , चुनावी   चस्का   जिनको ||


आया  टिकिट न पास में , दूर हुआ भोपाल |

दल से निष्ठा तोड़कर , अलग   पकाई  दाल ||

अलग पकाई  दाल , पीटेगें वह अब  दल को |

सिम्बल जिसके पास , करेगें उससे छल को ||

कल तक थे हम दर्द,  सभी कुछ जिससे पाया |

दुश्मन है वह आज , टिकिट जब पास न आया ||


नेता बनने के लिए ,   करिए   खूब  वबाल |

उठापटक में भाग लें  , जैसे  हो   हर हाल ||

जैसे हो हर हाल , ध्यान  जनता  का खींचें | 

उल्टे -सीधे  ब्यान , बोल   दें  आँखें   मींचें || 

राजनीति में  शोर , सदा  जो  आकर  देता  |

करते   लोग  पसंद , मानते  अपना   नेता || 


नेता  रुपया बाँंटते  ,  है  चुनाव की  रात |

रुपयों से मिलती उन्हें, वोटों की सौगात || 

वोटों की सौगात , बनाते  खूब  निकम्मा |

चावल गेहूँ मुफ्त , रहें खुश  बहिना अम्मा || 

सभी योजना लाभ , बनी है  जनता  लेता |

कौन करे अब काम , बाँटिए  रुपया नेता  ||


कुण्डलियां छंद (हास्य रस में )


झाडू   पौछा  कीजिए  , करिए नहीं वबाल |

प्रतिदिन बर्तन मांझिए , चमकाए  हर हाल ||

चमकाए   हर   हाल , सम्हाले   गेह  रसोई |

सब्जी  भी  दे  काट , बनाए   आटा   लोई ||

पत्नी  रखें   प्रसन्न  , बनो अब पूर्ण जुगाडू |

घर को रखिए साफ , हाथ में  लेकर झाडू ||


जुड़िए  उनसे   आप  भी ,  बनिए  छंदाचार्य || 
दानवीर    साहित्य   में  , करें  पुण्य के कार्य ||
करें पुण्य के कार्य , चरण भी   उनसे   लीजे | 
तुकमुल्ला का काम , आप   बस पूरा  कीजे || 
कहाँ भागते  आप , जरा   पीछे   तो   मुड़िए | 
सनद रहे   तैयार  , आप बस   उनसे जुड़िए || 

घटनाएँ  अब  हो  रहीं  ,  लगतीं    बड़ी    विचित्र | 
तरह - तरह   के   सामने,   उद्गम   दिखें   चरित्र ||
उद्गम.  दिखें   चरित्र ,   यहाँ     दोहा   लिखबाते |
कितना होता भार , नगण   का  सोच   न   पाते | | 
मिले फेस  बुक  आज , अजब ही अब  लीलाएँ |
आहत  है   साहित्य , बहस   की बस   घटनाएँ || 

भारत माँ से है जुड़ी  , हिंदी  की   पहचान |
बनकर भाषा देश की , पाती  है   सम्मान ||
पाती है   पहचान , ज्ञान  में   एक  सितारा | 
शब्द- शब्द विज्ञान, स्वरों की मिलती धारा || 
हिंदुस्तानी   लोग ,  करें सब मिलकर आरत | 
हिंदी  अभियुत्थान , देश भी   करता भारत || 

हिंदी में जो  लगा रहे , लाकर  नुक्ता   टाँग |
अकल अजीरण हो गया , पीकर बैठे भाँग ||
पीकर  बैठे   भाँग , गणों    को   पूरा भूले | 
याद करें अरकान , अकल के  लगते लूले ||
वेद ग्रंथ  लो  देख , नहीं  नुक्ता की   बिंदी | 
आधा अक्षर ज्ञान , सदा रखती   है  हिंदी || 

टाँगें    तोड़े   छंद   की ,  हिंदी    के   श्रीमान  |
आठ गणों को त्याग कर , समझाते  अरकान ||
समझाते   अरकान  , करें   हिंदी  की  खतना |
नुक्ता  का   फरमान , थोपते  हम  पर  अपना ||
चाहें  पद  आचार्य  , शिरोमणि   की  हैं   माँगें |
रचते  जो   साहित्य ,     छंद   की  तोड़े  टाँगे ||

मिर्ची जिनको लग रही , देख -देख सेंगोल |
अंतरमन में झाँककर  , क्या समझेगें मोल ||
क्या समझेगें मोल , दंड यह क्या कहलाता |
धर्म    न्याय  आदर्श , चिन्ह में कैसे  आता ||
करना   हमें  विरोध ,    लगाते  जो  है पर्ची |
रखते  कुंंठित  सोच, उन्हें  ही लगती मिर्ची ||

ऐसा क्या  है   देखते , गलत   लगे  सेंगोल |
हाय - हाय जो कर रहे ,  पीट  रहे  है ढोल ||
पीट   रहे   है  ढोल , याद  करते  है   नानी |
प्रेरक   होते   चिन्ह , समझते नहीं  कहानी ||
सारनाथ  का  चक्र , तिरंगे   पर   है  जैसा |
इसी तरह  सेंगोल , रखा   संसद  में   ऐसा  ||
~~~~~~~~~



कुंडलिया छंद--
(यह एक  नेता के व्यान पर आधारित कुंडलिया है ) 🙏

कहते है प्रभु राम से ,  जाकर के हनुमान |
सवर्ण आपकी जाति है, नेता   बाँटे ज्ञान ||
नेता   बाँटे ज्ञान , दलित  वानर  बतलाते |
जामवंत जी आज, वर्ग  पिछड़ा  में आते  ||
वासी आदि निषाद ,बोल सब इनके सहते |
इनको क्या  दें दंड  , राम से हनुमत कहते ||
~~~~~~~~~
भाई हो यदि ज्येष्ठ तुम,  और   पिता  से  हीन |
समझो पापी हो बड़े ,   पिछला  जनम मलीन ||
पिछला जनम मलीन , फर्ज का पहनो कपड़ा | 
सुनने    बाते  चार   , रखो  तन  मोटा  चमड़ा || 
फर्ज    नहीं   अहसान ,  त्याग दो  पाई - पाई |
फिर  भी   बेईमान ,    ज्येष्ठ यदि हो तुम भाई ||

एक हास्य कुंडलिया ( चार  शब्द आंगल भाषा के है ) 🙏

कवि की कविता को मिले , जीरो लाइक कमेंट | 
भावुकता   में  ले  लिया , तब कवि ने  जजमेंट || 
तब ‌कवि ने  जजमेंट , जहर  को  उसने  खाया | 
शव यात्रा  शमशान , तभी   कुछ  ने   दुहराया || 
कविवर था फनकार, झलक थी इसमें  रवि की | 
कहता  मुर्दा  बैठ  ,   नमन लो सादर  कवि की ||🙏😇

हास्य कुंडलिया 

करने   भोजन   जब   गये , एक  आलसीराम |
कहते   इतना  तोड़कर ,  कठिन चबाना काम || 
कठिन चबाना काम , सरल सी विधि बतलाओ |
भोजन   होवें   पूर्ण ,    समस्या यह सुलझाओ || 
बोला   तब   जजमान , पीक  मैं   लाता  भरने |
मुख में   डालो घोल , यहाँ  अब  भोजन करने ||
~~~~~~


मोदी-नड्डा-शाह की , तिकड़ी करे कमाल |
पप्पू पप्पी पोनिया , दिखते  यहाँ  सवाल ||
दिखते यहाँ सवाल,विफल सब  होते नेता |
घिघ्घी-अड़गे-नाथ , फेल सब यहाँ प्रणेता |
पुरजेवाला साथ , कब्र अब  लगती खोदी |
रोए  पप्पू भाग्य , देखकर   सूरत   मोदी || 

वह दल अब क्या मिट रहा ,  ले पप्पू पहचान |
जिसमें   बूड़े    हैं जमे , फूटा  दिखे   मकान || 
फूटा  दिखे  मकान ,  पोनिया  भौंचक रहती |
पप्पी की भी नाक , नहीं अब  जनता‌  सहती |
आस बहूू की टूट , धरा  अब दिखती समतल |
रहे   खाँग्रेस  नाम ,   कभी था कोई वह दल ||
~~~~~~~~~~~~~~

चार कुंडलिया - सानिया मिर्जा के नाम 🙏

आई मिर्जा सानिया , नुचवा   पूरी   खाल |
चाँटा पड़ा तलाक का , लाल हुआ है गाल ||
लाल हुआ है गाल, सनम था  पाकिस्तानी |
अच्छा किया हलाल,समझ लो यही कहानी ||
छूट गया घर घाट , नहीं कुछ इज्जत पाई |
गई मैच सब हार , सौत जब घर में  आई ||

पाकिस्तानी  चाह   थी , जिससे  हुईं   हलाल |
गोदी में लल्लू मिला    , बदन  किया  कंगाल ||
बदन  किया  कंगाल , शेष  है  अभी  हलाला |
हो जाओ   तैयार   , कराने   मुख  को काला |
छोड़ा  भारत   देश ,     लुटाई  जहाँ   जवानी |
लेगें  आगे    खैर   ,  वहीं    के   पाकिस्तानी ||

भारत  के सम्मान का, करके  कुछ अपमान |
चली  गईं   थी पाक   में ,   जैसे  हो  तूफान  ||
जैसे  हो तूफान ,  मलिक   शोयब  ने  चूसा |
फेंका   कूड़ा दान , समझकर कचरा  भूसा ||
कह सुभाष वाचाल ,  हुई   जो आज शरारत |
मिला  तुझे परिणाम ,  छोड़कर  सुंदर भारत ||

भारत में क्यों आ रहीं , बनकर खाला जान |
वहीं हलाला ठीक है ,  रहकर   पाकिस्तान ||
रहकर पाकिस्तान ,   दूसरा  वही   मिलेगा |
करना पुन:  निकाह , तुम्हें   औलादें   देगा ||
रखो सपोला पास , झेलना सदा  हिकारत |
यहाँ कौन अब काम , चली जो आने भारत ||

सुभाष सिंघई

कुंडलिया ( राहुल जी के स्टोव ज्ञान पर )
पाया    अच्छा  ज्ञान है ,  है  ज्ञानी   महराज |
स्टोप चाहता कोयला , पता   चला  है आज ||
पता चला है आज , अक्ल को अब है खोला |
लोग करें सब   वाह , आपने  जब यह बोला ||
घासलेट को  फेंक ,    कोयला   मैं भी  लाया |
भरूँ कहाँ  यह  ढ़ेर,   आपसे  ज्ञान न  पाया || 🙏🤔

चलती  चालाकी   नहीं  , खुल जाती   है पोल |                       सत्य सदा उजला दिखे  , रहें अमर ‌ सब बोल  ||                    रहें अमर   सब  बोल  ,  धरोहर   बनके  रहते  |                  दिखलाते   शुभ  मार्ग , नहीं अपवादों   पड़ते ||                     खड़ी तमाशा दाल, कहाँ अब किसकी गलती |                   खाली   जाते  वार  ,  नहीं   चालाकी ‌  चलती || 

~~~~~


आजकल भाषण में ऐश्वर्या राय का नाच व अभिताभ के ठुमके 

भाषण में याद  करा रहे  है , उसी पर दो कुंडलिया निवेदित है भाषण  में अब चल रहे ,  ऐश्वर्या  पर  बोल  |                           ठुमका भी अभिताभ के ,रहे  मंच पर खोल ||                      रहे   मंच  पर  खोल ,  नहीं  है  बात पुरानी |                       रहकर जिनके   गेह , मात की बनी कहानी ||                            पत्तल करते  छेद , भूलते  बच्चन खा कण |                        आज उसी घर वार  , उसी पर  देते भाषण ||

 आकर इटली से यहाँ  , रहकर बच्चन गेह |                        बेटी तेजी   की   बनी  , पाया  उनसे  नेह ||                            पाया  उनसे   नेह , दान भी  कन्या लीन्हा |                        बेटी का सम्मान , हृदय   से जिसने  दीन्हा ||                        नानी  के घर   वार,  करें   मंचों   से गाकर  |                          अकल अजीरण रोग  ,बताए  कोई  आकर  || 

~~~~~

वर्तमान पर कुंडलिया

बच्चन मधुशाला  कभी , करा   गई है मेल |

दिल्ली मधुशाला सुनो , आज कराती जेल || 

आज  कराती जेल , केजरी जाते  फँसकर |

मधुशाला का केस , पकड़ती ई डी हँसकर ||

जौहर दिखा सुभाष, समझ में आया लच्छन | 

होती बहुत खराब , नहीं  क्यों   गाये बच्चन ||


मधुशाला के  फेर   में  ,   गये  केजरी जेल |

बच्चन की कविता गलत, मधुशाला से मेल ||

मधुशाला से मेल , हाथ   जब   इसमें डाला |

ई   डी आई   पास ,  डालने  लाँकप  ताला ||

झाडू  बोले  बोल   , कौन   है  सुनने   वाला |

खुद ही आई  गेह   , नशे   में  थी  मधुशाला |

( केजरी महिमा पर तीसरी ) कुंडलिया 

मधुशालाएँ     रो   रहीं ,  होली  के त्योहार |

मेरे  आका   केजरी, जेल   गये   इस बार ||

जेल गये  इस बार, मची है अब  घबराहट |

ई  डी  हुई  ‌सचेत , सभी अब लेती आहट ||

झाडू नटवरलाल ,  बताओ  किसे   ‌सुनाएँ |

जाऊँ  किसके  पास , पूछतीं  मधुशालाएँ ||

सुभाष सिंघई~~`

कुण्डलियां छंद (हास्य रस में )😂

पत्नी माँगी   ईश से , मिले  सिंघई को गाय |
लेकिन आई  सिंघनी   , सूझें   नहीं  उपाय ||
सूझें  नहीं   उपाय  , सहज  कोई   बतलाए  |
भागूँ   कितनी    दूर  , श्रीमती   जब  गुर्राए ||
नर   कहलाते  बैल , सुभाषा विनती  इतनी |
कैसे  हो  निर्वाह   , सिंघनी   है यदि   पत्नी ||🤔🤓🙏

चिमटा बेलन पूजिए  ,सुन   लीजे यह नाम |
पत्नी के  हथियार हैं , आते प्रतिदिन  काम ||
आते प्रतिदिन  काम , सदा ही रोटी बिलती  |
जब होता संग्राम , पिया की चमड़ी छिलती ||
जब भी मिले प्रसाद, लगे जग पूरा   सिमटा |
इसीलिए  हे यार   , पूजिए   बेलन   चिमटा ||🤔🙏🤓

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~

कुंडलिया

गोरी   प्रीतम   से   कहे ,   वासंती     मधुमास |

पुष्प गुच्छ मेरा हृदय    , भ्रमर   उड़ें अब पास ||

भ्रमर  उड़े   अब   पास , इशारा   साजन जाने |

भर   आया  मकरंद ,   हृदय   गोरी    के  माने ||

फागुन की मधु  रात , लगे अब  भाव   विभोरी |

सप्त   धनुष  के    रंग ,   देखती    रहती  गोरी || 


कलियाँ खिलती है हृदय,करती दिखें विकास |

गोरी   होकर  वावरी  , कहती    यह मधुमास ||

कहती   यह   मधुमास , रंग   की   हैं  बौछारें |

प्रीतम   हमसे   दूर ,   चलें  दिल पर  तलवारें ||

नहीं सजन बिन नूर , कहाँ से   फूलें  फलियाँ |

फागुन है मधुमास  , अधूरी  फिर भी  कलियाँ 


गीता कहती कर्म कर , फल  देगा  भगवान |

कर्म हीन नर जानिए , होता  मृतक  समान ||

होता मृतक समान , नहींं कुछ भी कर पाता |

चला धुवाँ  में लठ्ठ , सदा ही  भ्रम   फैलाता || 

ऐसा   नर  बेकार , जगत   में   रहता   रीता |

इसीलिए कर  कर्म , कृष्ण की कहती गीता || 

~~~`

वाचक कथा प्रदीप की  , सबने  रगड़ी ‌‌ नाक   | 

पर राहुल के व्यान से, किसका दिल है चाक  ||

किसका दिल  है चाक , सरासर सुनकर गाली | 

सँग में वह भी   लोग,  जिन्होने  पीटी  ताली || 

हिंसा   हिंदू   जोड़ ,  बताया   नफरत  लायक |

संसद में  था  व्यान ,  जहाँ  राहुल  थे  वाचक || 


हाथ नहीं चूड़ी चढ़ी,  रहे सभी यह  देख  |

बालों में   सिंदूर की , कभी  न देखी रेख ||

कभी न देखी रेख , ‌सूत्र कब मंगल पहिना |

कहे हिंदु मैं नारि , सभी की लगती बहिना ||

ईसाई   से   व्याह ,   बनी  है   गांधी  बूड़ी |

समझाए अब कौन , कहाँ है‌ सधवा चूड़ी ||


दादा दफ्न जमीन में  , जिनकी  बनी मजार |

माँ  ईसाई कोख से  , लिया  जन्म सुखकार  ||

लिया जन्म सुखकार , पहेली  समझ न आई |

कैसे    दत्तात्रेय ,      गौत्र    का   ठप्पा भाई || 

बहिना  करती व्याह  , करे क्रिस्चिन से वादा  | 

रह जाते  चुपचाप   , नाम जब आता   दादा  ||



रोला छंद ( वर्तमान के हालात पर )

वह  माने   साहित्य , पढ़ें जो आकर  मंचों |
कवियत्री  लालित्य ,  लपेटें मधुर   प्रपंचों ||
कहें  सुनो   शृंगार ,  विदूषक   जैसी  बातें |
वर्तमान  साहित्य , सहे  अब  इनकी‌ घातें ||

सिर को धुनती आज , मंच पर बैठी कविता |
कहाँ गये रस छंद , और शुभ लगती सविता ||
दिखें चुटकुले बाज , जिन्हें सब  श्रोता ‌सहते |
फूहड़ प्रस्तुत हास्य , ठिठोली कविगण करते ||

सूर और रसखान    , किताबों  में अब दिखते |
मीरा   तुलसीदास ,   जायसी   लगते छिपते ||
महादेवी    श्री   पंत , भूलकर  आज निराला |
फिल्मी धुन की तर्ज ,गीत  कवि गाता आला ||

दोहा लिखते लोग   , और जो रचते  रोला |
लिखें सभी जो  छंद, दिखे वह होता भोला  || 
इनको सुनता कौन , मंच   पर बस बिठलाते |
पढ़े   विदूषक   खूब,   वाह   इनसे करवाते ||

सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र०


कुंडलियाँ , हिंदी दिवस पर 

हिंदी हम  सब  मानते, हिंदी सबकी शान | 
अंग्रेजी  के  सामने ,   हिंदी का अपमान || 
हिंदी का अपमान, कार्य हों जब सरकारी |
अंग्रेजी  में   काज ,   लगे  हिंदी  बेचारी ||
भारत की सरताज , करें  पर भाषा चिंदी |
एक दिवस सम्मान, शेष दिन चुप है हिंदी ||

हिंदी   का  झंडा  रहे  ,  अपने  हिंदुस्तान |       
और सदा सम्मान दें  ,करके अभियुत्थान ||
करके अभियुत्थान , राष्ट्र की है यह भाषा |
करे हृदय में वास , रखें यह  सबसे आशा ||
विनती करें 'सुभाष' , भाल पर शोभे बिंदी |
भारत माँ सम्मान , रहे    बस अपनी हिंदी ||

पढ़ने  वाले  सो  गए , कलम रही  है  जाग |                  
कविता‌  की  चिन्ता करे, रखे   देश अनुराग ||                    
रखे देश अनुराग , नजर है कवि की त्राटक |      
हिंदी से   बर्ताव ,      देखता  रहता नाटक ||
शासकीय सब काम , राह दे  सकते  बढ़ने |
पर जो लिखता बात,किसे है फुरसत पढ़ने ||

देखा है साहित्य में  , मन  जब  भरे उड़ान |
माता शारद भी वहाँ ,   देती  सबको ज्ञान  ||
देती‌ उसको ज्ञान , विषय वह उम्दा रखता |
हिंदी का साहित्य , तथ्य को ज्ञानी चखता || 
है 'सुभाष' संज्ञान , सभी कुछ रखता लेखा |
लिखता कवि अरमान,सृजन‌ में हमने देखा ||

हिन्दी भी अब क्या करे, कौन सुनेगा  माँग |              
कुछ ज्ञानी अब तोड़ते, हिन्दी की ही  टाँग ||                    
हिन्दी की  ही  टाँग, सभी अब "गुरू" बनाते | 
हटा रंग अनु स्वार,लिखा"रँग"हम अब पाते ||
लिखते   हैं "भन्डार"  हटाते  णस्वर   बिंदी |
शिक्षक अब'मास्साब',दशा यह कैसी हिन्दी ||

हिंदी कविता को मिले, अजब तरह की खार|               
चार  जमूरे  पालकर  ,   झगड़े  को  तैयार||                     
झगड़े    को  तैयार , छंद  सब  चीख रहे हैं|              
तोड़ें  उनकी   टाँग ,  जमूरे   सीख  रहे  हैं||                    
किसको दें अब दोष, कहाँ पर खोजे सविता|             
दिशा हीन जब राह, चले कब हिंदी कविता|| 

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

देवजागरण एकादशी पर विशेष 
माला के गुरिया ( शिव- हरि- ब्रह्मा संवाद आनंद  ) 

गुरिया गिनकर जब भजन,करते दिखे सुजान |    
महादेव हरि   से   कहें ,   भक्त   बड़े   नादान ||
भक्त  बड़े  नादान ,   आपको   कैसे    जपते  |
गिनकर  लेते नाम ,  सदा  गुरियों   से भजते  ||
हरि देते मुस्कान , कहें   यह   सुनो   नजरिया |
इनके  कारण बाग ,    बनें   हैं   पूरे    गुरिया ||

   गुरिया में  अब घूमता ,  गुरिया  मेरे   बाग |
    महादेव से हरि कहें ,   पावन भाव  पराग ||
   पावन भाव पराग , रोज हम जाकर चखते |
    रखें भक्त सब ध्यान,घुमाना निश्चित रखते ||
   शिव कहते कैलाश , रहूँ  मैं एक  टपरिया |
आप घूमते बाग  , भक्त के सुंदर  गुरिया || 

बाबा ब्रह्मा आ गए , सुन  गुरिया   की बात |
कहें शिवा से आप तो , रखते खुद सौगात ||
रखते खुद  सौगात  ,पहनते   गुरिया   रुद्रा |
जिसमें विष्णु प्रवेश , आपकी   रहती  मुद्रा ||
मुझसे   गुरिया  दूर , हाथ बस छोटी आबा |
हँसते विष्णु महेश ,   साथ में  ब्रह्मा बाबा ||  
   सुभाष सिंघई

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