https://subhashsinghai.blogspot.com/जय माँ शारदे (कुंडलिया कुंड)
रजधानी है ओरछा , कैतइ सबरै धाम ||
कैतइ सबरै धाम, गणेशी बाई रानी |
गईं अयोध्या दौर , राम खौं ल्याकै मानी ||
निगीं पुष्प नक्षत्र , किसायैं सब अलबेली |
ल्याये थे श्रीराम , सबइ जुरकै बुंदेली ||
(रइयत =प्रजा)
बिटियन के हर व्याह में , आतइ है हरदौल |
भानेजन खौं भात दें, रखत बहिन कौ कौल ||
रखत बहिन कौ कौल , देखतइ ठाठ दिमानी |
सुफल हौत सब काज , बात ये पंचन जानी ||
बुंदेली दै न्यौत , अशीषें माँगें पिटियन |
लाला जू है आत , भात खौ बाँटन बिटियन ||
सुभाष सिंघई
शंकर जी किरपा करत , रत कुंडेश्वर धाम |
कूँड़े से भयते प्रकट, धरै रूप थे श्याम ||
धरै रूप थे श्याम , धान मूसर से कूटा |
धन्ती बाइ खटीक, खून खौं तकबै छूटा ||
जुरै उतै सब लोग , हटाऔ कचरा कंकर |
कूँड़ों बन गव कुंड , प्रकट थे भोले शंकर ||
लेखें बाणासुर सुता , ऊषा जीकौ नाम |
वह कुंडेश्वर धाम में , करतइ रोज प्रणाम ||
करतइ रोज प्रणाम , अबै भी अतिशय खिलता |
भुंसारे अभिषेक , किया ही सबको मिलता ||
गैराई पाताल , ऊँचाई बढ़तइ देखें |
चाँउर बनतइ नाप , साल दर सालों लेखें || ~~~~~~~~~~~~~~
ले देकर कुल तीन है ,बस उनके ही पास |
पप्पू बेटी माँ सुनो , तीनो खासम खास ||
तीनो खासमखास , शिकंजा दल पर कसते |
अद्भुत जिनका गान , सभी अब सुनकर हँसते ||
लेकर बापू छाप , बने है दल के मेकर |
चल जाता है काम , "सुभाषा" बस ले देकर ||
कविता का मन साफ है , जब भी बोले बोल | लगती आभा- सी सदा , किरणें सब अनमोल || किरणें सब अनमोल , प्रखरता सदा दिखाती | किसका कैसा रूप , आइना बनकर आती || कविता से ही आज , सत्य की दिखती सविता | कवि के उजले भाव , आज भी पावन कविता ||
, गुरुघंटालों को भी नमन 🙏
पहले उनको भी नमन , जो है गुरुघंटाल |
माया फैला देश में , हड़प रहे है माल ||
हड़प रहे है माल , सभी को मूर्ख बनाते |
चमचा चेला पाल , कथाएँ नई सुनाते ||
कहता यहाँ सुभाष, हारते नहले दहले |
स्थापित गुरुघंटाल , नमन अब उनको पहले ||
सुभाष सिंघई
आबादी विस्फोट पर, सूझा एक उपाय |
जनता से भी पूछता ,क्या है उनकी राय ||
क्या है उनकी राय , रहें दो तब सरकारी |
इसके आगे तीन , स्वयं की जिम्मेदारी ||
सरकारी अनुदान , बंद हो सब आजादी |
नही किया सहयोग , घटाने जब आबादी ||
आया था दामाद जब ,अपनी निज ससुराल |
आवभगत की सास ने, पूछा घर का हाल ||
पूछा घर का हाल , कहा यह गेह तुम्हारा |
इसको अपना जान ,समझना निज का सारा ||
जगी सास जब भोर , काम पर उसको पाया |
भोला था दामाद , लगाकर झाड़ू आया ||😂🙏
आया कैसा वक्त है , लोक तंत्र में आज |
राष्ट्रपति सम्मान की , छेड़ रहे हैं लाज ||
छेड़ रहे हैं लाज , छोड़ते सब मर्यादा |
कटुता की यह खार,देखते हम सब ज्यादा ||
संविधान सौगंध , उठाते जिनको पाया |
करें प्रमुख पर घात , वक्त यह कैसा आया ||
झूला टूटे नेह के , चकरी करते झूल |
रस जितने थे प्रेम के , गए सभी है भूल ||
गए सभी है भूल , देखते दुनियादारी |
बोले कटुता बोल , भूल मर्यादा सारी ||
यत्र-तत्र भी आज,बीज कटुता का फूला |
लगी प्रेम की डोर, नहीं अब ऐसा झूला ||
पूनी हों जब शारदा , आशीषें बरसात ||
लक्ष्मी जी ऊनी रहें , बढ़नें को अकुलात ||
बढ़ने को अकुलात, करें खुद अनुभव प्रानी |
नहीं थोपता बात , बना मैं कोई ज्ञानी ||
निज का अनुभव भान, तिजोड़ी रही न सूनी |
यथा योग्य सम्मान , रखा जब ऊनी पूनी ||
कविता से अंजान हूँ , मैं हूँ लक्ष्मी पुत्र |
मौसी मेरी शारदे , रिश्ता रखूँ पवित्र ||
रिश्ता रखूँ पवित्र , चाह से रिश्ता पाला |
रखता श्रद्धा भाव , छंद से जपता माला ||
बतलाती है सार , शारदे देती सविता |
होकर लक्ष्मी पुत्र , लिखें हम यारो कविता ||
छंदों को समझा रहे, पटलों पर उस्ताद | हिंदी इनसे किस तरह, होगी अब आबाद || होगी अब आबाद , सूत्र भी याद नहीं है | फिर भी रहे दहाड़ , गलत को कहें सही है || रहता मौन सुभाष , कहें क्या हम बंदो को | उर्दू के उस्ताद , मिले हिंदी छंदो को ||
हिंदी भी अब क्या करे , कौन सुनेगा माँग | कुछ ज्ञानी अब तोड़ते , कलम धार से टाँग || कलम धार से टाँग , रबड़-सी खेंचा तानी | करते तोड़ मरोड़ , शब्द पर अब मनमानी || करता विनय सुभाष , करो मत आकर चिंदी | छेड़छाड़ का काज , नहीं अब कीजे हिंदी ||
हिंदी हम सब मानते, हिंदी मेरी शान | हिंदी का परचम रहे , हिंदी हिंदुस्तान | हिंदी हिंदुस्तान , हिंद में हिंदी जलवा | पर करते कुछ लोग, सदा हिंदी को अगवा || हिंदी है सरताज , नहीं हो सकती चिंदीं | विश्व दिवस सम्मान , आज भी पाती हिंदी ||
पढ़ने वाले सो गए , कवि रहा है जाग | कविता पढ़ता कौन है , किसको इससे राग || किसको इससे राग, नजर कवि की त्राटक | धन्यवाद आभार , सभी करने को नाटक || रचता है साहित्य, कदम भी रखता बढ़ने | पर जो लिखता बात, किसे अब फुरसत पढ़ने ||🙏
कविता से देने लगे, अजब तरह की खार | चार जमूरे साथ में , झगड़े को तैयार || झगड़े को तैयार , छंद सब चीख रहे है | तोड़े हिंदी टाँग , जमूरे सीख रहे है || किसको दे अब दोष , कहाँ पर खोजे सविता | दिशा हीन जब राह, चले जब कवि की कविता ||
अखरी मेरी बात है , अखर गए हम आज | खतना छंदों की हुई , खोला जब है राज || खोला जब है राज , फारसी से समझाते | हिंदी के आचार्य , फाइलुन फैलुन लाते || गण हिंदी के भूल, करें अरकानों शहरी | तब तो तुम उस्ताद, बात सच मेरी अखरी ||
करनी अपनी देखना , फिर करना तुम टोक |
अच्छी है यदि आपकी, कर सकते हो रोक ||
कर सकते हो रोक , आपकी बातें मानें |
सही नेक इंसान , जगत भी तुमको जानें ||
रखते हो यदि पोल , पडे़गी उल्टी भरनी |
रहना तब चुपचाप , सुधारो अपनी करनी ||
शिक्षा मेरे पास है , डिग्री का अम्बार |
लिखता सिर्फ सुभाष हूँ ,पाने सबका प्यार ||
पाने सबका प्यार , नेह. भी सबको देता |
नहीं रखूँ मैं चाह , बनू छंदों का नेता ||
करूँ शारदे गान , उन्हीं से माँगू भिक्षा |
रहवे दूर गुरूर , सदा हो अच्छी शिक्षा ||
मैं मैं तू तू हो रही , लेकर कोई बात |
शब्द बने तलवार है, देने को प्रतिघात ||
देने को प्रतिघात , निरर्थक समय गवाँते |
रोकें नहीं प्रवाह,नया सब क्यो झुठलाते ||
रुके कभी मत वेग , बना लो कितने खेमैं |
जगत सदा गति शील , करो मत तू तू मैं मैं ||
रहते किस घर शेर है, किस घर रहते श्वान |
भौं-भौं और दहाड़ से , हो जाती पहचान ||
हो जाती पहचान , श्वान ही पूँछ हिलाते |
करते शेर दहाड़ , सभी को खूब सुनाते ||
जहाँ नकलची स्वाँग, स्वयं को असली कहते |
उस दर से लें भाग, असलची जिस घर रहते ||
~~~~~~
कुंडलिया निवेदित है
कीड़े खाकर छिपकली , छिपी राम तस्वीर |
वहाँ बैठ वह सोचती , बदलेगी तकदीर ||
बदलेगी तकदीर , आज का मानव देखा |
करके बहुत अनीति, द्रव्य का करता लेखा ||
पर दे जाता दान , धर्म के मंचों आकर |
क्या कट जाए पाप , चले जो कीड़े खाकर ||?(1)
टूटे रिश्ते जोड़ने , पहुँच गए शमशान |
हाथ जोड़ कहने लगे , मिले क्षमा का दान ||
मिले क्षमा का दान , निकट मुरदे के आया |
लिपटा शव से खूब, अश्रु भी बहुत बहाया ||
करता प्रश्न सुभाष , बैर के कब घट फूटे |
मुरदे को दे मान , जुड़े क्या रिश्ते टूटे ||? (2)
जूते अब शोरूम में , बिकती सड़क किताब |
मिलता दूध उधार है , आती नकद शराब ||
आती नगद शराब , श्वान अब पाले जाते |
आवारा है गाय , गीत गधों के गाते ||
भूखा दिखे किसान , खोजता है बलबूते |
लगे न कुछ भी हाथ , घूमकर घिसता जूते || (3)
सदा सहारे के यहाँ , जग में चलें न काम |
सभी सहारों में छिपे , पालन हारे श्याम ||
पालन हारे श्याम , लोग क्यों भ्रम को रखते |
हम पालें घरवार , हमारा दाना चखते ||
मिलते सबको खूब , मदद के यहाँ किनारे |
रहते सबके राम , श्याम जी सदा सहारे ||(4)
कहते ज्ञानी जानिए , दिन हैं केवल सात |
सोमवार से रवि गिनो , समझो मेरी बात ||
समझों मेरी बात , इन्हीं में जीवन सिमटा |
जन्म मरण के कर्म , धरम भी आकर लिपटा ||
इन्हीं दिनों में रार , प्यार भी सम्मुख रहते |
समय न हो बेकार , सभी यह ज्ञानी कहते ||(5)
कहता अनुभव चुप रहो , याद रखो बस राम |
सदा रुलाने के लिए , अपने करते काम ||
अपने करते काम , दंश भी वहाँ चुभाते |
दवा लगे बेकार , सभी परिजन अकुलाते ||
रिश्तों की रख आन, गुणीजन सब कुछ सहता |
समझे ईश्वर लेख , नहीं दूजों से कहता ||(6)
ताकत पर बंधन रहे , देने चाल -विराम |
हाथी पर अंकुश चले , घोड़ा डले लगाम ||
घोड़ा डले लगाम , जहाँ पर छुट्टा प्राणी |
मनमानी का राज , रखे कर्कष वह वाणी ||
जंगल राजा शेर, कभी खुद लाता शामत ||
जिस पर नहीं लगाम , व्यर्थ में खोता ताकत ||(7)
पढ़ता रहता है पिता, निज बेटे का चाव |
माँ बेटी की आँख के, पढ़ती पूरे भाव ||
पढ़ती पूरे भाव , नहीं कुछ पीछे छिपता |
चाल ढाल संज्ञान , सभी माँ को है दिखता ||
जहाँ पिता का रंग , पुत्र पर आकर चढ़ता |
कैसा क्या है हाल, जमाना पूरा पढ़ता ||(8)
बासी कढ़ी उबाल पर , जब दिखलाती रूप |
ढक्कन के नीचे रहे , दिखे सड़न विद्रूप ||
दिखे सड़न विद्रूप , कहे मैं सबसे आला |
आओ मेरे पास , सभी की मैं हूँ खाला ||
कहें गुणीजन देख, हुई है सत्यानासी |
है अब बदबूदार , कढ़ी यह पूरी बासी || (9)
डसकर कहते सभ्य हम, आज देश में साँप |
मैं अच्छा दूजे बुरे , नेता भरते हाँप ||
नेता भरते हाँप , लगे हैं छल के मेले |
नाग बेंचते दूध , खोलकर नए तबेले ||
कैसे बचें 'सुभाष' ,खम्ब को पकड़ें कसकर |
नेताओं को छूट, मिली है आना डसकर || (10)
झगड़ा झंझट झूठ सब, झुँझलाना भी छोड़ |
जहाँ झमेला झाड़ हैं , बिना झेंप दो तोड़ ||
बिना झेंप दो तोड़ , जहाँ हो झिकझिक झंडा |
झुठलाओ सब दर्प , बनो मत आकर पंडा ||
झगड़ालू जो झुंड , सामने करते रगड़ा |
नष्ट करों सब झट्ट , सभी से झंझट झगड़ा ||( 11)
आँखें भेंगी हैं कहाँ, काणें करें बखान |
दूजों पर तत्पर रहें , करने को अपमान ||
करने को अपमान , नाक निज खूब फुलाते |
करते कुढ़कर वार , गाल भी वहाँ बजाते ||
बाँटे हरदम खार , उड़ाए कटुता पाँखें |
रहें खोजते चूक , गड़ाए काणें आँखें ||(12)
झूठा जीते इसलिए , सच रहता है मौन |
सभी सोचते दे समय , इनसे उलझे कौन ||
इनसे उलझे कौन , कुतर्की सम्मुख आते |
करते सदा प्रलाप, सत्य को वह झुठलाते ||
अब यह है कलिकाल, आदमी खुद से रूठा |
सत़्य माँगता न्याय , फैसला करता झूठा || (13)
नारी के सिर ओढ़नी , लगे मोरनी बाग |
बिखरे केश सियारनी, रखे जलन की आग ||
रखे जलन की आग , नैन को है मटकाती |
वहीं मोरनी लाज , थामकर चलती जाती ||
रूप रंग शृंगार , देह भी सब मनुहारी |
पर रखती है लाज , ओढ़कर सिर पर नारी ||(14)
हास्य व्यंग्य कुंडलिया
कुत्ते आकर द्वार पर , करें जोर से भौंक |
कहते वापिस व्यान लो ,गया तभी में चौंक ||
गया तभी मैं चौंक, कहें सब धूमिल सुषमा |
नेता-श्वान समान , आपने क्यों दी उपमा ||
लेकर नेता वोट , सदा ही देते बुत्ते |
पर हम तलवें चाट , वफा को जाने कुत्ते ||(15)
पापी करता पाप है , खोटे करता कर्म |
पर लेता वह आड़ है, जिसको कहते धर्म ||
जिसको कहते धर्म , मंच पर पहने माला |
मिले दान से मान , स्वयं को समझे आला ||
नहीं मिले पर चैन , रहे वस आधाधापी |
कहता कवि "सुभाष",कहाँ सुख पाता पापी ||16)
परिभाषा मत पाप की , कहीं खोजिए आप |
और नहीं बतलाइए , यहाँ उठी है थाप ||
यहाँ उठी है थाप , पाप भी कब है छिपता |
लाख छिपाते लोग,एक दिन सबको दिखता ||
कहता कवि " सुभाष",सदा ही रखना आशा |
जहाँ सत्य हो दर्श, बोलती खुद परिभाषा ||(17)
दिखता हमको ज्ञान है , चले गधे अब लाद |
करते निजी विवेचना, जो मन में ईजाद ||
जो मन में ईजाद , स्वयं को माने ज्ञानी |
करता रहे प्रलाप , झूठ का पीकर पानी ||
देखा हाल 'सुभाष', सत्य कटु को है लिखता |
करना मुझको माफ , लिखूँ मैं जो भी दिखता ||( 18)
ज्ञानी अब हम देखते , देते गजब प्रमाण |
करते सदा कुतर्क है ,गलत चलाते बाण ||
गलत चलाते बाण , बने है सबके आका |
अपना कहते सत्य, बनाते जो भी खाका ||
देखे इन्हें 'सुभाष' , सोचता कैसी नादानी |
घायल सब गुणवान , झूठ अब सच्चा ज्ञानी || (19)
देखा है साहित्य में , मन जब भरे उड़ान |
माता शारद भी वहाँ , देती उसको ज्ञान ||
देती उसको ज्ञान , विषय वह उम्दा रखता |
सार कहे साहित्य , तथ्य को ज्ञानी चखता ||
है 'सुभाष' संज्ञान , सभी कुछ रखता लेखा |
लिखता कवि अरमान , सृजन में हमने देखा || (20)
रोते यहाँ गरीब है , सँग में दिखें अमीर |
दोनों को रहती सदा ,बस पैसे की पीर ||
बस पैसे की पीर , जोड़ना पैसा रहता |
खर्चे पर हो दर्द ,सदा वह पैसा कहता ||
पैसा होता शान , हृदय में इसको ढोते |
है मंजर चहुँ ओर , सभी पैसे को रोते ||(21)
कीड़े नफ़रत के भरे , उगलें मेरे देश |
बेर छुहाँरे बन गए , राजनीति परिवेश ||
राजनीति परिवेश, मिली उनको आजादी |
कुर्सी का संग्राम , लड़़ा है पहने खादी ||
बदला नहीं स्वभाव , अभी भी लगते सीड़े |
खट्टापन है साथ , छोड़ते नफ़रत कीड़े ||(22)
कलियाँ खिलती है हृदय,करती दिखें विकास |
गोरी होकर वावरी , कहती यह मधुमास ||
कहती यह मधुमास , रंग की हैं बौछारें |
प्रीतम हमसे दूर , चलें दिल पर तलवारें ||
नहीं सजन बिन नूर , कहाँ से फूलें फलियाँ |
फागुन है मधुमास , अधूरी फिर भी कलियाँ (23)
कुण्डलियां छंद (हास्य रस में )
पत्नी माँगी ईश से , मिले सिंघई को गाय |
लेकिन आई सिंघनी , सूझें नहीं उपाय ||
सूझें नहीं उपाय , सहज कोई बतलाए |
भागूँ कितनी दूर , श्रीमती जब गुर्राए ||
नर कहलाते बैल , सुभाषा विनती इतनी |
कैसे हो निर्वाह , सिंघनी है यदि पत्नी ||🤔🤓🙏(24)
~~~~
रंगत रूप सुगंध है , पर चम्पा में दाग |
ताना सहती बाँझ का , रखती नहीं पराग ||
रखती नहीं पराग , पास भी भ्रमर न आता |
कह देता रसहीन , मारकर ताना जाता ||
अनुभव करे 'सुभाष',जहाँ है रस की संगत |
सब लेते है भाग, महकती महफिल रंगत ||5
झूठा जीते इसलिए , सच रहता है मौन |
सभी सोचते दे समय , इनसे उलझे कौन ||
इनसे उलझे कौन , कुतर्की बनकर आते |
करते सदा प्रलाप, सत्य को वह झुठलाते ||
अब यह है कलिकाल, आदमी खुद से रूठा |
सत़्य माँगता न्याय , फैसला करता झूठा || 8
नारी के सिर ओढ़नी , लगे मोरनी बाग |
बिखरे केश सियारनी, रखे जलन की आग ||
रखे जलन की आग , नैन को है मटकाती |
वहीं मोरनी लाज , थामकर चलती जाती ||
रूप रंग शृंगार , देह भी सब मनुहारी |
पर रखती है लाज , ओढ़कर सिर पर नारी ||9
हास्य व्यंग्य कुंडलिया
कुत्ते आकर द्वार पर , करें जोर से भौंक |
कहते वापिस व्यान लो ,गया तभी में चौंक ||
गया तभी मैं चौंक, कहें सब धूमिल सुषमा |
नेता-श्वान समान , आपने क्यों दी उपमा ||
लेकर नेता वोट , सदा ही देते बुत्ते |
पर हम तलवें चाट , वफा को जाने कुत्ते ||10
पापी करता पाप है , खोटे करता कर्म |
पर लेता वह आड़ है, जिसको कहते धर्म ||
जिसको कहते धर्म , मंच पर पहने माला |
मिले दान से मान , स्वयं को समझे आला ||
नहीं मिले पर चैन , रहे वस आधाधापी |
कहता कवि "सुभाष",कहाँ सुख पाता पापी ||11
परिभाषा मत पाप की , कहीं खोजिए आप |
और नहीं बतलाइए , यहाँ उठी है थाप ||
यहाँ उठी है थाप , पाप भी कब है छिपता |
लाख छिपाते लोग,एक दिन सबको दिखता ||
कहता कवि " सुभाष",सदा ही रखना आशा |
जहाँ सत्य हो दर्श, बोलती खुद परिभाषा ||12
दिखता हमको ज्ञान है , चले गधे अब लाद |
करते निजी विवेचना, जो मन में ईजाद ||
जो मन में ईजाद , कौन अब पुस्तक पढ़ता |
लाँघें गधा पहाड़ , वहीं पर मानव चढ़ता ||
देखा हाल 'सुभाष', सत्य कटु को है लिखता |
करना मुझको माफ , लिखूँ मैं जो भी दिखता || 13
ज्ञानी अब गर्दभ बने , देते गजब प्रमाण |
करते सदा कुतर्क है ,गलत चलाते बाण ||
गलत चलाते बाण , बने है सबके आका |
अपना कहते सत्य, बनाते जो भी खाका ||
देखे इन्हें 'सुभाष' , सोचता कैसी नादानी |
घायल सब गुणवान , गधे है सच्चे ज्ञानी || 14
आया पर्व महान था , रामराज गणतंत्र |
लला विराजे गेह में , सुरभित गूँजे मंत्र ||
सुरभित गूँजे मंत्र , दिशाएँ हर्षित थी सब ||
रामराज साकार , इबारत लिखती थी तब ||
सनातनी परिवेश , तिरंगा नभ में छाया |
लगता वहाँ सुभाष ,राम का युग था आया || 15
जग में शिव ही सत्य शुभ, परम ब्रम्ह हैं ज्ञान |
करते सब आराधना , पाते शुभ वरदान ||
पाते शुभ वरदान , नाम ले हम सब जीते |
संसारी संताप , सभी का शिव जी पीते ||
हम संसारी भक्त , सहारा पाते मग में |
शिव स्वरूप आकार, सभी को दिखता जग में ||16
शंकर जी का ब्याह शुभ , पार्वती के साथ |
बनी महाशिवरात्रि है , करने पीले हाथ ||
करने पीले हाथ , यही दिन शुभ ही मानें |
अच्छा लगे मुहूर्त , दान कन्या का जानें ||
कहता यहाँ सुभाष ,अक्ल है मेरी कंकर |
पर जाने दिन खास, उमा परिणय शिव शंकर || 17
देखा है साहित्य में , मन जब भरे उड़ान |
माता शारद भी वहाँ , देती उसको ज्ञान ||
देती उसको ज्ञान , विषय वह उम्दा रखता |
सार कहे साहित्य , तथ्य को ज्ञानी चखता ||
है 'सुभाष' संज्ञान , सभी कुछ रखता लेखा |
लिखता कवि अरमान , सृजन में हमने देखा || 18
रोते यहाँ गरीब है , सँग में दिखें अमीर |
दोनों को रहती सदा ,बस पैसे की पीर ||
बस पैसे की पीर , जोड़ना पैसा रहता |
खर्चे पर हो दर्द ,सदा वह पैसा कहता ||
पैसा होता शान , हृदय में इसको ढोते |
है मंजर चहुँ ओर , सभी पैसे को रोते ||19
कीड़े नफ़रत के भरे , उगलें मेरे देश |
बेर छुहाँरे बन गए , राजनीति परिवेश ||
राजनीति परिवेश, मिली उनको आजादी |
कुर्सी का संग्राम , लड़़ा है पहने खादी ||
बदला नहीं स्वभाव , अभी भी लगते सीड़े |
खट्टापन है साथ , छोड़ते नफ़रत कीड़े ||20
~~~
जूठन के मिष्ठान भी , कौन बाँटता आज |
कुत्ते ही वस भौंककर , करें चाटकर काज ||
करें चाटकर काज , सफाया पूरा करते |
जैसे नेता देश , पचाने लड़ते - मरते ||
सोचे यहाँ "सुभाष", मची रहती है रूठन |
मिल जाए कुछ माल,भले हो वह भी जूठन ||
मोदी-नड्डा-शाह की , तिकड़ी करे कमाल |
पप्पू पप्पी पोनिया , दिखते यहाँ सवाल ||
दिखते यहाँ सवाल,विफल सब होते नेता |
घिघ्घी-अड़गे-नाथ , फेल सब यहाँ प्रणेता |
पुरजेवाला साथ , कब्र अब लगती खोदी |
रोए पप्पू भाग्य , देखकर सूरत मोदी ||
वह दल अब क्या मिट रहा , ले पप्पू पहचान |
जिसमें बूड़े हैं जमे , फूटा दिखे मकान ||
फूटा दिखे मकान , पोनिया भौंचक रहती |
पप्पी की भी नाक , नहीं अब जनता सहती |
आस बहूू की टूट , धरा अब दिखती समतल |
रहा खाँग्रेस नाम , कभी था कोई वह दल ||
सभी शिकारी मिल कहें , करने चलो शिकार |
पर मोदी के सामने , सब लगते लाचार ||
सब लगते लाचार , बँधेगी कैसे घंटी |
पप्पू देता ताल , दिखे पर खाली अंटी ||
मैडम करें विचार , बनारस सीट निहारी |
कैसे चलते तीर , भूलते सभी शिकारी ||
आँखें भेंगी हैं कहाँ, काणें करें बखान |
मोदी जी को देखकर , बनती नाक कमान ||
बनती नाक कमान , फूलकर होती चपटी |
ठगवंधन का खेल , खेलने आए कपटी ||
जनता की आबाज , हृदय में मोदी राखें |
काणें करते रार , खुली जनता की आँखें ||
~~~~~
छाई खुशी अपार है , मिला राम का नेह |
जन्म भूमि पर जा रहे , आप पधारे गेह ||
आप पधारे गेह , किन्तु कुछ ने ठुकराया |
कहलाया दुर्भाग्य, जिन्हें कुछ समझ न आया ||
निजी पैर पर वार , खोपड़ी है चकराई |
आगे बंटाधार ,अक्ल में कालिख छाई ||
फूफाओं को देखिए , साथ जरा अंदाज |
नहीं अयोध्या जा रहे ,जहाँ राम का काज ||
जहाँ राम का काज , वहाँ जो होगी पूजा |
फूफा जी की पूँछ , दिखेगी सबको चूजा ||
चुभती तिथि बाईस ,आज श्री आकाओं को |
लगती घर में खैर , आजकल फूफाओं को ||🤑🙏
चम्पा फूला बाइ में , तकत सबइ हैं दाग |
कात बाँझ ठाटौ उयै , तौमें नँईं पराग ||
तौमें नँईं पराग , लिगाँ ना भौरा आता |
कै देतइ रसहीन , उरानौं भी भिजवाता ||
खुश्बू साजौ रूप , लगै पर यैडी लम्पा |
सुनकै सिसकै खूब , बाइ जी फूला चम्पा ||
कुंडलिया ( श्री राम लला जू की ही तरफ से निमंत्रण )
छाईं खुशियाँ हैं रगड़, कात राम रख नेह |
आऔ अब सबई जनै , धाम अजुदया गेह ||
धाम अजुदया गेह , बँटे है पीरे चाँवल |
सबरै जुर कैं लोग ,दैंय सब मैया आँचल ||
अभी लला हम राम , बधाईं सबकी पाईं |
है दिनांक बाईस रगड़ कै खुशियाँ छाईं ||
ठंडा मौसम जब बने , शीत लहर का जोर |
जल की बूँदें गिर कहें , मावठ का है शोर ||
मावठ का है शोर , रजाई लगती प्यारी |
करती घर के काम , काँपती थर-थर नारी ||
जलते खूब अलाव , ताप दें लकड़ी कंडा |
रहें सजन सब गेह , देखकर मौसम ठंडा ||
वेेलेंटाइन था दिवस , खुश थे फूल गुलाब |
देखूँ सबकी प्रेमिका,किसका कहाँ हिसाब ||
किसका कहाँ हिसाब,अधर मैं चूमूँ सबके |
छूकर सबके गाल , मजे हैं न्यारे तब के ||
था गुलाब तैयार , प्यार में आई साइन |
किस्मत का दिन खास , मानता वेलेंटाइन ||
~~~~~~~~~~~
आदरणीय श्री त्रिलोक सिंह जी ठकुरेला द्वारा सम्पादित ~
समकालीन कुंडलिया शतक पढ़कर भावोद्गार 🌹
ठकुरेला कविराय को , जाने हिंदुस्तान |
कुंडलिया शुभ छंद का , बहुत किया उत्थान ||
बहुत किया उत्थान , लेखकों को पहचाना |
सम्पादित साहित्य , सदा ही लगा सुहाना ||
कृति है समकालीन ,शतक कवियों का मेला |
कुंडलिया सब श्रेष्ठ ,चयन करते ठकुरेला ||
दिखते हैं साहित्य में , ठकुरेला जी नूर |
श्री त्रिलोक जी नाम शुभ , भावों से भरपूर ||
भावों से भरपूर , हृदय से सब स्वीकारें |
सम्पादन के शब्द , आपका सृजन निहारें ||
कुंडलिया एकत्र , शतक कविगण है लिखते |
पुस्तक समकालीन , समाहित लेखक दिखते ||
सुभाष सिंघई ~
~~~~~
आदरणीय श्री बिपिन पाण्डेय सर जी द्वारा सम्पादित ~
इक्सीसवीं सदी की कुंडलियाँ पढ़कर भावोद्गार 🌹
कुंडलियाँ इक्कीसवीं , सदी ; देखकर हर्ष |
बिपिन पाण्डेय जी सदा , हम सबके आदर्श ||
हम सबके आदर्श , सदी के कविगण जोड़े ||
सम्पादन अधिभार , सृजन सब श्रेष्ठ निचोड़े ||
समुचित कवि सम्मान , खिली सबकी मनकलियाँ
है "सुभाष" की राय , धरोहर सब कुंडलियाँ ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
श्वेतवर्णा प्रकाशन और आदरणीय श्री
राहुल शिवाय जी का हार्दिक अभिनंदन
व श्वेतवर्णा प्रकाशन को हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹
श्री राहुल के साथ में , है शिवाय शुभ नाम |
दिखे श्वेतवर्णा शुभम् , करे प्रकाशन काम ||
करे प्रकाशन काम , कहें तो यह है कैसा |
हिंदी अभियुत्थान , शारदे पूजन जैसा ||
पढ़े सभी साहित्य , हृदय हो सदा निराकुल |
पावन बने विचार , सोच यह रखते राहुल ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मंडलिया {अपवाद )
16 - 11 दो पंक्तियाँ सरसी छंद की , इसके बाद
, 11 ~16
ऐरे गैरे नत्थू खैरे, मुखिया दिखते आज |
लोकतंत्र में नोट तंत्र से, बगुले करते राज ||
बगुले करते राज , बना हवेली सबको लूटा |
किससे करें पुकार, सभी जगह है इनका खूँटा ||
कौन करेगा खोज, सही नहीं अब दिखते फेरे |
फैले लम्बरदार , सभी ओर ही नत्थू खेरे ||
~~~~~~~~`~``~~~~~~~~~~~~
नेता की मुस्कान में , बहुत छिपे है राज |
सरकारी धन के लिए , धरें रुप है बाज ||
धरें रुप है बाज , बने है फिर भी रक्षक |
जनता को लें काट, सुनहरे बनकर तक्षक ||
भाषण का दें दान , बने है सर्प गणेंता |
नहीं फूटता मैंर , काटते जब है नेता ||
मिलते ज्ञानी से रहें , दिन बीतें जब. चार |
सत्संगति से एक दिन , पुष्प खिलें मनुहार ||
पुष्प खिलें मनुहार , खुश्बू भीनी महकेगी |
आभा पा मकरंद , चंद्र सी चमकेगी ||
मिलता सभी सुभाष , लगे सब मधुवन खिलते |
सद्गुण का व्यवहार , सिखाते ज्ञानी मिलते ||
दोहा को मिलने लगा , दो चरणों का दान | कवि बनना कितना सरल, समझो अब श्रीमान || समझो अब श्रीमान , भाव कवि के सोते है | तुक मुल्ला-सा काम , सहज में सब होते है || मिल जाता सम्मान , पीटते अपना लोहा | मिला जुला जब गान,वहाँ तब किसका दोहा ||?
चूरण जैसा बाँटते , चरण आज. सरदार. | दोहों के सजने लगे, अजब- गजब दरबार || अजब-गजब दरबार,करे कवि का अब मर्दन | तुक का देते काम, पकडकर उनकी गर्दन || आदत गंदी डाल , कराएं दोहा पूरण | देते है अनुदान , चरण के अपने चूरण ||
कवि को अब मिलने लगा, दो चरणों का दान | दोहा में तुक जोड़कर , तुक मुल्ला पहचान || तुक मुल्ला पहचान , नहीं करना हैरानी | आदत बने खराब , चरण का खोजे पानी || लत अब गंदी डाल , कहें लेखक को रवि | घूमें वह. दिन रात , चरण पाने को कवि ||
आया संकट कान पर , कितना उस पर भार | चश्मा डंडी झुमकियां , रहती सदा सवार || रहती सदा सवार , मास्क भी अब लटकाया | खूँटे से हालात , कान भी समझ न पाया || नर ने बीड़ी पेन , जनेऊ. यहाँ चढ़ाया | हेड फोन तैयार , चिपकने सीधा आया ||
ढोता बोझा आदमी , गर्दभ बना सवार |
दान भिखारी बाँटता , दानवीर लाचार ||
दानवीर लाचार , काग को पहले खाना |
कोयल सहती भूख , लोमड़ी चुगती दाना ||
राजनीति परिवेश,यही सब उल्टा होता.|
गधे बने सरपंच , गुणीजन बोझा ढोता ||
एक शृंगार रस कुंडलिया
चंचल है यदि कामनी , कंचन रूप समान |
जहर भरी तब देखिए , अधरों की मुस्कान ||
अधरों की मुस्कान , कटीले जिसके नैना |
चेहरे पर मधु भाव , बने हों उसकी सेना ||
कह सुभाष नादान , महकता पूरा अंचल |
नारी की पग चाल , नैन भी जिसके चंचल ||
अपने जब करने लगे , आकर पीछे घात |
नहीं पाप का काम है , सम्मुख. देना मात ||
सम्मुख देना घात , भरोसा कभी न करना |
देना सभी जवाब. नहीं तुम मन में डरना ||
कहता यहाँ सुभाष , मानिए. झूठे सपने |
घाती आए. काम , कभी वह. होवें अपने ||
~~~~~~~~~~~~~~~
जो लोग रामचरित मानस में कमी खोजते है , उनके लिए
लिखते रामचरित सुनो , कविवर तुलसीदास |
लिखवाई. हनुमान. ने , यह श्रद्धा विश्वास ||
यह श्रद्धा विश्वास , प्रश्न को नहीं उठाना |
नहीं काव्य में दोष , अधूरी बुद्धि बतलाना ||
मिलता है परिणाम , रोग घर द्वारे दिखते |
क्षमा लीजिए मांग , कथ्य सुभाष सच लिखते ||
~~~~~~~~~~~~~~~
विषय - तर्पण
तर्पण पुरखों का करो , पर मत जाओं भूल |
जीवन में वह बृक्ष है , जिनके तुम हो फूल ||
जिनके हो तुम फूल , सदा वह साथ तुम्हारे |
कभी न तुमसे दूर , रहे वह सदा हमारे ||
कह सुभाष कवि जैन,हृदय से करो समर्पण |
कभी न जाना भूल , उन्हें तुम करके तर्पण ||
सुभाष सिंघई
कुंडलिया
उखरी में मुड़िया धरें , खुद. कन्छेदीलाल |
मूसर जी से कह रहे,रखियो मोरो ख्याल ||
रखियो मोरो ख्याल , रगड़ कै उनखौ कुटने |
फुकली उड़ने दाल, लगी ना मौं से छुटने ||
कहत सुभाषा यार , चिमाने रइयो बखरी |
नहीं काढ़ियों बात , ,कभउँ न मौं से उखरी ||√
{अंतिम शब्द का यहाँ भावार्थ उखड़ी बात है )
मुड़िया उखरी में धरें , रय है दाँत निपोर |
अटपट्टे सब काम है, काँ ढूढों है ठोर ||
काँ ढूढों है ठोर , कैथ सी चटनी बँटने |
मूसर जी की मार , तिरूला पूरे छँटने ||
परौ सुभाषा सोच , बोलने बोली उड़िया |
मुख खौं लेने फार , फटाका होने मुड़िया ||
उखरी में मुड़िया धरे, ऐसे है कइ लोग |
मूसर से कुटवें सदा , जोरत है खुद योग ||
जोरत है खुद योग , सबइ खौ है हैरानी |
लुटे पिटे से रात , जुरै ना पीवे पानी ||
दिखे तरइयाँ भोर , करै सब बाते अखरी |
कभउँ न चेते लोग , बात भी करते उखरी |
टपरा में डुकरा परो , लाघों प्यासो आज |
चार कुचइयाँ माँगने, लगा रहा आबाज ||
लगा रहा आबाज , बऊ जब बन गइ बैरी |
बिरचुन खौं तब पीस, डुकइयाँ लाई कैरी ||
सास ससुर खौं देख, बऊ जब. ठूसे चपरा |
बिकते खपरा गेह. बिखरते थुमिया टपरा ||
अब यही कुंडलिया हिंदी में ~
टपरा में लेटा पिता , भूखा प्यासा आज |
चार रोटियाँ माँगने , लगा रहा आबाज ||
लगा रहा आबाज , बहू बहरी बन जाती |
बेरों को तब पीस, डोकरी बिरचुन लाती ||
सास ससुर को देख, बहू जब बनती चपरा |
बिक जाता है गेह , उड़े सब लकड़ी टपरा ||
~~~~~~~~~
लूअर मौ में दाब कै , नकुआ धुआँ निकार |
और करेजौ बारबे , जुर गय ठलुआ चार ||
जुर गय ठलुआ चार, खाँस रय बैठे डुकरा |
धरै तमाकू जीभ , बनै है रौथत बुकरा ||
जुरै कहाँ से भाग , डुकइया कैवें दूभर |
कढ़ै बतेसा थूक , दबायैं मौ में लूअर ||
यही कुंडलिया खड़ी हिंदी में
बीड़ी मुख में डालते , धुवाँ निकाले लार |
हृदय यहाँ पर जल रहा , बैठे फुरसत यार ||
बैठे फुरसत यार , खाँसते बूड़ें बावा |
कुछ तम्बाकू डाल , थूक का उगले मावा ||
जुड़े कहाँ से योग , लगी है लत की कीड़ी |
फिर भी दावें औठ , मजे से पीते बीड़ी ||
हिंदी जौरत हाथ खौ , सामू रखतइ माँग |
काय टोरतइ लै कलम , भज्जा मोरी टाँग ||
भज्जा मोरी टाँग , रबड़-सी खिच्चू करतइ |
करकें मोय अशुद्ध , वरतनी ठूँसा भरतइ ||
विनतुआइ है आज , करौ नइँ हिंदी चिंदी |
लिखतइ इतै सुभाष , बचन दो भज्जा हिंदी ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मंडलिया {अपवाद) 16-11
गड़िया घुल्ला धरै धुरइयाँ, पौच गओ ससुरार |
रात बियारी मिली कुचइयाँ, गिनती की कुल चार ||
गिनती की कुल चार , देख सास खौ झट से बोलो |
ल्याये है छै सेर , जरा पोटली पसरा खोलो ||
तब बोली साराज, पावनें गलत करौ न कुल्ला ||
पैलउँ लय है तौल , खोल तुमारे गड़िया घुल्ला ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गड़िया घुल्ला खौ धरै , चलै धुरइ ससुरार |
रात बियारी मिल गई , उतै कुचइयाँ चार ||
उतै कुचइयाँ चार , सास से झट से बोलो |
ल्याये है छै सेर , पोटली जाकै खोलो ||
तब बोली साराज, पावने कर लो कुल्ला ||
चार सेर है तौल, तुमारे गड़िया घुल्ला ||
~~~~~~~~
पगड़ी तगड़ी बाँधना , नेता जी अब आप | जीत हार में आपकी , यहाँ लगेगी छाप || यहाँ लगेगी छाप , हुआ है भारी दंगल | राहु केतु के ठौर , दिखें सबको शनि मंगल || क्या होगा परिणाम, हुई है टक्कर तगड़ी | जागे जहाँ नसीब, उसी के सिर पर पगड़ी ||
सजनी सजधज सोचती ,साजन अमर सुहाग |
करवा चौथ सुहावना , प्रीतम से अनुराग ||
प्रीतम से अनुराग , रीति वह पूरा करती |
साक्षी होता चाँद , मगन वह पति में रहती ||
सजन उमर वह दीर्घ , सदा करती है बजनी |
सात जनम का साथ , कामना करती सजनी ||
उनकी झोली में टिकिट , आकाओं ने डाल |
भेज दिया मैदान में , खूब ठोकिए ताल ||
खूब ठोकिए ताल , लुटाओं जोड़ा पैसा |
हुनर दिखाओं खूब , तोड़ तुम रखते कैसा ||
अगर किसी की नाक,लगे कुछ भिनकी तुनकी |
पूरी कर दो साफ , पकड़ कर पूरी उनकी ||
वंदन चरणों का करें ,वोटर देव समान |
नेताजी अभिनय करें , माँग रहे वरदान ||
माँग रहे वरदान , खड़े हैं याचक बनकर |
भूखा वोटर आज , खड़ा दरबाजे तनकर ||
पूछें कुछ भी बात , मिले वादों का चंदन |
खुशी उसी को मान , कराये वोटर वंदन ||
जिनको भूत सवार है , लड़ना हमें चुनाव |
उसको तब मत रोकना ,देकर कोई भाव ||
देकर कोई भाव , मान यदि वह जायेगा |
देगा तुमको दोष , ताव भी दिखलायेगा ||
कर लो बंद सलाह , देख लो लड़ना किनको |
जोड़ो उनसे हाथ , चुनावी चस्का जिनको ||
आया टिकिट न पास में , दूर हुआ भोपाल |
दल से निष्ठा तोड़कर , अलग पकाई दाल ||
अलग पकाई दाल , पीटेगें वह अब दल को |
सिम्बल जिसके पास , करेगें उससे छल को ||
कल तक थे हम दर्द, सभी कुछ जिससे पाया |
दुश्मन है वह आज , टिकिट जब पास न आया ||
नेता बनने के लिए , करिए खूब वबाल |
उठापटक में भाग लें , जैसे हो हर हाल ||
जैसे हो हर हाल , ध्यान जनता का खींचें |
उल्टे -सीधे ब्यान , बोल दें आँखें मींचें ||
राजनीति में शोर , सदा जो आकर देता |
करते लोग पसंद , मानते अपना नेता ||
नेता रुपया बाँंटते , है चुनाव की रात |
रुपयों से मिलती उन्हें, वोटों की सौगात ||
वोटों की सौगात , बनाते खूब निकम्मा |
चावल गेहूँ मुफ्त , रहें खुश बहिना अम्मा ||
सभी योजना लाभ , बनी है जनता लेता |
कौन करे अब काम , बाँटिए रुपया नेता ||
कुण्डलियां छंद (हास्य रस में )
झाडू पौछा कीजिए , करिए नहीं वबाल |
प्रतिदिन बर्तन मांझिए , चमकाए हर हाल ||
चमकाए हर हाल , सम्हाले गेह रसोई |
सब्जी भी दे काट , बनाए आटा लोई ||
पत्नी रखें प्रसन्न , बनो अब पूर्ण जुगाडू |
घर को रखिए साफ , हाथ में लेकर झाडू ||
चार कुंडलिया - सानिया मिर्जा के नाम 🙏
आई मिर्जा सानिया , नुचवा पूरी खाल |
चाँटा पड़ा तलाक का , लाल हुआ है गाल ||
लाल हुआ है गाल, सनम था पाकिस्तानी |
अच्छा किया हलाल,समझ लो यही कहानी ||
छूट गया घर घाट , नहीं कुछ इज्जत पाई |
गई मैच सब हार , सौत जब घर में आई ||
पाकिस्तानी चाह थी , जिससे हुईं हलाल |
गोदी में लल्लू मिला , बदन किया कंगाल ||
बदन किया कंगाल , शेष है अभी हलाला |
हो जाओ तैयार , कराने मुख को काला |
छोड़ा भारत देश , लुटाई जहाँ जवानी |
लेगें आगे खैर , वहीं के पाकिस्तानी ||
भारत के सम्मान का, करके कुछ अपमान |
चली गईं थी पाक में , जैसे हो तूफान ||
जैसे हो तूफान , मलिक शोयब ने चूसा |
फेंका कूड़ा दान , समझकर कचरा भूसा ||
कह सुभाष वाचाल , हुई जो आज शरारत |
मिला तुझे परिणाम , छोड़कर सुंदर भारत ||
भारत में क्यों आ रहीं , बनकर खाला जान |
वहीं हलाला ठीक है , रहकर पाकिस्तान ||
रहकर पाकिस्तान , दूसरा वही मिलेगा |
करना पुन: निकाह , तुम्हें औलादें देगा ||
रखो सपोला पास , झेलना सदा हिकारत |
यहाँ कौन अब काम , चली जो आने भारत ||
सुभाष सिंघई
कुंडलिया ( राहुल जी के स्टोव ज्ञान पर )
पाया अच्छा ज्ञान है , है ज्ञानी महराज |
स्टोप चाहता कोयला , पता चला है आज ||
पता चला है आज , अक्ल को अब है खोला |
लोग करें सब वाह , आपने जब यह बोला ||
घासलेट को फेंक , कोयला मैं भी लाया |
भरूँ कहाँ यह ढ़ेर, आपसे ज्ञान न पाया || 🙏🤔
चलती चालाकी नहीं , खुल जाती है पोल | सत्य सदा उजला दिखे , रहें अमर सब बोल || रहें अमर सब बोल , धरोहर बनके रहते | दिखलाते शुभ मार्ग , नहीं अपवादों पड़ते || खड़ी तमाशा दाल, कहाँ अब किसकी गलती | खाली जाते वार , नहीं चालाकी चलती ||
~~~~~
आजकल भाषण में ऐश्वर्या राय का नाच व अभिताभ के ठुमके
भाषण में याद करा रहे है , उसी पर दो कुंडलिया निवेदित है भाषण में अब चल रहे , ऐश्वर्या पर बोल | ठुमका भी अभिताभ के ,रहे मंच पर खोल || रहे मंच पर खोल , नहीं है बात पुरानी | रहकर जिनके गेह , मात की बनी कहानी || पत्तल करते छेद , भूलते बच्चन खा कण | आज उसी घर वार , उसी पर देते भाषण ||
आकर इटली से यहाँ , रहकर बच्चन गेह | बेटी तेजी की बनी , पाया उनसे नेह || पाया उनसे नेह , दान भी कन्या लीन्हा | बेटी का सम्मान , हृदय से जिसने दीन्हा || नानी के घर वार, करें मंचों से गाकर | अकल अजीरण रोग ,बताए कोई आकर ||
~~~~~
वर्तमान पर कुंडलिया
बच्चन मधुशाला कभी , करा गई है मेल |
दिल्ली मधुशाला सुनो , आज कराती जेल ||
आज कराती जेल , केजरी जाते फँसकर |
मधुशाला का केस , पकड़ती ई डी हँसकर ||
जौहर दिखा सुभाष, समझ में आया लच्छन |
होती बहुत खराब , नहीं क्यों गाये बच्चन ||
मधुशाला के फेर में , गये केजरी जेल |
बच्चन की कविता गलत, मधुशाला से मेल ||
मधुशाला से मेल , हाथ जब इसमें डाला |
ई डी आई पास , डालने लाँकप ताला ||
झाडू बोले बोल , कौन है सुनने वाला |
खुद ही आई गेह , नशे में थी मधुशाला |
( केजरी महिमा पर तीसरी ) कुंडलिया
मधुशालाएँ रो रहीं , होली के त्योहार |
मेरे आका केजरी, जेल गये इस बार ||
जेल गये इस बार, मची है अब घबराहट |
ई डी हुई सचेत , सभी अब लेती आहट ||
झाडू नटवरलाल , बताओ किसे सुनाएँ |
जाऊँ किसके पास , पूछतीं मधुशालाएँ ||
सुभाष सिंघई~~`
कुण्डलियां छंद (हास्य रस में )😂
पत्नी माँगी ईश से , मिले सिंघई को गाय |
लेकिन आई सिंघनी , सूझें नहीं उपाय ||
सूझें नहीं उपाय , सहज कोई बतलाए |
भागूँ कितनी दूर , श्रीमती जब गुर्राए ||
नर कहलाते बैल , सुभाषा विनती इतनी |
कैसे हो निर्वाह , सिंघनी है यदि पत्नी ||🤔🤓🙏
चिमटा बेलन पूजिए ,सुन लीजे यह नाम |
पत्नी के हथियार हैं , आते प्रतिदिन काम ||
आते प्रतिदिन काम , सदा ही रोटी बिलती |
जब होता संग्राम , पिया की चमड़ी छिलती ||
जब भी मिले प्रसाद, लगे जग पूरा सिमटा |
इसीलिए हे यार , पूजिए बेलन चिमटा ||🤔🙏🤓
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~
कुंडलिया
गोरी प्रीतम से कहे , वासंती मधुमास |
पुष्प गुच्छ मेरा हृदय , भ्रमर उड़ें अब पास ||
भ्रमर उड़े अब पास , इशारा साजन जाने |
भर आया मकरंद , हृदय गोरी के माने ||
फागुन की मधु रात , लगे अब भाव विभोरी |
सप्त धनुष के रंग , देखती रहती गोरी ||
कलियाँ खिलती है हृदय,करती दिखें विकास |
गोरी होकर वावरी , कहती यह मधुमास ||
कहती यह मधुमास , रंग की हैं बौछारें |
प्रीतम हमसे दूर , चलें दिल पर तलवारें ||
नहीं सजन बिन नूर , कहाँ से फूलें फलियाँ |
फागुन है मधुमास , अधूरी फिर भी कलियाँ
गीता कहती कर्म कर , फल देगा भगवान |
कर्म हीन नर जानिए , होता मृतक समान ||
होता मृतक समान , नहींं कुछ भी कर पाता |
चला धुवाँ में लठ्ठ , सदा ही भ्रम फैलाता ||
ऐसा नर बेकार , जगत में रहता रीता |
इसीलिए कर कर्म , कृष्ण की कहती गीता ||
~~~`वाचक कथा प्रदीप की , सबने रगड़ी नाक |
पर राहुल के व्यान से, किसका दिल है चाक ||
किसका दिल है चाक , सरासर सुनकर गाली |
सँग में वह भी लोग, जिन्होने पीटी ताली ||
हिंसा हिंदू जोड़ , बताया नफरत लायक |
संसद में था व्यान , जहाँ राहुल थे वाचक ||
हाथ नहीं चूड़ी चढ़ी, रहे सभी यह देख |
बालों में सिंदूर की , कभी न देखी रेख ||
कभी न देखी रेख , सूत्र कब मंगल पहिना |
कहे हिंदु मैं नारि , सभी की लगती बहिना ||
ईसाई से व्याह , बनी है गांधी बूड़ी |
समझाए अब कौन , कहाँ है सधवा चूड़ी ||
दादा दफ्न जमीन में , जिनकी बनी मजार |
माँ ईसाई कोख से , लिया जन्म सुखकार ||
लिया जन्म सुखकार , पहेली समझ न आई |
कैसे दत्तात्रेय , गौत्र का ठप्पा भाई ||
बहिना करती व्याह , करे क्रिस्चिन से वादा |
रह जाते चुपचाप , नाम जब आता दादा ||

Comments
Post a Comment