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माता मेरी शारदे , देती सदा प्रकाश |
पंच लिखूँ दोहावली , सेवक यहाँ 'सुभाष' ||
लिखी "बराई" "बाँसुरी" , "कुंड" "दीप" हैं नाम |
दोहावली "सुभाष" से , माँ को किया प्रणाम ||
हैं माता आशीष से, दोहे पाँच हजार ||
पाँच खंड जिसके बने , मानूँ माँ उपकार ||
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मैं बुंदेलखंडी होते हुए भी , बहुत कम ही बुंदेली में लिखता था किंतु फेसबुक पर एक बुंदेली रचना पोस्ट करने के दौरान आदरणीय जी० एस० रंजन जी से वार्ता हुई , दूरभाष पर भी विचार विनिमय हुआ , मुझें यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि मुम्बई में रहकर भी एक शालीन व्यक्तित्व बुंदेली भाषा , लोक कला , संस्कृति सम्वर्धन के लिए चिंतित व कार्यरत है , मैं उनके बुंदेली झलक ब्लाग से जुड़ा व उनके कृतित्व को देखा पढ़ा , कौशल को समझा | इसी मध्य आदरणीय राजीव नामदेव " राना लिधौरी " जी टीकमगढ़ से सत्संगति हुई , और उन्होनें भी
बुंदेली माटी का ॠण चुकाने का परामर्श दिया , व अपने
जय बुंदेली साहित्य समूह से जोड़ा | आदरणीय राना जी भी बुंदेली भाषा संवर्धन के लिए प्रयासरत रहते है , समूह से लिखने के विषय मिले , , जिसका परिणाम
बुंदेली बराई की ई बुक आपके समक्ष प्रस्तुत है , जिसमें मेरे
एक हजार बुंदेली दोहे है ,अन्य बुंदेली रचनाएं अलग बुक में है , अन्य पुस्तकों के अलावा, हिंदी दोहों की भी दो ई बुकें एक -एक हजार दोहों की (दोहा दीप व दोहा कुंड ) भी ब्लाग पर सेवार्थ है व "दोहा सुभाष "तैयार हो रहा है सादर
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लेखक का परिचय
नाम - सुभाष सिंघई
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955
जन्म स्थान - जतारा ,
पिता का नाम - श्री कपूर चंद्र सिंघई
माता का नाम - श्रीमति शीला देवी सिंघई
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल (सागर )
2 - शिल्पी सूर्या - नितिन जैन ( खजुराहो )
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई
लेखन की विधा -
1 - दोहा , कुंडलिया , चौकड़िया , पदकाव्य , इत्यादि सभी सनातनी मात्रिक छंद
चार हजार के करीब हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के करीब कुंडलिया , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है
2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है
वर्तमान में सनातनी मात्रिक छंद पर लेखन कर रहे है
3- ब्लाग डाँट काम पर प्रकाशित कृतिया -
1- दोहा दीप (एक हजार दोहे )
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे )
3- बुंदेली बराई ( एक हजार बुंदेली दोहे )
4- मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य
5- कलम से उद्गम ( विभिन्न सनातनी मात्रिक छंद )
6 -कुंडलिया कुंड
7 - गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
8- हिंदी छंद माला
9- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी
10- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन ,
11- गर्भ से गमन तक (खंड काव्य )
12 गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है
13 -ट्वीटर - व ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें है व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है
वर्तमान में सम्पादन -
1- छंद महल (मासिक हिंदी ई पत्रिका ) जिसके 25 विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके है
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है
यूट्यूब - सृजन चैनल का संचालन
कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है
©® सुभाष सिंघई
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660
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सुभाष सिंघई की तीसरी दोहावली
(बुंदेली में एक हजार दोहें)
श्री गणेशाय नम:
मोइ विनायक जू सुनौ , झुका रयै हम माथ |
मिलकै चाउत सब जनै , मिलै आपको साथ || 1
कात गजाजन आपखौं , एकदंत माराज |
पूरै हौतइ आपकी , पूजा से सब काज ||2
अंबिकेय शंकर सुवन , सबइँ अपुन के नाम |
पाँव पखारत हम इतै , मानत तुमखौ धाम || 3
महाकाय भी कात है , टेड़ी राखत सूड़ |
जिनके आगें देवता , पटकत अपनी मूड़ || 4
मोदकदाता आपखौं , कात जगत के लोग |
विघ्नेश्वर भी है अपुन , हरतइ सबइ कुयोग ||5
एक हास्य दोहा
गनपत बप्पा मोरिया , तकौ देश कौ हाल |
नेता बगदर बन गये , पटा खाय अब खाल ||🙏😇6
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लय बाजौ है हात में , तकौ सरसुती मात |
बैठी राती हंस पै , उन्ना धवला रात || 7
हर अक्छर में देखतइ , उनकौ ग्यानी रूप |
माइ सुरसुती मौइ खौं , लगतीं नौनीं धूप || 8
वेदन ग्रंथन में लिखी , मैमा अपरमपार |
करत सुरसुती साधना , करकै सब जयकार ||9
कृपा करौ अब सुरसुती , रख लो मौरौ ध्यान |
रखियौ दास सुभाष की , छंदन में पैचान ||10
दुनिया भर कै कात है , लगत आँग वरदान |
हात सुरसुती जित लगत , बनत बोइ विद्वान ||11
कलम हमाइ चल रयी , साँसी कात सुभाष |
मिलै सरसुती से सदा , हमखौं ग्यान प्रकाश || 11
ढबुआ ताने मैंड पै , पिसिया रयी रखाय |
मुनिया खौं चिपका धना, गाकैं रयी सुलाय ||12
हरिआ-हरिआ टैरकैं , गोरी रयी भगाय |
हरि आ+कैं ढबुआ घुसै , मुनिया रयै खिलाय ||13
ढबुआ हौतइ खेत पै , चारौ तरफ रखात |
यैसइ ढबुआ ईश भी , अपनौ खुदइँ बनात ||14
ढबुआ जौ संसार है , पकी फसल तक राँय |
फिर सब ऊकै बाद में , अपने घर खौ जाँय ||15
ढबुआ ढाबा हौ गयै , चलनै लगी दुकान |
खटिया पै परसन लगौ , खाबै कौ सामान ||16
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बुंदेली दोहे -विषय चकिया
चकिया कत संसार खौं, सबइ पिसत हैं जात |
कीला पकरौ राम कौ , इतै कबीरा कात ||17
डड़ा ठुकी चकिया तकौ , जीखौं पकर घुमात |
ऊखौ जानौ है करम , सबइ जनै बतलात ||18
चकिया जौ संसार है , करम धरम दो पाट |
नौनों डारौ नाज तो , खाबै कौ हौ ठाट ||19 ~~~~~~~~~
बुंदेली दोहे विषय - गरी
गरी चढ़त जब देवता ,बनतइ नौनों योग |
बाँटत माँगत है सबइ , मानत सब है भोग ||20
गरी बुरादा पान में , सँग में चमन बहार |
गोरी रच रय औंठ है , लगत बाग गुलजार ||21
गरी गरीवन के गरै , बन कै आतई जोग |
बड़े प्रेम से खात बै , कत है मिल गव भोग ||22
गरी गुर्र कै डार दइ , लडुआ लये बनाय |
मजा पड़त खाओ अगर , स्वाद अलग ही आय ||23
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बुंदेली दोहे , विषय - बजौ भयौ
बजौ भऔ सब मानतइ , कितनउँ हौवें ठट्ठ |
सौ गुंडन पर एक है , बुंदेलन कौ लठ्ठ ||24
बजौ भऔ जौ क्षेत्र है , मुलकन तीरथ धाम |
दरसन से हौ जात हैं , सबकै पूरै काम ||25
बजौ भयौ इतिहास है , काँ लौ कियै बताँय |
आल्हा ऊदल बीरता , गाँकै सबइ सुनाँय ||26
बजौ भयौ मंदिर इतै , पन्ना जुगल किशोर |
नगर ओरछा राम जू , आ जातइ है भोर ||27
बजौ भयौ सब कर रयै , डारै नौनें हाथ |
दोहा लिख रय हूँक कै , राना जू के साथ ||28 ~~~~~~~~~~~
बुंदेली दोहे विषय बुड़़की
मकर संक्रांति एवं लोहड़ी की शुभकामनाओं सहित💐💐
माघ मास में सूर्य जब , मकर राशि में आँय |
बुड़की लैबै आँग में , पैलउँ तिली लगाँय ||29
नदिया में बुड़की लगा , करत तिली को दान |
पैलउँ अरघा देत है, ऊगत रवि भगवान ||30
जाड़ौ बुड़की से करे , आगे खौ प्रस्थान |
तिली हवन में डार कै , देत विदाई मान ||31
तेल तिली कौ खात जो , जठर अग्नि बढ़ जाय |
उल्टौ सूदौ पेट में , सबखौ तुरत पचाय ||32
खरी तिली की ढौर भी , चाँट- चाँट के खाँय |
काम किसानी हौ जितै , ताकत खौ बतलाँय ||33
तेल तिली अब दूर है , खा रय सबइ रिफान्ड |
सौ हम सब भी देखतइ , खाली रैतइ माइन्ड ||34
सूरज नें बदली दिशा , अब उत्तर खौं जाँय |
बुड़की में उम्दा तिली , पकवानों में खाँय ||35
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बुंदेली दोहे , विषय - कुइया
कुइया घर में देख कै , सगया भयै प्रसन्न |
कै गय मोड़ी खायगी ,येइ घरै अब अन्न ||36
बिन्नु गयीं जब सासरें , खिच गइ मन में रेख |
कुइया घर की थी भरी, हँस गइ ऊखौं देख ||37
तीन खेप मुड़िया धरै , गयीं कुआँ तक रोज |
कुइया हती न मायकै , पानू की रइ खोज ||38
कुआँ बड़ौ संसार है , कुइया घर परिवार |
ज्ञानी सबसे कात है ,रखौ प्रेम की धार ||39
सबकी प्यास बुझाउते , कुआँ चौपरा ताल |
कुइया घर परिवार कौ , राखत दिल से ख्याल ||40
नीर न सूकै काउ कौ , विनती है भगवान |
कुआँ चौपरा ताल हौ , या कुइया की आन ||41
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बुंदेली दोहे , विषय - घिची
माला पैरत ही तनत , करतइ कछु ना काम |
हाथ पाँव मैनत करैं , पातइ घिची इनाम ||42
तिरिया भी अपनी घिची , करतइ खूब सँबार |
डारै फिरतइ लल्लरी , गुरिया करैं निखार ||43
जौन घिची में डार दै , दुल्लौ अब वरमाल |
औइ गरै में नौचिया , लैतइ रत हर हाल ||44
घिची पकरतइ है पुलिस , बिद जाबै जब चोर |
टूटत है तब चामरौ , मचत गाँव में शोर ||45
सबखौ हम सम्मान दें , घिची झुका कै आज |
सबरै गुनियाँ है इतै , जीपै मोखौ नाज ||46
बुंदेली कमजौर थी , अब भी है कमजौर |
घिची झुका कै है कहत , देते रहियौ ठौर ||47
मथुरा में तुलसी कहैं , घिची झुकेगी नाथ |
ऊँकै पैलउँ लौ पकर, तीर धनुइयाँ हाथ ||48
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बुंदेली दोहे , विषय - दुके
फसल दुके ना खेत में , पक कै भी लहरात |
जैसन सूरज लालिमा , सबखौ रूप बतात ||49
चार जनन के बीच में , दुके नहीं अब ग्यान |
चार बौल जौ भी सुनै , कर लेतइ पैचान ||50
वीर दुके ना युद्ध में , रत है छाती तान |
मरबै नईं डरात है , लय हाथन में प्रान ||51
दान देय दाता दुके , अपनौ ना बतलाय |
जानौ ई संसार में , बोइ देवता आय ||52
दुका दुकऊल में दुके , यारन की है बात |
जबसै दूला सब बनै , घर में दुबकै रात ||53
दुके-दुके दोहा लिखे , दयै मंच पै डार |
घट बड़ जैसे हौ बने, पढ़ियौ आप समार ||54
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बुंदेली दोहे विषय,- मावट
गरजत है जब जौर से , बदरा ठंडन आन |
मावट आ गइ जान लौ , कातइ सबइ किसान ||55
टप-टप बूँदे गिर परै , जड़कारै कै माह |
मावट पाकै खेत भी , कात रात है वाह ||56
मावट बरसे जब फसल , हरी खड़ी हौ खेत |
कत किसान भगवान से , उम्दा मौका देत ||57
साँप चढ़ै जब पेड़ पै , उड़- उड़ सारस जाय |
चलवै जब पछुआ हवा , मावट जल्दी आय ||58
काँसे की बिलिया चढ़ै , नीली अगर फफूँद |
बदरा राबै रात भर , जानौ मावट कूँद ||59
मौइ धना गइ खौटबें , फरै धना जब खेत |
मावट की बूँदै गिरी , लौटी मुसकी देत ||60
माव मास की ठंड में , हौ मावट बरसात |
हाड़ कृषक कै काँपतइ , फसल हँसै दिन रात ||61
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बुंदेली दोहे , विषय ढ़ोंग
ढ़ोंग जितै हम देखतइ , जड़ में हौतइ स्वार्थ |62
करिया मन बन आँदरौ , भूलत रत परमार्थ ||
चार जनन के बीच में , ढ़ोंग नईं चल पात |
असुआ गिरबै आँख से, औठ हँसी खिल जात ||63
करतइ रातइ ढ़ोंग जो , घटत रात सम्मान |
बनै बिलौटा ढूँकतइ , देत न कौनउँ ध्यान ||64
छलछंदौ भी ढ़ोंग है , रहियौ उतै सचेत |
चंदन चूरा नाम पै , पकरा दै बै रेत ||65
ढ़ोंग न जिनकै पास है , बै हौतइ गम्भीर |
सूदै सच्चै आदमी , मन से रातइ हीर ||66
कपटी करतइ ढ़ोंग है , करतइ ढ़ोर उजार |
लम्पा यैड़त है सदा , यही लिखी करतार ||67
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बुंदेली दोहे, विषय - कुकात
करजा खरचा खाज हो , या सूजा-सी बात |
चारउँ में जब एक हौ , साँसउँ आँग कुकात ||68
घाम घलै जब पीठ पै , तबइँ पसीना आत |
चिपचिप सूकै जित जगाँ , भौतइ उतै कुकात ||69
सबा शेर जब शेर खौ , फाँकत में मिल जात |
दबा पूँछ पंचात में , बैठौ रात कुकात ||70
जरुआ - भरुआ जौन है , सबखौं खूब दिखात |
टेड़ौ मेड़ौ मौं करें , अपनी नाक कुकात ||71
मन में रखबै गंदगी , तन भी दिखै भिड़ात |
जीवन भर बौ आदमी , फिरतइ पाँव कुकात ||72
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बुंदेली दोहे , विषय- गरियात
महाकवि केशव के महाकाव्य रामचंद्रिका का जिवनार वर्णन बहुत पहले शिक्षाकाल में पढ़ा था | उसी से भाव लेकर सृजन किया है |🙏केशवदास जी ने बुंदेली रीति रिवाज , परम्पराओं को वखूबी रामचंद्रिका में समाहित किया है |
मड़वा के नैचें लगी , रामलला जिवनार |
मिलकै तब गरियात-से , गीत गबै मनुहार ||73
जीकै पति दशरथ अबै ,अमर नारि कहलात |
बने औइ के राम पति , गाँय जनीं गरियात ||74
लखन तरेरे गटन खौं , राम तबइँ मुस्कात |
रनै चिमानों है लखन , सइ गा रइँ गरियात ||75
भरत समझ गय बात खौ , भूपति दशरथ तात |
आगें भूपति राम है , गीत सयी गरियात ||76
बुंदेलन की रीति खौं , लिख गय केशवदास |
इज्जत दें गरियात में , पंगत में कुछ खास ||77
बकत रऔ शिशुपाल है, किसना खौं गरियात |
झेलत रय सौ गारियाँ , फिर बे चक्र चलात ||78
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बुंदेली दोहे , विषय ब्याद
बिदी गट्ट उनखौ हती , हमने लइ जब साद |
चिबक गई तब गोंच सी , ठाँड़ै बैठे ब्याद ||79
फिरत निनुरबे खौ उतै , जितै बिदेै लइ ब्याद |
कौउ सुनइया है नहीं , ब्याद बनी जल्लाद ||80
ब्याड़े में सब जान दो , पैले टारौ ब्याद |
ब्याद बिदी रत जब गरै , बिगरौ रै सब स्वाद ||81
ब्याद ब्याज में जब मिलै , गरै गोन पर जात |
फिरत निनुरबे आदमी , पर मौं की है खात ||82
ब्याद बिदै कै आ गयै , माते अब उकतात |
लुकत फिरत है अब मड़ा , अपनी मुड़ी कुकात ||83
नरवा हौबें खेत में , साला घर धुँदराद |
दौइ जगाँ पै जानियौ , पसरी रत है ब्याद ||84
रावन नें सीता हरी , चखौ करम कौ स्वाद |
लंका लैकें आव जब , ठाँड़ें बैठें ब्याद ||85
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बुंदेली दोहे , विषय चुगला
जगन तगन चुगला मिलैं, देतइ काम बिलोर |
भइया इनके पेट में , रातइ सदा मरोर ||86
हम सब चुगला देखतइ , सबखौं मजा चखात |
दुतयाई जब ना मिलै , इनकौ आँग पिरात ||87
दुनिया में चुगला तकै, जै रत कान चढा़ँय |
औसर उमदा देख कै , तुरतइँ आग लगाँय ||88
हमखौं जब चुगला मिलौ , फूँकन लागौ कान |
कुत्ता सौ दुत्कार दव , भगौ बचाकैं प्रान ||89
चुगला से चुगला मिलै , हँसतइ दाँत निपोर |
देखत में भोरे बनत , करतइ तनक न शोर ||90
चुगला जातइ सोच कै , करने का दुतियाइ |
भरत कान ऐसे सदा , हौवें हाथापाइ ||91
चुगला मिल जै हर जगाँ , नहीं ढूड़नैं आत |
उकसाबै कौ काम बें , पूरी तराँ निभात ||92
राजा अकबर के लिगाँ , चुगला थे कुछ खास |
पकरै पै बानर जुरै , छूटै तुलसीदास ||93
हर राजा के राज में , चुगला देखे खूब |
करा लरायी खुश भयै , राज गयै कइ डूब ||94
चुगला दूरइ राखियौ , जौरें रहियौ हाथ |
जो इनके चक्कर फँसै , फूटै उनकै माथ ||95
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बुंदेली दोहे , विषय बूँट
दिखैं चना के झाड़ पै , पुचके फूले बूँट |
यैसइ जौ संसार है , हम सब जीकै खूँट ||96
हरौ -हरौ दानौ रयै , अमरत जैसौ घूँट |
कात सुभाषा है इतै , सत्य करम सब बूँट ||97
डाली हौवे शुभ करम , फल हौवे जब बूँट |
ईसुर की किरपा समझ, दानें खाओ सूँट ||98
फरौ बूँट हौ ज्ञान कौ , कभउँ न हौवे झूँट |
बिधना से विनती करत ,सत्य रयै हर खूँट ||99
संत हौत है रस सरस , हृदय रखत फल बूँट |
फल पाने झुकना पड़ै , ठिगना हौ या ऊँट ||100
खेत काटियो बूँट कौ, जब दानें आ जाँय |
वरना भाजी हात रै , ग्यानी यह समझाँय ||101
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बुंदेली दोहे, विषय गुरीरो
सबइ जनै अजमाइयौ , जितै हौय मतभेद |
बचन गुरीरो बन दवा , मिटा देय हर खेद ||102
हौय उबाड़ौ आदमी , करत रात है ठैन |
कथन गुरीरो छौड़ कै, करय बौलतइ बैन ||103
पकरै मूसर हाथ में , धम्म करत जौ आँय |
स्वाद गुरीरो ना चखै , फुकला सूँगत जाँय ||104
मिलत गुणीजन है जितै , बगरौ रत सम्मान |
सुनियौ उनखी तान खौ , लगत गुरीरो गान ||105
काज गुरीरो हौ उठै , जितैं जुरैं जब खास |
सजतइ घुरुवा पालकी , रातइ उत विश्वास ||106
पिता गुरीरो हौत है , मात् गुरीरी खान |
गुर की परिया दिल रयै , कातइ सबइ सुजान ||107
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दोहे - विषय दरुआ
दरुआ की आदत बुरइ , पइसा जइँ से पात |
बेरा कभउँ न देखतइ , दौर कलारी जात ||108
दरुआ -दरुआ जब जुरैं , गजब करत बतकाव |
दौनउँ मिल कै एक सो , अपनो करत सुभाव ||109
दरुआ अपने गुनन से , खुद हौतइ बरबाद |
घर में टंटौ रोप कैं , बाहर करत फसाद ||110
दरुआ हौतइ दो तरा , एक चिमा के रात |
एक तनक सी डार कै , सबखौं गाँइँ सुनात ||111
दरुआ की हालत सुनौ , पीकैं घर में आत |
खटिया पै औधों डरौ , लदर फदर सौ जात ||112
दरुआ देतइ दौदरा , छरकत सब है रात |
मूरखता कौ काम है , इनसे करबौ बात ||113
दरुआ अरुआ सौ लगै , तनकइ नईं पुसात |
गाँइँ बकत झूमत निगत, जितै चाय गिर जात ||114
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बुंदेली दोहे , विषय - गानों
लाज शरम गाँनौ हतौ , कभउँ नारि को अंग |
अब मरयादें गइँ बिखर , तकत सबइ भदरंग ||115
गाँनों तिरियाँ गात ती , बन्नों बेंदी हार |
अब गाती है ब्याय में , फिलमी चढ़ी खुमार ||116
नारी कौ गाँनों लुटै , जियै कात है लाज |
जगाँ- जगाँ पर भेडिया , घात लगायैं आज ||117
कवियन कौ गाँनों रयै , कलम भाव को मेल |
कविता दिखबें ऊजरी, टपकत है रस तेल ||118
गीत सदा गाँनौ रऔ , गायक राग सुनात |
नोनौं सुनकै सब जनै , तन्मय भी हो जात ||119
सुभाष सिंघई~
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बुंदेली दोहे , विषय - वेदी
वेदी में समधा जलत , हवन करत सब लोग |बिनतुआइ माँ से करत, मिलैं खुशी के जोग ||120
वेदी पूजै होम दें , घर में देव बुलात | अपनौ लेकैं भाग वें , आशीशें दे जात ||121
वेदी सँग तुलसीघरा , घर की हौतइ शान | मइया कौ आशीष रत , बढतइ घर कौ मान ||122
वेद हमारे कात है , करौ देव आह्वान | पर वेदी से भोग दें , और करें सम्मान ||123
पोथी बाँचें मंत्र पढ़ , वेदी में दें होम | धूप सुगंधी जब उठै, खिलतइ तन के रोम ||124
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माते कक्का घास में , सुलगा गय है आग |
मड़ी कथूले की मुड़ी , ठोको ठाड़ों दाग ||125
बिन्नू सपरन खौ गई , लहरें उठती घाट |
रामप्यारी बोलती , बिन्नु खौ गर्राट ||126
लचक कमरियां देखकर , टपकी बब्बा लार |
आँख दबाकर दे रहे , लरकन खौ उसकार ||127
गलती माते जू करें , सबरे साधें मौन |
उरजट्टे खौं सोचते सामें आवै कौन ||128
दारु बँट रई गाँव में , डलने हैं कल वोट |
सभी चिमाने लग रहे ,डाल खलेती नोट ||129
लरका माते को लगे , सब लरकन से भिन्न |
फिर भी पूजो जात है , रात दिना रत टुन्न ||130
करें टिटकरी गाँव के ,फटियाँ की लख नार |
कहते भुज्जी डोकरा , खूब जताए प्यार ||131
कोरोना के काल में , भूखन मरो किसान |
पर डबला से फूल गय , देखो सभी प्रधान ||132
उससे ना कुछ बोलते , जिससे भाँवर सात |
मोदी बाजो टुनटुना ,करते मन की बात || 133
बापू आशाराम का , राधे माँ खौ ज्ञान |
इक दूजे का चित्त से , करते अंतरध्यान ||134
माते कुत्ता मारने , घर ले आए लठ्ठ |
मातिन ने अजमा लिया, माते पर ही झट्ठ ||135
राम राम जू चल उठे , भुनसारे से शाम |
समझो पास चुनाव हैं , बँटने दारू दाम ||136
मोड़ी मुखिया की भगी, कौसे कलुआ बैन |
खबर पैल से ना दई , ईसै हौ गइ ठैन ||137
जुड़कर पुंगा गाँव के , बात रहे है फाँक |
जो जितनी ही फाँक ले,उतनी उसकी धाँक ||138
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माखन रोटी खा गयौ , हरि हाथन से छीन |
रैमन कवि तब लिख गयै , कउवा रऔ न दीन |139
काँव-काँव कउवा करै , भुंसारे की बेर |
समजौ आ रय पावने , बैठौ कात मुड़ेर ||140
मुड़ी-हाथ कउवा छुयै , मम्मै चिठ्ठी दैत |
बिन्ना तोरी मर गई , रौकें फैरौ लैत ||141
कउवा आकै जुड्ड में , करवै छत पै शौर |
कछु असुगन है आवनै, करबै घर में ठौर ||142
उड़तै कउवा चौंच में , रोटी जब दिख जाय |
बूड़े बुजरग कै गयै , कछु सगुन घर आय ||143
कउवा खौदें जब जिमी , जानौ धन कछु होय |
सगुन शास्त्र हमने सुनो, पतौ चलौ तब मोय ||144
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जीनें बोंड़ी देख कै , मन में राखी हूल | (हूल =हुलास )
ऊखौं देखौं इक दिना , हाथन में लय फूल ||145
बोंडी खौं मसलो नहीं , बा भी खुश्बू देत |
फूला बनतइ फूलकै , आतइ है कइ हेत ||146
बोंड़ी सबसे कात है ,चार कदम लो बोंड़ |
खिलकैं खुश्बू के भरै , सबरै भरियौ कोंड़ ||147
जीनें बोंड़ी खौं गुचक , दव हाथन से तोड़ |
मूसर है वो आदमी , मौका देतइ छोड़ ||148
हमने बोंड़ी बात है , तुम आगे दो बोंड़़ |
मिलजुर राखौ एकता ,भारत के हर कोंड़ ||149
(अंतिम दोहे में बोंड़ी शब्द (स्त्रीलिंग कर्म) किसी बस्तु/कथ्य को आदान -प्रदान से तदात्मय कर लिखा है )
बुकरा की डुकरौ गई , माँगन जितै भभूत |
सला घौलना दै उठौ , इतइँ चढ़ा दै पूत ||150
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बूड़े बुजरक कात हैं , बुकरा से का बैर |
रात दिना वो माँगतइ, मिमया- मिमया खैर ||151
बुकरा मैं मैं रव करत , ले लय ऊकै प्रान |
मुलक बजा दइ तालियाँ ,कै दव है बलिदान ||152
कौनउँ देखे घौलना , बुकरा लै लें पेल |
हात मीड़ हूँ हैं करत , तरा- तरा के खेल ||153
नहीं समरथन हम करें , बुकरा की बलि होय |
परसादी खौं नारियल , दव ईसुर ने सोय ||154
फौर नारियल भोग हौ , निबुआ का हो काट |
बुकरा खौ नहिं कष्ट हो , कातइ बात निचाट ||155
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राधा नें कान्हा तकौ , फिर दय गटा तरेर |
दिन डूबै तुम आय हौ , करकै भौत अबेर ||156
शूपनखा नकुआ फुला , रइ है गटा तरेर |
नाक बुचकवें तब लखन , करतइ नहीं अबेर ||157
कै दइयौ तुम राम से , लौ कपीश अब हेर ||
सिया प्रान खौं त्याग दै , हौजे अगर अबेर ||158
शिशुपाल की गारियाँ , श्याम गिनत सब हेर |
चका चलौ जब सौ भईं , कुछ ना करीं अबेर ||159
चींखत जा रइ बेर खौ , भक्ति भरी उत हेर |
शबरी कत है राम जू , कर दइ बड़ी अबेर ||160
सभा पुकारे द्रौपदी , श्याम तमइ से मेर |
लाज हमारी लुट रयी , काहै करत अबेर ||161
चिठियाँ भेजत रुक मनी , श्याम तुमइँ से मेर |
मौखौं लैनें आइयौ , करियौ नहीं अबेर ||162
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पूने की जब रात हौ , छत पै धरतइ खीर |
सबइ जनन से जा सुनी , टपकें अमरत नीर ||163
ऊनै राखत है लछौ , बढत रहत कलदार |
शारद पूने टीकते , छंदो के मनुहार ||164
पूने चंदा नाचता , झरै आँग से स्वेद |
अमरत जीखौ कात है , मिटा देत सब खेद ||165
ऊनै पूनें आय जब , अपने घर मैमान |
कात सुभाषा तब सुनौ , समझौ है भगवान ||166
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कै गइ है राधा हओ , काल किशन हम लाँय |
चुपकइँ चपिया चाँप कै , सौकारे से आँय || 167
हओ पैलउँ बुलबा लई , फिर मौं खौं दव खौल |
वन जाबै श्रीराम कौ, करत कैकयी डौल ||168
भैया हओ न बोलियों , पैलाँ सुनियौ बात |
लै जौरा की फौज से , कैसै सजी बरात ||169
गुनियौ चुनियौ काम खौ , तबइँ हओ कौ मान |
नाँतर ले लै यह हओ , लुखरगड़े में प्रान ||170
उनकी हओ न लीजिए , कुसगुनया जाँ रोग |
जरत भुरत आहें भरत , तकत दूसरे लोग ||170
पबरन दो उनकी हओ , कहौ हओ तुुम आज |
नौनी कथा पसारने , नौनें करने काज ||171
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बुंदेली दोहे , विषय- गड़इ (लोटा )
गड़इ डोर छन्ना मिलें , तब गैलारौ जैन |
भरत कुआ से जल खुदइँ , तबइ पाउतइ चैन ||172
तामें पीतर कीं गड़इ , हैं नक्काशीदार |
माँज-माँज औरी उयै , चमकातइ जल ढार ||173
बेपेंदा की हौ गड़इ , ढुरक-मुरक है जात |
माल मसालो जो भरौ , इतै उतै विखरात ||174
नेतन के चमचा बने , घर में घुस कै खास |
बेंपैदा को हैं गड़इ , काते इतै सुभास ||175
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बुंदेली विषय - हनके
हनके बादर होत है , फिर. बिजुरी चमकात |176
भींजत मन अरु खेत है , धना बैठ मुस्कात ||
हनके मुगदर मार दव , दुरयौधन भव चित्त |
फार दई छाती उतइँ , बार द्रौपदी सिक्त ||177
सुनियौ भइया आज तुम,हनके लिखियौ बात |
कथ्य भरै कछु तथ्य सै, दइयौ अब सौगात ||178
हनके लेतइ ब्याज है , मौरे कक्का साव |
मिलत उधारी जब हमैं , हम भी करत न भाव ||179
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विषय रामधइ ,
केवट लैबै रामधइ , राम खड़े खुद द्वार |
कत है चरण पखार कै , हम लै जै उस पार ||180
हनुमत कै हर काज में , दिखत रामधइ शान |
मैमाँ सब कत राम की , अपनौ करत न गान ||181
खरिया से लिख राम खौं , मुस्का गय नल-नील |
पथरा मानैं रामधइ , तैरें मुल्कन मील ||182
पथरा खौं दे रामधइ , तैरा गऔ लंकेश |
पर प्रभाव अपनौ कहै , जाकै अपने देश ||183
अगन देव की साक्छ में , सिया रामधइ लेत |
तन- मन कै निरदोष खौं , सबइ परीक्षा देत ||184
राम काँप गय सुन उतै , आँखन आ गव नीर |
देर रामधइ एक दिन , छोरै भरत शरीर ||185
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बुंदेली दोहे , विषय - स्याँनों
जाँदा स्याँनों आदमी , चार जगाँ ठग जात |
बार मुड़त उल्टे छुरा , जैब कटा कै आत ||186
स्याँनों करतइ स्यानपन , तब ऊपर उतरात |
खुद खौ ठगिया मानतइ , पर खुद ठग के आत ||187
स्याँनों हौबौ ना गलत , पर इतनौ नहिं होय |
दूध जलेबी माँगतइ , घर में नाती रोय ||188
स्याँना होना चाहिये , परखइयाँ रख जात |
बिना ज्ञान कौ स्यानपन , खातइ सूदी घात ||189
स्यानें से स्याँनों मिलै, उनकी सुनियौ बात |
छाँटत अपनौ स्यानपन , कौउँ न खावै मात ||190
एक हास्य दोहा
स्याँनों समदी देख कै , समदन गइ मुस्काय |
जब पेरन के नाँव पर , चार खड़पुरी ल्याय ||191
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विषय - छिको
जसुदा कौ लल्ला छिको , गोपीं छेकैं बीस |
नचा रयीं हैं चुटकियन , नाच रयै जगदीश ||192
छिको आज ना राखियों , अपनी छिमा सुजान |
दइयौ लइयौ नेह से , दिन है आज महान ||193
रार-खार जौ भी छिको , ऊखौ डारौ खोल |
वानी हैगी आपकी , आज भौत अनमोल ||194
खोल किबरियाँ मन हृदय , माँगू छिमा सुभाष |
मन मोरौ इत है छिको , दइयो क्षमा प्रकाश ||195
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बुन्देली ,दोहे - करय ( कड़वा)
पहला- करय
करय दिना हम सब कहत , पुरखा करतइ याद |
पैलें उनखौ भोग दें , फिर सब पावें बाद ||196
दूसरा करय -
बात करइ सूदी घुसत , जाकैं मन ठुस जात |
पतौ चलत जब आदमी , थुथरी खौ बिचकात ||197
तीसरा करय -
करय करैला होत है , छोड़ देत सब रंग |
असर अपुन जौ जानियौ , मिलौ उसै सत्संग ||198
चौथा करय -
जहाँ करय बदले नहीं , अपनो तनिक सुभाव |
जानों पेंडौं नीम सम , दातुन जान चबाव ||199
पाँचवाँ करय -
करय दवा के घूँट से , भगतइ ताप-बुखार |
वैद्यराज भी है करत , करय स्वाद उपचार ||200
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विषय मुंडा (जूता)
का कै दैं ई जीभ की , ठाँटौ जब बक जात |
भीतर घुसतइ जब चलैं , मुंडा घूँसा लात ||201
मुंडा की मैमाँ सुनौ , पुलिस लैत है काम |
गुंडन की मुड़िया घलै , धुनकै रुइ-सो चाम ||202
मुंडा रहै ना पैर तक , अब बन गय औजार |
लोकसभा तक चल गयै , बनकर कै हत्यार ||203
खुद के मुंडा सिर पड़ैं , दद्दा हौं नाराज |
टौ डारत है चामरो , नहीं सुनत आबाज ||204
कुत्ता मुंडा सूँघ कै , करत चौर पैचान |
मुंडन की मैमाँ बहुत , काँ लौं करें बखान ||205
मुंडा बोलौ एक दिन , सुन लै बात सुभाष |
हमै छौड़ उपनय गयै , काँटे लैय किलाश ||206
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बुंदेली दोहे , विषय -ससुरार
साथियों मैने बेटी की ससुरार पर केन्द्रित दोहे लिखे है
बिटियाँ आबै मायके , या जाबै ससुरार |
दौइ जगाँ खौं लै निभा , बनकर कै हुश्यार ||207
सास- ससुर खौं मान लै , बाप मताई आन |
तब बिटियाँ ससुरार में , पात सबइ से मान ||208
सबइ जनै ससुरार के , बऊ खौं दैबें मान |
बिटियाँ सौ जाने उयै , कृपा करत भगवान ||209
बिटियाँ आ ससुरार में , परदा में जब होय |
लछमी के तब रूप में , पाती इज्जत सोय ||210
सास ससुर अरु नंद कौ , मिलै खूब जब प्यार |
गुइयन सै बिटियाँ कहै , सोने सी ससुरार ||211
सुभाष सिंघई
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विषय -दिया
एक जला दइयौ दिया , गुइयाँ उनकी शान | जो सीमा पै कर गयै , प्रानन कौ बलिदान ||212
देरी में धर कै दिया , मनइँ राखियौ सोच | कभउँ नहीं ईमान में , ईसुर आबै लोच ||213
दिया कात सूरज सुनौ , हम तुम येकइ जात | तुम जलतइ हौ शाम तक ,फिर हम जलतइ रात ||214
अपन- तुपन ईसुर दिया , ईसुर बड़ौ कुम्हार | करमन कै हम तेल से , जलत बुझत संसार ||215
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विषय - घुरवा
घुरवा दूला सब घुरवा चढै , चारउ भइया राम | दशरथ सजै बरात खौ , चलै जनक के धाम || 216
घुरवा पै राणा चढ़ैं , लय प्रताप जू भार | सत्तर सेरा की सुनी , रखैं हाथ तलवार |217
लक्ष्मीबाई कौ सुनौ , घुरुवा आलीशान | लगा किले से कूँदनी , राखी रानी आन || 218
घुरवा की ताकत कहत , लिखत सदा विज्ञान | | इतने पावर हौर्स है , मिलतइ हमें बखान || 219
काठी कौ घुरवा बनौ , चढ़ै कृृ्ष्ण गोपाल | मातु जसौदा हँस रयी , तककै हौत निहाल ||220
घुरुवा हाथी खड़पुरींं , लै जाओं ससुरार | मिलत पठौनी हूँक कै ,साउन रहे बहार ||221
सुभाष सिंघई
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दोहे , विषय - गदिया
जी से कछु नहिं छूटतइ , चुखरयाइ बस शान | कात सुभाषा लोभ सै , गदिया पै दय प्रान ||222
टाटइयाँ खुद ही धरै , लरबै दै रय प्रान | गदिया में लठिया चपा , बगरा रय है शान ||223
करम न साजै बै करै , गदिया खौं दे दोस | काम पसरतइ देख कै , ईसुर खौ रय कोस ||224
गदिया खौं नहिं कोसियौ , कै गय दास कबीर | जैसइ करतइ हौ करम , बैसइ खिचत लकीर ||225
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दोहे , विषय-पातर
शब्द कोई भी हो, उसमें संदेश छिपा रहता है , यह पातर महिमा पर तीन दौहे निवेदित है
पत्ता - पत्ता जब जुरै , पातर बनकै आत | परसा ऊपै है लगत ,अन्न रहत मुस्कात ||226
हम पत्ता संसार कै , उड़त अकेले आज | पातर से हम जित गुथै , नौनें कर लै काज ||227
पातर से संदेश है , मिलजुर रइयौ यार | रसगुल्ला सीरा सदा , करै तुमारौ ढार ||228
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दोहे , विषय - लपसी
ढ़रक मुरक लपसी चली , मौं में गयी समाय | जाती बैरा कात गइ , इत्तौ जीवन आय ||229
गरम -गरम लपसी मिलै , नैक सिरा कै खाव |चार ढ़ड़ीचें ज्ञान की , सबखौ उतै बताव ||230
गुरयाई लपसी बनै , मजा तबइँ है देत |येसइ बातें हौ जितै , मन सबकौ हर लेत ||231
बात करत है कछु जनै , ज्यौं लपसी रय चाट |तनक नहीं पल्लै परत , कैसौं खड़बड़ राट ||🙏232
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दोहे , विषय - भड़उ (चोरनी)
भड़या मन नहिं राखियौ , भडउ न करियौ काम |सब डंका की चोट-से , नोनौं गापौ खाम ||233
भड़या -भड़या जब मिलै , बन जातइ है यार |भड़उ - भड़उ जब दो जुरै , कर बैठे तररार ||234
ब्याय वरातन में भड़उ , करैं न हमखौं माफ |गानौ गुरिया जित धरौ , कर देतइ है साफ ||235
भड़या तो सब चीन लै , भड़उ हौत गुड़यैल |थुथरी सै भोरी बनै , पर जानत सब गैल ||236
पति भड़़या पत्नी भड़उ , इनै न दइयौ दोष |इक दूजै कौ दिल चुरा , भरै प्यार कौ जोश ||237
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दोहे , विषय - नौटंकी
नौटंकी नेता करत , जनता खौं पुट़याँय |जीत-जात कै फिर हमैं , चींथ -चींथ कैं खाँय ||238
नौटंकी तिरिया करै , घर पूरौ हकलात |चकरी हौतइ खौपड़ी , कछू नहीं कर पात ||239
नौटंकी जीवन बनौ , अड़बंगें सब खेल |फुरसत नइयाँ दो घड़ी , करैं राम से मेल ||240
नौटंकी अब देखतइ , टीवी पै दिन रात |. बैठे ठलुआ चार है , बेतुक कौ चिल्लात ||241
नौटंकी चालू करैं , काँवर- सी लय थाम |कुरसी कै लाने फिरै , नेता चारौं धाम ||242
नौटंकी अब काँ धरी , जौ देखी है पैल |. अब नौटंका है मिलत , करत रात हर गैल ||243
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बुंदेली दोहे , विषय डेकची
नेता हमखौं डेकची, समझत है दिन रात अपनौ वोट पकाय कै , सूदैं करै न बात ||244
हम सब बनकै डेकची, पका देत है वोट |चमचा घुस कै रामधी , अलग करत है चोट ||245
पारौ चढ़तइ डेकची , मलकत खाकै भाप |करिया हौतइ पीठ है , सहत रहत है ताप |246
जौ मानव मन डेकची , फदकत रातै ख्याल |पक कै आवत बायरैं , मिर्च मसाले डाल ||247
तप- तप के करिया बनै , सुनौ डेकची खाल |पर साधू- सी रात है , रखतइ नही मलाल||248
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दोहे , विषय - किलकिल
किलकिल बिलकुल ना करौ , भरौ न मन में ताव |चार जनन के बीच में , गम्म खुदइँ तुम खाव ||249
किलकिल में ना कछु धरौ , बेमतलब की खाज |लरै लड़इया रात दिन , हुआ- हुआ आबाज ||250
किलकिल करतइ जब धना , मुड़ी चटक है जात |सरसुत्तौ सबरौ लगत , पकौ पकाऔ भात ||251
किलकिल हौ रइ देश में , कुरसी खौ ललचात |चींथे डारत गिद्द बन , कीं खौं कौ समझात ||252
कैकइ नैं किलकिल करी, राम गए वनबास |दसरथ खौं प्रानन परी , रइयत भयी उदास ||253
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बुंदेली दोहे, विषय - ऊँग ( नींद )
जीकी आँखन में भरत , काम तकत ही ऊँग जानौं ऐसौ आदमी , हौतइ ठर्रा मूँग ||254
लपट - झपट आगी जरै , , चुरै न ठर्रा मूँग |काम नईं कौनउँ करै , जीखौं चढ़बै ऊँग ||255
ठलुआ ठैगन कै घरै , पसरी रत है ऊँग |जौ हौतइ है आलसी, लेतइ उनखौं सूँग || 256
ऊखौं चढ़तइ ऊँग है , जीखौं अफरा छाय |कह सुभाष ऊ टैम में , कौनउँ नईं पुसाय ||257
एक यथार्थ कटु सत्य
नचनारी नचबै जितै , उतै न आबै ऊँग |पंडित बाँचैं जब कथा , पौचें जल्दी सूँग ||258
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विषय - बजरी
आँग भिड़ाकर गिलहरी , बजरी रइ है डार |कर रय जित है नील नल , राम सेतु तैयार ||259
भइया बजरी को महल , ई जीवन खौं जान |आतइ आँदी मोत की , गिरतइ धूर समान ||260
बजरी जैसै पल यहाँ , देखौ खिसकत जात |परो चिमानो आदमी , देखत है ऊँगयात ||261
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बुंदेली दोहे, विषय - बियाँनौ
दैव बियाँनौ राम खौं , भजन सुना के चार |चानै चरनन धूर है , करवें खौं उद्धार ||262
भजन बिआँनौ लौ प्रभू , आगें खौ दो गैल |सेवा करवै आपकी , पौचें हम तो पैल ||263
हमखौ चानै आपकी , छाया हरदम राय |नाम रटत हैं आपको , जौइ बियाँनौ आय ||264
लयैं बियाँनौ घूमतइ , राम नाम उच्चार |अगर बियाँनौ लग गयौ, हौजे बेड़ा पार ||265
विषय बियाँनौं है मिलौ , करें चूक ना भूल |येइ बियानै में खिलैं , राम नाम के फूल ||266
(हम अपनौ बियाँनौ राम जू के चरनन में लगान चाऊत है ) 🙏~~~~~~~~~~~~
विषय - बैरा
जितै धिगानौं हौ मचौ , हौवें बत बड़़याव |बैरा बनकै तब उतै , तनक चिमाने राव ||267
बैरा भी बन जाव जू , जितै गलत हौ दाव |लबरा दौदा हौं जुरै , करै कपट बतकाव ||268
बैरा बनकै ना सुनौ , जितै धरम पै चोट |सामूँ छाती दो अड़ा , जितै दिखत हौ खोट ||269
जान बूझ बैरा बनौ , ऊखौं का समझाँय |ऐं-ऐं हैं -हैं वौ करैं , हम चिल्ला मर जाँय ||270
सूदै बैरा भी तकै , रखत काम से काम |. दंद फंद में ना परै , मन में भजतइ राम ||271
बैरा कछु टैड़े मिलै , करैं उबाड़ै काम |. जौन काम खौ रौकतइ , बौइ लैत वें थाम ||272
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विषय - गिगयात
राम नाम सब भूल कैं , सुख में सब मुस्कात |दुख की डिबियाँ जब जलै , ईसुर लौं गिगयात ||273
पूत न हौबै जौन घर , पूरौ घर घबरात |सतरा पूजत चौतरा , फिरत रात गिगयात ||274
पौलें पट्टी जान गय , जिनकी तनक सुभास ||बै रातइ गिगयात हैं , आतइ मौरे पास ||275
जौन रुपैया लै गयै , मुड़ी धरैं गिगयात | देती बेरा शेर बन , टरका रय दिन रात ||276
ढला चला सब दो चलन , काहै खौं गिगयात |रखौ भरोसा राम पै , मन से रओ मुस्कात ||277
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विषय मरगटा
नईं अकेलौ मरगटा , और नईं सुनसान |रात दिना ऊकी चलै , चमकत रयै दुकान ||278
सबकै घर खौ मरगटा , देखत रत है घूर |चार दिना की जिंदगी , चार दिना हौ दूर ||279
बुझत चिता जब मरगटा , जलत दूसरी आन |ठठरी पै लद आत हैं , श्वेत पिछौरा तान ||280
मेला तक लौ मरगटा , नईं झमेला राय |जलकै बननै राख है , हवा चलै उड़ जाय ||281
जुरै नकइयाँ जब चिता , धूँ धूँ कर जल जाय |राख बनातइ मरगटा , डबला एक समाय ||282
ठठरी के संगै हते , मुलकन थी तादाद |हँसत मरगटा कै उठौ , खतम एक फिर म्याद ||283
ठठरी से कत मरगटा , जीखौं ल्याईं लाद |ऊकी बस औकात है , डबला भर की खाद ||284
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विषय - गजरा
गजरा बारन में बदौ , कजरा आँखन डार |निग रइ गोरी मैड़ पै , हरिआ रयी पुकार || 285
हरि+आ सुन कै आ गयै , हरि भी अब ऊ ठौर |गजरा खिलकै गिर गऔ , हरि चरनन की ओर ||286
बारन में गजरा जरा , हिलगौ सौ बस रात |निगबै में गजरा+ज-सी, अपनी चाल दिखात ||287
गजरा भी गजरा+ज नैं , प्रभु खौ दियौ पिनाँय|मगरा कै मौं से जितै , आकैं प्रान बचाँय ||288
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बुंदेली दोहे , विषय - नरदा
नरदा निकरै बायरै , पौचे गलियन बीच | दौरौ तब भिनकत रयै , मचै हिला कै कीच ||289
नरदा जानौ गाँव कै , खौटे नर जौ हौंय | जिनकै मारे सब जनै , बदनामी खौ ढौंय ||290
बिनतुआइ नरदा करी , पर गय बखरी हार | बेदखली भइ जौत से , मिलौ न पट्टौ यार ||291
नरदा खौ नर दा+ब कै , दै छत्ती सै भेद | फिर भी बदबू जै निकर , पाकै छुटकुल छेद ||292
नरदा हौरी के दिना , फूला सौ खिल जात | पटकत गुइयाँ चार है , पूरौ आँग भिड़ात ||293
आँगन बिच नरदा रयै , रहबै साला आन | दौनउँ बुरय बसात हैं , मोखौ इतनौ ज्ञान ||294
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बुंदेली दोहे विषय - गडला
तीन चका गडला सुनौ , धर्म अर्थ अरु काम |
मोक्छ द्वार पाटी लगै , जीमैं रैतइ राम ||295
गडला कौ आगै चका , लगै धरम कौ रूप ||
अर्थ -काम कै पिच्छु है , चौखट मोक्छ अनूप ||296
गड़ला में हम देखतइ , तीन लोक की चाल |
आड़ी तिरछी सूदरी , सबइ मिलातइ ताल ||297
चलतइ घुँटरू राम जी, दशरथ जू के गेह |
गडला निसचित आन कै , पा गव हुइये नेह ||298
तीन लोक प्रतिरूप कौ , गडला संगै रात |
मौं खौलत श्री श्याम जू , जसुदा पार्थ बतात ||299
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दोहे ~ विषय - ठूसा
ठूँसा ठुसकी कृष्ण खौं , मारत मुसकी गोप |
उतइ घालती गोपियाँ , ठेंगा की अब तोप ||300
ठूँसा लगतइ लंकनी , कात सुनौ हनुमान |
भड़या रावण जानगइ , मिल गव मौखों ज्ञान ||301
ठूँसा हौबें प्रेम कौ , होय लँगुटिया यार |
ऐसे ठूँसा देत है , दिल खौ भौत करार ||302
दुनिया में हम देखतइ , ठूँसा कई प्रकार |
गुरु कौ ठूँसा सार दे , सजनी ठूँसा प्यार ||303
मटकीलौ ठूँसा लगै , ठेंगा भी चटकील |
सजनी जब साजन तकै , आँखन से दै ढील ||304
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दोहे - कचुल्ला (, कटोरा)
भरैं कचुल्ला में मठा , जीमें लगौ बघार |
खाबै दइयौ राम जी , रोटी पूरी चार ||305
नहीं कचुल्ला फूटवै , ना खाली भी होय |
रामा कै परसाद कौ , भरौ चाउँने मोय ||306
रामा तौरे नाम सै , भरत कचुल्ला ऐंन |
खाबै की बैरा कभउँ , कितउँ भई ना ठेंन ||307
नहीं कचुल्ला थाम कै , माँगन जइयो यार |
नाम जपौ घर राम जी , भरबै उतइँ अपार ||308
जितै कचुल्ला टौकलौ , भीतर राखै होय |
उतै राम जी का करै , सोस परौ है मोय ||309
कितउँ कचुल्ला राम जी , कभउँ न रीतौ होय |
करियौ बस इतनी कृपा , कौउँ न भूखौ सोय ||310
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बुंदेली दोहे, विष़य - हेंसा {हिस्सा)
हेंसा दइयौ राम जू , करबें खौ कछु काज |
कौनउँ दीन गरीब कौ , करबाँ सकै इलाज ||311
हेंसा उत भी चाउनै , जितै देश की बात |
दुश्मन जब गर्राट दै , मार आँय हम लात ||312
हेंसा कभउँ न भूलियौ , मोरौ भी जू राम |
हर हालत में चाउनें , रैबें बैकुठ धाम ||313
बड्डे बखरी पा गये , मजले खेत अथाइ |
हेंसा छोटे खौ मिलौ , बूड़े बाप मताइ ||314
हेंसा लैकें जानियौ , जीमें रत सम्मान |
नौनों सबसें बोलियौ , देत दया को दान ||315
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विष़य -बतकाव (बातचीत )
इज्जत दौ कोड़ी रयै ,कोउँ न देतइ भाव |
लम्पा जैसो ऐड़ कै , जो करतइ बतकाव ||316
करिया और गुड़ैल जो , खातइ रत है ताव |
लिगाँ न उनखौ राखियो, करबें खौ बतकाव ||317
लबरा दौदा लालची , कपटी और सियार |
इन सबके बतकाव में , टपकत देखी लार ||318
बोल गुरीरे शब्द खौ , भलौ करे बतकाव |
चार जनन के बीच में ,मिठबोला है साव ||319
चलनी जैसो चाल कै , संत करत बतकाव |
सबरै ऊखौ मानतइ , तकत ऊजरै भाव ||320
फरी डार झुक जात है , करत -करत बतकाव |
नैनू जैसे रात है , ऊ मानुस कौ भाव ||321
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बुंदेली दोहे विषय- नकटा
करम करत खोटे सबइ ,लाज शरम सब खोत |
ऊखौं कैतइ पंच गण , बें सब नकटा होत ||322
सूपनखा नकटी बनी, धरौ गलत प्रस्ताव |
रावण भी नकटा बनो , सीता खौ हर ल्याव ||323
नाक कटत ऊ काम पै , जीमें गड़बड़ योग |
नकटा मौं पै बोल दें , गैल चलत कै लोग ||324
नकटा हौतइ लोग है , नकटी हौत लुगाइ |
लाज शरम सब बैच कै , करतइ दत निपुराइ ||325
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दोहे ~न्योरे ( झुककर )
जो न्योरे नहिं निग सकै , गैल चलै फुसकार |
ऊखौं उपटा है लगत , काँटे गुचैं हजार ||326
होना न्योरे जब तकैं , ज्ञानी बैद हकीम |
खबर -दबर भी लीजिए , कीजै राम रहीम ||327
दुृ्ष्ट और दुश्मन मिलै , करौ न न्योरे बात |
गटा मिला कै चल पड़ो , यही सुभाषा कात ||328
न्योरे हौतइ देख कै , चढ़तौ रिश्तेदार |
भारत की है यह प्रथा , जीमें दिखतइ प्यार ||329
गगरी न्योरे कूप में , भरतइ जल खुद आन |
यैसइ हम तुम पा सकत , गुनियन से गुन ज्ञान ||330
दशरथ जनक मिलाप में , जुड़े हुए थे हाथ |
दोनों ही न्योरे करें , इक दूजे खौ माथ ||331
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बुंदेली दोहे विषय- गटा {आँख)
अच्छौ नोंनौं देखवें , गटा देत भगवान |
फिर भी खोटौ है तकत , ई जग में इंसान ||332
गटा सबइ के बोलतइ , नचतइ हैं वें खूब |
परखइयाँ पढ़ लेत है , कितै चरा रय दूब ||333
कर देतइ चुगली गटा , परै उनै ना चैन |
पलकै मिलका कात है , आगूँ कैसी ठैन ||334
जी मोड़ी कै दो गटा , सरमा कै झुक जात |
ऊखौं नौनीं जानियौ बूड़ें बुजरक कात ||335
गटा गड़ा कै हम लिखैं ,पढियौ आप सुजान |
भूल चूक भी हो अगर , दइयौ माफी आन ||336
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विषय -कुकात ( खुजलाना )
अलफतिया से घूमतइ , चुगला लबरा श्वान |
बैठे जितै कुकात है , भिनका दें इस्थान ||337
सूपनखा पुटया रयी , लल्लो-चप्पो बात |
लखनलाल ने खच्च की , ऊकी नाक कुकात ||338
जीखौं कर्जा चाउने , बोइ सेठ लौ जात |
पथरा ढूड़े खुरदरौ , जी कौ आँग कुकात ||339
कुत्ता चमचा ताकियो , लार रतइ बगरात |
लठ्ठ धरौ जब खैंच के , भगतइ पूँछ कुकात ||340
जीकौ आँग कुकात है , बोइ जानतइ मार |
कुका- कुका के खून की , छोड़ देत है धार ||341
जीखौ बिदतइ गट्ट है , बोइ निनुरबे जात |
बरना पसरो गेह में , अपनौ आँग कुकात ||342
जीत गये सरपंच जौ , तननाने से जात |
फुननाने हारे चलें , अपनी मुड़ी कुकात ||343
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बुंदेली दोहे , विषय - धरे
लेखन में नौनें धरे , कैबें कौनउँ बात |
तबइँ बनत दोहा अमर,बरना धूर उड़ात ||🙏344
धरे कथ्य दोहा कहौ, बन जातइ है शान |
चार जनन के बीच में, भौत मिलत है मान ||💐345
तुकमुल्ला दोहा रचौ , धरे न कौनउँ सार |
ऐसे दोहा हौत है , दो दिन में बेकार ||😴346
तेरह ग्यारह तुक मिला , धरी न कौनउँ बात |
लिखबौ तब पनबेसुरौ , धरे -धरे सड़ जात ||🤔347
तुलसी सूर कबीर नै , धरे कथ्य अनमोल |
उनकै दोहा आज लौ , है सोने की तोल ||🙄348
बुंदेली इस मंच पर , सबइ कथ्य है कात |
दोहा भी नौनें धरे , नौनी इतै जमात || 🙏349
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बुंदेली दोहे विषय समदी ,
सासउँ समदी है शगुन, हरौ भरौ है खेत |
बाप बराबर जानकै , बिटिया छाया लेत ||350
बिटिया की ससुरार में ,जब समदी नहिं होय |
गलती हो दामाद से , बिटियाँ कीनौ रोय ||?351
समदी तो बस दो हुयै , पैले अबद नरेश |
दूजे मिथिला के जनक , जिनके जुरै हृदेश ||352
कुछ हास्य -
समदी स्वापा बाँद कै , समदन खौ डुरयाँय |
तीरथ करबे कड़ गये , लेन धरम की छाँय ||353
बेटा की ससुरार मैं , समदी बनकै जाव |
लुचइ बरन दों माँय तुम , मालपुआ खौं खाव || 354
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बुंदेली दोहे , विषय- कुची {चावी)
कुची कात है सुन लियौ, मौरी नौनीं बात |
हमें हिरा तारे कुटै , पसरे सहकर घात ||355
तारौ लगौ लिलार पै , करम कुची से खोल |
मिलै भाग्य में जो तुमै , बीन लेव अनमोल ||356
तारौ कत है री कुची , रइयौ मोरे पास |
तै लिपटत जब प्रेम से, खुलतइ गाँठ खटास ||357
कुची और तारे कहैं , हम तुम गुइयाँ यार |
नाँय माँय जब हम हुए , तब दोनों बेकार ||358
कुची जानतइ मंत्र है , तारे कौ सब भेद |
पुटया कै है खोलती , तारौ करे न खेद ||359
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विषय - दच्च ( नुकसान )
दच्च लगन नहिं देत हैं , बचत लखन के प्रान |
परवत डिरुआ हाथ पै , उठा ल्याय हनुमान ||360
दच्च लगी थी राबने , चट गव पूरौ वंश |
ठठरी भर खौ बारबे , बचौ बिभीषन अंश ||361
दच्च लगी दुरयौधने , चाट पौंछ लय भ्रात |
तकत सबइ धृतराष्ट्र खौं , हाथ मलत पछतात ||362
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विषय तीती ( गीली)
फूल झरत मुइयाँ लगे , लगतइ तींती बात |
नौनों मन जो भी रखै , उये जगत्तर चात ||363
लू में तींती तौलिया , तरुअन पै लो ढाँक |
पानू गटकौ डार कै , निबुआ की दो फाँक ||364
तींती पट्टी टेंटुआ , रख लौ जरा लपेट |
भगतइ देखों टोनसिल , परतइ उये चपेट ||365
तींती चीजैं ही करै , पंचकर्म उपचार |
चिकनइ आती है बदन , भगै रोग हरिद्वार ||366
छाती के सब रोग भी , छू मंतर हो जाय |
तींती पट्टी उत रखो , जैसौ वैद्य बताय ||367
मूड़ सुभाषा जब दुखै , तींतो करत रुमाल |
फेर लेत दो बेर है , माथौ आँखें गाल ||368
बुंदेली सुनतइ लगत ,मोय गुरीरौ स्वाद |
रूखड़ता जीमें नहीं , तींती सब बुनियाद ||369
एक हास्य
तींती सब कंडा धरै , पकरत नइयाँ आग |
धुआँ कड़ै लुगरायदौ ,कैसे चुरबै साग ||🙏370
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दोहे -गड्ड बड्ड
गड्ड बड्ड सब बोलरय , सासी रहे न रान |
कीखौ दैकें आय है , अपनो वोट निशान ||371
गड्ड बड्ड वें कर गए , अपने दता निकार |
फैला गय है रायतौ , भिनका गये अचार ||372
गड्ड बड्ड वें गा रहे , मिलत नहीं तुकतान |
मूसर घालें जात है, उखरी में बिन धान ||373
गड्ड बड्ड अब मुड्ड है , सबखौ पटकै खड्ड |
अड़बड़ बक तड़बड़ करें ,फिरतइ बनें उजड्ड ||374
गड्ड बड्ड खड़बड़ मची , तड़बड़ थे जब वोट |
गड़बड़ - सड़बड़ देख कै, तड़तड़ बँट गय नोट ||375
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बुंदेली दोहे , विषय चीकनो
ठगो जात है चीकनो , मुड़त मुड़ी कै बार |
लये रुपट्टी एक है , करबै उसे हजार ||376
छुरा चला कै मौथरौ , सबइ मूड़तइ बार |
बात न समझे चीकनो , लुटतइ सरे बजार ||377
पाँच चबन्नी चाहता , लये रुपट्टी एक |
खोटी लेकें चीकनो , करतइ फेंकम फेक ||378
घड़ा चीकनो है जितै , बूँद रुपै ना ऐक |
ऐसइ चिकना है करत , दें बातन खौ फेक ||379
बात अगर हो चीकनी , लगबें ऊमै सार |
कहत सुभाषा पंच सब , करै उसे स्वीकार ||380
पथरा घिसना चीकनो , छुटा न पाबै मैल |
जानो चिकना जौन नर,साजी चलत न गैल ||381
देखत हम सब चीकनो , करतइ चरबदआव |
और घिनापन हर जगाँ , पइसा करत चपाव ||382
हम तौ गय तै हाट में , मिलौ चीकनो रोत |
मोलभाव ना सट रहौ , काँसै सौदा होत ||383~
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शब्द - मिर्ची
मिर्ची लगती है वहाँ , जहाँ सत्य दे ताल |
उखड़ रहा हो झूठ के ,पंड़ो का पंंडाल ||384
मिर्ची लगना भी सुना , पढ़ा कहावत ज्ञान |
मिर्ची लगती बात से ,कड़वी जहाँ जुबान ||385
मिर्ची जी का राज है , जहाँ मसाला गान |
मिर्च मसाला नाम से , मिलता है सम्मान ||386
अब कुछ दोहें आयुर्वेद में -
रक्त चाप मधुमेह में , मिर्ची करे कमाल |
लिए विटामिन 'सी' सुनो , तन का रखती ख्याल ||387
प्रतिरोधक क्षमता लिए , मिर्ची होती तेज |
भरा विटामिन 'ई' सदा , सुखमय करता सेज ||388
कैंसर से मिर्ची सदा , करती दो-दो हाथ |
पाचन भोजन भी करे , आँतों का दे साथ ||389
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भुन्सारे की कुर्रु खौं , नोनों कत है लोग |
घुरवाँ जैसो बल रहें , लिड़या जावें रोग ||390
कार्तकेय कुर्रू लगा , नापत रय संसार |
गणपति अक्कल खौं लगा , बने प्रथम सरदार ||391
कुर्रू देके जब गगन , निकर गये हनुमान |
पर्वत लेकै आ गए, बचे लखन के प्रान ||392
कुर्रू दइ़यो सामने , दुश्मन जितै दिखात |
पाछे की कुर्रू सुनो , लिड़पेंदा कहलात ||393
सदा लगाएं कुर्रु खौं , भुखाभुखे जो कोय |
तन नोनों हो जात है ,बाल न बाँका होय ||394
कत सुभाष हम सूदरे , कुर्रू खूब लगात |
जितै ज्ञान बगरौ डरो , रैवों हमे पुसात ||395
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जरुआ-भरुआ सब जगाँ , इन्हें न डारौ घास |
माँय बरन दो भाँड़ में , नहीं बनन दो खास ||396
हँसकै ना अब बोलियो , गुइयाँ सुन लौ बात |
जरुआ पूरौ गाँव है , बकतन नहीं अघात ||397
गुइयाँ हँस कै बोल गइ , उनखौ लग गइ आग |
जरुआ थुथरी रय चला, गा बदनामी राग ||398
जरुआ बगरा रायतो देतइ दाँत निपोर |
काम नसा कै मानतइ , देत गुली--सो फोर ||399
जरुअन से कातक लरै | , सोसत रहत सुभाश |
जरुआ फेलै हर जगाँ , करतइ सत्यानाश ||400
जरुआ मिलकै दे नसा ,अच्छौ नौनों काम |
पूरे दिन कुढ़कर सदा , चलते है अविराम ||401
जरुआ जर कै एक दिन , करन लगो बकवास |
तुमने कैसे जौर लय , तुमने सारे खास ||402
जरुआ जर कै खाक हों , उड़तइ रत है राख |
करनी जो अच्छी करे , ऊकी बनतइ साख ||403
जरुआ की नहिं पूछियो , भइया कित्ती आग |
डमा लगावें घूमतइ , देवें सबखौ दाग ||404
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जौन रिसाने लोग है , वें परवाँ रय पाँव |
करत थराई घूमते , प्रत्याशी अब गाँव |405
मिलें रिसाने जन- जनीं , या कौनउँ मिष्ठान |
माछी भिनकत है उतै , सूनी रहत दुकान ||406
लोग रिसाने लग रहे , है मँहगाई मार |
सौ से ऊपर तेल है , कैसे लगे बगार ||407
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देरी खूँदे खात है , नेता दय खरयाट |
घी चुपरी बातें करें ,लेत खुपड़िया चाट ||408
नेतन के खरयाट की , काँ लौं कैवें बात |
वोट झटकवें बाँटते , पउवाँ आधी रात ||409
ठाड़ौ भयो चुनाव में , माते जू को पूत |
खूब करत खरयाट है , बनो दरोगा दूत ||410
हाथ जोरतइ बाप है , लरका दय खरयाट |
बन ना पाने पंच है , खड़ी रनै है खाट ||411
बनतइ सबरे सूदरे , छोड़छाड़ खरयाट |
पैले नम्बर सब दिखे , छोड़ कुआँ के खाट ||412
जिनने दव खरयाट है , वे बन रय सरपंच |
हिस्ट्रीशीटर जो रहे, अब सोना सौ टंच ||413
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उनखौं तातो लग गयो , कह दइ साँसी बात |
नोन मिरच खौं डार कै , काहे काम नसात ||414
तातो देवै तीन. है , तन खौं लगतइ झार |
खरी बात, साँसी कहिन, चुका शकल की मार ||415
लबरा लोभी लालची , ताती रखतइ लार |
लम्पट इनको मित्र बन , बनतइ लम्बरदार ||416
तातो भोजन ठंड में , तन खौ सुख भी देत |
ताती- ताती चाय भी , जड़कारो हर लेत ||417
विषय दओं तातो भलो , राना जू ने खोज |
तातो तातो लिख चलो , ठंडो करौं न ओज || 418
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सुने बिलोरा तीन है , कपटी -काग- सियार |
मुख खौ मारे जिस जगाँ , देतइ काम बिगार ||419
मोय बिलोरा ना मिले , ना बिलुरें हम आज |
नहीं बिलुरियो आप जू , सुफल होय सब काज ||420
बिलुर -बिलुर हम जात है , लगो बिलोरा साथ |
इन बिलुरन से राम जू , छुड़ा देव अब हाथ |421
बनें बिलोटा घूमतइ , करत बिलोरा काम |
उन बिलुरन. की एक दिन , बिलुरत देखी शाम ||422
जोन होत. जै मान्स हैं , छींछालेदर काम |
करत बिलोरा हर जगाँ , ठंड तकें ना घाम ||423
भलमनसाहत छोड़ के,छोड़ शरम सब लाज |
दाँत निपोरें घूमतइ , करत. बिलोरा काज ||424
जितै बिलोरा होय जू , मिलत करेजे घात ||
चटा बिलोटा जात के , करें गुरीरी बात |425
लिखे बिलोरा रामधइ , कलम रही मुस्काय |
शब्द ढूँढ़ राना करें , काँसे पकड़ लियाय ||,426
नसादेत हर. काज खौं , जिते बिलोरा होय |
सूदो सादो मान्स तब , मुड़िया धर के रोय ||427
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गुदनारे बन श्याम जू , गुदना रय है गोद |
पकर कलाई राधिका , मन में भरैं . प्रमोद ||428
राधा जू भी कै रयीं , तुरतइ लिख दो श्याम |
संगे सूरत भी बना , गुदना में अविराम ||429
जैसइ सूरत मन बसी , बैसइ गुदना होय |
जैसी मंशा लाय हो , पूरी होगी तोय ||430
कौन सुरतिया मन धरै , ई बैराँ जाँ शाम |
मौं ताकत तब रह गए , गुदना बारे श्याम || 431
लीलाएं जै राधिका , मिलकै करते श्याम |
गुदना को वरनन सुनो, सो लिख दओ अविराम ||432
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घलत लबुदिया सब रटे , मिले हते जो पाठ |
असुआ डारत पढ़त रय , दो चौका है आठ ||433
घलत लबुदिया जोर से , ओरी आतइ ख्याल |
मास्साब जहाँ मारते , होत चामरो लाल ||434
बाप लबुदिया मारता , जीमें राती सीख |
पढ लिख कै बन आदमी , कभउँ न. मांगे भीख ||435
दिखलाती है दूर से , उठा लबुदिया रोज |
दादी को हथियार यह , पेड़त मन में ओज ||436
कौन आदमी है इते , घली जिसे ना मार |
एक लबुदिया बड़न की , रखतइ नोनों प्यार ||437
पर होतइ कुछ ढोर है , असर न जिनखौ होय |
मारत जाओ लबुदिया , जितनी चाहे ओय || 438
नोनीं धोनी जो बनी , लिखीं लबुदियाँ यार |
सेवा में हाजिर करत , जिसे करो स्वीकार ||🙏439
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उखरी जी खौं कात है , गड़ी जमीं में होत |
मूसर से कुटतइ रहे , सब कष्टन खौं ढोत. ||440
गढ़ी जिये हम कात है , उखरी खूब दिखात |
खावे नइयाँ डौल है , फिर भी बेर बतात ||441
कोड़े पर कोड़ी नहीं , मिले लुअर की ताप |
चलत फिरत जो आदमी , गड़िया ऊखौं छाप ||442
नाक छिदी नथुवा कहै , कान छिदो कन्छेद |
पातर. खाके छेदता , नहीं नाम को भेद ||443
जीखौ कत है गुनचुनू , मिले न गुन भी चार |
लेकै देखो हाथ. में , दिखे न कौनउ भार ||444
माउर लागे पाँव में , मौं उर में ना काम |
गड़बड़ झाला चल रहा , कैसें रख लय नाम ||445
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ठठरी बँधवे के पैलऊँ , करियो नौने काम |
पसरो राने ठाठ सब, जप लो सीताराम ||446
विषय भलो ठठरी दियो , राना जू श्रीमान |
मुरदा जी पै लेट के , जातइ है शमशान ||447
ठठरी बँधतइ जौन दिन , धरो रहत सब ठाट |
धरती तक पै पार के , छीन. लेत है खाट ||448
ठाट बाट सब निपुर गय , ठठरी बोले अर्थ |
बरबै जाओं मरगटा , तन है घर में व्यर्थ ||449
राम नाम ही सत्य है , ठठरी पाछे बोल |
पंच सबइ तन झौंकवे , करें न कौनउ झोल ||450
ठठरी पै गठरी बनो , तन. जातइ. शमशान |
लुअर लगा कै सब जनै , बोलत जातइ राम ||451
ठठरी सुने न काउ की , मुरदा खौ ले लाद |
ले जातइ वह मरगटा ,तन खौ करवे खाद ||452
ठठरी बँधतइ देखकर , बने पजोखों योग |
तेरई तक डिड़यात है , घर के मिलके लोग ||453
बांध दई जैसी बनी , मैंने ठठरी आज |
एक दिना सबको परै , ई ठठरी से काज ||454
ठठरी कभऊँ न भूलियो , ठठरी अंतिम ठाठ |
जी पै जी ने लेट कै , कभी न पकरी खाट ||455
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नन्ना खौं दें सब जनै , जुरकै खूबइ मान |
मिलत रहत. है छाँयरो, नन्ना जहाँ प्रधान ||456
नै कै निगियों सब जनै , नौने बोलो बोल |
नन्ना जू सबसे कहै , रखियों अपनो मोल ||457
कभउँ न नन्ना जीभ पै , नइयाँ लाते बात |
सबरे भइयन खौं रहें , नन्ना जू सौगात ||458
निपुर जहाँ पै काम जै , नन्ना आतइ काम |
बलदाऊ बनकर रहें , लौरे मानें श्याम ||459
जी जी खौं नन्ना मिले , या जो नन्ना होय |
नन्ना की पगड़ी उतै , रखियों मिलकै सोय ||460
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एक जला दइयौ दिया , गुइयाँ उनकी शान |
जौ सीमा पै कर गयै , प्रानन कौ बलिदान ||461
देरी में धर कै दिया , मनइँ राखियौ सोच |
कभउँ नहीं ईमान में , ईसुर आबै लोच ||462
दिया कात सूरज सुनौ , हम तुम येकइ जात |
तुम जलतइ हौ शाम तक ,फिर हम जलतइ रात ||563
अपन- तुपन ईसुर दिया , ईसुर बड़ौ कुम्हार |
करमन कै हम तेल से , जलत बुझत संसार ||464
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जरै दिया से अब दिया , बगरै खूब प्रकाश |
सबखौं है शुभकामना , बनै दिवारी खास ||465
नहीं दिवारी पर इतै , हम बगरा रय ज्ञान |
लुअर पटाखन पै रखौ , बस थोरौ सो ध्यान ||466
महावीर निर्वाण भय ,राम अजुध्या आय |
सुखद दिवारी हो गई , लछमी पूजन पाय || 467
और भौत सी है कथा , नहीं रहै हम बाँच |
सबइ कथा संदेश दें ,कात सुभाषा साँच ||468
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जुरी सभा में द्रौपदी , रइ असुअन खौं ढार |
लाज हमाई राखियौ , करतइ किसन पुकार ||469
मोखौ चरनन राखियौ , बृजबसिया गोपाल |
जौ लौ तन में स्वाँस है, करियौ मोरौ ख्याल ||470
ढौर बछेैरू राखियौ , दइयौ सानी रोज |
दूध दही भंडार रै , खाकैं भरियौ ओज ||471
दैकें आप जुवान खौं , सदा राखियौ मान |
वचन निभाबौ है धरम , चलै जाय चय प्रान ||472
इज्जत अपनी राखियौ , रखियौ अपनौ मोल |
बगर जात है रायतौ , जित हौं खाँड़े बोल ||473
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हम थोरौ बस कात है , बुरब न मानें आप |
एक बार लिखकैं पढौ , गुनौ चूक चुपचाप ||474
पतौ सबइ चल जात है , चूक किते है यार |
तेरह की यति देख लौ , थोरौ मात्रा भार ||475
कलन अगर थोरौ गलत , हौत उतइँ है टूट |
भरौ कथ्य दोहा सही , जग को लेता लूट ||476
थोरौ - थोरौ सीख लौ , मिले जितै भी ज्ञान |
झुकत कुआँ में बालटी ,कर लेबै जलपान ||477
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कक्का घर में होत हैं , सबकी सुनतइ बात |478
मौड़ा जब लड़यात हैं, जाकैं जै पुटयात ||
छोटे भइया खौ बँदत , कक्का की है पाग |
सब कामम में पूछतइ, घर में रत अनुराग ||479
कक्का यैसइ नइँ बनत ,जुटौ सुबह से शाम |
बउयैं लरका टैर कै , पकरा देती काम ||480
कक्का तुम बिन ना चलै , ढला चला लय देख |
घर खौ तुमइँ सबारियौ , बउयैं बाँचैं लेख ||481
कक्का स्वापी बाँद कै , गाँव गली में जात |
और जनै बैठार कै , अपने काम बतात ||482
कक्का से कक्को कहत , तुमै मजा भी आत |
सबकी टउका में जुतत , फिर भी तुम मुस्कात ||483
काम परै कक्का कहत , बेइ बनत फिर बाप |
कात सुभाषा है इतै , सबकी अपनी खाप ||484
खाप = पंचायत
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भुन्सारे निन्ने पियौ , तातौ पानी रोज |
बात पित्त जौ सब हटै ,कफ कौ मिट जै खोज ||485
भुन्सारे निन्नै अगर , तुलसी दल दो खाँव |
चार कोस तक तुम चलौ , कभउँ थकें ना पाँव ||486
सुबह उठौ निन्ने अगर , पकौ पपीता खाव |
हृदय रोग से कर उठौ , पैलउँ आप बचाव ||487
छिलका लेव उतार तुम , फूली हौ बादाम |
निन्ने आप चबाइयै , है ताकत अंजाम ||488
चना फुला लौ रात से , निन्ने उन्हें चबाव |
कह सुभाष तुम देख लो , ताकत घुरवा पाव ||489
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ठट्ट लगौ भारी हतौ , रावन के दरबार |
लत्ता लयँ हनुमान की ,कर रय पूँछ निहार ||490
चित्त पट्ट सब कर रयै , फैला रय है खट्ट ||
लट्ठ घुमा के जोड़ते , बेमतलब कौ ठट्ट ||491
अकल अजीरन जब मिलै , चुप हौ जाऔ झट्ट |
नाँतर बौ ऊदम करै , और जोड़ लै ठट्ट ||492
ठट्ट लगाबौं है सरल , कठिन सार की बात |
मलम धरै नइँ कौउ है , राखैं सबरै घात ||493
मंत्र न बिच्छू जानतइ , पकरत फिर रय साँप |
ठट्ट देखबें खौ जुरौ , कैसे रय बें काँप ||494
दुनिया कै जो ठट्ट में , रखतइ कर्म प्रधान |
देखत ऊ खौ सब जनै ,और करत सम्मान ||495
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दुनिया भी भटिया बनी , जीबै जौ भी आत |
एक दिना सब मरगटा , बरबै लद कैं जात ||496
कछू जनै भटिया बनत , तातौ रखत मिजाज |
तुनक फुनक जल्दी करत , मानत नईं रिवाज ||497
थुथरी राखत जौ बुरइ , कात जगत्तर बात |
कड़तइ भटिया आँच-से, सबखौं बोल सुनात ||498
मन भटिया जीकौ दिखे , सबइ बिगारै काज |
कछू हौत गंगा जमुन , सदा बचाबैं लाज ||499
जितै हौत झगड़ा मिलै , सब भटिया हौ जात |
बात हौत चैकाउतीं , ठाडैं बैठै घात ||500
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सूर्य रोहनी चंद्र कै , घर में रैबै आय |
उतरत जैठे नौ तपा , धरती पै लग जाय ||501
मंगल बुध जी भी करें , शनि से सप्तक योग |
आगी बरसे नौतपा , धरती होय निरोग ||502
एक बात साँसी सुनौ , जेठ मास कौ घाम |
रोग हरत सब नौ तपा , धरती कौ अविराम ||503
जेठ माह उतरन लगै , सूरज तेज दिखात |
जीखौं कातइ नौ तपा , ज्योतिष यह बतलात ||504
तपा अगर चूँ जाय तौ , लोग कात यह बात |
बारिश नौनीं ना रयै , हौ बसकारैं घात ||505
मानव तन बैक्टीरिया , देतइ तपा निकाल |
कातइ यह साइंस है , पढ़ा सुभाषा हाल ||506
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गरई बात न जब दिखे , लोग देत नइँ ध्यान |
जैसे हम तुम है सुनत , कउवा लै गव कान ||507
जम भी जातइ है सदा , मरयादा की बात |
गरई रयै न खैप तौ , मुड़िया पै हिल जात ||508
गाँठ गुड़ी हौतइ गरइ , संगे मन कौ मैल |
बदन खाक करतइ सदा , बंद हौत सब गैल ||509
हम तुम लिखवें सब गरइ , दोहा में सब बात |
कथ्य भरें सब तथ्य से , दें सबखौं सौगात ||510
ज्ञानी की बातें गरइ , सदा आउती काम |
अजमा लौ मौका परै , कह सुभाष अविराम ||511
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सिंदुकिया चापैं कमर , पौचे राधा धाम |
गुदनारी कौ स्वाँग धर ,घूम रयै है श्याम ||512
सिंदुकिया डुकरा चपा , करत न सूदैं बात |
धरौ पसेरी भर सुनौ , घर में सबसे कात ||513
सिंदुकिया बहुऐं तकै , दद्दा खौं पुटयाँय |
शाम सुबह ताती लुचइँ , अपने हाथ खिलाँय ||514
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नानो हौतइ सार है , लेना भाइ बटोर |
समझो गुन देखौ उयै , मन से करौ निहोर ||515
नानो हौतइ नोंन है , नानो हौतइ चून |
सत्संगत दौनों करै , बढ़ै मनुज कौ खून ||516
नानो जिनकौ दाँव है , लगतइ नईं सुराग |
बेइ सयाने आदमी , बचा लेत है दाग ||517
नानो जिनखौ ज्ञान है , बाँचत वेद पुरान |
पंडित जू कैलात है , हम बनतइ जजमान ||518
दोहन में जो भी रखत , कौनउँ नानो कथ्य |
अमर सदा लेखन रयै, रखतइ जौ भी तथ्य ||519
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त्रेता युग अभियांत्रिकी, गयै नील-नल ताड़ |
राम नाम परताप सें , पुल की बनै जुगाड़ ||520
जानत जनम जुगाड़ का , भारत है आधार |
चल जाती इस देश में , मिलीं जुलीं सरकार ||521
लै जौरा की फौज भी , अच्छी भरत जुगाड़ |
हौ -हौ सब मिलकै करैं , कर दैं तिल कौ ताड़ ||522
हाथ जौर विनती करौ , कर लौ सबइ प्रनाम |
जीकै पास जुगाड़ है , बौ है आज महान ||523
पास सदा ही हौत हैं , जीकै पास जुगाड़ |
बिन जुगाड़ सब रौत हैं , अपनै मौखौं फाड़ ||524
सबइ कुँवारै खुश रयैं , दद्दा करें जुगाड़ |
हाँड़न में हरदी लगै , दैत व्याव से आड़ ||525
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काँलौ कीसै का कहै , सबकै अलग मिजाज |
जूँ ना रैंगत कान पै , तला लौर रइ लाज ||526
मूरख सै भेरौ परौ , काँलौ अब समझाँय |
पथरा से मुड़ियाँ घलै , टुकलौ लैकैं आँय ||527
भैस लौर गइ देख लौ , पूरौ काम नासाय |
कालौ हम समझाँय अब , अडुआ अब दिखलाय ||528
छिटक जुदइयाँ कात है , करौ प्रेम की बात |
काँलौ अब किस्सा चलै ,करौ फिकर ना रात ||529
काँलौ झेलैं हम उनै , मुड़िया कौलें खात |
अपनी-अपनी धाँदतइ , सुनै न कौनउँ बात || 530
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तड़का सौ भड़का लगत , काटत सबखौं घाम |
पानी बरसौ नैक है , रऔ चिपचिपा चाम || 531
प्यासी धरती जानियौ , है भड़का परिणाम |
धार पसीना की लगी , कैसे करबैं काम || 532
भींज गई है तौलिया , पौछत -पौछत आँग |
दूजी दे दै अब धना , मुन्सेरू रव माँग ||533
नेतन खौ भड़का परौ , आ गय पास चुनाव |
दौरे जौरत हात हैं , कौउ न दे रव भाव ||534
जी तलफत भड़का परै , बैत पसीना धार |
बिजना लैकें हात में , करत तनिक उपचार || 535
उमस हवा में रात है , मन हौतइ बैंचैन |
कत भड़का सब लोग है , मुश्किल कटतइ रैन ||536
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इक्कर उनकी चल रयी , कात नीम खौं आम |
हाँ जू - हाँ जू सब करैं , भुन्सारे से शाम ||537
इक्कर जिनकी चल गई , अब गैलै सब बंद |
नईं पुछैया कौउ है , कैसे गा रय छंद ||538
नेता जीत चुनाव खौं , इक्कर चलतइ चाल |
बिना पतै के रात दिन , खूब बजातइ गाल ||539
इक्कर कौ चक्कर चलै , देखै सबकै राग |
गात लड़ैया पूस में , हुआ-हुआ की फाग ||540
इक्कर खौं टक्कर मिलै , नईं सुभाषा देर |
मिलत शेर खौं गैल में , सदा सबा है शेर ||541
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बृज की देखी फाग है , लठ्ठमार जब हौय |
फगुबारी की मार से , साबुत बचै न कौय ||542
गोरी लैकें रंग खौं ,फाग खेलतइ द्वार |
आबड़ में जो है बिदत, रँग देतइ है डार ||543
सबइ रंग उमदा लगैं , चिपकै आँग गुलाल |
खैलत गावत फाग हैं , देत नगड़ियाँ ताल ||544
गोरी खेलत फाग है , जब प्रीतम के संग |
रोम- रोम मुसकात है , खिलत सबइ हैं अंग ||545
बजत नगड़िया फाग में , सबरै दौरै आत |
हौरी है ई बात खौं , रँग डारत चिल्लात ||546
बिचकत अब कछु रात है , कैसन खेलें फाग |
कैमीकल रँग में डरौ , लगै गाल खौं आग ||547
गुइयाँ गाबैं फाग खौं , नचा रयीं गोपाल |
चिकुटी काटै गाल पै , पोतै लाल गुलाल ||548
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खा कै गुजिया चल पड़े , पीकै थोरी भंग |
हुरयारन कै बीच में , बजा रहे मिरदंग ||549
गुजिया हौवें रस भरी , और मसालेदार |
होरी पै नौनीं लगत, जैसें हौय बहार ||550
भौजी देवर से कहै, गुजिया खा लो चार |
देवर खाबे बैठ गव , दओ रंग तब डार ||551
जब किनायनो डारतइ , गुजिया में भरपूर |
तब हम सूँगत रात है , जात न घर से दूर ||552
सास ससुर अमरूद से , साला पिंड खजूर |
गुजिया -सी साली लगै, सलहज मोतीचूर ||553
होरी की सब बात जै , गुजिया सदा बहार |
जितै मिलै फटकारियै , कै गय लम्बरदार ||554
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टूटे गुरा गरीब के , मैगाई दै मार |
कह सुभाष जाबैं कितै , लेकैं घर परिवार ||555
नेतन की हम का कबैं , वोट झटक है लेत |
दो पइसा अनुदान भी , गुरा टौर के देत ||556
भारत में मजदूर भी , करतइ इतने काम |
जितने टौरें वह गुरा , मिलै न उतने दाम ||557
टैक्स लगें सरकार के , गुरा सबइ ढिलयात |
अठ्ठाइस जी एस टी , सौदा पै लग आत ||558
अपने गुरा बचाइयौ , जितै जुरै खड़पंच |
न्याय नीति से दूर है , आज दिखें जो मंच ||559
अच्छें नौनें काम कौ , गुरा चटक जब जात |
मुड़ी धरै सोचत रहत , नींद न लेंगर आत ||560
कालनेमि टोरै गुरा , चीन्ह गयै हनुमान |
राम नाम झूठौ जपै , बैठौ बेईमान ||561
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कुत्ते चमचे चमचियाँ , दौरैं खड़े पलैर |
नेतन कौ घर जानियौ,जितै भरत सब मैर ||562
जो पलैर चमचा हतौ , बदल गऔ है आज |
राजनीति में घुस गयौ , आज करत है राज ||563
जो पलैर हौ आदमी, बदमाशी कर जात |
कौनउँ मौका जब परै , दिखा देत औकात ||564
ढौर श्वान पंछी सदा , हौ पलैर जब गेह |
साँसउँ भौत निभात है , करतइ सबसें नेह ||565
हम पलैर प्रभु राम के , रय हमखौं है पाल |
उनकी हमै निभाउनें , पूरौ रखनें ख्याल ||566
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खड़ौ बिजूका खेत में, रखवारी के हेत |
खात कछु न खेत में , ना खाउन कछु देत ||667
ठाड़ौ मूसरचंद- सो, लठिया लय है हाथ |
सबइ बिजूका देखतइ , डबला कौ है माथ ||568
हम सब ई संसार में , बने बिजूका राँय |
तनक जगाँ खौ घेर कै , रत है उयै रखाँय ||569
एक बिजूका देख कै , ढौर छरक है जात |
ऐसइ एक गँवार नों , कौउ पास ना आत ||570
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कलइ न अपनी खोलियौ , बाँदे रहियौ गाँठ |
जौन दिना पसरे जितै , हौजे बारा बाँट ||571
कलइ उतर गइ झूठ की , कालनेमि पछताय |
मुगदर दव हनुमान ने, भागौ प्रान बचाय ||572
कलइ दार लोटा हतौ , भारी चमकत राय |
किरकउवाँ से जब मजौं , उतरौ मुख दिखलाय ||573
कलइ चढ़ौ उनकौ रहन , पानी में धुव जात |
बेर- बेर बै पौत के , फूटौ मड़ चमकात ||574
कलइ राम तुम खौलियौ ,चार जनन के बीच |
जो जूठै संसार में , मचा रयै हौं कीच ||575
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कनबत्तू गुइयाँ करैं , हेरैं लम्बरदार |
का जाने का बात है ,रयै कुका रय बार ||576
कनबत्तू भी हौ गई , सबइ चिमा गय पंच |
करने है अब फैसला , सबखौ अब सौ टंच ||577
कनबत्तू पर कह रयै , भाइ रामगोपाल |
काफी हद तक ठीक है , लगता यहाँ सवाल ||578
बुंदेली के शब्द हम , यहाँ सीखते आन |
कनबत्तू का अर्थ भी , गयै यहाँ पहचान ||579
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गोरी हँसकै कै रयी , मौये नईं उकास |
मिलत गैल बतियाँ करत , जी में रत बकवास ||580
पर पंचायत पड़ गयै , काड़ें फिरें उकास |
टंटौ जब बिदने लगो , गदबद दयी सुभाष ||581
भुन्सारे संझा सबइ , काड़ौ तनक उकास |
गुरिया फेरौ राम कै , ले लौ ग्यान प्रकास ||582
राम भजन पै कात जो, मरवें नईं उकास |
एक दिना उनके लिगाँ , माँछी भिनकत पास ||583
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गम्मखोर नौनों भलौ , करै न टंटौ आन |584
मान जात हर बात खौ, सबखौं दें सम्मान ||
चार बात सुन लेत है , सब पै देतइ ध्यान |
गम्मखोर जी में रखत , संतोषी को गान ||585
गम्मखोर राखत हृदय , मन में भलमनसात |
दौदा कपटी लालची , उचकत दौ दौ हात ||586
गम्मखोर की का कबै , सज्जन ऊखौं कात |
चार जनै लरबैं जितै , सबखौं बौ समझात ||587
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माता पूजन जा रयी , जुर गइँ गुइयाँ चार |
सजी धरी अठबाइ हैं, लय कुमकुम को थार ||588
बन्न बन्न की है शकल , जीखौं कत अठबाइ |
छल्ला बेलन लघु लुचइँ , भरी धरी चिकनाइ ||589
परिकम्मा सखियाँ करें , गोरी पूजै आन |
चढ़ा सभी अठबाइ खौं , सुंदर गाती गान ||590
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गों में दें मौगों रयै , जानौ उयै गुडै़ल |
औसर पै ऐसौ फटत , करत काम सब फैल ||591
गों में दें कै बैठ गय , हम तो उनकी बात |
बात उनइँ की मारने , उनकें मौं पै कात ||592
बने फिरत हुसयार है , खोटी लय सौगात |
गों में दें लइ बात है , उनखौ काय पिरात ||593
गों में रख लो बात खौ , तनक गम्म तो खाव |
जौन दिना चिचयाय बै , तबइँ देखबै जाव ||594
गों में दैकें आदमी , खूब चिमानों रात |
फटतइ मौका देख कै , सबखौं धुआँ दिखात ||595
राना जू भी है गजब , बीन -बीन के ल्याँय |
लगे गुरीरे शब्द सब , हँस-हँस के मर जाँय ||596
गों में देकै लिख रहै ,दोहन कौ दें आँच |
जैसे मौं पै बन परै , लइयौ भइया बाँच ||597
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लबरा पैंला से लुकत , सामैं आबैं सत्य |
या चमचा बन घूमता , करबै आगैं नृत्य ||598
चोर लुकत चोरी करत , दाड़ी खौं सैलात |
तिनका खौटत गाल से , फिर भी पकरौ जात ||599
मौड़ा मौड़ी है लुकत , छिपा छिपाउल खेल |
बचपन कै ई खेल में , बहुत रात है मेल ||600
लंका में हनुमान ने, लुकत खोज लइ मात |
फिर सामू है आन कैं , जौरे अपने हात ||601
एक हास्य दोहा -
समधिन पैलउँ है लुकत , फिर पानू भिजवात |
पाँछैं ल्याबै नासता , घूँघट से मुसकात ||602
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अक्सर हम यह देखते , बूढ़े देते खांस |
आज खांसना देखिए , बना गले की फांस ||603
बुंदेली दोहा~तकुआं टेड़ो काय है , भुन्नाने हो आप |
कीने भैसें छोर लईं, थुथरी बिगरी छाप ||604
सांसी - सांसी बोलकै , मिली पठौनी मोय |
सिर्री कहते सब जनै, अकल न तोखौ होय ||605
माते जू कौ निबूआ , कहें संतरा जोग |
मैने खट्टो कह दयो , चढ़ बैठे सब लोग ||606
मुखिया जी का शौक है , दारू पीना रोज |
मैने कै दइ टुन्न है , अखरी सबखौ खोज ||607
भड़याई लरका करे , बाप बनो सरपंच |
रामदुलारी चीन्ह के , बोल गई है टंच ||608
दारू मुरगा चींथ कै , बोलत नौने बोल |
राम नाम पगड़ी जड़ै , बड़े बड़न की पोल ||609
मौड़ा माते कौ सुनो , करे दौंदरा रोज |
फँसे घसीटे कौ लरका , पुलिस करत है खोज ||610
कोई गुइयाँ खेल को , मत कहियो खरयाट |
मिलजुर कै घरिया भरत , चलत कुआँ पर राट ||611
कोई गुइयाँ खेल को , मत कहियो खरयाट |
मिलजुर कै घरिया भरत , चलत कुआँ पर राट ||612
तीन अठन्नी भँजा रय , लेकै रुपया एक | खोटी लेके आत है , जिनखौ देतइ फेक |613
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एक जला दइयौ दिया , गुइयाँ उनकी शान |
जौ सीमा पै कर गयै , प्रानन कौ बलिदान ||614
देरी में धर कै दिया , मनइँ राखियौ सोच |
कभउँ नहीं ईमान में , ईसुर आबै लोच ||615
दिया कात सूरज सुनौ , हम तुम येकइ जात |
तुम जलतइ हौ शाम तक ,फिर हम जलतइ रात ||616
अपन- तुपन ईसुर दिया , ईसुर बड़ौ कुम्हार |
करमन कै हम तेल से , जलत बुझत संसार ||617
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जरै दिया से अब दिया , बगरै खूब प्रकाश |
सबखौं है शुभकामना , बनै दिवारी खास ||618
नहीं दिवारी पर इतै , हम बगरा रय ज्ञान |
लुअर पटाखन पै रखौ , बस थोरौ सो ध्यान ||619
महावीर निर्वाण भय ,राम अजुध्या आय |
सुखद दिवारी हो गई , लछमी पूजन पाय || 620
और भौत सी है कथा , नहीं रहै हम बाँच |
सबइ कथा संदेश दें ,कात सुभाषा साँच ||621
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गिरमा बँधता जब गले , करना उतै विचार |
जिसने बाँधा प्रेम से , वह चाहत उपकार ||622
भला वह तुमरा चाहे |
गिरमा टौरें फिर रहे, बनवें खौ सरपंच |
रुपयन से पुटया रहे, शरम करें ना रंच ||623
घूमतइ दाँत निपोरे |
देरी खूँदें खात हैं , तक लौ चारों ओर |
खग्गी सब ठाडे़ भये , फिरते गिरमा टोर ||624
फसूकर सबरै डारे |
साली की चिठिया मिली , जिज्जी चढ़ रव ताप |
गिरमा टोरे आ गये , जीजा अपने आप ||625
परी जिज्जी मुस्कानी |
गिरमा डेंगुर नाथवों , तकै हमइ ने खूब |
नदिया बैला हाँक कै, गये चरावै दूब ||626
याद सब आई मुझकौ |
साजै लच्छन आचरण, की मिलवें जब डोर |
उसको गिरमा मानकै , पहनो तब बिन शोर ||627
गिरमा लरकै बाँध दो , सामै दे दो पाड़ |
एक दुलइया ढूँड़ कै , दैव राछरी काड़ ||628
सुभाष सिंघई~
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~दो दुम के दोहे बुंदेली दोहे , विषय गोटी
गोटी गलियन में गपा , गुम्मा गये गुदार |
गटा गुचे है वोट पर , गारय गीत गुहार ||629
सबइ अब इनको चाने |
घूमते गाते गाने ||
देरी खूँदे खात है , नेता दय खरयाट |
गोटी अपनी फिट करें ,लेत खुपड़िया चाट ||630
वोट घर भर के चाने |
धूल चरनन. की पाने ||
गोटी की हम का कहै , काँ लौं कैवें बात |
वोट झटकवें बाँटते , पउवाँ आधी रात ||631
रुपैया संगै देवें |
राम की कसमें लेवें ||
जिनकी गोटी जम गयी , वे बन रय सरपंच |
हिस्ट्रीशीटर आज है , अब सोना सौ टंच ||632
हितैषी सबके दिखते |
सुभाषा साँसी लिखते ||
गोटी चलतइ बाप है , लरका दय खरयाट |
जीत न पाने पंच पद , खड़ी रनै है खाट ||633
मजा भी सबखौ लेने |
वोट ना ऊखौ देने ||
ठाड़े भये गुलेदरे , टटिया-सी रय टोर |
गोटी चले चुनाव में , सरपंची की ओर ||634
दौदरा दे रय छाती |
बिना घी की सब बाती ||
गुड़याकर गुपला गिरो ,चरनन कहै मराज |
मोरी गोटी फिट करो , सरपंची खौ आज ||635
मजा सब उसका लेते |
वोट ना एकउँ देते ||
ठाड़ौ भयो चुनाव में , माते जू को पूत |
गोटी चलवें गाँव में , बनो सूदरो दूत ||636
पाँव भी सबके परता |
पकै ना ऊकौ भुरता ||
गोटी फिट बैठे नहीं , फूटत वहाँ लिलार |
यह चुनाव के हाल है , हाथ लगत है हार ||637
सुभाषा बचकै रावें |
कभी ना लरवें जावें ||
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मिसरी मौ से झर रही , पुटया रय है वोट |
कौल धरा के दे रहे , मसकउँ से वें नोट ||638
चुनावी चलवें झौका |
परौ है सबसे मौका ||
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नमन मंच ,प्रदत्त शब्द - सूदो
दुमदार दोहे
सूदो सच्चो आदमी , दुनिया में ठग जात |
लबरा फाँकत बात खौं , मसकउँ लडुआँ खात ||639
पता ना उसका चलता |
चपेटे अपनो खलता ||
सूदो अपनी सूद की , छोड़े नहीं कतार |
पर सब इनके बीच में , टिड़का लम्वरदार ||640
गजब का आज जमाना |
झूठ. का है याराना ||
सूदो चलतइ एक सौ , धरे नाक की सूद |
लबरा टेड़ी चाल से , करत रहत है कूद ||641
सुने लबरन के लड्डू |
सूदरे दिखे निखड्डू ||
हल्के में थे सूदरे , टिड़का सदा कहाय |
जब से हम टेड़े भये , सूदो जगत बताय ||642
रीत है बड़ी पुरानी |
चले की बने कहानी ||
हॉसिया टेड़ो जान कै , दूर रखत है हाथ |
कीला सूदो होत है , पकड़ ठोकते माथ ||643
कील का ठुकता मत्था |
पिसत है चूना कत्था ||
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विषय डबला , दुमदार दोहे
तन डबला- सो फूटतइ , ईसुर दे जब मार |
फिर देतइ क्यों दौदरा , मानव फैला रार ||644
चिरैया सौ उड जाने |
सबइँ खौ कनै फलाने ||
एक बात सबसें सुनी, डबला में गय थूक |
उनखौ कौनउँ चौतरा , देतइ नहीं भभूक ||645
फिरत अब लयें कटौरा |
जुरै ना उनखौ कौरा ||
(शब्द कुछ और प्रचलन में है, पर थूक शब्द लिया है )🙏
डबला छाया में धरौ , ठंडो पानी होय |
चड़ा दओ चूला अगर , तातों होकें रोय ||646
असर संगत को होवें |
सुभाषा करनी ढोवें ||
मनोविनोद दुमदार दोहे🙏
लरका के लाने सुनो , सगया आये रात |
हम डबला से फूल कै, करवें उनसे बात | 647
पिलाई उनखौ लस्सी |
कढ़े वें पूरे हप्सी ||
पानी डबला में भरे , कक्का कड़ गय हार |
कक्को बैठी बक रही ,हुइयें पुंगा चार ||648
तमाकू साथ पवारें |
बिड़ी की सुट्टू मारें |
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दोहे,- गुम्मा
( दुुमदार ) दुम रोला का विषम चरण
एक- एक गुम्मा जुरै , तब बनतइ घर दोर |
ऐसइ हम सब अब रहें , इस बुंदेली ठोर ||649
सबइ अब मन में गुनियो |
प्रेम से सबकी सुनियो ||
हर गुम्मा भी लिगाँ रहें , पर है थौड़इ दूर |
जुरौ रहत वह प्रेम से, रख गुनियन-सो नूर ||650
सुभाषा रहिवों सीखो |
बोल ना राखो तीखो ||
गुम्मा का गुन जानियो , तकियो इसकी ओर |
आँधी पानी झेलकै , देतइ सबखौं ठोर ||651
कहानी कैबे अम्मा |
बनत है कैसे गुम्मा ||
गुम्मा जो भी पाथता , होता वह मजदूर |
मिला पसीना वह पथे , निज हाथन का नूर ||652
पसीना हरदम बहता |
पथइया कैसे रहता ||?
पाथें घर में बाप माँ , लरका चटा बनाय |
आगी से बउ धन अबा ,गुम्मा खरा पकाय ||653
सुभाषा घर है साजौ |
बजै रमतूला बाजौ ||
गुम्मा ही जुरकैं सदा , खड़ी करत दीवार |
सबइ जनै अब ताकियो ,का होतइ है प्यार ||654
गुम्मा से गुम्मा जुरै , रहें बीच सीमेंट |
रेता पानी प्यार से , करतइ परमानेंट |655
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विषय - उखरी
उखरी में मुड़िया धरें , खुद. कन्छेदीलाल |
मूसर जी से कह रहे,रखियो मोरो ख्याल ||656
नहीं मूसर से पटने |
रगड़ के उनखौ कुटने ||
उखरी में मुड़िया धरें , रय है दाँत निपोर |
अटपट्टे सब काम है, काँ ढूढों है ठोर ||657
कैथ सी चटनी बँटने |
तिरूला पूरे छँटने ||
उखरी में मुड़िया धरें , रामदुलारी आज |
मूसर से आशा करे, साजो कुट जे नाज ||658
अकल पै पर गय पथरा |
निनुरवे घूमत गथरा ||
उखरी में मुड़िया धरे , बन रय चतुर सुजान |
मूसर से है दोस्ती , कुटत. रहें श्रीमान ||659
देखकर आवे हाँसी |
चढ़े है खुद ही फाँसी ||
उखरी में मुड़िया धरे, ऐसे है कइ लोग |
मूसर से कुटवें सदा , जोरत है खुद योग ||660
सुभाषा खौ हैरानी |
नहीं अब पीवे पानी ||
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दिखे तरइयाँ राम धइ , भरी दुपरिया जेठ |
सबा सैर जब सैर खौ , सामे आवें ठेठ ||661
अकड़ सब दाँत निपोरे |
सड़क पै होत निहोरे ||
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बुंदेली दोहे ~ विषय पंचा
पैले पंचा पैरकैं , करो कलेवा भोर |
फिर जोते सब खेत है , छूटो कोउ न छोर ||662
राम धी सांसी कै रय
पंचा पैरत सब जनै , रई. पैलऊँ बात |
शर्ट पेंट है आजकल , पंचा किसे सुहात ||663
राम धी सांसी कै रय
पंचा अल्फी ऊजरी , रखी तौलिया साथ |
बने वरतिया श्याम जू , लेकें लठिया हाथ ||664
राम धी सांसी कै रय
पथरा को घिसना बना , दयो मैल. खौं ठेल |
पंचा अल्फी धाँद के , चुपड़ो सरसों तेल ||665
राम धी सांसी कै रय
सुभाष सिंघई जतारा
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विषय दुपाई
एक कंजूस सेठ जी की पनैया भरी दुपाई
भड़या ताड़ ले गए , उसी पर हास्य रस में
दो दुम के दोहे निवेदित है |
सकला-सी मुंँइया भुजी , ताती लगती खाल |
भरी दुपाई सेठ जी , फिररय वारेलाल ||666
पनैया भड़या ताड़े |
सेठ जी मौं खौं फाड़े || |
भरी दुपाई निग पड़े , लगी ततूरी पाँव |
नहीं पनैया मिल रईं , छानो पूरो गाँव ||667
पतो अब भड़या जाने |
कहाँ पै गए. छुपाने |
रामदुलारी बोलती , भरी दुपाई जेठ |
फटी पनैया खोजते , मरवें फिरते सेठ ||668
पनैया बाप मताई |
खोजते बने सिपाई |||
सेठानी समझा रही , आज. दुपाई तेज |
घर मुरकौ अब सेठ जी , पौड़ों घर की सेज ||669
प्रान खौ नहीं गवाओं |
पनैया फटी न लाओं |
लौट दुपाई अब रई , हौवे बारी शाम |
नयी पनैया पैरवें , खरचा होने दाम ||670
लोग सब दाँत निपोरे |
सेठ जी करें निहोरे /
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विषय - रमतूला
कागज पै सड़कें बनी , बातें नहीं उधार |
सरपंचन की जेब ने, रुपया लियो डकार || 671
डले है पेड़न झूला |
बजे अब तो रमतूला ||
निबूआ नोंन चौंख रय , गाँव भरे के लोग |
लुचईं सूँटरय मुखिया, पा सरकारी भोग | 672
बोल के गओ कथूला |
बजे अब तो रमतूला ||
राहत राशी भेज कै ,शासन गँव है बैठ |
इतै पचा सरपंच जी , मूँछ रहे हैं ऐंठ || 673
फूल कै दूनो कूला |
बजे अब तो रमतूला ||
पुलिया बन गइ रात में , भुन्सारें की पार |
एक झला में बह गई , का कर दे सरकार || 674
बने है नेता दूला |
बजन दो अब रमतूला |
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बुंदेली (दमदार दुमदार ) दोहे
माते कक्का घास में , सुलगा गय है आग |. मड़ी कथूले की मुड़ी , ठोको ठाड़ों दाग ||675
रामजी मौ में तारो | भलौ है देश हमारो ||
बिन्नू सपरन खौ गई , लहरें उठती घाट | रामप्यारी बोलती , बिन्नु खौ गर्राट ||676
रामजी मौ में तारो | भलो है देश हमारो ||
लचक कमरियां देखकर , टपकी बब्बा लार |आँख दबाकर दे रहे , लरकन खौ उसकार ||677
रामजी मौ में तारो | भलो है देश हमारो ||
गलती माते जू करें , सबरे साधें मौन | उरजट्टे खौं सोचते सामें आवै कौन |678
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
दारु बँट रई गाँव में , डलने हैं कल वोट | सभी चिमाने लग रहे ,डाल खलेती नोट ||679
रामजी मौ में तारो |भारत देश हमारो ||
लरका माते को लगे , सब लरकन से भिन्न | फिर भी पूजो जात है , रात दिना रत टुन्न ||680
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
करें टिटकरी गाँव के ,फटियाँ की लख नार | कहते भुज्जी डोकरा , खूब जताए प्यार ||681
रामजी मौ में तारो | भलो है देश हमारो ||
कोरोना के काल में , भूखन मरो किसान | पर डबला से फूल गय , देखो सभी प्रधान ||682
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
उससे ना कुछ बोलते , जिससे भाँवर सात | मोदी बाजो टुनटुना ,करते मन की बात || 683
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
बापू आशाराम का , राधे माँ खौ ज्ञान | इक दूजे का चित्त से , करते अंतरध्यान ||684
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
माते कुत्ता मारने , घर ले आए लठ्ठ | मातिन ने अजमा लिया, माते पर ही झट्ठ ||685
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
राम राम जू चल उठे , भुनसारे से शाम | समझो पास चुनाव हैं , बँटने दारू दाम ||686
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
मोड़ी मुखिया की भगी, कौसे कलुआ बैन | खबर पैल से ना दई , ईसै हौ गइ ठैन ||687
रामजी मौ में तारो |भलो है देश हमारो ||
जुड़कर पुंगा गाँव के , बात रहे है फाँक | जो जितनी ही फाँक ले,उतनी उसकी धाँक ||688
रामजी मौ में तारो | भलो है देश हमारौ
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बुंदेली दोहे- विषय फुकला = सार हीन छिलका
छंद न फुकला-सो लिखौ, दिखै न जीमें सार | ऐसौ लिखियौ जू सबइ , करबें लोग विचार ||689
नहीं तथ्य कौ कथ्य हौ , कविता तब बेकार | तुकबंदी की लोइ ही, कह सकते तैयार ||690
फुकला -सी बातें करत , पल्लै परत न मोय | जौ कत जुन्डी डंठ में , गन्ना-सो रस होय ||691
मन कौ फुकला जानियौ , गहरी कुंठा होय | जलन -बरन पत्ता फरैं , रौक सका कब कोय ||692
संग रयै कीमत रखै , चिपकौ दाना होय |जैसें फल बादाम भी , फुकला राखै सोय ||693
खतरनाक भी हौत है , फुकला जीकौ ग्यान |बीच गैल में जै पसर , बैतुक कौ मैमान ||694
फुकला मानव तन बना , दाना जानौ प्राण |साथ करै जब हरि भजन, हौ जाए निर्वाण || 695
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बुदेली दोहे - विषय डाँड़़
डाँड़ हमेशा देत रव , जितै हौय जब चूक | रानौ ईसुर के लिगाँ , हात जौर रव मूक || 696
डाँड़ दई हमने जगाँ , गाड़ौ अपनौ डाँड़ |. जितै लगत तो डाँड़ है , लोग बनत तै साँड़ || 697
डाँड़ लगाबै हैं मुलक ,करतइ फाड़ हजार |. सीबै बारै खौज लो , हौगें बस दो चार || 698
काँ काँ की चरचा चलै , उखरा और पछाँड़ |. लै दैकें सब अंत में , निसचित करतइ डाँड़ || 699
हाड़न में हरदी लगै , आबैं खसुआ भाँड |पइसा ऐसैं माँगतइ , जैसे हौवें डाँड़ || 700
डाँड़ लैत सब पंच है , ऊसैं कथा करात |. जौ समाज से चल अलग , नियम टौर कै जात ||701
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बर्रोटी = स्वप्न देखना
बर्रोटी प्यारी हती , पौचै प्रभु कै धाम |चरण पकड़ कै धन्य भय, मिल गय मौखौ राम ||702
गदा लयै हनुमान जी , तब बर्रोटी आय |बोलै रावन मानयौ , जो भी सुता सताय ||703
बर्रोटी में जप करै , बाँटें सबखौं दान |. भुन्सारे मेमान बन , घर आतइ भगवान || 704
बर्रोटी - सी देखतइ , शबरी दौरौ हेर |. प्रभू राम जी आ रयै , सुन रय ऊकी टेर ||705
बर्रोटी में नौनीं लगै , दिखबै संत समाज |. जानौ सबरै देवता , पूरै कर दें काज ||706
बर्रोटी या जागना , रखौ राम जी ध्यान |दुनिया में डौले नईं , मोरौ जौ ईमान ||707
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बुंदेली दोहा दिवस , विषय - डेंगुर
ईसुर डेंगुर डारियौ , लिखकै अपनौ नाम |बाँद गरै में हम हँसै , मिलै आपको धाम || 708
दद्दा मोरे कात तै , जौ भी करत उजार |ऊकी डेंगुर से घिची , करतइ है सिंगार || 709
ढोरन के बँदतइ गरै , जौ भी उजरा हौय |लरका हौ तौ ब्याय कौ, डेंगुर डरतइ औय ||710
डेंगुर भी जा कात है , करौ न उजरा काम |संग घसीटे हम फिरै , तुमै नईं आराम || 711
हलत - घलत डेंगुर कहत , जीनैं करौ उजार | तबइँ सजा हम दैत है , राखत नईं उधार || 712
डेंगुर जानो ईश कौ , सूदौ है संकेत | नौनें लच्छन सीख लौ , नईं उड़ाऔं रेत || 713
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मौं में ठेंटा बाँदियौ , साँसी कात सुभाष |
चार जनन के बीच में , नइँ करियौ बकवास ||714
सिसिया में ठेंटा लगै , कभउँ न बगरै तेल |
तनक खुलौ रै जाय तो , बनत धार की रेल || 715
साँसी हौबें बात तौ , मौं कौ ठेंटा खोल |
सब पंचन के बीच में , बतला दइयौ पोल ||716
मौं में ठेंटा बाँद कै , भड़या घूमत रात |
चोरी करबै जा रयै , पतौ चलत औकात || 717
अलग - अलग है सब जगाँ , ठेंटा का उपयोग |
कसै भयै नोंनें लगत , ढीले लगतइ रोग ||718
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गरजत है जब जौर से , बदरा सावन आन |
अमरत बरसत जान लौ , कातइ सबइ किसान ||719
टप-टप बूँदे गिर परै , सावन भादों माह |
पानी पाकै खेत भी , कात रात है वाह ||720
पानी बरसे जब फसल , हरी खड़ी हौ खेत |
कत किसान भगवान से , उम्दा मौका देत ||721
मौइ धना गइ खौटबें , फरी भुन्टिया खेत |
पानी की बूँदै गिरी , लौटी मुसकी देत ||722
सावन भादों माह में , हौ जमकै बरसात |
गीले रातइ खेत है , , फसल हँसै दिन रात ||723
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नीचट हौबें भाव जब , लइ मन में जौ ठान |
मनसा पूरन हौत है , जीनौ हौ ईमान ||724
नीचट डोरी बाँधियौ , कितउँ न जायै टूट |
यैसइ रिस्ता राखियौ , परै कभउँ ना फूँट || 725
नीचट हौतइ प्रेम है , पर जीसै हौ जाय |
रात दिना सपने दिखें, मन खौ भारी भाय ||726
शबरी भी नीचट रयी , राखै रइ विश्वास |
एक दिना श्री राम नें , पूरी कर दइ आस || 727
नीचट केवट भी रओ , करी न कौनउँ भूल |
जीते जी ही चूल सै , पा लइ प्रभु की धूल || 728
नीचट सबने जानकैं , कयी राम से आन |
सागर सबरौ लाँघ लैं , बीर बली हनुमान || 729
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सूपनखा नें जब तकौ , गयी राम पै रीझ |
नाक कटा गदबद दयै , गइ रावन नों खीझ ||730
की की नें का का तकौ , काँ काँ की की बात |
की की नें की की कही , की खौं भइ सौगात ||731
कब सुभाष सबने तकौ , लोग बनत जब डूँड़ |
मसकत महुआ छेवला , चटकत सबकौ मूँड़ ||732
चूहा से बिल्ली कहत , बिल्कुल नइयाँ देर |
कत चूहा पाछै तकौ , तौरे लाने शेर ||733
कत सुभाष साजौ तकौ , साजै रखौ विचार |
सफल करौ जीवन इते , मंत्र जपौ उपकार || 734
राम लखन सँग जानकी , और तकौ हनुमान |
हात जौर पूजा करौ , हौजे सब कल्यान || 735
हौं गरीब तौ दान दो , भूकन खौं आहार |
रोगी जन पैलें तकौ , और करौ उपचार ||736
बेटी जाऔ सासरैं , विदा करत माँ आज |
कभउँ उरानौ ना मिलै , इतनी रखियौ लाज ||737
कियै उरानौ दैंय हम , कौन सुनत है आन |
वर्ग भेद कौ बिष इतै , पसरौ हर इस्थान || 738
प्रभू उरानौ दैंय हम , तनक दीजियौ ध्यान |
बेइमान हलुआ भकै , भूकौ रत ईमान || 739
कितउँ उरानौ देखतइ , भौंत सभाँरत काज |
उनखौं असर न हौत है जिनखौं नइयाँ लाज ||740
कोउ उरानौ ना सुनै , रखत न मन में लोच |
यह नेतन की जात है, गड़बड़ है सब सोच ||741
ककरी कै किटुआ बनै , नेतन खौं हम लोग |
कियै उरानौ दैंय हम , सबरै कुसुगन योग || 742
कुछ अफसर देखे इतै ,नहीं समझ में आत |
देत उरानौ अब कियै ,रिश्वत लीलें जात || 743
देत उरानौ प्रेम से , शबरी कत प्रभु देर |
ताजे गुट्टा में धरै , सूख गयै है बेर ||744
देत उरानौ राधिका , सपने में हौ आत |
तुमरै मारे श्याम हम , तनिक नहीं सौ पात ||745
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दादी दादा है तँगत , नाती उनै तगाँत |
जानबूझ हँसकर तगैं , चपा पेट की आँत ||746
लबरा लम्पट लालची , इनकी खुलबै पोल |
बर्रन जैसे जै तँगत , लरबैं करतइ डोल |747
मौसी को काजर कयै , साँसी हौ जब बात |
भड़या भी पैलें तँगत , खुद खौ सच्चौ कात ||748
नेता भी देखे तँगत , हारत जौन चुनाव |
कछू काम की कै धरौ , पकर जात है ताव ||749
साव हमारे है तँगत , बिकट हौत नाराज |
उनसै कातइ लोग जब , छोड़ देव तुम ब्याज ||750
लरका बिटियाँ भी तँगत , बूड़े जब दें टोक |
खाबौ पीबौ चात बै , नईं सुहाबै रोक || 751
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हौबै भारत देश अब , ई पन्नी से मुक्त |
झट्टइँ हौबें भूमि अब , सुंदरता से युक्त || 752
पन्नी ने देखौ इतै , कर दव सत्यानाश |
गइयाँ खाकैं मर रईं , देखत रात सुभाष ||753
जब से जा पन्नी चली , लोग हुए शौकीन |
थैला लैबौं हात में , समझत है तौहीन || 754
पन्नी में सब पैक है , चलत आज व्यापार |
ऊकी जाँगाँ का चलै , यह सौचे सरकार ||755
कागज के बटुआ चलैं , बन जाबैं कानून |
पैक हौय सब औइ में , हरदी मिरचें चून || 756
पर्यावरण सुदारियै , पन्नी कर दो बंद |
घातक पशुअन खौं हुई , बनीं जहर यह मंद ||757
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सबर करौ फिर देख लौ , कैसौ चल रव काम |
नइँ उलात कौनउँ करौ , गदिया जमत न आम || 758
अपनी गदिया मान लौ , ईसुर करैं निवास |
जौन काज पै तुम धरौ , हौजे उतइँ उजास ||759
सुबह उठौ गदिया तकौ, लौ ईसुर कौ नाम |
सगुन भलौ यह मानियौ , सुमरौ मन से राम ||760
गदिया में कछु हौत हैं, जिनखौं कयैं लकीर |
लोग बाग यह सौचते ,यह कहती तकदीर || 761
भाग्य जगत जब आन कै , गदिया खूब खुजात |
लोग बाग तब कात है , पइसा दौरत आत || 762
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चिलकत है आकाश में , तारौं के सँग चंद |
बैसइ है साहित्य में , न्यारौ दोहा छंद || 763
चिलकत है ईमान भी , कौउ ढाँक ना पात |
चार जनन के बीच में , मौ खौं नईं दुकात || 764
कत सुभाष चिलकत रयै , जो भी करबैं काम |
सदा सहायी हौ इतै , सबखौं ईसुर राम || 765
प्रेम भाव लामौ रयै , कभउँ न टूटै डोर |
मनसा यह चिलकत रयै , होय सुहानी भोर || 766
चिलकत लज्जा भी रयै , नारी की भरपूर |
सबरी जुरी समाज में इज्जत ना हौ दूर || 767
चिलकत जग में दोसती , जिनकी पक्की होय |
मतलब की जो राखतइ , उनकी बैठी रोय || 768
चिलकत चंदा आसमाँ , ज्यौं कौ चाँदी थार |
तारे संगै साथ दें , ऊकै बनकैं यार || 769
एक शृंगार दोहा -
गौरी चिलकत लग रयी , मटकत घर खौ जात |
अटकत है जब गैल में , खटकत मन खौं भात || 770
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ठूँसा लग रय देश खौ , माँ भारत हैरान |
खाकैं रसगुल्ला इतै , गा रय पाकिस्तान || 771
आगें पुटया के इतै , पाछै ठूँसा देत |
यह नेतन की जात है , कारौ करत सुपेत ||772
ठूँसा खाकै हम हँसै , रत ऐसै लाचार |
माइ बाप नेता बनै , कैलातइ सरकार || 773
जनता ठूँसा फुस्स है , सरकारी मजबूत |
कत सुभाष मुड़िया घलै ,पर जातइ है कूत ||774
ठूँसा दव हनुमान नें , रावन हो गव चित्त |
सौचै राखैं राम है , बलशाली जौ मित्त ||775
बातन कै ठूँसा चलै , अविश्वास प्रस्ताव |
संसद में औदौ गिरौ , पर अच्छा था भाव || 776
ठूसाँ ठाँसी मत करौ , परिवारन कौ वाद |
साजौ साबित खुद करौ , फिर फैलाऔ नाद ||777
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पेड़ न खातइ फल इतै , और न सूँगत फूल |
ग्यानी कत कानात है , जल रत नदिया़ँ कूल || 778
कै गय है कानात खौं , हमरै पुरखा सोच |
हाँड़ी चढ़ै न काठ की , चूलौ लैत न लोच ||779
लुड़कौ भव भी रायतौ , नईं समेटत कौउ |
मिरचन की कानात है , आँखें रौबें दोउ || 780
बेर- बेर ससुराल की , अच्छी कइ कानात |
हलुआ पूरी छौड़ कै , खाबै मिलबें भात ||781
मीठा रक्खौ हौ जितै सब कातइ कानात |
गुर की परिया देख कै , चुखरा चीटा आत || 782
लालच में परियौ नहीं , नौनीं है कानात |
लपकी दाँड़ै है जितै , इक गिन ठुककैं आत ||783
कुआँ कभउँ ना पूछतइ , पनिहारिन की जात |
बरसा सबखौं हौत है , नींचट कयँ कानात || 784
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दया धरम पैचान लौ , संगै विनय विवेक |
करौ गरीबन कौ भलौ , रखौ इरादौ नेक || 785
जिनकी ना पैचान है , नइयाँ खाबै डौल |
नेता उनै चुनाव में , दैं दारू सै तौल || 786
जिनकै गुन पैचान में , लगबैं सज्जन संत |
ऊखौ जानो देवता , जग खौं हौय महन्त || 787
जीकी यह पैचान है , ई लौ है ईमान |
ऊकी रक्षा है करत , खुद आकैं भगवान || 788
नौनीं हौ पैचान तौ , खिलैं करम से फूल |
बिपदा कितनउँ भी परै , चुभैं कभउँ ना शूल || 789
सखा दिलइ से साथ हौं , पास रयै या दूर |
कत सुभाष पैचान लौ , है बै हीरा नूर || 790
राहगीर पैचान कर , बैना कत है बोल |
भैया से कै दीजियौ , सावन आबै कोल || 791
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दो गज रानै दूर है , ठाड़ै जितै उजड्ड |
नईं खुद्गरौ रौपनें , करबैं सब गडबड्ड ||792
ईसुर समझा हार जैं , खुलै न उनकै पेंच |
हौ उजड्ड तौ देख लौ , मिलै खुपड़िया रेंच || 793
कछु देखे हमने पढ़े , हौतइ भौत उजड्ड |
अकल अजीरन पालकैं , खौदत रत है खड्ड || 794
जब उजड्ड से बीदतइ , आकैं लम्मरदार |
लठ्ठम लठ्ठा हौत है ,न्याव हौत दमदार || 795
उरजौ नईं उजड्ड से , बड़े सयाने कात |
बगरा दै जै दार खौ , पसरा दैबै भात ||796
आड़ौ ठाड़ौ घूमतइ , लरबै फिरत उजड्ड |
बिना सींग को ढौर बन ,काड़ै रत है ठुड्ड || 797
अक्कल खौ गानैं धरैं , लरबै ठाडौं रात |
नइँ उजड्ड से बीदियौ , ग्यानी जन सब कात || 798
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है धिंगानों औइ घर , जितै न रातइ नेह |
किलकिल हौतइ रात दिन, नरक बनौ रत गेह || 799
है धिंगानों देश में , जनता टौरें खात |
मरका बैला सै लरैं , यह नेतन की जात || 800
अब धिंगानों देश में , मचौ रात दिन रात |
भारत की इज्जत धुबै , यह सुभाष अब कात || 801
जगन तगन हम देखतइ , है धिंगानों रोज |
लोग बाग भी ल्यात है , नय - नय मुद्दा खोज || 802
खाकै रुपया गय पचा , हतै जौन सरपंच |
अब धिंगानों जाँच कौ , घपला है सौ टंच ||803
अब धिंगानों है मचत , परत नहीं सड़ स्वाद |
बगरत कितनौ रायतौ , कौ काबै तादाद ||804
धन धिंगानों देख लव , फूटें मुड़ियाँ खूब |
भाई से भाई लरै , लाज शरम गइँ डूब ||805
बस इत्ती-सी कानियाँ , मसकत भारी बात |
छुकला धर कै धान कै , बाँट रयै खैरात || 806
जिनकै मौं पै कै धरौ , इत्ती - सी सच बात |
तकुआ टेड़ौ बौ करत , अपने गाल फुलात || 807
जौ इत्ती-सी बात खौं , लेतइ दिल में तान |
लरबै सूदै बें रयै , दैत फिरत है प्रान || 808
इत्ती- सी जब काटतइ , हम कौनउँ की बात |
गटा फार बौ देखतइ , जैसे हमखौं खात || 809
हम बस इत्ती- सी कयैं , विनतुआइ सुन लैव |
लबरयाइ अब छौड़ कै , साँसी सबसें कैव || 810
इत्ती-सी राई हती , बइ बगरा दइ पौर |
कौ जानत है बीन कै , डरी कौन कित ठौर || 811
एक हल्का हास्य -
इत्ती- सी चुटयाइ थी , गुर की परिया देख |
लिख लवँ कक्का साव ने , बइ खाते में लेख ||812
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कूका कीकौ कौ सुनै , बुचा लयै है कान |
जानबूझ बैरा बनै , बचै राँय अब प्रान ||813
कान हमारे बुच गयै , नेता कूका देत |
वोटन खौ मौं फार कै, पाँव पकर है लेत || 814
कक्कौ भी कूका दयै , घर खौं मुड़ी उठाँय |
जौन हिरानी चीज है , ऊखौ नईं बताँय || 815
कूका दे रव मरगटा , फिर भी चड़ी उमंग |
डुकरा थ्रेटर में गयौ , गई डुकरिया संग ||816
कूका दे रवँ मरगटा , फिर भी राखैं शौंक |
डुकरा बैठौ खाट पै , रवँ सिगरिट खौं धौंक || 817
कौन कितै कैसौ करत , कौन कितै कब जात |
कक्कौ कूका दै रयीं , कक्का काँख कुकात || 818
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नाती छाती पै चढ़ै , चैंथी लैत बिठार |
कत 'सुभाष' अच्छौ लगत , अपनौ घर परिवार || 819
काम बिगर जब जात है , चैंथी सबइ कुकात |
सौचत मुड़िया में उतै , कितै चूक गवँ हात ||820
चैंथी सदा बचाइयौ , लोग करत है घात |
बार बनै उलटै छुरा , देकैं गैरी मात || 821
तनक छूट दो तब चढ़ैं , चैंथी पर ही लोग |
कत सुभाष दइयौ नईं , यैसन खौं संजोग || 822
अपनी चैंथी पै सदा , लै लइयौ बै भार |
जीमैं भारत देश हो , संगै घर परिवार || 823
जिनकी मुड़िया घुर गई , बचै दाँत ना बार |
अबगुन चैंथी ना चढ़ै , भजन करैं घर द्वार || 824
चैंथी पै आँखें लगा , कायै भइया जात |
औधै मौं नैचै गिरत , सबरै चड़ी बिदात || 825
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अंगद ने दे दवँ टिया , आ रय है प्रभु राम |
रावन तौखौं मारकै , इतइँ करें विश्राम || 826
टिया धरै नेता सदा , काम करै हर हाल |
सकलैं नईं दिखात हैं , गुजर जात कइ साल || 827
टिया ठिकाने कौ धरौ , जौ पूरौ हौ जाय |
जब बिगार-सी टार दौ , कछू हात ना आय ||828
एक साल के धर टिया , जीतत खूब चुनाव |
पाँच साल में आत फिर , लैकैं नय - नय भाव ||829
नइँ टीका अब चूक रवँ , गयै टिया सब भूल |
गप्पै मारत बैठकै , फैकत सब पै धूल || 830
टिया न टारौ साँवरें , आऔ जमुना तीर |
राधा भुँज रइ बूँट-सी , झिरत नैन से पीर || 831
एक हास्य
टिया टोरकै आ गयै , साजन अब ससुराल |
मोइ मताई पूछतइ , जौ का मचौ बवाल || 832
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ठाँड़े़ बैठे जै निपुर , समय उतै तत्काल || 833
अब तो साँसउँ बीदगइ , ठाँड़़े बैठे गट्ट |
कइती मिलना रात खौं , पर बै आ गय चट्ट ||834
ठाँड़े बैठे है लरत , लोग करत बतकाव |
उरजट्टौ भी लेत है , अपनौ देखत दाव || 835
ठाँड़ो बैठे बानियाँ , नाँय माँय धर बाँट |
अपनौ समय गुजारतइ , फटकारत सब टाँट ||836
ठाँड़े बैठें पर लिखै , दोहा कुल है पाँच |
पतौ नईं कितनी लिखी , हमने इनमें साँच ||837
भिनकत भइ ऐजक बिदत , ठाँड़े़ बैठे आन |
जब लबरा से कै धरौ , साँसी दइयौ ब्यान ||838
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हो हौ हल्ला हौत है , आ गय मुड़ी चुनाँव |
चमचा चिपकै गौंच से, लगा रयै है दाँव ||839
चढ़ै चना के झाड़ पै , प्रत्याशी चिल्लात |
लगुयारै संगै लगै , हूँका दैतइ जात || 840
सबइ जगाँ पै देख लो , मुलकन दावेदार |
बनै विधायक जीत कै , राखै मनइँ विचार ||841
नेता से चर्चा करी , आन बिदी है गट्ट |
कइती मिल लै रात खौं , पर बै आ गय चट्ट ||842
डंडा झंडा गाड़ कै , कछु अब करत प्रचार |
पाँव परत भी जात है , मिलत जौन जिन द्वार ||843
जिनकी शिक्षा शून्य है , बैं कत करैं विकास |
काल उज्जडा जौ हतै , नैं कैं करैं सु भाष || 844
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तरी अपुन की ना खुलै , करियौ ऐसे काम |
जिनकी खुलतइ झट्ट से , बें हौतइ बदनाम || 845
मठा तरी कौ हो जितै , दैतइ नौनों स्वाद |
यैसइ हौबे ज्ञान तौ , रयै जनम भर याद ||846
फिरबैं लैबें जौ तरी , ऊकी पैलउँ लैव |
कत सुभाष फिर भी उयै , अपनी तनक न दैव || 847
लबरा लम्पट लालची , से भैरौ पर जाय |
तरी उतारौ औइ की , बौ भी समझ न पाय ||848
साजौ पानी देख कै , भैस जाय जब लोर |
तरी लगौ कीचड़ उठै , खचा मचै चहुँ ओर || 849
दूजौ की मिलबै तरी , अपनी तरी उतार |
हाथ जौर लो तब उतै , मिलबौ है बेकार || 850
बजनी हौबें चीज तौ , पौच तरी तक जात |
भीतर पौली जब रयै , कंडी- सी उतरात ||851
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श्राद्ध पक्ष कागौर का , लैव समझ गूणार्थ |
जीव चराचर प्रिय सकल, कत "सुभाष" भावार्थ ||852
पुरखा कउवाँ वेश धर , घर की छत मड़राँय |
आशिष दैं कागौर चख , फिर ऊपर उड़ जाँय ||853
पुरखन खौं डंडौत दैं , भेंट करत कागौर |
आशीषें माँगत सबइ , तकियौ घर की और ||854
वरनन ऐसौ है सुनत , पुरखा धरती आँय |
काग वेश कागौर चख , तृप्त होत भय जाँय ||855
पुरखन खौं भी प्रेम रत , आत काग कै वेश |
खाकै वह कागौर खौ , उड़ जाबैं परदेश ||856
इतै नईं कागौर है , पुरखन खौं उल्लास |
बै तौ बस चाहत यही , बनौ रयै विश्वास || 857
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चार चरण दोहा दिखें , कथ्य न बिर्रा होत |
रखतइ ऊमै तथ्य हैं , जला कलम से जोत || 858
बिर्रा बातें ना करौ , कैदौ भइ़या साफ |
निज गलती स्वीकार लो, उनकी कर दो माफ ||859
बिर्रा हौबें नाज तौ , करौ पीस के येक |
पर जब हौबें चार मत , छाँटौ ऊमै नेक || 860
बिर्रा रोटी जब बनै , अलग रात है स्वाद |
जब विचार मिल एक हौ , बनत नेक बुनियाद ||861
बिर्रा से हिलमिल रयैं , जी घर के सब लोग |
कत *सुभाष* उनके घरै , रातइ दूर कुयोग || 862
खिचड़ी बिर्रा नाज है , चावल दाल सुजान |
बीमारी में पथ्य भी , समझत है इंसान || 863
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ठगिया हैं चारौं तरफ , घूमत हैं दिन रात |
पतौ न कौनउँ खौं परत , ऐसी करतइ घात ||864
ठगिया अब चमचा बने, नेतन के सँग रात |
हेरा फेरी सब करै , लेकिन नईं दिखात || 865
नेता जी भी बन गयै , अब ठगिया के बाप |
सबइ दिशा सें खात हैं ,नहीं पकर पौ आप || 866
ठगिया चिना न अब परै , पतौ नहीं चल पात |
फैलातइ है रायतौ , पसरा दैतइ भात || 867
अब ठगिया खौ चीनबौं , नहीं रऔ आसान |
ताम झाम ऐसौ करैं , छुपी रात पैचान || 868
हम सब ठगिया भक्त है , प्रभु दरसन खौं जात |
धेला एक चढ़ाय कै , लाखन सुक्ख मँगात || 869
ठगिया नेता देश में , टाँड़ी से उतरात |
चूहन जैसी हरकतै , बजट कुतर कै खात ||870
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बीद गरे गौं अब गई , अच्छी फँस रइ गट्ट |
कइती मिलहैं काल हम , पर बै आ गवँ चट्ट ||871
सास गरे गौं पर गई , कात पावनै आव |
सारौ रड़ुआँ घूम रवँ , ऊकौ ब्याव कराव || 872
नेता ठाँडै बाँयरै , परै गरे गौं आन |
वोटन के लाने फिरत , दयँ गदिया पै प्रान || 873
उनै गरे गौं बीदतइ , जौ फाँकत दिन रात |
पंच टिपातइ काम खौं, कत है करौ उलात ||874
नहीं गरे गौं पालियौ , जीकौ मिले न माँप |
मंतर बिच्छू सीखकैं , नईं पकरियौ साँप || 875
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सुखिया दुखिया है जगत, चका लगै दिन-रात |
टूँका तिसना लोभ कै ,सबखौं देतइ घात || 876
टूँका हौजे ओइ कै , जौ सामें इठलाय |
लम्पा से जौ यैंड़ कैं , भारत से टकराय ||877
ऊपर बारौ यैक ही , सबइँ जनै है अंश |
पर धरती पै काय है , टूँका करकै वंश || ? 878
लोग लुगाई जातियाँ , मानवता है धर्म |
फिर टूँका में क्यों बँटे , समझ न आबें मर्म ||?879
बारिश पानू यैक है , सबइँ जनन खौं याद |
जिस टूँका में वह गिरै ,बनत ओइ को स्वाद ||880
भूमि -बीज कौ है मिलन, जीमें रत विस्तार |
पर टूँका में यह दिखत , जो ठगिया संसार || 881
धरती- अम्बर हौत है , गोल कात भूगोल |
टूँका में बादल रयैं , लय पानी अनमोल ||882
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उल्टौ देखत हाल अब ,कर रवँ भजन सियार |
बिल्ली करै पुआस है , छिरिया लय तलवार ||883
उल्टौ सूदौ हौ रऔ , कौन कात जा बात |
घी में घुइयाँ फिट रईं , चर्चा चलै चिमात || 884
राजनीति में खप गयै , जीकौ उल्टौ हाल |
लाते है कप चाय में , सुबह शाम भूचाल ||885
कभउँ न सूदी कात बै , उल्टौ कत बतकाव |
चार जनै जब टौक दें , पकर जात है ताव || 886
उल्टौ फट्टा बिछ गऔ , अब पाछै पछतात |
बनै लड़ैया घूमतइ , हुआ -हुआ चिचयात ||887
उल्टौ मंतर जब पढ़ै , तब बै सूदै हौत |
ऐसे टिडुआ आदमी , है गलियन में भौत ||888
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अँदरन की संगत करौ , गिरत खाइ में फच्च |
फिर इलाज की झेलतइ , ठाँड़े बैठै दच्च || 889
मित्र समझ दै दवँ उयै , आदौ माल उधार |
लग गइ अच्छी दच्च है , बौ नइँ सुनत पुकार ||890
अच्छी दैतइ दच्च है , आकै रिश्तेदार |
खातइ हूकाँ की लुचइँ , लै टीका उपहार ||891
मिलतइ ठाँड़ी दच्च है ,बिगरैं भी कछु काम |
समरत है फिर देर से , कत सुभाष अविराम || 892
लगबै अच्छी दच्च जब , तबइँ समझ में आत |
वरना इक्कर सब चलत , नब्दा पैलत जात || 893
बजरंगी ने दच्च दै , लंका दई जलाय |
रावन बैठौ हींड़ गवँ , अपनी मुड़ी खुजाय || 894
लबरा लम्पट लालची , चमचा आबै दोर |
दच्च इनइँ से है लगत, चिपकै संगै चोर ||895
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मइया पूजैं लै कलश , दै चरनन में ढार |
और चढ़ा अठबाइयाँ , माने खुशी अपार ||896
मइया पूजैं सब यहाँ , चुनरी लाल चढ़ात |
जय माता दी बोलकर , सबकै मन हरसात || 897
मइया पूजै भाव सै, करबै मन से ध्यान |
माँगत हैं उनसै सदा, चरनन में इस्थान || 898
नवदुर्गा त्यौहार है , मइया पूजैं लोग |
विनय करै सब नारियाँ , घर भर रयै निरोग || 899
मइया पूजैं कर युगल , विनती करै सुभाष |
अँदयारौ सब दूरकर , भर दो हृदय प्रकाश || 900
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न्योरे कभउँ न तुम करौ , हौबें साजौ काम |
करियौ डंका चौट पै , भली करेगें राम ||901
मंदिर जब भी जित मिलै , न्योरें चलियौ आप |
दरसन खौं चूकौ नईं , सुनियौ भजन अलाप || 902
अफसर न्योरे दैख कै, थोरी दया दिखात |
हलकौ पतरौ काम बै , मुस्की दै कर जात ||903
भड़या पकरत है पुलिस , दै डंडा से मार |
न्योरे भय चिल्लात बै , करतइ माइ पुकार || 904
गुनिया बनिया जब मिलैं , न्योरे कर लौ बात |
बखत परै पै जै कभउँ , दैबैं काम सटात || 905
न्योरे चोरी ऊँट की , कभउँ कितउँ ना होत |
जीकौ पेट पिरात है , बौ डिड़या कै रोत ||906
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बात सबइ से कात है , ले लौ भैया सीख |
दोवारा गलती नईं , कहत डाँड़ की चीख ||907
डाँड़ उनइँ कौ हौत है , नियम तौड़तइ जौन |
न्याय कभउँ ना देखतइ , सामै ठाड़ौ कौन ||908
डाँड़ लगै सै छूट गय , है साबुत अपराध |
सीख अगर तुम लै सकौ , कभउँ न आबै व्याद || 909
डाँड़ लगै पै जानियौ , लोग हौत बदनाम |
बैसरमी जिनखौ लदी , करै न ढँग कै काम || 910
लाख रुपै़या डाँड़ हौ , या हो एक छिदाम |
अपराधी कौ दाग लै , रत " सुभाष" बदनाम || 911
मूसर जैसी है अकल , करतइ रयै गुनाह |
डाँड़ लगत सौ है भरत , फिर भी करत न आह || 912
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चार ठौल पइसा जुरै , नब्दा पैलत लोग |
जैसे बनै कुबैर हौ , लयै स्वर्ग को भोग ||913
नेतन कै चमचा दिखै , यैठत अपनी मूँछ |
नब्दा गाँठत भीड़ पै , फटकारत है पूँछ || 914
नब्दा उनकौ गवँ निपुर , काढ़न लागै दाँत |
चार जनन ने पेट की , परख लई जब आँत ||915
नब्दा उनके है चलत , करत रात जौ दान |
चार जनै भी पूछतइ , और करत सम्मान || 916
सूखौ नब्दा ना चलै , और चलै ना यैड़ |
भर पंचायत सब जनै , दैखत आँखें कैड़ ||917
कैड़ = कैड़बाई (तिरछी आँखन देखना
जब-जब नब्दा पैलतइ , आकै पाकिस्तान |
हरदम खातइ लात है , बनतइ बेईमान || 918
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लरका नटवा जान कै , सबइ दैत हैं छोड़ |
दमदोरौ कर लैन दौ , कभउँ पकर लै मोड़ ||919
उछल कूँद नटवा करै , जब तक डरै न नाथ |
या फिर डेंगुर डार कै , कर लैं अपनै साथ || 920
रासा में नटवा चलै , सीख लैत है भौत |
खेतन कै हल में निबै , करत रात है जौत ||921
नटवा खौं सब प्रेम सै , दैत भौत पुचकार |
ऊसै काम निकारबै , करत रात है प्यार ||922
नटवा अपने सींग खौ , मानत है हथियार |
छरिया कीचड़ में घुसा , खेलत करत बहार || 923
नटवा हमसै कात ती , मौरी नानी खूब |
कत ती खाबै में कभउँ , करनै नइयाँ ऊब || 924
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रात अमावस कारतिक , हौत दिया त्यौहार।
पूजै घर में लच्छमी, करतइ सब उजियार।।925
मात् लच्छमी की सुनै , ई धरती पै आत |
साफ सफाई वह तकै , दीवाली की रात ||826
विनतुआइ माँ लच्छमी , सबकी राखौ लाज |
चलीं आइयौं तुम उतै , जितै हौय शुभ काज || 927
दूध दही पइसा रयै ,और सुखी औलाद |
कृपा करैं सब लच्छमी , सबकी है फरियाद || 928
सब चाउत है लच्छमी , घर में भरैं प्रकाश |
पाप कटै मन के सबइ , तम कौ करैं विनाश ||929
बउँ बिटियाँ सब लच्छमी , घर की हैं कैलात ||
इनकौ रखतइ मान जौ , घी चुपरी बौ खात || 930
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दीवाली के मौनिया , निकरत परमा जान |
घूमत बारह गाँव में, पूजत शुभ इस्थान || 931
डड़ा खेलतइ मौनिया, मौर पंख खौ धार |
ढुलक नगड़ियाँ पै नचत, गात भजन मनुहार || 931
गलगलियाँ भी है बँदी, रंगे बिरंगे हार |
देखत है सब मौनिया , अपनी नजर पसार ||932
घेरा में नाचत सबइँ , बजै नगड़िया ताल |
ढुलक मजीरा मौनिया ,दिखबै नाच कमाल ||933
मौन रात सब लोग है , लगत मौनिया नेक |
कला नृत्य में है निपुण , मिलत एक से एक || 934
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दाँद चुनावी थी मची , मिलौ न हमखौ चैन |
इतै उतै भागत फिरै , उनसै अपनी कैन ||935
उनकी बउँ धन की सुनत , भौत मचा रइ दाँद |
पिटिया चापैं है भगत , घर को दोरौ फाँद || 936
ठलुआ ठेंगा जुर गयै , दाँद मचा रय गाँव |
गैलारै हैरान है , बैठ न पाँवत छाँव || 937
पंचायत जब हौत है , भौत मचत रत दाँद |
लोग सुनत ना काउँ की , अपनी -अपनी धाँद || 938
दाँद मचाबौं है गलत , बूड़ै बुजरक कात |
निकरत नइयाँ सार कुछ , मठा लुड़क भी जात ||939
दाँद मचा रय कछु जनै , अच्छौ भयौ चुनाव |
वोट न मौरे कयँ दयै , खूब पकर रय ताव ||940
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उनखौं ब्याड़े जान दो , नइँ हौ बसकी बात |
पाँव फँसा लूलै बनैं , करियौ नईं उलात ||941
ऊखौ ब्याड़े जान दो , जौन न आबै काम |
बनतइ मूसर चंद है , लुटैं खुटी के दाम ||942
भैया ब्याड़े जान दो , लगै मुड़ी पै दाग |
खेचाँ तानी की जितै , झरझरात हौ आग ||943
उसकौ ब्याड़े जान दो , भलै मिलत हौ दाम |
हाथ लगातइ ही जितै , ऊसइ हौं बदनाम ||944
भइया ब्याड़े जान दो , मानौ मौरी बात |
लबरन की संगत जितै, मिलत उतै हौ मात |945
ब्याड़े में संगत गई , रानै सबखौ दूर |
किलकिल मचबै खेंच कें ,उचकत हौं लंगूर ||946
टाँय- टाँय-सी फिस्स हौ , मंतर जब बतलाँय |
ब्याड़े में हम तुम फिरै , गुथै गौजना राँय ||947
ब्याड़े में हम बिद गये , अच्छे बनै गवाह |
दिन भर पेशी है करत ,जियरा उठत कराह ||948
ब्याड़े में पंगत गई , जाने नइयाँ मोय |
गुली तेल लडुवाँ जितै , खाकै कौ अब रोय ||949
जौरू कहती आन कै , ब्याड़े में गइ बात |
हम तुम रइयौ प्रेम से , बनकै अब सौगात ||950
जौन लड़ाई हौ गई , ब्याड़े में दो टार |
धना कात हँसकै उतै , नईं मचाने रार ||951
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ब्रम्हा बिस्नु महेश है , तीन लोक करतार |
इनकी लीला सब जगाँ , करतइ लोग निहार ||952
सृष्टि रचियता सब कयै , पर ब्रम्हा औतार |
विस्नु टुड़ी का शुभ कमल , उनका है आधार || 953
ब्रम्हा की बेटी कहत , सुनौ शारदा नाम |
चलती वाहन हंस पै , हातन वीणा थाम || 954
ब्रम्हा कौ मंदिर बनौ , पुष्कर आलीशान |
अद्भुत लीला है इतै , सुनतइ सबइ बखान ||955
कात पितामह सब जनै , चतुरानन लोकेश |
टुड़ी जन्म औतार कत , पूजै ब्रम्हा वेश || 956
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देवराज जू नाम कै , हैगें इंद्र प्रधान |
सुरगन के सुख भोगतइ , सब कत इनै महान ||957
ठाय - ठाय तैतीस है , इंद्र मिला उल्लेख |
अलग बँटै सब काम है ,सबकी अपनी रेख || 958
वरुण अग्नि जल सूर्य है , यह सब हौतइ इंद्र |
मंगल इंद्रन में गिनौ , और गिनौ शुभ चंद्र || 959
इंद्र लोक की है सुनत , रयै सुखौ की खान |
नृत्य और संगीत की, चलै वहाँ पै तान ||960
सिंहासन चिंता करैं , देवराज मह इंद्र |
भेजे विश्वामित्र तक , अपने छल के छंद || 960
सबइ इंद्र रत मस्त हैं , जब बीदत है गट्ट |
आबैं ब्रम्हा विस्नु सँग , महादेव लौ झट्ट || 961
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शंकर भोले कात सब , जिनकौ मन है साफ |
हाथ जौर जौ पौंच जै , कर दैं ऊखौं माफ || 962
खाल लपेटें बाघ की , धरै मुड़ी पै गंग |
चढ़ो चंद्र मुस्कात है , भोले के बौ अंग ||963
बम-बम भोले कात सब , छानत रत सब भंग ||
भोला शंकर नाम सुन , मन में उठत उमंग ||964
उमा पार्वती अरु सती , गौरारानी नाम |
भोले के सँग नाम लौ , बनत सबइ है काम || 965
रातइ हैं कैलास पै , नौनों है यह धाम |
करैं सवारी नादिया , भोला जिनकौ नाम || 966
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दोहे विषय - बैठका
घर में बनतइ बैठका, सजौ बनौ बौ रात |
खा पी कै सब बैठतइ , फिर सब अपनी कात || 967
बैसे घर - घर बैठका , सबकै अपने रात |
पर मुखियन को गाँव में , बड्डौ तनक दिखात ||968
जितै बैठका है बनत , गद्दा तखत बिछात |
हुक्का पानी सब रखत , पान- सुपाड़ी रात || 969
चार जनै या पावनै , घर में जाँय पधार |
खुल जातइ है बैठका , हौन लगत सतकार || 970
लिपौ पुतौ रय बैठका , हौत बैठ बतकाव |
हौतइ घर की शान है , सबखौं दै ठहराव ||971
तखत लगै कुरसीं डरीं, सौफा लगत दबंग |
हुक्का रख्खौ बैठका , लोंग लायची संग || 972
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चीं चीं चिल्ला चोट हौ ,चींख चिकड़ हौ बात |
चतुराई सब छाँटबैं, तकियौ सबइँ चिमात ||973
का का कौ कौ कै रयौ , परै नईं सड़ स्वाद |
कत सुभाष कित्तउँ करौ , पानू भरै न नाद ||974
दाँत निपौरे जौ फिरै , अपनै मौं खौं फाड़ |
गुर कौ हँसिया बौ बनै , किंच लगै ना दाड़ ||975
धूरा आँखन में पिड़ै , गटा हौत है लाल |
बगदूरै में जौ घुसै , ठौकत फिरबै ताल || 976
गयतै अमियाँ टौरबै , चढ़ न पायै पेड़ |
फेकों पथरा सिर गिरौ , उतइँ पसर गइ ऐड़ || 977
पाछै से हूँदा घलैं , आगै न्यौरें जात |
मैला - ठैला घूम कै , पाँव पिरातइ रात ||978
चाल चलौ यैसी चलौ , चलबौ दैबै सार |
चल्लौसन चखबै मिलै , उतै बात दौ टार ||979
मुड़िया उतै कुकात रय , समझ न पायै काज |
जितै बैशरम पी मठा , छौड़ आय सब लाज || 980
विशेष - पहले चरण में यदि 🖕
उतै मुड़ी कुका+त रयै , लिखते तब ×× होता , क्योंकि आठवी नौवी मात्रा संयुक्त होती व उच्चारण में तीन त्रिकल भी बन रहे थे ,इसीलिए लय में हल्का अटकाव जाता , यह दोहे की बहुत ही बारीकी है |
सुख दुख दौनौं आत है , लयै कलैबा गेह |
हींसत से चिपकत गरे ,दिखलातइ है नेह || 981
छुटपन ज्वानी गइ हिरा , पतौ नईं चल पाँव |
बनै जुआरी हम रयै, खूब लगायै दाँव || 982
गुजरी बिरियाँ लौट कै , कभउँ घरै ना आँइ |
हाथ मलत कउँ धौत रय , मौं पै आई झाँइ || 983
गैलारौ सूरज रऔ , और चंद्र रवँ आन |
सबखौं जै समझात रय , अपनौ इतै न मान || 984
साँप पूजतइ सब जनै , अगर चित्र में हौय |
जिंदा में मारै कितै , सौचत रात अनौय || 985
खोट करम ना कुछ करै , करत पाप को अंत |
भजत राम को नाम है , जौ हौतइ है संत || 986
संतन की चर्या अलग , भुन्सारै से शाम |
लैकै माला फेरतइ , जपत कृष्ण श्री राम || 987
फिर भी डरतइ संत है , हौय कछू ना पाप |
राम नाम में मस्त हौ , करत रहत है जाप ||988
हम दुनिया के लोग हैं , करतइ मायाचार |
पाप पुन्य कौ है करत , अच्छौ इतै बजार ||989
लोगन की अब का कयै , राखत नहीं उसूल |
दुनियादारी की करैं , बातैं इतै फिजूल || 990
मौं देखत हैं चीकनो , फिर ऊ जैसी कात |
बातै करतइ लाबरी , दुनिया खौ भरमात ||991
कौउ तनिक साँसी कयै , लरबै खौ आ जात |
अपनौ साजौ देखतइ , दूजौ नहीं पुसात || 992
गैलन में पथरा बिछा , खुद खौ साजौ काँय |
दूजै की आँखें तकैं , फुली चट्ट बतलाँय || 993
लोग न अपना छौड़ते , जैसौ बनौ सुभाव |
सूदौ दैखे आदमी , तुरत पकर जै ताव || 994
सबखौं अपनी है परी , दूजन की नइँ बात |
अपनौ काम निकारबै , दैत सबइँ खौं घात ||995
कै दैतइ है जौ सरल , करबौ कठिन बताँय |
समरत दैखत काम खौ,अपनौ कहौ सुनाँय ||996
अपनी छैड़ी में सबइ , लैतइ खूब दहाड़ |
बिदत दूसरी जब गली , खाकै आत पछाड़ || 997
सेंक लैत कनबूजरै , चुप्पी लैतइ साध |
जब सयानन के बीच में ,हौ जातइ अपराध ||998
बातै नौनीं जौ करत , फूल झरत-से बोल |
बौ हेगौं संसार में , कीरत में अनमोल || 999
चार जनन कै बीच में , जब बढ़बाई हौय |
समझौ जीवन है सफल , तीरथ मिल गवँ मौय ||1000
दोहे लिखे हजार है , बुंदेली के बोल |
कहै बराई अब कलम , समझे सब अनमोल ||1001
©® सुभाष सिंघई जतारा (टीतमगढ़) म०प्र०
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