https://subhashsinghai.blogspot.com/ ,बुंदेली बराई , (सुभाष सिंघई जतारा के एक हजार बुंदेली दोहे )


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माता   मेरी    शारदे ,  देती   सदा   प्रकाश |
पंच लिखूँ दोहावली , सेवक  यहाँ  'सुभाष' ||

लिखी "बराई" "बाँसुरी"  , "कुंड"  "दीप"  हैं  नाम |
दोहावली "सुभाष" से   , माँ   को  किया  प्रणाम  ||

हैं  माता  आशीष   से,     दोहे   पाँच    हजार ||
पाँच  खंड  जिसके बने ,    मानूँ   माँ  उपकार ||
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मैं बुंदेलखंडी होते हुए भी , बहुत कम ही बुंदेली में लिखता था किंतु फेसबुक पर  एक बुंदेली रचना पोस्ट करने के दौरान आदरणीय जी० एस० रंजन जी  से वार्ता हुई , दूरभाष पर भी विचार विनिमय हुआ , मुझें यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि मुम्बई में रहकर भी एक शालीन व्यक्तित्व बुंदेली भाषा , लोक कला , संस्कृति सम्वर्धन के लिए चिंतित व कार्यरत है , मैं उनके बुंदेली झलक ब्लाग से जुड़ा व उनके कृतित्व को देखा पढ़ा ,  कौशल को समझा | इसी मध्य आदरणीय राजीव नामदेव " राना लिधौरी " जी  टीकमगढ़ से सत्संगति हुई , और उन्होनें भी बुंदेली माटी का ॠण ‌चुकाने का परामर्श दिया , व अपने जय बुंदेली साहित्य समूह से जोड़ा | आदरणीय राना जी भी बुंदेली भाषा संवर्धन के लिए प्रयासरत रहते है , समूह से लिखने के विषय मिले ,  , जिसका परिणाम बुंदेली बराई  की ई बुक आपके समक्ष प्रस्तुत है , जिसमें मेरे एक हजार बुंदेली दोहे है ,अन्य बुंदेली रचनाएं अलग बुक में है ,
बुंदेली बाँसुरी , भी लिखना प्रारंभ कर दिया है, जिसमें पुन: एक हजार नए बुंदेली दोहे है 
अन्य पुस्तकों के अलावा,  हिंदी  दोहों की भी दो ई बुकें एक -एक हजार दोहों की (दोहा दीप व दोहा कुंड ) भी ब्लाग पर  सेवार्थ है व "दोहा   सुभाष "तैयार हो रहा है 
सादर 
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लेखक का परिचय

नाम - सुभाष सिंघई 
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955 
जन्म स्थान - जतारा , 
पिता का नाम - श्री कपूर चंद्र सिंघई 
माता का नाम - श्रीमति शीला देवी सिंघई 
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र  )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई 
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल (सागर )
       2 - शिल्पी सूर्या  - नितिन जैन ( खजुराहो ) 
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई 

लेखन की विधा - 
1 - दोहा , कुंडलिया , चौकड़िया , पदकाव्य  , इत्यादि सभी सनातनी मात्रिक छंद 
चार  हजार के करीब हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के  करीब कुंडलिया  , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है 

2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है 

 वर्तमान में सनातनी मात्रिक छंद पर लेखन कर रहे है 

3- ब्लाग डाँट काम पर प्रकाशित  कृतिया - 
1- दोहा दीप (एक हजार दोहे )
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे ) 
3- बुंदेली बराई ( एक  हजार बुंदेली दोहे   ) 
4- मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य 
5- कलम से उद्गम ( विभिन्न सनातनी मात्रिक छंद  ) 
6 -कुंडलिया कुंड 
7 - गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
8- हिंदी छंद माला
9- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी 
10- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन , 
11- गर्भ से गमन तक (खंड काव्य )
12  गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है 
13 -ट्वीटर -  व ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें है व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है 
वर्तमान में सम्पादन - 
1- छंद महल (मासिक हिंदी ई पत्रिका ) जिसके  25 विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके है 
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक  हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है 

यूट्यूब - सृजन चैनल का‌‌ संचालन

कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है

©®  सुभाष सिंघई 
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660 
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सुभाष सिंघई की तीसरी दोहावली
 (बुंदेली में एक हजार दोहें) 


               श्री गणेशाय नम: 

मोइ विनायक जू सुनौ , झुका रयै  हम   माथ | 
मिलकै चाउत  सब जनै , मिलै आपको साथ || 1

कात गजाजन आपखौं  ,    एकदंत     माराज | 
पूरै   हौतइ   आपकी ,   पूजा   से  सब काज ||2

अंबिकेय शंकर सुवन , सबइँ अपुन के  नाम |
पाँव पखारत  हम इतै , मानत  तुमखौ  धाम || 3

महाकाय भी   कात  है , टेड़ी   राखत    सूड़ | 
जिनके  आगें देवता ,  पटकत  अपनी   मूड़ || 4

मोदकदाता  आपखौं , कात  जगत के लोग | 
विघ्नेश्वर  भी  है अपुन , हरतइ सबइ कुयोग ||5

एक हास्य दोहा 
गनपत बप्पा मोरिया ,    तकौ देश कौ हाल |
नेता बगदर बन गये , पटा खाय अब खाल ||🙏😇6
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लय   बाजौ  है   हात में , तकौ सरसुती मात | 
बैठी   राती   हंस    पै , उन्ना    धवला   रात || 7

हर अक्छर  में  देखतइ ,  उनकौ ग्यानी रूप | 
माइ  सुरसुती मौइ खौं   , लगतीं  नौनीं  धूप || 8
 
वेदन   ग्रंथन   में  लिखी  , मैमा    अपरमपार |  
करत सुरसुती‌ साधना  , करकै  सब जयकार ||9

कृपा  करौ अब  सुरसुती , रख लो मौरौ ध्यान |
रखियौ दास   सुभाष  की , छंदन  में   पैचान ||10

दुनिया  भर  कै कात है  , लगत आँग वरदान |
हात सुरसुती जित लगत , बनत बोइ विद्वान ||11

कलम हमाइ चल रयी , साँसी  कात सुभाष | 
मिलै सरसुती से सदा , हमखौं ग्यान प्रकाश || 11
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ढबुआ  ताने   मैंड  पै , पिसिया  रयी  रखाय |
मुनिया  खौं चिपका धना, गाकैं  रयी‌‌  सुलाय ||12

हरिआ-हरिआ   टैरकैं  , गोरी‌   रयी   भगाय  |
हरि आ+कैं ढबुआ घुसै , मुनिया रयै खिलाय‌  ||13

ढबुआ  हौतइ खेत पै  , चारौ   तरफ  रखात |
यैसइ ढबुआ  ईश भी  , अपनौ खुदइँ बनात ||14

ढबुआ जौ संसार है , पकी फसल तक राँय |
फिर सब ऊकै बाद में , अपने घर खौ जाँय ||15

ढबुआ ढाबा हौ गयै , चलनै   लगी   दुकान |
खटिया पै परसन लगौ  , खाबै  कौ सामान ||16

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बुंदेली दोहे -विषय चकिया

चकिया कत संसार खौं, सबइ पिसत हैं जात   |
कीला   पकरौ   राम   कौ , इतै   कबीरा कात ||17

डड़ा ठुकी  चकिया तकौ , जीखौं पकर घुमात |
ऊखौ  जानौ  है  करम  , सबइ  जनै  बतलात ||18

चकिया जौ संसार है , करम   धरम  दो  पाट |
नौनों  डारौ  नाज  तो ,   खाबै  कौ   हौ  ठाट ||19
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बुंदेली दोहे विषय - गरी

गरी चढ़त जब  देवता ,बनतइ  नौनों  योग  |
बाँटत माँगत है सबइ , मानत सब है  भोग ||20

गरी बुरादा पान में ,      सँग में चमन बहार |
गोरी रच रय औंठ है , लगत  बाग गुलजार ||21

गरी गरीवन के गरै ,   बन  कै आतई  जोग |
बड़े प्रेम से खात बै , कत है मिल गव भोग ||22

गरी   गुर्र कै‌   डार दइ ,    लडुआ  लये  बनाय |
मजा पड़त खाओ अगर , स्वाद अलग ही आय ||23
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बुंदेली दोहे    , विषय - बजौ भयौ

बजौ भऔ सब मानतइ , कितनउँ हौवें ठट्ठ |
सौ  गुंडन  पर  एक   है , बुंदेलन  कौ  लठ्ठ ||24

बजौ भऔ जौ क्षेत्र है , मुलकन तीरथ धाम |
दरसन  से  हौ  जात  हैं , सबकै   पूरै काम ||25

बजौ भयौ इतिहास है , काँ लौ कियै बताँय‌ |
आल्हा ऊदल बीरता , गाँकै   सबइ  सुनाँय ||26

बजौ भयौ मंदिर इतै , पन्ना जुगल किशोर |
नगर ओरछा राम जू , आ  जातइ है‌  भोर ||27

बजौ भयौ सब कर रयै , डारै  नौनें    हाथ |
दोहा लिख रय हूँक कै , राना जू के साथ ||28
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बुंदेली दोहे विषय बुड़़क

मकर संक्रांति एवं लोहड़ी की शुभकामनाओं सहित💐💐

माघ मास में सूर्य जब , मकर राशि में आँय |
बुड़की  लैबै आँग में   , पैलउँ  तिली लगाँय ||29

नदिया में बुड़की लगा , करत तिली को  दान |
पैलउँ  अरघा देत है,    ऊगत   रवि  भगवान ||30

जाड़ौ   बुड़की  से   करे , आगे खौ   प्रस्थान |
तिली    हवन  में डार कै , देत  विदाई  मान  ||31

तेल तिली कौ खात जो , जठर अग्नि बढ़ जाय |
उल्टौ    सूदौ    पेट  में ,    सबखौ तुरत पचाय ||32

खरी तिली की ढौर भी , चाँट- चाँट   के  खाँय |
काम किसानी हौ जितै ,  ताकत  खौ  बतलाँय ||33

तेल तिली अब दूर है , खा रय सबइ रिफान्ड |
सौ हम सब भी देखतइ , खाली रैतइ माइन्ड ||34

सूरज नें बदली दिशा , अब उत्तर खौं जाँय |
बुड़की में उम्दा तिली , पकवानों   में  खाँय ||35

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बुंदेली दोहे  , विषय‌ - कुइया

कुइया घर में देख कै , सगया  भयै प्रसन्न |
कै गय मोड़ी खायगी   ,‌येइ घरै‌ अब अन्न ||36

बिन्नु गयीं जब सासरें , खिच  गइ   मन में  रेख |
कुइया घर की थी भरी,   हँस  गइ ऊखौं   देख ||37

तीन खेप मुड़िया धरै , गयीं  कुआँ तक रोज |
कुइया हती न मायकै , पानू‌   की  रइ  खोज ||38

कुआँ  बड़ौ  संसार  है , कुइया   घर  परिवार |
ज्ञानी  सबसे  कात है  ,रखौ  प्रेम   की  धार ||39

सबकी प्यास बुझाउते , कुआँ  चौपरा    ताल |
कुइया घर परिवार कौ , राखत दिल से ख्याल ||40

नीर न सूकै काउ कौ ,  विनती  है भगवान |
कुआँ चौपरा ताल हौ , या कुइया की आन ||41

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बुंदेली दोहे , विषय - घिची

माला पैरत ही  तनत  , करतइ कछु ना काम |
हाथ पाँव  मैनत  करैं ,  पातइ  घिची  इनाम ||42

तिरिया भी अपनी घिची , करतइ खूब  सँबार |
डारै  फिरतइ   लल्लरी , गुरिया  करैं  निखार ||43

जौन घिची में डार दै ,  दुल्लौ  अब  वरमाल |
औइ  गरै में  नौचिया , लैतइ  रत  हर  हाल ||44

घिची पकरतइ है पुलिस , बिद जाबै जब  चोर  |
टूटत  है   तब  चामरौ ,  मचत  गाँव  में   शोर   ||45

सबखौ हम सम्मान दें , घिची झुका कै आज |
सबरै  गुनियाँ  है  इतै , जीपै   मोखौ    नाज ||46

बुंदेली   कमजौर  थी , अब  भी  है  कमजौर |
घिची  झुका  कै है  कहत , देते  रहियौ   ठौर ||47

मथुरा में   तुलसी  कहैं   , घिची   झुकेगी नाथ  |
ऊँकै   पैलउँ  लौ  पकर,   तीर  धनुइयाँ  हाथ  ||48

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बुंदेली दोहे , विषय - दुके

फसल दुके  ना खेत में , पक कै भी लहरात |
जैसन सूरज लालिमा  , सबखौ  रूप बतात ||49

चार जनन के बीच में , दुके नहीं  अब ग्यान |
चार बौल जौ भी सुनै ,   कर  लेतइ  पैचान ||50

वीर दुके  ना युद्ध में , रत  है  छाती   तान |
मरबै नईं  डरात है , लय  हाथन   में  प्रान ||51

दान देय दाता दुके , अपनौ ना बतलाय  |
जानौ  ई संसार में , बोइ   देवता   आय ||52

दुका दुकऊल में दुके , यारन की  है बात  |
जबसै दूला सब बनै , घर में  दुबकै  रात  ||53

दुके-दुके दोहा   लिखे , दयै  मंच पै   डार |
घट बड़ जैसे हौ बने, पढ़ियौ  आप समार ||54

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बुंदेली दोहे विषय,- मावट

गरजत  है जब  जौर  से , बदरा   ठंडन     आन |
मावट आ गइ जान लौ ,  कातइ  सबइ किसान ||55

टप-टप   बूँदे   गिर  परै   ,  जड़कारै   कै    माह |
मावट   पाकै  खेत   भी ,  कात  रात   है     वाह ||56

मावट  बरसे   जब  फसल , हरी  खड़ी  हौ खेत |
कत   किसान  भगवान से ,   उम्दा   मौका  देत ||57

साँप चढ़ै  जब पेड़ पै , उड़- उड़  सारस   जाय |
चलवै  जब  पछुआ  हवा , मावट  जल्दी आय ||58

काँसे की बिलिया चढ़ै ,  नीली  अगर  फफूँद |
बदरा   राबै   रात  भर , जानौ     मावट‌  कूँद ||59

मौइ धना  गइ  खौटबें , फरै   धना  जब खेत |
मावट   की  बूँदै   गिरी , लौटी    मुसकी देत ||60

माव    मास  की   ठंड    में ,  हौ   मावट   बरसात |
हाड़ कृषक कै काँपतइ  , फसल  हँसै    दिन रात ||61

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बुंदेली दोहे , विषय ढ़ोंग

ढ़ोंग जितै हम देखतइ , जड़ में    हौतइ स्वार्थ |62
करिया मन बन  आँदरौ , भूलत रत   परमार्थ ||

चार  जनन के बीच में , ढ़ोंग   नईं   चल   पात |
असुआ गिरबै आँख से, औठ हँसी खिल जात ||63

करतइ  रातइ  ढ़ोंग  जो , घटत   रात  सम्मान |
बनै बिलौटा  ढूँकतइ  , देत  न कौनउँ   ध्यान ||64

छलछंदौ  भी  ढ़ोंग   है , रहियौ   उतै   सचेत |
चंदन   चूरा  नाम पै   , पकरा    दै   बै    रेत ||65

ढ़ोंग न  जिनकै  पास है , बै   हौतइ   गम्भीर |
सूदै   सच्चै    आदमी ,   मन  से   रातइ  हीर ||66

कपटी करतइ  ढ़ोंग है ,  करतइ  ढ़ोर  उजार |
लम्पा   यैड़त  है   सदा , यही लिखी करतार ||67

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बुंदेली दोहे, विषय - कुकात

करजा खरचा खाज हो , या   सूजा-सी  बात |
चारउँ में जब एक हौ , साँसउँ  आँग  कुकात ||68

घाम घलै   जब   पीठ पै ,  तबइँ  पसीना आत |
चिपचिप सूकै जित जगाँ , भौतइ  उतै कुकात ||69

सबा शेर जब शेर खौ , फाँकत में  मिल  जात |
दबा   पूँछ   पंचात   में ,  बैठौ   रात  कुकात ||70

जरुआ - भरुआ जौन है  , सबखौं खूब दिखात |
टेड़ौ   मेड़ौ  मौं   करें ,  अपनी    नाक  कुकात ||71

मन   में   रखबै   गंदगी , तन भी  दिखै भिड़ात |
जीवन भर बौ आदमी  ,  फिरतइ  पाँव कुकात ||72

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बुंदेली दोहे , विषय- गरियात

महाकवि केशव के महाकाव्य  रामचंद्रिका का जिवनार वर्णन बहुत पहले शिक्षाकाल में पढ़ा था | उसी से भाव लेकर सृजन किया है |🙏केशवदास जी ने बुंदेली रीति रिवाज , परम्पराओं  को वखूबी  रामचंद्रिका में समाहित किया है |

मड़वा के   नैचें  लगी ,    रामलला      जिवनार |
मिलकै   तब    गरियात-से , गीत  गबै  मनुहार ||73

जीकै  पति  दशरथ   अबै ,अमर नारि कहलात |
बने औइ के राम पति ,  गाँय   जनीं    गरियात ||74

लखन  तरेरे  गटन खौं  , राम  तबइँ     मुस्कात |
रनै  चिमानों   है  लखन ,  सइ गा रइँ  गरियात ||75

भरत समझ गय बात खौ , भूपति दशरथ तात |
आगें   भूपति  राम  है ,   गीत  सयी   गरियात ||76

बुंदेलन   की रीति   खौं , लिख  गय केशवदास |
इज्जत दें   गरियात में  , पंगत  में  कुछ   खास ||77

बकत  रऔ   शिशुपाल  है,  किसना   खौं  गरियात |
झेलत  रय  सौ   गारियाँ ,  फिर    बे   चक्र  चलात  ||78

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बुंदेली दोहे , विषय ब्याद

बिदी  गट्ट उनखौ हती , हमने लइ जब साद |
चिबक गई तब गोंच सी , ठाँड़ै  बैठे   ब्याद ||79

फिरत निनुरबे खौ  उतै , जितै बिदेै लइ ब्याद |
कौउ सुनइया है नहीं , ब्याद   बनी   जल्लाद  ||80

ब्याड़े में  सब  जान  दो ,  पैले   टारौ  ब्याद |
ब्याद बिदी रत जब गरै , बिगरौ रै  सब  स्वाद  ||81

ब्याद ब्याज में जब मिलै , गरै गोन  पर जात |
फिरत निनुरबे आदमी , पर मौं   की है  खात ||82

ब्याद बिदै कै आ गयै ,   माते   अब    उकतात |
लुकत फिरत है अब मड़ा , अपनी मुड़ी कुकात   ||83

नरवा  हौबें   खेत   में , साला   घर    धुँदराद |
दौइ जगाँ  पै जानियौ  , पसरी   रत  है  ब्याद ||84

रावन नें सीता हरी , चखौ  करम  कौ  स्वाद |
लंका  लैकें   आव जब  , ठाँड़ें   बैठें   ब्याद ||85

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बुंदेली दोहे , विषय चुगला

जगन तगन चुगला मिलैं, देतइ काम बिलोर |
भइया  इनके पेट  में ,    रातइ   सदा  मरोर ||86

हम सब चुगला  देखतइ , सबखौं मजा चखात |
दुतयाई जब  ना मिलै , इनकौ   आँग  पिरात ||87

दुनिया में   चुगला तकै, जै रत कान  चढा़ँय‌ |
औसर  उमदा  देख कै , तुरतइँ आग लगाँय ||88

हमखौं जब चुगला मिलौ  , फूँकन लागौ कान |
कुत्ता सौ   दुत्कार दव  , भगौ  बचाकैं   प्रान ||89

चुगला से चुगला मिलै  , हँसतइ  दाँत  निपोर |
देखत में  भोरे बनत ,   करतइ तनक न   शोर ||90

चुगला जातइ  सोच  कै , करने  का  दुतियाइ |
भरत    कान   ऐसे   सदा ,   हौवें    हाथापाइ ||91

चुगला मिल जै हर जगाँ , नहीं   ढूड़नैं   आत |
उकसाबै  कौ  काम   बें , पूरी   तराँ   निभात  ||92

राजा अकबर के लिगाँ , चुगला थे कुछ खास |
पकरै    पै  बानर    जुरै  ,  छूटै    तुलसीदास ||93

हर  राजा  के  राज   में  , चुगला देखे   खूब |
करा लरायी खुश भयै , राज   गयै कइ  डूब ||94

चुगला    दूरइ  राखियौ , जौरें   रहियौ   हाथ |
जो   इनके चक्कर  फँसै , फूटै  उनकै   माथ ||95

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बुंदेली दोहे  , विषय बूँट

दिखैं  चना के  झाड़  पै ,  पुचके   फूले    बूँट |
यैसइ जौ संसार है , हम   सब   जीकै    खूँट ||96

हरौ -हरौ  दानौ   रयै ,   अमरत   जैसौ  घूँट |
कात सुभाषा है इतै ,  सत्य  करम  सब  बूँट ||97

डाली  हौवे  शुभ  करम , फल हौवे जब बूँट |
ईसुर की  किरपा समझ, दानें   खाओ  सूँट ||98

फरौ बूँट हौ ज्ञान कौ , कभउँ  न हौवे  झूँट‌  |
बिधना से विनती करत ,सत्य रयै हर  खूँट ||99

संत हौत है रस सरस , हृदय रखत फल बूँट |
फल पाने  झुकना पड़ै , ठिगना   हौ या ऊँट ||100

खेत काटियो  बूँट   कौ,   जब दानें आ जाँय |
वरना  भाजी  हात रै , ग्यानी  यह  समझाँय‌ ||101

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बुंदेली दोहे, विषय गुरीरो

सबइ  जनै  अजमाइयौ ,  जितै  हौय मतभेद |
बचन  गुरीरो बन दवा  , मिटा देय  हर   खेद ||102

हौय उबाड़ौ आदमी , करत  रात    है     ठैन |
कथन  गुरीरो छौड़  कै, करय  बौलतइ   बैन ||103

पकरै  मूसर   हाथ में , धम्म  करत जौ आँय |
स्वाद  गुरीरो   ना चखै , फुकला सूँगत जाँय ||104

मिलत गुणीजन है जितै , बगरौ रत सम्मान |
सुनियौ उनखी तान खौ ,  लगत गुरीरो गान ||105

काज गुरीरो हौ उठै , जितैं  जुरैं   जब खास |
सजतइ घुरुवा  पालकी , रातइ उत विश्वास ||106

पिता गुरीरो   हौत   है , मात्   गुरीरी    खान  |
गुर की परिया दिल रयै , कातइ सबइ सुजान ||107

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 दोहे - विषय दरुआ

दरुआ की आदत बुरइ , पइसा जइँ से पात |
बेरा  कभउँ  न  देखतइ , दौर कलारी जात ||108

दरुआ -दरुआ जब जुरैं , गजब करत बतकाव |
दौनउँ  मिल कै एक सो , अपनो करत  सुभाव ||109

दरुआ अपने गुनन  से , खुद  हौतइ   बरबाद |
घर  में   टंटौ  रोप कैं   , बाहर  करत  फसाद ||110

दरुआ हौतइ दो तरा   , एक  चिमा  के  रात |
एक तनक सी डार कै , सबखौं  गाँइँ  सुनात ||111

दरुआ की   हालत  सुनौ  , पीकैं  घर में  आत |
खटिया पै औधों डरौ , लदर  फदर   सौ जात ||112

दरुआ देतइ दौदरा ,   छरकत सब  है  रात  |
मूरखता कौ  काम  है  , इनसे  करबौ बात ||113

दरुआ अरुआ सौ लगै , तनकइ  नईं    पुसात  |
गाँइँ बकत झूमत निगत, जितै  चाय गिर जात ||114

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बुंदेली दोहे , विषय - गानों

लाज शरम गाँनौ हतौ , कभउँ  नारि को अंग |
अब मरयादें गइँ बिखर , तकत सबइ भदरंग ||115

गाँनों  तिरियाँ गात   ती , बन्नों   बेंदी   हार |
अब गाती है ब्याय में , फिलमी चढ़ी खुमार ||116

नारी कौ गाँनों लुटै ,    जियै  कात  है  लाज |
जगाँ- जगाँ पर भेडिया , घात लगायैं  आज ||117

कवियन कौ गाँनों रयै , कलम भाव को मेल |
कविता दिखबें  ऊजरी, टपकत  है  रस तेल ||118

गीत सदा गाँनौ  रऔ ,   गायक  राग  सुनात |
नोनौं  सुनकै सब जनै , तन्मय भी  हो जात ||119

सुभाष सिंघई~

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बुंदेली दोहे , विषय - वेदी

    वेदी में समधा जलत , हवन  करत  सब लोग |बिनतुआइ  माँ  से करत, मिलैं खुशी के जोग ||120

            वेदी  पूजै   होम   दें  , घर  में   देव   बुलात |                   अपनौ लेकैं   भाग वें , आशीशें    दे  जात ||121

            वेदी   सँग   तुलसीघरा , घर की  हौतइ शान |                  मइया कौ आशीष रत  , बढतइ  घर कौ मान ||122

                वेद   हमारे   कात    है , करौ  देव  आह्वान |                 पर  वेदी  से  भोग  दें , और   करें   सम्मान ||123

              पोथी   बाँचें   मंत्र    पढ़ ,    वेदी  में  दें  होम |              धूप सुगंधी जब उठै,  खिलतइ  तन  के  रोम ||124

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माते कक्का घास में , सुलगा गय  है आग |
मड़ी कथूले की मुड़ी , ठोको  ठाड़ों   दाग ||125

बिन्नू सपरन खौ  गई , लहरें उठती घाट |
रामप्यारी    बोलती  ,   बिन्नु  खौ  गर्राट ||126

लचक कमरियां देखकर , टपकी बब्बा लार  |
आँख दबाकर दे रहे , लरकन खौ  उसकार ||127

गलती माते जू करें    , सबरे साधें मौन |
उरजट्टे  खौं सोचते     सामें आवै कौन ||128

दारु बँट रई गाँव में , डलने हैं कल वोट |
सभी  चिमाने लग रहे ,डाल खलेती नोट ||129

लरका माते को लगे   , सब लरकन से भिन्न |
फिर भी  पूजो  जात है , रात  दिना रत  टुन्न ||130

करें टिटकरी गाँव के ,फटियाँ की लख नार |
कहते  भुज्जी  डोकरा , खूब जताए प्यार ||131
कोरोना के  काल में , भूखन  मरो  किसान  |
पर डबला से फूल गय , देखो  सभी  प्रधान ||132

उससे ना कुछ बोलते , जिससे भाँवर सात | 
मोदी बाजो  टुनटुना ,करते  मन  की  बात || 133

बापू  आशाराम  का , राधे  माँ  खौ  ज्ञान |
इक दूजे का चित्त से , करते  अंतरध्यान ||134

माते कुत्ता  मारने ,  घर  ले  आए   लठ्ठ | 
मातिन ने अजमा लिया, माते पर ही झट्ठ ||135

राम  राम जू  चल उठे , भुनसारे  से  शाम |
समझो पास  चुनाव हैं  , बँटने  दारू  दाम ||136

मोड़ी मुखिया की भगी, कौसे कलुआ बैन |
खबर  पैल  से  ना  दई , ईसै  हौ  गइ  ठैन ||137

जुड़कर  पुंगा गाँव  के , बात  रहे  है  फाँक |
जो जितनी ही फाँक ले,उतनी उसकी धाँक ||138
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माखन  रोटी खा गयौ  , हरि   हाथन  से  छीन |
रैमन कवि तब लिख गयै , कउवा रऔ न दीन |139

काँव-काँव  कउवा   करै , भुंसारे की बेर |
समजौ आ रय पावने , बैठौ   कात  मुड़ेर ||140

मुड़ी-हाथ कउवा छुयै , मम्मै    चिठ्ठी  दैत |
बिन्ना तोरी   मर गई , रौकें     फैरौ   लैत ||141

कउवा आकै जुड्ड में , करवै   छत  पै  शौर |
कछु असुगन है आवनै, करबै  घर  में ठौर  ||142

उड़तै कउवा चौंच में , रोटी जब  दिख जाय |
बूड़े    बुजरग कै गयै , कछु सगुन घर आय ||143

कउवा  खौदें  जब जिमी , जानौ धन कछु होय |
सगुन शास्त्र  हमने  सुनो,  पतौ  चलौ तब मोय ||144
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जीनें  बोंड़ी  देख कै , मन  में  राखी   हूल | (हूल =हुलास )
ऊखौं देखौं इक दिना , हाथन में लय फूल ||145

बोंडी खौं मसलो नहीं , बा  भी खुश्बू  देत |
फूला बनतइ फूलकै  , आतइ है कइ  हेत ||146

बोंड़ी सबसे कात है  ,चार कदम  लो बोंड़ |
खिलकैं खुश्बू के भरै , सबरै भरियौ कोंड़ ||147

जीनें  बोंड़ी खौं  गुचक , दव हाथन से तोड़ |
मूसर  है वो   आदमी , मौका   देतइ  छोड़ ||148

हमने  बोंड़ी  बात है , तुम   आगे   दो  बोंड़़ |
मिलजुर राखौ  एकता ,भारत के हर  कोंड़ ||149

(अंतिम दोहे में बोंड़ी शब्द  (स्त्रीलिंग कर्म) किसी बस्तु/कथ्य को आदान -प्रदान से तदात्मय कर लिखा  है )

बुकरा की  डुकरौ  गई  , माँगन  जितै  भभूत |
सला  घौलना  दै  उठौ ,   इतइँ  चढ़ा  दै  पूत ||150
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बूड़े  बुजरक  कात हैं ,   बुकरा  से  का  बैर |
रात दिना वो  माँगतइ, मिमया- मिमया  खैर ||151

बुकरा मैं मैं रव करत , ले   लय   ऊकै   प्रान |
मुलक बजा दइ तालियाँ ,कै दव है  बलिदान ||152

कौनउँ  देखे  घौलना , बुकरा  लै   लें   पेल |
हात मीड़ हूँ हैं करत , तरा- तरा   के   खेल ||153

नहीं समरथन हम करें , बुकरा की बलि होय |
परसादी खौं  नारियल , दव  ईसुर  ने   सोय ||154

फौर नारियल भोग हौ , निबुआ का हो काट |
बुकरा खौ नहिं कष्ट हो , कातइ बात निचाट ||155
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राधा नें कान्हा तकौ , फिर  दय गटा तरेर |
दिन डूबै तुम आय हौ , करकै भौत अबेर ||156

शूपनखा  नकुआ  फुला , रइ   है  गटा  तरेर |
नाक बुचकवें तब लखन , करतइ नहीं अबेर ||157

कै दइयौ  तुम राम से , लौ कपीश अब हेर ||
सिया प्रान खौं त्याग दै , हौजे अगर  अबेर ||158

शिशुपाल की गारियाँ , श्याम गिनत सब हेर |
चका चलौ जब सौ भईं , कुछ ना करीं अबेर ||159

चींखत जा रइ  बेर खौ , भक्ति भरी उत हेर |
शबरी कत है राम जू , कर  दइ  बड़ी अबेर ||160

सभा  पुकारे   द्रौपदी  , श्याम तमइ से मेर |
लाज हमारी  लुट रयी  , काहै  करत  अबेर ||161

चिठियाँ भेजत रुक मनी , श्याम तुमइँ से मेर |
मौखौं  लैनें  आइयौ  ,  करियौ   नहीं  अबेर ||162
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पूने की  जब  रात हौ , छत  पै  धरतइ  खीर |
सबइ जनन से जा सुनी  , टपकें अमरत नीर ||163

ऊनै राखत है लछौ , बढत  रहत  कलदार |
शारद   पूने    टीकते , छंदो   के   मनुहार ||164

पूने    चंदा    नाचता ,   झरै  आँग  से  स्वेद |
अमरत जीखौ कात है ,  मिटा देत सब खेद ||165

ऊनै‌‌  पूनें  आय  जब , अपने  घर    मैमान |
कात सुभाषा तब सुनौ , समझौ  है भगवान ||166
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कै गइ है  राधा हओ , काल  किशन  हम  लाँय |
चुपकइँ  चपिया   चाँप   कै , सौकारे   से आँय || 167

हओ पैलउँ बुलबा लई , फिर मौं खौं दव खौल |
वन जाबै श्रीराम कौ‌, करत  कैकयी डौल ||168

भैया  हओ न बोलियों   , पैलाँ सुनियौ  बात |
लै जौरा की  फौज  से , कैसै  सजी‌   बरात ||169

गुनियौ चुनियौ काम खौ , तबइँ हओ कौ मान |
नाँतर ले लै यह हओ ,  लुखरगड़े   में     प्रान ||170

उनकी हओ न लीजिए , कुसगुनया जाँ रोग  |
जरत भुरत आहें भरत , तकत  दूसरे लोग ||170

पबरन दो उनकी हओ , कहौ हओ तुुम आज |
नौनी   कथा   पसारने  , नौनें    करने  काज ||171
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बुंदेली दोहे , विषय- गड़इ (लोटा )

गड़इ   डोर    छन्ना   मिलें ,  तब   गैलारौ   जैन |
भरत कुआ से जल खुदइँ , तबइ पाउतइ   चैन ||172

तामें     पीतर  कीं   गड़इ ,  हैं  नक्काशीदार |
माँज-माँज औरी  उयै , चमकातइ  जल ढार   ||173

बेपेंदा  की  हौ  गड़इ , ढुरक-मुरक  है   जात |
माल  मसालो जो  भरौ , इतै   उतै   विखरात ||174

नेतन के चमचा बने , घर में घुस कै खास |
बेंपैदा   को  हैं  गड़इ , काते  इतै  सुभास  ||175

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बुंदेली विषय - हनके

हनके बादर होत है , फिर.  बिजुरी चमकात  |176
भींजत  मन अरु खेत है , धना बैठ मुस्कात ||

हनके मुगदर मार दव , दुरयौधन भव चित्त |
फार दई छाती उतइँ , बार   द्रौपदी  सिक्त ||177

सुनियौ भइया आज तुम,हनके  लिखियौ  बात |
कथ्य भरै   कछु तथ्य सै,   दइयौ अब सौगात ||178

हनके  लेतइ   ब्याज   है , मौरे  कक्का  साव |
मिलत उधारी जब हमैं , हम भी करत न भाव ||179

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विषय रामधइ ,

केवट लैबै  रामधइ , राम   खड़े   खुद  द्वार |
कत है चरण पखार कै , हम लै जै उस पार ||180

हनुमत कै हर काज में , दिखत रामधइ  शान |
मैमाँ सब कत राम की , अपनौ  करत न गान ||181

खरिया  से  लिख राम खौं , मुस्का गय  नल-नील |
पथरा   मानैं    रामधइ    , तैरें      मुल्कन   मील ||182

पथरा खौं दे  रामधइ , तैरा  गऔ  लंकेश |
पर प्रभाव अपनौ  कहै , जाकै अपने देश ||183

अगन देव की साक्छ में , सिया रामधइ  लेत |
तन- मन कै निरदोष खौं , सबइ  परीक्षा देत ||184

राम काँप गय सुन उतै , आँखन आ गव नीर |
देर  रामधइ  एक  दिन ,  छोरै   भरत  शरीर ||185

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बुंदेली दोहे , विषय - स्याँनों

जाँदा स्याँनों आदमी , चार  जगाँ ठग जात |
बार  मुड़त उल्टे छुरा , जैब  कटा  कै आत ||186

स्याँनों   करतइ   स्यानपन , तब  ऊपर  उतरात |
खुद खौ ठगिया मानतइ , पर खुद ठग के आत ||187

स्याँनों हौबौ  ना गलत , पर इतनौ नहिं  होय |
दूध   जलेबी  माँगतइ , घर   में  नाती   रोय ||188

स्याँना होना चाहिये , परखइयाँ   रख जात |
बिना ज्ञान कौ स्यानपन , खातइ सूदी घात ||189

स्यानें से स्याँनों   मिलै, उनकी सुनियौ  बात |
छाँटत अपनौ स्यानपन , कौउँ न खावै  मात ||190

एक हास्य दोहा
स्याँनों समदी देख कै , समदन गइ मुस्काय |
जब पेरन के नाँव पर , चार खड़पुरी ल्याय ||191

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विषय - छिको

जसुदा कौ  लल्ला छिको  , गोपीं  छेकैं  बीस |
नचा रयीं  हैं चुटकियन  , नाच  रयै  जगदीश ||192

छिको  आज ना राखियों , अपनी छिमा सुजान |
दइयौ   लइयौ नेह से , दिन   है   आज  महान ||193

रार-खार जौ भी  छिको , ऊखौ  डारौ   खोल |
वानी    हैगी   आपकी , आज  भौत  अनमोल ||194

खोल किबरियाँ मन हृदय , माँगू  छिमा  सुभाष |
मन मोरौ इत  है  छिको  , दइयो   क्षमा प्रकाश ||195

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बुन्देली ,दोहे -  करय ( कड़वा)

पहला- करय
करय‌ दिना हम सब कहत , पुरखा  करतइ याद |
पैलें  उनखौ   भोग दें  ,   फिर  सब पावें   बाद ||196

दूसरा करय -
बात  करइ  सूदी घुसत  , जाकैं मन  ठुस जात |
पतौ चलत जब आदमी ,   थुथरी खौ बिचकात  ||197

तीसरा करय -
करय   करैला   होत  है , छोड़   देत  सब  रंग |
असर अपुन जौ जानियौ , मिलौ  उसै  सत्संग ||198

चौथा करय -
जहाँ   करय बदले नहीं , अपनो तनिक सुभाव |
जानों  पेंडौं   नीम   सम ,  दातुन जान   चबाव ||199

पाँचवाँ करय -
करय  दवा के   घूँट से   , भगतइ ताप-बुखार |
वैद्यराज  भी है  करत ,  करय  स्वाद उपचार ||200

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विषय मुंडा (जूता)

का कै दैं ई जीभ की , ठाँटौ  जब  बक जात |
भीतर  घुसतइ जब  चलैं  , मुंडा  घूँसा  लात ||201

मुंडा की मैमाँ  सुनौ , पुलिस  लैत  है  काम |
गुंडन की मुड़िया घलै ,  धुनकै रुइ-सो चाम ||202

मुंडा रहै ना पैर  तक , अब बन गय  औजार |
लोकसभा तक चल गयै  , बनकर कै हत्यार ||203

खुद के   मुंडा सिर पड़ैं  ,   दद्दा  हौं   नाराज |
टौ  डारत  है चामरो ,  नहीं  सुनत   आबाज ||204

कुत्ता  मुंडा  सूँघ  कै , करत   चौर   पैचान |
मुंडन की मैमाँ बहुत ,   काँ लौं करें बखान ||205

मुंडा   बोलौ एक दिन , सुन लै बात सुभाष |
हमै छौड़ उपनय गयै , काँटे   लैय  किलाश ||206

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बुंदेली दोहे , विषय -ससुरार

साथियों मैने बेटी की ससुरार पर  केन्द्रित दोहे लिखे है

बिटियाँ  आबै   मायके , या   जाबै  ससुरार |
दौइ जगाँ खौं  लै निभा , बनकर कै  हुश्यार  ||207

सास- ससुर खौं  मान लै , बाप मताई आन |
तब बिटियाँ ससुरार में , पात सबइ  से मान ||208

सबइ जनै ससुरार के , बऊ खौं  दैबें  मान |
बिटियाँ सौ जाने उयै , कृपा करत भगवान ||209

बिटियाँ आ ससुरार में , परदा में जब होय |
लछमी के तब रूप में , पाती इज्जत सोय ||210

सास ससुर अरु नंद कौ , मिलै खूब जब प्यार |
गुइयन सै बिटियाँ कहै ,   सोने   सी   ससुरार ||211

सुभाष सिंघई
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विषय -दिया 

 एक जला दइयौ दिया  , गुइयाँ उनकी शान |                     जो सीमा पै कर  गयै , प्रानन  कौ बलिदान ||212

   देरी में धर कै  दिया , मनइँ  राखियौ  सोच |                     भउँ  नहीं  ईमान  में , ईसुर  आबै  लोच ||213

  दिया  कात  सूरज  सुनौ , हम तुम  येकइ  जात |             तुम जलतइ हौ शाम तक ,फिर  हम जलतइ रात ||214

न- तुपन  ईसुर  दिया , ईसुर  बड़ौ  कुम्हार |                 करमन  कै  हम  तेल से , जलत  बुझत संसार ||215

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विषय - घुरवा 

घुरवा दूला सब घुरवा चढै , चारउ भइया राम |                  दशरथ सजै बरात खौ , चलै जनक के धाम || 216

 घुरवा   पै   राणा   चढ़ैं   , लय  प्रताप जू भार  |                 सत्तर   सेरा की  सुनी   , रखैं    हाथ  तलवार |217

 लक्ष्मीबाई   कौ   सुनौ ,  घुरुवा   आलीशान |                   लगा  किले  से  कूँदनी , राखी   रानी   आन  || 218

घुरवा की ताकत कहत , लिखत सदा विज्ञान | |                इतने पावर हौर्स   है   , मिलतइ  हमें  बखान || 219

  काठी कौ  घुरवा   बनौ , चढ़ै   कृृ्ष्ण गोपाल |                 मातु जसौदा हँस रयी , तककै   हौत  निहाल‌ ||220

   घुरुवा   हाथी  खड़पुरींं  , लै  जाओं  ससुरार |                  मिलत पठौनी   हूँक  कै   ,साउन  रहे  बहार ||221

सुभाष सिंघई

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 दोहे , विषय - गदिया

जी से कछु नहिं  छूटतइ  , चुखरयाइ  बस शान  |               कात सुभाषा लोभ   सै , गदिया   पै दय प्रान ||222

 टाटइयाँ  खुद ही धरै ,     लरबै दै रय प्रान |                     गदिया में लठिया चपा  , बगरा रय है शान ||223

                   करम न साजै बै करै , गदिया  खौं दे   दोस‌ |               काम पसरतइ देख कै , ईसुर खौ रय कोस ||224

       गदिया खौं नहिं  कोसियौ  , कै  गय   दास कबीर  |       जैसइ  करतइ  हौ  करम , बैसइ   खिचत   लकीर ||225

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दोहे , विषय-पातर 

शब्द कोई भी हो, उसमें संदेश छिपा रहता है , यह पातर महिमा पर तीन दौहे निवेदित है 

              पत्ता - पत्ता जब जुरै  ,  पातर बनकै आत |                     परसा ऊपै  है  लगत  ,अन्न   रहत मुस्कात ||226

             हम  पत्ता  संसार  कै ,    उड़त  अकेले  आज |             पातर से हम जित गुथै  , नौनें  कर लै    काज ||227

                         पातर से संदेश है , मिलजुर रइयौ  यार |                   रसगुल्ला सीरा सदा  , करै   तुमारौ ढार ||228

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   दोहे , विषय -      लपसी 

            ढ़रक मुरक लपसी चली , मौं में गयी समाय |       जाती   बैरा  कात  गइ ,  इत्तौ  जीवन आय ||229

          गरम -गरम  लपसी मिलै  , नैक  सिरा कै खाव |चार ढ़ड़ीचें   ज्ञान  की  , सबखौ  उतै    बताव  ||230

           गुरयाई    लपसी  बनै ,    मजा  तबइँ   है   देत |येसइ बातें  हौ जितै     , मन सबकौ हर लेत  ||231

         बात करत  है कछु जनै , ज्यौं  लपसी रय चाट |तनक  नहीं  पल्लै   परत , कैसौं   खड़बड़  राट ||🙏232

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 दोहे , विषय -   भड़उ (चोरनी) 

        भड़या मन नहिं राखियौ , भडउ न करियौ काम  |सब डंका   की    चोट-से , नोनौं   गापौ   खाम  ||233

           भड़या -भड़या जब मिलै , बन जातइ है यार |भड़उ - भड़उ जब दो जुरै , कर बैठे   तररार ||234

             ब्याय वरातन  में भड़उ , करैं न हमखौं माफ |गानौ गुरिया जित धरौ , कर देतइ  है   साफ  ||235

           भड़या तो सब चीन लै , भड़उ  हौत  गुड़यैल |थुथरी सै भोरी  बनै , पर  जानत  सब   गैल ||236

                पति भड़़या पत्नी भड़उ , इनै न दइयौ दोष |इक दूजै कौ दिल चुरा , भरै प्यार कौ जोश ||237

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दोहे , विषय -   नौटंकी 

          नौटंकी   नेता   करत ,   जनता खौं   पुट़याँय |जीत-जात कै फिर हमैं , चींथ -चींथ कैं खाँय‌ ||238

         नौटंकी    तिरिया    करै , घर   पूरौ  हकलात  |चकरी हौतइ   खौपड़ी , कछू  नहीं कर  पात  ||239

              नौटंकी जीवन बनौ  , अड़बंगें   सब खेल |फुरसत नइयाँ दो घड़ी , करैं  राम से मेल ||240

                    नौटंकी अब   देखतइ , टीवी पै दिन रात |.               बैठे ठलुआ चार है , बेतुक कौ चिल्लात ||241

             नौटंकी चालू  करैं , काँवर- सी लय थाम   |कुरसी  कै  लाने फिरै  , नेता चारौं   धाम ||242

                  नौटंकी अब काँ धरी , जौ   देखी  है  पैल |.   अब नौटंका है मिलत , करत रात हर गैल ||243

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बुंदेली दोहे  , विषय डेकची

            नेता   हमखौं  डेकची‌,  समझत है दिन रात अपनौ  वोट पकाय  कै ,‌ सूदैं   करै न  बात ||244

            हम सब   बनकै  डेकची,  पका  देत है वोट  |चमचा घुस कै रामधी , अलग करत है चोट ||245

             पारौ  चढ़तइ डेकची , मलकत खाकै भाप |करिया हौतइ पीठ है , सहत  रहत   है ताप |246

              जौ मानव मन डेकची , फदकत रातै  ख्याल |पक कै आवत  बायरैं  , मिर्च  मसाले   डाल ||247

               तप- तप के करिया बनै , सुनौ डेकची खाल  |पर साधू- सी रात है , रखतइ   नही  मलाल||248

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 दोहे , विषय - किलकिल

       किलकिल बिलकुल ना करौ , भरौ न मन में ताव |चार जनन के बीच में , गम्म  खुदइँ   तुम    खाव ||249

           किलकिल में ना कछु धरौ , बेमतलब की‌ खाज |लरै लड़इया   रात  दिन , हुआ- हुआ   आबाज ||250

   किलकिल करतइ जब धना , मुड़ी चटक है जात |सरसुत्तौ  सबरौ   लगत ,   पकौ   पकाऔ   भात ||251

         किलकिल हौ रइ देश में , कुरसी  खौ  ललचात |चींथे डारत  गिद्द बन , कीं   खौं  कौ    समझात ||252

      कैकइ   नैं  किलकिल  करी, राम  गए   वनबास |दसरथ खौं  प्रानन परी  , रइयत   भयी   उदास ||253

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बुंदेली दोहे, विषय - ऊँग ( नींद )

             जीकी आँखन में भरत , काम तकत ही ऊँग जानौं  ऐसौ  आदमी  , हौतइ    ठर्रा  मूँग ||254

            लपट - झपट आगी  जरै ,  , चुरै  न ठर्रा  मूँग |काम नईं   कौनउँ   करै , जीखौं चढ़बै   ऊँग ||255

                  ठलुआ ठैगन कै घरै , पसरी  रत    है  ऊँग |जौ हौतइ है‌  आलसी, लेतइ   उनखौं  सूँग || 256

                ऊखौं चढ़तइ ऊँग है , जीखौं  अफरा  छाय |कह सुभाष  ऊ टैम में  , कौनउँ नईं  पुसाय‌ ||257

एक यथार्थ कटु सत्य 

            नचनारी  नचबै   जितै ,   उतै न  आबै  ऊँग |पंडित बाँचैं  जब कथा , पौचें  जल्दी ‌  सूँग ||258

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विषय - बजरी

               आँग  भिड़ाकर गिलहरी , बजरी  रइ  है डार |कर रय  जित है नील नल , राम  सेतु  तैयार  ||259

         भइया  बजरी को  महल , ई जीवन खौं  जान  |आतइ  आँदी  मोत की , गिरतइ  धूर‌   समान ||260

             बजरी जैसै पल यहाँ , देखौ   खिसकत जात |परो  चिमानो  आदमी ,  देखत  है    ऊँगयात ||261

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बुंदेली दोहे, विषय‌ - बियाँनौ

             दैव  बियाँनौ  राम खौं  , भजन सुना के चार |चानै   चरनन  धूर   है  , करवें   खौं  उद्धार  ||262

               भजन बिआँनौ लौ प्रभू  , आगें खौ दो गैल |सेवा करवै  आपकी  , पौचें  हम तो   पैल ||263

              हमखौ   चानै  आपकी , छाया   हरदम राय |नाम  रटत हैं  आपको , जौइ  बियाँनौ आय  ||264

              लयैं  बियाँनौ   घूमतइ , राम   नाम  उच्चार |अगर बियाँनौ लग गयौ,   हौजे   बेड़ा  पार ||265

         विषय   बियाँनौं  है  मिलौ ,    करें चूक ना  भूल |येइ  बियानै  में  खिलैं   , राम   नाम   के   फूल ||266

(हम अपनौ बियाँनौ राम जू के चरनन में लगान चाऊत है ) 🙏~~~~~~~~~~~~

विषय - बैरा

                 जितै धिगानौं हौ मचौ  , हौवें  बत बड़़याव |बैरा बनकै  तब उतै  , तनक  चिमाने  राव ||267

              बैरा भी बन जाव जू , जितै गलत हौ  दाव  |लबरा दौदा हौं जुरै , करै  कपट  बतकाव  ||268

               बैरा बनकै   ना  सुनौ , जितै  धरम  पै चोट |सामूँ छाती दो अड़ा , जितै दिखत हौ खोट ||269 

                जान   बूझ बैरा  बनौ , ऊखौं   का समझाँय |ऐं-ऐं   हैं -हैं   वौ करैं , हम  चिल्ला मर जाँय ||270

                         सूदै बैरा भी तकै , रखत काम से काम |.           दंद फंद में ना परै , मन में भजतइ राम ||271

                  बैरा कछु    टैड़े  मिलै , करैं  उबाड़ै  काम |.    जौन काम खौ रौकतइ , बौइ लैत वें थाम ||272 

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विषय - गिगयात

           राम नाम सब  भूल कैं , सुख में  सब  मुस्कात |दुख की डिबियाँ जब जलै , ईसुर लौं गिगयात ||273

              पूत न  हौबै जौन घर  , पूरौ   घर  घबरात |सतरा  पूजत चौतरा , फिरत रात गिगयात ||274

              पौलें पट्टी जान गय‌  , जिनकी तनक सुभास  ||बै  रातइ  गिगयात   हैं , आतइ  मौरे    पास ||275

                  जौन   रुपैया लै गयै , मुड़ी  धरैं गिगयात | देती बेरा शेर  बन  , टरका रय  दिन रात ||276 

             ढला चला सब दो चलन , काहै खौं गिगयात |रखौ भरोसा राम पै , मन  से  रओ  मुस्कात ||277

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 विषय मरगटा

             नईं   अकेलौ    मरगटा , और  नईं    सुनसान |रात दिना ऊकी   चलै , चमकत रयै दुकान ||278

                   सबकै घर खौ मरगटा , देखत  रत है  घूर |चार दिना की जिंदगी , चार दिना  हौ दूर ||279

             बुझत चिता जब मरगटा , जलत दूसरी आन |ठठरी पै लद   आत हैं , श्वेत   पिछौरा   तान ||280

              मेला तक लौ मरगटा , नईं   झमेला  राय‌  |जलकै बननै राख है  , हवा चलै उड़ जाय ||281

            जुरै नकइयाँ जब चिता , धूँ धूँ कर जल जाय |राख  बनातइ  मरगटा , डबला   एक  समाय ||282

            ठठरी   के   संगै   हते ,  मुलकन   थी तादाद |हँसत मरगटा कै उठौ , खतम एक फिर म्याद ||283

         ठठरी   से कत   मरगटा ,  जीखौं  ल्याईं  लाद |ऊकी  बस  औकात   है , डबला  भर की खाद ||284

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विषय - गजरा

          गजरा बारन में  बदौ  , कजरा    आँखन   डार |निग   रइ   गोरी  मैड़ पै , हरिआ   रयी  पुकार || 285

          हरि+आ  सुन कै आ गयै , हरि भी अब ऊ ठौर |गजरा खिलकै गिर  गऔ , हरि चरनन की ओर ||286

          बारन में गजरा जरा ,     हिलगौ सौ   बस रात |निगबै में गजरा+ज-सी, अपनी चाल  दिखात ||287

          गजरा भी गजरा+ज नैं , प्रभु खौ दियौ पिनाँय‌|मगरा कै   मौं से जितै ,    आकैं  प्रान  बचाँय ||288

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बुंदेली दोहे , विषय - नरदा

                 नरदा निकरै  बायरै , पौचे  गलियन   बीच |                 दौरौ तब भिनकत रयै , मचै हिला कै कीच ||289

                    नरदा जानौ  गाँव  कै ,  खौटे नर जौ हौंय |                  जिनकै मारे सब जनै , बदनामी खौ ढौंय‌ ||290

                  बिनतुआइ नरदा करी , पर गय बखरी हार |                 बेदखली भइ जौत से  , मिलौ न पट्टौ यार ||291

                 नरदा खौ नर दा+ब कै , दै   छत्ती  सै    भेद  |            फिर भी बदबू जै निकर , पाकै छुटकुल छेद  ||292

               नरदा हौरी  के दिना , फूला सौ खिल जात |                 पटकत गुइयाँ चार है , पूरौ  आँग   भिड़ात ||293

        आँगन  बिच  नरदा   रयै   , रहबै    साला  आन |         दौनउँ  बुरय  बसात हैं  ,   मोखौ    इतनौ   ज्ञान  ||294

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बुंदेली दोहे विषय - गडला

तीन चका गडला सुनौ , धर्म  अर्थ अरु काम |
मोक्छ  द्वार  पाटी  लगै  , जीमैं  रैतइ   राम  ||295

गडला कौ आगै  चका , लगै  धरम कौ रूप ||
अर्थ -काम कै पिच्छु है , चौखट मोक्छ अनूप ||296

गड़ला में हम देखतइ , तीन लोक की चाल |
आड़ी तिरछी सूदरी , सबइ   मिलातइ ताल ||297

चलतइ घुँटरू  राम जी, दशरथ  जू   के गेह |
गडला निसचित आन कै , पा गव हुइये नेह ||298

तीन लोक प्रतिरूप कौ  , गडला  संगै रात |
मौं खौलत श्री श्याम जू , जसुदा पार्थ बतात ||299

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दोहे ~ विषय - ठूसा

ठूँसा ठुसकी कृष्ण खौं , मारत   मुसकी  गोप |
उतइ घालती गोपियाँ ,  ठेंगा   की  अब  तोप ||300

ठूँसा लगतइ  लंकनी , कात   सुनौ   हनुमान |
भड़या रावण जानगइ , मिल गव मौखों ज्ञान ||301

ठूँसा   हौबें ‌  प्रेम  कौ , होय  लँगुटिया  यार |
ऐसे   ठूँसा  देत  है , दिल खौ   भौत  करार ||302

दुनिया   में   हम   देखतइ  , ठूँसा   कई   प्रकार |
गुरु   कौ   ठूँसा   सार दे , सजनी   ठूँसा   प्यार ||303

मटकीलौ   ठूँसा   लगै ,    ठेंगा   भी  चटकील |
सजनी जब साजन तकै , आँखन से   दै  ढील  ||304
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दोहे - कचुल्ला (, कटोरा)

भरैं  कचुल्ला में मठा ,  जीमें  लगौ  बघार |
खाबै   दइयौ   राम  जी  ,  रोटी  पूरी  चार ||305

नहीं कचुल्ला फूटवै  , ना  खाली भी  होय |
रामा कै परसाद  कौ , भरौ   चाउँने   मोय ||306

रामा  तौरे  नाम  सै , भरत ‌  कचुल्ला  ऐंन |
खाबै  की बैरा कभउँ , कितउँ भई ना  ठेंन ||307

नहीं कचुल्ला थाम कै ,  माँगन जइयो यार |
नाम जपौ घर राम जी , भरबै उतइँ अपार ||308

जितै कचुल्ला टौकलौ , भीतर राखै होय |
उतै राम जी का करै , सोस  परौ  है मोय ||309

कितउँ  कचुल्ला राम जी  , कभउँ न  रीतौ  होय |
करियौ बस इतनी  कृपा ,  कौउँ न  भूखौ  सोय ||310
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बुंदेली दोहे, विष़य - हेंसा {हिस्सा)

हेंसा दइयौ राम जू  , करबें खौ कछु काज |
कौनउँ दीन गरीब कौ , करबाँ सकै इलाज ||311

हेंसा उत  भी चाउनै , जितै  देश   की बात |
दुश्मन जब गर्राट दै  , मार आँय हम लात ||312

हेंसा कभउँ न भूलियौ , मोरौ भी जू राम |
हर हालत  में चाउनें , रैबें   बैकुठ   धाम ||313

बड्डे बखरी पा गये , मजले  खेत  अथाइ |
हेंसा छोटे  खौ मिलौ , बूड़े   बाप  मताइ ||314

हेंसा  लैकें  जानियौ  , जीमें  रत सम्मान |
नौनों सबसें बोलियौ , देत  दया को दान ||315
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विष़य -बतकाव (बातचीत )

इज्जत दौ कोड़ी रयै ,कोउँ  न देतइ भाव |
लम्पा जैसो ऐड़ कै , जो करतइ बतकाव ||316

करिया और  गुड़ैल जो , खातइ   रत है ताव |
लिगाँ न उनखौ राखियो, करबें  खौ बतकाव ||317

लबरा दौदा   लालची , कपटी  और  सियार |
इन सबके   बतकाव में , टपकत  देखी लार ||318

बोल ‌ गुरीरे  शब्द खौ , भलौ   करे    बतकाव |
चार जनन के  बीच  में   ,मिठबोला  है    साव  ||319

चलनी  जैसो चाल कै , संत करत बतकाव |
सबरै  ऊखौ  मानतइ  , तकत ऊजरै  भाव ||320

फरी डार झुक जात है  , करत -करत बतकाव |
नैनू     जैसे रात  है ,     ऊ   मानुस  कौ  भाव ||321
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बुंदेली दोहे विषय- नकटा

करम करत खोटे सबइ  ,लाज शरम सब खोत |
ऊखौं  कैतइ  पंच गण  ,  बें  सब  नकटा  होत ||322

सूपनखा  नकटी  बनी, धरौ  गलत  प्रस्ताव  |
रावण भी नकटा बनो , सीता खौ हर ल्याव ||323

नाक कटत ऊ  काम पै , जीमें गड़बड़ योग |
नकटा मौं पै बोल दें , गैल  चलत  कै लोग ||324

नकटा  हौतइ लोग   है , नकटी  हौत  लुगाइ |
लाज शरम सब बैच कै , करतइ दत निपुराइ ||325
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दोहे ~न्योरे ( झुककर )

जो न्योरे नहिं निग सकै , गैल  चलै  फुसकार |
ऊखौं  उपटा  है  लगत  , काँटे  गुचैं   हजार  ||326

होना न्योरे  जब  तकैं  ,  ज्ञानी   बैद  हकीम |
खबर -दबर भी लीजिए , कीजै   राम रहीम ||327

दुृ्ष्ट और दुश्मन मिलै  , करौ  न  न्योरे  बात |
गटा मिला कै चल पड़ो , यही  सुभाषा कात ||328

न्योरे   हौतइ   देख  कै  ,  चढ़तौ    रिश्तेदार  |
भारत की है यह प्रथा , जीमें  दिखतइ  प्यार ||329

गगरी   न्योरे   कूप में , भरतइ  जल खुद आन |
यैसइ  हम तुम पा सकत , गुनियन से गुन ज्ञान ||330

दशरथ जनक मिलाप में , जुड़े हुए थे हाथ |
दोनों  ही  न्योरे  करें , इक  दूजे  खौ  ‌माथ‌  ||331
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बुंदेली दोहे विषय- गटा {आँख)

अच्छौ  नोंनौं  देखवें , गटा  देत   भगवान |
फिर भी खोटौ है तकत , ई जग में इंसान ||332

गटा सबइ के बोलतइ , नचतइ हैं वें  खूब |
परखइयाँ पढ़ लेत है  , कितै चरा रय दूब ||333 

कर   देतइ   चुगली  गटा , परै  उनै  ना चैन |
पलकै   मिलका  कात  है , आगूँ  कैसी ठैन ||334

जी मोड़ी कै दो गटा , सरमा कै झुक जात |
ऊखौं नौनीं जानियौ   बूड़ें   बुजरक  कात ||335

गटा गड़ा कै हम लिखैं   ,पढियौ आप सुजान |
भूल चूक भी हो अगर , दइयौ   माफी  आन ||336
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विषय -कुकात ( खुजलाना )

अलफतिया से घूमतइ , चुगला  लबरा  श्वान |
बैठे  जितै  कुकात है   , भिनका  दें  इस्थान ||337

सूपनखा   पुटया  रयी    , लल्लो-चप्पो   बात |
लखनलाल ने खच्च की  , ऊकी  नाक कुकात ||338

जीखौं  कर्जा   चाउने , बोइ  सेठ लौ  जात |
पथरा ढूड़े  खुरदरौ , जी कौ  आँग  कुकात ||339

कुत्ता चमचा ताकियो   , लार  रतइ बगरात  |
लठ्ठ  धरौ जब खैंच के , भगतइ  पूँछ कुकात ||340

जीकौ आँग कुकात है , बोइ  जानतइ मार |
कुका- कुका के खून की , छोड़ देत है धार ||341

जीखौ बिदतइ गट्ट है  , बोइ निनुरबे  जात |
बरना पसरो गेह में , अपनौ  आँग  कुकात ||342

जीत  गये  सरपंच जौ , तननाने  से   जात  |
फुननाने   हारे  चलें   , अपनी मुड़ी कुकात ||343

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बुंदेली दोहे  , विषय - धरे

लेखन में नौनें   धरे  , कैबें  कौनउँ   बात |
तबइँ बनत दोहा अमर,बरना धूर उड़ात ||🙏344

धरे कथ्य दोहा कहौ, बन जातइ  है   शान |
चार जनन के बीच में, भौत मिलत है मान ||💐345

तुकमुल्ला दोहा रचौ  , धरे न कौनउँ सार  |
ऐसे  दोहा  हौत  है , दो   दिन  में  बेकार ||😴346

तेरह ग्यारह तुक मिला , धरी न कौनउँ बात |
लिखबौ तब पनबेसुरौ , धरे -धरे  सड़ जात ||🤔347

तुलसी सूर कबीर नै , धरे कथ्य अनमोल |
उनकै दोहा आज लौ , है   सोने की तोल ||🙄348

बुंदेली इस मंच पर , सबइ कथ्य है कात |
दोहा भी‌  नौनें  धरे , नौनी   इतै ‌  जमात || 🙏349
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बुंदेली दोहे  विषय समदी ,

सासउँ  समदी है शगुन, हरौ   भरौ  है  खेत   |
बाप  बराबर जानकै , बिटिया   छाया   लेत  ||350

बिटिया की ससुरार में ,जब समदी नहिं  होय |
गलती  हो दामाद से ,  बिटियाँ   कीनौ  रोय ||?351

समदी   तो बस   दो हुयै , पैले  अबद  नरेश |
दूजे मिथिला के जनक , जिनके  जुरै हृदेश ||352

कुछ हास्य -
समदी स्वापा बाँद कै , समदन खौ डुरयाँय |
तीरथ करबे कड़ गये , लेन धरम की छाँय‌ ||353

बेटा  की  ससुरार     मैं ,  समदी   बनकै   जाव |
लुचइ बरन दों माँय तुम  , मालपुआ  खौं  खाव || 354

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बुंदेली दोहे  , विषय- कुची {चावी)

कुची कात है सुन लियौ,   मौरी नौनीं बात |
हमें हिरा तारे कुटै ,   पसरे   सहकर  घात ||355

तारौ लगौ  लिलार पै , करम कुची से खोल |
मिलै भाग्य में जो तुमै  , बीन लेव अनमोल ||356

तारौ  कत  है  री  कुची ,       रइयौ   मोरे  पास |
तै लिपटत जब   प्रेम  से, खुलतइ गाँठ  खटास ||357

कुची और  तारे  कहैं ,  हम तुम गुइयाँ   यार  |
नाँय माँय जब हम हुए ,    तब  दोनों  बेकार ||358

कुची जानतइ मंत्र है , तारे   कौ   सब  भेद |
पुटया कै है  खोलती , तारौ   करे   न   खेद‌ ||359
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विषय - दच्च ( नुकसान )

दच्च लगन नहिं  देत  हैं , बचत   लखन  के  प्रान  |
परवत ‌ डिरुआ   हाथ  पै  , उठा   ल्याय  हनुमान ||360

दच्च लगी   थी   राबने  , चट गव  पूरौ वंश |
ठठरी भर खौ बारबे , बचौ   बिभीषन अंश ||361

दच्च लगी   दुरयौधने , चाट  पौंछ  लय  भ्रात |
तकत सबइ धृतराष्ट्र खौं , हाथ मलत पछतात ||362
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विषय तीती ( गीली)

फूल  झरत  मुइयाँ  लगे , लगतइ  तींती   बात |
नौनों मन   जो भी रखै  ,   उये   जगत्तर  चात ||363

लू में तींती तौलिया , तरुअन  पै‌   लो ढाँक |
पानू  गटकौ डार कै , निबुआ की दो फाँक ||364

तींती   पट्टी   टेंटुआ , रख लौ जरा लपेट |
भगतइ देखों  टोनसिल , परतइ उये चपेट ||365

तींती चीजैं  ही   करै   , पंचकर्म   उपचार |
चिकनइ आती है बदन , भगै रोग हरिद्वार ||366

छाती के सब रोग भी , छू मंतर हो जाय |
तींती पट्टी  उत  रखो , जैसौ  वैद्य बताय ||367

मूड़ सुभाषा जब दुखै , तींतो करत रुमाल |
फेर   लेत   दो बेर   है , माथौ आँखें गाल ||368

बुंदेली सुनतइ  लगत  ,मोय   गुरीरौ   स्वाद |
रूखड़ता जीमें   नहीं , तींती  सब  बुनियाद ||369

एक हास्य
तींती सब कंडा धरै  , पकरत नइयाँ आग |
धुआँ कड़ै लुगरायदौ  ,कैसे   चुरबै साग ||🙏370

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दोहे -गड्ड बड्ड

गड्ड बड्ड   सब बोलरय , सासी रहे   न   रान |
कीखौ  दैकें आय  है , अपनो वोट   निशान ||371

गड्ड बड्ड वें कर गए , अपने  दता   निकार |
फैला गय है रायतौ , भिनका  गये अचार ||372

गड्ड बड्ड वें गा रहे , मिलत नहीं  तुकतान |
मूसर घालें  जात है, उखरी में  बिन धान  ||373

गड्ड  बड्ड अब   मुड्ड  है  ,   सबखौ  पटकै   खड्ड |
अड़बड़ बक तड़बड़ करें   ,फिरतइ बनें  उजड्ड ||374

गड्ड बड्ड  खड़बड़  मची , तड़बड़  थे  जब  वोट |
गड़बड़ - सड़बड़ देख कै, तड़तड़‌  बँट गय नोट ||375
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बुंदेली दोहे  , विषय चीकनो

ठगो जात है चीकनो , मुड़त मुड़ी कै बार |
लये   रुपट्टी एक है , करबै   उसे   हजार ||376

छुरा चला कै मौथरौ , सबइ  मूड़तइ  बार |
बात न समझे चीकनो , लुटतइ सरे बजार ||377

पाँच  चबन्नी  चाहता , लये    रुपट्टी  एक |
खोटी  लेकें चीकनो , करतइ फेंकम फेक ||378

घड़ा चीकनो  है जितै ,  बूँद  रुपै   ना ऐक |
ऐसइ चिकना है करत , दें बातन खौ फेक ||379

बात अगर हो  चीकनी , लगबें   ऊमै  सार |
कहत सुभाषा पंच सब , करै उसे स्वीकार ||380

पथरा घिसना चीकनो ,  छुटा  न  पाबै   मैल |
जानो  चिकना जौन नर,‌साजी चलत न गैल ||381

देखत हम सब   चीकनो , करतइ  चरबदआव |
और घिनापन हर जगाँ , पइसा करत चपाव  ||382

हम तौ  गय तै हाट में , मिलौ चीकनो रोत |
मोलभाव ना सट रहौ , काँसै  सौदा  होत ||383
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शब्द - मिर्ची


मिर्ची लगती  है वहाँ , जहाँ  सत्य दे ताल |
उखड़ रहा हो  झूठ के ,पंड़ो  का   पंंडाल ||384

मिर्ची लगना भी सुना , पढ़ा  कहावत ज्ञान  |
मिर्ची लगती  बात से ,कड़वी जहाँ  जुबान ||385

मिर्ची जी का  राज है  , जहाँ  मसाला गान |
मिर्च  मसाला   नाम से , मिलता है सम्मान ||386

अब कुछ दोहें आयुर्वेद में - 

रक्त  चाप   मधुमेह   में ,   मिर्ची   करे    कमाल |
लिए विटामिन 'सी' सुनो , तन का  रखती ख्याल ||387

प्रतिरोधक  क्षमता   लिए , मिर्ची   होती   तेज |
भरा विटामिन 'ई' सदा  , सुखमय करता  सेज  ||388

कैंसर  से मिर्ची   सदा ,  करती  दो-दो  हाथ ‌ |
पाचन भोजन भी करे , आँतों  का   दे  साथ  ||389
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भुन्सारे की कुर्रु खौं , नोनों कत है लोग |
घुरवाँ जैसो बल रहें , लिड़या जावें  रोग ||390

कार्तकेय   कुर्रू   लगा ,   नापत  रय ‌ संसार |
गणपति अक्कल खौं लगा , बने प्रथम सरदार ||391

कुर्रू देके  जब गगन  , निकर गये हनुमान |
पर्वत लेकै आ गए,    बचे   लखन के प्रान ||392

कुर्रू  दइ़यो   सामने  , दुश्मन  जितै दिखात |
पाछे की  कुर्रू सुनो ,   लिड़पेंदा    कहलात ||393

सदा लगाएं कुर्रु खौं  , भुखाभुखे  जो  कोय  |
तन  नोनों  हो  जात  है  ,बाल न बाँका  होय ||394

कत सुभाष हम  सूदरे  , कुर्रू  खूब  लगात |
जितै ज्ञान   बगरौ डरो , रैवों   हमे   पुसात ||395
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जरुआ-भरुआ सब जगाँ , इन्हें न डारौ घास |
माँय बरन दो  भाँड़ में  , नहीं  बनन दो खास ||396

हँसकै ना अब बोलियो , गुइयाँ सुन लौ बात |
जरुआ पूरौ गाँव है , बकतन  नहीं   अघात ||397

गुइयाँ हँस कै बोल गइ , उनखौ लग गइ आग |
जरुआ थुथरी रय  चला, गा    बदनामी   राग ||398

जरुआ   बगरा  रायतो   देतइ  दाँत  निपोर | 
काम नसा कै मानतइ , देत  गुली--सो  फोर ||399

जरुअन से कातक लरै | , सोसत रहत सुभाश  |
जरुआ फेलै   हर जगाँ ,   करतइ   सत्यानाश ||400

जरुआ   मिलकै   दे  नसा ,अच्छौ  नौनों  काम |
पूरे दिन  कुढ़कर    सदा , चलते   है  अविराम ||401

जरुआ जर कै एक दिन , करन लगो बकवास |
तुमने   कैसे   जौर   लय , तुमने सारे     खास ||402

जरुआ‌ जर कै खाक हों , उड़तइ रत  है  राख |
करनी जो   अच्छी  करे  , ऊकी  बनतइ साख ||403

जरुआ की  नहिं  पूछियो , भइया   कित्ती  आग |
डमा    लगावें    घूमतइ   , देवें    सबखौ    दाग ||404
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जौन रिसाने लोग  है , वें परवाँ  रय  पाँव |
करत  थराई   घूमते , प्रत्याशी अब गाँव |405

मिलें  रिसाने जन- जनीं , या   कौनउँ  मिष्ठान |
माछी  भिनकत है  उतै , सूनी   रहत   दुकान ||406

लोग  रिसाने  लग ‌ रहे , है  मँहगाई  मार |
सौ‌  से  ऊपर  तेल है , कैसे   लगे  बगार  ||407
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देरी खूँदे  खात है , नेता   दय  खरयाट |
घी चुपरी बातें करें ,लेत खुपड़िया चाट ||408

नेतन के खरयाट की , काँ लौं कैवें  बात |
वोट झटकवें बाँटते , पउवाँ   आधी रात ||409

ठाड़ौ  भयो चुनाव में , माते  जू   को  पूत |
खूब  करत  खरयाट है , बनो दरोगा  दूत ||410

हाथ जोरतइ बाप है , लरका दय खरयाट |
बन ना   पाने  पंच है , खड़ी   रनै  है खाट ||411

बनतइ  सबरे  सूदरे , छोड़छाड़    खरयाट |
पैले नम्बर सब दिखे , छोड़‌ कुआँ के खाट ||412

जिनने दव खरयाट है , वे बन रय सरपंच |
हिस्ट्रीशीटर जो रहे,   अब   सोना सौ टंच ||413
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उनखौं तातो लग गयो , कह  दइ साँसी बात |
नोन मिरच खौं डार  कै , काहे  काम नसात ||414

तातो  देवै    तीन.    है , तन  खौं लगतइ झार |
खरी बात, साँसी कहिन, चुका शकल की मार ||415

लबरा लोभी  लालची , ताती    रखतइ  लार  |
लम्पट  इनको मित्र  बन , बनतइ   लम्बरदार ||416

तातो भोजन ठंड में , तन खौ सुख भी देत |
ताती- ताती चाय भी , जड़कारो  हर  लेत ||417

विषय‌ दओं तातो भलो  , राना जू ने खोज |
तातो तातो लिख चलो ,  ठंडो करौं न ओज || 418
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सुने  बिलोरा तीन  है , कपटी -काग- सियार |
मुख खौ मारे जिस जगाँ , देतइ काम बिगार‌  ||419

मोय बिलोरा ना मिले , ना   बिलुरें   हम    आज |
नहीं बिलुरियो आप जू , सुफल होय सब काज  ||420

बिलुर -बिलुर हम जात है , लगो बिलोरा साथ |
इन बिलुरन से राम जू , छुड़ा   देव अब   हाथ  |421

बनें    बिलोटा    घूमतइ , करत  बिलोरा  काम |
उन बिलुरन. की एक दिन , बिलुरत देखी शाम  ||422

जोन होत.  जै   मान्स हैं  ,  छींछालेदर   काम |
करत  बिलोरा   हर  जगाँ , ठंड  तकें ना घाम ||423

भलमनसाहत  छोड़ के,छोड़  शरम सब  लाज |
दाँत निपोरें  घूमतइ   , करत.   बिलोरा   काज ||424

जितै बिलोरा होय जू  , मिलत  करेजे  घात ||
चटा बिलोटा   जात के  , करें    गुरीरी  बात |425

लिखे बिलोरा रामधइ , कलम  रही  मुस्काय‌ |
शब्द ढूँढ़  राना  करें , काँसे  पकड़‌‌   लियाय ||,426

नसादेत हर.  काज खौं ,  जिते   बिलोरा   होय |
सूदो सादो मान्स तब  , मुड़िया   धर   के   रोय‌  ||427
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गुदनारे बन  श्याम   जू , गुदना   रय है गोद |
पकर कलाई राधिका , मन में  भरैं . प्रमोद ||428

राधा जू भी कै रयीं  , तुरतइ लिख दो  श्याम |
संगे   सूरत भी   बना , गुदना  में    अविराम ||429

जैसइ सूरत मन बसी , बैसइ    गुदना  होय |
जैसी   मंशा  लाय   हो ,  पूरी  होगी   तोय ||430

कौन सुरतिया मन धरै , ई बैराँ  जाँ  शाम |
मौं ताकत तब रह गए , गुदना  बारे श्याम || 431

लीलाएं जै  राधिका ,    मिलकै   करते    श्याम |
गुदना को वरनन  सुनो, सो लिख दओ अविराम ||432
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घलत लबुदिया सब रटे , मिले हते  जो  पाठ  |
असुआ डारत पढ़त रय ,  दो चौका  है आठ ||433

घलत लबुदिया जोर से  , ओरी आतइ ख्याल  |
मास्साब  जहाँ   मारते , होत   चामरो   लाल ||434

बाप     लबुदिया   मारता , जीमें   राती     सीख |
पढ लिख कै बन आदमी , कभउँ न.  मांगे भीख ||435

दिखलाती   है  दूर से  , उठा   लबुदिया    रोज |
दादी  को  हथियार यह  , पेड़त  मन  में  ओज ||436

कौन आदमी  है   इते   , घली   जिसे ना मार |
एक  लबुदिया बड़न की , रखतइ नोनों  प्यार ||437

पर होतइ कुछ ढोर है , असर न जिनखौ होय |
मारत  जाओ लबुदिया , जितनी   चाहे  ओय‌ || 438

नोनीं धोनी जो बनी , लिखीं  लबुदियाँ  यार |
सेवा में हाजिर करत , जिसे  करो  स्वीकार ||🙏439
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उखरी जी खौं कात है , गड़ी जमीं में होत |
मूसर से कुटतइ रहे , सब कष्टन खौं ढोत. ||440

गढ़ी जिये हम कात है , उखरी खूब दिखात |
खावे  नइयाँ डौल  है ,  फिर भी  बेर बतात ||441

कोड़े पर कोड़ी नहीं , मिले   लुअर  की   ताप |
चलत फिरत जो आदमी , गड़िया ऊखौं  छाप ||442

नाक छिदी नथुवा कहै , कान छिदो कन्छेद |
पातर.  खाके  छेदता , नहीं  नाम को   भेद ||443

जीखौ कत है गुनचुनू , मिले न  गुन भी चार |
लेकै देखो  हाथ. में    , दिखे न  कौनउ भार ||444

माउर लागे   पाँव  में , मौं उर   में   ना काम |
गड़बड़ झाला चल रहा , कैसें रख लय नाम ||445
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ठठरी बँधवे के पैलऊँ , करियो   नौने काम |
पसरो  राने   ठाठ सब, जप  लो सीताराम ||446

विषय भलो ठठरी दियो , राना   जू   श्रीमान |
मुरदा  जी पै लेट के , जातइ   है    शमशान ||447

ठठरी बँधतइ जौन दिन , धरो रहत सब ठाट |
धरती तक पै  पार के   , छीन.  लेत  है खाट ||448

ठाट बाट सब निपुर गय  , ठठरी  बोले अर्थ |
बरबै जाओं  मरगटा , तन है   घर   में व्यर्थ ||449

राम   नाम ही   सत्य है , ठठरी  पाछे  बोल  |
पंच सबइ तन झौंकवे , करें न कौनउ झोल ||450

ठठरी पै गठरी बनो  , तन.  जातइ.  शमशान |
लुअर लगा कै सब जनै , बोलत  जातइ  राम ||451

ठठरी सुने न काउ की , मुरदा खौ ले लाद |
ले जातइ  वह मरगटा ,तन खौ करवे खाद ||452

ठठरी बँधतइ देखकर , बने  पजोखों योग |
तेरई तक डिड़यात है , घर के मिलके लोग ||453

बांध  दई  जैसी  बनी , मैंने    ठठरी  आज |
एक दिना सबको परै , ई  ठठरी   से  काज ||454

ठठरी कभऊँ न भूलियो , ठठरी अंतिम ठाठ |
जी पै जी ने लेट कै ,  कभी  न पकरी  खाट ||455
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नन्ना खौं  दें सब जनै  , जुरकै  खूबइ   मान |
मिलत रहत. है  छाँयरो, नन्ना   जहाँ  प्रधान ||456

नै कै निगियों सब जनै , नौने बोलो बोल |
नन्ना जू सबसे कहै , रखियों अपनो मोल ||457

कभउँ न नन्ना जीभ पै , नइयाँ   लाते बात |
सबरे   भइयन  खौं रहें , नन्ना  जू   सौगात ||458

निपुर जहाँ पै काम जै , नन्ना   आतइ   काम |
बलदाऊ   बनकर   रहें , लौरे   मानें   श्याम ||459

जी जी खौं नन्ना  मिले   , या  जो  नन्ना  होय |
नन्ना की पगड़ी उतै ,  रखियों  मिलकै  सोय ||460
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एक जला दइयौ दिया  , गुइयाँ उनकी शान |
जौ सीमा पै कर  गयै , प्रानन  कौ बलिदान ||461

देरी में धर कै  दिया , मनइँ  राखियौ  सोच |
कभउँ  नहीं  ईमान  में , ईसुर  आबै  लोच ||462

दिया   कात  सूरज  सुनौ , हम तुम  येकइ  जात |
तुम जलतइ हौ शाम तक ,फिर  हम जलतइ रात ||563

अपन- तुपन  ईसुर  दिया , ईसुर  बड़ौ  कुम्हार |
करमन  कै  हम  तेल से , जलत  बुझत संसार ||464
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जरै दिया   से अब  दिया , बगरै  खूब  प्रकाश |
सबखौं है  शुभकामना ,   बनै   दिवारी  ‌खास  ||465

नहीं दिवारी  पर इतै , हम बगरा   रय   ज्ञान |
लुअर पटाखन पै रखौ , बस थोरौ सो ध्यान ||466

महावीर निर्वाण भय  ,राम अजुध्या आय‌‌ |
सुखद दिवारी हो गई , लछमी पूजन पाय‌ || 467

और भौत सी है कथा , नहीं  रहै हम बाँच | 
सबइ  कथा संदेश दें ,कात सुभाषा साँच ||468
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जुरी  सभा में   द्रौपदी ,    रइ  असुअन  खौं  ढार |
लाज   हमाई  राखियौ ,  करतइ   किसन  पुकार ||469

मोखौ  चरनन  राखियौ , बृजबसिया  गोपाल |
जौ लौ तन में स्वाँस है, करियौ   मोरौ ख्याल ||470

ढौर  बछेैरू  राखियौ , दइयौ   सानी   रोज |
दूध  दही  भंडार  रै , खाकैं  भरियौ   ओज ||471

दैकें आप जुवान  खौं , सदा  राखियौ  मान |
वचन निभाबौ है धरम  , चलै जाय चय प्रान ||472

इज्जत अपनी राखियौ , रखियौ  अपनौ ‌ मोल |
बगर जात  है   रायतौ  , जित हौं  खाँड़े  बोल ||473
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हम थोरौ बस कात है , बुरब   न मानें आप |
एक बार लिखकैं पढौ , गुनौ  चूक चुपचाप ||474

पतौ सबइ चल जात है , चूक‌ किते है यार |
तेरह की  यति देख लौ , थोरौ   मात्रा भार ||475

कलन अगर थोरौ गलत  , हौत उतइँ है टूट |
भरौ कथ्य दोहा सही  , जग को  लेता  लूट ||476

थोरौ - थोरौ  सीख लौ , मिले जितै भी ज्ञान |
झुकत कुआँ में बालटी ,कर लेबै  जलपान  ||477
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कक्का घर में  होत हैं , सबकी सुनतइ बात |478
मौड़ा जब  लड़यात  हैं, जाकैं  जै  पुटयात ||

छोटे  भइया खौ  बँदत , कक्का  की है पाग |
सब कामम में पूछतइ,  घर में  रत  अनुराग ||479

कक्का यैसइ नइँ बनत ,जुटौ सुबह से शाम  |
बउयैं   लरका  टैर कै  , पकरा   देती  काम  ||480

कक्का तुम बिन ना चलै , ढला चला लय देख |
घर  खौ  तुमइँ   सबारियौ , बउयैं  बाँचैं  लेख ||481

कक्का स्वापी  बाँद  कै , गाँव गली में जात  |
और जनै  बैठार कै  , अपने   काम   बतात ||482

कक्का से कक्को कहत ,     तुमै   मजा भी आत | 
सबकी  टउका  में  जुतत , फिर  भी तुम मुस्कात ||483

काम परै कक्का कहत , बेइ बनत फिर बाप |
कात सुभाषा है इतै , सबकी   अपनी   खाप ||484
खाप = पंचायत 
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भुन्सारे     निन्ने     पियौ ,    तातौ    पानी   रोज | 
बात पित्त जौ सब  हटै  ,कफ कौ मिट जै खोज ||485

भुन्सारे   निन्नै  अगर , तुलसी    दल  दो  खाँव |
चार कोस तक तुम चलौ , कभउँ थकें ना पाँव ||486

सुबह उठौ निन्ने अगर , पकौ पपीता खाव |
हृदय रोग से कर उठौ , पैलउँ आप बचाव ||487

छिलका लेव उतार तुम , फूली हौ बादाम |
निन्ने आप चबाइयै , है   ताकत   अंजाम ||488

चना फुला लौ रात से , निन्ने    उन्हें   चबाव  |
कह सुभाष तुम देख लो , ताकत घुरवा पाव ||489
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ठट्ट   लगौ   भारी हतौ , रावन  के   दरबार   |
लत्ता लयँ हनुमान की ,कर रय  पूँछ निहार ||490

चित्त  पट्ट  सब  कर  रयै , फैला  रय है खट्ट ||
लट्ठ   घुमा  के  जोड़ते , बेमतलब   कौ  ठट्ट ||491

अकल अजीरन जब मिलै , चुप हौ जाऔ झट्ट |
नाँतर   बौ  ऊदम करै , और   जोड़  लै    ठट्ट ||492

ठट्ट   लगाबौं  है   सरल , कठिन सार की बात |
मलम  धरै   नइँ    कौउ है ,  राखैं  सबरै  घात ||493

मंत्र न बिच्छू जानतइ ,  पकरत  फिर रय साँप |
ठट्ट  देखबें   खौ    जुरौ , कैसे   रय   बें  काँप ||494

दुनिया कै   जो  ठट्ट में , रखतइ   कर्म प्रधान  |
देखत  ऊ खौ सब जनै ,और   करत सम्मान ||495
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दुनिया भी  भटिया बनी ,  जीबै  जौ  भी   आत | 
एक दिना  सब  मरगटा , बरबै  लद   कैं   जात ||496

कछू   जनै भटिया  बनत , तातौ  रखत  मिजाज |
तुनक फुनक जल्दी करत , मानत  नईं    रिवाज ||497

थुथरी  राखत जौ बुरइ   , कात   जगत्तर   बात |
कड़तइ भटिया आँच-से,  सबखौं  बोल  सुनात ||498

मन  भटिया जीकौ दिखे , सबइ  बिगारै  काज |
कछू  हौत   गंगा   जमुन , सदा   बचाबैं  लाज  ||499

जितै हौत झगड़ा  मिलै  , सब  भटिया हौ जात |
बात     हौत    चैकाउतीं  ,   ठाडैं   बैठै    घात  ||500
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सूर्य रोहनी  चंद्र कै  , घर   में   रैबै  आय |
उतरत जैठे  नौ तपा , धरती पै लग जाय ||501

मंगल बुध जी भी करें , शनि से सप्तक योग |
आगी   बरसे   नौतपा , धरती   होय  निरोग ||502

एक बात साँसी सुनौ , जेठ   मास कौ  घाम |
रोग हरत सब नौ तपा , धरती कौ  अविराम ||503

जेठ माह   उतरन  लगै , सूरज  तेज   दिखात |
जीखौं कातइ नौ तपा , ज्योतिष  यह बतलात ||504

तपा अगर चूँ जाय तौ , लोग कात यह  बात |
बारिश  नौनीं   ना  रयै , हौ   बसकारैं  घात ||505

मानव तन बैक्टीरिया , देतइ  तपा निकाल |
कातइ यह साइंस है , पढ़ा   सुभाषा  हाल ||506
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गरई बात न जब दिखे , लोग देत नइँ ध्यान |
जैसे हम तुम है सुनत  , कउवा लै गव कान ||507

जम भी जातइ  है  सदा , मरयादा  की  बात |
गरई रयै  न खैप तौ , मुड़िया  पै  हिल  जात ||508

गाँठ  गुड़ी  हौतइ गरइ , संगे   मन कौ  मैल |
बदन खाक करतइ सदा , बंद हौत सब गैल ||509

हम तुम लिखवें सब गरइ , दोहा में सब बात |
कथ्य भरें सब तथ्य से , दें  सबखौं   सौगात ||510

ज्ञानी   की  बातें गरइ , सदा   आउती  काम |
अजमा‌ लौ मौका परै , कह सुभाष अविराम ||511
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सिंदुकिया चापैं कमर  , पौचे  राधा   धाम |
गुदनारी  कौ स्वाँग धर ,घूम   रयै है श्याम ||512

 सिंदुकिया डुकरा चपा , करत न सूदैं बात |
धरौ पसेरी भर सुनौ , घर  में सबसे कात ||513

सिंदुकिया  बहुऐं    तकै , दद्दा   खौं  पुटयाँय |
शाम सुबह ताती लुचइँ , अपने हाथ खिलाँय ||514
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नानो   हौतइ  सार है , लेना   भाइ   बटोर |
समझो गुन देखौ उयै , मन से करौ निहोर ||515

नानो   हौतइ  नोंन  है , नानो   हौतइ   चून | 
सत्संगत  दौनों  करै , बढ़ै मनुज कौ खून ||516

नानो जिनकौ दाँव है , लगतइ नईं सुराग |
बेइ   सयाने  आदमी , बचा  लेत है दाग ||517

नानो जिनखौ ज्ञान है  , बाँचत   वेद  पुरान |
पंडित जू कैलात है  , हम बनतइ जजमान ||518

दोहन में जो भी रखत , कौनउँ    नानो कथ्य |
अमर सदा लेखन रयै,  रखतइ जौ भी तथ्य ||519
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त्रेता युग अभियांत्रिकी, गयै  नील-नल ताड़ |
राम नाम परताप सें , पुल    की बनै जुगाड़ ||520

जानत जनम  जुगाड़ का , भारत   है  आधार  |
चल जाती इस देश में   , मिलीं जुलीं सरकार ||521

लै जौरा  की  फौज भी , अच्छी  भरत  जुगाड़ | 
हौ -हौ सब  मिलकै करैं , कर दैं तिल कौ ताड़ ||522

हाथ जौर विनती करौ , कर लौ सबइ प्रनाम  |
जीकै   पास  जुगाड़ है , बौ   है  आज महान  ||523

पास  सदा   ही  हौत हैं , जीकै पास जुगाड़ |
बिन जुगाड़ सब रौत हैं , अपनै मौखौं  फाड़ ||524

सबइ कुँवारै खुश रयैं , दद्दा  करें   जुगाड़ |
हाँड़न में हरदी लगै , दैत  व्याव  से  आड़ ||525
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काँलौ कीसै का कहै , सबकै अलग मिजाज | 
जूँ ना रैंगत  कान  पै , तला  लौर  रइ  लाज ||526

मूरख  सै  भेरौ  परौ , काँलौ अब समझाँय |
पथरा से मुड़ियाँ घलै , टुकलौ  लैकैं  आँय  ||527

भैस   लौर   गइ देख   लौ , पूरौ   काम   नासाय |
कालौ हम समझाँय अब , अडुआ अब दिखलाय ||528

छिटक जुदइयाँ  कात है , करौ   प्रेम की बात | 
काँलौ अब  किस्सा चलै ,करौ फिकर ना  रात ||529

काँलौ  झेलैं  हम   उनै , मुड़िया कौलें  खात | 
अपनी-अपनी धाँदतइ , सुनै न  कौनउँ बात || 530
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तड़का सौ भड़का लगत , काटत  सबखौं  घाम | 
पानी  बरसौ   नैक   है , रऔ   चिपचिपा  चाम || 531

प्यासी धरती जानियौ , है  भड़का परिणाम |
धार  पसीना की लगी , कैसे   करबैं   काम || 532

भींज गई है तौलिया , पौछत -पौछत आँग |
दूजी दे  दै अब  धना , मुन्सेरू   रव   माँग ||533

नेतन  खौ भड़का परौ , आ गय  पास चुनाव |
दौरे  जौरत  हात  हैं   , कौउ  न  दे रव भाव ||534

जी तलफत भड़का परै , बैत   पसीना  धार |
बिजना लैकें हात में , करत तनिक उपचार || 535

उमस   हवा में    रात    है , मन   हौतइ  बैंचैन | 
कत भड़का सब लोग है , मुश्किल कटतइ रैन ||536
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इक्कर उनकी चल रयी , कात नीम खौं  आम  |
हाँ जू - हाँ जू सब करैं ,    भुन्सारे   से  शाम ||537

इक्कर जिनकी चल गई , अब  गैलै सब  बंद | 
नईं   पुछैया  कौउ   है ,    कैसे  गा  रय  छंद ||538

नेता जीत चुनाव खौं , इक्कर  चलतइ चाल |
बिना पतै के रात दिन , खूब  बजातइ  गाल ||539

इक्कर कौ  चक्कर चलै  , देखै  सबकै  राग |
गात  लड़ैया  पूस   में , हुआ-हुआ की फाग ||540

इक्कर खौं  टक्कर मिलै , नईं  सुभाषा   देर  |
मिलत शेर खौं गैल में  , सदा   सबा   है  शेर ||541
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बृज की देखी फाग है , लठ्ठमार जब हौय |
फगुबारी की मार से  , साबुत बचै न कौय‌ ||542

गोरी  लैकें  रंग  खौं  ,फाग  खेलतइ  द्वार | 
आबड़ में जो है  बिदत, रँग   देतइ है डार  ||543

सबइ रंग उमदा लगैं , चिपकै आँग  गुलाल |
खैलत गावत फाग हैं , देत  नगड़ियाँ  ताल ||544

गोरी खेलत फाग है , जब  प्रीतम   के   संग |
रोम- रोम मुसकात है , खिलत सबइ हैं अंग ||545
 
बजत नगड़िया   फाग में , सबरै  दौरै  आत |
हौरी है ई बात   खौं , रँग   डारत   चिल्लात ||546

बिचकत अब कछु रात है , कैसन खेलें फाग |
कैमीकल रँग में डरौ ,  लगै   गाल   खौं आग ||547

गुइयाँ  गाबैं  फाग  खौं , नचा  रयीं  गोपाल |
चिकुटी  काटै गाल पै  , पोतै  लाल  गुलाल ||548
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खा कै गुजिया चल पड़े , पीकै थोरी भंग |
हुरयारन  कै  बीच  में , बजा  रहे मिरदंग ||549

गुजिया हौवें रस भरी , और मसालेदार |
होरी पै नौनीं लगत, जैसें  हौय   बहार ||550

भौजी देवर से कहै, गुजिया खा लो चार |
देवर खाबे बैठ गव , दओ रंग  तब  डार ||551

जब  किनायनो डारतइ , गुजिया में भरपूर |
तब हम सूँगत रात है  , जात न घर  से दूर  ||552

सास ससुर अमरूद से , साला   पिंड  खजूर |
गुजिया -सी  साली   लगै, सलहज  मोतीचूर  ||553

होरी की सब बात जै , गुजिया  सदा   बहार |
जितै  मिलै फटकारियै , कै   गय लम्बरदार  ||554
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टूटे   गुरा   गरीब   के , मैगाई   दै     मार |
कह सुभाष जाबैं  कितै , लेकैं घर परिवार ||555

नेतन की हम का कबैं , वोट झटक है लेत |
दो पइसा अनुदान   भी , गुरा  टौर के देत ||556

भारत में मजदूर भी , करतइ  इतने काम |
जितने  टौरें वह गुरा ,  मिलै न उतने दाम ||557

टैक्स लगें सरकार के , गुरा सबइ ढिलयात |
अठ्ठाइस  जी एस टी , सौदा   पै लग  आत ||558

अपने  गुरा  बचाइयौ , जितै  जुरै खड़पंच |
न्याय नीति से दूर है , आज दिखें जो मंच ||559

अच्छें नौनें काम कौ , गुरा चटक जब जात |
मुड़ी धरै सोचत  रहत , नींद न लेंगर  आत ||560

कालनेमि टोरै गुरा , चीन्ह  गयै हनुमान |
राम  नाम  झूठौ  जपै , बैठौ    बेईमान ||561
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कुत्ते   चमचे चमचियाँ , दौरैं   खड़े   पलैर |
नेतन कौ घर जानियौ,जितै भरत सब मैर ||562

जो पलैर चमचा हतौ , बदल गऔ है आज |
राजनीति में घुस गयौ , आज करत है राज ||563

जो पलैर हौ आदमी,  बदमाशी   कर जात |
कौनउँ  मौका जब परै , दिखा देत औकात ||564

ढौर श्वान पंछी सदा , हौ    पलैर   जब गेह |
साँसउँ भौत निभात है , करतइ सबसें  नेह ||565

हम पलैर प्रभु राम के , रय हमखौं है पाल |
उनकी   हमै  निभाउनें , पूरौ रखनें ख्याल ||566
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खड़ौ  बिजूका  खेत‌   में, रखवारी  के  हेत |
खात कछु न खेत में , ना   खाउन कछु देत ||667

ठाड़ौ मूसरचंद- सो,  लठिया लय  है  हाथ |
सबइ बिजूका देखतइ , डबला कौ है माथ ||568

हम सब ई संसार में , बने   बिजूका   राँय |
तनक जगाँ खौ घेर कै , रत है  उयै रखाँय ||569

एक बिजूका देख कै , ढौर  छरक है  जात |
ऐसइ एक गँवार नों  , कौउ  पास ना आत ||570
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कलइ न अपनी खोलियौ , बाँदे रहियौ गाँठ |
जौन दिना पसरे जितै ,   हौजे     बारा  बाँट  ||571

कलइ उतर गइ झूठ की , कालनेमि पछताय |
मुगदर  दव हनुमान ने,  भागौ   प्रान   बचाय ||572

कलइ दार   लोटा हतौ , भारी    चमकत   राय |
किरकउवाँ से जब मजौं , उतरौ मुख दिखलाय ||573

कलइ चढ़ौ  उनकौ  रहन    , पानी में  धुव जात |
बेर- बेर बै   पौत के , फूटौ    मड़       चमकात ||574

कलइ राम   तुम   खौलियौ  ,चार जनन के बीच |
जो   जूठै   संसार   में ,  मचा    रयै   हौं   कीच ||575
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कनबत्तू    गुइयाँ   करैं , हेरैं  लम्बरदार |
का जाने का बात है ,रयै कुका रय बार ||576

कनबत्तू भी हौ गई ,    सबइ चिमा गय पंच |
करने है अब फैसला , सबखौ अब सौ टंच ||577

कनबत्तू   पर  कह  रयै , भाइ     रामगोपाल |
काफी हद तक ठीक है , लगता  यहाँ सवाल ||578

बुंदेली के शब्द हम , यहाँ सीखते  आन |
कनबत्तू का अर्थ भी , गयै यहाँ पहचान ||579
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गोरी  हँसकै  कै रयी ,    मौये    नईं    उकास |
मिलत गैल बतियाँ करत , जी में रत बकवास ||580

पर   पंचायत  पड़  गयै , काड़ें  फिरें   उकास | 
टंटौ  जब बिदने  लगो ,  गदबद   दयी  सुभाष ||581

भुन्सारे  संझा   सबइ  , काड़ौ  तनक  उकास |
गुरिया  फेरौ  राम कै ,  ले लौ  ग्यान   प्रकास ||582

राम भजन पै  कात  जो,   मरवें  नईं  उकास |
एक दिना उनके लिगाँ ,  माँछी  भिनकत पास ||583
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गम्मखोर नौनों भलौ , करै न  टंटौ   आन |584
मान जात हर बात खौ, सबखौं दें सम्मान ||

चार बात सुन लेत है , सब पै देतइ ध्यान |
गम्मखोर जी में रखत , संतोषी  को गान ||585

गम्मखोर राखत हृदय , मन में भलमनसात |
दौदा कपटी लालची ,  उचकत दौ  दौ हात ||586

गम्मखोर की का कबै ,  सज्जन ऊखौं  कात |
चार जनै  लरबैं जितै   , सबखौं बौ समझात ||587
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माता पूजन जा रयी ,    जुर गइँ गुइयाँ चार |
सजी धरी अठबाइ हैं, लय  कुमकुम को थार ||588

बन्न बन्न की है शकल , जीखौं  कत  अठबाइ |
छल्ला बेलन  लघु लुचइँ , भरी धरी चिकनाइ ||589

परिकम्मा सखियाँ करें , गोरी    पूजै  आन |
चढ़ा सभी अठबाइ खौं , सुंदर   गाती गान ||590
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गों  में  दें  मौगों   रयै  , जानौ   उयै    गुडै़ल |
औसर पै ऐसौ फटत , करत काम सब फैल ||591

गों में दें कै बैठ गय , हम तो उनकी बात |
बात उनइँ की मारने  , उनकें  मौं पै कात ||592

बने फिरत हुसयार है , खोटी  लय सौगात  |
गों में दें लइ बात है , उनखौ  काय पिरात ||593

गों में रख लो बात खौ , तनक गम्म तो खाव |
जौन   दिना  चिचयाय बै , तबइँ देखबै जाव ||594

गों   में    दैकें    आदमी , खूब   चिमानों   रात  |
फटतइ मौका देख कै , सबखौं  धुआँ  दिखात ||595

राना जू भी है गजब , बीन -बीन के ल्याँय |
लगे गुरीरे शब्द सब , हँस-हँस के मर जाँय ||596

गों में  देकै लिख रहै  ,दोहन कौ  दें  आँच |
जैसे  मौं  पै बन परै , लइयौ  भइया  बाँच ||597
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लबरा    पैंला   से   लुकत , सामैं आबैं सत्य |
या   चमचा   बन   घूमता , करबै  आगैं नृत्य ||598 

चोर  लुकत   चोरी  करत ,  दाड़ी  खौं  सैलात  | 
तिनका खौटत  गाल से , फिर भी पकरौ जात ||599

मौड़ा मौड़ी है लुकत , छिपा छिपाउल खेल |
बचपन कै ई खेल में , बहुत   रात है    मेल ||600

लंका में हनुमान ने, लुकत खोज लइ मात |
फिर सामू है आन कैं , जौरे   अपने   हात ||601

एक हास्य दोहा - 

समधिन पैलउँ है लुकत  , फिर पानू  भिजवात |
पाँछैं    ल्याबै   नासता ,   घूँघट  से   मुसकात ||602
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अक्सर  हम  यह  देखते  , बूढ़े  देते  खांस |
आज खांसना देखिए , बना गले की फांस ||603

बुंदेली दोहा‌~तकुआं टेड़ो काय है , भुन्नाने  हो   आप |
               कीने भैसें छोर लई‌ं,  थुथरी बिगरी छाप ||604

सांसी - सांसी    बोलकै , मिली  पठौनी मोय |
सिर्री कहते  सब  जनै, अकल न तोखौ होय ||605

माते  जू  कौ निबूआ , कहें  संतरा‌ जोग |
मैने  खट्टो कह दयो , चढ़ बैठे सब लोग ||606

मुखिया जी का शौक है , दारू पीना  रोज | 
मैने  कै दइ  टुन्न  है , अखरी सबखौ खोज ||607

भड़याई  लरका  करे , बाप  बनो  सरपंच |
रामदुलारी  चीन्ह   के ,  बोल  गई  है  टंच ||608

दारू  मुरगा  चींथ कै , बोलत   नौने  बोल |
राम नाम पगड़ी जड़ै   , बड़े बड़न की पोल  ||609

मौड़ा   माते   कौ   सुनो , करे   दौंदरा    रोज |
फँसे घसीटे कौ लरका , पुलिस करत है खोज ||610

कोई  गुइयाँ  खेल को  , मत  कहियो  खरयाट |
मिलजुर कै  घरिया भरत  , चलत  कुआँ पर  राट ||611

कोई  गुइयाँ  खेल को  , मत  कहियो  खरयाट |
मिलजुर कै  घरिया भरत  , चलत  कुआँ पर  राट ||612

                  तीन अठन्नी भँजा रय , लेकै रुपया एक |                        खोटी लेके आत है , जिनखौ देतइ फेक |613
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एक जला दइयौ दिया  , गुइयाँ उनकी शान |
जौ सीमा पै कर  गयै , प्रानन  कौ बलिदान ||614

देरी में धर कै  दिया , मनइँ  राखियौ  सोच |
कभउँ  नहीं  ईमान  में , ईसुर  आबै  लोच ||615

दिया   कात  सूरज  सुनौ , हम तुम  येकइ  जात |
तुम जलतइ हौ शाम तक ,फिर  हम जलतइ रात ||616

अपन- तुपन  ईसुर  दिया , ईसुर  बड़ौ  कुम्हार |
करमन  कै  हम  तेल से , जलत  बुझत संसार ||617
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जरै दिया   से अब  दिया , बगरै  खूब  प्रकाश |
सबखौं है  शुभकामना ,   बनै   दिवारी  ‌खास  ||618

नहीं दिवारी  पर इतै , हम बगरा   रय   ज्ञान |
लुअर पटाखन पै रखौ , बस थोरौ सो ध्यान ||619

महावीर निर्वाण भय  ,राम अजुध्या आय‌‌ |
सुखद दिवारी हो गई , लछमी पूजन पाय‌ || 620

और भौत सी है कथा , नहीं  रहै हम बाँच | 
सबइ  कथा संदेश दें ,कात सुभाषा साँच ||621
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गिरमा बँधता जब गले , करना उतै  विचार |
जिसने बाँधा प्रेम  से , वह  चाहत  उपकार ||622
भला वह तुमरा चाहे |

गिरमा टौरें फिर रहे, बनवें   खौ सरपंच |
रुपयन से पुटया रहे,  शरम करें ना रंच ||623
घूमतइ दाँत निपोरे |

देरी   खूँदें  खात  हैं  , तक  लौ  चारों  ओर   |
खग्गी सब ठाडे़ भये , फिरते    गिरमा  टोर  ||624
फसूकर सबरै डारे |

साली की चिठिया मिली , जिज्जी चढ़ रव ताप |
गिरमा  टोरे   आ   गये  , जीजा   अपने   आप ||625
परी जिज्जी मुस्कानी |

गिरमा डेंगुर नाथवों , तकै हमइ ने खूब |
नदिया बैला हाँक कै, गये  चरावै   दूब ||626
याद सब आई मुझकौ |

साजै  लच्छन आचरण, की मिलवें जब डोर |
उसको गिरमा  मानकै , पहनो तब बिन शोर ||627

गिरमा लरकै  बाँध दो , सामै दे दो  पाड़ |
एक दुलइया ढूँड़ कै  , दैव  राछरी  काड़ ||628

सुभाष सिंघई~

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~दो दुम के दोहे बुंदेली दोहे , विषय गोटी

गोटी  गलियन में गपा ,  गुम्मा  गये   गुदार |
गटा गुचे  है‌  वोट पर , गारय   गीत   गुहार ||629
सबइ अब इनको चाने |
घूमते   गाते   गाने ||

देरी    खूँदे  खात   है , नेता   दय   खरयाट |
गोटी अपनी फिट करें  ,लेत खुपड़िया चाट ||630
वोट घर भर  के  चाने |
धूल चरनन.  की पाने  ||

गोटी की हम का कहै , काँ लौं कैवें  बात |
वोट झटकवें बाँटते , पउवाँ   आधी रात ||631
रुपैया    संगै     देवें |
राम की कसमें लेवें ||

जिनकी  गोटी जम गयी , वे बन रय सरपंच |
हिस्ट्रीशीटर आज है ,  अब   सोना सौ टंच ||632
हितैषी  सबके दिखते  |
सुभाषा साँसी लिखते ||

गोटी चलतइ बाप है , लरका दय खरयाट |
जीत न पाने पंच पद , खड़ी   रनै  है खाट ||633
मजा भी सबखौ लेने |
वोट ना  ऊखौ   देने ||

ठाड़े   भये  गुलेदरे , टटिया-सी  रय‌ टोर |
गोटी चले चुनाव में  , सरपंची  की ओर  ||634
दौदरा दे   रय     छाती |
बिना घी की सब बाती ||

गुड़याकर गुपला गिरो ,चरनन कहै   मराज |
मोरी गोटी  फिट करो , सरपंची  खौ आज ||635
मजा सब उसका लेते |
वोट ना  एकउँ    देते ||

ठाड़ौ  भयो चुनाव में , माते  जू   को  पूत |
गोटी चलवें   गाँव  में  , बनो  सूदरो   दूत ||636
पाँव भी सबके परता |
पकै ना ऊकौ भुरता ||

गोटी   फिट  बैठे  नहीं , फूटत वहाँ लिलार |
यह चुनाव के  हाल है , हाथ लगत है  हार ||637
‌सुभाषा बचकै रावें |
कभी ना लरवें जावें ||
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मिसरी मौ से झर रही , पुटया  ‌ रय है   वोट |
कौल धरा  के दे   रहे , मसकउँ से वें   नोट ||638
चुनावी चलवें  झौका |
परौ है   सबसे मौका ||
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नमन मंच ,प्रदत्त शब्द - सूदो
दुमदार दोहे

सूदो   सच्चो    आदमी , दुनिया   में  ठग  जात |
लबरा फाँकत बात खौं  , मसकउँ लडुआँ खात ||639
पता ना उसका चलता |
चपेटे अपनो  खलता ||

सूदो   अपनी   सूद की ,   छोड़े  नहीं    कतार |
पर सब इनके बीच में   , टिड़का     लम्वरदार ||640
गजब का आज जमाना |
झूठ.  का   है   याराना ||

सूदो  चलतइ एक सौ , धरे   नाक  की  सूद |
लबरा टेड़ी   चाल से  , करत  रहत  है  कूद ||641
सुने लबरन के लड्डू |
सूदरे  दिखे  निखड्डू ||

हल्के  में  थे  सूदरे  , टिड़का   सदा‌   कहाय |
जब से   हम टेड़े  भये  , सूदो   जगत बताय ||642
रीत है बड़ी पुरानी |
चले की बने कहानी ||

हॉसिया टेड़ो जान कै , दूर रखत है  हाथ   |
कीला सूदो होत है , पकड़  ठोकते  माथ ||643
कील का  ठुकता मत्था |
पिसत   है  चूना कत्था  ||

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विषय डबला , दुमदार दोहे

तन  डबला- सो  फूटतइ  , ईसुर   दे जब  मार |
फिर देतइ   क्यों  दौदरा , मानव  फैला    रार ||644
चिरैया सौ उड‌ जाने |
सबइँ खौ कनै फलाने ||

एक बात सबसें सुनी, डबला  में गय थूक |
उनखौ   कौनउँ चौतरा , देतइ नहीं भभूक ||645
फिरत अब लयें    कटौरा |
जुरै   ना  उनखौ   कौरा ||
(शब्द कुछ और प्रचलन में है,  पर  थूक शब्द लिया है )🙏

डबला छाया में धरौ , ठंडो   पानी  होय |
चड़ा दओ चूला अगर , तातों होकें रोय‌ ||646
असर संगत  को  होवें |
सुभाषा   करनी  ढोवें ||

मनोविनोद  दुमदार दोहे🙏

लरका  के लाने  सुनो  , सगया आये रात |
हम डबला से फूल कै, करवें   उनसे बात | 647
पिलाई उनखौ लस्सी  |
कढ़े  वें  पूरे    हप्सी  ||

पानी डबला में भरे , कक्का कड़ गय हार |
कक्को बैठी बक रही   ,हुइयें   पुंगा  चार ||648
तमाकू साथ  पवारें |
बिड़ी की सुट्टू मारें |

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दोहे,- गुम्मा
( दुुमदार ) दुम रोला का विषम चरण

एक- एक गुम्मा जुरै  , तब बनतइ घर दोर |
ऐसइ हम सब अब रहें , इस  बुंदेली   ठोर ||649
सबइ अब मन में गुनियो |
प्रेम से    सबकी सुनियो ||

हर गुम्मा भी लिगाँ  रहें , पर‌‌  है थौड़इ   दूर |
जुरौ  रहत वह प्रेम से, रख गुनियन-सो नूर ||650
सुभाषा रहिवों सीखो |
बोल ना राखो तीखो ||

गुम्मा का गुन जानियो , तकियो  इसकी ओर  |
आँधी    पानी  झेलकै   , देतइ   सबखौं ठोर ||651
कहानी कैबे अम्मा |
बनत है कैसे गुम्मा ||

गुम्मा जो भी  पाथता , होता   वह   मजदूर |
मिला पसीना वह पथे , निज हाथन का नूर ||652
पसीना  हरदम बहता   |
पथइया  कैसे  रहता ||?

पाथें घर में  बाप  माँ , लरका   चटा बनाय |
आगी से बउ धन अबा ,गुम्मा खरा  पकाय ||653
सुभाषा  घर है साजौ |
बजै   रमतूला बाजौ ||

गुम्मा ही  जुरकैं  सदा ,  खड़ी  करत दीवार  |
सबइ जनै अब ताकियो ,का होतइ  है प्यार ||654

गुम्मा से  गुम्मा   जुरै ,  रहें  बीच   सीमेंट |
रेता   पानी   प्यार से , करतइ   परमानेंट |655

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विषय - उखरी

उखरी में मुड़िया धरें , खुद.  कन्छेदीलाल |
मूसर जी से कह रहे,रखियो मोरो  ख्याल ||656
‌नहीं    मूसर से  पटने |
रगड़ के उनखौ  कुटने ||

उखरी में मुड़िया धरें , रय‌ है‌ दाँत निपोर |
अटपट्टे सब काम है‌, काँ  ढूढों  है  ठोर ||657
कैथ सी   चटनी  बँटने |
तिरूला    पूरे    छँटने ||

उखरी में मुड़िया धरें  , रामदुलारी आज |
मूसर से आशा करे, साजो कुट जे नाज ||658
अकल पै पर गय पथरा |
निनुरवे   घूमत    गथरा ||

उखरी ‌में मुड़िया धरे , बन रय चतुर सुजान |
मूसर  से   है  दोस्ती , कुटत.  रहें   श्रीमान ||659
देखकर आवे   हाँसी |
चढ़े है खुद ही फाँसी‌  ||

उखरी में मुड़िया धरे, ऐसे है‌ ‌  कइ लोग |
मूसर से कुटवें सदा , जोरत है खुद योग ||660
सुभाषा खौ हैरानी |
नहीं अब पीवे पानी ||
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दिखे तरइयाँ राम धइ , भरी दुपरिया जेठ |
सबा सैर जब  सैर खौ , सामे  आवें   ठेठ ||661
अकड़ सब दाँत निपोरे |
सड़क पै   होत  निहोरे ||

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बुंदेली दोहे ~ विषय पंचा

पैले   पंचा   पैरकैं ,   करो   कलेवा   भोर |
फिर जोते सब खेत है , छूटो कोउ न छोर ||662
राम धी  सांसी कै रय

पंचा‌ पैरत सब जनै ,   रई. पैलऊँ  बात |
शर्ट पेंट है आजकल , पंचा किसे सुहात ||663
राम धी सांसी कै रय

पंचा अल्फी ऊजरी ,  रखी   तौलिया  साथ |
बने वरतिया श्याम जू  ,  लेकें लठिया हाथ ||664
राम धी सांसी कै रय

पथरा को  घिसना बना  ,  दयो मैल. खौं ठेल  |
पंचा   अल्फी धाँद के , चुपड़ो   सरसों   तेल ||665
राम धी सांसी कै रय

सुभाष सिंघई जतारा

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विषय दुपाई

एक कंजूस सेठ जी की पनैया भरी दुपाई
भड़या ताड़‌ ले गए , उसी पर हास्य रस में 
दो दुम के  दोहे निवेदित है |

सकला-सी मुंँइया भुजी  , ताती‌‌  लगती‌ खाल |
भरी   दुपाई    सेठ  जी , फिररय  वारेलाल ||666
पनैया  भड़या   ताड़े |
सेठ जी मौं खौं फाड़े || |

भरी दुपाई निग पड़े , लगी  ततूरी‌ पाँव |
नहीं पनैया मिल रईं , छानो  पूरो  गाँव ||667
पतो‌  अब भड़या जाने |
कहाँ  पै   गए.  छुपाने |

रामदुलारी बोलती , भरी   दुपाई  जेठ |
फटी पनैया खोजते , मरवें फिरते सेठ ||668
पनैया  बाप   मताई |
खोजते बने सिपाई |||

सेठानी  समझा रही  , आज.  दुपाई   तेज |
घर मुरकौ अब सेठ जी , पौड़ों घर की सेज ||669
प्रान खौ नहीं गवाओं |
पनैया फटी न  लाओं |

लौट  दुपाई  अब रई , हौवे  बारी शाम |
नयी पनैया  पैरवें  ,  खरचा  होने दाम ||670
लोग सब दाँत निपोरे |
सेठ जी करें   निहोरे /

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विषय - रमतूला

कागज पै  सड़कें  बनी , बातें  नहीं  उधार |
सरपंचन की जेब ने, रुपया  लियो  डकार ||   671
डले है पेड़न  झूला |
बजे अब तो  रमतूला ||

निबूआ नोंन चौंख रय , गाँव भरे के लोग |      
लुचईं सूँटरय मुखिया, पा  सरकारी भोग |  672
बोल के गओ कथूला |                                 
बजे अब तो रमतूला ||

राहत राशी भेज कै ,शासन गँव  है बैठ |            
इतै पचा सरपंच जी , मूँछ  रहे  हैं  ऐंठ || 673    
फूल कै दूनो  कूला |                                   
बजे अब तो  रमतूला ||              

पुलिया  बन  गइ  रात में , भुन्सारें  की पार  |       
एक झला में  बह गई , का  कर दे सरकार ||  674
बने है  नेता दूला |                                
बजन दो अब रमतूला |
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बुंदेली (दमदार दुमदार ) दोहे

                 माते कक्का घास में , सुलगा गय  है आग |.           मड़ी कथूले की मुड़ी , ठोको  ठाड़ों   दाग ||675

रामजी मौ में तारो |      भलौ है  देश हमारो  ||

               बिन्नू सपरन खौ  गई , लहरें उठती घाट |                  रामप्यारी    बोलती  ,   बिन्नु  खौ  गर्राट ||676

रामजी  मौ में तारो |     भलो है  देश हमारो  ||

            लचक कमरियां देखकर , टपकी बब्बा लार  |आँख दबाकर दे रहे , लरकन खौ  उसकार ||677

रामजी  मौ में तारो   |   भलो है  देश  हमारो  ||

                   गलती माते जू करें    , सबरे साधें मौन |                   उरजट्टे  खौं सोचते     सामें आवै कौन |678

रामजी मौ में तारो    |भलो है  देश हमारो  ||

                   दारु बँट रई गाँव में , डलने हैं कल वोट |           ‌         सभी  चिमाने लग रहे ,डाल खलेती नोट ||679

रामजी  मौ में तारो     |भारत देश हमारो  ||

              लरका माते को लगे   , सब लरकन से भिन्न |              फिर भी  पूजो  जात है , रात  दिना रत  टुन्न ||680

रामजी  मौ में तारो     |भलो है  देश हमारो  ||

             करें टिटकरी गाँव के ,फटियाँ की लख नार |                 कहते  भुज्जी  डोकरा , खूब जताए प्यार ||681

रामजी  मौ‌ में तारो |   भलो है  देश हमारो  ||

                कोरोना के  काल में , भूखन  मरो  किसान  |            पर डबला से फूल गय , देखो  सभी  प्रधान ||682

रामजी मौ में तारो    |भलो है  देश हमारो  ||

              उससे ना कुछ बोलते , जिससे भाँवर सात |                     मोदी बाजो  टुनटुना ,करते  मन  की  बात || 683

रामजी मौ में तारो    |भलो है  देश हमारो  ||

                   बापू  आशाराम  का , राधे  माँ  खौ  ज्ञान |           इक दूजे का चित्त से , करते  अंतरध्यान ||684

रामजी मौ में तारो    |भलो है देश हमारो  ||

                 माते कुत्ता  मारने ,  घर  ले  आए   लठ्ठ |                    मातिन ने अजमा लिया, माते पर ही झट्ठ ||685

रामजी मौ में तारो    |भलो है देश हमारो  ||

                राम  राम जू  चल उठे , भुनसारे  से  शाम |                समझो पास  चुनाव हैं  , बँटने  दारू  दाम ||686

रामजी मौ में तारो   |भलो है देश हमारो  ||

                मोड़ी मुखिया की भगी, कौसे कलुआ बैन |                 खबर  पैल  से  ना  दई , ईसै  हौ  गइ  ठैन ||687

रामजी मौ में तारो    |भलो है देश हमारो  ||

                  जुड़कर  पुंगा गाँव  के , बात  रहे  है  फाँक |               जो जितनी ही फाँक ले,उतनी उसकी धाँक ||688

रामजी मौ में तारो | भलो है  देश हमारौ 

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बुंदेली दोहे- विषय फुकला = सार हीन छिलका

          छंद न फुकला-सो लिखौ,  दिखै  न जीमें सार |        ऐसौ लिखियौ जू सबइ , करबें   लोग  विचार ||689

      नहीं  तथ्य कौ कथ्य हौ , कविता  तब  बेकार |              तुकबंदी की  लोइ   ही, कह   सकते   तैयार ||690

           फुकला -सी बातें करत , पल्लै  परत  न  मोय |   जौ  कत  जुन्डी   डंठ   में , गन्ना-सो रस  होय ||691

       मन कौ   फुकला जानियौ , गहरी   कुंठा  होय |    जलन -बरन  पत्ता फरैं , रौक  सका कब  कोय   ||692

           संग  रयै   कीमत  रखै  ,  चिपकौ  दाना   होय  |जैसें  फल   बादाम भी   , फुकला  राखै  सोय ||693

          खतरनाक भी  हौत है , फुकला  जीकौ  ग्यान |बीच  गैल  में जै   पसर  , बैतुक  कौ    मैमान ||694

           फुकला मानव तन बना , दाना  जानौ    प्राण |साथ करै जब हरि भजन,  हौ  जाए  निर्वाण || 695

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बुदेली दोहे - विषय डाँड़़

                डाँड़ हमेशा देत रव , जितै हौय  जब चूक |     रानौ ईसुर के लिगाँ , हात  जौर रव  मूक || 696

               डाँड़   दई  हमने जगाँ , गाड़ौ अपनौ  डाँड़ |.   जितै लगत तो डाँड़‌ है , लोग बनत तै साँड़‌ || 697

             डाँड़ लगाबै हैं  मुलक ,करतइ  फाड़  हजार |.   सीबै   बारै  खौज लो ,  हौगें   बस  दो चार || 698

             काँ काँ की चरचा चलै ,  उखरा   और   पछाँड़ |.   लै दैकें   सब अंत   में , निसचित करतइ  डाँड़ || 699

            हाड़न  में  हरदी  लगै , आबैं   खसुआ  भाँड |पइसा  ऐसैं   माँगतइ ,   जैसे    हौवें    डाँड़ || 700

         डाँड़   लैत  सब   पंच   है , ऊसैं    कथा   करात |.   जौ समाज से चल अलग ,  नियम टौर  कै  जात ||701

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बर्रोटी = स्वप्न देखना

          बर्रोटी  प्यारी   हती ,   पौचै    प्रभु   कै    धाम |चरण पकड़ कै धन्य भय, मिल गय मौखौ राम ||702

             गदा  लयै   हनुमान   जी  , तब बर्रोटी आय |बोलै   रावन मानयौ  ,  जो भी  सुता सताय ||703

      बर्रोटी    में  जप   करै ,  बाँटें    सबखौं  दान  |.   भुन्सारे     मेमान   बन , घर आतइ  भगवान || 704

            बर्रोटी  - सी  देखतइ ,    शबरी   दौरौ     हेर |.   प्रभू  राम जी आ रयै , सुन  रय  ऊकी    टेर ||705

          बर्रोटी में  नौनीं  लगै ,  दिखबै  संत  समाज  |.   जानौ   सबरै   देवता ,    पूरै  कर  दें  काज ||706

       बर्रोटी  या  जागना   , रखौ    राम   जी  ध्यान |दुनिया   में   डौले   नईं ,   मोरौ    जौ   ईमान ||707

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बुंदेली दोहा दिवस , विषय - डेंगुर

            ईसुर   डेंगुर  डारियौ  ,  लिखकै अपनौ नाम  |बाँद   गरै में  हम हँसै  , मिलै आपको  धाम  || 708

           दद्दा   मोरे  कात तै  ,  जौ भी  करत  उजार  |ऊकी   डेंगुर से   घिची , करतइ  है   सिंगार || 709

             ढोरन के बँदतइ   गरै , जौ भी  उजरा  हौय |लरका हौ तौ ब्याय कौ,  डेंगुर  डरतइ औय  ||710

                डेंगुर भी जा कात है , करौ  न उजरा काम |संग  घसीटे   हम  फिरै , तुमै  नईं  आराम || 711

          हलत - घलत डेंगुर कहत , जीनैं  करौ उजार   |    तबइँ  सजा हम दैत है  ,   राखत  नईं उधार || 712

                डेंगुर  जानो   ईश  कौ‌ ,  सूदौ   है  संकेत |     नौनें  लच्छन  सीख लौ , नईं  उड़ाऔं रेत || 713

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मौं   में   ठेंटा  बाँदियौ , साँसी  कात  सुभाष | 
चार जनन के बीच में , नइँ  करियौ बकवास ||714

सिसिया में  ठेंटा  लगै , कभउँ   न  बगरै   तेल |
तनक खुलौ रै जाय  तो , बनत   धार  की‌‌‌  रेल  || 715

साँसी  हौबें  बात  तौ , मौं  कौ   ठेंटा  खोल |
सब पंचन के बीच में ,  बतला  दइयौ  पोल ||716

मौं में  ठेंटा   बाँद   कै , भड़या  घूमत  रात |
चोरी करबै जा रयै , पतौ  चलत   औकात || 717

अलग - अलग है सब जगाँ , ठेंटा  का उपयोग |
कसै  भयै  नोंनें   लगत ,  ढीले  लगतइ ‌  रोग ||718
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गरजत  है जब  जौर  से , बदरा  सावन    आन |
अमरत बरसत‌ जान लौ ,  कातइ  सबइ किसान ||719

टप-टप   बूँदे   गिर  परै   , सावन    भादों   माह |
पानी    पाकै  खेत   भी ,  कात  रात   है     वाह ||720

पानी  बरसे   जब  फसल , हरी  खड़ी  हौ खेत |
कत   किसान  भगवान से ,   उम्दा   मौका  देत ||721

मौइ धना  गइ  खौटबें , फरी  भुन्टिया   खेत |
पानी    की  बूँदै   गिरी , लौटी    मुसकी देत ||722

सावन भादों  माह में  ,   हौ   जमकै    बरसात |
गीले   रातइ खेत है , , फसल  हँसै    दिन रात ||723
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नीचट हौबें   भाव जब , लइ मन में जौ ठान | 
मनसा   पूरन   हौत   है , जीनौ   हौ   ईमान ||724

नीचट  डोरी   बाँधियौ , कितउँ  न  जायै टूट | 
यैसइ रिस्ता राखियौ , परै  कभउँ   ना फूँट || 725

नीचट  हौतइ  प्रेम है , पर   जीसै  हौ जाय | 
रात दिना सपने  दिखें, मन खौ भारी  भाय  ||726

शबरी भी  नीचट  रयी , राखै  रइ विश्वास | 
एक दिना श्री राम नें , पूरी कर  दइ आस || 727

नीचट केवट भी रओ , करी न कौनउँ भूल  | 
जीते जी ही चूल सै , पा लइ प्रभु की धूल || 728

नीचट  सबने  जानकैं , कयी   राम से   आन | 
सागर   सबरौ लाँघ लैं , बीर   बली   हनुमान || 729
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सूपनखा नें जब तकौ , गयी  राम पै   रीझ |
नाक कटा गदबद दयै , गइ रावन नों खीझ ||730

की की नें का का तकौ , काँ काँ की की बात |
की की नें की की कही  , की खौं भइ सौगात ||731

कब सुभाष  सबने तकौ , लोग बनत जब डूँड़‌ | 
मसकत  महुआ छेवला , चटकत  सबकौ मूँड़ ||732

चूहा से बिल्ली कहत  , बिल्कुल  नइयाँ   देर  | 
कत     चूहा  पाछै तकौ  ,  तौरे   लाने   शेर ||733

कत सुभाष  साजौ तकौ ,  साजै  रखौ विचार |
सफल करौ  जीवन इते , मंत्र  जपौ   उपकार || 734

राम लखन सँग जानकी , और  तकौ हनुमान | 
हात  जौर   पूजा  करौ , हौजे  सब  कल्यान || 735

हौं  गरीब तौ दान  दो , भूकन खौं  आहार | 
रोगी जन   पैलें तकौ , और  करौ उपचार ||736

बेटी  जाऔ  सासरैं  , विदा   करत   माँ आज | 
कभउँ  उरानौ ना मिलै , इतनी रखियौ   लाज ||737


कियै उरानौ दैंय हम  , कौन  सुनत है  आन | 
वर्ग भेद कौ बिष इतै , पसरौ    हर  इस्थान || 738

प्रभू उरानौ दैंय  हम  , तनक  दीजियौ ध्यान  | 
बेइमान   हलुआ   भकै , भूकौ   रत   ईमान || 739

कितउँ  उरानौ देखतइ  , भौंत सभाँरत काज |
उनखौं असर न हौत है   जिनखौं नइयाँ लाज‌ ||740

कोउ उरानौ  ना  सुनै  , रखत न मन में लोच  | 
यह नेतन की जात है,  गड़बड़‌ है  सब  सोच  ||741

ककरी कै किटुआ बनै , नेतन खौं हम  लोग |
कियै   उरानौ  दैंय  हम , सबरै कुसुगन योग || 742

कुछ अफसर  देखे  इतै  ,नहीं समझ में आत | 
देत   उरानौ अब  कियै    ,रिश्वत लीलें  जात  || 743

देत उरानौ  प्रेम  से  , शबरी कत प्रभु देर |
ताजे   गुट्टा में  धरै ,    सूख   गयै  है  बेर ||744

देत उरानौ राधिका  ,  सपने   में   हौ   आत | 
तुमरै मारे श्याम   हम , तनिक नहीं  सौ पात ||745
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दादी दादा  है   तँगत  , नाती    उनै   तगाँत | 
जानबूझ हँसकर तगैं  , चपा पेट  की  आँत ||746

लबरा लम्पट लालची , इनकी खुलबै पोल |
बर्रन जैसे जै तँगत ,  लरबैं   करतइ  डोल |747

मौसी को काजर कयै  , साँसी हौ  जब  बात | 
भड़या भी पैलें तँगत , खुद खौ  सच्चौ कात ||748

नेता भी देखे   तँगत , हारत   जौन    चुनाव | 
कछू  काम की कै धरौ , पकर जात है ताव ||749

साव   हमारे  है  तँगत , बिकट  हौत  नाराज | 
उनसै कातइ लोग जब , छोड़‌ देव तुम ब्याज ||750

लरका बिटियाँ भी तँगत , बूड़े जब दें टोक |
खाबौ  पीबौ   चात बै , नईं    सुहाबै   रोक || 751
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हौबै   भारत देश अब  ,  ई  पन्नी से    मुक्त | 
झट्टइँ  हौबें  भूमि  अब , सुंदरता   से  युक्त || 752

पन्नी    ने   देखौ   इतै , कर   दव   सत्यानाश |
गइयाँ  खाकैं    मर रईं ,  देखत रात   सुभाष ||753

जब से जा  पन्नी चली , लोग   हुए  शौकीन | 
थैला  लैबौं   हात   में  , समझत  है   तौहीन || 754

पन्नी में  सब   पैक है , चलत आज व्यापार | 
ऊकी   जाँगाँ का चलै , यह  सौचे  सरकार ||755

कागज के बटुआ चलैं , बन जाबैं  कानून | 
पैक हौय सब औइ में , हरदी मिरचें  चून || 756

पर्यावरण   सुदारियै ,   पन्नी   कर   दो  बंद | 
घातक पशुअन खौं हुई , बनीं जहर यह मंद ||757
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सबर करौ फिर देख लौ , कैसौ   चल रव काम |
नइँ उलात कौनउँ करौ , गदिया  जमत  न आम || 758

अपनी गदिया मान लौ ,  ईसुर  करैं   निवास | 
जौन काज पै तुम धरौ   , हौजे  उतइँ  उजास ||759

सुबह   उठौ  गदिया   तकौ, लौ ईसुर कौ नाम | 
सगुन भलौ यह मानियौ , सुमरौ  मन से   राम ||760

गदिया में कछु हौत हैं, जिनखौं कयैं लकीर | 
लोग  बाग यह सौचते  ,यह कहती  तकदीर || 761

भाग्य जगत जब आन कै , गदिया खूब  खुजात | 
लोग बाग तब   कात  है , पइसा     दौरत  आत || 762
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चिलकत  है  आकाश  में ,   तारौं के  सँग  चंद  |
बैसइ   है   साहित्य   में ,    न्यारौ   दोहा   छंद || 763

चिलकत    है   ईमान  भी , कौउ  ढाँक‌  ना  पात | 
चार  जनन  के   बीच   में , मौ    खौं  नईं  दुकात || 764

कत ‌सुभाष चिलकत रयै  , जो भी    करबैं  काम | 
सदा    सहायी     हौ  इतै ,  सबखौं    ईसुर   ‌राम || 765

प्रेम भाव    लामौ     रयै   , कभउँ   न  टूटै  डोर  | 
मनसा यह चिलकत रयै , होय    सुहानी    भोर || 766

चिलकत  लज्जा  भी रयै , नारी  की  भरपूर  | 
सबरी  जुरी  समाज  में    इज्जत ना  हौ दूर  || 767

चिलकत   जग  में दोसती , जिनकी पक्की होय | 
मतलब की   जो   राखतइ , उनकी   बैठी   रोय   || 768

चिलकत चंदा आसमाँ  , ज्यौं   कौ चाँदी थार |
तारे  संगै   साथ   दें   ,  ऊकै   बनकैं   ‌‌ यार || 769

एक शृंगार दोहा - 
गौरी चिलकत लग रयी  , मटकत  घर खौ जात | 
अटकत है जब गैल में ,   खटकत मन खौं भात || 770
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ठूँसा  लग रय देश  खौ , माँ भारत  हैरान |
खाकैं  रसगुल्ला इतै , गा रय पाकिस्तान || 771

आगें  पुटया  के   इतै ,   पाछै   ठूँसा   देत | 
यह नेतन की जात है , कारौ करत   सुपेत ||772

ठूँसा  खाकै  हम   हँसै , रत   ऐसै   लाचार |
माइ  बाप  नेता   बनै ,  कैलातइ  सरकार || 773

जनता  ठूँसा  फुस्स है ,  सरकारी   मजबूत | 
कत सुभाष मुड़िया  घलै ,पर जातइ है कूत ||774

ठूँसा दव हनुमान नें , रावन हो  गव चित्त | 
सौचै  राखैं राम है , बलशाली जौ   मित्त ||775

बातन  कै ठूँसा   चलै , अविश्वास   प्रस्ताव | 
संसद  में  औदौ गिरौ , पर अच्छा था भाव || 776

ठूसाँ  ठाँसी मत करौ ,   परिवारन  कौ  वाद | 
साजौ साबित खुद करौ , फिर फैलाऔ नाद ||777
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पेड़ न खातइ फल इतै , और न   सूँगत फूल | 
ग्यानी कत कानात है , जल रत नदिया़ँ कूल || 778

कै गय है कानात खौं  , हमरै   पुरखा   सोच |
हाँड़ी  चढ़ै न काठ की , चूलौ  लैत  न  लोच‌ ||779

लुड़कौ भव भी  रायतौ  , नईं   समेटत   कौउ |
मिरचन   की  कानात   है , आँखें   रौबें   दोउ || 780

बेर- बेर ससुराल की , अच्छी कइ कानात | 
हलुआ पूरी छौड़ कै , खाबै   मिलबें  भात ||781

मीठा  रक्खौ हौ जितै  सब कातइ  कानात | 
गुर की परिया देख कै , चुखरा चीटा  आत || 782

लालच   में   परियौ  नहीं , नौनीं    है  कानात  | 
लपकी दाँड़ै है जितै , इक गिन  ठुककैं  आत  ||783

कुआँ  कभउँ ना पूछतइ  , पनिहारिन की जात |
बरसा  सबखौं  हौत  है , नींचट  कयँ   कानात || 784
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दया धरम पैचान लौ ,  संगै    विनय  विवेक |
करौ  गरीबन  कौ भलौ ,  रखौ  इरादौ  नेक || 785

जिनकी  ना  पैचान है  , नइयाँ   खाबै डौल  | 
नेता  उनै  चुनाव   में   , दैं    दारू  सै तौल  || 786

जिनकै  गुन पैचान में  ,  लगबैं  सज्जन संत |
ऊखौ  जानो   देवता , जग खौं हौय  महन्त || 787

जीकी  यह पैचान  है  , ई    लौ  है   ईमान |
ऊकी रक्षा  है  करत , खुद  आकैं  भगवान || 788

नौनीं  हौ   पैचान तौ   , खिलैं  करम से  फूल | 
बिपदा कितनउँ  भी परै , चुभैं कभउँ ना शूल || 789

सखा दिलइ से साथ हौं  , पास  रयै  या दूर | 
कत सुभाष  पैचान  लौ , है   बै  हीरा   नूर || 790

राहगीर पैचान  कर , बैना   कत  है   बोल |
भैया से कै दीजियौ , सावन  आबै   कोल || 791
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दो गज   रानै दूर   है , ठाड़ै    जितै  उजड्ड  |
नईं    खुद्गरौ  रौपनें ,  करबैं  सब  गडबड्ड ||792

ईसुर समझा हार जैं , खुलै न  उनकै    पेंच |
हौ  उजड्ड तौ  देख लौ , मिलै खुपड़िया रेंच || 793

कछु देखे  हमने  पढ़े ,    हौतइ   भौत उजड्ड  |
अकल अजीरन पालकैं  , खौदत रत है खड्ड  || 794

जब उजड्ड से बीदतइ , आकैं    लम्मरदार  | 
लठ्ठम   लठ्ठा   हौत  है ,न्याव  हौत दमदार || 795

उरजौ  नईं उजड्ड  से , बड़े  सयाने  कात | 
बगरा दै जै  दार  खौ ,   पसरा  दैबै  भात ||796

आड़ौ  ठाड़ौ  घूमतइ  , लरबै  फिरत उजड्ड | 
बिना सींग को ढौर बन ,काड़ै रत   है   ठुड्ड || 797

अक्कल खौ गानैं  धरैं , लरबै     ठाडौं  रात | 
नइँ उजड्ड से बीदियौ , ग्यानी जन सब कात || 798
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है  धिंगानों   औइ  घर ,  जितै  न   रातइ  नेह | 
किलकिल हौतइ रात दिन, नरक बनौ रत गेह || 799

है  धिंगानों  देश   में ,   जनता  टौरें   खात | 
मरका बैला  सै लरैं  , यह नेतन की  जात || 800

अब धिंगानों  देश  में  , मचौ   रात  दिन  रात  | 
भारत की इज्जत धुबै  , यह सुभाष अब कात  || 801

जगन   तगन  हम  देखतइ , है  धिंगानों   रोज | 
लोग बाग भी ल्यात है , नय - नय  मुद्दा  खोज || 802

खाकै रुपया गय पचा ,  हतै  जौन  सरपंच | 
अब धिंगानों जाँच कौ  , घपला है  सौ टंच ||803

अब धिंगानों है मचत  , परत नहीं  सड़ स्वाद | 
बगरत  कितनौ   रायतौ , कौ  काबै    तादाद ||804

धन धिंगानों देख लव , फूटें    मुड़ियाँ    खूब | 
भाई   से   भाई   लरै  , लाज शरम  गइँ डूब ||805


बस इत्ती-सी कानियाँ , मसकत भारी बात | 
छुकला धर कै  धान कै , बाँट   रयै खैरात || 806

जिनकै मौं पै कै धरौ , इत्ती - सी सच बात |
तकुआ टेड़ौ बौ करत , अपने  गाल फुलात || 807

जौ इत्ती-सी बात खौं  , लेतइ  दिल में तान | 
लरबै  सूदै  बें  रयै   , दैत   फिरत  है  प्रान || 808

इत्ती- सी जब काटतइ , हम कौनउँ की बात | 
गटा फार बौ देखतइ , जैसे  हमखौं    खात || 809

हम बस इत्ती- सी कयैं , विनतुआइ  सुन लैव |
लबरयाइ  अब छौड़ कै  , साँसी  सबसें  कैव || 810

इत्ती-सी   राई   हती , बइ   बगरा  दइ  पौर | 
कौ जानत है बीन कै , डरी कौन कित ठौर || 811

एक हल्का हास्य - 

इत्ती- सी चुटयाइ थी , गुर   की  परिया  देख | 
लिख लवँ कक्का साव ने , बइ खाते में लेख ||812
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कूका  कीकौ कौ  सुनै , बुचा लयै  है   कान  |
जानबूझ  बैरा   बनै , बचै   राँय  अब   प्रान  ||813

कान    हमारे बुच गयै , नेता   कूका   देत | 
वोटन खौ मौं फार कै‌,   पाँव पकर है‌ ‌लेत || 814

कक्कौ भी कूका दयै , घर  खौं  मुड़ी  उठाँय  | 
जौन   हिरानी चीज है , ऊखौ   नईं    बताँय  || 815

कूका दे रव मरगटा , फिर भी  चड़ी उमंग  |
डुकरा थ्रेटर  में  गयौ , गई   डुकरिया संग ||816

कूका दे रवँ  मरगटा , फिर भी राखैं  शौंक |
डुकरा बैठौ खाट पै , रवँ सिगरिट खौं धौंक || 817

कौन कितै कैसौ  करत  , कौन कितै कब जात  |
कक्कौ कूका  दै रयीं , कक्का   काँख  कुकात || 818
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नाती     छाती   पै  चढ़ै ,    चैंथी  लैत   बिठार | 
कत 'सुभाष' अच्छौ लगत , अपनौ घर परिवार || 819

काम बिगर जब जात है , चैंथी  सबइ   कुकात | 
सौचत मुड़िया  में  उतै , कितै  चूक   गवँ   हात ||820

चैंथी  सदा  बचाइयौ ,   लोग   करत  है  घात | 
बार   बनै‌  उलटै   छुरा  ,   देकैं     गैरी   मात || 821

तनक छूट दो तब चढ़ैं ,  चैंथी  पर   ही  लोग | 
कत सुभाष दइयौ नईं  , यैसन   खौं  संजोग  || 822

अपनी  चैंथी  पै सदा , लै   लइयौ   बै  भार | 
जीमैं   भारत देश  हो ,   संगै   घर   परिवार || 823

जिनकी  मुड़िया घुर गई , बचै  दाँत ना बार | 
अबगुन चैंथी  ना चढ़ै , भजन करैं  घर द्वार || 824

चैंथी  पै  आँखें  लगा , कायै   भइया  जात | 
औधै  मौं  नैचै  गिरत , सबरै  चड़ी  बिदात || 825
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अंगद ने दे दवँ टिया , आ रय है प्रभु  राम | 
रावन   तौखौं  मारकै , इतइँ करें  विश्राम || 826

टिया  धरै  नेता   सदा ,  काम  करै  हर  हाल |
सकलैं नईं दिखात हैं ,  गुजर जात कइ साल || 827

टिया ठिकाने कौ  धरौ , जौ   पूरौ   हौ जाय |
जब  बिगार-सी टार दौ , कछू हात ना आय‌ ||828

एक साल के धर टिया , जीतत   खूब   चुनाव | 
पाँच साल में आत फिर , लैकैं नय - नय भाव ||829

नइँ टीका अब चूक रवँ , गयै टिया सब भूल | 
गप्पै   मारत   बैठकै , फैकत   सब पै   धूल || 830

टिया न टारौ साँवरें , आऔ   जमुना    तीर | 
राधा  भुँज रइ बूँट-सी , झिरत  नैन से पीर || 831

एक हास्य 
टिया टोरकै आ गयै , साजन अब  ससुराल | 
मोइ मताई पूछतइ ,    जौ का  मचौ बवाल || 832
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ठाँड़े़  बैठे  जै   निपुर ,  समय   उतै   तत्काल || 833

अब तो साँसउँ   बीदगइ ,    ठाँड़़े   बैठे  गट्ट |
कइती मिलना  रात खौं  , पर बै आ गय चट्ट ||834

ठाँड़े  बैठे    है लरत   , लोग   करत बतकाव |
उरजट्टौ  भी  लेत  है  , अपनौ   देखत   दाव || 835

ठाँड़ो   बैठे  बानियाँ ,   नाँय   माँय   धर बाँट | 
अपनौ समय गुजारतइ , फटकारत सब टाँट ||836

ठाँड़े  बैठें  पर लिखै ,   दोहा कुल  है  पाँच  | 
पतौ नईं  कितनी लिखी , हमने इनमें साँच ||837

भिनकत भइ ऐजक  बिदत , ठाँड़े़   बैठे  आन |
जब लबरा  से   कै   धरौ ,  साँसी दइयौ ब्यान ||838
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हो हौ हल्ला  हौत है , आ गय मुड़ी चुनाँव |
चमचा चिपकै गौंच से, लगा रयै   है दाँव ||839

चढ़ै चना  के झाड़ पै , प्रत्याशी चिल्लात | 
लगुयारै   संगै   लगै ,  हूँका  दैतइ  जात || 840

सबइ जगाँ पै देख लो , मुलकन दावेदार |
बनै विधायक जीत कै , राखै मनइँ विचार ||841

नेता  से चर्चा  करी   , आन  बिदी    है  गट्ट |
कइती मिल लै रात खौं  , पर बै आ गय चट्ट ||842

डंडा झंडा गाड़‌ कै ,  कछु अब   करत  प्रचार | 
पाँव परत भी जात है , मिलत जौन जिन द्वार ||843

जिनकी शिक्षा शून्य है , बैं कत करैं  विकास |
काल उज्जडा   जौ हतै , नैं कैं  करैं   सु भाष || 844
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तरी अपुन की ना  खुलै , करियौ   ऐसे   काम |
जिनकी खुलतइ  झट्ट से , बें हौतइ    बदनाम || 845

मठा तरी कौ  हो जितै ,   दैतइ   नौनों   स्वाद  |
यैसइ हौबे   ज्ञान तौ , रयै   जनम   भर  याद ||846

फिरबैं  लैबें   जौ   तरी ,    ऊकी   पैलउँ   लैव |
कत सुभाष फिर भी उयै , अपनी तनक न दैव || 847

लबरा लम्पट लालची  , से  भैरौ  पर   जाय |
तरी उतारौ  औइ  की , बौ भी समझ न पाय ||848

साजौ पानी  देख कै    , भैस जाय जब लोर  |
तरी लगौ   कीचड़ उठै , खचा मचै चहुँ ओर || 849

दूजौ  की  मिलबै  तरी ,  अपनी   तरी  उतार |
हाथ जौर लो  तब  उतै , मिलबौ   है   बेकार || 850

बजनी  हौबें  चीज  तौ , पौच तरी तक जात  | 
भीतर पौली जब  रयै ,   कंडी- सी   उतरात ||851
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श्राद्ध पक्ष कागौर का  , लैव    समझ  गूणार्थ  |
जीव चराचर प्रिय सकल, कत "सुभाष" भावार्थ  ||852

पुरखा कउवाँ वेश धर ,  घर  की  छत मड़राँय |
आशिष दैं  कागौर चख , फिर ऊपर उड़ जाँय ||853

पुरखन  खौं  डंडौत    दैं   , भेंट  करत  कागौर |
आशीषें  माँगत  सबइ  ,  तकियौ घर की और ||854

वरनन ऐसौ  है  सुनत  , पुरखा धरती   आँय |
काग वेश कागौर चख , तृप्त होत भय  जाँय ||855

पुरखन खौं भी प्रेम रत , आत काग कै वेश | 
खाकै वह कागौर खौ , उड़   जाबैं    परदेश ||856 

इतै  नईं  कागौर   है , पुरखन खौं  उल्लास |
बै तौ बस  चाहत यही ,   बनौ  रयै  विश्वास || 857
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चार चरण दोहा दिखें , कथ्य   न   बिर्रा  होत |
रखतइ  ऊमै तथ्य  हैं , जला कलम से  जोत || 858

बिर्रा  बातें   ना  करौ ,   कैदौ    भइ़या    साफ | 
निज गलती स्वीकार लो, उनकी कर  दो माफ ||859

बिर्रा  हौबें  नाज  तौ , करौ   पीस  के येक  | 
पर जब  हौबें  चार मत ,  छाँटौ  ऊमै  नेक || 860

बिर्रा  रोटी    जब   बनै , अलग  रात    है स्वाद | 
जब विचार मिल एक हौ , बनत   नेक बुनियाद ||861

बिर्रा  से  हिलमिल   रयैं , जी घर के सब लोग |
कत *सुभाष* उनके घरै ,   रातइ  दूर  कुयोग || 862

खिचड़ी बिर्रा नाज है , चावल दाल  सुजान | 
बीमारी में  पथ्य भी  ,   समझत  है  इंसान  || 863
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ठगिया हैं  चारौं तरफ , घूमत हैं  दिन   रात | 
पतौ न कौनउँ खौं परत , ऐसी करतइ घात ||864

ठगिया अब चमचा बने,  नेतन के सँग रात | 
हेरा  फेरी  सब  करै , लेकिन नईं  दिखात || 865

नेता जी  भी बन गयै , अब  ठगिया के बाप |
सबइ दिशा सें खात हैं ,नहीं  पकर पौ आप || 866

ठगिया  चिना न अब  परै , पतौ नहीं चल पात | 
फैलातइ  है    रायतौ ,   पसरा    दैतइ    ‌भात || 867

अब ठगिया खौ चीनबौं ,  नहीं रऔ आसान |
ताम   झाम   ऐसौ   करैं , छुपी  रात पैचान || 868

हम सब ठगिया भक्त है , प्रभु   दरसन खौं जात | 
धेला एक  चढ़ाय कै ,  लाखन  सुक्ख    मँगात || 869

ठगिया   नेता  देश    में  ,  टाँड़ी   से  उतरात | 
चूहन  जैसी हरकतै  , बजट  कुतर कै खात ||870
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बीद गरे गौं अब गई , अच्छी  फँस  रइ   गट्ट | 
कइती मिलहैं काल हम , पर बै  आ गवँ चट्ट ||871

सास गरे गौं   पर  गई , कात  पावनै  आव |
सारौ  रड़ुआँ  घूम रवँ , ऊकौ  ब्याव कराव || 872

नेता    ठाँडै   बाँयरै , परै   गरे  गौं    आन | 
वोटन के लाने फिरत , दयँ गदिया पै प्रान || 873

उनै  गरे गौं बीदतइ , जौ फाँकत  दिन रात |
पंच टिपातइ काम खौं, कत है करौ उलात ||874

नहीं गरे गौं पालियौ  , जीकौ मिले न माँप | 
मंतर बिच्छू सीखकैं  , नईं पकरियौ  साँप || 875
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सुखिया दुखिया है जगत, चका लगै   दिन-रात | 
टूँका  तिसना  लोभ   कै ,सबखौं    देतइ   घात || 876

टूँका  हौजे   ओइ  कै , जौ ‌ सामें    इठलाय  |
लम्पा से  जौ  यैंड़ कैं ,  भारत   से  टकराय ||877

ऊपर  बारौ   यैक ही  , सबइँ  जनै है  अंश |
पर धरती   पै काय‌ है ,   टूँका  करकै  वंश || ? 878

लोग लुगाई  जातियाँ   , मानवता   है   धर्म |
फिर टूँका में क्यों  बँटे , समझ न आबें मर्म ||?879

बारिश   पानू   यैक है , सबइँ जनन खौं  याद  |
जिस  टूँका में वह   गिरै ,बनत ओइ को स्वाद ||880

भूमि -बीज कौ  है   मिलन, जीमें  रत विस्तार |
पर   टूँका  में  यह दिखत , जो ठगिया  संसार || 881

धरती- अम्बर हौत है , गोल   कात   भूगोल  |
टूँका में  बादल रयैं   , लय  पानी  अनमोल ||882
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उल्टौ देखत हाल अब  ,कर रवँ भजन सियार | 
बिल्ली करै    पुआस है , छिरिया लय तलवार ||883

उल्टौ सूदौ हौ रऔ , कौन  कात  जा बात | 
घी में घुइयाँ फिट रईं , चर्चा चलै   चिमात || 884

राजनीति में    खप गयै , जीकौ  उल्टौ हाल | 
लाते है कप चाय में   , सुबह शाम  भूचाल ||885

कभउँ न सूदी कात बै , उल्टौ कत  बतकाव |
चार जनै जब टौक दें , पकर  जात  है  ताव || 886

उल्टौ फट्टा  बिछ गऔ  , अब   पाछै पछतात |
बनै  लड़ैया    घूमतइ ,  हुआ -हुआ चिचयात ||887

उल्टौ    मंतर  जब  पढ़ै , तब  बै  सूदै   हौत | 
ऐसे  टिडुआ  आदमी , है  गलियन में  भौत ||888
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अँदरन  की संगत करौ , गिरत खाइ में फच्च |
फिर इलाज की झेलतइ ,     ठाँड़े  बैठै  दच्च || 889

मित्र समझ दै दवँ  उयै , आदौ   माल   उधार | 
लग‌ गइ अच्छी दच्च है , बौ नइँ सुनत पुकार  ||890

अच्छी  दैतइ   दच्च है ,    आकै    ‌रिश्तेदार |
खातइ हूकाँ की लुचइँ , लै   टीका‌‌   उपहार ||891

मिलतइ ठाँड़ी दच्च  है  ,बिगरैं  भी कछु  काम |
समरत है  फिर देर  से , कत सुभाष अविराम || 892

लगबै अच्छी दच्च जब , तबइँ  समझ में आत |
वरना इक्कर सब चलत , नब्दा   पैलत  जात || 893

बजरंगी   ने  दच्च   दै   , लंका  दई   जलाय | 
रावन बैठौ  हींड़ गवँ  , अपनी  मुड़ी  खुजाय || 894

लबरा लम्पट लालची ,  चमचा  आबै  दोर |
दच्च इनइँ से है लगत,  चिपकै  संगै  चोर ||895
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मइया पूजैं लै कलश , दै    चरनन में ढार  | 
और चढ़ा अठबाइयाँ , माने खुशी अपार ||896

मइया  पूजैं  सब  यहाँ , चुनरी लाल चढ़ात |
जय माता दी बोलकर , सबकै मन हरसात || 897

मइया पूजै भाव सै, करबै  मन से  ध्यान | 
माँगत हैं  उनसै सदा, चरनन  में  इस्थान || 898

नवदुर्गा    त्यौहार  है , मइया    पूजैं     लोग | 
विनय करै  सब  नारियाँ , घर भर रयै निरोग || 899

मइया पूजैं  कर युगल , विनती करै ‌सुभाष |
अँदयारौ  सब दूरकर , भर दो हृदय प्रकाश || 900
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न्योरे  कभउँ न तुम करौ , हौबें    साजौ   काम | 
करियौ    डंका  चौट   पै , भली   करेगें    राम ||901

मंदिर जब भी जित मिलै , न्योरें चलियौ आप  | 
दरसन खौं चूकौ नईं ,  सुनियौ भजन  अलाप || 902

अफसर  न्योरे दैख कै‌, थोरी   दया‌‌    दिखात | 
हलकौ पतरौ काम बै , मुस्की  दै   कर  जात ||903

भड़या  पकरत  है  पुलिस , दै डंडा  से  मार |
न्योरे  भय चिल्लात बै  , करतइ माइ  पुकार  || 904

गुनिया बनिया जब मिलैं , न्योरे कर लौ बात |
बखत परै पै जै  कभउँ   , दैबैं  काम  सटात || 905
 
न्योरे  चोरी  ऊँट की , कभउँ  कितउँ ना होत |
जीकौ  पेट  पिरात है , बौ    डिड़या  कै  रोत ||906
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बात  सबइ से   कात  है  , ले  लौ  भैया    सीख | 
दोवारा   गलती   नईं  ,  कहत   डाँड़  की  चीख ||907

डाँड़  उनइँ   कौ हौत है , नियम  तौड़तइ   जौन | 
न्याय कभउँ ना   देखतइ ,   सामै    ठाड़ौ  कौन ||908

डाँड़ लगै  सै   छूट गय   , है    साबुत   अपराध | 
सीख अगर तुम लै सकौ , कभउँ न आबै व्याद || 909

डाँड़    लगै   पै  जानियौ ,  लोग  हौत  बदनाम | 
बैसरमी  जिनखौ  लदी , करै न ढँग कै   काम || 910

लाख    रुपै़या  डाँड़  हौ , या   हो एक छिदाम | 
अपराधी कौ दाग लै , रत  " सुभाष"  बदनाम || 911

मूसर   जैसी  है अकल ,   करतइ  रयै   गुनाह | 
डाँ‌ड़ लगत सौ है भरत , फिर भी करत न आह || 912
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चार ठौल पइसा जुरै , नब्दा पैलत लोग | 
जैसे बनै कुबैर हौ , लयै  स्वर्ग को भोग ||913

नेतन कै चमचा दिखै , यैठत अपनी मूँछ | 
नब्दा गाँठत भीड़ पै , फटकारत  है पूँछ || 914

नब्दा  उनकौ गवँ निपुर , काढ़न  लागै  दाँत | 
चार जनन ने पेट की ,  परख लई जब आँत ||915

नब्दा उनके  है चलत , करत  रात जौ  दान |
चार  जनै भी पूछतइ , और  करत  सम्मान || 916

सूखौ नब्दा ना चलै ,  और  चलै ना   यैड़‌  |
भर पंचायत सब जनै , दैखत आँखें  कैड़ ||917
कैड़ = कैड़बाई (तिरछी  आँखन देखना 

जब-जब नब्दा पैलतइ , आकै पाकिस्तान | 
हरदम   खातइ लात है , बनतइ    बेईमान || 918
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लरका नटवा जान कै , सबइ  दैत   हैं छोड़ | 
दमदोरौ कर लैन दौ , कभउँ  पकर लै मोड़ ||919

उछल कूँद नटवा करै , जब तक डरै न नाथ | 
या फिर डेंगुर डार कै , कर   लैं अपनै साथ || 920

रासा में नटवा   चलै , सीख   लैत  है  भौत | 
खेतन कै हल में निबै , करत रात  है  जौत ||921

नटवा  खौं सब प्रेम सै , दैत  भौत  पुचकार | 
ऊसै  काम  निकारबै  , करत रात  है  प्यार ||922

नटवा  अपने सींग खौ , मानत  है  हथियार | 
छरिया कीचड़ में घुसा , खेलत करत बहार || 923

नटवा   हमसै  कात   ती , मौरी ‌नानी  खूब  |
कत ती खाबै में कभउँ , करनै नइयाँ  ऊब || 924
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रात अमावस कारतिक , हौत  दिया त्यौहार।
पूजै  घर में लच्छमी,  करतइ सब उजियार।।925 

मात्  लच्छमी की सुनै  , ई धरती  पै  आत | 
साफ सफाई वह  तकै ,  दीवाली  की  रात  ||826

विनतुआइ  माँ लच्छमी , सबकी   राखौ लाज |
चलीं आइयौं तुम उतै  , जितै हौय शुभ काज || 927
 
दूध   दही   पइसा   रयै  ,और  सुखी  औलाद | 
कृपा करैं सब  लच्छमी , सबकी  है  फरियाद || 928

सब चाउत है लच्छमी ,    घर में  भरैं  प्रकाश |
पाप कटै मन के सबइ  , तम कौ करैं  विनाश ||929

बउँ  बिटियाँ सब लच्छमी , घर की हैं  कैलात || 
इनकौ  रखतइ मान  जौ , घी  चुपरी बौ  खात || 930
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दीवाली के मौनिया  , निकरत परमा जान |
घूमत   बारह गाँव में,  पूजत शुभ इस्थान || 931

डड़ा खेलतइ मौनिया,  मौर  पंख  खौ  धार | 
ढुलक नगड़ियाँ पै नचत, गात भजन मनुहार || 931

गलगलियाँ  भी   है  बँदी, रंगे   बिरंगे   हार |
देखत है सब मौनिया , अपनी  नजर पसार  ||932

घेरा में नाचत सबइँ ,    बजै  नगड़िया  ताल |
ढुलक मजीरा मौनिया  ,दिखबै नाच कमाल ||933

मौन रात सब लोग है , लगत  मौनिया  नेक |
कला नृत्य में है निपुण  , मिलत एक से एक || 934
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दाँद चुनावी थी मची  , मिलौ न हमखौ  चैन |
इतै  उतै  भागत  फिरै , उनसै  अपनी  कैन  ||935

उनकी बउँ धन की सुनत , भौत मचा  रइ  दाँद |
पिटिया   चापैं  है  भगत ,  घर  को   दोरौ फाँद || 936

ठलुआ ठेंगा जुर  गयै , दाँद  मचा रय गाँव | 
गैलारै ‌  हैरान   है , बैठ   न   पाँवत   छाँव || 937

पंचायत  जब  हौत है ,  भौत  मचत रत   दाँद | 
लोग सुनत ना काउँ की , अपनी -अपनी  धाँद || 938

दाँद  मचाबौं  है गलत ,     बूड़ै  बुजरक   कात |
निकरत नइयाँ सार कुछ , मठा‌ लुड़क भी जात  ||939

दाँद मचा रय कछु जनै , अच्छौ  भयौ चुनाव | 
वोट न मौरे कयँ दयै ,  खूब   पकर  रय ताव ||940
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उनखौं  ब्याड़े जान दो , नइँ हौ बसकी बात |
पाँव फँसा  लूलै बनैं   , करियौ नईं  उलात ||941

ऊखौ ब्याड़े जान दो , जौन न आबै काम |
बनतइ मूसर चंद है , लुटैं खुटी  के   दाम ||942

भैया  ब्याड़े जान दो ,   लगै  मुड़ी   पै दाग |
खेचाँ तानी की जितै  , झरझरात   हौ आग ||943

उसकौ  ब्याड़े जान दो , भलै मिलत हौ दाम |
हाथ लगातइ ही  जितै , ऊसइ  हौं  बदनाम ||944

भइया  ब्याड़े    जान दो , मानौ   मौरी  बात |
लबरन की संगत जितै, मिलत उतै हौ  मात  |945

ब्याड़े  में   संगत  गई ,   रानै    सबखौ  दूर |
किलकिल मचबै खेंच कें ,उचकत हौं लंगूर ||946

टाँय‌- टाँय‌-सी फिस्स हौ , मंतर जब बतलाँय |
ब्याड़े में  हम तुम   फिरै , गुथै   गौजना  राँय‌ ||947

ब्याड़े में हम  बिद  गये , अच्छे  बनै गवाह |
दिन भर पेशी है करत ,जियरा उठत कराह ||948

ब्याड़े में  पंगत   गई , जाने   नइयाँ    मोय |
गुली तेल लडुवाँ जितै , खाकै कौ  अब रोय‌ ||949

जौरू कहती  आन कै  , ब्याड़े में   गइ  बात |
हम तुम रइयौ प्रेम से , बनकै अब  सौगात ||950

जौन लड़ाई  हौ गई , ब्याड़े   में   दो  टार |
धना कात   हँसकै   उतै , नईं  मचाने रार ||951
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ब्रम्हा बिस्नु   महेश है , तीन  लोक   करतार | 
इनकी लीला सब जगाँ , करतइ  लोग निहार ||952

सृष्टि रचियता सब कयै  , पर   ब्रम्हा   औतार |
विस्नु टुड़ी  का शुभ कमल , उनका है  आधार || 953

ब्रम्हा की   बेटी कहत , सुनौ   शारदा   नाम |
चलती   वाहन  हंस पै  , हातन  वीणा  थाम  || 954

ब्रम्हा कौ मंदिर   बनौ ,  पुष्कर   आलीशान  |
अद्भुत लीला है  इतै  , सुनतइ  सबइ बखान  ||955

कात पितामह सब जनै , चतुरानन  लोकेश |
टुड़ी  जन्म औतार कत  , पूजै    ब्रम्हा वेश || 956
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देवराज   जू  नाम    कै ,    हैगें    इंद्र   प्रधान |
सुरगन के सुख भोगतइ , सब कत इनै महान ||957

ठाय  - ठाय  तैतीस है , इंद्र  मिला  उल्लेख |
अलग बँटै  सब काम है ,सबकी अपनी रेख  || 958

वरुण अग्नि जल सूर्य  है , यह सब हौतइ इंद्र | 
मंगल इंद्रन में गिनौ , और  गिनौ    शुभ‌  चंद्र ‌|| 959

इंद्र लोक की है सुनत  , रयै  सुखौ की खान |
नृत्य और  संगीत  की‌,  चलै  वहाँ   पै  तान ||960

सिंहासन  चिंता  करैं ,    देवराज  मह  इंद्र |
भेजे  विश्वामित्र   तक , अपने छल के छंद || 960

सबइ इंद्र रत मस्त हैं  , जब  बीदत है गट्ट |
आबैं  ब्रम्हा विस्नु सँग ,  महादेव लौ झट्ट || 961
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शंकर भोले कात सब , जिनकौ मन है साफ |
हाथ जौर जौ  पौंच जै , कर दैं ऊखौं   माफ || 962

खाल  लपेटें  बाघ  की ,  धरै   मुड़ी  पै  गंग |
चढ़ो   चंद्र   मुस्कात है ,  भोले  के बौ  अंग ||963

बम-बम भोले कात सब  , छानत रत सब  भंग ||
भोला शंकर   नाम सुन  , मन   में  उठत  उमंग ||964

उमा  पार्वती  अरु  सती ,    गौरारानी   नाम |
भोले के सँग नाम लौ , बनत  सबइ  है काम  || 965

रातइ   हैं  कैलास पै , नौनों   है ‌   यह  धाम | 
करैं  सवारी  नादिया , भोला   जिनकौ  नाम || 966

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दोहे विषय - बैठका 

घर  में  बनतइ   बैठका, सजौ   बनौ  बौ  रात  |  
खा पी कै सब बैठतइ  , फिर सब अपनी कात || 967

बैसे   घर - घर  बैठका ,  सबकै   अपने  रात | 
पर मुखियन को गाँव में  , बड्डौ  तनक दिखात   ||968

जितै  बैठका  है बनत  , गद्दा  तखत  बिछात  | 
हुक्का पानी सब रखत  , पान- सुपाड़ी   रात || 969

चार  जनै  या  पावनै , घर   में  जाँय  पधार | 
खुल जातइ है बैठका , हौन लगत सतकार || 970

लिपौ पुतौ रय बैठका , हौत  बैठ   बतकाव | 
हौतइ घर की शान है , सबखौं   दै   ठहराव ||971

तखत  लगै  कुरसीं डरीं, सौफा लगत दबंग  |
हुक्का  रख्खौ बैठका , लोंग लायची  संग || 972

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चीं चीं चिल्ला चोट हौ ,चींख चिकड़‌ हौ बात | 
चतुराई  सब छाँटबैं,  तकियौ सबइँ  चिमात  ||973

का का कौ कौ कै रयौ , परै नईं सड़ स्वाद | 
कत सुभाष कित्तउँ करौ , पानू भरै न  नाद ||974

दाँत निपौरे  जौ फिरै , अपनै मौं खौं फाड़ | 
गुर कौ हँसिया बौ बनै , किंच लगै ना दाड़ ||975

धूरा आँखन में पिड़ै , गटा  हौत  है  लाल |
बगदूरै‌‌  में जौ घुसै  , ठौकत  फिरबै  ताल  || 976

गय‌तै   अमियाँ  टौरबै , चढ़    न  पायै  पेड़ | 
फेकों पथरा सिर गिरौ , उतइँ पसर गइ ऐड़ || 977

पाछै ‌  से  हूँदा ‌  घलैं , आगै  न्यौरें   जात |
मैला - ठैला घूम कै , पाँव    पिरातइ  रात ||978

चाल चलौ यैसी चलौ , चलबौ   दैबै  सार |
चल्लौसन चखबै मिलै , उतै बात दौ टार ||979

मुड़िया उतै  कुकात रय  ,  समझ न पायै काज |
जितै  बैशरम पी मठा , छौड़  आय सब   लाज || 980

 विशेष - पहले चरण में यदि 🖕
उतै मुड़ी कुका+त रयै , लिखते तब ×× होता , क्योंकि आठवी नौवी मात्रा संयुक्त होती व उच्चारण में तीन त्रिकल भी बन रहे थे ,इसीलिए लय में हल्का अटकाव जाता , यह दोहे की बहुत ही बारीकी है |

सुख दुख दौनौं आत है , लयै   कलैबा  गेह |
हींसत से चिपकत गरे ,दिखलातइ  है  नेह || 981

छुटपन ज्वानी गइ हिरा , पतौ नईं चल पाँव |
बनै जुआरी हम रयै,  खूब    ‌लगायै   दाँव || 982

गुजरी बिरियाँ लौट कै , कभउँ  घरै  ना आँइ |
हाथ मलत कउँ धौत रय ,  मौं  पै  आई झाँइ || 983

गैलारौ   सूरज  रऔ , और   चंद्र  रवँ  आन | 
सबखौं  जै समझात रय , अपनौ इतै न मान || 984

साँप पूजतइ सब  जनै , अगर चित्र में हौय |
जिंदा  में  मारै कितै  , सौचत   रात  अनौय || 985

खोट करम  ना कुछ  करै , करत पाप को अंत |
भजत राम को   नाम है   , जौ  हौतइ  है  संत || 986

संतन  की चर्या  अलग ,    भुन्सारै  से  शाम |
लैकै  माला    फेरतइ , जपत  कृष्ण श्री राम || 987

फिर भी डरतइ संत है , हौय कछू  ना  पाप |
राम नाम में मस्त हौ ,    करत रहत है जाप ||988

हम दुनिया  के  लोग हैं   , करतइ मायाचार | 
पाप पुन्य कौ है करत , अच्छौ  इतै  बजार ||989

लोगन की अब का कयै , राखत नहीं उसूल |
दुनियादारी की करैं ,   बातैं   इतै    फिजूल || 990

मौं  देखत हैं चीकनो ,  फिर ऊ जैसी  कात | 
बातै  करतइ  लाबरी , दुनिया खौ   भरमात ||991

कौउ तनिक साँसी कयै , लरबै खौ आ जात |
अपनौ साजौ देखतइ ,    दूजौ‌  नहीं  पुसात || 992

गैलन  में  पथरा बिछा , खुद खौ साजौ काँय |
दूजै की  आँखें   तकैं , फुली   चट्ट  बतलाँय || 993

लोग न अपना  छौड़ते  ,  जैसौ  बनौ सुभाव | 
सूदौ     दैखे  आदमी , तुरत   पकर जै ताव || 994

सबखौं  अपनी‌‌  है परी , दूजन की नइँ बात |
अपनौ काम निकारबै , दैत सबइँ खौं  घात ||995

कै दैतइ है जौ  सरल , करबौ कठिन बताँय | 
समरत दैखत काम खौ,अपनौ कहौ सुनाँय ||996

अपनी   छैड़ी  में सबइ , लैतइ  खूब   दहाड़ | 
बिदत दूसरी जब गली , खाकै  आत  पछाड़ || 997

सेंक   लैत    कनबूजरै‌ , चुप्पी    लैतइ ‌ साध | 
जब  सयानन के बीच में ,हौ जातइ  अपराध ||998

बातै नौनीं जौ करत , फूल  झरत-से   बोल |
बौ   हेगौं  संसार  में ,  कीरत   में  अनमोल || 999

चार जनन कै  बीच  में , जब   बढ़बाई    हौय |
समझौ जीवन है सफल , तीरथ मिल गवँ मौय ||1000

दोहे   लिखे  हजार   है ,   बुंदेली   के   बोल | 
कहै बराई अब कलम , समझे  सब अनमोल ||1001

©® सुभाष सिंघई जतारा (टीतमगढ़) म०प्र०

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