https://subhashsinghai.blogspot.com/( बुक चित्र को क्लिक करें ) हिंदी छंद माला (भाग एक )
शारदे वंदना ,(उपमान छंद)
धवल वसन कमलासनी, ब्रम्हपुरी रहतीं | लिपि श्रुति माँ वागेश्वरी , वाणी शुभ कहताीं | वीणा पुस्तक धारिणी , जय शारद माता | हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
अक्षर-अक्षर ज्ञान की , तुम शुचि मम देवी | भक्ति भाव से पूजता, तेरा मैं सेवी || पुस्तक मेरी मित्र है , जो ज्ञानी दाता | हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
वेद ग्रंथ या कुछ कहो, सभी नाम माता | माँ शारद सबमें मिलें , मिलती सुख साता || आना मैया शारदा , भजन यहाँ गाता | हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
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1- चौपइया छंद [सम मात्रिक]
1- चौपइया छंद [सम मात्रिक]
{4 चरण समतुकांत,प्रति चरण 30 मात्राएँ,
प्रत्येक में 10,8,12मात्राओं पर यति
प्रथम व द्वितीय यति समतुकांत किन्तु हर तुकांत में जगण वर्जित है
प्रथम द्वितीय चरणान्त में गुरु(2),या 11 दो लघु , |
अंतिम चरणान्त में दो गुरु होने पर यह छंद अति सुंदर हो जाता है।}
जग का हर कंकर, है शिव शंकर, शंकर की सब माया |
गिरिराज हिमालय , शंकर आलय शंकर सब पर छाया ||
शंकर हितकारी ,है सुखकारी , भस्म. और मृग छाला |
जीवन का यह सच,खुद में रच पच , संकेत दिया आला ||
हे ब्रम्ह विधाता , सबके दाता , सब कुछ तेरा जाना |
कहलाते पालक , करते लायक , सबने यह पहचाना ||
हम सब जन संसारी , हैं व्यापारी आप सभी कुछ जाने |
जिसने भी चीन्हा , सब कुछ दीन्हा , यह हम सब अब.माने ||
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अब यही चौपइया छंद मुक्तक में
जग का हर कंकर , है शिव शंकर , शंकर की सब माया |
गिरिराज हिमालय , शंकर आलय , शंकर सब पर छाया |
शंकर हितकारी , है सुखकारी , भस्म स्वयं अपनाते -
जीवन का यह सच , खुद में रच पच , संकेतो को लाया ||
हे ब्रम्ह विधाता , सबके दाता , सब कुछ तेरा जाना |
कहलाते पालक , करते लायक , सबने यह पहचाना |
हम सब जन संसारी , हैं व्यापारी आप सभी कुछ जाने ~
जिसने भी चीन्हा , सब कुछ दीन्हा , जग तेरा दीवाना `
-©सुभाष सिंघई एम•ए• हिंदी साहित्य ,दर्शन शास्त्र~
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विधान- २४ मात्रा, १२-१२पर यति, सभी समकल, अंत वाचिक गा गा, ध्यातव्य है कि विषम और विषम मिल कर सम हो जाते हैं |
छंद
बस्ता बोझा माना , लगता था वह भारी |
वह बोरा अब ढोते , करते पल्लेदारी ||
बस्ता जिसने पकड़ा , पुस्तक पढ़ ली प्यारी ||
बनकर के वह ज्ञानी ,कुर्सी का अधिकारी ||
पुस्तक पढ़कर इंसा , ज्ञानी जब बन जाता |
बनता साधक सच्चा , राह सही अपनाता ||
सदाचरण के झंडे , वह जग में फहराता |
हरदम मानवता से , रखता है वह नाता ||
मिलती रहती उसको , माँ शारद की माला |
मिले ज्ञान की कुंजी , खोले हर पग ताला ||
जीत हौसला देती , मिले हार से शिक्षा |
कभी न माँगे जग में , आकर कोई भिक्षा |
सदाचरण का साथी , जीवन भर है रहता |
न्याय नीति की बातें , अपने मुख से कहता ||
पग देखे है उसके , रहे सदा ही आगे |
पक्के बनते कच्चे , उससे छूकर धागे ||
सुभाष सिंघई
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मुक्तक
धारें पुस्तक वीणा , नमो शारदे माता |
हंसवाहिनी देवी , कवि मन नवल प्रभाता |
हर अक्षर है ज्ञानी , माँ के मुख से निकले ~
नई इबारत लिखने , माता रखतीं नाता ||
आनन माँ शारद के , भरी दिव्यता मिलती |
आशीषों के बीजों से , सदा कोंपलें खिलती |
माता को जो माने , अनुकम्पा की देवी-
तब विखरे छंदों को , माँ आकर खुद सिलती |
शारद माँ जो पूजे , लिखता नई कहानी |
ज्ञान ह्रदय में धारे , बाँटे बनकर दानी ||
जग भी वंदन करके , अभिनंदन है करता ~
वेद शास्त्र भी देते , अनुकम्पा का पानी |
सुभाष सिंघई
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मुक्तक (अपनी "मुस्कराते मुक्तक " ) बुक से -
भिखारी छंद
रुख लिबास ही अब तो , यह पहचाने दुनिया ,
कहाँ उतरना दिल में अब यह जाने दुनिया ,
चले बनावट अब तो, चलन आजकल देखें ~
सत्य बोलना अच्छा , कब यह माने दुनिया |
ग्राहक ही अब बिकता , देखा बाजारों में ,
मीठी बातें मिलती , केवल मक्कारों में ,
कौन फरिश्ता सुनता , कहता बोल सुभाषा -
सत्य न्याय का याचक , झूठें दरबारों में |
सुभाष सिंघई
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भिखारी छंद , गीतिका अपदांत
सुंदर लगती छाया , मन भाए हरियाली |
ऐसा लगता सबको , बजा उठे हम ताली ||
पत्थर नहीं उठाना , फेंक न देना उनको ,
लगे जहाँ पर हँसते , पेड़ तने है आली |
पेड़ हमेशा हमको , फूल फलों को देते,
जो भी आता उनको , कभी न भेजे खाली |
पेड़ लगाना यारो , जैसा भी मौसम हो ,
पुण्य कमाना अपना , बनकर उनका माली |
पेड़ सदा उपयोगी , रोग हमारे हरते ,
कह सुभाष हितकारी , उनकी डाली- डाली |
सुभाष सिंघई
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गीतिका (भिखारी छंद)
स्वर - आता , पदांत रोगी
लालच मानव लाता , बनता जाता रोगी |
धन दौलत का पूरा , गाना गाता रोगी ||
नहीं बात को माने , लालच बुरी बला है ,
हाय-हाय परसादी , घर में लाता रोगी |
छल छंदों को पढ़ता , पूरा रटे पहाड़ा ,
पैसा बीमारी से , रखता नाता रोगी |
जनसेवा से दूरी , अपनी सदा बनाता ,
अम्बर बनता रुपया , ताने छाता रोगी |
कौन उसे समझाता , रखे कान जो बहरा ,
लालच की बस रोटी , रूखी खाता रोगी |
सुभाष सिंघई
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भिखारी छंद , गीतिका , स्वर - अर , पदांत कौन कहेगा
लाख टका है कीमत , मलकर कौन कहेगा |
सत्य धर्म की बातें , चलकर कौन कहेगा ||
मतलब अपना रखते , हाथ पाँव को जोड़ें |
अब सेवा का मेवा , तलकर कौन कहेगा ||
नमक मिर्च भी डाले घृत का होम लगाते ,
गलत हुआ वर्ताव , जलकर कौन कहेगा |
पंचायत पंचों ने , अब तो मौन लगाया ,
न्याय नीति के साँचे , ढलकर कौन कहेगा |
काँटे उगें बबूली, सींच रहे है माली ,
सत्य बीज अब बनके, फलकर कौन कहेगा |
मिलते है अब छलिया , देते रहते चोटें ,
अब सीधा ही उनको , छलकर कौन कहेगा |
बगुलों की अब टोली, भजन सुनाती सबको
जाल बिछाते जो भी , बचकर कौन कहेगा |
सुभाष सिंघई
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भिखारी_छंद (मापनीमुक्त मात्रिक)
विधान- २४ मात्रा, १२-१२पर यति, सभी समकल, अंत वाचिक
गा गा , ध्यातव्य है कि विषम और विषम मिल कर सम हो जाते हैं |
स्वर अति , पदांत न्यारी
रहे गाँव में गोरी, बातें तलती न्यारी |
चर्चा है सुंदरता , छम-छम चलती न्यारी |
चंद्र लगे मुख गोरी, नहीं सूझती उपमा ,
पलक नयन है तीखे , हर पल मलती न्यारी |
चढ़ी नाक पर नथनी , सूरज - सी है दमके ,
लगता सूरज को ही , वह अब छलती न्यारी ||
सावन -भादों बरसे , मुख पर आएँ बूँदे ,
कलम यहाँ पर लिखती, आभा ढलती न्यारी |
केश लटाएं झुककर , गालों को जब छूती ,
लगे सुमन की डाली , वन में पलती न्यारी ||
होंठ कमल दल लगते, कहता बोल सुभाषा,
सब कुछ उसका अच्छा , उसकी गलती न्यारी ||
सुभाष सिंघई
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आधार छंद- भिखारी (मापनीमुक्त मात्रिक)
गीत
चापलूस को मिलती, करने दुनियादारी | मुखड़ा
पालक को दे जाता , घर बैठे बीमारी || टेक
चापलूस के जानो , कीट जहाँ पर आते |
अच्छे - अच्छों की वह , संतोषी हर जाते ||
बीट हमेशा करते , घुमा फिराकर बातें |
आगे पीछें सबको चौकस देते घातें ||
चापलूस संगत है , अब चाहर दीवारी | पूरक
पालक को दे जाता , घर बैठे बीमारी || टेक
आडम्बर को रचता , माया को फैलाता | अंतरा
घातक उल्टे सीधे , सपनों को दिखलाता ||
नहीं आचरण उसके , किसी काम में आते |
उसकी पूरीं बातें , कचड़ा ही फैलाते ||
अजब गजब है लीला , उसकी अद्भुत न्यारी |
पालक को मिल जाती , घर बैठे बीमारी || टेक
नहीं जरुरत फिर भी , देता रहे सलाहें |
बेमतलब की सबसे , दिखलाता है चाहें ||
अपनी-अपनी फाँके, नहीं किसी को मौका |
झूँठ बिछाकर पिच पर , मारे छक्का चौका ||
कलयुग का शैतानी , जानो है अवतारी |
पालक को दे जाता , घर बैठे बीमारी || टेक
सुभाष सिंघई जतारा
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16,13 पर यति कुल 29 मात्राएं. (यह मात्रिक छंद है )
विशेष निवेदन ~चौपाई चरण का पदांत चौपाई विधान से ही करें ,
एवं दोहे के चरण का पदांत दोहा विधान से ही करें ) चौपाई के चरण में 16 मात्रा गिनाकर पदांत. रगण ( 212 ) जगण 121 , तगण 221से वर्जित है ।
यह गेय छंद है , इससे –
मूल छंद –
मुक्तक ,
गीतिका ,
गीत ,
पद काव्य
लांँगुरिया गीत
लिखे जा सकते हैं।
सोलह -तेरह मात्राओं का , न्यारा छंद प्रदीप है |
चार. चरण का प्यारा जानो , रखना बात समीप है |
विषम चरण है चौपाई सा , सम दोहा का है प्रथम ~
है सुभाष लय इसमें पूरी, विज्ञ जनों की टीप है |
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विषय- मित्र (चार चरण के दो युग्म में )
मित्र सदा मिलता रहता है , भाई खोजे यार में |
सुख दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में ||
करे सामना आलोचक से , कमी नहीं तकरार में |
सदा मित्र को अच्छा मानें , अपने नेक विचार में ||
(अब यही युग्म मुक्तक में )
मित्र सदा मिलता रहता है , भाई खोजे यार में |
सुख दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में |
करे सामना आलोचक से , तर्कों के आधार पर –
सदा मित्र को अच्छा मानें , अपने नेक विचार में |
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पुन: दो युग्म
मित्र इत्र सा जिसको मिलता , खुश जानो संसार में |
हाथ मानिए भाई जैसा , अपने घर परिवार में ||
मिले सूचना यदि संकट की , मित्र कृष्ण अवतार में |
आकर हल करने लगता है , लग जाता उपचार में ||
(अब यही युग्म मुक्तक में )
मित्र इत्र सा जिसको मिलता , खुश जानो संसार में |
हाथ मानिए भाई जैसा , अपने घर परिवार में |
मिले सूचना यदि संकट की , आए कृष्णा भेष में ~
बिना कहें हल करने लगता , लग जाता उपचार में |
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अब यही युग्म अपदांत गीतिका में ….
मित्र सदा मिलता रहता है , भाई खोजें यार में ,
सुख-दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में |
करे सामना आलोचक से , तर्को के आधार पर ,
सदा मित्र को अच्छा मानें , अपने नेक विचार में |
कभी मित्रता हो जाती है , मन से उपजी बात में ,
कृष्ण- सुदामा सुनी कहानी , दादी के सुखसार में |
सदा मित्र का साथ निभाओं , हितकारी आधार पर,
रखो बाँधकर भाई जैसा , अपने दिल के तार में |
आसमान से ऊँची दुनिया , सदा मित्र की देखिए |
मिलते ही मन खिल जाता है , सुख आता दीदार में ||
मित्र खबर पर दौड़ा आता , कृष्णा के परिवेश में |
भरी सभा में लाज बचाता , लग जाता उपचार में ||
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अब इन्हीं सभी युग्मों से गीत तैयार है….
मित्र सदा मिलता रहता है , भाई खोजे यार में | (मुखड़ा)
सुख दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में || (टेक)
मित्र इत्र सा जिसको मिलता , खुश जानो संसार में |(अंतरा)
हाथ मानिए भाई जैसा , अपने घर परिवार में ||
मिले सूचना यदि संकट की , मित्र कृष्ण अवतार में |
आकर हल करने लगता है , लग जाता उपचार में ||
करे सामना आलोचक से , कमी नहीं तकरार में |(पूरक)
सुख दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में || (टेक)
कभी मित्रता हो जाती है , मन से उपजे प्यार में |(अंतरा)
कृष्ण- सुदामा सुनी कहानी , हमने घर परिवार में |
सदा मित्र का साथ निभाओ , हितकारी आधार में |
रखो यार को भाई जैसा , अपने नेक विचार में ||
मिलते ही मन खिल जाता है , सुख आता दीदार में ||(पूरक)
सुख -दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में || (टेक)
आसमान से ऊँची दुनिया , देखी है संसार. में |(अंतरा)
भाई जैसा मित्र जहाँ है , दिल के जब दरवार में ||
सदा मित्र को रहते देखा , अपने मन आधार में |
एक जान मित्रों को कहते, दुनिया की रस धार में ||
सदा मित्र का साथ न छोड़ो, पड़ो न सुभाष खार में |(पूरक)
सुख -दुख में वह साथ निभाता, जुड़ा रहे परिवार में || (टेक)
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प्रदीप छंद आधारित पद काव्य
मतलब का संसार है |
कपटी करता मीठी बातें , खूब दिखाता प्यार है ||
हित अनहित को नहीं विचारे , करे पीठ पर वार है |
कूट- कूटकर भरी हुई है, चालाकी दमदार है ||
भाव भरे हैं जिसमें घातक , रखता सबसे खार है |
कहे ” सुभाषा ” बचकर रहना , वर्ना हर. पग हार है ||
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प्रदीप छंदाधारित लांँगुरिया गीत {पांँच अंतरा का)
(आप सबसे निवेदन हो ही चुका है कि लांँगुरिया लोक भाषा गीतों को खड़ी हिंदी में लाने का प्रयास है , टेक और -उड़ान को गायक बीच में कहीं से भी तोड़कर अलाप- क्षेपक के साथ आगे लय भर सकता है |
टेक- लांँगुरिया दीवान री |
उड़ान ~ उसका करती मान री ~ 2
अंतरा~
सुनो सजनिया गोरी कहती , नहीं समझ नादान री |
लांँगुरिया अलबेला मेरा , उसे बहुत पहचान री ||
पूरक ~ लांँगुरिया का गान री |
उड़ान ~ उसका करती मान री ~2
अंतरा~
लांँगुरिया से जब-जब मेरी , होती न्यारी बात री |
प्रेम रंग से खिल जाती है , मेरी पूरी रात री ||
पूरक ~ बतलाती मैं ज्ञान री |
उड़ान ~ उसका करती मान री || ~2
अंतरा ~
लांँगुरिया से बनते रहते , मेरे प्यारे छंद री |
हँसती रहती लांँगुरिया सँग , होंठों से मैं मंद री ||
पूरक~ लांँगुरिया है भान री |
उड़ान ~उसका करती मान री ~2
अंतरा
बातें उसकी मीठी लगती , खिल जाते है फूल री |
सुनकर शीतलता भी आती , मन. के झड़ते शूल री ||
पूरक ~ मधुरम उसका गान री |
उड़ान ~करती उसका मान री ~2
अंतरा
रहूँ देखती मैं लांँगुरिया , मन के बजते तार री |
सुनो सहेली हम दोनों में , अद्भुत रहता प्यार री ||
पूरक ~ लांँगुरिया ईमान री |
उड़ान ~करती उसका मान री ||~2
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प्रदीप छंदाधारित गीत
करें निवेदन मित्रों पहले , हिंदी छंद विधान की |
दोहा चौपाई को लेकर , लेखन के उत्थान की ||
दोहा जिनको लिखना आता , सही मापनी जानते |
जो चौपाई की गति यति भी , विधि सम्मत ही मानते ||
सभी छंद को वह लिख सकते ,यह हमको अनुमान है |
लिखते देखा श्रेष्ठ गणों को , जिनकी अब पहचान है ||
दोहा के सँग रक्षा करते , चौपाई सम्मान. की |
करें निवेदन मित्रों पहले , हिंदी छंद विधान की ||
जो अपनाकर अपवादों को , निजी सृजन को मोड़ते |
रगण जगण से यति चौपाई ,करके विधि को तोड़ते ||
सृजन भटकता देखा उनका , बनते खुद उपहास है |
मात् शारदे अनुकम्पा के , बनते कभी न खास. है ||
ध्यान कलन का जो रखते है , कलम वहाँ गुणगान की |
करें निवेदन मित्रों पहले, हिंदी छंद विधान की ||
सही तरह. से अठकल बनता , रहता छंद प्रवाह है |
दोहा लेखन सुगम बनाता , आगे दिखती राह. है ||
अठकल का चौपाई. में भी , योगदान बेजोड़ है |
हाथ जोड़कर कहे ‘सुभाषा’ ,समझा यही निचोड़ है ||
सदा सीख की चाहत रखता , पाना कृपा निधान की |
करें निवेदन मित्रों पहले , हिंदी छंद विधान की |
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प्रदीप छंद गीत
सोच जहाँ पर खो जाती है , रहे न मानव चाल. में |
मुफ्त पिलाकर आदी करते , मदिरालय. के जाल में ||
चार चरण का दोहा होता , दो मिलते है मुफ्त. में |
काम सौपते तुकमुल्ला का , कहते रहिए. रफ्त में ||
आदत गंदी डाल रहे है , देकर भाव उधार में |
चरण खोजता कवि घूमेगा ,सुबह-शाम अखवार में ||
मिलें देखने क्या- क्या नाटक,स्वांग दिखे सब ताल में |
मुफ्त. पिलाकर आदी करते , मदिरालय के जाल. में ||
चरण. बाँटते चूरण जैसा , दानवीर सरदार. है |
क्रमशा: बाँट प्रशस्ति हँसते, ऐसे भी दरबार है ||
नहीं सोचना कवि को पड़ता , मिले दान में भाव है |
काम कीजिए तुक मुल्ला का , अच्छा भला चुनाव है ||
वर्ण. शंकरी सृजन. बनाते , लावारिश की ढाल में |
मुफ्त पिलाकर आदी करते , मदिरालय के जाल. में ||
नहीं सोचना. पड़ता कवि को , रच जाता साहित्य है |
चरण मिले खैरात जहाँ पर, नहीं वहाँ लालित्य है ||
वाह- वाह जी अब क्या कहना , अच्छी पैदावार है |
पटल बनाकर ठेके पर अब , कवि करते तैयार है ||
होटल जैसे मंच बने है , तड़का देकर. दाल. में |
मुफ्त पिलाकर आदी करते, मदिरालय के जाल. में ||
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प्रदीप छंद गीतिका
हम नागों को दूध पिलाते , और बजाते बीन हैं |
मौका पड़ने पर दिखलाते , नहीं कहीं से दीन हैं ||
कवि कहता है मेरे यारो , कलम हमारे हाथ में ,
सदा सत्य की विजय चाहता, भाव वही प्राचीन हैं |
संत देश का सैनिक होता , स्वयं चेतना पुंज शुभ ,
सदा इशारों से समझाते , कहते वचन प्रवीन हैं |
कायर नहीं अहिंसा मेरी , इतना रखते भान हम ,
प्रतिरोधी हिंसा को पालें , नहीं कहीं से हीन हैं |
दया क्षमा करुणा को मानें , पालन करते हैं सदा ,
राम कृष्ण के आराधक हम ,सब उनके आधीन हैं |
हम समझाते पहले आकर , फिर करते प्रतिकार मिल
यह सुभाष आदर्श हमारे , जिससे हम स्वाधीन हैं |
राम चंद्र ने रावण मारा, कृष्ण चंद्र ने कंस को ,
अभी पाक को है निपटाया , आगे दुश्मन चीन हैं |
सुभाष सिंघई
प्रदीप छंद (16-13) (चौपाई चरण + दोहा का विषम चरण )
शब्द प्रशंसा के लिखते हैं ,हम तो इनकी शान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
दरवाजे नेता के मिलते , जैसे रहते श्वान हैं |
इनसे पहले मिलना होता , अद्भुत यह श्रीमान हैं ||
बने बिचौली करते रहते , जनता के सब काम हैं |
इन्हें पूजकर ऐसा लगता , यह तो चारों धाम हैं ||
कैसे होता काम सफल है , मंत्र फूँकते कान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
नेता जी के साथ रहें यह , चोखे यही दलाल हैं |
सदा पकड़ते यह पैसा हैं , होते माला माल हैं ||
कभी नामजद अपराधों में, थानों के सिरमौर थे |
लोग काँपते थर- थर इनसे, इनके भी कुछ दौर थे ||
बदल गया है इनका धंधा , कमी न आई शान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
चमचों की चाँदी रहती , आज किया यह गौर है |
इनका फैला जाल जहाँ पर, कहीं नहीं कमजोर है ||
कार्य प्रणाली अद्भुत इनकी, इनका अजब शुरूर है |
लोकतंत्र में स्वाद बनें है , मीठा पिंड खजूर है ||
मंत्री जी कत्था से खिलते , यह चूना हैं पान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
सुभाष सिंघई जतारा जिला टीकमगढ़ म०प्र०(बुंदेलखंड)
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🧭 गीत 🧭 🍓प्रदीप छंद (16-13)🍓
🦜 (चौपाई चरण + दोहा का विषम चरण )🦜
कैसा चलता तंत्र यहाँ पर , आग लगी ईमान में ||
सत्य सदा ही रोता रहता , देखों हिंदुस्तान में |
🦜
हाथ जोड़कर जब हम जाते , आफिस में ललकारते |
चार कमी फायल में देखें , ऐसा वहाँ निहारते ||
जेब देखते बाबू पहले , अपनी नजर पसार के |
रहें ‘ सुभाषा’ जब भी खाली , नेंग मिलें दुत्कार के ||
🧭
भोग लगाना सीखो पहले , आकर कहते कान में |
सत्य सदा ही रोता रहता , देखों हिंदुस्तान में |
🗾
गुंडे चमचे जब भी जाते , बाबू सब मनुहारते |
उन्हें बैठने कुर्सी देते ,काम सभी स्वीकारते ||
नहीं विनय की इज्जत होती, घुड़की से अपमान है |
दीन हीन अब रोता रहता , लोकतंत्र हैरान है ||
🧑🎄
जन गण के अधिनायक देखों , मस्त रहें निज गान में |
सत्य सदा ही रोता रहता , देखों हिंदुस्तान में |
👾
सैनिक बनते जाकर बेटे , अपने यहाँ किसान के |
मजदूरों के भी बनते देखे , भरे हुए ईमान के ||
जब शहीद वह हो जाते है , चार फूल तैयार हैं |
हश्र बुरा है उनके पीछें , भूखे सब परिवार हैं ||
😤
नेताओं के मौज उड़ाते , घूमें अपनी शान में |
सत्य सदा ही रोता रहता , देखों हिंदुस्तान में |
😩
सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़) म०प्र०( बुंदेलखंड) ✍️
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9- निश्चल छंद #निश्चल छंद 16- 7 पदांत गाल
सरल विधान -
(चौपाई चरण (जिसकी यति जगण छोड़कर चौकल हो )
+ चौकल (जगण छोड़कर ) +गाल / अथवा -गाल + जगण सदा देखते हम मानव की , चाल कुचाल | वह क्षति पहुँचाकर भी करता , नहीं मलाल || अपना स्वारथ अपनी बातें , अपना काम | अच्छा बनता कहता दूजे , है बदनाम ||
फटे पजामें में वह टाँगें , देता डाल | सभी जगह पर बनता ज्ञानी , वह हर हाल || बेतुक की भी बातें करकें ,देता ज्ञान | अकल अजीरण. लेकर घूमें ,सीना तान ||
बना घोसला पंछी अपना , करते गान | स्वर्ण पिंजरा उनको लगता, नर्क समान || सबको अपने घर से रहता , अनुपम प्यार | अपनी कोशिश से करता है , उसे सँवार ||
शेर देखिए जंगल सोता, अपनी माँद | नहीं चाहता सिर के ऊपर , चमके चाँद || भले गुफा है छोटी उसकी , पर संतोष | नहीं किसी को जाकर वह भी , देता दोष ||
सुभाष सिंघई~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
निश्चल छंद 16-7 पदांत गाल (मुक्तक)
समय मिले जब लिखते जाओं, कुछ उद्गार |
भाव हृदय के सुंदर लाकर, कर उपकार |
मात् सरस्वति कृपा करेगी , देगी नेह -
सार पकड़कर सार निकालो, बाँटो सार |
शीत माह की धूप सुहानी , खिलते बाग |
मोर हृदय का हर्षित होता , सुनता राग |
सुमन खिलें मन में मनमोहक , हँसते फूल -
लेखन से कुछ पावन होता ,मन का भाग |
मंजिल भी मिल जाती उनको , जो हो काम |
सूरज तपकर ठंडा होता , आए शाम ||
कीचड़ भी जब कमल खिलाता, महके गंध -
जीत सत्य की रहे हमेशा , होता नाम |
जहाँ कोठरी काजल की है , लगते दाग |
सुनी कहावत बहुत पुरानी , जलती आग |
तपकर बचकर जो भी निकले , होता संत -
आगे जीवन उसका देता , सदा पराग |
कभी -कभी मैं देखा करता , अपनी दाल |
लोग गलाने चल पड़ते है , चलकर चाल |
बीन बजाते खूब हिलाते, अपना शीष -
नहीं सफलता मिलती उनको , करें मलाल |
खरबूजा खरबूजे के सँग , बदले रंग |
सदा एक- सा कर लेते है , अपना ढंग |
हो जाते है दूर सदा को , टूटें डाल -
अपनी- अपनी राह चले सब , रहते तंग |
सुभाष सिंघई
निश्चल छंद , 16 - 7 , अंत गाल (मुक्तक)
बनने का जब अवसर आए , बनना खास |
भक्त बनो हनुमान सरीखे , प्रभु के पास |
संत हुए रविदास भगत जी , जग में नाम -
गंगा को खुद पाया घर में , रखे उजास |
पत्थर जैसा टूटा देखा , है अभिमान |
नहीं नीर की टूटी देखी, हमने आन |
एक चोट से पत्थर टूटे , बिखरे राह ~
पानी हँसता कभी न खोता , अपनी शान |
जगह- जगह पर देखी गलियाँ, उगते शूल |
जहर बरसता वहाँ न खिलते , कोई फूल |
आज धरा पर रोता मिलता , है विश्वास -
यहाँ झूठ को अच्छे-अच्छे , देते तूल |
सुभाष सिंघई
निश्चल छंद 16- 7 चौपाई चरण + 7 पदांत गाल ( मुक्तक )
जिसका जग में साथ निभाते , कर विश्वास |
जिसको भी हम माने दिल से, अपना खास |
आगे की मत पूछों कैसी , मिलती घात ~
जहाँ घाव कुछ लग जाते है , उगते त्रास |
सीने पर आरी चल जाती , चुभे कटार |
सदा पीठ पर मिलते रहते , है कटु वार |
खेल खेलते लोग निराले , चलकर चाल -
जगह- जगह पर मिलें देखने , जलते खार |
नाम आपका लेकर होते , ऐसे काम |
जगह -जगह पर होते रहते , है बदनाम |
समझ न पाते कोई फितरत, कोई भेद -
पता न चलती अब घातों की , कोई शाम |
सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
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निश्चल छंद,( मुक्तक )
कौन जगत में तुमसे अच्छा , दीनानाथ |
जग में ईश्वर तुमको मानूँ , थामूँ हाथ |
सुनकर दीन पुकार प्रभु जी, देते तार ~
कृपा आपकी पाकर होता , उन्नत माथ |
आप जगत में प्रभुवर करुणा , के अवतार |
सदा शरण में लेते सुनकर , दीन पुकार |
भक्तों का भी मान बढ़ाते , सुनते बात ~
देकर चरणों की रज करते , हो उद्धार |
सुभाष सिंघई
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निश्चल छंद , गीत
सवसे न्यारा सवसे प्यारा, इसका मान | (मुखड़ा )
झण्डा ऊँचा रहे हमारा, गाते गान ||(टेक )
वह झंडे के आगे चंगे , बोलें बोल | (_अंतरा)
हम अधनंगे झंडा थामें , समझें मोल ||
नेता जी भी भाषण देकर , बने प्रधान |
भाषण सुनना लाचारी का ,मिलता पान ||
वह विकाश का नारा देते , हमको आन |( पूरक )
झंडे ऊँचा रहे हमारा , गाते गान ||(टेक )
करकें काले गोरख धंधे , बनें महान |
लोकतंत्र के हम सब बंदे , है हैरान ||
लोकतंत्र अब कॉपे थर-थर,सुनकर व्यान |
चर्चा में वस रहना उनका , रहता ध्यान ||
नेता का हरदम जयकारा , लगता तान |
झंडे ऊँचा रहे हमारा , गाते गान ||
नाम बड़ा है नेता जी का , कहते लोग |
कुर्सी का बस रहता है जी, उनको रोग ||
हर अवसर पर वह जब खींचें, झंडा डोर |
करें सलामी फिर सब देखें , उनकी ओर ||
लोकतंत्र के यही दरोगा , है दीवान |
झंडा ऊँचा रहे हमारा , गाते गान
(सुभाष सिंघई)
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निश्चल छंद गीतिका , 16 -7 पदांत गाल ,
स्वर - ऐं पदांत - विकार
राग द्वेश के तीर जहाँ भी , करें शिकार |
कालिख मुख पर सदा लगाते , भरें विकार |
जो भी मन में पाले रहता , है अभिमान ,
चाल-ढाल मुख बोली से भी झरें विकार |
धन से बढ़ता मद देखा है , मद है रोग ,
रोगी बनकर रोग बढ़ाता , धरें विकार |
काँटे उसको जग में मिलते , मिले न फूल ,
कभी नहीं उससे इस जग में , डरें विकार |
मन जिसका हो निर्मल पानी , मीठे बोल ,
सदा देखता उसके अंदर , मरें विकार |
क्रोध सदा ही करता मन को , खूब अशांत ,
संत हृदय को जब भी देखें , टरें विकार |
सुख विकार में जो भी खोजे , भारी भूल ,
सत्संगति जिनको मिल जाती ,तरें विकार |
सुभाष सिंघई
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निश्चल छंद , गीतिका (अपदांत )
जीवन में सुख दुख आता है , कष्ट अपार |
फिर भी मानव जी लेता है, यह संसार ||
शीत गर्म का अनुभव मिलता, सहते लोग ,
हर्ष विषादों का जब लगता , है अम्बार |
जीवन है शुभ मंगल सबको , मानो बात ,
कर्म आपके भरते उसमे ,अमरत खार |
जहाँ धर्म से कर्म हमेशा , करते लोग ,
उनको देता ईश्वर भी है , अपना प्यार |
जहाँ कलश है पुण्य कर्म से ,अब भरपूर ,
सदा जानिए देगा ईश्वर , कृपा निहार |
यह तन जानो ईश्वर की तुम , खींची रेख ,
कहें सुभाषा जोड़े रहना , अपने तार |
सुभाष सिंघई
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(यह बड़ा रोचक छंद है , इसमें आप अपने लिखे हुए दोहों का उपयोग कर सकते हैं , या नया भी लिख सकते हैं।
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(गूगल अनुसार रीतिकालीन महाकवि #केशव दास जी ने इसे #चूड़ामणि छंद कहा है।
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चुलियाला छंद की विधान मापनी कई विद्वान आचार्यों की, पढ़ने मिली है , किसी ने एक दो उदाहरण- एक- दो मापनी अवगत कराकर इतिश्री कर ली है | तो किसी ने विस्तृत लिखा है, पर पदांत के आधार पर नामकरण वह भी नहीं कर सके हैं। जैसा कि अन्य छंदों के साथ किया गया है - ताटंक -कुकुभ -लावनी छंद इत्यादि |
आठ तरह से प्रमुख सहज चुलियाला छंद लिखे जा सकते हैं |
(और गहराई में जाएंँ तो 184 प्रकार हैं ) 23 प्रकार के दोहा × 8 प्रकार के पदांत = 184 )
सीधा सरल विधान है , वह 13 - 16 मात्रा का है ,
पर मुख्य पदांत आठ प्रकार के हैं |
और सबसे सूक्ष्म सहज सरल बात यह है कि आठों प्रकार ( जिनका नामकरण चुलियाला छंद ही है ) में #दोहा_छंद समाहित है |
यानी आप अपने लिखे दोहा छंद के प्रत्येक पदांत में , दोहे के भाव के अनुसार एवं समान्त का ध्यान रखते हुए 5 मात्राएँ और जोड़कर , चतुष्पदी चुलियाला छंद लिख सकते हैं।
विशेष निवेदन - आप जिस पदांत को दोहा में सहजता से जोड़ सकें , उसी का प्रयोग करें | आठ पदांतों में से पाँच-छ: पदांत तो लय युक्त आसानी से जुड़कर , सुंदर छंद सृजित हो जाते हैं।
चुलियाला के छंद में , तेरह सौलह भार मिलेगा |
दोहा का प्रथमा चरण , अग्र दूसरा सार खिलेगा ||
दोहा के जब सम चरण, जुड़े वर्ण जब पंच सुहाने |
बने चतुष्पदी गेय तब , चुलियाला का मंच झुलाने ||
(सुभाष सिंघई)
अब और सरल से सरल विधान निवेदित कर रहा हूँ ::- -
दोहा के पदांत में पाँच कला ( पांच मात्रा जोड़ना ) से चुलियाला छंद सृजित किया जा सकता है।
दोहों के साथ निम्न तरह 5 मात्राओं को जोड़कर 8 प्रकार से चुलियाला छंद बनाया जा सकता है।
~चतुष्पदी चुलियाला छंद / मुक्तक / गीत - के लिए दो दोहों का एक साथ प्रयोग करना पड़ेगा | दो दो चरण सम तुकांत अथवा चारों चरण सम तुकांत हो सकते हैं।
गीतिका में दो- दो चरण प्रयोग होंगे |
व एक "चतुष्पदी चुलियाला " के लिए निम्न में से कोई एक पदांत चयन कर लें , व दोहा छंद पदांत में जोड़ दें , व छंद के ऊपर पदांत उल्लेख कर दें।
1--एक "चतुष्पदी चुलियाला " के लिए निम्न में से कोई एक पदांत विधान का चयन कर लें , व दोहा छंद पदांत में जोड़ दें ,
2- छंद के ऊपर पदांत विधान का उल्लेख कर दें।
3-मूल छन्द में पदांत एक ही पदांत न रखें।विधान वही पर शब्द अलग।
आठ प्रकार का चुलियाला छन्द
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1-दोहा+ गुरु लघु गुरु (212)शुद्ध-रगण
2- दोहा+लघु गुरु गुरु,(122)शुद्ध-यगण
3-दोहा+गुरु लघु लघु लघु (2111)शुद्ध भगण+लघु
4-दोहा+ लघु लघु लघु गुरु,(1112)शुद्ध नगण+गुरु
5. दोहा+लघु लघु लघु लघु लघु,(11111)शुद्ध नगण+लघु, लघु
6-.दोहा+ लघु गुरु लघु लघु, (1211)शुद्ध जगण+लघु
7-दोहा+ गुरु गुरु लघु (221) शुद्ध तगण
8-दोहा+ लघु लघु गुरु लघु , (1121)शुद्ध सगण+लघु।
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1-- चुलियाला छंद (चतुष्पदी) दोहा छंद के सम चरणों में + 212
बनने का अवसर मिले , तब बनना तुम दास राम के |
भक्त दास हनुमान से , बनो राम के खास काम के |
भक्त शिरोमणि हो गए , जग में श्री रविदास नाम से |
गंगा चलकर आ गई , खुद ही उनके पास धाम से ||
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2- चुलियाला छंद चतुष्पदी ) दोहा छंद के सम चरणों में + 122
जो भी दीन गरीब हों , कभी न मानो दास हमारे |
अंधकार में रोशनी , भरते रहे उजास तुम्हारे ||
छोटों को जो देखकर , उनको अपना दास विचारे |
कहें 'सुभाषा' वे सदा , रहते खुद ही त्रास किनारे ||
चुलियाला छंद चतुष्पदी = दोहा छंद के सम चरणों में + 122
खूब दिखाते प्यार अब , करते कपटी बात सयानी |
चोटिल करते पीठ हैं, बन जाती है घात कहानी ||
मीठी मीठी बात से खूब दिखाते प्यार सुहाना |
अनहित करें प्रदान वह , करें पीठ पर वार रुलाना |
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3- चुलियाला छंद चतुष्पदी = दोहा छंद के सम चरणों में + 2111
हम दासों के दास हैं , कहता आज सुभाष बोलकर |
राम नाम जो पुंज है , रखता हृदय प्रकाश खोलकर ||
मात पिता गुरु के चरण , शरण राम की पास जानकर |
नहीं 'सुभाषा' चूकता , रहे चरण में दास मानकर ||
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4- चुलियाला छंद. चतुष्पदी= दोहा छंद के सम चरणों में+ 1112
मेंढक तुलते हैं नहीं , कितना करो प्रयास सहज ही |
एक चढाते हम जहाँ , दूजा कूदे खास महज ही |
अजब-गजब अब भक्त हैं , सब हैं चतुर सुजान तरल से |
पहले अपना देखते , नफा और नुकसान सरल से ||
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5- चुलियाला छंद.चतुष्पदी =दोहा छंद के सम चरणों में + 11111
जय -जय बोले उस जगह , जिधर मिले कुछ खास रतन धन |
नहीं पूछ हो जिस जगह , कह उठते बकवास तपन मन |
पूँछ मीडिया थामकर , चलते नेता लोग यतन कर |
योगदान के नाम पर , देते निंदा रोग वतन पर ||
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6-. चुलियाला छंद चतुष्पदी= दोहा छंद के सम चरणों में + 1211
आप यहाँ क्या कर रहे , यह मत पूछें बात अभी हम |
फैलाया है रायता , देने बस आघात नहीं कम ||
दोष गिनाते घूमते , और खोजते जोश यहाँ पर |
खल से होता सामना , खो जाते हैं होश वहाँ डर ||
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7- चुलियाला छंद चतुष्पदी= दोहा छंद के सम चरणों में + 221
शिव शम्भू का वास शुभ , है पर्वत गिरिराज देखो न |
गंगा का विश्राम है , बनी जटा सरताज लेखो न |
चंद्र भाल पर सोहता , आसन को मृग छाल लाओ न |
बैठी धूनी शिव यहाँ , सर्प गले में डाल आओ न ||
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8- चुलियाला छंद चतुष्पदी= दोहा छंद के सम चरणों में + 1121
गलियाँ जहाँ उदास हों , लगे वहाँ पर शूल कहना न |
और बरसता हो जहर, वहाँ न खिलते फूल रुकना न ||
गम के पत्थर हों लगे , रोता हो विश्वास सहना न |
वहाँ हौंसले टूटते , रहते लोग उदास रहना न ||
सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र०
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उपरोक्त आठ पदांत हैं , जो भी आप लय में लाकर प्रयोग कर सकें , करें , किंतु ध्यान रहे कि जो भी पदांत आप प्रयोग करें वह पूरी एक चतुष्पदी में करें।
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चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद
दोहा छंद के पदांत में 1211 जोड़कर
गीतिका , समांत आर , पदांत यहाँ पर
उनकी जय होती सदा , जिनके नेक विचार यहाँ पर |
उन्हीं विचारों की झलक , करती है शृंगार यहाँ पर ||
बोल उठें जय लोग भी , कर उठते है वाह खुशी से ,
परहित के शुभ भाव से , मन के बजते तार यहाँ पर |
नेता की जय शोर है , प्रभु की करे विभोर सदा ही ,
जय बुलवाना बात कुछ , जय होना कुछ सार यहाँ पर |
मिलना जुलना हो जहाँ , जय- जय सीताराम कहे हम ,
हो जाए प्रभु नाम से , जग में बेड़ा पार यहाँ पर |
जय जैसे शुभ कर्म से , रहती खुशी अपार निजी मन ,
निज जय जो लगवा रहे , उस जय में है हार यहाँ पर |
सुभाष सिंघई
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चुलियाला छंद दोहा + यति प्रयोग 122
(मुक्तक) संसार का एक पहलू
फूल खिलें सब देर से , पहले काँटे शोर मचाते |
खलनायक सम्मुख मिले , तब ही नायक जोर लगाते |
कहे ' सुभाषा' आज भी, सुंदर रहते गेह हमारे -
मिलजुल कर हम सब रहें,सबको अपनी ओर बुलाते |
संसार का दूसरा पहलू
सभी पुराने दूर है , आज नए जो गान मिले है |
उनको बिखरा देखता , सबके सब अरमान हिले है |
गंध कपट की अब रहे , मिले दिखावट खार पुरानी -
नजर उठाकर देखता , बने हुए शैतान किले है |
आज गजब हालात है , रोते रहते ओज किनारे |
सूरज चंदा छिप गए , करते रहते खोज सितारे |
समय आज वेवश हुआ , सब कुछ बैठा हार उजाला -
बने काम सब टूटते , अब तो सब कुछ रोज हमारे |
सुभाष सिंघई
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चुलियाला छंद में गीत - दोहा छंद में + पदांत प्रयोग 212
हर अक्षर में भर रही, साजन सुनो सुगंध नीति की |(मुखड़ा)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
पाती पाकर पवन भी , चला सजन के पास दौड़ता | (अंतरा
विरहा की सांसे लिए , साजन के तट खास छौड़ता ||
थोड़े में ही जानिए , साजन पूरा दर्द हटाना |
शब्द न मुझको मिल रहे, आकर तुम ही गर्द गिराना ||
तुम बिन जग सूना लगे, भर दो तुम आनंद जीत की |(पूरक)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
काजल बहकर गाल पर ,रोता है शृंगार शाम को (अंतरा)
सखियां आकर कह रहीं, कहाँ गया भरतार काम को ||
तू क्यों सँवरें रात- दिन , साजन क्यों परदेश धाम को |
प्रीतम क्या अब आ रहें, धरें भ्रमर परिवेश नाम को
करें इशारा नैन से , सजनी गाती छंद मीत की (पूरक)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
सब कहते मैं मोरनी , नयन आज चितचोर टेरते |(अंतरा)
चढ़े धनुष पर तीर सी , काजल की सब कोर हेरते ||
बनी बावरी घूमती , समझ न आती बात बोलते |
कब होती अब भोर है , कब होता दिन-रात तोलते ||
प्रीतम मेरे लो समझ , विरहा गीता छंद गीत की |{पूरक)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़) म० प्र०
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चुलियाला छंद (गीतिका) (13 - 16)
दोहा छंद + 1112 , समांत आर , पदांत- जगत में
बड़ी बात लघु रूप से , कविता कहती सार जगत में |
कविता के शुचि भाव ही , देते सबको प्यार जगत में |
कविता लिखना अति सरल , भावों का है खेल यतन से ,
शब्द चयन जब श्रेष्ठ हों , अनुपम है उपहार जगत में |
कवि जब कविता को लिखे, लिखकर होता धन्य कथन से ,
माँ शारद का पुत्र बन , पाता पुण्य अपार जगत में |
कविता उनसे दूर है , लेन - देन जब चाह मनन में ,
भाव शून्य जब तुक रहें , अंधकार की खार जगत में |
शीत माह की धूप में , खिले सुबह से फूल चमन में ,
ऐसी ही कविता लगे , शुचिमय गंगा धार जगत में |
कविता को सब जानिए , है शारद का रूप सहज ही ,
जिसके चरणों में झुके , भक्तों का सत्कार जगत में |
कविता की आभा सदा , देती है संदेश चमक- सी
करती दर्पण काम यह , चलती हर दरबार जगत में |
कविता कवि मन भाव है , निर्झर होते गीत भगत के ,
जहाँ हृदय कविता रहें, दूनी करती चार जगत में |
कविता छोटी सी रहे , या लेवें आकार , धरनि में ,
आँचल इसका है बड़ा , करती है विस्तार जगत में |
कविता निकसत है हृदय , जोड़े कवि से तार नवल ही ,
कवि कविता पूरक रहें , करते रहें दुलार जगत में |
सुभाष सिंघई जतारा
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चुलियाला छंद दोहा + यति प्रयोग 1112
उनसे मिलती खोट है , जिनका जानूँ साथ सुनहरा |
पढ़वाते है चैन से , सबको उल्टे हाथ ककहरा ||
सरे आम सब देखते , बनते सबके नाथ छहररा |
रावण अब मरता नहीं ,उल्टा फूटे माथ दशहरा ||
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चुलियाला छंद गीतिका , स्वर - कैर , पदांत - इआया
दोहा छंद + यति 122 का प्रयोग
राजनीति मैदान में , जब भी अपना पैर टिकाया |
खाकर आए चोट हम , आकर सबने बैर निभाया |
काँटो बाली है फसल , छीन लिया सुख चैन हमारा ,
तलवारें थी सामने , जब भी अपना मैर मिलाया |
मैर =गौत्र
जड़ें काटते मित्र ही , अब अनुभव का गान सुनाता ,
जहाँ जरूरत थी हमें , हमको पूरा गैर दिखाया |
राजनीति सागर मिला , मिलते काफी जाल सुनो जी ,
नहीं नाव पर चढ़ सके , पर दे आए तैर किराया |
वादों की कीमत नहीं , राजनीति के देख अखाड़े ,
कहता यहाँ सुभाष है, हाथों काला खैर रचाया |
सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
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चुलियाला छंद - दोहा छंद में + यति प्रयोग 1112
आज हुए भदरंग हैं , त्योहारों के रंग, गजब है |
प्रेम भरी बातें दिखें , अब कटुता के संग ,अजब है ||
फीके - फीके स्वाद में ,जीते है मिष्ठान , महज ही |
मरती जीती चासनी , मावा खोता शान, सहज ही ||
मेंढ़क सिर पर कूँदते , चूहे कुतरें कान , जगत के |
दूल्हे बने सियार है , गर्दभ देते ज्ञान , गरज के ||
लाज शर्म वैश्या रखे , सती चले बेढंग, टहल के |
कपट बजे अब ढोल से ,सिकुड़ी रहे उमंग,मसल के ||
अब असत्य का शोर है , रखें सत्य मुख बंद, सरल से |
वाह- वाह अब पा रहे , खींचा तानी छंद , गरल से ||
आगे नीम हकीम है , मिलते तिकड़मबाज, धवल है |
जब सुभाष सच बोलता , सिर पर गिरती गाज , प्रवल है ||
योगी से तप दूर है , उत्कंठा है शांत, करम से |
झरने सूखे मिल रहे , दिखे चंद्र अब क्लांत, भरम से ||
समाधान हल भूलकर , खोज रहा है ज्ञान, भगत में |
प्रवचन करते काग है , हंस बना यजमान , जगत में ||
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चुलियाला / चूड़ामणि छंद ( दोहा के समचरण में + 122 जौड़कर
होली पर रसिया ( मुक्तक)
रंग बिरंगा माह है , गोरी मन मदहोश लगा है |
लौटे प्रिय परदेश से , रोम - रोम में जोश जगा है |
गोरी भावुक लग रही , सुलझाती है बाल बला से ~
टेसू जैसे सूर्य का , गालो पर अब कोष उगा है |
नैना चंचल हो गए , अब काजल की कोर खिली है |
मस्ती आई झूमकर , अब गोरी की ओर मिली है |
पग धरती पर नाचते , नूपुर देते ताल रुहानी -
गोरी लगती आजकल,जैसे खिलती भोर लिली है |
धरती पीली लाल है , अनुपम सुंदर फूल खिले है |
गोरी तन्मय गा रही , बिसरे भी सब शूल गिले है ||
छनछन पायल बज रही, थिरक रहे सब अंग नाच से -
सभी शिकायत मंजिलें,सब गिरकर अब धूल मिले है |
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आधार चुलियाला छंद , गीतिका
समांत आस , पदांत सजनियाँ
फागुन के शुभ माह में , प्रीतम माने खास सजनियाँ |
तीन लोक की सम्पदा ,कहती मेरे पास सजनियाँ |
होली की मस्ती चढ़ी , मन में सुंदर फूल महकते ,
नेह पिया का हो सदा , रखती है यह आस सजनियाँ |
कोयलिया भी गा रही , बैठ आम की शाख पकड़ के ,
भावों के सुर ताल से , रचा रही है रास सजनियाँ |
प्रीतम दर्शन चाहती , गोरी लगे अधीर जगत में ,
मिलन नेह का जब मिले ,भरकर चले सुबास सजनिया |
मड़राता है अब भ्रमर ,रहा पुष्प को चूम चमन में ,
बैठी- बैठी देखती , लगती आज उदास सजनियाँ |
रसिया मन भँवरा लगे , अद्भुत उसका प्रेम प्रकट है ,
लखकर उसका प्यार , भरती रहे उजास सजनिया |
©®सुभाष सिंघई , जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
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11- उपमान (दृृढ़पद ) छंद - 23 मात्रा
, ( 13- 10) पदांत चौकल ,
(दो दो पद समतुकांत , या चारों पद तुकांत )
सबसे सरल विधान
#दोहा_छंद_के_सम_चरण_में_एक_मात्रा_घटाकर_पदांत_चौकल #करने_से_उपमान_(दढ़पद ) छंद बन जाता है
उपमान छंद , विधान
दोहा का पहला चरण , दूजा दस जानों |
चौकल करो पदांत तुम , छंद बना मानों ||
लिखे छंद उपमान हम, लय सुभाष देता |
एक चरण ; तेरह-दस , भार यहाँ लेता
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उपमान (दृृढ़पद ) छंद - 23 मात्रा , ( 13- 10) पदांत चौकल ,
उपमान छंद ,{ विषय घड़ी }
घड़ी नहीं है आपकी ,भली रहे वह घर |
चलती अपनी चाल है , फैला अपने पर ||
करे इशारा वह सदा , कभी नहीं थकती |
बतलाती है वह समय ,चाल नहीं रुकती ||
घड़ी- घड़ी में लोग भी , रंग बदलते है |
कह सुभाष हँसती घड़ी , जब निज कहते है ||
यहाँ घड़ी हम छोड़कर , बनते खुद ज्ञानी |
काग सयाने सम बनें , करते नादानी ||
बड़ी घड़ी या लघु दिखे , समय एक रहता |
घड़ी समझती सब यहाँ , काँटा जब चलता ||
घड़ी कभी बँधती नहीं , हम खुद बँध जाते |
बार- बार हम देखते , बंधन ही पाते ||
टिक टिक करती है घड़ी , लोग करें खटपट |
मिटमिट करता काल है , हम कहते हटहट ||
मरने की आए घड़ी , तब बैठा रोता |
बँधी घड़ी चलती रहे , नर सब कुछ खोता ||
सुभाष सिंघई
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उपमान छंद , विषय - परीक्षा (मुक्तक)
सदा परीक्षा दीजिए , साहस ही रखना |
पास फेल चिंता नहीं , बस उद्यम करना |
हो जाती पहचान है , कौन यहाँ मेरा -
हो जाते साकार हैं , जो पालें सपना |
जगत परीक्षा कक्ष है, सुख दुख हम सहते |
यहाँ खोजना हल पड़े , साहस हम रखते |
समझों जो दाता जगत , कहलाता ईश्वर -
कभी परीक्षा लें उठें , वह चलते - चलते |
कभी परीक्षा में अजब , प्रश्न मिले करने |
अपने मन के हाल सब , लिख सुभाष सपने |
भाव हृदय पट खोलकर , लिखना है पड़ता ~
अपने दुश्मन लिख यहाँ , कौन यहाँ अपने |
सुभाष सिंघई ~
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उपमान छंद , गीतिका , विषय - सबसे अच्छा कौन ?
समांत - आरी , पदांत चर्चा
सबसे अच्छा कौन अब , है न्यारी चर्चा |
इधर-उधर की बात से , अब भारी चर्चा ||
डंका अपना पीटते , है मेरी लंका ,
शंका में है डालते , उपकारी चर्चा |
यहाँ मसीहा सब बनें , सबके सब नामी ,
चौराहों पर चल रही , लाचारी चर्चा |
जिन्हें चुना था छाँटकर , वह उल्टा चुनते ,
दिखती सुंदर रूप में , अब खारी चर्चा |
शोषण जिनका खुद किया , मर्यादा लूटी ,
आज करें उत्थान हित , वह नारी चर्चा |
उल्टे खेले खेल है , नियम सभी तोड़े ,
आज उन्हीं की कर रहे , सब पारी चर्चा |
समय नजाकत में चले , कुछ हम पहचानें ,
करे सुभाषा आपसे , कुछ जारी चर्चा |
लिखी गीतिका मित्रवर , कौन यहाँ अच्छा ,
मिला न उत्तर बंद है , अब सारी चर्चा |
सुभाष सिंघई ~
~~~~~~~
उपमान छंद , {शारदे वंदना )
धवल वसन कमलासनी, ब्रम्हपुरी रहती |
लिपि श्रुति माँ वागेश्वरी , वाणी शुभ कहती |
वीणा पुस्तक धारिणी , जय शारद माता |
हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
अक्षर-अक्षर ज्ञान की , तुम शुचि मम देवी |
भक्ति भाव से पूजता, तेरा मैं सेवी ||
पुस्तक मेरी मित्र है , जो ज्ञानी दाता |
हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
पुस्तक में जो खो गया , बन जाता ज्ञानी |
माता तेरी है कृपा , गंगा सा पानी ||
चरण शरण से आपकी , बन जाता ज्ञाता |
हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
वेद ग्रंथ या कुछ कहो, सभी नाम माता |
माँ शारद सबमें मिलें , मिलती सुख साता ||
आना मैया शारदा , भजन यहाँ गाता |
हंसवाहिनी दिव्य तुम , है तुमसे नाता ||
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उपमान छंद , मुक्तक , 13- 10 , पदांत चौकल (दीर्घ दीर्घ / लघु लघु दीर्घ )
समस्या - मरें तो हम कहाँ मरें ? 😇
पत्नी कहती प्रिय सदा , मुझ पर ही मरना |
उस पर मरता तब कहे , नाटक मत करना |
घर से बाहर घूमता , तब कुढ़कर कहती-
कहाँ मरे थे आज तुम, हमसे सच कहना |😇🙏
मिली राह में जब हमे , अपनी ही साली |
बोली मरने क्यों कहीं , रहते हो खाली |
मुझको मरना आपका, समझ नहीं आया -
जीजा तुम तो लाल हो , जीजी है लाली |
कहे पड़ोसन आप अब, कहीं नहीं मरना |
रहकर अपने गेह में , मन की तुम करना |
मरना है जाकर कहाँ , सीखो कुछ जग से -
इधर-उधर मत खोजना , नहीं जरा डरना |
जगह नहीं मरने कहीं , मिले नहीं छाया |
किस पर न्यौछावर करूँ , अपनी यह काया |
नहीं मानता दिल यहाँ , हम मरना चाहें -
मरकर भी जिंदा रहे , भरने को आहें |
मंदिर जाकर जब मिला , प्रभुवर तब बोले |
रे सुभाष तू बात सुन , कहीं नहीं डोले |
पत्नी पर मरना सदा , समझो गहराई -
कितनी चाहत वह रखे , होंठ नहीं खोले |
(समस्या ज्यों की त्यों , पत्नी के निकट पहुँच गई है 😇🙏)
मरें तो हम कहाँ मरें ?
सुभाष सिंघई
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उपमान छंद , 13 - 10 , पदांत चौकल (दो दीर्घ)
दौलत जिसके पास है , उसको पहचानो |
अंदर से कितना दुखी , कुछ आकर जानो ||
दौलत पाकर वह सदा , पैसा चिल्लाता |
बोझा ढ़ोता रात दिन , ढेंचू ही गाता ||
दौलत जिसके पास है , नींद नहीं आती |
पैसों की ही रात दिन , गर्मी झुलसाती ||
जितनी दौलत जोड़ता , उतनी कंजूसी |
बातचीत व्योहार में , बालों - सी रूसी ||
दौलत जिसके पास है , भरता है आहें |
तृष्णा मृग -सी पालता , रखता वह चाहें ||
पैसा भी उसको सदा , तृष्णा में लाता |
महिमा अपनी जानकर , उसको भरमाता ||
सुभाष सिंघई
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सूरज चंदा है पथिक , ताप शीत देते |
कष्ट हमेशा आम जन , आकर हर लेते |
इनको माने जग सदा , यथा योग्य पूजे -
यही काम आएँ सदा , और न हों दूजे |
बिषधर पूजें सब यहाँ , खल बनते राजा |
आगे पीछे लोग सब , बजा रहे बाजा |
डसते जाते आम जन , कौन उन्हें टोकैं ~
डंका बजता राह में , कौन यहाँ रोकें |
सुभाष सिंघई
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राजनीति दंगल हुआ , चित्त हुआ नेता |
चमचा भी अब दूर है , खवर नहीं लेता ||
समय समय की बात है , बोतल अब खाली |
खुली धूप में दौड़ता , बागों का माली ||
सत्य प्रकट हो सामने , छलिया सब भागें |
अंधे अपने भाव से , अंदर से जागें ||
सच कड़बा जो मानते , हर्षित हो पीते |
लाभ मिले उनको सदा , मस्ती में जीते ||
मत चूकों चौहान अब , सुनो कवि की वाणी |
भितरघात जो भी करे , दुश्मन वह प्राणी ||
मूँछें अपनी ऐंठता , सम्मुख जो आए |
मर्दन पहले कीजिए , जो भी चिल्लाए ||
रखवाली झूठी दिखें , गड़बड़ है माया |
चिडि़याँ बदले कब कहाँ , खेतों की काया ||
लोग चतुर अब बन रहे , समझें सुल्तानी |
कर्म एक दिन बोलते , छाई बेईमानी ||
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उपमान छंद
महुआ की मधुरम महक , मादकता छाई |
यौवन लाया बाढ़ है , प्रीति निकट आई ||
महुआ टपके रस भरे , है रात नशीली |
साजन करते प्रेम से , अब बात रसीली ||
बौराया है अब पवन , छू महुआ डाली |
कहता है हर कान में , इस रस में लाली ||
महुआ फूला पेड़ पर , रस में है डूबा |
टपक अवनि की अंक से , हर्षित है दूबा ||
सुभाष सिंघई
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उपमान छंद मुक्तक
सुख भी आता शान से , दुख भी है आता |
पर दोनों में फर्क है , दुख कुछ चिल्लाता |
सुख को भोगें आदमी , बनता अलवेला -
नशा द्रव्य का जब चड़े , तब ही मदमाता |
बचपन यौवन कब गया , पता नहीं होता |
देख बुढ़ापा पास में , तब बैठा रोता |
जीवन यह कुछ खास था, कभी नहीं माना ~
मौसम हरदम हाथ से , निज हाथों खोता |
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उपमान (दृृढ़पद ) छंद - 23 मात्रा
( 13- 10) पदांत चौकल ,
न्याय नीति के मिल रहे , हमको व्यापारी |
चोरों की भी बिक रही , आज कलाकारी ||
नेता हमको देश में , दिखते उपयोगी |
हावी है अब न्याय पर , तिकड़म का भोगी ||
जगह-जगह हमको दिखे, अब तिकड़मबाजी |
नेता के पहले करो , चमचों को राजी ||
मिलता अब तो न्याय है , जहाँ दाम भारी |
वर्ना आती हाथ में , सीधी लाचारी |
एक न्याय देना प्रभू , सत्य वचन बोलूँ |
चरणों में लेना मुझे , बँधे पाप खोलूँ ||
शरण आपकी हो सदा , मिलबे सुख छाया |
रहे धर्म का ध्यान अब , करे भजन काया ||
सुभाष सिंघई
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यह मुक्तक जैसे ही हैं , जिनका "आधार लय युक्त तुकबंदी है" , यह तुक्तक किसी छंद की मापनी या आधार पर नहीं होते है , यदि स्वाभाविक मिलान भी हो जाए तो , तब वर्तमान में प्रस्फुटित नव कविता( पिरामिड) में उनका नाम उपयोग उचित नहीं है
पिरामिड कविता नए नए आकार में लिखी जा रही है , जैसे धनुषाकार में भी सामने आई है
यहाँ हम पिरामिड तुक्तक बनाकर अंताक्षरी नियम का पालन करकें
" अंताक्षरी पिरामिड तुक्तक " प्रस्तुत कर रहे है
(प्रारंभ के तुक्तक का अंतिम शब्द , अगला तुक्तक प्रारंभ होगा , व क्रमशा: दो मात्रा बढ़ जाती है इसी तरह क्रमशा: "पिरामिड अंताक्षरी तुक्तक" बढ़ते जाएगें )
आप किसी भी मात्रा से प्रारंभ हो सकते है
कम से कम 4 या 5 तुक्तकों से एक अंताक्षरी पिरामिड तुक्तक तैयार होता है |
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( गा गा पदांत के ) अंताक्षरी पिरामिड तुक्तक
मात्रा 10
फूल नहीं पलते
खिलकर वह ढलते
जीवन भी ऐसा -
रुक जाता चलते |
12 मात्रा
चलते जाओ यारा ,
बनना सदा सितारा ,
आँसू पीना सीखों -
नहीं रहेगा खारा |
14 मात्रा
खारा जीवन मत जानो ,
अपने को अब पहचानो ,
किसी लक्ष्य को पाना है
तब बन जाओ दीवानो |
16 मात्रा
दीवानो की बात निराली ,
खुद ही बगिया के खुद माली ,
मस्त फकीरी में दिन रहते -
बजती रहती हरदम ताली |
18 मात्रा
ताली जीवन में जब आती है ,
मस्ती मन के अंदर छाती है ,
जीवन में भी कुछ खुश्बू आती
बगिया मन की वह महकाती है |
20 मात्रा
महकाती है जीवन को जब डाली ,
फूलों को भरकर लाता है माली ,
तभी सफल जीवन उसका हो जाता -
जब ईश्वर देने लगता उजयाली |
सुभाष सिंघई
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तुक्तक ( गाल पदांत के )
( 11 मात्रा)
जीवन के दिन चार ,
मत करना बेकार ,
लेना हरि का नाम -
होगा बेड़ा पार |
(13 मात्रा )
पार लगाता है ईश ,
कहलाता जो जगदीश ,
लेते हैं जब उसका नाम -
मिटती तब मन की टीस |
15 मात्रा
टीस कभी मत दिल में पाल ,
आ जाए तो उसे निकाल ,
निर्विकार मन रखना यार -
सदा मिटेगें जग जंजाल |
17 मात्रा
जंजाल यहाँ पर चारों ओर ,
सुने हाय का उठता हम शोर
लोग मचाते रहते है धूम -
सभी लगाते है अपना जोर |
( 19 मात्रा )
जोर लगाना जहाँ धर्म के बोल ,
दान दया के होते क्षण अनमोल ,
सुख मिलता जब अच्छे होते काम -
मन के भी मिट जाते है सब झोल |
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लगा के तुक्तक
9 मात्रा
देखा सब जहाँ ,
कलरव है यहाँ _
काँटे है लगे-
यहाँ न कुछ वहाँ |
11 मात्रा
वहाँ नहीं तुम रहो ,
वचन कथन मत कहो ,
मूर्ख जहाँ कुछ कहें -
बात न उनकी सहो |
13 मात्रा
सहो न कोई घात को ,
कटुता भरती बात को ,
नहीं पालिये कायरता -
अपने अंदर मात को |
15 मात्रिक
मात को न दिल से मानिए ,
सीख मिले यह सच जानिए ,
असर मात का कुछ दिन रहे -
जरा जीत का हल ठानिए |
सुभाष सिंघई
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इन अंताक्षरी तुक्तकों को आप आप किसी भी गण के पदांत में ले जा सकते है पर लय युक्त हो |
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धनुष पिरामिड
१-२-३-४-५-६-७-६-५-४-३-२-१=४९ वर्ण
हे
प्रिय
सुन लो
अब आओ
साज सजेगें
मधुर गूँजेगें
सुर लेकर गाओ
चाह सभी पाओ
अब मुस्काओ
मन लाओ
सुनाओ
हाल
भी
~
धनुष पिरामिड ,
१-२-३-४-५-६-७-६-५-४-३-२-१=४९ वर्ण
है
बेग
प्रवाह
प्रीति चाह
यहाँ अथाह
भरी रसधार
परस्पर प्यार है
भरा मकरंद
पूर्ण आनंद
है सुंगध
जीवन
वन
में
सुभाष सिंघई
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मनमोहन छंद 14 मात्रा (8+6) पदांत नगण
चारों चरण या दो- दो चरण समतुकांत
सही विधान- अठकल +किसी भी तरह का त्रिकल + नगण अर्थात पदांत 111 )
कुछ विद्वान कवि , अठकल की यति के बाद शेष छक्कल , चौकल +द्विकल के रुप में इस तरह आ रहा हो कि चौकल का अंतिम वर्ण लघु हो व द्विकल दोनों लघु हो | उसको मान्य करते है , आशय वही निकला कि चरणांत नगण 111 हो | और मैं भी इस पर असहमति नहीं देता हूँ , यदि कवि का सृजन लय में जरुरी लग रहा है , तब आपत्ति नहीं है
(इसको द्विगुणित करने पर स्वाभाविक रुप से महा मनमोहन छंद कहलाएगा )जिस तरह शृंगार छंद का द्विगुणित महा शृृंगार छंद कहलाता है ,
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मनमोहन छंद
रावण जैसी जहाँ हपस |
उसकी लंका सहे तपस ||
जलकर होगी खाक जरुर |
मद का उतरे सभी शरुर ||
सच्चे की है बात अलग |
झूठाँ होता अलग-थलग ||
आँखें जाती वहाँ झलक |
करें इशारा वहाँ पलक ||
सच्चा होता जहाँ कथन |
मानव करता वहाँ मनन ||
खिलता उपवन बने चमन |
जग करता है वहाँ नमन ||
छिपा न रहता किया गबन |
अधिक चले मत कभी दमन ||
संत बोलते सत्य वचन |
सदा झूठ का करो हवन ||
जिसका होता हृदय सरल |
पी जाते है सदा गरल ||
उन पर होता नहीं असर |
करते रहते गुजर – बसर ||
सुभाष सिंघई
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(मुक्तक )मनमोहन छंद , 14 मात्रा (8+6)
( किसी भी तरह का अठकल +किसी भी तरह का त्रिकल + नगण अर्थात पदांत 111 )
जो करते है सदा नकल |
नहीं लगाते वहाँ अकल ||
मूरख बनकर करें गुजर ~
काम हमेशा चले धकल |
जो करते है घात अमल |
खिले न घर में कभी कमल |
काँटो की ही उगे फसल ~
रहते है वह हृदय मसल ||
करता दानी सदा पहल |
मंदिर मस्जिद करे चहल |
सृजन हमेशा करे निरत ~
जन सेवा को तजे महल |
सुभाष सिंघई
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🍒💐शारदे वंदना💐🍒
मनमोहन छंद ( अठकल + त्रिकल + नगण ) √
मात् शारदे तुझे नमन |
रहे वतन में सदा अमन ||
मन से निकले यही कथन |
भारत हरदम रहे चमन ||
माता तेरा करूँ भजन |
चरणों में नित रहूँ मगन ||
पूजा तेरी करे कलम |
छाए गहरा निकट न तम ||
वीणाधारी वस्त्र धवल |
पावन तेरे चरण कमल |
छंद रचूँ मैं सदा नवल |
कह सुभाष अब दास चपल ||
सुभाष सिंघई
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मनमोहन छंद ( 8- 6 ) पदांत नगण 111 √
अच्छी होती , नहीं कलह |
लोग लड़े भी, बिना बजह ||
अपना-अपना , कहें कथन |
खुद ही अपना , करें नमन ||
बनते जग में , सभी सरल |
भरें हृदय में , खूब गरल ||
नहीं पराया , करें सहन |
मन में रखते , सदा जलन ||
साधू होते , निर्मल जल |
उनके होते , सुंदर पल ||
राग द्वेश से , दूर बचन |
अमरत उनके , सदा कथन ||
सुभाष सिंघई
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मनमोहन छंद ( 8- 6 ) पदांत नगण 111 (मुक्तक )√
खल करता है , जहर वमन |
कुढ़ता रहता , रखे जलन |
ज्वाला भीतर , रखे दहक ~
उसका होता, नहीं शमन ||
जो होती है , बात सहज |
दुर्जन खाएं , वहाँ मगज |
बात घुमाता , करे चुभन –
बिन पानी का , दिखे जलज |
बात निराली , दिखे अलग |
नहीं सत्य से ,कभी बिलग ||
दर्शन जिनका सत्य सहज –
उनका करता , दर्शन जग |
सुभाष सिंघई
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मनमोहन छंद ( 8- 6 ) पदांत नगण 111
अधिकारों का , जहाँ हनन |
उन्नति करता , नहीं वतन |
यश उन्नति का , जहाँ बिगुल |
देश बने वह , सदा मुकुल ||
आर पार की बात प्रखर |
आगे पीछे नहीं जहर ||
सत्य सदा ही करे चमक |
पुष्प छोड़ते सदा महक ||
आज सामने छंद महल |
करता नूतन सदा पहल ||
मित्र जुड़े सब करे सृजन |
चिंतन करते करे मनन ||
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मनमोहन छंद(गीतिका ) अदांत गीतिका
करते रहना बात अमन |
पास खिलेगा सुखद चमन |
लोग भरोसा करे सहज,
यश पायेगा, निजी कथन |
मन दर्पण हो जहाँ सरल ,
अमरत बनते वहाँ वचन |
ज्ञानी है अनमोल जगत ,
मिलता उसको सदा नमन |
मेहनत का है जहाँ दखल ,
सोना खिलता सहे तपन |
सुभाष सिंघई
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मनमोहन छंद (गीत )
जहाँ घास का करें बजन |
नहीं वीरता काम सजन ||
करते रहते सदा दखल |
खूब लगाते निजी अकल ||
सदा तोड़ते बना महल |
करते रहते चहल- पहल ||
लड़वाने को कहें वचन |
नहीं वीरता काम सजन ||
बेतुक गाते सदा गजल |
मुख से निकले फटी हजल ||
चौखाने को कहें त्रिकल |
करें ढ़िढ़ोरा द्वार निकल ||
देते सबको खूब तपन |
नहीं वीरता काम सजन ||
ढींगे हाँके टहल-टहल |
हर कारज में करें दखल ||
उकसाने की करें पहल |
जाते मानव वहाँ दहल ||
करे सुभाषा यहाँ मनन |
नहीं वीरता काम सजन ||
सुभाष सिंघई
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महा मनमोहन छंद
रख सुभाष अब हृदय विनय, प्रातकाल कर ईश नमन |
धोखा चोखा रखो समझ , जीवन होगा सुखद चमन ||
झूठा समझो यहाँ जगत , नहीं छोड़ना कभी भजन |
उसकी रहमत करे सफल , राह मिलेगें सरल सजन ||
|
(इस छंद में ” उसकी रहमत पाकर चल ” कर सकते थे , – पाकर चल ( पाक +र + चल = यति या पदांत नगण 111 ही बनता )
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महा मनमोहन छंद( मुक्तक ) ,
जिनके कारज करें अमन , वह होता है सदा सरल |
शिव शंकर वह बने सहज , पी जाता है सभी गरल |
देता है वह उदाहरण , अपनाता है आकर जग ~
अपनी रखता बात महज , जो लगती है सभी तरल |
तीसरे चरण में ” आकर जग ” भी एक त्रिकल व एक त्रिकल नगण बना रहा है , आप अपने सृजन में ऐसा संयोग आने पर प्रयुक्त कर सकते है
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महा मनमोहन छंद(गीतिका )
स्वर – आ , पदांत महल
बजी ईंट से ईट दहल , फिर भी मानें खड़ा महल |
पत्थर जिसके करे टपक , वह कहता है कड़ा महल |
गरल सींचते खड़ी फसल, पुस्तक रखने नहीं रहल |
उनकी लीला दिखे अजब , कहते मेरा जड़ा महल ||
झूँठ बोलते बात सहज , जिनको कोई नहीं गरज ,
बिखरे कंकण जहाँ दखल ,वे कहते है मड़ा महल |
धूल धूसरित जहाँ अकल , जिस पर होते वार सहज ,
दिखे नही कुछ चहल पहल , वह कहते है लड़ा महल |
अपने स्वर को कहें गजल , जिनकी बोली नहीं सरस ,
बेमतलब की करें टहल , बीच राह में गड़ा महल |
सुभाष सिंघई
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सुभाष सिंघई
आलेख उदाहरण ~ #सुभाष_सिंघई , एम. ए. हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र , निवासी जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०~
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15- सार छंद. (छन्न पकैया गीत )
सार छंद गीतात्मक मात्रिक छंद हैं , इसका एक रूप छन्न पकैया गीत भी हैं
( छन्न पकैया में प्रथम चरण एक तरह से गीत छंद की टेक हुआं करती है )
प्रथम चरण की मात्राए चौपाई की तरह १६ , दूसरे चरण की मात्रा १२ होती है. अर्थात, १६-१२ पर यति होती है
पदों के दोनों चरणान्त -२२ या २११ या ११२ या ११११) से होते हैं.
किन्तु गेयता के हिसाब से २२ से हुआ चरणान्त अच्छा रहता है
पदों के किसी चरणान्त में तगण (२२१), रगण (२१२), जगण ( १२१) वर्जित हैं
सार छंद 16-12 (यति व चरणांत चौकल )
सार छंद में गति चौपाई , सौलह पर यति जानो |
इसके आगे बारह मात्रा , चौकल की लय मानो |
कलन जहाँ पर चाल मिलाएं, गेय छंद तब प्यारा |
दीर्घ -दीर्घ से चरण समापन , दिखे छंद तब न्यारा ||
गीत. लिखो तुम छन्न पकैया, सृजन गीतिका प्यारी |
छंद- गीत-मुक्तक भी लिखना , कलम चलाना न्यारी ||
पद भी इसमे लिख सकते है , छंद लगे यह न्यारा |
सार छंद में सार लिखो तुम , कहना यही हमारा ||
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~
चार चरण में सार छंद
जहाँ कहीं चुुप रहना होता , लोग वहीं पर बोलें |
नहीं जहाँ पर जाना सबको,आसपास ही डोलें ||
करे सियासत अवसर की सब,बंद पोटली खोलें |
बात बढ़ाने के चक्कर में , लोग धूल को तोलें ||
खामोश समय जब हो जाता , लोग बदलना जाने |
खूब नाचती खाली बोतल, गाती मन. के गाने ||
रखें आरजू हम भी कितनी , अब उनको अपनाने |
मौसम का परिवर्तन होता , मिलते अजब तराने ||
दूर सदा जो फितरत रखते , नहीं पनपने देते |
वही एक दिन घायल होकर , दिल में नफरत सेते ||
भरी बदलियाँ जहाँ बरसती , वही बीज हम बोते |
पर कटुता के बृक्ष जहाँ है , वहाँ प्यार को खोते ||
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अब यही सार छंद में मुक्तक
जहाँ कहीं चुुप रहना होता , लोग वहीं पर बोलें |
नहीं जहाँ पर जाना सबको ,आसपास ही डोलें |
करे सियासत अवसर की सब,नहीं भरोसा यारो ~
बात बढ़ाने के चक्कर में , लोग धूल को तोलें |
खामोश समय जब हो जाता , लोग बदलना जाने |
खूब नाचती खाली बोतल, गाती मन. के गाने |
रखें आरजू हम भी कितनी , दुवां बनाए दूरी ~
मौसम का परिवर्तन होता , मिलते अजब तराने |
दूर सदा जो फितरत रखते , नहीं पनपने देते |
वही एक दिन घायल होकर , दिल में नफरत सेते ||
भरी बदलियाँ जहाँ बरसती ,वही बीज हम बोते ~
पर कटुता के बृक्ष जहाँ है , नहीं प्यार को लेते |
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🤑 गुस्से वाली बीवी 🤑
सार छंद आधारित गीतिका (16- 12 ) यति और पदांत चौकल
बड़े भाग्य से मिलना जानो , गुस्से वाली बीवी |
निज जीवन में अपना मानो , गुस्से वाली बीवी ||
काम समय पर हम सब करते , घर में चुपके आते ,
चंडी देवी ही पहचानो , गुस्से वाली बीवी |
सदा पड़ोसन छिटकी रहती, फिर भी उसे घसीटे ,
चित कर देतीं चारों खानो , गुस्से वाली बीवी |
कुल का वह इतिहास समेटे , छेड़ो बस तुम थोड़ा ,
खोल कुंडली करे बखानो , गुस्से वाली बीवी |
रिस्तेदार नहीं घर टिकते , नौ दो ग्यारह होते ,
उनका सहती नहीं बहानो , गुस्से वाली बीवी |
नंद मायके जब भी आए , काम उसे भी देती ,
देखे पिछला पेंच लड़ानो , गुस्से वाली बीवी |
रखे सास को अपने काबू , और ससुर चुप रखती ,
देती रहती उन्हें उरानो गुस्से वाली बीवी |
सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़) म० प्र०
~~~~~~~~~~~~~~~~~
आधार - सार छंद गीतिका
समान्त स्वर आते पदान्त श्री बजरंगी
मापनी - १६ + १२ मात्रा यति अन्त चौकल
पता लगाने सीता जी का , जाते श्री बजरंगी |
राम कृपा है मेरे ऊपर , गाते श्री बजरंगी |
बल से उड़कर लाँघा सागर , पहुँच गए जब लंका ,
मिली लंकिनी चंगुल में तब , लाते श्री बजरंगी |
घूमें लंका पहले पूरी , हर कोना भी देखा ,
राम भक्त भी संत विभीषण , पाते श्री बजरंगी |
पता मिला जब सीता माँ का, बाग अशोका पहुँचे ,
शीष झुका सीता से कहते , माते श्री बजरंगी |
भूख लगी कुछ परिचय देने , पूरा बाग उजाड़ा ,
लगा फलों का ढ़ेर मजे से , खाते श्री बजरंगी |
थाह लगाई रावण की भी , ताकत निज दिखलाई ,
बतला आए प्रभु से अपने , नाते श्री बजरंगी |
राम भजन भी जो करता है , हनुमत शरणा मिलती ,
इसीलिए तो हम सबको ही , भाते श्री बजरंगी |
सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र०
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सार छंद गीतिका
समान्त : ए स्वर पदान्त : हनुमत लाला |
द्रोड़ागिर पर्वत को लेकर , उड़ते हनुमत लाला |
संजीवन बूटी है इसमें , कहते हनुमत लाला |
लखन लाल के प्राण बचाने ,यह है आज जरूरी
काज सफल यह करना प्रभुवर, जपते हनुमत लाला |
उड़ते -उड़ते मिली अयोध्या , जहाँ भरत ने देखा ,
तीर लगा पैरों में सीधा , गिरते हनुमत लाला |
सभी भरत को हाल सुनाया , बोले अब मैं जाता ,
देर उचित अब नहीं हमारी , चलते हनुमत लाला |
सूरज कहता अब बजरंगी , जल्दी से तुम जाओ,
लखन लाल हित पूरे चिंतित , लगते हनुमत लाला |
पर्वत लेकर जैसे पहुँचे , राम कहें आभारी ,
कृपा तुम्हारी है यह प्रभुवर , झुकते हनुमत लाला |
राम भजन से ताकत मिलती , आकर सबसे कहते ,
राम शरण में सबने देखा ,रहते हनुमत लाला |
सुभाष सिंघई
~~~
आधार - सार छंद गीतिका
समान्त स्वर आरी पदान्त भूले
मापनी - १६ + १२ मात्रा यति अन्त चौकल
जिससे मेरी रही पुरानी वह अब यारी भूले |
फर्ज निभाया हमने पर वह, अपनी बारी भूले |
अपना मतलब पूरा करके , घर बैठे मुस्काते ,
बनते अब है चतुर सयाने , निज लाचारी भूले |
कैसे दिन थे याद नहीं है , आज सूरमा आली ,
साथ दिया था कैसे हमने , मेरी पारी भूले |
अहसानों को वह मत माने , नहीं लोटकर देते ,
अपने में वह मस्त रहे अब , दुनियादारी भूले |
आज सभी कुछ पा़्या प्रभु से ,नहीं भजन अब करते ,
कैसे दिन में किया गुजारा , संकट भारी भूले |
सदा काम में असफल होते , मित्र साथ तब देते ,
आज जीत का जश्न मनाते , बाजी हारी भूले |
कहे कहानी यहाँ 'सुभाषा ' , सदा रखी है फितरत ,
बने तोपची अब वह घूमें , सब उपकारी भूले |
सुभाष सिंघई ,जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र०
~~~~~
अब सार छंद में गीतिका अपदांत
खामोश समय जब हो जाता , लोग बदल कर जाने |
खूब नाचती खाली बोतल, गाती आकर. गाने ||
जहाँ कहीं चुुप रहना होता , लोग वहीं पर बोलें ,
नहीं जहाँ पर जाना सबको , बिखरे जलकर दाने |
करे सियासत अवसर की सब,बंद पोटली खोलें ,
बात बढ़ाने के चक्कर में , धूल डालकर छानें |
मौसम का परिवर्तन होता , करते उल्टी बातें ,
रखें आरजू हम भी कितनी , जिसको तत्पर माने |
दूर सदा जो फितरत रखते , नहीं पनपने देते ,
देख उसूलों की वह लगते , क्यो जाकर अपनाने |
भरी बदलियाँ जहाँ बरसती , वही बीज हम बोते ,
पर कटुता के बृक्ष जहाँ है , उगे वहाँ पर दाने |
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मेरा एक – सार छंद में (छन्न पकैया) गीत
धत् तेरे की – धत् तेरे की , उनकी गज़ब कहानी |
चुगली करके कहते सबसे , मै बोलूँ सच वानी ||
धत् तेरे की ||
धत् तेरे की – धत् तेरे की , उनकी कैसी बोली |
मुख से बोली छूटती , जैसे चलती गोली ||
धत् तेरे की ,
धत् तेरे की – धत् तेरे की , कैसे- कैसे नेता |
देता कहता है जो खुद को ,सबको लगता लेता ||
धत् तेरे की ,
धत् तेरे की – धत् तेरे की , नेता जी की पूजा |
जो जनता को पीछे मारे , तेज नुकीला सूजा ||
धत् तेरे की ,
धत् तेरे की – धत् तेरे की, जो जनता के आलम |
दाग लगाकर देते रहते , दोनों हाथों मरहम ||
धत् तेरे की ,
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मेरा दूसरा -सार छंद (छन्न पकैया) गीत-
गोरी कहती -गोरी कहती , मै अलबेली नारी |
चंदा सूरज मेरे प्रीतम , जिन पर मै बलिहारी ||
गोरी कहती -गोरी कहती ,
गोरी कहती- गोरी कहती , जो मेरे है साजन |
फूल खिलाते सुंदर-सुंदर , मेरे मन के आंगन ||
गोरी कहती -गोरी कहती ,
गोरी कहती- गोरी कहती , चंदा गाता गाना |
मेरे ही गालो पर खुद तिल, आ बैठा दीवाना ||
गोरी कहती – गोरी कहती ,
गोरी कहती-गोरी कहती नथनी का यह मोती |
मेरी सुंदरता से आई, इस पर जगमग ज्योति ||
गोरी कहती – गोरी कहती ,
गोरी कहती-गोरी कहती , काजल की यह रेखा |
तीर धनुष पर चढ़ता जानो,जग ने यह सब देखा ||
गोरी कहती – गोरी कहती ,
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( सार छंद 16- 12) गीत (यति और चरणांत चौकल )
चयनित विषय - पनिहारिन
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पनिहारिन के परिधानों को , आकर पवन झुलाए |
नीर कलश से छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||
पनिहारिन पगडंडी चलती , घूँघट से शशि झाँके |
सूरज अलपक देख रहा है , मोल स्वर्ण से आँके ||
रजत चमक भी लज्जित लगती , हीरा भी शरमाए |
नीर कलश से छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||
नैन कोर हैं तीर धनुष-से , घायल करनें तीखे |
रंग गुलाबी गालों को लख, अब गुलाब कुछ सीखे ||
केशों की लट बदली लगती , जब भी बाहर आए |
नीर कलश से छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||
कली केतकी लगे नासिका , लगते कर्ण चमेली |
श्याम वर्ण की भौहें लगती, कलियाँ नईं नवेली ||
दंत लगें मोती के दाने ,ओष्ठ जिधर खुल जाए |
नीर कलश से छलके बाहर,तन पर गिर मुस्काए ||
सुभाष सिंघई ,जतारा ( टीकमगढ़) म०प्र०( बुंदेलखंड) ✍️
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सार छंद , ( छन्न पकैया )गीत
उनका सुनते- उनका सुनते , रखते बड़ा खजाना |
ड़ेड टाँग की मुर्गी जैसा , अपना गाते गाना ||
उनका सुनते ~
उनका सुनते - उनका सुनते, गली - गली में हल्ला |
काम निकाले अपना पहले , फिर झाड़े वह पल्ला ||
उनका सुनते ~
उनका सुनते -उनका सुनते, वह सबके है नन्ना |
रखते अपने पास सदा है , वस बातों का भन्ना ||
उनका सुनते ~
उनका सुनते - उनका सुनते , सबसे बड़े खिलाड़ी |
पर मौके पर देखा उनको , निकले बड़े अनाड़ी ||
उनका सुनते ~
उनका सुनते - उनका सुनते , टेड़ा पढ़ा पहाड़ा |
आठ कहे वह दो का दूना , पाँसा फेकें आड़ा ||
उनका सुनते ~ √
सुभाष सिंघई
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सार छंद ( छन्न पकै़या गीत )
सौन चिरैया - सौन चिरैया , दिखे गाँव की गोरी |
दिखते उसके नयन कटीले , अलबेली है छोरी |
सौन चिरैया - सौन चिरैया ~
सौन चिरैया - सौन चिरैया , गोरी से सब बोलें |
बूड़े से बच्चे तक देखे , आस पास ही डोलें ||
सौन चिरैया - सौन चिरैया ~
सौन चिरैया - सौन चिरैया , मीठी उसकी बोली |
गोरी चर्चित चढ़ी जुबाँ पर , सबको है हमजोली ||
सौन चिरैया - सौन चिरैया ~
सौन चिरैया - सौन चिरैया , छूटें हँसी फुहारें |
गोरी की गुण गाथा गाती , गाँव गली दीवारे ||
सौन चिरैया - सौन चिरैया ~
सौन चिरैया - सौन चिरैया , गोरी की सुन बातें |
सबको सपनों में आती है , मधुम़य लगती रातें ||
सौन चिरैया - सौन चिरैया ~
सुभाष सिंघई
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सार छंद में छन्न पकैया गीत
गंगा मैया - गंगा मैया , सबका तारण करती |
लोग गंदगी डाले उसमें , देखें उसे सिसकती ||
गंगा मैया - गंगा मैया ~
गंगा मैया -गंगा मैया , मोक्ष दायनी जाने |
फिर भी उसमे डाले नाले , बात न कोई माने ||
गंगा मैया - गंगा मैया ~
गंगा मैया - गंगा मैया , करती पावन सबको |
छेड़छाड़ मैया से करते , शर्म न आती हमको ||
गंगा मैया -गंगा मैया ~
गंगा मैया - गंगा मैया , कष्ट झेलती रहती |
बहती रहती पीड़ा लेकर, नहीं किसी से कहती ||
गंगा मैया -गंगा मैया ~
गंगा मैया - गंगा मैया , देख रही सरकारें |
वादे उसको मिलते रहते , देगें तुम्हें बहारें ||
गंगा मैया - गंगा मैया ~
सार छंद , छन्न पकैया गीत , 16 - 12 यति व चरणांत चौकल
गोरी हँसती - गोरी हँसती , गड्ढे गालों पर है |
सिर से लट बहती सी लगती, मानो यह निर्झर है ||
गोरी हँसती - गोरी हँसती ~
गोरी हँसती - गोरी हँसती ,बस हम इतना माने |
दंत चमककर सुषमा देते , ज्यों अनार. के दाने ||
गोरी हँसती - गोरी हँसती ~
गोरी हँसती - गोरी हँसती , मुख से निकले बोली |
बहती तब रसधार सुहानी , खुश्बू चंदन. रोली ||
गोरी हँसती - गोरी हँसती ~
गोरी हँसती - गोरी हँसती , हिलती उसकी भौहें |
मोर नाचता जब भी वन में , ऐसी हमको सौहें ||
गोरी हँसती - गोरी हँसती ~
गोरी हँसती - गोरी हँसती , लगती है मन भावन |
ग्रीष्म ऋतु में जैसे आया , उमड़ जमी पर सावन ||
गोरी हँसती - गोरी हँसती~
सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ) म०प्र०
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विभावना अलंकार में सार छंद
कागा को सम्मान मिला है, हंस मिला है रोता |
गर्दभ कुर्सी पर बैठा है , पंछी बोझा ढोता ||
मोर छात्र अब कहलाता है , गधा नृत्य सिखलाता |
दानवीर लाचार दिखा है , कृपड़ बाँटता जाता ||
सभी सपेरे नाच रहे है , नागिन बीन बजाती |
नदिया पर्वत. चढ़ती जाती , मछली भू लहराती ||
बोल बंद है अब गायक के , गूँगा सुर को भरता |
कहे " सुभाषा" इस दुनिया में , सिंघा देखा डरता ||
मुक्तक (विभावना अलंकार )में (सार छंद)
सत्य परीक्षा देने जाता , झूठा कापी जाँचे |
यजमान बना है अब हंसा , कागा पोथी बाँचे |
बना शिकारी चूहा घूमे , शेर दिखा अब छिपता~
महल अँधेरे में डूबा हैं , इठलाते अब ढाँचे |
सूरज को तपने से रोकें, उड़ते छोटे बादल |
उजला होकर नूर दिखाता , कल का काला काजल |
अब चरित्र की हँसी उडाते , मिलकर के खल कामी ~
कुचक्र जहाँ में चल जाते है , नीतिवान अब घायल ||
पास हुआ है झूठा जग में , सत्य परीक्षा देता |
उपदेश बाँटते सूरज को , जुगनू बने प्रणेता |
हार जीत के खेल दिखावा , जिसमें सब ही उलझे~
निर्णय पहले ही रख लेता , वर्तमान का नेता |
सम्हल-सम्हल कर चलना है , कहते बड़े सयाने |
जान बूझकर अपने घर में , करना नहीं फसाने |
आँख मूँदकर नहीं भरोसा , अंजानों पर करना ~
भेद बताने के पहले अब , उसका परिचय जाने |
मीठी -मीठी बातें करता , आकर के गुण गाता |
आगे पीछे दौड़ लगाता , बातें सभी सुनाता |
नहीं कान को कच्चा रखना , आँखे धोखा खाती ~
जहाँ सत्य हो कैदी जैसा ,समझों गड़बड़ खाता |
आज देश में चल जाती हैं , जुमलों की बौछारें |
रहे भीगती जनता जिसमें , करती जय-जयकारें |
नए-नए जुमले भी मिलते, काम इसी से चलता ~
जनता सपने देखा करती , अनुभव करे वहारें |
जुमलों की बौछारें चलती , वादो की वरसातें |
मेरे भारत में लगती है जनता को सौगातें |
जुमले लगते सबको अच्छे , सभी पीटते ताली ~
गली - गली जुमलो की चर्चा, वादो की भी बातें |
सुभाष सिंघई
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मुक्तक आधार (सार छंद , 16 - 12 ,)यति व चरणांत चौकल से, #चिठ्ठी पर चार मुक्तक
पा जाते थे सब संंदेशा , हम पाकर चिठ्ठी में |
पूरे रिश्ते जुड़ जाते थे , तब आकर चिठ्ठी में |
आनंद बहुत छा जाता था , चिठ्ठी की खुश्बू से~
नजर गड़ाकर पूरी पढ़ते , सब जाकर चिठ्ठी में |
लिए डाकिया जब आता था , समाचार चिठ्ठी में |
सभी खोजते अपना-अपना, जुड़ा तार चिठ्ठी में |
सभी धरोहर-सी रख लेते , जैसे सोना चांदी ~
कण पराग से लगते सबको , है वहार चिठ्ठी में |
परिवार जोड़कर रख देता , रस रहता चिठ्ठी में |
भाव भंगिमा हमने देखी, सब ,बहते चिठ्ठी में |
इधर उधर जो घूमे हरदम , दोड़ा ही आता था~
राम-राम क्या हमको भेजा , सब कहते चिठ्ठी में |
एक जमाना बीत गया है , अनमोल रही चिठ्ठी |
अहसासों की रानी बनकर , बसी हृदय में चिठ्ठी |
हलचल कर देती थी घर में , बिखरा देती खुश्बू ~
रिश्ता जोड़ बनाने में तब , सूत्र रही है चिठ्ठी |
©®सुभाष सिंघई जतारा
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कुण्डल/उड़ियाना छंद [सम मात्रिक]
विधान – इसके प्रत्येक चरण में 22 मात्रा होती हैं,
12 - 10 पर यति होती है
मापनी- कुंडल - 633 , 6 2 2
मापनी - उड़ियाना 633 , 6 112
प्रत्येक चरण में पहली यति से पहले त्रिकल आवश्यक है
उपरोक्त दोनों छंदों में कुल चार चरण होते हैं,तुकांत दो-दो चरण या चारों भी एक से हो सकते है
कुंडल छंद
दर्प सर्प जहां कहीं , मानव में रहता |
कटुता की बात सदा, वचनों से कहता ||
सम्मुख भी यदा कदा ,आ. जाए नहला |
सभी काम छोड़ तभी, तुम मारो दहला ||
मद से भी भरा जहाँ , चलता है हाथी |
उसको भी वहीं छोड़ , भागें सब साथी ||
दिखता है दर्प जहाँ ,तब सब जन भागें |
दूर-दूर सभी रहे , चुपके से त्यागें ||
(मुक्तक के लिए - रहते है दूर-दूर , मिट जाती थाथी )
दिखती है खार जहाँ , समरसता रोती |
लोगों के बीज वचन , कटुता है बोती ||
लोगों के हाल सुने , हमने भी लेखे |
हर पल में खीज रहे , खोट साथ देखे ||
(मुक्तक के लिए - हर पल में खीज रहे ,खोट साथ होती ||
उड़ियाना छंद
कटुक वचन जहाँ सुने, आता है सहना |
हँसकर ही सुनें कहें , सदा सहज रहना ||
धार नेह भी अपनी , सदा खर्च करना |
रार खार भी न रहे , रुकता है जलना ||
(मुक्तक के लिए तीसरी पंक्ति -
(अपनी भी धार नेह , सदा खर्च करिए )
© सुभाष सिंघई एम•ए• हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
आलेख- सरल सहज भाव शब्दों से छंदों को समझानें का प्रयास किया है , वर्तनी व कहीं मात्रा दोष हो तो परिमार्जन करके ग्राह करें
सादर
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17-मुक्तामणि छंद [सम मात्रिक].
विधान – 25 मात्रा, 13,12 पर यति,
विषम चरण में यति 12
चरणान्त में वाचिक भार 22 या गागा l
कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत l
सरसता- दोहे के सम चरणों के पदांत को २१ की जगह २२ करने से एक मात्रा बढ़कर यह छंद सहज बन जाता है ,|
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मुक्तामणि छंद
अपना हित ही देखना , नहीं बुरीं हैं बातें |
पर ऐसा मत कीजिए ,चलें किसी पर लातें ||
शोर मचाने से नहीं , कभी बरसता पानी |
रटत- रटत हरि नाम भी , तोता बना न ज्ञानी ||
एक अनीति कर गई , रावण की बदनामी |
करते जो ताजिंदगी , क्या समझेगें कामी |
ज़ख्म कुरेदे जग सदा , देकर चोट निशानी |
आरोपों को थोपता , करता है नादानी ||
छाया के सँग फल मिलें, और दाम भी मिलते |
पर पत्थर मत मारिए , आम पेड़ जब लगते ||
हम समझे हालात को , हल करने की ठानी |
हाथ जलाकर आ गए , कड़वा पाया पानी ||
मिलती रहती हैं यहाँ , मतलब की सब यारी |
अजमाकर भी देख लो, दिल में चुभे कटारी ||
देखो इस संसार में , तरह-तरह के रोगी |
सबके अपने योग हैं , दाँव पेंच उपयोगी ||
ज्ञानी अब सब है यहाँ , कौन करे नादानी |
नहीं मुफ़्त में बाँटिए , अपना अनुभव पानी ||
माल बाँटिए मुफ़्त में , कमी निकालें खोजी |
कचरा जाओ बेचनें , चल जाती है रोजी ||
मुक्तामणि मुक्तक 13-12
संकट से हो सामना , एक परीक्षा जानो |
अनुभव मिलता है नया , कथ्य सत्य यह मानो |
साहस सँग पुरुषार्थ से , संकट सब टल जाते -
अपने अंदर झांककर, अपना बल. पहचानो |
एक धनुष की टूट से , मान भँग कई मानो |
रावण ,राजा,वीर सब, विश्वमित्र ऋषि जानो |
रचा स्वयंवर मानिए ,परम बम्ह की माया ~
मनुज रूप में ईश की , लीला को पहचानो |
देख रहे कविगण जगत,अपना लिखा पढ़ाते |
दूजों का जब सामने , इधर-उधर हो जाते |
पोस्ट पटकते थोपते , दौड़ लगाते भाई ~
मिलती है जब टिप्पणी , तब ही बापिस आते |
शत प्रतिशत टीकाकरण ,बात सभी यह मानो |
कोरोना से जंग का , एक भाग यह जानो |
धन्यबाद सरकार का , अपने दिल से कीजे ~
लहर तीसरी दूर हो , समय आ़ज पहचानो |
जो कोरोना से मरे , वह कहते महामारी |
बीमारी बतला रहे , बचने बाले भारी |
अब तक जो बचते रहे ,वह ही भाषण देते -
मास्क बांध घर में रहो , नौटंकी सरकारी |
प्रलयकाल तूफान सा , कोरोना है आया |
त्राहमाम है विश्व में , सबको यहाँ रुलाया |
साहस के अब तेज से, सूरज नया उगाओं ~
गहन निराशा दूर हो , हटे अँधेरी छाया |
कोरोना की मार का , कष्ट निकट था आया |
बहुत मिली सद्भावना , सम्बल सबसे पाया ||
साहस को खोया नहीं , नाम नहीं प्रभु भूला ~
जिसके कारण अब हुई , आज निरोगी काया |
हाल सभी यह देखते , साथी लगे बिछड़ने |
आसपास के खास भी, रिश्ते लगे सिकुड़ने |
फिर भी इस संसार में , रहना हमको यारो ~
हिम्मत की बुनियाद से, अवसर सभी पकड़ने |
रोद्र रूप धारण करे , हम दुश्मन के बास्ते |
पैर तले हम फूल है , हर सैनिक के बास्ते |
जज़्बात नहीं पूँछना , सुभा देश के लिए ~
गर्दन अपनी कटा दे , मां भारती के बास्ते |
एक गिलहरी राम जी , अपलक निहारते है |
बालू डाले सेतु में , तब ही पुकारते है |
योगदान को देखकर, भाव समझ उपकारी -
उसे चढ़ाकर हाथ पर , जीवन सुधारते है |
काज राम का कर रही , एक गिलहरी भोली |
रेत देह की सेतु में , करती रहती घोली |
पास बुलाया राम ने , बोले तू उपकारी -
योग तुम्हारा भी लिखा , प्रभु की निकली बोली |
(कुछ मुस्कराने के लिए )
जुखाम पीड़ा में आप से परामर्श 🙏🤔
( मुक्तामणि छंद मुक्तक)
सौंठ कुचल कर लोंग सँग , अजबाइन भी खा ली |
कड़वा काढ़ा पी गये , विक्स नाक में डाली |
अंतिम बचा उपाय अब , क्या यह हो पायेगा -
फ्राई कर दे नाक को , क्या मधुशाला वाली ||🤑🙏
यहाँ धरा के साथ में , अम्बर निहारता हूँ |
हालात देखकर सभी , रब को पुकारता हूँ |
दिख रही कयामत में , साहस की डोरी से -
तन्हाई आराधना , से खुद सँवारता हूँ |
वहाँ मकानों पर दिखे , जो जले उजाले है |
दीनों के मुख से छिने , वह लगे निबाले है |
दिखती चेहरे पर चमक, जितनी भी तुम मानो-
उतने ही अंदर सुनो , वह दिल के काले है |
कवि कुल की है भूमिका , ऐसी कविता बोले |
साहस का संचार रहे , जन-जन का मन डोले |
जहाँ निरासा देख लें , बिखराए मुस्कानें ~
बीमारी भी दूर हो , नेह सभी पर खोले |
देते है बलि प्राण की , मेरे वीर सिपाही |
रखें सुरक्षित सीमाएं, दिखे तिरंगा शाही |
जहाँ देश में हो युवा, जज़्बे से बलिदानी-
वहाँ राष्ट्र को जानिए ,है विकास का राही
बली उसी को मानिए , क्षमा हृदय में धारे |
पर सेवा उपकार में , जीवन सदा गुजारे |
महाबली हनुमान है , जीवन उनका देखो ~
सबके संकट टालते , जो भी उन्हें पुकारे |
झाडू देकर हाथ में , पत्नी करे इशारा |
घर बैठे कुछ कीजिए , बनता फर्ज तुम्हारा |
इस कोरोना काल ने, दिन भी क्या दिखलाया~
पोंछा बाला बन गया ,घर में पति बेचारा |😊🙏
मै आटा को गूँथता , जब भी पके रसोई |
पत्नी रोटी सेंकती , मैं भी बेलूँ लोई |
हम पत्नी के साथ में , काम न समझें ओछा ~
पोंछा तक भी मारकर ,कमी न रखता कोई |😊🙏
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विषय - राखी
राखी का त्यौहार है , रिश्तों की नव लोरी |
रेशम धागे प्रीति की , पक्की करते डोरी ||
राखी जिसने बांधकर , बहिना को पहचाना |
बहिना ने शुभकामना , मन से गाया गाना ||
भाई बहिन न भिन्न है , राखी कहती मानो |
एक सूत्र के छोर है , बंधन इनका जानो ||
पावन राखी जानिए , रिश्तों की मजबूती |
भ्रात बहिन की डोर यह , आसमान को छूती ||
सजी कलाई कह रही , अनुपम भाव सुहाना |
भैया का मंगल सदा , प्रभुवर आप निभाना ||
जुड़ा बहिन से भ्रात है ,कहते राखी धागे |
सब मंगल भी साथ है , समझो इसके आगे ||
रक्षाबंधन निकट हो , यदि कारण वश दूरी |
दोनो करते याद . है , रहती है मजबूरी ||
राखी धागा नेह का , इसकी शान निराली |
करता गान सुभाष है , पावन यह उजयाली ||
©सुभाष सिंघई एम•ए• हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
जतारा (टीकमगढ)म०प्र०
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मुक्तामणि कुंडल
हिंदी में अनेक छंद हैं , और गेयता के आधार पर नए छंद भी सृजित हो जाते हैं , कुछ विद्वान जितना पढ़े हैं , उससे आगे कुछ स्वीकार ही नहीं करते हैं, प्रलाप विवाद के अखाड़े में ताल ठोकने लगते हैं , खैर इस विषय को यहाँ छोड़ते हैं
यहाँ हम चर्चा कर रहे है , मुक्तामणि छंद से आधारित मुक्तामणि कुंडल की | कुंडल कान में पहनने बाला एक गोल आकृति का आभूषण है , यह आकृति जहाँ से प्रारंभ होती है , वहीं पर आकर समाप्त होती है
मुक्तामणि कुंडल की शैली , कुंडलिया , कुंडलिनी से ली गई है
विधान मुक्तामणि छंद का व शैली कुंडलिया कुंडलिनी से है
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मुक्तामणि छंद -
गान धवलता से नहीं , होता है उजयाला |
बदबू कचरा ढ़ेर हो , क्या कर देगा ताला ||
(इस छंद में अधोलिखित सृजन से मुक्तामणि कुंडल बन जाएगा )👇
क्या कर देगा ताला , चाहते पूर्ण सफलता |
दूर हटाना गंदगी , पाएं गान धवलता ||
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{इसी तरह नीचे लिखा सृजन मुक्तामणि छंद एव मुक्तामणि कुंडल समझिए ) मुक्तामणि कुंडल में छंद का चौथा चरण ही पांचवा , (१२ मात्रा) रहेगा व आगे छटवाँ १३ मात्रा का हो जाएगा , पर सातवाँ , आठवां अपने विधान १३-१२-पर रहेगा |तथा जिस चौकल शब्द से प्रारंभ किया था , उसी चौकल शब्द से समापन होगा | यह कुंडल चौकल से ही प्रारंभ करना होगा क्योकि इसमें चरणांत २२ मात्रिक होता है
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अपना गाकर गान जो, अपनी बाजू ठोके |
उनको तोता मानिए , कौन उसे क्यो रोके ||
+👇
कौन उसे क्यो रोके, पालकर झूठा सपना |
विषधर बनते दर्प के, घात करें खुद अपना ||
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रखता जीवन में सही , जो भी नेक इरादा |
उनका भी ईश्वर सदा , पूरा करता वादा ||
+👇
पूरा करता वादा , सत्य सुभाष. अब कहता |
मिली सफलता जानिए, जो जीवन शुचि रखता ||
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भोले ऊपर से दिखे , चालाकी हो अंदर |
क्या कर बैठे कब कहाँ , समझो उनको बंदर ||
+👇
समझों उनको बंदर , डाल से चीं चीं बोलें |
अपना ही हित साधता, बनता जग में भोले ||
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कागा कपटी बोलता , हमें मोर ही जानो |
काँव - काँव करता रहे , कहे गीत ही मानो ||
+👇
कहे गीत ही मानो , लहराकर एक धागा ||
कहता रस्सी जानिए , धोखा देता कागा ||
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माली देखो बाग का , नेह सभी से रखता |
फूलों की माला बने , उपवन पूरा हँसता ||
+👇
उपवन पूरा हँसता , देखिए बजती ताली |
बंदन होता बाग का , हर्षित रहता माली ||
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मुख में भरकर गालियाँ, जो भी नभ में थूके |
खुद के मुख पर लोटता , कर्म यहाँ पर चूके ||
+👇
कर्म यहाँ पर चूके, लगाकर आगी सुख में |
अमृत को तज आदमी,रखता विष को मुख में ||
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©सुभाष सिंघई
एम•ए• हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र जतारा (टीकमगढ)म०प्र०
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18 शैलजा छंद { २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा)
शैलजा छंद { २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा) )
जीव जगत देखा संसारी , बोझा ढोता |
कठपुतली सा नचता रहता, हँसता रोता ||
लोभी धन का ढेर लगाता, फिर भी खोता |
हाय-हाय में खुद ही पड़ता, जगता सोता ||
बरसे जब भी पानी पहला , हर रोम खिले |
बादल बने प्यार का दानी , शुभ गीत मिले ||
आसमान भी कहता सबसे , अब गेह तले |
आज सुखद सब मंगल होगें ,नव दीप जले ||
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( शैलजा छंद { २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा) )
मुक्तक ~
बीती बातें कटुता की सब , जो भी भूला |
कभी नहीं वह लाता मन में , कोई झूला |
साधु जनों की सुंदर बातें , सदा मानता -
अंधकार का उर में रहता , नहीं बबूला |
वचन सरस युत अच्छी लगती , सभी कहानी |
सब कुछ न्यारी बातें होतीं , यहाँ पुरानी |
नहीं कभी जो प्राणी माने , कटुता पाले ~
उसको हम सब कह सकते यह , है नादानी |
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गीत ( आधार शैलजा छंद )
{ २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा) )
नेता मतलब का अब सबसे, रखते नाता |
पीड़़ाएँ सब सहती जाती, भारत माता |
कसम तिरंगे की खाते हैं , देश बेंचते |
सरे आम जनता की जाकर , खाल खेंचते ||
चोर-चोर मौसोरे दिखते , सबको भ्राता |
पीड़ाएँ सब सहती जाती , भारत माता ||
अन्न उगाते कृषक हमारे , भूखे मरते |
खाद बीज के दाम न निकलें , कहने डरते ||
अन्न उगाकर रूखा -सूखा , भोजन पाता |
पीड़ाएँ सब सहती जाती , भारत माता ||
जन मन गण को गाते रहते , झंडा ताने |
जन गण का मन कैसा होता , बात न जाने ||
सभी जगह बेईमानी का , दिखता छाता |
पीड़ाएँ सब सहती जाती , भारत माता ||
मूर्ख समझते हैं जनता को , नीयत खोटी |
असर न उन पर कुछ भी होता, चमड़ी मोटी ||
जन का पैसा जन के आगे , लुटता जाता ||
पीड़ाएँ सब सहती जाती , भारत माता ||
सुभाष सिंघई जतारा~
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शैलजा छंद गीतिका
{ २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा) )
कीन्हीं गलती और न मानी , है नादानी |
कटु वचनों का देना पानी , है नादानी |
जिसके जैसे भाव रखे है , बाँटा करते ,
पड़ती है तब मुख की खानी, है नादानी |
करता मानव मारा मारी , क्रोधी बनता,
शांति नहीं कुछ भी पहचानी , है नादानी |
कपटी मिलकर धूम मचाते , करें तमाशा ,
रार हमेशा जिसने ठानी , है नादानी |
उल्टी सीधी चालें चलना , रचकर झूठी ,
मक्कारी की रचें कहानी , है नादानी |
फितरत करते रहते जग में , हर पल इंशा ,
कहते जब यह हवा सुहानी, है नादानी |
इस दुनिया में रहे सुभाषा , भजन न करते ,
हर पल करते नष्ट जवानी , है नादानी |
सुभाष सिंघ
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शैलजा छंद
{ २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा)
गोरी घर की छत पर चढ़कर, देखे अँगना |
सूरज तन को छूकर बोले , थोड़ा हँसना ||
पवन खींचकर घूँघट खोलें , छेड़ें कँगना |
बादल कहता मैं रस छोड़ूँ , थोड़ा रँगना ||
रात अँधेरी गोरी कहती , साजन आओ |
कितना चाहो तुम अब मुझको , कुछ बतलाओ ||
मन भी मेरा रूठा रहता , तुम समझाओ |
छूकर मेरा तन -मन देखो , कहीं न जाओ |
सुभाष सिंघई , जतारा (टीकमगढ़ ) म०प्र०
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(हमारे बुंदेलखंड में इस छंद का एक परम्परिक गीत बहुत प्रसिद्ध है काहे डारे गोरी दिल खौ ,अपने अँगना ।
काहे फरकत रात बिराते , तोरे कँगना ||
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शैलजा छंद
{ २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा)
मुक्तक -
याद तुम्हारी साजन आती , राह बताओ |
भेज अभी संदेशा कोई , हाल सुनाओ |
नहीं परीक्षा दे सकती हूँ , मैं चाहत की -
सूखे मन में पहले पानी , तुम बरषाओं |
चले गए हो जबसे साजन , रोती रहती |
कब आएगें कभी सहेली , आकर कहती |
हाल बताऊँ कैसे उसको , अपने मन का-
विरह अग्नि की अपने अंदर , लपटें सहती |
सदा मिलेंगें वहाँ अँधेरे , जहाँ उजाला |
सबकी देखी अपनी छाया ,रँग है काला |
जहाँ जीत है हार वहीं पर , है मड़राती -
चोर घूमते जहाँ लगाते , हम है ताला |
प्रश्न चिन्ह पर उत्तर मिलते , देखा हमने |
सभी भूल से सीखा करते , माना सबने |
राह पूछते चौराहे पर , आकर ठिठकें -
साथ माँगने पर ही आते ,खुद भी अपने |
राह बनाता कोई जग में , कोई चलता |
कोई जग में हाथ बजाता , कोई मलता |
सोच नहीं है सबकी मिलती, कभी एक -सी -
कोई सूरज उगता लगता , कोई ढलता |
वृक्ष लगाता बूड़ा घर का, फल सुत पाता |
लिखे गीत गायक को मिलते , नाम कमाता |
बाग सँवारे वन में माली, मिले न माला -
समझ न आते तेरे हमको , नियम विधाता |
सुभाष सिंघई
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शैलजा छंद गीतिका
{ २४ मात्रा .१६-८यति,अंत- दीर्घ (गा)
गीतिका, समांत स्वर - एँ पदांत - मुश्किलें
झिझके मन से गोरी बोली , मिलें मुश्किलें |
काले बादल बरसे अब तो , दिखें मुश्किलें |
चली गेह से मटकी लेकर , पानी भरने ,
रूप देखकर मचला मौसम , लगें मुश्किलें |
पवन उठाकर घूँघट पलटे , चेहरा देखे ,
बैठ कर्ण पर तितली उससे , कहें मुश्किलें |
बैठ गाल पर भँवरा कहता , रस है मीठा ,
यहाँ सहेली खुद ही आकर, सुनें मुश्किलें |
हाल जानकर लोग गये जब , कुछ समझाने ,
और अधिक भी आकर मन में, जगें मुश्किलें |
सुभाष सिंघई
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19 छप्पय छंद
कुंडलिया छंद के पहले , छप्पय छंद बहुत प्रचलन में था , इसका विधान भी सरल है | एक रोला छंद + एक उल्लाला छंद =छप्पय छंद |
उल्लाला छंद भी सरल है , उल्लाला के चारों चरण , दोहे के प्रथम चरण ( विषम चरण) जैसे होते है | उल्लाला को तेरह मात्रा की जगह पन्द्रह मात्राओं में भी लिख सकते है , पर तेरह मात्रा का ही सटीक रहता है ,
इस प्राचीन विधा में रोला में कोई - बात/परिस्थिति / समस्या / वर्तमान हालात रखकर या चित्रित करके , उल्लाला छंद से अपना संदेश कथन दिया जाता है जो समाज को छत्रछाया /छप्पय / या छप्पर / छतरी की प्रतिरुपता प्रदान करता है
सादर
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छप्पय_छंद )छंदों का भी विचित्र मेल है , एक दोहा +एक रोला =कुंडलिया
पर एक रोला छंद + एक उल्लाला छंद =छप्पय छंद (6 पंक्तियां )
उदाहरण ::--
कोष्ठक लगा पढ़ने पर 15-13 का उल्लाला हो गया व हटाने पर 13- 13 का उल्लाला ही रहा है (यह प्रयोग अभ्यास छप्पय में काम आएगा
(है )उनसे कैसी मित्रता , कटु विष जिसके पास है |
(पर )जिनको ऐसी निकटता, उनमें तब विष.खास है ||
(हम )गए खोजने यार घर , मक्खी है किस दाल में |
(जब) वापस आकर देखता, घर था मकड़ी जाल में ||
(हम )लोग सयाने हो गए, निज की करें न बात अब. |
(पर)कमी और में खोजना ,लगे रहे दिन- रात सब. ||
(अब )बिन दौड़े अंधा कहे , मेरी जानो जीत है |
(वह) बहरे से भी बोलता , मेरा सुंदर गीत है ||
(जब) नाच. रही थी लोमड़ी , कागा जिसका यार है |
(तब) भौचक हंसा देखता , होना क्या इस बार है ||
यह १५-१३-उल्लाला का अभ्यास था
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कुंडलिया के दोहा में कोई कथ्य जोरदार तरीके से कहकर , उसके रोला में समर्थन या उदाहरण दिए जाते है
पर छप्पय के रोला में बात कहकर ,उल्लाला से जो संकेत किया जाता है उसकी हृदय पर गूँज छपाक से हो जाती है व अमिट छाप रहती है
आयोजित छंद के लिए ऐसे रोला का अभ्यास करें , कि जिसमें नीचे रोला पर समर्थित एक और दमदार कथ्य का उल्लाला जोड़ा जा सके , जैसे ~
रोला
मौसी उनको मान , निभाता जिनसे नाता |
खुले आम. लूँ नाम , कहें हम विद्या माता ||
कलम हाथ में देख , शारदे देती सविता |
बने लक्ष्मी पुत्र, लिखें पर यारो कविता ||
रोला
जिसको अक्ल अजीर्ण, गान में निज की गाथा |
होता बंटाधार , रगड़ता रहता माथा ||
यह अभिमानी हाल , करे जब ऐसी गलती |
तब माचिस की आग , स्वयं पहले ही जलती ||
रोला
कुछ हैं बड़े महान , हमें हर चौखट दिखते |
करे न कोई काम , वहाँ पर लटके मिलते ||
मुरझाते हैं फूल , देखता रहता माली |
दिखता कदम प्रताप, बगीचा रहता खाली ||
यह रोला का अभ्यास था
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अब रोला में उल्लाला जोड़कर छापदार छपाक से पूरा छप्पय पोस्ट करना है ।
जैसे~मैं कर रहा हूँ
छप्पय~छंद 1
मौसी उनको मान , निभाता जिनसे नाता |
खुले आम. लूँ नाम , कहें हम विद्या माता ||
कलम हाथ में देख , शारदे देती सविता |
बने लक्ष्मी पुत्र, लिखे पर यारो कविता ||
कविता से अंजान हूँ , पर भावो का इत्र है |
मोसी मेरी शारदे , रिश्ता यहाँ पवित्र है ||
हमने यहां 13-13 का उल्लाला लगाया है ,यहां 15- 13का भी लगा सकते हैं, जैसी आपकी लय सुविधा हो ।
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छप्पय छंद 2
जिसको अक्ल अजीर्ण, गान में निज की गाथा |
होता बंटाधार , रगड़ता रहता माथा ||
यह अभिमानी हाल , करे जब ऐसी गलती |
तब. माचिस की आग , स्वयं पहले ही जलती ||
बदनामी के काम तज, चिंतन से लो चेतना |
यश के सोचो कर्म अब, सदा दर्प को फेकना ||
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छप्पय छंद 3
कुछ हैं बड़े महान , हमें हर चौखट दिखते |
करें न कोई काम , वहाँ पर लटके मिलते ||
मुरझाते हैं फूल , देखता रहता माली |
दिखता कदम प्रताप, बगीचा रहता खाली ||
कुछ लोगों के पग दिखें , होते बंटाधार हैं |
कदम रखें जिस भूमि पर , बँटती रहती खार है ||
~~~~~~~~~~~~
यह चमत्कार आप अपनी कुंडलिया में ही करके देखे, , आज
छप्प़य लिखने से कविगण दूर हैं , पर छप्पय नें एक समय मुकाम हासिल किया था ,
आज छंद के लिए , अपनी पुरानी या नई लिखी कुंडलिया लिखकर , उसके दोहा को, नीचे ले
जाकर , सम चरण के चरणांत में दो लघु या एक दीर्घ जोड़ने का अभ्यास करें, जिससे छप्पय बन सकता है
जैसे -
वह कुंडलिया जिससे ऊपर लिखा छप्पय छंद बनाया है
पहले कुंडलिया लिखना है , फिर उसी के नीचे लिखी कुंडलिया से छप्पय बनाकर लिखना है , ़यह छप्प़य लिखने का अभी आसान तरीका है व छप्पय को प्रचलन में लाना उद्देश्य है
वह कुंडलिया जिसको छप्पय में बदल रहे है
कुंडलिया -
बनता खुद ही पारखी ,कहता हम सरदार |
परख न पाता आदमी, ऐसा नर बेकार ||
ऐसा नर बेकार , घड़ी में रंग बदलता |
पर दाई से पेट , नहीं माता का छिपता ||
रखता कच्चे कान ,आंख भी अंधी रखता |
खाता रहता चोट , सदा खुद लल्लू बनता ||
अब इस कुंडलिया का छप्पय छंद बनाया है
👇
ऐसा नर बेकार , घड़ी में रंग बदलता |
पर दाई से पेट , नहीं माता का छिपता ||
रखता कच्चे कान ,आंख भी अंधी रखता |
खाता रहता चोट , सदा खुद लल्लू बनता ||
बनता खुद ही पारखी ,कहता हम हुश्यार हैं |
परख न पाता आदमी, ऐसा नर बेकार हैं ||
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( एक सम्पूर्ण रचना) उदाहरणार्थ छप्पय छंद
पल में लिया उखाड़ , बीज को बोकर सादा |
फल देने हर हाल , अभी पूरा कर वादा ||
कैसा है यह बीज ,नहीं फल इसमें दिखते |
बोते ही फल फूल , उगें हम यही समझते ||
(यह ) कैसे-कैसे स्वाँग है , देखते सभी ठहरकर |
(अब) पल भर में फल है कहाँ, और वह पूरे मन भर ||
( इस छप्पय में समाहित 15-13 उल्लाला की दोनों पंत्तियों में प्रारंभ ११ से है व अंत भी १११ से है)
यह १५+१३ का उल्लाला है = छप्पय छंद बन गया है
पर कोष्ठक में दिए गए ( यह ) अब )हटाने पर 13- 13 का उल्लाला लगा छप्पय बन जाएगा
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सादर
© सुभाष सिंघई (एम•ए• हिंदी साहित्य , दर्शनशास्त्र)
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
आलेख- सरल सहज भाव शब्दों से छंद को समझानें का प्रयास किया है , विधान से सृजन , वर्तनी, मात्रा दोष हो तो परिमार्जन करके ग्राह करें
सादर
~~~~~~~~~अब मेरे कुछ छप्पय छंद प्रस्तुत है ~~~~~
छप्पय छंद
मन का निर्मल गान , करे सिर पर सुख छाया |
जहाँ अपेक्षा त्याग , वहाँ हर्षित है काया ||
किसी-किसी को प्रेम , वहाँ होता है दुखदाई |
अपनी लेता मान , किसी की चीज पराई ||
मन अपना निर्मल रखो , नहीं पराई चाह हो |
दूजों का सम्मान हो , बस इतनी परवाह हो ||
देखा कुछ के गेह , बनी है जो कद काठी |
दरवाजे पर दर्प , खड़ा है लेकर लाठी ||
मैं मैं का ले ढोल , बजाकर करते हल्ला |
ज्ञानी उनसे दूर , झाड़ते अपना पल्ला ||
ऐसे जन जब भी मिले , रहना उनसे दूर है |
समझाना बेकार भी, मद जिनमें भरपूर है ||
पढ़कर पन्ने चार , कहें वह पढ़ ली पोथी |
अधकचरा रख ज्ञान ,बात भी करते थोथी ||
रखते मीटर एक , सभी को उससे नापें |
उनको सम्मुख देख, लोग भी थर थर कापें ||
ऐसे ज्ञानी जब मिले , हाथ दूर से जोड़िए |
आ जाए यदि सामने , जगह वहाँ की छोड़िए ||
ज्ञानी करता वार, रार भी जमकर ठाने |
करे सृजन का लोप , घात के बुनता ताने ||
बोल बड़े वाचाल , बात अचरज से लेखी |
गहन निशा से प्रेम, रार उजयाला देखी ||
वर्तमान हालात यह , पर करना कुछ काम है |
जितना भी अब हो सके , करना उजली शाम है ||
सूरदास रसखान , कदा पड़ जाते फंदे |
तब भी कुछ श्रीमान, टोकते सुनिए बंदे ||
मुझसे लीजे ज्ञान, कहाँ फिरते हो मारे |
हम है गुरु उस्ताद , छंद भी आते सारे ||
कहते लोग 'सुभाष'' से, मुझें करो स्वीकार तुम |
मैं हँसकर उनसे कहूँ , लगे सही सरदार तुम ||
मौसी उनको मान , निभाता जिनसे नाता |
आदर से लें नाम , कहें हम विद्या माता ||
कलम हाथ में देख , शारदे देती सविता |
बने लक्ष्मी पुत्र, लिखे पर यारो कविता ||
कविता से अंजान हूँ , पर भावो का इत्र है |
मौसी मेरी शारदे , रिश्ता बड़ा पवित्र है ||
होते जलती आग , चुभाते दिल में भाला |
कर्कष जिसके बोल,उगलते मुख से ज्वाला ||
कह सुभाष नादान वचन में भरी रँगोली |
सुखद मिले परिणाम , बोलकर मीठी बोली ||
देखे जग में कटु वचन , पूरे जलती आग हैं |
मीठी बोली बोलकर, खिलते पुष्प पराग हैं ||
जिनके हो तुम फूल , सदा वह साथ तुम्हारे |
कभी न तुमसे दूर , रहे वह सदा हमारे ||
कह सुभाष कवि जैन,हृदय से करो समर्पण |
कभी न जाना भूल , उन्हें तुम करके तर्पण ||
याद उन्हें करते रहो , पर मत जाओं भूल तुम |
जीवन में वह बृक्ष है, जिनके खिलते फूल तुम ||
करते रहते घात , सदा हिंदी को तोड़े |
पकड़ गधे की पूँछ , शेर में जाकर जोडे ||
बनते खुद मठधीश, सड़ी-सी लिखते पर्ची |
कहकर भोड़ाचार्य , लगाता उनको मिर्ची ||
मिर्ची उनको दे रहा , सीधी सच्ची बात है |
जो हिंदी के नाम पर , करते रहते घात है ||
सूर्योदय के पूर्व , दौड़ना तुम कुछ योजन |
रहना सदा निरोग,अधिक मत करना भोजन ||
उम्दा रहे शरीर , हँसी मुख मंडल लाना |
कह सुभाष नादान , उमर सौ की तुम पाना ||
भोजन थोड़ा कम करें , ज्यादा पीना नीर है |
मेहनत करना ठाठ से , उम्दा तभी शरीर है ||
ऐसे है श्रीमान , सूत्र भी याद नहीं है |
फिर भी रहे दहाड़ , गलत को कहें सही है ||
रहता मोन सुभाष , कहें क्या हम बंदो को |
भले मिले उस्ताद , जहाँ पर है छंदो को ||
छंदों को समझा रहे, पटलो पर उस्ताद है |
हिंदी का ठेका लिए , पर करते बर्वाद है ||
कारण प्रमुख दहेज, भार है बेटी घर में |
पिता लगे लाचार , जुड़ा दहेज है वर में ||
जाता है जिस द्वार , दहेजी उसको मिलते |
लेन देन की बात, तभी शादी को हिलते ||
गर्भपात में बेटियां , हो जाती निस्तेज है |
इसके सौ कारण में ,कारण प्रमुख दहेज है ||
रोगी अक्ल अजीर्ण, गान में निज की गाथा |
होता बंटाधार , ठोकते परिजन माथा ||
अपना गाते गान , दिखे पग उनके लोभी |
काम मदारी छाप , ठोकते दावा जो भी ||
जो भी अभिमानी रहा,छवि करता उत्कीर्ण है |
ऐसे नर को जानिए , रोगी अक्ल अजीर्ण है ||
मिलते हमें हजार , देखते हम पाखंडी |
बगुले बनते हंस , धर्म की लेकर झंडी ||
कह सुभाष नादान , घड़ा फूटेगा भरके |
बचा न कोई यार , एक भी गलती करके ||
करके एक अनीति ही , रावण जग बदनाम है |
करते जो अब रात दिन, उसकी जाने राम है ||
पुल ऊपर जलधार, प्रीति से सजन पुकारे |
गोरी है लाचार , खड़ी वह. बलम निहारे ||
देख रहे सब लोग , सभी को है मनभावन |
साजन -सजनी प्रीति , सुहाना कहते सावन ||
सावन में साजन खड़ा , नदिया के उस पार है |
बैरी बादल हो गए , पुल ऊपर जलधार. है ||
कहीं न होता मर्ज, अकेला ही वह रहता |
जिद्दी रहे स्वभाव , कष्ट भी खुद ही सहता ||
समझाना बेकार , प्रेम का नीर न बहता |
दिल से रहे कठोर ,बात भी बेतुक कहता ||
कहता है जो आदमी , हमें पड़ी क्या गर्ज है |
वह देखा संसार में , कहीं न होता मर्ज. है ||
नेता करे धमाल , नमक व्यानों में घोला |
होती वहाँ दरार , जहाँ पर उसने बोला ||
कह सुभाष कुछ सोच ,सभी रखते यह लेखा |
फट जाता है दूध , जहाँ नेता ने देखा ||
देखा नेता आजकल, रहता कुछ नाराज है |
भाषण की पूँजी लगी, मिले न उसका ब्याज है ||
भारत माँ की शान , हुए थे सभी इकट्ठे |
आजादी की चाह , दाँत गोरो के खट्टे ||
कैसी थी तलवार , सभी ने सुनी कहानी |
लड़ी शौर्य से खूब , यहाँ झांसी की रानी ||
रानी लक्ष्मी का सुनो , पहचानो बलिदान को |
नमन करूँ वीरांगना , भारत माँ की शान को ||
अच्छा रहे शरीर , खुशी मुख मंडल. आती |
लगे काज में चित्त , आभ चेहरे पर छाती ||
सूर्योदय के पूर्व , दौड़ना तुम कुछ योजन |
रहना सदा निरोग,अधिक मत करना भोजन ||
भोजन थोड़ा कम करें , ज्यादा पीते नीर है |
मेहनत करते ठाठ से ,उम्दा दिखे शरीर है ||
बन जाता जब भाव का, दही धवल सुखकार |
कलम मथानी हाथ की , मथकर देती सार ||
मथकर देती सार , चमकते उसके दाने |
चखते उसका स्वाद , परखते जिसे सयाने ||
कह सुभाष नादान , गुणीजन हाथों आता |
पारस जैसा काज , सृजन कंचन बन जाता ||
रुकते घोड़ा पैर , ऊँट भी मारे हाथी |
लगे बजीरा दीन , मरें पैदल - से साथी | |
लगते सब लाचार , जहाँ राजा भी हारे |
हुई चाल में भूल , चले हम बिना विचारे ||
बिना विचारे जब चलें ,यदि शतरंज बिसात पर |
प्रतिद्वन्दी चूके नहीं , लाता हमको मात. पर ||
लगते सब नादान , ज्ञान अब गूगल देते |
कुछ है त्रुटि अपलोड , उसे भी अपना लेते ||
देख रहे हम हाल , तर्क भी गूगल से तल |
कुछ करते है रार, जयति जय-जय हो गूगल ||
गूगल जी अब गुरु हुए , पाते है सम्मान. अब |
ज्ञाता लगते जगत के , बाकी सब नादान अब ||
दुर्जन देता घात , भरोसा कभी न करना |
देना सभी जवाब. नहीं तुम उससे डरना ||
कहता यहाँ सुभाष , मानिए. झूठा सपना |
आए. दुर्जन काम , कभी वह. होवे अपना ||
अपना भी करने लगे, आकर पीछे घात है |
नहीं पाप का काम तब , देना उसको मात है ||
छूटे हाथ लगाम , काम जब बिना विचारे |
रोता सिर को थाम , सभी को वहाँ पुकारे ||
भरा अहम् है भाव , वहाँ पर कौन. टिकेगा |
रहे समय खामोश , नहीं वह वहाँ कहेगा ||
रे मानव तू चेत जा , मान न कर संसार में |
अमृत सा आनंद है , जग के उपजे प्यार में ||
अधरों की मुस्कान , कटीले जिसके नैना |
चेहरे पर मधु भाव , बने हैं उसकी सेना ||
कह सुभाष नादान , महकता पूरा अंचल |
होते लोग निहाल , हृदय भी होता चंचल ||
सभी देखते कामनी , कंचन रूप समान है |
नारी का सुंदर रूप , अधरों की मुस्कान है ||
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किसको उसका भान , उसी का खेल खजाना |
किसकी यहाँ बहार , अभी तक किसने जाना ||
कहते है सब ग्रंथ , भावना करती नाता |
अंतस करे निखार , राम जी मंगल दाता ||
दाता सबके है वही , जगत उन्हीं का जानिए |
रामामय संसार है , बात सत्य यह मानिए ||
सच में दिखे कमाल, फर्क हम देखें इतना |
उससे उतना प्यार, काम है जिससे जितना ||
देख रहा संसार , खून के बंधन सस्ते |
स्वारथ के सब पृष्ठ , खुले हैं सबके बस्ते ||
रिश्ते देखे खून के, जिस पर उठें सवाल अब |
अंजानो से प्यार है, सच में दिखें कमाल अब ||
~~~~~~~
उल्लाला छंद विधान (चन्द्रमणि छन्द) सउदाहरण
उल्लाला छंद (चन्द्रमणि छन्द) - (यह.सम मात्रिक छन्द है)
इस छंद के हर चरण में 13-13 मात्राओं से कुल 26 मात्राएं या 15-13 के हिसाब से 28 मात्राएं होती हैं।
इस तरह उल्लाला के दो भेद होते है।
पर 13-13 मात्राओं वाला ही विशेष प्रचलन में है। और हम इसे ही उदाहरण में लेकर चल रहे है
दोहे के विषम चरण की तरह इस छन्द में 11वीं मात्रा लघु ही होती है। . चरणान्त मॆं तुकांत अनिवार्य हॊती है ।
पर 15 मात्राओं वाले उल्लाला छन्द में 13 वीं मात्रा लघु होती है।
या यूँ कह ले कि दोही का विषम चरण
13 मात्राओं वाले उल्लाला के विषम /सम चरण, बिल्कुल दोहे के विषम चरण के समान होते है
चरणांत दो लघु वर्ण अथवा एक गुरु वर्ण से हो सकता है।
चूकिं ग्यारहवी मात्रा लघु का नियम है तो चरणांत तीन लघु का भी कहकर कर सकते है
इस छन्द में बहर का कोई बन्धन नहीं होता है , शिल्प बिल्कुल दोहे के विषम चरण जैसा होता है
सीधी और सरल बात - उल्लाला छंद के चारो चरण , दोहे के विषम चरणों जैसे मापनी के एवं तुकांत सम चरणों में मिलाएं
इस छन्द को चन्द्रमणि छन्द भी कहा जाता है।
उल्लाला छंद
दीन न लेखन जानिए , करता है ललकार जब |
शब्द बाण चलते रहे , करके पैनी धार तब. ||
कलम धनुष ही मानिए, तीर बने है सार सब |
अनुसंधानी कवि लगे, लक्ष्य सृजन स्वीकार तब ||
(उपरोक्त 13 -13 के उल्लाला के सम चरणों मेंं पदांत 111 से है |जैसा दोहे के विषम चरण की यति में होता है )
अंतस के जब भाव का , कलम बनाती चित्र है |
शब्द सभी हैं बोलते , जैसे बिखरा इत्र है ||
यह "सुभाष' नादान बन , वहाँ तोलता मौन है |
महिमा कलम बखानती , यहाँ बोलता कौन है ||
उपरोक्त उल्लाला के सम चरणों में चित्र - मित्र व मौन -कौन की तुकांत मिलाई जाएगी | कुछ और छंद देखे
ज्ञानी प्रवचन में कहे , सब माया जंजाल है |
पर कुटिया के नाम पर , बँगला बड़ा विशाल है ||
वह हमको समझा गए, दुनिया बड़ी ववाल है |
मिलने जब मैं घर गया, देखा उल्टा हाल है ||
सबको आकर जोडिए, कितनी अच्छी बात है |
कहने बाले तोड़ने , लगे हुए दिन- रात है ||
खुदा नहीं रुपया यहाँ , कहने में है बात दम |
पर रब से भी कम नहीं , देख रहे दिन रात हम ||
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उल्लाला छंद में मुक्तक -
जीवन के दिन चार हैं , रटा खूब था ज्ञान को |
दो झगड़े में कट गए , दो सोंपे अभिमान को |
जीवन खोया खेल में , किया स्वयं बेकार है -
अंत समय घिघिया रहे ,याद करे भगवान को |
जीवन के दिन चार कुल, जिसमें गुणा न भाग है |
फिर भी जिसमें आदमी , पाता रहता दाग है |
मस्ती में जीवन कटा , लिया न प्रभु का नाम तब~
अब मरघट की राह क्यों , राम नाम का राग है |
जीवन के दिन चार है , करता संत सचेत है |
सोने जैसे हाथ में , थामे रहता रेत है |
जो कहते थे हम सदा , हरदम तेरे साथिया -
संकट आया जानकर, पास न कोई. हेत है |
या ( भाग गए सब खेत है )
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उल्लाला छंद में गीतिका
लिखता हिन्दी छंद से ,अब उल्लाला गीतिका |
हिंदी को पहना रहा, अब मैं माला प्रीतिका ||
खतना हिंदी कुछ करें , वर्ण शंकरी ज्ञान से ,
हिंदी वाले तोड़ते , है अब ताला नीति का |
टेक अंतरा भूलकर, भूले मुखड़ा शब्द ,
पूरक को भी छोड़ते , कुचलें जाला रीति का |
नुक्ता मकता थोपते , हिंदी छंद विधान पर,
खतना के औजार से , रुतवा डाला मीत का |
चेतो हिंदी ज्ञानियो , समझो मेरी बात. कुछ ,
मौसी हिंदी शब्द तज , खाला क्यों है पूत का |
सुभाष सिंघई
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उल्लाला गीतिका
मूरख. हो यदि सामने , बचे रहो तकरार से |
बेमतलव. की रार में, कीचड़ के उस पार से ||
यह कैसा बदलाव है , चुप बैठे अब हंस है ,
नागनाथ से दूर सब , बचे रहें फुसकार से |
न्याय कटघरे में खड़ा , मिलता नहीं गवाह है ,
आरोपो की सुंदरी , बुला रही रुखसार से |
बदल गए अब देखिए , हिंदी के विद्वान है ,
खतना करते छंद की , उर्दू की तलवार से |
बदल गए हालात है , मत सुभाष तू सोचना |
चलना सच्ची राह पर , अपने हंस विचार से ||
कड़वा लिखता तू सदा , मिर्ची लगती गात में |
मीठा लिखना सीख ले , बात कहूँ सच यार में ||
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उल्लाला छंद में गीत
शक्कर को ही देखिए , घुल. जाता मिष्ठान में | (मुखड़ा)
नहीं गुणों को भूलता , आ जाता पहचान में || टेक
सृजन धर्मिता नष्ट हो , समझो वहाँ अनिष्ट. है | अंतरा
कथ्य भटकता सा मिले , कर्म वहाँ तब.भ्रष्ट है ||
लगता अच्छा है नहीं, खल को भी उपदेश है |
बस मतलब की बात पर , उसका सब परिवेश है ||
पर सज्जन की बात कुछ, रहता सदा विधान में | पूरक
नहीं गुणों को भूलता , आ जाता पहचान में || टेक
गुनियाँ ग्राहक यदि मिले , वहाँ बेंचिए माल को |
देने मूरख को चले, निज की पीटा खाल को ||
नही दया हो जिस ह्रदय , उपज नहीं भू भाग जब |
वचन जहाँ हो कटु भरे , खोजों नहीं पराग तब ||
ढक देता बादल सदा , सहन. शीलता भान. में |
नहीं गुणों को भूलता , आ जाता पहचान में ||
नागनाथ से दोस्ती , कीजे सोच विचार कर |
मिले दंश उसका सदा , जहर वमन उपहार. दर ||
बेवश दिखती मित्रता , मानव भी लाचार है |
कोयल के घर पर दिखा , कागा का अधिकार है ||
शेर नहीं गीदड़ बने , नहीं किसी अहसान में |
नहीं गुणो को भूलता , आ जाता पहचान में ||
~~~~~~~~~~
गीतिका , आधार - उल्लाला छंद ~
(चारों चरण दोहे के विषम चरण का निर्वाह करते है)
ई स्वर ,
जब मुलाकात भी सजी , उससे उम्र की ढली में |
यादे नासूर सी जगी , नुक्कड़ वाली गली में |
आंसू सूखे हुए भी , वहाँ पिघलने थे लगे,
गंगा - सी बहने लगी , नुक्कड़ वाली गली में |
मुझे एकटक देखती , होंठ नहीं वह. खोलती ,
लगती जैसे वह ठगी , नुक्कड़ वाली गली में |
नहीं अंजाम था पता , बदली गलियों की हवा,
खता आवाज ही मिली , नुक्कड़ वाली गली में |
चल सुभाष इस गली से ,दूर इल्जाम है नहीं ,
सभी खिड़कियाँ दिलजली , नुक्कड वाली गली में |
सुभाष सिंघई जतारा
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-©सुभाष सिंघई
एम•ए• हिंदी साहित्य ,दर्शन शास्त्र
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आलेख- सरल सहज भाव शब्दों से छंद को समझानें का प्रयास किया है , विधान , वर्तनी व कहीं मात्रा दोष हो तो परिमार्जन करके ग्राह करें
सादर

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