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कह देता मैं आज सभी से , अपने मन की बातों को |
हिंदी के अब साथ सुनो जी ,पीछे चलती घातों को ||
हिंदी के आचार्य बने हैं , पर करते है उस्तादी |
दूजी भाषा बना रहे हैं , हिंदी छंदों की दादी ||
नहीं रगण को बतलाते है , फाईलुन कह समझाते |
गणसूत्रों पर नाक सिकोड़ें , अरकानों पर. मुस्काते ||
नहीं हमारी हिंदी याचक , दूर. करो खैरातों को |
कह देता मैं आज सभी से, अपने मन की बातों को ||
बैर नहीं हम पाला करते , सबकी अपनी शैली है |
हिंदी छंद विधानों की भी , अपनी निज की थैली है ||
दूजी भाषा अरकानों को , हिंदी छंदों में खोजें |
उस्ताद उन्हें कहकर देखों, मन में रखकर कुछ मोजें ||
बने सेकुलर ढ़ोगीं जोड़ें , उल्टे पुल्टे नातो को |
कह देता मैं आज सभी से, अपने मन की बातों को ||
यमाताराजभानसलगा: , इनकी अपनी आजादी |
काँट छाँट जो भी करता है , समझों उसको अपराधी ||
हिंदी सेवक हम सब भाई , मात् शारदे है माता |
अपनी मिली धरोहर में भी , रहना हमको है आता ||
अपनी- अपनी मर्यादा में , खोलो अपने छातों को |
कह देता मैं आज सभी से, अपने मन की बातों को ||
सुभाष सिंघई
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वह भाषा भी हिन्दुस्तानी , उसमें उस्ताद कहाते |
हिंदी में आचार्य.कहें हम , इतना सबको बतलाते ||🙏
सुभाष सिंघई
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[१०,८,१४ यति,दो यति पदानुप्रास, अंत--गागा ]
जीवन में जब गम , आते हरदम , तब लगता है कुछ हारा |
मधु गीतों को सुन ,पहचाने धुन ,तब लगता कुछ न्यारा ||
पद चिन्हों पर चल, आगे का कल, बनता है जहाँ सितारा |
बनतीअच्छी मति, जाने हम गति,बहती तब निर्मल धारा ||
पथिक देखता मग ,कैसा है जग , सदा जोड़ता वह नाता |
रखता अपनापन ,निर्मल है मन ,सबको समझे वह भ्राता ||
अंजाना है पथ , खाली है रथ ,फिर भी कहलाता दाता |
रखना है साहस ,आएगा रस , जग को वह है बतलाता ||
यात्रा अंतिम जब ,राह मिले तब ,मुक्ति धाम की है ज्वाला
छोड़ चला यह मन ,अपना निज तन ,जिसको था उसने पाला ||
नहीं आयगा कल, अंतिम है पल,चढ़े पुष्प बनकर माला |
लोग कहेगें बच , राम नाम सच ,जीवन मकड़ी है जाला ||
लोग कहेगें चल ,नष्ट हुए पल , अंतिम यात्रा तैयारी |
शाम हुई, अब, छोड़ गया सब , समय बड़ा है यह भारी ||
इतना था जीवन ,भोग गया तन , अब आगे है लाचारी |
करनी का श्री फल , आएगा ढल ,नई मिलेगी अब पारी ||
सुभाष सिंघई
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सार छंद 16- 12) गीत (यति और चरणांत चौकल )
पनिहारिन के परिधानों को , आकर पवन झुलाए |
नीर कलश से छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||
पनिहारिन पगडंडी चलती , घूँघट से शशि झाँके |
सूरज अलपक देख रहा है , मोल स्वर्ण से आँके ||
रजत चमक भी लज्जित लगती , हीरा भी शरमाए |
नीर कलश से छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||
नैन कोर हैं तीर धनुष-से , घायल करनें तीखे |
रंग गुलाबी गालों को लख, अब गुलाब कुछ सीखे ||
केशों की लट बदली लगती , जब भी बाहर आए |
नीर कलश से छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||
कली केतकी लगे नासिका , लगते कर्ण चमेली |
श्याम वर्ण की भौहें लगती, कलियाँ नईं नवेली ||
दंत लगें मोती के दाने ,ओष्ठ जिधर खुल जाए |
नीर कलश से छलके बाहर,तन पर गिर मुस्काए ||
सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
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काली -घनघोर अंधेरी रात -का सन्नाटा
हवा का साँय साँय -गाल पर था चॉटा
एक पीपल पर -चार भूत - अटके थे
दाँतों से अठ्ठहास किए उल्टे लटके थे
तभी वहाँ से निकली -एक कार
जिसमें नेता जी थे सवार
पीपल के नीचे , कार हुई बेकार
चालक घबराया , दिखने लगा लाचार
नेता जी कार से उतरे
लटके हुए भूतों के पास पहुँचे
बोले चलो, कार को , धक्के लगाओं
मुझे , मेरी मंजिल -तक पहुँचाओं
भूतों ने कहॉ -हीं हीं खीं खीं ,हम भूत है
मारे जाओंगे, हम यमराज के दूत है
नेता ने कहा -तुम भूत हो -तो हम वर्तमान है
शक्तिशाली -भाग्य विधाता , भगवान है
यदि तुम , मेरी राह में -डालोगे व्यवधान
तब हम तुमसे -जाय्दा बन सकते शैतान
कटवाकर यह पीपल -तुमको बेघर कर दूगॉ
जंगल साफ कराकर- बदला तुमसे ले लूगॉ
भूत डर गए वर्तमान से -उतरे गिड़गिड़ाए
पीछे जाकर ---कार को-- धक्के खूव लगाए
और अंत में जो बात
मै कहना चाहता हूँ~~~~~~~
"वर्तमान "को मिलकर -"भूत"--
धक्के लगा रहे है
भूतों का भय दिखलाकर
"वर्तमान "भी
"भविष्य " जला रहे है
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©®(सुभाष सिंघई)
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बुंदेली में चौपाई मुक्तक
टाँग हमाई वै अब खैचे , महुआ अपने दाखन बैचें ,
हमने कै दइ जो का करतइ -बौले बिट्टू उतरौ नैचें |
भुँजी भांग घर में है नइयाँ , फटी धरी है खिचऊँ पनैया,
फाँकत है लाखन की बातें -मटका- मटका अपनी कइयाँ
नाँय माँय की बात भिड़ातइ , थुथरी अपनी खूब चलातइ ,
कानौ अपनौ टैट न देखै - दूजी आँखें बींग बतातइ |
बनत फिरत है अब बै सूदे , साँसी कै गव इतै रबूदे ,
सेठ घरै गय भड़याई खौ - टाँग टौर लइ भागे कूदे ,
दही न उनको देखो जमतइ , शकल देख कै दुद्दू फटतइ ,
घास कौउ ना डारै उनखौ ,फिर भी अपनी पै पै करतइ |
खिरविर्री मूँछन खौ ऐठैं ,पंचायत में आगे बैठे ,
कौउ न उनखौ जब पुर्रैटे - काढ़ै नकुआ सै वैं घैटें |
उनकी काँ तक कहे कहानी ,नहीं काँउ खौं देवैं पानी ,
लुचइँ मसकवै आगे रत है - फिर भी कत अपने खौं दानी |
सबइ जगाँ पै दाँत निपौरे , फिरत रात है दौरैं दौरें,
लत्ता कौ वै साँप बनातइ -दूजी स्वापी खूब लटौरें
काम करत वै सब अड़बंगौ ,दोस्त करैं बातन से नंगौ ,
पूँछ उठा कै बाँड़ी बैठी -सबसे लैवें आकै पंगौ |
बना-बना बातन कौ भतुआ ,बुकरा सौ है चलतइ चबुआ
नाँय माँय से खबर सूँघ ले धरै गिद्द से उनकै नकुआ |
सुभाष सिंघई
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पिता अभी मोहताज है
(लेखक़-सुभाष सिंघई जतारा)
माँ का प्रसूति गृह में चिल्लाना
पिता की धड़कनें बढ़ जाना
लेता रहता ईशवर का नाम
छोड़कर सभी निज काम
साँसे भी उसकी थम जाती
जव आवाजाही बढ़ आती
रोने की आहट कानों में आती
छाती तक मिश्री-सी घुल जाती
हाथ जोड़़ कहता है परमात्मा
भेजी तूने मेरी दूजी आत्मा
बेटी कों वह लक्ष्मी माने
बेटे को कुल दीपक जाने
गंदा हो पर छाती से चिपकाए
राजा बेटा कह वह उसे बुलाए
उसे दूध भात ,खुद रुखी खाए
फिर हंसे यही पिता कहलाए
पढ़े लिखे जग में होबें मान
आगे बढ़ने का रखता अरमान
मॉ की ममता गुस्सा भी आ़ए
बिगड़ न जाए मन में घबराए
बेदर्द -बेरहम- कठोर हृदय-
पत्नी के व्यंग्य सभी सहता |
पर अंतरमन है कितना कोमल-
पिता अभिब़्यक्त नहीं करता |
माँ को ममता की देवी कहते
सच है नहीं कोई एतराज है |
किन्तु कोई ऐसा पद पाने -
पिता अभी मोहताज है ||
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स्वागतम् - हे नव वर्ष -
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स्वागतम् - हे नव वर्ष
अभिनंदन में हर्ष-हर्ष
जीवन पथ हो उत्कर्ष
प्रवल नवल चेतना दर्श
कड़वाहट हो-लोप विगत
पुण्य प्रसून खिले अक्षत
मानवता में नत हो मस्तक
पुरुषार्थ शिखर से नभ तक
शुचि गंगा नीर बहै ह्रदयांतर
राष्टहित मन हो ओज प्रखर
अमन-चमन हो गॉव शहर
खुशयाली हो डगर - डगर
शुभेच्छु रचनाकार- सुभाष सिंघई

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