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🌹जय माँ शारदे 🌹

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मंगलवत्थु (रोली छंद)














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समाधान उत्तर --चौपई (जयकरी छंद 21 गाल )के
 पुनीत रुप गागाल   221  में  


रखती   सुंदर  चम्पा  फूल | खुश्बू   रखकर करती भूल ||
भँवरा कहता  उसको बाँझ  | चम्पा रोती    ढलती  साँझ ||
मिले पराग न  उसके  भाग |  करता भँवरा उसका त्याग ||
लगती चम्पा    उसको  हीन | खुश्बू   रंगत  लगते   दीन ||

शिव को चम्पा से आनंद |  चम्पा खेली छल का छंद ||
बोली थी  नारद से   झूठ |  नारद जी तब जाते  रूठ  ||
देते    नारद  जी  है श्राप |    उतरे  तेरे    मद का ताप ||
मत पराग का होगा वास |    शिव आँगन से तेरा ह्रास ||

बुरी नियत का ले संज्ञान  |  आया   था  कोई  नादान ||
तब  देकर  चम्पा ने फूल |  जीवन में  की  भारी भूल ||
नारद  पूछें   तब  इंकार |     करे नहीं गलती स्वीकार ||
तब पराग का  सूखा नूर |     तब से चम्पा शिव से दूर ||

चम्पा  रोती  हरि  के   पास | मैं कहलाऊँ किसकी  खास ||
कहते   हरि  यदि तू   तैयार | राधा    कर  सकती  उद्धार ||
राधा   के  तू  आना    काम |  जिससे   मुझको है आराम |
राधा  पावन     इस  संसार |   मिले  उसे बस  मेरा प्यार ||

चम्पा  जाती   राधा   पास |  कहती कर‌‌लो मुझमें वास ||
अब तो हरि चरणों की धूल | सदा     सुधारें   ‌मेरी   भूल ||
राधा   चम्पा   बनके    फूल |  व्यंग्य बाण के सहती शूल ||
अपना     रखती छुपा  पराग | सिर्फ कृष्ण को देती भाग ||

भ्रमर  रहे  इस  नाते   दूर |  हरि ही   छूते  उसका  नूर ||
हरि का भँवरा  होता  दास | इस कारण मत जाए पास ||
राधा   रहती  चम्पा   फूल |  यादें हरि को यमुना कूल ||
चम्पा   उनको    है  स्वीकार | देते उसको अपना प्यार ||
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श्रीहरि -ब्रम्हा   है    तैयार |  पता लगाने  शिव आकार ||
ब्रम्हा    जाते    है   पाताल | भरें विष्णु जी नभ में चाल ||
श्रीहरि लौटे  खाली    हाथ |   नहीं   मिली  ऊँचाई नाथ ||
ब्रम्हा   लौटे  भरते   ओज  |     गहराई ली  हमने खोज  ||

कहें केतकी   सच है बात |  यहाँ  गवाही  दूँ  सौगात ||
कहते शिव है, करती पाप | सुनो  केतकी   मेरा श्राप ||
तुझे    डसेगें     मेरे    नाग | आज छोड़ता तुझसे राग ||
जग में तब से सहती शूल  |  नहीं केतकी चढ़ते  फूल ||

ब्रम्हा का भी गिरता  शीष |  झूँठ वचन जो बोला दीश |
बचे चार सिर   बोलें नाथ |  नहीं  हमारा  समझों साथ ||
ब्रम्हा का तब झुकता माथ |  क्षमा  माँगते    जोड़े  हाथ ||
महादेव   ही  जग  आधार |  जिनकी महिमा अपरम्पार ||

तब से ब्रम्हा   मुख है चार |  गिरा   पाँचवाँ   है  बेकार || 
नहीं बोलना  जग में  झूठ |  वर्ना  जाते  शिव जी रूठ ||
कहे  केतकी  मुझसे  भूल |  झूँठ उगा तन ,बनके  शूल ||
क्षमा   करो   हे , दीनानाथ | ‌सर्प  डसें  मत  मेरा   माथ ||

शिव कहते है  लेना पाल |  सर्प   रखेगें   तेरा ख्याल ||
नहीं झूँठ का   देना साथ |  देने पर  डस  लेगें   माथ ||
कहे  केतकी   जोड़े  हाथ  |  किस चरणों में जाऊँ नाथ ||
श्रीहरि ही  तब आए काम |  मिला केतकी  को आराम ||
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कहें  प्रिया हरि तुलसी आन |  श्रीहरि जैसा   दें   सम्मान ||
करें नहीं  हरिहर  स्वीकार |  बेल  पत्र को   बस  दें प्यार  ||
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शिव कनेर को  देते मान |  कहें लक्ष्मी की  ये  आन ||
शिवजी देते    है‌     संदेश | सबका अपना रहता वेश ||
लाल पुष्प में लक्ष्मी  मान | शिव खुद करते इनका गान ||
नहीं चढ़ाना शिव को आप | स्वीकारे   मत  इनकी जाप ||
(जाप =माला)
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किसने  समझा शिव  संदेश | क्या चाहें शिव  कैसा  वेश ||
जो भजते है शिव का  नाम |  उन   तक  मेरा   है  पैगाम ||
सदा    बुराई    देना    तोड़ | शिव के सम्मुख आना छोड़ ||
गरल आपका  कर लें  पान  | जग को अमरत  देते   दान ||

गरल कंठ  में  रखें  सम्हाल | नहीं   उतारे तन   में  काल ||
इस   लीला  से   दें   संदेश |  नहीं    बुराई   आवें     लेश ||
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सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ )म०प्र० 
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                   12
नील परिधान तन पर सुशोभित
घूँघट से चन्दा है झाँकता |
चलती है पनिहारिन पगडंडी पर
छलक कर अमृत-कलशों से भागता ||

रुप की राशी, सूरज भी देखता
किरणें भी ठहर स्तब्ध है  |
स्फटक मणि भी लज्जित खड़ी 
कवि की कल्पना नि:शब्द है ||

तीर-सी तीखी, नयनों की कोर है
बिंदु भी उसके सीप के है मोती |
गालो की लालिमा, गुलाव भी फीका
ललाट की आभा में, सृष्टि है सोती ||

नासिका केतकी की कली सुभाष
कर्ण है पुष्प चम्पा  चमेली |
दंत दाने अनार के है धवल
भौहे हैं श्याम वर्ण नई नवेली || 

        (सुभाष सिंघई)
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विधा -कविता (नारी का सोलह श्रृंङ्गार ) 

नारी के सोलह. श्रृंङ्गार में वासना नहीं  -
आराधना होती है |
देखकर आँखों को सुखकर लगे -
यह साधना होती है ||

हमारी संस्कृति नीरस नहीं ~   
वर्णन है सोलह. श्रृंङ्गार  का |
अनुपम उदाहरण है -
राधा- कृष्ण के प्यार का ||

लेकिन. श्रृंङ्गार के नाम पर-
लज्जा त्याग -अंग प्रदर्शन |
हमारी धरोहर नहीं देती -
इसको कोई भी समर्थन ||

मैं भी इंसान पुरुष वर्ग से-
सुंदरता का पुजारी हूँ |
लिखता हूँ श्रृंङ्गार पर ~
श्रृंङ्गार पर बलिहारी हूँ ||

श्रृंङ्गार पर लिखना ~ 
लिखना नहीं अपराध |
दृष्टिकोण है अपना ~
हृदय की है नौशाद ||

सुंदरता हो अनुपम न्यारी-
चेहरे पर आए  मुस्कान |
भरी भीड़ भी कर बैठे -
जिसका अद्भुत गुणगान ||

ऐसी सुंदरता श्रृंङ्गार का -
मैं शत-शत करता अभिनंदन |
स्वागत में  अर्पण करता-
भारत का अनुपम हल्दी चंदन ||

कविता में कवि भाव ~ 
प्रकट हो‌ जाते है | 
पर जो देते मोड़‌ ~ 
नहीं हाथ कुछ पाते है ||

©® सुभाष सिंघई
जतारा (टीकमगढ़)म०प्र
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गाँव 

मै गाँव गया था~मैने देखा है गाँव में 
अमुवॉ ~पीपल~ बरगद की छॉव में

खेत और खलिहान  लेखकर
मेहनत कश किसान देखकर 
बालाएं मेड़ो पर थी इठलाती
महिलाएं घूँघट से~ मुस्काती

पैजनियाँ बजती थी पाँव में 
मैं गाँव गया था - मैने देखा गाँव में ||

गगरी छलकत ~पनघट पर
बच्चें थे तालावों -के तट पर
बूड़े    देखे थे~  चौपालों पर
पगड़ी लगी हुई थी ग्वालों पर

मल्लाहें भी थे ~ नदियॉ की नाव में
मै गॉव गया था-मैने देखा है गॉव में

हमें देखकर बोली एक चिरैया
आओं~ कहॉ   से आए  भैया
 तोता  भी  बोला   राम राम
बछड़ा   बोला जय घनश्याम

अपनापन था हाव भाव में 
मै गाँव गया था , मैने देखा गाँव में 

लोगों ने घेरा -क्या है हाल
स्वीकारो मम भोजन थाल
कहा गॉव की आई. याद
आकर पाया यहाँ  प्रसाद

स्वागत में धूली लिपटी पाँव में 
मै गॉव गया था~मैने देखा है~गॉव में
              सुभाष सिंघई
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कह देता मैं आज सभी से , अपने मन की बातों को  |
हिंदी के अब साथ सुनो जी ,पीछे चलती   घातों को ||

हिंदी  के  आचार्य  बने  हैं , पर  करते  है   उस्तादी |
दूजी भाषा बना‌  रहे   हैं ,  हिंदी   छंदों   की  दादी ||
नहीं रगण को बतलाते है , फाईलुन  कह  समझाते |
गणसूत्रों पर नाक सिकोड़ें , अरकानों पर.  मुस्काते ||

नहीं  हमारी  हिंदी याचक ,  दूर. करो  खैरातों   को |
कह देता मैं आज सभी से, अपने मन की बातों  को ||

बैर  नहीं हम पाला करते  , सबकी  अपनी शैली  है |
हिंदी छंद विधानों की भी , अपनी निज की थैली है ||
दूजी भाषा अरकानों को   , हिंदी   छंदो‌ं   में  खोजें |
उस्ताद उन्हें कहकर देखों, मन में रखकर कुछ मोजें  ||

बने   सेकुलर ढ़ोगीं जोड़ें    , उल्टे  पुल्टे  नातो‌  को |
कह देता मैं आज सभी से, अपने मन की बातों को ||

यमाताराजभानसलगा:    ,   इनकी  अपनी  आजादी |
काँट छाँट  जो भी करता है , समझों उसको अपराधी ||
हिंदी  सेवक  हम सब भाई ,    मात्  शारदे  है   माता |
अपनी मिली धरोहर में भी  , रहना  हमको  है   आता ||

अपनी- अपनी  मर्यादा में , खोलो  अपने  छातों  को |
कह देता मैं आज सभी से, अपने   मन की बातों को ||

सुभाष सिंघई
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वह भाषा भी हिन्दुस्तानी , उसमें   उस्ताद  कहाते  |
हिंदी  में आचार्य.कहें  हम , इतना सबको बतलाते  ||🙏

सुभाष सिंघई

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पद्मावती मात्रिक छंद)

 [१०,८,१४ यति,दो यति पदानुप्रास, अंत--गागा ]

जीवन में जब गम , आते हरदम , तब लगता है कुछ हारा |

मधु गीतों को सुन ,पहचाने धुन ,तब  लगता  कुछ न्यारा ||

पद चिन्हों पर चल, आगे का कल, बनता है जहाँ  सितारा |

बनतीअच्छी मति, जाने हम गति,बहती तब‌ निर्मल धारा ||


पथिक देखता मग ,कैसा है  जग , सदा जोड़ता वह नाता |

रखता अपनापन ,निर्मल है मन ,सबको समझे वह भ्राता ||

अंजाना है पथ , खाली है  रथ ,फिर  भी  कहलाता  दाता |

रखना  है  साहस ,आएगा  रस , जग को वह है बतलाता ||


यात्रा अंतिम जब ,राह मिले तब ,मुक्ति धाम की है ज्वाला

छोड़ चला यह मन ,अपना निज तन ,जिसको था उसने पाला ||

नहीं आयगा कल, अंतिम है पल,चढ़े  पुष्प बनकर  माला |

लोग कहेगें  बच , राम नाम सच ,जीवन मकड़ी  है जाला ||


लोग  कहेगें  चल ,नष्ट  हुए  पल , अंतिम   यात्रा   तैयारी |

शाम  हुई, अब, छोड़‌ गया सब , समय‌   बड़ा ‌है यह भारी ||

इतना  था जीवन ,भोग गया  तन , अब  आगे  है लाचारी |

करनी का श्री फल , आएगा  ढल ,नई  मिलेगी अब पारी ||

सुभाष सिंघई 

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 सार छंद 16- 12) गीत (यति और चरणांत चौकल )

 चित्र विषय - पनिहारिन गीत

पनिहारिन के परिधानों को  , आकर  पवन  झुलाए |

नीर  कलश से   छलके बाहर, तन पर गिर मुस्काए ||


पनिहारिन पगडंडी चलती , घूँघट  से शशि  झाँके |

सूरज अलपक  देख रहा है , मोल स्वर्ण से आँके ||

रजत चमक भी लज्जित लगती , हीरा भी शरमाए |

नीर  कलश से छलके बाहर, तन पर  गिर मुस्काए ||


नैन  कोर  हैं  तीर  धनुष-से  , घायल करनें  तीखे |

रंग गुलाबी गालों को लख, अब गुलाब कुछ सीखे‌ ||

केशों की लट बदली लगती , जब  भी बाहर आए |

नीर  कलश से छलके बाहर, तन पर  गिर मुस्काए ||


कली केतकी लगे नासिका , लगते कर्ण चमेली |

श्याम वर्ण की भौहें लगती, कलियाँ  नईं नवेली ||

दंत लगें मोती  के  दाने ,ओष्ठ  जिधर खुल जाए |

नीर कलश से छलके बाहर,तन पर  गिर मुस्काए ||

सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

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मेरी एक पुरानी कविता {भूत )

काली -घनघोर अंधेरी रात -का सन्नाटा 

हवा का साँय साँय -गाल पर  था चॉटा

एक पीपल पर    -चार भूत - अटके थे

दाँतों से अठ्ठहास किए   उल्टे लटके थे


तभी वहाँ से निकली -एक कार 

जिसमें   नेता   जी थे    सवार

पीपल के नीचे , कार हुई बेकार

चालक घबराया  , दिखने लगा लाचार


नेता जी कार से उतरे 

लटके हुए  भूतों  के पास पहुँचे

बोले चलो,  कार को , धक्के लगाओं 

मुझे , मेरी  ‌ मंजिल -तक पहुँचाओं 


भूतों ने कहॉ -हीं हीं खीं खीं ,हम भूत है

मारे जाओंगे, हम यमराज के   दूत है


नेता ने कहा  -तुम भूत हो -तो हम वर्तमान है

शक्तिशाली -भाग्य विधाता  , भगवान है

यदि तुम  , मेरी राह में -डालोगे व्यवधान

तब हम तुमसे -जाय्दा बन सकते   शैतान


कटवाकर यह पीपल -तुमको बेघर कर दूगॉ

जंगल साफ कराकर- बदला तुमसे ले लूगॉ


भूत डर गए वर्तमान से -उतरे गिड़गिड़ाए

पीछे जाकर ---कार को-- धक्के खूव लगाए


और अंत में जो बात 

मै कहना चाहता हूँ~~~~~~~


"वर्तमान "को मिलकर -"भूत"--

धक्के लगा रहे है

भूतों का भय दिखलाकर

"वर्तमान "भी

"भविष्य " जला रहे है

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©®(सुभाष सिंघई)

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बुंदेली में चौपाई मुक्तक

टाँग   हमाई  वै अब खैचे ,  महुआ अपने  दाखन बैचें ,

हमने कै दइ जो का करतइ  -बौले   बिट्टू   उतरौ   नैचें |


भुँजी भांग घर  में है नइयाँ , फटी धरी है   खिचऊँ पनैया, 

फाँकत है लाखन की  बातें  -मटका- मटका अपनी कइयाँ 


नाँय माँय की बात भिड़ातइ , थुथरी अपनी खूब चलातइ , 

कानौ   अपनौ टैट  न देखै - दूजी  आँखें   बींग बतातइ |


बनत फिरत है अब बै सूदे , साँसी कै   गव  इतै   रबूदे , 

सेठ घरै गय   भड़याई खौ - टाँग टौर लइ   भागे  कूदे ,


दही न उनको देखो जमतइ , शकल देख कै दुद्दू फटतइ , 

घास कौउ ना डारै  उनखौ ,फिर भी अपनी पै पै करतइ |


खिरविर्री  मूँछन  खौ ऐठैं ,पंचायत    में  आगे   बैठे , 

कौउ न उनखौ जब पुर्रैटे - काढ़ै   नकुआ सै वैं  घैटें |


उनकी काँ तक कहे कहानी ,नहीं  काँउ  खौं  देवैं   पानी , 

लुचइँ मसकवै आगे रत है - फिर भी कत अपने खौं दानी |


सबइ जगाँ पै दाँत निपौरे , फिरत  रात  है दौरैं   दौरें, 

लत्ता कौ वै साँप बनातइ -दूजी  स्वापी खूब लटौरें 


काम करत वै सब अड़बंगौ ,दोस्त करैं  बातन से   नंगौ , 

पूँछ उठा कै   बाँड़ी  बैठी -सबसे लैवें  आकै   पंगौ |


बना-बना बातन कौ भतुआ ,बुकरा सौ  है चलतइ  चबुआ 

नाँय माँय से  खबर   सूँघ  ले धरै   गिद्द  से उनकै  नकुआ |

सुभाष सिंघई

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पिता अभी मोहताज है 

(लेखक़-सुभाष सिंघई जतारा)

माँ का प्रसूति गृह में चिल्लाना

पिता   की धड़कनें बढ़  जाना

लेता रहता   ईशवर   का नाम

छोड़कर  सभी    निज   काम


साँसे  भी   उसकी थम जाती

जव   आवाजाही   बढ़ आती

रोने की आहट कानों में आती

छाती तक मिश्री-सी घुल जाती


हाथ जोड़़ कहता  है परमात्मा

भेजी तूने   मेरी   दूजी आत्मा

बेटी कों   वह     लक्ष्मी  माने

बेटे   को कुल    दीपक जाने


गंदा हो पर छाती से चिपकाए

राजा बेटा कह वह उसे बुलाए 

उसे दूध भात ,खुद रुखी खाए

फिर हंसे  यही पिता कहलाए 


पढ़े लिखे जग में   होबें  मान

आगे बढ़ने का रखता अरमान

मॉ की ममता गुस्सा भी आ़ए 

बिगड़ न जाए मन में घबराए 


बेदर्द  -बेरहम- कठोर  हृदय-

पत्नी के व्यंग्य सभी सहता |

पर अंतरमन है कितना कोमल-

पिता अभिब़्यक्त नहीं  करता |


माँ  को ममता की देवी कहते

सच है  नहीं कोई एतराज है |

किन्तु कोई ऐसा पद पाने - 

पिता अभी  मोहताज है ||

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स्वागतम् - हे नव वर्ष -

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स्वागतम् - हे नव वर्ष

अभिनंदन में हर्ष-हर्ष

जीवन पथ हो उत्कर्ष

प्रवल नवल चेतना दर्श


कड़वाहट हो-लोप विगत

पुण्य प्रसून खिले  अक्षत

मानवता में नत हो मस्तक

पुरुषार्थ शिखर से नभ तक


शुचि गंगा नीर बहै ह्रदयांतर

राष्टहित मन हो ओज प्रखर

अमन-चमन हो गॉव  शहर

खुशयाली हो डगर - डगर

शुभेच्छु रचनाकार- सुभाष सिंघई




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