https://subhashsinghai.blogspot.com/दोहा दीप ( बुक चित्र पर क्लिक करें )
जिन लोगों ने बाँट दी , सभी जगह पर खार | आज उन्हीं को मिल रही , हर अवसर पर हार ||14
सबसे मीठा बोलिए , बड़े विनय के साथ | अभिनंदन भी हो सदा , जोड़े दोनों हाथ ||15
विनय सहित आभार हो , करें सभी स्वीकार | इसी तरह का बाँटिए , आप सभी का प्यार ||16
भारत के संदेश पर , विश्व आज दे ध्यान | योग सनातन से सदा , करता रोग निदान ||17
भारत के संदेश को , करे विश्व स्वीकार | योग सनातन से सदा , करता है उपचार ||18
अपने पुल तारीफ के ,खूब बाँधते ढीट | गाल फुलाकर नाचते, दोनों हाथों पीट ||19
हार जीत के खेल में , दुखदाई है कर्म | बिना चाह के कर्म में , है संतोषी धर्म ||244
जहाँ जीत के खेल में , नैतिकता की हार | समझो तब उस जीत का ,हुआ यहाँ व्यापार ||245
जिंदादिल इंसान को , सदा पास है जीत | वह करता पुरुषार्थ से , जग में सबको मीत ||246
जनसेवा के नाम पर , है सेवा में लूट | छोटे ही पकड़े यहाँ , मिले बड़ों को छूट ||247
सेवक विपदा काल में , जुटे रहे दिन रात | मगरमच्छ थे कुछ बड़े , खूब लगाई घात ||248
लेना आना चाहिए. , देते है सब. साथ |सुंदर महल बनाने में , लगते सबके हाथ ||249
दर्पण कहलाता सदा , सृजन हुआ साहित्य |मूल्य , भाव से जानिए , कितना है लालित्य ||281
आभूषण उत्तम क्षमा , जो नर लेता धार |परहित निजहित साथ में ,करता जग उपकार ||282
मानव का गहना क्षमा , करे दुष्टता नाश |फैले यश आकाश में , जैसे सूर्य प्रकाश ||283
आभूषण ही मानिए , क्षमा दया हो पास |कीमत दुनिया में सदा , रहती उसकी खास ||284
सप्त जलधि नीर हो , तीन लोक बरसात |बिन प्रीतम बढ़ती रहे , विरह तपन की घात ||285
टप -टप आंसू गिर रहे , विरहन. लगे उदास |झर-झर अब बरसात भी ,बुझा सके मत प्यास ||286
विरहा के आंसू झरे ,बड़ा कठिन था दौर |पर भँवरे ने बात को , समझा कुछ ही और ||287
सदाचार. फूले फले ,समरसता जिस गेह |घर में रहती एकता, सदा बरसता नेह ||288
जहाँ आपकी जीत पर , हर्ष मनाए लोग |समझो सच्चे मित्र का , यहीं बनेगा योग ||289
नेताओं के कर्म से , दूर भागता धर्म |
बढ़चढ़ कर अब फूलते , राजनीति से जुर्म ||327
नेता आपस में सदा , देते हैं धिक्कार |
खुद को सच्चा मानते , ईश्वर का अवतार ||328
खुद की खुली दुकान है , राजनीति छल छंद |
हमसे कहते कीजिए , अपना भारत बंद ||329
नफ़रत रखकर जो लिखे , वर्ग भेद साहित्य |
कुंठित रहते वह सदा , रहे दूर लालित्य ||330
सृजन मनन चिन्तन नहीं , केवल करते तंज |
मीन- मेख के यह रथी , खुद में रहते भंज ||331
जातिवाद का ध्वज ले , वर्ग भेद की बात |
करें एकता भंज वह , लगे रहें दिन रात ||332
करें वमन बिष बात से , प्रेम नहीं स्वीकार |
वह नफरत की नींव से , खड़ी करें दीवार ||333
वह समाज में आदमी , कभी न होता मर्ज |
जिसके रहते भाव हैं , हमें पड़ी क्या गर्ज ||334
चिकनी चुपड़ी बात से , हो जाते हैं काम |
जो यह विद्या जानते , उन्हें बड़ा आराम ||335
देखी साहसवान की, ऊँची रहती मूँछ |
कायर देखा है सदा , रहे छिपाता पूँछ ||336
कभी हार से सीखिए , कैसी चलना राह |
साहस के अब साथ ही, पूरी कैसे चाह ||√ 337
चुगलखोर चुगली करें , मुख से निकले आँच |
नैन सत्य ही बोलते , लखकर पकड़े साँच ||338
सखा नहीं वह आपके , भरते हैं जो कान |
झगड़ा जब होने लगे , कर जाते प्रस्थान ||339
देखा है संसार में , बड़े अनोखे लोग |
मूरख समझें और को , पाले उम्दा रोग ||340
बड़ा ग़ज़ब है आदमी , खुद बनता हुश्यार |
माथा ठोके उस समय , जब हो बंटाधार ||341
चुगलखोर चुगली करें , और न कोई काम |
भोजन से न तृप्त हों , चुगली से आराम ||342
जिनका झगड़ा शौक है , मिल जाते है योग |
जिनकी जैसी चाहना , उनको बैसा रोग ||343
काँटे बिखरा राह में , स्वयं खोजता फूल |
एक यही संसार में , मानव करता भूल ||√344
करें पाप फिर दान दें , नहीं हुए निर्दोष |
लाख यतन के बाद भी ,रिक्त पुण्य का कोष ||345
पैसों से मिलता नहीं , खुशियों का वरदान |
परोपकार के भाव से , अधरों पर मुस्कान ||346
देखा जिसके गेह में , खूँटे बँधा उसूल |
न्याय नीति की बात भी , लगती वहाँ फिजूल ||347
मतलब की चर्चा करें , मतलब के सब यार |
जब मतलब निकले नहीं ,मतलब करती रार ||348
यदि किसी संयोग में , होता उदित वियोग |
पीड़ा तन मन में भरे , यादें बनती रोग ||349
यह जीवन समझों घड़ी , सांसे करें रियाज |
थम जाती है एक दिन ,टिक-टिक की आबाज ||350
ज्ञानी देखे आजकल , करें विषम संवाद |
तथ्य हीन चर्चा करें, जिस पर चाहें दाद ||351
ज्ञानी भी ऐसे दिखे , सदा चाहते मान |
दूजों का वह देखकर , लेते मुक्का तान ||352
अब चुनाव आसान है , पास रखो टेलेन्ट |
यदि बाहुबली आप है , समझों परमानेन्ट ||353
टिकट झटकना हो गया ,अब काफी आसान |
बाहुबली की छाप से , कहलाओं श्रीमान ||354
दल भी दल-दल में फँसे , कीचड़ में स्नान |
राजनीति में आइए , होगे आप महान ||355
जनता भी सब भूलती , अगले पिछले दोष |
हाथ जुड़े वह देखकर , नष्ट करे सब रोष ||356
धनबल यहां सुभाष भी , आए भारी काम |
बिकते बोटर देखिए , मिलते ऊँचे दाम ||357
लोकतंत्र में लाज भी , लगती गई सिधार |
अब चुनाव भी बन गया , एक भला व्यापार ||358
आलोकित मन राखिए , दीपोत्सव है रोज |
सुना परिश्रम तेल से , अंदर रहता ओज ||359
झोपड़ पट्टी में दिया, जलकर सारी रात |
मेहनतकश मजदूर से, गुपचुप करता बात ||360
एक दीप ने झोपड़ी , रोशन कर दी रात |
मेहनतकश मजदूर से , खुश था करके बात ||361
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सुनकर गूलर पेड़ पर , पके टगें हैं आम |
ललचाकर जो भी चढे, नीचें गिरें धड़ाम ||
दनादन बाजे बजते | नहीं अब हम कुछ कहते ||362
बहरा आंखे बांधता , अंधा बांधे कान |
लूले को दोड़ा दिया , लाने को सामान ||
दनादन बाजे ----|. 363
बूँद गिरे या मत गिरे , पर हल्ला का दोर |
पावस ऋतु अब आ गई, नाच रहे है मोर ||
दनादन बाजे ------. 364
लाखों लेकर फैसला , अफसर बड़ा महान |
फाइल खोजी सौ लिए , बाबू बेईमान ||
दनादन बाजे-----365
एक फीट गड्डा खुदा , शौचालय निर्माण |
जाँच कमेटी कह गई, दस है सत्य प्रमाण ||
दनादन बाजे -----366
सरकारी कर्जा मिला ,खर्च किए कुछ दाम |
वोट दिया माफी मिली , बड़ा सुलभ है काम ||
दनादन बाजे --------367
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पिंगल मैंने छोंड़कर , पढ़े सूर रसखान |
तुलसी केशबदास पढ़ , सीखा छंद विधान ||368
कथ्य ,शिल्प के भाव की , प्रत्यंचा तैय्यार |
बड़े दूर तक गूँजती , दोहे की टंकार ||369
गुणी जनों की बात को ,भाई मत तू भूल |
दर्पण धुँधला जब दिखे,मुख पर समझो धूल ||🙏370
नज़र रखें कमनीयता , यदि है भाव पवित्र |
कुंठित रखे विचार जो , बने न सच्चे मित्र ||🙏371
माता रानी आइए, नमन करोड़ों बार |
नवराते है आपके, जीवन में उपहार ||√372
नवधा-पूजा हम करें , माँ के हैं नौ रूप ||
आराधन भी नौ दिवस , करते सभी अनूप ||√373
मां तेरे नौ रूप हैं , सबको करूँ प्रणाम |
नवराते में लूँ सदा, जाग-जाग कर नाम ||374
माता रानी आपका , पाऊँ सदा प्रसाद |
कर्म धर्म के सँग चलें , रहें आप वस याद ||375
सात बचन का आज भी , दिन है मुझकों याद |
जीवन पथ उत्कर्ष में , रहा सदा आवाद ||376
हमसे हँसकर पूँछती , क्या पाया है नाथ |
मैने भी उत्तर दिया , हर पल तेरा साथ ||377
मै अतीत में सोचता , सुख दुख थे व्याप्त |
सदा साथ मिलता रहा , जीवन में पर्याप्त ||378
समय चक्र चलता रहा , बनी सारथी गेह |
शेष जिंदगी बना रहे , इसी तरह का नेह ||379
पत्नी ने काढ़ा दिया , साथ कहे यह बोल |
अपने रस श्रृंङ्गार को , कविवर लीजे घोल ||😊😊380
काढ़ा कप में डालकर, पत्नी बोली बोल |
अपने रस श्रृंङ्गार से, मीठा करिए घोल ||😊😊381
कविवर काढ़ा पेश है, पत्नी जी के बोल |
समझ इसे श्रृंङ्गार रस , पान कीजिए घोल ||😊🙏382
चाय नदारत हो गई , लौंग लायची पान |
स्वागत में काढ़ा मिले ,स्वीकारो श्रीमान ||😊🙏383
चाय पान अभी दूर है , काढ़ा से सत्कार |
कहीं कहीं तो भाप भी , स्वागत में तैयार ||384
कोरोना के काल में , आव भगत थी साफ |
स्वागत में काढ़ा मिले, वह भी कप में हाफ ||385
मित्र चाय के नाम पर , काढ़ा करता पेश |
कोरोना के काल में , किया इसी में ऐश |386
कोरोना भी भागता, वहाँ न करता सैर |
होता जहाँ चुनाव है , रुकें न उसके पैर ||387
चमक रही हर चीज का , नहीं स्वर्ण में नाम |
कोरोना मत जानिए, जिसको सहज जुखाम ||388
हम सब मिलकर भागते ,बचा रहे है जान |
पर नेता से डर गया , कोरोना श्रीमान ||389
नेता जी का बिक रहा , भाषण का सामान |
पर हमसे वह कह रहे , करिए बंद दुकान ||390
कोरोना के काल में , बदले कई रिवाज |
शुभाशीष ही फोन पर , चल जाते हैं आज ||391
लिखा मित्र ने कार्ड में , यदि आए श्रीमान |
सावधान खुद ही रहें , शादी के दौरान ||392
मित्र निमंत्रण पर लिखे , है कोरोना मार |
गूगल पे स्वीकारता , मै शादी व्यवहार ||393
एक कार्ड मुझको मिला, साथ लिखा उपचार |
गूगल पे से भेज दे , शुभाशीष व्यवहार ||394
दर्शन हित मंदिर गया , दिखी वहॉ पर होड़ |
रुपया एक चढ़ाय कर , मांगे लाख करोड़ ||395
करते सूरज चन्द्रमा , बिन माँगे उपकार |
रब भी देता बिन कहे , जीवन भर उपहार ||396
ईश्वर को मत भूलिए ,करिए उससे प्यार |
बिन मांगे दे आपको , जीवन भर उपहार ||397
हरिआ पंछी टेरती ,भावुक सुता किसान |
सुनकर हरि-आ भी गए , देने को वरदान ||398
नभ में अब घन श्याम हैं , हुआ गाँव में शोर |
दौड़ पड़े तब श्याम जी , घन लेकर घनघोर ||399
भावों की गंगा बहे , टूटे नहीं प्रवाह |
कलम चले उत्साह से , लेकर गहरी थाह 400
निर्माता है भाग्य का , मानव का निज कर्म | कर्म हमें ही सौंपता , परिणामों का मर्म ||401
आनन की दो आँख से , जीभ अधिक वाचाल | कहकर पीछे लौटती , आँख झुके बेहाल ||402
मन को वश में कर रहे , ऋषिगण और फकीर | मैं सेवा तप मानकर , देखूँगा तकदीर ||403
जहाँ शौर्य की बात है , भारत है तब शेर | प्रेम खड़ा स्वागत करे , खा लेता है बेर ||404
सत्य अहिंसा प्रेम का , भारत पढ़ता पाठ | संग शौर्य का बिम्व है , दिखे विश्व में ठाठ ||405
कह सुभाष सबसे यहाँ , आप सभी का साथ |सृजन सरोवर धाम में , सबके अनुपम हाथ |406
यह सुभाष भी मानता , सज्जन का हो साथ |बिगड़े काम सँवारते , हरदम उसके हाथ ||407
ब्याहा जिसको कह रहे , लव जिहाद की मार | तंज करें जो लोग है , उस पर करें विचार ||408
बेटी ब्याही कौन ने , मुस्लिम करके खोज | लव जिहाद के फेर में , बेटीं थी उस रोज ||409
कोई कब-कब खोजता , बेटी को वर गैर | हो जाती है बेटियाँ , लव चक्कर में गैर ||410
अपनी-अपनी मान्यता , अपना देख समाज | बेटी बेटा ब्याहते , मंगल होते काज ||411
किसने रोका कब किसे, होवें खूब विवाह | लव जिहाद षणयंत्र को , नहीं थोपिए चाह ||412
बापू के सरनेम से , दिखें आज त्रय नाम | इसीलिए इनकी फसल,पा जाती है दाम ||413
बापू के बंदर नहीं , गिनती में अब तीन | चौथा भी शामिल हुआ, मारे आँख नवीन ||414
बापू के अब ख्याल को ,यह तीनों उपहार | कर देगें यह एक दिन , सपने को साकार ||415
बापू की वंशावली , आज रहे चुपचाप | इसीलिए इनकी पुजे, पूरी गांधी छाप ||416
हम सब गांधी वाद का , माने पूरा अंश | पर यह तीनो चल रहे , लेकर गांधी वंश ||417
बापू के सरनेम का , गांधी लेकर नाम | राजनीति में खप गए, बिन अक्कल गुलफाम ||418
मोदी का सौभाग्य है , पप्पू का दुर्भाग्य | एक समय दोनों हुए , कुर्सी के अनुराग्य ||419
नाम राम ही सत्य है , शव के पीछे शोर | कहा राम ने देखकर, आज यहाँ पर भोर ||420
वही फसल है आपकी , जो बो आए आप | नई कहाँ से उपज हो , लेकर कोई छाप ||421
कटु अनुभव ही कह रहे, रखों फूँककर पैर | मिले सफलता एक दिन ,जग भी भूले बैर ||422
असफलता हो यदि प्रथम , होना नही निराश | मिली सफलता की कुँजी,समझों नया प्रकाश ||423
किसी कार्य में दक्षता , होती सोना तोल | लगे सफलता हाथ में , जो होती अनमोल ||424
कर्म सदा अच्छा करें , रखें बुराई दूर | यही ईश का नाम है , और यही रब नूर ||425
नीम सदा कड़वा लगे , पर औषधि में नाम | मूल्य न जिनका हम करें, मौके पर दे काम ||426
कथ्य ,शिल्प के भाव की , प्रत्यंचा तैय्यार | बड़े दूर तक गूँजती , दोहे की टंकार ||427
मीठे भी होने लगें. , जब खट्टे अंगूर | समझों उनको मिल रही , सत्संगति भरपूर ||428
रुच रुच भोजन जो करें , उन्हें सुलभ स्कूल |(इस्कूल). रिक्त पेट की पीठ पर , पन्नी कागज धूल ||429
बोतल देखो नाचती , बहक रहे है जाम |गोरी की पग चाल से , लगे गुलाबी शाम ||430
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इधर उधर मत खोजिए,कहाँ ईश का धाम | मन मंदिर में देखना , अपने आतम राम ||431
मनमर्जी मत कीजिए, दिन को कहें न रात | किस पुस्तक में यह लिखा,सुनो न कोई बात ||432
हम सब उसको मानते, जिसकी दुनिया अंश |
फिर क्यों मज़हव नाम पर , इक दूजे को दंश ||433
आज कृषक का पुत्र भी , करें खेत पर काम |
हाथ पिता का बाँटते ,कृष्ण और शिवराम ||434
गेहूँ की बाली कटी , नई फसल का गान |
शिर पर रखकर चल दिया, बालक बना किसान ||435
बचपन बीते खेत पर , और जवानी फौज |
किस्मत यही किसान की, सत्य सुनो यह खोज ||436
पिता पुत्र मेहनत करें, खेतों में दिन रात |
शीत लगे या लू चले , या तन पर बरसात ||437
आए प्रभु के व्दार पर , मन की ले अभिलाष |
शरणागत को शरण दो, विनती करे सुभाष ||438
माँ बेटा लाचार है , नही पास में दाम |
पत्ते का अब मास्क ही , करे सुरक्षा काम |439
संकट के इस दौर में , पत्ता आया काम |
यह गरीव का है हुनर , लगा न कोई. दाम ||440
यह मजबूरी में बना , जिसको कहें जुगाड़ |
पत्ता के ही मास्क से , देगे रोग पछाड़ ||441
आवश्यकता ही जनक , करता आविष्कार |
देख नमूना हम रहे , पत्तों का आधार ||442
देखा मैने चित्र में , प्रमुख यही संदेश |
स्वयं सुरक्षा कीजिए , कोरोना परिवेश ||443
कवच बना पत्ता यहाँ , माँ बेटा के अंग |
जीतेगें हम एक दिन , कोरोना से जंग ||444
यह गरीब की खोज है , नही खर्च कुछ दाम |
पत्ता के ही मास्क से , चला रहे है काम ||445
यह गरीब भी लड़ रहे , पत्ता है मुख अंग |
इनका साहस देखकर , कोरोना भी दंग ||446
पूजा के ही साथ हम , करें पेट का ख्याल |
बर्ना पूजा मध्य ही , होने लगे ववाल ||447
फुरसत में सब लोग है , रखें पेट का ख्याल |
इतना अधिक न खाइऐ , होने लगे ववाल ||448
नथनी के नग नूर की , चर्चा बड़ी कमाल.|
पूनम का यह चाँद है , सबका ऐसा ख्याल ||449
कौन उठाता प्रश्न है , और लगाता चिन्ह |
दिखते पैमाने अलग , जगह जगह पर भिन्न ||450
हम कोरोना से लड़े , जंग नही आसान |
सुने सभी सरकार की , दूरी पर दे ध्यान ||451
क्या हम आगे बढ़ चले , होना जहाँ विनाश |
चुप लगता विज्ञान है , अब तक नही प्रकाश ||452
सुखद पढ़ा विज्ञान को , पर लगता अभिशाप |
परिणाम आज सब लखे , सुने मोत पदचाप ||453
होड़ नही हथियार है , अज़ब़ चल रहा मेल |
छोड़ वायरस खेलते , शीत युद्ध का खेल ||454
मतलब की सब कर रहे , मतलब का संसार |
मतलब कभी न हारता , मतलब है सरदार ||455
सावित्री ने सत्य से , रोक लिया यमराज |
कहे सती यदि मानते , सँग ले जाओं आज ||456
यमराज न्याय के देवता , दे बैठे वरदान |
सदा यशस्वी तुम रहो , पाओं पुत्र महान |457
सत्यवान जिंदा हुऐ , सावित्री के सत्य |
यश जग में फैला रहे , जब तक है आदित्य.|458
बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |
नहीं जहाँ संदेश हो , और कथ्य में सार |459
कठिन शब्द दोहा रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |
देखा कुछ दिन बाद ही , दोहे का अवसान ||460
दोहा होना चाहिए , मन पर करे प्रभाव |
चिंतन जिसमें हो भरा , मिटे कलुषता घाव ||461
दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |
याद सदा सबको रहे , मिट सकती है खोट ||462
दोहे कितने सहज है , सबको याद कबीर |
साल पाँच सौ बाद भी , जिंदा है तहरीर ||463
अनपढ़ को भी याद है ,आज.सुनो रसखान |
दोहे है इतने सरल , सबकी चढ़े जुबान ||464
दोहे जन जन गा रहे , कविवर तुलसीदास |
रामचरित मानस लिखा , भाषा सरल सुभास ||465
दोहा में कुछ बात हो , भाषा सरल सुजान |
हर युग दोहे आपके , सबकी चढ़े जुबान ||466
आज देश में फैलता , एक वायरस और |
दिखे धर्म के नाम पर , नफ़रत का भी दौर ||467
ऊपर वाले ने दिया , जीने का अधिकार |
नही धर्म यह बोलता , पैर कुल्हाड़ी मार ||468
सोच समझ कर कीजिए , घर से कन्यादान |
हित भारत का देखकर , दागो अपने ब्यान ||469
नेताओं को गालियाँ , अज़ब चला है रोग |
किया आपने कुछ कहाँ , चुप हो जाते लोग ||470
मेरा दीपक जल रहा , आज एकता नाम |
हम सब मिलकर एक है , देता.है पैगाम ||471
मेरा दीपक जल रहा , कर आशा संचार |
डटकर करे मुकावला , आपस में रख प्यार ||472
मेरा दीपक जल रहा भारत माँ के नाम |
नौ बजकर से नौ मिनिट ,जले आज अविराम ||473
मेरा दीपक जल रहा , कर मन से गुणगान |
आज अवतरित थे प्रभू , महावीर भगवान ||474
मेरा दीपक जल रहा , सबको मिले प्रकाश |
कोरोना से मुक्ति हो , विनती करे सुभाश ||475
कोटर में रह शुक कहे , समय आपदा जान |
मै पंछी पहचानता , नादाँ क्यों इंसान |476
स्वयं सुरक्षित कर लिया.,शुक ने कोटर खोह |
राम नाम में मस्त है , छोड़ अभी जग मोह ||477
कोरंटाइन कर लिया , शुक ने.सोच विचार |
इसे दवा ही मानिऐ , यही आज उपचार ||478
नही रहेगी आपदा , रहे गेह में लोग |
शुक भी यह पहचानता , कैसे भागे रोग ||479
बैठा शुक यह कह रहा , सुन लो मेरे ख्याल |
बीमारी है यह महा , कोरोना जंजाल 480
कोरोना से सामना , करती है सरकार |
कदम उठाऐ कुछ कड़े , जिसे करें स्वीकार ||481
सैन्य चिकित्सक मानिऐ , वर्तमान भगवान |
दिखे सफाईदार तब , दीजे उनको मान || 482
सेवारत जो दिख रहे , अभिनंदन हकदार |
आज कष्ट की कुछ घड़ी , कल सुख की बौछार ||483
साथ प्रशासन मीडिया , सबको करूँ सलाम |
आप रहे घर कुछ दिवस , जनता को पैगाम ||484
सैन्य चिकित्सक मित्रवर ,सँग भारत सरकार |
हम सबके उपचार है , आज सफाई दार ||485
सैन्य चिकित्सक आज है ,अभिनंदन हकदार |
और सफाई बन्धु भी , सँग भारत सरकार ||486
सैन्य, चिकित्सक, नर्स को , और सफाई दार |
नमन प्रशासन, मीडिया , सँग भारत सरकार ||487
हाथ मिलाना छोड़कर , करो दूर से हाय |
कोरोना के इश्क में , हो जाती गुडवाय ||488
देखा सबने चीन का , सभी माल बेकार |
पर.कोरोना टिक गई , अपने नैन पसार ||489
नही मजाक को जानना , टोटे का यह खेल.|
कोरोना के प्यार में , लोटे से है मेल ||,490
कोरोना को देखकर , खुद का करे सुधार |
या गंगा में तैरने , हो जाऐ तैय्यार ||491
खुद को पहले दीजिऐ, कवच सुरक्षा दान |
यही कथन अब कह रहा , पूरा हिन्दुस्तान ||492
संकट के पल चल रहे , रहना सभी सतर्क |
सरकारी आदेश पर , करना नही कुतर्क ||493
आज विश्व में वह समय , चिन्ता में सब लोग |
उन्मूलन हो किस तरह , यह केरोना रोग ||494
थमा देश का चक्र है , फेल रहा यह रोग |
हँसी उड़ाते घूमते , लापरवाही लोग ||495
भारतवासी ले रहे , स्वंय सुरक्षा. ओट |
यही एक हथियार है , करें रोग पर चोट ||496
नही रोड पर हम दिखे ,मोदी करें अपील |
अनुपालन हम सब करें , जरा न देवें ढील ||497
हर संकट से सामना , करता हिन्दुस्तान |
मिलकर हम सब एक है , देखे सदा जहान ||498
देख सजगता हिन्द की , और एकता सोच |
सभी वायरस देखते , यहाँ न कोई लोच ||499
शोर मचाता वायरस , कोरोना है नाम |
हिन्दुस्तानी सजगता, जीतेगी संग्राम ||500
कोरोना की शक्ति का , देख लिया अंदाज |
मानव की कुछ भूल का , दिखा नतीजा आज ||501
मिलकर करता सामना , पूरा हिन्दुस्तान |
कोरोना हैवान हो , या कोई शैतान ||502
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आज शारदे नाम पर , अनुपम सजी दुकान |
प्रतिदिन रेड़ी बँट रही , सर्वश्रेष्ठ श्रीमान ||503
हम भी दिखते लालची , पाकर समझें मान |
वह भी क्रमशा: बाँटते , दानी जैसा दान ||🙏504
नही समझते आप क्या , कैसा है यह मान |
एक दिवस गुणगान है , बाकी दिन नादान ||🙏505
सृजन भाव से सृजित हो , मन के हो उद्गार |
सृजन श्रेष्ठ पावन स्वयं , खुद का खुद उपहार ||🌷506
श्रेष्ठ सभी दोहा सृजक , कौन दिखे नादान |
बाँटे लाली पाँप वह , हम समझें सम्मान ||🙏507
दोहा लिखता भाव से , लेखक. डाले प्राण |
पाठक देते प्रेम है , सच्चा पत्र प्रमाण ||508
लोकतंत्र के नाम पर , बिषधर जैसे व्यान |
घायल संकट में लगे, हतप्रभ हिन्दुस्तान ||509
बड़े भाग्य मानव बने, सदाचार हो चाल |
कर्म धर्ममय आपके , करें प्रभू से ताल ||510
==°=°=°℅°℅℅
अथ श्री मोबाइल कथा
अजब ग़ज़ब हालात है , क्या बोलूँ भगवान |
मोबाइल से देखिऐ , चिपका है इंसान ||511
साजन सजनी बीच में , मोबाइल दीवार |
सबकी अपनी लिस्ट है ,अपने निज है यार ||512
व्हाटशाप पति देखता , रहता उसमें व्यस्त |
बीवी देखे फेसबुक , रहती उसमें मस्त ||513
बिस्तर भी लाचार है , पलँग दिखे खामोश |
प्यार नजर आता नहीं , दिखे फोन में जोश ||514
सब्जी जलकर खाक है ,लगती किचिन उदास |
बीवी माहिर फेसबुक , अव्वल दरजे पास ||515
बेटा शाला जा रहा , खड़ा हुआँ तैयार |
पापा को फुरसत नहीं , गूगल रहे निहार ||516
माता कब से कह रही , बेटी है चुपचाप |
पोस्ट यार की पढ़ रही , गहराई को नाप ||517
बेटा कहता जोर से , खलल न कोई डाल |
लड़की मेरी पोस्ट पर , पूँछ रही है हाल ||518
मोबाइल भी कान पर , करता सदा प्रहार |
रहता हाथों में सदा , जैसे हो शृंगार .|| 519
चलते सुंदर चैट हैं , मस्त रहें आवाद |
ग़ज़व इश्क फरमा रहे , मजनू की औलाद ||520
बहुत सुना संसार में , ऋषि मुनियों का ज्ञान |
मैल न मन का दूर है , अब ब्यर्थ गंग स्नान.||521
ज्ञानी हो यदि मद भरा , कुछ पल छाए असर |
फिर दूरी है इस तरह , , ज्यों चम्पा सँग भ्रमर ||522
आए प्रभु के व्दार पर , मन की ले अभिलाष |
शरणागत को शरण दो, विनती करे सुभाष ||523
कोरोना के काल में , मिलने लगी शराब |
सुनकर अब इस बात को ,खुश है कई जनाब ||524
बीड़ी गुटखा भी मिले , करते बहुत प्रयास |
गुटखा बिन सब सून है , चेहरे लगे उदास ||525
दस का गुटखा तीस में , युवजन रहे खरीद |
तम्बाखू के नाम पर , आधी रहती लीद ||526
बीड़ी की आदत रही , कंठ रहे है सूख |
नहीं धुवाँ अब नाक से , गायव रहती भूख ||527
श्रमिक करें दिन रात जब , निष्ठा से सब काम |
स्वेद बहाकर हाथ में , पाते आधे दाम ||528
श्रमिक भटकते काम को , जीने को मजबूर |
सरकारी अनुदान भी , उनसे रहता दूर ||529
बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |
नहीं जहाँ संदेश हो , और कथ्य में सार ||530
दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |
याद सदा सबको रहे , मिटा सके वह. खोट ||531
जीवन के दो पंख है , कहें एक को कर्म |
दूजा भी अनमोल है , जिसको कहते धर्म ||532
कठिन शब्द दोहा रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |
देखा कुछ दिन बाद ही , दोहे का अवसान ||533
नहीं आज कुछ काम है , बेवश है मज़दूर |
सरकारी अनुदान पर , जीने को मजबूर ||534
बैठी चिड़िया सोचती , कहाँ गए. इंसान |
चहल पहल कुछ भी नही , दिखता सब वीरान ||535
बैठ डाल चिड़िया कहे , लगता संकट दौर |
मुझकों भी अब खोजना , आज सुरक्षित ठौर.||536
नही रहेगी आपदा , रहें गेह में लोग |
समझ गई चिड़िया अभी , कैसे भागे रोग ||537
चिड़िया भी अब सोचती , मन में आते ख्याल |
महा बीमारी लगे , कोरोना जंजाल ||538
बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |
नहीं जहाँ संदेश हो , और कथ्य में सार |539
कठिन शब्द दोहा रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |
देखा कुछ दिन बाद ही , दोहे का अवसान |540
दोहा होना चाहिए , मन पर करे प्रभाव |
चिंतन जिसमें हो भरा , मिटे कलुषता घाव ||541
दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |
याद सदा सबको रहे , मिट सकती है खोट ||542
दोहे कितने सहज है , सबको याद कबीर |
साल पाँच सौ बाद भी , जिंदा है तहरीर ||543
अनपढ़ को भी याद है ,आज.सुनो रसखान |
दोहे है इतने सरल , सबकी चढ़े जुबान ||544
दोहे जन जन गा रहे , कविवर तुलसीदास |
रामचरित मानस लिखा , भाषा सरल सुभास ||545
दोहा में कुछ बात हो , भाषा सरल सुजान |
हर युग दोहे आपके , सबकी चढ़े जुबान ||546
मिलें समय से पंख दो , करने को उत्थान |
कर्म कहा है दाहिना , बायाँ धर्म सुजान ||547
पनिहारिन
पनिहारिन पग बढ़ रहे ,गगरी कर से थाम |
घूँघट से पथ देखती ,नैन सजग अविराम ||548
मुख चंदा सा जानिऐ , लेता घूँघट ओट |
जल पनिहारिन गाल पर ,करता सीधा चोट ||549
पनिहारिन परिधान है , रंग मनोहर पीत |
रुप राशी बिखरी हुई , पायल दे संगीत ||550
पनिहारिन की नासिका , गहरी लेती साँस |
श्रमकण तारे से लगे , मस्तक से आभास ||551
लगे गुलाबी पंखुरी , पनहारिन के होंठ |
भौंह धनुष सम जानिऐ , मन पर करते चोट ||552
============
कोई जल भुन रह रहा , कोई जलकर राख |
चिन्ता लोगो की करे , पल पल होता खाक ||553
अहम् बहम् को पालकर , खुद ही लाऐ रोग |
यही सोच घर कर गई , क्या कहते है लोग ||554
बड़ा अज़ब इंसान है , मन को करें मलीन |
सोच रहे क्या लोग , चिन्ता के. आधीन. ||555
रोग बड़ा ही जानिऐ , क्या कहते है लोग ? |
खुद पथ भूला आदमी , निज मन रखें कुयोग ||556
आज देश में फैलता , एक वायरस और |
दिखे धर्म के नाम पर , नफ़रत का भी दौर ||557
ऊपर वाले ने दिया , जीने का अधिकार |
नही धर्म यह बोलता , पैर कुल्हाड़ी मार ||558
सोच समझ कर कीजिए , घर से कन्यादान |
हित भारत का देखकर , दागो अपने ब्यान ||559
नेताओं को गालियाँ , अज़ब चला है रोग |
किया आपने कुछ कहाँ , चुप हो जाते लोग ||560
बहुत सुना संसार में , ऋषि मुनियों का ज्ञान |
मैल न मन का दूर है , अब ब्यर्थ गंग स्नान.||561
ज्ञानी हो यदि मद भरा , कुछ पल छाए असर |
फिर दूरी है इस तरह , , ज्यों चम्पा सँग भ्रमर ||562
आए प्रभु के व्दार पर , मन की ले अभिलाष |
शरणागत को शरण दो, विनती करे सुभाष ||563
कोरोना के काल में , मिलने लगी शराब |
सुनकर अब इस बात को ,खुश है कई जनाब ||564
बीड़ी गुटखा भी मिले , करते बहुत प्रयास |
गुटखा बिन सब सून है , चेहरे लगे उदास ||565
दस का गुटखा तीस में , युवजन रहे खरीद |
तम्बाखू के नाम पर , आधी रहती लीद |566
बीड़ी की आदत रही , कंठ रहे है सूख |
नहीं धुवाँ अब नाक से , गायव रहती भूख ||567
श्रमिक करें दिन रात जब , निष्ठा से सब काम |
स्वेद बहाकर हाथ में , पाते आधे दाम ||568
श्रमिक भटकते काम को , जीने को मजबूर |
सरकारी अनुदान भी , उनसे रहता दूर ||569
बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |
नहीं जहाँ संदेश हो , और कथ्य में सार ||570
मिलें समय से पंख दो , करने को उत्थान |
कर्म कहा है दाहिना , बायाँ धर्म सुजान ||571
दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |
याद सदा सबको रहे , मिटा सके वह. खोट ||572
जीवन के दो पंख है , कहें एक को कर्म |
दूजा भी अनमोल है , जिसको कहते धर्म ||573
कठिन शब्द दोहा रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |
देखा कुछ दिन बाद ही , दोहे का अवसान ||574
नहीं आज कुछ काम है , बेवश है मज़दूर |
सरकारी अनुदान पर , जीने को मजबूर ||575
बैठी चिड़िया सोचती , कहाँ गए. इंसान |
चहल पहल कुछ भी नही , दिखता सब वीरान ||576
बैठ डाल चिड़िया कहे , लगता संकट दौर |
मुझकों भी अब खोजना , आज सुरक्षित ठौर.||577
नही रहेगी आपदा , रहें गेह में लोग |
समझ गई चिड़िया अभी , कैसे भागे रोग ||578
चिड़िया भी अब सोचती , मन में आते ख्याल |
महा बीमारी लगे , कोरोना जंजाल ||579
दोहो के वारे में -
दोहे में हो गेयता , तेरह ग्यारह भार |
गण पूरे निर्दोष हो , कथ्य कहे कुछ सार ||580
,
तेरह ग्यारह जानते , चार चरण का ज्ञान |
पर कुछ समकल विषम का , रखते कभी न ध्यान ||581
समकल से समकल जुड़े , यही विषमकल खेल |
साथ आठवी यति हो , दिखता लय से मेल ||582
मात्रा हो यदि आठवी , संग नवम् को देख |
ग्यारह बारह भी गिने , संयुक्त न होवे लेख ||583
पंचम.पष्टम यदि करें , आदि से यदि सुजान |
दोहे की लय में सुने , आ सकता व्यव्धान ||584
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साहस की आराधना , और एकता नाम |
दीप निरंतर यह जले , सबको दो पैगाम ||585
दीप जलाकर दीजिएँ , जग को यह संदेश |
भारतवासी एक है , संकट के परिवेश ||586
भारत में यह दीप भी , करता सदा कमाल |
कहता रखिए एकता , अद्भुत जले मसाल ||587
आज जगत भी देखता , भारत की तासीर |
कोई कैसा युद्ध हो , सभी वतन में वीर ||588
जलता दीपक कह रहा , भारतवासी एक |
डटकर करते सामना , रखें इरादा नेक ||589
जलता दीपक जानिऐ , मन की सुंदर आश |
प्रेरक साहस का बने , जो नर रहे निराश ||590
कोरोना से भी बड़ा , बड़ा भयंकर रोग |
चिंतित रहता आदमी , क्या कहते है लोग |591
सबसे घातक रोग है , क्या लोगो की सोच |
खोज खवर में आदमी , खा जाता है मोच |592
ह्रदय बसी तस्वीर है , जो है मित्र शहीद |
रक्षा करते जान दी , जिसके सभी मुरीद ||593
नूर चमकता जिस जगह ,आभा से भरपूर |
प्रणय निवेदन मानने , करे शलभ मजबूर ||594
सब रंग कच्चे जानिऐ , कुछ दिन रहे उमंग |
पक्का रंग हम मानते , देश प्रेम का रंग ||595
होली आई देखकर , रोते देखे रंग |
होली दिल्ली हो चुकी , खूनी खेली जंग ||596
दादी अम्मा खेलती . , होली के रस रंग |
नाती पोते दे रहे , उनको नई उमंग ||597
होली पर रोते मिले , हमको सुंदर रंग |
राजनीति ने नष्ट की , पूरी आज उमंग ||598
पहले खेला भूलकर , खूनी होली खेल |
गले मिलन की बात अब , कैसे होगा मेल ||599
नेताओं ने फैलाई , जहाँ जहाँ विष बेल |
कह सुभाष कैसे वहाँ , निकले रस का तेल ||600
जहाँ सड़क पर फैलकर , वही खून की धार |
वहाँ बैठ रोदन करे , होली का त्यौहार ||601
भाई चारा प्रेम के , नष्ट हुऐ विश्वास |
अस्पताल में होलियाँ , विस्तर पड़ी 'सुभास' ||602
कपटी की पहचान है , आकर पूछे राज |
उसी राज को खोलता , देकर निज आवाज ||√603
सुन सभाष नादान तू , दम्भी को मत छेड़ |
एक दिवस वह खुद गिरे, ज्यों खाई में भेड़ ||√604
काला मन उजला करे , कब गंगा का नीर ?|
कागा भी कपटी रहे , खाकर मीठी खीर ||√605
शिल्पी ने पाषाण को , खुद ही दिया तराश |
फिर उससे ही बोलता , मुझमें भरो प्रकाश ||606
शिल्पी पत्थर से कहे , तुमको दिया तराश |
बने आज भगवान तुम , मुझमें भरो प्रकाश ||607
दीप यदि हो नेह का ,सँग समरसता तेल |
बाती हो सद्भाव की ,अनुपम होता मेल ||608
----------------
शादी के कार्ड दोहे
नेह निमंत्रण भेजता , विनय करूँ भरपूर |
घर में शादी काज है , आप न रहना दूर ||609
कृपा प्रभू की हो रही , घर में मंगल काज |
राह देखता आपकी , सुनिऐ विनती आज ||610
परिणय पाती भेजता , खुशियों की बौछार |
परिजन सहित पधारिऐ , करें नेह स्वीकार ||611
जहाँ कृपा हो राम की , सुंदर होवें गान |
मंगल परिणय गेह में , आओं अब श्रीमान ||612
जब तक बहती जानिऐ , भू पर गंगा धार |
सुखी रहे यह वर वधू , खुशियाँ रहे अपार ||613
अतिथि हमारे आप है , मै सेवक नादान .|
गृह में बेटी काज है , दर्शन दे श्रीमान.||614
शादी विटियाँ जानिऐ , तभी बजेगें ढोल |
आप पधारे गेह मम , बने अतिथि अनमोल ||615
आँगन में मण्डप सजे , रक्षा करें गणेश |
आप पधारे गेह मम , स्वीकारें संदेश ||616
शिव जी ब्रम्हा विष्णु का , सँग गणपति का ध्यान |
शादी कारज गेह मम , आओं अब श्रीमान ||617
पलक पाँवड़े डालकर, देखूँ सबकी राह |
आप पधारे गेह मम , बस इतनी सी चाह ||618
डी जे बजता गेह पर , जल्दी आऐं आप |
मंगल परिणय जानिऐ , सुंदर छिड़े अलाप |619
उड़ती सुगन्ध गुलाव की , चहूँ दिशा में शोर |
दीदी का परिणय यहाँ , घर में मंगल.भोर ||620
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-दाता कहते कृषक को , फिर भी वह लाचार |
खाद बीज मौसम कभी , देता उसे प्रहार ||621
वर्षा का जल याद है , सँग माटी का खेल |
बचपन की यादे बसी , वह आपस का मेल ||622
बालक भोले जानिऐ , रहते सदा निशंक |
कमल सरोवर में रहे , फिर भी चुनता पंक ||623
काया मिट्टी जानिऐ , उसके ही सब खेल |
आज लपेटो खेल.में , कल उससे ही मेल ||624
मस्ती से पूरण रहे , मिट्टी के सब खेल |
लिपटाते थे अंग पर ,जैसे हो वह तेल ||625
मिट्टी पानी सँग हवा , बचपन मस्ती याद |
आनन्द और प्रेम का , अनुपम था वह स्वाद ||626
मिट्टी पानी तन लगा , बचपन की है याद |
दादी अम्मा डाँटती , कहती तू बरवाद ||627
आज शिखर पर जानिऐ ,जिनका कर्म महान |
सदा आचरण हो धवल , संग में स्वाभिमान ||628
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छेकानुप्रास अलंकार -
हँस-हँस लोट लोटकर , देख रही नव नार |
मग में पग डगमग दिखें , घूँघट घट है भार ||629
चलती-चलती देखती , चलती चक्की नार |
चलती-चलती बोलती , यह चलता संसार ||630
रुक-रुक कर जो बोलते , सोच-सोच कर बोल |
खोज-खोज वह बाँटते , मधुर वचन अनमोल ||631
पानी-पानी कर रहे , मिलकर पानीदार |
पानी पर पैसा बहा , पानी दिखे न यार ||632
देख देखकर चल रहे , रुकते रुख को देख |
कहते-कहते चुप हुए , मन ही मन कुछ लेख ||633
धोते-धोते गंग में , तन के सारे मैल |
मैल न मन का धो सके , भरा जो ठेलम ठैल ||634
धो - धोकर हैरान है , मैला ठेलम ठैल |
रगड़-रगड़ के बाद भी , ज्यों का त्यों मन मैल 635
वृत्यानुप्रास अलंकार -
साधू का मन देखकर , निज मन रहा न मैल |
मन मन्दिर भी शुचि लगा , संग दिखा मन शैल ||636
उतरा पानी मुख दिखा , सुन पानी की बात |
लाखों का पानी बहा , कागज पर दिन रात ||637
लाटानुप्रास अलंकार -
अभिनंदन ने कर दिया , अभिनंदन का काम |
अभिनंदन भी पाक का , करके काम तमाम ||638
निर्मल का निर्मल ह्रदय , निर्मल मन का नीर |
निर्मल वाणी मुख झरें , हरती तन मन पीर ||639
अन्त्यानुप्रास अलंकार
कामी भँवरा कह गया , कुसुम कली के द्वार |
सुखमय संध्या सेज की , सजे तेरे सुखसार ||640
लोभी भँवरा लौटकर , कहे कली के कान |
रस पीने फिर आऊगाँ , रखना इतना ध्यान ||641
मादक हैं नारी नयन , नचते हैं ज्यों मोर |
उन्हें कमल को मानकर , भँवरे है उस ओर ||642
श्रुत्यानुप्रास अलंकार -
श्याम सरोवर वर दिखें , सुमन सलोने नाथ |
सतरंगी चंगी रहे , मुरली दोनों हाथ ||643
कंचन काया कामनी , कुसुम कली कचनार |
लोभी भँवरे भागकर , आए उसके द्वार ||644
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इस कोरोना काल में , मिलती खूब शराब |
धन्यवाद सरकार का , खुश है कई जनाब ||645
बीड़ी गुटखा मिल रहे , थोड़ा लगे प्रयास |
दस का मिलता तीस में , सच्ची कहे सुभाष ||646
सूखी जर्दा देखते , युवजन रहे खरीद |
तम्बाखू के नाम पर , आधी रहती लीद ||647
बीड़ी की आदत रही , कंठ रहे है सूख |
नहीं धुवाँ अब नाक से , गायव रहती भूख ||648
नीति बचन सब कहें , पर पथ है सुनसान |
कहने बाले वहाँ दिखें , जहाँ नहीं ईमान ||649
कोरोना ज्यादा पढ़ा , और लिखे खुद छंद |
त्राहिमाम् मन कर उठा , कलम हो गई बंद ||650
पोस्ट पटककर चल दिए , खुद की समझें तोप |
आना जाना है नहीं , फिर भी चाहें होप || 651
सखी कहे राधा सुनो , किस रँग से है प्यार ?|
राधा बोली श्याम रँग , मेरा मन आधार ||652
राधा बोली श्याम से , है होली त्योंहार |
अपना निज रँग छोड़ना , मेरे मन के व्दार ||653
श्याम कहे राधे गुनो , मेरा रँग है स्याह |
राधा कहती स्याह में , सब रँग छिपे अथाह. ||654
छवि बसती है नैन में , अंग अंग है श्याम |
राधा कहती श्याम रँग , लगते मुझको धाम ||655
होली खेले श्याम जी , राधा जी के साथ |
नैनो से रँग डालते , पकड़े दोनों हाथ ||656
श्याम कहें राधा सुनो , होली है रस रंग |
राधा बोली श्याम तू , मेरी.सदा उमंग |657
रंग महकता केसरिया , फूले टेसू फूल.|
होली खेलन चल पड़ी , गोपी यमुना कूल |658
रंग लेकर के गोपियाँ , करती हरि की खोज |
हरियाली में हरि छिपे , देख रहे है.मोज |659
हँस हँसकर गोपी कहे , सुनिऐ नंदकिशोर |
मै होली पर आ गई , सुनिऐ मेरा शोर ||660
गोपी हँसकर कह रही , लल्ला अब क्या नाम |
इस होली की मार में , सतरँगी घनश्याम |661
गोपी मिल मंथन करें , हँसी करुँ या क्रोध |
कान्हा फोड़त गगरी , अंतरमन में शोध ||662
सखी छीनकर बाँसुरी , कहती सुन लो श्याम |
पहले वादा कीजिऐ , सुर में मेरा नाम ||663
मिलजुल कर गोपियाँ , रही कृष्ण को हेर |
नचा रही नँदलाल को , चार तरफ से घेर .||664
मधुर गीत जीवन रहे , संग रहे उत्साह |
दया भाव उर में बसे , वहाँ प्रगति हर राह ||665
महाशिवरात्रि पर्व
महाकाल दरवार में , शीश झुकाता आज |
महादेव पूरण करें , बिगड़े मेरे काज ||666
शिव ही पालनहार है, शिव ही जग का नाम |
महादेव शिव जानिऐ, शिव ही सुख के धाम |667
गिरी हिमालय शिव रहें , माँ गौरी के साथ |
भक्त उन्हें भोले कहें , माने अपना नाथ ||668
महादेव जी आपका , मै सेवक नादान |
करूँ भाव से अर्चना , तेरी कृपानिधान ||669
माँ गौरी को मानता , पिता श्री महाकाल |
जिस घर मंगल मूरती, पुत्र गणेशी लाल ||670
नही नौकरी खेत भी , और नही व्यापार |
पहले आकर लीजिऐ , शादी का सब भार ||671
मम गृह शादी काज है , लखूँ आपकी राह |
आप पधारे प्रीति सँग , बस इतनी है चाह ||672
-------------------
जय किसान नारा सुना , देशप्रेम अनुराग ||
खेतों में हल हाँककर , युवक ले रहे भाग ||673
रतन रहे दो बैल है , दादा जी के दौर |
खेत जोतने जानिऐ , यही रहे शिरमौर ||674
हल बैलो के साथ में , यदि है खड़ा जवान |
निश्चित अब यह मानिऐ , होगा अभ्युत्थान ||675
आदर सम्मुख यदि मिले , पीछे यश गुणगान |
वही नाम जग में चले , जो पावें सम्मान ||676
सुधा तुल्य माँ दूध की , जो रखते है लाज |
जन्नत उनके दर रहे , आदर करे समाज ||677
मात शारदे नाम पर , कुंठित करें दुकान |
खुद को समझें तोप वह , दूजों को नादान ||678
खुद को ही घोषित किया , हम ही है गुणवान |
बाकी मूरख मानते, भले दिखे श्रीमान ||679
चूल्हा रोटी यदि मिले , सँग में सरसों साग |
मक्खन भी हो साथ में , समझें सुखद पराग ||680
चूल्हे की रोटी सदा , अनुपम देती स्वाद |
दादी जी के हाथ की , रोटी अब तक याद ||681
भारत माँ मम शान है , माने देवी रूप |
हाथ तिरंगा देखकर , लगती बड़ी अनूप ||682
भारत माँ के लाल हम , गिनती सवा करोण |
हाथ तिरंगा थामकर , देते दुशमन तोड़ ||683
ध्वज है मेरे देश का , जिसका जन गण गान |
हर रँग में संदेश है , चक्र प्रगति की शान ||684
केसरिया रँग त्याग का , श्वेत प्रेम का गान |
खुशहाली कहता हरा , चक्र विजय पहचान ||685
#दोहा_पहेलियाँ
पर्त चढ़ी है पर्त पर , धवल बनी है गाँठ ||
मिले सभी का नेह भी , सबसे उसकी साँठ.||(प्याज)686
लाल रंग मोती भरे , मीठे फल का नाम |
रसमय दाने हम चखे , शीतलता अविराम ||(अनार)687
एक पुष्प इक फल दिखे , जोड़े दोनों नाम |
बना सुखद मिष्ठान है , उत्तर दो अविराम ||
(गुलाव जामुन )688
लाल रंग का किला है , सबका कहे विवेक |
मृदुता से है पिलपिला , सैनिक जहाँ अनेक ||
(टमाटर )689
फल , व्यंजन में नाम है , दोनो रुचिकर मेल |
इक मीठा इक चटपटा , है त्रय मात्रा खेल ||(सेव)690
हरित सीप , मोती भरे , मृदुता भरी अटूट |
तोड़े से बिखरें सभी , रहती उनको छूट ||(मटर फली )691
खुद उसके ही नाम से , उसको किया सलाम |
दे आया जो पाक को , भारत का पैगाम ||-अभिनंदन692
हरे रंग छतरी दिखी , बूड़ी दिखती लाल |
पिसकर चढ़ती जीभ पर , झन्नाते है गाल ||(मिर्च )693
गिनती बारह राशि में , उनमें से है एक |
उल्टा करके पढ़िऐ , मिले रकम तब नेक || मकर (राशि) 694
चार खूँट का चादरा , जिसका छोटा रूप |
रखते जेबों में सदा , रँक होए या भूप ||( रुमाल )695
आप गुणी पहचानिऐ , कौन राशि में गान |
उल्टा सीधा देखिऐ , रहती एक समान ||कर्क (राशि)696
हरित रंग रानी दिखी , बच्चे दिखे सफेद |
सब्जी की है मालकिन , इतना देता भेद ||(-भिंडी )697
लगी सभी के चेहरे , है नाजुक नादान |
ऊपर नीचे नाचती , लो इसको पहचान ||( पलक)698
तीन मात्रा सृजन करें , आनन के दो अंग |
खाई दोनों अंग है , मारग जिनका तंग ||(नाक कान)699
बापू की है पुण्य तिथि , दिन शहीद है आज |
नमन करें शतवार हम ,जिन्हें देश पर नाज ||700
मात् शारदे अवतरण , वर्णन करते संत |
हम सब नतमस्तक करें , अर्पित पुष्प अनंत |701
वंदन करता आपका , हे ऋतुराज बसंत |
माघ शुक्ल की पंचमी ,महिमा बड़ी अनंत ||702
आज निराला जयंती , सुखद साथ त्यौहार |
बागों में बिखरा हुआँ , फूलों का उपकार ||703
आऐ है ऋतुराज अब ; फूले फले पलाश |
शीत शयन करने लगी ; सुखद बसंत सुभाष ||704
पीली पगड़ी आप पर ; शोभित है ऋतुराज |
स्वागत बंदन चंदन ; हर्षित सकल समाज ||705
नेह निमंत्रण मानिए , विनय करूँ भरपूर |
ऋतु वसंत जी आप अब कभी न जाना दूर ||706
कृपा प्रभू की हो रही , घर में हो शुभ आज |
ऋतु वसंत का आगमन , मंगल करता काज ||708
ऋतु वसंत लगती हमें , खुशियों की बौछार |
मंगल यह करती सदा , करें नेह स्वीकार ||709
जहाँ कृपा हो राम की , सुंदर होवें गान |
ऋतु वसंत हो गेह में , आओं सब श्रीमान ||710
काँव काँव कागा करे , बैठा प्रात: मुड़ेर |
अतिथि आगमन हो रहा , तनिक न समझो देर ||711
कुत्ते रोऐं रात भर , आप रहें हैरान |
अनहोनी कुछ घट रही , पूरा है अनुमान ||712
निकले अच्छे काज को , भरे कलश का दर्श |
सुनो सफलता हाथ है , मन में रखिऐ हर्श ||(हर्ष)713
कन्या चलती राह में , कहीं तुम्हें ले घूर |
अनुकम्पा माँ की हुई , सभी मनोरथ पूर ||714
नीलकंठ का दर्श है , दिवस दशहरा जान |
सभी अमंगल हट गऐ, निकट मिले सम्मान ||715
दिखे बैल मोटा अगर , सपने की हो बात |
सस्ता गल्ला जानिऐ , सुलभ रहें दिन रात ||716
मोती देखा चमकता , बेटी का आभाश |
बेटे का संयोग है ,सपना यदि आकाश ||717
देखा सपना आपने , है चावल का ढ़ेर |
फल इसका यह जानिऐ ,मिटे शत्रु से बैर ||718
पूजा करते स्वयं दिखे , सपने आऐ संत |
नष्ट पुरानी हो रही , सुनो समस्या अंत ||719
हरा भरा जंगल दिखा , है सपने का राज |
खुशियाँ अब घर आ रही ,सफल सभी है काज ||720
दरवाजा घर का खुला ,सपना बड़ा बिचित्र |
फल इसका यह जानिऐ , नया बनेगा मित्र ||721
सपना देखा आपने , उठता धुवाँ गुवार |
निश्चित हानी हो रही , जो करते व्यापार ||722
छप्पर टूटा देखना , है अचरज की वात.|
गड़ा हुआँ धन योग है , तुमको आधी रात ||723
दिखे सिंहनी सिंह सहित , सपन न जाना भूल |
शादी जीवन मधुर है , और सदा अनुकूल ||724
आसमान में उड़ रहे , सपना है सुखकार |
मिटी मुसीवत जानिऐं , शिर से उतरा भार ||725
चंदन देखा आपने , सपने में सत्कार |
समाचार शुभ आ रहे , समझों अपने व्दार ||726
कैची देखी आपने , चमक रही है धार |
कलह आगमन जानिऐ , आप रहें तैयार ||727
माँ सपने में आ गई , समझो सुंदर गान |
यश बैभव बढ़ता मिले , और साथ सम्मान ||728
बिल्ली सोना बाढ़ भी , सपने में हो दर्श |
धन हानी संकेत है , तीनों हरते हर्ष ||729
कीचड़ सपने में लखा , चिंता की है वात |
दामन रखिऐ साफ तुम , दुश्मन देगा घात ||730
साँप देखकर जानिऐ , धन मिलने के योग |
यह सपना सुखमय लगे , घर में भोगें भोग ||731
जूता छोटा पहनना , यह सपना बेकार |
पर नारी झगड़ा करे , वेमतलव की रार ||732
देख रुई के ढ़ेर को , होवें आप निरोग |
सपने का फल बोलता , घर में सुंदर योग ||733
पकी फसल को देखना , रोटी खाऐ आप |
सपना सुंदर मानिऐ , घर में धन की थाप ||734
किसी मृतक से बात की , सपना सुंदर मान |
मनचाहा पूरण हुआँ , बढ़ा आपका मान || 735
स्वर्ण देखना हानि है , रजत वहाँ पर लाभ |
तीर धनुष पर यदि चढ़ा , सपन है आभताभ ||736
सपने में शव देखना , सुनो सगुन की वात |
बीमारी अब भागती , उजली होगी रात ||737
सपने में चूड़ी दिखे , जागे उससे राग |
घर में खुशियाँ आ रही , मिटा कष्ट के दाग ||738
चन्द्र चमकता देखना , सपने की सच वात |
मान मिलेगा आपको , बनकर के सौगात ||739
लाल पुष्प खिलता लगे , सपना देखे आप |
किस्मत है अब जागती , लेकर नूतन छाप ||740
झरना कल कल बह रहा , पानी दिखे अनंत |
सपना यह है बोलता , सुनो दुखो को अंत ||741
शुभकामना दोहा विधा में 🌹
लाख बधाई भेजता , जन्म दिवस पर मित्र |
मिले सफलता जगत में, महके हर पल इत्र || 742
मन से भेजी भावना , जन्म दिवस पर आज |
जीवन पथ की राह में , सभी सफल हो काज ||743
आज अवतरण आपका , मंगल गाता गीत |
भेजी है शुभकामना , रहे हाथ में जीत ||744
आज दिवस है आपका , सचमुच में अनमोल |
जन्म दिवस मंगल रहे , बजे सुहाने ढोल ||745
बर्षगांठ शुभकामना , पाणिग्रहण की याद |
आप युगल प्रमुदित रहे , जीवन के शृंगार ||746
साथ बधाई भेजता , जिसे करें स्वीकार |
दाम्पत्य सुखमय रहे , घर में सदा बहार || 747
पुष्पगुच्छ. मै भेजता , और साथ मनुहार |
महको पुष्पों से सदा , मिले सफलता काज ||748
बर्षगाँठ है मिलन की , बने परस्पर मीत |
भेजी है शुभकामना , सदा रहे अब जीत ||749
दो का दो से गुणनफल , आता पूरा चार |
पर तुम दोनों के मध्य , खुश्बू बने हजार ||750
जन्मदिवस शुभकामना , कर लीजे स्वीकार |
मंगलमय हो हर दिवस ,खुशियाँ रहे अपार ||751
भाव पुष्प की माल है , जन्म दिवस पर आज |
अनुकम्पा हो ईश की , सफल मनोरथ काज ||752
नेह नूर सबका मिले , सुंदर हो परिवेश |
जन्म दिवस शुभकामना , देता आज विशेष ||753
खुशियाँ बरसे नव सदा , हर दिन हो त्यौहार |
जीवन के सब सुख मिले , सुंदर सुखद विचार ||754
मंगल करता कामना , खुशियाँ मिले अनेक |
सदा साथ हो आपके , विद्या विनय विवेक ||755
सुखमय जीवन आपका , रहे परस्पर गान |
देता हूँ शुभकामना , रहे सदा सम्मान ||756
राम सिया सा प्यार हो , जोड़ी राधे श्याम |
गौरी शंकर से रहें , घर भी हो सुख धाम ||757
जन्म जन्म का साथ हो , रहे साथ में प्रेम |
जीवन में आनंद हो , रहे कुशलता क्षेम ||758
रहे परस्पर प्रेम का , आपस में विश्वास |
सुख दुख में साथी रहो , नित नूतन उल्लास ||759
जीवन पथ में आपका , रहे परस्पर. साथ |
धर्म कर्म में रुचि रहे , सुयश रहे अब हाथ ||760
दाता. लीला जानिऐ , मंगल है उपकार |
धनी सुदामा बन गया ,अंतस किया निखार ||761
एक शहीद परिवार के भाव -किसने क्या कहाँ
मॉ~आया मेरा पूत है ; भारत मां के काम |
धन्य कोख मेरी हुई ; अमर किया जब नाम || 762
बहिन~ बहिन थाम राखी ,कहे ; इसका है बड़भाग |
भैया ने बतला दिया ; देश प्रेम अनुराग ||763
पिता~ गर्वित मेरा माथ है ; है बेटे पर नाज |
मेरे घर का लाड़ला ; बना शत्रु पर बाज.||764
पत्नी~ मरे नही पत्नी कहे ; मेरा अमर सुहाग |
बनी सजनियां वीर की ; धन्य हमारे भाग ||765
भाई~अनुज कहे मेरा अग्रज ; मुझको देता काम |
मै भी उसके पथ चलूँ ; जीवन मॉ के नाम ||766
बेटा~ बेटा बोला पद चिन्ह ; पिता मिलें अविराम |
वह भी देखे स्वर्ग से , कर लूँ ऐसा काम ||767
बेटी ~कफन तिरंगा मै रखूँ ; जब जाऊँ ससुराल |
यह दहेज मेरा रहे ; जिसको रखुँ सम्हाल.||768
मित्र - जब तक मै जिन्दा रहूँ ; ह्रदय रहेगा मित्र |
प्रेरक हो भारत में ; रहे नाम में इत्र ||769
नगरवासी - याद रखे पूरा नगर ; बेटे का बलिदान |
मिलजुल इस परिवार का ;सभी रखेगे ध्यान ||770
ज्ञान न पाता आलसी , धन मूरख को भार |
निर्धन तरसे मित्र को ,कपट न सुख आकार ||771
विद्या पढ़े न आलसी , धन मूरख को धूर |
निर्धन तरसे मित्र को ,सुख. अमित्र से दूर ||772
आलस नर का शत्रु है , श्रम को समझें मित्र |
नही परिश्रम दुख सहे , श्रमकण बनते इत्र ||773
साक्षात गुरु मानिऐ , ब्रह्मा विष्णु महेश |
परम पिता गुरु जानिऐ , नमन करूँ गुरु वेश ||774
परम ब्रह्म गुरु मानते , गुरु ही तीनो देव |
ब्रह्मा शंकर विष्णु है , करूँ गुरू की सेव ||775
मातु-पिता ,भ्राता -सखा , विद्या धन है नाम |
सर्वे सर्वा जगत के , तुमको करूँ प्रणाम ||776
मातु पिता मम हो सखा , विद्या धन के रूप |
भ्राता मेरे आप ही , हो सर्वज्ञ अनूप ||777
बोझा ढोता आदमी , गर्दभ बने सवार |
दान भिखारी बाँटते , दानवीर लाचार ||778
कम्वल ओढ़े जेठ में , लू चलती है शीत |
पंडित जी का घर चले ,चेले की ले नीति||779
सच सुभाष यह मानता ,पश्चिम निकले भान |
हिंदी से एम ए किया, फिर भी है नादान ||780
कविता सविता सी बने , या गंगा सा नीर |
तन मन को छूती हुई , हर ले पूरी पीर ||781
सब कोई कविता सुने , कविता गुनें न यार |
एक वार कविता गुनें , मिले ज्ञान भण्डार ||782
कवि भी, रवि सा जानिऐ , कहे तथ्य की बात |
बर्ना कपि ही, मानिऐ , उछल कूँद दिन रात ||783
मथकर घृत ऊपर दिखे , है कविता का रुप ||
कविता वह कैसे करें , जो तुकबन्दी कूप ||784
सखी कहे तू श्याम से ,कितना करती प्यार |
राधा कहती नाप ले , जितना है संसार ||785
छवि बसती है नैन में , रोम रोम में श्याम |
राधा कहती श्याम पग , लगते मुझको धाम ||786
मुहावरा दोहे
आवश्यकता पर मिले , राशी प्रतिशत एक |
जीरा मुख है ऊँट के , बोले लोग अनेक ||787
रार मिटाने थे चले , कर बैठे बकवास |
प्रभूभजन को छोड़कर , ओटन लगे कपास ||788
मिले सबल को यदि सजा , सँग निर्बल का योग |
गेहूँ के सँग धुन पिसा , कहते है तब लोग ||789
वादा करके तोड़ दे , मुख मोड़कर जाए |
दिखा अँगूठा है दिया , यहि समझ में आए ||790
मिले सहारा दीन को , उसकी करे सहाय |
अंधे की लाठी बने ,सबको यह दिखलाय ||791
मतलब अपना देखकर , करते है जो बात |
उल्लू सीधा बह करें , सबको लगती घात ||792
बिन प्रयास का धन मिले , दिखे न कोई देर |
घर बैठे तब लग गई , अंधे हाथ बटेर ||793
विना विचारे जो चले , करते निज नुकसान |
पैर कुल्हाड़ी मारकर , कहलाते नादान ||794
जिद्दी हो यदि आदमी , रहना उससे दूर |
ज्ञान वहाँ खामोश है , कुंठा है भरपूर ||795
पग बजते है नार के , घुँघरू है खामोश |
नैना करते बात है , मुख लगता बेहोश ||796
कहे शरावी अब सुनो , छोड़ो बोतल जाम |
नशा नैन से आ रहा , मिले बड़ा आराम ||797
हाथी विल में छिप रहा , मूषक घूमें आम |
हिरणी करती छल यहाँ ,काग जपे श्रीराम ||798
गूगल जी अब गुरु हुऐ , पाते है सम्मान |
ज्ञाता लगते जगत के , बाकी सब नादान ||799
आगे हम सबसे कहें , रहें निकट अब हर्ष |
मंगलमय सबको रहें , अब यह नूतन वर्ष ||800
मन मलीन कपटी ह्रदय , धवल पहनते वस्त्र |
जहाँ जमी है गंदगी , करे वहाँ क्या इत्र || 801
कीड़े खाकर छिपकली , छिपी राम के चित्र |
बदल न पाया आचरण , बदला नही चरित्र ||802
दुश्मन आया काम है , दगा दे गए मित्र |
का़यम रखना दुश्मनी, कहता बात विचित्र ||803
कंचन सी है सभ्यता , यदि हो मीठे बोल |
हीरे का तो मोल है , पर यह सच अनमोल ||804
संस्कार से आदमी , देता अपना भान |
सुखद आचरण का सदा , जग करता है गान ||805
संकल्प सदा ही लक्ष्य , करता शर संधान |
साहस. से चीटी चढ़े , हम सब करते गान ||806
दुखी जनों में दुख भरा , सुखी करें सुख बात |
ज्ञानी बाँटे ज्ञान ही , अवगुण देते घात ||807
अमर रखे साहित्य ही , युग युग का इतिहास |
कीर्तिमान भी विश्व के , रहते उसके पास ||808
वही सुनाता आदमी , जिसका जैसा राग |
धेनू देती दुग्ध है , जहर उगलता नाग ||809
जीवन में सुख दुख मिले , उसे करो स्वीकार |
दुख तो काली रात है , दिन है सुख बौछार ||810
बात हजम होती नही , चुगलखोर में नाम. |
निजी प्रशंसा खुद करें , अभिमानी सब काम ||811
दौलत पाकर जो चले , सदा पाप की राह |
नही चैन उनको मिले , रहे ह्रदय में दाह ||812
विभावना अलंकार
दमकत लली के रुप से, चंदा का आभाश |
नथनी के नग नूर से , तारे करें प्रकाश ||813
काग बजाते सारँगी , कोयल पीटे ढोल |
सूरज की कीमत नहीं , दीपक लेते मोल ||814
शेर गुफा में छिप रहे , करे लोमड़ी शोर |
बिल्ली बिल से देखती , मूषक है शिरमोर ||815
उड़ते अब आकाश में , पशु भी लेकर पंख |
और दबाए चौंच में , कागा फूँकत शंख ||816
नागनाथ जी संत है , बगुला बना महंत |
आगे मूषक जी चले , दिखे हिरण जी अंत ||817
राजनीति परिवेश में , मेढ़क दिखते चंग |
गधे बने सरपंच है , कागा बदले रंग ||818
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श्याम सलोनें लग रहे , राधा जी के साथ |
अधर लगी मुरली बजे , पकड़े दोनों हाथ ||819
श्याम कहें राधा सुनो , मन तेरा मनुहार |
राधा बोली श्याम तू , मेरा मन आधार ||820
सूर्य गमन उत्तर दिशा , लेकर शुभ संदेश |
सुखी रहें सब जीव अब , सुखद दिखे परिवेश ||821
शीत काल का अंत है , आगे दिखे बसंत |
सुखमय हो जीवन सदा , खुशियाँ मिले अनंत ||822
मकर राशि में कर रहा , सूरज जहाँ प्रवेश |
मंगलदायी फल रहे , मेरे भारत देश ||823
पंजाबी है लोहड़ी , बुड़की भी बुन्देल |
हर हर गंगे सब करें , तन पर तिल का तेल ||824
नाना बिधी से तिल के , बनते है पकवान |
हर्ष हिलोरे मारता , अर्घ सूर्य भगवान ||825
मधुरस नयनों में भरा , अनुपम रति शृंगार |
भ्रमर कहें वन में खिली ,अभी कली कचनार ||826
सजनी सँवरें रात दिन , साजन है परदेश |
कहती प्रीतम घूमते , धरें भ्रमर परिवेश |827
गोरी लगती मोरनी , नयन लगे चितचोर |
चढ़े धनुष पर तीर सी , काजल की है कोर ||828
देवालय सी माँ लगे , अनुपम माँ अनुराग |
शब्द नही ऐसे बने , वर्णन कर दे त्याग ||829
माँ संतानो के लिए , इतना करती त्याग |
त्याग मूरती माँ कहे , ममता लगे पराग ||830
माँ की ममता छाँव है , लगती बड़ी अनूप |
शीत लगे वह जेठ में , पौष माह है धूप ||831
माँ की महिमा जानिए , माँ पद प्रभू समान |
आते ही जग में यहाँ , माँ ही पहला ज्ञान ||832
रख देती है माँ सदा , जब- जब शिर पर हाथ |
मिले सफलता काज में , ऊँचा रहता माथ ||833
उसका भी यश फैलता , उसको मिलता मान |
विनय करे माँ की सदा , रखता उसका ध्यान ||834
उसका भी यश फैलता , जिसका परहित गान |
मीठी वाणी बोलकर , दया भाव दे दान ||835
शारदे माँ शिवानुजा ; है पद्यनिलया शान |
चन्द्रलेखाविभूषिता ; विद्याधरा मां गान || 836
मां 'ज्ञानमुद्रा' 'वरप्रदा' , 'महाफला' है शान |
'सुधामूर्ति' हे 'शारदे' , कृपा दे 'गुणनिधान' ||837
"'शिवानुजा' 'वीणापाणि ', है 'पद्यनिलय शान |
'चन्द्रलेख' से विभूषित ' ; 'विद्याधर " मां गान ||838
'ब्रम्हजाय' माँ ' जानिऐ , मात् 'मालनी' नाम |
'श्वेतानन';मां 'सौम्या' , 'विमला' 'विद्याधाम' ||839
'ज्ञानदायनी ' मात है , 'बैष्णबी' है नाम |
'अज्ञानतिमिर' भंजनी ,आनन तीरथ धाम.||840
"ज्ञान शक्ति' 'माँ जानिऐ ", "हंसासना" सुनाम |
"चंद्रिका" गुणी पूजिका " , "महाफला" है धाम.||841
"महामायनी " "महाभद्र " ,"महागुणी " अवतार |
"विद्यारूपा"मां " शारदे " , "गोमती" ओमकार ||842
"श्रीप्रदा" नमो "मालनी" , सुभाष तेरा दास |
" रमा" "परा" माँ को कहें ,सँग कान्ता" प्रकाश ||843
मां है "पातकनाश्नी" ." जो लेते है नाम |
"महोत्साहा" जानिऐ ; है "सौम्या ' सुधाम ||844
"चित्राम्वरा" "भारती"; "श्वेतानन" मां रंग |
"महापाश " विद्याधरा' : 'सुवासिन' मां उमंग ||845
"महाकार माँ को नमन, "महाभुजा" भी नाम ||
"चंद्रबदन माँ को कहे , ". विद्यारूपा" धाम ||846
भूलचूक हो कही भी , गुणियों पढ़े सुधार |
उसके पहले मात भी , क्षमा देय उपकार ||847
प्रथम किरण नववर्ष की , हर्षित हो सब गान |
यश वैभव सुख सम्पदा , बढ़े आपका मान ||848
वीरो का भूषण क्षमा , सँग में है शृंगार |
क्षमा भाव जो मन रखे, देव तुल्य वह यार ||849
सोना चढ़ा सुहाग है , क्षमा करे बलवान |
उसका ही यश फैलता , गाते सब गुणगान.||850
कभी समय पर भी क्षमा ,देती फल अविराम |
जाल काटने शेर का , मूषक आया काम || 851
महिमा गुरु की जानिए, , पद है प्रभू समान |
गुरू करे जीवन शुरू , देकर सच्चा ज्ञान ||852
रख देते है गुरु सदा , जिसके शिर पर हाथ |
यश मिलता जग में उसे, उन्नत रहता माथ ||853
पाप पुण्य के कर्म फल , देते सुख संताप |
पुण्य सदा सुखकर लगे , देय खिन्नता पाप 854
पाप पुण्य पर तुल रहे , करम सभी दिन रात |
भाव वचन बनते करम, कौन समझता बात ||855
हम कोल्हू के बैल से , घूम रहें दिन रात |
दुनियादारी झेलते , सहते रहते घात ||856
दोहा मधुरस जानिए , घुलता जिस मिष्ठान |
खोता व्यंजन में नही , अपनी निज पहचान ||857
बगुला पण्डा कब बने , संतो की सुन बात |
मछली पर वह चौंच से , करता रहता घात ||858
लगता अच्छा है नहीं, खल को सच्चा ज्ञान |
बस मतलब की बात पर , उसका रहता ध्यान ||859
गुनियाँ ग्राहक यदि मिले , वहाँ दीजिए ज्ञान |
देने मूरख को चले , खतरे में सम्मान ||860
सभी धुरंदर है यहाँ , कौन दिखे कमजोर |
दोहो के ज्ञानी यहाँ , कविगण सब चितचोर ||861
आवे ज़मज़म गंग जल , दोनों पावन नीर |
दोनों ही अनुपम लगें , दिखें एक तासीर ||862
आबे ज़मज़म गंग जल , दिखे एक सी बात |
दोनों में ही जानिए , रहवर की सौगात ||863
सरल दिखे जीवन कहीं , कहीं दिखे विकराल |
साहस है यदि पास में , हल है सभी सवाल ||864
दाता लीला जानिए , प्रभू करें उपकार |
धनी सुदामा बन गया , अंतस हुआ निखार ||865
कंचन काया कामनी , कपटी कूप कपूत |
इनसे धोखा कब मिले , जाने कौन सपूत . ||866
मधुरस नयनों में भरा , अनुपम रति शृंगार |
भ्रमर कहे वन में खिली अभी कली कचनार ||867
सजनी सँवरें रात दिन , साजन है परदेश |
कहती प्रीतम घूमते , धरें भ्रमर परिवेश ||868
उपकारी मत भूलिए , करें न इसकी तोल |
मोती का तो मोल है , उपकारी अनमोल ||869
वचन निभाता आदमी , नभ का लगता भान |
अभिनन्दन का पात्र है ,यश का रहता गान ||870
करता साहस ही सदा , आगे शर संधान |
चीटी चढ़ती देख लो , मंजिल है आसान.||871
जितना जैसा पढ़ लिया , वही पास है ज्ञान |
क्षमा करें किसने पढ़ा , पूरा अनुसंधान ||872
पीने शीतल जल गया , तेज चटक थी धूप |
धोखा राही को मिला , रिक्त पड़ा था कूप ||873
निर्विकार यदि मन नहीं , भाव नही है शुद्ध |
वह सुभाष कैसे बने , परमहंस सा बुद्ध ||874
जहाँ आवरण दर्प का , वहाँ ज्ञान बेकार |
मोती है यदि सीप में , आभा है लाचार ||875
पानी सा ज्ञानी रहे , निर्मलता आधार |
धोकर मन पावन करे , मेटे सभी विकार ||876
अपने अंदर खोजिए, कितने भरे उसूल |
दूजे में कुछ झाँकना , हमको लगे फ़िजूल ||877
धनी नही धर्मा यहाँ , सुख साधन मदचूर |
पुण्य वान निर्धन लगे , संतोषी भरपूर ||878
दोहाकार समर्थ है , करें सृजन सब शोध |
समय मांगता यह पटल, विनयावत् अनुरोध ||879
चिल्लाती हरिआ लली , हरिआ जाऐ भाग |
सुनते ही हरि आ गऐ , बोले सुंदर राग ||880
बेटा जहाँ गुलाब है , बेटी वहाँ पराग |
घर का बेटा भाग है , बेटी मन अनुराग ||881
बेटा जहाँ उमंग है , बेटी वहाँ तरंग |
भैया भी बेटा बने , यदि बेटी का संग ||882
कुल दीपक बेटा बने , बेटी वहाँ प्रकाश |
वंश बेल बेटा कहें , बेटी कुल आभाश ||883
बेटा घर का मान है ,पर.बेटी सम्मान |
बेटी तीरथ सी लगे , बेटा घर का .गान ||884
सुत उत्तरदायी बने , सुता रहे उल्लास |
माने सुत को कामना, सुता भावना वास ||885
बेटा बेटी दूर हो , दीजे आप पुकार |
बेटी आए दौड़कर , बेटा करे निहार ||886
बेटे को भाग्य कहें , समझें उसको शान |
सौभागी है बेटियाँ , किसको इसका ज्ञान ||887
मंगल मौन सुधा कलश, न्याय बिम्ब सौगात |
चंदन सी है बेटियाँ , महक रहे दिन रात ||888
न्याय मांगती बेटियाँ , सजल नयन मुख मौन |
कृष्णा का अब युग नही , लाज बचाए कौन ||889
पागल नर क्यों हो रहा , कामुकता आधीन |
लुटती है अब बेटियाँ , दिखे कृत्य सब हीन ||890
कामुक नर बहशी बना , उत्तरदायी कौन |
नही सुरक्षित बेटियाँ , न्याय दिखा है मौन ||891
डाला है जब घाव पर , नमक किसी ने यार |
मिरची का लेपन किया , जिसे किया स्वीकार || 892
किसने देखा है यहां , कल का उगता भान |
जो देखा वह आज का , कल की क्या पहचान |893
उस पल की किसको खबर , जिस पल आना मोत |
खबरी क्या यह जानते , किस पल बुझना ज्योत ||894
राहगीर संसार का , चलता जाता राह |
तिनका तिनका जोड़ता , है स्थाई की चाह |895
गोरी लगती मोरनी , नयन लगे चितचोर |
चढ़े धनुष पर तीर सी , काजल की है कोर ||896
गोरी मृगनयनी लगे , मधुवन चलती राह |
भ्रमर शिकारी बन रहे , लेकर तीर अथाह ||897
जहां लोमड़ी चल रही , हिरणी चाल अनूप |
अभिनय करती बैश्या , रखे सती का रुप |898
हंसो की बस्ती मिली , जहां काग सरपंच |
वहां देखने को मिले , नित नित नए प्रपंच ||899
चिड़ियाघर हम बोलते, जहाँ .शेर है बंद |
ताकत देखी कैद में , चिड़िया उड़े स्वछन्द ||900
निकले नही म्यान से , जब कोई. तलवार |
चमक तेज ठंडी पड़े , जंग पड़त है धार ||901
तेज बोलना आपका , दर्शाता है खीज |
बातचीत आती नहीं , गिरबी रखी तमीज ||902
नही नाम में कुछ रखा , पहचाने सब काम |
झूठ गवाही दे रहे , सत्यचन्द्र जी नाम ||903
सत्य छिपाने के लिऐ , बोले झूठ हजार |
फिर भी जाती वह पकड़ , दिखे सदा लाचार ||904
चलते रहो सुभाष तुम, रुकने का क्या काम |
हर पग पर तुम लीजिए ,सदा प्रभू का नाम ||905
सीखा कभी न तैरना , गए नदी में कूँद |
बड़ी दूर तक बह गए ,तन पर चोट फफूँद ||,906
कोशिश जो करते रहें ,वहाँ सफलता दास |
बने आलसीदास जो , मक्खी उड़ती पास ||907
चर्चा शेर शिकार की , करें आलसीदास |
चीटीं तक मसली नहीं , करे सदा बकवास ||908
संकट में गायब हुए ,जो पकड़े थे हाथ |
परम हितैषी लोग थे ,जो रहते थे साथ ||909
काले काग नहा रहे , है साबुन. में झाग |
क्या हंसा बन जाएगें , या छूटेगें दाग ||910
जब कागा ने स्नान कर , खुद को बोला हंस |
झाग सर्प का दिख गया, राजनीति का बंश ||911
कागा दिखते हंस है , राजनीति की खाल |
जनता भी अब भ्रमित है , कहां लगाए ताल.||912
लँगड़े पर्वत चढ़ रहे ,अंधे पिक्चर हाल |
राजनीति परिवेश में , यही दिखें भूचाल ||913
किसी अनाड़ी हाथ में ,जब. होती बन्दूक |
उसको कभी न छेड़ना , हो सकती है चूक ||914
संशोधित अच्छी भली , मिलती उचित सलाह |
विनम्र सदा स्वीकारिए , सृजन मनन की राह ||915
साथीगण है आपके , नहीं करो इग्नोर |
जिसकी जैसी कलम है , करे फैसला श्योर ||916
बड़ी कलम के साथ में , छोटी चल दे साथ |
यदि बड़े दे आलम्वन , सुदृड़ सभी का हाथ ||917
व्यापारिक दोहे
व्यापारी व्यापार में , देने लगे उधार |
इंतजार तब हाथ में , क्रेता यदि लाचार ||918
अपनी रकम गवाँइये , देकर माल उधार |
लोटी तब सब ठीक है, वर्ना सब लाचार ||919
थोड़ी पूंजी से नहीं , करें बड़ा व्यापार |
जोखिम का यह काम है , रहे आप हुश्यार ||920
सामानों के साथ में , बिकता है व्योहार |
कर्कषता के साथ में , धन्धा है बेगार ||921
जितनी होवे सम्पदा , उतनी भरो दुकान |
रहे विनम्रता गद्दी पर, ग्राहक है भगवान.||922
व्यापारी की छवि सहज , जुड़ जाए ईमान |
यही प्रशंसा आपकी , कर देगी उत्थान ||923
कहते यहाँ सुभाष है , नगर जतारा छाप |
अपने खुद व्यापार की , इज्जत राखे आप ||924
सुनते है व्यापार में , बिकता भी कुछ नाम.|
अपना नाम कमाइये , उचित रखे सब दाम ||925
इतना खर्च निकालिए , रकम न जाऐ टूट |
आमद से खर्चा अधिक , गए करम तब फूट ||926
समय समय पर कीजिए ,थोड़ा सा बदलाव |
ग्राहक को ऐसा लगे ; यही रहे ठहराव ||927
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मीठा खाने जब गए , मन में उठी हिलोल |
अंदर मीठा था नही , बाहर जूते गोल ||928
चमचों के सानिध्य में , सभी काम आसान |
नेता के दरबार में , चमचों पर दो ध्यान ||929
दोहावली
काम लेखनी का यही, करे जागरण काम |
एक चेतना जानिए , जन जन में अविराम ||930
जब तक बोली बोल हैं , मीठे बोलो बोल |
करो सार्थक बोल को , बोली है अनमोल ||931
नुक्ता चीनी देखकर , बदल न देना चाह |
राह भली है आपकी , होना मत गुमराह ||932
गुणीं जनों के साथ में , बन जाते है काम |
मिल जाता है सीखना ,जीवन में अविराम ||933
कुछ ज्ञानी हिंदी जगत , बने हुए उस्ताद |
खतना हिन्दी की करें , बनकर के जल्लाद ||934
पथिक खड़ा है नाव में ,लिए हाथ पतवार |
यहाँ अकेले सब खड़े , करने भव को पार ||935
मुख को ऊपर कर लिया , दिया चांद पर थूक |
गिरता आनन लोटकर , जग हँसता तब मूक ||936
कभी समय भी पूँछता , कैसे आप जनाब |
खुद के डंडे पर नहीं , चलता कभी हिसाब ||937
कभी-कभी थूका हुआ , जो लेते है चाट |
हँसी पात्र जग में बने , चौपट करके ठाट ||938
जिस पर थूका जिस जगह , बही वहां सिरमौर |
उसका कुछ बिगड़ा नहीं , आज उसी का दौर ||939
अजवाइन में लोंग को , थोड़ा मिला कपूर |
बांधे तब. रूमाल में , सूँघे आप जरूर ||940
जो भी इसको सूँघता , अच्छा है आभास |
सर्दी उसकी भागती , कहते यहाँ सुभाष ||941
दवा हवा सब गोल है , असहज है सरकार |
पर दारू पर्याप्त है , भरा पड़ा भंडार ||942
कोरोना की मार से , पाया कष्ट अपार |
बहुत मिली सद्भावना , सम्बल साहस प्यार ||943
समाचार नित मिल रहे ,लगे बिछड़ने लोग |
देख रहा संसार में, प्रलय कर रहा रोग ||944
महावीर की जय कहें , सुखद जयंती आज |
हे प्रभु कष्ट मिटाइए , करें अमन का राज ||945
प्रलय काल क्या चल रहा , उठते यही विचार |
लाख यत्न के बाद भी , दिखता नहीं सुधार |946
बड़ा भयावह दौर है , छिपा आज इंसान |
गया अकेला मित्र भी , जलने को शमशान ||947
सरकारें भी क्या करें , ठोस नहीं उपचार |
लाती एक अनार तो , सौ मिलते बीमार ||948
उनके दिल से पूंछिए , जिनको आया रोग |
कितने बिचलित रह रहें , उसके घर के लोग ||949
सरकारों को कोसते , करते कई सबाल |
बिना मास्क के लोग भी , करते मिले वबाल ||950
जीवन को व्यापार पर , लगा दिया है मोल |
लघु व्यापारी क्या करे, सुनता कड़वे बोल ||951
कोरोना को मानते , जो भाई बीमार |
बचने बाले कह रहे, नौटंकी सरकार ||952
बड़ा भयावह दौर है , दुख का पारावार |
जलने को शमशान में , गया अकेला यार ||953
कोई नगदी में दिखे , कोई लगे उधार |
इस चलते संसार में , कोई बंटाधार ||954
अपना हित ही देखना , नहीं बुरी है बात |
पर ऐसा मत कीजिए ,चले किसी पर लात ||955
दीपक रखना नेह का ,सँग समरसता तेल |
बाती हो सद्भाव की ,अनुपम होता मेल ||956
दुखी आज है मानवता, माता सुन लो आप |
कोरोना से मुक्ति दो , क्षमा करो सब पाप ||957
पाप हुए यह मानता , संकट कर दो दूर |
माता तू भी देख ले , मानवता मज़बूर ||958
बड़ी आपदा देखता , कोरोना विकराल |
उथल-पुथल संसार में , माता करना ख्याल ||959
विनती करते आपसे, माता मिलकर भक्त |
कोरोना की जंग में , कर दो सभी सशक्त ||960
नवरातें अनुपम सजे , मैया के दरबार |
भक्त सभी पूजा करें ,आरत रहे उतार ||961
भक्ति भाव से पूजते , माता के नौ रुप |
जय माता जगदम्बिके,लगते सभी अनूप ||962
माता इसको मेटिए , चलता संकट काल |
कृपा आपकी चाहता ,विश्व आज बद्हाल ||963
माता तेरे नाम से , कट जाते है पाप |
मैहर वाली शारदे , मेटो सब संताप ||964
जो भी माँ को पूजता , सबको दें वरदान |
माता के दरवार में , पूरे हो अरमान ||965
माता रानी पूज के, कर्म करे सब नेक |
जीवन के संग्राम में , रखिए सदा विवेक ||966
हे माता सुखदायनी , कर देना उद्घार
भगत तेरे दर पर खड़ा , पूजा कर स्वीकार ||967
हर बेटी के भाल में , देखो माता रूप |
बेटी जिस घर में हँसे , बने रंक से भूप ||968
माता को सुमरित रहे, करे भगत गुणगान |
मैया से अब बिन कहे, होते कष्ट निदान ||)969
माता रानी आपकी, महिमा अपरम्पार |
भक्त खड़ा है सामने, नमन करो स्वीकार ||970
मात् शारदे अवतरण , बर्णन करते संत |
हम सब नतमस्तक करें , अर्पित पुष्प अनंत |971
आए है ऋतुराज अब , फूलें फलें पलाश |
शीत शयन करने लगी ,सुखद बसंत सुभाश ||972
पीली पगड़ी धारकर , शोभित हैं ऋतुराज |
स्वागत बंदन जग करे , हर्षित सकल समाज ||973
बिछड़ रहे है यार अब , मौसम लगे उदास |
तांडव करती मौत है , पल- पल बिछड़ें खास ||974
गिला नहीं मन में रखें , समय रहा है रूठ |
सावधान उपचार है , बात न समझें झूठ ||975
बुझते हर घर के दिए , नहीं कहीं उल्लास |
फिर भी साहस तेल से , मन. में करो प्रकास ||976
कोस रहे सरकार को , बोले जो कटु बोल |
उनसे कहना चाहता , खुद का देखे झोल ||)977
माँ
नव खतरे में पड़ा , तूफानों का साल |
प्रल़य काल सा दिख रहा , समय आज बिकराल ||978
बैठा पंछी सोचता , कहाँ गए. इंसान |
चहल-पहल कुछ भी नहीं , दिखता सब वीरान ||979
बैठ डाल पंछी कहे , लगता संकट दौर |
मुझकों भी अब खोजना , आज सुरक्षित ठौर.||980
नहीं रहेगी आपदा , रहें गेह में लोग |
समझ गया पंछी यहाँ , कैसे भागे रोग ||981
पंछी भी अब. सोचता , मन में आते ख्याल |
आज सामना है विकट , मानव खुद जंजाल ||982
विषय - श्राद्ध
श्राद्ध पक्ष में क्यों पितर , समझ यहाँ गूणार्थ |
जीव चराचर प्रिय सकल, सुन "सुभाष" भावार्थ ||983
श्राद्ध पक्ष बस जानिए , श्रद्धा का उल्लास |
पितर सभी के चाहते , बना रहे विश्वास || 984
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विषय - जगत
ऐसा कुछ कर जाइये , रखे जगत सब याद |
कर्म सभी बुनियाद हों , रहें साथ आबाद ||985
कर्म सदा ऐसे करो , उदाहरण हों आप |
और जगत में आपकी, बनी रहे कुछ छाप || 986
कर्म आपका देखकर ,करे जगत भी वाह |
और आप भी दीन की, हरते रहें कराह ||987
संत जगत को देखकर ,कहते है यह बात |
सदाचरण ही आजकल , बन सकता सौगात || 988
नहीं जगत को कोसना , हर युग में हैं दुष्ट |
जो समाज में खाज बन, फैलाते है कुष्ट || 989
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हाड़ तोड़ मेहनत करें , फिर करते विश्राम |
बिना कमाए. देखिए , इनको भी आराम ||990
जिंदा रखता देश को , सृजन जहां है पास |
लिखता है साहित्य तब, अमर सदा इतिहास ||991
वही श्रेष्ठ साहित्य है , जिसमें हो संदेश |
सदा प्रेम का रंग दिखे ,विश्व बंधु परिवेश ||992
बदल जमाना अब रहा , दिखते दृश्य विचित्र |
तरह - तरह अब छद्म के, उद्गम दिखें चरित्र ||993
ऐसी शिक्षा चाहिए , हो चरित्र निर्माण |
चर्चा भी आदर्श शुचि , जग का हो कल्याण ||994
मात- पिता सब चाहते , सुत के सुंदर चित्र |
जीवन में उत्थान कर , अच्छा रखें चरित्र ||995
मिले मान-सम्मान सब , उजला जहाँ चरित्र |
वहाँ आचरण हर कदम , मिलता हमें पवित्र ||996
देखा है संसार में , मानव बड़ा विचित्र |
दो पैसे के लोभ में , बेचें धवल चरित्र ||997
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शब्द सनातन चुभ रहा , सुनकर करते क्रोध |
उन पर होना चाहिए , कुछ तो यारो शोध || 🙏998
तनातनी हम देखते , सनातनी पर ध्यान |
कहासुनी भी सब करें , घिनापुरी सा गान ||999
पुरखे जहाँ सनातनी , माने अपना धर्म |
ओलादों को शर्म क्यों , समझ न आता मर्म || 🙏1000
सनातनी चर्या रहे , घर मंदिर परिवार |
राजनीति से दूर हो , पर इसका आधार ||1001
©®सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
9584710660
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