https://subhashsinghai.blogspot.com/दोहा दीप ( बुक चित्र पर क्लिक करें )

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                          जय‌ माँ शारदे 
माता   मेरी    शारदे ,  देती   सदा   प्रकाश |
पंच लिखूँ दोहावली , सेवक  यहाँ  'सुभाष' ||

लिखी "बराई" "बाँसुरी"  , "कुंड"  "दीप"  हैं  नाम |
दोहावली "सुभाष" से   , माँ   को  किया  प्रणाम  ||

हैं  माता  आशीष   से,     दोहे   पाँच    हजार ||
पाँच  खंड  जिसके बने ,    मानूँ   माँ  उपकार |

मेरी माता  शारदे  , करता इस   पर गर्व |
             रहें शरण में  हर्ष से , सभी  दिवस है पर्व |`


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कितना लिखा ,यह समय की गति ने ज्ञात ही नहीं होने दिया , सभी छंदों पर लिखा , पर सब बिखराव सा डायरियों में या पन्नों में बँधा रहा , वणिक पुत्र हूँ , सो द्रव्य की और ध्यान रहा , पर माँ शारदे का शुभाशीष भी अटूट पाया , संकलन की और ध्यान गया कि दोहे ही करीब  - पांच हजार  होगें , व अन्य छंद अलग से है , तब दोहा छंद संकलन अभी तीन भागों में है , दोहा दीप (एक हजार दोहे ) दोहा कुंड (एक हजार दोहे ) , बुंदेली बराई (एक हजार बुंदेली दोहे) शेष दोहे भी एक और बुक में समेटने  का प्रयास कर रहे है 
इसी तरह कई बुकों में अपना साहित्य विषय बार तैयार किया  है , कई छंद ई विशेषांक प्रकाशित किए है 
यह सब माँ शारदे की अनुकम्पा है |
मेरे साहित्यक मित्र आदरणीय सुरेन्द्र कौशिक जी गाजियाबाद ने सदैव मुझे स्नेह  दिया , मार्गदर्शन भी किया  , मैं आभार लिखकर उनके स्नेह और सानिध्य का मूल्य नहीं देना चाहता हूँ , उनके स्नेह और सहयोग का सदा ऋणि रहना चाहता हूँ , आ० कौशिक जी के साथ हमने  कई छंदों की ई पत्रिका का सम्पादन व प्रकाशन किया है ,यह हमारे सभी साहित्यक मित्र जानते है 
सादर 
सुभाष सिंघई 
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लेखक का परिचय

नाम - सुभाष सिंघई 
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955 
जन्म स्थान - जतारा , 
पिता का नाम - स्व० श्री कपूर चंद्र सिंघई 
माता का नाम - श्रीमति शीला देवी सिंघई 
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र  )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई 
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल (सागर )
       2 - शिल्पी सूर्या  - नितिन जैन ( खजुराहो ) 
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई 

लेखन की विधा - 
1 - दोहा , कुंडलिया , चौकड़िया , पदकाव्य  , इत्यादि सभी सनातनी मात्रिक छंद 
चार  हजार के करीब हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के  करीब कुंडलिया  , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है 

2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है 

 वर्तमान में सनातनी मात्रिक छंद पर लेखन कर रहे है 

3- ब्लाग डाँट काम पर प्रकाशित  कृतिया - 
1- दोहा दीप (एक हजार दोहे )
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे ) दोहा सुभाष ( एक हजार 
3- बुंदेली बराई ( एक हजार ) बुंदेली बराई(एक हजार)
4- मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य 
5- कलम से उद्गम ( विभिन्न सनातनी मात्रिक छंद  ) 
6 -कुंडलिया कुंड 
7 - गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
8- हिंदी छंद माला
9- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी 
10- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन , 
11- गर्भ से गमन तक (खंड काव्य )
12  गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है 
13 -ट्वीटर -  व ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें है व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है 
वर्तमान में सम्पादन - 
1- छंद महल (मासिक हिंदी ई पत्रिका ) जिसके  25 विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके है 
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक  हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है 

यूट्यूब - सृजन चैनल का‌‌ संचालन

कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है

©®  सुभाष सिंघई 
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660 
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नहीं वचन कटु बोलिए, जब हों कुछ मतभेद |
ऐसी  राह   बनाइए , प्रकट  कर   सकें खेद ||1

वाणी   कटुता   से  भरी  , मन  होता   बेचैन |
मिलने  पर    शर्मिंदगी , नीचें   झुकते    नैन ||2

हठधर्मी  जो भी बने   , तोड़े  कुचले   फूल |
हम उसके इस कृत्य को , कह सकते है भूल ||3

सृजन  गंग में आप सब  , करें  खूब  स्नान |
पर विधान के भी नियम,  मत तोड़े  श्रीमान ||4

मुखपोथी पर मानिए , सब  है सबके  मित्र |
पर चोरी भी  पाप है ,अपना कहकर चित्र  ||5

सभी गुणी जन जब मिलें , करते   है सम्मान |
अपनी-अपनी  चाह से , करते सब है   गान || 6

स्वागत भी  सबका करें , स्वीकारो   सत्कार |
गुट बंदी  मत कीजिए , जहाँ  सत्य.   दरबार  ||7

काम सदा  ऐसे करो ,  होवें  सभी   निहाल |
दुश्मन भी जब कह उठे , सच में हुआ कमाल ||8

अभिनन्दन सबका करो   ,जहाँ सृजन के मंच |
अच्छा लिखकर आप भी, बन जाना  सौ टंच ||9

सुखद सलोने आप हों , सदा रहें  इक्कीस |
मंगलमय जीवन रहे  , विनय‌ सुने जगदीश ||10

नई‌ किरण विश्वास से, प्रभु है विनती‌ आज |
नया सबेरा शुभ रहे  , रखना  सबकी लाज ||11

कभी नहीं हो  सामना , हो जाएँ  मद चूर |
मद से मिटते है  सदा  , अच्छे‌-अच्छे  नूर |12

 जो भी‌ बोते  है‌ं  सदा , जगह -जगह  पर  शूल  |                     ह  क्यो  हैं  यह  सोचते , हमे   मिलेगें  फूल ||13

जिन लोगों ने बाँट दी , सभी  जगह  पर  खार |                   आज उन्हीं को‌ मिल रही , हर अवसर पर हार ||14 

सबसे मीठा बोलिए , बड़े विनय के साथ |                          अभिनंदन भी हो सदा  , जोड़े दोनों हाथ ||15

 विनय सहित आभार हो , करें सभी स्वीकार |                     इसी तरह का बाँटिए , आप सभी का प्यार ||16

भारत  के संदेश पर , विश्व आज  दे  ध्यान |                        योग सनातन से सदा , करता  रोग  निदान ||17

भारत  के  संदेश को  , करे  विश्व  स्वीकार  |                     योग  सनातन से  सदा , करता‌‌  है  उपचार ||18

   अपने पुल तारीफ के ,खूब  बाँधते  ढीट |                           गाल  फुलाकर नाचते, दोनों  हाथों पीट ||19

गाल  फुलाकर नाचना  , और  पेट को  पीट |
बांधे पुल तारीफ निज , समझों उसको ढीट ||20

मूरख उसको जानिए, निज की छोड़ दुकान |
उधर  करें  आवारगी , इधर  सड़े    सामान ||21

करते  खुद नुकसान हैं , जो  होते  मति  मूड़‌ |
ज्यों  गयंद  पाषाण  से , घायल  करता  सूड़ ||22

चापलूस  के  जाल  में , फँसते  हैं  जो लोग |
जाल  काटना है  कठिन  , रहता सदा कुयोग ||23

हंसों  की  टोली  जहाँ , करना  नहीं  शिकार |
वहाँ   एक  से  एक हो , तब  करना  सत्कार  ||24

कुछ कपटी है घूमते  , खूब जताकर प्यार |
हंसों  की  टोली  लखें  ,करते वहाँ  शिकार  ||25

सदा शिकारी प्यार  से , दाना  दे  पुचकार |
पंछी  फँसकर जाल में, होते  रहें  शिकार ||26

मधुर वचन सँग नम्रता , हिय के भाव पवित्र |
ईश्वर  उनके‌  साथ  में , बनकर  रहता  मित्र ||27

माँगे से  मिलता  नहीं , खोजे   से   सम्मान |
मिलता उसको धर्म से, जिनका कर्म प्रधान ||28

कलयुग  में  भी  देखिए , रहते  हैं  भगवान | 
कहें न्याय की बात जो, उनमें प्रभु को जान ||29

बेईमानी कब  छिपे  , खुलती  उसकी  पोल |
चौराहे   पर   फूटता , उसका  बजता  ढोल ||30

अंधा  जो  बनता  रहें , पाकर  तेज  प्रकाश |
पैर  कुल्हाड़ी  मारकर ,  करता   सत्यानाश ||31

फूली रोटी से अधिक , बेटी  की मुस्कान |
चूल्हे से प्रारम्भ है, उसका सकल जहान  ||32

बेटी को चूल्हा  लगे  ,‌यह  है  एक सिलेट  | 
रोटी सब्जी दाल के , अक्षर  करना  भेट ||33

शीत ऋतु बरसात भी ,रूप बदलती  धूप |
शीतल रहती चाँदनी , कभी न बदले रूप ||3४

बेतमीज को  देखकर , मुझें न आए खीज |
उसको ही मैं देखकर, सीखूँ  सदा  तमीज ||35

दोष लगाना पाप है , फुसलाना  कटु  पाप |
इन सब पापों का सुनें, धोखा सबका बाप ||36

भरें  ह्रदय  में  गंदगी, घूमें   जो  श्रीमान |
उनका कैसे चाहकर ,भला करे भगवान ||37

धोल जमाकर प्यार से , फेरे  हाथ  सुनार |
स्वर्ण समझकर बात को ,ले लेता आकार ||38

लोहा  जलता आग  में ,पिटता हाथ कठोर |
अक्कल  आती  देर  से ,रोकर करता शोर ||39

मूरख से यदि  सामना , हो जाना‌ चुपचाप |
मूरख तो मूरख  रहे , क्या  पा  लेगें  आप ||? 40

मूरख को मत दीजिए ,अपना कुछ भी ज्ञान |
अग्नि के गुण जानिए  ,जला   देत  सामान ||41

विनय आपकी देखकर ,जो समझे कमजोर |
जब  भी  उससे सामना , मत देखें उस ओर ||42

चापलूस मत पालिए, और कपट का साथ |
दोनों  कभी  न चूकते , अजमा‌  लेते  हाथ ||43

कुंठित की आदत दिखे, अपनी जोड़ जमात |
भौंके   सब  पर  जोर से, देख  दूसरी  जात ||44

वेश्या  पैसा  देखकर , करती   सबसे   राग |
सोच समझकर जाइए, जहर  उगलता नाग ||45

नहीं  बेशर्म  जानता ,  क्या   होता  सम्मान |
पड़े  पादुका शीष  पर , हँसता   है  नादान ||46

मतलब के संसार में , मतलब  के  है  लोग |
रोना- धोना  किसलिए , स्थाई   यह    रोग ||47

पत्थर को हीरा समझ  , दे   बैठो   सम्मान |
वहीं उछलकर दे सदा,सबको चोट निशान ||48

पत्थर हीरा कब   बने, रहता  सदा  कठोर |
सिर को देता चोट है , यदि  झुकें उस ओर ||49

जलन  न  इतनी पालिए , देख  दूसरे  गेह |
कालिख. घर में  आनकर, काला कर दे नेह ||50

जल भुनकर मत खीजिए , देख दूसरे गेह |
जरा आप भी पोतिए , अपने  घर  में  नेह ||51

अपने मुख अपना करें , ढोल पीटकर गान |
उनका बिखरे एक दिन, सड़कों पर सामान ||52

जिसने मारी लात हो , कहकर मीठी  बात |
पक्का  उसको  मानिए, देगा  गहरी   घात ||53

एक बार की भूल को , कर  देते  सब माफ |
बार-बार जो भी करे , हो  जाते  वह  साफ ||54

कपट नहीं जिसके हृदय,उसका पक्का रंग |
परहित की उठती वहाँ , मन  में सदा  उमंग ||55

दामन यदि बेदाग है , रहता  तब. उल्लास |
आदर  देने  आपको , सज्जन आते  पास ||56

जैसी  जिसकी  सोच  है ,वैसा उसका ढंग |
श्वान सदा ही  भौंकता , शेर  जीतता  जंग ||57

गूंगों  को  बहरे  चुनें ,करने  को  कुछ  गान |
लँगडे़    अंधे     दौड़ने ,   उतरे तब मैदान ||58

अंधी  गूँगीं बन  गई,  असली आज  जुबान |
कागा  साफा  बांधकर , बनता  आज महान ||59

नोट लुटाकर जीतना , अब  चुनाव में   शान |
हिस्ट्रीशीटर  बन. गए ,  कुर्सी   पर   श्रीमान |60

राजनीति  करना  नहीं , अभी दुखी  है  देश |
सबक सिखाना शत्रु  को ,कोई हो  परिवेश ||61

पहले  भारत  देश  में ,  निपटाओ  गद्दार |
नेता हो या मजहबी , इनका  करो  सुधार ||62

पाक परस्ती बात हो  , उनकी   गाएँ   तान |
उनकी  जाकर कीजिए , पहले बंद जुवान ||63


मात्  शारदे  अवतरण  ,  वर्णन  करते   संत |
हम सब नतमस्तक  करें , अर्पित पुष्प अनंत |64

आए है  ऋतुराज अब ,  फूलें  फलें  पलाश |
शीत शयन करने लगी ,सुखद बसंत सुभाष ||65
               
पीली पगड़ी धारकर  , शोभित  हैं   ऋतुराज |
स्वागत वंदन जग करे , हर्षित सकल समाज ||66

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मित्र सदा मिलता रहे , बात  करे  दो  चार  |
मिलते-मिलते मित्र भी, लगता घर परिवार ||  67     

आलोचक  से  सामना , मित्र  करे  तकरार |
भले न तुमसे मिल सके, समझो सच्चा यार ||  68

जहाँ  बुराई  आपकी ,  मित्र   सुने  चुपचाप |
संशय उस पर कीजिए ,गलत  नहीं हैं आप ||  69

धन वैभव का ढ़ेर हो  , पास  नही   संतोष |
हाय-हाय तब हो वहाँ  , रहें   उपजते  दोष ||70

  विश्व  सदा ही  मानिए  , अपना घर परिवार |                 कह सकता साहित्य ही , कभी न पालें खार  ||71

मित्र  अगर  संकट  सुने , आए  तेरे  काम |
भाई सम जानो उसे,  लेकर हरि  का नाम || 72    

नेक   आपके   पास है ,  कोई एक विचार |
किसी  मित्र से  बदलिए,  होगें   दो  तैयार ||73

सदा मित्र का साथ हो, संकट  के  दौरान ||
कट जाते हैं  कष्ट तब , रहती  है  मुस्कान  ||74
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सुंदर हो अब स्वर्ग से,  सदा  हमारा  देश |
नजर नहीं इसको लगे,  स्वच्छ रहे  परिवेश ||75

वचन  सदा  ही पालिए  , कर्तव्यों   में जोश |
भाव सदा निर्मल रखो,  कभी न खोना होश ||76

गज जैसी ताकत रखो   , भोजन  शाकाहार |
स्वस्थ रहो इस  देश में ,  बहा   प्रेम  की धार ||77

करता  रहता विश्व में , भारत  नित उत्थान |
नवल चेतना दर्श से,जन गण मन का गान ||78
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देखा   है  संसार  में ,   सब  ढोते  हैं  भार |
कठपुतली  सा  नाचते, बदल-बदल शृंगार ||79

कोई  नगदी  में  दिखे , कोई  लगे  उधार |
इस  चलते  संसार  में  , कोई    बंटाधार ||80
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जिनकी जय हम  बोलते , वें   नेता  श्रीमान |
दंगा   फैला  वह  बने , अब   पूरे     शैतान ||81

सीमा   पर  हम  देखते  , रहता   सजग  जवान |
इधर   खेत में   जुटा   रहे ,  मेरा  सदा   किसान ||82

खुल   जाते   गणतंत्र  पर , कुछ पाकी भी  बोल |
जहर उगलते है सदा , जिसकी   करो   न  तोल ||83

पर संयम से काम लो   शुभ  दिन  की रख आन |
बदनामी  से   दूर     रह   , आगे    रहें  जवान ||84
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सप्त  जलधि  भी नीर हो , तीन.  लोक  बरसात |
प्रीतम बिन बुझती नहीं , बिरहिन  की अब प्यास ||85

रहती    सोतन   डाह  बन,   गोरी  के  मन  गेह |
साजन.  सजनी   प्यार का ,  चोरी   करती  नेह ||86


वर्ग   भेद  माली  रखे, जानों  गलत  प्रधान |
और दूसरे क्या कहें  , समझ  न आए ज्ञान ||87

फूलों  को  फटकारता , माली  बना प्रधान |
गलत रंग के चिन्ह का, फूलों को दे   ज्ञान ||88

जहरीला  भी   डालता ,  खेतों  में  जो‌ खाद |
फसल न उसको मिल सके , हो जाता वरबाद ||89

जहाँ  साधना  पेड़‌ में , लगती   तप  की डाल |
वहाँ   फूल भी ज्ञान   के , खिलते है तत्काल ||91

बिना तथ्य का कथ्य हो , उसे मिले कब मान  |
जितना   चाहे   गाइये , करे असर मत गान ||92

अपवादों के  फूल  जो , करते   हैं  गुलजार |
हँसी  बाग की  हो सदा , नहीं   गुनें  सरदार ||93

कोमल होते  पेड़    में , शुरूवात  के  फूल  |
उनको जाकर तोड़ना ,  यह तो भारी  भूल  ||94

कलम हाथ में  लीजिए , समझों भाई बात | 
लिख डालो ऐसा सदा , खुश हो सभी जमात ||95

करते   कुछ  अपवाद है  , करते  खेल बिगाड़ ||
सर्वमान्य कुछ त्यागकर,   अलग जलाते भाड़ ||96

कहता है  जो कटु बचन , मत रखना  विश्वास |
बन सकता है वह नहीं , कभी आपका  खास ||97

लेखन के   पंडा   बने,   बाँट   रहे   हैं  ज्ञान |
खुद के लेखन पर नहीं,  उनका रहता ध्यान ||98

मुख पोथी पंडा   बने , अधकचरा   है    ज्ञान |
घंटी  दर-दर  बजा  रहे, नहीं    मिले  सम्मान   |99

पंडा   बनकर  घूमते ,  टोकलाल   जी   आज |
अधकचरा खुद ज्ञान है, फिर भी उन्हें न लाज ||100

ज्ञानचंद   के   साथ   में  , रायचंद   है   साथ |
टोकलाल  अँगुली  करें , सभी जगह दें  हाथ ||101

अंधे‌  ने   बहरे  चुने  , लगड़ों   की‌   ले  फौज | 
कहता  लड़िए  युद्ध  में , आपस में  कर मौज ||102

टर्र-टर्र   मेंढ़क.  करें , सिंघा   देत   दहाड़‌ |
कोई    कूँदे  कूप में , कोई   चढ़े    पहाड़ ||103

कुंठित रहते जो सदा, जग में जो भी‌‌ लोग |
मिले  साफ परिवेश  में , वह फैलाते  रोग ||104

मिट जाती है झोपड़ी ,यदि महल हो पास |
महलों के अंदाज में  , नहीं झोपड़ी खास ||105

सदा  जाति  से  दूर  है  , सुंदर  नेक  विचार |
जहाँ  सत्य  का  आचरण,  रहें  वहाँ  शृंगार ||106

जिसका खोटा आचरण , खोटी  करता  बात | 
अपना हित  ही साधता ,  करता  रहता  घात ||107

पढ़ लिखकर जो कर चुके,  कुर्सी पर अधिकार |
वह  भी  तो  नहीं  चाहते,  और  बनें   हकदार ||108

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बीमा  होते  यूँ  लगा, जैसे  हुआँ  हलाल |
मर  जाएगें  तब कभी ,  होगें मालामाल ||🤑109

बीमा  बाले  पत्नियां ,   समझाते  भरपूर |
मुक्ति धाम पति जी गए, नहीं खजाना दूर ||😉110

सन्नाटा   घर  में  रहे,  किस्त  लगे  बेकार |
मरना काफी  दूर  है,  चढ़ता  नहीं  बुखार ||🙂111

बीमा से  विनती करें ,  बस  छोटी  है  बात |
कहे अधमरा जग जिसे, देना कुछ सौगात ||😍112

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कोई  कैसे  आएगा  , देने    तुमको   मान |
दरवाजे  से  भौकता , जो   बैठा   दरवान ||113

पत्ता तक खड़के नहीं , कहते  हवा  प्रचंड |
यही  हाल  इंसान का , जिसको  रहे घमंड ||114

दूजों का चूका नहीं , करने  जो अपमान |
सम्मानों की चाह भी , वह  रखता इंसान ||115

दुनिया में जो भी रखें , अपने मन में  रार |
दूजों का बिगड़े नहीं ,खुद ही खाता खार‌||116

जिसको समझा भूप था , उसका लख अब रूप |
सागर   क्यों  मज़बूर   है , बनने  को  अब  कूप ||117

सीमा  से आगें बढ़ें,  कट   जाते   नाखून |
उनका भी यह हाल है , जो  तोड़े  कानून ||118

मनसा  वाचा  कर्मणा , जिसके‌‌  हैं  निर्दोष |
राहगीर  हैं  सत्य  के , सदाचार   के  कोष ||119

जल-भुन कर जो  रखें  , कुढ़ते-चिढ़ते  नैन |
दुख  का  डेरा  है   वहाँ  , मन  रहता‌  बेचैन ||120

तीसमार खाँ खुद बने , सँग  झांसी की तोप |
होकर  ढीले  पेंच  वह ,  होते  स्वयं  विलोप ||121

दिन  में  फाँके बात दस , रात फाँकते बीस |
लोग भागते  देखकर  , जो  रखते‌  है  टीस ||122

उलटा-पुल्टा  बोलते, जल-भुनकर जो लोग |
स्वयं  पालते वह सदा  , पागलपन  का  रोग ||123

जहाँ नहीं  कुछ  रस रहे ,गायब वहाँ  मिठास |
मक्खी  तक  बैठे  नहीं , वह दर दिखे  उदास ||124

रानी  देवी   जीभ  का ,अद्भुभुत  देखा राग ||
बिखराती हैं फूल यह , कभी  लगाती  आग ||125

गठबंधन की आड़ में , ठगबंधन की बात |
ठगियां ठगने घूमते ,  लेकर  मीठा  भात ||126

चुनकर वह नेता बने  चुनना उनका काम |
जैसे को तैसा  करें ,   नेता  जी  अविराम ||127

कुर्सी गठबंधन दिखे , मिलते  नही   उसूल |
राजनीति चौसर बिछी ,  चालें चलें फिजूल ||128

मूर्ख बनाने को चले, नहीं रही अब लाज‌ |
सांझा--संग्रह  नाम  पर , लूटें   धंधेबाज ||129

सोए अब तक लोग जो  , प्रहर बीतते  चार |
उन्हें  जगाने  मैं गया , तब  जागे   सरकार ||130

स्वार्थी परहित कब करे, कृपड़ करे कब  दान |
मेहनत‌  करे न आलसी  , पर  चाहें  सब  मान ||131

स्वार्थी मतलब जानता , कृपण पकड़ता दाम |
मेहनत बाला चुप रहें ,  चुगलखोर  का  नाम ||132

चुगलखोर  को  जानिए ,‌ यह‌ तब  हों  संतुष्ट |
मित्र  कष्ट  दे‌  मित्र को , और  रहें  सब‌  रुष्ट |133

जिनकें  कच्चे  कान  हों, आँखे‌‌  लेते  फोड़ |
बकरी‌  की वह टांग को , घोड़े  से  लें जोड़ ||13४

अपना काम निकालकर , देते दर से फेंक |
देखा उनको एक दिन , साथी मिले न नेक ||135

फेंक  दिए वाचाल बन, पत्थर  काफी  दूर |
मूल्य न उनका ज्ञात था ,अनुपम थे जो नूर ||136

फेंके थे जो  खेत पर , कभी छांटकर आम | 
उगकर छाया  दे  रहे, और  फलों  से  दाम ||137

नेता‌‌‌ जी घर में रखें   , पूरा  बना‌  हिसाब |
वोट डालने जा रहे , किसको कौन जनाब ||138

रटने  से  मिलता  नहीं , भजने  से  हों  काम |
तोता ज्ञानी कब बना ?, रटत- रटत हरि नाम ||139

करके एक अनीति जब, रावण  जग  बदनाम |
करते   जो   ताजिंदगी ,  उसकी   जाने   राम ||140

ज़ख्म  कुरेदे  जग  सदा , देकर चोट  निशान |
आरोपों  को   थोपता ,  करता    है  अपमान ||141

छाया के सँग फल  मिलें , और  मिलेगें  दाम |
पर  पत्थर  मत मारिए , जब  हों कच्चे आम ||142

निपटाने   हालात  को , चले   गये   श्रीमान  |
हाथ  जलाकर  आ गए , कड़वा   पाया  पान ||143

मिलते   रहते  हैं  यहाँ , मतलब  के सब  यार |
फैलाकर भी  देख  लो  , मिले  हाथ  में  खार ||144

माना   इस   संसार   में , तरह-तरह   के‌‌  रोग | 
सबके   अपने   रोग  है , दाँव  पेंच   के   योग ||145

ज्ञानी  अब  सब  लोग  है,   नहीं  रहे   नादान   |
नहीं   मुफ़्त  में  बाँटना , अपना   ज्ञान  बखान  ||146

माल    बाँटिए   मुफ़्त  में , कमी  निकालें  खोज | 
कचरा   जाओ    बेचनें , बिक   जाता   है  ओज ||147

नहींं धवलता गान से ,उजला होगा वस्त्र |
क्या कचरे के  ढ़ेर पर, काम करेगा इत्र ||?148

नहींं धवलता गान से ,उजला होता वस्त्र |
जहाँ ढ़ेर कचरा लगा ,क्या कर लेगा इत्र ||149

अपना गाकर गान जो, रहे पीठ खुद ठोक |
राजा  खुद को  मानते , कोन  करेगा रोक ||150

अपना गाकर गान जो  ठोकें खुद की‌ पीठ |
ऐसों  को  ज्ञानी  कहें ,समझों‌ इनको  ढ़ीट ||151

जीवन की जो खोलकर,रखते खुली किताब |
उनका भी  ईश्वर सदा, करता  सही  हिसाब ||152

ऊपर‌  से  कुछ  और  है ,अंदर  से‌  कुछ  और‌ |
क्या कर जाए पीठ पर   ,रहे न  कुछ  भी  ठौर ||153

पहिन खाल जो‌ भी चलें  , बनने‌  को  जब  शेर |
शेर‌   मिलें   जब‌   सामने ,  हो   जाते‌   है   ढ़ेर ||154

नहीं  शेर  उसको कहें , पा  जाए  जो खाल |
शेर स्वयं पहचान दे , चलकर ‌ अपनी  चाल ||155

अपना हित ही देखना  , नहीं  बुरी   है बात |
पर ऐसा मत कीजिए ,चले किसी पर लात ||156

जल भुन कोई राख है-कोई जलकर खाक |
कह सुभाष ऐसे जलो -जग में होय प्रकाश |157

अहम् बहम् पालें नहीं ,भटक जाएगें आप |
बारिश पानी -रुके नही ,  बहता छोड़े छाप ||158

सतरंगी है आसमां , फिर भी  दिखता नील |
यही मनुज का मन लगे, सब रस करता फील ||159

आज देश में कर रहें , नेता  खूब  सबाल |
सेना दुश्मन मारती ,इनकी जलती खाल ||160

नही बिपक्ष की भा रही , जन जन को यह बात  |
सेना   दुश्मन     मारकर ,    इनके   झेले  घात   ||161

सेना इनको बांधकर  , जाओं  सीमा पार |
कर दो दुश्मन सामने  ,इनका हो उद्धार ||162

खाते हिंदुस्तान का ,  गाते    पाकिस्तान |
तब सुभाष बैचेन है , लिखता भारत गान ||  163

अंतराल   लम्बा   रहा , मोदी   है  दमदार |
सीना छप्पन इंच का ,किया पाक पर वार ||164

रहे खौप में पाक अब , निराश हुआँ इमरान |
पर देखा   कुछ दोगले ,देते   उसको   मान ||165

सहन नही अब हो रहा ,वीरो का अपमान |
स्ट्राइक में  शव गिने  ,  देखों       बेईमान ||166

कागा  कपटी  बोलता , हम  वंशज‌  है  मोर |
करे  नाच के  नाम पर , काँव-काँव का शोर ||167

माली   होना    चाहिए  ,  रखे  सभी‌‌  से  नेह |
भांति-भांति के पुष्प से, उपवन निज-सा गेह ||168

मुख में  भरकर  गालियाँ, जो  थूके  आकाश |
खुद के मुख पर लोटता , इज्जत  करता नाश ||169

अंहकार से लें  जला  , अपना घर जो  मूढ़ | 
नकटा उनको  बोलते ,  लिए‌ कटी जो  सूढ़‌ ||170

अंहकार से जब जला , जले स्वयं खुद  लोग  | 
मैं मैं  ही   चिल्ला लगा ,   बड़ा भंयकर   रोग ||171

जो सबके आदर्श थे , उन्हें देखता आज |
बिना बात की बात से,  रहते‌  है  नाराज ||172

छल भी छलके जब कभी , खूब करे आबाज |
जब भी हंडी  फूटती,  खुले  सड़क  पर  राज ||173

बड़े बोल जो भी कहें , चुप हो जाना  आप |
समय एक दिन बैठकर ,लेगा उसका नाप ||174

इधर -उधर जो  घूमते, अपनी छोड़ दुकान |
हम भी रहकर क्या करें, सोच उठे सामान ||175

जिससे खाकर  गालियाँ ,आप रहे  हो  दूर |
फिर से उसका साथ हो , मत होना मज़बूर ||176

चोट अगर तुमको लगे, होना  नहीं निराश |
वही चोट भी सीख दे, चलिए देख प्रकाश ||177

दानी‌  उसे न मानिए , वह  होता  नादान |
देकर थोड़ा दान वह , करता हो अपमान ||178

कभी-कभी हर बात का , होता  नहीं जवाब |
समय एक दिन कह उठें,यह है सही हिसाब‌ ||179

जितनी  होती  पोल है , उतना बजता ढोल |
कह सुभाष ‌संसार में , यही  गणित भूगोल ||180

दुनियां में खुद आप है  , सबसे बड़े अमीर |
यदि आपके पास हो , अपना निजी ज़मीर ||181

धन दौलत  का ढ़ेर हो, सँग. में  बड़ा शरीर |
उसे अमीर  न जानिए, जब तक नहीं ज़मीर ||182

धन दौलत को देखकर , सँग में बड़ा शरीर |
कैसे कहें अमीर हम , जिसका नहीं ज़मीर ||183

कहें  सिंघई  संसार  में , देखी‌  बात  विचित्र |
चोरी   करने   घूमते,  लोग    लगाकर   इत्र ||184

लोकतंत्र   में  देखता ,  लगती  बात  विचित्र |
जनता  खुद  ठगती  रहे ,  सूंघ-सूंघकर  इत्र ||185

सुन   सुभाष ‌ संसार में,  कुछ  है  बड़े अनूप |
काजल की भी कालिमा, कहते  उजली धूप‌ ||186

नहीं  भावना   शुद्ध  है , अधकचरा  है  ज्ञान |
स्वयं  ढ़ोल  हैं   पीटते ,   हम  है  बड़े  महान ||187

जगह-जगह पर देवता , अपना-अपना रूप |
कोई   रहता‌   छांव   में ,   कोई   रहता  धूप ||188

अब सुभाष यह सोचता ,यह‌ कैसा भूगोल |
बहता पानी‌‌ मुफ्त का, पर  बोतल में मोल ||189

रखकर  कच्चे  कान  जो , झूठे  माने  नैन |
संतुष्ट नहीं  वह हो‌ सके , रहते  हैं    बेचैन ||190

रखते   कच्चे  कान  जो , रहते   है  बेचैन |
देखें  सच  को  सामने, फिर भी झूठे  नैन ||191

पटल अधिक साहित्य के , पाठक है  लिमिटेड |
कुछ कवि चीनी  मेड से,  कुछ सच में अपग्रेड ||192🙏

नहीं हजम उनको कभी, कितना दो  सम्मान |
अपमानित  होने‌  खड़े , बनकर  वह  दरबान  ||193

कुछ‌ लोगों को देखता ,  रोटी हजम न चार |
चुगली  चूरन  बांटकर , खुश  रहते सरकार ||194

चौपट  खेती  कर  रहे , मेरे  ही  कुछ  यार |
पकी  फसल  पर फेंकते  ,  पानी   बारम्वार  ||195

उनको हम अब क्या कहें, जो हैं  बड़े  अनूप |
काजल की लख कालिमा,कहते उजली धूप‌ ||196

कहीं  नहीं  है  शुद्धता, अधकचरा  है  ज्ञान |
स्वयं  ढ़िढौरा  पीटते ,   हम  है  बड़े  महान ||197

पटल- पटल पर देवता , अपना-अपना रूप |
कोई  रहता‌  खान में ,   कोई  मेढ़क   कूप ||🙏198

कीमत उसकी खुद बढ़े ,जिसमें गुण हों चार |
परहित-करुणा भावना, विनय-सत्य आधार ||199

दया धर्म जिसके ह्रदय, आकर करे निवास |
ईश्वर का प्रतिरूप है, रखना  उसको  पास ||200

बोली हम क्या बोलते ,जिसको नहीं ख्याल |
नहीं मान वह पा सकें, रखकर ह्रदय मलाल ||201

अमृत मिलता देव को , मद्य दैत्य रस पान |
महादेव को विष  मिले, रहने को  श्मशान ||202

अपने को  ज्ञानी कहें , दूजों  को  नादान |
उनका‌‌ देखा एक दिन , रोता‌ है अभिमान ||203

बोकर बीज किसान ने , पल में लिया‌ उखाड़ | 
कहता  फल लटके नहीं, करने  खड़ा पहाड़ ||204

एक  रात  में  फल  लगें , उत्तम  लगा विचार |
माली  बदले  देखकर , फिर  भी‌  नहीं सुधार‌ ||205

एक  रात  में  फल  लगें , डालूँ   दूना   खाद |
जो  माली  यह  सोचता,  समय  करे  बर्वाद ||206

जीवन बगिया आपकी,  फूल एक-से  एक |
खुश्बू   सबको  दे  सके, चुनिए  उनमें  नेक ||207

निकट   रहें  या  दूर हों ,  पर‌   रहता  अहसास |
कह सुभाष जिसके हृदय, रहती मधुर  मिठास ||208

गुस्ताख़ी  को  देखकर , मत   बनना   गुस्ताख़ |
वह‌ तो  गंदा  हो  रहा ,   पर  तुम  रहना‌  साफ ||209

गुस्ताख़ों  को देखकर , बनें  नहीं  गुस्ताख़ |
दुर्जन तो  गंदे दिखें ,  सज्जन  रहते  साफ |210

पढ़ा लिखे से क्या हुआ , कुंठित हृदय विचार |
बैठा  कुर्सी  भांजता  ,     बेमतलब    तलवार‌ |211

कालिख दामन पर दिखे ,कहते खुद को  साफ | 
दाग कभी  छिपते   नहीं ,हमको   करना  माफ ||212

भीगीं  चूनर  प्रेम  से , रंग  रहे  निष्काम |
सतरंगी गोरी हुई , सुनकर पिय का‌ नाम ||213

तन पर लगा गुलाल भी , करता दूर  मलाल |
होली  की   तासीर  से  ,  होते‌   नष्ट  वबाल ||214

ईद    दशहरा   देखिए  ,  होली    हिंदुस्तान |
रखे गिला मन में नहीं , झालर शंख अजान ||215

ईद  दशहरा  होलियाँ , रखतीं  नहीं  मलाल |
इनकी  ही रहमत सुनो  ,  होते‌  नष्ट  वबाल ||216

ईद  दशहरा   संग  में ,  होली   की   तासीर |
प्रेम  और  सद्भाव   ही ,  इनकी‌  है  जागीर ||217

होली पर  गोरी  दिखी , जलती  उसकी  देह |
सजन  नहीं  परदेश  से , लोटे   करने    नेह ||218

गोरी खिड़की तट खड़ी , करती मन में ख्याल |
सजन न आएं जब तलक ,रँग‌ से मुझे मलाल ||219

भीगें  चूनर  प्रेम  से , रंगों  का   क्या   काम |
सतरंगी  हो  जाऊँगी , अगर  पिया  ले  थाम ||220

गोरी खिड़की पट खड़ी , हाथों  लिए गुलाल  |
राह सजन  की  देखती , सतरंगी  हैं  ख्याल ||221

होली चढ़ी सुभाष पर , फिर भी  होश हवास  |
मेरे भारत देश की , होली   है  कुछ    खास ||222

गोरी‌  लेकर   आ  गई  , बढ़िया  रंग   गुलाल |
मुस्कराहट की भजिया  ,  गुझिया माला  माल ||223

गोरी  होली  खेलती , अधरों  पर  मुस्कान |
मिलकर सब है बोलते ,  गोरी    आलीशान ||224

रंग  बिरंगा  पर्व  है  , लगता‌  सदा  नवीन  |
गिला मिटाने के लिए  , होली   है    रंगीन ||225

गोरी के तन रँग लगा , गालों  खिला  गुलाल |
गोरी लगे गुलाब है   ,  उड़ती   गंध  कमाल ||226

गोरी  होली  खेलती , उस  पर  चढ़ी  उमंग |
सिंघई सुभाष बोलते  , आज गज़ब  है रंग ||227

होली  पर रोते  मिले  , हमको  सुंदर  रंग |
राजनीति  ने  नष्ट  की , पूरी आज उमंग ||228

अब चुनाव  में  देखता,  खूनी  होते  खेल |
गले मिलन की बात अब , कैसे होगा मेल ||229

नेता जी  की उग उठी , जहाँ- जहाँ  विष  बेल |
कह  सुभाष  कैसे  वहाँ ,   खेलें   होली   खेल ||230

जहाँ सड़क पर  फैलकर , बही खून की धार |
वहाँ  बैठ  रोदन  करे ,   होली   का   त्योहार ||231

भाई  चारा  प्रेम  के ,     नष्ट    हुए   विश्वास |
अस्पताल में  होलियाँ ,  बिस्तर पड़ीं 'सुभास' ||232

ज्ञान चंद्र को दे दिया , टोकचंद ने  लंच |
समझोते को आ गए ,रायचंद   सरपंच ||233

ज्ञान चंद्र से  भिड़  गए , टोकचंद  जी मंच |
समझोते  को बन गए  , रायचंद   सरपंच ||234

अभिनंदन के शौर्य पर ,यह रहते चुपचाप |
आतंकी जब मर जाए ,     रोते जैसे बाप || 235

लोगों  की  हर  बात  का , जिसके पास  जवाब |
उनका ही गड़बड़ दिखा  , प्रस्तुत   देख  हिसाब ||236

विधवा उन्हें न बोलिए, जिनके सजन शहीद |
शौर्यांगिनी  कह सकते , रहकर बतन  मुरीद ||237

दवा बनी हर रोग की , पर कहते  है  लोग | 
उसका नहीं इलाज है, जिसको मैं का रोग ||  238

दवा बनी हर रोग की , कहें  वैद्य  जी  राज | 
जिसको मैं का रोग है , उसका नहीं इलाज ||239

चंदन-सज्जन  एक सम, हरते दोनों ताप |
खुश्बू देते  है सदा,   रखें   पास  में आप ||240

कत्ल सलीके से करें , नहीं  लगे अंदाज |
इसीलिए कातिल यहाँ , कर लेते है राज |241

विश्व-बंधु  की  भावना, न्याय  नीति  परिधान |
नया  वर्ष  हो   हर्षमय,  नित   नूतन   उत्थान ||242

       सदा‌ हार से गम मिले, जीत  दिलाती‌  हर्ष |                    जो  रहते  है  एक  से‌,  बनते  है   आदर्श ||243

       हार जीत  के खेल  में , दुखदाई‌  है  कर्म |                         बिना चाह  के कर्म में , है‌   संतोषी   धर्म ||244

     जहाँ  जीत के‌‌  खेल  में , नैतिकता  की  हार |                    समझो तब उस जीत का ,हुआ यहाँ व्यापार ||245

        जिंदादिल  इंसान  को , सदा  पास  है‌  जीत |                    वह करता  पुरुषार्थ ‌से , जग में सबको मीत ||246

                 जनसेवा के नाम पर , है   सेवा  में  लूट |                     छोटे ही पकड़े यहाँ , मिले‌ बड़ों को छूट ||247

              सेवक विपदा‌ काल में , जुटे  रहे  दिन  रात |             मगरमच्छ थे  कुछ बड़े  , खूब लगाई  घात ||248

                  लेना  आना‌   चाहिए. ,   देते  है   सब. साथ |सुंदर  महल  बनाने  में , लगते‌  सबके  हाथ ||249

खुद  के  घर में गंदगी ,  बढ़ा रहें  दिन  रात | 
दूजों  के  घर  बैठकर , करें  स्वच्छता  बात ||250

ऐसा  बैसा मत  कहो , नहीं  फुलाना गाल |
पहले खुद की देखना , कहाँ मिली है ताल ||251

सब जाते जिनके  यहाँ ,  रखते नहीं मलाल |
तुम  उस  घर के‌  लिए , करना‌ नहीं  वबाल ||252

माफी  देकर आप भी , नहीं  पालना  खाज |
बदलें  नही  स्वभाव को ,, जो  है  धोखेबाज ||253

दूरी  उससे  है  भली , जिससे  खाया  खार |
मोका पाकर आप पर , करें  पीठ  पर  वार ||254

जिसको तुम सम्मान दो , वह बांटे अपमान |
उसको कभी न मानिए , यह सच्चा  इंसान ||255

कच्चे    बहरे    साथ    में , अन्धे  कर   ले   कान |
उसकी आकर तब मदद ,क्या कर सकते भगवान ||256

वर्ग   भेद   कुंठा   भरें , छोड़े   कटुता  तीर |
ऐसा  नर  भेदे  स्वयं,  अपना  सुखी  शरीर ||257
========

 
 तांत्रिक
भुतनी जैसे होंठ हैं , आंखें  लगती जेल  |
केला पत्ता कर्ण हैं ,  दंत कील से मेल ||258

सब्जी_बिक्रेता
नाक मिर्च सी तेज है ,  कद्दू जैसे गाल |
सब्जीमंडी प्रेमिका ,  मेरे सुंदर  ख्याल ||259

किराना बाला
लोंग लगें पलकें मुझें , काजू  जैसे नैन |
बादामी है नासिका,मिलता हमको चैन ||260

पान बाला
गाल   बनारस  पान  हैं , चूने  जैसे  दंत |
आँखें लगती लायची , खुश्बू जहां अनंत ||261

नाई
शेव क्रीम है नासिका , नैन उस्तरा  धार |
होंठ चले कैची तरह , लगते बाल उधार ||262

मिठाई बाला
रसगुल्ले से  नैन है  ,  रबड़ी जैसे गाल |
बाल जलेबी से लगें ,कान इमरती लाल ||263

फल_बिक्रेता 
पके सेव से गाल हैं , केला जैसी नाक |
दाने दंत अनार के , होंठ  संतरा फाक ||264

बुक_सेलर्स
बालपेन सी  नाक है , लगे  रबड़  से  गाल |
ड्रांइग बुक माथा लगे ,  गर्दन बनी किताब ||265

गारमेंट्स_बिक्रेता 
मिनी  कर्ट गर्दन लगे , जीन्स शोभते कान |
बेबी   चड्डी   नासिका , गोरी की पहचान  ||266

मछली_बिक्रेता 
कतला मछली नासिका ,  राहू मछली गाल |
झींगा मछली आंख है ,  गोरी बड़ी  कमाल || 267

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
===================
विनय  हमारी देखकर , वह समझें  कमजोर |
आंख दिखाकर जो कहे, उनको वह सिरमोर ||268

शीष झुकाकर कर दिया ,हमने जिन्हें प्रणाम |
गर्दन  झटका  दे  गए  , बे  स्वीकृति   पैगाम ||269

जिसने अँगुली  से कहा , और  सुनाओं  हाल |
हाथ जोड़ वह कह उठे , कृपा  आपकी  ढाल ||270

एक दिवस वह  टूटता , जिनको  रहे घमण्ड |
पाषाणों  को  तोड़ते , बिजली-नीर  प्रचण्ड ||271

अभिमानी का दर्प भी , करे विसर्जन प्राण |
नदी  नीर  के वेग  से , हट  जाता  पाषाण ||272

सज्जन भी है  तोड़ता  , दुर्जन का  अभिमान |
हिल  जाता  है  नीर  ‌से   ,पत्थर    का  स्थान ||273

एक  लोह  की  चोट  से , पत्थर  चकनाचूर |
अभिमानी के दर्प  की , यही  नियति  मंजूर ||274

दिखे  नम्रता  नीर  में , पत्थर  में  अभिमान |
पत्थर  टूटे   चोट   से , नीर   न   टूटे  आन ||275

अभिमानी की बात  में ,रहती  नहीं सुगंध |
सज्जन के हर बोल से, उड़ता  है  मकरंद ||276

पानी  कभी  न टूटता , कितना करो प्रहार |
पत्थर के अभिमान में , करती  चोट  दरार  ||277

सज्जन को सब बोलते , है यह निर्मल नीर |
अभिमानी पत्थर कहा, जहाँ न रहती  पीर ||278

अभिमानी   की  देह  पर , क्रोध  रहे  गणवेश |
पत्थर दिल उसका मिले, भरा हलाहल क्लेश ||279

                  लल्लू-चप्पू  बोलते  ,खुद  घोषित  सरताज  |चम्पी मालिस कर रहे  ,छूट गई सब. लाज ||280

                दर्पण कहलाता  सदा  , सृजन  हुआ साहित्य |मूल्य , भाव से जानिए‌   , कितना‌  है लालित्य ||281

               आभूषण  उत्तम   क्षमा ,  जो  नर  लेता  धार |परहित निजहित साथ में ,करता जग उपकार ||282

                मानव   का  गहना  क्षमा ,  करे  दुष्टता  नाश  |फैले  यश  आकाश  में ,  जैसे  सूर्य   प्रकाश  ||283

               आभूषण   ही  मानिए , क्षमा  दया  हो  पास |कीमत दुनिया  में सदा ,  रहती  उसकी खास ||284

               सप्त  जलधि  नीर  हो , तीन    लोक  बरसात |बिन  प्रीतम  बढ़ती  रहे , विरह तपन की घात ||285

                टप -टप आंसू  गिर  रहे , विरहन.  लगे  उदास |झर-झर अब बरसात भी ,बुझा‌ सके मत प्यास ||286

                विरहा  के  आंसू  झरे  ,बड़ा   कठिन  था  दौर  |पर  भँवरे  ने  बात को , समझा  कुछ  ही और ||287

                 सदाचार.   फूले   फले ,समरसता   जिस   गेह |घर में   रहती    एकता,  सदा    बरसता     नेह ||288

                      जहाँ आपकी जीत पर , हर्ष मनाए लोग |समझो सच्चे मित्र का , यहीं  बनेगा योग ||289

अभिमानी‌ देखा‌ सदा , चलता चाल कुचाल |
दूजों  का  सुख  देखकर , रहता  है  बेहाल ||290

सज्जन  भी‌  है  तोड़ता  दुर्जन  का  अभिमान |
हिल  जाता  है  नीर  ‌से   ,पत्थर   का   स्थान || 291
(स्थान =इस्थान वाचक भार ५ 

माँ को जिसने कर लिया, कर्मो‌  से नाराज | 
खुदा नहीं स्वीकारता , उसकी पढ़ी नमाज ||292

रहमत  रब  देता  नहीं , मिले  उसे‌  फटकार |
जो मां से मुख मोड़कर , खोज रहा है  प्यार ||293

जन्नत  मां  के‌  पैर  में , बरकत  मां के  हाथ |
रहमत  रहती  नैन  में , खिदमत रहती  माथ || 294

देवालय सी माँ  लगे  , अनुपम माँ अनुराग  |
शब्द  नही  ऐसे बने ,   वर्णन  कर दे  त्याग ||295

माँ  संतानो   के  लिऐ ,  इतना करती त्याग   |
त्याग  मूरती  माँ  कहे ,  ममता  लगे  पराग   ||296

माँ  की  ममता  छाँव है  , लगती  बड़ी अनूप  |
शीत  लगे  वह  जेठ  में ,  पौष  माह   है  धूप ||297

माँ  की  महिमा  जानिऐ , माँ  पद  प्रभू समान |
आते ही जग में यहाँ  ,   माँ  ही  पहला  ज्ञान ||298

रख देती है  माँ  सदा , जब जब शिर पर हाथ |
मिले सफलता काज में ,    ऊँचा  रहता  माथ ||299

उसका भी यश फैलता , जो  माँ  करते  मान  |
विनय करे माँ की सदा , रखता उसका ध्यान ||300

माँ को जिसने कर लिया, कर्मो‌  से नाराज | 
प्रभू  नहीं  स्वीकारते , पूजन  का आगाज ||301

रहमत  रब  देता  नहीं , मिले  उसे‌  फटकार |
जो मां से मुख मोड़कर , खोज रहा है  प्यार ||302

जन्नत  मां  के‌  पैर  में , बरकत  मां के  हाथ |
रहमत  रहती  नैन  में , हसरत‌‌ दिल के‌ साथ  || 303

बड़ा नहीं इतना हुआ, रख लूँ मां को पास |
रहता मां के पास में , छोटा अभी  सुभाष ||304

मां का रुतवा रख सकूँ , नहीं मेरी औकात |
रुतवा मुझको मानती , कहती मां यह बात ||305

नहीं  छोड़ती  आज  भी , माता  मेरा  साथ | 
जग  मेले  की  भीड़  में, पकड़े  रहती हाथ ||306

मां   मेरी   चिन्ता  करे ,   मै  रहता  निश्चिन्त |
अब  भी  छोटा मानती, मां की नजर अनन्त ||307

कह  सुभाष  संसार में  , भाग्यवान वह लोग |
मां की  नजर दवा बनी , पास  न  कोई  रोग ||308

एक दिवस वह  टूटते ,  जिनकों  रहें घमण्ड |
पाषाणों को तोड़ती , बिजली कड़क प्रचण्ड ||309

सभी पटल पर देखता ,मिले  एक  से हाल |
नहीं परस्पर पोस्ट का , रखता कोई ख्याल ||🙏310

पोस्ट पटककर भागते‌, कविगण सभी महान |
यहाँ  एडमिन‌‌  सोचते  , क्या‌  कर दें  श्रीमान ||311

जहाँ आपकी बात से , निकले कोई बात |
लोग कहें क्या बात है , बात बने सौगात ||312

कुंठित होकर मत लिखें ,प्यारे  कोई  तंज |
तंज लिखे मुस्कान से  , मिटते मन के रंज ||313

अधरों  पर मुस्कान से , मिटते‌‌  मन  के  रंज | 
करें प्रफुल्लित ह्रदय को ,  अच्छे लगते तंज ||314

जातिवाद  पर  टिक  गई ,  राजनीति   है  आज |
जिसमें  चिन्तन की जगह  ,काँव-काँव  आबाज ||315

जाति  पंथ  के  सूरमा , करते  है  जो  बात |
भारत  के  उत्थान  की , नहीं  वहाँ  सौगात ||316

राजनीति में  देखिए, कैसे  बजते  ढोल |
चौराहे  पर खोलते,  सदा परस्पर पोल ||317

बैरी  से  भी  पूँछिए , कभी   कुशलता   खैर |
चिड़कर  सीधा  चुप  रहे   , या   भूलेगा  बैर ||318

खुला रहा उनका सुनो , कल का भारत बंद |
घर में  झेला  रौद्र  रस ,पत्नी  जी  का  छंद ||√319

बदल‌ सका घर बैठकर , कौन मनुज तकदीर |
कर्मठता  के कर्म  सँग  , सहज रहे   तदवीर ||√320

राजनीति  अब देखिए , नेता  बने  किसान |
शोर मचाकर  खोल ली , नेतागिरी  दुकान ||√321

टी वी  पर जो दिख रहे , नेता नए किसान |
ज्ञात नहीं उनको जरा  , कैसे  उगता  धान ||√322

कोरोना  के  कहर  सी , राजनीति   है आज |
मुख  पर  पट्टी  बांधकर  ,मूक  देखिए  राज ||323

हाल-चाल मत पूंछिए , राजनीति का  आज |
वह भड़काता देश को , जिसे मिले न  ताज ||324

किस-किसको हम दोष दें ,बेदागी  है  कौन |
राजनीति चौसर बिछी , जनता रहती मौन || 325

राजनीति की चौसर पर , लगे  द्रौपदी लाज ||
हर युग का यह हाल है ,  मूक  देखते  ताज ||326

नेताओं   के   कर्म  से  , दूर   भागता   धर्म |
बढ़चढ़ कर अब फूलते  , राजनीति से जुर्म ||327

नेता  आपस  में  सदा  , देते    हैं  धिक्कार |
खुद  को  सच्चा मानते , ईश्वर  का अवतार ||328

खुद की खुली दुकान है , राजनीति छल छंद  |
हमसे  कहते   कीजिए , अपना   भारत  बंद ||329

नफ़रत रखकर जो लिखे , वर्ग  भेद  साहित्य |
कुंठित  रहते   वह  सदा ,   रहे   दूर  लालित्य ||330

सृजन  मनन चिन्तन नहीं , केवल  करते  तंज |
मीन- मेख  के  यह  रथी , खुद  में  रहते  भंज ||331

जातिवाद  का  ध्वज  ले ,  वर्ग  भेद  की  बात |
करें  एकता  भंज  वह , लगे   रहें   दिन   रात ||332

करें  वमन   बिष  बात से , प्रेम  नहीं  स्वीकार |
वह  नफरत  की  नींव  से , खड़ी   करें  दीवार ||333

वह  समाज  में  आदमी , कभी  न  होता  मर्ज |
जिसके  रहते  भाव  हैं , हमें  पड़ी   क्या  गर्ज ||334

चिकनी  चुपड़ी  बात  से ,  हो  जाते  हैं   काम |
जो  यह  विद्या  जानते  ,  उन्हें   बड़ा   आराम ||335

देखी    साहसवान    की,  ऊँची   रहती   मूँछ |
कायर   देखा   है  सदा ,   रहे   छिपाता   पूँछ ||336

कभी  हार  से   सीखिए , कैसी  चलना   राह |
साहस  के  अब  साथ   ही,  पूरी   कैसे  चाह ||√ 337

चुगलखोर  चुगली  करें , मुख से निकले आँच |
नैन  सत्य  ही  बोलते , लखकर   पकड़े  साँच ||338

सखा  नहीं  वह  आपके , भरते  हैं  जो  कान |
झगड़ा   जब   होने  लगे ,  कर  जाते  प्रस्थान ||339

देखा    है    संसार   में ,  बड़े   अनोखे   लोग |
मूरख  समझें  और  को  ,   पाले   उम्दा   रोग ||340

बड़ा  ग़ज़ब  है  आदमी , खुद  बनता   हुश्यार |
माथा   ठोके   उस  समय ,  जब  हो  बंटाधार ||341

चुगलखोर  चुगली  करें , और  न  कोई  काम |
भोजन  से   न  तृप्त  हों  , चुगली  से  आराम ||342

जिनका  झगड़ा  शौक है , मिल  जाते  है योग |
जिनकी   जैसी   चाहना , उनको   बैसा    रोग ||343

काँटे   बिखरा  राह  में  , स्वयं   खोजता  फूल |
एक   यही  संसार   में ,   मानव   करता   भूल ||√344

करें   पाप  फिर  दान  दें  , नहीं   हुए   निर्दोष |
लाख यतन के  बाद  भी  ,रिक्त पुण्य का कोष ||345

पैसों  से  मिलता  नहीं , खुशियों  का  वरदान |
परोपकार  के  भाव से , अधरों  पर  मुस्कान ||346

देखा  जिसके   गेह  में  ,   खूँटे    बँधा  उसूल |
न्याय नीति की बात भी  , लगती वहाँ फिजूल ||347

मतलब  की  चर्चा करें  , मतलब के सब यार |
जब  मतलब  निकले नहीं ,मतलब करती रार ||348

यदि  किसी  संयोग  में , होता  उदित  वियोग |
पीड़ा  तन  मन  में  भरे    , यादें   बनती  रोग ||349

यह  जीवन  समझों   घड़ी , सांसे करें  रियाज |
थम जाती है एक दिन ,टिक-टिक की आबाज ||350

ज्ञानी   देखे   आजकल , करें   विषम   संवाद |
तथ्य  हीन  चर्चा  करें,   जिस  पर  चाहें   दाद ||351

ज्ञानी   भी   ऐसे   दिखे  , सदा   चाहते   मान |
दूजों  का   वह   देखकर ,  लेते  मुक्का  तान ||352

अब   चुनाव  आसान  है , पास   रखो  टेलेन्ट |
यदि  बाहुबली  आप   है ,  समझों  परमानेन्ट ||353

टिकट  झटकना हो गया ,अब काफी आसान |
बाहुबली  की  छाप   से , कहलाओं   श्रीमान ||354

दल  भी  दल-दल  में  फँसे , कीचड़ में  स्नान |
राजनीति   में  आइए  ,   होगे   आप    महान ||355

जनता  भी  सब  भूलती , अगले  पिछले दोष |
हाथ  जुड़े  वह  देखकर , नष्ट   करे  सब  रोष ||356

धनबल  यहां  सुभाष  भी , आए  भारी  काम |
बिकते   बोटर   देखिए  ,  मिलते  ऊँचे   दाम ||357

लोकतंत्र  में  लाज  भी ,  लगती  गई  सिधार |
अब चुनाव भी बन गया  , एक भला  व्यापार ||358

आलोकित  मन  राखिए , दीपोत्सव   है  रोज |
सुना   परिश्रम  तेल  से  , अंदर   रहता  ओज ||359

झोपड़   पट्टी   में   दिया, जलकर   सारी  रात |
मेहनतकश  मजदूर  से,  गुपचुप  करता  बात ||360

एक  दीप   ने   झोपड़ी , रोशन   कर   दी  रात |
मेहनतकश  मजदूर  से , खुश  था  करके बात ||361
--------------

सुनकर गूलर पेड़ पर , पके टगें  हैं आम |
ललचाकर जो भी चढे, नीचें  गिरें धड़ाम ||
दनादन बाजे बजते | नहीं अब हम कुछ कहते ||362

बहरा  आंखे  बांधता ,    अंधा  बांधे कान |
लूले  को  दोड़ा दिया  , लाने  को  सामान ||
दनादन बाजे ----|.     363

बूँद गिरे या मत गिरे , पर हल्ला का दोर |
पावस ऋतु अब आ गई, नाच रहे है मोर ||
दनादन बाजे ------.  364

लाखों लेकर फैसला , अफसर बड़ा महान |
फाइल खोजी  सौ  लिए  , बाबू    बेईमान ||
दनादन बाजे-----365

एक  फीट  गड्डा   खुदा , शौचालय  निर्माण |
जाँच कमेटी कह गई, दस है  सत्य प्रमाण ||
दनादन बाजे -----366

सरकारी कर्जा मिला  ,खर्च  किए कुछ दाम |
वोट दिया माफी मिली , बड़ा सुलभ है काम ||
दनादन बाजे --------367
---------------;

पिंगल मैंने छोंड़कर  , पढ़े   सूर    रसखान |
तुलसी केशबदास पढ़ , सीखा छंद विधान ||368

कथ्य ,शिल्प के भाव  की , प्रत्यंचा तैय्यार |
बड़े   दूर तक  गूँजती  ,  दोहे   की  टंकार ||369

गुणी जनों की बात को   ,भाई  मत  तू  भूल |
दर्पण धुँधला जब दिखे,मुख पर समझो धूल ||🙏370

नज़र रखें कमनीयता , यदि है भाव पवित्र  |
कुंठित रखे विचार जो  , बने न सच्चे मित्र ||🙏371

माता रानी आइए, नमन करोड़ों बार |
नवराते  है आपके, जीवन में उपहार ||√372

नवधा-पूजा  हम करें , माँ  के  हैं  नौ  रूप ||
आराधन भी नौ दिवस , करते सभी  अनूप ||√373

मां  तेरे  नौ  रूप हैं , सबको  करूँ  प्रणाम |
नवराते  में  लूँ सदा,   जाग-जाग कर नाम ||374

माता  रानी  आपका , पाऊँ  सदा  प्रसाद |
कर्म धर्म के सँग चलें , रहें आप वस याद ||375

सात बचन का आज भी , दिन है मुझकों याद |
जीवन  पथ  उत्कर्ष  में ,    रहा  सदा  आवाद ||376

हमसे  हँसकर  पूँछती , क्या  पाया  है  नाथ |
मैने  भी  उत्तर  दिया  , हर   पल  तेरा  साथ ||377

मै अतीत में  सोचता ,  सुख दुख  थे व्याप्त |
सदा साथ मिलता रहा , जीवन  में  पर्याप्त ||378

समय  चक्र चलता  रहा , बनी  सारथी  गेह |
शेष  जिंदगी बना रहे , इसी  तरह  का  नेह ||379

पत्नी ने  काढ़ा  दिया , साथ कहे यह बोल |
अपने रस श्रृंङ्गार को , कविवर लीजे  घोल ||😊😊380

काढ़ा कप  में  डालकर, पत्नी  बोली  बोल |
अपने  रस  श्रृंङ्गार से,  मीठा  करिए   घोल ||😊😊381

कविवर काढ़ा  पेश  है,  पत्नी जी  के बोल |
समझ  इसे श्रृंङ्गार रस , पान कीजिए  घोल ||😊🙏382

चाय  नदारत  हो गई , लौंग लायची पान |
स्वागत में काढ़ा मिले ,स्वीकारो  श्रीमान ||😊🙏383

चाय पान अभी दूर है , काढ़ा  से  सत्कार |
कहीं कहीं तो भाप भी , स्वागत में  तैयार ||384

कोरोना के काल में , आव भगत थी  साफ |
स्वागत में काढ़ा मिले, वह भी कप में हाफ ||385

मित्र चाय के नाम पर , काढ़ा  करता पेश |
कोरोना के   काल  में  , किया  इसी में  ऐश |386

कोरोना भी भागता, वहाँ  न  करता सैर |
होता जहाँ चुनाव है ,  रुकें न उसके पैर ||387

चमक रही हर चीज का , नहीं  स्वर्ण में नाम  |
कोरोना मत जानिए, जिसको सहज जुखाम ||388

हम सब मिलकर भागते ,बचा रहे है  जान  |
पर  नेता  से  डर  गया ,  कोरोना   श्रीमान ||389

नेता जी का बिक रहा , भाषण का सामान |
पर हमसे वह कह रहे ,  करिए  बंद दुकान ||390

कोरोना के  काल  में , बदले  कई  रिवाज  |
शुभाशीष ही फोन पर , चल जाते हैं आज ||391

लिखा मित्र ने कार्ड में , यदि आए श्रीमान  |
सावधान  खुद ही रहें , शादी   के   दौरान ||392

मित्र  निमंत्रण पर लिखे , है  कोरोना  मार  |
गूगल  पे‌‌  स्वीकारता ,  मै  शादी व्यवहार ||393

एक कार्ड मुझको मिला, साथ लिखा उपचार |
गूगल  पे  से  भेज  दे ,     शुभाशीष व्यवहार ||394

दर्शन हित मंदिर गया , दिखी वहॉ पर होड़ |
रुपया एक चढ़ाय कर , मांगे लाख करोड़ ||395

करते  सूरज  चन्द्रमा , बिन  माँगे  उपकार |
रब भी देता  बिन कहे , जीवन भर उपहार ||396

ईश्वर  को  मत  भूलिए ,करिए  उससे  प्यार |
बिन  मांगे  दे आपको , जीवन  भर  उपहार ||397

हरिआ पंछी  टेरती ,भावुक सुता किसान |
सुनकर हरि-आ भी गए , देने को वरदान ||398

नभ में अब घन श्याम हैं , हुआ गाँव में शोर |
दौड़ पड़े तब श्याम जी  , घन लेकर घनघोर ||399

भावों   की  गंगा  बहे ,  टूटे   नहीं  प्रवाह |
कलम चले उत्साह से , लेकर गहरी थाह 400

        निर्माता  है  भाग्य   का , मानव का निज कर्म |                   कर्म   हमें  ही  सौंपता ,  परिणामों    का  मर्म ||401

 आनन की दो आँख से  , जीभ अधिक वाचाल |           कहकर   पीछे   लौटती ,  आँख   झुके   बेहाल ||402

    मन को वश में कर रहे , ऋषिगण और फकीर |                   मैं  सेवा   तप    मानकर ,    देखूँगा   तकदीर ||403

    जहाँ शौर्य की बात है , भारत  है तब  शेर |                  प्रेम  खड़ा  स्वागत करे , खा  लेता है  बेर ||404

         सत्य अहिंसा प्रेम का , भारत  पढ़ता  पाठ  |                        संग शौर्य का बिम्व है ,  दिखे विश्व में ठाठ ||405

           कह‌‌ सुभाष सबसे यहाँ , आप‌ सभी का साथ |सृजन  सरोवर धाम में , सबके  अनुपम  हाथ |406

           यह सुभाष भी मानता , सज्जन का हो साथ |बिगड़े  काम ‌ सँवारते , हरदम  उसके  हाथ ||407

लव जिहाद

ब्याहा जिसको कह रहे , लव जिहाद की मार |                  तंज करें   जो लोग है    , उस  पर करें विचार ||408

बेटी ब्याही कौन ने , मुस्लिम करके  खोज |                       लव जिहाद के फेर में , बेटीं थी  उस रोज ||409

कोई कब-कब खोजता , बेटी को वर गैर |                           हो जाती है  बेटियाँ , लव चक्कर  में  गैर ||410

              अपनी-अपनी मान्यता , अपना देख  समाज |                   बेटी  बेटा  ब्याहते ,  मंगल  होते   काज ||411

            किसने रोका कब किसे, होवें  खूब  विवाह |                   लव जिहाद षणयंत्र को  , नहीं थोपिए चाह ||412

बापू जी

               बापू  के सरनेम से , दिखें आज त्रय नाम |                       इसीलिए इनकी फसल,पा जाती है दाम ||413

                 बापू के बंदर  नहीं  , गिनती में  अब  तीन |                     चौथा भी शामिल हुआ, मारे आँख नवीन ||414

               बापू के अब ख्याल को ,यह तीनों उपहार |                      कर देगें यह एक दिन , सपने  को साकार ||415

            बापू  की  वंशावली , आज  रहे  चुपचाप |                         इसीलिए  इनकी पुजे, पूरी   गांधी   छाप ||416

                    हम सब  गांधी वाद का , माने  पूरा  अंश |                 पर यह तीनो चल रहे , लेकर  गांधी  वंश  ||417

        बापू  के  सरनेम  का ,    गांधी   लेकर  नाम |                    राजनीति में खप गए, बिन अक्कल गुलफाम ||418

               मोदी का सौभाग्य है  , पप्पू  का दुर्भाग्य |                       एक समय दोनों हुए , कुर्सी  के अनुराग्य ||419

परम सत्य

        नाम राम  ही सत्य है , शव  के  पीछे  शोर |                    कहा राम ने  देखकर, आज यहाँ  पर भोर ||420

        वही  फसल है आपकी , जो बो आए आप |                     नई कहाँ  से उपज हो  , लेकर  कोई  छाप ||421

         कटु अनुभव ही कह रहे, रखों  फूँककर पैर |                   मिले सफलता एक दिन ,जग भी  भूले  बैर ||422

       असफलता हो यदि प्रथम , होना नही  निराश |                   मिली सफलता की कुँजी,समझों नया प्रकाश ||423

           किसी  कार्य  में  दक्षता ,  होती   सोना  तोल  |      लगे सफलता हाथ में  , जो   होती  अनमोल ||424

              कर्म  सदा अच्छा  करें ,  रखें   बुराई  दूर |                     यही ईश का नाम है ,   और यही रब नूर ||425

             नीम सदा कड़वा लगे , पर औषधि में नाम |                    मूल्य न जिनका हम करें, मौके पर दे काम ||426

             कथ्य ,शिल्प के भाव  की , प्रत्यंचा तैय्यार |                     बड़े   दूर तक  गूँजती  ,  दोहे   की  टंकार ||427

            मीठे  भी  होने    लगें. ,  जब  खट्टे   अंगूर |                   समझों उनको मिल रही , सत्संगति भरपूर ||428

      रुच रुच भोजन जो करें , उन्हें सुलभ स्कूल |(इस्कूल). रिक्त  पेट  की  पीठ  पर  , पन्नी  कागज  धूल ||429

             बोतल  देखो  नाचती ,  बहक  रहे   है  जाम |गोरी की  पग  चाल से , लगे  गुलाबी  शाम ||430

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          इधर उधर मत खोजिए,कहाँ ईश का धाम |                     मन मंदिर में देखना ,  अपने  आतम   राम ||431

          मनमर्जी मत कीजिए,  दिन को  कहें  न रात  |                  किस पुस्तक में यह लिखा,सुनो न कोई बात ||432

हम सब  उसको  मानते, जिसकी दुनिया अंश |

फिर क्यों मज़हव नाम पर , इक  दूजे को दंश ||433


आज कृषक का पुत्र भी , करें खेत पर काम |

हाथ  पिता  का   बाँटते ,कृष्ण और शिवराम ||434


गेहूँ   की  बाली  कटी  ,    नई   फसल  का   गान |

शिर पर रखकर चल दिया, बालक बना किसान ||435


बचपन  बीते  खेत  पर , और   जवानी   फौज |

किस्मत यही किसान की, सत्य सुनो यह खोज  ||436


पिता  पुत्र  मेहनत  करें, खेतों  में  दिन  रात |

शीत लगे या लू चले ,   या तन  पर  बरसात ||437


आए प्रभु के व्दार पर , मन की ले अभिलाष |

शरणागत को शरण दो,  विनती करे सुभाष ||438


माँ   बेटा लाचार  है ,  नही  पास  में  दाम  |

पत्ते का अब मास्क ही , करे सुरक्षा काम  |439


संकट  के  इस  दौर  में , पत्ता  आया  काम |

यह गरीव का है हुनर , लगा  न कोई. दाम ||440


यह मजबूरी में बना , जिसको कहें  जुगाड़ |

पत्ता  के  ही  मास्क से , देगे   रोग   पछाड़  ||441


आवश्यकता ही जनक , करता  आविष्कार |

देख   नमूना  हम   रहे , पत्तों   का    आधार ||442


देखा  मैने   चित्र  में ,  प्रमुख   यही  संदेश |

स्वयं  सुरक्षा   कीजिए  , कोरोना  परिवेश ||443


कवच  बना  पत्ता  यहाँ , माँ  बेटा  के अंग |

जीतेगें हम एक दिन ,  कोरोना   से    जंग ||444


यह गरीब की खोज है , नही  खर्च  कुछ दाम  |

पत्ता के   ही  मास्क  से , चला   रहे   है  काम ||445


यह गरीब भी लड़  रहे , पत्ता है मुख  अंग  |

इनका  साहस  देखकर , कोरोना  भी  दंग ||446


पूजा के ही साथ हम , करें पेट का ख्याल |

बर्ना  पूजा  मध्य  ही ,   होने  लगे  ववाल ||447


फुरसत में सब लोग है , रखें पेट का ख्याल |

इतना अधिक न खाइऐ , होने  लगे  ववाल ||448


नथनी के नग नूर की ,  चर्चा बड़ी कमाल.|

पूनम का  यह चाँद है , सबका ऐसा ख्याल ||449


कौन  उठाता  प्रश्न  है , और  लगाता  चिन्ह |

दिखते पैमाने अलग , जगह जगह पर भिन्न ||450


हम कोरोना से लड़े  , जंग नही आसान |

सुने सभी सरकार की , दूरी पर दे ध्यान ||451


क्या हम  आगे बढ़ चले , होना  जहाँ   विनाश |

चुप लगता  विज्ञान है , अब तक नही प्रकाश ||452


सुखद पढ़ा विज्ञान  को , पर  लगता  अभिशाप |

परिणाम आज सब लखे     , सुने  मोत  पदचाप ||453


होड़   नही   हथियार  है ,  अज़ब़ चल रहा मेल |

छोड़   वायरस  खेलते  ,   शीत  युद्ध  का  खेल ||454


मतलब की सब कर रहे ,  मतलब का संसार  |

मतलब कभी न हारता ,  मतलब  है  सरदार  ||455


सावित्री ने सत्य से , रोक   लिया  यमराज |

कहे सती यदि मानते , सँग ले जाओं आज ||456


यमराज न्याय  के  देवता ,  दे  बैठे  वरदान |

सदा यशस्वी तुम रहो , पाओं   पुत्र   महान |457


सत्यवान   जिंदा  हुऐ , सावित्री    के  सत्य |

यश जग में फैला रहे , जब तक है आदित्य.|458


बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |

नहीं  जहाँ  संदेश  हो , और  कथ्य  में   सार |459


कठिन  शब्द  दोहा  रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |

देखा कुछ दिन  बाद  ही ,  दोहे  का  अवसान ||460


दोहा   होना   चाहिए ,    मन   पर   करे  प्रभाव |

चिंतन  जिसमें  हो  भरा , मिटे कलुषता  घाव ||461


दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |

याद सदा सबको रहे , मिट  सकती  है  खोट ||462


दोहे  कितने  सहज  है ,  सबको   याद  कबीर |

साल  पाँच  सौ  बाद  भी ,  जिंदा   है   तहरीर ||463


अनपढ़ को भी  याद है ,आज.सुनो रसखान |

दोहे   है  इतने  सरल , सबकी   चढ़े   जुबान ||464


दोहे जन जन गा रहे ,   कविवर    तुलसीदास |

रामचरित मानस लिखा , भाषा सरल सुभास ||465


दोहा में  कुछ  बात  हो  , भाषा  सरल  सुजान |

हर  युग  दोहे  आपके ,   सबकी  चढ़े  जुबान ||466


आज देश में फैलता ,  एक  वायरस  और |

दिखे धर्म के नाम पर , नफ़रत का भी दौर ||467


ऊपर  वाले  ने  दिया , जीने  का अधिकार |

नही धर्म  यह बोलता  , पैर  कुल्हाड़ी  मार ||468


सोच समझ कर कीजिए , घर  से कन्यादान  |

हित भारत का देखकर , दागो  अपने  ब्यान  ||469


नेताओं   को   गालियाँ , अज़ब चला है  रोग |

किया आपने कुछ कहाँ , चुप  हो  जाते  लोग ||470


मेरा   दीपक  जल रहा  , आज   एकता  नाम |

हम सब मिलकर एक है ,  देता.है    पैगाम ||471


मेरा    दीपक  जल रहा ,   कर    आशा  संचार |

डटकर करे मुकावला , आपस में रख प्यार ||472


मेरा  दीपक  जल रहा     भारत   माँ    के   नाम |

नौ बजकर से नौ मिनिट ,जले आज अविराम ||473


मेरा    दीपक जल रहा ,   कर  मन से  गुणगान |

आज  अवतरित थे प्रभू ,   महावीर भगवान ||474


मेरा   दीपक  जल रहा  , सबको   मिले   प्रकाश |

कोरोना  से  मुक्ति  हो ,  विनती  करे  सुभाश ||475


कोटर में रह शुक कहे , समय आपदा जान | 

मै   पंछी    पहचानता ,  नादाँ   क्यों   इंसान |476


स्वयं सुरक्षित  कर लिया.,शुक ने कोटर  खोह |

राम  नाम  में  मस्त  है , छोड़   अभी जग मोह ||477


कोरंटाइन कर लिया , शुक ने.सोच विचार |

इसे  दवा  ही  मानिऐ , यही   आज  उपचार ||478


नही   रहेगी  आपदा ,     रहे  गेह  में  लोग |

शुक भी  यह  पहचानता , कैसे  भागे  रोग ||479


बैठा शुक यह  कह रहा , सुन लो मेरे ख्याल | 

बीमारी   है  यह  महा  ,     कोरोना   जंजाल 480


कोरोना  से   सामना , करती   है   सरकार |

कदम उठाऐ कुछ कड़े , जिसे करें स्वीकार ||481


सैन्य चिकित्सक मानिऐ , वर्तमान भगवान |

दिखे  सफाईदार  तब ,  दीजे  उनको   मान || 482


सेवारत  जो   दिख  रहे ,   अभिनंदन    हकदार |

आज कष्ट की कुछ घड़ी , कल सुख की बौछार ||483


साथ   प्रशासन  मीडिया , सबको  करूँ  सलाम |

आप  रहे  घर  कुछ  दिवस , जनता   को  पैगाम ||484


सैन्य चिकित्सक मित्रवर ,सँग भारत सरकार |

हम   सबके   उपचार   है , आज   सफाई  दार ||485


सैन्य चिकित्सक आज है ,अभिनंदन हकदार |

और   सफाई  बन्धु  भी , सँग भारत सरकार ||486


सैन्य, चिकित्सक, नर्स को ,   और सफाई दार |

नमन प्रशासन, मीडिया , सँग भारत सरकार  ||487


हाथ मिलाना छोड़कर , करो दूर  से हाय |

कोरोना के इश्क में ,  हो जाती   गुडवाय ||488


देखा सबने  चीन का ,   सभी माल बेकार |

पर.कोरोना टिक गई ,  अपने नैन  पसार ||489


नही मजाक को जानना , टोटे का यह खेल.|

कोरोना  के प्यार में ,        लोटे  से  है  मेल ||,490


कोरोना को देखकर , खुद का करे सुधार |

या   गंगा   में   तैरने ,    हो  जाऐ   तैय्यार ||491


खुद को पहले दीजिऐ,   कवच सुरक्षा दान |

यही कथन अब कह रहा , पूरा हिन्दुस्तान ||492


संकट के पल चल रहे , रहना सभी सतर्क |

सरकारी आदेश पर ,    करना नही कुतर्क ||493


आज विश्व में वह समय , चिन्ता में  सब  लोग |

उन्मूलन   हो  किस  तरह ,   यह  केरोना  रोग ||494


थमा देश का चक्र है , फेल रहा यह रोग |

हँसी  उड़ाते  घूमते ,  लापरवाही  लोग ||495


भारतवासी  ले  रहे , स्वंय  सुरक्षा. ओट |

यही एक हथियार है , करें  रोग  पर चोट ||496


नही रोड पर हम दिखे   ,मोदी करें अपील |

अनुपालन हम सब करें , जरा न देवें ढील ||497


 हर संकट से सामना , करता   हिन्दुस्तान |

मिलकर हम सब एक है , देखे सदा जहान ||498

 

देख सजगता हिन्द की , और एकता सोच |

सभी वायरस  देखते   , यहाँ न  कोई लोच ||499


 शोर  मचाता  वायरस  ,  कोरोना  है  नाम   |

हिन्दुस्तानी   सजगता,  जीतेगी    संग्राम ||500


कोरोना की शक्ति का ,    देख  लिया अंदाज |

मानव की कुछ भूल का , दिखा नतीजा आज ||501

 

मिलकर करता सामना , पूरा हिन्दुस्तान |

कोरोना  हैवान  हो , या    कोई     शैतान ||502

==========


आज शारदे  नाम पर ,   अनुपम सजी  दुकान |

प्रतिदिन रेड़ी बँट रही ,      सर्वश्रेष्ठ श्रीमान ||503


हम  भी दिखते  लालची , पाकर   समझें  मान |

वह  भी  क्रमशा:  बाँटते     , दानी  जैसा  दान  ||🙏504


नही समझते आप क्या  ,  कैसा  है  यह   मान  |

एक  दिवस  गुणगान है  , बाकी   दिन  नादान  ||🙏505


सृजन भाव से सृजित हो ,    मन के हो उद्गार |

सृजन श्रेष्ठ पावन स्वयं , खुद का खुद उपहार  ||🌷506


श्रेष्ठ सभी  दोहा  सृजक , कौन  दिखे  नादान |

बाँटे  लाली  पाँप  वह ,   हम  समझें  सम्मान ||🙏507


दोहा लिखता भाव से ,    लेखक. डाले  प्राण |

पाठक   देते   प्रेम   है ,    सच्चा  पत्र   प्रमाण ||508


लोकतंत्र  के  नाम  पर   , बिषधर   जैसे  व्यान |

घायल   संकट  में   लगे,  हतप्रभ   हिन्दुस्तान ||509


बड़े  भाग्य  मानव  बने,    सदाचार  हो  चाल |

कर्म   धर्ममय   आपके ,  करें   प्रभू    से  ताल  ||510

==°=°=°℅°℅℅

अथ श्री मोबाइल कथा 

अजब ग़ज़ब हालात है , क्या बोलूँ भगवान |

मोबाइल  से   देखिऐ  , चिपका  है    इंसान ||511


साजन  सजनी  बीच में ,   मोबाइल  दीवार |

सबकी अपनी लिस्ट है ,अपने निज है यार ||512


व्हाटशाप पति देखता , रहता उसमें  व्यस्त |

बीवी  देखे   फेसबुक  , रहती   उसमें मस्त ||513


बिस्तर भी लाचार है ,  पलँग दिखे खामोश |

प्यार नजर आता नहीं , दिखे फोन में  जोश ||514


सब्जी जलकर खाक है ,लगती किचिन उदास |

बीवी माहिर  फेसबुक   ,  अव्वल  दरजे  पास ||515


बेटा   शाला   जा   रहा , खड़ा   हुआँ   तैयार |

पापा   को  फुरसत  नहीं ,   गूगल  रहे निहार ||516


माता  कब से  कह  रही ,  बेटी   है   चुपचाप |

पोस्ट यार की पढ़ रही    , गहराई   को   नाप  ||517


बेटा कहता जोर से ,   खलल न कोई  डाल |

लड़की मेरी पोस्ट पर , पूँछ   रही   है   हाल ||518


मोबाइल भी कान पर , करता सदा प्रहार |

रहता  हाथों  में  सदा   ,    जैसे हो शृंगार .||  519


चलते सुंदर चैट हैं ,      मस्त  रहें   आवाद |

ग़ज़व इश्क फरमा रहे  , मजनू की औलाद ||520


बहुत  सुना  संसार  में , ऋषि  मुनियों  का ज्ञान |

मैल न  मन  का दूर है  ,  अब  ब्यर्थ  गंग  स्नान.||521


ज्ञानी हो यदि मद भरा , कुछ  पल  छाए  असर |

फिर दूरी है इस तरह , , ज्यों  चम्पा  सँग  भ्रमर ||522


आए प्रभु के व्दार पर , मन की ले अभिलाष |

शरणागत को शरण दो,  विनती करे सुभाष ||523


कोरोना  के  काल  में ,  मिलने   लगी   शराब |

सुनकर अब इस बात को ,खुश है कई जनाब ||524


बीड़ी  गुटखा  भी  मिले , करते  बहुत  प्रयास |

गुटखा बिन  सब सून है , चेहरे    लगे  उदास ||525


दस का  गुटखा तीस में , युवजन  रहे  खरीद |

तम्बाखू    के नाम  पर ,  आधी   रहती  लीद ||526


बीड़ी   की  आदत  रही  , कंठ   रहे   है  सूख |

नहीं धुवाँ अब नाक से  , गायव   रहती भूख ||527


श्रमिक करें दिन रात जब , निष्ठा से सब काम |

स्वेद   बहाकर     हाथ   में ,  पाते    आधे  दाम ||528


श्रमिक भटकते काम को , जीने को मजबूर |

सरकारी  अनुदान  भी , उनसे   रहता   दूर ||529


बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |

नहीं  जहाँ  संदेश  हो , और  कथ्य  में   सार ||530


दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |

याद  सदा सबको रहे , मिटा  सके  वह. खोट ||531


जीवन  के दो पंख  है  , कहें  एक को  कर्म |

दूजा भी अनमोल है , जिसको कहते धर्म ||532


कठिन  शब्द  दोहा  रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |

देखा कुछ दिन  बाद  ही ,  दोहे  का  अवसान ||533


नहीं   आज  कुछ  काम  है ,  बेवश  है  मज़दूर |

सरकारी  अनुदान पर  ,  जीने   को    मजबूर ||534


बैठी  चिड़िया  सोचती ,     कहाँ   गए.  इंसान | 

चहल पहल कुछ भी नही , दिखता सब वीरान ||535


बैठ  डाल  चिड़िया  कहे , लगता  संकट  दौर  | 

मुझकों भी अब खोजना , आज सुरक्षित ठौर.||536


नही    रहेगी   आपदा ,     रहें    गेह   में   लोग |

समझ  गई  चिड़िया  अभी  , कैसे  भागे  रोग ||537


चिड़िया भी अब सोचती  , मन में आते ख्याल | 

महा      बीमारी    लगे  ,     कोरोना     जंजाल ||538


बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |

नहीं  जहाँ  संदेश  हो , और  कथ्य  में   सार |539


कठिन  शब्द  दोहा  रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |

देखा कुछ दिन  बाद  ही ,  दोहे  का  अवसान |540


दोहा   होना   चाहिए ,    मन   पर   करे  प्रभाव |

चिंतन  जिसमें  हो  भरा , मिटे कलुषता  घाव ||541


दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |

याद सदा सबको रहे , मिट  सकती  है  खोट ||542


दोहे  कितने  सहज  है ,  सबको   याद  कबीर |

साल  पाँच  सौ  बाद  भी ,  जिंदा   है   तहरीर ||543


अनपढ़ को भी  याद है ,आज.सुनो रसखान |

दोहे   है  इतने  सरल , सबकी   चढ़े   जुबान ||544


दोहे जन जन गा रहे ,   कविवर    तुलसीदास |

रामचरित मानस लिखा , भाषा सरल सुभास ||545


दोहा में  कुछ  बात  हो  , भाषा  सरल  सुजान |

हर  युग  दोहे  आपके ,   सबकी  चढ़े  जुबान ||546


मिलें समय से  पंख दो , करने को उत्थान  |

कर्म  कहा है  दाहिना ,  बायाँ  धर्म  सुजान  ||547

 पनिहारिन

पनिहारिन पग बढ़ रहे  ,गगरी कर से  थाम |

घूँघट  से  पथ  देखती ,नैन सजग अविराम ||548


मुख  चंदा  सा  जानिऐ ,   लेता  घूँघट  ओट |

जल पनिहारिन गाल पर ,करता सीधा चोट ||549


पनिहारिन  परिधान  है , रंग  मनोहर  पीत |

रुप  राशी बिखरी हुई ,   पायल  दे   संगीत  ||550


पनिहारिन की नासिका , गहरी लेती साँस |

श्रमकण तारे से लगे , मस्तक  से आभास ||551


लगे  गुलाबी  पंखुरी  ,   पनहारिन  के  होंठ  |

भौंह धनुष सम जानिऐ , मन पर करते चोट ||552

============


कोई जल भुन रह रहा ,  कोई जलकर राख |

चिन्ता लोगो की करे  , पल पल होता खाक ||553


अहम् बहम् को पालकर , खुद ही  लाऐ  रोग  |

यही सोच घर कर गई  , क्या कहते  है लोग ||554


बड़ा अज़ब इंसान है ,   मन  को  करें  मलीन  |

सोच रहे क्या लोग ,     चिन्ता   के.  आधीन. ||555


रोग बड़ा ही जानिऐ ,    क्या  कहते  है  लोग ? |

खुद पथ भूला आदमी , निज मन रखें कुयोग ||556


आज देश में फैलता ,  एक  वायरस  और |

दिखे धर्म के नाम पर , नफ़रत का भी दौर ||557


ऊपर  वाले  ने  दिया , जीने  का अधिकार |

नही धर्म  यह बोलता  , पैर  कुल्हाड़ी  मार ||558


सोच समझ कर कीजिए , घर  से कन्यादान  |

हित भारत का देखकर , दागो  अपने  ब्यान  ||559


नेताओं   को   गालियाँ , अज़ब चला है  रोग |

किया आपने कुछ कहाँ , चुप  हो  जाते  लोग ||560


बहुत  सुना  संसार  में , ऋषि  मुनियों  का ज्ञान |

मैल न  मन  का दूर है  ,  अब  ब्यर्थ  गंग  स्नान.||561


ज्ञानी हो यदि मद भरा , कुछ  पल  छाए  असर |

फिर दूरी है इस तरह , , ज्यों  चम्पा  सँग  भ्रमर ||562


आए प्रभु के व्दार पर , मन की ले अभिलाष |

शरणागत को शरण दो,  विनती करे सुभाष ||563


कोरोना  के  काल  में ,  मिलने   लगी   शराब |

सुनकर अब इस बात को ,खुश है कई जनाब ||564


बीड़ी  गुटखा  भी  मिले , करते  बहुत  प्रयास |

गुटखा बिन  सब सून है , चेहरे    लगे  उदास ||565


दस का  गुटखा तीस में , युवजन  रहे  खरीद |

तम्बाखू    के नाम  पर ,  आधी   रहती  लीद |566


बीड़ी   की  आदत  रही  , कंठ   रहे   है  सूख |

नहीं धुवाँ अब नाक से  , गायव   रहती भूख ||567


श्रमिक करें दिन रात जब , निष्ठा से सब काम |

स्वेद   बहाकर     हाथ   में ,  पाते    आधे  दाम ||568


श्रमिक भटकते काम को , जीने को मजबूर |

सरकारी  अनुदान  भी , उनसे   रहता   दूर ||569


बिन रस का फल जानिए , उस दोहे को यार |

नहीं  जहाँ  संदेश  हो , और  कथ्य  में   सार ||570


मिलें समय से  पंख दो , करने को उत्थान  |

कर्म  कहा है  दाहिना ,  बायाँ  धर्म  सुजान  ||571


दोहा हो यदि कुछ खरा , करता दिल पर चोट |

याद  सदा सबको रहे , मिटा  सके  वह. खोट ||572


जीवन  के दो पंख  है  , कहें  एक को  कर्म |

दूजा भी अनमोल है , जिसको कहते धर्म ||573


कठिन  शब्द  दोहा  रचा , किया प्रदर्शन ज्ञान |

देखा कुछ दिन  बाद  ही ,  दोहे  का  अवसान ||574


नहीं   आज  कुछ  काम  है ,  बेवश  है  मज़दूर |

सरकारी  अनुदान पर  ,  जीने   को    मजबूर ||575


बैठी  चिड़िया  सोचती ,     कहाँ   गए.  इंसान | 

चहल पहल कुछ भी नही , दिखता सब वीरान ||576


बैठ  डाल  चिड़िया  कहे , लगता  संकट  दौर  | 

मुझकों भी अब खोजना , आज सुरक्षित ठौर.||577


नही    रहेगी   आपदा ,     रहें    गेह   में   लोग |

समझ  गई  चिड़िया  अभी  , कैसे  भागे  रोग ||578


चिड़िया भी अब सोचती  , मन में आते ख्याल | 

महा      बीमारी    लगे  ,     कोरोना     जंजाल ||579


दोहो के वारे में -

दोहे   में     हो    गेयता ,   तेरह    ग्यारह   भार |

गण   पूरे   निर्दोष  हो , कथ्य   कहे   कुछ  सार ||580

,

तेरह    ग्यारह   जानते  ,  चार   चरण   का   ज्ञान |

पर कुछ समकल विषम का , रखते कभी न ध्यान ||581


समकल से समकल जुड़े , यही  विषमकल  खेल |

साथ   आठवी  यति  हो   , दिखता लय  से   मेल ||582


मात्रा  हो  यदि  आठवी ,  संग   नवम्  को  देख |

ग्यारह  बारह  भी  गिने ,  संयुक्त  न  होवे लेख ||583


पंचम.पष्टम यदि करें , आदि से यदि सुजान |

दोहे   की  लय में सुने , आ सकता  व्यव्धान ||584

------------;+-----

साहस  की आराधना  ,  और   एकता   नाम |

दीप निरंतर  यह  जले  ,   सबको दो  पैगाम ||585


दीप  जलाकर  दीजिएँ , जग  को  यह  संदेश |

भारतवासी    एक   है  ,   संकट   के   परिवेश ||586


भारत  में  यह  दीप  भी ,  करता  सदा  कमाल |

कहता रखिए   एकता  , अद्भुत जले  मसाल ||587


आज जगत भी देखता , भारत की  तासीर |

कोई कैसा युद्ध  हो ,  सभी वतन में    वीर ||588


जलता  दीपक  कह  रहा , भारतवासी  एक |

डटकर  करते   सामना ,  रखें   इरादा  नेक ||589


जलता  दीपक  जानिऐ , मन की सुंदर आश |

प्रेरक साहस का बने   , जो  नर  रहे निराश ||590


कोरोना  से  भी  बड़ा , बड़ा  भयंकर  रोग |

चिंतित रहता आदमी , क्या कहते है लोग |591


सबसे घातक रोग है , क्या  लोगो की सोच |

खोज खवर में आदमी ,    खा जाता है मोच |592


ह्रदय  बसी  तस्वीर है  , जो है मित्र  शहीद |

रक्षा करते जान दी , जिसके  सभी   मुरीद ||593


नूर चमकता जिस जगह ,आभा से भरपूर |

प्रणय निवेदन मानने , करे शलभ मजबूर ||594


सब रंग कच्चे जानिऐ , कुछ दिन रहे उमंग |

पक्का रंग हम मानते ,     देश  प्रेम का रंग ||595


होली  आई  देखकर ,    रोते   देखे  रंग |

होली दिल्ली हो चुकी , खूनी खेली जंग ||596


दादी अम्मा खेलती . , होली   के   रस   रंग | 

नाती   पोते   दे   रहे ,    उनको  नई   उमंग ||597


होली  पर रोते  मिले  , हमको  सुंदर  रंग |

राजनीति  ने  नष्ट  की , पूरी आज उमंग ||598


पहले  खेला  भूलकर  , खूनी   होली  खेल |

गले मिलन की बात अब , कैसे होगा  मेल  ||599


नेताओं  ने  फैलाई  ,   जहाँ  जहाँ  विष  बेल |

कह  सुभाष  कैसे  वहाँ , निकले रस का तेल  ||600 


जहाँ सड़क पर  फैलकर , वही खून की धार |

वहाँ  बैठ  रोदन  करे ,   होली   का   त्यौहार ||601


भाई  चारा  प्रेम  के ,      नष्ट    हुऐ   विश्वास |

अस्पताल में  होलियाँ , विस्तर पड़ी 'सुभास' ||602


कपटी  की  पहचान  है , आकर  पूछे  राज |

उसी राज को खोलता , देकर निज आवाज ||√603


सुन सभाष नादान  तू , दम्भी  को  मत  छेड़ |

एक दिवस वह खुद गिरे,   ज्यों खाई में भेड़ ||√604


काला  मन उजला करे , कब  गंगा  का नीर ?|

कागा  भी  कपटी  रहे ,  खाकर  मीठी खीर ||√605


शिल्पी ने पाषाण को , खुद ही दिया  तराश  |

फिर उससे ही बोलता , मुझमें भरो  प्रकाश  ||606


शिल्पी पत्थर  से कहे  , तुमको  दिया  तराश  |

बने आज भगवान तुम  , मुझमें भरो  प्रकाश  ||607


दीप यदि हो नेह का ,सँग  समरसता तेल |

बाती हो सद्भाव की ,अनुपम  होता  मेल ||608

---------------- 

शादी के कार्ड‌ दोहे

नेह निमंत्रण भेजता , विनय करूँ भरपूर |

घर में शादी काज है ,   आप न रहना दूर ||609


कृपा प्रभू की हो रही , घर  में  मंगल काज |

राह   देखता आपकी , सुनिऐ विनती आज  ||610


परिणय पाती भेजता , खुशियों की बौछार |

परिजन सहित पधारिऐ , करें नेह स्वीकार ||611


जहाँ  कृपा  हो राम की , सुंदर   होवें  गान |

मंगल परिणय गेह में , आओं अब श्रीमान ||612


जब तक बहती जानिऐ , भू पर गंगा धार |

सुखी रहे यह वर वधू , खुशियाँ रहे अपार ||613


अतिथि हमारे आप है , मै  सेवक  नादान .|

गृह  में  बेटी  काज है ,  दर्शन  दे  श्रीमान.||614


शादी  विटियाँ  जानिऐ , तभी  बजेगें  ढोल |

आप पधारे गेह मम , बने अतिथि अनमोल ||615

आँगन में मण्डप सजे , रक्षा करें गणेश |

आप  पधारे  गेह  मम , स्वीकारें  संदेश ||616

शिव जी ब्रम्हा  विष्णु का , सँग गणपति का ध्यान |

शादी  कारज  गेह  मम  ,     आओं   अब  श्रीमान ||617

पलक पाँवड़े डालकर,    देखूँ सबकी राह | 

आप पधारे गेह मम , बस इतनी सी चाह ||618

डी जे बजता गेह पर ,    जल्दी आऐं आप |

मंगल परिणय जानिऐ , सुंदर छिड़े अलाप |619

उड़ती  सुगन्ध गुलाव की , चहूँ दिशा में शोर |

दीदी  का परिणय यहाँ ,     घर में मंगल.भोर ||620

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-दाता कहते कृषक को , फिर भी वह लाचार |

खाद बीज  मौसम  कभी  , देता  उसे  प्रहार  ||621


वर्षा का जल याद है  , सँग  माटी का खेल |

बचपन की यादे बसी , वह आपस का मेल ||622


बालक  भोले जानिऐ  , रहते  सदा  निशंक |

कमल सरोवर में रहे ,  फिर भी  चुनता पंक ||623


काया मिट्टी जानिऐ , उसके ही सब खेल |

आज लपेटो खेल.में ,   कल उससे ही मेल ||624


मस्ती से पूरण रहे   , मिट्टी के सब खेल |

 लिपटाते थे  अंग पर ,जैसे   हो  वह  तेल ||625


मिट्टी पानी सँग हवा ,   बचपन मस्ती याद |

आनन्द और प्रेम का , अनुपम था वह स्वाद ||626


मिट्टी पानी तन लगा , बचपन की है याद |

दादी  अम्मा  डाँटती ,    कहती  तू  बरवाद ||627


आज शिखर पर जानिऐ ,जिनका कर्म महान |

सदा आचरण हो धवल  ,  संग में स्वाभिमान ||628

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छेकानुप्रास अलंकार -

हँस-हँस  लोट  लोटकर ,  देख  रही  नव नार |

मग में पग डगमग दिखें , घूँघट घट  है  भार ||629


चलती-चलती देखती , चलती चक्की नार |

चलती-चलती बोलती , यह चलता संसार ||630


रुक-रुक कर जो बोलते , सोच-सोच कर बोल |

खोज-खोज वह  बाँटते  , मधुर वचन अनमोल ||631


पानी-पानी   कर  रहे  ,  मिलकर  पानीदार  |

पानी  पर  पैसा बहा , पानी  दिखे   न  यार ||632


देख  देखकर  चल रहे , रुकते रुख  को देख |

कहते-कहते चुप हुए   , मन ही मन कुछ लेख ||633


धोते-धोते   गंग    में ,  तन    के   सारे    मैल |

मैल न मन  का धो सके  , भरा जो ठेलम ठैल ||634


धो  - धोकर   हैरान   है  ,  मैला   ठेलम   ठैल |

रगड़-रगड़ के बाद भी , ज्यों का त्यों मन मैल 635


वृत्यानुप्रास अलंकार -

साधू  का  मन  देखकर  , निज  मन  रहा न मैल |

मन  मन्दिर भी शुचि लगा , संग दिखा मन शैल ||636


उतरा  पानी  मुख  दिखा , सुन  पानी  की  बात |

लाखों  का  पानी बहा , कागज  पर  दिन  रात ||637


लाटानुप्रास अलंकार -

अभिनंदन ने कर दिया , अभिनंदन का काम |

अभिनंदन भी पाक का , करके  काम तमाम ||638


निर्मल का निर्मल ह्रदय  , निर्मल मन का नीर |

निर्मल  वाणी  मुख  झरें , हरती तन मन पीर ||639


अन्त्यानुप्रास अलंकार 

कामी भँवरा कह गया , कुसुम कली  के  द्वार |

सुखमय संध्या सेज की , सजे  तेरे  सुखसार ||640


लोभी भँवरा लौटकर , कहे   कली के  कान |

रस पीने फिर आऊगाँ , रखना इतना ध्यान ||641


मादक  हैं नारी  नयन ,  नचते  हैं  ज्यों  मोर |

उन्हें कमल को मानकर , भँवरे है उस ओर ||642


श्रुत्यानुप्रास अलंकार -

श्याम सरोवर वर दिखें , सुमन सलोने नाथ |

सतरंगी   चंगी     रहे ,   मुरली   दोनों   हाथ ||643


कंचन काया कामनी , कुसुम कली कचनार |

लोभी   भँवरे  भागकर ,  आए  उसके  द्वार ||644

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इस कोरोना काल  में ,  मिलती  खूब   शराब |

धन्यवाद  सरकार  का , खुश  है  कई  जनाब ||645


बीड़ी  गुटखा मिल रहे  , थोड़ा लगे   प्रयास |

दस का मिलता तीस में , सच्ची कहे  सुभाष ||646


सूखी  जर्दा     देखते  , युवजन    रहे    खरीद |

तम्बाखू    के नाम  पर ,  आधी   रहती  लीद ||647


बीड़ी   की  आदत  रही  , कंठ   रहे   है  सूख |

नहीं धुवाँ अब नाक से  , गायव   रहती भूख ||648


नीति  बचन  सब  कहें ,  पर  पथ  है  सुनसान |

कहने   बाले   वहाँ   दिखें , जहाँ   नहीं   ईमान ||649


कोरोना  ज्यादा  पढ़ा , और लिखे खुद छंद |

त्राहिमाम् मन कर उठा , कलम हो गई  बंद ||650


पोस्ट पटककर चल दिए , खुद की समझें तोप |

आना   जाना  है   नहीं ,  फिर   भी   चाहें   होप || 651


सखी कहे राधा सुनो , किस रँग से है प्यार ?| 

राधा  बोली श्याम रँग , मेरा  मन  आधार ||652


राधा  बोली  श्याम  से , है   होली  त्योंहार |

अपना निज रँग छोड़ना , मेरे मन के व्दार ||653


श्याम  कहे  राधे  गुनो ,  मेरा  रँग  है   स्याह  |

राधा  कहती स्याह में , सब रँग छिपे अथाह. ||654


छवि  बसती  है  नैन में , अंग अंग है  श्याम |

राधा कहती श्याम रँग , लगते मुझको धाम ||655


होली खेले श्याम जी   , राधा जी के साथ |

नैनो  से  रँग  डालते  , पकड़े  दोनों  हाथ ||656


श्याम  कहें  राधा सुनो , होली है रस रंग  |

राधा बोली  श्याम  तू , मेरी.सदा  उमंग  |657


रंग महकता केसरिया ,     फूले  टेसू  फूल.|

होली खेलन चल पड़ी , गोपी यमुना कूल |658


रंग लेकर के गोपियाँ , करती हरि की खोज |

हरियाली में हरि छिपे ,       देख रहे है.मोज |659


हँस हँसकर गोपी  कहे , सुनिऐ नंदकिशोर |

मै होली पर आ गई ,       सुनिऐ मेरा शोर ||660


गोपी हँसकर कह रही , लल्ला अब क्या नाम  |

इस होली  की  मार  में   , सतरँगी   घनश्याम |661


गोपी  मिल  मंथन  करें , हँसी  करुँ  या  क्रोध |

कान्हा फोड़त गगरी ,         अंतरमन में शोध ||662


सखी छीनकर बाँसुरी , कहती सुन लो श्याम |

पहले वादा कीजिऐ ,            सुर में मेरा नाम ||663


मिलजुल कर गोपियाँ ,   रही कृष्ण को हेर  |

नचा रही नँदलाल को , चार तरफ से  घेर .||664


मधुर  गीत  जीवन  रहे , संग   रहे   उत्साह |

दया  भाव  उर  में  बसे , वहाँ प्रगति हर राह ||665


महाशिवरात्रि पर्व 

महाकाल दरवार में , शीश झुकाता आज |

महादेव  पूरण करें ,   बिगड़े   मेरे    काज ||666


शिव ही पालनहार  है, शिव ही जग का नाम |

महादेव शिव जानिऐ, शिव ही सुख  के धाम |667


गिरी हिमालय शिव रहें , माँ गौरी के साथ |

भक्त  उन्हें  भोले कहें ,  माने  अपना  नाथ ||668


महादेव जी आपका , मै  सेवक  नादान |

करूँ भाव से अर्चना , तेरी कृपानिधान ||669


माँ गौरी को मानता   , पिता श्री महाकाल  |

जिस घर मंगल मूरती,  पुत्र गणेशी  लाल ||670


नही  नौकरी  खेत भी  , और नही व्यापार |

पहले आकर लीजिऐ , शादी का सब भार ||671


मम गृह शादी काज है , लखूँ आपकी राह |

आप पधारे प्रीति सँग , बस इतनी है चाह ||672

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जय किसान नारा सुना , देशप्रेम अनुराग ||

खेतों में हल  हाँककर , युवक ले रहे भाग ||673


रतन रहे दो बैल है ,     दादा जी के दौर |

खेत जोतने जानिऐ  , यही रहे शिरमौर ||674


हल  बैलो  के  साथ में , यदि  है  खड़ा  जवान |

निश्चित अब यह मानिऐ ,       होगा अभ्युत्थान ||675


आदर सम्मुख यदि मिले , पीछे यश गुणगान |

वही  नाम  जग में  चले ,     जो  पावें  सम्मान ||676


सुधा तुल्य माँ दूध की , जो रखते  है  लाज |

जन्नत उनके दर रहे  , आदर  करे   समाज ||677


मात  शारदे नाम पर ,  कुंठित करें  दुकान |

खुद को समझें तोप वह  , दूजों को  नादान ||678


खुद को ही घोषित किया , हम  ही  है गुणवान |

बाकी  मूरख  मानते,       भले  दिखे   श्रीमान ||679


चूल्हा  रोटी  यदि मिले , सँग  में  सरसों  साग |

मक्खन भी हो साथ में , समझें   सुखद  पराग ||680


चूल्हे की रोटी सदा , अनुपम  देती  स्वाद |

दादी जी के हाथ की , रोटी अब तक याद ||681


भारत माँ मम शान है ,  माने    देवी   रूप |

हाथ तिरंगा देखकर , लगती बड़ी अनूप ||682


भारत माँ के लाल हम , गिनती   सवा करोण |

हाथ  तिरंगा थामकर  ,    देते  दुशमन  तोड़ ||683


ध्वज है मेरे देश का , जिसका जन गण गान |

हर रँग में  संदेश है , चक्र  प्रगति  की   शान ||684


केसरिया रँग त्याग का , श्वेत  प्रेम का गान  |

खुशहाली कहता हरा , चक्र विजय पहचान ||685


 #दोहा_पहेलियाँ

पर्त चढ़ी है  पर्त पर , धवल  बनी  है  गाँठ ||

मिले सभी का नेह भी , सबसे उसकी साँठ.||(प्याज)686


लाल  रंग  मोती  भरे , मीठे  फल  का नाम |

रसमय दाने हम चखे , शीतलता अविराम  ||(अनार)687


एक पुष्प  इक फल दिखे , जोड़े  दोनों नाम |

बना सुखद मिष्ठान है ,  उत्तर दो अविराम ||

(गुलाव जामुन )688


लाल रंग का किला है ,  सबका  कहे  विवेक |

मृदुता से है पिलपिला , सैनिक जहाँ   अनेक ||

(टमाटर )689


फल , व्यंजन में नाम है , दोनो रुचिकर मेल |

इक मीठा इक चटपटा , है  त्रय मात्रा खेल  ||(सेव)690


हरित सीप , मोती भरे  , मृदुता भरी अटूट |

तोड़े से बिखरें सभी ,  रहती  उनको  छूट ||(मटर फली )691


खुद उसके ही नाम से , उसको किया सलाम |

दे आया जो पाक को ,     भारत   का  पैगाम ||-अभिनंदन692


हरे  रंग  छतरी   दिखी  ,  बूड़ी  दिखती  लाल |

पिसकर चढ़ती जीभ पर ,   झन्नाते  है  गाल ||(मिर्च )693


गिनती बारह राशि में ,  उनमें  से  है  एक |

उल्टा करके पढ़िऐ , मिले रकम तब नेक || मकर (राशि) 694


चार खूँट का चादरा , जिसका छोटा रूप |

रखते   जेबों में  सदा , रँक  होए  या  भूप ||( रुमाल )695


आप गुणी पहचानिऐ , कौन राशि में गान |

उल्टा सीधा देखिऐ , रहती   एक समान ||कर्क (राशि)696


हरित रंग रानी दिखी , बच्चे दिखे सफेद |

सब्जी की है मालकिन ,  इतना देता भेद ||(-भिंडी )697


लगी  सभी के चेहरे , है  नाजुक  नादान |

ऊपर नीचे नाचती , लो इसको पहचान ||( पलक)698


तीन मात्रा सृजन करें , आनन के दो अंग |

खाई दोनों  अंग है , मारग  जिनका  तंग ||(नाक कान)699


बापू की है पुण्य तिथि , दिन शहीद है आज |

नमन करें शतवार हम ,जिन्हें देश पर नाज ||700


मात्  शारदे  अवतरण  ,  वर्णन  करते   संत |

हम सब नतमस्तक करें , अर्पित पुष्प अनंत |701


वंदन करता आपका ,  हे   ऋतुराज  बसंत |

माघ शुक्ल की  पंचमी ,महिमा बड़ी अनंत ||702


आज निराला जयंती , सुखद साथ त्यौहार |

बागों में बिखरा हुआँ ,  फूलों का  उपकार ||703


आऐ है  ऋतुराज अब  ;  फूले  फले  पलाश |

शीत शयन करने लगी ; सुखद बसंत सुभाष ||704

            

पीली पगड़ी आप पर  ; शोभित है ऋतुराज |

स्वागत  बंदन  चंदन  ; हर्षित सकल समाज ||705

             

नेह निमंत्रण मानिए  , विनय करूँ भरपूर |

ऋतु वसंत जी आप अब कभी न जाना दूर ||706


कृपा प्रभू की हो रही , घर  में  हो शुभ आज |

ऋतु वसंत का आगमन , मंगल करता  काज ||708


ऋतु वसंत लगती हमें   , खुशियों की बौछार |

मंगल यह करती सदा    , करें नेह   स्वीकार ||709


जहाँ  कृपा  हो राम की , सुंदर   होवें  गान |

ऋतु वसंत हो  गेह में , आओं सब श्रीमान ||710


काँव  काँव   कागा   करे ,    बैठा   प्रात:    मुड़ेर |

अतिथि आगमन  हो रहा ,   तनिक न समझो देर ||711


कुत्ते   रोऐं   रात   भर ,   आप  रहें   हैरान |

अनहोनी कुछ घट रही  , पूरा  है  अनुमान ||712


निकले अच्छे काज को , भरे कलश का दर्श |

सुनो सफलता हाथ है ,  मन   में  रखिऐ  हर्श ||(हर्ष)713

                                     

 कन्या चलती राह में ,  कहीं  तुम्हें  ले  घूर  |

 अनुकम्पा माँ की हुई , सभी  मनोरथ  पूर ||714


नीलकंठ का दर्श है ,  दिवस दशहरा  जान |

 सभी अमंगल हट गऐ, निकट मिले सम्मान ||715


 दिखे बैल  मोटा  अगर , सपने की  हो  बात |

  सस्ता गल्ला जानिऐ ,  सुलभ रहें दिन रात ||716


मोती   देखा  चमकता ,  बेटी  का  आभाश  |

बेटे    का   संयोग   है ,सपना यदि आकाश ||717


देखा  सपना  आपने , है  चावल  का  ढ़ेर |

फल इसका यह जानिऐ ,मिटे शत्रु से बैर ||718


पूजा करते स्वयं दिखे , सपने आऐ संत |

नष्ट पुरानी हो रही ,  सुनो समस्या अंत ||719


हरा  भरा  जंगल  दिखा ,    है  सपने  का  राज |

खुशियाँ अब घर आ रही ,सफल सभी है काज ||720


दरवाजा घर का खुला ,सपना बड़ा बिचित्र |

फल इसका यह जानिऐ , नया  बनेगा मित्र ||721


सपना  देखा  आपने , उठता  धुवाँ  गुवार |

निश्चित हानी हो रही , जो  करते व्यापार ||722


छप्पर  टूटा देखना , है  अचरज  की  वात.|

गड़ा हुआँ धन योग है , तुमको आधी रात ||723


दिखे सिंहनी सिंह सहित , सपन न जाना भूल |

शादी  जीवन  मधुर  है ,  और  सदा  अनुकूल ||724


आसमान में उड़ रहे ,     सपना है सुखकार |

मिटी मुसीवत जानिऐं , शिर से उतरा भार ||725


चंदन देखा आपने ,         सपने में सत्कार |

समाचार शुभ आ रहे , समझों अपने व्दार ||726


कैची  देखी आपने , चमक   रही  है  धार |

कलह आगमन जानिऐ , आप रहें  तैयार ||727


माँ सपने में आ गई ,      समझो   सुंदर गान | 

यश बैभव बढ़ता मिले , और साथ सम्मान ||728


बिल्ली  सोना  बाढ़ भी , सपने  में  हो दर्श |

धन  हानी  संकेत  है ,    तीनों   हरते   हर्ष ||729


कीचड़ सपने में लखा , चिंता  की  है  वात |

दामन रखिऐ साफ तुम , दुश्मन देगा घात ||730


साँप देखकर जानिऐ , धन मिलने के योग |

यह सपना सुखमय लगे , घर में भोगें भोग ||731


जूता  छोटा  पहनना , यह  सपना  बेकार | 

पर नारी झगड़ा करे ,    वेमतलव की रार ||732


देख  रुई  के  ढ़ेर  को , होवें  आप  निरोग |

सपने का फल बोलता , घर में सुंदर योग ||733


पकी फसल को देखना , रोटी खाऐ आप |

सपना सुंदर मानिऐ , घर में धन की थाप ||734


किसी मृतक से बात की , सपना सुंदर मान |

मनचाहा  पूरण  हुआँ , बढ़ा  आपका  मान || 735


स्वर्ण देखना हानि है ,     रजत वहाँ पर लाभ |

तीर धनुष पर यदि चढ़ा , सपन है आभताभ ||736


सपने में शव देखना , सुनो सगुन की वात |

बीमारी अब भागती ,   उजली होगी रात ||737


सपने  में  चूड़ी  दिखे ,    जागे  उससे  राग |

घर में खुशियाँ आ रही , मिटा कष्ट के दाग ||738


चन्द्र चमकता देखना , सपने की सच वात | 

मान मिलेगा आपको ,   बनकर के सौगात ||739


लाल पुष्प खिलता लगे  , सपना देखे आप  |

किस्मत है अब जागती , लेकर नूतन छाप ||740


झरना कल कल बह रहा , पानी दिखे अनंत |

सपना यह  है बोलता , सुनो  दुखो  को  अंत ||741


शुभकामना दोहा विधा में  🌹

लाख  बधाई  भेजता , जन्म दिवस पर मित्र |

मिले सफलता जगत में,  महके हर पल इत्र ||  742


मन से भेजी भावना , जन्म  दिवस पर आज |

जीवन पथ की राह में , सभी सफल हो काज ||743


आज अवतरण आपका , मंगल गाता गीत |

भेजी  है  शुभकामना ,   रहे  हाथ  में  जीत ||744


आज दिवस है आपका , सचमुच में अनमोल |

जन्म दिवस  मंगल  रहे ,   बजे  सुहाने  ढोल ||745


बर्षगांठ शुभकामना , पाणिग्रहण की याद |

आप युगल प्रमुदित रहे , जीवन के शृंगार ||746


साथ बधाई भेजता  ,  जिसे   करें स्वीकार |

दाम्पत्य सुखमय रहे  , घर  में  सदा  बहार  ||  747


पुष्पगुच्छ. मै  भेजता , और  साथ  मनुहार  |

महको पुष्पों  से सदा , मिले सफलता काज ||748


बर्षगाँठ  है  मिलन की  ,  बने परस्पर मीत  |

भेजी  है  शुभकामना , सदा रहे  अब जीत ||749


दो  का  दो  से  गुणनफल , आता  पूरा  चार |

पर तुम दोनों के मध्य  ,  खुश्बू  बने   हजार ||750


जन्मदिवस शुभकामना , कर लीजे स्वीकार |

मंगलमय हो हर दिवस ,खुशियाँ रहे अपार ||751


भाव पुष्प की माल है , जन्म दिवस पर आज |

अनुकम्पा हो ईश की , सफल मनोरथ काज ||752


नेह नूर सबका मिले ,     सुंदर  हो  परिवेश |

जन्म दिवस शुभकामना , देता आज विशेष ||753


खुशियाँ बरसे नव सदा  , हर दिन हो त्यौहार |

जीवन के सब सुख मिले , सुंदर सुखद विचार ||754


मंगल करता कामना , खुशियाँ मिले अनेक |

सदा साथ हो आपके ,  विद्या  विनय  विवेक ||755


सुखमय जीवन आपका , रहे परस्पर गान |

देता  हूँ   शुभकामना ,  रहे   सदा  सम्मान ||756


राम सिया सा प्यार हो , जोड़ी राधे श्याम |

गौरी शंकर से रहें  , घर भी हो सुख धाम ||757


जन्म जन्म का साथ हो , रहे साथ में प्रेम |

जीवन में आनंद हो , रहे  कुशलता  क्षेम ||758


रहे परस्पर प्रेम का ,        आपस में विश्वास |

सुख दुख में साथी रहो , नित नूतन उल्लास  ||759


जीवन पथ में आपका , रहे   परस्पर.  साथ |

धर्म कर्म में रुचि रहे ,  सुयश रहे  अब हाथ ||760


दाता.   लीला जानिऐ ,  मंगल   है  उपकार |

धनी सुदामा बन गया ,अंतस किया निखार ||761


एक शहीद परिवार के भाव -किसने क्या कहाँ

मॉ~आया  मेरा  पूत  है  ;    भारत  मां  के  काम |

      धन्य कोख मेरी हुई ; अमर किया जब नाम || 762


बहिन~ बहिन थाम राखी ,कहे  ; इसका है बड़भाग |

             भैया ने बतला दिया ;    देश प्रेम  अनुराग ||763

                               

पिता~ गर्वित  मेरा  माथ  है  ; है  बेटे  पर  नाज |

            मेरे घर का लाड़ला ; बना शत्रु पर बाज.||764

          

पत्नी~ मरे नही पत्नी कहे    ; मेरा  अमर  सुहाग |

           बनी सजनियां वीर की ; धन्य हमारे भाग ||765

                                 

भाई~अनुज कहे मेरा अग्रज ; मुझको देता  काम |

          मै भी उसके पथ चलूँ ;   जीवन  मॉ के नाम ||766

                                  

बेटा~ बेटा बोला पद चिन्ह ; पिता मिलें अविराम |

        वह भी देखे स्वर्ग  से    , कर लूँ  ऐसा  काम ||767


बेटी ~कफन तिरंगा मै रखूँ ; जब जाऊँ  ससुराल |

         यह दहेज मेरा रहे ;   जिसको रखुँ सम्हाल.||768


मित्र - जब तक मै जिन्दा रहूँ ; ह्रदय रहेगा मित्र |

         प्रेरक  हो  भारत में  ;   रहे  नाम  में  इत्र ||769


नगरवासी - याद   रखे   पूरा   नगर ; बेटे   का   बलिदान |

          मिलजुल इस परिवार का ;सभी रखेगे ध्यान ||770


ज्ञान न पाता आलसी , धन  मूरख  को  भार |

निर्धन तरसे मित्र को ,कपट न सुख आकार ||771

 

विद्या पढ़े न आलसी ,  धन  मूरख को धूर  |

निर्धन तरसे मित्र को ,सुख.   अमित्र से दूर ||772

                  

आलस नर का शत्रु है , श्रम को समझें मित्र |

नही परिश्रम दुख सहे ,   श्रमकण बनते इत्र ||773


साक्षात  गुरु  मानिऐ ,  ब्रह्मा     विष्णु   महेश |

परम पिता गुरु जानिऐ  , नमन करूँ गुरु वेश  ||774


परम ब्रह्म गुरु मानते  , गुरु ही तीनो देव |

ब्रह्मा शंकर विष्णु है ,   करूँ गुरू की सेव ||775


मातु-पिता ,भ्राता -सखा , विद्या धन है नाम  |

सर्वे  सर्वा जगत के   ,   तुमको करूँ प्रणाम ||776


मातु पिता मम हो सखा , विद्या धन के रूप |

भ्राता  मेरे  आप  ही ,       हो  सर्वज्ञ  अनूप ||777


बोझा  ढोता  आदमी , गर्दभ  बने  सवार |

दान  भिखारी  बाँटते , दानवीर   लाचार ||778


कम्वल ओढ़े जेठ में , लू चलती  है शीत |

पंडित जी का घर चले ,चेले की ले नीति||779


सच सुभाष यह मानता ,पश्चिम निकले भान |

हिंदी   से एम ए  किया,  फिर भी है  नादान ||780


कविता सविता सी बने , या गंगा  सा नीर |

तन  मन  को  छूती  हुई , हर ले  पूरी  पीर ||781


सब कोई कविता सुने , कविता गुनें न यार |

एक वार कविता गुनें ,  मिले  ज्ञान भण्डार ||782


कवि भी, रवि सा जानिऐ , कहे तथ्य की बात |

बर्ना कपि ही, मानिऐ , उछल  कूँद  दिन  रात ||783


मथकर घृत ऊपर दिखे , है कविता का रुप  ||

कविता  वह  कैसे  करें , जो  तुकबन्दी  कूप ||784


सखी कहे   तू श्याम से ,कितना करती प्यार |

राधा  कहती  नाप ले ,     जितना  है  संसार ||785


छवि  बसती  है  नैन में , रोम  रोम  में  श्याम |

राधा कहती श्याम पग , लगते मुझको धाम ||786


मुहावरा दोहे

आवश्यकता पर मिले , राशी प्रतिशत एक |

जीरा मुख है ऊँट  के   , बोले  लोग  अनेक ||787


रार  मिटाने   थे   चले ,   कर  बैठे  बकवास |

प्रभूभजन को छोड़कर , ओटन  लगे कपास ||788


मिले सबल को यदि सजा , सँग निर्बल का योग |

गेहूँ  के  सँग  धुन  पिसा ,   कहते  है  तब  लोग ||789


वादा करके तोड़ दे ,   मुख  मोड़कर  जाए | 

दिखा अँगूठा है दिया , यहि समझ में आए ||790


मिले सहारा दीन को ,  उसकी करे सहाय  |

अंधे की लाठी बने ,सबको यह  दिखलाय  ||791


मतलब अपना देखकर , करते है जो बात |

उल्लू सीधा बह करें , सबको लगती घात ||792


बिन प्रयास का धन मिले , दिखे न कोई देर |

घर  बैठे  तब  लग  गई ,  अंधे  हाथ  बटेर  ||793


विना विचारे जो चले , करते निज नुकसान |

पैर  कुल्हाड़ी   मारकर ,   कहलाते    नादान ||794


जिद्दी  हो यदि  आदमी ,  रहना  उससे  दूर |

ज्ञान वहाँ खामोश है ,    कुंठा   है    भरपूर ||795


पग बजते है नार के , घुँघरू है खामोश |

नैना करते बात है , मुख लगता बेहोश ||796


कहे शरावी अब सुनो , छोड़ो बोतल जाम |

नशा  नैन  से  आ  रहा , मिले बड़ा आराम ||797


हाथी विल में छिप रहा ,  मूषक   घूमें  आम |

हिरणी करती छल यहाँ ,काग जपे   श्रीराम ||798


गूगल जी अब  गुरु हुऐ ,  पाते  है  सम्मान |

ज्ञाता  लगते जगत  के , बाकी सब नादान ||799


आगे  हम  सबसे कहें , रहें  निकट अब हर्ष |

मंगलमय सबको रहें , अब‌  यह  नूतन  वर्ष ||800


मन मलीन कपटी ह्रदय , धवल पहनते वस्त्र |

जहाँ  जमी   है  गंदगी ,  करे  वहाँ  क्या  इत्र || 801


कीड़े  खाकर  छिपकली , छिपी राम के चित्र |

बदल न पाया आचरण ,    बदला नही चरित्र  ||802


दुश्मन  आया  काम  है ,  दगा  दे  गए  मित्र |

का़यम रखना दुश्मनी,  कहता  बात  विचित्र ||803


कंचन  सी  है  सभ्यता ,  यदि  हो  मीठे  बोल |

हीरे का  तो मोल है , पर  यह  सच  अनमोल ||804


संस्कार    से  आदमी    , देता  अपना   भान |

सुखद आचरण का सदा , जग करता है गान ||805


संकल्प सदा ही  लक्ष्य  ,  करता  शर  संधान |

साहस. से  चीटी  चढ़े ,  हम सब  करते  गान ||806


दुखी जनों‌ में दुख भरा , सुखी करें सुख बात |

ज्ञानी   बाँटे   ज्ञान   ही  , अवगुण  देते   घात  ||807

अमर रखे  साहित्य ही , युग युग का इतिहास |

कीर्तिमान  भी  विश्व  के , रहते  उसके  पास ||808

वही  सुनाता  आदमी , जिसका   जैसा  राग |

धेनू  देती   दुग्ध   है ,  जहर   उगलता   नाग ||809

जीवन में  सुख  दुख मिले , उसे करो स्वीकार |

दुख तो काली रात है ,   दिन है   सुख  बौछार ||810


बात  हजम होती नही ,   चुगलखोर  में  नाम. |

निजी प्रशंसा खुद करें , अभिमानी सब काम ||811


दौलत  पाकर जो चले , सदा   पाप  की राह |

नही चैन उनको मिले  , रहे   ह्रदय  में   दाह ||812


विभावना अलंकार

दमकत लली के रुप से,  चंदा का आभाश |

नथनी के नग नूर से ,       तारे करें प्रकाश ||813


काग  बजाते  सारँगी ,  कोयल  पीटे  ढोल |

सूरज की कीमत नहीं ,  दीपक  लेते  मोल ||814


शेर गुफा   में  छिप  रहे  , करे   लोमड़ी  शोर |

बिल्ली  बिल  से  देखती , मूषक  है  शिरमोर   ||815


उड़ते अब आकाश में , पशु भी लेकर पंख |

और  दबाए   चौंच  में , कागा  फूँकत शंख ||816


नागनाथ  जी  संत  है ,  बगुला  बना  महंत  |

आगे मूषक जी चले ,  दिखे  हिरण जी अंत  ||817


राजनीति  परिवेश में ,  मेढ़क  दिखते  चंग  |

गधे  बने  सरपंच है ,      कागा  बदले  रंग ||818

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श्याम  सलोनें लग रहे , राधा जी के साथ |

अधर लगी मुरली बजे , पकड़े दोनों हाथ ||819


श्याम  कहें  राधा सुनो , मन  तेरा मनुहार  |

राधा बोली  श्याम  तू , मेरा  मन  आधार ||820


सूर्य  गमन उत्तर  दिशा , लेकर   शुभ   संदेश |

सुखी रहें सब जीव अब , सुखद दिखे परिवेश ||821


शीत  काल  का  अंत  है ,   आगे  दिखे  बसंत |

सुखमय हो जीवन सदा , खुशियाँ मिले अनंत ||822


मकर  राशि  में  कर  रहा , सूरज  जहाँ   प्रवेश |

मंगलदायी   फल    रहे ,        मेरे   भारत   देश ||823


पंजाबी  है   लोहड़ी    ,   बुड़की   भी   बुन्देल | 

हर हर गंगे सब करें ,     तन पर तिल का तेल ||824


नाना  बिधी  से  तिल  के ,   बनते  है  पकवान |

हर्ष    हिलोरे   मारता  ,  अर्घ   सूर्य    भगवान ||825


मधुरस नयनों में भरा ,   अनुपम  रति  शृंगार |

भ्रमर कहें वन में खिली ,अभी कली कचनार ||826


सजनी  सँवरें रात  दिन , साजन  है  परदेश |

कहती प्रीतम  घूमते  ,   धरें  भ्रमर  परिवेश |827


गोरी  लगती  मोरनी ,  नयन लगे  चितचोर  |

चढ़े धनुष पर तीर सी ,  काजल की है कोर ||828


देवालय सी माँ  लगे  , अनुपम  माँ अनुराग  |

शब्द  नही  ऐसे बने ,   वर्णन  कर दे  त्याग ||829


माँ  संतानो   के  लिए ,  इतना करती त्याग   |

त्याग  मूरती  माँ  कहे ,  ममता  लगे  पराग   ||830


माँ  की  ममता  छाँव है  , लगती  बड़ी अनूप  |

शीत  लगे  वह  जेठ  में ,  पौष  माह   है  धूप ||831


माँ  की  महिमा जानिए , माँ  पद  प्रभू समान |

आते ही जग में यहाँ  ,   माँ  ही  पहला  ज्ञान ||832


रख देती है  माँ  सदा , जब- जब शिर पर हाथ |

मिले  सफलता काज में ,    ऊँचा  रहता  माथ ||833


उसका भी यश फैलता , उसको मिलता मान  |

विनय करे माँ की सदा , रखता उसका ध्यान ||834


उसका भी यश फैलता , जिसका परहित गान |

मीठी  वाणी   बोलकर   , दया  भाव  दे   दान ||835


शारदे माँ शिवानुजा ; है पद्यनिलया शान |

चन्द्रलेखाविभूषिता ;  विद्याधरा  मां गान || 836


मां 'ज्ञानमुद्रा' 'वरप्रदा' ,  'महाफला'  है शान  |

'सुधामूर्ति'  हे 'शारदे' , कृपा  दे  'गुणनिधान'  ||837


"'शिवानुजा' 'वीणापाणि ',   है 'पद्यनिलय शान |

'चन्द्रलेख'  से विभूषित ' ; 'विद्याधर " मां गान ||838


'ब्रम्हजाय' माँ ' जानिऐ ,  मात् 'मालनी'  नाम |

'श्वेतानन';मां 'सौम्या' , 'विमला'   'विद्याधाम' ||839


'ज्ञानदायनी ' मात है   , 'बैष्णबी'    है   नाम |

'अज्ञानतिमिर' भंजनी ,आनन   तीरथ  धाम.||840


"ज्ञान शक्ति' 'माँ जानिऐ ", "हंसासना"  सुनाम |

"चंद्रिका" गुणी पूजिका " , "महाफला" है धाम.||841


"महामायनी " "महाभद्र " ,"महागुणी " अवतार |

"विद्यारूपा"मां " शारदे " , "गोमती" ओमकार  ||842


"श्रीप्रदा" नमो "मालनी" ,      सुभाष  तेरा  दास |

 " रमा" "परा" माँ को कहें ,सँग कान्ता"  प्रकाश ||843


मां है "पातकनाश्नी" ."     जो लेते है  नाम |

"महोत्साहा"  जानिऐ ; है "सौम्या  ' सुधाम  ||844


"चित्राम्वरा" "भारती";  "श्वेतानन"  मां   रंग |

 "महापाश " विद्याधरा' : 'सुवासिन' मां उमंग ||845


"महाकार माँ को नमन,  "महाभुजा" भी नाम  ||

"चंद्रबदन माँ को कहे  , ". विद्यारूपा"   धाम ||846


भूलचूक हो कही भी  , गुणियों  पढ़े सुधार |

उसके पहले मात भी ,    क्षमा देय उपकार ||847


प्रथम किरण नववर्ष की , हर्षित हो सब गान |

यश  वैभव  सुख सम्पदा , बढ़े  आपका  मान ||848


वीरो का  भूषण  क्षमा , सँग  में  है  शृंगार |

क्षमा भाव जो मन रखे,  देव तुल्य वह यार  ||849


सोना चढ़ा  सुहाग  है  , क्षमा  करे बलवान |

उसका ही यश फैलता  , गाते सब गुणगान.||850


कभी समय पर भी क्षमा ,देती फल अविराम |

जाल  काटने  शेर  का ,  मूषक  आया  काम || 851


महिमा गुरु की जानिए,  , पद है  प्रभू समान |

गुरू करे  जीवन शुरू ,   देकर  सच्चा   ज्ञान ||852


रख देते है गुरु सदा ,  जिसके शिर पर हाथ |

यश मिलता जग में उसे, उन्नत  रहता  माथ ||853


पाप पुण्य के कर्म  फल  , देते  सुख  संताप |

पुण्य सदा सुखकर लगे ,  देय  खिन्नता  पाप 854

       

पाप पुण्य पर तुल रहे ,  करम सभी  दिन रात |

भाव वचन  बनते  करम, कौन  समझता  बात  ||855


हम  कोल्हू  के  बैल  से ,  घूम  रहें  दिन  रात |

दुनियादारी  झेलते ,          सहते   रहते  घात ||856


दोहा  मधुरस जानिए  , घुलता  जिस  मिष्ठान |

खोता  व्यंजन में नही  , अपनी  निज पहचान ||857


बगुला  पण्डा  कब  बने ,   संतो  की  सुन बात  |

मछली  पर  वह  चौंच  से , करता  रहता  घात ||858


लगता अच्छा  है नहीं,   खल  को सच्चा  ज्ञान |

बस मतलब की बात पर , उसका  रहता ध्यान ||859


गुनियाँ  ग्राहक  यदि  मिले , वहाँ  दीजिए  ज्ञान |

देने  मूरख   को   चले   ,    खतरे   में    सम्मान ||860


सभी  धुरंदर  है  यहाँ ,   कौन  दिखे  कमजोर | 

दोहो के  ज्ञानी यहाँ  , कविगण  सब  चितचोर ||861


आवे ज़मज़म गंग जल , दोनों  पावन नीर |

दोनों ही अनुपम लगें ,  दिखें  एक  तासीर ||862


आबे ज़मज़म गंग जल , दिखे एक सी बात |

दोनों  में  ही  जानिए ,   रहवर  की  सौगात ||863


सरल दिखे जीवन कहीं , कहीं दिखे विकराल |

साहस है यदि पास में , हल   है  सभी  सवाल ||864


दाता  लीला जानिए   , प्रभू    करें  उपकार |

धनी सुदामा बन गया ,  अंतस  हुआ निखार ||865


कंचन काया  कामनी , कपटी कूप  कपूत |

इनसे धोखा कब मिले ,  जाने कौन सपूत . ||866


मधुरस नयनों में भरा ,   अनुपम  रति  शृंगार |

भ्रमर कहे वन में खिली  अभी कली कचनार ||867


सजनी  सँवरें रात  दिन , साजन  है  परदेश |

कहती प्रीतम  घूमते  ,   धरें  भ्रमर  परिवेश ||868


उपकारी मत भूलिए , करें  न इसकी तोल |

मोती का तो  मोल है , उपकारी   अनमोल ||869


वचन निभाता आदमी , नभ का  लगता भान |

अभिनन्दन का पात्र है  ,यश  का  रहता गान ||870


करता साहस  ही  सदा  , आगे  शर  संधान |

चीटी चढ़ती  देख  लो , मंजिल  है  आसान.||871


जितना जैसा पढ़ लिया , वही पास है ज्ञान |

क्षमा  करें  किसने  पढ़ा ,   पूरा  अनुसंधान ||872


पीने शीतल जल गया , तेज चटक थी धूप |

धोखा  राही  को  मिला , रिक्त पड़ा था कूप ||873


निर्विकार यदि मन नहीं , भाव नही है  शुद्ध |

वह सुभाष  कैसे  बने ,  परमहंस  सा   बुद्ध ||874


जहाँ आवरण दर्प  का , वहाँ ज्ञान बेकार |

मोती है  यदि सीप में ,  आभा  है लाचार ||875


पानी सा  ज्ञानी  रहे ,  निर्मलता  आधार  |

धोकर मन पावन करे , मेटे सभी विकार ||876


अपने अंदर खोजिए,    कितने भरे  उसूल |

दूजे में कुछ झाँकना , हमको लगे फ़िजूल ||877


धनी नही धर्मा यहाँ ,  सुख साधन मदचूर |

पुण्य वान निर्धन लगे  ,  संतोषी    भरपूर ||878


दोहाकार  समर्थ  है , करें  सृजन  सब  शोध   |

समय मांगता यह पटल, विनयावत्  अनुरोध ||879


चिल्लाती हरिआ लली  , हरिआ जाऐ  भाग |

सुनते  ही  हरि आ  गऐ ,  बोले   सुंदर   राग ||880


बेटा जहाँ गुलाब  है , बेटी  वहाँ   पराग  |

घर  का बेटा भाग है , बेटी मन अनुराग ||881


बेटा  जहाँ  उमंग  है ,  बेटी  वहाँ  तरंग |

भैया भी  बेटा बने , यदि बेटी  का संग ||882


कुल दीपक बेटा बने , बेटी वहाँ प्रकाश |

वंश बेल बेटा कहें   , बेटी कुल आभाश ||883


बेटा  घर का मान  है ,पर.बेटी  सम्मान |

बेटी तीरथ सी लगे ,  बेटा घर का .गान  ||884


सुत  उत्तरदायी  बने , सुता  रहे  उल्लास |

माने सुत को कामना, सुता भावना वास ||885


बेटा     बेटी  दूर  हो , दीजे  आप   पुकार |

बेटी  आए   दौड़कर ,  बेटा   करे   निहार ||886


बेटे को  भाग्य   कहें , समझें  उसको  शान |

सौभागी है  बेटियाँ ,  किसको इसका  ज्ञान ||887


मंगल मौन सुधा कलश, न्याय बिम्ब सौगात |

चंदन  सी  है  बेटियाँ  , महक रहे दिन  रात ||888


न्याय मांगती बेटियाँ , सजल नयन मुख मौन |

कृष्णा का अब युग नही ,  लाज बचाए कौन ||889


पागल नर क्यों हो रहा , कामुकता आधीन |

लुटती है अब बेटियाँ , दिखे कृत्य सब हीन ||890


कामुक नर बहशी बना  , उत्तरदायी कौन  |

नही सुरक्षित बेटियाँ , न्याय दिखा है मौन ||891


डाला है जब  घाव पर , नमक  किसी  ने  यार |

मिरची का लेपन किया  , जिसे किया स्वीकार || 892


किसने  देखा  है  यहां , कल  का  उगता भान |

जो देखा वह आज का , कल की क्या पहचान |893


उस पल की किसको खबर , जिस पल आना मोत |

खबरी क्या  यह जानते , किस पल  बुझना ज्योत ||894


राहगीर   संसार  का  ,  चलता   जाता  राह |

तिनका तिनका जोड़ता , है  स्थाई की चाह |895


गोरी  लगती  मोरनी ,  नयन लगे  चितचोर  |

चढ़े धनुष पर तीर सी , काजल की है कोर ||896


गोरी  मृगनयनी  लगे   , मधुवन चलती  राह |

भ्रमर शिकारी बन रहे  , लेकर  तीर अथाह ||897


जहां लोमड़ी चल रही , हिरणी चाल अनूप  |

अभिनय करती बैश्या , रखे सती का रुप |898


हंसो की बस्ती मिली , जहां  काग सरपंच |

वहां देखने को मिले  , नित नित नए प्रपंच ||899


चिड़ियाघर हम बोलते,  जहाँ .शेर  है  बंद |

ताकत देखी कैद में , चिड़िया उड़े  स्वछन्द ||900


निकले नही म्यान से , जब  कोई. तलवार |

चमक  तेज  ठंडी पड़े , जंग‌  पड़त है धार ||901


तेज  बोलना  आपका ,  दर्शाता  है  खीज |

बातचीत आती  नहीं , गिरबी रखी तमीज ||902


नही नाम में कुछ रखा , पहचाने सब काम |

झूठ गवाही   दे रहे ,   सत्यचन्द्र  जी  नाम ||903


सत्य  छिपाने  के  लिऐ ,  बोले   झूठ  हजार |

फिर भी जाती वह पकड़ , दिखे सदा लाचार ||904


चलते रहो सुभाष तुम,  रुकने का  क्या  काम |

हर पग पर तुम लीजिए  ,सदा  प्रभू  का  नाम ||905


सीखा कभी न  तैरना  , गए  नदी  में   कूँद |

बड़ी दूर तक बह गए  ,तन पर चोट फफूँद ||,906


कोशिश जो करते रहें ,वहाँ सफलता दास |

बने आलसीदास जो , मक्खी  उड़ती  पास ||907


चर्चा   शेर   शिकार  की ,   करें  आलसीदास |

चीटीं तक  मसली  नहीं , करे  सदा  बकवास ||908


संकट में गायब हुए  ,जो  पकड़े  थे  हाथ | 

परम हितैषी  लोग  थे ,जो रहते  थे  साथ ||909


काले काग नहा रहे ,  है साबुन.  में झाग |

क्या हंसा बन जाएगें ,   या  छूटेगें  दाग ||910


जब कागा ने स्नान कर , खुद को  बोला हंस |

झाग सर्प का दिख गया,  राजनीति  का बंश ||911


कागा दिखते  हंस  है , राजनीति  की  खाल |

जनता भी अब भ्रमित है , कहां लगाए ताल.||912


लँगड़े  पर्वत  चढ़  रहे ,अंधे  पिक्चर  हाल |

राजनीति  परिवेश  में ,  यही  दिखें  भूचाल ||913


किसी अनाड़ी हाथ  में ,जब.  होती  बन्दूक |

उसको कभी न छेड़ना ,  हो सकती है चूक ||914


संशोधित अच्छी भली ,  मिलती उचित सलाह  |

विनम्र सदा स्वीकारिए  , सृजन  मनन की राह  ||915


साथीगण  है   आपके ,  नहीं   करो  इग्नोर |

जिसकी जैसी कलम है ,  करे फैसला श्योर ||916


बड़ी कलम के  साथ  में , छोटी चल दे साथ  |

यदि बड़े दे आलम्वन ,  सुदृड़ सभी का हाथ ||917


व्यापारिक दोहे 

व्यापारी  व्यापार  में , देने  लगे   उधार |

इंतजार तब हाथ में ,  क्रेता यदि लाचार  ||918


अपनी रकम गवाँइये  , देकर माल उधार |

लोटी तब सब ठीक है, वर्ना  सब लाचार ||919


थोड़ी   पूंजी   से  नहीं , करें  बड़ा  व्यापार |

जोखिम का यह काम है , रहे आप  हुश्यार ||920


सामानों के साथ में  , बिकता है व्योहार |

कर्कषता  के  साथ  में ,  धन्धा  है बेगार  ||921


जितनी होवे सम्पदा , उतनी भरो दुकान |

रहे विनम्रता गद्दी पर,  ग्राहक है भगवान.||922


व्यापारी की छवि सहज , जुड़ जाए ईमान |

यही  प्रशंसा  आपकी , कर   देगी  उत्थान ||923


कहते‌  यहाँ  सुभाष  है ,  नगर  जतारा  छाप |

अपने  खुद  व्यापार  की ,  इज्जत राखे आप  ||924


सुनते है  व्यापार में , बिकता  भी कुछ नाम.|

अपना नाम कमाइये  , उचित रखे सब दाम ||925


इतना खर्च निकालिए  ,  रकम  न जाऐ  टूट |

आमद से खर्चा अधिक , गए  करम तब फूट ||926


समय समय पर कीजिए ,थोड़ा सा बदलाव |

ग्राहक  को  ऐसा  लगे ;  यही   रहे   ठहराव ||927

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मीठा खाने जब  गए , मन में उठी  हिलोल |

अंदर मीठा  था   नही  ,  बाहर   जूते  गोल ||928


चमचों के सानिध्य में ,  सभी  काम आसान |

नेता‌  के  दरबार  में , चमचों  पर   दो  ध्यान ||929


दोहावली 

काम लेखनी का यही,  करे जागरण काम |

एक चेतना जानिए , जन जन में  अविराम ||930


जब  तक बोली  बोल हैं , मीठे  बोलो बोल |

करो सार्थक  बोल को , बोली  है  अनमोल ||931


नुक्ता  चीनी  देखकर ,  बदल  न  देना  चाह |

राह  भली  है आपकी ,  होना  मत   गुमराह ||932


गुणीं जनों के साथ में ,   बन  जाते  है  काम |

मिल  जाता है  सीखना ,जीवन  में अविराम ||933


कुछ  ज्ञानी  हिंदी   जगत , बने  हुए  उस्ताद |

खतना  हिन्दी की करें , बनकर  के  जल्लाद ||934


पथिक  खड़ा  है नाव  में  ,लिए  हाथ  पतवार |

यहाँ  अकेले  सब  खड़े , करने  भव  को पार ||935


मुख को ऊपर कर लिया , दिया  चांद पर थूक |

गिरता आनन लोटकर  , जग हँसता तब  मूक ||936


कभी  समय  भी पूँछता ,   कैसे  आप  जनाब |

खुद के  डंडे  पर  नहीं , चलता  कभी  हिसाब ||937


कभी-कभी  थूका  हुआ  ,   जो  लेते  है  चाट |

हँसी  पात्र  जग  में  बने  , चौपट  करके   ठाट ||938


जिस पर थूका जिस जगह , बही वहां सिरमौर |

उसका कुछ बिगड़ा नहीं , आज उसी का  दौर ||939


अजवाइन‌  में लोंग‌ को , थोड़ा‌  मिला‌  कपूर |

बांधे   तब.  रूमाल  में  , सूँघे  आप  जरूर ||940


जो  भी  इसको  सूँघता , अच्छा   है  आभास |

सर्दी  उसकी  भागती ,  कहते‌   यहाँ   सुभाष ||941


दवा हवा सब गोल है , असहज  है सरकार |

पर   दारू  पर्याप्त  है  , भरा   पड़ा  भंडार ||942


कोरोना   की  मार  से ,  पाया  कष्ट  अपार |

बहुत मिली सद्भावना , सम्बल साहस प्यार ||943


समाचार नित मिल रहे ,लगे बिछड़ने लोग |

देख  रहा  संसार  में, प्रलय  कर  रहा रोग ||944


महावीर की जय कहें , सुखद जयंती आज |

हे प्रभु कष्ट मिटाइए , करें  अमन  का‌  राज ||945


प्रलय काल क्या चल रहा , उठते यही विचार |

लाख यत्न के बाद भी , दिखता  नहीं सुधार |946


बड़ा   भयावह   दौर   है , छिपा आज  इंसान |

गया अकेला  मित्र भी  , जलने  को  शमशान ||947


सरकारें  भी  क्या  करें  , ठोस  नहीं  उपचार |

लाती  एक  अनार  तो ,   सौ   मिलते  बीमार ||948


उनके  दिल  से  पूंछिए , जिनको  आया  रोग |

कितने बिचलित रह रहें , उसके  घर  के लोग ||949


सरकारों  को  कोसते  ,  करते   कई   सबाल |

बिना मास्क के लोग भी  , करते  मिले  वबाल ||950


जीवन को व्यापार पर , लगा दिया है मोल |

लघु व्यापारी क्या करे, सुनता  कड़वे बोल ||951


कोरोना   को    मानते , जो   भाई   बीमार |

बचने  बाले   कह   रहे,   नौटंकी  सरकार ||952


बड़ा   भयावह  दौर  है , दुख   का  पारावार |

जलने  को  शमशान में , गया  अकेला  यार ||953


कोई  नगदी  में  दिखे , कोई  लगे  उधार |

इस  चलते  संसार  में  , कोई    बंटाधार ||954


अपना हित ही देखना  , नहीं  बुरी   है बात |

पर ऐसा मत कीजिए ,चले किसी पर लात ||955


दीपक रखना नेह का ,सँग  समरसता तेल |

बाती  हो सद्भाव की ,अनुपम   होता  मेल ||956


दुखी आज है मानवता, माता  सुन लो आप |

कोरोना‌ से मुक्ति दो ,  क्षमा  करो  सब पाप ||957


पाप  हुए  यह मानता , संकट  कर  दो  दूर |

माता‌  तू  भी   देख‌  ले  , मानवता   मज़बूर ||958


बड़ी  आपदा   देखता ,  कोरोना   विकराल |

उथल-पुथल संसार में , माता करना ख्याल ||959


विनती करते‌ आपसे‌,  माता मिलकर भक्त |

कोरोना की जंग में , कर  दो  सभी सशक्त ||960


नवरातें  अनुपम सजे , मैया के  दरबार |

भक्त  सभी  पूजा करें ,आरत रहे उतार ||961


भक्ति  भाव  से‌ पूजते , माता‌  के नौ रुप |

जय माता जगदम्बिके,लगते‌ सभी अनूप ||962


माता इसको  मेटिए , चलता‌ संकट काल |

कृपा आपकी चाहता ,विश्व आज बद्हाल ||963


माता  तेरे  नाम  से , कट  जाते है पाप |

मैहर  वाली  शारदे , मेटो  सब   संताप ||964


जो भी माँ को पूजता , सबको दें वरदान |

माता  के  दरवार   में ,   पूरे   हो अरमान ||965


माता   रानी  पूज के, कर्म करे सब नेक |

जीवन के संग्राम में , रखिए सदा  विवेक ||966


हे    माता    सुखदायनी ,  कर   देना    उद्घार 

भगत तेरे  दर पर  खड़ा , पूजा  कर  स्वीकार ||967


हर  बेटी‌  के  भाल में , देखो  माता‌  रूप |

बेटी  जिस  घर में हँसे , बने  रंक  से भूप ||968


माता को सुमरित रहे, करे भगत गुणगान |

मैया से अब  बिन कहे, होते  कष्ट  निदान ||)969


माता रानी आपकी,   महिमा   अपरम्पार |

भक्त खड़ा है सामने,  नमन करो स्वीकार ||970


मात्  शारदे  अवतरण  ,  बर्णन  करते   संत |

हम सब नतमस्तक  करें , अर्पित पुष्प अनंत |971


आए है  ऋतुराज अब ,  फूलें  फलें  पलाश |

शीत शयन करने लगी ,सुखद बसंत सुभाश ||972

               

पीली पगड़ी धारकर  , शोभित  हैं   ऋतुराज |

स्वागत बंदन जग करे , हर्षित सकल समाज ||973


बिछड़  रहे  है  यार अब , मौसम लगे   उदास |

तांडव करती मौत है , पल- पल बिछड़ें  खास ||974


गिला नहीं मन में रखें , समय  रहा   है   रूठ |

सावधान   उपचार है , बात  न  समझें  झूठ  ||975


बुझते‌  हर  घर  के  दिए , नहीं  कहीं  उल्लास |

फिर भी‌‌ साहस तेल से , मन.  में करो  प्रकास ||976


कोस रहे सरकार को , बोले  जो  कटु बोल |

उनसे कहना चाहता , खुद   का  देखे‌ झोल ||)977

माँ

नव खतरे   में  पड़ा , तूफानों   का   साल |

प्रल़य काल सा दिख रहा , समय आज बिकराल ||978


बैठा  पंछी   सोचता  ,     कहाँ    गए.   इंसान | 

चहल-पहल कुछ भी नहीं , दिखता सब वीरान ||979


बैठ  डाल  पंछी   कहे ,   लगता   संकट  दौर  | 

मुझकों भी अब खोजना , आज सुरक्षित ठौर.||980


नहीं    रहेगी   आपदा ,     रहें    गेह   में   लोग |

समझ  गया   पंछी यहाँ   , कैसे   भागे     रोग ||981


पंछी  भी अब.  सोचता   , मन में आते ख्याल | 

आज सामना है  विकट‌ , मानव  खुद  जंजाल ||982

विषय - श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष में क्यों पितर ,  समझ  यहाँ    गूणार्थ  |

जीव चराचर प्रिय सकल, सुन  "सुभाष" भावार्थ  ||983


श्राद्ध पक्ष बस जानिए , श्रद्धा  का   उल्लास |

पितर सभी के चाहते , बना     रहे   विश्वास || 984

~~~    

विषय - जगत 


ऐसा कुछ कर जाइये , रखे जगत सब याद |

कर्म सभी  बुनियाद  हों , रहें  साथ आबाद ||985


कर्म  सदा ऐसे करो  ,  उदाहरण  हों आप |

और जगत में आपकी, बनी रहे कुछ छाप || 986


कर्म  आपका  देखकर ,करे  जगत भी वाह |

और  आप  भी दीन की,   हरते  रहें  कराह ||987


संत जगत को देखकर ,कहते   है   यह बात |

सदाचरण ही आजकल , बन सकता सौगात || 988


नहीं जगत को  कोसना , हर युग में   हैं दुष्ट |

जो समाज  में खाज बन, फैलाते  है   कुष्ट || 989

~~~~~~~~~

हाड़ तोड़ मेहनत  करें  , फिर करते  विश्राम |

बिना   कमाए.  देखिए , इनको‌  भी  आराम ||990


जिंदा  रखता  देश  को , सृजन जहां है पास |

लिखता है साहित्य तब, अमर‌ सदा इतिहास ||991


वही   श्रेष्ठ  साहित्य  है  ,  जिसमें हो   संदेश |

सदा   प्रेम का‌ रंग दिखे  ,विश्व  बंधु ‌ परिवेश ||992

विषय - चरित्र

बदल जमाना अब रहा  , दिखते  दृश्य  विचित्र |
तरह - तरह अब  छद्म के,   उद्गम   दिखें चरित्र ||993

ऐसी  शिक्षा    चाहिए  , हो  चरित्र   निर्माण |
चर्चा भी आदर्श शुचि , जग का  हो कल्याण ||994

मात- पिता सब चाहते , सुत के‌ सुंदर  चित्र |
जीवन में उत्थान कर ,  अच्छा  रखें   चरित्र ||995

मिले मान-सम्मान सब ,  उजला जहाँ चरित्र |
वहाँ आचरण हर कदम , मिलता हमें  पवित्र ||996

देखा है   संसार  में , मानव   बड़ा  विचित्र |
दो पैसे के   लोभ  में , बेचें  धवल  चरित्र ||997

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विषय - सनातन /सनातनी

शब्द सनातन चुभ रहा , सुनकर करते क्रोध |
उन पर होना चाहिए  , कुछ तो  यारो  शोध || 🙏998

तनातनी हम देखते , सनातनी    पर    ध्यान |
कहासुनी भी  सब करें  ,  घिनापुरी  सा ‌ ‌गान ||999

पुरखे   जहाँ   सनातनी ,  माने  अपना   धर्म |
ओलादों को  शर्म क्यों ,  समझ न आता मर्म || 🙏1000

सनातनी   चर्या   रहे , घर    मंदिर   परिवार |
राजनीति से दूर हो ,  पर    इसका   आधार ||1001

©®सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

9584710660

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