छंद महल , पूर्वाभ्यास छंद विशेषांक , माह दिसम्बर 2022 , पुन: बुक चित्र पर क्लिक करें , पत्रिका खुल जाएगी


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6 - ब्लागडाट काम पर यह पत्रिका है हीं 💐
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भवदीय 
सम्पादक मंडल 
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1- अनुक्रमणिका  , 2 - सम्पादकीय ,
3- माँ शारदे वंदना(श्यामराव धर्मपुरीकर जी गंज बासौदा
 4-रामानंद राव जी लखनऊ , 
5 - आर के प्रजापति " साथी जी" जतारा 
6- सुरेन्द्र कौशिक जी गाजियाबाद 
7- सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र० 
8- जयवीर सिंह अत्री जी गाजियाबाद 
9- श्यामराव धर्मपुरीकर जी गंज बासौदा ( विदिशा) 
10- महेश बीसौरिया जी , डबरा ( ग्वालियर) म०प्र०
11- डा० एन० एल० शर्मा जी निर्भय ( जयपुर ) 
12 - प्रमिला श्री तिवारी जी धनबाद 
13- हिम्मत चोरड़िया जी , कोलकाता 
14 - गिरधारी लाल मीणा जी , बस्सी (जयपुर) राजस्थान
15 - सुनीता सिंह सरोवर जी (देवरिया ) उत्तर प्रदेश 
16- कंचनलता चतुर्वेदी जी ( वाराणसी) 
17 - सुशील सरना जी जयपुर 
18- रंजना झा जी  नेपाल 
19 -हर्षलता दुधौड़िया जी हैदराबाद
20- अशोक महिश्वरे ' माही" जी वालाघाट 
21 - सरला भंसाली जी अहमदाबाद 
22-धनन्जय प्रसाद यादव जी 
23-धर्मपाल धर्म जी नीमराना 
24 - नागेश्वरी जी
25 - शशिकांत पाठक जी टौंक राजस्थान
26- अनामिका कली जी जयपुर 
27- डा० सरिता गर्ग जी  गाजियाबाद
28 संजीव नाईक जी इंदौर 
29- डा० सोनिया गुप्ता जी डेरा बस्सी ( मोहाली) 
30 - प्रो ० विश्वम्भर शुक्ल जी , लखनऊ  
31- गजेन्द्र सिंह जी हमीरपुर
32- मंजु मित्तल ' मंजुल ' जी अलीगढ़ 
33- राजीव नामदेव ' राना लिधौरी ' जी टीकमगढ़‌
34- वर्तिका अग्रवाल जी वाराणसी 
35-निशि अग्रवाल जी 
36-जगदीश गोकलानी जी  "जग, ग्वालियरी"
37 - ब्रजेश कुमार शर्मा जी बरेली 
38 - कौशल कुमार पाण्डेय आस जी बीसलपुर 
39- रघुनंदन हटीला 'रघु' कोटा राज
40- रमानिवास तिवारी जी 
41-अंजु कपूर गांधी जी 
42- डा० अतिराज सिंह जी बीकानेर (राजस्थान)
43-रामप्रसाद मीना " लिल्हारे ' जी चिखला( बालाघाट )
44- हरिओम_श्रीवास्तव जी भोपाल 
45-प्रियंका त्रिपाठी 'पांडेय',जी  प्रयागराज उत्तर प्रदेश
46- मुकेश बलकेश जी  , नीमराना ( अलवर )
47-सीमा पाण्डेय जी मिश्रा देवरिया उत्तर प्रदेश
48- रंजना सिंह  अंगवाणी जी  बीहट बेगूसराय 
49- चंद्रभूषण निर्भय जी बेतिया विहार 
50-राजकिशोर  मिश्र   राज जी  प्रतापगढ़ी 
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                         🌹  पृष्ठ क्रमांक _2🌹
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                   🍒 पृष्ठ क्रमांक _3🍒
💐💐💐💐💐माँ शारदे वंदना💐💐💐💐💐
🥀🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🥀
महिमा अपरंपार,     शारदे  माँ  तव  जय  हो। 
करें सभी जयकार,     सदा ही मातु अभय हो।। 
जग का हो कल्याण,     छत्र-छाया  हो  माता। 
गाऊँ तव गुणगान,        रूप  तेरा  मन  भाता।।
जय हो मातु महान की, महिमा गौरव गान की। 
गरिमा-मय सम्मान की, माँ जग के उत्थान की।।
         एवं 
🍒तमाल छंद पर आधारित मुक्तक:-🍒
विधान- 16+2+1 = + 19 मात्राभार (चौपाई +गुरु +लघु).
मातु शारदे तेरी जय-जय कार ।
अपने भक्तों से करती माँ प्यार। 
माता के चरणों  मे  माथा  टेक -
नित्य लगाता माता तुम्हें गुहार।

अयोध्या अनुपम पावन यह  धाम । 
राम-लला हैं लगते ललित ललाम ।
अपने भक्तों से  करते  अति प्यार -
बसते  हैं   सबके  मन में  श्री राम । 
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                    🍎पृष्ठ क्रमांक _4🌹
🥀16-12 पर यति,अंत गुरु गुरु, समांत- आना,  अपदांत🥀

🐦आया  पंछी  देख   अकेला,  लौट  वहीं  है  जाना।
थोड़े दिन का दाना-पानी , उसका  वहीं   ठिकाना।

विश्व पराया उसका अपना, कुछ दिन का है नाता,
आज रहे कल जाना है तो,क्यों फिर प्रीत लगाना।

लोभ-मोह में भूलें  सारे , यह   माया   की  नगरी, 
यहाँ नहीं  तेरा  कुछ  बंदे, थोड़ा  समय  बिताना।

चमक दमक दिखती है दुनिया,जैसे भूल भुलैया,
तुम्हें याद वह डाली पंछी,जगत मुसाफिर खाना।

खड़ा शिकारी देख वहाँ पर,बहुत बड़ा है  धोखा,
जाल  बिछाया थल पर ऐसा, अंदर डाले  दाना।

आएगा वह दिन जब तेरा,याद नहीं कुछ  होगा,
फँसना पड़े जाल के अंदर,चलना नहीं  बहाना।

आँख बंद कर जैसे आए, जाना  पड़े  अकेला,
कर्मो का  ये  दुनिया ‌ वाले, गाएँगे  बस  गाना।
🦜विधान- 16,11 पर यति, अंत में गुरु लघु🦜
अब चलो गाँव की ओर।
भीड़ बहुत  है  यहाँ  शहर  में,  होता  रहता  शोर।।
यहाँ प्रदूषण बहुत अधिक है,श्वास पड़े  कमजोर।
गाँवो  में  हरियाली  रहती ,मस्त  हवा  झकझोर।।
कोयल गाती मधुरिम धुन  में ,वन  में  नाचे  मोर।
ताल  तलैया  नदिया  नाले,  देखे   चाँद   चकोर।।
सुबह सूर्य की सुन्दर लाली, खिड़की झांके भोर।
रात चाँदनी अति मन भाये,जग मग धरा अजोर।। "रामानन्द राव , इन्दिरा नगर , लखनऊ।✍️
एवं 👇
🧑‍🎄
🍓
लगता है अब गाँव, शहर के विल्कुल  जैसा।
रहन-सहन  परिवेश, नया अब आया  ऐसा।।
विजली करे अजोर, दीप का  गया  जमाना।
मोबाइल  हर  हाथ,  खेत  में  चलता  गाना।।
अंतर दिखे न गाँव में, शहरी  ही  अंदाज  है।
खुले हुए सब लोग हैं,नहीं शर्म अब लाज है।।
🌷एवं 👇🌷
💐ताटंक छंद आधारित "गीत"  शीर्षक-नारी💐
सदियों से वह लड़ती आई,हिम्मत कभी न  हारी  है।
भूख  गरीबी  घर  झंझट  से, लड़ती  आई  नारी  है।।
👩
कभी खेत खलिहानों में वह,बीज खेत  में  बोया  है।
सींचा  रोपा  और  निराई,  जीवन  सारा  खोया   है।
श्रम करने में आज भी नारी,मर्दो पर  वह  भारी  है।
भूख  गरीबी  घर  झंझट  से, लड़ती  आई  नारी  है।।
👩‍🦳
जंगल से लकड़ी बिन लाती,पर्वत पर चढ़ जाती है।
ईंटों  के  भट्ठो  पर  देखो,  कैसे   ईंट   पकाती   है।
बाँध पीठ पर बच्चे को  वह, ढोती  ईट  सवारी  है।
भूख गरीबी घर  झंझट  से, लड़ती  आई  नारी  है।।
👩‍🦰
रिक्सा आटो सड़कों पर वह,गाड़ी  ट्रेन चलाती है।
अंतरिक्ष में पहुँची  नारी, देख  जहाज  उड़ाती  है।
वही  रूप  है  बहनें, बेटी, पत्नी  भी, महतारी  है।
भूख गरीबी घर  झंझट  से, लड़ती आई  नारी  है।।
🙍‍♀️
कभी न डरती बाधाओं से,कश्ती  ले  तूफानो  में।
वर्दी पहनी सीमा पर वह,कमी नहीं  अरमानों  में।
लड़ती बन वह लक्ष्मी बाई,ऊदा वह झलकारी है।
भूख गरीबी घर झंझट से, लड़ती आई  नारी  है।।
•••••••एवं 👇
🍎मंगलवत्थु (रोली)छंद आधारित "गीत"🍎
 💥8+3,  3+2+2+4 =22 मात्रा💥

प्यारा  अपना  गाँव,  खूब  है  हरियाली।
परिचित सारे पेड़, यहाँ  की  हर  डाली।।

हरा-भरा चहुँओर,हृदय मन अति भाये।
फसल और सब खेत, खूब ये  लहराये।
सुन्दर नवल प्रभात, सूर्य की है  लाली।
परिचित सारे पेड़, यहाँ की  हर  डाली।।

पीपल बरगद पेड़,और उसकी छाया।
जिसके नीचे बैठ, पथिक है सुस्ताया।
सींच रहा है  फूल ,बाग  देखो  माली।
परिचित सारे पेड़,यहाँ की हर डाली।।

यहाँ झोपड़ी  डाल, पास  बैठी  मैया।
बँधी खूँट से  देख ,एक  सुन्दर  गैया।
कृषक खेत में बैठ,करे  है  रखवाली।
परिचित सारे पेड़,यहाँ की हर डाली।।

होता  पूजा  पाठ, सुबह  जैसे  होता।
लेकर बीज किसान,खेत में है  बोता।
कहीं डीह स्थान, कहीं  मंदिर  काली।
परिचित सारे पेड़,यहाँ की हर डाली।।
••••एवं 
🧡विधा- सार छंद छंद आधारित "गीत"🧡
❣️16,12 पर यति 28 मात्रा अंत गुरु गुरु❣️
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कर्म करो चिंता मत करना,------करो भरोसा रब की।
रखवाला है ऊपर वाला,--------लाज रखे वो सबकी।।

बुरा कभी मत सोचो भाई,---- ---कर्म करो तुम प्यारे।
मानवता  ही  धर्म यहाँ है, ----------इसके चलो सहारे।
एक समय तुम छू लोगे जब,---ऊँचाई इस  नभ  की।
रखवाला है ऊपर वाला,-------लाज रखे वो सबकी।।

करो फिक्र मत तुम अपनी अब,चलो सही बस रस्ता।
कुछ महँगी  है वस्तु यहाँ तो, मिले बहुत कुछ सस्ता।।
बीत गया जो भूलो उसको,-- सोचो  केवल  अबकी।
रखवाला है ऊपर वाला,----लाज  रखे  वो  सबकी।।

कभी न पथ से तुम हट जाना,चलो  बढ़ो बस आगे।
बनो नहीं तुम आलस छोड़ो,---चलो  नीद से  जागे।।
सागर मोती से भर लाओ,--चलो लगा  लो  डुबकी।
रखवाला है ऊपर वाला,------लाज रखे वो सबकी।|  "रामानन्द राव , इन्दिरा नगर लखनऊ।✍️
•••एवं 👇
🍒पहले का ग्राम चित्र🍒
-------------------------
नहीं गाँव में चहल-पहल थी,निर्धन मैल कुचैल थे।
झाड़ फूस के घर  होते थे, कुछ  होते  खपरैल थे।।
यहाँ नहीं तारों में बिजली, ढिबरी का उजियार था।
आते  जाते  पगडंडी  में , छाया बस अँधियार था।।

बहे हवा जब जब  पुरवाई, बैठ  पेड़  के  छाँव में।
अरुणोदय की सुन्दर लाली, दुल्हन जैसी गाँव में।।
कहीं  बँधी  खूटे  से  गैया, कहीं वहाँ पर  बैल थे।
कुछ तो होते  सीधे-साधे, कुछ  होते  बिगड़ैल थे।।

अन्न वस्त्र की कमियाँ होती,जीवन बड़ा अजीब था।
रात दिवस खेतों में रहना,इनका  यही  नसीब  था।।
चौमुख छायी थी हरियाली,----हरे-भरे जो पेड़ थे।
गाँव खेत जाती पगडंडी,------पतले पतले मेड़ थे।।

जैसे मानव लोक नहीं है, ग्राम  सभ्यता  नर्क  था।
नग्न घूमते आदि मनुज सा, पड़े न कोई फर्क था।।
घर मिट्टी के इनके होते,-------छोटे छोटे द्वार  थे।
यही देश के  निर्माता  जो, निर्धन  शिल्पी कार थे।।

घर-घर में होता था झगड़ा,खेत कलह खलिहान में।
कीड़ों सा  जीवन था इनका,बुद्धि  हीन  अज्ञान में।।
मेड़ काटते नाली पानी,--------नहीं इन्हें संतोष था।
छोटी छोटी बातें करते,--------औरों में भी दोष था।।

सूर्य चाँद का लोक लगे वह,----तारों की बारात सी।
सागर नदिया पर्वत झरने,झिलमिल करती रात सी।।
विहग वृंद सब यहाँ चहकते,कोयल  गाती  गीत भी।
हरी-भरी फसलों पर दिखती,माघ पूस में शीत भी।।
•••एवं 👇

नहीं है  लिखना  यह  आसान।
            छंद या कविता को  श्री  मान।।
बहुत   होती   है   गर्मी    सर्द।
            समझता कवि ही इसका दर्द।।

देखता जीवन का परिवेश।
            देश में अपने कभी विदेश।।
कहीं पर सूखा हो बरसात।
            अँधेरी काली  जैसी  रात।।

जहाँ पर नहीं सूर्य का ताप।
            वहाँ भी गर्मी  का  ले  नाप।।
घटित हो घटना कोई  बात।
            वहाँ की देखे क्या हालात।।

करे  वह  खाते - पीते  याद।
            कभी पति पत्नी का संवाद।।
राजनेताओं की कुछ  नीति।
            लिखे वह जैसी देखे  रीति।।

लड़े सीमा पर वीर जवान।
           देश का दाता अन्न किसान।।
प्रकृति की शोभा करे बखान।
           चाँद तारे नभ  में  दिनमान।।

उच्च होती है कवि की सोच।
           नहीं वह करता  है  संकोच।।
दिखाई   देता   जो  प्रत्यक्ष।
           लेखनी करती  उसे  समक्ष।।
••एवं 👇

🍒चौकड़िया (ईसुरी) छंद आधारित "गीत"🍒
💐16-12 पर यति चरणान्त गुरु (पाँच तुकांत)💐

जहाँ डाल से आया यारा,-------मिलता वहीं  सहारा।
इस दुनिया में घूम रहा है,--------मानव मारा- मारा।।

जीवन का कुछ नहीं ठिकाना,आज यहा़ँ कल जाना।
एक दिवस जाना है सबको,---मिलना वहीं ठिकाना।
भव सागर में गहरा पानी,-------- डूब- डूब उतराना।
यह काया है निर्मित माटी,-------साधु-संत पहचाना।

मुर्ख समझता यही हमारा,-------साजे और सँवारा।
इस दुनिया में घूम रहा है,-------मानव मारा- मारा।।

धन दौलत कुछ काम न आए,साथ नही कुछ जाए।
जैसी  करनी  करता  मानव,----वैसा ही फल पाए।
लगा वृक्ष जब कीकर का तो,---आम कहाँ से लाए।
काम क्रोध मद लोभ जड़ो का,-खर पतवार उगाए।

लालच है सबको ही सारा,-----कम में नहीं गुजारा।
इस दुनिया में घूम रहा है,-------मानव मारा-मारा।।

गई जवानी बचपन बीता,-----वृद्ध अवस्था रीता।
रोग शोक चौतरफा घेरे,-------कटने को है फीता।
याद करे अब ईश्वर को वह,---पढ़े बैठ कर गीता।
चलो बुलावा यम का आया,--राम कहो या सीता।

बहुत लगाए जग में नारा,----चलो नदी के धारा।
इस दुनिया में घूम रहा है,---- मानव मारा-मारा।।
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🌹मुक्तक🌹
हम हिन्दू या तुम मुस्लिम हो, ये सब बातें छोड़ें।
लहू एक है बस मानव हैं,  मधुरम  नाता  जोड़ें।
सभी धर्म सिखलाते  सबको, प्रेम भाव से रहना,
जाति धर्म से बाहर निकलें,नफरत से मुँह  मोड़ें।
👨‍🦰
है उद्देश्य  सभी धर्मों का, सबका  मन हो चंगा।
हर घर में हो ईद  दिवाली, कभी  न  फैले दंगा।
आओ मिलकर राष्ट्र धर्म  को, सबसे पहले मानें,
तभी विश्व में अविजित होकर,गर्वित रहे तिरंगा।
👨‍🦲
आओ मिलकर एक दूसरे, का हम माथा चूमें।
सुख दुख में भी साथ निभाकर,नाचें गायें झूमें।
मानवता की अलख जगाकर,दें सन्देश सभी को,
हाथ  तिरंगे  को  लेकर  के, पूरा  भारत  घूमें।
एक पिता की अंतिम इच्छा (गीत)
एक  बार  तो पापा कहकर्,  हमें टेर  लो  बेटा।
निश्छल मन कर प्रेम नजर से,मुझे हेर लो बेटा।

उँगली पकड़ चलाया तुमको गिरने नहीं दिया था।
तुम्हें पिलाया  दूध  निपनियां, मैंने  नीर  पिया था।
हर बाधा से लड़ने की दी साहस  शक्ति  निपुणता,
अगर किसी ने आँख दिखाई, बदला तुरत लिया था।

चुक जाएगा कर्ज बदन पर, हाथ फेर लो बेटा।

खून पसीने  को  पानी सा, मैंने  नित्य  बहाया।
तेरे सुख सपनों को बेटा गुलशन समझ सजाया।
दुनिया की सब बाधाओं से, दूर रखा  है तुझको,
निज अनुभव से जीवन जीने,का ही पाठ पढ़ाया।

उस अनुभव को थोड़ा थोड़ा,तुम उकेर लो बेटा

माथा चूमो  हँसकर  बेटा, बालों को  सहला दो।
दिल से अपने ही हाथों से,खाना मुझे खिला दो।
अंतिम घड़ी हुई चलने की,फर्ज निभाओ अपना,
पानी भी गंगाजल होगा, अपने हाथ  पिला दो।
"साथी"मंजिल मिले हँसी से, मुझे घेर लो बेटा
~एवं 👇
🍒समांत-आई, पदांत-साथी आज बुढ़ापे में🍒

दूर  हुई  खुदगर्ज  कमाई, साथी  आज  बुढापे में।
धूमिल सी खुद की परछाई, साथी आज बुढापे में।

पगली नींद रूठकर हमसे,लुका छिपी सी खेल रही,
भारी  लगने  लगी  रजाई, साथी  आज  बुढ़ापे में।

सही स्वार्थ की परिभाषा क्या,आज समझ में आया है,
जब अपनों  ने डाट  पिलाई, साथी  आज  बुढ़ापे में।

जिसको अपनी बात सुनाकर, मन का बोझ किया कम था,
उसने ही अब  आग  लगाई, साथी  आज  बुढ़ापे में।

देह थकी जीवन एकाकी, रोग घिरे मधुमक्खी से,
दुश्मन मेवा और मिठाई ,साथी  आज  बुढ़ापे में।

जिन गद्दों पर सुख की चादर, उनपर देह अकड़ती है,
अच्छी लगने लगी चटाई , साथी  आज  बुढ़ापे में।

जब जागा तो सभी सवेरा, अब तो प्रभु से ही यारी,
सच्ची समझ  देर से  आई,साथी  आज  बुढ़ापे मे |
•••एवं 👇
🍒विषय-पतझड़ विधा-मुक्तक🍒
पतझड़  देख  स्वयं का  यारो, कोई  वृक्ष  नहीं रोता।
झंझावात  को देख  साहसी, नाविक धैर्य नहीं खोता।
संकट  से  जो   लगते  रहते,  वह  ही पाते मंजिल को
सच्चा पथिक वही जो दुख में विचलित कभी नहीं होता।
🍎
पतझड़  बाद  सभी  वृक्षों में, नव कोपल  आ  जाते हैं।
नव श्रृंगारित  जीवन  पाकर,  सबके  मन  को  भाते हैं।
नियम प्रकति के सभी अटल हैं, कोई बदल नहीं सकता,
चले समय के  साथ  सदा जो, वो अनुपम  सुख पाते हैं।
🍎
पतझड़ जब  आता  तो  लगता, दर्द भरा  ये उपवन है।
निज  सम्पत्ति  से  खाली अब, होता  इसका  दामन है।
ये ही जीवन की क्षणिकाएं, विचलित मन  को कर देतीं,
समय चक्र  चलता ही रहता, फिर  आता  मन भावन है।
🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒
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                   🍎 पृष्ठ क्रमांक 6🍎
दुश्मन को भी मित्र बनाए, मीठे शब्दों की बोली,
प्रभु किरपा से भरती जाए, खाली तेरी ये झोली,
मृदु बोली से सब सुख पाएँ, सम्मान मिले तुमको भी~
महल किले ये क्या हैं बंदे, मन को सुख देती खोली।
              👨‍🦰      --::::--
दुश्मन पर विश्वास करो मत, बिन सोचे तुम ऐ भाई,
जो भी ऐसा करता पाया, आखिर में मुंँह की खाई,
कहीं भरोसा अनजानों पर, कभी नहीं करना प्यारे~
जान, माल का धोखा खाकर, होगी तेरी रुसवाई
••••एवं••👇•••
देना नहीं उधार, बड़ी मुश्किल से पटता।
मांँगो तो बेकार,तभी अपना पन घटता।‌।
अपना पैसा मांँग, भिखारी बनकर के तू।
ऊंँची जो आवाज,पिटेगा लड़कर के तू।।
देना  अगर  उधार  हैं,  देना  उतना  ही  सनम।
छोड़ सको मन से जिसे,पड़े न खानी जो कसम।। 
🍎
नहीं  भरा  है  पेट,  कभी  मानव  का  यारो।
धन  पाने  की  चाह,  कर्म  दानव  का  यारों।।
धन सँग मिलता मान, उसी को अपना समझो।
निकल गया जो हाथ, उसे बस सपना समझो।।
उस धन से संतोष कर, कुदरत ने जो दे दिया।
स्वप्न समझकर भूल जा, दुष्टों ने जो ले लिया।।
🍎
बीत  रहा  जो  वर्ष,  बहुत  अनुभव  करवाए।
बिछड़ गए कुछ मित्र, नए कुछ और मिलाए।।
कर "कौशिक" को माफ,हुई यदि गलती उससे।
नहीं  छोड़ना  साथ, मिला  है  मुश्किल  तुमसे।।
तुम जैसे जो मित्र हैं, मिलने मुश्किल हैं बड़े।
नहीं मुझे अब छोड़ना, बा-मुश्किल हत्थे चढ़े।।
       सुरेन्द्र कौशिक...(गाजियाबाद)

•••••एवं 👇
  🍒  #सरसी छंद/ मात्रा बाँट - १६ ११🍒
    🎈पदांत - गुरु लघु🎈
पढ़कर,लिखकर,ज्ञानी बनकर, 
चला नाश की ओर।।
ज्ञान  लगाया  आयुध   में  सब, 
चहुंँ दिश होता शोर।।
नहीं शक्ति अब भुजबल की है, 
बस  बारूदी  जोर।।
अणु  परमाणू  बम  के  डर से, 
ढूंँढे   जनता   ठोर।।
••••एवं 👇
  मानव जितना ज्ञानी बनता, उतना बढ़ता दम्भ,
उन्नति के पथ में डलवाता, विघ्नों के वह खम्भ,
टैंक, तोप के भरे खजाने, सुख साधन पर मार~
जब भी दिन उन्नति के आते, तभी युद्ध आरम्भ।
••••एवं 👇

#छंद_महल, कवियों की टोली, सभी यहाँ पाठक श्रोता |
रचनाएं लिखना अच्छा है,    ज्ञान गंग    का  है   गोता‌ ||
जो पढ़ते औरों की रचना,      ज्ञान अधिक उनका होता |
औरों को जो  साहस देते,      नहीं मान वह कुछ खोता ।।
                   --::::--🎈🎈🎈
मैं सुझाव बस दे सकता हूँ ,   आगे का काम तुम्हारा ।
हाथ जोड़कर सेवा करता,    सदा   सोचता उपकारा ||
पुण्य कार्य में भागी तुम भी,  अब‌  बनना‌ सभी सितारो |
खुला #महल यह #छंदों का है, मिलो सजाओ सब यारो ।।
                    --::::--🎈🎈🎈
रचना पढ़कर ही कुछ लिखिए, यहाँ समीक्षा  बतलाना |
प्रेम दिखाएं खुद लेखन में, मान   सभी को  दे जाना।।
केवल वा-वाही मत चाहो, करनी साहित्यिक सेवा।
किसी लाभ की आशा मत कर, अंतस मिलती खुद मेवा।।
          सुरेन्द्र कौशिक...(गाजियाबाद )
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कैसी सर्द हवाएं,  आज बनी हैं,
चुभती हैं ये जैसे,  नागफनी  हैं,
कोई आओ सूखी,घास जलाओ~
जर्जर तन, सर्दी में,आज ठनी है।
              --::::--🍎
देखो आज  जमाना, आया  कैसा,
नजर नहीं कुछ आता, भाता पैसा,
ध्यान नहीं बच्चों पर, करें  कमाई~
जैसा आप  करोगे, मिलता  वैसा।
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सदा सत्य के  साथ , अड़ा   रहता हूँ |
और अहिंसा द्वार  ,   पड़ा   रहता हूँ |
जो कायरता   जान,  नैन  दिखलाते -
तब सिंहों की चाल ,  खड़ा   रहता हूँ |🐯
🐱
महावीर पहचान, नहीं   हम  भूले |
भूले नहीं   दहाड़ , नहीं  हम  लूले |
जहाँ धर्म पर चोट , वहाँ पर गरजें - 
फिर भी रखते गेह , अहिंसा झूले |🐦
🐘
कायर है हम लोग , यहाँ जो  मानें |
सह लेते   है  वार ,  विचारा  जानें |
उनसे कहता आज,समझ लो प्यारे -
प्रतिरोधी हथियार , सदा  हम  तानें |🗽
🌹•••••एवं ~~👇~•🌹
मानव छंद, 14 ~14 मात्रा का एक चरण , चार. चरण, 
चारों चरण या   दो दो चरण समतुकांत,  मात्रा बारह  + दो  
छिपे छिपकली मंदिर में , कीड़ा  खाती जाती है |
पाप न उसके कटते है , शरण न प्रभुवर पाती है |
दान करे नर कितना भी , ‌यदि करता पाप कमाई ~
करनी उसकी देती फल , नियति यही बतलाती है |

आज मनुज की हालत है  ,पाप   हमेशा  करता है |
फल भी अच्छा पाने को , लालायित  वह रहता है‌ |
कौन  उसे  समझाता है   , खुद को प्यारे  धोखा है -
चखता है वह करनी फल , बैठा    आहें   भरता है |

कर्म  जहाँ पर  खोटे  है   , दूरी   सभी  बनाते   हैं |
पापी  माया   रहती  है , पास  न सज्जन आते हैं ||
जहाँ कुटिलता छाई है  ,  सार    नहीं   है बातों में -
वहाँ  दिखावा  होता है ,  छल के लड्डू   खाते   हैं |
💐••••एवं •👇•💐
विधान 16- 12 , अंत गागा , 
यह छंद सार छंद की तरह चाल भरता है , पर प्रथम चरण की यति की तुकांत ,  पदांत से तुकांत करती है  , अर्थात एक छंद में पाँच तुकांत लगती है 
सज्जन दर- दर ठोकर खाता   , लोग न जोड़ें नाता |
दुर्जन का सब स्वागत करते , कहते  उसको भ्राता ||
मक्कारो को  मिले  सफलता ,सत्य पराजय‌ पाता |
कलयुग के यह हाल सुभाषा , कागा  रबड़ी खाता  ||
🍎
काँटे  यहाँ  आदमी   बोता  , पड़ा   चैन  से   सोता |
खुद को ही जब आकर चुभते,सबके सम्मुख रोता ||
कौन   कहे  अब  उनसे  यारो, लेता   जैसा   गोता  |
कर्म उदय में आता है जब  , फल   बैसा  ही  होता ||
🍊
ऐसे काम नहीं अब करना , पड़े किसी से  डरना  |
चार लोग जब मुख पर थूकें  , पड़े शर्म से मरना ||
बोल सदा ही मीठे बोलो , ज्यों शीतल हो  झरना |
कर्म नहीं  यदि खोटे छोड़े  , सभी  बुरा   है  वर्ना ||
       ••••एवं 👇
                    🍓प्रदीप छंद (16-13)🍓

शब्द प्रशंसा के लिखते  हैं  ,हम तो  इनकी शान में |
गीत गजल मैं  सब गाता हूँ  ,  चमचों के  सम्मान में |
🦁
दरवाजे  नेता के    मिलते ,  जैसे  रहते  श्वान  हैं |
इनसे पहले  मिलना होता , अद्भुत यह श्रीमान हैं ||
बने बिचौली करते रहते , जनता के  सब काम हैं |
इन्हें पूजकर ऐसा  लगता , यह  तो चारों धाम हैं ||
🦧
कैसे  होता काम  सफल है , मंत्र    फूँकते  कान में |
गीत गजल मैं  सब गाता हूँ  ,  चमचों के  सम्मान में |
🐮
नेता जी के साथ रहें यह , चोखे  यही  दलाल हैं |
सदा पकड़ते यह पैसा हैं ,   होते  माला माल हैं ||
कभी नामजद अपराधों  में, थानों के  सिरमौर थे |
लोग काँपते थर- थर इनसे, इनके भी कुछ दौर थे ||
🐃
बदल गया है इनका धंधा , कमी न  आई   शान  में |
गीत गजल मैं  सब गाता हूँ  ,  चमचों के  सम्मान में |
🐄
चमचों  की चाँदी रहती  , आज  किया  यह  गौर है |
इनका फैला जाल जहाँ पर, कहीं नहीं कमजोर  है ||
कार्य प्रणाली‌ अद्भुत इनकी, इनका अजब शुरूर है |
लोकतंत्र में  स्वाद  बनें  है ,   मीठा   पिंड  खजूर है ||
🦓
मंत्री जी   कत्था से खिलते   , यह चूना   हैं  पान में |
गीत गजल मैं  सब गाता हूँ  ,  चमचों के  सम्मान में |

•••••एवं👇

कैसा चलता  तंत्र   यहाँ    पर , आग लगी  ईमान में ||
सत्य  सदा  ही  रोता   रहता   , देखों   हिंदुस्तान   में |
 🦜               ‌             
हाथ जोड़कर जब हम जाते , आफिस में ललकारते |
चार कमी   फायल  में  देखें ,   ऐसा   वहाँ  निहारते ||
जेब   देखते बाबू पहले  , अपनी   नजर  पसार  के |
रहें ' सुभाषा' जब भी  खाली  , नेंग मिलें दुत्कार  के ||
🧭
भोग लगाना सीखो पहले , आकर  कहते  कान में |
सत्य  सदा  ही  रोता   रहता , देखों   हिंदुस्तान   में |
 🗾            ‌‌                
गुंडे  चमचे जब  भी   जाते , बाबू   सब  मनुहारते |
उन्हें   बैठने  कुर्सी   देते  ,काम   सभी  स्वीकारते ||
नहीं विनय की इज्जत होती, घुड़की से अपमान है |
दीन हीन   अब  रोता   रहता  ,  लोकतंत्र  हैरान है ||
🧑‍🎄
जन गण के अधिनायक देखों , मस्त रहें निज गान में |
सत्य  सदा  ही  रोता   रहता   ,  देखों   हिंदुस्तान   में |
👾
सैनिक बनते  जाकर बेटे , अपने   यहाँ  किसान के |
मजदूरों   के      बनते    देखे , भरे  हुए ‌  ईमान  के ||
जब शहीद  वह  हो  जाते है , चार  फूल   तैयार  हैं |
हश्र  बुरा  है  उनके पीछें ,   भूखे  सब  परिवार  हैं ||
😤
नेता सारे  मौज   उड़ाते , घूमें  अपनी    शान में |
सत्य  सदा  ही  रोता   रहता   ,  देखों   हिंदुस्तान   में |
😩
••••••एवं 👇

कोई  मिलता दो कोड़ी का,   कोई   फूटी  कोड़ी  है  |
कोई बिकता लाख करोड़ों ,कुछ की कीमत थोड़ी है ||

बिकने को  तैयार खड़े हैं , खूब  खरीदी   होती‌ है |
सस्ता है ईमान यहाँ पर , खड़ी  आबरू   रोती  है ||
सिंह  खड़े  हैं  दरबारों में , मुद्रा  याचक  धारी   है |
ताकत वाले हैं सरकारी , या फिर वह   दरबारी है ||

धर्म शर्म की दिखती कड़ियाँ,लगती मिलकर  तोड़ी है  |
कोई बिकता लाख करोड़ों  , कुछ की कीमत थोड़ी है  ||

भाषण प्रवचन अच्छे  होते , ताली  खूब  बजाते   है |
कथनी जब करनी को कहते , अपने गाल फुलाते है ||
कागा  करता  है  सरपंची , हंसा  अब  अपराधी   है |
नेता वह अब  कहलाता है,जिसके तन पर खादी  है ||

चोर -चोर  मौसेरे    भाई  , चोरों की   अब  जोड़ी है ||
कोई बिकता लाख करोड़ों ,कुछ की कीमत थोड़ी है  ||

तीन पाँच जो करते रहते , जोकर  जिनका  मुक्का है |
नौ दो ग्यारह हो जाते हैं , जब सच दिखता  रुक्का है ||
गुटबंदी छलछंदी करती , झूठा  सच   हो   जाता   है |
सच का  मालिक झूठा होवें  , परिवर्तन  कहलाता है ||

लोकतंत्र में   स्वाँग   रचे है ,   जिसमें तोड़ा फोड़ी है |
कोई बिकता लाख करोड़ों ,कुछ की कीमत थोड़ी है  ||

चमत्कार को नमस्कार है , बाबा   आज   मदारी है |
चार जमूरे पाल लिए हैं ,  बना  आज   व्यापारी  है ||
तंत्र मंत्र का अभिनय करते , धन का करते लेखा है |
बाबाओं को नोट झटकते , खुले  मंच पर  देखा  है ||

कलियुग में यह सच्चे ब्रम्हा, हवा अज़ब अब छोड़ी है |
कोई बिकता लाख करोड़ों  ,कुछ की  कीमत थोड़ी है  ||
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कड़वी तेरी बोली  बंदे, दिल  को  देती  छोल। 
जब भी बोलो मानव बोली, बोली में रस घोल।। 

मीठी बोली खींचे सबको, देखो  अपनी  ओर, 
मधुरिम सुर में बजते हैं तो, अच्छे लगते ढोल। 

कोयल  गाती मीठा  गाना, कौवा करता शोर, 
लेकिन कानों  को  भाते हैं, मीठे-मीठे  बोल। 

कटु बोली  झगड़ा करवाती, मधु करवाती मेल, 
बोली बोलो  जब भी भाई, शब्दों को लो तोल। 

शब्दों से  वाणी  सजती है, शब्दों को पहचान, 
शब्दों से ही रिश्ते चलते, समझो इनका मोल। 

शब्दों से  ही  जीते  दिल को, हर  कोई   इंसान, 
है  शब्दों का इस जीवन में, काफी अच्छा रोल। 

'अत्री' जब भी लिख तू कविता, चुनना उत्तम शब्द, 
खुलकर  अपनी  बातें कह तू, मत  कर बातें गोल। 
•••एवं 👇

मन जब भी विचलित होता है, मानव खोता धीर। 
समझ न पाता  रोने लगता, सहन न हो जब  पीर।। 
ठीक  बात  कोई  समझाये, होती  गलत  प्रतीत-
चाहे     बंदा    साधारण     हो, चाहे   कोई    वीर।। 
🎈
धीरज  वाले  इस  दुनिया में, होते  जो  इंसान। 
दुख-सुख उनको लगते भाई, दोनों एक समान।। 
मुसीबतों से  डटकर लड़ते, खोते  नहीं विवेक-
बाल न बाँका  कर सकता है, आये यदि तूफान।। 
🎈
मन  में  जो  ताकत  रखते हैं, सफल  रहें वे लोग। 
सही चीज  का  सही वक्त पर, करते  हैं उपभोग।। 
तन की ताकत दुर्बल समझो, होता सहन न कष्ट-
लग जाता  है दुर्बल मन को, तरह-तरह का रोग।। 
🎈
नहीं   साथ  यदि  कोई   देता, देते  हैं  प्रभु राम। 
दुनिया कहती आयी जग में, निर्बल के बल राम।। 
सुबह-शाम को  पूज राम को, मन में मूरत धार-
आज नहीं  तो कल बदलेंगे, किस्मत  तेरी राम।। 
•••एवं 👇

अनजानी राहों में मिलते, जब परिचित इंसान। 
कितना भी  हारा हो  बंदा, होती   दूर  थकान।। 
🍒
तन-मन दोनों  खिल जाते हैं, मुख पर आये नूर। 
मंजिल भी जल्दी मिल जाती, बेशक लगती दूर।। 
कठिनाई  यदि  हो  राहोंं  में, हो  जाती आसान। 
कितना  भी   हारा  हो  बंदा, होती  दूर  थकान।। 
🍒
खाते   पीते   कटता   रस्ता, बीते   बढ़िया  वक्त। 
एक-एक ग्यारह मिलकर के, बनते बहुत सशक्त।। 
एकरूपता  हो   आपस  में, बढ़  जाती  है शान। 
कितना  भी    हारा  हो बंदा, होती   दूर  थकान।। 
🍒
मिलकर  जो   भी   रहते  बंदे, बन   जाते  हैं पुष्ट।
देख  संगठन    फिर  लोगों का, डर  जाते  हैं दुष्ट।।
तब कोई भी दुश्मन इनका, कर न सके नुकसान।
कितना   भी  हारा हो  बंदा, होती   दूर    थकान।।
🍒
एकल  जब  से हम  लोगों के, हुए यार परिवार। 
लेकर चलते अपने-अपने, सर पर गम का भार।। 
एक साथ यदि रह लें सारे, गम कम हो श्रीमान। 
कितना  भी  हारा हो  बंदा, होती   दूर  थकान।। 
•••एवं 👇

मित्र मतलबी  यदि हो  कोई, साथ  नहीं  दे पाये।। 
सिद्ध करेगा अपना मतलब, एक तरफ हो जाये-
एन  वक्त  पर धोखा दे दे, काम  नहीं  वह आये।। 
नहीं खिलाये तुमको कुछ भी, खूब तुम्हारा खाये।। 
🎈
रखना  दूरी  उस   बंदे  से, पास  न  उसे  बिठाना। 
चाहे   कितनी   मजबूरी   का, गाये   सामी  गाना।। 
झूठ  बोलकर  मीठा  बंदा, मन  में  जगह  बनाये-
लूट लाट कर तुमको चल दे, ढूंढ़ न सको ठिकाना।। 
🎈
पागल लोग  कहेंगे तुमको, जब  चूना  लग जाये। 
दुश्मन को यदि पता लगेगी, घर  में  खुशी मनाये।। 
चालबाज़   इंसान   हमेशा, धोखा   ही   देता  है-
गिरगिट जैसा रंग बदलकर, वह तुमको दिखलाये।। 
🎈
दोस्त  बनाकर  इक  बंदे  से, हमने  धोखा खाया। 
कम कीमत का आलय उसने, मँहगे में दिलवाया।। 
कागज उसके सोंपे  हमको, कब्जा  नहीं दिलाया-
मुश्किल से कब्जा पाया था, सिर काफी चकराया।। 

•••एवं 👇

राधा कहती  कान्हा तुम तो, मेरे  दिल में रहते। 
मुझ पर दु:ख न आने देते, खुद मेरे दुख सहते।। 
🍎
याद करूँ कान्हा जब तुमको, बाहर दिल से आते।
देख  बाबरी  इस  राधा को, तब  दर्शन   हो  जाते।। 
मैं अपनी  बातें  बतलाती, तुम  भी  अपनी कहते। 
मुझ पर  दु:ख न  आने देते, खुद  मेरे  दुख सहते।। 
🍎
खुशी मुझे मिलती है भारी, सम्मुख जब तुम होते। 
नहीं    सामने  यदि  तुम  आते, नैना   मेरे  रोते।। 
पल भर  के  अंदर  ही काफी, आँसू  मेरे बहते। 
मुझ पर  दु:ख न आने देते, खुद मेरे दुख सहते।। 
🍎
कितना भी कुछ कहे जमाना, मुझको मत ठुकराना। 
रहना    मेरे   पास   कन्हैया, नहीं    दूर  तुम  जाना।। 
साथ   खड़े   जो  मजबूती से, नहीं  मकां  वो ढहते। 
मुझ  पर  दु:ख  न  आने  देते, खुद  मेरे दुख सहते।। 
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💐छप्पय छंद 💐
करते सभी बखान,           पूजते हम नारी को। 
करता मान समाज,        मानता सम नारी को।।
करे जगत उद्धार,         मातु कल्याणी बनकर। 
जग का है आधार,     सदा वह नर की सहचर।।
नारी के सम्मान की,         गाते गौरव गान की। 
व्यथा-कथा बलिदान की, नारी के उत्थान की।।
🌻••••एवं~👇~🌻
विधान- 16,13 यति, (चौपाई+दोहे का विषम चरण)

सबसे  न्यारा  सबसे  प्यारा,      भारत  अपना  देश  है
मिलजुलकर  रहते सब जन हैं, नहीं किसी को क्लेश है।।

धरती सुंदर अंबर सुंदर,        अनुपम  चले  समीर  है। 
पर्वत झरने नदी सरोवर,        कल-कल बहता नीर है।।
कलरव करते पंछी सुंदर,       अद्भुत  यह  परिवेश  है। 
मिलजुलकर रहते सब जन हैं, नहीं किसी को क्लेश है।।
🍒
श्रम करते हैं कृषक यहाँ पर,        हरे-भरे ये खेल हैं। 
फसल उगाकर करते पोषण,    काम करें   पर हेत है।।
जग के पालन-कर्त्ता ये हैं,             धरती के सर्वेश हैं। 
मिलजुलकर रहते सब जन हैं,नहीं किसी को क्लेश है।।
🍒
बाहर भीतर लड़ी लड़ाई,          अब न कहीं आतंक है। 
महकी फिर केसर की क्यारी,      चमके भाल मयंक है ।।
विघ्न सभी अब हट जाएँगे,           रक्षा-हित विघ्नेश हैं। 
मिलजुलकर रहते सब जन हैं,   नहीं किसी को क्लेश हैं।।
💐•••एवं •••👇•💐
विधान- 14,14 पर यति, अंत में वाचिक  चौकल. 
मौसम बदल-बदल जाये । 
ऋतु शिशिर शीत फैलाती, तन-मन को मनुज बचाये ।।
बादल  घेरे  सूरज  को,        घना  कोहरा  अब  छाये ।
कभी-कभी  वर्षा  ओले,         मेघा  आफत  बरसाये ।।
हर फसल-चक्र पर ऋण को,  बेचारा  कृषक   चुकाये । 
बनी मुसीबत खेती अब,       बार-बार  मुँह  की  खाये ।।
वने-सहायक  शासन  यदि,    मन  किसान  का  हर्षाये । 
करे 'श्याम ' जग का पोषण,    भगवान  धरा  कहलाये ।।
💐•••एवं ~👇~💐•
जीवन की इस संध्या में अब, मन करता यह मंथन। 
उम्र-जिंदगी  बीती  सारी,   अस्त-व्यस्त मन-रंजन ।

गुणा-भाग में लगा रहा मन, शेेष-नहीं अब कुछ भी,
कभी न जागा प्यार  हृदय  में,   बजरी  सा  संवेदन । 

माना होता सारे जग को, यदि अपने घर जैसा,,
सब सपने ये पूरे होते,  सुखमय  होता  जीवन । 

अब भी चाहो पा सकते हो,  मन की साध-अधूरी,
आस-पास जो जन रहते है,  रुके-सभी का क्रंदन । 

सिद्ध-मंत्र से मिले सफलता,  नित्य-साधना होगी, 
जपूँ हृदय में आज ईश को, करके परहित चिंतन । 
••••एवं 👇
🌹🌷साथी छंद पर आधारित मुक्तक 🌹🌷
विधान - 23 मात्राभार, 12,11 पर यति. 
यति पूर्व वाचिक गा गा, यति के बाद अंत में गाल अनिवार्य. 

साथी सबसे कहना,       करें सभी से प्यार ।
सबकी बातें सुनना,      जीवन है दिन चार । 
मन को वश में रखना, प्रभु को करना याद -
राम नाम तुम जपना,       होगा  बेड़ा-पार । 
🍒
जियो जिंदगी सादी,   कभी न होगा रोग । 
खान-पान हो सादा,   मानो छप्पन भोग ।
बिखरी स्वर्णिम माया, आयी सुंदर भोर -
पंछी करते कलरव, करो सभी अब योग । 
•••एवं 👇
विधान- 16,12 यति, प्रथम चरण का यति पूर्व समतुकांत अनिवार्य, प्रथम चरण का प्रारंभ व यति पूर्व चौकल से.

भारत माता तव अभिनंदन,      करते हम सब वंदन। 
गाते जन-जन जय यश-गाथा, कहीं न हो अब क्रंदन। 
रक्षा  कर  सीमा  की  प्रहरी,         देते  हैं  अवलंबन। 
श्रम की पूजा हम सब करते, जय-जय हे दुख-भंजन। 
🎈
माता न्यारी तेरी ममता,       मिले न  जग में  समता। 
बढ़ता जाता कोष हमारा,       बढ़ती  जाती  क्षमता। 
जय यश गाधा का हो गायन,    मन यह तुझमें रमता। 
जीवन में शुभ मंगल आशा, कभी न दुख यह थमता। 
•••👇
🍎हंसगति छंद पर आधारित गीत:-🍎
विधान -  20 मात्राभार , 11, 9 (3,2,4), पर यति, दोहे का सम चरण, अंत वाचिक चौकल. 

मन में हो अधिवास, मातु वरदाई। 
कभी न हो संत्रास, मातु सुखदाई। 
🍒
जीवन संकट मुक्त, सँवारो माता। 
करना बेड़ा-पार,    उबारो माता। 
महिमा अपरंपार, जयतु  हे  माई। 
कभी न हो संत्रास, मातु सुखदाई। 
🍒
करती सदा दुलार,   सदा दे ममता। 
माने सबको एक,    रखे माँ समता। 
माँ की कृपा अनंत, खुशी भरपाई ।
कभी न हो संत्रास, मातु सुखदाई। 
🍒
विपदा का हो अंत, दया माँ करना। 
छाये सदा बसंत,  पातु  माँ  रखना। 
कोयल  गाये  गीत,  मस्त  अमराई। 
कभी न हो संत्रास,  मातु  सुखदाई। 
•••एवं 👇
🎈योग छंद आधारित मुक्तक:-🎈
🍒विधान- 20 मात्राभार, 12,08 पर यति, अंत में 122 
💐
प्राॅची में रवि निकले,   नित्य सबेरे। 
चादर  लेकर  भागे,      दूर  अँधेरे। 
उठकर मित्रो घूमों,  लाभ अनेकों -
सुंदर स्वर्णिम किरणें, भोर बिखेरे। 
💐
पंछी कलरव करते,    रोज सबेरे। 
सतरंगी  यह  सुंदर,    मेघ  घनेरे। 
कुदरत ने तूली से,  चित्र  बनाये -
अद्भुत अनुपम देखो, रंग बिखेरे। 
••••एवं 👇
ताटंक छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान- 30 मात्राभार, 16,14 पर यति, अंत में गुरु गुरु गुरु. 

सारा जीवन व्यर्थ गया यह,  यूँ  ही  खींचातानी  में। 
नहीं याद प्रभु को कर पाया, अपनी इस नादानी में। 

उलझे-उलझे कुछ  सवाल  हैं,  इनके  उत्तर  कोई  दे, 
और न जागे यदि तुम अब भी, क्या करोगे जवानी में ।

पत्थर पर यह जड़ें  जमाती, जिजीविषा जीने की, 
यूँ भी तो कुछ मुरझा जाते,  पौधे  गहरे  पानी  में। 

पीर पराई कब पहचाने,   देखें   बस  अपनी  पीड़ा, 
खुद का ही नुकसान कराते, दिखते हैं अभिमानी में। 

मौसम के यह तेवर देखो, शीत अधिक दहलाता है, 
सड़कों पर जो  रात  बिताते,  हैं  बड़ी  परेशानी  में। 
•••••एवं 👇
विधान- मात्राभार-15,, अंत में गाल अनिवार्य. 

कलम आज जय भारत बोल। 
आपस में अब विष मत घोल।।

सारे   जग    में    तेरा    मान। 
बढ़ती    जाए     तेरी     शान। 
कचरा   रखना   घर   से   दूर-
अब  बच्चों  को  रहता  ध्यान। 
खेलें   साथी    बन   हमजोल। 
आपस में अब विष मत घोल।।

करना   अपने     पूरे    काज। 
छू लो बढ़कर  नभ को आज। 
भरना  सबको   बड़ी   उड़ान-
आगे  बढ़ने   का   यह   राज। 
नहीं   बराबर     कोई    तोल। 
आपस.में अब विष मत घोल।।

रखना  आपस  में   सब  मेल। 
खुशियों  को  तब  लाती  रेल। 
कभी न जाना  अब  तुम रूठ-
खेलो    प्यारे     सुंदर    खेल। 
बचपन  मित्रो   यह  अनमोल।
आपस में अब विष मत घोल।।

लुका-छिपी  का   खेलें  खेल। 
बादल  सूरज  का  कब   मेल। 
बढ़ती   जाती   है   यह   ठंड-
डाले   इसको    कौन   नकेल। 
बजें    नगाड़े     बाजे     ढोल। 
आपस में अब विष मत घोल।।

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माना मुश्किल पथ है जीवन , पर क्यों हिम्मत हारे ।
अँगड़ाई  में  भरकर  योवन  , रे  मन  चलता जा रे ।।
माना  लाखों शूल मिलेंगे ,  ठोकर भी खाएगा ।
हिम्मत से ही फूल खिलेंगे , और महक पाएगा ।।
रुककर क्या हासिल होगा मन , चलकर पछताना रे ।
अँगड़ाई  में भरकर योवन , रे मन चलता जा रे ।। ,,, 
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लाखों बंध लगा लो जल पर , अपनी राह बनाता ।
सूरज भी दुपहर में तप कर , सांँझ ढले ढल जाता ।।
समय बदलकर ठहरे आंँगन , ऐसी  युक्ति  बना  रे ।
अँगड़ाई  में  भरकर  योवन , रे  मन  चलता  जा रे ।। ,,,,
🍒
तू  चाहे  तो  सागर  मापे  ,    अम्बर  मुट्ठी  भर  ले ।
पग आहट से गिरि भी कांपे , जो तू निश्चय कर ले ।।
तेरे  साथ  चलेगा  आनन ,  हिम्मत  पंख  लगा  लें ।
अँगड़ाई में  भरकर  योवन  , रे  मन  चलता  जा रे ।। ,,,,
🍒••••एवं ••👇🍒
रंगों में बँटता संसार ।
कुदरत रंगों से करती है , जीवन को गुलजार ।।
मानव मतलब मैं अन्धा हो , बाँट रहा घर-द्वार ।
इसका रंग हरा है  उसका ,  केसरिया  रतनार ।।
नीला रंग किसी ने अपना ,   बांट दिए परिवार ।
धर्मों  को  रंगों  में  बाँटा  ,  यह  कैसा आधार ।।
रंग कलुष का छाया मति पर , कैसे हो उजियार ।
"माही" प्रभु से विनती करते , हर लो बुद्धि विकार ।।
••••एवं •••👇
#गीतिका_सृजन , (अपदान्त )
बादल  को  भी रोते  गाते ,  हमने देखा है । ,,,,,
बिन मौसम आंसू बरसाते , हमने देखा है ।। ,,,,

अस्तीनों  में  खंजर  देखे , लालच के रिश्ते ।
मतलब वाली प्रीत निभाते , हमने देखा है ।। ,,,,

धुँआं दिखाकर चूल्हे में माँ , भूख छिपाती थी ।
लोरी  से  बच्चे   बहलाते  ,  हमने  देखा  है ।। ,,,,

लाख महल बनवाए बापू , जीवन पूँजी से ।
वृद्धाश्रम  में  उम्र  बिताते , हमने  देखा है ।। ,,,,,

आपस में लड़कर मर जाते , चमचे नेता के ।
नेताओं  को  जाम  लड़ाते ,  हमने देखा है ।। ,,,,,

धर्म ज्ञान बतलाते पांड़े ,  धन दौलत झूठी ।
उसी ज्ञान से लाख कमाते , हमने देखा है ।।

सच्चे "माही" कब मिलते हैं , कलि की ड्योढ़ी पे ।
सिर्फ  हवस  में  जान गँवाते ,   हमने  देखा  है ।। ,,,,
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फिरे सदा चहुंओर जगत मन ,चंचल बड़ा हमारा है।
देखें सुन्दरता ये नाचे, हमको नहीं गवारा है।।
रहे सदा मन काबू अपना,  कब ये पार उतारा है।।
बुद्धि चले चतुराई से ही,काम बुद्धि का सारा है।।
🍒
चलें साथ हल्की बातों के, नहीं सार पर चलता है।
चलता उल्टी राहों पर मन,नहीं सत्य पर बढता है।।
नहीं अधिक आजादी देना,डोर पकड़ मन रखना है।
सदा नजर रखना हर गतिविधि,सभी बुद्धि से करना है।।
🌻•••••एवं~👇~~🌻
राज छुपा कर राजा बनते,  कभी न मन के राजा।
काज कपट के करते जग में,कभी न उत्तम काजा।
नहीं भुलाया जा सकता गम,छुपने से बढ़ जाता।
जी हल्का हो जाता थोड़ा,    कहने से घट जाता।
💐
उमड़ घुमड़ कर मन करता है,कह दें मन की बातें।
दर्द भरी आंखों में जो थी,        कैसे गुजरी रातें।
भटके राही कई जगत में,  थे वह जग के किस्से।
थोड़े सुख दुख झेले सबने,     आये सबके हिस्से।
🌻•••एवं •••👇•••🌻
सावधान रहना सब, रहे नहीं कुछ कमियां।
आंखों में अब सबके,रहे दीन हित नमियां।।
दया भाव परिचायक, नेकी हर मानव में।
करें दुष्टता जग में,बदी भरी दानव में।।
💐
सनम अदाओ पर हों,इस जग  बेताबी में।
सदा निराले नखरे,हो वही नवाबी में।।
अल्हड़ कमसिन जग में ,बहके यहां जवानी।
वही प्यार में गिरती,होती यही कहानी।।
🌻••••••एवं ••👇•••🌻
मान रखो सब हिंदी का अब, शान हमारी हिंदी।
सकल विश्व में मानें सब,      ये माथे की बिंदी।।
बढ़े शान अब भारत माता,  परचम हो अब हिंदी।
इसने विपदा झेली जीवन,  हर तूफां रह जिंदी।।
💐
करो उत्थान हिंदी सारे,  सकल विश्व जा जाये।
इसका लोहा मानें  सब  जग, गीत इसी के गाये।।
नहीं सफल दुश्मन के करतब, श्रेष्ठ ज्ञान जग देती।
ज्ञान निस्वार्थ बांटे जग को, नहीं कभी कुछ लेती।।
•🌻•••एवं ••👇•🌻
चरणांत-22/112/211/1111

लिप्त सभी धन लोलुपता में,दुनियां धन दीवानी।
नहीं ध्यान दे धर्म पुण्य में, करते  सब मनमानी।।
परहित जीवन नहीं करे वह ,करते व्यर्थ जवानी।
नहीं ध्यान सेहत पर अपनी,बिन कारण कुर्बानी।।
🍒
अच्छे काम बतायें सज्जन,करता है आनाकानी।
जो चलते सदराह जगत में,कोई न होता सानी।।
इज्जत के बिन दौलत जग में,हो जाती  बेमानी।
पार लगाता ईश प्रेम जग,अब हरि भक्ति कमानी।।
🍒विधान-16/14 मात्रा भार चरणांत -गा गा🍒

विवश सदा मजबूर यहां है, क्यों बेबस होती नारी।
शर्म नयन पट्टी बांधी है,     रही सदा ही लाचारी।।
सहती अत्याचार वही क्यों, होती आधी आबादी।
संस्कार सारे सुन्दर हैं,      दो नारी अब आजादी।।
🍎
सभी निभाती फर्ज सदा वह,सुर नर मुनि हरि महतारी।
त्याग करें हर स्वार्थ सदा वह,फिर भी बेबस क्यों नारी।।
ध्यान सभी का घर पर रखती,भेदभाव कब वो  करती।
विपदा आती कभी किसी पर,निर्भय होकर वह लडती।।
🍎
जब तक खुद को छलते जाओ, सदा पिछड़ते ही जाते।
सतत लगन से काम करो सब,तब ही हम मंज़िल पाते।।
कब तक नकल करोगे तुम, कब तक निज लक्ष्य तजोगे।
कब तक आलस निद्रा में रह,       मंज़िल से दूर रहोगे।।
🍎
देख देख औरों की खुशियां,कब तक खुद हाथ मलोगे।
विजय मिलेगी किस दिन तुमको,कब तुम स्वाद चखोगे।।
तुम भी कुछ करके दिखलाओ, जीवन में नाम कमाओ।
बड़ा कीमती जीवन दे प्रभु,       यूं ही तुम नहीं गंवाओ।।
🍎
कब तक आस करो दूजों की,कुछ अपने बूते पाओ।
सदा हौसले मंज़िल देते,कुछ तो हिम्मत दिखलाओ।।
मान और सम्मान मिले जग, जग में कुछ कर दिखलाते।
आंख चुराते सदा कर्म वो,          सदा देखते रह जाते।।
••एवं👇
रखता ज्यों परिवार सभी को,राजा तकलीफें जानें।
समझे हरदम पीर प्रजा की,दर्द हृदय का पहचाने।।
बनें प्रजा का ईश हमेशा, स्वार्थ सदा वह खोता है।
समझे सबको मीत हृदय से, राजा सचमुच होता है।।

करे प्रजा परमार्थ सदा वो, बनें त्याग से वह प्यारा।
नहीं रहे मद चूर हमेशा, ध्यान प्रजा रखता सारा।।
रक्षा करता देश रात दिन,भान‌ रहे सदा वतन का।
दे न सजा निर्दोषों को वह,भला हमेशा हो मन का।।

होती जो भी आय प्रजा से, करे प्रजा काम हमेशा। 
बना कुंये तालाब बावड़ी ,प्रजा हेतु ले संदेशा।।
प्रजा हेतु उपकार करे वह, छाया हित पेड़ लगाये।
नीर सभी को मिले हमेशा, बहुतेरे कुंये बनाये।।

करे प्रजा इमदाद जरूरी, दर्द पीर में ‌जो रोती।
करे नहीं कुछ भेद कभी भी,सबसे ही समता होती।।
करे प्यार अपने बच्चों सा, करता इच्छाएं पूरी।
सदा पता करता इच्छाएं, नहीं कभी रखता दूरी।।
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सारा-जग-जगमग है सोनिल,खिली सुनहरी भोर ।
गाते पंछी गीत उड़े सब,  नील  गगन  की ओर ।। 

राम रमे हैं सबके उर में, हर्ष  खुशी उल्लास ,
लाख करोड़ों दीप जले हैं ,मिटी निराशा घोर। 

जीवन में  संघर्ष  बहुत है,पग-पग बिखरे शूल,
लगे समय का फेर कभी तो, चलता कब है जोर।

रिश्तों में जिन्दा रखना है, जनम-जनम का प्यार ,
प्रेम और विश्वास रहे तो, कभी न उलझे डोर। 

नेह हृदय का बाँटें थोड़ा,यह अनुपम उपहार, 
गूँज रहा हर ओर जहां में, घृणा द्वेष का शोर।

मानुष तन जब पाया यह तो,कर लें कुछ शुभ कर्म ,
जीवन की सुंदर बागिया तब, महकेगी  हर छोर।
••••••एवं 👇

सच्ची मेहनत लगन रहे तो,किस्मत फलने लगता है।
मुश्किल बाधा सारा मग का, अपने टलने लगता है।

कर्म सदा जिसकी पूजा वो, पलता है संघर्षों में, 
समय गँवा कर सोता उसको,दूर्दिन खलने लगता है।

दुख के काले बादल छाए, दिखता नहीं किनारा जब,
जप-तप साधन हरि नाम से, संबल मिलने लगता है।

अगर निराशा घेरे मन को,आशा नई जगा लें,
कोशिश करने से आशा की ,दीपक जलने लगता है।

सभी चुनौती जिसने हँसकर,स्वीकार किया जीवन में,
नई-नई राहें उन्नति के, निश्चिय मिलने लगता है।
•••एवं 
1
दुख सुख सबको मान चलें हम, जीवन में उपहार ।
संयम  होता है जीवन में, सब  सुख के आधार ।
2.
नहीं दया का भाव हृदय में, धर्म-कर्म सब व्यर्थ ,
सबसे बढ़कर धर्म  यही है,   जीवों पर उपकार।
3
कपटी मानव ही करता है,जग में सदा अनर्थ,
शुद्ध,साफ, बेदाग हृदय में, ही बसते करतार।
4
बदले वाली भाव हमारी , कर देती अलगाव,
नफरत का परिहार करें तो,बढ़ता मन में प्यार।
5
समय किसी के साथ नही है, सदा बदलता रंग,
व्यर्थ बीत जाए मत साथी ,तेज समय की धार ।
6
सहज सरल व्यवहार रहे तो,मिलता है सम्मान 
चाह यही करते रहना है ,निर्मल हो आचार ।।
7
अपनें हाथो ही हम सब को, लिखनी है तकदीर ,
श्रम के दोनों हाथों पर यह , चलता है संसार।

•••एवं 👇
🎈१६-१२ यति चौकल चरणान्त चौकल 🎈

राहों के काँटों को चुनना , जिस पर चलते रहना।।
सुख-दुख के झंकृत तारों पर, गाते गीत विचरना।।
बहती जाए धार समय की, संग उसी के बहना।।
यह जीवन है सुंदर बगिया, फूलों जैसे खिलना।।
🍒
ऊँच नीच का भेद मिटाकर ,कहना सबकी सुनना।।
दया धर्म कहते हैं किसको, इन बातों को गुनना ।।
जीवन है ये कठिन साधना, मान हानि सब चखना।।
साथ नहीं है कोई किसी के, श्याम  सलोने  भजना ।।
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सुनकर कड़वे बोल, कभी भी मत घबराना।
करना चिंतन आप, सत्य ही मुझको पाना।।
भिन्न -भिन्न सब लोग, प्रकृति है सबकी न्यारी।
कोई देता प्यार, किसी की बोली भारी।।
होना नहीं हताश है, हृदय आस फिर जागती।
'हिम्मत' भरना रंग नव, सभी निराशा भागती।।
🌷•एवं •••👇•🌷


पाँव रखेंगे इस धरती पर,आसमान को छू लेगें।
डोर रखेंगे अपने हाथों, सपनों को  हम पर देंगे।।
कदम -कदम जब साथ चलें तो, कहो कौन कब हारा है।
💐
नहीं गिरा कर कभी हँसेंगे, सबको गले लगाना है।
सच के बनें पुजारी सारे, सबका साथ निभाना है।।
तोड़ेगे हम तम की कारा, बदले युग की धारा है।
💐
तोड़े नफरत की दीवारें, बाधक इनको हम मानें ।
सारे हैं हम भाई-भाई, सत्ता एक ईश जानें।।
क्यूँ व्यसनों के दास बनेंगे,वादा हमको प्यारा है।

🌻••एवं •👇•🌻
🎈आल्हा छंद 16,15 मात्रा भार, अंत गाल ( पदावली ) 
हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा  कोलकाता✍️
🌻~~~~~~एवं ~~👇~~~~🌻

नये सब्ज नव बाग लगा कर।
नया तराना हम गायें।।

नव बसंत देता संदेशा,
बीती बातें बिसराना।
लहरायेगी फिर से फसलें,
कोयल गायें फिर गाना।।
दीप जलेंगे मैत्री के अब,
नयी रौशनी फिर लायें।
शुभ भविष्य हो सबका आगे, 
नया तराना हम गायें।।
🍒
शस्य श्यामल इस धरती पर,
समता  परचम लहराना।
अभयदान का बिगुल बजा कर,
राज सुखों का बताना।।
छोड़ो अपने अहंकार को,
मैत्री जीवन अपनायें।
शोषण क्यों हो अब धरती का,
नया तराना हम गायें।।
🍒
नयी फसल अब नये बीज से,
श्रम से हमको लहराना।
चहक उठेगा अग-जग सारा,
वो गूँथे  ताना बाना।।
हर कण महक उठे धरती का,
ऐसा कर के दिखलायें।
होगी सबकी आशा पूरी,
नया तराना हम गायें।।
•••एवं 👇
विनती बारम्बार, शारदे आओ।
हरो सकल अज्ञान, रूप दिखलाओ।।
💐
मेटो भव के क्लेश, ज्ञान की दाता।
तोड़ो बंधन आज, आप ही माता।।
चाहूँ हर पल साथ, हृदय हरसाओ।
हरो सकल अज्ञान, रूप दिखलाओ।।
💐
लिखूँ नये मैं छंद, कृपा माँ करना।
हस्त रखो मम शीश, नाव ये तरना
शरण मिले ये मात, हृदय हरसाओ।
हरो सकल अज्ञान, रूप दिखलाओ।।
💐
भरना नया प्रकाश, तमस ये भागे।
टूटे सारे पाश, मान को त्यागे।।
जग जननी हे मातु, सवेरा लाओ।
हरो सकल अज्ञान, रूप दिखलाओ।।
💐
भरना नव उम्मीद, रंग नव भर दो।
जगमग जागे ज्योति, आप ये वर दो।।
'हिम्मत' दो वरदान, बाग सरसाओ।
हरो सकल अज्ञान, रूप दिखलाओ।।
••••एवं 👇

आयेगा नव वर्ष, गान हम गायें।
करें विदा बाईस, नहीं घबरायें।।
🍒
देना होगा ध्यान, व्यर्थ क्यूँ खोना।
खोकर सारा वक्त, नहीं फिर रोना।।
हर क्षण है अनमोल, कद्र ये करना।
पाओगे नित चैन, बहे सुख झरना।।
आओ मिलकर आज, क्रांति नव लायें
करें विदा बाईस, नहीं घबरायें।।
🍒
आये कब फिर लौट, समय जो जाता।
जैसा करते कर्म, लौट फिर आता।।
महावीर संदेश, समय पहचानो।
करें वक्त पर काम, राज ये जानो।।
रहता सदा समान, नहीं भरमायें।
करें विदा बाईस, नहीं घबरायें।।
🍒
पंख बड़े हैं तेज, भाग ये जाता।
गया हाथ से छूट, हाथ कब आता।।
कब बदले ये रंग, कौन ये जाने।
बड़े -बड़े सब ढ़ेर, सभी ये माने।।
पकड़ा जिसने हाथ, खुशी सब पायें।
करें विदा बाईस, नहीं घबरायें।।
••••एवं 👇
मुक्तक विष्णु पद छंद 16,10 मात्रायें,अंत गुरु

महामंत्र नवकार हमारा, है सबल सहारा।
जाप जपे जो सच्चे मन से, तोडे़ भव कारा।
मंगलकारी विध्न विनाशक, उत्तम है सबसे-
'हिम्मत' नित उठ इसको जपना, सबसे है न्यारा।।1।।
🎈🎈
सरसी छंद मुक्तक-16,11मात्रा-

पार्श्वनाथ को करती वंदन, नित उठ बारम्बार।
देव सहायक रक्षा करते, देते सिद्धि अपार।
उपसर्ग दूर रहते हैं सारे, विषधर का विष दूर-
'हिम्मत' लोहा पारस बनता, पार्श्व नाम सुखकार।।2।।
🎈🎈
तमाल छंद मुक्तक,19 मात्रा-

करती वंदन आदिनाथ को आज।
सुमिरन से सब सफल बनेंगे काज।
असि मसि कृषि का दिया जगत में ज्ञान-
'हिम्मत'  हर जन करता है ये नाज।।3।।
🎈🎈
शृंगार छंद-
धर्म से कर ले अब शृंगार।
जगत से होगा तब उद्धार।
साथ में जाये यह इंसान-
बनेगा परभव का आधार।।4।।
🎈🎈
चौकड़िया छंद- 16,12 मात्रायें-

चुगली करना  सारें छोड़ें, प्रीत स्वयं से जोड़ें।
पाप बड़ा है यह दुखदायी, मुख को अपना मोड़ें।
गहरा दलदल डाले सबको, अपनी कमियाँ देखो-
लत यह गंदी मानें सारे, नाता इससे तोड़ें।।5।।
🎈🎈
प्रदीप छंद-
नहीं उपेक्षा करो समय की, यह सबसे बलवान है।
समझी कीमत जिसने इसकी, बनता वही महान है।
क्यों भविष्य की चिंता करते, बीत गया वह छोड़ दे-
वर्तमान पर ध्यान लगाओ, मिलती नव पहचान है।।6।।

हिम्मत चोरड़़िया प्रज्ञा कोलकाता
•••••एवं 👇

जाये फिर से हंस अकेला, दो दिन का ये मेला।
कर्म नचाये नाच यहाँ पर,   करते सारे खेला।।

कोई हँसता कोई गाता,     कोई नीर बहाता।
कोई महलों का है वासी, कोई खूब रुलाता।।
लिखा भाग्य में जिसके जितना, उतना ही वह पाता।
जाना सब कुछ छोड़ यहीं पर, क्यूँ माया भरमाता।।

जाने की जब आये बेला, चले न भाई ढ़ेला।
कर्म नचाये नाच यहाँ पर, करते सारे खेला।।

तू ही अपना सबल सहारा,    कर लो आज किनारा |
डोरी ले ली जिसने हाथों,         बोलो कब वो हारा।।
भाग्य विधाता खुद बन जाओ, सुरभित जीवन सारा।
नेकी कर दुनिया से जाना, बनो , अटल ध्रुव तारा।।

कहता गुरु सुन ले रे चेला, जीवन पानी रेला।
कर्म नचाये नाच यहाँ पर, करता सारा खेला।।

क्यों जीवन को व्यर्थ गवाएँ , क्यों ममता भरमाएँ।
लिखें भाग्य अब अपने हाथों, देव इसे ललचाएँ।।
जब जागेंगें तभी सवेरा, गीत भक्ति की के गाएँ।
'हिम्मत' पुण्य उदय में आये, भीतर में रम जाएँ।|

जो भी आकर बनता गेला, उन्हें समय ने पेला।
कर्म नचाये नाच यहाँ पर, करते सारे खेला।।

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प्रेम  भावना  आज ,   नहीं  है  पहले   जैसी ।
मन से  नहीं  लगाव ,  बनी  हालत  ये  कैसी ।।
मतलब  से  सब  लोग ,  बोलते  मीठी  बानी ।
नहीं प्रेम बिन काम , बनी  ये  आज  कहानी ।।
टूट रहे परिवार  भी , नहीं  प्रेम  का  भाव  है ।
"गिरधारी "सब देखता , बात बात का घाव है ।।
🌻•••एवं ••👇🌻
सर्दी से बचना रे ! भाई ।
सर्दी  लगकर  काम  बिगाड़े , बिगड़े  हाल  सवाई ।।
धीरे. धीरे  खाँसी  बनती ,    चमड़ी  अब  मुरझाई ।
बने  बिमारी  हालत  बिगड़े ,  अब क्या करे रजाई ।।
खाना  पीना  नहीं  पचे  अब ,  बैठे  आग  जलाई ।
मन ये कुछ भी नहीं माँगता  ,  तन की नींद उड़ाई ।।
फिर ये तन का  ताप बढ़ावे  ,   बदन उदासी छाई ।
दवा बैद की  लो  "गिरधारी" , जाकर लोग लुगाई ।।
🌻•••एवं •👇•🌻

दिन दिन देखो धन की भारी  , भूख बढ़ी संसार में ।
नहीं किसी का कोई  होता , मिले नहीं  व्यवहार में ।।
🧭
प्रेम भावना  डूब गई अब ,  बोले सब जन लोभ से ,
दिखावटी है  भाई  चारा ,  मतलब है अब  प्यार में ।
🏝
जन जन में अब स्वार्थ भरा है ,आँखें कहती बात को ,
दिल  सूना  है  अपनापन से ,   डूबा नफरत  भार में ।
🌋
लालच छाता जन जन में अब , दया धर्म दिखते नहीं ,
होड़ लगी आपस में भारी ,   बहे  लोभ  की  धार  में ।
🗾
भाई   भाई    बैरी   बनते  ,   टाँग  खिचाई  ये  करे ,
समझ  गई  सबकी " गिरधारी " ,  बुरे बने बेकार में ।गिरधारी लाल मीणा बस्सी ( जयपुर ) राजस्थान✍️
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••••एवं••••👇

लीला  तेरी  अजब  निराली ,   अचरज  तेरी  माया ।
सबका  मन  मोहे  ये  रचना , सुन्दर  जगत  बनाया ।
🎈🎈
नित नित आकर  रमन करे सुर ,भाता जग ये सारा ।
सुन्दर सुन्दर उपवन सजते , निर्मल  जल की  धारा ।।
प्यारी प्यारी खुशबू  आती  ,   सुख  पाती  ये  काया ।
लीला  तेरी  अजब  निराली ,    अचरज  तेरी  माया ।।
🎈🎈
कल कल करती नदियाँ बहती , सबको  देती  पानी ।
सुन्दर  सुन्दर  बाग  बगीचे  ,    कोयल  बोले  बानी ।।
रंग  बिरंगे  पक्षी  उड़ते  ,      सबने   मौज   उड़ाया ।
लीला  तेरी  अजब  निराली ,    अचरज  तेरी  माया ।।
🎈🎈
सुन्दर  गिरि  ये  गहरे  सागर ,    कहीं  चाँदनी  रातें ।
मन  भाती  हरियाली  सजती ,   बड़ी अनोखी बातें ।।
बहुत  सुहाना जग " गिरधारी " , कहीं धूप ये छाया ।
लीला  तेरी  अजब  निराली  ,  अचरज  तेरी  माया ।।।

••••एवं 👇
🎈विधा - मुक्तक आधार - सरसी छंद (१६,११=२७ )🎈

आज जमाना बदल रहा है , नित नित बदले लोग ।
फँसे लोभ  में  लोभी  करते ,  अपनों का उपयोग ।
प्रेम भावना नहीं  दिलों  में ,   देखे  अपना   लाभ ,
दुनियाँ कहती इसको  जग में , हाय लाल का रोग ।।
🍒🍒
पहले जैसे  नहीं  रहे  जन ,  नहीं  रहा  वो  प्रेम ।
मतलब से मिलते आपस में ,मिलकर खेले गेम ।
अपना पन तो डूब रहा है ,  दिल में बसता लोभ ,
आदर  करना  छोड़  रहे  अब , नहीं पूछते  क्षेम ।।
•••एवं 👇

माया प्रभु की सबसे न्यारी , लगती सबको प्यारी ।
कोई नहीं इसे पहचाना ,  इस जग  के  नर  नारी ।।
रचना करे अनोखी जग में , सुन्दर  लगती  भारी ।
प्रभु की प्रभु ही जाने माया ,जगत रचे "गिरधारी "।।
🍒🍒
प्रभु है बड़ा जगत का माली ,    करे  वही हरियाली ।
खिलते सभी फूल उपवन में ,महक रही सब डाली ।।
करता धरता जग का प्रभु है ,प्रभु बिन सब है खाली ।
देखो नजर डाल " गिरधारी " ,   वही  बजाते  ताली ।।
•एवं 👇
विधा - मुक्तक 
आधार - तमाल छंद (19 मात्राभार , चरणान्त गुरु लघु )

निर्मल मन से सीखो  करना कर्म ।
दया करो निर्बल पर  समझो धर्म ।
हरी  धर्म  की  रहती  आई   मूल , 
पाप कर्म से करना सब जन शर्म ।।
🍎🍎
कर्म करो है जीवन  का  आधार ।
कर्म फूल से खिलता यह  संसार ।
महके जग उपवन बिखरे मकरंद,
सुख मय जीवन है कर्मो का सार ।।

••👇
गीत 

रात चाँदनी सुन्दर लगती  , गिरती भू तल में ।
सबके मन को मोहे जब ये,चाँद हिले जल में ।

तारे सारे टिमटिम  करते ,  नभ  सुन्दर  लगता ।
बड़ी निराली लगती छवि जब ,ये बादल भगता ।।
चाँद छिपे बादल में फिर ये , रहता हलचल में ।
रात चाँदनी सुन्दर लगती , गिरती  भू  तल  में ।।

दुल्हन सी लगती धरती ये ,  अति सुन्दर तन है ।
रूप सुनहरा मन को मोहे ,फिर खिलता मन है ।।
भरे नहीं मन देखो सब जन,खुशियाँ हर पल में ।
रात चाँदनी  सुन्दर लगती ,  गिरती  भू  तल में ।।

कभी कभी ये बादल छाते  ,   लगते सुन्दर हैं ।
पक्षी   बैठे  बोली   बोले ,   पेड़ों  में   घर   हैं ।।
झूम रही डाली " गिरधारी " , खग बैठे दल में ।
रात चाँदनी  सुन्दर  लगती ,  गिरती भू तल में ।।
•••एवं 👇
विधा - गीतिका 

अहंकार  कर  लोग , करे   मनमानी ।
मोटे  बोले  बोल ,   सूल  सी   बानी ।

धन दौलत का गर्व ,निभा है किसका ,
सब  जाने  यह  बात ,  नहीं  है छानी ।

नहीं जानते ज्ञान ,  ध्यान  कब  देते ,
होता  सबको  कष्ट ,  उतारे   पानी ।

करे नहीं ये प्रेम ,    स्नेह क्या  जाने ,
अकड़ दिखाते  खूब ,  करे नादानी ।

रूखे  रूखे  शब्द  ,  नहीं  ये  भाते ,
कह  गिरधारी लाल,लोग क्या ठानी 

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झूठ जगत का मेला प्यारे, काहें को घबराना ||
मुठ्ठी बाँधे आया बंदे, खोल यहाँ कर जाना ||

मिथ्या रिश्ते नाते तेरे, माया तुझे लुभाती |
चार दिनों का सफर सुहाना, अंत नहीं पछताना ||

सोना- चाॅंदी धन यश वैभव, चमक -दमक सब फीके |
राम नाम से ध्यान लगाना, मन को मत भरमाना  ||

कठपुतली सा तन ये तेरा, साॅंसों  का सब खेला |
माटी के साॅंचे में ढलकर , माटी में मिल जाना ||

धर्म कर्म का लेखा जोखा, भूख प्यास की झोली |
ईश रचाएं रास यहाँ पर, सुख - दुख का  है गाना ||
सुनीता सिंह सरोवर (देवरिया) ✍️
•💐••••••एवं  •••👇•••💐
सृजन पंक्ति-इस दहेज के कारण जग में, बढ़े कितने पाप |

सौप जिगर के टुकड़े को भी, क्यों सहें संताप |
इस दहेज के कारण जग में, बढ़े कितने पाप ||
🎈🎈
रीत पुरानी चलती आई, करते सुता दान |
पाई- पाई जोड़ पिता भी, करते न अभिमान ||
बड़े लाड से बेटी पाले,सहती वही ताप |
इस दहेज के कारण जग में, बढ़े कितने पाप ||
🎈🎈
भूले क्यों तुम बेटे वाले, बेटियाँ अनमोल|
घर बसाने को ही तुम्हारा, दे पिता जी खोल||
घुट-घुट मरती बहू तुम्हारी, क्या यही अभिशाप |
इस दहेज के कारण जग में, बढ़े कितने पाप ||
🎈🎈
 किया भरोसा जिस पर उसने, लेते वही जान |
अपनेपन का नाटक करते, अरु बने अनजान ||
 सिसक सिसक के रोती बेटी, देती वही श्राप|
इस दहेज के कारण जग में, बढ़े कितने पाप||
•••••एवं 👇
सृजन पंक्ति- सोच समझकर मीठा बोलो

सोच समझकर मीठा बोलो, मनकी गाँठ खोल |
रिश्ते होंगे मधुरिम सबसे, रख न मन में झोल ||
🍎
कड़वी बातें तीखी लगती, होते रोज रार |
सागर के पानी को देखो,  लगे कितना खार ||
दुनिया कितनी सुंदर अपनी, लगती सदा गोल |
रिश्ते होंगे मधुरिम सबसे, रख न मन में झोल ||
🍎
जीवन की बगियाँ भी महके, गुन-गुन भ्रमर गीत |
कूके कोयल डाली -डाली, सबको बना मीत ||
विष जैसी है वाणी कड़वी, जैसे बजे ढोल |
रिश्ते  होंगे मधुरिम सबसे, रख न मन में झोल ||
🍎
जोड़ो दिल से रिश्ते प्यारे, मिले सबका साथ |
दुख - सुख भी हैं आते-जाते, चले पकड़े हाथ ||
मीठी बोली भाषा रखिये, वाणी बोल तोल |
रिश्ते होंगे मधुरिम सबसे, रख न मन में झोल ||
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              🍎पृष्ठ क्रमांक 16🍎
                       🌷विधा- चौकड़िया छंद🌷
आओ साथी साथी आओ, सबको गले लगाओ।
चार दिनों के इस जीवन में, मंगल गीत सुनाओ।
खाली हाथ धरा पर आये, मन से लोभ मिटाओ।
माँगेंगे प्रभु  हमसे    तुमसे,    कर्म कमाई लाओ।
🍒
क्या दिखलाओगे तुम बोलो, मन की पलकें खोलो।
बुरी आदतें त्यागो अपनी,      मन को जरा टटोलो।
अध का भागी नहीं बनो तुम, अपने मत को धो लो।
बहुत हुआ दुष्कर्म कमाई,      पुण्य कर्म को तोलो।
🍒
नाता जोड़ न तू दुर्जन से,    प्रीत लगा सज्जन से।
खत्म करो मन का पायरिया, कर्म कांति मंजन से।
देख कठिन पथ भाग न मानव, सीख सदा खंजन से।
ऐसा काम करें हम मिलकर,      भर दे मन रंजन से।
🍒
जब भी दम्भ किसी को आया, मन ही मन इतराया।
नेह जगत में कभी न पाया,    अंत समय पछताया।
सब कुछ खोया था रावण ने, राज विभीषण पाया।
मामा कंस हुआ अभिमानी, हरि ने सबक सिखाया।
                   🥀•••••एवं ••👇•••🥀
                    🌻विधा-चौपइ छंद🌻
फिसलो बन मत मुट्ठी रेत।
जीवन रख हरियाली खेत।
धूप नहीं सावन बन डोल।
कली हँसे अपना मुख खोल।
💐
अपनी धरती चन्दा गोल।
नहीं खुशी का कोई तोल।
दूर करें बातों का झोल।
मृदु वाणी होती अनमोल।
💐
हुआ सबेरा खग का शोर।
बिना घड़ी की होती भोर।
कितना मीठा कोयल गान।
राग अलापे छेड़े तान।
💐
मन्दिर होता अपना गेह।
जिसमें मिलता सबका नेह।
मातु-पिता चरणों में धाम।
पुत्र कुशल तो बढ़ता नाम।
               🌷   •••••एवं •👇••🌷
                      🌻विधा-सरसी छंद🌻
छंद महल है सुंदर कुटिया, रहते बन परिवार।
बाग लगायें हम छन्दों का , बहती सुखद बयार।
कोई छंद न दुर्गम लगता, खड़े रहें सब साथ।
कलम अगर मुश्किल में होती, आकर पकड़ें हाथ।
🍒
इस कुटिया के मुखिया जी का, लगता सरल स्वभाव।
कई रसों में भ्रमर करें हम, बैठ छंद के नाव।
इक पोथी में बाँध रखें फिर, सबके मन का भाव।
नहीं परिश्रम निष्फल हो यह, ऐसा सबका चाव।
🍒
ज्ञान सुधा बरसाते हरदम, बनकर मेघ फुहार।
मिलकर हम रसपान करें जब, बढ़े कलम की धार।
मेरा तो आशीष यही है, चमके बनकर नूर।
आशा की परिभाषा हो यह, रहे निराशा दूर।
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             🍎पृष्ठ क्रमांक 17 🍎

धरती अम्बर शीत  उगलते, काँपे  दिन  भर  काया ।
टुकड़ा - टुकड़ा  धूप   ढूँढते, बैरन  ।लगती   छाया ।
शाल  रजाई   प्यारी   लगती ,  मन  को  भाते   मेवे-
गरम चाय की चुस्की  चलती , मौसम  ठंडा  आया ।
                        एवं   ****👇
सुशील सरना (जयपुर ) 
               ••एवं••👇
जल -जल जाती देह न जलती, आशाओं की बेल ।
जब तक तन में चलती साँसें , चलता तन में खेल ।
इस जीवन को  किसने जाना , अद्भुत  इसके  रंग -
धू - धू  करते  तन  का  होता, आसमान  से  मेल ।
                  =×=×=×=×=👇
शीत काल की रैन  सुहानी, तरसें  प्यासे  नैन ।
तन्हाई में याद  सताती , मिले न  मन को चैन ।
विरह व्यथा कोई क्या जाने , जागूँ  सारी  रात -
रह-रह मुझको बहुत रुलाते , उसके प्यारे बैन ।
            •••••••एवं 👇••••
बिना पिया के  लगतीं , अंगारों  सी  रातें ।
दिल में आग लगातीं, सावन की बरसातें ।
आलिंगन की बातें, कुछ ख्वाबी अफसाने-
अधर दलों पर महकें , अधरों की सौगातें ।
                     * * * *🍒🍒
अन्तर में छल  रखते, ये  छलिया  दीवाने ।
प्यार- व्यार क्या जानें, ये आशिक परवाने ।
बेशर्मी  से  पीते, आशिक भर -भर प्याले -
कामी   भौंरे   ढूँढें , आँखों    के   पैमाने ।
•••एवं 👇
तन में इच्छा  करती  वास । झूठा लगता  हर  मधुमास ।
कैसी है यह अनबुझ प्यास । हर दम  चाहे  प्रीतम  पास ।
गंध हीन सब नकली फूल ।   बड़े  अनोखे   इनके  शूल ।
अभिव्यक्ति की है ये  भूल ।    इनसे होती  प्रीत  फिजूल ।
🍒🍒
समय बदलता अपनी चाल । काल फेंकता अपना जाल ।।
हर दिन जीवित एक सवाल । जीवन प्रश्नों की इक डाल ।।
रिश्ते   जैसे   सूखे   पात । बात -बात में  दें  आघात ।।
आँखों से  बरसे  बरसात ।  ढूँढे   कहाँ   प्यारी प्रभात ।।
🍒🍒
तन में इच्छा  करती  वास । झूठा लगता  हर  मधुमास ।
कैसी है यह अनबुझ प्यास । हर दम  चाहे  प्रीतम  पास ।
 गंध हीन सब नकली फूल । बड़े  अनोखे   इनके  शूल ।
अभिव्यक्ति की है ये  भूल । इनसे होती  प्रीत  फिजूल ।
••••एवं 👇
🎈हंसगति छन्द 🎈
साजन  तेरी  याद, बड़ा  दुख देती  ।
पागल दिल का चैन ,सदा हर  लेती ।
उसके  सारी  रात , स्वप्न  ही   आते ।
भोर काल में स्वप्न, बिखर सब जाते ।
•••••एवं 👇

जब -जब सर्दी आती ,कब वृद्धों को भाती ।
गिरे  आँख  से पानी ,खाँसी  बहुत  सताती ।
रोटी  गिर -गिर  जाती ,चाल संभल न पाती ।
लड़ते-लड़ते  आखिर ,काया चुप  हो  जाती ।
                         * * * 🍒🍒
     ठहर जरा दीवानी , तेरी  उम्र  सयानी ।
     आशिक नजरें घूरे, तेरी मस्त  जवानी ।
     अक्सर मीठे धोखे ,इन  राहों  पर होते ।
      पड़ न जाए महँगी , थोड़ी सी नादानी ।
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जीवन की हर राह, लीजिए सोच समझकर। 
बहना नहीं प्रवाह,   झुंड का हिस्सा बनकर।|
मुश्किल है निर्वाह, डूब जायेंगे निश्चित। 
चलिए अपनी राह, नहीं होगा कुछ कुत्सित।|
नियम बने थे सोच कर, लोगों का होगा भला। 
संस्कृति से विद्रोह यह , पाणिग्रहण भी है टला।
                •••••एवं •••👇•
मिलता बड़े नसीब से। 
नर तन मिलना बहुत कठिन है, मिलता उसी हवीब से।
वेद पुराण सभी यह  कहते,     देखो   इसे   करीब से।
लख चौरासी जन्म लिया है,     कैसे गजब अजीब से। 
तब जाकर यह जन्म मिला है,       वरना रहे गरीब से। 
खोना मत इसको पढ़ लेना,    हिम्मत तप तरकीब से।
•••••••••एवं 👇
सुन्दरतम रचना हैं मानो, ईश्वर की संतान हम। 
ईश्वर ने है रूप दिया पर,खोले मन के द्वार कम। 
अगर करें हम सेवा मन से, खुलता मन का द्वार है। 
अंतर्मन के द्वार खुले तब, दूर कहाँ संसार है। 
••••••एवं 👇
सच्चाई के पथ पर चलते, कभी न मिलती हार।
अंदर बैठा प्रभु है लेकिन, खोज रहा   संसार।
मानवता को पूजो मन से ,कहते हैं भगवान।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा में, भटके क्यों इंसान।
•••एवं 👇
सज्जन बस धमकी खाते, दुर्जन चालें भरते  हैं। 
अनदेखी सच की करते,     झूठी बातें करते हैं। 
जिसकी लाठी होती है,     भैंस वही ले जाते हैं-
कलयुग में ऐसा होता,     कागा  मोती चरते हैं। 
••••👇
पूस महीना लेकर आया,    कितनों की हैरानी। 
महलों में रहने वालों ने,       घनी रजाई तानी। |
पास नहीं है कुछ भी जिनके , सोते सड़क किनारे। 
उनके बारे में कुछ सोचो,     कैसा लगता प्यारे। |

छप्पर जिनकी टूटी फूटी ,   कैसे ओस बचाए। 
अंतर इतना क्यों रहता है ,  कोई तो समझाए। |
सोने की चम्मच से खाता,    कोई खूब डकारे। 
रोटी को तरसे है कोई,        फिरता मारे-मारे। |
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सारी बातें मन में रख कर,खुद को नहीं सजा दो।
क्यों हैं आंखें वीरानी सी, खुलकर आज बता दो
दुख भी हल्का होता है, अक्सर, दर्द बांट लेने से,
साझा कर के निज भावों को,मन की पीर बहा दो।।
🍒🍒
छुपी भावनाएं जो दिल में,       कर दो आज उजागर ।
जो मुख खोल नहीं तुम पाओ, जतला दो तुम लिखकर।
ऐसे तो मैं पढ़ लेता हूँ,      तव आंखों की भाषा,
मन की पीर बहा दो तुम प्रिय, सुनना चाहूँ प्रियवर।।
      •••एवं •👇

खिला फूल देखा डाली पर , मन मेरा मुस्काया था।
सूखा उस को जब देखा तब, मन मेरा दुख पाया था।।
जो पतंग अंबर को छूती, कटी गिरी आई धरती।
कल जो थी महलों की रानी, आज सर्द आहें भरती।।
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हुआ क्षितिज में सूर्य  उदित जब , भोर सुहानी तब आई।
सुबह- दोपहर चमका नभ में, शाम कालिमा गहराई।।
अपनी सुंदरता को लख कर, चांद बहुत शरमाता था।
ग्रहण लगा कुछ ऐसा उस पर, दशा देख घबराता था।।
🍒🍒
गीत जन्म के कल गाए थे, उसको दी आज विदाई ।
कल जिस आंगन थी शहनाई, आज उदासी है छाई।।
लहर उठी थी खूब जोश से, तोड़ गई तट पर निज दम।
हश्र देखकर अपनी विचि का ,आँखें रत्नाकर की नम।।
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यही निष्कर्ष सब बातों का, बात समझ में  यह आई ।
जो आया जाएगा निश्चित, नहीं चले छल- कपटाई।।
जन्म-मृत्यु पतझड़ सावन का, आता जाता है मौसम।
नश्वर काया नश्वर माया, नश्वर तुम  हो नश्वर हम।।
••••••एवं ••••👇
आदि- त्रिकल+द्विकल,, अंत गुरु लघु।
शीर्षक : 'लिव इन' का कीड़ा
बिना परिणय के रहते साथ।
घुसा 'लिव इन' का कीड़ा माथ।।
मान्यता पाई अब यह रीत।
युवा माने है इस को जीत।।
🍒🍒
पड़ी है आज कुएं में भांग।
नहीं अब कोई सुनता बांग।।
चढ़ा है पश्चिम का  यह रंग
करे निज मर्यादाएं भंग।।
🍒🍒
बड़ों का करते नहीं लिहाज।
भूल कर सारे रीति रिवाज।।
उठाता जो भी कुछ आवाज।
बताता पिछड़ा उसे समाज।।
🍒🍒
छोड़ते अपने माँई बाप।
जाल में फँसते अपने आप।।
प्रेम पर जब हो स्वार्थ सवार।
नहीं फिर बचता पावन प्यार।।
🍒🍒
गात के टुकड़े करता यार।
सजाता है फ्रिज में दिन चार।।
फेंकने जाता वन में दूर।
प्रीत क्या ऐसी होती  क्रूर।।
🍒🍒
पिता माता को आती याद।
नहीं भूली जाती औलाद।।
सुनों बच्चों तुम मेरी बात।
शीश ऊँचा रखना माँ तात।।
🍒🍒
बड़े जब होते अपने  संग।
नहीं फिर बच्चे होते तंग।।
समस्या झटपट जाती भाग।
नहीं डस पाता कोई नाग।।
एवं 👇
🍎ताटंक छंदाधारित "गीत"  मात्राभार - 30. ,🍎
 16, 14 पर यति
🍒पदांत - तीन गुरु अनिवार्य. शीर्षक- काया कहती🍒
🎈
काया कहती मैं माटी की, आखिर माटी बन जाना।
दफनाओ या आग लगाओ, मुझे ख़ाक ही कहलाना।।

दोनों हाथों पैसा गिनता, पैसा-पैसा है करता,
गोरख धंधा खत्म न होता, उसमें ही उलझा रहता,
चाहे भर ले माल तिजोरी, साथ नहीं कुछ है आना ।
दफनाओ या आग लगाओ, मुझे ख़ाक ही कहलाना।।
💐
भटक-भटक कर लख चौरासी, मानव चोला पाया है,
पुन्याई के प्रबल उदय से, दुर्लभ अवसर आया है,
माया-काया के चक्कर में, और नहीं  है भरमाना।
दफनाओ या आग लगाओ, मुझे ख़ाक ही कहलाना।।
💐
रंग गुलाबी काया का यह, जाने कब उड़ जाएगा,
चंदा जैसा सुंदर मुखड़ा, काली रंगत पाएगा,
टूटेगा जो बुना प्यार से, रिश्तो का ताना-बाना।
दफनाओ या आग लगाओ, मुझे ख़ाक ही कहलाना।।
💐
प्राणों से प्यारी है पत्नी, पुत्र कलेजे का टुकड़ा,
पोते पोती तन सम लगते, नाती नातिन है मुखड़ा,
दूर करेंगे घर वाले हीं,  दादा हो या हो नाना।
दफनाओ या आग लगाओ, मुझे ख़ाक ही कहलाना।।
💐
चार कांध पर ले जाएंगे, राम नाम सत बोलेंगे,
नश्वर है यह तन धन योवन, बात सभी यह  खोलेंगे,
चली नई यात्रा पर आत्मा, वापस नव जीवन पाना।
दफनाओ या आग लगाओ, मुझे ख़ाक ही कहलाना।।
••••एवं 👇

चले आदमी जीवन पथ पर,  नहीं सरल है गलियां।
शूल किसी को मिले यहाँ पर, फूल किसी को कलियां।।
पत्नी बच्चों के खातिर वे,  दुख सारा सह लेतें।
खुशियां जब जब मिलती उनको, बांट सभी को देतें।।
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दर्द मर्द को भी होता है, चोट लगे जब दिल पर।
छुपा सभी से मुखड़ा लेता, नैना जाते जब भर।।
नहीं बताए पीड़ा अपनी, सह लेता है हंँसकर।
माता पत्नी की सब बातें, सुनता है धीरज धर।।
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वंदन तुमको सौ- सौ बार।। 
अंग विकल ले जो जीते हैं, तुम तो सच में हो अवतार।। 
यही सत्य मानव तुम मानो,इनका जीवन पर उपकार।। 
काया के धनवानों बाँटो, इनको तो तुम सदा दुलार।। 
अंगहीन या कुछ कम इनके,फिर भी हैं बल के भंडार।। 
आज खिलाड़ी सर्जक गायक,"माही" क्षमता रहे निखार।।
••••••एवं 👇
हमने तुमने सबने माना, लिखा भाग्य जो होता है । 
यही मान जो जीता हरदम, फिर किस्मत पर रोता है। 
बिना कर्म मिलता क्या किसको, कर्म भाग्य का दाता है-
अब निद्रा तज दे मानव क्यों,  भाग्य भरोसे सोता है।
••••एवं 👇
प्रभु जी! खूब रचा संसार ।। 
अपने ही गर्दन पर करते,         अब अपनों के वार।। 
न्याय नीति पर सूखा दिखता,बस अनीति गुलज़ार ।। 
बलवानों की इस दुनिया में,        हर निर्बल लाचार।। 
अज्ञानी अनमोल जहाँ पर,     मिले    ज्ञान को खार | 
दौलत वाला बन बैठा है,        "माही" खुद अवतार।।
•••••एवं 👇
अनुशासन जीवन को देती,बहुत सुखद ही राह। 
पग-पग पर पूर्ण सदा तब, होती इच्छित चाह। 
अगर नही तो बस रोड़ा है,केवल उलझन जान-
नित्य शिखर यदि चढ़ना माही, कर इसकी परवाह।
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पाठ पढ़ाने को सबही हैं, देखो तो तैयार । 
सुनना ही तो हक है जन का, बोलो तुम सरकार। 
रोग लगा है लोकतंत्र को, राजनीति हर सूत्र_
दौलत के हाथों में  जकड़ी, सत्ता की पतवार।
••एवं 👇
सत्ता मूर्खो के हाथों में,     नौकर देखो चोर है । 
स्याह हुए सपने अब सारे, आगे काली भोर है।। 
कौन  पूछता है घोड़े को      गधा यहाँ अनमोल है। 
लोकतंत्र अब ढ़ोलक थोथा, जिसके भीतर पोल है।। 
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सेवक सिर पर अब तनता है, कहता मालिक चोर है। 
धनवानों  बलवानों का ही,    आज वतन में जोर है।। 
मत सोओ जागो तरुणाई,मचा हुआ अंधेर है। 
उसे उतारो फौरन नीचे,"माही" झूठा शोर है।।
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अनपढ़ का अपमान,करे हैं सब नर नारी।
शिक्षा बनी समाज,अंग है मंगल कारी।।
'सरला'पढ़ गुणवान,सभी बन जाओ भाई।
बढ़े मान सम्मान,वही है शुभ वर दाई।।
शिक्षा जीवन में सदा,होती है वरदान ही।
शिक्षा जीवन ज्योत है,शिक्षा है ईमान ही।।
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जीने का विज्ञान,प्रथम सीखो तुम भाई।
उत्तम शिक्षा ज्ञान,यही है नित सुखदाई।।
'सरला' सीखें योग,सदा कसरत तुम करना।
करो नवीन प्रयोग,स्वस्थ तुम हरदम रहना।।
आसन प्राणायाम से, सब सुख पा सकते सभी।
तंदुरुस्त जब तन-बदन, दुश्मन डरता है तभी।।
                 •••••एवं ••••👇•
ऋतु बसन्त  मन भावन आई,कोयल कहुकी बाग। 
मोर पपीहा झूमे नाचे,चिड़िया गाए राग ।।
सुंदर हरीतिमा है छाई,चलती मंद बयार ।
मीठी सौरभ है अमराई,छाई खुशी अपार।।
                    •••एवं ••👇
गुरुवर मेरे आंगन आए,घर में बहुत बहार है।
खुशियों की झोली भर लाए,उपदेशामृत सुख सार है।।
रोज सवेरे प्रवचन करते,भाव भरे उद्गार है।
उसका असर न बिल्कुल होता,कैसा यह संसार है।।
गणतंत्र दिवस आया है,  ध्वज वंदन भी  करना है।
राष्ट्र गान के भावों  को , अपने   उर   में  भरना है।।
भारत देश हमारा तो,        सुख सपनों का डेरा है।
त्याग अहिंसा का इस पर, प्यारा सुखमय झरना है।।
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राष्ट्र प्रेम  मन में जागे,    भाई  चारा विकसित हो।
एक  दूसरे  के हित में, सहभागी भी  प्रमुदित  हो।
ऊंच नीच का भेद न हो   ,एकमेव   सब   हो जाएं-
राष्ट्र  बढ़े तब हम सबका , तन मन पूरा पुलकित हो।।
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सिर पर. घट आधार, राधिका ज्यों  रतनेश्वर |
गिरे  नहीं  यह  सार,,,, लगे  पानी  परमेश्वर ||
यही  सोच  में  प्राण, घड़ा  में  भरकर  पानी |
बाँटेंगे  मुख   सार, जगत  में  बनकर  दानी ||
है धर्म  इसी में प्राण से, जो है  बनकर  झील सम |
हे धन्य धन्य ! जग मात तू, देवी तुम हो दिव्य सम || 1
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मधुशाला  में   सूर - रसा - नंद  व   मधुबाला |
किंचित  किंचित  पैग,  बने यह कैसा  झाला ||
नशा मुक्ति की जोर - शोर क्यों खलती खाला |
माने  मत मुँह  जोर, गजब- सा  धंधा  लाला ||
है प्रांत प्रेम सरकार जो, मद निषेध पर ध्यान मत |
सति  नार  नवल सोच में, यह  कैसा गंतव्य - गत ||2
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मंडी में  भगवान, जना मत  मिलने  वाले |
चरस   भाँग  शैतान, यहाँ  पर  है  मधुबाले ||
दंग - दंग   हुड़दंग , मचाने  मनु  आते  हैं |
नशा मुक्ति सरकार, झूठ क्यों चिल्लाते हैं ||
जन जीवन की सोच यदि, हो उत्तम परिपूर्ण तो |
स्वत: नशा हटकर टले, सज्जन का यह तूर्ण तो ||3
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ग्रीष्मकाल में सूर्य, सदा  दुत्कारा जाता।
वहीं मान सम्मान,शीत में जग से पाता।।
दुनिया का दस्तूर,यही जो "धर्म" बताता।
गरज पड़े इंसान, गधे  को  बाप बनाता।।
जगत बड़ा ही मतलबी,सब मतलब के यार हैं।
छिपे  प्रेम  के  पुष्प  में, दो  धारी  तलवार  हैं।। 1
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देखा   हर   इंसान,  आँसुओं  में   जब   डूबा।
प्रभु से करूं सवाल, रचा  क्यों  खेल अजूबा।।
कहीं रिक्त है कोख, पुत्र  से  कहीं  दुखी  सब।
कहीं दुखी धनवान,कहीं धन बिना सुखी सब।।
कहीं बचाती गोलियाँ,कहीं बरसती गोलियाँ।
घाव करें कुछ बोलियाँ,धीर बँधाती बोलियाँ।। 2
                     धर्मपाल धर्म✍️
                         •••••••👇
विधा:- गीत.    आधार:- सार छन्द
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भरतलाल ने किया प्रश्न जब,कर रघुवर को वन्दन।
मैं  दोषी  या  माता  मेरी,  मुझे   बताओ  भगवन।।
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सुनकर भरतलाल की बातें,बोले रघुवर भ्राता।
पूत कपूत भले हो जाएं, होती माँ न कुमाता।।
उसे दोष कैसे दूं जो  है, मेरी  भाग्य  विधाता।
मातु कैकई से है प्रेमल,जन्म जन्म का नाता।।

हँसकर बोले राम भरत से,रखो न मन में उलझन।
मैं दोषी या माता..............
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रही बात तेरे दोषों की, अब  सुन  ओ  बैरागी।
भरत प्रेम का सागर है तू,ज्ञानी तपसी त्यागी।।
तेरे  जैसा  भाई  पाकर,  राम  बना  बडभागी।
बड़ा मूर्ख होगा वो जग में,तुझे कहे जो दागी।।

लक्ष्मण बायां अंग अगर है,तो तू दिल की धड़कन।
मैं दोषी या माता........
🍒
अब तू सोच रहा होगा ये, फिर  संकट  क्यों  आया।
क्यों मैं आज बना बनवासी, छिना  पिता का साया।।
काल बना विकराल भरत बस,सब उसकी थी माया।
राजा हो या रंक  काल  से, कौन  भला  बच  पाया।।

करें भरत हम यही "धर्म" है,पितु आज्ञा का पालन।
मैं दोषी या माता.......
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            धर्मपाल धर्म✍️                                     
सात सुरों में बाँध,गीत दिल को छू जाता।
शब्द बने संगीत,राग बन सब को भाता।।
अर्थ समझ नेहाल, बसे मन की गहराई।
सुन अंतस में डूब,मिलें शीतल परछाई।।
 करें ह्रदय को स्पर्श भी,ईश्वर का वरदान हैं।
आत्मा की आवाज बन,गाता हर इंसान हैं।।
🍎
सुर तो बजते सात,शब्द मिलकर बन जाते।
बजें सुनो संगीत,    भक्ति   रस में ही गाते।।
सरगम के सुन तान,ताल दिल का तब बजता।
धीमी यादें आज,        ह्रदय सागर में उठता।।
करते सब हैं साधना,मधुर गीत सुन बंदिनी।।
राग ताज हैं भैरवी,   जीवन का बन संगिनी।।
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हर जन ने यह माना,दुनिया एक तमाशा।
गहराई से प्यारे, समझो ये परिभाषा।।(१)

जब भी कुछ करना हो,सोचो समझो जानो ।
जीवन के दो कोने,आशा और निराशा।।(२)

लेखा जोखा होगा,अपने ही कर्मो का।
हर पल है सम भारी,तोला हो या माशा।।(३)

कैसे नाच नचाता, करता है वो लीला।
बने मोहरे  हैं सारे,फेंक रहा वो पांशा ।।(४)

उल्टा समय चला है, कैसे कहें किसी से,
जिसको अपना माना,धोखा  देता खाशा ।।(५)
            •••••एवं ••👇
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मन से उसको ध्याओ, वंदन उसका गाओ।
उसकी महिमा देखो, मन चाहा वर पाओ।।(१)

अनुभव होगा न्यारा, जीवन सुखमय सारा।
एक बार तुम दिल से,शरण देव की जाओ।।(२)

जो उसके दर जाते,सबके वे हो जाते।
इसीलिए कहता हूं,ध्यान जरा तुम लाओ ।।(३)

जितने फल दुनिया में, हर जन पाना चाहे।
मेहर जब उसकी हो,हर मीठा फल खाओ।।(४)

होकर उसके सेवक, काम करो कुछ अच्छे।
सेवा पथ पर चल कर,सबके मन पर छाओ ।।(५)
        •••••••••
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आया दिवस स्वयंवर का है,दोनों को मिलना होगा।
सुंदर धरती स्वर्ग बनेगी ,  फूलों को खिलना होगा ।
महक उठेगी जन- फुलवारी, प्रीत- सुधा मुस्कायेगी।
वरमाला जब  पहनायेंगे,   प्रेम -विजय हो जायेगी।
🎈🎈
हुई राम मय  सिया -सुंदरी,   बजे  दुंदुभी प्यारी है।
सिया-राम की सुंदर जोड़ी ,लगती कितनी न्यारी है।
चहुँ-ओर झूमतीं है खुशियाँ बहकी दुनिया सारी जी।
नर -नारायण एक हुए हैं, मोहित हर नर -नारी जी।
🎈🎈
जीवन सफल हुआ है सबका ,देखा रूप सलौना सा।
दुनिया हुई   बावरी सी है,  मन है बना  खिलौना सा।
मनमोहक हैं  दोनों   छबियाँ,  सुंदरतम नर -नारी ये।
जनकनंदिनी    है   मुस्काये,    हुईं राम   आभारी ये।

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झूम झूम कर बादल नाचें ,बरस बूंद दीवानी |
मन मयूर सा नाचे मेरा  ,   बयार बहे सुहानी।।
घुमड़ घुमड़ कर मेघा बरसे , झांझर बाजे पानी
कागज की फिर नाव चलाने,  टोली नटखट वाली।।
🍎🍎
मोर पंख फैलाकर नाचे ,   सबका   मन हरसावें 
पंचम स्वर में कोयल गावे , सरस राग भर जावे।।
बादल से जब मांगे चातक   स्वाति बूंद को पावे
धरती जो तन मन से प्यासी , मेघा प्यास बुझावें ।।
••••••
छंद महल की शिक्षा, छंद बद्ध ही लिखना,
जो हो मन के भीतर,उसको ही बस कहना।

भाव शिल्प लय पर तो, पकड़ सभी की होगी,
आवश्यक बस यह है, रचना नियमित करना।

स्वागत सदा करें हम, आलोचना मिले जब,
दूर कमी को कर के,आगे फिर है बढ़ना।

धर्म कर्म को मानें,सत्कर्म सदा शुभ हों,
गर्व भाव से हमको,नहीं कभी है चलना। 

आगे ही आगे अब,हमको बढ़ते जाना,
शूल भरी हों राहें,हमें नहीं है थमना।
एवं •••••••••••👇

दो से दो मिल कर हो जाते,  क्या हरदम ही चार हैं  ,
तर्क वितर्क पास हैं उनके, करते बात हजार हैं।

किले हवाई नित्य बनाते,दिवा स्वप्न दृष्टा सभी,
देखें नहीं हकीकत यारों,सपने सब बेकार हैं।

जब भी खोलेंगे मुख अपना,गाली निकलेगी सदा,
एक सांस में ही कर देते,गाली की बौछार हैं।

चाटुकारिता पेशा इनका, करते लूट खसोट बस,
गुंडे और मवाली सारे, इनके प्रिय परिवार हैं।

आशा इनसे कभी न रखना,आएं कभी न काम भी,
बात याद यह भी रख लेना,सब मतलब के यार हैं।
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शिल्प विधान - चौपाई +10 मात्रा ।, 16,10 = 26 मात्रा ।अंत में गुरु गुरु अनिवार्य….. 
जीवन सफल हुआ है जबसे, श्याम सखा पाया 
पावन प्रभु चरणों की रज से, कण कण हर्षाया | 

जबसे डूबी श्याम रंग में, रंग सभी फीके 
मुझको तो बस माधव का ही, श्यामल तन भाया | 

सिमरन कर लो मनमोहन का, नाम यही सच्चा, 
झूठा है यह जग तो सारा, झूठी सब माया | 

इस तन का अभिमान न करना, होता है नश्वर 
मिट्टी में मिल जाए इक दिन, मिट्टी की काया | 

याद करो हर पल मोहन को, हो कैसा भी पल 
हर पल मुझपर माधव अपना, रखना तुम साया | 
•••एवं 👇
🌷आधार छंद : सार (मापनीमुक्त मात्रिक) 🌷
विधान : 28 मात्रा, 16-12 पर यति, अंत वाचिक गागा 
सार = चौपाई + 12 मात्रामात्रा (समकल)
गीतिका समान्त : आता  पदान्त: अपदान्त
**********
श्याम नाम है सच्चा सबसे, झूठा है हर नाता, 
सुमिरन कर लो हरी नाम का, नैया पार लगाता |

जग सारा ही छोड़ भले दे, श्याम नहीं पर छोड़े,
कैसा भी पल हो जीवन में, मोहन साथ निभाता |

हर बँधन में केशव ही है, हर रिश्ता है उस से,
जैसा चाहो उसे देखना, वैसा रूप दिखाता |

करुणामयी दयाला मोहन, विनय सुने है सबकी,
पल में दौड़ा आए केशव, जो भी उसे बुलाता |

इधर उधर क्या ढूँढे उसको, वह तो है कण कण में,
मन मंदिर में झाँक ज़रा सा, इसमें कृष्ण समाता |
           ••••••••एवं ••••••👇
इन्द्रधनुष के रंगों जैसा, होता जीवन सार |
रंग यही मिलकर बनते हैं, जीने का आधार |

कोई रंग लगे फीका सा, दुख का बने प्रतीक ,
रंग कई पर ऐसे भी हैं , बरसाते जो प्यार |

अम्बर की भीनी बूंदों में, मिलती श्वेत किरण ,
तब जाकर वो बन पाता है, सतरंगी आकार |

जब ये सातों रंग मिलें तो, एक रंग बन जाय ,
ऐसे ही जीवन में सुख दुख, संग करें बौछार |

देखे सतरंगी अम्बर में, मन सबका हर्षाय ,
ऐसे ही अपने जीवन में, लाते रंग बहार |

तुम जीवन सबका महका दो, अपनी छटा बिखेर ,
दूर करो अब ऐ सतरंगी, सबके मन का ख़ार |

इस जीवन को जीने का इक, बड़ा अनोखा राज़ ,
सतरंगी रंगो में डूबे, कर लो सब श्रृंगार |
      ••••••एवं 👇
 (16 मात्रा भार) गीतिका समान्त-आना  पदान्त - है
***
कान्हा तुझको बतलाना है
ये दिल तेरा दीवाना है |

भूला है सब सुध बुध अपनी
जब से तुझको पहचाना है |

झूठा है सब यह जग सारा
तुझसे ही बस याराना है |

दुख मेरा क्या समझे कोई
तुझको ही सब समझाना है |

क्या करना है इस काया का
तुझमें ही तो रम जाना है |
**
                            •••एवं ••••👇
(एक चरण चौपाई +दोहे का विषम चरण )
शेरां वाली जगदम्बे की, महिमा अपरम्पार है,
अम्बे मैया हर पल करती, भक्तों का उद्धार है |

मंगलकरणी, संकटहरणी, देती सबका साथ माँ,
जग ये सारा छोड़ चले पर, छोड़े कभी न हाथ माँ,
करुणामयी भवानी मैया, करती सबको प्यार  है |
शेरां वाली…..
🍒
सुखदायक, फलदायक होता , सुमिरन माँ के नाम का,
जप लो हर पल मात भवानी, फल पाओ सुख धाम का,
जो भी सच्चे मन से ध्याये, उसकी सुने पुकार है |
शेरां वाली…..
🍒
माँ की महिमा बड़ी निराली, संकट सबके ही हरे,
शरण पड़े जो भी अम्बे की, नहीं किसी से वो डरे,
माँ की ममता के आँचल में, खुशियों का संसार है |
शेरां वाली…..
       ••••एवं 👇

अपने मन में रख विश्वास |
सब कुछ होगा तेरे पास ||

याद रहे तुझको यह बात |
तू खुद अपने में है खास ||

छोड़ परे इस जग का मोह |
रख केवल अपने से आस ||

क्या सच है औ क्या है झूठ |
तुझको हो जाए आभास ||

पग चलते हों सच की राह |
करना सदा यही प्रयास ||

जीवन ऐसे हो व्यतीत |
अंतर्मन में हो उल्लास ||

मात पिता हैं ईश समान | 
इन चरणों का रहना दास ||
••••एवं 👇
💥गीतिका समान्त-अन. पदांत- अपदान्त💥
****
जप लो प्रभु का नाम, सफल हो जीवन |
बिन मांगे मिल जाय, ख़ुशी,वैभव,धन ||

ईश अगर हो साथ, नहीं कुछ मुश्किल |
पल में होती दूर, सभी की उलझन ||

मिलता प्रभु का प्रेम, लगे सब सुंदर |
जीवन महका जाय, खिले ज्यूँ मधुबन ||

दरस दिखा दो नाथ, खड़ा मैं कबसे|
तरस गए हैं नैन, मुझे दो दर्शन ||

झाँक रहा हर ओर, नहीं प्रभु पाए |
इधर उधर मत ढूँढ, देख अपना मन ||

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मात्रिक भार - 16 , 12 = 28
अंत में 22 /112 /211/1111 अनिवार्य )

जिसने सीखा काँटों में भी, हँसना और हँसाना ,
पग न शिथिल होते उसके सुन, तूफानों का आना।
-
उसकी यशगाथा को निशिदिन,
अखिल विश्व पढ़ता है,
घोर तिमिर में ढूँढ़ रोशनी, 
जो आगे बढ़ता है ।
राष्ट्र भक्ति की प्रखर ज्वाल में, लिपटे ज्यों परवाना।
-🍒
तोड़ सभी देते दीवारें, 
बंधन बाधाओं के ,
पूत लाड़ले ऐसे ही हैं,
भारत की माँओं के।
जन्म-भूमि जिनको प्यारी वे,करते नहीं बहाना !
-🍒
कब कब मृत्यु डरा पाई है, 
पथ के दीवानों को ,
बाँध मुट्ठियों में लेते हैं,
आँधी तूफानों को।
करते प्राणोत्सर्ग राष्ट्र-हित,गाते हुए तराना। 
-🍒
धवल कीर्ति हो अखिल विश्व में, 
नवोन्मेष का रवि हो,
नभ में फहरे धवल तिरंगा 
श्रेष्ठ राष्ट्र की छवि हो। 
शस्य श्यामला नमन देश को, वन्दे भारत गाना।
••••••एवं 👇
🌻गीतिका ~🌻
-
खोया बचपन ,गई जवानी , उम्र भले हो अस्सी पार,
लहरें लेता सबके भीतर , सात समंदर वाला ज्वार।
-
कभी नेह  है, कभी मुहब्बत, आशिष, दुआ,कई हैं नाम,
कदम कदम पर नए रूप में, पहचाना जाता  है प्यार।
-
सम्बन्धों की सहज डगर है , कभी न इसमें अन्धे मोड़ ,
लेना - देना नकद हमेशा ,चलता बिल्कुल नहीं उधार।
-
एक दूसरे के हितकारी ,सबका सभी करें कल्याण,
अनुबंधों पर टिका हुआ है, सारी दुनिया का व्यवहार ।
-
मतभेदों की भीति ढहा दें,प्रतिदिन सौमनस्य सौगात ,
झिलमिल झालर जले हर्ष की,सजे ज्योति की वंदनवार ।
••••एवं 👇
जीवन तो है निश्छल सरिता, अंतर्मन को धोना है,
मन के मनके एक एक कर, प्रतिदिन हमें पिरोना है।
-
दर्प,दम्भ या अहंकार का मानव , है केवल  माटी,
राग , द्वैष से परे मनुज तन, चमके जैसे सोना है।
-
चर्म सुचिक्कड़ हो जाने से ,कोई देव नहीं होता,
वचन श्रेष्ठ होते हैं जिसके ,अमर उसी को होना है।
-
पीर न समझी कभी दीन की, केवल सुख अपना सोचा,
लोभ मोह की गठरी तेरी , इसे अकारथ ढोना है।
-
निधि सत्कर्मों की अमोल है, इसे बचाकर रख लेना,
छूट गई यदि कभी हाथ से , समझो नयन भिगोना है।
••••👇

(शिल्प-सरसी छंद -16,11 मात्रा भार , अंत 21-चौपाई अर्धाली +दोहा का सम चरण )
^
ऊपरवाले से माँगे थे जीवन के दिन चार ,
लौटाना तो होगा ही अब जो भी लिया उधार।

चमके कभी सुर्खियाँ बनकर चर्चाओं के संग,
कुछ पल में हो गये पुराने ज्यों ताजा अखबार।

अधिकारों को मिली चुनौती हए तनिक बेहाल,
श्वासों का यह आना जाना लगा हमें व्यापार !

बीच डगर में लगे काँपने किसी वधू से पाँव,
डर है मिलकर कहीं न डोली लूटें आज कहार।

चिन्तन और मनन कर डाला भूले मृदु-अनुराग,
अपने लिए जिए हम जी भर सुविधा के अनुसार ।

••••👇

🍎गीतिका ~(छन्द - ताटंक ,16,14, चरणान्त -🍎 222, पदान्त - में , समान्त- आरी)
-
नित्य व्यस्त हैं कुछ हठवादी, अब तक मारा-मारी में,
युद्घातुर ये राष्ट्र लगे हैं, विध्वंसक तैयारी में। 
-
इन्हें न चिन्ता मानवता की , दिन पर दिन बस्ती फूँकें ,
झोंक रहे हैं अखिल विश्व को, महायुद्ध चिंगारी में।
-
हत्यारे ये बात न मानें, अपनी मौत बुलाएँगे,
औरों को कर ध्वस्त मरेंगे,अपनी जीत खुमारी में।
-
हार हमेशा उसकी होती,अहंकार में  जो भी है , 
पहले जीत गया तो हारा, वही दूसरी पारी में।
-
रोकें सभी देश अब मिलकर ,क्रूर आक्रमण दम्भी के,
मानव का जीवन अमूल्य है ,सदा सुरक्षित यारी में।
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🌷रचना विधा -मुक्तक(विधाता छ्न्द आधारित)🌷
"""""""""'""'"""'"'""''''''''"''''''''''''''''''''''''''"""""'''''''''''''''''''''""""
जगाते जो हमेशा से,हमें दिनमान से पहले।
हमें हरदम सिखाया है,बचो अभिमान से पहले।
अगर हो साफ नीयत तो,सफलता हाथ आयेगी,
भजन भगवान का होवे,किसी अभियान से पहले॥
                      ••••••
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मन से नमन करूँ माँ शारद , तुम पर है विश्वास।
मैया तुम पूरी कर दोगी , मेरे मन की आस।
**
किशन कन्हैया मुरली वाला, राधा रानी साथ।
धवल चाँदनी खिली हुई है,होगा अद्भुत रास।
**
आया सावन मास अनोखा, शिव-शंकर का राज
बेल पत्र अरु आक धतूरा ,हैं भोले के खास।
**
राम-सिया वनवास चले हैं,लखन भ्रात के साथ
अवध नगर के सब नर नारी, व्याकुल और उदास।
**
श्रद्धा सुमन सुभाव के लेकर, चलें शैलजा द्वार
'मंजुल' हम सब करें आरती,बैठ मात के पास।
                    ••••एवं ••••👇
बंधन प्यारा तुमसे,मोहन मदन मुरारी।
आस पूर्ण करते हो,जय जय गिरिवर धारी।

आये शरण तुम्हारी,लिये भावना मन में
पार करोगे भव से, तुम ही रास बिहारी।

हम  अज्ञानी  चंचल,माया  में भरमाये
रखना लाज हमारी , करुणाकर उपकारी।

 तुमने पाठ पढ़ाया, गीता का अर्जुन को
पार्थ मोह  को छोड़ो ,बोले तुम अवतारी।

चीर चुरैया,नटवर,,नित  नव लीला करते
'मंजुल' के अंतस में,बसती छवि मनहारी।
•••••एवं 👇

जीवन में करती जगदीश्वर, कभी नहीं छलछंद।
हिल-मिल सबके सँग में रहकर,पाती हूँ आनंद।१

करूँ प्रार्थना हे! परमेश्वर ,जोडूँ दोनों हाथ
दया करो प्रभु अपनी मुझपर ,काटो भव के फंद।२

लय, यति, गति अरु छंद ध्यान रख, रचती अपने भाव
जिस को पढ़ कर हों आनंदित,तीव्र और मतिमंद।*३

ले लो अपनी शरण में दाता, विनय करो स्वीकार
मैंअज्ञानी मुझे करा दो, ज्ञान पान मकरंद।*४

खुशियाँ जीवन में भरतीं हैं ,सदा अनोखे रंग
नहीं पालती 'मंजुल' मन में , किसी तरह का द्वंद।* ५
•••एवं 👇
जीवन छोटा सफर घनेरा, बहुत दूर तक जाना। 
हिम्मत और हौसला रखना, मन में मत घबराना।
 मंजिल उनको ही मिलती है, जो चलते रहते हैं।
बाकी तो सोने वाले सब ,कर मलते रहते हैं।
*🍒
यशुदा नंदन किशन कन्हैया , मुरली मधुर बजाता।
गोपों के सँग मटकी फोड़े,दूध-दही बिखराता।
 गोपी भागे पीछे -पीछे, ठेंगा खूब दिखाता।
पर जब श्याम पकड़ में आता,नाचे और नचाता।
•••••एवं 👇
मेरे गुरुवर आप, मुझे चरणों में रखना।
वरद हस्त रख शीश, सुखों से झोली भरना।
सच्चाई  के   साथ ,   रहे   प्रभु  मेरा नाता।
लोभ,दंभ, पाखण्ड , नहीं मुझको है भाता।
जो चलते सच राह पर, उनकी होती जीत है।
 लगता जैसे है सभी, दुनिया अपनी मीत है।
*🍒
जीवन हो आसान, रखो बस सच से नाता।
 कृपा करें जगदीश, रखें सब लाज विधाता।
 कृपा बिना भव पार, नहीं कोई भी होता।
फल  पाता  इंसान,यहाँ  जो  जैसा   बोता।
सदा करो शुभ कर्म ही,खुश होते भगवान हैं।
जो चलते हैं सत्य पर, वो सच्चे इंसान हैं।
*🍒
आज चीन ने पुनः,बहुत उत्पात मचाया।
समझ रहा था शान, और मन में हरषाया। 
भारत माँ के लाल, वीर ने सबक सिखाया। 
मत बन तू नादान, बहुत उसको समझाया।
समझाओ कितना उसे, नहीं समझता चीन है।
दंभ और पाखण्ड में, रहता अपने लीन है।
*🍒
भारत  अपना देश, हमें   प्राणों से  प्यारा।
 सुबह भोर में रोज, लगे जय-जय का नारा। 
कहकर भारत मातु,इसे हम सभी पुकारें।
बना हिमाल‌य शीश, मुकुट हम उसे निहारें।
अपने भारत देश पर, हमें बहुत अभिमान है।
सारे जग में देश की,बनी हुई शुभ शान है।
••••एवं 👇

ठेस लगी है किससे तुमको,यह बतलाओ प्यारी।
बात सभी तुम दिल की रख दो, हल्का हो मन भारी ।
रीत सदा से इस दुनिया की, कोई साथ न देता 
यहाँ  सभी खुद ही तय करते, मानव या  अवतारी।
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मात्रा भार - 16 -  11 , यति चौकल , पदांत गाल 
खुले नहीं  मुख उनका गोरा   , लम्बा  रहे   नकाब |
कहाँ  बैठ अब  उनसे कर लूँ, अपना सही हिसाब |
बहुत   बड़ी है  चाहत हमको ,  हो   जाए   दीदार ~ 
बड़े   गौर  से  देखूँ  उनका   , #राना  जरा  शबाब |
🎈🎈
बंद  लिफाफा-सा सब रहता, खुलती नहीं  किताब‌ |
होते   रहे   इशारें चुपके  ,   मिलते    रहें    जवाब |
नहीं सनम कुछ कहती हमसे  , आड़े  आती   लाज - 
#राना    कैसे देगें    उनको   , पूरा   बना   हिसाब |
🎈🎈
गली- गली में   चर्चा   होती  , उठता   नहीं  नकाब |
लोग बोलकर  जाते जब भी ,   लगता   हमें खराब | 
तरह - तरह की   बातें   करते ,  अंजाने   में   लोग - 
बिन देखे ही #राना कातिल ,   मिलने  लगे खिताब |
•••एवं 👇
🍒#गीतिका - समांत - आने   ,पदांत वाले 🍒

जुड़े  हुए  हैं  पास  हमारे ,  आज   रुलाने   वाले |
नहीं  चूकते  अवसर  पाकर , हमें   सताने   वाले |

कातिल होकर काबिल बनते ,जिनने हमको घेरा , 
हर घटना की  पहले से ही  ,  खबर  छपाने वाले |

एक खोजता मिलें हजारों , पास रखूँ मैं किसको , 
एक परीक्षा  में सब  निकलें , गाल   बजाने वाले |

दमखम की सब बातें करते, आगे-आगे   चलते , 
समय देखकर  पीछे होते , सभी   बहाने  वाले |

जरा तरक्की हमने कर ली , उनको पड़े  फफोले
मिलजुल कर सब आगे आए , मुझे   हराने  वाले |

जिनको हमने ज्ञानी समझा , पोल खुली जब उनकी , 
ठग निकले सब इस दुनिया में ,   मूर्ख  बनाने  वाले |

#राना उनको सदा बुलाता,  जिन पर रहा भरोसा ,
दूर   दोस्त अब जाते   दिखते , हमें  हँसाने  वाले ।।
मोबाइल-9893520965
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छंदों की यह खान।
छंद-महल में जाकर नित दिन,मिलते शिल्प-विधान।।
छंद-महल तो    गुरुजी से है,       देते ज्ञान-वितान ।
मात्रा-गणना भाव-शब्द    में ,    होता यहाँ विहान ।।
जो आता है भर कर जाता,          मंच-मंच सम्मान।
नमन करूँ मैं गुरुवर को नित,       विद्या देते दान ।।
सब मंचों में अद्भुत यह  है,        जन-मन में है गान।
साधो लेखन जुड़कर इससे ,     भिन्न रखो पहचान।।
💐•••एवं•••👇•💐
मथुरा वासी थे  निद्रा में ,     सपनों के संसार में ।
जन्म हुआ जब नारायण का,मथुरा कारागार में ।।
🍒
लीलाधारी की लीला ने ,   फैलाया भ्रम-जाल को ।
अर्धरात्रि के काले घन ने, दमकाया हरि भाल को ।।
मातु देवकी कमलनयन की ,कृष्ण रूप अवतार में।
जन्म हुआ जब नारायण का,   मथुरा कारागार में।।
🍒
टूट बेड़ियाँ वासुदेव की ,         राह दिखाए पार हो ।
यमुनाजी भी मचल रही थीं,कह अब मम उद्धार हो।।
चरण पखारे आनंदित उर, प्रीत प्रकट अभिसार में ।
जन्म हुआ जब नारायण का,   मथुरा कारागार में ।।
🍒
ढोल-मँजीरे बजे पखावज़,      पूरे ही ब्रज धाम में ।
नंद-भवन में गीत शुभग हो,हर मन ही बस श्याम में।।
मृत्यु निकट अब कंस जानता, जीवन खोजे खार में ।
जन्म हुआ जब नारायण का,      मथुरा कारागार में।।
••••एवं 👇
छंदो में प्रिय छंद,  नाम है छप्पय जिसका।
रोला से प्रारंभ,      अंत उल्लाला उसका।।
दो छंदो का खेल,     त्रिकल में है उलझाए।
जो उलझन से पार,      हर्ष से छंद रचाए।।
ग्यारह-तेरह ने सदा,  दिव्य गढ़ा यह छंद है।
ध्यान रखे जो मापनी,हुई क़लम मकरंद है।।
••••एवं 👇

मात्रा-गणना के सँग,शिल्प-भाव सिखलाना।
छंद-महल की मंज़िल,     गहराई को पाना।।
🍎
एक वर्ष की यात्रा ,  आज यहाँ अब गाऊँ।
क्या सबने है सीखा, आज वही दुहराऊँ ।।
लांगुरिया, सरसी में ,गुरु लिखवाए गाना ।
छंद-महल की मंज़िल ,गहराई को पाना।।
🍒
छंद प्रदीप लिखे जो,  आनंदित उर होता।
चौकड़िया-मानव में,बार-बार मन खोता।।
शृंगार यहाँ  योगी         मंगलवत्थू जाना ।
छंद-महल की मंज़िल,गहराई को पाना ।।
🍒
योग-भिखारी चौपइ,  शंकर सँग चौबोला।
कठिन विधानों के हर,राज़ गुरू ने खोला।।
यहाँ विष्णुपद आया , छंद अहीर सुहाना  |
छंद-महल की मंज़िल, गहराई को पाना।।
🍒
छंद हंसगति न्यारा , है तमाल की धारा
छंदों को नित लिखना,सबको ही है प्यारा।।
आभारी हूँ गुरुवर,        नहीं छंद अंजाना।
छंद-महल की मंज़िल , गहराई को पाना।।
••एवं 👇

कृष्ण-मनोहर केशव-गिरधर,  अति सुंदर हर नाम ।
हरि हरते हर मन मुस्का कर ,      हरना ही है काम।
वेणु-बजैया रास-रचैया ,     वह माधव गोपाल --
मन-मंदिर प्रभु जिसके बसते,वह मन रटता श्याम।।
🍎
भक्त दिखे कह राधा-राधा,    एक सभी का हाल है।
कृष्ण नाम का हाला पीकर ,बदली सबकी चाल है ।
वृंदावन को जो भी जाए ,पूर्ण नहीं वह लौटता --
हृदय चुराये यशुदानंदन ,       जाने कैसा ग्वाल है ।।
🍎
ब्रज की तुलसी ने तप साधा, दिखती प्यारी राधा।
नैनों में हरि दर्शन देती ,      सब कुछ वारी राधा ।
पत्ती-पत्ती हर टहनी ही ,दिखते शीश झुकाए--
हरि-उर जीती जाने 'वरदा',फिर क्यों हारी राधा ।।
🍎
बृजनंदन की वंशी तो ,           सबकी पीड़ा हरती है।
माया-नगरी से हरि-पथ ,    उलझे मन को करती है ।
मोहन सबके प्यारे हैं,    पागल मन हरि को जप लो --
जिस उर-उपवन हरि-पद हो,वह मन पावन धरती है।।
•••एवं👇
श्रृंगार छंद आधारित मुक्तक

कृष्ण की गीता नित दे ज्ञान।
युद्ध से मत भागो कर भान।
कर्म फल की चिंता को छोड़ --
देखते ईश्वर    सब दे ध्यान।।
🍎🍎
तमाल छंद आधारित मुक्तक

हर मानव ही अर्जुन कर लो भान। 
मन ही हारे जग प्रभु देते     ज्ञान।
 गीता हरि की हरती उर के पीर--
 सब प्रश्नों का उत्तर इसमें गान।।
🍎🍎
हंसगति छंद आधारित मुक्तक

हरि-मोहन-गोपाल ,ईश   गिरधारी ।
कहते ब्रज के ग्वाल,कृष्ण अवतारी। 
माधव की शुचि वेणु ,  है हरे पीड़ा -
देती सबको तार,   मुश्किलें हारी ।।
🍎🍎
योग छंद आधारित मुक्तक

मोहन-माधव ,केशव ,ईश हमारे। 
नारायण हम आए, द्वार तुम्हारे ।
माया छल हँसती है ,बहुत सताए-- 
भवसागर है गहरा ,भक्त पुकारे।
🍎🍎
योगी छंद आधारित मुक्तक

छंदों की नगरी ,            उर को है भाए।
आत्मिक-सुख,लेखन,सब कुछ दे जाए ।
गागर में सागर ,गुरुवर छलकाते --
गुरुवर की छाया,शुचि पथ दिखलाए।।
🍎🍎
विष्णुपद छंद आधारित मुक्तक--

बहुत नचाता है सबको यह ,गोल-गोल पैसा ।
दुनिया पीछे भागे पल-पल    ,यह मोहे ऐसा ।
छूटे-टूटे है हर रिश्ता ,बस  पैसा पहले --
हर लोभी हँस बिक जाता है,पैसा यह कैसा।।
🍎🍎
शंकर छंद आधारित मुक्तक--

केशव ,माधव ,गिरधर, मोहन ,कृष्ण-हरि,गोपाल ।
नाम सभी प्रिय मोहक पावन,  ईश ब्रज के ग्वाल ।
कमलनयन के नीरज-नैना ,प्रीत की दे वृष्टि---
हृदयविहारी ही नारायण  ,       यशोदा के लाल ।।
🍎🍎
मंगलवत्थू छंद आधारित मुक्तक--

मंगलवत्थू छंद,     लगे रोला जैसा ।
दो मात्रा का भार , नहीं इसमें वैसा।
कर प्यारे अभ्यास ,छंद यह अद्भुत है--  
छंद नवल जो दूर , छंद-प्रेमी कैसा।।


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 दुनिया की सब बातें छोडो़,हरि से नाता जोडो़।
 अपने जीवन की नैया को,गुरु के दर पे मोडो़ । 
 ईश्वर का नित सुमिरन करके,जग की कारा तोडो़।
 निश्चय पक्का कर आत्मा का ,भ्रम का भांडा फोडो़।
                             (2)🍒🍒
 मेरी बात सुनो तुम बहना,लाज हमारा गहना।
 नाम उसी का ऊँचा जग में,जिसने इसको पहना।
 दौर भले ही फैशन का हो,मर्यादा में रहना।
 अबला बनकर दुनिया भर के,जुल्म नहीं तुम सहना।।
••••••एवं 👇
1-🍎
शबरी जैसा धीर,कहाँ से लायें।
जिसके झूठे बेर,राम जी खायें।।
सच्चा था विश्वास,लगन अति भारी।
बरसों पंथ निहार,नहीं वो हारी।।
2-🍎🍎
केवट जैसा भाग्य,नहीं सब पाते।
चलकर जिसके पास,राम जी आते।।
जग के तारन-हार,खडे़ सकुचाते।
जाना है उस पार,उसे समझाते ।।
3-🍎🍎🍎
कान्हा जैसा मित्र,पुण्य से मिलता।
देख सखा का हाल,पात सा हिलता।।
छोटी सी सौगात,माँग कर लेता।
बदले में दो लोक,उसे दे देता ।।
4-🍎🍎🍎🍎
राधा जैसा प्रेम,कहाँ अब होगा ।
बरसों रहकर दूर,विरह था भोगा।।
पल भर को भी नाम,नहीं बिसराया।
रटते-रटते श्याम,छोड़ दी काया।।
5-🍎🍎🍎🍎🍎
मीरा का था जन्म, बडा़ बड़भागी।
श्याम श्याम बस श्याम ,लगन थी लागी।।
छोड़ जगत के गीत,नाम गुण गाया।
अपनी अन्तिम श्वांस,श्याम को पाया।।
6-🍎🍎🍎🍎🍎🍎
नानक का गुणगान,सभी जन करते।
जपुजी जैसा ग्रन्थ,वही रच सकते।।
भोला था स्वभाव,भरी थी ममता।
सिक्खों का है धर्म,उन्हीं से चलता।।

मन की शांति तभी मिलती है, मन रहता है जब उजला।
मन चाहे ये करना विचरण, पेचीदा है ये मसला।।
🍎
किस-किस से जाकर है मिलता, पता नहीं मन को मेरे,
कैसे-कैसे खेल खेलता, अनगित अनेक बहुतेरे।
जानू कैसे मन को मेरे, मन तो मेरा है पगला,
मन चाहे ये करना विचरण, पेचीदा है ये मसला।।
🍎
गहरे मर्म रखे मन अंदर, कौन जान इसको पाया,
मानव तू सदा मोह माया, में ही तो बस भरमाया।
मन से पूछूं मैं मन मेरे, अंदर की बातें बतला,
मन चाहे ये करना विचरण, पेचीदा है ये मसला।।
🍎
पाप कपट से मन दूर रहे, दानी मन भरपूर रहे,
सुख देकर मन ये दूजों को, खुद सारे ही कष्ट सहे 
मन है सत्यम शिवम सुंदरम, लेता नहीं कभी बदला,
मन चाहे ये करना विचरण, पेचीदा है ये मसला।।
🍎
छोड़ूं लगाम कैसे मन की, डर लगता भाग न जाए,
फँस गया गलत हाथों में तो, आकर के कौन बचाए।
नहीं जानता है मन मेरा, हैं आसपास कई बला,
मन चाहे ये करना विचरण, पेचीदा है ये मसला।।
🍎
रखना श्याम लाज तू मन की, सीधा-साधा बेचारा
बहकने नहीं पाए मन ये, रखना सदा खुला द्वारा।
शरण इसे तू अपनी देना, जैसा भी है बुरा-भला,
मन चाहे ये करना विचरण, पेचीदा है ये मसला।।

जगदीश गोकलानी "जग, ग्वालियरी"✍️
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💐 विधाता छंद 💐
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कदम जो बढ़ गया आगे न फिर पीछे हटता हूंँ ।
हजारों गम  छुपाकर भी  सदा मैं  मुस्कुराता हूंँ ।
मुझे तकदीर ने बेशक चला है उम्र भर लेकिन -
यहांँ मैं हौसलों से हर सफर आसान बनाता हूंँ ।
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
कभी तो चांँद निकलेगा कभी तो चांँदनी होगी ।
कभी संगीत  बिखरेगा कभी  तो रागिनी होगी ।
अमावस चार दिन  की है  उजाला पक्ष आएगा -
मिलन की रात आएगी प्रणय की यामिनी होगी |
••••एवं 👇
      💐हंसगति छंद 💐 मात्रा -20, 11- 9 पर यति
🍎
हमको  अपना  देश,  बहुत  है  प्यारा ।
यह दुनिया का मुकुट, सभी से न्यारा ।।
मौसम  के  बहुरंग,   यहांँ  पर  आते ।
कोयल  मोर चकोर,  कहीं पर गाते ।।
🍎🍎
उड़ता कहीं  गुलाल, कहीं  दिवाली ।
देख  तमाशा खूब,  बजाओ  ताली ।।
सावन  में  हर  ओर,  पड़े  हैं  झूले ।
सुन महिला संगीत,  राह हम भूले ।।
🍎🍎🍎
राम-कृष्ण  भी कभी,  यहांँ पर खेले ।
कहीं  मने  त्यौहार,  कहीं  पर  मेले ।।
लगती  कहीं  दुकान, कहीं  पर ठेले ।
आकर  कोई  गरम,  जलेबी  ले  ले ।।
••••एवं👇
पूष माह  की इस  सर्दी ने,  सूरज को ललकारा है ।
गया जेठ- वैशाख मास अब, आया वक्त हमारा है ।।
छुप कर बैठा है अब सूरज, छाया गजब कुहासा है ।
आज झोपड़ी में गरीब की, कैसी अजब निराशा है ।।
ठिठुर  रहे  हैं  छोटे  बच्चे,  कपड़े  फटे  पुराने  हैं ।
रोती है जिद  करके पिंकी,  चलने नहीं  बहाने हैं ।।
दादू मुझको जैकिट ला दो,  ठंडी बहुत सताती है ।
मेरी एक  सहेली मुझको, आकर रोज चिढ़ाती है ।।
घास-फूँस कुछ उपले लाकर, थोड़ी आग जला लेंगे ।
ज्वार-बाजरा अरु बथुआ से, अपना काम चला लेंगे ।।
••••एवं 👇
साथी सावधान  तुम रहना,  दुनिया में  मक्कारों से ।
धोखा मिल जाता है अक्सर, अच्छे-अच्छे यारों से ।।

किया भरोसा जिस पर तुमने, आगे वही दगा देगा ।
खुशियों के  झुरमुट  में तेरे, प्यारे आग  लगा देगा ।।

इसीलिए  मैं तुमसे  कहता,  दुनिया में  यदि जीना है ।
फूँक-फूँक कर रखो कदम तुम,हर एक दोस्त कमीना है।।

अपने निजी स्वार्थ की खातिर, तुमको यह धोखा देंगे । 
 भगत सिंह  की तरह एक दिन,  फांँसी तुम्हें चढ़ा देंगे ।।
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ताज पहनने के चक्कर में, करें देश जोड़ो यात्रा।
राष्ट्र प्रेम की इनके उर में,दिखे नहीं मासा मात्रा।।

पुरखों का इतिहास अजूबा,इनकी ग़ज़ब कहानी है।
गद्दी के  हकदार  यही  है , इनकी  यही  निशानी है।।

जिसने भारत मां के अगणित,देखो भाग बना डाले।
गद्दी  पाकर   हौले - हौले ,  भोंके  छाती   में   भाले।।

धर्म मिटाने की साज़िश, जिनके   दादाओं ने  डाली।
बहुत दिनों के  बाद  देश ने  , उनसे  आजादी  पाली।।

नहीं  दुबारा  घुसने   देने का ,  निश्चय  कर  डाला  है।
समझ गये हैं  देश  विरोधी , दल  को  इसने  पाला है।।
••••एवं 👇
शिल्प ~ १६ - १३ (चौपाई + दोहे का विषम चरण)
बेजुबान सड़कों पर घूमे,~~~ मौज काटते लोग हैं।
भूखे प्यासे कुटते पिटते,~~~~झेल रहे हर रोग हैं।।
धर्म हमारा पूज्य बताता,~~ किन्तु नहीं हम पूजते।
उनके हिस्से पर कब्जा कर,~ ~ सरकारोंं से पूछते।।

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विषय - दुःखद समाचार - कोटा में कोचिंग के तीन बच्चों द्वारा आत्म हत्या। ( छंद मात्रा 14,14 चरण पदांत दो दीर्घ )
बच्चों के यूं जाने पर,
कुछ शोक-गीत गाने दो ।
कुछ सोचो अरु कुछ बोलो,
तुम निज विचार आने दो ।
ये आत्म घात करने की,
कैसी विपदा है आई -
तुम खिले हुए फूलों को,
यूं ही मत झर जाने दो ।
( क्रमशः )
••••एवं 👇

चंदा की शीतलता भरले, सूरज का उजियारा भरले ।
ऐसा प्रेम जगा मन प्राणी, कौना कौना सारा भरले ।

राम नाम की ज्योत जला दे, दिल से सब अवसाद मिटा दे 
मन के आंगन खुशी उगाकर, खुशियों से गलियारा भरले |

सुख देगा सुख तभी मिलेगा, तभी हृदय संतोष दिखेगा -
दया भक्ति सुख ममता सागर, योग विधा के द्वारा भरले ।

मन सुंदर तो घर सुंदर है, घर सुंदर तो जग सुंदर है  -
तज मलीनता अपने मन की, पावन गंगा धारा भरले ।

साथ उजाला चला करेगा, बन कर दीपक जला करेगा -
अपने मन - मंदिर में 'रघु' जी, नाम राम सा प्यारा भरले ।
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मापनी -2122 2122,2122 2122 
🍎
देश का उत्थान हित में , जो सृजित की भावनायें।
है नमन उनको हमारा,     साथ में शुभ  कामनायें।
दान तन  देकर हुये जो, जन हुतात्मा देश कारण ।
पृष्ठ जो इतिहास बदले, नष्ट करके ऑग्ल के तृण।1।
🍎
है समय स्वर्णिम अभी हम, गीत उनके भव्य   गायें ।
एक होकर आक्रमण कर, शत्रु को हम फिर  हरायें।
चाल छल की चल रहा है , अति पड़ोसी जो हमारा ।
लाज उसको है नहीं वह,      युद्ध तो प्रत्येक हारा ।2।
🍎
युद्ध गृह को  छोड़ कर हम ,क्षेत्र रण में  शीघ्र जायें ।
जो लुटा आतन्क में सब,   जीत कर हम देश लायें ।
नाग अर्जुन हन्त अरि से, व्योम में  भर दें धुॅवा हम ।
जान जाये लोक  तब फिर, हम नहीं हैं  शत्रु से कम ।3।
🍎
क्या करेंगीं अब हम हमारा, विश्व  की यह नाटिकायें ।
घात पर प्रतिघात कर हम,दन्त से अरि को चबायें।
जानता जो युद्ध भाषा, सन्धि जिसको भार लगती ।
लोभ में जो चाहता है  ,      जीतना सम्पूर्ण धरती ।4।
🍎
कौन किसका साथ देता, देख लें हम युद्ध में अब ।
शान्त कब तक हम रहेंगे, नित्य होती हानि है जब।
मान मर्दन हम करें अब, कार्य कुछ करके दिखायें ।
राष्ट्र का विस्तार कर हम, भाग भू अरि का मिलायें ।5।
•••••👇
विधान चौपाई +दोहे का सम चरण 
समान्त -आर,अपदान्त. गीतिका

हमें सिखाती पुस्तक सद्गुण ,जीवन का व्यापार।
सही  सिखाते गुरुवर जीना,     शुभ करते संचार  ।१।

गुरु नारायण से भी बढ़कर ,        गाते हैं सद-ग्रंथ,
इस माटी घट का सर्जक भी,   गुरु है एक कुम्हार।२।

गुरु आज्ञा सर्वोपरि साधक,    एकलव्य विख्यात  ।
 क्यों रे जन तू है बौराया,     करता गुरु प्रतिकार।३।

माली बनकर जिसने पाला,तेरा किया विकास,
भूल गया तू उपकारों को,   गुरु से करे न प्यार ।४।

अब तो गुरु साथी बनकर ही   दें  तुझको निर्देश,
क्यों ईर्ष्या तू गुरु से करता,    लिख दे सच्चा सार।५।

अभियोगों की सूची लम्बी,का लिखता आलेख।
संकेतों में तू बतलाता,         जैसे मूर्ख गँवार।६।

जब समर्थ तू संस्थागत है ,क्यों करता प्रतिशोध,
पकड़़ो गुरु के पद पंकज तो,    हो तेरा उद्धार।७।

*
रंग बिरंगे सुमन खिले हैं, भारत की फुलवारी में। 
मत तोड़ो खिलने दो सबको, अपनी-अपनी क्यारी में। 

सभी तरफ फैलाते सौरभ ,  इनसे लगती सुँदर भोर, 
अलग-अलग फूलों से शोभा, इस हरियाली सारी में। 

पुष्प गुलाब जुही बेला का  , सुमन बाग हर अलबेला, 
नहीं रौंदना भूले से भी,    तुम कुरसी   की   यारी में। 

प्रेम भाव से  सबको सींचो, खाद न डालो नफरत की, 
खरपतवार उगे तो काटो,       देशभक्ति की आरी में। 

सिँचित भू  यह बलिदानों से , बीज समाहित सब इसमें , 
आज देखते  अनुपम ‌सुंदर ,     भारत  चलती पारी  में।। 
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🌷ताटंक छंदाधारित "गीत"  मात्राभार - 30/16, 14 पर यति, 🌷 पदांत - तीन गुरु अनिवार्य🌷

यह जीवन है  एक पहेली, कोई समझ नहीं पाया। 
आया वक्त कई रूपों में, मन मानव का भरमाया।। 
🍎
उत्साहित मन रोज निहारा, अपने हाथों की रेखा,
जागी आँखों के सपने को, उसने हसरत से देखा, 
बाँध  उसे सुंदर  डोरी से, जग बंधन में उलझाया।
आया वक्त कई रूपों में, मन मानव का भरमाया।।
🍎🍎
गहरे पानी में मन पैठा, हिम्मत कर उसको थाहा, 
रौंद कदम से चट्टानों को, चोटी पर चढ़ना  चाहा, 
पंख लगे थे उम्मीदों के, रोका पथ दुख का साया। 
आया वक्त कई रूपों में, मन मानव का भरमाया।।
🍎🍎🍎
बेबस मन हर लाचारी का, गरल सदा ही पीता है, 
तब भी थामे आशाओं को, श्वाँस सँभाले जीता है, 
राहों के  इन अवरोधों  से, रंच  नहीं वह घबराया।
आया वक्त कई रूपों में, मन मानव का भरमाया।।
••••एवं 👇
🍎मानव छंदाधारित "बालगीत" 🍎
💥विधान - 28 मात्रा 14,14 पर यति, अंत दो गुरु💥
🍒घर : एक उपवन🍒

हम बच्चे  किसलय जैसे, दादा करते रखवाली। 
नेह  पिता का  लाता है, घर के अंदर खुशहाली।। 
🍒
मौसम  कैसा भी आए, हर  वक्त  खिले रहते हैं, 
अपने मन की सब बातें, माँ से  जाकर कहते हैं, 
दादी की नेहिल ममता, फूलों की मोहक डाली। 
नेह  पिता का  लाता है, घर के अंदर खुशहाली।। 
🍒🍒
पर्वोत्सव  पर  हम  अपने, नाना के घर हैं जाते, 
खेल - खिलौने को देकर, मामा वापस पहुँचाते, 
अपने घर में हरदम ही, होती है सुखद दिवाली। 
नेह  पिता का  लाता है, घर के अंदर खुशहाली।। 
🍒🍒🍒
देख हमें  झबरा कालू, जब भागा - भागा आए, 
दौड़े, घूमे - झूमे वह, फिर सबको नृत्य दिखाए, 
खुश होकर  छोटी मुन्नी, तब खूब  बजाए ताली। 
नेह  पिता का  लाता है, घर के अंदर खुशहाली।। 
डाॅ० अतिराज सिंह✍️ बीकानेर, राजस्थान
••एवं 👇
🍎ताटंक छंदाधारित  मुक्तक "त्रय"🍎
विधान - 30 मात्रा 16, 14 पर यति
पदांत - तीन गुरु अनिवार्य

लक्ष्य हमेशा आगे रखकर, हे मन! कदम बढ़ाना है, 
साथ नहीं जो दे  कोई तो, तनिक  नहीं घबराना है। 
जीवन के पथ पर  बाधाएँ, पल - पल डेरा डालेंगी - 
भटकाएँगी  डगर  हवाएँ, फिर भी  चलते जाना है।। 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~🍎
भाग्य उसी के आगे  चलता, जो नर कर्मठ होता है, 
देता साथ समय उसका ही, भू पर श्रम जो बोता है।
वह मानव कैसे कुछ पाए, जो  कर्तव्य नहीं समझा - 
जाता पीछे  छूट सभी  कुछ, आँसू से मुख धोता है।। 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~🍎
गहराया यह तम का घेरा, सुबह  पहर हट जाएगा, 
आशा  है  सबके  ही  मन में, नवल सवेरा आएगा।
तरु पत्रों पर भी  छाया है, मौसम  का गहरा साया - 
पूर्व दिशा से चलकर दिनकर, भू पर उष्मा लाएगा।।🍎

डाॅ० अतिराज सिंह✍️ बीकानेर, राजस्थान
••••••एवं 👇
🍒सार छंदाधारित "पद" (प्रतीकात्मक)🍒
🎈विधान - 28 मात्राभार 16, 12 पर यति 🎈

मेघ! पुनः मन क्यों भरमाए? 
उमड़ - घुमड़ कर नाहक बेधे, अतिशय शोर मचाए!! 
अहम लिए खुद अपने अंदर, स्वार्थ सदा दिखलाए! 
नील वसन तन पर धारण कर, छलिया रूप बनाए!! 
ग्रहण  किए उष्मा  सलिला से, पर पल में ठुकराए! 
कैसे भूल  गए उस  तट को? जहँ जीवन गति पाए!! 
जल भंडार हुआ  संचित जब, इधर - उधर बरसाए! 
बिन  समझे ही प्यास नदी  की, कुछ  बूँदे टपकाए!! 
बीता  समय  नहीं  फिर आता, क्या होगा पछताए! 
अब तो अश्रु  नयन  से ढरकर, भ्रम का दुर्ग ढहाए।।  
डाॅ० अतिराज सिंह✍️ बीकानेर, राजस्थान
•••एवं 👇
🍒लावणी छंदाधारित "बाल गीतिका"🍒
विधान - 30 मात्रा 16, 14 पर यति पदांत - 2 लघु, 2 गुरु
🍎बाल संकल्प 🍎

आया फिर घातक कोरोना, किंतु नहीं अब डरना है, 
पालन कर सारे  नियमों का, दुख से शीघ्र उबरना है।

भाई और  बहन सब मिलकर, खेलेंगे अब घर में ही, 
पास कई हैं खेल - खिलौने, बाहर क्यों पग धरना है? 

बहुत  जरूरी  होने  पर  ही, घर  से  बाहर निकलेंगे, 
सजग रहेंगे मुख अपना ढक, कुछ ही देर ठहरना है।

कर को मलकर  साफ करेगें, नीर नहीं  शीतल लेंगे,
कार्य सही कर पाएँ कैसे? वरण यही अब करना है। 

हारेगा  जब  यह  कोरोना, विहँस  उठेंगे  सब बच्चे, 
बंदी जैसा समय भुलाकर, सबको तुरत निखरना है। 

जाग उठेगा यह भू अंचल, फिर आएगी खुशहाली, 
खुल जाएँगे विद्यालय सब, हमको पुन: उभरना है।

डाॅ० अतिराज सिंह✍️ बीकानेर, राजस्थान
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मात   तेरे   दर   खड़े   हैं।
जोड़कर हम कर खड़े हैं।।
कामना ‌  पूरी    करो  माँ।
दुःख दुखियों के हरो माँ।।
🍎
एक   तू   ही   है  सहारा।
बिन   नहीं  तेरे   गुजारा।।
दूर   सारे  दोष   कर  दो।
ज्ञान  का  भंडार भर दो।।
🍎
सत्य  राहों  पर  चले हम।
नित्य दीपक से जले हम।।
हम   सदाचारी   बने  माँ।
नित   कृपाकारी बने माँ।।
🍎
है खड़े  मझधार  में  हम।
मोह  के  संसार  में  हम।।
आरती      तेरी     उतारे।
माँ लगा हमको  किनारे।।
🍎
दूर  कर  माँ   विघ्न सारे।
जी    रहें    तेरे   सहारे।।
सर्व का कल्याण कर माँ।
दे सभी को नेक वर माँ।।

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                      🍎   शीर्षक - "मेला"🍎
""""""""""""""""""""""""""""""""""''''"""""""""""""""""""""""
 मुझे मेलादिखा दो चलकर, मेरे प्यारे दादा।
खूब  पढ़ूँगा  पूरे  मन से, ये  है  मेरा  वादा।।
🍎
लगा हुआ है जंगी मेला, जिसमें आया जादू।
संडे को मेला दिखला दो, मुझको  मेरे दादू।।
अबकी जैसे कभी-कभी ही, लगते देखे मेले।
रोज दोपहर से  दिखते  हैं, आते-जाते  रेले।।

मम्मी-पापा बिजी बहुत हैं, बात न करते ज्यादा।
मेला मुझे दिखा दो चलकर,  मेरे   प्यारे   दादा।।
🍎
मेले में है  कुँआ मौत  का, भाँड़ों  की  नौटंकी।
दादा सुनो  भविष्य बताता, ऐसा आया  डंकी।।
हिंडोले हैं खेल खिलौने, तरह-तरह  के  खाने।
जोकर जी  गाते रहते  हैं, नाच-नाचकर गाने।।

मेनगेट  पर   खड़ा  आदमी, ओढ़े  एक  लबादा।
मेला मुझे  दिखा दो  चलकर,  मेरे   प्यारे  दादा।।
🍎
झूले  कई  तरह  के  आए, जिनमें  मैं  झूलूँगा।
उँगली पकड़ रखूँगा कसकर, कहीं नहीं भूलूँगा।।
सर्कस भी इस बार लगा है, जिसमें रामू हाथी।
जिसे  देख  तारीफ़ें  करते, मुझसे  मेरे  साथी।।

नए-नए  करतब दिखलाता, भालू  सीधा सादा।
मेला मुझे दिखा दो  चलकर, मेरे   प्यारे   दादा।।
🍎
दादी  से  पूछा  था  मैंने, वो  भी  साथ  चलेंगीं।
मेले में से किट क्रिकेट की, मुझको लेकर देंगीं।।
एक वीडियो गेम आप भी, अच्छा सा दिलवाना।
गरम मगौड़े गाजर हलुआ, दादाजी  खिलवाना।।

दादाजी मेला चलने का, कर  लो  आज इरादा।
मेला मुझे  दिखा दो  चलकर, मेरे  प्यारे  दादा।।
🍎
दादा  बोले  जीवन में हैं, यों तो बहुत झमेले।
जिनसे कुछ राहत दिलवाते, ऐसे  मेले-ठेले।।
अगले संडे को बिटवा हम, सभी चलेंगे मेला।
ए टी एम  अभी  जाता  हूँ,  लेने  पैसा  धेला।।

अपने अच्छे  दादाजी  का, मैं  हूँ  नन्हा  प्यादा।
मेला मुझे दिखा दो  चलकर,  मेरे  प्यारे  दादा।|
🍎
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‘’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’'''''''''''''''''
                1-🎈
दशरथ को चिंता व्यापी।
जो नृप थे बहुत प्रतापी।।
संतान न अब तक पायी।
थी   वृद्धावस्था   आयी।।
                2-🎈
भूपति ने  मन  में  ठानी।
बुलवाये ऋषि मुनि ज्ञानी।।
पुत्रेष्ठि    यज्ञ    करवाया।
आशीष सभी  का  पाया।।
                3-🎈
नौमीं तिथि चैत्र महीना।
तब जन्म राम ने लीना।।
शुभ ग्रह गोचर थे नाना।
तब जन्मे कृपानिधाना।
                4-🎈
दशरथ  घर  बजे  बधाए।
चौथेपन  में   सुत   पाए।।
थीं अति प्रसन्न सब रानी।
प्रभु लीला से अनजानी।।
                5-🎈
सुर  नाना   वेश   बनाए।
प्रभु  दर्शन  करने  आए।।
बलवती हो उठी  आशा।
अब होगा निशचर नाशा।
                6-🎈
सब देव  गगन  में  आए।
मन मुदित  पुष्प  वर्षाए।।
नृप की मिट गई उदासी।।
खुश हुए अयोध्या वासी।

•••एवं 👇
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           🍒  💐🎈  #सार_छंद#🎈💐🍒
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1-🍎
कभी  सिखाए  पूत  कहीं  क्या, दरबारों में  जाते।
जिनमें बुद्धि विवेक स्वयं का, वही सफलता पाते।।
नैसर्गिक  प्रतिभा  का  होना, होता  बहुत  जरूरी।
बिना कर्म के कभी न होती, साध  किसी की पूरी।।
2-🍎🍎
सजने-धजने से  काया के, रोग  नहीं  मिट  जाते।
पोत-पोतकर  काजल  अंधे, खुद को ही भरमाते।।
काजल  पोत  रहे  अंधे जो, उन्हें  कौन  समझाए।
नेत्र ज्योति काजल पोते से, कभी न वापिस आए।।
3-🍎🍎🍎
आती देर-सबेर सदा ही ,  बात  सत्य  जो  होती।
भले  व्यर्थ   बहलाए  कोई,  करके   लीपापोती।।
कृत्रिमता क्या मौलिकता को, मात कभी दे पाती।
सच्चाई  सम्पूर्ण  जगत में, सदा  सभी को भाती।।
4-🍎🍎🍎🍎
जड़ें   छोड़   डाले  जो  कोई, शाखाओं  में  पानी।
कौन भला होगा इस जग में, उस  जैसा  अज्ञानी।।
मूल समस्या अगर मिटाना,तो फिर जड़ तक जाएँ।
पोत-पोत अंधों सा काजल, व्यर्थ  न  मन बहलाएँ।।
     भोपाल, म.प्र.
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                 🍒सरसी छंद🍒
नफरत करते रहते हैं सब,थोड़ा कर लो प्यार।
सीखो मिलजुल कर रहना यह,जीवन का है सार।।
कब-कब किसका छूटे डेरा,नही किसी को भान।
यह जीवन है भूल भुलैया,इसको सच तू मान।।
•••••एवं 👇

शारदे माॅ॑ दे दो वरदान,
द्वार पर खड़ा भक्त नादान।
नित्य करता माॅ॑ तेरा ध्यान,
मात देना शब्दो का ज्ञान।
🎈
लिखूं मै हर दिन ही रस छंद,
लेखनी पड़े न मेरी मंद।
कलम को दे दो मेरे धार,
शब्द का हो जाए श्रृंगार ।।
🎈
कलम है दो धारी तलवार,
बने जो हो तेरा उपकार।।
मिटा दू सब मै भ्रष्टाचार,
सजे माॅ॑ तेरा ही दरवार।।
🎈
गंग की बहती हो मधु धार,
हृदय में भर दे पर उपकार।
बुराई कभी न आए पास |
भक्त की मात यही है आस।।
🎈
सुरो की देवी है तू मात,
कृपा से तेरे होती बात।
कंठ में है तेरा ही वास,
सभी देवो मे तू है खास।।
•••एवं 👇

स्वर्ग है धरती पर कश्मीर,
दफन हैं कई अंक मे पीर।

शीत की बहती मंद बयार,
प्रकृति का करती है श्रंगार।
जिहादी करते रहते वार,
गोलियों की करते बौछार।
मनुज कैसे रख पाए धीर?
दफन हैं कई अंक मे पीर।
🍎🍎
मुकुल का जीवन जैसे जेल,
कभी खेले वो कैसे खेल?
दया की मांग रहे हैं भीख,
कंठ से निकले उनके चीख।
मुसीबत खड़ी आज गंभीर,
दफन हैं कई अंक मे पीर।
🍎🍎
मात रो रो कर है बेहाल,
कौन पूछे अब उसका हाल।
देहरी पर रोए है तात,
हदय की कौन सुने अब बात।
नैन है सजल और अधीर,
दफन हैं कई अंक मे पीर।
🍎🍎
दरिंदों का कैसे हो मान?
मिले कैसे इनको सम्मान।
कत्ल करते हैं ये दिन रात,
नही इनकी कोई औकात।
खींच कर चलते धर्म लकीर,
दफन हैं कई अंक मे पीर।
🍎🍎
देश के ये सब हैं गद्दार,
वीर करते हैं इन पर वार।
हिंद की इन वीरो से शान,
वतन का रखें सदा ये मान।
इन्ही से जिन्दा है कश्मीर,
दफन हैं कई अंक मे पीर।

स्वर्ग है धरती पर कश्मीर,
दफन हैं कई अंक मे पीर।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒
जाग मुसाफिर बीत गई अब रैन।
हुआ सवेरा खोल हृदय के नैन।
व्यर्थ गॕ॑वाया जीवन था अनमोल -
राम नाम अब रटकर पाना चैन।
🎈🎈
हंस अकेला उड़ जायेगा दूर।
फिर भी रहता मूर्ख नशे में चूर।
रीझ रहा है दिखा दिखा कर रूप -
नहीं बचेगा काल बड़ा है क्रूर।

नीमराना अलवर राजस्थान।
••••एवं 👇

समय का पहिया है बलवान।
हृदय में मत रखना अभिमान।
बना है जग में क्यों नादान।
उदय के सम्मुख है अवसान।
🎈
कहाॕ॑ से आता है इंसान।
जीव की अपनी क्या पहचान।
लिखा है सबका अटल विधान।
सत्य है ईश्वर सकल जहान।
•••एवं 👇

आओ बच्चों खेलें खेल।
आपस में बढ़ जाये मेल।

रहे हमारा स्वस्थ शरीर,
लेगा हर आफत को झेल।

खली बली से बनें जवान,
बढ़ जायेंगे जैसे बेल।

चुन्नू मुन्नू आओ पास,
आज बनेंगे हम सब रेल।

झुककर मोटू पकड़ कमीज,
सबको आगे चलो धकेल।

चढ़े सवारी होती भीड़,
धक्का मुक्की रेलमपेल।

आगे इंजन करता शोर,
जिसमें भरता ईंधन तेल।

खेल खिलाता है बलकेश,
आओ मिलकर करें कुलेल।

🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒
💐16/14परयति अंत में मगण(sss)💐

इन नैनो को चैन कहां अब,       तरस  दरस को जाते हैं।
निशि वासर व्याकुल होकर यह , बरस विवश हो जाते हैं।

अगणित दिन बीते हैं लेकिन ,समझें मत इन की भाषा |
क्षीण हुई जाती है अब तो, दिन प्रतिदिन मन की आशा।|
कोई हवा किवाड़ हिलाए,     हर्षित   यह   हो जाते हैं।
इन नैनों को ....
🎈
राह तके प्रतिपल प्रियतम की, पर वह यह पथ भूले हैं।
गई बहार शरद ऋतु आई,        सूने से सब झूले हैं।
इससे पहले सांस थमें तुम, आ जाओ समझाते हैं।
इन नैनों को.....
🎈
याद  करो यह नैन वही हैं, जिनको याद तुम्हारी थी।
निर्निमेष इनको तक कर के,कितनी रात गुजारी थी।
किस सौतन के संग न जाने,अब यह क्षण बंट जाते हैं।
इन नैनो को......
🎈
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒🍒

तोड़ के पिंजरा अब उड़ने, लगा पंख परवाज।
उड़कर छूए नील गगन को, पहने सिर पर ताज।।
नील गगन में पूरी होगी, हृदय की अभिलाषा। 
इक दिन इतरायेंगे हम भी, बोल मधुर स्व भाषा।।
🍒🍒
बंद किया किसने मुख देखो, हाथ किया लाचार।
आजादी होती है प्यारी, मन में करो विचार।।
जोड़ी हमने है लेखन से,अपनी यह तकदीर।
इक दिन होगी विजय हमारी, मन में रखते धीर।।
🍒🍒
नव इतिहास रचे जग में हम,नेक राह दिखाएँ।
सतरंगी प्यारी भाषा को, आगे हम बढ़ाएँ।।
नहीं किसी से नफरत करते, सबका रखते मान।
स्वाभिमान की खातिर हम सब, करते जीवन दान॥
©®
रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार✍️
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मतलब के रिश्ते सारे है,मतलब के इंसान।
इस दुनिया में जीना है तो, रिश्ते को पहचान।।

प्रीत निभाना सबसे सीखों,  विधि का मानो लेख ,
सही ठिकाना अपना ढूॅंढ़ो,जहाॅं मिले सम्मान।।

सारा जग तो अपना भाई,पर तुम रखना ख्याल, 
दुख का साथी जो जीवन,उसको अपना मान।।

आस्तीन के साॅंप सभी है,मौका रहें तलाश।
कठिन परीक्षा अजी ज़िन्दगी,लेते हैं भगवान।।

सोच समझ कर करना अपना, पूरा तू दायित्व।
मानवता है धर्म हमारा,मत करना अभिमान।।

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प्रियतम  प्रिया  बचन अनुरागा ,  प्रणय  काव्य  संसार  में l
 किंशुक  पुष्प ललित परिधाना,रस श्रृंगार  प्रसार     में   ll
कवि कोविद कर  विविध  प्रशंसा छन्दस शब्द आगार  में l
हर्ष  उत्कर्  मनचहुँओरा , प्रमुदित  प्रिय     श्रृंगार     में  l l

करहि  कलोल  मोर  मन  हंसा  ,नीर क्षीर  विलगाव    में l
मन मानस जस उड़हिं पतंगा, तिमिर मध्य  ठहराव    में  ll
 चपला उजास  सब  देखहिं, नवल अलंकृत भाव  में l
 दुर्जन सज्जन  निर्गुण जानहिं ,अवगुण ज्ञान   दुराव   में ll
एवं •••••👇

नमन करूँ   माँ के  चरणों  में ,  छंद  प्रवणता   भाव       भरें l
वीणाधारी  मेरी   माता    ,   नवल    शब्द   सद्भाव      भरें   ll
शब्द अर्थ  माँ  कल  संयोजन , निर्मल  नवल  विहान   करें    l
जयति जयति  जय जय माँ वाणी , तेरा नित गुण गान करें ll

नहीं   समय   है  जिनको  मित्रों  , उनसे   क्या   उम्मींद   करूँl
छंद  लावणी  कुकुभ  लिखें  क्या ,   बात यहाँ   ताटंक  करूँll
भार   जोड़   सोलह   चौदह  में  ,   तीस  नवल  अनुराग  भरे l
त्रय द्वै  अन्तक कवि की   ईच्छा ,  वैसे  उसके   नाम    धरे  ll

लिखे  लावणी    छंदहिं   कैसे ,लघु  लघु  गुरु  पद  अंत  दिए l
दो गुरु अंत कुकुभ प्रिय  नामा ,    अंतर  गाल प्रमोद    हिए ll
ताटंकहिं  त्रय  गुरु जब   होई ,   पद  अंतहिं शुभ   नाम प्रिये l
पिंगल  पाणिन भाव  सुमेला ,    बसते  हिय  में    राम  सिये  ll

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