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जब घटना स्थल सूँघकर , भागे है श्री श्वान |
थाने में वह क्यों घुसे , पकड़ लिया दीवान ||
मुझको पता नहीं है
नेता जी के साथ में , चिपके रहे दलाल |
कैसे रातो रात वह , होते माला माल ||
मुझको पता नहीं है
कल उद्धाघित पुल हुआ , आज किया जब गौर |
क्यों लिख्खी चेतावनी ,सावधान कमजोर ||
मुझको पता नहीं है
कल तक थे जो नामजद, थाने में सिरमौर |
आज वही श्रीमान क्यों , राजनीति के दौर ||
मुझको पता नहीं है
जबसे अंदर जेल में , बापू आसाराम |
राधे मां से बात वह, क्या कर पाते शाम ||
मुझको पता नहीं है
दल बदला या दिल कहीं , लेता अभी शुरूर |
सोच रहे अब सिंधिया, मीठे कहां खजूर ||
मुझको पता नहीं है ||
नेता जनता देखकर, हँस लेते हैं रोज |
हमको बुद्धू मानते , खुद में देखे औज ||
मुझको पता नहीं है
मोदी जी अब सुन रहे , सबके मन की बात |
क्यों उसकी सुनते नहीं, जो भाँवर थी रात ||
मुझको पता नहीं है
राहुल से आशा नहीं , रहीं सोनिया सोच |
दल का बारिश कौन हो, निपटे कब यह लोच ||
मुझको पता नहीं है
क्या राहुल जी सोचते, पहले बनूँ प्रधान |
फिर लाकर ही मैम को, थोपू हिंदुस्तान ||
मुझको पता नहीं है
लालू जी क्यों कह रहे, क्या करना इस बार |
मुझें काम कोई नहीं , जब मोदी सरकार ||
मुझको पता नहीं है
क्या राहुल दुर्भाग्य है , या मोदी सौभाग्य |
एक समय दोनों हुए , कुर्सी के अनुराग्य ||
आँख मारना आ गया , राहुल हुए जवान |
क्या प्रसन्न थी सोनिया , लोक सभा दौरान ||
मुझको पता नहीं है
इन्द्रा जी की नाक से , मिले प्रियंका नाक |
पर कितनी उस नाक पर , बाड्रा जी की धाक ||
मुझको पता नहीं है
कमलनाथ की कमल ने , छीन लई सरकार |
हाथ झुलाते घूमते , रखते कितनी खार ||
मुझको पता नहीं है
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दुमदार दोहे ,- झुनझुना
सदा झुनझुना हम रहें , नेता जी के द्वार |
लोकतंत्र की रीढ़ हम , पर रहते लाचार ||
बजाते मिलकर यारा |
लगाते उनका नारा ||🙏
थाम झुनझुना खुश रहें , हम सब भूलें पीर |
वह रक्षक बन देश के , खाते रहते खीर ||
अमीरी उनकी ओली |
फकीरी मेरी झोली ||
बजा झुनझुना हम रहे , उनके आते काज |
दूल्हा है नेता यहाँ , नाच रहे हम आज ||
बराती रहते भूखे |
दिखे तन-मन से सूखे ||
थमा झुनझुना हाथ में , चले गए वह दूर |
पाँच साल में आयगें , बनकर फिर से शूर ||
आरती सभी करेगें |
उन्हीं के वोट भरेगें ||🙏
नहीं सुभाषा बोलना , बजा झुनझुना खूब |
मेहनत में खाने मिले , उनकी डाली दूब ||
बजाते हरदम रहना |
मानना उनका कहना ||🙏
सुभाष सिंघई जतारा जिला टीकमगढ़ म०प्र०(बुंदेलखंड)
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कुत्ते भी -चमचों को देख-
शर्मिन्दा है |
कहते यह नजारा देखने-
हम क्यों जिंदा है ||
कह रहे हैं --इतने नीचे
हम नहीं भाव से भरे |
भले भूखे रह लिया -
और जान से मरे ||
पूँछ हिलाई--
चल गया सिलसिला |
तलवे चाटने का --
मौका नहीं मिला ||
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गिद्द अव यहाँ -
रहते नहीं हैं |
माँस खाते मानव का-
दिखते नहीं हैं ||
पूछाँ बूड़े गिद्द से -
बोला समेट लिया कारोवार |
मरकर के सवने -
नेताओं में ले लिया अवतार ||
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गिरगिट ने भी अपना -
मुँह छिपा लिया |
बुलाकर साथियों को-
सीधा सा कह दिया ||
चुल्लू भर पानी में -
सभी डूव जाओं |
या इंसान से अधिक ~
रंग बदलकर दिखाओं ||
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बूड़े साँप ने नए नवेलो-
साँपो को समझाया है |
उन्हे मत काटना-जिनमें -
हमसे जाय्दा समाया है ||
और नेताओं के पास तो-
हरगिज जाना नहीं |
उल्टा जहर चढा आओगे-
बचने का तव ठिकाना नहीं ||
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कागा बोला जोर से -
साथी क्यों करते हो शोर |
संसद जाकर देख लो-
अपना काम करे कोई और ||
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तोता वोला देखकर-
सुनिए सिंघई सुभाष |
शरीफ जेल में- बन्द है-
बाहर आतंकी परिहास ||
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अपदांत गीतिका 16-14 मात्रा पदांत घरवाली
(हास्य रस )
ताना मुझको मारा करती , जब रहता हूँ मैं खाली |
जो सिखलाया वह क्यों भूले ,कहती मुझसे घरवाली ||
ठोक पीटकर मुझे सुधारा, काम सभी था समझाया ,
अक़्ल शत्रु का ठप्पा देकर , चिल्लाती है घरवाली |
साली मुझसे मिलने आई , हाल चाल है क्या जीजू ,
नहीं प्यार से देख सका मैं , पास खड़ी थी घरवाली |
देख पड़ोसन हँसती मुझ पर , मैं भारी हूँ सकुचाता ,
खाक हुई है इज्जत मेरी , नहीं सोचती घरवाली |
जान गया मैं शादी बंधन , होती है इज्जत कैसी
दुनियादारी भूल गया मैं ,याद मुझे बस घरवाली |
खुला रहा उनका सुनो , कल का भारत बंद |
घर में झेला रौद्र रस ,पत्नी जी का छंद ||
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(चौपाई + दोहा का विषम चरण )
गेय तर्ज ~ आओं बच्चों तुुम्हें दिखाएं , झांकी हिंदुस्तान की
आज समय है कैसा आया, कवि फँसता अब चाल में |
मुफ्त पिलाकर आदी करते , मदिरालय के जाल में ||
चार चरण का दोहा होता , दो मिलते है मुफ़्त में |
काम सौपते तुकमुल्ला का , कहते रहिए. रफ़्त में ||
आदत गंदी डाल रहे है , देकर भाव उधार में |
चरण खोजता कवि घूमेगा ,सुबह-शाम अखवार में ||
मिलें देखने क्या- क्या नाटक,स्वाँग दिखे सब ताल में |
मुफ्त. पिलाकर आदी करते , मदिरालय के जाल. में ||
नहीं सोचना. पड़ता कवि को , रच जाता साहित्य है |
चरण मिले खैरात जहाँ पर, नहीं वहाँ लालित्य है ||
वाह- वाह जी अब क्या कहना , अच्छी पैदावार है |
पटल बनाकर ठेके पर अब , कवि करते तैयार है ||
वर्ण. शंकरी सृजन. बनाते , लावारिश की ढाल में |
मुफ्त पिलाकर आदी करते , मदिरालय के जाल. में ||
खुद की रचना सही नहीं है , ज्ञान पटल पर बाँटते |
विषय शब्द को देकर भी कुछ , तमगा देने छाँटते ||
खुद को नमन लिखाते पहले, फिर रचना स्वीकारते |
टाँग तोड़कर छंदो की वह , खतना करके मारते ||
होटल जैसे मंच बने है , तड़का देकर. दाल. में |
मुफ्त पिलाकर आदी करते, मदिरालय के जाल. में ||
( हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र )
पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई ,
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बे झंडे की ले आड़ है चंगे
झंडे को थामे हम अधनंगे
उनको भाषण में सरदारी
भाषण सुनना मेरी लाचारी
वह कहते विकाश तुम्हारा
झंडे ऊंचा रहे हमारा
उनके है काले गोरख धंधे
हम है लोकतंत्र के बंदे
लोकतंत्र कॉपे थर थर
उनके निकले है पर
मेरे कंधों पर लोकतंत्र का भारा
झंडे ऊंचॉ रहे हमारा
गुण्डागिर्दी में जितना बड़ा नाम है
संसद में उसका देखा सम्मान है
बह बड़ी शान झंडा फहराऐ
हम दीन हीन वस गाना गाऐ
लोकतंत्र का कोई नही सहारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा
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प्रदीप छंद (16-13) (चौपाई चरण + दोहा का विषम चरण )
शब्द प्रशंसा के लिखते हैं ,हम तो इनकी शान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
दरवाजे नेता के मिलते , जैसे रहते श्वान हैं |
इनसे पहले मिलना होता , अद्भुत यह श्रीमान हैं ||
बने बिचौली करते रहते , जनता के सब काम हैं |
इन्हें पूजकर ऐसा लगता , यह तो चारों धाम हैं ||
कैसे होता काम सफल है , मंत्र फूँकते कान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
नेता जी के साथ रहें यह , चोखे यही दलाल हैं |
सदा पकड़ते यह पैसा हैं , होते माला माल हैं ||
कभी नामजद अपराधों में, थानों के सिरमौर थे |
लोग काँपते थर- थर इनसे, इनके भी कुछ दौर थे ||
बदल गया है इनका धंधा , कमी न आई शान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
चमचों की चाँदी रहती , आज किया यह गौर है |
इनका फैला जाल जहाँ पर, कहीं नहीं कमजोर है ||
कार्य प्रणाली अद्भुत इनकी, इनका अजब शुरूर है |
लोकतंत्र में स्वाद बनें है , मीठा पिंड खजूर है ||
मंत्री जी कत्था से खिलते , यह चूना हैं पान में |
गीत गजल मैं सब गाता हूँ , चमचों के सम्मान में |
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एक श्वान का सम्मान. (व्यंग्य रचना)
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चौराहे पर मंच था बना | ऊपर चंदौवा था तना ||
शोर मच गया उस स्थान का | अभिनंदन है इक श्वान का |
जिसने रात्री चौर पकड़ा था | नुकीले दाँतो से जकड़ा था |
खवर सुन मुहल्ले के नेता जी कुड़ गये
संमर्थक चमचे आयोजको के पीछे पड़ गये
सम्मान पहले नेताजी का होना चाहिये
तत्पश्चात मंच पर जिसे चाहे बुलाइये
चमचों का जुनून देख , नेता के हौसला बढ़ गये
मंच से पुकारा गया कुत्ते का नाम -
नेताजी मंच पर चढ़ गये
मुख्य अतिथि ने उन्हें ही पुष्पहार पहनाया
श्वान के सम्मान का अभिनंदन पत्र
नेताजी को ही थमाया
दर्शक देखकर हल्ला मचाने लगे
तव कार्यक्रम संयोजक माइक पर समझाने लगे
कि इन दोनों में फर्क ही क्या है
दोनों नेक है - समानताये भी अनेक है
एक रात भर भौकता है-एक दिन भर चीखता है
एक रोटी के लिये दुम हिलाता है
एक वोटो के लिये गरदन झुकाता है
दोनों समान ढंग से जीते है
लौगो का गरम लहूँ पीते है
इनमें एक और है समानता
जिसमें प्रकट हुई महानता
कि ये दौनो जब हमे काटते है
हम बाप के बाप से भी पानी मॉगते है
(सुभाष सिंघई)
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