(परम पूज्य गुरुदेव के प्रथम दीक्षित शिष्य ) 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
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ताटंक /लावनी छंद में लिखने का दुस्साहस गुरुकृपा से ही कर रहा हूँ ,
लेखक - सुभाष सिंघई , एम०ए० ( हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र) निवासी जतारा , जिला टीकमगढ़ (म०प्र०)
मोबाइल 9584710660
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छंद परिचय - ताटंक , लावनी , ककुभ छन्द
प्रत्येक पद में दो चरण , विषम - सम चरण 16-14 मात्रा
विषम चरण के अन्त को लेकर कोई विशेष नियम नहीं है,पर चौकल की यति सुंदर लय देती है |
किंतु सम चरणों का पदांत गुरुओं से होना अनिवार्य है |
कुकुभ, ताटंक ,लावनी में बारीक अंतर है
पदान्त दो गुरुओं से तब - कुकुभ छंद
पदान्त तीन गुरुओं से हो तब -ताटंक छंद
पदान्त दो लघु , दो दीर्घ से हो तब- लावनी छंद
पर मामूली अंतर से, सबका समिश्रण ताटंक /लावनी मानते है
परम पूज्य गुरुवर आचार्य श्री विमर्श सागर जी की भक्ति मैं इसी छंद में कर रहा हूँ | यह छंद गेय है , मात्रा मापनी के अलावा गा़यक की लय ताल आरोह अवरोह का भी ध्यान रखना जरुरी है , इसके लिए प्रिय चक्रेश जैन जी ने गायन सम्पादन कार्य करने का दायित्व स्वीकार किया है , मै चक्रेश जी का बहुत बहुत आभारी हूँ
परम पूज्य गुरुवर के प्रवचनों में से कथन लेकर भी कई छंद का सृजित किए है , और यह सभी छंद पूज्य गुरुवर के चरणों में ही सादर समर्पित कर रहा हूँ | इसके अलावा साकेत वासी आदरणीय श्री कपूरचंद्र बंसल जी की लिखी गद्य पुस्तक -जतारा नगर का ध्रुव तारा से क्रमबद्ध कुछ जीवन परिचय मिला है , तो कुछ अन्य पुस्तकों से मिला है , जिसमें परम पूज्य मुनिवर विचिन्त सागर. जी की पुस्तक से मिला है , मैं आदरणीय बंसल जी को स्मरण व नमन करता हूँ , व उन्हीं की 'पुस्तक शीर्षक " को छंदों में समाहित करता हूँ
कवि का हर घटना पर , प्रत्येक क्रिया पर , बात समझने का , लिखने का दृष्टिकोण होता है , जिसका संकेत गर्भ खंड से ही है |
यह छंद बहुत ही सुमधुर होता है ,गायक भी इस छंद की लय जानने को उत्सुक हो तो वह यूट्यूब पर मधुशाला सर्च करें , जहां से गायन लय मिल जाएगी, आज हिंदुस्तान के कई कवि इस छंद को अपनी लय में पढ़ते भी नजर आते है •••••••आ० हरिओम पवाँर जी भी इसे अपनी ओजस्वी लय से काव्य पाठ करते है
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समर्पण
हे गुरुवर स्वीकारो अब तो , थोड़ा सा चंदन मेरा |
अर्पित करता श्री चरणों में , बस भावो का कुछ घेरा ||
लगा न कुछ भी मेरा है , सब जीवन सार तुम्हारा |
कैसे चमका सूरज जैसा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१
कलम हाथ में आकर मेरी , कर बैठी है गुस्ताखी |
पकड़ आपके श्री चरणों को , मांग रहा हूँ मैं माफी ||
दिव्य बने कैसे जीवन में , अपना है जन्म सुधारा |
यही कहानी लिख बैठा मैं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२
गुरु वाणी अनमोल सुनी हैं , छंदो में उसे पिरोया |
मात्रा भार यथावत करके , गुरु पद पंकज में खोया ||
गुरु चरणों पर पुष्प चढ़ाऊँ, भावों से करुँ पखारा |
सदा आशीष मैं अब चाहूँ , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३
परम पूज्य श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर चरण कमलेभ्यों नमो नम:
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नगर जतारा ध्रुव तारा
प्रवचानांश अमृत
पानी बूँद कहा जीवन को , यह गीत बना है आला |
मुनि विमर्श है ऐसे गुरुवर , खोल मोह का दे ताला ||
वीर नाम है सत्य यहाँ पर , और न कोई है नारा |
अनुरागी अरिहंत हमारे ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||४
दुनिया चलती रहती देखो , लम्बी इसकी है माला |
आग लगाता जाता बेटा , जलती मरघट की ज्वाला ||
जन्म मरण की चलती चक्की, गुरुवर भी करें इशारा |
श्री विमर्श जी गुरुवर मेरे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५
श्री विमर्श जी ठगनी बोले ,कहते जिसको हैं माया |
सबको देखा लेते उसकी , बड़े प्यार से खुद छाया ||
रागी बंदे हम संसारी , गुरुवर आगम की धारा |
ज्ञान गंग में न्हवन कराते , नगर जतारा ध्रुव तारा |६
विमर्श गुरु कहते है सबसे ,क्या पावन कर दे गंगा |
मैल न मन का छुटा सके तो, क्या हो जाओगे चंगा
खरा बोलते धर्मसभा में , बहा ज्ञान की सुख धारा |
बोध कराएं सम्यक सबको, नगर जतारा ध्रुव तारा ||७
कौन यहाँ पर मूरख लगता, कौन यहाँ पर है ज्ञानी |
पुण्य- पाप है किसके अंदर , लेखा जोखा नादानी ||
एक उठाकर अँगुली हमने, मुक्का खुद पर है मारा |
निज को देखो पहले कहते ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||८
जहाँ आचरण सत्य अहिंसा, उसको ही मानव मानो |
जिसमें कटुता और कपट है, दानव उसको ही जानो ||
गुरुवर कहते यह जग जीतो, बहा प्रेम की रस धारा |
खरा उतरते इस पथ पर अब,नगर जतारा ध्रुव तारा || ९
नहीं बनावट जादू चलता, सृजन मनन को जो रोके |
अभिनंदन उसका ही होता, सत् पथ झंडा जो रोपे ||
चार कदम चल दो जब अच्छे, लग जाता है जयकारा |
श्री विमर्श जी गुरुवर देखो ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०
त्याग जहाँ पर पहले आता , तप भी आकर रम जाता |
ज्ञान सूर्य भी देता आभा, जन-जन को भी चमकाता ||
मुक्ति मार्ग भी सजकर कहता, आ भी जाओ अब यारा
चलते है इस पथ पर देखो , नगर जतारा ध्रुव तारा |११
अमरत -विष-मदिरा सागर में, हमने यह सब हैं देखे |
मर्जी है रसपान तुम्हारी , जिसको जैसा जो लेखे ||
रहते है जग मेले में सब , पाएँ रस मीठा खारा |
सोच समझकर पीना बोलें , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१२
तरह -तरह के लोग यहाँ पर , तरह-तरह की हैं बातें |
रोता है उपकार यहाँ पर , हँसती देखी हैं घातें ||
सदा भूलते उपकारी भी , देकर अहसान पिटारा |
ऐसे मेरे गुरुवर जानो , नगर जतारा घ्रुव तारा ||१३
पढ़ लिखकर भी करते रहते , दिन पर दिन जो नादानी |
नहीं आचरण में लाते हैं , अच्छे - अच्छे भी ज्ञानी ||
जहाँ आचरण चरणों रहता , संत लगे वह कुछ न्यारा |
गुरु विमर्श है ऐसे गुरुवर, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४
जहाँ आचरण पावन रहता , कहता है बात निराली |
उपवन में सुंदरता आती, कुशल दिखा है यदि माली ||
बात बोलते कितनी सुंदर , गुरुवर वाणी रस धारा |
उदित दिखें वैराग्य क्षितिज पर,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१५
करनी का फल मिलता पूरा , सत्य वचन गुरुवर बोलें |
नीति सदा सुखकारी होती, और अनीति दुख तोलें |
आम देखिए पककर मीठा, नीम लगे कड़वा खारा |
इसी तथ्य पर बोला करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६
बर्तन में जल नव भरने को , पिछला करते है खाली |
घास हटाकर पौध लगाता , आकर उपवन में माली ||
गुरु विराग के वचन सुने जब , तब मन से है स्वीकारा |
खाली होकर गुरु शरण में , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१७
कृपा गुरु भी जिसको मिलती ,वह रहता सदा निराला |
रहे दशहरा और दिवाली , रहता मन में उजियाला ||
धन्य रहेगा शिष्य सदा तब , हटता रहता अँधियारा |
प्रवचन में यह बोला करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८
किसको हमने क्षति पहुँचाई , किससे हमने क्या बोला |
जरा बिचारें और सवाँरें , भड़का तन -मन में शोला ||
भाव जहाँ हों कटुता जैसे, यदि गलती को स्वीकारा |
पाप शमन यह बोला करते,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९
मानव आते इस धरती पर , दिखते हमको सब रोगी |
धन दौलत की पूजा करते , रहते तन मन से भोगी ||
आदिश्वर जो पूजे मन से , बनता योगीश्वर प्यारा ||
है विमर्श जी योगी न्यारे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२०
संयम तप की बात करूँ मैं , नहीं जानता परिभाषा |
मुक्ति मार्ग के राही की भी , नहीं जानता मैं आशा ||
गुरु विमर्श को जब से देखा , समझ गया हूँ संसारा |
परिभाषा प्रतिमान बने है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२१
कोई चलता अंधा होकर , हर पग से धूल उड़ाता |
गिरता पड़ता ठोकर खाता ,खुद रोता और रुलाता ||
पद चिन्ह बनें जिसके पग से, वह जग में दिखता न्यारा |
गुरु विमर्श के हर पग पुजते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२२
लोभ पाप का बाप बताया , गंथ्रों ने यही बखाना |
जिसे लोभ की लगी लालसा , गाता धन का है गाना ||
जितना पाता करने दुगना , करता सोच विचारा |
दुखी रहें वह बोलें गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३
मेरा तेरा , तेरा मेरा , जिसने भी रटा पहाड़ा |
फेल हुआ जीवन कक्षा में , सबने भी उसे पछाड़ा ||
तेरा मेरा कहाँ रहा है , जब यह संसार असारा |
सत्य ज्ञान का बोध कराते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२४
सदा जानिए निर्धन उसको , मन रहता जिसका मैला |
दया धर्म का नाम न लेता , खर्च न करता है धैला ||
थैला भरता पापों का वह , करता है मारी मारा |
बचकर चलना गुरुवर कहते ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||२५
गर्भ अवतरण गुरुवर का था , माता ने सपने देखे |
रजत ढेर सिक्कों की थाली,फलों सहित तरुवर लेखे ||
रजत कलश थे दुग्ध दही के, भरा सरोवर था न्यारा | |
खेत उगे गेहूँ चावल के ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२६
साथ स्वप्न में देखें माता , सुंदर हाथी दो आए |
ध्यान लीन खुद को देखा है,णमोकार की ध्वनि छाए ||
आशय क्या हो सकता इनका , जो माता रात निहारा
पड़े गर्भ में गुनते हँसते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२७
कौन नियति को जाने जग में , यह कर्मो का है मेला |
वही उदय में आता जाता , जिसने जग में जो खेला ||
पर माता के सुंदर सपने , फल पर भी जरा विचारा |
कैसें बोलें पर माता से , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२८
आज बोलती कवि की वाणी , इनका आशय यह जानो |
रजत देखना यह कहता है , सत्य दर्शनी शिशु मानो ||
बृक्ष फलों के शुभकारी है , आया कोई अवतारा |
भरा सरोवर ज्ञानी होगा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९
रजत कलश जो दुग्ध दही के, होगा अद्भुत यह दानी |
ग्रेंहू चावल खेत कहें अब , यह बालक होगा ज्ञानी ||
दो हाथी भी जो देखे है , धर्म ध्वजा का है धारा |
जिन शासन जयवंत करेगा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३०
ध्यान लीन खुद को देखा है , आतम को है हितकारी |
पूज्य जन्मना है इस जग में,फिर खुद पुजना सुखकारी ||
जिसको जन्मा उससे दीक्षा , यह अद्भुत रहा नजारा |
जय-जय हो गुरुदेव तुम्हारी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३१
सत्य सभी यह सपने निकले, कवि की कहती है वाणी |
माता जी भी ध्यान लगाती , छोड़ गई सब जग प्राणी ||
माता जी को नमन हमारा , यहाँ लगाता जयकारा |
बैरागी माता भी बनती , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३२
जीव गर्भ में जब रहता है , कष्ट अनेकोंं है पाता |
हांड़ मांस का रहता बंधन , विकल बेदना को गाता ||
भव्य जीव समता रखते हैं ,चिंतन की अविरल धारा |
करें तत्व का जैसे शोधन ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३३
आकुल व्याकुल जीव रहे तो , आती मां को बीमारी |
गर्भ अवस्था पीड़ा रहती , विचलित रहती हैं भारी ||
मात् भगवती प्रमुदित रहती, गर्भ अलौकिक था धारा |
चिंतन अविरल करते होगें , नगर जतारा ध्रुवतारा ||३४
अभिमन्यू का नाम सुना है , दिव्य पुरुष था अवतारी |
सुना गर्भ में और विचारा , धर्म युद्ध की तैयारी||
महापुरुष समता रखते है , हर हालत में संसारा |
जैसे हैं प्रतिमूरत गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३५
चेतन को चैतन्य रखेगें , महापुरुष जो अवतारी |
सदा सत्य के साथ रहेगें , मुक्ति मार्ग के अधिकारी ||
और समय भी झुककर उनको , देता है सुखद सहारा |
यही सामने हम सब देखें, नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६
मानव योनी साधन जग में , हर साधक यह माने |
आत्म तत्व का चिंतन करता , गूढ़ कथ्य यह जाने |
हम चौरासी योनी भटकें , समझा जो यह संसारा |
इसी कथ्य पर तथ्य विचारे , नगर जतारा ध्रुवतारा ||३७
बहुत सालती उनको हरदम ,गर्भ कैद की कटु पीड़ा |
जिसने समझा मिलता जीवन, करने जग में मधु क्रीड़ा ||
पुण्य जीव चिंतनरत रहते, गुरुवर जैसे जयकारा |
नहीं कष्ट पर ध्यान लगाएँ , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८
प्रभुू नाम उच्चारण करते , आदिश्वर को है ध्याते |
सदा मनन चिंतन चलता है , नहीं बेदना में जाते ||
पुण्य जीव का भाग्य प्रबल है ,रहती उर में रस धारा |
आतम हित का चिंतन करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३९
कहें बेदना एक नरक सम , गर्भ पिंड की है ज्ञानी
स्थान संकुचित मांस रुधिर का , बहता रहता है पानी
कष्ट समझकर घ्यान न देते ,भव्य करें सब निपटारा |
जैसे निज पर ध्यान लगाएं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४०
पंच महाव्रत धारुगाँ अब , जीवन धन्य बनाऊगाँ |
मुक्ति पथ का राही बनकर, सिद्ध शिला तक जाऊगाँ ||
यह चिंतन भी अविरल करते ,भव्य रहें जो अवतारा |
गुरु विमर्श है ऐसे मुनिवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४१
मन चिंतन भी करते रहते , जो योगी है अवतारी |
गर्भ कैद की पीड़ा सहते , जो भोगी है संसारी ||
मानव तन शुभ माने जग में , सोच रही थी उद्धारा |
गर्भ कैद की पीड़ा छोड़े , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४२
अविरल चिंतन चलते रहते , यह जग है बड़ा असारा |
प्रभू नाम है अमरत जग में , सबको भी मिले सहारा ||
रागी से बैरागी बनने , जैनागम की शुभ धारा |
ऐसा चिंतन अविरल करते ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३
जन्म धरा पर जब जब होता ,अवसर को भी पहचानो |
रत्न त्रयी को धारण करके , मतलब नर तन का जानो ||
योगीश्वर जो आते जग में , वह सबको बने सहारा |
विमर्श गुरु योगीश्वर बनते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४
भव्य जीव यह सोचा करते , अब भव के ताप मिटाना |
पंच महाव्रत धारण करना , राह मुक्ति पर है जाना ||
मोह मान मद लोभ न करना , यह करते रहे विचारा |
ऐसा ही यह चिंतन करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४५
मानव तन शुभकारी जग में , जिस नर ने यह जाना |
शुभ कर्मो की रहे लालिमा, जिसने सत् पथ को माना ||
यही फूटती अंतरमन से , सुंदर चिंतन जल धारा | |
सदा गर्भ में सोचा करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४६
पढ़ा गर्भ का वर्णन सबने , पान करे जब भी माता |
शीत उष्ण से त्रास उपजता , बालक के तन पर छाता ||
भव्य जीव तप माने इसको , समता की रखते धारा |
विमर्श गुरु भी तपकर आए , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४७
हिलती डुलती चलती माता , सुइयाँ चुभती हैं मानो |
उदर रगड़ बिजली सी चमके , सांसे घन सी भी जानो ||
मेरे गुरुवर चित्त न देते , निज चेतन करें निहारा |
भव्य जीव है जानो गुरुवर ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४८
माता भी जब करवट लेती , ऐसी पीडा है आती |
हजार फीट खंदक में गिरना , अनुभव पूरा बतलाती ||
कितनी पीड़ा कैसी पीड़ा , चित्त न देते अवतारा |
धन्य- धन्य गुरुदेव हमारे , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४९
प्रसव काल का वर्णन आता, पीड़ा है अति दुखदाई |
स्वर्ण पत्र के तार मरोड़े , ज्यों सोनी खींच कलाई ||
सहज प्रसव में आ आते है , भव्य जीव के अवतारा |
ऐसे ही गुरु प्रकट हुए थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५०
परम पूज्य गुरुवर आचार्य श्री विमर्श सागराय गर्भ काल नमो नम: =
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=जन्म खंड
पुनरवसू नक्षत्र लगा था , धनू लग्न का था डेरा |
भव्य जीव का जन्म धरा पर , शुभ योगों का था घेरा ||
बनी कुंडली जिसमें पाया, यह शिशु है एक सितारा |
सत्य वचन यह उद्घाटित है ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||५१
माह नवम्बर पंद्रह जानो , वर्ष तिहत्तर उन्नीसा |
पिता सनत के आलय जन्में , कोख भगवती आशीषा ||
नाम मिला राकेश जगत में , सबने था खूब निहारा |
बने एक दिन जगत गुरु है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५२
गर्भ कैद से छुटकारा है , जन्म जीव का जब होता |
कहाँ-कहाँ के बोल निकाले, हँसता और कभी रोता ||
पर बालक की किलकारी ने , आगामी दिया इशारा |
जिन शासन जयवंत करेगा ,नगर जतारा ध्रुव जतारा ||५३
गौर वर्ण का सुंदर बालक , सबकी जागी जिज्ञासा |
मात् भगवती अधिक निहारें, पूरी करती अभिलाषा ||
दादी माँ ने गोदी लेकर , आशीषों से पुचकारा |
चढ़ते जाते सबकी गोदी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५४
मात् भगवती ममता से भर , जन्मा ही पुत्र निहारें |
स्पर्श वात्सल्य का न्योछावर , लोरी गाकर पुचकारें | |
ममता सागर नयनों में था , आंचल में अमरत धारा ||
दुग्ध पान ममता का करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५५
माँ की ममता अनुपम जानों , कभी न होता है लेखा |
दुग्घ पान अमरत ही होता , सबने यह भी है देखा ||
माता की नजरों में बेटा , जग का है राज दुलारा |
यही दुलारा बना एक दिन , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५६
कुल दीपक भी माता कहती , नैनों का कहती तारा |
चाहत उसकी हरदम रहती , बेटा ही बने सहारा ||
कुल दीपक से जग दीपक हैं ,किया मात् का उद्धारा |
यही सितारा जैनागम का , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५७
कौन करे ममता का वर्णन , यह तो गहरा है पानी |
गहराई कब माप सके हैं , मिलजुल कर भी कुछ ज्ञानी ||
माता की ममता से देखो , बेटा होता जग न्यारा ||
यह बेटा ही निकला न्यारा ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||५८
नवम् माह तक रखा उदर में, धन्य कोख माता माने |
प्रसव काल से आंचल में ही,लगती शिशु को सिमटाने ||
पर ममता को समता देकर , पूज्य बनाई सुख धारा |
माता भी वैरागी आगे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||५९
गाई लोरी जब माता ने , सो जा बारे मम वीरा |
हुआ जागरण रत्न त्रयी का , बनने वैरागी धीरा ||
यहाँ संस्कार भी उदित हुए , करता था योग निहारा |
जाना है वैराग्य क्षितिज पर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६०
वर्णन पूर्ण न ममता का है , कलम पकड़ती खामोशी |
नहीं शक्ति है पूरा लिखना , क्षमा मांगती बन दोषी ||
नमन करुँ माता की ममता, जो जग में अमृत धारा |
जिसको पीकर सूरज सम हैं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६१
जग में आकर विस्मृत होती , गर्भ कैद की कटु पीड़ा |
रिश्ते परिजन आकर बुनते ,जग लीला की मधु क्रीड़ा ||
किए कर्म से भाग्य लिखा जो, दिखा नहीं मेटन हारा |
जो होना वैराग्य क्षितिज पर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६२
भव्य जीव का अंतरमन भी , कभी प्रदूषित मत जाने |
सदाचरण पग-पग पर रहता, कथ्य सत्य यह सब जाने ||
करता रहता समय प्रतीक्षा , निमित्त संजोता धारा |
अवसर पर ही प्रकट किया है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६३
स्मृति कौन दिलाता पिछली , मौन समय भी लेता |
यही सृष्टि दस्तूर रहा है, चलने आगे क्रम देता ||
कर्म उदय में पिछले आते ,जिनको हम कहें पिटारा |
इसी उदय से उदय हुआ था ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||६४
आखिर यह हैं कौन जगत में , नहीं किसी ने पहचाना |
लाड़ प्यार का नाम दिया है , बल्लू भैया का बाना ||
पंडित जी की पत्री में से , राकेश नाम की धारा |
आया है संकेत चन्द्रमा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६५
जीव अलौकिक को लौकिक में ,बदल रहे थे घरवाले |
समय देखकर हँसकर कहता, टूटें पल भर में ताले ||
नहीं पता था मात् पिता को , घर में आया जयकारा |
नाम करेगा रोशन यह सुत , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६६
पिता सनत का नेह अलग था , हर बातों से थी शिक्षा |
संसारी प्राणी बनने की , धीरे से चलती दीक्षा ||
सदाचरण का पाठ पढ़ाते , धर्म कर्म की ले धारा |
जिसे हमेशा चिंतन करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||६७
पिता सोचते वंश चलेगा , अंश हमारा है न्यारा |
सहभागी जीवन में होगा , और बुढ़ापे का तारा ||
अनुरागी मन बेटे में ही , खोज रहा था जग सारा |
पर जग बेटे से ही चाहे , नगर जतारा ध्रुव तारा || ६८
बहिन सोचती कमला मन में , मेरा भाई है आ़या |
रक्षाबंधन पावन होगा , भै़या लगता अति प्यारा ||
सोच रहे राजेश यहाँ पर, अब भाई एक सहारा |
कौन जानता आया घर में , नगर जतारा घ्रुव तारा ||६९
खबर मुहल्ले में फैली जब , तब आने लगी बधाई |
परिवार हुआ था विस्तारित , समाचार था सुखदाई ||
राग डालते वैरागी पर , यह अद्भुत रहा नजारा |
शायद हँसते होगें मन में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||७०
बूड़े जर्जर हाथों में जव , शिशु आया गोल मटोला |
सुख से अव मै मर जाऊँगीं , दादी ने हँसकर बोला ||
वेग हँसी का फूटा था तब , रही देर तक रस धारा |
किलकारी भी देकर शामिल ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||७१
समय यहाँ पर हँसकर कहता ,जब दादी थी मुस्काई |
जीवन इतना ही क्यों जाना , दादी जी समझ न पाई ||
वंश बेल लौकिक सुख देखे ,जीव सनातन से न्यारा |
यहाँ अलौकिक सुख जन्मा था,नगर जतारा घ्रुव तारा ||७२
नहीं दोष है किसी जीव को , मात पिता हों या भाई |
कौन किसे पहचाने पिछला, वर्तमान जब शहनाई ||
यही जन्म उपहार समय का, आगे का करे इशारा |
बिंदु इन्दु यह आगे होगा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||७३
जन्म तुझें भी मैं क्या बोलूँ , क्या दे दूँ तुझको उपमा |
तेरे आते ही आगे की , विकसित होती है सुषमा ||
दुनिया की संरचना में भी , जन्म सदा है सुख धारा |
इस धारा में माणिक निकले ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||७४
करें जन्म का अभिनंदन हम , निर्विकार ही मति देता |
ताप गर्भ का पिछला जीवन , सबको पहले हर लेता ||
नवजीवन में ओज सुहाना , किलकारी की दे धारा |
इस धारा में अमरत निकले , नगर जतारा ध्रुव तारा ||७५
आदिनाथ से महावीर तक , तीर्थंकर जो अवतारी |
हुआ जन्म का शुभ अभिनंदन,कल्याणक है बलिहारी ||
नर से नारायण बनने का, जिसने संकल्प विचारा |
श्री विमर्श गुरुदेव हमारे , नगर जतारा ध्रुव तारा |७६
दुनिया जव तक अमर रहेगीं, जन्म यहाँ पर अविनाशी |
अविरल क्रम जग का रखता है,जन्म जगत में आभाषी ||
जन्म सार्थक करके जिसने , फैला़या है उजियारा ||
गुरु विमर्श आचार्य जानिए , नगर जतारा ध्रुव तारा ||७७
तपोमूर्ति है मेरे गुरुवर , आचार्य मूल गुणधारी |
चौथे युग की चर्या रखते , हम सबको है सुखकारी ||
कहे जन्म मैं खुद बड़भागी , पाया मुनिवर अवतारा |
धन्य-धन्य है जन्म यहाँ पर , नगर जतारा घ्रुव तारा ||७८
पुण्य यहाँ आशीष सुनाता , बनो वीतराग विज्ञानी |
मोक्ष मार्गी पथिक बनो तुम , बनना आतम कल्यानी ||
प्रभु जयकारा से जय होगी , णमोकार का उच्चारा |
हँसकर के स्वीकार किया है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||७९
ज्ञान चारित्र दर्श सरोवर , सम्यक रखते दरबाजा |
पारस जैसा लगते सबको, दिखें तपोवन के राजा ||
निज का भी आतम पहचाने, और ज्ञान की लय धारा |
महाव्रती योगेश्वर गुरुवर , नगर जतारा घ्रुव तारा ||८०
मान मोह का इस दुनिया में , रहता है विटप अंधेरा |
एक किरण भी आ जाती है ,तब कुहरा हटे घनेरा ||
जन्म लिया गुरुवर ने प्रात: , नवम् अंक था मनुहारा |
तिथी पुण्य थी क्षण था पावन,नगर जतारा ध्रुव तारा ||८१
मौन अभी था समय यहाँ पर, क्या कह देता वह भाषा |
सूर्यभान थे नेक इरादे, लिखनी थी जब परिभाषा ||
इन्दु धरणि पर अब आया था, करने जग में उजियारा |
गुरु विमर्श पहचान जानना , नगर जतारा ध्रुव तारा ||८२
धूमधाम घर छाई अनुपम, है उत्सव जन्म मनाते |
परिजन उसमे निरत दिखे है , गीत जन्म के सब गाते ||
यह क्षण भी सब होते ऐसे , हो आनंदित मन धारा |
मोद मगन गुरुवर भी दिखते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||८३
बाल्यावस्था
बाल अवस्था जितनी समझी,दिखती है बड़ी निराली |
मन निर्मल सच्चा रहता है ,रहती उत्कंठा लाली ||
कुछ तथ्य सिखाए जाते है , कुछ रहते अंतर धारा |
सहज सीखते सब जाते है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||८४
परिजन जितने घर में रहते, सबको पहले पहचाने |
उसमें माता को ही पहले , जीव निकटतम है माने ||
बहिन पिता भाई को जाने , दादी का समझ इशारा |
रोते -रोते चुप हो जाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||८५
एक तथ्य है सुंदर कितना , बालक होता है भोला |
नहीं झूठ से नाता रखता , रहे सत्य का वह शोला ||
नहीं बनावट बातें करता , सच का रखता उजियारा |
ऐसे ही थे गुरु हमारे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||८६
जो कुछ सच लगता है उनको, सीधा सच्चा कह देते |
झूठ कपट की परिभाषा से ,नहीं काम को वह लेते ||
कितना निश्छल मन होता है , आकर के इस संसारा |
ऐसे थे गुरुदेव हमारे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||८७
झूठ कपट का जग बाना हम , बालक को है पहनाते |
और सत्य की आशा रखते,नहीं स्वयं कुछ सिखलाते ||
दिव्य दिखे इस जग में जो भी ,वह सत्य रहे आधारा |
निर्मल मन के ऐसे गुरुवर,नगर जतारा ध्रुव तारा ||८८
चौखट घर आंगन पहचाने, तुतली थी प्यारी बोली |
घुटनों के बल चलते जाते , घर में थी खूब ठिठोली ||
आत्ममुखी बचपन से लगते ,जिसने भी उन्हें निहारा |
आज वही जैनागम पथ पर, नगर जतारा ध्रुव तारा ||८९
मम्मी बोला जिस दिन मुख से, माता ने अपना देखा |
पर कवि कहता मैं का चिंतन,भव्य जीव ने तब लेखा ||
पापा से परमात्म पुकारा, दीदी से दया निहारा |
भैया से भगवान उचारा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९०
संसारी जीवो का मेला , मोह पाश में वह खीचें |
रागों के फल फूल उगाकर , हरपल उनको ही सीचें ||
पर वैरागी रहें कमल से , खिलें सरोवर जल धारा |
अवसर पाकर गंध बिखेरें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९१
सम्बंधो पर कष्ट किसे है , यह तो जग की है धारा |
सभी नहाते इस गंगा में , पर छोड़े नहीं किनारा ||
छोड़ किनारा जो जाते है , करने भव पार उतारा |
वहीं मुनिश्वर बन जाते ज्यों , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९२
माँ की ममता बालपने में , हरपल ही चिंतित होती |
खाना पीना और नहाना , शिशु सुलाकर खुद सोती ||
राग विराग न माता जाने , बस जाने अंश हमारा |
इसी अंश ने धन्य किया कुल, नगर जतारा ध्रुव तारा ||९३
कौन मोह की नींद यहाँ पर , कौन यहाँ पर था जागा |
माँ बेटे का रिश्ता गहरा ,नहीं समझिए है धागा ||
जो भी चिंतन आता मन में , रहती माँ की रस धारा |
गंग समझते इस धारा को ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||९४
मोह बोलते जो ममता को , करते है वह नादानी |
सही आंकलन ममता का भी , कब कर पाए है ज्ञानी ||
बंदनीय निर्दोष जगत में , ममता की अमरत धारा |
करते है सम्मान जगत में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९५
लाड़ प्यार का नेहा अमरत, जो जन ममता ही माने |
मैं कह सकता हूँ वह प्राणी, ममता कभी न पहचाने ||
ममता के संस्कार जगत में , जग कल्याणी रस धारा |
महावीर दे सकती मां ज्यों , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९६
अकथनीय है ममता वर्णन, शांत न होती जिज्ञासा |
शब्द न ऐसे बन पाए है , परिभाषित हो परिभाषा ||
पर परिभाषा विमर्श श्री है , दिखी समाहित रस धारा |
नमन करे चरणों में हम , नगर जतारा घ्रुव तारा ||९७
बंदनीय वह ममता जानो , दीक्षा आज्ञा दे डाली |
गुरु विराग के चरणों जाकर, झोली कर दी थी खाली ||
रतन हृदय का गुरु को सोंपा, गुरु ने भी खूब निखारा |
आज वही है आगम पथ पर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९८
ज्येष्ठ भ्रात राजेश मिले थे , अनुज चक्रेश से खेले |
कमला और प्रियंका बहिने ,मिली हुई थी जग मेले ||
गुरु विराग ने आतम हित को, जब अपने निकट पुकारा |
पहुँचे गुरुवर चरणों थे तब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||९९
बचपन की घटनाएँ भी कुछ, बहुत इशारा कर जाती |
ललना के गुण पलना में ही, आकर सबको बतलाती ||
बहुत कहानी छुटपुट जानो , है सबमें बहुत इशारा |
वल्लू भैया गुरु विमर्श है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१००
शिक्षा खंड ,
स्कूल पास था मदनी सागर, कखगघ की थी तैयारी |
गागर से सागर तक की यह, दिखी कहानी है न्यारी ||
पहली कक्षा में जब हाथों , पहली पोथी को धारा |
करें वर्ण से परिचय अद्भुत ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०१
पहला 'अ' तभी अक्षर आया , अरिहंत वहाँ पर माना |
'आ' का आचार्य समझकर , 'ई' से ईश्वर को जाना ||
उल्लू का 'उ' न माने गुरुवर , अधर हँसी का फव्वारा |
उपाध्याय ही तब शुभ जाने,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०२
गधा सीखना "ग" नहीं सीखा , गणपति गणधर को माना |
भट्टी का नहीं "भ" भी माने , भगवन् को ही पहचाना ||
कभी सरोता "स" नहीं सीखें ,सीखे सम्यक रस धारा |
कहें चरित्र को 'च' से गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०३
कहते " म "महावीरा है यह , 'मछली का 'म' नहीं माने |
जिनवरजी का 'ज' गुरू कहते, पदम प्रभु 'प'को पहचाने ||
संस्कार की बगिया में थी , वर्णा की अनुपम धारा |
सभी सीखते जाते गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०४
प्रथम सदा कक्षा में आए , मेधावी मेंडल धारे |
ज्ञानार्जन उत्कंठा रहती , समाधान सब स्वीकारे ||
प्रश्न अनेकों मन में आते , जिज्ञासा अविरल धारा |
खोज हमेशा करते रहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०५
भ्रात राजेश ने एक दिवस , बालू का बना घरोंदा |
दिखलाया राकेश अनुज को , कितना लगता सोंधा ||
फूट गया पर इक झटके में , कण कण विखरा था सारा |
मग्न विचारत तब मूरत थी, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०६
अग्रज राजेश बतलाते है , पहली बारिश का पानी |
कागज की लघु नाव बनाई , मस्ती करने की ठानी ||
नाव छोड़कर खुश हम सब थे , पर डूब गई जल धारा |
भाव करुण राकेश अनुज के, नगर जतारा ध्रुवतारा ||१०७
गीत हृदय को छू लेते है , सम्वेदक होते जो प्राणी |
एकाग्र मुखी भी रहते है , कम बोला करते वाणी ||
डेक बजाकर गीत सुने बस ,जिसमें मन तक रस धारा |
गीत पुराने चयन करें तब , नगर जतारा घ्रुव तारा ||१०८
शिक्षा के सँग उम्र बढ़ी थी , मित्र इत्र से थे न्यारे |
जैन युवक मंडल में शामिल , बन गए वहाँ सितारे ||
मंत्री पद दायित्व सम्हाला , खूब लगाया जिन नारा |
जय अब इनकी खुद होती है ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१०९
अब मंत्री हैं जैनागम के , तथ्य कथ्य से बतलाते |
निज का भी कल्याण करें अब,राह सत्य की दिखलाते ||
नायक सबको सदा दिखे है , अब भी लगे सितारा |
जिनशासन जयवंत करें अब,नगर जतारा ध्रुव तारा ||११०
दिव्य घोष मंडल का भारी , बड़ा ठोल कंधे तानें |
बड़ी आज भी हाथों में है , जिनवाणी जिसको मानें |
दिव्य ध्वनि सी अब खिरती है ,गुरु पद को नमन हमारा |
जैनागम के संत निराले , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१११
गायन वादन अभिनय मंचन , खेल, संगठक थे न्यारे |
अध्यापन की रुचि भी रखते दान दया में थे प्यारे ||
बूड़ा मिलता जहाँ भिखारी , बन जाते थे उपकारा |
दया और करुणा की मूरत , नगर जतारा ध्रुव तारा ||११२
नाट्य कला मंचन में गुरुवर , बनते थे मैना रानी |
अभिनय इतना अनुपम करते , नैनों में आता पानी ||
सिद्धों का आराधन करते , करने को कष्ट निवारा |
मंत्र मुग्ध सब दर्शक होते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||११३
यह अभिनय निज लय में बदला ,सिद्धों को है स्वीकारा |
पथ बदला संसारी रागी , चलते सिद्धो की धारा ||
कितना परिवर्तन जीवन में , पग -पग का है जयकारा |
चले सिद्ध है खुद बनने को , नगर जतारा ध्रुव तारा ||११४
चिड़िया बल्ला खेल निराला , यह बिडमिंटन कहलाता |
इधर उधर को चिडिया उड़ती , बल्ला मारे ही जाता ||
खेल खेलते यह गुरुवर भी , सिखलाने वाला हारा |
पर इस पर भी चिंतन करते,नगर जतारा ध्रुव तारा ||११५
जीव हमेशा से चिड़िया है , कर्मो का बल्ला मारे |
इधर- उधर है उड़ती गिरती ,भरती रहती चित्कारे ||
लोग बजाते जाते ताली , वाह-वाह जी क्या मारा |
ऐसा चिंतन करते रहते ,नगर जतारा घ्रुव तारा ||११६
खेल शतरंज भी खेला है , राजा घोड़े थे हाथी |
ऊँट बजीरा रहते सँग में , पैदल रहते है साथी ||
मात खेल में शह करती है , जीता मेडल था धारा |
इस पर भी थे चिंतन करते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||११७
जीवन भी शतरंजी खेला , हम सब दिखते है प्यादे |
कभी समझ हम कब पाते है , कैसे हैं यहाँ इरादे ||
हार जीत भी चलती रहती, मिले जीत या हो हारा |
उपादान क्षण भर के समझें ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||११८
भक्तामर जी के पाठोंं से , नई चेतना थी जागी |
प्रभू वंदना से मन पावन, बने धर्म के अनुरागी ||
उत्प्रेरक पर अभी नहीं था , जो समझाता संसारा |
उपकारी की अभी प्रतीक्षा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||११९
बारहवीं कक्षा पास हुई , छात्र रहें है मेधावी |
पुरस्कार मिलते रहते थे , होनहार थे गुरु भावी ||
लिखा समय ने जैसा जीवन , बैसा ही उसे सँवारा
आज उदित वैराग्य क्षितिज पर,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१२०
कुछ मित्रों के नाम सुनाता , मन से थे परम सनेही |
लोकेश खरे , मुन्चु चौरसिया, मुन्नु देवराहा से ही ||
अतुल-स्वतंत्र - संतोष रहे , सब सच्चे थे यारा |
बहुतेरे है नाम यहाँ पर , नगर. जतारा ध्रुव तारा ||१२१
मित्र इत्र से सदा रहे है , अंतरमन से खिलते है |
जहाँ आचरण पावन रहते , वह नदियों से मिलते है ||
इक दूजे के पूरक बनते , कहते है यार हमारा |
सदा यार शिरमौर रहे हैं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१२२
स्नातक शिक्षा टीकमगढ़ में , हुई अनवरत थी जारी |
विषय लिया विज्ञान जीव का , जीव तत्व की तैयारी ||
पढ़ा जीव विज्ञान जगत का , स्नातक उपमा को धारा |
दर्शन जीवो का था आगे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१२३
लिखा नियति ने कुछ था आगे, लौकिक आचार्य बनाया |
विद्यालय था अब सरस्वती , तब जाकर ज्ञान पढ़ाया ||
आचार्य कहें बच्चे बूड़े , लौकिक पद जब स्वीकारा |
आगे भी आचार्य बने है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१२४
युवा अवस्था खंड न पूरा , वर्णन है अभी अधूरा |
कलम यहाँ विश्राम चाहती , लिखना आगे है पूरा ||
वैरागी पथ लिखने को अब , कलम लगाती जयकारा ||
गुरुवर काआशीष मिले अब ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१२५
पंचकल्याणक प्रभू जिनवर का, नगर जतारा तैयारी |
आठ फरवरी से तेरह तक , पंचाउनवें शुभ कारी ||
त्रय गजरथ का आयोजन है ,आदिनाथ का जयकारा |
सिंधु विराग आचार्य श्री वर, नगर जतारा जय तारा ||१२६
सागर बना महासागर था , गए जतारा थे वासी |
आमंत्रण गुरुवर को देकर , चरणों के थे अभिलाषी ||
विशुद्ध मुनि विज्ञान सिंधु जी , आए पहले उपकारा |
दिव्य घोष से स्वागत करते,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१२७
पत्थर को पारस होना था , करे समय अब तैयारी |
गुरु विराग के चरण पड़े है , नगर जतारा बलिहारी ||
अगवानी अनुपम गुरुवर की , जिन मंदिर संघ पधारा |
दर्शन करते अभी दूर से , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१२८
नहीं नैन से नैन मिले थे , पारस से थी कुछ दूरी |
समय सुनिश्चित कर बैठा था , दूर हुई सब मज़बूरी ||
रचना था इतिहास धरा पर , जो रहता यहाँ सितारा |
गुरु चरणों तक लाना कैसे, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१२९
होनी जो अब होने बाली , उदित हुए थे नभ तारे |
हवा ठहर कर कोतूहल से , दिखती थी नैन पसारे ||
दिखी चाँदनी घूँघट डाले , लखने को आज नजारा |
गुरु चरण तक कैसे आते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३०
समय आज कुछ फूलों से , सजा रहा था अब राहें |
जगी लालसा सुध बुध खोकर, यहाँ बढ़ाती थी चाहें ||
मलयागिर का चंदन दौड़ा , लेकर अपनी रस धारा |
छिड़कूगाँ मैं आज मिलन पर,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१३१
निकल पड़े राकेश गेह से , अब घर मुन्नु देवराहा |
अब थकान को यहाँ उतारे , रंजन करने को चाहा ||
मुन्नू बोले गरुवर आए ,चलते वैयावृत्ति को यारा |
करें लौटकर रंजन हम सब ,मान गए तब ध्रुव तारा ||१३२
जहाँ आचार्य जी बैठे थे , वैयावृत्ति मनो हारी |
पैर दबाकर सबको लगता , जीवन मेरा सुखकारी ||
समय यहाँ पर देख रहा था,अब होना है कुछ न्यारा |
कैसे हो वैराग्य क्षितिज पर ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३३
यहाँ बने संयोग स्वयं थे , कौन यहाँ पर था दोषी |
आज टूटना रागी की थी, गुरु चरणों में मदहोशी ||
हाथ बढ़ा राकेशचंद्र का , मुन्नू ने किया इशारा |
देख न पाए मित्र किनारा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३४
बजे तार तब मन वीणा के , नैनों में उतरा पानी |
हुई ग्लानी हृदयांतर है , सीने में चलती धानी ||
निमित्त बने थे मुन्नु भाई , जो आलू हुआ इशारा |
त्याग दिया सब पल भर में नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३५
पैर खींचकर गुरुवर ने तब , इकटक है वहाँ निहारा |
मिले नैन से नैन जहाँ पर , हुआ तभी है उपकारा ||
आज छोड़ता सभी बुराईं , बही नैन से जल धारा |
वैयावृत्ति करने मिल गई , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३६
पैर दबाते जाते फिर भी , मन में चिंतन की धारा |
क्या मैं इतना नीचे तक था , गुरुवर ने किया किनारा ||
कितना है आनंद चरण में ,अब इनका मिले सहारा |
यही विचारो की गंगा थी ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३७
यही मिलन था अनुपम पहला ,समय बजाता था ताली |
प्रमुदित था वैराग्य यहाँ पर , आज नहीं था वह खाली ||
बीज अंकुरण हुआ यथोचित, आगे फल का जयकारा |
योगीश्वर यह भू पर होगा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३८
चिंतन सुख की सांसे लेता , कहता है मिला किनारा |
वर्षो से जो चली तपस्या , उसको भी आज सहारा ||
सृजन बोलता जाता मन में , होगा मेरा रुप न्यारा |
मान मिलेगा गुरु दर्शन से, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१३९
नजर पड़ी है जब से गुरु की , जो थी अमृत की धारा |
सदा रहेगी मस्तक पर वह , धन्य करे जीवन सारा ||
गुरुवर ने पहचान लिया था , यह होगा शिष्य हमारा |
नाम करेगा जग में यह अब , नगर जतारा घ्रुव तारा ||१४०
चाँद सितारे मकरंद पवन , चंदन सँग सब हरषाते |
गुरुवर को अनमोल मिला है, रतन शिष्य को बतलाते ||
शिष्य सोचता मेरे गुरुवर , गंग अमोलक है धारा |
सम्यक दर्शन ज्ञान चरित के , नभ में है सूर्य सितारा ||१४१
इक दूजे ने पहचाना था , तीजा इसमें क्या जाने |
बोल अधिक भी नहीं हुए थे , फिर भी रिश्ते थे माने ||
शिष्य सदा आज्ञा में रहता , गुरुवर मनसा अनुसारा |
ऐसा ही सत्संग बना था , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४२
गुरुवर ने वह रात लिखी है , हम तुमको क्या बतलाएं |
मुलाकात जो नई जिंदगीं किसको कैसे समझाएं ||
स्वाद कहें मीठे का कैसे, जब मौन हृदय ने धारा |
निज अनूभूति मोद मगन थे ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४३
बड़ा काफिला मंदिर जी में , दर्शन हित को था आया |
मिला दर्श से क्या -क्या मुझकों , हर्ष नहीं यह कह पाया ||
रात नजाकत से सजती थी , नई जिंदगीं जयकारा |
हृदय पटल था अति आनंदित,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१४४
मंद मुस्कान थी होंठों पर , भरा हर्ष का भण्डारा |
जीस्त बंद दिखती थी पूरी , आज बहें रस की धारा ||
नई जिंदगी , नई बंदिगीं , नव जीवन हर्ष अपारा |
किसको कैसे बतलाते तब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४५
नेह नज़र में कुछ जादू था ,गुरु विराग की शुभ छाया |
मिली आरजू गुरु चरणों से , जिसे आज था गाया ||
आज नज़र से बात हुई है, जिसने सब कुछ है हारा |
इसी हार में जीत छिपी है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४६
गुरु चरणों में मन था पूरा , तन लेकर घर को आए |
नज़र जहाँ भी आती जाती, गुरुवर की छवि दिखलाए ||
आज जागरण नव जीवन था ,चलता था सोच विचारा |
मन में निर्मल गंगा बहती , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४७
लगता था हर पल ही गुरुवर , जैसे है पास बुलाते |
यहाँ समर्पण इक्छा जगती , गुरु ही यादों में आते ||
नई जिंदगीं लिखे कहानी , करने को अब उद्धारा |
सोच नई थी राह नई थी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४८
दिया आज गुरुवर ने जो कुछ ,उसका अब तक था घेरा |
किया नमन था जब चरणों में , हाथ शीष पर था फेरा ||
आज रात थी कुछ भारी सी , चिंतन की चलती धारा |
नई सुबह में नव पथ होगा ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१४९
गुरु के चरणों में रहती है, सदा शिष्य की जब सेवा |
देख समर्पण गुरुवर देते , पूरी निधियों की मेवा ||
परख यहाँ गुरुवर ने कीन्हीं ,यह सच्चा शशि है न्यारा |
नाम करेगा रोशन जग में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५०
सदा अमोलक गुरु पद पंकज, शिष्य रहें जब बलिहारी |
ब्रम्हा बिष्णु महेश मानते , गुरु को माने उपकारी ||
उपमा कब मिलती गुरुवर की , गुरु होते है जयकारा |
इनकी ही शरणागत है अब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५१
मैं सुभाष भी नमन करूँ अब , गुरु की महिमा है न्यारी |
गुरु तो पारस ही होते है , करते पत्थर सुखकारी ||
यहाँ नियति ने जो था लिक्खा, उसका करता जयकारा |
आएगा वैराग्य क्षितिज पर नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५२
आठ फरवरी पंचाउनवें , प्रात काल की थी बेला |
गुरु चरणों का बन अनुरागी, आया था भक्त अकेला ||
करता राग विराग सिंधु से, राकेश नाम की धारा |
गुरुवर ने तब हँसकर देखा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५३
देख कमंडल गुरु से कहते, इसको आज उठाऊँगा |
नित्य क्रिया को जब जाओगें , सँग में पीछे आऊँगा ||
गुरु विराग जी तब कहते है, सामायिक अभी विचारा |
साधु संघ के सभी चलेगें , सुंदर है नगर जतारा ||१५४
जाप जानते थे माला को , पर सामायिक है कैसी |
उत्कंठा गुरुवर ने समझी , तब बतला दी थी ऐसी ||
समझीं है कायोत्सर्ग मुद्रा , विधि को पूरा स्वीकारा |
सामायिक तब करने बैठे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५५
मैं सुभाष बतलाता सबको, तब था दायित्व हमारा |
मंदिर अध्यक्ष -मुनि संघ का , रथ उपाध्यक्ष का भारा ||
रहा प्रवंधक पूरा बनकर , गुरुवर के सब सत्कारा |
पर उस क्षण मैं समझ न पाया ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१५६
संजू मांची राकेश सहित , नीरज जैन सगरवारा |
तीन युवक देखे थे हमने , मुनिवर सेवा दरवारा ||
तीनो ही सामायिक करते , घंटो की अविरल धारा |
मै भी देखा करता चिंतित ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५७
कहा एक दिन हमने सबसे , यह क्या करते हो भाई |
मुझे जरूरत जब होती है , मिलते जप में दिखलाई ||
कहते तब राकेश हमारे , गुरुवर सेवा स्वीकारा |
चिन्ता मत कुछ करना बोले, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५८
भव्य हुई जिन बिम्व प्रतिष्ठा , बही धर्म की सुख धारा |
पांचों दिन के कल्याणक में , खूब हुई थी जयकारा ||
खुद का भी कल्याणक करने , थे पक्के हुए विचारा |
इंदु राकेश को बनना है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१५९
एक पहाड़ी निकट बनी है , गजरथ का सुंदर फेरा |
मानव बनी पहाड़ी तत्क्षण , जब दर्शक जन ने घेरा ||
बड़े मनोरम दृश्य रहे है , अतिशय आया था सारा |
जिसके साक्षी खुद गुरुवर है , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१६०
यहाँ राकेश मन पांचों दिन , बहती थी चिन्तन धारा |
प्रवल वैराग्य की छाया में ,गुरुवर के चरण सहारा ||
लिए नियम अब पूरे होगें, संघ प्रवेश मिले धारा |
छोड़ेगें घरवार सदा को , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६१
तेरह को था पूरा गजरथ , चौदह को संघ विहारा |
जय-जय हो गुरुदेव आपकी , गूँज रहे थे जयकारा ||
घर की देरी छूकर कहते, है अंतिम नमन हमारा |
छोड़ दिया यह कहकर के घर,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६२
नियम सीखते मुनि संघों के , करते गुरुवर की सेवा |
जिनवाणी को पढ़ते जाते, समझें गुरुवर को देवा ||
क्षेत्र अहार पर सँघ विराजा, थी दीक्षाओं की धारा |
ब्रम्हचर्य लेने की ठाने , नगर जतारा ध्रुव जतारा ||१६३
गुरुवर के तब सम्मुख जाकर , अपना है शीष झुकाया |
ब्रम्हचर्य व्रत धारण करने , इक्छा को है बतलाया ||
गुरुवर कहते मात पिता की,क्या स्वीकृति की है धारा |
दृढ़ निश्चय तब मेरा कहते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६४
खबर फैलते ही परिजन सब ,आकर थे खूब मनाते |
दादी मरने की कहती थी , भाई भी नीर बहाते ||
माँ की ममता व्याकुल होती , पिता बढ़ाते थे पारा |
मेरा तो दृढ़ निश्चय कहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६५
कौन हिमालय हिला सका है , दृढ़ता का जहाँ पहाड़ा |
प्रथम तोड़ते परिजन बंधन , मोक्ष मार्गी यह आड़ा ||
बड़ा कठिन है यह सब करना,जिसमें बहता जल खारा |
अडिग दिखे है इस पथ पर तब,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६६
नहीं जीत है -नहीं पराजय , यह सब परिजन की बातें |
जुड़े तार जब अलग हो रहे , नहीं समझिए यह घातें ||
पुण्य यहाँ पर दोनों का है , रहे परस्पर आधारा |
धन्य यहाँ परिवार समझिए , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६७
मात - पिता आते जाते थे , जोर लगाते थे पूरा |
कोशिश करते रहते हरदम ,डिगा सकें मत निज शूरा ||
कहें चक्रेश भाई जी अब, तुम ही हो एक सहारा |
धर्म सहारा कहते अच्छा, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६८
लोकेश खरे कमलेश जैन , मित्र मनोज सभी आए |
वैरागी से रागी बातें , सभी मित्र करते पाए ||
मिलकर सागर हिला रहे थे , सबने अपनापन ढारा |
दूर रहें पर इन बातों से , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१६९
छव्बीस/दो/पंचानवें को , सात बहिन की थी दीक्षा |
नहीं व्रती राकेश बने है ,बाकी थी अभी परीक्षा ||
शांतिनाथ के चरण कमल में, तब विनती बारम्वारा |
अपनी दृढ़ता को दुहराते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१७०
सताईस फरवरी प्रात ही , पिता सनत ने स्वीकारा |
आज्ञा दे दी गुरुवर सम्मुख, हर्षित था आज सितारा ||
शांतिनाथ की कृपा मानकर, बोल उठा मन जयकारा |
प्रथम प्रशस्ती आज मिली थी,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१७१
गुरुवर से आजीवन मांगा , पर वह दो का है देते |
नहीं ब्रम्हचर्य हल्का होता , स्वयं परीक्षा गुरु लेते ||
पेंट शर्ट को वहीं उतारा , धोती को तन पर धारा |
ब्रम्हचारी जी अब कहलाते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१७२
पेंट शर्ट को पिता सनत ने , याद धरोहर है माना |
माँ की ममता उपदेशक का,पहिन चुकी थी अब बाना ||
बेटे को बैठाया सम्मुख , देने को अमृत धारा |
धन्य-धन्य है मात् भगवती , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१७३
मात-पिता अब गुरुवर तेरे , बन जाना आज्ञाकारी |
ध्यान न करना घर परिवारा , मत चिंता लाना भारी ||
सुनकर हम आदर्श तुम्हारे , पा जाएगें सुख सारा |,
बड़े ध्यान से सुनते गुनते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१७४
निकल पड़े हो जिन राहों पर,नहीं सरल उसको मानो |
चूक कभी मत करना बेटे , धीरे -धीरे पथ जानो ||
नहीं निराशा मन में लाना , गुरुवर समझो आधारा |
मन से तब सब सुनते जाते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१७५
कोई ऐसा काम न करना , आंच साधना पर जाए |
गुरुवर को कुछ बुरा लगा है,खबर न हम तक कुछ आए ||
देव शास्त्र गुरुवर ही होगें , जीवन के अब उपकारा |
शीष झुकाकर सब स्वीकारें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१७६
देख रही मैं तेरी दृढ़ता , निश्चय पथ पा जाओगें |
आशीष हृदय से देती हूँ , मंजिल निश्चित पाओगें ||
चुना हुआ पथ जानो बेटा , तलवारो की है धारा |
नहीं चूकता जिस पर आगे,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१७७
नमन हमारा इस ममता को , नमन भगवती है माता |
महावीर जो बेटा कर दे , जग भी बंदन कर जाता ||
शीष झुकाकर चंदन अर्पित, अभिनंदन शत-शत वारा |
चला दिया है मुक्ति मार्ग पर ,नगर जतारा घ्रुव तारा ||१७८
ममता की देखो गहराई , पढ़ लो ममता परिभाषा |
मात् भगवती देती थी अब , माँ को एक नई भाषा ||
वीर शिवा भी लोह बने है , ममता की पाकर धारा |
इस धारा के आज पथिक थे , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१७९
लाड़ प्यार तक रही न सीमित , यह ममता थी बलशाली |
गौरव गाथा रचने वाली , यह ममता थी अब आली ||
एक नाद था इस ममता में , जग में था नया इशारा |
ममता भेजे बैरागी पथ , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८०
कितना साहस इस ममता में , उपदेशों के थे मोती |
जिस पथ पर है बेटा जाता , उसका हर कोना छूती ||
सजग स्वयं दिखती थी पहले ,करती विश्लेषण सारा |
जिस पथ पर जाता था बेटा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८१
माता लेती स्वयं परीक्षा , अब बेटा यह सब जानो |
नहीं बनेगा यह सब तुमसे , लोट चलो अब यह मानो ||
देखा है बेटे का चहरा , इकटक है वहाँ निहारा |
छूकर माँ के पैर कहें तब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८२
मेरी माता अरज हमारी , निर्देश आपने बोला |
आतम हित की रस गंगा को , मेरे कानों में घोला ||
वचन आपको देता हूँ मैं , रखूँ याद मैं अब सारा |
मान तुम्हारा सदा रखेगा , बनकर तेरा ध्रुव तारा ||१८३
पर माता जी विनय हमारी , तुम घर जाकर मत रोना |
याद हमारी करके पिछली ,मत अतीत का कुछ खोना ||
तेरा बेटा बनकर आया , यह है सौभाग्य हमारा |
वंदन करते बार-बार है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८४
जिन शासन जयवंत रहेगा , अंग बनेगा यह बेटा |
सुदृढ़ साधना सदा करुगाँ , कर्म रहेगें सब जेठा ||
लाज न आने दूगाँ तुमको, गुरु विराग को स्वीकारा |
माता को विश्वास दिलाते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८५
सांयकाल की बेला आई , गुरु चरणों में था जाना |
छोड़ चला माँ को अब राही , मुक्ति पथ का दीवाना ||
लिखी नियति ने अद्भुत गाथा,कलम न लिख सकती सारा
उगता था वैराग्य क्षितिज पर,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८६
जुड़ा राकेश में भैया जी , यही नाम था अब आगे |
लगनशीलता गुरुवर देखें , परखें मन के सब धागे ||
हाथ जौहरी हीरा आया , परखा गुरु ने यह न्यारा |
कितना प्यारा पारस आया , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८७
पुन: सनत जी जब आए तब , सिंधु विराग जी बोले |
अद्भुत प्रतिभा इसके अंदर , नहीं साधना में डोले ||
उच्च शिखर तक यह पहुँचेगा, अब है आशीष हमारा |
मात-पिता ने तब सुत देखा ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१८८
गुरुवर की सुनकर यह वाणी , मन में धीरज था धारा |
मात-पिता ने जीभर के फिर ,अपना था लाल निहारा ||
श्वेत सभी परिधान बदन पर, मुख पर तेजोमय धारा |
वैरागी पथ अनुगामी थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१८९
शिष्य समर्पण जब कर देता , गुरु का पूरा हो जाता |
मोह छोड़ता जग में सबसे , गुरुवर में जग को पाता ||
गुरुवर होते उसके बम्हा , गुरुवर शिव की है धारा |
गुरुवर को बिष्णू ही माने ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९०
जहाँ आचार्य श्री की सम्यक , रहती शीतल है छाया |
सुिंधु विराग बने कल्याणी , तपोमूर्ति जिनकी काया ||
जैनागम के प्रतिमान शिखर है ,जिन गंगा की रस धारा |
जिनके चरणों में रहता था, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९१
श्री विराग जी सागर पारस , जिसको मन से छू लेते |
पत्थर. कुंदन बन जाता है , आशीषों को है देते ||
ज्ञान दिवाकर रतन त्रयी के , जैनागम के जयकारा |
जिनके दर्शन के चातक थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९२
जिनकी वाणी से बहती है , सम्यक ज्ञानी रस धारा |
सम्यक चारित्र सदा चमकता, करता रहता जयकारा ||
सम्यक दर्शन खुद ही गुरुवर , सबका करते उपकारा |
जिनके पग चिन्हों पर आया, नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९३
आगम चक्छु जिनकी कृति है ,आगम की जो खुद गंगा |
ऐसे गुरुवर के चरणों में , मन भी रहता है चंगा ||
सिंधु विराग यहाँ गुरुवर जी , पूजक था एक सितारा |
यही सितारा बना एक दिन,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९४
है विराग जी सागर सूरज , करते रहते उजियारा |
तारे जिनसे सदा प्रकाशित , देते सबको आधारा ||
आगम की लगते परिभाषा , लोग. लगाते जयकारा |
पूर्ण समर्पित शरणागत था , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१९५
शांतिनाथ का भव्य जिनालय , तीर्थ अहार मनो हारी |
यहाँ शिष्य था गुरु चरणों में , सुपथ साधना थी जारी ||
पाणाशाह सुना था रांगा , बनता चांदी का सारा |
गुरु विराग का यहाँ बना है ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९६
शांति कुंथ अरु अरहनाथ की , दिव्य यहाँ सब प्रतिमाएं |
भव्य यहाँ सब हो जाते है , जो श्रृद्धा पूजा मन लाएं |
दिव्य यहाँ से बीज पड़े थे , था सबने यहाँ निहारा |
बाग विरागी पुष्प सुहाने , नगर जतारा ध्रुव तारा ||१९७
गुरुवर ने जांचा परखा है , चरणों में आया सोना |
उसे तपाते पाठ पढ़ाते , जिसको तारा था होना ||
आशीषों की बौछारों से , करते जाते उद्धारा |
तपकर कुंदन चमक रहा था , नगर जतारा ध्रुवतारा ||१९८
गुरुवर कहते बड़ा विलक्षण ,यह मोती प्रतिभाशाली |
खिला पुष्प जब गंध विखेरे , खुश रहता है वनमाली ||
गुरुवर की माला के मोती , सब करते थे उजियारा |
एक नया तब आया पारस ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||१९९
सदा पूजते गुरु पद पंकज , चरणों में ध्यान लगाते |
गुरु सेवा का फल भी मिलता , सदा आचरण अपनाते ||
यही आचरण बने दिवाकर , करने जग में उजियारा |
यह उजियारा आज क्षितिज में , नगर जतारा ध्रुवतारा || २००
गुरुवर वाणी जग कल्याणी , अविरल सुनते है सारा |
हृदयांगम करते जाते थे , ज्ञान गंग की रस धारा ||
रचना था इतिहास नया अब , करने अपना उद्धारा |
दीपअलौकिक गुरु विराग का,नगर जतारा ध्रुवतारा ||२०१
कितना भी गुणगान करें हम , गुरुवर महिमा है न्यारी |
पूर्ण न कोई कर सकता है , वीतरागिता वलिहारी ||
कलम यहाँ झुककर कहती है , ज्ञानगंग की गुरु धारा |,
आए थे जिनके तट पर अब, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२०२
क्षेत्र अहार से गमन गुरु का , स्वयं रहा था मैं पद राही |
सिंधु विराग से की जिज्ञासा , नगर जतारा का ग्राही ||?
'सबसे अच्छा' गुरुवर बोले , मैं समझा बहुत इशारा |
आज वहीं वैराग्य गगन पर,नगर जतारा ध्रुव तारा || २०३
किया निवेदन मैने तब ही , यह रागी हैं या वैरागी |
वैरागी से रागी होना , गुरुवर बोले बड़भागी ||
राग प्रशस्त भी पुण्य मार्गी, कर सकता है उजियारा |
यह उजियारा देखा सबने ,नगर जतारा ध्रुव तारा | २०४
संघ पपौरा तब पहुचाँ था , फिर टीकमगढ़ को आया |
नंदीश्वर मंडल की रचना , और वाचना को पाया ||
ब्रम्हचारी राकेश सोचते , केशलोंच निर्णय न्यारा |
गुरुवर देते हँसकर स्वीकृति,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२०५
नई साधना ब्रम्हचारी की , केशलोंच करते जाते |
दृढ़ता थी चहरे पर पूरी , मन को भी पक्का पाते ||
बना मांझ का मंदिर साक्षी, जब सिर से केश उतारा |
भव्य जीव है लोग कहें तब ,नगर जतारा ध्रुव तारा || २०६
कठिन परीक्षा कितनी देते, क्या थी मन में अब ठानी |
ब्रम्हचारी का साधु जीवन , सभी देखते थे ज्ञानी ||
अडिग साधना अपनाते थे, करते थे सब जयकारा |
आगम का प्रतिमान बने थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२०७
केशलोंच करना भी जानो , एक तपस्या में आता |
नहीं वेदना करुणा झलके, समता चेहरे पर लाता ||
कठिन परीक्षा आती रहती , जो कर जाते है पारा |
वही एक दिन बन जाते हैं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२०८
मैं सुभाष जब टीकमगढ़ में , गुरु दर्शन को था आया |
हुई राकेश से जय वीरा , सम्मुख उनको जब पाया ||
मै बोला क्या मुनि पथ जाना , उत्तर था समय इशारा |
गुरु शरणागत हूँ बोलें तब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२०९
एक दिवस मै बोला भैया , लगता है आने बाला |
मोक्ष मार्ग का राही बनकर , खुलने बाला है ताला ||
यह सब अब गुरुवर ही जाने, करते मुख से उच्चारा |
मै भी समझा जग भी समझा,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२१०
करते-करते बातें मैं जब , जीने तक था कुछ आया |
हाथ जोड़कर नमन किया तो ,चेहरा पाया सकुचाया ||
अभी समय है हँसकर बोले, जय पारस नगर जतारा |
आगे देखो बोले हमसे , नगर जतारा ध्रुव तारा |||२११
जहाँ समर्पण होता पूरा , शिष्य पूर्णता को पाते |
खाली घट के अंदर गुरुवर , निधियां पूरी भर जाते ||
शिरोधार्य गुरु आज्ञा करते , वही शिष्य होता न्यारा |
अद्भुत बनता इस जग में ज्यों,नगर जतारा ध्रुवतारा ||२१२
गुरु विराग के चरण कमल में ,एक पुष्प था अति प्यारा |
करे साधना गुरु के सँग में ,साधक लगता था न्यारा ||
जहाँ साधना बने सुगंधित , आतम का है जयकारा |
नूर दिखे इस जयकारे में, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२१३
संघ ललितपुर पहुचाँ है अब , चातुर्मास निकट चोखा |
विनय विराग सिंधु से करते , श्रावक चाहें यह मोका ||
पंचानवें का योग गुरुवर , क्षेत्रपाल में स्वीकारा |
ब्रम्हचारी राकेश सँग में , नगर जतारा ध्रुवतारा || २१४
चले पिता के पदचिन्हों पर , बेटे को देखा जाता |
पर बेटे के पद चिन्हों पर , अब मात -पिता को पाता ||
श्रीफल भेंट चढ़ाकर गुरु को , दो प्रतिमा को स्वीकारा |
धन्य भगवती-सनत हुए है, पाकर बेटा ध्रुव तारा ||२१५
कोई चलकर पद राहों में , पक्की ही राह बनाता |
कोई उदाहरण देता है , फिर कोई तब अपनाता ||
आदर्शा के झंड़े फहरा , जो चलते जीवन सारा |
वह पदचिन्ह बनाता जैसे , नगर जतारा ध्रुवतारा ||२१६
चातुर्मास ललितपुर पूरा , बढ़ -चढ़ कर हिस्सेदारी |
संघ दायित्व जो भी मिलते , समझी है जिम्मेवारी ||
सृजन जहाँ पर होता रहता , देखा उसका उजियारा |
प्रवल पुरुषार्थ करते जाते, नगर जतारा ध्रुवतारा ||२१७
भैया जी राकेश जतारा, किस कारण से अब आएं |
गुरुवर से तब किया निवेदन, कुछ दिन को क्या ले जाएं ||
स्वीकृति तब गुरुवर की पाकर ,तीन दिवस का जयकारा |
नगर जतारा धन्य हुआ था , पाकर अपना ध्रुवतारा ||२१८
संघ विहार चलाचल रहता , गरुवर की रहती छाया |
परिमार्जित थी पूरी चर्या , और ज्ञान भी था आ़या ||
वर्ष छियान्वें माह फरवरी , संघ द्रोणगिरि जयकारा |
मद्जिनेंद्र पंचकल्याणक, शामिल जिसमें ध्रुव तारा ||२१९
त्रय दीक्षाएं मुनिवरों की , समारोह था अति न्यारा |
खोल लंगोटी ऐलक द्वय ने , वेश दिगम्वर था धारा ||
सोच रहे राकेश यहाँ पर , अब है संकल्प हमारा |
करें निवेदन तब गुरुवर से , नगर जतारा ध्रुवतारा ||२२०
जहाँ भावना दीक्षा आई , अवसर जल्दी ही पाया |
देवेन्द्र नगर के गजरथ में, समय सोचकर था आया ||
दीक्षाएं घोषित होते ही , गूँज उठा था जयकारा |
नाम राकेश था शामिल अब, नगर जतारा ध्रुवतारा ||२२१
गुरु विराग से विनती करके , आयोजित हुई बिनोली |
नगर जतारा में जयकारा , घर-घर थी सजी रँगोली ||
माह फरवरी तेरह जानों , अद्भुत था यहाँ नजारा |
वैरागी पथ पर जाता था नगर जतारा ध्रुव तारा ||२२२
जन्म भूमि अभिनंदन करती , अपने को गर्वित माने |
मिट्टी उड़कर माथे लगती , अपने को चंदन जाने ||
गली नगाइच सिसकी भरती,बिछड़ रहा है सुत प्यारा |
रौनक जिससे गली रही है , बनने जाता ध्रुवतारा ||२२३
वरण सोचकर मुक्ति वधू का , बने राकेश थे दूला |
भाल तिलक माथे पर साफा, बजा जोर से रमतूला ||
घोड़े बाजे लोग बहुत थे , बने बराती सब यारा |
आरत ओली पर मुस्काते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२२४
नौ भैया जी और साथ थे , सब ही थे दूल्हे राजा |
पैर महावर हाथों मेंहदी , हार गले में था ताजा ||
उमड़ पड़ा समुदाय नगर का , गूँज उठे थे जयकारा |
पुष्प बरसते छज्जों से भी , जिस पथ जाते ध्रुवतारा ||२२५
बुंदेलखंड का शिमला भी , नगर जतारा कहलाता |
बाग बगीचें सुंदर जिन पर, सुषमा अपनी बिखराता ||
सुषमा पूरी उड़कर आई , चरणों का करे पखारा |
जिस पथ पर वैरागी नव था, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२२६
लहरें उठती मदन सरोवर , लगा रहीं हैं जयकारा |
ऊँची उठकर कहती मानो , मैं देखूँ आज नज़ारा ||
चली पवन भी शीतल होकर , खुश्बू चंदन रस धारा |
पंछी भी उड़कर देख रहे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२२७
कौन यहाँ जैनी जैनेतर , सभी यहाँ थे बड़भागी |
चली बिनोली जिस पथ पर है, यत्र तत्र थे अनुरागी ||
सबकी पलकें छिपा रही थी , जो गीले हुए किनारा |
वैरागी की आज बिनोली , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२२८
यही बोलते तिनके उड़कर , अहो भाग्य है यह मेरा |
सभी पुष्प यह कहते है , मैं पूजों यहाँ चितेरा ||
नजर बाग में खिली केतकी , गंध यहाँ अपरम्पारा |
जाता है वैराग्य क्षितिज पर, नगर जतारा ध्रुवतारा ||२२९
कुवाँ कहे कोठी का सबसे, मेरी विनती कुछ मानो |
चरण पखारो मेरे जल से , अभिलाषा मेरी जानो ||
कुवाँ कहे थाने का सबसे , मेरा मीठा जल सारा |
छिड़क चरण में जल कुछ देना ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||२३०
स्कूलों की शिक्षण धरती भी, धन्य आज खुद को माने |
रतन आज राकेश बने है , सबको लगती बतलाने ||
रहें चन्द्रमा अंक हमारे , पढ़ा ज्ञान की रस धारा |
आशीषों की बरसाते हैं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३१
दिखता सरस्वती शिशु मंदिर , आज बना है कुछ मोनी |
अब उसका आचार्य चला है , करने को अच्छी होनी ||
चली बिनोली नगर डगर पर , हर मग पर था जयकारा |
चला छोड़कर जग की माया , नगर जतारा ध्रुवतारा ||२३२
सांयकाल थी सभा विदाई , उमड़ पड़े थे नर नारी |
आंखे नम थी जन-जन की तब, देख मंच पर व्रत धारी ||
धीरज देता कौन किसे अब ,सबकी आंखों जल खारा |
जाता था बैरागी बनने , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३३
क्षमा याचना दौर चला था , सिसकीं थी जन की गूँजी |
आज खिसकती जैसे हो अब,महनत की जोड़ी पूँजी ||
क्षमा भाव के हाथ जुड़ें थे , करुणा की बहती धारा |
पर हँसकर सबसे मिलता थे ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||२३४
नजर जहाँ तक जाती सबकी , आंखे लगती थी गीली |
मित्र सभी व्याकुल लगते थे , भूल न पाते मूर्त छबीली ||
यार चला अब जिस राहों पर ,नहीं लोटना स्वीकारा |
अंतिम मिलना करते सबसे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३५
जब मथुरा को श्याम गए थे , दृश्य वही थे दिखलाए |
गोकुल की गलिया रोती थी , नहीं लोटकर थे आए ||
पापी मन के कर्म कंस को , चला ताड़ने सुत न्यारा |
आज विदाई लेता सबसे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३६
कौन विदाई देना चाहें , पर सबको मिले विदाई |
सभी रोकना चाहें जिसको , कैसे रुकता वह राही ||
हम रागी-वह वैरागी थे , अंतर था अब जल धारा |
हम अपना-वह सपना कहते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३७
हम मोही -वह निर्मोही थे , टूट रही थी जो जोड़ी |
नाम विदाई देकर उसको , रखते मर्यादा थोड़ी ||
तोड़ चला बंधन वैरागी , हम रागी का संसारा |
फिर भी सम्बोधन देते है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३८
मुश्किल से मिलता है जानो , यह मानव जनम दुबारा |
इसी जनम में करना होगा , अपना ही पूर्ण सुधारा ||
चेतन को चैतन्य करो सब , पाकर गंगा जिन धारा |
भव सागर को पार उतरते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२३९
मेरा यह संदेश जानिए , मत पीना मद का प्याला |
तेरा मेरा जो भी करता , कड़बी पीता है हाला ||
मकड़ी जैसा बुनता जाला ,जिसने भी राग पसारा |
इस जाले को मत बुनना अब , कहते जाते ध्रुव तारा ||२४०
नेत्र खोलकर आप देखिए , दुखिया है यह संसारा |
सुखिया भी दुखिया रहते है, हाय-हाय का जब नारा ||
भरा कपट है जिसके अंदर , जोड़ रखा है अँधयारा |
इस अँधयारे से दूर रहो , कहते जाते ध्रुव तारा ||२४१
सम्बोधन में बतलाया था , करनी ही भाग्य बनाती |
पुरुषार्थ परिश्रम करने से, किस्मत सबकी जग जाती ||
निज आतम का ध्यान जरूरी , भव सागर से भी पारा |
करो धर्म से कर्म सदा ही , कहते जाते ध्रुव तारा ||२४२
सम्बोधन में सबसे कहते , जो जिन शासन अनुरागी |
वह मानव तन पाकर जाने , सचमुच में हैं बड़भागी ||
मोक्ष मार्ग का हितग्राही हूँ , जीवन को यहां सँवारा |
वीर प्रभू कल्याण करेगें , कहते जाते ध्रुव तारा ||२४३
कल्याणक था नगर जतारा ,अब एक वर्ष है पूरा |
मैं खुद का कल्याण करुँगा ,अब तक जो रहा अधूरा ||
कहकर के मुस्काते जाते ,कहते सब यहाँ उधारा |
जैनागम की शरण सुहानी , कहते जाते ध्रुव तारा ||२४४
हुई समापन सभा नगर में , चले गए सब नर नारी |
पर ग्वाला अब नहीं छोड़ते , देख रहे सब तैयारी ||
देर रात तक बैठे मिलकर , हिला न कोई था यारा |
मोन हुई थी सबकी वाणी , देख रहे थे ध्रुव तारा ||२४५
मित्र इत्र-सा आज चला था , साथ यहाँ से छूटेगा |
अपने - अपने भी पथ होगें ,मिलना भी कभी रहेगा ||
हम रागी यह वैरागी है , जाएगा का यह यारा |
आज रात है कितनी भारी , देख रहे सब ध्रुव तारा ||२४६
चौदह फरवरी छियान्वें की , प्रात काल की है बेला |
भक्ति बड़े बाबा की करता , जाकर के निपट अकेला ||
अब मुक्ति पथ पर चाहे शक्ति , चाहे ऊपर उपकारा |
देते बाबा शुभाशीष है , नगर जतारा घ्रुव तारा ||२४७
पूजन भी सब मिलकर करते , आए थे जो ब्रम्हचारी |
शीघ्र पहुँचने गुरु चरणों में , चलने लगती तैयारी ||
पुन: सभी जन हुए इकठ्ठे , चला काफिला था सारा |
छोड़ नगर सीमा तक आए , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२४८
छोड़ कृष्ण को जैसे आए , व्याकुल गोकुल बासी |
यही हाल था नर नारी का , छाई थी बहुत उदासी ||
दिन चर्चा तो करना पड़ती , सबने था धीरज धारा |
धन्य जतारा नगर हुआ है ,उभरा नभ जो ध्रुव तारा ||२४९
आगे की कुछ कथा लिखूँ मैं , सभी नमन को स्वीकारें |
साक्ष्य बने जो भव्य बिनोली , लगा रहे थे जयकारें ||
सब अपने को धन्य मानते , हृदय धारते जयकारा |
नमन सैकड़ों बार हमारा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५०
तेइस फरवरी छियानवें को , तप कल्याणक सुखकारी |
देवेन्द्र नगर की धरती पर , दिवस दीक्षा मनोहारी ||
तेरह दीक्षाएं होनी है , गुरु विराग के अनुसारा |
ऐलक जी पद दीक्षित होगें , नगर जतारा ध्रुवतारा ||२५१
मात भगवती पिता सनत जी , राजेश चक्रेश भाई |
कमला और प्रियंका बहिनें , गए सभी थे अगुबाई ||
मामा सुंदरलाल बड़े है , चले सभी थे परिवारा |
नाते रिश्तेदार जुड़े थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५२
दिव्य घोष भी नगर जतारा , करने को था जयकारा |
और बहुत से लोग गए थे , लखने दीक्षा सुखकारा ||
ढोल बजा था जिन हाथों से, उसी ढोल का नक्कारा |
अभिनंदन है शत -शत तेरा, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५३
ढोल सोचता जिन हाथों ने, मुझको था कभी बजाया |
पिछी कमंडल लेगा कर में , परिवर्तन कैसा आया ||
धन्य हुआ मैं आज बजूगाँ , जितनी ताकत को धारा |
नाद गगन तक गूँजेगा जय, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५४
और यंत्र भी सभी सोचते , हमने भी साथ निभाया |
लिया हाथ राकेश बंधु ने ,जब- जब भी ढोल बजाया ||
आज बजेगें हम सब मिलकर , करें जोर से जयकारा |
यहाँ बिगुल भी तान सुनाती, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५५
नगर जतारा के श्रावक भी ,आए थे बहु नर नारी |
दीक्षा पल के दृश्य देखने , पुण्य कमाने सुखकारी ||
यत्र-तत्र सर्वत्र दिखा था , मंगलकारी जयकारा |
जाता था वैराग्य क्षितिज पर, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५६
नगर देवेन्द्र की धरती पर , ऋतु आई सरस सुहानी |
आज दिवस दीक्षा की बेला , रचनी है नई कहानी ||
यहाँ राकेश जी ब्रम्हचारी , केशों का लुंचन न्यारा |
प्रातकाल ही कर बैठे थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५७
सजा द्रव्य की थाली अंतिम , पूजन प्रभु के दरबारा |
कल से पूजा भाव द्रव्य की, हाथ पिछी से जयकारा ||
वीतराग की मुद्रा होगी , हटे परिग्रह अब सारा |
जिन शासन जयबंत करेगें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५८
समोशरण- सा मंच बना था ,लगता था जैसे जादू |
कमलासन पर गुरुवर बैठे , फिर बैठे थे सब साधू ||
ब्रम्हचारी पंत्ति से बैठे , दीक्षा को है स्वीकारा ||
जिसमें शामिल दिए दिखाई, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२५९
मंच धरा में सबसे आगे , वह बैठे थे परिवारा |
कुल दीपक जिनके आए थे , करने अपना उद्धारा ||
नजर जहाँ तक जाती सबकी,ओर छोर का नहिं पारा |
जनमानस था वहाँ देखता ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२६०
दीक्षार्थी थे जितने भैया, सबको गज पर बिठलाया |
सभा मंच तक लाए थे जन,आदर अनुपम दिखलाया ||
गाए बहिनें शुभारंभ पर , चरण मंगला शुभकारा |
मंगल में मंगल दिखते थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२६१
गुरु विराग. ने सबसे पहले , साधू पथ को बतलाया |
कितना कंटक कारी होता , सबको अवगत करवाया ||
फिर कहते अब सोचो समझों ,कर सकते अभी किनारा |
पर दृड़ निश्चय अडिग सभी थे, जिसमें शामिल ध्रुव तारा ||२६२
गुरुवर ने परिवार जनो से , स्वीकृति देने को बोला |
मुनि संतो विद्वानजनों के , अनुमोदन को भी तोला ||
किया इशारा सभा जनों से , क्या अनुमोदन की धारा |
कहा सभी ने हाथ उठाकर, शामिल कर लो ध्रुव तारा ||२६३
सभी जनों के मात-पिता ने , पहले था शीष झुकाया |
स्वीकृति गुरु चरणों में रखकर,अनुमोदन को दुहराया ||
भाव विहृल से सजल नयन थे ,सब करते थे जयकारा |
जिसमें शामिल सनत-भगवती ,जिनका बेटा ध्रुव तारा ||२६४
श्रीफल लेकर सभी विनय से , खड़े हुए तब दीक्षार्थी |
विनय करें दीक्षा देने की , बनें हुए थे सब प्रार्थी ||
गुरु विराग ने मुसकी देकर , सबको था वहाँ निहारा |
देख योग्यता गुरुवर हँसते ,जिसमें शामिल ध्रुवतारा ||२६५
गुरु से कहते राकेश यहाँ , मुझें बना दो आभासी |
मुक्ति मार्ग का शिलान्यास है, बन जाना ही सन्यासी ||
संयम से उद्धार जीव का , मिलता है सही किनारा |
यही सीख चरणों में सीखी , विनय बोलते ध्रुव तारा ||२६६
शब्द सन्यास में देख रहा हूँ ,संयम की अब परिभाषा |
जीवन सरिता का न्यास रहे , समता की बनती भाषा ||
रहे नदी-सा बहना जग में , राग द्वेष की तज धारा |
यही सीख चरणों से सीखी , विनय बोलते ध्रुव तारा ||२६७
घड़ी सन्यास भी अद्भुत है ,जिसके जीवन में आती |
कब किसको यह मिलती जाए , नहीं पूर्व से बतलाती ||
रोमांचित है मन अब मेरा , आल्हादित है तन सारा |
कृपासिंधु अब दया करो सब, विनय बोलते ध्रुव तारा ||२६८
कौन कहें सन्यासी जीवन, कुछ कहना भी मत आबें |
ज्यों गूंगा मीठे फल का रस , मत वर्णित कुछ कर पाबें ||
परम स्वाद जो अनुभव करता , रखता अंदर ही धारा |
हाल यही है मेरा गुरुवर , विनय बोलते ध्रुव तारा ||२६९
कारण निमित्त उपादान भी , उपादेय सँग उपकारी |
किस पल मिल जाए मानव को, बन जाते जो हितकारी ||
सुखद संयोग कब घटते है , नहीं जानता संसारा |
पर जिसको गुरुवर अपना ले, वह बन जाता ध्रुव तारा ||२७०
रत्ना त्रय के धवल गगन में , सम्यक दर्शन की माला |
सम्यक चारित्र ज्ञान रवि सा, संयम का हो शुभ ताला ||
जिनवाणी गंगा सी पावन , उर में पा जाऊँ धारा |
सदा शरण गुरुवर की होवें , करें कामना ध्रुव तारा ||२७१
क्षमा याचना सबसे करते , कहीं रहा मैं यदि दोषी |
संसारी रागी के कारण , आ जाती थी मदहोशी ||
संघ शरण में गल्ती जो भी, उनका करता स्वीकारा |
क्षमा करो हे क्षमामूर्ति अब , विनय बोलते ध्रुव तारा ||२७२
क्षमा भाव से अनुभव करता , अपने अंदर गहराई |
द्वेष कपट से खाली होकर , भरने मिलती सच्चाई ||
क्षमा मांगता करता सबको ,रिक्त घड़ा मन का सारा |
हे गुरुवर इसको भर देना , विनय बोलते ध्रुव तारा ||२७३
इतना कहकर गुरु चरणों में, जाकर था शीष झुकाया |
गुरुवर ने भी आशीषों से , पुन: सभी को नहलाया ||
सिंधु विराग करें तब आज्ञा , लगने लगता जयकारा |
हाथ जोड़कर सभी खड़े थे,जिसमें शामिल ध्रुवतारा ||२७४
सौभाग्यवती बहिनों ने तब , मंगल था चौक लगाया |
श्वेत बस्त्र हाथों में लेकर,शुभ स्वास्तिक चिन्ह बनाया ||
केशर से यह चिन्ह बना था , अनुपम लगता न्यारा |
रखा चौक के ऊपर जिसको , बैठक करते ध्रुव तारा ||२७५
विचार मग्न थे ब्रम्हचारी , अब मात पिता नहिं भाई |
सभी देह के रागी लगते , इसीलिए हैं दुखदाई ||
मेरे तो अब सब कुछ गुरुवर , बदली है जीवन धारा |
गुरुवर नौका पार करेगीं , भव सागर से ध्रुव तारा ||२७६
गुरुवर ने आदेश दिया तब , आभूषण बस्त्र उतारो |
राग नहीं अब किसी चीज से, नव जीवन को स्वीकारो ||
आज अभी से यह पल जानो , बदलेगी जीवन धारा |
सभी करें स्वीकार मंच पर, जिसमें शामिल ध्रुवतारा ||२७७
उतार दिए सब गहने कपड़े , जैसे तन पर हो भारी |
मन के सँग तन पर आई थी, शुचिता की किरणें न्यारी ||
दर्शक थे सब भाव विहृल भी , लगा रहे थे जयकारा |
मंद - मंद मुस्कान बिखेरें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२७८
देवर भै़या बेटा नाती, टूट गए थे सब नाता |
मात भगवती पिता सनत में ,भाव यही था अब आता ||
महाराज कहूगाँ बेटे को , वंदन इक्छामि उच्चारा |
अब पूरे यह वैरागी है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२७९
कितनी कठिन परीक्षा होती , जिसने सुत को है पाला |
आज वही वैरागी बनकर , चुनता पथ कष्टों बाला ||
ममता धीरज कैसे बांधे , नैन बहाते जल खारा |
देख रही थी इकटक माता ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२८०
प्रतिबिम्ब पिता का बेटा होता , सँग में एक सहारा |
पल भर में ही टूट गया है , धागे- सा आज किनारा ||
पिता नारियल दृड़ता का है, नरम रहे अंदर सारा |
आज निकल कर बाहर आया,जिसका बेटा ध्रुवतारा ||२८१
राजेश चक्रेश सोच रहे , साथी होता है भाई |
आज साथ यह छूट गया है ,पीड़ा नैनों में आई ||
सब कुछ अच्छा समझ रहें है, पर भाई भी है प्यारा |
आंसू अपने टपकाते थे , देख-देखकर ध्रुव तारा ||२८२
कमला और प्रियंका बहिनें, सिसकी पर हम क्या बोलें |
नहीं तराजू ऐसी है अब , जिस पर इनको हम तोलें ||
भाई एक सहारा होता , जो करता आज. किनारा |
फिर भी मंगल करें कामना, भाई बनता ध्रुव तारा ||२८३
बूड़े जर्जर तन पर बोलूँ , जिसको कहते है दादी |
कांप रही थी बैठी- बैठी , विल्कुल थी सीधी साधी ||
उनका बल्लू चला गया था , एक खिलौना मन प्यारा |
जो था अब वैराग्य क्षितिज पर,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२८४
मामा सुंदरलाल सोचते , धीरज सबको दूँ कैसे |
मेरा भी वह हाल यहाँ है , सब कुछ खोया हो जैसे ||
नहीं यहाँ पर मामा कहने , अब आए भानिज प्यारा |
साथ यहाँ से छूट गया है , नगर जतारा ध्रुव जतारा || २८५
बैठ गए पूरित चौकों पर , वस्त्र उतारें संयासी |
गुरुवर तब उठकर आए थे, सबका करने को न्यासी ||
पंचामुष्ठी केशलोंच लख , लगा जोर से जयकारा |
हाथ जोड़कर सब बैठे थे , शामिल जिसमें ध्रुव तारा ||२८६
सिर पर केशर से गुरुवर ने, शुभ स्वास्तिक चिन्ह बनाया |
विघि विधान अभिमंत्रों से भी , सबका न्यास कराया ||
सिंधु विराग ने किया दीक्षित, लगातार थे जयकारा |
ऐलक पद पर दीक्षा पाई, नगर जतारा ध्रुव तारा || २८७
जनसमूह के नेत्र सजल थे , आनंदित दीक्षा धारी |
दृश्य कैद आंखों में करके ,गुरु को माने उपकारी ||
अल्हादी का रंग प्रकट था ,अनुपम सबसे था न्यारा |
नामकरण भी अभी शेष था , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२८८
वस्त्राभूषण दीक्षार्थी के , परिवार जनों को सोपे |
मिले सनत को जब हाथों में , तब आंसूू रुकें न रोके ||
अंतिम याद समेटी छाती , जैसे हो अब पुचकारा |
सभी यहाँ पर भाव विहृल है,जय हो ऐलक ध्रुवतारा ||२८९
मिला कमंडल पिच्छी गुरु से , शिष्यों ने तब स्वीकारा |
किया नमन गुरुवर को सवने , माना अपना उपकारा ||
तीन परिक्रमा गुरुवर कीन्हीं , नमन किया था हर बारा |
अब गुरुवर की नौका में थे, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२८९
करें सनत कोपीन भेंट जब , दृश्य देख हम रह जाते |
एक जनक की कठिन परीक्षा, विचलित अपने को पाते ||
जैनागम की महिमा जानों , करते है सब स्वीकारा |
शास्त्र भेंट मामा जी करते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||२९०
गुरुवर उच्चासन से करते , नामकरण की परिपाटी |
उत्सुकता थी सबकी जागी ,नाम जतारा क्या माटी ||?
नाम मिला तब हर्षित होकर , लगा जोर से जयकारा |
जय विमर्शसागर की बोलो, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९१
आनंदमय था दिवस दीक्षा , जन्म हुए थे कुछ योगी |
एक नया इतिहास बना था, शुचि पथ था पूर्ण निरोगी ||
है विमर्श सागर की कीर्ति , गगन छुएगा अब सारा |
जैनागम जयबंत करेगें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९२
नामकरण सबका होता है , लगता जाता जयकारा |
आनंदित भी होते जाते , गुरुवर महिमा स्वीकारा ||
गुरुवर चरणों में शरणागत , जाना भवसागर पारा |
जिसमें शामिल सबको लगते, नगर जतारा घ्रुव तारा ||२९३
हुआ समापन गुरुवर चलते , तब देखी हमने राहें |
यहाँ संघ की जय जय करते , नारों में उठती बांहें ||
चौतीस पिच्छीं हुई सँघ में , हर्ष दिखा अपरम्पारा |
गुरु के पीछे चलते देखे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९४
आचार्य भक्ति सांयकाल की,आज अलग से रस धारा |
पिच्छी लेकर बंदन करते ,णमोकार का जप प्यारा ||
पिच्छीं हाथों में लेकर ही , जीवन को आज सँवारा |
यह पिच्छी उपकारी माने , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९५
सामायिक को मिली बसतिका,और मिला चौका पाटा |
अब जीवन में इन पर करना , सोने पढ़ने का ठाटा ||
सामायिक में खूब लगा मन ,नाम प्रभू का उच्चारा |
हृदय पटल था अति आनंदित ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||२९६
नगर जतारा वासी भी जब , वैयावृत्ति को आए |
मंद- मंद मुस्कान बिखेरें ,हर्षित ही सबको पाए ||
सदा धर्म की चाहत रखना , सबको था किया इशारा |
शीष झुकाकर तब स्वीकारे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९७
कितना वर्णन लिखूँ दीक्षा , ताकत भी नहीं हमारी |
अद्वितीय है अवसर प्यारा , कथा जानिए यह न्यारी ||
नायक अभी कथा का जानो,लगता सबको कुछ न्यारा |
रात शयन को जाते है अब, नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९८
तेइस फरवरी छियान्वें को , गजरथ की अनुपम फेरी |
देवेन्द्रनगर की भूमि पर है , जैनागम की जय भेरी ||
गुरु आज्ञा से संघ व्यवस्था , का लेते रहते भारा |
हर आज्ञा को पूरा करते,नगर जतारा ध्रुव तारा ||२९९
गजरथ पूरा होते ही अब , संघ गमन की तैयारी |
नगर जतारा दिव्य घोष भी , लोटा घर को मनुहारी ||
सनत भगवती भारी मन से ,जब लोटे निज परिवारा |
धीर बंधाकर सभी बोलते , पुत्र आपका ध्रुव तारा ||३००
ॐ श्री विमर्श सागराय दीक्षा खंड नमो नम:
श्रेयांसगिरी को गमन हुआ था , संघ चला था अब आगे |
अति सुंदर पावन तीरथ है , भाग्य यहाँ सबका जागे ||
वन आच्छादित पर्वत सुंदर , बहती है शीतल धारा |
ध्यान साधना मग्न दिखें है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३०१
श्रेयांसनाथ की प्रतिमा अनुपम, सबका भव ताप मिटाती |
दर्शन से मन पावन होता, शीतलता मन में आती ||
खूब लगा मन प्रभु चरणों में , गुरुवर का लिए सहारा |
जिनशासन जयवंत यहाँ पर, शामिल जिसमें ध्रुवतारा ||३०२
बहता पानी रमता योगी , संघ सलेहा में देखा |
अब गुनौर पवई पावन है , कटनी की छूते रेखा ||
भव्य हुई अगवानी अनुपम , विनय वाचना जयकारा |
ग्रंथ हुआ धवला विस्तारित , सुनते पढ़ते ध्रुव तारा ||३०३
धवला ग्रंथ अनूठा जाने , षटखंडागम टीकाएं |
विमर्श सिंधु जी पढ़े गुरु से , गुरुवर भी सब बतलाएं ||
होती तत्वों पर चर्चा भी , मिले ज्ञान का भण्डारा |
सूत्र समझ कर चिंतन करते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||३०४
एक सूत्र में कहाँ शिष्य ने , स्वामी है विनय हमारी |
कैसे बैठूँ-चलूँ-शयन भी , कैसा भोजन आहारी ||
पाप बंघ भी निकट न आबें , क्या है इसका उपचारा |
"यत्नाचार पूर्वक". उत्तर, जानें जिसको ध्रुव तारा ||३०५
सूत्र और टीकाएँ पढ़ते , जहाँ ज्ञान की धाराएं |
गुरुवर भी पूरी करते हैं , आती जो जिज्ञाषाएं ||
अति आनंदित होते रहते , सार समझते थे सारा |
ज्ञानार्जन की सीड़ी चलते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३०६
ज्ञान शताव्दी आठ रही है , वीरसेन गुरुवर स्वामी |
ग्रंथराज षटखंडागम पर , घवला ग्रंथ रचा नामी ||
पांच खंड में टीकाएं है , छटवें से दिखा किनारा |
महाबंध छटवाँ कहलाता , समझ रहे थे ध्रुव तारा ||३०७
पाहुणकषाय संग सम्मिलित , सहस्त्र बहत्तर श्लोका |
संस्कृत प्राकृत भाषा सुंदर , टीका ग्रंथ रचा चोखा ||
वीरसेन के शिष्य रहे हैं , जिनसेनी का उपकारा |
धवला पूरण की थी जिनने , समझ रहे थे ध्रुव तारा ||३०८
महा ग्रंथ की चली वाचना , बहें ज्ञान की शुचि धारा |
कटे पाप कटनी बालों के , खूब लगे थे जयकारा ||
पंचमखंडा खंडवर्गणा , वाचन भी था सुखकारा |
सबको पढ़कर गुनते रहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३०९
सम्यक ज्ञान शिविर शिक्षण में, सक्रियता थी दिखलाई |
गुरुवर का आशीष सदा ही , रहता था सुखदाई ||
कर्तव्यों को पूरा करते , साथ साधना उपकारा |
गुरुवर करते बहुत भरोसा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३१०
श्री विमर्श की नई -नई थी , कुछ माहों की अब दीक्षा |
अंतराय जी आ पहुँचे थे , लेने को कठिन परीक्षा ||
स्थाई डेरा जमा लिया था , पर समता की थी धारा |
करें साधना संयम से तब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३११
कटनी के ही निकट शहर है , जहाँ धर्म का है पानी |
नाम जबलपुर जानो उसको ,कहें संस्कार की धानी ||
पिसनहार की मड़िया जानो , क्षेत्र अनूठा है प्यारा |
आया जन सैलाब शहर से , देख रहे थे ध्रुव तारा ||३१२
चौमासे का करें निवेदन , गुरुवर जी शहर पधारें |
वर्ष छियान्वें चौमासा तब, श्री विराग जी स्वीकारें ||
कटनी से जब संघ चला था , समोशरण-सा था न्यारा |
गुरुवर चलते आगे-आगे , पीछे चलते ध्रुव तारा ||३१३
मिला बहोरीबंध राह में , मंदिर था अतिशय कारी |
शांतिनाथ की प्रतिमा सुंदर , लगती सबको मनुहारी ||
मनोमुग्ध थे दर्शन करके , सबने था खूब निहारा |
नहीं परिश्रम अनुभव करते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||३१४
गति विहार में रही निरंतर , आई थी सात जुलाई |
लार्ड गंज में कदम रखे थे , भव्य हुई थी अगुवाई ||
धन्य जबलपुर शहर हुआ था, खूब लगे थे जयकारा |
चौमासा यह पहला करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३१५
यहाँ संस्कार रजधानी में, आए थे अब मुनि ज्ञानी |
दिखें सीप में मोती न्यारे , रचने को नई कहानी ||
ज्योति ज्ञान की जगमग जलती,दीपक हर्षित था प्यारा |
शहर जबलपुर जय- जयकारा, धर्म साधना ध्रुवतारा ||३१६
चातुर्मास कलश स्थापन की, थी तब उन्तीस जुलाई |
हर्ष शहर में छाया अनुपम , बजी जबलपुर शहनाई ||
बहें ज्ञान की गंगा अब तो , होगा नहवन.सुख प्यारा |
मड़िया जी में बढ़िया आया , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३१७
मड़िया जी की महिमा जानो , है यह इतिहास पुराना |
घर -घर पीसे आटा माता, पैसों का जोड़े दाना ||
पर्वत पर मंदिर बनबाती , द्रव्य लगाती है सारा |
पिसनहार की मड़िया देखें , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३१८
धनाभाव में शिखर कलश पर, चक्की के पाट चढ़ाए |
सम्वत् नौ सौ उनसठ जानो , मंदिर भी श्रृद्धा गाए ||
चौवीस चरण भगवंतों के , चौतिस मंदिर आकारा |
इन सबका दर्शन करते है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३१९
गुरुकुल ग्रंथागार यहाँ पर , क्षेत्र प्राकृतिक मनुहारी |
उदासीन भी आलय दिखता, व्रतिजनों को सुखकारी ||
धर्माराधन को उत्तम है , सब कुछ लगता है प्यारा |
यहाँ साधना निरत रहें अब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३२०
चार माह तक शहर जबलपुर , पूरा था लाभ उठाता |
सुबह शाम वह गुरु चरणों में , रहता था आता जाता ||
ज्ञान धर्म की हर पल दिखती , बहती रहती थी धारा |
गुरुवर के चरणों में रहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३२१
ग्रंथो पर थी चली वाचना , और शिविर थे न्यारे |
चौमासे के ज्ञान गंग में , डूब रहे थे जन सारे ||
छहढाला का शिविर लगा था , पर्यूषण में जयकारा |
ऐलक जी प्रभार सम्हालें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३२२
कक्षा लेते छहढाला की , ऐलक जी तब समझाते |
जीव दशा संसारी वर्णन , हर ढालों से बतलाते ||
श्रावक कहते अनुपम प्रवचन,समझाते हमको सारा |
धन्य -धन्य है योगी यह तो , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३२३
अंतराय ने नहीं यहाँ पर , ऐलक जी को था छोड़ा |
लगातार तो यदा कदा भी, देता दंश अधिक थोड़ा ||
काया कृश हो जाती थी , पर संयम कभी न हारा |
ध्यान साधना पूरी करते , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३२४
हुआ पिछी का परिवर्तन है,तब जाकर मंच सम्हाला |
कहें समीक्षा और परीक्षा , चौमासा है यह आला ||
धर्म साधना हुई संघ की , सँग में श्रावक उपकारा |
जिन शासन जयवंत बोलते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३२४
मड़़िया जी में सब कुछ बढ़िया, चलने की बेला आई |
नहीं चाहते फिर भी देते , भावों से भरी विदाई ||
वेग नदी का रुक सकता है , पर योगी रुके न धारा |
चरण कमल से झरें आचरण,ले लो कहते घ्रुव तारा ||३२६
जैनागम के साधू जानो , जहाँ कहीं है रुक जाते |
जंगल में भी मंगल होता , ज्ञान बूँद की बरसाते ||
आतम हित के योग बने थे ,मन का भी हुआ पखारा |
यही पखारा हरदम रखना ,कहते सबसे ध्रुव तारा ||३२७
चार माह तक शहर जबलपुर, बही ज्ञान की सुख धारा |
लाभ उठाया सबने मिलकर, गुरुवर थे एक सहारा ||
अब योगीश्वर जाते आगे , मन से रखना जयकारा |
मुक्ति मार्ग के पथ पर चलना, सबसे कहते ध्रुव तारा ||३२८
युवा जुड़े विमर्श सागर से , कहते कुछ दिन रुक जाते |
गुरु विराग आचार्य श्री की , कृपा निरंतर हम पाते ||
सदा आचरण सीखो गुरु के , रहे कृपा की तब धारा |
मड़िया में बढ़िया समझाते , नगर जतारा ध्रुव तारा |३२९
समोशरण-सा संघ चला था , आगे था शहर कटंगी |
भव्य संघ की अगवानी थी , दिखते थे सभी उमंगी ||
यहाँ विधान कल्पद्रुम मंडल ,दिखती है खुशी अपारा |
तरुण साधु से सब आकर्षित ,जिसको कहते ध्रुव तारा ||३३०
विशद -विनिश्च ऐलक जी भी , करते गुरु की अगवानी |
श्री विनिर्भय क्षुल्लक जी है , पहले से ही इस पानी ||
यहाँ रहें संजीव कटंगी , करें मंत्र से विस्तारा |
सभी प्रभावित ऐलक जी से, नगर जतारा ध्रुवतारा ||३३१
चले कंटगी से करने को , दर्शन कुंडलपुर बाबा |
आदिनाथ के पाद मूल में , भावों से शीष नवाया ||
पूर्ण संघ था अति आनंदित, तीर्थ बड़ा है अति प्यारा |
छै घरिया का पर्वत जानें , नगर जतारा ध्रुवतारा || ३३२
कुंडलपुर में निर्णयसागर , करते गुरु की अगवानी |
तीन साधु भी उनके सँग में , रखते संयम का पानी ||
भक्ति पाठ को गुरू पढ़ाते , संघ समझता है सारा |
बड़े घ्यान से सीख रहे है , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३३३
कुंडलपुर में संघ विराजा , कवि महिमा को बतलाता |
त्रैसठ श्री जिन मंदिर जानों , एक सरोवर भी आता |
पर्वत और तलहटी सुंदर ,आच्छादित है वन न्यारा |
आराघन दर्शन करते है , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३३४
बने केवली श्रीधर स्वामी , इस स्थल से है जयकारा |
महावीर का समोशरण भी, आया मंगल सुखकारा ||
सम्वत सत्रह सौ सन्तावन , भट्टारक जी के द्वारा |
सुरेन्द्रकीर्त जी उद्धारक ,पढ़े ज्ञान यह ध्रुव तारा ||३३५
छत्रसाल महराज केसरी , मंदिर में द्रव्य लगाते |
फीट पन्द्रह अवगाहन है , आदिनाथ की जय पाते ||
घने क्षेत्र जंगल में फिर से , जय बाबा बड़े पुकारा |
आज उन्हीं बाबा का दर्शन , करते जाते ध्रुव तारा ||३३६
औरंगजेब मूरती भंजक , कुंडलपुर में जब आया |
चुना अँगूठा क्षति पहुँचाने , दाएं पग को अजमाया ||
तलवार चली तब बहती है , श्वेत दूध की लघु धारा |
भाग गया तब आतातायी , महिमा जाने ध्रुव तारा ||३३७
कुंडलपुर में वर्ष छियान्वें , का सूरज सबने देखा |
बड़े दयालु बाबा लगते, है आशीषों का लेखा ||
बुंदेली यह तीर्थ सुहाना , पर्वत है चन्द्राकारा |
नमो -नमो करते है मुख से , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३३८
धन्य- धन्य यह धरती पावन,तीर्थ क्षेत्र है अति न्यारा |
बड़े कहें बाबा हम जिनको, आदिनाथ है सुखकारा ||
संघ हुआ पूरा आनंदित , नैनागिरि राह निहारा |
कुंडलपुर को नमन करें अब , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३३९
अंतराय भी सखा बना था , कैसे जल्दी वह जाता |
कंकण तिनका बाल बनाता ,अब उल्टी तक पहुँचाता ||
वैद्यराज जी नगर दमोही , बलताते टी बी उपचारा |
दूध नमक मीठा को छोड़े , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४०
गुरुवर बोले छैना लेना , रोग ठीक हो जाएगा |
ऐलक कहते गुरुवर मेरे , रोग नहीं अब रह पाएगा ||
कहा आपने माना मैने , रोग हटे तन से सारा |
गुरुवर हँसते शिष्य हँसे तब नगर जतारा ध्रुव तारा || ३४१
एक दिवस ऐलक जी करते , तन का घाटे पर घाटा |
केशलोंच को बिछा लिया था , अपने आगे इक पाटा ||
निर्ण़य सागर दोड़े आए , आकर खुद केश उतारा |
देह कांपती समता रखते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४२
नैनागिरि को संघ चला था , नगर पथरिया में आया |
गुरु विराग की जन्म भूमि को ,सबने था शीष झुकाया ||
लाल पथरिया का करता है, तीन दिवस रह जयकारा |
आगे बढ़ते नैनागिरि को , नगर जतारा ध्रुवतारा ||३४३
दलपतपुर से पूर्व दिशा में , दस कोसों की है दूरी |
नैनागिरि नयनों को देता , शीतलता मन से पूरी ||
सिद्ध क्षेत्र तालाब किनारे , ऊपर पर्वत मनुहारा |
नैसर्गिक सुषमा को देखे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४४
सिद्ध क्षेत्र पर बासठ मंदिर , है पारसनाथ सहारे |
समोशरण जल मंदिर दोनों , सुंदर तालाब किनारे ||
पांच साधु वरदत्त सहित है ,मोक्ष गए तप के द्वारा |
करें नमन इतिहास समझकर,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४५
वर्ष बत्तीस सौ सालो का , है यह इतिहास पुराना |
शैल चित्र से एक शिला पर , वर्णन भी लगे सुहाना ||
महावीर के अभिषेकों पर , दिव्य ध्वनि का आकारा |
यहाँ देखते अतिशय पूरा ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४६
नैनागिरि से संघ चला था , आया था नगर घुवारा |
सिद्धों का आराधन अनुपम ,सृजन हुआ था प्यारा ||
बड़ागांव भी निकट नगर है , वहाँ लगा भी जयकारा |
गुरुवर का थे साथ निभाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४७
सिद्धों का आराधन करना , जीवन में है सुखकारी |
जिसको पाना ध्येय सभी का , रहता सबका मनुहारी |
नगर घुवारा बड़ागाँव भी , बहे अर्चना की धारा |
गुरु विराग की छाया में हैं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४८
बड़ागाँव से चले पपौरा , जिन मंदिर है सुखकारी |
आठ एक सौ यहाँ जिनालय , समतल भू पर मनुहारी ||
आदिनाथ का मंदिर अनुपम , चौवीसी का जयकारा |
तेरह नम्बर अतिशय समझें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३४९
एक कुवाँ की अनुपम सुनते , पूरी है यहाँ कहानी |
मनचाहा बर्तन देता था , जो भी आता था प्रानी ||
पर खोटे मन के श्रावक से , बंद हुआ यह व्यापारा |
पार्श्व प्रभू की लखते प्रतिमा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३५०
तपो मूर्ति सन्मति सागर जब , क्षेत्र करगुवाँ जी आए |
मिलन विराग सिंधु से चाहा, योग बने तब सुखदाए ||
बीस दिनों तक संघ निरंतर , करता है खूब विहारा |
दादा गुरु के दर्शन करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||351
पचपन पिच्छी क्षेत्र करगुवाँ , अनुपम साधू यह मेला |
त्रयी मिले आचार्य यहाँ पर , सभी साधुओं का रेला ||
आदिसागर अंकलीकर की , तिथी समाधि जयकारा |
श्रृद्धा से नत मस्तक दिखते , नगर जतारा ध्रुवतारा || ३५२
अंतराल सौलह सालों का , अपने गुरुवर आराधें |
गुरु विराग जी बोल रहे थे , जुड़ी बहुत सी जो यादें ||
सभी भाव से सुनते जाते , गुरु दादा करें निहारा |
सन्मति सागर की जय बोले , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३५३
गुरू शिष्य के रिश्ते पावन, गुरुवर जो कुछ है बोते |
बीज खरा जब पैदा होता , गर्वित गुरुवर भी होते ||
सन्मति सागर प्रमुदित होते , करते हैं हर्ष अपारा |
दृश्य देखते भाव विहृल यह, नगर जतारा ध्रुवतारा ||३५४
गुरु विराग के शिष्य सदा ही, सब गुरुवर को मानें |
नत मस्तक हो उनके सम्मुख , पा आशीषों के दानें ||
सन्मति सागर गुरु यहाँ पर , मन से सबने स्वीकारा |
दृश्य बड़े रोमांचित लखते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३५५
गुरू भक्ति में स्वर लय देखे , तभी सभा में स्वीकारा |
शिष्य आपके प्रतिभाशाली , उच्चारण शुद्ध निहारा ||
गुरु विराग तब विनय करें यह , कृपा आपकी रस धारा |
उसमें ही स्नान कराता , जो भी मिलते ध्रुव तारा ||३५६
तीजे दिन सन्मति सागर ने , गुरु विराग से है बोला |
शुभारंभ वाचन कुछ करिए , ग्रंथ अनूठा है खोला ||
गुरु की आज्ञा शिरोधार्य तब ,करके प्रवचन सुखकारा |
यहाँ आनंद था मनुहारी , समझ रहे थे ध्रुव तारा ||३५७
शिष्य गुरू को -गुरू शिष्य को , बतलाता अद्भुत ज्ञानी |
समझो दोनों लिखे सदा ही , बिल्कुल से नई कहानी ||
महासिंधु दो सागर मिलकर, है पावन आज नजारा |
और जलज बन साधुू मिलते ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||३५८
गुरू वात्सल्य सुधा कलश है , नेक पुंज शशि धर होते |
अनुशासन प्रतिमान जानिए , सदाचरण ही उर बोते ||
ब्रम्हा विष्णु महेश मानिए , गुरु जीवन के आधारा |
गुरू शिष्य का मिलन देखते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||३५९
गुरू शिष्य का मिलन पूर्ण था, अब निज पथ की तैयारी |
टीकमगढ़ को लोट चले थे , जहाँ वाचना सुखकारी ||
वर्ष सन्तानवें ग्रीष्म ऋतू , तपता भू मंडल सारा |
आगे देते कठिन परीक्षा, नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६०
टीकमगढ़ में ग्रीष्म ऋतु थी, सूर्य प्रखरता दिखलाता |
अंतराय का कर्म उदय भी, श्री विमर्श को झुलसाता ||
लगातार थे अंतराय जब , सूख गया था तन सारा |
पर दृड़ता में भीष्म दिखे हैं , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३६१
अंतराय का कर्मोदय भी , मुनि चर्या में जब आता |
कठिन परीक्षा लेने को वह , कड़ा परीक्षक बन जाता ||
अंतराय का रूप जानिए , होता तपता -सा पारा |
जिसे सहन करते समता से , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६२
अंतराय यदि चले निरंतर , कठिन परीक्षा आ जाती |
जलती ज्वाला-सा तन रहता ,एक बूँद नहिं मिल पाती ||
नहीं साधना शिथिल यहाँ पर , करते पूरा जयकारा |
इसी दौर से गुजर रहे थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६३
अंतराय भी चले निरंतर , कर्मोदय कैसा आया |
अंतराय महराज कहें जन,नया नाम था यह पाया ||
दृश्य यही रोमांचित करते , देखे टीकमगढ़ सारा |
चर्चा पूरी पावन रखते , नगर जतारा ध्रुव सारा ||३६४
पार्श्वनाथ टीकमगढ़ मंदिर , मन से जिसको आराधू |
अंतराय निर्वाह यहाँ अब , करता जाता नव साधू ||
तन की दुर्बलता दिखती है , पर मन से कभी न हारा |
सभी कहें यह योगीश्वर है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६५
ग्रंथों का पावन वाचन है ,और समय था बलशाली |
अंतराय का चला हथौड़ा , परखे ऐलक की पाली ||
संयम से करते आराधन , मन में था नहींं विकारा |
समय सार में ध्यान लगाते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||३६६
गुरु विराग ने नजर उठाकर, जब कृश काया को देखा |
ब्रम्हचारी अहार कराने , साथ भेजने तब लेखा ||
किरण अंजना दो बहिने भी , करती शोधन उपचारा |
अंतराय का खेल देखते , नगर जतारा ध्रुव . तारा ||३६७
पाठ प्रतिष्ठाचार्य हमारे , गौरव टीकमगढ़ जाने |
जय निशांत जी जाने लगते, तब सँग आहार कराने ||
अंतराय का नहीं भरोसा , कब कर ले पैर पसारा |
रूठा है वह ऐलक जी से , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६८
है सुरेन्द्र जी पठा यहाँ पर , वी पी है कितना नीचें |
कैसा परिषह सह लेते हैं , दुर्वलता तन को खींचे ||
संकट का कंटक कट जाए , सब करते है उपचारा |
पर समता से विपदा काटें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३६९
अंतराय जब इसके पहले, कटनी में भी थे आए |
नए -नए महराज बने थे , पर पूरी तरह निभाए ||
पर टीकमगढ़ में लगातार , ग्रीष्म काल की है धारा |
सभी संहनन सहते जाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७०
अंतराय ने कटनी से ही , किया निरंतर है पीछा |
टीकमगढ़ में तीव्र उदय था , विमर्श श्री पर था रीझा ||
पर अंतराय भी शांत हुआ, योगी चरणों में हारा |
वह योगी कहलाता जग में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७१
जहाँ मिले विज्ञान समापन, धर्म वही से शुरु होता |
सदा जीतते संयम रामा , परिषह रावण है रोता ||
अंतराय ने पीछा छोड़ा , होता तन को सुखकारा |
संयम की सब जय करते है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७२
कहे सुरेन्द्र पठा जी हँसकर , विज्ञान गया है हारा |
जीता संयम यहाँ आपका , स्वीकारो नमन हमारा ||
जिन शासन जयवंत किया है, मै करता हूँ जयकारा |
गुरुवर महिमा ऐलक कहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७३
चला संघ जब टीकमगढ़ से , तब धर्म सभा थी भारी |
गुरुवर कहते यहाँ बोलिए , आज तुम्हारी है बारी ||
प्रवचन करते गुरुवर पर ही, दिखे समर्पण की धारा |
ध्यानाकर्षण सबका करते,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७४
गुरु विराग जी तब कहते हैं, बढ़िया तुमने है बोला |
जो भी तुमने भाव रखे हैं , शब्द- शब्द को है तोला ||
अब जिनवाणी सम्बल देगी , जिन शासन बने सहारा |
शुभाशीष गुरुवर का पाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७५
मग में पग साधू के रहते , कब बंधन वह स्वीकारें |
चरण जहाँ पर पड़ जाते हैं , बहें आचरण की धारें ||
टीकमगढ़ को धन्य किया था ,अब आगे किया विहारा |
गुरु पथ अनुगामी रहते हैं नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७६
मिला दिगौड़ा ग्राम बम्हौरी , पृथ्वीपुर में जब आए |
चौमासे की विनय करें सब , श्रीफल भी बहुत चढ़ाए ||
लक्ष्य बना था आगे जाना , सो छूकर चले किनारा |
नगर ओरछा झांसी देखें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७७
दतिया सोनागिर में दर्शन , श्री चंदा प्रभु स्वामी |
सत्रह फिट खड़गासन प्रतिमा ,जिन प्रभुवर अंतरयामी ||
साड़े पाँच करोण जानिए , मुनिराजों की तप धारा |
नंग अनंग प्रमुख द्वय जाने , नगर जतारा ध्रुवतारा ||३७८
समोशरण सत्रह बार यहाँ , चंद्रा प्रभु जी का आया |
सुन देशना नंग अनंग ने , मुनि मार्ग को अपनाया ||
समोशरण विराग सागर का ,आज यहां है सुखकारा |
नंग अनंग सी भक्ति करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३७९
आठ एक सौ श्री जिनमंदिर , सब लगते है मनुहारी |
सन्तावन नम्वर चंद्रप्रभू , है नायक अतिशय कारी ||
तेतालीस फीट है लम्बा , जिसे मान है स्वीकारा |
जिसकी करते सुखद परिक्रमा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८०
श्रमणगिरी प्राचीन नाम था , अब सोनागिर कहलाता |
दो पर्वत उन्नत जुडे हुए है , बत्तीस एकड़ में आता ||
ईशा पूरव त्रयी शताब्दी , मिलता गिर का आधारा |
सुवर्णगिरि भी इसको जाने , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३८१
महाराज असिंजय यहाँ हुए ,एक प्रतापी थे राजा |
नंग अनंग पुत्र थे जिनके ,आतम हित के ही काजा ||
मुनि बन जाते समराट दत्त , तज उज्जैनी दरवारा |
दो हजार राजा भी जाने , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८२
चले भिंड को सोनागिर से , नगर शहर थे बहुतेरे |
चौमासा करना स्थापित है , स्पष्ट हुए थे अब घेरे ||
वर्ष संतावने सुखद यहाँ , लगा भिंड में जयकारा |
सदर बाजार के मंदिर में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८३
स्वास्थ्य नहीं अनुकूल रहा था , दुर्बल दिखती थी काया |
पर समता से सम्बल पाते , गुरुवर की रहती छाया ||
दुर्बल काया को रचना थी, कालजयी कविता धारा |
बीज हुए थे जिसके रोपड़ ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||३८४
कविता भी रहती उस दिल में , जो मन के भावुक होते |
पर पीड़ा निज पीड़ा समझें , या समझें पीड़ा के गोते ||
मन सुंदर अंदर से जिनका , या करुँणा की हो धारा |
भाव सरस हो ऐसे जैसे ,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८५
प्रथम गान करुँणा से निकला , बतलाते हमको ज्ञानी |
वाल्मीकी का मिला उदाहरण, कविता जग ने पहचानी ||
कविता उसकी उतनी सुंदर , जितनी अंदर रस धारा |
थाह उसी की अनुपम रखते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८६
कविता विकसित जिसके अंदर , वह कुछ न्यारा होता |
बात प्रभावी कह देता वह , मन जग जाता जो सोता ||
कविता का गुण बहुआयामी , अंत अमरता की धारा |
ईश्वर वाणी कविता कहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८७
एक नई कविता का उदयन , रचा समय ने आधारा |
कालजयी बनना है जिसको , होना है उसका विस्तारा ||
उपादेय भी तत्पर दिखते , उपादान के अब द्वारा |
प्रसव काल को पूरा करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३८८
तन दुर्बल था फिर भी गुरुवर , अपने सँग में ले जाते |
प्रातकाल की चर्या करने , हाथ थाम कर चल पाते ||
प्रसव किया कविता ने उर से , निकली होंठों से धारा |
जीवन है पानी की बूँदें , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३८९
प्रथम पंक्ति का प्रसव हुआ था , दूजी थी अब तक मोनी |
गीत पटल का गूँज उठा तब , होती होनी अनहोनी ||
प्रसव पूर्ण था कविता का अब , आगे का था विस्तारा |
जिसको अब तक करें पल्लवित, नगर जतारा ध्रुवतारा ||३९०
कालजयी कविता को जाकर , गुरुवर को तभी सुनाया |
मिला आशीष गुरु का पूरा , मन भी था अति हरषाया ||
बनी अमर कृति दिखे घरा पर, सबने इसको स्वीकारा |
मोवाइल रिंगटोंनों तक है, नगर जतारा घ्रुव तारा ||३९१
जीवन है पानी की बूँदें , कब बनती कब मिट जाती |
हर होनी अनहोनी पर यह , सम्बल देने को आती ||
चिंतन इस रचना पर करते , मिलता है बहुत सहारा |
युगों-युगों को देते कविता , नगर जतारा घ्रुव तारा ||३९२
सब कुछ है इस रचना में , रहा न कुछ भी है बाकी |
जीवन का दर्शन चिंतन है,आगम की दिखती झांकी ||
हर पथ पर भी मिले चेतना , सार भरा है सब न्यारा |
जीवन की परिभाषा लिखते, नगर जतारा घ्रुव तारा ||३९३
कड़वाँ भी मीठा लिखते है , सत्य सभी को बतलाते |
छंद गीत के गुनकर देखो , सार सभी है समझाते ||
लिखें हकीकत कहते सबसे,मत करना इसे किनारा |
महाकाव्य को लिखते जाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३९४
जिसको निज का घ्यान नहीं है,निज स्वरुप नहीं पहचाना
भटक रहे वह भव जंगल में , हाथ नहीं है कुछ पाना |
महाकाव्य में लिखकर गुरुवर , करते है बहुत इशारा |
अब विमर्श की वाणी निर्झर,नगर जतारा ध्रुवतारा ||३९५
धर्म हृदय में जब आता है , मन निश्छलता को पाता |
सुख मिलता दुख गलता पूरा,सच्चा पथ भी दिख जाता ||
धर्म सदा हितकारी जग में , सब पर करता उपकारा |
वचन कहें यह विमर्श श्री जी,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३९६
महाकाव्य में ज्ञान गंग अब , दिन प्रतिदिन बढ़ती जाए |
सप्त महासागर छंदों का , जन मानस में लहराए ||
हर छंदों में सम्यक दर्शन , दिखे ज्ञान का भंडारा |
जीवन पानी की बूँदे कहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||३९७
भजन प्रभू का सुखकारी है , शरण गुरू की बलशाली |
गुरु गिरवर से ऊँचें होते, नव प्रभात- सी दें लाली ||
जो खाली होकर आता है , ज्ञान गंग भरते धारा |
यही भाव तो लिखें काव्य में, नगर जतारा ध्रुवतारा ||३९८
कह सुभाष यह विनती मेरी , बूँद लिखा है जो पानी |
उसका वर्णन कर देना भी , नहीं यहाँ है आसानी ||
बस अभिनंदन वंदन चंदन , स्वीकारो नमन हमारा |
आगे बढ़कर लिखता हूँ मैं,नगर जतारा ध्रुव तारा ||३९९
गुरु विमर्श की गौरव गाथा , अब आगे को ले जाता |
शब्द नहीं सामर्थ्य नहीं है , साहस ही यहाँ जुटाता ||
हर चर्या पर चिंतन करता , हर घटना करूँ निहारा |
हे गुरुवर आशीष हमें दो , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४००
श्रावक शिक्षण शिविर लगा था , पर्यूषण की थी बेला |
प्रश्न पत्र तैयार शिविर का , खुद का रत्नात्रय तेला ||
निरंतराय पारणा होती , विमल जैन के घर द्वारा |
रजत छत्र आहार दान में , चढ़ते देखें ध्रुव तारा ||४०१
आचार्य दिवस पद आरोहण, गुरु विराग का जब आया |
आठ नवम्बर संतावन को ,सबने था सुखद मनाया ||
श्री विमर्श संचालन करते, श्रृद्धा की अविरल धारा |
पिच्छी परिवर्तन भी करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४०२
यहाँ भगवती आगे आती , गृहस्थ अवस्था की माता |
पिता सनत भी साथ रहे थे , बैनी दादी का नाता ||
सबने व्रत अंगीकार किए , खूब लगे थे जयकारा |
शुभा शीष अब सबको देते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४०३
संघ गमन की थी तैयारी , श्री धर्मचंद जी आए |
कृष काया के भाव समाधी , गुरु चरणों में बतलाए ||
गुरुवर ने भी दीक्षा देकर , विग्रह सागर उच्चारा |
अब उनको क्षुल्लक जी कहते,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४०४
दशम जनवरी अन्ठावन को , जब मिलती है मुनि दीक्षा |
दो घंटे के अंतराल में , हो जाती पूर्ण परीक्षा ||
देह त्यागकर विग्रह जी ने , जीवन को लिया सँवारा |
क्षपक साधू की सेवा करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४०५
चले इटावा सिरसा गंजी , पुन: भिंड था बड़भागी |
अन्ठावन का चौमासा भी , बन जाता गुरु अनुरागी ||
यहाँ धर्म की सदा पताका , करती रहती जयकारा |
गुरुवर के अनुगामी रहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४०६
चौमासे के बाद चले थे , आया था ग्राम बरासो |
गुरु विराग से विनती करते ,अब गुरुवर मुझें तरासो ||
मुनि मुद्रा के लायक समझें, तब चाहूँ मैं उपकारा |
कुछ दिन रुकिए उत्तर सुनते,नगर जतारा ध्रुव तारा ||४०७
हुआ दिसम्बर चौदह घोषित , तेरह मुनि की दीक्षाएं |
अब तक गुरुवर परख चुके थे, प्रदत्त सभी ही शिक्षाएं ||
पात्र सभी थे मुनि बनने को, सबको गुरु ने स्वीकारा |
समाचार सुन हर्षित होते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||४०८
जैन बंधु जैनेतर जुटते , करते पूरी तैयारी |
ग्राम बरासो प्रभुता आई , हर्षित थे सब नर नारी ||
केवट के दरवाजे पर थे , अब श्रीराम से अवतारा |
ग्राम वरासो की नौका पर , गुरुवर के सँग ध्रुव तारा ||४०९
शीत ऋतू भी हर्षित दिखती, कहती कष्ट नहीं दूँगी |
जो भी श्रावक आएगें अब , शीत सभी की हर लूँगी ||
पर्ण पुष्प हर मग के कहते , स्वागत का करूँ इशारा |
धन्य धरा खुद को कहती है , होगें मुनिवर ध्रुव तारा ||४१०
श्री विमर्श को जबसे मिलता, समाचार यह सुखदाई |
भावी मुनि मन में आ बैठे, चिंतन पड़ता दिखलाई ||
वेश दिगम्बर धारण करके , बेड़ा होगा मम पारा |
मुक्ति मार्ग केे सही पथिक अब,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४११
दिवस दीक्षा अनुपम बेला , जुटे खूब. है नर नारी |
संचालन नीरज जी सतना , करते जाते मनुहारी ||
अपलक आंखे जन-जन की अब , करती है मंच निहारा |
मंद-मंद मुस्काते दिखते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४१२
सिद्ध शिला के आकांक्षी है , गुरुवर तेरह अब राही |
इनको मुनिपद दीक्षा दीजे, परख लिए सब गुण ग्राही |
नीरज जैन कहे फिर सबसे, स्वंय विनय की लो धारा ||
उठकर गुरु का बंदन करते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४१३
भेष. दिगम्बर अर्जन करना , सदा पुण्य को है भाता |
भेष विसर्जन संसारी सब ,यह क्षण पावनता लाता ||
करो दिगम्वर मुझकों गुरुवर ,अब मैं हूँ दास तुम्हारा |
अवलम्वन अब शिष्य चाहता , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४१४
सभी कहे गुरुदेव हमारी , मानव पर्याय सुधारो |
जिनदीक्षा मुनिवर की देकर, हमें यहाँ अब स्वीकारो ||
हाथ जोड़कर सभी खड़े थे , सबने यह दृश्य निहारा |
याचक सब दीक्षार्थी ज्ञानी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४१५
गुरु विराग ने हँसकर देखा,,जब अँगुली की थी छोटी |
संकेत समझकर तब सबने, खोली थी बँधी लँगोटी ||
दृश्य बड़े भावुक लगते थे , लगातार थे जयकारा |
तभी लँगोटी खोल चुके थे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४१६
एक लँगोटी कितना परिषह , तब इसको था जाना |
उच्च कोटि के साधक का ही , रुप यहाँ पर है माना ||
खुली लँगोटी भेष दिगम्वर , वीतरागिता जय कारा ||
यहाँ संस्कार तब गुरु करते ,नगर जतारा घ्रुव तारा ||४१७
मोक्ष मार्ग में एक लँगोटी , बनती देखी है बाधा |
खोल लँगोटी मुनि बने है , जिसने संयम को साधा ||
नहीं परिग्रही किसी बस्तु से ,सबसे ही करें किनारा |
मुनिचर्चा से मोक्ष पथिक अब,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४१८
वीतरागिता पाने को ही , खुलती है बँधी लँगोटी |
भेष दिगम्वर ही दिखलाए, साधक को उत्तम चोटी ||
सार समझकर गुरु चरणों से , करते अपना उद्धारा |
नाम यथावत ही रहता है, नगर जतारा ध्रुव तारा ||४१९
कांटो में भी जीवन तेरा , फूलों सा खिल पाएगा |
खोज रहा है जिसको तू वह , पल भर में मिल जाएगा ||
यह दो पंक्ति विमर्श सिंधु की , करती हैं बहुत इशारा |
भेष दिगम्बर धारण है अब , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४२०
हुआ समापन मंच मानिए , पर उद्घाटन कवि देखे |
मुनि पद मनहर अब आगे को,निज अंतरमन में लेखे ||
मुक्ति मार्ग अब उद्घाटित है , हुआ समापन संसारा |
आतम का कल्याण करेंगें, नगर जतारा ध्रुव तारा ||४२१
कुछ दिन बीते चली साधना , नए साल की है बेला |
श्रमण और श्रावक का दिखता , ग्राम बरासों में मेला ||
पद विहार अब होना आगे , सभी लगाते जयकारा |
मुद्रा विमर्श सिंधु की मुनि है ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४२२
पुर पुट्टन वरनेर वरासों, मंदिर है अतिशय कारी |
वीर प्रभू की रहती हरदम , कृपा यहाँ पर सुखकारी ||
मान स्तम्भ भी भव्य शुचि है , नदी वेसली की धारा |
बना देवकृत मंदिर जानें , नगर जतारा घ्रुव तारा ||४२३
समोशरण महावीर प्रभु का , ग्राम बरासों था आया |
सदी ग्यारवीं की प्रतिमा है , मंदिर देवाकृत पाया ||
किलेनुमा सी ऊँचाई भी , मंदिर अनुपम है न्यारा |
दर्शन कर आनंदित होते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४२४
चम्बल का बीहड़ कहलाता, पर जब गुरुवर थे आए |
तब डाकू भी भेष बदलकर , दर्शन करने को धाए ||
लूटपाट सब बंद हुई थी , हुआ कार्यक्रम सुखकारा |
ऐलक से मुनि बन जाते है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४२५
भिंड चला था संघ सुहाना , सिंंहनिया जी में आया |
पुष्पदंत आचार्य प्रवर ने, संत समागम था चाहा ||
मिलन भिंड में होता है तब,था अद्भुत सुखद नजारा |
पुष्पदंत के दर्शन करते , नगर जतारा घ्रुव तारा ||४२६
दो मिलते आचार्य यहाँ पर , बलदाऊ -कृष्णा साया |
इक दूजे का आदर करते , उमण भ्रातृत्व था आया ||
महामिलन से प्रमुदित लगती, ज्ञानगंग की शुभ धारा |
इस धारा से बहुत सीखते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४२७
होती है यहाँ काव्य गोष्ठी , मुनि विमर्श स्वर में गाते |
पुष्पदंत जी मुक्त कंठ से , श्रेष्ठ यहाँ पर बतलाते ||
गुरु विराग से कहते जाते हमने भी सही निहारा |
अद्भुत है यह शिष्य आपका , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४२८
चाहत रखते इस्तम्भ कीर्ति, भिंड नगर के सब वासी |
वर्ष निन्यानवें चौमासा , पुन: सभी थे अभिलाषी ||
हुई कामना पूरण सबकी , गुरुवर का हुआ इशारा |
भिंड नगर चौमासा करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४२९
पांचो कल्याणक हुए भिंड में , संघ करगुवाँ जी आया |
आयोजित भी कल्याणक था ,यहाँ उत्साह भी छाया ||
पग- पग पर थी धर्म पताका,कंठ -कंठ पर जयकारा |
गुरुवर का थे साथ निभाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३०
एक कहावत बहुत पुरानी , लिया पिता ने पहचाना |
विलग पुत्र को करके कहते, परिभाषित करो जमाना ||
निमित्त उपादान भी बनते , कारण कारज भी सारा |
केंद्र बिंदु अब विमर्श श्री है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३१
यहाँ समय भी अड़ा खड़ा था ,अब नव इतिहास बनाना |
चरण छोड़कर पकड़ आचरण , विमर्श श्री को ले जाना ||
पग पीछे मत दोड़ो कहता , पद चिन्हों की लो धारा |
हटकर कुछ तो अब दिखलाओ,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४३२
साथ गुरु के अब तक रहते , पर आगे खुद ही जाना |
यही समय ने भेद लिखा था , खुद आगे राह बनाना ||
कारण पैदा हो जाते है, जिसे मानता जग सारा |
स्वीकारा तब करते मुनिवर , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४३३
कारण कारक कर्ता मिलते , उपादेय हैं उपकारी |
उपादान भी आगे बनता , धारक को भी सुखकारी ||
गंगा भी नवगंगा देने , छोड़ रही थी शुचि धारा |
इस धारा को धारण करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३४
अंतराय भी तप बनकर अब , परख चुका था यह सोना |
चोखा निकला था यह कुंदन ,नहीं रहा था कुछ खोना ||
लिखी समय ने जो घटनाएं , करे नियति अब विस्तारा |
आलम्वन अब छूटा देखें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३५
चाहत से राहत मुख मोड़े , कहती अब सब कुछ मानो |
आगे का खुद मार्ग खोजना , इतना तो निश्चय जानो ||
अंगुली छोड़ गुरु की चलना , लो गुरुवर नाम सहारा |
तैयार चेतना हो जाती , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३६
शिखर सम्मेद की करुँ बंदना ,विचार बना था आला |
तब गर्मी उल्टी अंतराय ने , खेला था खेल निराला ||
कारण बनकर प्रकट हुए थे , तब गुरुवर करें निहारा |
उपसंघ बनाते विमर्श श्री का,नगर जतारा घ्रुव तारा ||४३७
विमद विशद विमर्शसागर के , उपसंंघों की तैयारी |
विश्वपूज को विमर्श श्री से , जोड़े गुरुवर सुखकारी ||
छब्बीस मार्च दो हजार है , तब गुरुवर करें इशारा |
चलते हम अब तुम्हें छोड़कर, नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३८
गुरू चरण में शीष झुकाते , बोल न मुख से थे फूटें |
नैन सोचते गीले होकर, गुरू चरण हैं क्यों रूठें ||
हाथ फेरकर गुरुवर कहते ,करो धर्म का जयकारा |
सदा रहे आशीष हमारा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४३९
यह क्षण कितना भाव भरा है , गुरुवर सबको समझाते |
पथ अपना सब शुचिमय रखना , आशीषों को बरसाते ||
सदा धर्म की शरण राखना , शुभ है आशीष हमारा |
संयम पथ पर तुमको चलना , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४४०
जब गुरुवर को गए छोड़ने , गुरु ने आगे पग मोड़ा |
लगता था तब ऐसे जैसे , खुद को आए हों छोड़ा ||
प्राण विहीनी यहाँ चेतना , कांप रहा था तन सारा |
गुरु दर्शन बिन मन था व्याकुल , नगर जतारा ध्रुवतारा ||४४१
यही नियति ने लिखा पढ़ा था, और समय की थी लीला |
मार्ग खोजना और बनाना , बंजर करना था गीला ||
एक दिव्य को भव्य मार्ग का , करना था अब शृंगारा |
एक नई गंगा बहनी थी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४२
समय देखता विमर्श श्री को , कहता है यह नव धारा |
सृजन बोलता आगे देखो , इस सूरज का उजियारा ||
धरती पर इतिहास रचेगा , निज पग चिन्हों के द्वारा |
मान बढाए अपने गुरु का , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४३
विगत पूँछता वर्तमान से , क्या कारण यहाँ बनाए |
वर्तमान चुप रह जाता है , खड़ा भविष्य मुस्काए ||
बहुत हुई अनहोनी तन पर ,अब होनी का जयकारा |
अंतराय भी नमन करे अब, नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४४
सृष्टि दृष्टि है भव्य जीव पर, सृजन यहाँ पर हरषाता |
यहाँ साधना साधक की लख,फल भी मन में मुस्काता ||
गुरु विराग के श्री विमर्श जी ,दर्श दिखाते तप धारा |
मोक्षमहल तक सागर विस्तृत,नगर जतारा ध्रुवतारा ||४४५
क्या होनी क्या अनहोनी है , यह साधक नहीं विचारें |
करें धर्म से कर्म हमेशा , सदा साधना विस्तारें ||
अब खुद के निर्णय खुद लेना , चलना बिना सहारा |
गुरू नाम आधार रहेगा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४६
उदित हुआ था सूरज नभ में , बस इतना ही अब जानो |
ज्ञान किरण का उजियारा था , अब प्रातकाल ही मानो ||
प्रखर रश्मियां फैलेगीं जब ,जग जानेगा हितकारा |
यथा नाम से गुण को देगें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४७
क्षेत्र करगुवाँ से श्रावक गण , मुनिवर को लाए झांसी |
शौर्य पराक्रम धर्म ध्वजा में , बुन्देलखण्ड की काशी |
बड़ा बाजार का जिन मंदिर , मुनि विमद का सँग प्यारा |
मार्च उन्तीस दो हजार हैं, नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४८
मंदिर जी में धर्म सभा थी , नहीं गुरू का था साया |
यहाँ बोलना बिना गुरू के ,अवसर प्रथमा था आया ||
उच्चासन पर बैठे मुनिवर , नाम गुरू का उच्चारा |
आगम गंगा करें प्रवाहित , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४४९
सुनने बाले कहते अनुपम , चकित सभी थे नर नारी |
तथ्यों का विश्लेषण करते , जिनगंगा थी मनुहारी ||
ज्ञानार्जन का दर्शन देखा , और सुना जन ने सारा |
सभी कहें यह मुनिवर ज्ञानी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||४५०
विशद साथ थे गमन किया जब, नगर वबीना था आगे |
पवा क्षेत्र भी निकट रहा था , जुड़ते दर्शन के धागे ||
दो हजार अप्रैल महीना , पवा क्षेत्र पर जयकारा |
सेठ जिनेश्वर से पड़गाहन , नगर जतारा ध्रुव तारा ||451
पुण्य तालबेहट का आया , जब उसने ताल मिलाई |
मुनि संघो की अगवानी में , तिथी पंचमी सुखदाई ||
तालबेहट से विशद मुनि जी , करते है पृथक विहारा |
मुनि विमर्श जी रुक जाते हैं, नगर जतारा ध्रुवतारा ||452
महावीर जयंती निकट है , धूमधाम से तैयारी |
सम्यग्ज्ञान शिविर शिक्षण का, स्थापन है तब सुखकारी ||
युवा वर्ग ने बढ चढकर ही , भाग लिया था सुखकारा |
सम्यक दर्शन पाठ सिखाते , नगर जतारा ध्रुवतारा ||453
सम्यक दर्शन क्या कहलाता ,मुनि विमर्श जब बतलाते |
मंत्रमुग्ध सब सुने ध्यान से , चकित ज्ञान पर रह जाते ||
स्वयं उदाहरण विमर्श मुनि जी , लोगो ने यह स्वीकारा |
सम्यक दर्शन प्रतिमूरत है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||454
युवा संत की तपचर्या से , सभी प्रभावित नर नारी |
युवा वर्ग भी सभी जुड़ा था , दिखते सब आज्ञाकारी ||
नियम शिविर में लेते है सब , देते मुनिवर व्रत धारा |
जैनागम का पाठ सिखाते, नगर जतारा ध्रुवतारा ||455
निशि भोजन है त्याग सभी का, जिनदर्शन का व्रत लेते |
ध्रूम्रपान निशि भोजन त्यागें , चमड़ा त्याग सभी देते ||
भक्तामर का पाठ करेगें , दस नियमों की है धारा |
सभी करें स्वीकार सामने , व्रत देते है ध्रुव तारा ||456
तीर्थ क्षेत्र सेरोंन बंदना , मुनिवर ने भाव बनाए |
आगे चलते मुनिवर जी है , ग्राम जखौरा में आए ||
होती है सेरोंन बंदना , पुन: जखौरा जयकारा |
दिवस पंचमी श्रुति का देखे, नगर जतारा घ्रुव तारा ||457
षटखंडागम की रचना पूरण , दिवस यहाँ पर सुखकारी |
पुष्पदंत जी भूतबली को , नमन करें सब नर नारी ||
जेठ सुदी में तिथी पंचमी , जिनवाणी की है धारा |
और इसी पर प्रवचन करते, नगर जतारा ध्रुव तारा ||458
सिद्ध चक्र का तालबेहट में , आयोजन था सुखकारी |
श्रावक आकर करें निवेदन , चलिए मुनिवर हितकारी ||
आठ जून से सत्रह तक में , दो हजार सन् जयकारा |
सिद्ध चक्र में प्रवचन सुंदर, नगर जतारा ध्रुव तारा ||459
छब्बीस जून पुन: जखौरा , मुनिवर जी थे फिर आए |
सत्ताइसवां जन्म दिवस पा , ग्राम जखौरा मुस्काए ||
कदम बानपुर ले जाते है , फिर महरौनी जयकारा |
माने चातुर्मास निवेदन , नगर जतारा ध्रुव तारा || 460
प्रमुदित थी मुनिवर को पाकर,धन्य-धन्य थी महरौनी |
चातुर मास रहा था अनुपम , थी नगरी बनी सलौनी ||
नगर जतारा पास रहा था, आकर करते जयकारा |
सभी बोलते यह है मेरे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||461
यहाँ धर्म की गंगा बहती , अविरल बहती थी जाती |
सम्यक दर्शन जन जन को , वाणी मुनि की बतलाती ||
दिन में शादी दिन में भोजन , यहाँ लगा था नारा |
सूत्रधार थे इसके गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा || 462
चौमासा का निष्ठापन कर , आते है नगर घुवारा |
सिद्ध चक्र का आराधन कर , राह शाहगढ़ जयकारा ||
आए बंडा फिर सागर में , चातुरमास. हुआ न्यारा |
दो हजार सन् एक रहा है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||463
इसी तरह क्रम चलते रहते , आगे भी बढ़ते जाते |
मिलें राह में जो गुण ग्राही , सम्यक. दर्शन बतलाते |
चतुरमास भी कई हुए थे , और विधानों की धारा |
गजरथ भी सानिध्य दिए , नगर जतारा ध्रुव तारा ||464
दो हजार सन् पाँच रहा है , गुरु विराग घोषित वाणी |
मुनि विमर्श आचार्य बनेगें , सुनते है यह सब प्राणी ||
गुरु मिलने पर आज्ञा माने , मुनि विमर्श जी स्वीकारा |
दो हजार सन् दस आ पहुँचा,नगर जतारा ध्रुव तारा ||465
लोहारिया पंच कल्याणक , गुरु विराग जी आएं |
मुनि विमर्श को आज्ञा भेजी , अपने पास बुलाएं ||
शिरोधार्य तब आज्ञा करते , चलते पथ गुरु अनुसारा |
दो हजार सन् दस रहता है,नगर जतारा ध्रुव तारा ||465
आठ दिसम्बर का शुभ दिन था , मिलन गुरु से होना है |
रोमांचित था तन अब पूरा , त्रुटि गुरु चरणों में धोना है ||
बड़भागी हूँ गुरु बुलाते , करने फिर से उपकारा |
मुनि विमर्श जी चलते जाते, नगर जतारा ध्रुवतारा || 465
गुरु विराग जी आज्ञा देगें , हम सब पहले सुन लेगें |
विनय भाव से नत मस्तक कर , प्रत्युत्तर हम तब देगें ||
आचार्य बनाकर हमें आप क्यों , डाल रहे हो संसारा |
सदा आपके हम तो है , सुत जैसे ही ध्रुव तारा || 465
यह चिंतन सब करते जाते , संकोच ह्रदय में है आता |
गुरुवर से मैं विनती कैसै , कह पाऊँगा हे दाता ||
मैं कैसे आचार्य बनूगाँ , कौन उठाए यह भारा |
असमंजस मैं चलते रहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||466
गुरुवर की जब मुझ पर छाया , खुद छाया कैसे मानूँ |
करुँ निवेदन कैसे जाकर , बात न करना कुछ जानूँ ||
सरिता जाकर सागर मिलती , मैं सरिता की खुद धारा |
धारा कैसे सागर होगी , प्रश्न सोचते ध्रुव तारा ||467
बना बीज से पौध अभी हूँ , तरुवर कैसे बन जाऊँ |
नहीं योग्यता इतनी आई , गुरु को कैसे बतलाऊँ ||
गुरुवर ने क्या मुझमें देखा , जो देते है अब भारा |
सिकुड़े सिकुड़े से रहते है , नगर जतारा ध्रुव तारा || 468
गुरुवर नभ में दिनकर जैसे , मै छोटा सा तारा |
फिर भी गुरुवर मुझे बुलाते , करने जग में उजयारा ||
आठ दिसम्बर का दिन आया,प्रकट हुआ था जयकारा |
दीपक झुकता रवि चरणें में, नगर जतारा ध्रुव तारा ||469
अपने छोटे दीपक की अब , करता सूरज अगवानी |
गुरु विराग जी लिए हुए थे , आशीषों का शुचि पानी ||
भाव विहृल थे दृश्य वहाँ पर , बही प्रेम की रस धारा |
साष्टांग था गुरू चरण में , नगर जतारा ध्रुव तारा || 470
गुरुवर ने तब अपने कर से , आकर था दिया सहारा |
प्रेम भाव आशीषों का था , वहाँ फैलता उजयारा ||
सूरज की तब करे परिक्रमा , दीपक आकर शुभकारा |
धन्य मिलन है गुरू शिष्य का, नगर जतारा ध्रुवतारा ||471
लिखे कलम सामर्थ्य नहीं है , लिखूँ मिलन यह अब सारा |
इसीलिए इस भावुक पल से , करती है यहाँ किनारा ||
गुरू शिष्य ही जाने यह सब , कलम करे न विस्तारा |
जयजय करती कलम हमारी,नगर जतारा ध्रुवतारा || 472
लोहरिया कल्याणक बनता , आगे चलती जिज्ञासाएं |
जुड़े बाँसवाड़ा के जन है , प्रकट करें सब अभिलाषाएं ||
मुनि विमर्श आचार्यारोहण , है उनके नगर इशारा |
गूँज उठा था तब जयकारा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||472
गुरु विराग से कहे विमर्श जी , क्या है यह अभी जरुरी |
तब विराग जी कहे शिष्य से , बात सुनो तुम यह पूरी ||
हम गुरुजन जब भी जो देवें , करो सदा ही स्वीकारा |
और नहीं कुछ सोचों मन में , नगर जतारा ध्रुवतारा ||473
अब क्या कहते इसके आगे , मुनि विमर्श चुप रह जाते |
गुरु आज्ञा का पालन करने , यहाँ सामने तब आते ||
निकट बुलाकर गुरु विराग ने , सम्बोधी कुछ रस धारा |
विनम्र सिंधु सँग समझें वाणी, नगर जतारा ध्रुवतारा || 474
नहीं आचार्य पद खुद को है , मोक्ष मार्ग पद मुनि मानो |
पर मोक्ष मार्गी जीवों को , राह दिखाता सूरज जानो ||
बनकर सूरज सुदृड़ रहो खुद , करो और पर उपकारा |
कथ्यलघु था तथ्य बड़ा था,समझ गये तब ध्रुवतारा ||475
लगा धर्म का मेला- सा था , श्रावक दोड़े थे आते |
दो हजार सन् माह दिसम्बर , तिथि भी बारह को पाते ||
बनी बाँसवाड़ा की धरती , जैसे हो आज सितारा |
बने आचार्य धर्म सभा में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||476
सभी संस्कार गुरु विराग ने , निज हाथों से थे कीन्हें |
पावन थी आचार्य पिच्छिका , दोनों शिष्यों को दीन्हें ||
देख रहे थे श्रावक सारे , गूँज रहे थे जयकारा |
यहाँ गम्भीर पर हो जाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||477
बहुत कठिन दायित्व निभाना , पर जब गुरु कृपा रहेगी |
सम्यक है जिनवाणी गंगा , शुचि मेरे साथ चलेगी ||
आशीषों का सम्यक पानी , गुरुवर ने है जब ढारा |
अच्छा होगा यही विचारें , नगर जतारा ध्रुव तारा || 478
यहाँ अलौकिक दीक्षा पर अब , कहें जतारा के वासी |
जिसमें शामिल लौकिक शिक्षा ,गुरुवर के गुरु मृदुभाषी ||
रामरतन सर ,श्रीविनोद जी , नंदराम जी उच्चारा |
सर एच एस चौहान बतायें , कैसे थे यह घ्रुव तारा ||479
जो भी सुनता वह ही कहता , है सचमुच प्रतिभा शाली |
गौरव नगर जतारा है यह , दे उपाधि अब यह आली ||
मान करें हम -भाव भरें सब , और लगाते जयकारा |
लाल हमारा , शान हमारा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||480
नगर जतारा गौरव न्यारा , जग में आज सितारा |
गुरु से अब पहचान मिली है , बढ़ता मान हमारा ||
जिनवाणी की गंगा जानों ,हैं "सुभाष"यह शुभ धारा |
सदियों तक यह याद रहेगें , नगर जतारा ध्रुवतारा ||481
सौलह रहा दिसम्बर दस का , खबर समाधि थी आई |
सन्मति सागर छोड़ गए जग , खबर बनी थी दुखदाई ||
गुरु विराग से यहाँ संघ ने , सन्मति जाना हितकारा |
नमन करें तब श्रद्धांजलि में , नगर जतारा ध्रुव तारा ||482
गुरुवर से अब आज्ञा लेकर , कोटा को करें विहारा |
हर पग पर इतिहास बनाते ,बहे ज्ञान की शुचि धारा ||
दो हजार सन ग्यारह जानो , वीर नगर का विस्तारा |
रही जनवरी सोलह आए , नगर जतारा ध्रुव तारा ||483
बूचड़खाना बंद कराया , जन- जन में अलख जगाया |
नव मंदिर में सुंदर कलशा , आरोहण भी करवाया ||
प्रवचन शैली लोग कहे शुभ , बहती अंदर रस धारा |
सम्यक दर्शन बोध कराएं , नगर जतारा ध्रुव तारा ||484
ब्रम्हचारी राजीव सँग में , ग्राम सिघाड़ा के वीरा |
जिला अशोकनगर रहते थे , यहाँ संघ में है हीरा |
चाहें दीक्षा गुरु विमर्श से , कहते कर दो उपकारा |
स्वीकृति देते है तब गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||485
माँ सरोज जी पिता पदम सुत ,थे सागर बनने बाले |
मार्च छब्बीस सन् ग्यारहवीं, हटे मोह के सब ताले ||
कोटा में कब टोटा होता , बढ़े धर्म की जल धारा |
इस धारा को करें प्रवाहित , नगर जतारा ध्रुव तारा ||486
मैं सुभाष भी वहाँ गया था , और साथ थे बहुतेरे |
भरा हुआ मैदान दशहरा , देखे साथी सब मेरे ||
लाखों जन थे वहाँ देखते , महिमा थी अपरम्पारा |
पहली दीक्षा देते गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||487
मैं क्या हाल बताऊँ मित्रों , मेरी आँखों ने जो देखा |
कड़ी परीक्षा लेते गुरुवर, पूछें प्रश्नों को लेखा ||
हर प्रश्नों का उत्तर देते, शिष्य राजीव जी न्यारा |
तब समाज से पूछें गुरुवर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||488
उचित मानते क्या अब इनको ,खुलकर ही सब बतलाओं |
विज्ञ जनों से भी कहते है , अपना अभिमत दिखलाओं ||
सभी बोलते उचित सहीं है , और लगाते जयकारा |
हँसकर कहते गुरुवर अच्छा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||489
चौक लगा था पाटा ऊपर , तब दीक्षार्थी बिठलाया |
पंचमुष्ठिका लोंच हुआ था , शिर से उन्हें हटाया ||
चंदन अक्षत लोंग पुष्प से , न्यास किया था प्यारा |
प्रथम शिष्य का दर्जा देते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||490
ऐलक जी का वेश मिला था ,जब था धोती को खोला |
नाम रखा है क्या गुरुवर नें , उत्सुकता ने मुख बोला ||
सिंधु विचिन्त्य कहलाएगें , गुरुवर ने तब उच्चारा |
लगा जोर का तब जयकारा , नगर ओध्रुव तारा ||491
, जतारा जन्म भूमि की और ,
गया शाम को मैं गुरुवर तट , कहा विनय है अब मेरी |
रुका पड़ें है प्रभू कल्याणक , नगर जतारा की देरी ||
जब पाएं सानिध्य आपका , तभी करेगें जयकारा |
यह समाज संकल्प निवेदित, नगर जतारा ध्रुव तारा ||492
शीष झुकाया कर को जोड़ा, नैन कहें कब आओगे |
तब कहते बुंदेलखंड में , शीघ्र संघ को पाओगे ||
मैं सुभाष तब जान गया था , कैसा था हुआ इशारा |
चरणों की रज देते सबको , नगर जतारा ध्रुव तारा ||493
संघ ललितपुर जब आया था , सबमें जागी थी आशा |
चौमासे की लिख जायेगी, नगर जतारा परिभाषा ||
करे निवेदन नगर जतारा , पर करता भाग्य किनारा |
पथ अशोकनगर चलें गुरुवर,नगर जतारा ध्रुव तारा ||494
यहाँ देखते सब रह जाते , आगे की करते तैयारी |
पर चौमासे के बाद मिली , फिर से सबको लाचारी ||
चले शिवपुरी तब गुरुवर जी, करने को कुछ जयकारा |
हम सब पीछे- गुरुवर आगे , नगर जतारा ध्रुव तारा ||495
रणनीती तब बदली सबने, होगें हम सब अब आगे |
पीछें गुरुवर करके डालें , धर्म राग के शुचि धागे ||
तीव्र भावना से बाँधेगें , भरके मन में उजयारा |
फिर देखेगें कैसे भागें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||496
शिवीपुरी से आगे-पीछे , नगर जतारा लग जाता |
देखा मुड़ते जन्म भूमि पर , मन सबका तब हरषाता ||
गजरथ की अब तैयारी है , सुबह शाम है जयकारा |
शीघ्र जतारा आएं निश्चित , नगर जतारा घ्रुव तारा ||497
सदा गमन में साथ रहे सब ,आठ दिसम्बर दिन आया |
दो हजार सन् ग्यारह जानो , परम स्वाद जो मन पाया ||
आल्हादित थी नगरी सारी , चले धर्म के फब्वारा |
जन्म भूमि पर कदम रखेगें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||498
पंचकल्याणक जतारा और जन्म भूमि में प्रवेश
बैरवार चर्या निर्धारित , बनी तिगैला अगवानी |
टूट गए क्रम निर्धारित सब , बैरवार थी रजधानी ||
अगवानी अब बैरवार से , अविरल चलती है धारा |
उमड़ पड़ा सैलाब देखने , नगर जतारा ध्रुव तारा ||499
राम लौटकर आये जैसे, यह खुशियाँ थी अलबेली |
हरे बृक्ष की पत्ती बनती , पग -पग पर यहाँ चमेली ||
आगे बढ़ता धीरे- धीरे , वेश दिगम्बर मनुहारा |
नमन हवाएं करती देखी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||500
बैरवार का़ सजा तिगैला , जैसे हो महल अटारी |
झंडे बैनर इंच -इंच पर , जगह घेरते थे सारी ||
मुश्किल लगता अब यह कहना,किधर प्रवेशी है द्वारा |
हर पग वंदन लिखा हुआ था, नगर जतारा ध्रुवतारा ||501
आज दिवाली लगती सबको , रंग बिरंगी-सी होली |
आज हृदय भावुक दिखता है, पाकर घर की शुभमौली ||
थामे थे इक दूजे को सब , गूँज रहे थे यह नारा |
स्वागत वंदन अभिनंदन है , नगर जतारा ध्रुव तारा ||502
शासन मंत्री हरिशंकर जी , अगवानी करने थे आए |
जगदीशशरण नायक दिखते , नगरपालिका को लाए ||
जनपद नेता श्री सुरेन्द्र जी ,द्वार करें निज शुभ कारा |
है नवीन जी मित्र पुराने , नगर जतारा ध्रुव तारा ||503
क्या जैनी क्या जैनेतर अब , सबका अद्भुत था मेला |
धनी मानता आज यहाँ पर , मुस्काता आज तिगेला ||
झुका आज वह गुरु चरणों में , करता है खूब पखारा |
मंद-मंद मुस्काते रहते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||504
छोड़ तिगैला आगे बढ़ते , आए थे नहर किनारे |
मंत्री हरिशंकर ने आकर, गुरुवर शुभ चरण पखारे ||
कुंड पहाड़ी कहती आगे , मेरा भी करो निहारा |
सभी शिलाएं पावन कर दो , नगर जतारा ध्रुव तारा |505
नजर उठाकर गुरुवर देखें , धन्य- धन्य वह हो जाती |
कहती मानो आज अहिल्या , मुक्ति अपनी है पाती ||
आगे बढ़ते अब मिलता है , नई कोर्ट का दरवारा |
यहाँ न्याय भी स्वागत करता,नगर जतारा ध्रुव तारा ||506
इसी कोर्ट के सम्मुख होना , गजरथ की अनुपम फेरी |
कल्याणक की निर्धारित है , इसी जगह पर शुभ भेरी ||
धूल उठी तब आए रजकण , करने को गुरू निहारा |
चिपक गए थे आकर चरणों , नगर जतारा ध्रुव तारा ||507
मिला राह में पुल भी जिसका , छप-छप बहता था पानी |
लगता वह भी लालायित था , चरण पकड़ने यह ज्ञानी ||
कभी - कभी बैठा करते थे , जिस पट्टी पर सब यारा |
पट्टी कहती मुझको छू लो , नगर जतारा ध्रुव तारा ||508
आसपास के देहातोंं से , जो जन क्रय करने आए |
बंद बाजार देख सभी ने , कारण समझा हर्षाए ||
दर्शन करते वह गुरुवर के , करें पुण्य तब क्रय सारा |
अद्भुत योगी संत देखते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||509
मेला परिसर कव्बाली का , जहाँ झूलते थे झूले |
गुरुवर को जब उसने देखा , बोला क्या हमको भूले ||
नजर उठाकर जिसको देखें , धन्य वही था मग न्यारा |
चलते जाते मुस्काते है,नगर जतारा ध्रुव तारा ||510
ठिठके अटके गुरुवर कुछ पल , शिक्षा मंदिर था आया |
हायर सेकेन्ड्री के गुरुजन , अपने सम्मुख जब पाया ||
लौकिक शिक्षा देने वाले , नमन करें सब शुभ न्यारा |
हँसते है आशीष बाँटते , नगर जतारा ध्रुव तारा || 511
नजरबाग था आगे सुंदर , चला पवन का था झोंका |
भीनी खुश्बू चरण पखारें , कुछ पल को उसने रोका ||
सैलाब उमड़ता जाता था , जय -जय लगते थे नारा |
धीरे --धीरे कदम बढ़ाते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||512
लौकिक थे आचार्य जहाँ पर,शिशु मंदिर था जब आया |
स्टाप छात्र सब दर्शन करते , था स्वागत द्वार बनाया ||
यहाँ आशीष बाँटते सबको , सबको लगता था प्यारा |
धन्य-धन्य यह धरती करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||513
मिला कुँवा था मीठे जल का , सब कहते जिसको थाना |
लगता जैसे वह गाता हो , चरण पखारूँ का गाना ||
यहाँ बना इस्टेन्ड बसों का , था अद्भुत यहाँ नजारा |
लोग उमड़ते दर्शन करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||514
मारकेट अब चालू होता , बस्ती भी है अब प्यारी |
द्वारे - द्वारे वंदन होता , चरण पखारें नर नारी ||
करें आरती भाग्य मानते , और लगाते जयकारा |
मुश्किल पथ पर चलना देखें,नगर जतारा ध्रुव तारा ||515
वर्णन लिखना यहाँ अधूरा , आप सभी यह अब माने |
हर दरवाजे वंदन होता , बस इतना ही सब जाने ||
बैनर झंडे अटे पड़े थे , दृश्य बड़ा था यह न्यारा |
आज गगन के यहाँ चमन थे, नगर जतारा ध्रुव तारा ||516
मारकेट से नीचे उतरे , गली पकड़ते पहचानी |
पिता सनत लौकिक घर ने , भाव भरी की अगवानी ||
चरण पखारें आरति कीन्हीं ,नमन किया था सुखकारा |
शांत चित्त से सभी निहारें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||517
मात् भगवती नीर उढ़ेलें , चरण सनत है धुलवाते |
कमला और प्रियंका बहिनें , राजेश चक्रेश आते ||
करें आरती भरे भाव से , मिलजुलकर सब परिवारा |
धन्य नगाइच कुलिया करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||518
दृश्य अनोखा जिसने देखा , नीर नैन में भर आएं |
जनक और जननी को देखा, कैसे पग को धुलवाएं ||
रोमांचित तन मन होता था, लख बैरागी शुभ धारा |
कलम यहाँ पर नमन करे अब,नगर जतारा ध्रुवतारा || 519
अब सीधे जिन मंदिर जाते , पूर्ण हुई थी अगवानी |
सम्यक दर्शन ज्ञान चरित्र की,नगर जतारा रजधानी ||
गुरू भक्ति में शामिल जन है ,है वैयावृत्ति उपचारा |
मंद-मंद मुस्कान विखेरें , नगर जतारा ध्रुव तारा ||520
गुरु विराग की मुनिवर दीक्षा , दिवस प्रात ही आया |
नवम् दिसम्बर धूम धाम से , सबने था यहाँ मनाया ||
गुरु पूजन भी सब करते है , और लगाते जयकारा |
प्रवचन करते गुरु के ऊपर, नगर जतारा ध्रुव तारा ||521
तिथी दिसम्बर की बारह थी, सन् ग्यारह था जब आया |
पद आरोहण यहाँ दूसरा , आचार्य दिवस का पाया ||
चले कार्यक्रम दिन भर शुभमय, बहुत अधिक है विस्तारा |
अमरत मय प्रवचन करते है,नगर जतारा ध्रुव तारा || 522
रयणसार की चली वाचना , तथ्य अनेकों बतलाते |
सभागार का शिलान्यास भी, संरक्षण में करवाते ||
सभागार का नामकरण तब , रखते श्रावक है न्यारा |
यह "विमर्श" अब कहलाएगा,नगर जतारा ध्रुव तारा ||523
दो हजार सन् बारह जानो, अठ्ठाईसी सुखकारी |
माह जनवरी अब शुभ बनती,जोश यहाँ पर है भारी ||
तीन फरवरी गजरथ फेरी, निश्चित हैं सब जयकारा |
गुरु विमर्श जी सूर्य मंत्र दे, नगर जतारा ध्रुव तारा ||524
गजरथ के दिन आ जाते है , होती पूरी तैयारी |
पाँच दिवस के कल्याणक में ,श्रावक आए थे भारी |
तीन फरवरी गजरथ फेरी , मंगलमय थे जयकारा |
पुंगव है आचार्य प्रवर जी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||525
उपसंहार
यह गाथा में लेखक केवल , फोटोग्राफर बनता है |
चित्र खींचता हर घटना के , प्रस्तुत उसको करता है ||
नगर जतारा सूरज की है , यह गाथा अविरल धारा |
कैसे हैं वैराग्य क्षितिज पर , नगर जतारा ध्रुव तारा ||
गर्भकाल से इस गाथा में , जो दिखती सत्य कथाएँ |
अद्भुत अनुपम चिंतन इसमें , हम सबको यह दिखलाएँ ||
लौकिक शिक्षा से दीक्षा तक , हर पहलू दिखता न्यारा |
गुरु विमर्श जी कैसे योगी , नगर जतारा ध्रुव तारा ||
जो भी पढ़ना चाहें पुस्तक, व्हाट शाप पर आयेगी |
डाँट काम पर करी प्रकाशित , ब्लागर पर दिख जायेगी ||
कई एप्स पर सांझा होगी , जीमेल बहेगी धारा |
इंटर नेट करेगा जय-जय , नगर जतारा ध्रुव तारा ||
हम क्या लिख पाते गुरुवर को , यह अनुकम्पा ही जानों |
हमें लिखा पहले गुरुवर नें , घटनाएँ सचमुच मानों ||
छोड़ चुके उम्मीद हमारी , हृदय रोग में घरवारा |
आशीषों से मुझें बचाते , नगर जतारा ध्रुव. तारा ||
नमन हैदराबाद से चलता , गुरु चरणों में खजुराहा |
गुरुवर देते खजुराहा से , आशीषों को मन चाहा ||
बचकर मैं संकट से आया , तब गुरुवर चरण पखारा |
पकड़ लेखनी लिखने बैठा , नगर जतारा ध्रुव तारा ||
कहें कहाँ तक गुरुवर महिमा, हर पग इतिहास बनाता |कलम करें विश्राम यहाँ पर ,अब अपना शीष झुकाता ||जन्म भूमि तक लिखना था , पद रज पाना था सारा |मनसा पूरी कवि की करते , नगर जतारा ध्रुव तारा ||
नम: नम: श्री आचार्य 108 विमर्श सागराय चरण कमलेभ्यों नम: नम: 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#मनहरण घनाक्षरी में भावना स्तुति
( विधान -प्रत्येक पद ८-८-८-७ वर्ण) अंतिम वर्ण दीर्घ)
हे गुरु विमर्श नाथ , चरण रज ले माथ ,
शीष पर चाहूँ हाथ , भक्त की पुकार है |
देखकर गुरु छवि , दिगम्वर्त लगे रवि ,
सोचता है सदा कवि , मूर्ति मनुहार है ||
विराग की तपन से , ज्ञान में है गगन से ,
अब जिनशासन से , करते उद्धार है |
अब सोचता सुभाष , गुरु का रहे प्रकाश ,
जिनागम पथ खास, तभी उपचार है ||
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#जनहरण घनाक्षरी में कामना स्तुति
(विधान -प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण )
प्रत्येक पद का 31 वां वर्ण दीर्घ,
शेष सभी वर्ण लघु
कुल सनत सुजन , भगवति सुत मन
चरण शरण हम , मुक्तिपति सुनिए |
गणधर जिन मुनि ,निज मन तप मनि,
प्रभु मुझ पर अब , निज कर धरिए |
सच बच मुनि गुन , जिन ध्वनि उर सुन ,
सरस सदन मन , महकत रखिए |
मुनिवर निज हित , बनकर प्रभु मित ,
जग मग पग रख , मम उर बसिए |
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#जलहरण घनाक्षरी में गुरुवर परिचय स्तुति
(विधान-प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण हैं । 31वां एवं 32वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु है)
नगर जतारा जानो ,जन्म राकेश का मानो
मिली भगवती कोख , पिता सनत आलय |
गुरु विराग की गंगा , पाकर मन था चंगा
छोड़ा था घर बार , उदित था भाग्योदय ||
गुरु विराग का ज्ञान ,लिया बहुत संज्ञान ,
मिला विमर्श है नाम , पापो का करने क्षय |
अब है कृपा निधान , देते है सबको ज्ञान,
जिसको दर्शन देते , पापो का हो क्षय |
गुरु छूते जो कंकर , बनता वह शंकर ,
शरणागत रखते , कर देते हैं निर्भय ||
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#कलाधर घनाक्षरी में गुरु आभा स्तुति
( विधान-प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण ,क्रमश: गुरू-लघु 15 बार , अंत में एक गुरू )
ज्ञान दान दे अनंत , है विमर्श गुरु संत
ज्ञान के सुलेख कंत , जैन बोल नूर हैं |
बात सार की सुभाष , मानिए सदा प्रकाश ,
चंद्र नेह के सुधाम , आसमान सूर हैं ||
देखता विमर्श रूप , ज्ञान-गंग शीत-धूप ,
मेघ छाँव -ज्ञान-भूप , मात तात पूर हैं |
ज्ञान के गुरू महेश , आत्म लोक के दिनेश
वीतराग वेश धार ,मुक्ति मान शूर है ||
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#कृपाण घनाक्षरी में गुरुवर के संदेश की स्तुति
(विधान-प्रत्येक पद 8,8,8 8 वर्ण , चारो पद के अंत में दीर्घ दीर्घ )
जीवन है पानी बूँद , लगी सभी की है कूँद
भूलें मत कर डालो , गुरुवर समझाते |
जग मे होकर दागी , मत होना तुम रागी,
बन सकते बैरागी , पथ सच्चा बतलाते ||
विमर्श गुरु है संत ,जिनको ज्ञान अनंत,
जिनवाणी जयवंत , सत्य बचन सुनाते |
जैनागम तरुवर , मेरे जानो गुरुवर ,
मुक्तिपथ अनुचर , सच मग बतलाते ||
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#डमरू घनाक्षरी-में गुरुवर निधियों की स्तुति
(विधान -प्रत्येक पद में 8,8,8 ,8 वर्ण, सभी वर्ण लघु )
मुक्ति पथ मुनिवर , तप पथ शुचिकर ,
जिन घ्वनि हरिहर , समझत जन जन |
चरण शरण नित , जन गण हरषत ,
निज उर कर हित , सुखद रहत मन ||
सच बच मुनि कह , हर जन उर रह ,
मुनिवर रहवर , खुद जिन. दरसन |
गणधर मुनिवर , जगमग तपकर ,
महकत मन धन , तप लख चरणन ||
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#विजया घनाक्षरी-में गुरु चर्या स्तुति
(विघान-प्रत्येक पद 8,8,8, 8 । सभी पदो के अंत में लघु गुरू)
विमर्श गुरु आलय , देखा ज्ञान हिमालय
माने सब देवालय, मुक्ति पथ ताल रहे |
वेेश दिगम्वर धारा ,जैनम पंथ निहारा ,
गुरु विराग स्वीकारा , जिनकी ही ढाल रहे ||
चर्या चौथे युग जैसी , सुनी सभी ने है बैसी ,
बात सत्य मानो ऐसी , शिरोमणि भाल रहे |
दोनों कर जोड़ खड़े , गुरु चरण में पड़े ,
लेकर विनय अड़े , नमन सुभाष रहे ||
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#देव घनाक्षरी में गुरु महिमा एवं कथन पर चिंतन
(विधान-प्रत्येक पद 8,8,8, 9 वर्ण । सभी पदों के अंत में तीन लघु )
नगर जतारा नूर , ज्ञानामृत भरपूर ,
त्याग तपस्या शूर , विमर्श गुरु है चमन |
जैनागम हरियाली , गुुरुवर है दीवाली ,
मुक्ति पथ की है ताली ,रहता निकट अमन ||
मुझको गुरु का दम ,जो नहीं कहीं से कम ,
सरल सहज हम , सुनकर गुरु कथन |
जीवन है पानी बूँद , जिसमें लगी फफूँद ,
लगा रहा मैं क्यों कूँद , इस पर करें मनन ||
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#सूर घनाक्षरी (गुरुवर की कालजयी रचना की स्तुति )
(विधान-8,8,8,6 वर्ण चरणान्त में लघु या गुरु दोनों मान्य)
सबका यह कहना , कालजयी है रचना ,
सुनके सब गुनना , जीवन पानी है |
बूदों में यह बिखरा , जानो आशय गहरा ,
चाहे जितना प्रहरा , फूटना मानी है ||
गुरु कहें जब बोल , लगते है अनमोल ,
यह तन पूरा ठोल , सही कहानी है |
खुद का ही देखो बेटा , छोटा हो या जेठा ,
बांधता ठठरी ठेठा , यही रवानी है ||
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#रुप घनाक्षरी में विनयाजंली
(विधान-प्रत्येक पद में 8,8,8, 8 का क्रम । 32 वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु )
जैनागम के चंदन , करता जग बंदन ,
गुरु विराग नंदन , मुनि विमर्श सागर |
कवि ह्रदय के नूर , भरा ज्ञान भरपूर ,
सिद्ध शिला नहीं दूर , है ज्ञानामृत गागर ||
ग्रथों का अनुवाद , सार सार सब याद ,
दिखता सब आबाद ,तप त्याग सरोवर |
करता नमो सुभाष , गुरुवर का है दास ,
पाता है सदा प्रकाश , गुरुवर का होकर ||
सुभाष सिंघई
एम•ए• {हिंदी साहित़्य , दर्शन शास्त्र)
निवासी -जतारा , जिला टीकमगढ़ (म० प्र०)
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परम पूज्य , बालयति ,भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महामुनिराज जी की बुंदेली बोली में पूजन
कुकुभ /ताटंक छंद में
(16- 14 मात्रा भार , पदांत दो दीर्घ / तीन दीर्घ)
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स्थापना
सिंहासन पै फूल बिछा दय , नीचट भाव बनाये है |
गुरु विमर्श जी आन बिराजौ , हम पूजन खौं आये है ||
बिनतुआइ भी सबरी लगबें , पूजा मोरी स्वीकारौ |
चरनन खौं इस्थापन कर दौ ,तब मोखौ लगै सहारौ ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज , अत्र अवतर -अवतर संवोषट् आह्वाननम्
अत्र तिष्ठ- तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् | अत्र मम् सन्निहितो
भव -भव बषट् सन्निधिकरणम्
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जल
पानू से हम भरै कठौता , केवट बनके आये है |
चरन आपके धौकै मानें , राम अपुन से पाये है ||
पाप धुलै सब मौरे अब तो, हम खौ आस लगाने है |
गुरु विमर्श के चरनन छूकै, खुद हमखौं तर जाने है ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , जन्म- जरा -
मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
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चंदन
चड़ौ जगत्तर ताप टिपिरियन , सौ हम चंदन ल्याये है |
सबइँ ताप चटपट हो जाबैं , बिनतुआइ खौं आये है ||
हौरा से हम भुँजतइ राबैं , ताप जनम भर हम पाबै |
गुरु विमर्श जी हेरौ हमखौं , हम चंदन इतइँ चढ़ाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , संसार ताप विनाशनाय
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
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अक्षत
चाँउर हम तौ नौनें जानै , धो धा कै हम ल्यायै है |
मन मौरौ येसौई हौवै , बिनतुआइ खौ आयै है ||
सबइ तरा सैं हौय ऊजरै, मोपै किरपा हौ जाबै |
चरन अपुन के पछया-पछया , गैल मोक्ष की हम पाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , अक्षयपद प्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~
पुष्प
लुकलुकात हम भटकत रत हैं , कामी कीरा से साँसी |
जलत बरत भी भगत रहत हैं , करवाँ तइ पूरी हाँसी ||
काम कीचाड़े में ना परबै , रस चेतन फरै बराई |
जियै चखत हम सब पा जायै, गुरु जैसी ही प्रभुताई ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , कामबाण विनाशनाय
पुष्प निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~
नैवेद्य
कितनउँ हम खा पी लै साँसउँ , भूक मिटत फिर भी नइयाँ |
नर खौ भरतइ जितनौ- जितनौ , उतनइँ बढ़तइ टुइ़याँ- टुइयाँ ||
मिट जाबै जा भूख मोइ अब , धरी इतइँ जा रै जाबै |
गुरु चरनन में बिनतुआइ है , जा मौखौं नईं सताबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरणकमलेभ्यो , क्षुधारोग विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~~
दीप
दिया न चिंगीं जी में जलतइ , अँदयारौ नीचट राखै |
तौरो मौरो मोह भरौ है , लगत मुँदी हैं सब आखैं ||
दिया जला कै धरतइ चरनन, गैल मोक्ष की दिख जाबै |
गुरु विमर्श जी कृपा राखियौ , ज्ञान कभउँ ना धुँधलाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो ,महा मोहान्धकार
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा |
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धूप
इतनौ कूरा धरै जिया में , काँतक गुरुवर बतलाबैं |
सौचत रत है कैसे ई खौं , नाँय माँय हम सरकाबैं ||
धूप चढ़ा रय गुरू चरन में , पाप करम सब जर जाबै |
दोष न कौनउँ भीतर राबै , मनुआँ मोरौ हरसाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अष्ट कर्म दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~~~~
फल
खटुआ फल मन के भीतर ही , फूलौ - फूलौ ही राबै |
करिया रस है जीकै भीतर , नाँय - माँय ढुरकत जाबै ||
गुरु विमर्श से बिनतुआइ है , अब तो फल होय गुरीरौ |
होय मोक्ष को साजौ नोंनौं , फल लगबै हमें कुरीरौ ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , महा मोक्ष फल प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा |
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अघ् र्य
सबइ भाव हम करें इकठ्ठे , एक जगाँ पर है जौरे |
अरघा जीखौ कात इतै है , जीमैं है भरै निहौरे ||
अक्षय साता मोखौ मिलबै , अब सबरै पाप नसाबै |
गुरु विमर्श जू कृपा दीजियौ , मुक्ती मोखौ मिल जाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद प्राप्तये
अघ् र्य निर्वपामीति स्वाहा |
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जयमाला
जै जै भूम जतारा हो गइ , धन्य हुई है वह कुलिया |
जनम लऔ जब खुद खौ तरबै , सबरन नै भी नेह दिया ||
मात भगवती पिता सनत ने , लैं कैयाँ है पुचकारौ |
बूड़ी दादी के हाथन कौ , उत भौतइ रहौ सहारौ ||
समय सटक कै आँगूँ जाबै , दिखै खाल पै जब लाली |
जा कौ जानत तौ है यह , आतम हित की उजयाली ||
धरौ नाम राकेश हतौ तौ , गुरु विराग ने जब परखौ |
तनक बात भइ जब कल्यानी,छौड़ दऔ तब निज घर खौ ||
कहै जिनागम पंथ सुहाना , हित आतम कौ हैं करते |
जीवन है पानू की बूँदें , सूदी साँची ही कहते ||
कातै है आचार्य गुरू जी , रओ धर्म में सब प्रानी |
सबखौ दे आशीष सुभाषा , बौलत मीठी है वानी ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद प्राप्तये
अघ् र्य निर्वपामीति स्वाहा |
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बुंदेली पूजा लेखक - सुभाष सिंघई
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
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जैन ध्वज गीत (लावणी छंद में )
छंद विधान 16 - 14 मात्रा , पदांत दो लघु , दो दीर्घ
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
शुचिमय शुभ सम्मेद शिखर जिन , यहाँ मुक्ति का वर दाता ||
गोमटेश जी खड़े अडिग है , नेमि चरण है गिरनारी |
महावीर जी पावापुर से , वर्तमान में अधिकारी ||
वर्तमान में वर्द्धमान को , नायक जिनशासन पाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
जिनवाणी है मंगल दायक , मंगलमय शुभ जय गाथा |
साधु शरण हित मित प्रिय रहती, जन गण मन की बन नाथा ||
ध्वज लहराए नील गगन में , सत्य अहिंसा सनदेशा |
गीत सुभाषा गाता चल अब, रखकर सब शुचि परिवेशा ||
आशिष मागूँ जय- जय होवें , अब अपना शीष नवाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
जम्बू दीपे आर्य खंड का , भरत क्षेत्र यह कहलाता |
जिनवर स्वामी यहाँ हुए है , जिनका ध्वज मैं फहराता ||
करूँ कामना काज सफल हों , बहे ज्ञान की शुभ धारा |
जिन शासन जयवंत रहे अब , सत्य अहिंसा जयकारा ||
जय जय करता नमन- नमन है , सबको शुभ गीत सुनाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो, जय जिनवर ध्वज फहराता |
जय हो -जिनवर श्री जय जय हो,
श्री जिन जय हो , जय शुभ हो -2
©® गीत रचियता - सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबाइल - 9584710660
विशेष नम्र निवेदन - यह गीत आप रचनाकार का नाम सहित ही फारवर्ड करें , कार्यक्रमों में गायें |
संकेत - कोई किसी तरह की काँट छाँट कर छंद का स्वरुप , मात्रा भार विधान , बिगाड़ने का दोष व पाप अपने सिर पर धारण न करे |
सादर
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, यह पुस्तक गर्भ से लेकर , आचार्य पद पदारोहण , जतारा जन्म भूमि आगमन , एवं जतारा गजरथ तक है | बुंदेली में पूजन व जैन ध्वज गान भी लिखा है
सुभाष सिंघई
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फेसबुक पर सृजन सरोवर व छंद महल हिंदी ई पत्रिका एवं ,यूट्यूव पर सृजन चैनल संस्थापित किए है , जिसमें मेरी कई पुस्तकें प्रकाशित है व 20 अंक मासिक विभिन्न छंदों पर प्रकाशित हो चुके है ,व हर माह एक अंक एक नए छंद के साथ निकलता है , जिसका सम्पादन का दायित्व निर्वहन करता हूँ
पीडीएफ , गूगल डिस्क एवं
1- दोहा दीप (एक हजार दोहे )
2- मुस्कराते मुक्तक
3- कलम से उद्गम ( विभिन्न सनातनी मात्रिक छंद )
4- बुंदेली बराई (बुंदेली रचनाएं )
5- कुंडलिया कुंड
6 - दोहा कुंड (पुन: एक हजार दोहे )
इसके अलावा एक हजार दोहे और रिविजन में है
7 - गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
8- हिंदी छंद माला(छंद और विधाएं)
9- - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी
10- प्रकाशन तैयारी - गर्भ से गमन तक (खंड काव्य )
11- गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद
12- आलपिनें (हास्य व्यंग्य रचनाएं )
13- कतरनें ( समाचार पत्रों में प्रकाशित व्यंग्य लेख)
14- ट्वीटर एवं क्यूरा एप्स पर भी अब लिखने लगा हूँ जहाँ ब्लाग डाँट काम की बुकें भी शेयर करुगाँ , कुछ हो भी गई है
15- निरंतर हर माह एक ई पत्रिका "सृजन सरोवर छंद महल " से प्रकाशित होती है
आपका सुभाष सिंघई
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👏श्री विमर्श सागराय नमः 👏
परम आदरणीय श्री सुभाष सिंघई जी
मैंने आपके द्वारा लिखी गई नगर गौरव परम पूज्य गुरुवर आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज के संपूर्ण जीवन चरित्र पर, गर्भ जन्म से लेकर आचार्य पदारोहण तक" अनमोल कृति " नगर जतारा ध्रुव तारा " को आधोपान्त पड़ा है
आपकी यह कृति भारत देश के दिगंबर श्रमण जैन इतिहास में एक अनमोल कृति के रूप में भविष्य में सदैव सुरक्षित रहेगी 🙏🙏
इस कृति को इतने सुंदर और सरल ढंग से लिखने एवं छंद वद्य कविता के रूप से सुसज्जित करने के लिए जतारा की संपूर्ण दिगंबर जैन समाज स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती है
साथ ही टीकमगढ़ जिले की संपूर्ण जैन समाज को इस जिले का एक कवि लेखक वरिष्ठ पत्रकार होने के नाते आप पर गर्व है आप वास्तव में न केवल एक लेखक हैं बल्कि एक श्रेष्ठ कवि भी है
हम आपकी इस लेखनी की भरपूर सराहना करते हैं और भगवान से आशा करते हैं कि , उम्र के इस पड़ाव पर भी आपकी लेखनी एक भरपूर युवा कवि की लेखनी से भी अधिक सुंदर रूप में चलती रहे |
हम सभी के लिए यह बहुत ही खुशी का विषय है एवं समाज में खुशी की लहर है |
आपने अपनी इस संपूर्ण पुस्तक में परम पूज्य आचार्य श्री के संपूर्ण जीवन "गर्भ जन्म से लेकर आचार्य पदारोहण तक" एवं जन्म भूमि जतारा प्रवेश और गजरथ तक 525 छंद लिखे है जो कि सभी एक से बढ़कर एक है
यह बुक आपने डिजीटल बनाकर प्रकाशित की है , जो वर्तमान समय के हिसाब से सही है , पुस्तक प्रकाशन भी आगे पीछे हो सकता है
आपकी इस कृति में जहां
" हे गुरुवर स्वीकारो अब तो , थोड़ा सा चंदन मेरा"
भावो के साथ गुरु के चरण कमलों में नमन किया है तो वही आपने इस सुंदर कृति के 26 से 50 तक के छंद में गुरुवर के गर्भ खंड को लिया है
आपने अपनी कृति में 51 से 83 तक परम पूज्य गुरुवर के जन्म खंड को जोड़ा है
तो वही 84 से 100 तक बाल्यावस्था
101 से 125 छंद तक शिक्षा खंड
दीक्षा खंड 251 से 300 तक को संजोया है
👏👏
गुरुवर की अनमोल कृति
"जीवन है पानी की बूंद "महाकाव्य को ध्यान में रखते हुए आपने अपनी कृति में 351 से 400 तक सभी छंद में बहुत ही सुंदर साहित्य के शब्दों का संजोया है
और 400 छंदो के बाद मुनि दीक्षा , मुनिविहार व आचार्य पदारोहण , जन्म भूमि जतारा आगमन (गजरथ तक) 525 छंदों पर विराम दिया है
इसके बाद सभी प्नकार के घनाक्षरी छंदो से गुरुदेव की स्तुति की है
👏👏
वीर प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि
आप सदा स्वस्थ रहें दीर्घायु रहें
समाज ,धर्म एवं मानव कल्याण के प्रति सदैव समर्पित रहे
इसी पवित्र भावना के साथ
आपका अपना
👏👏
प्रकाश जैन "रोशन'
(पत्रकार एवं साहित्यकार)
पूर्व अध्यक्ष -दिगंबर जैन समाज
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🙏 *श्री पार्श्वनाथाय नमः* 🙏
🙏 *श्री विमर्श सागराय नमो नमः* 🙏
परम सम्माननीय
श्री *सुभाष सिंघई जी*
आपके द्वारा लिखी गई कृति
*नगर जतारा ध्रुव तारा* एक अनमोल कृति है जिसमें आपने *जतारा* नगर गौरव परम पूज्य श्रमणाचार्य 108 श्री विमर्श सागर जी महाराज के जीवन चरित्र पर एक नए दृष्टिकोण से पद्य में सृजनात्मक लेखन कार्य किया है ।
मैंने आपके द्वारा रचित "नगर जतारा -ध्रुव तारा* " को आदि से अंत तक पड़ा, पढ़ने के बाद लगा कि यह कृति, भारत देश की दिगंबर श्रमण जैन संस्कृति में एक अनमोल कृति के रूप में चिर स्मरणीय रहेगी एवं नगर गौरव आचार्य गुरुवर श्री विमर्श सागर जी महाराज के जीवन परिचय से जतारा नगर भी इतिहास में सदैव याद किया जाता रहेगा ।
आपने अपनी लेखनी से इस महाकाव्य में परम पूज्य श्रमणाचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज के *जीवन चरित्र* को एक नए दृष्टिकोंण से छंद वद्य कविता रूप में सुंदर सरल और आकर्षक शब्दों से अभिसिंचित किया है जो सर्वसाधारण के सर्वथा पढ़ने योग्य है ।
आपने *नगर जतारा ध्रुव तारा* काव्य में परम पूज्य आचार्य गुरुवर श्री *विमर्श सागर* जी महाराज का *गर्भकाल, जन्म काल, बाल्यावस्था, युवावस्था, लौकिक शिक्षा, नगर जतारा का प्रथम पंचकल्याणक, राकेश जी का गृहत्याग, ब्रम्हचर्य व्रत, ऐलक दीक्षा, मुनि दीक्षा,आचार्य पदारोहण, आदि का जीवंत चित्रण* किया है,
साथ ही साथ आपने इस महाकाव्य का प्रारंभ आचार्य श्री द्वारा रचित जीवन है पानी की बूंद महाकाव्य से ......
*पानी बूंद कहा जीवन को यह गीत बना है आला* ........
से किया है जिसके लिए निश्चित तौर पर आप बधाई के पात्र हैं ।
इस कृति लेखन के लिए संपूर्ण दिगंबर जैन समाज आपको साधुवाद प्रेषित करते हुए अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती है ।
संपूर्ण जैन समाज को आचार्य गुरुवर की जन्म नगरी जतारा के कवि, लेखक, वरिष्ठ पत्रकार होने के नाते आप पर गर्व है
आपने अपनी रचना के अंत में परम पूज्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज के चरणों की भक्ति घनाक्षरी छंद के सभी भेदों से की है जो अद्वितीय है ।
*आप न सिर्फ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक हैं बल्कि एक आदर्श कवि भी है ।* 🙏🙏
*उस सर्वशक्तिमान से कामना करते हैं कि आप निरोगिता के साथ धर्म, समाज, एवं मानव कल्याण के प्रति सदैव समर्पित रहते हुए सतत लेखन कार्य करते रहें*।
*आप शतायु हो, पूर्णायु हो ।*
इसी मंगल भावना के साथ
🌲 *आपका अनुज* 🌲
🖋️पत्रकार अशोक कुमार जैन
अध्यक्ष - भारतीय जैन संगठन
चैप्टर जतारा
जिला टीकमगढ़ मध्य प्रदेश
9826909617
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~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विमोचन
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