https://subhashsinghai.blogspot.com/मुस्कराते मुक्तक (बुक पर क्लिक करें )
(विभावना अलंकार में ) वर्तमान परिवेश का चित्रण
सत्य परीक्षा देने जाता , झूठा कापी जाँचे |
यजमान बना है अब हंसा , कागा पोथी बाँचे |
बना शिकारी चूहा घूमे , शेर दिखा अब छिपता~
महल अँधेरे में डूबा हैं , इठलाते अब ढाँचे |
सूरज को तपने से रोकें, उड़ते छोटे बादल |
उजला होकर नूर दिखाता , कल का काला काजल |
अब चरित्र की हँसी उडाते , मिलकर के खल कामी ~
कुचक्र जहाँ में चल जाते है , नीतिवान अब घायल ||√
सार छंद मुक्तक
पास हुआ है झूठा जग में , सत्य परीक्षा देता |
उपदेश बाँटते सूरज को , जुगनू बने प्रणेता |
हार जीत के खेल दिखावा , जिसमें सब ही उलझे~
निर्णय पहले ही रख लेता , वर्तमान का नेता |
सम्हल-सम्हल कर चलना है , कहते बड़े सयाने |
जान बूझकर अपने घर में , करना नहीं फसाने |
आँख मूँदकर नहीं भरोसा , अंजानों पर करना ~
भेद बताने के पहले अब , उसका परिचय जाने |
मीठी -मीठी बातें करता , आकर के गुण गाता |
आगे पीछे दौड़ लगाता , बातें सभी सुनाता |
नहीं कान को कच्चा रखना , आँखे धोखा खाती ~
जहाँ सत्य हो कैदी जैसा ,समझों गड़बड़ खाता |√
सार छंद - मुक्तक
आज देश में चल जाती हैं , जुमलों की बौछारें |
रहे भीगती जनता जिसमें , करती जय-जयकारें |
नए-नए जुमले भी मिलते, काम इसी से चलता ~
जनता सपने देखा करती , अनुभव करे वहारें |
जुमलों की बौछारें चलती , वादो की वरसातें |
मेरे भारत में लगती है जनता को सौगातें |
जुमले लगते सबको अच्छे , सभी पीटते ताली ~
गली - गली जुमलो की चर्चा, वादो की भी बातें |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~
मुक्तक. आधार (सार छंद , 16 - 12 ,)
यति व चरणांत चौकल से
चिठ्ठी पर चार मुक्तक
पा जाते थे सब संंदेशा , हम पाकर चिठ्ठी में |
पूरे रिश्ते जुड़ जाते थे , तब आकर चिठ्ठी में |
बहुत आनंद था छा जाता , चिठ्ठी की खुश्बू से~
नजर गड़ाकर पूरी पढ़ते , सब जाकर चिठ्ठी में |
लिए डाकिया जब आता था , समाचार चिठ्ठी में |
सभी खोजते अपना-अपना, जुड़ा तार चिठ्ठी में |
सभी धरोहर-सी रख लेते , जैसे सोना चांदी ~
कण पराग से लगते सबको , है बहार चिठ्ठी में |
परिवार जोड़कर रख देता , रस रहते चिठ्ठी में |
भाव भंगिमा हमने देखी, सब बहते चिठ्ठी में |
इधर उधर जो घूमे हरदम , दौड़ा ही आता था~
राम-राम क्या हमको भेजा , सब कहते चिठ्ठी में |
एक जमाना बीत गया है , अनमोल रही चिठ्ठी |
अहसासों की रानी बनकर ,जब हृदय बसी चिठ्ठी |
हलचल कर देती थी घर में , बिखरा देती खुश्बू ~
रिश्ता जोड़ बनाने में तब , यह सूत्र रही चिठ्ठी |
सुभाष सिंघई जतारा
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मुक्तक
गुजर गया है काफी अरसा , नहीं चाहतें बदली |
रही दोस्त की लत हमको , नहीं आदतें बदली |
मुझें सभी इस जग में अब, अपने ही लगते है ~
सब बैसा ही चलता जाता , , नहीं रिवायतें बदली |
सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र०
मुक्तक भिखारी छंद
रुख लिबास ही अब तो , यह पहचाने दुनिया ,
कहाँ उतरना दिल में अब यह जाने दुनिया ,
चले बनावट अब तो, चलन आजकल देखें ~
सत्य बोलना अच्छा , कब यह माने दुनिया |
ग्राहक ही अब बिकता , देखा बाजारों में ,
मीठी बातें मिलती , केवल मक्कारों में ,
कौन फरिश्ता सुनता , कहता बोल सुभाषा -
सत्य न्याय है याचक , झूठें दरबारों में |
~~~~~~~~
नील वर्णिक छंद - ५भगण +गुरु
२११ २११ २११ २११ २११ २
राम लला अब मंदिर में निकले रहने ,
छूट गया अब टेंट यहाँ सबके कहने ,
देख रही दुनिया अब आकर भारत में -
जश्न यहाँ पर है पहने शुचिता गहने |
~~~~~
दोस्त की दुख में पहचान होती है
भाई की भाई में बसी जान होती है
दुनियॉ में जो रिश्ते निभाना जानते
हर मंजिल उन्हें ~आसान होती है
पत्नी का कदम अगर अपने साथ हो
माता पिता का शुभाशीष भी माथ हो
दुनिया की कायनात कदमों तले होती
ईमान की कलम अगर अपने हाथ हो
बहिन से बढ़कर मंगल तिलक नही है
बेटी बेटा से आगे कोई झलक नही है
खुदा की राह पर यदि चलता है बंदा
सव कुछ यहीं जन्नत की ललक नही है
~~~~सुभाष सिंघई~~~~
गीतिका
समान्त: आनी---स्वर की बंदिश।
पदान्त: पड़ेगी।
मापनी:१२२-१२२-१२२-१२२
हमें गीतिका भी सुनानी पड़ेगी |
यहाँ की वफा भी निभानी पडेगी |
चले थे जहाँ में लिए झोल झंडा ,
रुके क्यों कहानी बतानी पड़ेगी |
जहाँ सोचते है यहाँ तो रहेगें ,
वहाँ पै अदा भी दिखानी पड़ेगी |
नहीं साथ देगा मिलेगी सजा जो ,
हमें ही गुनाही छिपानी पड़ेगी |
नहीं चाहते हैं कि यादें मिटा दें ,
किसी को वफा आजमानी पड़ेगी |
रखा गेह सोना व चाँदी पुरानी ,
लुटेरा मिला तो बचानी पड़ेगी |
हमें भी न कोई कहानी सुनाओ ,
गवाही "सुभाषा" दिलानी पड़ेगी |
सुभाष सिंघई
~~~`~``
(चंचरीक छन्द 12+12+12+10 (अंत गा गा )
(हास्य रस में )
होली की धुन लाया , पहले घर में गाया ,
जब गोरी घर आया , बोली वह गाओ |
कहती स्वर है ढीले , लाल हरे कुछ पीले ,
करो ताल सुर गीले , महफिल से जाओ ||
कहता तभी सुभाषा , रखता तुमसे आशा ,
समझो धुन परिभाषा , निकट जरा आओ |
प्रकट करे नाराजी , बनो नहीं तुम काजी ,
गाने में हो पाजी , मत सिर को खाओ ||
🤓🙏🤑
~~~~~~~~~~~~~~
सीता छंद , 15 वर्ण , गालगागा ×3 +गालगा
हास्य मुक्तक
मैं सुनाता गीत होली ,चार आए आदमी ,
गीत पूरा भी नहीं वे , झेल पाए आदमी ,
लोग भूले हैं मुझे भी , पूछते ये कौन है -
आलमी है या जमीं से , खोद लाए आदमी |
🤔🙏😁
सुभाष सिंघई
~~~~
फाग
२१२२. । २१२२ । २१२२। २१२२
फाग खेले गोपियाँ भी , कृष्ण को काला बताएँ,
मारती ताना पुराना , चोर भी ऊँचा सुनाएँ ,
कृष्ण बोले जाइये भी , क्यों यहाँ जूँ मारती हो -
गोपियाँ भी बोलती जूँ , आप है क्या मार खाएँ |?
🤔🤑😄
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~
हास्य
212 122 122. 212
दिल लगा गधी से परी क्या चीज है |
मिर्च लाल खायी हरी क्या चीज है |
हुश्न था कभी देखते थे लोग भी ,
खाल भी वही है उम्र क्या चीज है |
🤑🙄🤔
~~~~`
(चंचरीक छन्द 12+12+12+10 (अंत गा गा )
(हास्य रस में )
होली की धुन लाया , पहले घर में गाया ,
जब गोरी घर आया , बोली वह गाओ |
कहती स्वर है ढीले , लाल हरे कुछ पीले ,
करो ताल सुर गीले , महफिल से जाओ ||
कहता तभी सुभाषा , रखता तुमसे आशा ,
समझो धुन परिभाषा , निकट जरा आओ |
प्रकट करे नाराजी , बनो नहीं तुम काजी ,
गाने में हो पाजी , मत सिर को खाओ ||
🤓🙏🤑
~~~~~~~~~~~~~~
सीता छंद , 15 वर्ण , गालगागा ×3 +गालगा
हास्य मुक्तक
मैं सुनाता गीत होली ,चार आए आदमी ,
गीत पूरा भी नहीं वे , झेल पाए आदमी ,
लोग भूले हैं मुझे भी , पूछते ये कौन है -
आलमी है या जमीं से , खोद लाए आदमी |
🤔🙏😁
सुभाष सिंघई
~~~~
फाग
२१२२. । २१२२ । २१२२। २१२२
फाग खेले गोपियाँ भी , कृष्ण को काला बताएँ,
मारती ताना पुराना , चोर भी ऊँचा सुनाएँ ,
कृष्ण बोले जाइये भी , क्यों यहाँ जूँ मारती हो -
गोपियाँ भी बोलती जूँ , आप है क्या मार खाएँ |?
🤔🤑😄
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~
हास्य
212 122 122. 212
दिल लगा गधी से परी क्या चीज है |
मिर्च लाल खायी हरी क्या चीज है |
हुश्न था कभी देखते थे लोग भी ,
खाल भी वही है उम्र क्या चीज है |
🤑🙄🤔
~~~`
#ग़ज़ल_आयोजन
#क़ाफिया: आ---स्वर की बंदिश।
#रदीफ़: कीजिए।
#वज्न:212-212-212
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वोट से भी दुवा कीजिए |
देश की भी सुना कीजिए |
लूटमारी जहाँ देश में ,
फितरते सब सफा कीजिए |
चापलूसी यहाँ पनपती ,
घाव बढ़ते दवा कीजिए |
प्रश्न छोड़ो यहाँ अब सभी ,
हो सके वो व़फा कीजिए |
धार सूखी नदी की नहीं ,
जंगलों को हरा कीजिए |
देखने को जमाना रहे ,
चाल से नव हवा कीजिए |
अब 'सुभाषा' यहाँ कौन है ,
कुछ अभी सिलसिला कीजिए |
_________________________
✍️स्वरचित-मौलिक
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
**नकल में अकल कुछ लगाने लगे हैं **
मापनी 122 ×4 समांत-आने , पदांत -लगे हैं
नकल में अकल कुछ लगाने लगे हैं |
जहाँ छंद बिखरे चुराने लगे हैं ||
मिली छूट पूरी यहाँ पर जिसे है
दही कह मठा ही लुटाने लगे हैं |
'महल छंद' में जो बिखेरा गया है ,
वहाँ का लिखा निज बताने लगे हैं |
जहाँ छंद की मूँछ दिखती वहीं से ,
दिखे हिंदु मुल्ला बनाने लगे हैं |
जुड़े है हजारों यहाँ आप देखो
नयन के इशारे नचाने लगे हैं |
मदारी बने बंदरों के शहर में
समय देख ढपली बजाने लगे हैं |
लगी आग पूरी न जल है बुझाने ,
धुआँ देख गलती छुपाने लगे हैं |
नहीं शर्म कोई रखे वें " सुभाषा "
हवा देख लाठी घुमाने लगे हैं |
सुभाष सिंघई
~~~~~
बुंदेली में मनहरण घनाक्षरी (सुभाष सिंघई)
कुत्ता सोफा पै पसरौ , बिस्कुट खाकैं अफरौ,
डुकरा बैठो बायरैं , संगैं बैठी डुकरौ |
बउँ धन लैकैं कैयाँ , लैतइ खूब बलैयाँ ,
आगें पाँछै पौछत है , सब उकौ बुकरौ ||
किसमत खेले खेली , कुत्ते मिले जलेबी ,
दद्दा रगड़ तमाकू , बैठो कोने कुकरौ |
रूखी सूकी दद्दा बाई , छ्प्पन भोग लुगाई ,
माल पुआ कुत्ता खाबे, घी को सब चुपरौ ||
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