https://subhashsinghai.blogspot.com/मुस्कराते मुक्तक (बुक पर क्लिक करें )


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मुस्कराते मुक्तक 
देख रहा मुख पोथी पर मैं , सभी  तरह  के‌  लोगो  को ,
भांति-भांति के ज्ञानों से अब , उपज चुके नव रोगो को , 
गुरु से  बढ़कर  चेले  निकले , सबका   ऊँचा  है  पारा ~
हिंदी  छंदो  की खतना कर  , थोपे  हमे   प्रयोगो  को |

जहाँ  उजालों  को  अँधियारा ,  सुबह  शाम धमकाता है,
और  साहसी को  कायर  भी , झूठा  जब बतलाता    है ,
बक्त. वहाँ  खामोश दिखे तब, अनहोनी   घटना   जानो ~ 
बेकार समझिए  कुछ कहना, जो निज  गान  सुनाता  है |
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लोग भूलते जाते है अब , काम  निकलता जाता है ,
अवसर आने पर अब मानव , गर्दभ पिता बनाता है , 
दुनिया में अब रिश्ते देखे , परहित के डिव्बे  खाली ~
संकट में अजमाना अपना,    कैसा  हाथ हिलाता है |

जले देखकर अपनो की छवि,‌जो भी तीर चलाता  है  ,
स्वयं पीटता  अपना डंका , ‌पर  की  त्रुटि  सुनाता  है , 
भूलें    अपनी    मर्यादाएं , हरदम   पत्थर ‌  ही   फेकें  -
एक दिवस वह पागल होकर,पथ पर नृत्य दिखाता  है |
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जो सम्मानो को पाकर भी , हजम  नहीं   कर  पाता है , 
अभिमानी बनकर महफिल में , अपना रौव दिखाता है , 
उल्टी उसकी गिनती जानो , वस्त्र स्वयं  वह ही  फाड़े ~
जो अपना ही राग अलापे  , ढपली‌    स्वयं  बजाता है   |

लघु  लकीर.  दूजो  की करने  , सदा  पीटने  आता  है , 
समय सृजन करने  का  पूरा  , अपना व्यर्थ गँवाता  है , 
हाथ रहे खाली जीवन में , पास नहीं  कुछ भी  होता  ~
जो भी अपनी सहज लकीरे , नहीं    बढ़ाने  जाता  है  |
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व्यथित हृदय पर प्रिय वचनों का , जाकर लेप लगाना है ,
जहाँ प्रज्वलित क्रोधी  ज्वाला  ,  बनकर नीर बुझाना  है ,
जहाँ   बुबै  कटुता  के  काँटे ,  फूल वहाँ  पर. है   बोना 
निस्हाय  जगत में जो   रहते ,  उनका  दर्द. मिटाना   है |

लघु  लकीर.  दूजो  की करने  , नहीं  पीटने  जाना   है , 
समय सृजन करने का अपना, बिल्कुल नहीं गवाना  है , 
सब हासिल होता जीवन में , दूर नहीं  कुछ भी  जानो ~
सबको अपनी सहज लकीरें,  स्वयं   बढ़ाने  आना  है  |
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धाम अयोध्या सदा रहा है ,    आगे भी  यहाँ   रहेगा | 
प्रलय काल में रहे सुरक्षित , धरती  पर  यह उभरेगा |
जन्म भूमि यह भगवंतो  की,राम ऋषभ को  पहचानो - 
पुण्य जीव सब आएगें अब, नभ थल जयकार करेगा |

पाँच सदी संघर्ष चला है , तभी  जीत का पल आया |
बाबर की तानाशाही का ,   ढ़ाँचे  को  था   गिरवाया |
जन्म भूमि पर रामलला को, हम सब अब बिठलाएँगें - 
देर   हुई पर  जीत मिली है  , फल  मीठा सबने पाया |

सुभाष सिंघई 

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दिग्वधू छंद विधान - मात्रिक छंद है।२२मात्राएं 
मापनी - २२१  २१२२ २२१  २१२
आयोजन - दिग्वधू छंद आधारित मुक्तक 

हालात है यहाँ जो  कहना‌   नहीं  हमें , 
पर पीर भी  वहाँ कुछ सहना नहीं हमें , 
मजबूत   है   इरादे  चलना   जरूर  है - 
अड़कर वहाँ  रहेगें   ढ़हना नहीं    हमें |

सुभाष सिंघई
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(दोहा का समचरण + 324)

सदा सत्य के  साथ , अड़ा   रहता हूँ |
और अहिंसा द्वार  ,   पड़ा   रहता हूँ |
जो कायरता   जान,  नैन  दिखलाते -
तब सिंहों की चाल ,  खड़ा   रहता हूँ |

महावीर पहचान, नहीं   हम  भूले |
भूले नहीं   दहाड़ , नहीं  हम  लूले |
जहाँ धर्म पर चोट , वहाँ पर गरजें - 
फिर भी रखते गेह , अहिंसा झूले |

कायर है हम लोग , यहाँ जो  मानें |
सह लेते   है  वार ,  विचारा  जानें |
उनसे कहता आज,समझ लो प्यारे -
प्रतिरोधी हथियार , सदा  हम  तानें |

सुभाष सिंघई
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(मुक्तक ), आधार -द्विगुणित मानव /हाकलि छंद
 (14 -14 मात्रा  ) 4+4+4+ 2 
(विशेष - मानव / हाकलि , आंसू , सखी छंदों में मामूली अंतर है , मानव छंद भी कुछ अलग पथ के‌ गूगल पर मिल जाते है , जैसे किसी भी तरह के अठकल + चौकल + द्विकल के 
पर यह उपरोक्त मापनी के है 

छिपे छिपकली मंदिर में , कीड़ा  खाती जाती है |
पाप न उसके कटते है , शरण न प्रभुवर पाती है |
दान करे नर कितना भी , ‌यदि करता पाप कमाई ~
करनी उसकी देती फल , नियति यही बतलाती है |

आज मनुज की हालत है  ,पाप   हमेशा  करता है |
फल भी अच्छा पाने को , लालायित  वह रहता है‌ |
कौन  उसे  समझाता है   , खुद को प्यारे  धोखा है -
चखता है वह करनी फल , बैठा    आहें   भरता है |

कर्म  जहाँ पर  खोटे  है   , दूरी   सभी  बनाते   हैं |
पापी  माया   रहती  है , पास  न सज्जन आते हैं ||
जहाँ कुटिलता छाई है  ,  सार    नहीं   है बातों में -
वहाँ  दिखावा  होता है ,  छल के लड्डू   खाते   हैं |

सुभाष ‌सिंघई जतारा ( टीकमगढ़) म० प्र०
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देखता  आदमी में  नहीं   मैं   यहाँ आदमी |
कंठ‌  प्यासे  सभी  घूमते  है‌  यहाँ  आदमी |
भूख के  रोग  को पालते    भी  यहाँ लोग है  ~
काम का भी  नहीं आदमी  को‌  यहाँ आदमी |

भगवानों को भी यारी का  धर्म   निभाना पड़ता है |
मित्र  सुदामा के चरणों को खुद धुलवाना पड़ता है |
शरण  बिभीषण बजरंगी को  मित्र सदा ही  माना ~
श्री प्रभु को इनको पहले सीने  तक लाना पड़ता है| 


नमन मंच- विधाता छंद आधारित मुक्तक सृजन
मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

चली गंगा धरातल पर ,  उसे अब  कौन रोकेगा |
रखे वह वेग कितना है , किसे अब कौन बोलेगा |
करे सब लोग बाते भी ,यहाँ  शिव काम आएगें - 
तपोबल पास किसके है  , जटायें कौन खोलेगा | ? 

डरा होता अगर मानव  , जरा  भी देर कर लेता |
समय का फेर भी उसको, वही पर ढ़ेर कर देता |
रहे‌ जो साहसी‌ बनकर , जमाना झुक उसे माने - 
सभी जाने  उसे अपना , सहारा  मानकर   नेता |

जहाँ सागर दिखा खारा, वहाँ  अमरत  सुहाना  है |
जहर निकला जहाँ पर है , वहाँ शिव का तराना है |
जुड़े जब  देवता सारे ,   बनी   मंथन   कहानी   है -
असुर खुद हो गये खाली, यहाँ छल बस बहाना है |

सुभाष सिंघई
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1222 ×4 मुक्तक 

नहीं   देखे  वहाँ   हमने ,  चले   मेरे   यहाँ   कोई |
रहे हमदम हमारा भी , कहे  खुलकर वहाँ   कोई |
अकेले ही चले थे हम , बिना   बोले   शराफत से ~
सुना अब खोज जारी है , दिखे रहता कहाँ कोई |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~

नमन मंच 
विधा -गीतिका  , मापनी--१२२ ×४ 

मिलेगें    अकेले   सभी   कह सकोगे |
कहेगें वहाँ   कुछ   तभी  सह सकोगे  |

रहेगें जहाँ   पल   निशानी लिए कुछ ,
वहाँ पर तभी तुम   सही  रह सकोगे |

सितमगर नहीं है  कहीं से  यहाँ हम , 
रहोगें निकट तो   गिले  ढह  सकोगे |

जमाना   कहे  तो  नहीं   रोकता  हूँ , 
उसे चुप कराना  सुलह गह सकोगे |

नहीं है    खुदा   वह  गिला जो बताए ,
उसे तुम यहाँ क्या ,निकट सह सकोगे |

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~

गीतिका  122 ×4     

मुलाकात होती   नहीं अब गली में |
पता कौन करता वहाँ कब गली में |

खुलेगा नहीं कुछ वहाँ राज क्या था ,
छुपेगें  नजारे  रहे जो  सब गली में |

बनी    है  हमारी  तुम्हारी   कहानी , 
रहे मोन हम तुम मिले जब गली में |

मिलेगें  कहेगें      करेगें     इशारे , 
शिकायत न होगी , वहाँ तब गली में |

गली  है  हमारी  तुम्हारी  अमानत  , 
नहीं बद करेगें वहाँ लब  गली   में |

किसे अब पड़ी है  खलल जो करेगें , 
हमारे   रहेगें    जहाँ  रब  गली   में |

सुभाष सिंघई
~~~

122 × 4 

हमारा नहीं है  यहाँ  पर  बसेरा |
पता भी नहीं है जहाँ पर लुटेरा |
उठाकर चलेगें बचाकर  समेटे -
पता भी नहीं है कहाँ पर सबेरा  |

सुभाष सिंघई

नमन मंच- विधाता छंद आधारित मुक्तक सृजन
मापनी - १२२२ १२२२ १२२२ १२२२

चली गंगा धरातल पर ,  उसे अब  कौन रोकेगा |
रखे वह वेग कितना है , किसे अब कौन बोलेगा |
करे सब लोग बाते भी ,यहाँ  शिव काम आएगें - 
तपोबल पास किसके है  , जटायें कौन खोलेगा | ? 

डरा होता अगर मानव  , जरा  भी देर कर लेता |
समय का फेर भी उसको, वही पर ढ़ेर कर देता |
रहे‌ जो साहसी‌ बनकर , जमाना झुक उसे माने - 
सभी जाने  उसे अपना , सहारा  मानकर   नेता |

जहाँ सागर दिखा खारा, वहाँ  अमरत  सुहाना  है |
जहर निकला जहाँ पर है , वहाँ शिव का तराना है |
जुड़े जब  देवता सारे ,   बनी   मंथन   कहानी   है -
असुर खुद हो गये खाली, यहाँ छल बस बहाना है |

सुभाष सिंघई

1222 ×4 मुक्तक 

नहीं   देखे  वहाँ   हमने ,  चले   मेरे   यहाँ   कोई |
रहे हमदम हमारा भी , कहे  खुलकर वहाँ   कोई |
अकेले ही चले थे हम , बिना   बोले   शराफत से ~
सुना अब खोज जारी है , दिखे रहता कहाँ कोई |

सुभाष सिंघई
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नमन मंच 
विधा -गीतिका  , मापनी--१२२ ×४ 

मिलेगें    अकेले   सभी   कह सकोगे |
कहेगें वहाँ   कुछ   तभी  सह सकोगे  |

रहेगें जहाँ   पल   निशानी लिए कुछ ,
वहाँ पर तभी तुम   सही  रह सकोगे |

सितमगर नहीं है  कहीं से  यहाँ हम , 
रहोगें निकट तो   गिले  ढह  सकोगे |

जमाना   कहे  तो  नहीं   रोकता  हूँ , 
उसे चुप कराना  सुलह गह सकोगे |

नहीं है    खुदा   वह  गिला जो बताए ,
उसे तुम यहाँ क्या ,निकट सह सकोगे |

सुभाष सिंघई

गीतिका  122 ×4     

मुलाकात होती   नहीं अब गली में |
पता कौन करता वहाँ कब गली में |

खुलेगा नहीं कुछ वहाँ राज क्या था ,
छुपेगें  नजारे  रहे जो  सब गली में |

बनी    है  हमारी  तुम्हारी   कहानी , 
रहे मोन हम तुम मिले जब गली में |

मिलेगें  कहेगें      करेगें     इशारे , 
शिकायत न होगी , वहाँ तब गली में |

गली  है  हमारी  तुम्हारी  अमानत  , 
नहीं बद करेगें वहाँ लब  गली   में |

किसे अब पड़ी है  खलल जो करेगें , 
हमारे   रहेगें    जहाँ  रब  गली   में |

सुभाष सिंघई
~~~
122 × 4 
हमारा नहीं है  यहाँ  पर  बसेरा |
पता भी नहीं है जहाँ पर लुटेरा |
उठाकर चलेगें बचाकर  समेटे -
पता भी नहीं है कहाँ पर सबेरा  |
सुभाष सिंघई
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मुक्तक - (16-14)

मैया मिटा मलिनता मन की,  मोर मुदित मन अंदर हो , 
सुखी सकल शुभ कारज होवें , स्वप्न  सलौना  सुंदर हो , 
दारुणता  दीनों  की   हरना, माँ  जग  की  दुर्गा  देवी -
जगतपालिनी जग में  तेरी , करुणा    सदा समुंदर हो | 

          सुभाष सिंघ्ई
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मुक्तक ,   16-12 , यति व चरणांत चौकल

(विभावना अलंकार में ) वर्तमान परिवेश का चित्रण

सत्य  परीक्षा  देने   जाता  , झूठा   कापी जाँचे  |
यजमान बना  है अब हंसा ,   कागा‌‌ पोथी बाँचे  |
बना  शिकारी चूहा घूमे , शेर  दिखा अब छिपता~
महल अँधेरे  में  डूबा   हैं   , इठलाते  अब   ढाँचे‌  |

सूरज   को  तपने   से  रोकें,   उड़ते   छोटे‌‌   बादल |
उजला होकर नूर दिखाता , कल का काला काजल |
अब चरित्र की  हँसी उडाते , मिलकर के खल कामी ~
कुचक्र जहाँ में  चल जाते है ,  नीतिवान अब  घायल ||√

सार छंद  मुक्तक

पास हुआ  है  झूठा   जग में ,  सत्य  परीक्षा  देता |
उपदेश   बाँटते   सूरज  को   , जुगनू  बने  प्रणेता |
हार जीत के खेल दिखावा , जिसमें सब ही उलझे~
निर्णय  पहले  ही  रख लेता ,  वर्तमान   का   नेता |

सम्हल-सम्हल कर चलना है , कहते बड़े सयाने |
जान बूझकर अपने घर में , करना नहीं फसाने |
आँख मूँदकर नहीं भरोसा , अंजानों पर करना ~
भेद बताने के पहले अब , उसका परिचय जाने |

मीठी -मीठी  बातें  करता , आकर के गुण गाता |
आगे   पीछे दौड़  लगाता , बातें  सभी   सुनाता‌ |
नहीं कान को कच्चा रखना , आँखे  धोखा खाती ~
जहाँ सत्य हो कैदी जैसा   ,समझों गड़बड़ खाता |√

सार छंद - मुक्तक

आज देश में चल जाती हैं , जुमलों   की   बौछारें |
रहे भीगती जनता जिसमें  , करती जय-जयकारें |
नए-नए जुमले भी मिलते, काम  इसी  से चलता ~
जनता  सपने  देखा करती ,  अनुभव  करे  वहारें |

जुमलों की  बौछारें  चलती ,   वादो  की वरसातें  |
मेरे   भारत में  लगती  है     जनता   को  सौगातें |
जुमले लगते सबको अच्छे , सभी   पीटते  ताली ~
गली - गली जुमलो की चर्चा,   वादो की भी बातें |

सुभाष ‌सिंघई
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मुक्तक. आधार  (सार छंद‌ , 16 - 12 ,)
यति व चरणांत चौकल से
चिठ्ठी पर चार मुक्तक

पा जाते थे सब संंदेशा ,    हम पाकर  चिठ्ठी में |
पूरे   रिश्ते  जुड़ जाते थे  , तब आकर चिठ्ठी में |
बहुत आनंद था छा जाता , चिठ्ठी की खुश्बू  से~
नजर गड़ाकर पूरी पढ़ते  , सब जाकर चिठ्ठी में |

लिए डाकिया जब आता था , समाचार चिठ्ठी में |
सभी खोजते अपना-अपना, जुड़ा‌ तार चिठ्ठी में |
सभी   धरोहर-सी रख  लेते , जैसे सोना चांदी ~
कण पराग से लगते सबको ,  है  बहार चिठ्ठी में |

परिवार जोड़कर रख देता , रस रहते चिठ्ठी में |
भाव भंगिमा  हमने  देखी,  सब बहते चिठ्ठी में |
इधर उधर जो  घूमे हरदम , दौड़ा  ही आता था~
राम-राम क्या हमको भेजा , सब कहते चिठ्ठी में |

एक जमाना बीत गया है , अनमोल  रही   चिठ्ठी |
अहसासों की रानी बनकर ,जब हृदय‌ बसी चिठ्ठी |
हलचल कर देती थी घर में , बिखरा  देती खुश्बू ~
रिश्ता जोड़  बनाने में तब , यह  सूत्र  रही  चिठ्ठी |

सुभाष सिंघई जतारा

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मुक्तक

गुजर गया है काफी‌ अरसा   , नहीं  चाहतें बदली |

रही  दोस्त की   लत  हमको , नहीं आदतें  बदली |

मुझें सभी इस जग में अब, अपने   ही  लगते  है ~

सब बैसा ही चलता जाता , , नहीं  रिवायतें  बदली |

सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र०


मुक्तक भिखारी छंद 

रुख लिबास ही अब तो ,  यह पहचाने  दुनिया ,

कहाँ  उतरना  दिल  में  अब  यह जाने  दुनिया ,

चले  बनावट अब तो‌,  चलन  आजकल देखें ~

सत्य  बोलना अच्छा  ,  कब यह  माने दुनिया |


ग्राहक ही अब बिकता , देखा  बाजारों में  ,

मीठी   बातें  मिलती ,  केवल मक्कारों में ,

कौन फरिश्ता सुनता , कहता बोल सुभाषा - 

सत्य न्याय है  याचक  , झूठें   दरबारों   में |

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नील वर्णिक छंद - ५भगण +गुरु

२११ २११ २११ २११ २११ २

राम लला अब मंदिर में निकले रहने  ,

छूट गया अब टेंट यहाँ सबके कहने , 

देख रही दुनिया अब आकर भारत में -

जश्न यहाँ पर   है पहने शुचिता  गहने |

~~~~~

दोस्त की दुख में  पहचान  होती है

भाई की भाई में बसी जान होती है

दुनियॉ में जो रिश्ते निभाना जानते

हर मंजिल उन्हें ~आसान  होती है


पत्नी का कदम अगर अपने साथ हो

माता पिता का शुभाशीष भी माथ हो

दुनिया की कायनात कदमों तले होती

ईमान की कलम अगर अपने हाथ हो


बहिन से बढ़कर मंगल तिलक नही है

बेटी बेटा से आगे  कोई झलक नही है

खुदा की राह पर  यदि चलता  है  बंदा

सव कुछ यहीं जन्नत की ललक नही है

~~~~सुभाष सिंघई~~~~

गीतिका

समान्त: आनी---स्वर की बंदिश।

पदान्त: पड़ेगी।

मापनी:१२२-१२२-१२२-१२२

हमें गीतिका भी    सुनानी पड़ेगी |

यहाँ की  वफा भी निभानी पडेगी |


चले थे जहाँ में  लिए झोल झंडा , 

रुके क्यों कहानी  बतानी पड़ेगी |


जहाँ  सोचते है  यहाँ  तो रहेगें   , 

वहाँ पै अदा भी दिखानी पड़ेगी |


नहीं साथ देगा  मिलेगी सजा जो , 

हमें   ही  गुनाही   छिपानी पड़ेगी |


नहीं चाहते हैं  कि यादें  मिटा दें , 

किसी को वफा आजमानी पड़ेगी |


रखा  गेह सोना व चाँदी पुरानी , 

लुटेरा  मिला तो बचानी पड़ेगी |


हमें भी न कोई कहानी सुनाओ , 

गवाही "सुभाषा" दिलानी पड़ेगी |

सुभाष सिंघई

~~~`~``

(चंचरीक छन्द  12+12+12+10 (अंत गा गा )
(हास्य रस में )

होली की धुन  लाया , पहले घर  में गाया ,
जब गोरी घर आया , बोली वह गाओ |

कहती  स्वर है‌ ढीले , लाल हरे कुछ पीले  ,
करो ताल सुर गीले , महफिल‌‌ से जाओ ||

कहता  तभी सुभाषा  , रखता तुमसे आशा  ,
समझो धुन  परिभाषा , निकट जरा आओ |

प्रकट करे नाराजी , बनो नहीं तुम काजी ,
गाने में हो पाजी   , मत  सिर को खाओ ||
🤓🙏🤑
~~~~~~~~~~~~~~
सीता छंद , 15 वर्ण , गालगागा  ×3 +गालगा
हास्य मुक्तक

मैं सुनाता गीत होली   ,चार   आए आदमी ,
गीत पूरा भी   नहीं वे   , झेल पाए  आदमी ,
लोग भूले हैं  मुझे  भी , पूछते  ये   कौन है -
आलमी है या जमीं से , खोद  लाए आदमी |
🤔🙏😁
सुभाष ‌सिंघई
~~~~
फाग

२१२२. ।    २१२२  ।   २१२२।      २१२२
फाग खेले गोपियाँ भी , कृष्ण को काला बताएँ,
मारती   ताना  पुराना  , चोर भी   ऊँचा  सुनाएँ ,
कृष्ण बोले जाइये भी , क्यों यहाँ जूँ मारती हो -
गोपियाँ भी बोलती जूँ , आप है क्या  मार खाएँ |?
🤔🤑😄

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~
हास्य

212       122     122.    212
दिल लगा गधी से  परी क्या चीज है |
मिर्च लाल  खायी  हरी क्या चीज है |
हुश्न था    कभी देखते   थे  लोग भी ,
खाल भी वही  है  उम्र   क्या चीज है |
🤑🙄🤔

~~~~`

(चंचरीक छन्द  12+12+12+10 (अंत गा गा )
(हास्य रस में )

होली की धुन  लाया , पहले घर  में गाया ,
जब गोरी घर आया , बोली वह गाओ |

कहती  स्वर है‌ ढीले , लाल हरे कुछ पीले  ,
करो ताल सुर गीले , महफिल‌‌ से जाओ ||

कहता  तभी सुभाषा  , रखता तुमसे आशा  ,
समझो धुन  परिभाषा , निकट जरा आओ |

प्रकट करे नाराजी , बनो नहीं तुम काजी ,
गाने में हो पाजी   , मत  सिर को खाओ ||
🤓🙏🤑
~~~~~~~~~~~~~~
सीता छंद , 15 वर्ण , गालगागा  ×3 +गालगा
हास्य मुक्तक

मैं सुनाता गीत होली   ,चार   आए आदमी ,
गीत पूरा भी   नहीं वे   , झेल पाए  आदमी ,
लोग भूले हैं  मुझे  भी , पूछते  ये   कौन है -
आलमी है या जमीं से , खोद  लाए आदमी |
🤔🙏😁
सुभाष ‌सिंघई
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फाग

२१२२. ।    २१२२  ।   २१२२।      २१२२
फाग खेले गोपियाँ भी , कृष्ण को काला बताएँ,
मारती   ताना  पुराना  , चोर भी   ऊँचा  सुनाएँ ,
कृष्ण बोले जाइये भी , क्यों यहाँ जूँ मारती हो -
गोपियाँ भी बोलती जूँ , आप है क्या  मार खाएँ |?
🤔🤑😄

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~~~~
हास्य

212       122     122.    212
दिल लगा गधी से  परी क्या चीज है |
मिर्च लाल  खायी  हरी क्या चीज है |
हुश्न था    कभी देखते   थे  लोग भी ,
खाल भी वही  है  उम्र   क्या चीज है |
🤑🙄🤔

~~~`

#ग़ज़ल_आयोजन
#क़ाफिया: आ---स्वर की बंदिश।
#रदीफ़: कीजिए।
#वज्न:212-212-212
●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●
वोट से  भी दुवा कीजिए |
देश की भी सुना कीजिए |

लूटमारी  जहाँ  देश   ‌ में ,
फितरते सब  सफा कीजिए |

चापलूसी   यहाँ  पनपती ,
घाव बढ़ते  दवा   कीजिए |

प्रश्न छोड़ो  यहाँ अब सभी  ,
हो  सके वो  व़फा‌‌  कीजिए |

धार  सूखी नदी की  नहीं ,
जंगलों को  हरा  कीजिए |

देखने   को  जमाना  रहे ,
चाल से नव  हवा कीजिए |

अब 'सुभाषा' यहाँ कौन है ,
कुछ अभी सिलसिला कीजिए |
_________________________
✍️स्वरचित-मौलिक
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०


**नकल में  अकल कुछ लगाने लगे हैं **

मापनी 122 ×4  समांत-आने  , पदांत -लगे हैं


नकल में  अकल कुछ लगाने  लगे हैं  |

जहाँ  छंद   बिखरे     चुराने  लगे हैं  ||

                मिली   छूट पूरी   यहाँ  पर जिसे है 

                 दही  कह   मठा  ही   लुटाने लगे हैं  |

'महल  छंद'  में  जो    बिखेरा   गया  है , 

वहाँ का  लिखा निज बताने  लगे हैं |

                    जहाँ  छंद  की मूँछ  दिखती‌  वहीं  से , 

                    दिखे    हिंदु   मुल्ला  बनाने  लगे हैं  |

जुड़े है    हजारों  यहाँ आप देखो 

नयन के   इशारे    नचाने  लगे हैं  | 

                    मदारी   बने    बंदरों   के   शहर  में 

                    समय  देख  ढपली  बजाने लगे हैं  |

लगी आग   पूरी   न जल है  बुझाने , 

धुआँ  देख गलती  छुपाने  लगे हैं  |

                   नहीं  शर्म  कोई  रखे   वें  " सुभाषा "

                    हवा  देख   लाठी   घुमाने लगे हैं   |

सुभाष सिंघई

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बुंदेली में मनहरण घनाक्षरी (सुभाष सिंघई)


कुत्ता सोफा पै पसरौ  , बिस्कुट खाकैं अफरौ,

डुकरा बैठो   बायरैं ,  संगैं   बैठी   डुकरौ |


बउँ धन लैकैं कैयाँ , लैतइ  खूब बलैयाँ , 

आगें  पाँछै पौछत है ,     सब उकौ बुकरौ ||


किसमत खेले खेली  , कुत्ते  मिले  जलेबी , 

दद्दा रगड़‌ तमाकू ,       बैठो कोने कुकरौ |


रूखी सूकी दद्दा बाई , छ्प्पन  भोग लुगाई , 

माल पुआ कुत्ता खाबे,  घी को सब चुपरौ ||


 









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