छंद महल , निश्चल छंद विशेषांक , माह जनवरी 2023


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भवदीय 
सम्पादक मंडल
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                         🌹  पृष्ठ क्रमांक _ 1
1-अनुक्रमणिका , 
2-सम्पादकीय 
3-शारदे वंदना + महेश बीसौरिया जी 
4 -श्यामराव धर्मपुरीकर जी 
5- सुभाष सिंघई 
6- सुरेन्द्र कौशिक जी‌
7- रामानंद राव जी लखनऊ 
8 - आर० के० प्रजापति जी 
9- सुनील कुमार शर्मा"आकाश" जी
10- सुशील सरना जी 
11- सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर 
13- गिरधारीलाल मीणा जी 
14 - धर्मपाल धर्म जी 
15- शशिकांत पाठक जी  टोंक 
16- सरला भंसाली जी
18- रमानिवास तिवारी जी 
19- पूनम सिन्हा "प्रीत" जी 
20- डा० एन एल शर्मा जी 
22- डॉ० रमेश खटकड़ 'रामा'जी 
23- जयश्री कांत 'जय' जी 
25 -स्वामीप्रसाद श्रीवास्तव जी 
26-जयवीर सिंह अत्री जी
27- कौशल किशोर पांडे आस जी 
37- डॉ. रजनी अग्रवाल "वाग्देवी रत्ना"जी 
38- रंजना झा जी  नेपाल 
39-डॉ०प्रदीप चित्रांशी जी
47- रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार
48- अशोक मिश्र " अनंत " जी बाँदा 
49- ज्ञान प्रकाश दुबे जी
50- जे पी मधुकर जी 
51-डॉ. सोनिया गुप्ता जी 
53- अतिराज सिंह जी बीकानेर 
55-पंकज शर्मा "तरुण ".जी पिपलिया मंडी
56 - बृजेश सिन्हा जी
57- धनंजय प्रसाद यादव जी 
58 - महेन्द्र प्रसाद दुबे ' अमन" जी
59- जया शर्मा जी 
60- संजीव नाईक जी 
62-कंचनलता चतुर्वेदी वाराणसी
63-सुनीता सिंह सरोवर जी देवरिया    
64 - राजीव नामदेव " राना लिधौरी "
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जय माँ शारदे 
💐जय माँ शारदे 💐
१६-७ , चौपाई + ७ , चरणान्त गाल
मात  शारदे  देना  हमको ,  यह वरदान ।
नित्य बढ़ाएं आप कृपा से , अपना मान ।।
विनय यही है रहना हरदम , मात सहाय ~
शब्द सुधा का नित कर पाएं , अमरित पान ।।

सुर प्रदायिनी देना हमको , सुर का ज्ञान ।
वीणापाणी भरो हृदय में ,  मधुरिम तान ।।
शब्द भाव पर गुंजित हो माँ , बस करताल ~
द्वेष  दर्प  से  दूर  रहे  मन ,  पा   सम्मान।।
••••👇
🍒#गीत_सृजन निश्चल छंद मात्रिक🍒
१६-७ चौपाई + ७ मात्रा , चरणान्त गाल ( गुरु लघु )

मानव मन को थोड़ा चंचल , करके देख ।
स्वर्ग स्वयं मरकर दिखता है , मरके देख ।। 

पाप पुण्य का क्यों करता है , व्यर्थ प्रलाप ।
पुण्य तनिक  हल्का होता है ,  भारी  पाप।।
पाप घड़ा तिल-तिल भरता है , भरके देख ।
स्वर्ग स्वयं  मरकर दिखता  है ,  मरके देख।। ,,,,,,,

थोड़े   दुख  से  रोने  लगता  ,  क्यों नादान ।
दुख सह कर ही उभरे तुझ में , नव इन्सान।।
यार  कभी  छाती  पर  पत्थर , धरके देख ।
स्वर्ग स्वयं  मरकर दिखता है  , मरके देख।। ,,,,,,,

अगर नया  अनुभव  करना है , मेरी  जान ।
सहचर कर औरों के दुख में , तन-मन प्रान ।।
पर पीड़ा को निज करतब से ,  हरके  देख ।
स्वर्ग स्वयं मरकर दिखता है  ,  मरके  देख।। ,,,,,,

जग से  क्या  लेना  देना  है ,  आप सँभाल ।
व्याधि अनेक  गले पड़ती हैं ,   कूड़ा  डाल  ।।
"माही" हाल जगत के तजकर , घरके देख ।
स्वर्ग स्वयं  मरकर दिखता  है  , मरके देख।। ,,,,,,,

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🍒निश्चल छंद पर आधारित गीत :-🍒
🍎विधान- 16,7 पर यति, अंत गाल अनिवार्य. 🍎

प्रथम नमन माँ शारद तव है, जय-जय कार । 
भाव-पुष्प  अर्पित  कर  वंदन,       बारंबार ।

रचकर  माँ  यश-गाथा  तेरी,   गाऊँ  नित्य । 
निश्चल  छंद रचूँ  नित  सुंदर, नव-साहित्य । 
वरद-हस्त माँ सिंर पर हो नित, करूँ गुहार । 
भाव-पुष्प  अर्पित  कर  वंदन,      बारंबार ।

निखरे  माता  रूप-निराला, गाऊँ  गीत। 
करके नित मैं अनुपम चित्रण,पालूँ रीत। 
जय-जय माता तेरी महिमा,   अपरंपार। 
भाव-पुष्प अर्पित कर वंदन,    बारंबार। 

अभिनव रचना अनुमोदन तव, मन में प्रीत। 
सारा जग करता अभिनंदन,  बनकर  मीत। 
रचे-तूलिका  नित  नव  सुंदर,   तव-शृंगार। 
भाव-पुष्प अर्पित कर वंदन,         बारंबार। 

••••एवं 👇
🍎आधारित  गीतिका:-🍎
मानवता के हित में मानव, मरना सीख। 
नर में नारायण के दर्शन,  करना  सीख। 

पथ प्रशस्त हो सबका जग में, मिलती राह, 
खुशियाँ बन जीवन.में सबके, झरना सीख। 

टला नहीं है अब भी संकट, बाकी रोग,
कोरोना से बचने मानव , डरना  सीख। 

जिजीविषा ही जीवित रखती,हमको आज, 
कदम-कदम तू गिनकर आगे, धरना सीख। 

कर्मों की  संचित  पूंजी  ही,  आती  काम, 
जीवन बीमा की किश्तें नित, भरना सीख। 
•••एवं 👇
🍎ताटंक छंद पर आधारित गीतिका:-🍎
🍒विधान - 16,14 पर यति, अंत में गुरु गुरु गुरु. 🍒

मानव जीवन सुखी बनाने,अनुपम यह ऋतु आई है। 
नये-साल  की  नव बेला यह,  नव  सौगातें  लाई  है। 

सरसी सरसिज सुंदर सजते, स्वागत द्वार सजे देखो, 
बजे दुंदुभी स्वागत करती,  अलि ने  आज बजाई  है। 

सैय्यादों  की  बेरहमी  ने,      कैद  रखी  थीं  सांसें  जो, 
विगत साल की व्यथा-कथा भी, बुलबुल नें हमें सुनाई है। 

तन-मन रोमांचित हर्षित है,नव उत्कर्षी यह मेला, 
कदम-ताल करती सेना यह,   फूली नहीं समाई है। 

लिखे समय इतिहास सभी का, फूल-शूल पथ में दोनों,
नये  स्वप्न हों नये साल में,       नयन-ज्योति  जलाई  है। 
••••एवं 👇
नोक-झोंक से मानव मन में,    होता हर्ष । 
सहज जिंदगी जीता जग में,   हो उत्कर्ष । 
सरल सादगी से मिटता यह, मन आमर्ष ।
बाँटो खुशियाँ जग में इतनी, बन आकर्ष । 

मानव जीवन सदा तरंगित,    मन में  चाह ।
मंजिल तक जाने को पाता,     सुंदर   राह । 
श्रम से उसने सब कुछ पाया, मिलती वाह । 
बाँटो खुशियाँ जग में इतनी,  मिटती  आह ।
•••एवं 👇
निश्चल छंद पर आधारित मुक्तक:-
जग में  सबसे  सुंदर  न्यारा,    हिंदुस्तान ।
जनगणमन  गाएँ नव पक्षी,  कलरव गान। 
काम शुरू करते सब अपना, जीवन-धर्म -
रोज सबेरे सूरज लाता ,   ललित  विहान। 

आशा सुंदर जीवन सुंदर,  मन में चाह ।
नित्य निरंतर चलते रहना, अपनी राह ।
चलते रहना जीवन सुंदर, रुकना मृत्यु -
गाते चलना सदा तराने,  मिलती वाह । 
•••••एवं 👇

हिंदी विश्व-दिवस संकल्पित,  हिंदुस्तान।
बनी अटल के संभाषण से, नव पहचान।
हिंदी  से  ही  उन्नत  भारत, बढ़ती  शान। 
हिंदी  भाषा  वैज्ञानिक  है,    दें  सम्मान। 

भारत माता  की  बिंदी  है,  ललित  महान।
जन-जन की भाषा हिंदी है, अरुण वितान। 
जनगणमन  का  गाती  हिंदी,  गौरव  गान। 
वनी  विश्व  की  भाषा  हिंदी,   भरे  उड़ान। 
👇
निश्चल छंद पर आधारित मुक्तक-
अतिशय शीत भयंकर देखो,   जैसे    युद्ध। 
मानव लड़ता हो मौसम से,    कुदरत क्रुद्ध। 
स्वार्थ-लिप्त हो जंगल काटे,    दूषित दृष्टि -
बदले मानव दशा दिशा को, शत-शत शुद्ध। 

धनपति सुखमय जीवन जीते,   कष्ट विहीन। 
बिना वस्त्र  के  रात  बिताते,    निर्धन   दीन। 
सुख का सूरज कब निकलेगा,   होगी   भोर -
भूखा-प्यासा श्रमिक न सोये, प्रभु दुख छीन। 
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निश्चल छंद पर आधारित मुक्तक:-
रूप-धरा  का  सुंदर  सज्जित, अद्भुत  रंग। 
बर्फीली  चादर  पर्वत  पर,       भरे  उमंग। 
कल-कल करते झरने बहते, अनुपम दृश्य-
स्वर्णिम किरणें मनहर लगतीं,  आभा संग। 

वसुंधरा पूरित वैभव से,          मनुज  मलीन। 
स्वार्थ-अंध हो मानव जीता,      बनकर  दीन।
खुद को ही वह छलता, रखकर, मन में खोट-
गलत दिशा में चिंतन का फल,  मिलता हीन। 
👇
निश्चल छंद पर आधारित बाल-गीत:-
विधान- 16,7 पर यति, अंत में गाल अनिवार्य. 

लगे सुहाने सुंदर मेले,  आओ मित्र। 
मेला घूमें झूम-झूमकर, खींचे चित्र।।

रंग-बिरंगी  उड़ें  पतंगें,       मन  में  हर्ष। 
छू-सकते हो छू लो नभ को, हो  उत्कर्ष।।
काम करोगे जब तुम सुंदर,  महके  इत्र। 
मेला  घूमें  झूम-झूूमकर ,   खीचें  चित्र।।

चलो हिंडोला झूलें गुड्डू,         होकर मस्त। 
सब मिलकर हम लड्डू खायें, आलस ध्वस्त।।
तिल गुड़ खाने से बनता तन,    सदा  जनित्र। 
मेला घूमें झूम-झूूमकर,           खीचें   चित्र।।

नाचो गाओ  खुशी मनाओ,   हो  आनंद। 
मटर टमाटर मूली धनिया,    ले लो कंद।।
बनती सेहत सुंदर तन-मन, बनें न  भित्र। 
मेला  घूमें   झूम-झूमकर ,    खीचें चित्र।।
👇
निश्चल छंद पर आधारित मुक्तक:-
विधान- 16,7 पर यति, अंत गाल अनिवार्य. 

कोटि-कोटि वंदन अभिनंदन,   नमन सुभाष। 
आज अवतरित भारत-नंदन,    नमन सुभाष। 
अपना निज सुख नित ही त्यागा, नमन सदैव-
तुम्हें पुकारे यह जनगणमन,    नमन  सुभाष। 

आजादी का पाठ पढ़ाया,   नमन सुभाष। 
भारत माँ का मान कराया,  नमन सुभाष। 
रिपु को भी औकात दिखाई, नमन सदैव-
जीवन जीना हमें सिखाया, नमन  सुभाष। 
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छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह जनवरी 2023  🍒      🦜     निश्चल छंद  विशेषांक )~~🍒🦜
                         🌹  पृष्ठ क्रमांक _   5
जिसका जग  में साथ  निभाते  , कर विश्वास |
जिसको भी हम माने दिल से, अपना   खास |
आगे   की   मत    पूछो  कैसी , मिलती  घात ~
जहाँ   घाव  कुछ लग जाते  है   , उगते  त्रास  |

सीने  पर  आरी  चल   जाती  , चुभे   कटार |
सदा   पीठ पर मिलते  रहते  , है    कटु वार |
खेल खेलते   लोग  निराले  , चलकर   चाल -
जगह- जगह पर मिले देखने  , जलते  खार |

नाम  आपका  लेकर    होते  , ऐसे  काम |
जगह -जगह पर होते   रहते  , है  बदनाम |
समझ न पाते   कोई  फितरत, कोई  भेद - 
पता न चलती अब घातों की ,  कोई  शाम |



बनने का जब अवसर  आए , बनना खास |
भक्त बनो हनुमान  सरीखे , प्रभु  के  पास |
संत हुए रविदास भगत जी  , जग  में नाम -
गंगा को खुद‌  पाया  घर में  , रखे   उजास |

पत्थर  जैसा   टूटा   देखा  ,  है  अभिमान |
नहीं   नीर की  टूटी   देखी,  हमने    आन |
एक   चोट  से  पत्थर  ‌ टूटे ,  बिखरे   राह ~
पानी हँसता कभी न खोता ,  अपनी  शान |

जगह- जगह पर देखी गलियाँ, उगते  शूल  |
जहर बरसता  वहाँ न  खिलता , कोई  फूल |
आज धरा पर   रोता मिलता ,   है  विश्वास -
यहाँ    झूठ को   अच्छे-अच्छे  , देते   तूल |

समय मिले जब लिखते जाओं, कुछ  उद्गार   |
भाव  हृदय  के  सुंदर लाकर,   कर उपकार  |
मात्    सरस्वति    कृपा   करेगी  , देगी  नेह -
सार पकड़कर   सार निकालो,  बाँटो   सार |

शीत माह  की  धूप  सुहानी ,  खिलते बाग |
मोर  हृदय  का हर्षित  होता  , सुनता  राग |
सुमन खिलें मन में मनमोहक , हँसते  फूल - 
लेखन से कुछ पावन  होता ,मन का  भाग |

मंजिल भी मिल जाती उनको , जो हो काम  |
सूरज तपकर   ठंडा   होता ,  आए   शाम ||
कीचड़ भी जब कमल खिलाता, महके गंध -
जीत सत्य की   रहे   हमेशा ,    होता    नाम |

जहाँ कोठरी  काजल की है , लगते  दाग |
सुनी  कहावत बहुत पुरानी , जलती आग |
तपकर बचकर जो भी निकले , होता संत - 
आगे   जीवन   उसका   देता , सदा‌ पराग |

कभी -कभी मैं देखा करता , अपनी दाल |
लोग गलाने  चल पड़ते है , चलकर  चाल |
बीन बजाते खूब  हिलाते,   अपना  शीष  -
नहीं सफलता मिलती उनको , करें मलाल |

खरबूजा   खरबूजे  के सँग , बदले   रंग |
सदा एक- सा कर   लेते है  , अपना ढंग |
हो   जाते   है दूर  सदा   को  , टूटें  डाल - 
अपनी- अपनी राह चले सब  , रहते तंग |

सुभाष सिंघई 
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नव वर्ष विश्व में शांति का प्रसार करे, और विश्व में फैली, विनाशकारी कटुता को सृजनकारी प्रेम में परिवर्तित करे, विश्व में फैले रोग दोषों का नाश करे।
     🍒 नव वर्ष की मंगल कामनाएं🍒
           
   नए वर्ष का नया सवेरा, नव उजियार।
कटुता भूलो भूत वर्ष की, कर लो प्यार।।
आज मिटा दो दिल से अपने, कलुषित खम्भ।
प्रेम पाश में सब से बँधकर, छोड़ो दम्भ।।
                    🇳🇪🇳🇪
नया  वर्ष  है,  नए  तराने,  नव  आनन्द,
अब मुश्किल की हो जाएँगी, राहें बन्द,
करो प्रार्थना प्रभु से ही तुम, जागे प्रेम~
नाश करो भारत अरियों का, बचें न चंद।
••••👇

समय कहाँ कब स्थिर होता, हर पल नव रहता भाई।
कभी तवंगर मुफलिस बनता, रोग शोक सहता भाई।

पावक गिरि जब तक सोता है, तब तक सब कुछ प्यारा है।
सदियों में भी यदि जागा तो, हर उपवन संहारा है।।
कभी राई पर्वत बन जाता, और कभी बनता राई।

चांँद सितारे चौबिस घंटे, नभ में रहते हैं सारे।
सारी रात सजाते नभ को, झिलमिल कर चंदा तारे।।
निकला दिन तो गायब होते, जैसे फट जाती काई।

हरिश्चंद्र राजा सतवादी, सुत,दारा प्राणों प्यारे।
चाल काल की जब है बदली, काशी बीच बिके सारे।।
कष्ट भोग फिर काल बदलता, नरमाई फिर से आई।

समय सही जब राजतिलक को, जाता कौशल्या प्यारा।
चला राम पर चक्र समय का, भगवा बाना है धारा।।
चौदह सालों तक वन भटके, सँग लछमन, सीता माई।
••••एवं 👇  

जो मर्यादा  कुल की चाहें, रखते  शांति,
सद्विचार दिल में रखते हैं,मुख पर कांति,
पाप  नहीं है  उनके दिल  में, मन  है शुद्ध ~
नहीं किसी को दुख देने की,पालें भ्रांति।
                     --::::--
नहीं पराए धन पर रखते, अपनी आंँख,
अपने धन को रखते हैं वे,अपनी काँख,
पूरी सोच समझ से करते, अपने काम~
औरों के कामों में करते, ताक न झाँक।
•••👇एवं 
 आज  देश की  सीमाओं  पर, डटे जवान।
करें  सामना  तूफानों का,  सीना  तान।।
श्वास जहांँ मुश्किल हो लेना,उच्च पहाड़।
वहीं बर्फ के  अंदर रह कर, रहे  दहाड़।।
                    🇳🇪🇳🇪
आज  घरों  में  हम  सोते  हैं,  हो  बेफिक्र।
त्याग जवानों का हम करते, कभी न जिक्र।।
कैसे  हम  उन  जाँबाजों  को,  जाते  भूल।
हम सब तो अपनी ही धुन में, हैं मशगूल।।
•••👇एवं 
हुई   प्यार  की  है   बदनामी, चाहें  जिस्म।
नजर मिली बस हो जाता है, एक तिलिस्म।।
कुछ  दिन  में हो  जाते हैं  बस, सारे  काम।
कैसी मिली प्यार को  किस्मत, है बदनाम।।
                     😭😭
प्रेम नहीं उसको कहते हैं, जिसमें लोभ।
सच्चे प्रेमी कभी न करते, कोई क्षोभ।।
प्रेम नहीं नापाक कभी हो,करता त्याग।
सच्चा प्रेम मिले तो किस्मत,जाए जाग।।
👇 

नहीं सुनेंगे मात-पिता की, जो कुछ बात,
सहनी पड़ जाएंँगी उनको, सबकी लात,
नहीं मानते  जो अपनों को,  समझें  गैर~
जल्दी जान पड़ेगी उनको, निज औकात।
              🌺🌺🌺🌺
जिन गैरों को समझ  रहा  तू, अपना यार,
वही  लोग   बो  देंगे   तेरे,  पथ   में   खार,
मित्र  बनाने  से  पहले  तू,  नीयत   जान~
सही मिले जो तब ही उससे,  करना  प्यार।
👇
  
इच्छाओं को वश में रखते, बनते वही महान,
सारा जग करता है उनका, निशि दिन ही गुणगान,
समाधान हो सभी समस्या, हो जब इच्छा त्याग~
बोझ नहीं कुछ मन पर रहता, जीवन हो आसान।
                --::::--
इच्छाएं जब मर जाती हैं, लालच जाए डूब,
शब्द न्याय के मुख से निकलें, झूठ वचन से ऊब,
सत पथ पर अग्रेषित होकर, भोगे सुख आनंद~
चिंतित कभी न मानव होता, मिले शांति मन खूब।
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🔸🔸🔸•••🔸🔸🔸•••🔸🔸🔸•••🔸🔸🔸
छंद महल की इस बगिया  में, फूल  अनेक।
गूंथ  सभी  को  बन  जाती  है, माला  एक।।
सबसे   प्यारा  सबसे   सुन्दर,  है   परिवार।
सरसी छप्पय लिखता कोई, लिखता  सार।।
🌿✍️
नहीं कठिन है  कुछ  भी  भाई, है  सहयोग।
नहीं  द्वेष  छल  यहाँ  मिलेगा,  कोई   रोग।।
स्वच्छ लोग हैं छंद महल में, मिलता  प्यार।
छंद  सीखने  का  सुन्दर  है,  यह   आधार।।
🌿✍️
नये - नये   छंदो   को   लेकर , है   आनंद।
चलो लिखें हम सारे मिलकर,निश्चल छंद।।
सोलह सात यहाँ  यति  तेइस ,मात्रा  भार।
छंद सिखाया जाता  है  नित, कई  प्रकार।।
🌿✍️
बहे ज्ञान की  गंगा  जिसकी, निर्मल  धार।
छंदामृत  रस  बहती  इसमें,  लो   आहार।।
विद्वानों की  टोली  सुन्दर, मिलती  सीख।
गुरु ज्ञानी  से  पाते  हैं  हम, शिक्षा  भीख।।
🌿✍️
•••एवं 👇
🍒 "गीतिका" 🍒
🍎16-7 पर यति पदांत गुरु लघु,समांत-आन, अपदांत।🍎

माघ महीना ठंडी  में  जब, पथ  सुनसान।
गर्म  रजाई  में   धन  वाले,  सोये    तान।
🌿✍️
गर्म-गर्म खाने  की  सुविधा, काफी  चाय,
गर्म  समोसा  बने  पकौड़ी,  ले  पकवान।
🌿✍️
सड़क किनारे भी जीवन है,नभ को ओढ़,
घास  फूस   के   टूटे  छप्पर , जन  हैरान।
🌿✍️
नहीं पास में  खाना  कपड़ा, पड़ती  शीत,
नहीं  ठिकाना  रैन  बसेरा, कहीं  मकान।
🌿✍️
मरते दीन कृषक कुछ  ऐसे, जो  मजदूर,
बाल  वृद्ध  नर - नारी  कोई, रहे  जवान।
🌿✍️
इनसे अच्छा जीवन  जीते, कैसा  भाग्य,
शयन कक्ष में धनवानों के, जो  हैं  श्वान।
🌿✍️
बंद  कार  में  घूम  रहे  हैं,  लगे  न  ठंड,
मालिक कुत्ता मौज मनाते, एक समान।
🌿✍️
सब कुछ धरती पर है भाई,मत दो  दोष,
सब समान धरती पर होते,यदि भगवान।
🌿✍️
दीन  गरीबों  का  ईश्वर  पर, है  विश्वास,
श्वान  सोचता  मेरा  ईश्वर,बस  धनवान।

        श्वेत शीत की चादर फैली,दिखे  न  भोर।
चुरा  लिया  सूरज  को  जैसे, कोई  चोर।

बर्फीली  सी   चले   हवाएं,  बढ़ती   ठंड,
शून्य पड़ा है गात सभी का, चले न जोर।

छिपे  हुए  हैं  पशु  पक्षी   भी,  हैं  बेहाल,
नहीं बाग में कोयल कागा, दिखता  मोर।

कैद घरों में  हैं  नर - नारी, जले  अलाव,
अस्त व्यस्त जन जीवन ठंडी,है घन घोर।

कहीं बर्फ तो शीत कहीं पर,ढका पहाड़,
दिन  में  भी  अंधेरा  छाया, चारो  ओर।
•••👇
छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह जनवरी 2023
निश्चल छंद आधारित "गीतिका" 23 मात्रा,
घिरी  हुई  तूफानों   से   वह , छोटी   जान।
फिर भी चेहरे पर  अच्छी  सी ,है  मुस्कान।

नफरत  की  है  आँधी  उसके, चारो  ओर,
नहीं  मिटा  सकता   है  कोई, भी  तूफान।

विकृत रूप  धर नभ  से  चाहे ,बरसे  मेघ,
भिगो  नहीं  सकते  ऊँचे  हैं, जो  अरमान।

वह पात्र घृणा का भी बनकर,रखती ठाठ,
देश  और  दुनिया  में  उसकी, है  पहचान।

संत-साधु ऋषियों की संगति,सबका साथ,
देव  और  ईश्वर  का  उसको, है   वरदान।

हँसना और हँसाना बस है, उसका  काम,
सुबह शाम केवल करती है,अमरित पान।

सूर कबीर तुलसी मीरा कवि,के अनमोल,
शब्द प्रेम की "लौ"कहते सब,एक जुबान।

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निश्चल छंद आधारित "गीतिका" 23 मात्रा,
माँ से बढ़कर इस दुनिया  में, किसका  प्यार।
माँ  ही  सब  कुछ  है  जीवन  में,वह  संसार।।

देवी   से    ऊँचा    माता    का,   है    स्थान,
यहीं  साथियों   फूल  चढ़ाना,  सुन्दर   हार।

सुख मिलता है माँ  चरणों  में,  मिले  सुकून,
लिए थाल में माँ का  जल  से, पाँव  पखार।

मातु - पिता  तो  ईश्वर  सबके, रहे न  कष्ट,
इनका दिल है  निर्मल  जैसे ,अमरित  धार।

लोग  पूजते  पत्थर  तरुवर,  और   पहाड़,
वृद्धाश्रम  में  माँ  को  छोड़ें,  कष्ट  अपार।

कोख मास नव लेकर ढोती, वह मल  मूत्र,
साफ-सफाई कर जीवन को, दिया  सँवार।

बच्चो को वह सुख से पाले, रख  उपवास,
सागर से गहरा दिल माँ  का, श्रेष्ठ  विचार।
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निश्चल छंद आधारित "गीतिका"
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है उदार यह हिंदी भाषा,----सबकी शान।
आज विश्व गाता हिंदी का,-मधुरिम गान।

शब्दों से सजती है हिंदी,----बनकर हार ,
गर्व पर्व त्यौहार हमारी,----है यह  आन।

भारत माता की बिंदी है - -----यह श्रृंगार ,
सत्य झूठ की दर्पण हिंदी,अतुलित ज्ञान।

हिंदी की महिमा है न्यारी,--रीति रिवाज,
तीज चौथ करवा नारी की,--है परिधान।

भरा हुआ है इसके  अंदर, सार  अथाह,
सागर से भी गहरी फिर भी, है  आसान।

वेद पुराणों की यह भाषा,--अमृत  धार,
कवियों की भाषा है हिन्दी,रस की खान।

संस्कृत की बेटी मुँहबोली,-गुण भरमार,
गर्व बहुत हम इसपर करते,हैं अभिमान।
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निश्चल छंद आधारित "गीत"
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लगे पराया  दिखे  न  कोई, अपना  खास।
वृद्ध  अवस्था  जीवन  भारी, लगे  उदास।।

बचपन  बीता  गई  जवानी,  होकर  वृद्ध।
देख  रहें  हैं  इधर - उधर  वे, जैसे  गिद्ध।
नहीं  चाहता  आना  कोई , उनके   पास।
वृद्ध  अवस्था  जीवन  भारी, लगे उदास।।

साथ सभी थे युवा  रहे  जब, कैसा  ठाट।
आज अकेले  पड़े  हुए   हैं,  टूटी   खाट।
अपनो के सब  रहते  भूखे, होती  प्यास।
वृद्ध अवस्था जीवन  भारी, लगे  उदास।।

हँसना रोना जीवन किस्से, सबके  साथ।
आता है वह दिवस सभी का, छूटे  हाथ।
उसी  समय  के  सारे  बंदे,  होते   दास।
वृद्ध अवस्था जीवन भारी, लगे  उदास।।

साथ  छोड़ती  परछाईं  भी , बूरे   वक्त।
भक्ति भाव में रम जाते हैं, हो  आसक्त।
अंत समय केवल ईश्वर में,बस विश्वास।
वृद्ध अवस्था जीवन भारी, लगे उदास।।
🍎समांत-आए पदांत-नूतन वर्ष🍎
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मुद मंगलमय समय सजाए नूतन वर्ष।
प्रेम अमिय समरस बरसाए,नूतन वर्ष।

सपने सुंदर नवल पले जो,हों साकार,
राह लक्ष्य की सुगम बनाए,नूतन वर्ष।

बीत गया जो कल अड़चन में,कारण ढूंढ,
साहस  धैर्य  उमंगें  लाए,  नूतन वर्ष।

खुद को बदलो जग बदलेगा,मानो सत्य,
यही भावना  मन  उपजाए, नूतन वर्ष

धर्म कर्म  मिलकर् ही बनते,शुभ सत्कर्म,
ऐसा  शुभ  संयोग  बिठाए, नूतन वर्ष।

"साथी"ईश्वर से यह विनती,दो वरदान,
ब्याधि हरो शुभ मंगल आये,नूतन वर्ष

•••••एवं 👇
🍎समांत-आस अपदान्त🍎
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सागर के  खारे पानी से, बुझे न प्यास।
मन की मीठी गागर घर में,पड़ी उदास।

पुण्य  कमाने  घूमें  मंदिर,  तीरथ  धाम।
घर के मातु पिता का करते,नित परिहास।

चाह आसमां  में  उड़ने को, गढ़ते स्वप्न,
भूल गया मधुरम माटी का,ही मधुमास।

हो जाते जब दिल के नैना, दो से चार,
माता से मुँह  मोड़ें लगती,प्यारी सास।

नहीं भरोसा खुद पर रहता,घटिया सोच,
करे  चापलूसी  गैरों की, बनकर दास।

ऑंगन की बगिया की तुलसी,से परहेज।
खुशबू खोज रहा जंगल में,देख पलास।

आभासी दुनिया में रहता,दिनभर मस्त।
शूल बने हैं रिश्ते नाते, जो अति खास।

"साथी"  कैसे -कैसे  मानव,  खेलें  खेल,
मानवता का मधुरम रिश्ता, रहा न पास |
••••|एवं 👇
🍒समांत-ओर अपदान्त🍒
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चतुर चाल चलते चटकीली,बन चितचोर।
चुपके चाबुक चला चला कर,करे किलोर।

स्वार्थ सिद्ध से सुख को सींचे,रहें न शान्त
दर्द  दूसरों के  दारुण लख, भाव विभोर

मुख मासूम मलिन मन मचले,मतलब देख,
गाँठ-गाँठ में गरल गले तक,ओर न छोर।

मगरमच्छ के आँसू छलके,बगुला भक्ति,
ढोल  पीटते  बेमतलब  के,दें  झकझोर।

चतुराई के हथकण्डे सब, जिसके पास,
वही बना दे  उल्लू  सबको,करे न शोर।

धीरे-धीरे समझ सके  जो,  रहता  पास,
"साथी"पोल खुले आँखन की,भींगे कोर।
••••एवं 👇
समांत-अते पदांत-लोग
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बोलूँ तो बकबक करता हूँ, कहते लोग।
मौन रहूँ  तो  गूंगा  कहते, फिरते लोग।

समय न आये उनके मन की,सारी बात।
सीधा- सादा बन दिखलाऊँ,ठगते लोग।

श्रम कर कमा रहा दो रोटी, रहता मस्त।
सुख से हँसता देख निकम्मे,जलते लोग।

कर्तव्यों  का  बोध  कराऊँ, होकर नम्र,
उल्टी मुझको डाट पिलाकर,तनते लोग।

कैसे काम करूँ मैं सबके,मन अनुरूप।
मेरे   आगे   उल्टा- सीधा, बकते  लोग।

"साथी" चिंता छोड़ स्वयं पर, देना ध्यान
जाल बुना उसमें ही खुद ही,फसते लोग।
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व्यथित पार्थ प्रिय को समझाते, माधव कृष्ण।
धर्म   कर्म  का  मर्म  बताते,   माधव  कृष्ण।

कर्म तत्व जीवन  का  केवल, है पुरुषार्थ।
सब जीवों के कर्म सुनिश्चित, सत्य यतार्थ।
अकर्मण्यता  ही  कर देती, सर्व  विनाश,
मन मलिन कायर का गहना,है सुन पार्थ।

कर्तव्यों  का  बोध  कराते,  माधव कृष्ण।

अपना कौन पराया जग में, खोलो दृष्टि।
स्वार्थ मोह से भरी  पड़ी है, सारी  सृष्टि।
सदा अंधविश्वासी बन मानव,रहता त्रस्त,
कभी कभी बेमौसम में भी,हो जल वृष्टि।

सुप्त हृदय में जोश जगाते,माधव कृष्ण।

मैं ही जग  का   नियति  नियंता, हूँ सर्वेश।
अंश रूप  ही  हर  जीवों में,  करूँ  प्रवेश।
जिस निमित्त जिसको भेजा है, करे सुकर्म।
मोह छोड़  धनु वाण  उठाओ, मम आदेश।

गीता का उपदेश सुनाते, माधव कृष्ण।
धर्म कर्म का मर्म बताते, माधव कृष्ण।
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🍒निश्चल छंदाधारित गीत 🍒
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क्यों करते हो भाई चिंता, तुम बिन बात।
ईश भजन से कटे दुखों की,काली रात।।
द्रुपद सुता की संकट में जब, आई लाज।
मौन सभी बैठे थे पांडव,खो कर ताज।।
बनकर आँसू बहे सभा में,सब जज़्बात।
ईश भजन से कटे दुखों की, काली रात।।

मगरमच्छ ने पकड़ लिए थे,जब गजराज।
 रक्षा करने श्री हरि आए, सुन आवाज।।
हर रजनी के पीछे निकले,नवल प्रभात।
ईश भजन से कटे दुखों की, काली रात।।

माना तेरा समय नहीं है,अब अनुकूल।
जीते सच्चाई आखिर में,यह मत भूल।।
सहनी पड़ती बुरे दिनों में,सबकी लात।
ईश भजन से कटे दुखों की काली रात।।

सुनील कुमार शर्मा"आकाश" नीमराना, अलवर (राज.)✍️
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शीत  काल  की  रैन  सुहानी, प्यासे  नैन ।
तन्हाई  में  मन  को मिलता ,जरा न चैन ।
विरह  व्यथा  में  तड़पूँ  मैं तो, सारी  रैन ।
रह-रह दिल को बहुत रुलाते, उसके बैन ।
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💐निश्चल छंद मुक्तक 💐

लगें   अनोखी   उसकी   बातें , वाह   कमाल ।
छमक- छमक बाजे पायलिया, मृग  सी चाल ।
नैना   तो   मस्ती   के   प्याले,  बहके   पाँव  - 
उल्फ़त  की  रातों  में   आते ,मस्त    खयाल ।

निश्चल छंद 
अच्छा लगता है इस दिल  को , उसका प्यार। 
कैसे  भूले  आखिर  ये  दिल , उसका   द्वार ।
रूठ   गई  है   जैसे   जग  से, मस्त   बहार ।
उसके   सपनों   से   अब  रातें, हैं  गुलजार ।
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निश्चल छंद 
शीत  ऋतु  में  सबको  लगती , बैरी  छाँव ।
टुकड़ा  -  टुकड़ा  धूप  ढूँढते, थकते  पाँव ।
गरम  चाय  की  चुस्की  एसी, निकले भाप।
जलती लकड़ी से ही मिलता,आखिर ताप ।

शाल  रजाई   दिल को भाती , लगती  ठंड ।
ऐसा लगता बिन  मतलब  के ,मिलता  दंड ।
ठंडे  मौसम  से  इस  दिल  में, बढ़ती  प्रीत ।
धक धक करती धड़कन में ज्यों , हो संगीत ।
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करूँ शारदे छंद सृजन शुभ, देना ज्ञान।
सत्य भाव का जान सकूँ मैं, दो वरदान।।
लय ललिता सुर ताल सजाऊँ, अद्भुत गीत।
सबके मन को मोह सकूँ मैं, सबका मीत।।

नीति रीति सम्मान सभी का, रखना ध्यान।
सबकी सबसे प्रीत बढ़े अब  , कर सम्मान ।।
देवी कल्याणी कर देना, बेड़ा पार।
उत्सुकता से देखे मुझको, यह संसार।।

मन में निर्मल भाव रहें बस, है अरमान।
गीत हमारे गूँज बढ़ाएं, सबकी शान।।
मिटे बैर के बीज दिलों से, हो सद्भाव।
बढ़े मान-सम्मान जगत में, घटे दुराव।।

सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर ✍️
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•••एवं 👇

शीत लहर चलती है भारी, देना धूप।
सूर्य देव दिखलायें अपना, दाहक रूप।।
पाला पड़ता खूब यहाँ पर, फसल खराब।
मुश्किल हुआ नहाना धोना, छूना आब।।

सुबह धुंध में मत कुछ दिखता, सूनी राह।
जीव जंतु सब काँप रहे हैं, जीवन चाह।।
इस सर्दी में एक सहारा, बना अलाव।
चौपालों पर आग तापते, बढ़ा लगाव।

सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर✍️
••••एवं 👇
चतुराई घट गयी हमारी, बिगड़े काम।
पहले थे जो अच्छे खासे, लगते आम।।
कहते सब विद्वान गुणी जन, चिंता छोड़।
निकले सच्ची राह बने है, सुखमय मोड़।।

मेहनत पर विश्वास हमारा, निश्चय नेक।
सबको लेकर साथ चलेंगे, रस्ता एक।।
आयें सब मिल करते वादा, देना मान।
मानव हैं मानवता का हो, सबको ज्ञान।।

©सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर
👇
पंक्षी बन मन उड़ता जाता, चंचल मोर।
नहीं देखता रात दिवस वह, संध्या भोर।।
वन उपवन नदियाँ पर्वत सब, लेता छान।
देश विदेशों में यह घूमे, लेता ज्ञान।।

छोड़ लोभ मद माया मत्सर, दुनिया झूठ।
लम्बी छाया पड़े दिखाई, चाहे ठूठ।
क्षमा दया धीरज गुण होते, मानव मूल।
सुमिरन में रम जा प्राणी मत, भगवन भूल।।

©सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर
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बीती बात भुलाकर अपनी, गलती मान।
हँसी खुशी आगे बढ़ना है, अद्भुत ज्ञान।।

मिला हमें मानव तन कर ले, प्रभु आभार।
साहस सत्य बना ले संबल, कर अभियान।।

हल होगा हर प्रश्न कठिन अब, रख विश्वास।
आगे बढ़ो राह की मुश्किल, हो आसान।।

मानवता का मूल समझ ले, कर उपकार।
हर दिल से जो मिलें दुआएँ, अमृत खान।।

चलता जा मत समझ अकेला, मंजिल पास।
मिलनी है तय मान सफलता, मन में ठान।।

सर्वानन्द सिंह "पथिक"जमशेदपुर
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निश्चल छंद आधारित मुक्तक (१६,७)

धर्म युक्त जब होंगे जग में, सारे काम।
भाईचारा होगा सबमें, सुख का धाम।
विश्व करें उत्थान निरंतर, पाये चैन-
सभी स्वप्न साकार करें हम, लें प्रभु नाम।

मात शारदे देना मुझको, समुचित ज्ञान।
ऐसा कुछ लिख पाऊँ माता, हो वरदान।
मिले सभी को प्यारी बोली, मानव मूल-
सबको सच का बोध करा दो, हे भगवान।

©सर्वानन्द सिंह "पथिक" जमशेदपुर
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हरदम स्वागत करें तुम्हारा, हे नववर्ष।
कठिन घड़ी में भी तुम देना,बस उत्कर्ष।।
नहीं छोड़ना कर तुम मेरा,अब प्रति वर्ष।
संकट सारे दूर करो बस, देकर हर्ष।।

अंतस में भर प्रीत सदा ही, गाएंँ गीत।
तजकर ईर्ष्या द्वेष बनाएँ,सबको मीत।
नहीं किसी को हार मिले अब, सबको जीत।
बनें सभी ही वीर मिटे हर, मन से भीत।।
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स्वागत करले अपने मन  से ,  है  नव  वर्ष ।
पूरा  करले  लक्ष्य  सभी  तू ,     बरसे  हर्ष ।।
लिखले अपने भाग्य लेख को ,फिर कर कर्म ।
रचना  कर  तकदीर  बना  ले ,   उत्तम  मर्म ।।

आया है नव वर्ष उठो सब , करो विचार ।
अपने अपने काम करो सब , हो तैयार ।।
मंजिल अपनी पाँव तले हो , मन में धार ।
बना हौसला मन में ऐसा ,  निकले   सार ।।
•••👇

नई साल का नया  सवेरा ,    बिस्तर  छोड़ ।
नूतन विकल्प से सब लाओ,   जीवन मोड़ ।
खुशियां होगी आँगन में अति ,   सुन्दर भोर ,
होश जोश अब पूरा भरले  ,   बन्धन  तोड़ ।

किरण सूर्य की नभ में  छाई , खग की  राग ।
खुशबू आती  खुशिया  भरती ,  सुन्दर  बाग ।
नये  वर्ष  का  नया  सवेरा ,   दिखती   राह ,
किरण देख कर दुनिया जागी , अबतो जाग ।।

आलस  छोड़ो  मन  के  सारे ,  प्यारी  भोर ।
गगन  लालिमा  सुन्दर  छाई ,    बोले  मोर ।
नये  नये  अरमान  बना  तू ,   आँखें  खोल ,
पतंग  जैसे  उड़  नभ  में  रख , लम्बी  डोर ।।  
••••एवं 👇
🍒विधा - गीतिका 🍒
🍎आधार - निश्चल छंद (१६,७=२३ मात्रा भार )🍎

पौष माघ का महिना लाया , शीत समीर ।
काँप  रहे  पशु  पक्षी  बैठे  ,   होती  पीर ।

बने कौहरा  सूरज छिपता ,   मिले न धूप ,
खेत खेत में काम करे सब , रख कर धीर ।

बालक सारे  दुबक  रहे  अब , छूटे  खेल ,
बाहर  जाने  वाला  लाता  ,  शीत  शरीर ।

मौसम बिगड़े कभी कभी फिर ,बढ़ती ठंड ,
औस  भरी  सारे  पेड़ों  में  ,   झरता  नीर ।

काम करे मजबूर बने  सब ,   भरना  पेट ,
कह "गिरधारी"बचो पहन कर  ,ऊनी चीर ।
••एवं 👇
🍎विधा - गीत🍎

आस  पराई  करते  रहते ,     सहते   पीर ।
भटक भटक कर खोते जीवन ,धरे न धीर ।

नित उठ कर ताके झांके ज्यों , भूखे लोग ।
रीति नीति सब तजकर मन के ,पाले रोग ।। 
जीवन  का  संघर्ष  कहे  ये  ,   झूँठे  वीर ।
आस  पराई  करते  रहते ,     सहते  पीर ।।

काम नहीं कुछ इनको भाता , बिगड़े हाल ।
नहीं सत्य को माने  ये  जन , उल्टी  चाल ।।
आलस पाले घूमे दिन  भर ,  मरा  जमीर ।
आस  पराई  करते  रहते  ,    सहते  पीर ।।

लालच इनमें होता  भारी ,  खोट  तमाम ।
काम बुरे सब इनके जग में ,  हैं बदनाम ।।
गिरधारी ये  नहीं  किसी  के , छोड़े  तीर ।
आस  पराई  करते  रहते  ,   सहते  पीर ।।
विधा - गीतिका 
आधार - निश्चल छंद (१६,७=२३)

धीरज रखना चीज बड़ी है , धीरज धार ।
धीरज रखना जाने बिरला , लाभ अपार ।

जान अमृत का पीना जैसा  , है अनमोल ,
धीरज  धरने  वाले  न्यारे  , सब  परिवार ।

जीवन रक्षक मानो इसको ,  दवा विशेष ,
जान बड़ा सन्तोष इसे तू ,  सबका  सार ।

सबसे न्यारा गुण जानो सब ,    कहते  ग्रन्थ ,
धीरज साधक का दिल सागर , सुख भरमार ।

चिन्ता से अति दूर रहे जन ,  सब खुश हाल ,
पीना सीखो रस " गिरधारी " , सब नर नार ।
👇👇

मकर राशि में  आया  सूरज  ,  सर्दी  मंद ।
मन भावन अब मौसम बनता , है आनन्द ।
सूरज उत्तर अयन चला अब , बढ़ती  धूप ,
धुंध कोहरा नहीं बने अब  ,  ठिठुरन  बंद ।।

रात घटी दिन बढ़ने लगते ,  सुन्दर भोर ।
अब सरसों की खुशबू फैली , चारों ओर ।
शीतल मौसम नहीं रहा अब , गर्म समीर ,
अब पतंग नभ में उड़ते ये ,  लम्बी  डोर ।।
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विधा - गीतिका आधार - निश्चल छंद (१६,७)

रे  मन  मेरा  मत  भटके  तू ,    कहना  मान ।
फिरता क्यों तू पागल बनकर , सच को जान ।

फूल  फूल  पर  फिरता  भँवरा ,   तेरा  हाल ,
सूख सूख कर फूल गिरे सब ,   बिगड़े  शान ।

नहीं  रहे  ये  स्थाई   जग   में  ,    बनते   रेत ,
दिखने  में  सुन्दर  भारी   हैं ,  जान   विधान ।

आँख मिचोनी करता निश दिन , पल पल दौड़ ,
नहीं  टिके  तू  एक  जगह  पर ,  बहुत  महान ।

बड़े  बड़े  सब  समझाते  जन ,  करे  कमाल ,
देख  रहे  तेरी  "गिरधारी" ,    सकल  उडान ।
जीवन के पथ में नित चलते,सुख दुख साथ।
कैसे  जीना  यह  खुद  के  है,  अपने   हाथ।
"धर्म" नीति  के  साथ चले  जो, यदि  इंसान,
साथ   सदा   रहते   हैं   उसके,  दीनानाथ।।

भले हमारा  समय  बुरा  हो, या  अनुकूल।
शूल साफ कर बिछा हमेशा, पथ  में फूल।
जीवन  है  बस  भूल भुलैया, रखना  याद,
माया में मत फँसकर जाना,प्रभु को भूल।।

देख दुखों के बादल  हो  मत, कभी  उदास।
सुखद किरण की आशा में रख,दृढ़ विश्वास।
छूना  है   आकाश   अगर  तो,  पंख  पसार,
अपने हाथों अपना खुद का,लिख इतिहास।।
                                         धर्मपाल धर्म✍️
•••••एवं 👇
🍒विधा:- गीत आधार:- सरसी छन्द🍒
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हुई कार की सड़क किनारे,ज्यों ही धीमी चाल।
पास कार के पहुँच मीडिया,करने लगी सवाल।।

ठंड  कड़ाके  की  पड़ती  है, थरथर  काँपे  गात।
क्या है कहो विचार आपके,क्या कहते जज्बात।।
चहुँ दिश बिछी हुई राहों में, धुंध  और  हिमपात।
कैसे  दिवस  बीतता  श्रीमन, कैसे  कटती  रात।।

ले अँगडाई हँसकर  बोला, धनी  तभी  तत्काल।
पास कार के पहुँच मीडिया,करने लगी सवाल।।

ठंड गुलाबी बड़ी सुहानी,मधु सी भरी मिठास।
चाय पकौड़े सँग मदिरा के,होती संध्या खास।।
हीटर कम्बल कोट रजाई, जब हो अपने पास।
हमें भला फिर कैसे होगा,जाड़े का अहसास।।

बने भोज में  गाजर  हलवा, और  चूरमा  दाल।
पास कार के पहुँच मीडिया,करने लगी सवाल।।

वहीं   पास   में  एक  भिखारी, बैठा  पैर  समेट।
फटी  हुई  छोटी  सी  मैली,  चादर  एक  लपेट।।
हुई नहीं थी आज  सुबह  से, भोजन से भी भेट।
ठंड लगी तो वहीं सिकुड़ कर,गया धरा पर लेट।।

सुनकर धनवानों की  बातें, करने  लगा  मलाल।
पास कार के पहुँच मीडिया, करने लगी सवाल।।
                                           धर्मपाल धर्म ✍️
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🍎निश्चल छंद आधारित गीत 🍎
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किसी तरह के संशय का मत, करो विचार।(मुखड़ा) 
 जो भी करना है कर डालो, मेरे यार।(टेक) 

सदा रोकने हर पग मिलते , सच की राह। (अंतरा) 
लेकिन उनकी कभी न करना, तुम परवाह।। 
औरों के हित रहना होगा , हमें उदार। 
साहस भर कर करना होगा, सागर पार।। 
आगे-आगे बढ़ते जाना, जीवन सार।
जो भी करना है कर डालो, मेरे यार।।(टेक) (१) 

जब होगा विश्वास तभी वे, होंगे साथ।
विजय तिलक शोभित कर देंगे,तेरे माथ।। 
नमन करे उगते सूरज को, ये संसार। 
सकल जगत में तथ्य यही है, अब स्वीकार ।। 
समझ साथिया जग की लीला, अपरम्पार।
जो भी करना है कर डालो, मेरे यार।।(२) 

मिले जरूरतमंद कभी तो, हरना पीर। 
पास बिठा कर उनके मन में,धरना धीर।। 
क्यों कर उन पर छाया है ये, कष्ट अपार। 
समाधान कर लाना होगा, वहाँ सुधार।। 
बड़ी आस है इनको तुमसे, हर लो भार। 
जो भी करना है कर डालो, मेरे यार।।(३) 
••एवं 👇
💐विधा - मुक्तक💐
००००००००००००(१)०००००००००००००००००००
कभी किसी को कुछ कह देना, बिन आधार। 
सही-गलत का नहीं किया हो, कभी विचार। 
इधर - उधर गोते खाता है, वह इंसान। 
जैसे नैया बीच भँवर में, बिन पतवार। 
______________(२)______________________

विषम काल में भी जो करते, धारण धीर। 
ऐसे जन ही जन मानस की,हरते पीर। 
औरों के दुख रहे बाँटने , को तैयार, 
सच्चे अर्थों में उनको ही,कहते वीर। 
बहुत हुई परनिंदा अब तो, करो विराम। 
 इसे छोड़ देखो दुनिया में, ढेरों काम।। 
नहीं करेंगे भला किसी का, हुआ स्वभाव, 
कुछ अच्छा सा जोड़ो तब ही,होगा नाम।। 
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जीवन का हो अवलोकन अब, सच्चा ज्ञान।
क्या खोया क्या  पाया हमने      ,देवें ध्यान।

नहीं नष्ट हों जीवन में अब,  अवसर व्यर्थ,
हमें सीखना   होगा जीवन , का    विज्ञान।

आगे की बेला में हो अब , नहीं अनर्थ,
नया बनाएं जीवन में अब  ,सुंदर प्लान।

वृक्ष पुष्प लाखों खोकर भी,नहीं हताश
व्यस्त रहें नव पुष्प सृजन में,सोच विधान।

जीवन ऐसा सफल  बनाएं ,    हो बिंदास,
नहीं संकुचित व्यापकता हो , रखना ध्यान।।

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माह जनवरी होता ठंडा,शीत अपार।
धुन्ध कोहरा, सूरज छुपता, दूजी पार।।
नल में पानी ऐसे जमता, बनती बर्फ ।
पढ़ना लिखना नहीं सुहाता, बांचे हर्फ।।

खग मृग ठिठुरे तरु मुरझाए ,पीले पात।
हीटर चालू तीन रजाई,ठंडी मात।।
बच्चे कांपे बुड्ढे तापे,अपने हाथ।
स्वेटर कोट दुशाला ओढ़े ,चाहे साथ।।

अभी रसोई लगती प्यारी सदा बहार।
गर्म पकौड़े गाजर हलुआ, मय आहार।।
सब ऋतुओं में ऋतु यह प्यारी,भाए संग।
 देख परस्पर साजन सजनी ,चढ़ता रंग।।

संबंधों की सीढ़ी  होती,    कुल ही पांच।
ध्यान रखें हम उनका  मानें,यह है सांच।।
प्रथम "देखना" सीढ़ी होती , यह लो जान।
होती दूजी *लगना अच्छा*, यह सब मान।।

यहाँ  "चाहना" तीजी , सीढ़ी, लें पहचान।
चौथी सीढ़ी होती "पाना" ,  देवें     ध्यान।।
सबसे कठिन "निभाना" सीढ़ी,पांचों जान।
पांच सीढ़ियों से अब जानों ,रिश्ता  ज्ञान।।
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  विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष में -

दिवस आज है मंगल हिंदी ,है अभिमान।
बने राष्ट्र की हिंदी ,  भाषा, हो उत्थान।
मेरा लिखना पढ़ना हिंदी,मन आभार।
हिंदी जीने की परिभाषा,अब स्वीकार।।

करें अर्चन हम सब पूजा ,जय जयकार।
सदा गर्व है भाषा हिंदी,     है शृंगार।
आन बान है हिंदी भाषा ,सदैव शान।
हमको सबसे प्यारी हिंदी, रखते मान।।

आज विश्व का  दिन है हिंदी ,हिंदी ज्ञान।
हिंदी से ही वतन हमारा,  हिंदी शान।।
भूल संस्कृति हम अब हिंदी,से अनजान।
आभ देश की  अपनी हिंदी, लो पहचान।।

है विकास का नारा हिंदी,करें विकास।
बने मातृ भाषा अब हिंदी ,मत अवकाश।।
भक्ति शक्ति सब मेरी हिंदी,है अनुभूति।
चिंतन मंथन सब ही हिंदी,है अभिव्यक्ति।।
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 मुक्तक युग्म -
जीवन में सोना अच्छा या ,रहना जाग।
प्रमादी  का है सोना अच्छा, नहीं कि जाग।।
 व्यक्ति संयमी रह कर जागृत, धारे ध्यान।
भोगी मनुष्य जब भी जागे ,करता राग।।

राग कर्म बंधन का कारण, छोड़ें राग।
कर्मों को हो अगर तोड़ना,बनें विराग।
 व्यक्ति संयमी रहे जागता, काटे कर्म।
ध्यान स्वाध्याय करता रहता ,करता त्याग।।

रहता सब दिन इस जग में, बोलो कौन।
ये भी सच है सत्य सदा ही,रहता मौन।।
बढ़ा चढ़ा कर झूठा बोलें ,करता शोर।
आने जाने वाले पर कब, किसका जोर।1

मर्यादा का पाठ पढ़ाया,जय श्री राम।
मात-पिता के चरणों में है, सारे धाम।।
ईश नाम से बनते सारे, बिगड़े काम।
नेक काज करता चल प्यारे,होगा नाम।।2

क्षमा दया का पाठ पढ़ाना, हो उद्धार।
भूल सदा ही अपनी करना, तुम स्वीकार।।
भाग्य लकीरें मेहनत बदले,यह लो जान।
उगते सूरज को ही जग में,मिलता मान।।3
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स्वागत करते स्वागत करते,नूतन वर्ष।
प्यार बसे सबके ही उर में, बरसे हर्ष।।
दूर रहे ये जग कटुता से, हो उत्कर्ष।
बांटे खुशियां झोली भरकर,हम प्रति वर्ष।।

मंगलमय हो जीवन कहता ,नूतन साल।
यही कामना करते हैं हम, हो खुशहाल।।
सदा साथ रहना सुख-दुख में,बढ़ता प्यार।
मिलती सदा दुआएं तुमको,एक हजार।।
••••👇
निश्चल छंद आधारित मुक्तक द्वय

नमन कोर से झांके अम्बर,क्यों यूं आज।
विकल हृदय है धीमे बादल,क्या है राज।।
उजड़ी धरती देखें अम्बर, है हैरान-
भेजी टोली बादल की अब,करने काज।।

झम-झम झम-झम बरसा पानी, भू  की ओर।
भीगा आंचल धरती का भीगा, है हर छोर।।
हुआ प्रफुल्लित झूमे अम्बर,गाए गान-
गरज-गरज कर मेघा भी अब,करते शोर।।
प्रयागराज उत्तर प्रदेश
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हे सरस्वती  देवी माँ दें  ,       अक्षर दान ।
शिल्प सृजन का सार्थक दे दें,  हमें विधान ।
लोक अर्थ की कविता गायें , हो उत्थान ।
सबको शिक्षा दे  माँ भारत,  बने महान |

लोभ द्वेष से  हे माँ कर दें,     सबको दूर ।
देश भक्ति  हित पैदा कर दें, अगणित शूर।
आन देश की रखने वाली,      दे दें व्यक्ति ।
विश्व पटल पर भारत होये,    पहली शक्ति।

••एवं 👇
🍎गीतिका 🍎
💐समान्त-आम, अपदान्त!💐

शीत लहर में सैनिक करते,       हैं संग्राम ।
सैनिक के जीवन होते हैं, जनहित -नाम ।१।

 हमको घर में  कर देती है, असहज   शीत ।
नहीं प्रकट करता जब सूरज , दिनभर  घाम ।२।

वयोवृद्ध   ठंड़क से होते, हैं   बीमार ।
पशु- पक्षी के रक्षक होते, केवल राम ।३।

हमें कर्मरत रहने का है,एक विकल्प ।
कर्म देख कर ईश्वर देते, हैं परिणाम ।४।

 कर्म- भाग्य दोनों से बनता, जीवन -पंथ  ।
अथक परिश्रम से बनते हैं, मन- काम ।५।

कठिन समय में हम साहस से  ,धारें धैर्य । 
असमय के  दिन कटकर मिलता , है विश्राम ।६।

प्रकृति ईश -आश्रित होती है, यह तो सत्य ।
लक्ष्य कर्म से मिलता अच्छा , यदि  उद्दाम ।७।

••एवं 👇

शीत लहर से खग कुल व्याकुल, पक्षी त्रस्त ।
दीन किसान सभी  खेतों में,    अपने व्यस्त ।
श्रमिक करें मजदूरी निशि -दिन, भूखे पेट ।
परजीवी  जीवों का करते  ,           हैं आखेट ।

हन्स सरोवर में  दुख पाते,      बगुला मस्त ।
काक मनोहर कलरव करते, कोकिल पस्त ।
घर में रहते कुत्ते बिल्ली,          बाहर- बाल ।
खुले व्योम में बच्चों   का है,   बदतर हाल।

लुप्त हुईं  गौरैया घर से,        किया प्रवास ।
क्षेमकरी उड़ बाहर भागीं,       हुईं  उदास ।
अजब बनाया ईश्वर नें यह,        बन्दोबस्त ।
श्रमिक भूख सहते सुख भोगें  , समय परस्त ।
एवं 👇
भारत - सीमा का प्रहरी है , शैल विशाल ।
प्रचुर सम्पदा का  स्वामी नग, उन्नत भाल ।
अर्थव्यवस्था का संवर्धक ,    भव्य महान ।
सदृश हिमालय के  हिन्दी है,    हिन्दुस्तान ।१।

अधिकृत बोली हिन्दी वर्णित, लिखित विधान  ।
सरल व्याकरण भाषा शैली,       युत विज्ञान ।
 सरस्वती गङ्गा यमुना सम,    जन प्रतिपाल ।
हन्स- गरुण जैसी हिन्दी की,   सुन्दर चाल।२।

तुलसी सूर कबीरा की है,             हिन्दी प्राण ।
 भारतेन्दु के  तप का जागृत    , काव्य  -प्रमाण।
दीन जनों को देशज भाषा,              देती त्राण ।
सृजती संस्कृत के छन्दों  से ,  पुण्य   पुराण ।३।

महावीर जय शंकर की है ,       स्वर लय  ताल।
महामना गाँधीयुत   देती      ,   शास्त्री लाल ।
सूर्यकान्त  हरिऔध सुमित्रा,       नन्दन पन्त ।
हिन्दी देती  झाँसी रानी ,         दिव्य अनन्त ।४।

वीर शिवा हिन्दी देती  है ,       सुत  कुलवन्त ।
नामदेव रविदास  गुणागर,           देती सन्त ।
सरस्वती  का वाहन हिन्दी,      गरुण- मराल ।
मानसरोवर रामायण का,           गूढ़ रसाल ।६।
एवं 👇

सैनिक सीमा के रखवाले,      जागें रात ।
सैनिक  यश गौरवशाली है , सदृश प्रभात ।
सैनिक  बल पर हम घर सोते, हैं निर्भीक ।
उन्हें नमन हम सादर  करते  ,मान   प्रतीक ।१।

कृषक गाँव में खेती करते,        देते अन्न ।
जिससे सबका तन  पलता मन, हो सम्पन्न ।
दूध दधी का घी का उत्पादन, करें किसान ।
पैदा  करते गेहूँ अरहर,         मक्का धान ।२।

कृषक  भूख से रण लड़ता सुत, सीमा पार ।
दोनों का अद्भुत अर्पित है ,    माँ को प्यार ।
पिता  उदर का पालक करता, बालक- देश ।
जन हितकारी दोनों के हैं  ,     सम  परिवेश ।३।

शिक्षा-दीक्षा उपकारी है,      शुभ  संस्कार।
दुख में हॅसकर जीना सीखा, सरल विचार  ।
भूखे रहते अच्छा करते ,        हैं  व्यवहार  ।
किसी दूसरे से ऋण लेना,       लगता भार।४।

बालक और बालिका दोनों,      करते काम ।
पढ़कर विद्यालय से जब वे,      आयें शाम ।
श्रम उनका आभूषण है,         श्रम पहचान ।
वे दोनों मिट्टी के पुतले,       कृषक- जवान ।५।


कठिन कर्म होता निर्धारण,        करना धर्म ।
 तुम  स्वधर्म  कर्तव्य समुच्चय , समझो   मर्म ।१।

देश काल अनुरूप बदलते,      नव कर्तव्य ।
अपने पद का कर लो  तुम अब , उत्तम कर्म ।२।

जो न व्यक्ति यह तथ्य  समझते, हों पथ भ्रष्ट ।
उन्हें कष्ट होता धन मन का,     दुखता  चर्म ।३।

अलग -अलग कर्तव्य सभी के ,  होते भिन्न ।
समय  भिन्न   रवि  को कर देता, शीतल गर्म ।४।

सत्य लिए  जीवन को हॅसकर  ,देते  दान ।
अमर वीर हो जाते पाते,     स्वर्गिक - वर्म    ।५।
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सरसों के फूलों पर मधुपों ,का गुञ्जार ।
मटर गेहुॅओं से लिपटी है,      लच्छेदार ।
अलसी करती है रखवाली ,चारों ओर ।
जीव न अन्दर बनकर आये   ,कोई  चोर ।1।

जनित कोहरा कीट अनेकों,       का संचार ।
 बिन इच्छा के   करते निशि दिन , वे मनुहार ।
चूस गये सुन्दर लाली को,           सूखे फूल ।
कृषक हृदय में  पीड़ा क्रन्दित,तन में शूल । 2।

बीज खाद का धन कैसे दे,   दुखी किसान ।
कृपा करें प्रभु  तो बच जाये,  कर्षक- जान।
चारों ओर अॅधेरा छाया,           पड़े तुषार ।
सर्दी खाँसी खसरा लाया,       संग बुखार ।3।

सुता कुमारी घर में बैठी,    परिणय  योग्य ।
फसल हुई सब चौपट तन भी  ,नहीं निरोग्य ।
तुम्हीं  सॅभालो प्रभु जी कर दो,     बेंड़ा पार ।
जीर्ण नाव बल्ली  टूटी दो, निज  आधार ।4।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ईश्वर ने है रचा धरा पर,ये संसार।
छाई रहती है धरती पर,सदा बहार।
सुंदर मुखड़ा मानव का है,दिल मेंं प्यार।
पर उपकार सदा मानव का,जीवन सार।

अच्छे कर्म सदा ही करना,पाना मान।
कभी न हो कुछ गलती हमसे,देना ध्यान।
बुरा भला का ज्ञान नहीं है,हम नादान।
हमको सच्ची राह दिखाना,हे भगवान।

आओ तेरा मन बहलाऊँ, गाकर गीत।
इक दूजे में हम खो जाएं,मेरे मीत।
सदा प्यार में होगी यारा,अपनी जीत।
आओ संग निभाएं हम भी,प्यारी "प्रीत"

पूनम सिन्हा "प्रीत" देवघर, झारखंड।✍️
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

बना मुसीबत सभी जगह पर, देखो आज।
दुखी कोहरा करता सबके ,बाधित काज।।
सभी सफर में सभी जगह पर,खतरा काम |
मुश्किल करना बाहर सबका ,सफर हराम।।

घना अंधेरा हो तब कैसे, बचते लोग।
दुर्गम पथ में दुर्घटना के , बनते योग।।
नहीं कोहरे में जाना भी , है आसान।
घना कोहरा सबकी जग में, लेता जान।।

👇
गुरू बांटते ज्ञान हमें जग, किस्मत आस।
प्रेम भाव अब भरें जगत में,  हो विश्वास।
लेखन ऐसा हरदम करना, भरता ज्ञान।
लक्ष्य गढ़ें अपना जीवन में,हो उत्थान।

जीवन में बढ़ते ही रहना,।      राहें नेक।
विघ्न भले कितने हों जग में,सच्ची टेक।
मंज़िल नित नव गढ़ना बंदे, बन इंसान।
सदा भलाई जग में करना,  रख ईमान।
👇
धैर्य सदा हो जब जीवन में, होती जीत।
मूल्य जगत में जो पहचाने, करते प्रीत।
कोई पत्थर सा समझे जग,  कोई रत्न।
आशा रखते कभी न भावी , छोड़े यत्न। 

सबमें खूबी है यह जाने, चतुर सुजान।
बुद्धि सभी पहचाने उसको ,होता भान।
सही समय पर आता उसमें,सही  निखार।
निर्बल कभी न माने खुद को,समझे  सार। 
👇

भाव जगत जैसे जिनके हों, वैसे काज।
करें जगत में नेकी दिल पर ,करते राज।।
उन्हें जगत आदर करता जो, हों इंसान।
मदद दीन की जो करते हैं, हो जग शान।।

दीन दुखी के दुख जो हरता , सदा महान।
करे प्रेम संसार सदा हो,विजय जहान।।
रहे हितैषी सदा जगत जो, दया निदान।
 मिले उसी अनुसार उसे जग,यथा ईमान।।
👇
कब बदलोगे सोच पिया तुम, हों इंसान।
सार जमाने का कब समझो , पाओ ज्ञान।।
जगत सम्मान कब पाओगे,बन  विद्वान।
ध्यान भलाई पर दोगे कब , नेक महान।।

अच्छा व्यवहार रहेगा कब नेक विचार।
हृदय सुखी होगा जब अच्छे, हों आसार।। 
तन मन में आस जगे अच्छा, हो आहार।
बनों नेक इंसान तभी जब , हो आधार।।
👇
कभी नहीं वापस आती है ,निकली बात।
सोच समझ कर तौल महोदय, हो सौगात।।
सदा जगत गुणगान करेगा, हर दिन रात।
बात अगर कड़वी होती जग, मारे लात।।

लक्ष्य वही जग में पाते हैं, करते फर्ज।
लौटे करनी इंसान यहां, होता कर्ज।।
नेकी साथ चले जीवन में, होता मर्म।
परहित सेवा मां पितु गुरु ही,होता धर्म।।
👇
भारत हिंदी माता का जग, हो सम्मान।
वीर डटें सरहद पर अपना, सीना तान।।
हिंद तिरंगे की रखते हैं,जग में शान।
गोली खाते सीने पर वे, रखते मान।।

हिंद हमें प्यारा है जग से,।   हो उत्थान।
सकल विश्व में शान हमारी, है गुणगान।।
करें नमन जो बनें शहादत,  करके फर्ज।
कितने ये उपकार मातु के,  हैं अहसान।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
साहस से हर काम करें तो, होगी जीत।
हार मान ले जो पहले यह, कायर रीत।।
मिट जाए सारे झगड़े अब, जागे प्रीत।
देश-देश में प्रेम बढे सब, गाएं गीत।।

श्रम की बूंदों से लिख देंगे, नव इतिहास।
हर आंगन में फैला दें हम, नेह सुवास।।
सभी जानते अधिकारों को, जो है पास।
पहचानें अब कर्तव्यों को,  करें प्रयास।।

••••एवं 👇
16,12 पर यति चारों चरणांत चौकल

यहाँ वहाँ हर नगर शहर में,गीत स्वयं के गाता।
स्वप्न सुनहरे पूरे करने, छल बल सब अपनाता।।
नहीं किसी की कुछ भी सुनता, खुद सौ बार सुनाता।
जब भी कोई शिक्षा देता, गुस्सा मुझको आता।।

तुम ऐसे हो तुम वैसे हो, सब से कहता रहता।
खुद को ज्ञानी साबित करने, बातें ऊँची गढ़ता।।
आलस छोड़ो समझाता हूँ, पर मैं नहीं समझता।
नहीं पता है खुद का कुछ भी, बस डींगें मैं भरता।।

कैसे चलना कैसे उठना, कैसे तुमको खाना।
क्या-क्या खोया अब तक तुमने, शेष रहा क्या पाना ।।
कहाँ तुम्हारी मंजिल भैया, कहाँ तुम्हें है जाना।
शिक्षण सबको देता सुंदर, खुद का नहीं ठिकाना।।

मात-पिता की सेवा करना, धर्म पुत्र का पहला।
कहे जनक जननी कुछ मुझसे, दूँ नहले पर दहला।।
बहुत सरल है शिक्षा देना, पर मुश्किल अपनाना।
छोड़ दिखावा अब है जीना, मैं भी बनूँ सयाना।।

शुभारंभ जीवन परिवर्तन, अब धारूँ मैं शिक्षा।
एक बने अब कथनी करनी, मेरी यही अभिक्षा।।
संकल्प किया है दृढ मैंने, होगी पूर्ण  विविक्षा
बीत गई सो बात गई सब, मन में रहे तितिक्षा। 
मनुज योनि में जन्म मिला है, लख भव बाद।
परनिंदा में जीवन खोया, शुभ कर नाद।।
बीत गई सो बात गई कल, मत कर याद।
सूखी बगिया में सत्कर्मों, की दे खाद।।

राग द्वेष की बहती सरिता, उर के द्वार।
गहरे बंधन कैसे खोलूँ, है अंधार।।
राह बता दे भगवन तू ही, तारणहार।
डगमगती प्रभु नैया थामों, अब पतवार।।
👇
घुमड़ घुमड़ कर घन आए हैं, घर्षण घोर।
चम -चम,चम -चम चमके चपला, चंचल चोर।
 बरसे बदरा बालम बहके, बहका बाग।
 भीनी-भीनी भीगी-भीगी, भाई भोर।

अरुणिम अरुणिम अंबर आभा, है अकराल।
भूमंडल भामंडल भरता, भास्कर भाल।
नयन नजारा निरखे न्यारा,नाचे नूर,
कुहू कुहू कुहके है कोयल, करे कमाल।
 अकराल=सौम्य, सुंदर
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 🍎 सावित्रीबाई फूले के जन्म दिवस पर विशेष🍎
🐧🖋
सावित्रीबाई थी महिला, ,,,,,,,,,,, शुद्र समाज।
कलैंडर में दिन तिथि यही थी, जन्मी आज।।1।।
🐧🖋
थी अध्यापिका प्रथम महिला, बाँटा ज्ञान।
खूब की गरीबों की सेवा, ,,,,, लाया ध्यान।।2।।
🐧🖋
महानायिका बनकर उभरी, जीत महान।
कवयित्री बन नाम कमाया,  था सम्मान।।3।।
🐧🖋
समाज सेवा में जीवन रत, स्नेह अपार।
मान बढ़ाया भारत का था, करती प्
🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷
                  
    "मन के मोती".. डॉ० रमेश खटकड़ 'रामा'✍️
                जुलाना, हरियाणा
••एवं 👇

🌷🙏 निश्चल छंद आधारित मुक्तक 🙏🌷

💐कुल 23 मात्राएं 16,7 की यति पदांत गुरु लघु💐
***********************************
              संसद कार्यवाही
*************************************
🐧🖋
संसद में पंचायत होती, ,,, करे विचार।
रखें बीच में मुद्दे सबके, जटिल अपार।।
पक्ष विपक्ष बहस है करता, खींच कमान।
होता घमासान आपस में, ,,,,,, करते वार।।1।।
🐧🖋
काट पीट कर जो भी बचता, यह निष्कर्ष।
कानून देश का बन  करता, ,, फिर उत्कर्ष।।
हो विकास भारत का सुंदर    , हो उत्थान।
दिखती चौतरफा खुशहाली, , होता हर्ष।।2।।

***********************************
                    "मन के मोती"...🖋   डॉ० रमेश खटकड़✍️ रामा'
                   जुलाना, हरियाणा

••••👇

छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह जनवरी 2023 निश्चल छंद - 23 मात्रा,16-7 पर यति पदांत गुरु लघु

   स्वागत एवं कामना

पलक पाँवड़े सभी बिछाकर,  हैं तैयार।

नये साल का अभिनंदन है, करते प्यार।।

पावन बेला पर सब गाएँ, मंगल गीत।

खेलें कूदें खुशी मनाएँ, ,,, है यह रीत।।1।।

🐧🖋

नये साल का नया सवेरा, हो सब खैर।

प्यार मुहब्बत बढ़े जगत में, ना हो बैर।।

दुनिया में जो आग लगी है, ,,,, हो वह शांत।

ज्ञान शिखा ऐसी हो जिसका, नहीं शिखांत।।2।।

***********************************

  "मन के मोती"...० रमेश खटकड़ 'रामा'✍️

                   जुलाना, हरियाणा

👇

छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह जनवरी 2023 सरसी छंद आधारित "गीतिका"🌷

कुल 27 मात्रा 16,11 की यति पदांत गुरु लघु

         तुकांत 'आर'  अपदांत

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            मातृ भाषा हिन्दी

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भाषा हिन्दी मातृ हमारी, हम सब करते प्यार।

माथे की है बिन्दी इसको,  करते हैं स्वीकार।।

🐦🖋

संस्कृत भाषा है माँ इसकी, दिया इसे है जन्म।

नानी भाषा बनी हमारी, ,,,,,, सुंदर है परिवार।।

🐦🖋

सरल सरस है मनभावन है, सुंदर इसका भाव।

बोधगामिनी यशकरणी यह, ,, सुंदर है संचार।।

🐦🖋

बालक हम सब इसके करते, स्तुति हो करबद्ध।

दुनिया में सिरमौर बनी है, करती बहुत दुलार।।

🐦🖋

विश्वबंधु का भाव हमारा, ,, करें नहीं अहसान।

प्रेम बाँटती दुनिया में यह, करती कभी न वार।। 

🐦🖋

बने विश्व गुरु भाषा के भी, देते सबको ज्ञान।

बेटे हम यह मात हमारी, इसका करें प्रसार।।

🐦🖋

हम सब हिन्दी दिवस मनाते, , होता पूरा शोर।

विजय पताका ऊपर चढ़ती, फैली यह संसार।।

*************************************"

मन के मोती"...© डॉ० रमेश खटकड़ 'रामा'

                   जुलाना, हरियाणा

छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह जनवरी 2023 निश्चल छंद - 23 मात्रा,16-7 पर यति पदांत गुरु लघु

  🍒मकर संक्रांती 🍒

🐧🖋
उत्तर दिशि हो सूरज करता, मकर प्रवेश।
पर्व मकर संक्रांती लाता, शुभ संदेश।।
कल्याण करे सबका बाँटे, सबमें प्यार।
शांति मिले सुख समृद्धि वैभव, बढ़े अपार।।1।।

🐧🖋
सुबह सवेरे गंगा जल में, करते स्नान।
आग जलाते तिल गुड़ बाँटें, देते दान।।
गात तपाते लड्डू खाते, मिलता प्राण।
बड़े बुजुर्गों की सेवा में, ,,,, होता त्राण।।2।।

*************************************
                    "मन के मोती"...🖋
© डॉ० रमेश खटकड़ 'रामा' जुलाना, हरियाणा

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💐*सर्दियों का मौसम*💐

जोर पकड़ता जाता जाड़ा, आया शीत।
जो काबू कर ले यह मौसम,जाए जीत।।

धूप सेंकने आग जलाने,का आनंद,
खूब मजे लो ऋतु बन जाए,मन की मीत।

हाय हाय कर व्यर्थ गँवाएं  ,पलछिन राग,
छोड़ शिकायत छेड़ो जीवन का संगीत।

कुदरत का रथ चक्र चलेगा,जब तक सांँस,
मनमौजी बन साथी इसके ,कर लो प्रीत।

नहीं रहेगी अधिक समय तक,रखना याद,
परिवर्तन हो नित्य चलायी,प्रभु ने रीत।

जयश्री कांत 'जय' ~✍️

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छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह जनवरी 2023  🍒      🦜     निश्चल छंद  विशेषांक )~~🍒🦜

सुबह सवेरे उठ कर लेता,प्रभु का नाम ।
दर्शन पाकर प्रभु के करता,अपने काम ।।
महिमा तेरी जग में प्रभु जी ,अपरम्पार ।
करता तुमसे हर पल विनती,बारम्बार ।।

एक द्वार पर केवल झुकता,है यह शीश ।
सबके रक्षक स्वामी वे हैं,बस जगदीश ।।
कण कण में होता है मानों,प्रभु का वास ।
हर पल सुधि लेते वे सबकी,रहकर पास ।।

जिसके सिर पर रख देते हैं,प्रभु जी हाथ ।
सकल सम्पदा पाकर रहता,नहीं अनाथ ।।
नाम मात्र से हो जाती यह,नौका पार ।
सारे जग के नाविक हैं वे,खेवन हार ।।

सूरज चाँद सितारे नभ के,हो आधार ।
मात्र इशारे से चलता सब,यह संसार ।।
राजा रंक सभी की सुनते,करुण पुकार ।
इच्छित वर देकर करते हैं,प्रभु उपकार ।।

•••|👇
टेर लगायें गोकुल गलियाँ,आ गोपाल ।
नंद बबा के आँगन घूमे,यसुमति लाल ।।
मधुर बाँसुरी सुनकर आये ,सब हैं ग्वाल ।
नाच - नाच कर गायें झूमें,करत धमाल ।।

माखन मिसरी लागे उनको,मोहन भोग ।
प्रभुवर मिल जायें ये मानों,बस संयोग ।।
समझ पूतना को माँ भेजा,अपने लोक ।
मार राक्षसों को आ मेटा,सबका शोक ।।

मर्यादा में रह यह गीता,का उपदेश ।
मानवता फैलायी देकर,शुभ संदेश ।।
धर्म ध्वजा फहराई जग के,बनकर नाथ ।
अपने भक्तों के सँग रहते,प्रभु वर साथ ।।

मित्र विदुर के घर जा खाया,सूखा साग ।
कौरव कुल ने बात न मानी,फोड़े भाग ।।
हाथ पकड़ प्रभु का चलता जो,पाता जीत ।
धरती अंबर कण कण उसका,गाता गीत ।।

••••👇
++++++++++++++++++++++
जीवन जर्जर होता जाता,पा आघात ।
असहनीय ये सहा न जाये,झंझावात ।।
जिसको मैनें बतलायी थी,मन की बात ।
मिला उसी से धोखा हमने,खायी लात ।।

बदला हुआ जमाना आया,था अंजान ।
अपना जैसा सच्चा समझा,हर इंसान ।।
भरा हुआ हर दिल के अंदर,है अभिमान ।
इधर उधर करता चलता है,बन धनवान ।।

सारे जग में खूब घुमाया,बैठा शीश ।
शुभद कामना मैनें की है,दे आशीष ।।
बिछा रहें काँटें पथ में वह,नहीं मलाल ।
पंकज रोज भावनाओं को,करें हलाल ।।

मन के सारे दुख सह लें,हम चुपचाप ।
घर के अन्दर ही रो लेना,भ्राता आप ।।
दरवाजे पर कोई आये,हँसकर बोल ।
पर दर्दों के दरवाजे को,तू मत खोल ।।
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विनती है तुम से मम स्वामी,दे दो साथ ।
मैं तेरे चरणों का अनुगामी,पकड़ो हाथ ।।
छूट रही हैं अब हाथों से,यह पतवार ।
डूब रही है नौका मेरी,लख मझधार ।।

झर झर झरती नैनों से है,आँसू धार ।
मात्र सहारा तेरा जग में,कर उपकार ।।
जगती के स्वामी हो मेरे,पालन हार ।
संकेत मात्र से हो जाता,भव से पार ।।

भोली भाली तेरी सूरत,देती चैन ।
तेरे दर्शन से हैं होते,शीतल नैन ।।
भक्तों के उर अन्तर में है,तेरा वास ।
जीवन में भर देते हो,नव उल्लास ।।

रोली अक्षत साथ न लाया,कोई फूल ।
कर्कश मेरी वाणी लगती,चुभते शूल ।।
अंजाने में हर पल बोये ,नित्य बबूल ।
माफ करो हे स्वामी मेरी ,सारी भूल ।।
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मैं किसको बतलाऊँ अपने,मन की बात ।
मैं किसको घाव दिखाऊँ अब,बोलो तात ।।
जिस पर निज अर्मान लुटाये,करे मजाक ।
धूल धूसरित कर डाला है,यह तन खाक ।।

कतरा - कतरा देकर सींचा,तन का रक्त ।
वह ही अब दुश्मन बन बैठा,कैसा वक्त ।।
रात रात भर जाग सुलाया था,मीठी नींद ।
मन पागल उस से कर बैठा ,नयी उम्मीद ।।

समझा उसको जगत अकेला,पकड़ा हाथ ।
छाया बनकर साथ चला मैं,समझ अनाथ ।।
बहुत सहा अब सहा न जाता,यह बर्ताव ।
नित्य बदलती भाषा उसकी,मन के भाव ।।

समझ रहे हो जिसको जग में,सुनो गरीब ।
मुँह के बल गिर जाओगे यदि,गये करीब ।।
सच भी अब मुझको लगता है,मित्रों झूठ ।
कानन का हर पेड़ लग रहा,मुझको ठूँठ ।।
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मन मंदिर में बजता प्यारा,नव संगीत ।
आठों याम सदा करता है,कार्य पुनीत ।।

छोटी - छोटी बातें जाता,जो नित भूल ।
काँटें भी हो जाते उसके,खातिर फूल ।।
जड़ चेतन हर कोई करता,उससे प्रीत ।
आठों याम सदा करता है,कार्य पुनीत ।।

सच के पथ चल कर बेचें,नहीं जमीर ।
दौलत मिल जाये या फिर,रहे फकीर ।।
समझे एक बराबर गरमी,बरसा शीत ।
आठों याम सदा करता है,कार्य पुनीत ।।

सूझ बूझ से चलता होता,नहीं अधीर । 
हँस के सह लेता है अपनी,सारी पीर ।।
शुद्ध भाव से सब हैं उस के,गाते गीत ।
आठों याम सदा करता है,कार्य पुनीत ।।

मानव जीवन को मानें वह,प्रभु वरदान ।
जग में कहलाता है अच्छा,वह इंसान ।।
हर कोई दे आदर बनता,सब का मीत ।
आठों याम सदा करता है,कार्य पुनीत ।।
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सच्चाई  की  राह  चलें जो, मिलती निश्चित जीत  ।
देख रहा भगवन है सब कुछ, नीत अधर्म अनीति ।।
मानव हो दानवता छोड़ो, लोभ मोह अभिमान ।
देश  भक्ति  परमारथ  सेवा,  से होगा कल्यान ।।

पूत निछावर हुआ वतन पर, छोड़ी अमिट निशानी 
सींची  अपने  खूं  से  धरती,  वीर  महा  वलिदानी
रँगा  पृष्ठ  इतिहास वीर ने,  लिख  गरिमामय गाथा
वीर  प्रसवनी  भारत  मांता,  गर्वित   है   अवदानी 
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कृपा  करो  माँ बगला मैया, सुनो पुकार  ।
फंसी  नाव  मंझधार भवानी, करदो पार ।।
एक  सहारा  मात्र  तुम्हारा,  रखदो  हाथ  ।
तुम अनाथ की नाथ नवांऊ, चरनन माथ ।।
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विधा  -- निश्चल छंद पर आधारित मुक्तक

  नील  गगन  के  तारे  गिनते, कटती रात  ।
   सूनी  प्रीतम  सेज  करूँ मैं, किससे बात ।।
   आँखें  हैं  बेचैन सदा ही  ,  बहता  नीर ।
   हुआ  हाल  बेहाल  विरह  में, सूखा  गात ।।

संतुष्ट  नहीं  होता   मानव,  पा  धन  कोष  ।
लोलुपता  बस  फिरे  भटकता, करता रोष ।।
खोटे  करता  काम  मनुष हो, भले सुजान  ।
असफल हो तो वह किस्मत को, देता दोष ।। 

बीतीं  बातें  भले - बुरे  कीं, भूलो यार  । 
प्रेम प्रीति का नये सिरे से,  कर संचार ।।   
मानवता का धर्म निभाओ, बनो महान ।
गया समय तो पछताओगे, करो विचार ।।

••••एवं 👇
क्या लिख दूं कुछ ज्ञान नहीं है, हूँ मति मंद  ।
   भाँति-भाँति की छंद विधाए,  नियम  बुलंद ।।
   उम्र अधिक झट समझ न पाता,मात्रिक भार  ।
   सीख  रहा  हूँ  छंद  महल  से, लिखना छंद ।।
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विधा - निश्चल छंद पर आधारित मुक्तक 
मात्रिक भार- 16/7 पदांत गुरु-लघु 

ये  धरती आकाश तुम्हारे,  रख विश्वास  ।
पंख लगा के उड़ो गगन हो, पूरण आस  ।।
दृढ़ संकल्प ले बढ़ते जाओ,  होगी जीत  ।
कर्मसाध्य मत पीछे मुड़ना, हो भयभीत  ।।

हरे  -  भरे   खेतों  में  पंछी,  करते  गान  ।
हरिया-हरिया हाँके किसना, चढ़ा मचान ।।
भागें उड़ पुनि दाना चुँगते,  सह  परिवार  ।
हर  दाने में छुप कर बैठी, आस किसान ।।

नहीं उजागर करिये अपने, दिल की बात  ।
बात  बतंगढ़  बन कर होगी, दिन में रात  ।।
गाँव - गली  में  बाजे  भौपू, हो  उपहास   ।
बैर - भाव  का उठे बवंडर, कर  आघात  ।।
                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   26

पिछली जो बातें   दुख देतीं, उन्हें  बिसार। 
नये   साल  में  अपने  सर से , भार उतार।। 
खुशी-खुशी  यह  जीवन  तेरा, जाये बीत-
सब  लोगों से  चलना मानव, करके प्यार।। 

नये  साल  की  करो  बधाई, तुम स्वीकार। 
मना  रहा  नव   वर्ष   देख लो, यह संसार।। 
करो   प्रार्थना  श्री राम  से, तुम  हर  रोज-
रखो सुखी हम सब बंदों का, प्रभु परिवार।। 

नये  साल   में   नयी  उमंगें, मन  में धार। 
आशा से  भर  कर अपने को, रख तैयार।। 
जीतेगा   तू     हारी   बाजी, मेरे    दोस्त-
हिम्मत  वाले  का  करते  प्रभु, बेड़ा पार।। 

••••एवं 👇

गलती जो पिछले संवत की, करो सुधार। 
नये  साल  में  मन में अच्छे, रखो विचार।। 

केवल अपने ही  मत मानव, हित की सोच, 
कुछ औरों का भी तो करके, चल उपकार। 

सोच समझकर करना बंदे, अपना काम, 
बिन  सोचे  ही नहीं  धूल में, लाठी मार। 

बच्चे   वे  ही   जग  में  करते, रोशन नाम, 
मात-पिता घर जिनके बढ़िया, दें संस्कार। 

मात-पिता की सेवा में तू , रह नित लीन, 
नहीं सकेगा मात-पिता का, कर्ज उतार। 

पड़ती काफी ठंड ठिठुरते, निर्धन लोग, 
दान  करो   सर्दी में कंबल, हैं  लाचार। 

धर्म सिखाता अच्छी बातें, सीखो मित्र, 
चले  धर्म   पर  होगा  तेरा, बेड़ा  पार। 

शिक्षा पाकर औरों को दे, शिक्षा मुफ्त, 
तुझे मिलेगी खुशी और का, हो उद्धार। 

'अत्री'  मुश्किल से मिलता है, मानव जन्म, 
नफरत को दे त्याग सभी से, कर ले प्यार। 
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दादा  दादी  पोता पोती, में अति प्यार। 
वक्त  सहारे  कट  जाता है, इनके यार।। 

बात तोतली  करके लेते, मन को जीत। 
बच्चों का मन होता पावन, और पुनीत।। 
मन में चलते रहते इनके, साफ विचार। 
वक्त  सहारे  कट  जाता है, इनके यार।। 

बड़े    बुजुर्गों   के   ये   सच्चे, होते  मित्र। 
दिल को लगती अच्छी बातें, करें विचित्र।। 
अद्भुत  देखो   सब  बच्चों का, है संसार। 
वक्त   सहारे  कट  जाता है, इनके   यार।। 

बच्चों के जब  मम्मी पापा, लड़ते भ्रात। 
किन बातों  पर लड़े  बताते, सारी बात।। 
लेकिन जब  बतलाते  जाते, वे बाजार। 
वक्त  सहारे  कट  जाता है, इनके यार।। 

बच्चों  की  किलकारी   गूँजे, चारों  ओर। 
लगता मधुरिम है  कानों को, इनका शोर।। 
खिल उठते हैं किलकारी से, आँगन द्वार। 
वक्त   सहारे   कट  जाता  है, इनके यार।। 

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राधा रानी  कान्हा जी का, पावन प्यार। 
इन  सब   बातों को जाने, सारा  संसार।। 
अलग-अलग बेशक दोनों का, रहे शरीर-
लेकिन दिल तो इन दोनों के, हैं  इकसार।। 

एक व्यथित यदि हो जाता है, पीर समान। 
एक  दूसरे    के  दिल  की ये, लेते   जान।। 
विरह अगन में  दोनों  जलते, रहकर  दूर-
पास  कभी आ  जाते  चेहरे, पर मुस्कान।। 

देखो   दोनों   ही   जग   में  हैं, प्रेम  प्रतीक। 
प्रेम  नीति  कान्हा  राधा  की, काफी  नीक।। 
इन  दोनों  से  मिलती हमको, अच्छी सीख-
चलो प्रीत की डगर छोड़ कर, नफरत लीक।। 

गूँज रहा  है  इस  दुनिया में, इनका नाम। 
पूजनीय   हैं   दोनों  इनके, उत्तम  काम।। 
करते हम सब पूजा इनकी, सुबहो शाम-
हम लोगों  के  दिल में रहते, राधे श्याम।। 
💐शारदे वंदना💐

कृपा दास पर करिए माता , ~  बेटा मान।
शब्द अनूठे और अजूठे , ~~~देना दान।।
रच दूॅं गीत अजूबे माॅं दो , ~~  ऐसा ज्ञान।
आस हृदय में मैया उपजे, मत अभिमान।।

कर में वीणा लेकर बनती, सबकी मीत।
पद्मासन पर बैठ सुनाती   , सुन्दर गीत।।
भक्तों में साहित्य सृजन की,भरतीं प्रीत।
आस हृदय से मात मिटा दो, सारी मीत।।

पद पंकज में शीश झुकाता, मैं हूॅं मात।
सदा आपके ही गुण गाऊॅं , मैं नित प्रात।।
अपना स्नेहिल कर रख माता ,मेरे माथ।
आस चाहता रहे हमेशा, सिर पर हाथ।।
एम०काम० ,एम०ए०अर्थशास्त्र, एम०एड०
बीसलपुर, पीलीभीत। पिन-२६२२०१
🍎निश्चल छंद🍎

सुख-दुख की गहरी नदिया है,उतरो तैर।
प्रेम - भाव से जीना सीखो , त्यागो बैर।।
है कुटुम्ब जग सारा अपना, रखना ध्यान।
कभी किसी को नहीं सताओ, छोड़ो मान।।
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मौसम  ने  बदली  है  करवट , कैसा खेल।
सर्दी    का   गर्मी    से  होता , देखो  मेल।।
नया  वर्ष  आने  वाला  है , अब  वो  जान।
आओ मिलकर इसका करलें,हम सम्मान।।

बूटा - बूटा   अब   महकेगा , भौंरे   मस्त।
मानव भी अब निज कर्मों में,होगा व्यस्त।।
ठिठुरन से अब छूटापीछा , उर उल्लास।
आयेगी  रंगों  की  होली , हो  मधुमास।।
👇
ममता का सागर है माता,दूजा कौन।
जग में बड़ा अनोखा नाता,पूजो मौन।।
जननी जन्मभूमि से बढ़कर, सच्ची बात।
बालक वास्तव में माता का , होता गात।।

मात पिता का जीवन में कर, लो सम्मान।
उनके हित कर देना अपना, जीवन दान।।
मान धर्म यह अपना करना,मत अभिमान।।
तब दुनिया मानेगी तुझको,सच संतान।।
निश्चल छंद आधारित गीतिका  शीर्षक - बेटी

जननी की महिमा अति न्यारी,करती प्यार।
बेटा - बेटी  पर  जीवन   को ,   देती बार।।

जग की रीति अनोखी लेकिन,मां अनमोल ,
भेद  नहीं  माने  दोनों   ही,  घर परिवार।।

दादा - दादी लड़की जन्में,करते सोच,
मात-पिता को बिटिया लगती, है संसार।।

कुछ लोगों को नष्ट कराते , देखा भ्रूण,
चिंतित कन्याओं की संख्या,से सरकार।।

इसीलिए प्रतिबंधित करदी,होनी जाॅंच,
मत हो पाये जिससे जग में, अत्याचार।।

बढ़े -पढे़ हर बिटिया रोशन,कर दें नाम,
सपना आज दिखाई देता,, है साकार।।
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   28🍒

शीत बड़ी सुखदाई जब हो, रुपया साथ।
शिमला भी है स्वर्ग जब हो , पैसा हाथ।
लेकिन कंगाली  में मिलती,  टूटी खाट।
वृद्धों को  साथ  न  मिलता,  जोहें  बाट।

हाय दुष्टनी    सर्दी देती ,   हर आघात।
अधमा,जैसी ही तो होती ,इसकी जात।
सभी ध्यान से समझें तो है,सच्ची बात।
खा जाये गच्चा  तो बिगडें, सब हालात।

काश!न होती सर्दी कहते ,सभी अनाथ।
हाय !  साथ तुम  देना मेरा ,  दीनानाथ।
पर अमीर है   कहता   होती, सर्दी काश!
खूब घूमते शिमला जाकर,नव  आकाश।

👇
महकी है फुलवारी सारी,महके बाग।
नव प्रभात सा खिलता ये मन,लगती आग।
बूढ़े,बच्चे, सभी जवां हो,गाते राग।
रंग बसंती ओढ़े धरती ,जागे भाग।

डाली-डाली नव दुल्हन से,फूल पलाश।
रंग टेसुआ जैसा सुंदर , पूर्व प्रकाश।
है मधुरस मोहित मनमोहक,जीवन आस।
साथ सखा का श्याम सलोने,लगते खास।

कली-कली मुस्काये जैसे,पहला प्यार।
अलि घूम-घूम घूमर घूमें ,हो लाचार।
मदन मगन मनमोहक करता,है व्यवहार।
नभ,धरती भी झूमे खोकर ,सब आचार।

स्वप्न मोहिनी है मन-मन में,प्यार सुबास।
मंद-मंद मदिरा जैसी ही ,बढ़ती प्यास।
मदमस्त सभी हैं बासंती ,रंग बहार।
झूमें सब नर-नारी जैसे,हों दिन चार।

सोच समझ सब खो बैठे,भूले द्वार।
अमिट छाप दे दिल पर इनके,रंग फुहार।
मन में महके ऐसे जैसे,गुल कचनार।
चोखी रंगत जीवन की ये,है सरोबार।
*************
भिन्न रूप हैं जाति भिन्न हैं ,उजले वेश।।
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,भारत देश।

उत्तर खड़ा हिमालय इसका ,है आधार।
अम्बर से धरती पर पावन,बरसे धार।।
कल कल करती नदियों के तट,सजती रेत।
ओढ़ चुनरिया धानी-धानी ,लहकें खेत।।

शस्य श्यामला भारत माता, देश सर्वेश ।
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,भारत देश।।

कश्मीर से कन्याकुमारी,भिन्न रिवाज़।
मीठी-मीठी धुन में बजते,सुन्दर साज।।
नृत्य ,संगीत, वेद का ज्ञान , नित सम्मान।    
सोने की चिड़िया कहलाया,है वरदान।।

रत्नों की अनमोल संपदा,गर्व स्वदेश ।
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,भारत देश।।

सरहद पर वीर सपूतों का,देखा जोश।
सर्द हवाओं को सहकर भी,रखते होश।।
कृषक खेत में स्वेद बहाता,उपजे अन्न।
परचम भारत का लहराता, दुश्मन सन्न।।

रहे शांति सुख सुविधाएं भी  , अब  धर्मेश 
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,     भारत देश।।
अनपढ़ तो लड़ते-रहते हैं ,जो संतान। 
तेरा-मेरा कह करते हैं, खींचा-तान ।।

दो टुकड़ों में बाँटे घर को,   खींच-दिवार। 
माँ-पितु लगते उनको तो बस,हैं भू-भार।।
भरा सभी कुछ खोल तिजोरी,हो अंजान।
तेरा-मेरा कह करते हैं,      खींचा- तान।।

खटिया पर है बूढ़ी अम्मा,       देखे नैन। 
सिसक रही है हर करवट पर ,हो बेचैन।।
हिस्सा अपना माँग रहा सुत, बेसुर गान।
तेरा-मेरा कह करते हैं,      खींचा-तान।।

चार पुत्र थे चार दिशा सम,सुंदर भोर। 
देख लड़ाई रोते नैना,  दुख हर ओर।। 
खेल खेलती माया-नगरी, लेती जान। 
तेरा-मेरा कह करते हैं, खींचा- तान।।

धन-दौलत की लालच में तो,दिखता लोभ।
भाग लगाने में मद के तो ,  कभी न क्षोभ।।
संस्कार क्या इतना दूषित ,भर निज खान ।
तेरा-मेरा कह करते हैं ,        खींचा-तान।।
••••एवं 👇

गिरिधर-माधव-मोहन-केशव,ब्रज-गोपाल ।
कमलनयन नैनों से फेंके,   सब पर जाल ।।

हृदयविहारी-पालनहारी ,    नंदकिशोर ।
वेणु बजाकर उर हरते हरि, माखनचोर।।
पीतांबर-दामोदर-मधुरिपु ,  यशुदालाल। 
कमलनयन नैनों से फेंके,सब पर जाल।।

करे प्रतिक्षा कीर्ति-किशोरी,     बैठी शांत। 
पावन निधिवन आते मिलने,कमलाकांत।।
प्रीति-सुमन के चुनती गोपी,सजती थाल ।
कमलनयन नैनों से फेंके ,सब पर जाल ।।

तार रहे प्रभु दनुज-मनुज को ,प्यारे श्याम ।
मुरलीवाला-कमलापति है ,अगणित नाम।।
हरिमय होकर झूम रहे सब,       देते ताल। 
कमलनयन नैनों से फेंके ,  सब पर जाल।।
हृदय-दीप मत बुझने देना, रखना आस।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,करो प्रयास।। 

मंज़िल पाने में जो लेता,     अगणित वर्ष। 
संघर्षों के बाद मिला तो,    आत्मिक हर्ष।।
लिख दो प्यारे आज यहाँ पर,शुचि इतिहास।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,     करो प्रयास।।

मत हारो तुम खाकर ठोकर, उन्नति नाश।
दृष्टि घुमा कर देखो ऊपर,वह आकाश।।
छूने को यह नभ बाकी है ,बन जा खास ।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,करो प्रयास।।

दृढ़ संकल्पित हो जा प्यारे , साधो राह। 
पथ भटकाने वाले चाहे,  सुन ले आह।। 
उड़ो परिंदा बन नभ में भर,  लंबी श्वास। 
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,करो प्रयास।।

••••एवं 👇
नहीं कभी कवि ऐसे लिखता,    कविता-गीत।
संवेदित यह मन उसका है ,       अपना मीत ।
झकझोरा जो हर पल उसको,    कर मजबूर --
वही लिया है कवि मन को बस,हँस-रो जीत।।

जब-जब सिसका है यह कवि मन,लेखन कर्म।
जाना है यह कवि  भावों का,        सच्चा मर्म।
कौन कहे बस वैद्य दवा दे ,   पढ़ कवि- राग-- 
आशाओं का दीप जलाना ,    ही कवि-धर्म ।।

सदा दूरदर्शी है कवि-मन ,     सभी समीप।
तपते मरु में भी खोजे वह,       सुंदर सीप।
एक समय में दो जग जीता , हो सब पार--
गढ़-गढ़ कर वह नित्य जलाए,मन के दीप।।
                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   31🍒
एक डाल के हैं हम पंछी, लगते हैं सबको प्यारे।
एक ईश की सबमें सत्ता, छोड़ें करना छल सारे।।

ऊपर बैठा वह अंबर में, नीली छतरी को तानें।
बागडोर है उसके हाथों, हर कण में उसको जानें।।
अभय मिले सारे जीवों को, खुशियाँ आये तब द्वारे।।
एक ईश की सबमें सत्ता, छोडें करना छल सारे।।

राग-द्वेष की छोड़ गठरियाँ, सत्य धर्म पर चलना है।
कहते कुछ हो करते कुछ हो, वह तो केवल छलना है।।
लौट कर्म फिर से आता है, मान कर्म से सब हारे।।
एक ईश की सबमें सत्ता, छोडे़ं करना छल सारे।।

बढ़ा प्रीत से हाथ तुम्हारे, जग अपना बन जायेगा।
अगर बहेगी उल्टी धारा, दूरी सदा बढ़ायेगा।।
परहित होगा लक्ष्य हमारा, लगा सदा अब ये नारे।
एक ईश की सब में सत्ता, छोड़ें करना छल सारे।।

भेदभाव की तोड़े कारा, अपने सम सबको मानें।
ज्ञान ध्यान जीवन में धारें, व्यर्थ कलह को क्यों तानें।।
'हिम्मत' सपनें पूर्ण करें सब, लायें धरती पर तारे
एक ईश की सब में सत्ता, छोड़ें करना छल सारे।।

••••|एवं 👇
🍎गीत-🍎
सबसे बोलें मीठी वाणी, लगे न दाम।
दौड़-दौड़ कर आते सारे, बनते काम।।

इसमें करना मत कंजूसी, बन नादान।
खुले हाथ जब मिलती हमको, दे मुस्कान।।
मुश्किल हल हो जाती पल में, दे आराम।
दौड़-दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।

कोयल लगती सबको प्यारी, सुनते ध्यान।
काँव-काँव कौवा जब करता, खोता मान।
मिश्री सा जो बोले सबसे, करे सलाम।
दौड़ -दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।

शब्दों में ही भेद छिपा है, ले संज्ञान।
बोली ही है सच्चा गहना, दे पहचान।।
बोले जो भी कटु वचनों को, हो बदनाम।
दौड़-दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।

मधुर वचन ही काम बना दे, मीठा बोल।
एक लगा दे गाँठ दिलों में, मत मुख खोल।।
पाप काट दे 'हिम्मत' पल में , बोले राम।।
दौड़-दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।


•••••एवं 👇
सार छंद, 16,12 मात्रायें-

कर्म किसे कब छोड़े जग में, किया स्वयं ही पाते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।

आदिनाथ  घर-घर घूमे थे, नहीं मिली थी भिक्षा।
अन्तराय थी जो कर्मों की, देते हमको शिक्षा।।
महावीर प्रभु को देखा है, संकट जीवन आये।
दोषी माना बस कर्मों को, धीरज से सह पाये।।
अटल मानते जो कर्मों को, नहीं कभी घबराते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।

महासती सीता को देखें, घूमी थी  वन-वन में।
राम सरीखे पति भी पाकर, कष्ट सहे जीवन में।
हरिश्चंद्र राजा को देखें, भरा डोम घर पानी।
राजपाट सब छूट गये थे, बेची तारा रानी।।
उदय प्रबल हो जब कर्मों का, क्या-क्या नहीं दिखाते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।

सीख हमें ये देते हर पल, सगे नहीं ये अपने।
कब राजा से रंक बना दे, नये दिखा दे सपने।।
सँभल-सँभल कर रहना हमको, सदा अशुभ से डरना।
साक्षी तेरे कर्म सदा ही, तेरा तुमको भरना।।
'हिम्मत' उदाहरण हैं कितने, पग-पग नाच नचाते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।

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आज द्वार मैं चलकर आयी, दो वरदान।
सत्य लिखूँ मनभावन माते, सब दें कान।।

छल से दूर रहूँ आजीवन, जगे विवेक।
साथ तुम्हारा हर पल चाहूँ, पथ हो नेक।
रहे आपका सदा सहारा, बनूँ न भीत।
परहित काम सदा मैं आऊँ, होगी जीत।।
संकट चाहे कितने आये, तव हो ध्यान।
सत्य लिखूँ मनभावन माते, सब दें कान।।

सदा कामनाओं से उठ कर, हो बस कर्म।
जड़ चेतन को जान सकूँ मैं, समझूँ मर्म।।
मैं ही दुश्मन अपनी जानूँ, मैं ही मित्र।
स्थान मिले जीवन में इसको, स्वच्छ चरित्र।।
मिले कृपा बस माँ ये तेरी, ये अरमान।
सत्य लिखूँ मनभावन ऐसा, सब दें कान।।

बैर भाव से करूँ किनारा, बाँटूं प्यार।
मोती चुन लूँ गहरे जाकर, पाऊँ सार।।
दृष्टि बने ये निर्मल मेरी, कर उपकार।
अग जग मातु बसेरा तेरा, कर दो पार।
'हिम्मत' वंदन नित उठ तुमको, देना ज्ञान।
सत्य लिखूँ मनभावन माते, सब दें कान।।
                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   32 🍒
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1-
मेरी से ज्यादा  क्यों उसकी, शर्ट  सफेद।
कोई तो  बतलाए  मुझको, इसका  भेद।।
मेरी जहाँ न गल पायी है, अब तक दाल।
उसने वहीं सफलता पायी, यही  मलाल।।
2-
वह क्यों मुझसे अधिक सुखी यह,अखरे बात।
यही  जगत  में  अधिसंख्यों  को,  है   संताप।।
है   आधार   मात्र   मिलने   का, अपने  कर्म।
वही  सुखी  जग में  जिसने  यह, जाना  मर्म।।
3-
उसने  ही  पाया  है  जिसने, किया  प्रयास।
बैठ  आलसी  भाग्य  भरोसे, करता  आस।।
मृग क्या सिंहों के मुख के खुद, आता पास।
सिंहों  को  ही  करना  पड़ता, उद्यम  खास।।
4-
असफलता  पर  कभी नहीं हम, मानें  हार।
कोशिश   करनी  होगी   हमको,  बारम्बार।।
हिलमिलकर जग में जो चलते, सबके साथ।
उनकी   रक्षा  हर  पल   करते,  भोलेनाथ।।
•••एवं 👇
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1-
कर्त्तव्यों के प्रति  होते जो, लापरवाह।
बड़े बुजुर्गों की जो मानें, नहीं सलाह।।
चाटुकार करते हैं  उनकी, झूठी  वाह।
इस कारण से भी हो जाते, वे गुमराह।।
2-
लक्ष्य   लोकमंगलकारी  जो,  लेते   खास।
सत्पथ पर चलकर जो करते, स्वयं प्रयास।।
बाधाओं  की  कभी  न  करते, जो परवाह।
ईश्वर भी  फिर  सुगम  बनाते, उनकी राह।।

•••एवं 👇
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                      - निश्चल छंद -
16,7 पर यति, 23 मात्राएँ, चरणांत में 2,1
            दो-दो पंक्तियों में समतुकांत
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1-
शीत लहर है जाड़ा भारी, जीवन ठप्प।
बैठो  ओढ़  रजाई  घर  में, मारो गप्प।।
जाड़े  का  घर में ही असली, है आनंद।
जिसका लुफ्त उठाना रहकर, घर में बंद।।
2-
धुंध कोहरा मुँह से निकले, दिनभर  भाप।
दिखा रही है  सर्दी अपना, प्रबल  प्रताप।।
स्वेटर कंबल मफलर टोपी, और  अलाव।
ऊनी कपड़े  खूब रहे बिक , ऊँचे  भाव।।
3-
सिकुड़  गए   सर्दी  के  मारे,  बाहर  पेड़।
गाय  भैंसियाँ ठिठुरे पंछी , बकरी  भेड़।।
नहीं सुनायी चिड़ियों की भी, दे आवाज।
कभी-कभी कोई चिल्लाता, आलू प्याज।।
4-
मजदूरों  को  नहीं  मिल  रहा   कोई  काम।
उनको  करना   मजबूरी   में,  घर  आराम।।
मगर परिस्थिति  पहले  से  है, बदली आज।
रुपया किलो निर्धनों को अब, मिले अनाज।।
5-
जाड़ा दिखा रहा है अपना, असली रूप।
ओढ़  रजाई  सूरज  सोया, गायब  धूप।।
गजक गुलगुले गरम मगौड़े , कॉफी चाय।
चौराहों पर  आग जलाए, नगर निकाय।।
6-
खड़े  रोंगटे   लगे   कँपकँपी,  बजते  दाँत।
घर  में   बैठे   आग  तापते, जमती  आँत।।
स्वत: दाम्पत्य  में पड़ता है,     पानी  खाद।
खत्म हुए है  आपस के अब , सकल विवाद ||

•••एवं 👇
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मकर  संक्रांति पर्व सुहाना ,  करिए दान।
गंगा  में  डुबकी  लेने का, पुण्य  महान।।
साथ लोहड़ी पोंगल का भी, पावन पर्व।
तीज और त्योहार मनाएँ, मिलकर सर्व।।
2-
गजक रेवड़ी तिल गुड़ लड़डू , तापो आग।
नाचो  कूदो  मिलकर  गाओ, सुंदर  राग।।
प्रेम  और  सद्भाव  बढ़ाए,  यह  संक्रांति।
शुभकामना सभी को मेरी, हो सुख शांति।

👇
1-
कुछ लोगों को भ्रम हो जाता, वही महान।
भक्त मंडली करती उनके, नित  गुणगान।।
पर  जो  होते  हैं  नैसर्गिक,  प्रतिभावान।
वही   विवेकानंद   सरीखा,  पाते   मान।।
2-
जीव जगत का जिनको होता, सच्चा ज्ञान।
सपने में भी  उन्हें न होता, कभी  गुमान।।
प्राणिमात्र का जो करते हैं, खुद  सम्मान।
उन्हें मान देता है  मन से, सकल  जहान  ||
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🍎*महाजन चीन*🍎
चीन डालता दाना तब ही,  जाल बिछाय ।
चलता चाल महाजन जैसी, फिर हड़काय ।।
क़र्ज़ा  उसका नहीं चुका जो, कुछ भी पाय ।
उसकी धरती पर फिर अपना, पैर जमाय ।।

दिया पाक को कर्ज़ा इतना, दे कब पाय ।
चलता है नेपाल उसी पथ, मौत बुलाय ।।
नित्य देश जो छोटे-मोटे, को धमकाय ।
दाँत रखे वह भारत पर जब, मुंँह की खाय ।।

सब पर हावी होना चाहे, ड्रेगन चीन ।
बजने कब देती है दुनिया, उसकी बीन ।।
जनक मानता है कोरोना, का संसार ।
चीन आज खुद ही पीड़ित है, अपनी मार ।।

मुँह तोड़ चीन को भारत ने,  दिया जबाव ।
पूरा विश्व कहे है उसको, बहुत खराब ।।
बेशर्मी की चादर ओढ़े, लगता चीन ।
उतर गई जब लोइ नहीं है, इसका दीन ।।
••••एवं 👇
*मुक्तक* विषय :- *हिंदी*

संस्कृत से भाषाएं सारी, कब संदेह ।
देवनागरी हिंदी पाती, उसका नेह ।।
फलीभूत पोषित भारत में, अब वह वृक्ष ~
विश्व पटल पर छाई हिंदी, जैसे मेह ।। १।।

काम सभी होते हिंदी में, सबको प्यार ।
सब भाषाएं प्यारी इसको,    लेती धार ।।
कोई नहीं पराई जानी, देती हाथ ~
सरकारी या गैर सभी ही, दें सत्कार ।। २।।

कोष वृहद हिंदी का मिलता, सबको ज्ञान ।
विषय क्षेत्र अब शेष न कोई,  है पहचान ।।
'प्रिंट मीडिया' हुआ पुराना, नवयुग देख ~
मोबाइल कंप्यूटर फिल्मों, की यह जान ।। ३।।

टेलीविजन रेडियो पर अब,   हिंदी राज ।
संसद हो न्यायालय चाहे, हिंदी काज ।।
सम्मेलन हो देश-विदेशी, हिंदी भाष ~
हर भारतवासी की है अब, हिंदी ताज ।। ४।।

कवि-लेखक की सच में लगती, हिंदी प्राण ।
विश्व पटल पर दिखती हिंदी, देख प्रमाण ।।
बने राष्ट्र की भाषा अब बस, यह ही आस~
टूटें सब अवरोध चलाओ, ऐसा बाण ।।
एवं 👇
*दहेज*
हाथ करें बिटिया के पीले, रहा रिवाज़ ।
देकर सामान गृहस्थी का, करते नाज़ ।।
संबंधी-परिचित भी देते, कहते दान ।
लेने-देने वालों को था, कब अभिमान ।।

रिश्ता जब सम स्तर में होता, बनती बात ।
लड़की चाहे अच्छा लड़का, यह ज़ज्बात ।।
होती है तब सौदेबाजी, पर तकरार ।
लड़की वाला रखता है फिर, उस पर धार ।।

लालच देकर लड़की वाला, डाले फंद ।
फिर मुकरे बहुतों वचनों से,  देता चंद ।।
बात बिगाड़ें रखते बेटी, बहुत सहेज ।
फिर कहते हैं लड़के की है, माँग दहेज ।।

दुरुपयोग है हित लड़की के, जो कानून ।
उल्टा चोर सिपाही डाँटे, है मजमून ।।
लड़की फाँसे ऊँचे लड़के,  डाले जाल ।
हाथ नहीं आता है तो फिर, करे हलाल ।।

हर लड़की या घरवाले कब, ऐसे देख ।
ऊँचे पद वाले लड़के की, लम्बी रेख ।।
चहिए शिक्षित धनवाली वधु, संग सुशील ।
जरा कमी होती तो जाते, पत्नी-लील ।।

व्यापारी या लोभी रिश्ता, लो पहचान ।
देना पड़े दहेज बचाओ, अपनी जान ।।
सुधरें दोनों लोग तभी कब, यह अभिशाप ।
दान मिली बछिया-दाँतों को, गिनना पाप ।।
                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   34 🍒
🍎निश्चल छंद आधारित गीत 🍎

कष्ट मिटायेऺ क्लेश हटायेऺ, सीताराम।
सबकी सुनते पीड़ा हरते, राधेश्याम।

मौन खड़े थे भरी सभा में , सारे वीर।
दुस्सासन जब खींच रहा था,तन से चीर।
लाज बचाने दौड़े आये, राधेश्याम।
सबकी सुनते पीड़ा हरते, राधेश्याम।

शबरी कहती आओ भगवन,कर दी देर।
प्रेम सुधा में भीगे खाये, झूठे बेर।
नाम रटा तो चलकर आये, सीताराम।
कष्ट मिटायेऺ क्लेश हटायेऺ, सीताराम।

अवगुण छोड़ो स्वच्छ बनाओ,मन का द्वार।
जग के स्वामी सबका करते, बेड़ा पार।
हृदय खोलकर भक्त सदा ही, रटते नाम।
सबकी सुनते पीड़ा हरते, राधेश्याम।

•••••👇

हृदय पुकारे नयन निहारे,तेरी राह।
आ जाओ घनश्याम जगा है, प्रेम अथाह।
जन्म जन्म से हरपल रटती,तेरा नाम -
बढती जाये प्रतिदिन स्वामी,मन की चाह।

धीरे धीरे घट जाता है,हर अवसाद।
हृदय कमल में सदा गूंजता, अनहद नाद।
जीव जगत जड़ चेतन का तब, मिलता ज्ञान -
साधक ध्यान लगाकर करता, जब संवाद।
•••👇

उलझन से क्या नाता मेरा, रहता मस्त।
तूफानों से टकराते हैं, मेरे हस्त।
कभी न निकला इन आॕ॑खों से, कोई अश्क -
दुख रहता है दूर सदा ही, मुझसे पस्त।

अभी न होगा जग में मेरा, सूरज अस्त।
रोग शोक से कभी न होता,तन मन ग्रस्त।
पूर्ण सभी होते हैं मेरे, सुखमय स्वप्न -
कठिन काल जीवन में आये, करता ध्वस्त।
👇

निज तन मन से प्रतिदिन करता,जग उत्थान।
शीत तपन जल प्लावन सहकर,गाता गान।
हे वसुधा के वीर सदा ही, जय जयकार -
सकल धरा पर अन्न उगाता, धन्य किसान।

तन पर दिनभर बोझ उठाता,वह मजदूर।
स्वेद बहाकर घर को लौटे, थककर चूर।
सकल धरा पर वो ही करता,नव निर्माण -
हालातों से फिर भी रहता, वह मजबूर।
👇
मुक्तक
डाल डाल पर खिले हुये हैं,, पुलकित वृन्त।
मनुज हृदय में उमड़ रहे हैं  , भाव अनन्त।
पीत वर्ण में सजी धरा भी,, हुलसित अंग।
प्रेम जगाये आए जब ऋतु, राज वसंत।
👇

नहीं रहा अब प्यार जगत में, नहीं किसी से छानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।

परिवारों में पड़ी दरारें, इज्जत गिरवी थानों में।
गली गली से निकल शराबी,झूम रहे मयखानों में।।
नहीं बचा अब भाईचारा,जहर घुला हर वाणी में।
फैल रही है हिंसा नफरत,गाॕ॑व शहर हर ढाणी में।।

समझदार लोगों की बातें, नहीं किसी ने मानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।

एक बाप के दो औलादें, फिर भी भूखा सोता है।
देख समय को आज बुढ़ापा,बिलख बिलख कर रोता है।।
जिस माता ने दूध पिलाया, दंश उसी को देते हैं।
जिनकी खातिर कष्ट सहे थे,छीन वही सुख लेते हैं।।

नहीं श्रवण सा पूत यहाॕ॑ पर, नहीं कर्ण सा दानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।

बदल गये त्योहार पुराने,बदला ढंग पढ़ाई का।
बच्चे भाषा पढे विदेशी,भूले ज्ञान अढ़ाई का।।
मौन हुये सब लोग पुराने,देख रहे नव पीढ़ी को।
जिस मंजिल पर टिकी इमारत,थाम रखी उस सीढ़ी को।

देख रहा बलकेश घरों में, होती खींचातानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।

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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   35 🍒

     💐 *स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*💐
धरा नहीं कुछ नफरत में है, समझो यार ।
सिर्फ प्रेम ही जीवन का अब, है आधार ।
पूर  घृणा  की  खाई  उसके,  थे  उद्गार ।
'विगत वर्ष' कह चला गया है, सागर पार ।

काल चक्र के रथ पर आए, तुम इस पार ।
साथ  तुम्हारे  आशा खुशियां, प्रेम अपार ।
लुटा रहे सब तुम पर देखो, अपना प्यार ।
*स्वागत  है  नव  वर्ष  तुम्हारा*, बारंबार ।

नहीं समझती अब भी दुनिया, जीवन सार ।
आतंकी  नित  बढ़ा  रहे  हैं, धरती  भार ।
शायद दुष्टों का तुम करदो, अब उपचार ।
देख  रहा  आशा  से तुमको, यह संसार ।

बढ़ा  हुआ है पाप धरा पर, आज उतार ।
बारूद बमों के ढेर लगे हैं, सब लाचार ।
एक  दूसरे  के  दुश्मन हैं, सब  नर  नार ।
'समय' तुम्हीं हो जग के ईश्वर, कर उद्धार ।

ऐसे लोगों का  रघु  तू  ही, कर संहार ।
*स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*, बारंबार ।

👇👇
रविवार पौष, शुक्ल पक्ष-दशमी - २०७९
1 जनवरी 2023, रविवार ।
अंग्रेजी नव वर्ष शुभ एवं मंगलमय हो!

खुशियों की लहरों पर आशा, ऊंची और उठाएं ।                                                               
चलो आज फिर जीवन पथ पर, कदम और बढ़ जाएं ।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।

अपने मन का कोना कोना, उत्साहों से भर लें ।
पूर्ण करें संकल्प यहां हम, ऐसा निर्णय कर लें ।
सबके साथ चलें हम मिलकर, सपने नए सजाएं ।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।

रूप  नए  में  नई  कहानी, नए  वर्ष  में  रच लें ।
उत्कर्ष करें हम जन जन का, खुशियां घर घर भर लें ।
पढ़ने और पढ़ाने की हम, रीत नई अपनाएं।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।

जैसा भी था बीत गया कल, उसको आज भुलाएं ।
अपने सुख दुखियों में बांटें, जीवन नया बनाएं ।
सेवा की हम पौध लगा कर, फसलें नई उगाएं ।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।

नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ- 

👇

गीतिका - "वरदान"

मानव  जीवन  ईश्वर का ही, है वरदान । 
समझो हम सब ईश्वर की ही, हैं संतान ।

ऊंच नीच अरु भेद भाव का, कर दो त्याग -
सब अपने हैं सबको समझो, एक समान ।

व्यर्थ नहीं तुम करना जीवन, है अनमोल -
नेक कार्य में इसे लगा कर, पा सम्मान ।

अपने मन से अपने मन का, कर उद्धार -
शत्रु मित्र ही अपना मन है, सच्चा ज्ञान ।

खुद  में  ईश्वर  औरों  में  भी, ईश्वर देख -
ईश्वर का फिर प्यार मिलेगा, पक्का जान ।

आज नहीं तो कल या परसों, जाना यार -
अतः सभी 'रघु' मन के गा लो, अपने गान ।

🙏🌹🙏 🙏🙏🌹🌹

गीत ~✍️
(आधार छंद - निश्चल ,शिल्प विधान 16,7 पर.यति अंत में 21,पदान्त - सीख  समान्त - अरना )
💐
 स्नेह नीर से शुष्क उदधि को,भरना सीख,
         छद्म बादलों का जल छल है, डरना सीख।
-
मृग-छौने जब भरें कुलाँचें ,विहँसे भोर , 
मोती नभ के लगें चुराने , हंसा - चोर ।
     नित्य व्योम के मौक्तक सँग-सँग,चरना सीख।
-
जगती का कल्याण करे तब, हो उल्लेख,
निडर अबाधित हो निष्कंटक ,जीवन रेख।
         विषदंतों का काल बनें पग,धरना सीख।
-
देख शुभ्र सत्कर्म स्वयं को , गढ़ लें लोग,
लिख दे नव अध्याय अनूठे ,पढ़ लें लोग।
      कर्म-रेख को विमल धवल अब,करना सीख।
👇

एक बिंदास गीतिका //बैठे-ठाले
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भेंट हुई है बहुत दिनों पर , राम जुहार!
मन मुकुलित है खिलती बाँछें, हर्ष अपार !!
-
अब कुछ होगी नहीं शिकायत,पक्की बात,
शिकवे गिले गिना देना सब,अबकी बार !
-
सदा रोक देती है दूरी ,दिल की रेल,
रहे दूर तो रंज अलेखन ,मिले हजार।
-
तैरी नाव कभी पानी में, जब बेरोक ,
भावुक होकर उर सलिला में,बहे विचार।
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अंगड़ खंगड़ लोहा लंगड़ ,सबसे मेल,
आँधी पानी सूखा ओले, अपने यार!
-
चर्चित होते तो बन जाते , हम भी खास ,
हैं फिलहाल अभी तो चुप ये,सब अखबार।


गीतिका ~
नील गगन का श्यामल बादल ,देता नीर,
करते रहते स्वप्न सुहाने, हमें अमीर।
-
दर्द ,चुभन आदत में शामिल,रंच न क्लेश,
नहीं प्रीति की होती दुश्मन, हिय की पीर।
-
हँसते पल क्षण होते सबकी,जीवन धार,
श्वास श्वास में नित्य प्रवाहित ,मृदुल समीर।
-
मेले में है आपा-धापी ,चारो ओर,
ढूँढ़े मानव कहाँ खो गई ,है तकदीर।
-
अगर निशाने पर हैं खुशियाँ,नहीं मलाल,
हमें वक्त की प्रियकर लगती,यह शमशीर।
       
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🍎निश्चल छंद में मुक्तक🍎
🍒विधान-16-7 चौपाई चरण+7, पदांत गाल🍒
💐"कहर ढाहता घोर कुहासा"💐

पहन शीत की झीनी चादर, आई भोर।
लगा धुंध का पहरा जग में, चारों ओर।
ठिठुर रहा खगदल शाखा पर, बैठा मौन-
अस्त-व्यस्त जन-जीवन सारा, चले न ज़ोर।

कहर ढाहता घोर कुहासा, करे प्रहार।
बर्फ़ीली सी चलें हवाएँ, जन लाचार।
पीत पत्र गिरते तरुवर से, बिना प्रकाश-
वयोवृद्ध निर्बल पर भारी, ठंड अपार।

घास-फूस के छप्पर टूटे, गिरे मकान।
शिथिल पड़े सब सड़क किनारे, गुम पहचान।
ताप धरा का घटता जाता, जग बेहाल-
पूस महीना कर्कश आया, लेने जान।

डॉ. रजनी अग्रवाल "वाग्देवी रत्ना"✍️
वाराणसी उ. प्र.)
माह जनवरी होती कितनी, ठंड प्रचंड। 
नहीं दरश था दिनकर का भी, इतनी ठंड।।
ऐसे में ले आयी मुझको, मेरी मात। 
था उसको माता बनने का, बड़ा घमंड।
👇

मोह नहीं है उनको मुझसे, समझी आज। 
करती है सौतन क्या कोई, उनपर राज। 
ओस गिरी ज्यों आँसू ढलके, भीगे गाल। 
कजरा बहकर फैली मेरे, बिखरे बाल। 

पिया नहीं आए हैं अब तक, आयी याद। 
सेज पड़ी है सूनी मोरी, हूँ बरबाद। 
ख्वाब सुनहरे क्यों दिखलाये, ओ प्राणेश। 
मिल जाए वह सौतन फिर मैं, पकडूँ केश। 

सूरज भी छिपता फिरता है, नयन सिकोड़।
नहीं आज कल खुल के खिलता , मुख को मोड़।
साँझ पड़े दीपक भी जलना, जाता भूल। 
रैना बीते नहीं चुभाती, वह भी शूल।


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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _   39  🍒
विधा: निश्चल छन्द  मात्रा भार: 16+7(चार चौकल+चौकल+गुरु लघु) सबका ध्यान 
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रार भुलाकर आपस में बस,करिए प्यार, 
मौसम के हैं खेल निराले,समझो यार,
प्रेम-मुहब्बत ने सर्दी को,दी है मात-
एक रजाई को जब ओढ़े, बच्चे चार।

द्वारे आए भूखे को दें,रोटी दान,
बच्चो को दें थोड़ा-थोड़ा,अक्षर ज्ञान, 
लोक हितो की जो करता है,सीधी बात-
उसको ही दुनिया वाले सब,कहें महान।

बाँट रहे जो हँसी सुहानी,हैं वे राम,
आओ हमसब झुककर उनको,करे सलाम,
अपनी सेवा से हैं रखते,सबका ध्यान-
सच्चे हरि के सेवक हैं यह,करो प्रणाम।

मातु-पिता गुरुजन की जिसने,मानी बात,
दूर सदा उससे रहते हैं,सब सदमात,
पहले चिन्तन-मनन करें तब,करते काम-
उन्हें सदा खुशियों की मिलती,है सौगात। ।

एवं 👇
                 सुखद विहान 
                ---------------------
किरणों ने मुस्कान बिखेरी,गाया गान,
आँगन की तुलसी लाती है,सुखद विहान। 

अलग-अलग खुशबू बिखराए, हर किरदार,
गुलदस्तों के फूलों-सा है,घर-परिवार, 
पतझर देख नहीं घबराते,सूखे पात-
संकट  से   कैसे  उबरेंगे,देकर ज्ञान,
लाते हैं जीवन में सबके,सुखद विहान। 

हर मौसम को पढ़कर नित-नित,करते काम, 
बना रहे हैं,घर-आँगन को,हरि का धाम,
अधरों पर मुस्कान लिए वे,करते बात-
स्वाद भरें सूखी रोटी में,कह पकवान, 
साधु-समान वही लाते हैं,सुखद विहान। 

खेतों में खुशियों को बोते,चुनते रार,
अन्त समय में  पाते हैं वे,कन्धे चार,
मूँद नयन तब हँसकर गाते,यह नगमात-
चला मुसाफ़िर तज माया को,सुन फ़रमान,
जीवन का विज्ञान यही है,सुखद विहान। 
-211001 मो: 8726195041
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भव सागर को पार कराते , हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते , हैं प्रभु राम ॥

शोषित वंचित त्यागी जन के ,हैं प्रभु मीत ।
भक्ति भाव शुचि प्रेम दया से , लें प्रभु जीत ॥
राम बिना श्रृंगार‌ रहित है     ,सुंदर गात ।
तरु बेवा सा लगे नहीं यदि , सुंदर पात ॥

भूले को सद मार्ग बताते, हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते , हैं प्रभु राम ॥

राम रत्न यदि मिले कहाँ कुछ , बचता शेष ।
खुश होते नर नारि मिला हो  , जैसा भेष ।
केवट शबरी गिद्ध जटायू ,तारें आप ।
शरणागत पापी के धोयें ,सारे पाप ॥

सत्य मार्ग चल स्वयं सिखाते, हैं प्रभु  राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते , हैं प्रभु  राम ॥

पाया परमानन्द लिया  जो ,  प्रभु को जान ।
भूल गया मद मोह किया जो ,प्रभु का ध्यान ॥
जिसे त्यागता जगत उसी के ,प्रभु जी थंभ ।
तन का होना राख रहे मन ,फिर क्यों दंभ ॥ 

गिरे हुए को सदा उठाते ,हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते ,हैं प्रभु राम ॥
जय श्री राम
यहाँ बुरा ही क्यों दिखता है, सबका हाल। 
सबके सब ही बुन रहे हैं,     स्वारथ जाल। 
परहित केवल मुख तक बसता,सबकी रीति-
"माही" सब ही बजा रहे हैं,     थोथा गाल ।
••••••एवं 👇
निश्चल छंद

हरियाली ही नित सहती क्यों, पतझड़- वार। 
साथ छोड़कर निकल चला है ,अब संसार।। 
जैसे ही हरियाली आती,          बनते मित्र। 
दुनिया सच्ची है या कोई,      है चल चित्र।।

दुनिया ही बेगानी होती,     स्वारथ साध। 
पाया कोई सच्चा साथी,   क्या निर्बाध।। 
क्या दुनिया के भीतर उपजा, कोई खोट। 
"माही" क्यों दस्तूर बना है, करना चोट।।

👇

किसी ग्रंथ पर  जब होती है,   कोई बात । 
किसी धर्म पर क्यों होता है, तब आघात। 
लिखे ग्रंथ की करे समीक्षा,  हर परिवेश_
क्या सच्चाई का भी  होता ,    कोई तात। 
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गणतंत्र दिवस पर पटल परिवार को हार्दिक बधाई
प्रदीप छंद आधारित गीत

नाना धर्मों का जल पीकर,        पलने दो इंसान को।
भारत नदियों का है संगम,समझो जगत महान को।। 

मत घोलो इस पावन जल में, स्वारथ हित तुम बैर को। 
अपनी थाती याद करो तुम,         गले लगाये गैर को। 
हवा अमन की बस बहने दो,     जिंदा रखो गुमान को.......

सदियों जग सिरमौर कहाता,मानवता की खान है । 
भाईचारा, प्रेम लुटाओ,जो अपना अभिमान है। 
मत मेटो जिंदा रहने दो, वीरों के बलिदान को.......

मत घोलो तुम जहर हवा में, मुझको भारत रहने दो। 
संविधान  से आस यही अब, दुख मुझको मत सहने दो। 
मत हँसने दो मुझ पर जग को, रखना मेरी आन को.................

वीरों की जननी जो धरती,   भरती साहस खास है। 
रोको अपने स्वारथ को तुम, वरना जग उपहास है।।
नमन् जगत करता है सारा,"माही" जिसके ज्ञान को............
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🍎निश्चल छंद🍎
छंद महल  की   सुन्दर   रचना   , निश्चल छंद l
उत्तरायण  रवि  माघ  मकर  में , शोभित  चंद ll
 साधु संत  की  निर्मल  वाणी , बहे   समीर l
गंगा यमुना सरस्वती   जल  ,   संगम  तीर  ll

धर्म  कर्म की महिमा न्यारी ,   तीर्थ  प्रयाग l
आलौकिक सुख तीरथ  संगम , देह  विराग ll
 माघ मकर महिमा गुण गाथा,    सदा बसंत l
भवसागर  का तारण तट है ,कहते   संत  ll

देवहूति कर्दम हि तनय  का   , कपिल हिं नाम l
 हे सांख्य शास्त्र  के शब्द प्रणेता  कोटि प्रणाम ll
जयति  -जयति  जय -जय सुरसरिता  , तेरा धाम l
मोक्षदायिनी  देवनदी   है       , तेरा    नाम ll

पापनाशिनी  निर्मल गंगा   , बहती    धार l
शब्द नहीं  हैं कवि कोविद के,  पाएं  पार  ll
पूर्वज  सगर तारिणी  गंगा ,  मुनिवर    श्राप l
कर लो  दर्शन विष्णुपगा के, मिटते   पाप ll
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हर हर गंगे  की  बोली से ,    मचता  शोर  l
अविचल प्रेम  देखता  कैसे   , चंद्र  चकोर  ll
माघ  मकर   संक्रांति सुपावन , नाचे   मोर l
भक्त  नहाते  गंगा तट पर ,    भाव  विभोर   ll

  मन उपमेय  भाव उपमानहिं , कृषकहिं  खेत l
कवियों को प्यारा   लगता   है      , उपमा  देत  ll
जाति मयूर  वर्ग  का  प्राणी   ,  चंद्र     चकोर  l
निष्ठां  उसकी कितनी  निर्मल ,    राजकिशोर ll
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अहम्  हुआ  जब बने प्रजापति  ,   कनखल  दक्ष  l
सुर नर मुनि गन्धर्व  निमंत्रित   ,   ऋषिगण     यक्ष ll
चंद्र  रोहिणी   लखि  मुस्काते    ,    जब   स्वयमेव    l
चलहि  विमानहिं   नभ  ध्वनि होई ,   हर्षित    देव   ll

कनखल  तीर्थ दक्ष   की  नगरी , प्रथमहि    यज्ञ    l
आहुति  देव भाग  निज लीन्हा ,    सुर  तत्वज्ञ   ll
 यज्ञ  समय  जामाता शिव का,   कर  अपमान l
  संहारक  जय  जय  शिव  भोले     ,    शिव   भगवान  ll

सती देखि  निज पति  अपमाना ,  उपजा  रोष  l
यज्ञ कुंड   प्राणाहुति   दे दी  ,  मानस    दोष ll
   शिवगण दक्ष युद्ध  भा  भारी  ,    यज्ञहिं  कुण्डl
शिवलीला  जानहि   सुर  कैसे  ,   बकरा   मुंड ll
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _  43🍒
जो सबके जीवन में बोते , रहते खार।
सोचो सुखमय उनका कैसे,हो संसार।
सुखी सदा रहने को अपना,बाँटो प्यार।
दीन -दुखी निर्बल पर करना , तुम उपकार।
*
सुबह सवेरे नित ही करना,ईश्वर गान।
मन से रे ओ! मानव सब दे,तज अभिमान।
निश्छल मन मानव की जग में ,रहती शान।
शुभ कर्मों के कारण होता, है कल्यान।
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हरी-भरी धरती सब मानव,रहा उजाड़।
अपने नित्य स्वार्थ को वो तरु,रहा उखाड़। 
 जीव -जन्तु का छिना बसेरा, सहते कष्ट।
फिक्र नहीं धरती माता की, मानव भ्रष्ट।
*१
बिन तरुवर आकुल -व्याकुल सब ,रहते आज।
जीव -जन्तु बहु सर्दी गर्मी, सहते आज।
दुश्मन बन मानव का मानव,छीने प्रान।
भार अधिक धर धरती पर वह,समझे शान।
*२
 फिक्र नहीं धरती की चिनता, उच्च मीनार।
लख प्रकोप धरती का मानव, जाता हार।
सब कुछ छूट सदा को जाता,हो बेहाल।
खड़ा दिखाई देता उसको, अपना काल।
*३
जीवन सबका संकट में है , देखो आज।
जोशीमठ से छिना सभी का, अपना राज।
खिसक रहा पर्वत लगता है, होगा लुप्त।
माया ईश्वर की सब जाने,रहती गुप्त।
* ४
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तेइस मात्रिक होता है यह, निश्चल छंद।
सोलह सप्तम मात्रा पे यति, अनुपम बंध।।
चौपाई ने छेड़ दिया स्वर, चौकल तान।
गुरु लघु से चरणांत वहाँ फिर, निश्चल जान।।

छंदों में दोहा,चौपाई,भरते जान।
इनके बिन लगते ऐसे ज्यों, हों निष्प्राण।।
शब्द-शिल्प का हुनर गढ़े जब, रचना भव्य।
अलंकार, हो सरस शुद्ध सब अक्षर, हो ध्यातव्य।।

ज्ञानी जन को विनयावत हूँ, मैं मति मंद।
अंधकार से घिरी न आया, रचना छंद।।
अनगढ़ सी कुछ लिखीं पंक्तियाँ, हों स्वीकार।
जो भी अब तक रचा काव्य सब, गुरु साभार।।
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निश्चल छंद–
(23 मात्रिक छंद)16,7 पर यति  चरणांत गाल।
(चौपाई+ 7 मात्राएं चरणांत गाल)

नैतिक मूल्य जरूरी हरदम, हों स्वीकार।
अंगीकार करें जीवन के, ये आधार।।
हैं मनुष्यता के गुण जिसमें, वही मनुष्य। 
वर्तमान उजला-उजला हो, भला भविष्य।।

सही राह पर चलते रहना, हो उत्कर्ष।
संयम सदाचार  अपनाकर, पाता अर्श।।
सार्थक पहल इसी क्षण से हो, कर प्रारंभ।
बड़ी-बड़ी बातें में फँसकर , भर मत दंभ।।

संस्कार की नींव हमारी, है मजबूत।
कुछ कठोर कुछ नियम लचीले, प्रत्याभूत।।
वचन-वद्धता निज-अनुशासन, अंगीकार।
वातावरण सुंदरम् घर का, दिल में प्यार।।

सत्यवादिता कण्ठाभूषण, सह- ईमान।
भाषा मर्यादित गह इसका, रखना ध्यान।।
मंजिल पाना लक्ष्य हमारा, दृढ़ संकल्प।
कठिन-परिश्रम- दूजा कोई, नहीं विकल्प।।

नैतिक,सामाजिक मूल्यों का, प्रतिदिन ह्रास।
आध्यात्मिक मूल्यों का भी है,  नित उपहास।।
नैतिक मूल्यों को धारण कर, निज-कल्याण।
ऐसे निज-हित से होता है, जग-कल्याण।।
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _  45🍒
विषय -जिस देश में गंगा बहती है 

जिस प्रदेश में गंगा बहती, पावन देश।
कण कण में भगवान बसे है , शुभ परिवेश।।
मैं उस भारत का वासी हूॅं ,    लो पहचान।
तपो भूमि ऋषि मुनियों की यह , इतना जान।।

बहे देश में गंगा भारत ,  निर्मल नीर।
उसकी तो कुदरत ने लिक्खी, भाग्य लकीर।।
 प्यार बसा है प्रकृति मनोहर, लगता रूप।
देख हिमालय पर्वत चोटी, रूप अनूप।।

गंगा में डुबकी से कटते , सारे पाप।
ऐसा है  बरदान यहाँ पर , जानें आप।।
पेड़ो की पूजा है होती, पीपल नीम।
तुलसी तो घर ऑंगन बसती,दूर हकीम।।

भाईचारा प्रेम यहां पर,है सम्मान।
फहरे ध्वजा तिरंगा प्यारा,है अभिमान।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा है ,गिरजा शान।
घंटा बजता मंदिर मस्जिद, पड़े अंजान।।

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छंद महल निश्छल छंद
चन्द्र शेखर आजाद

उनके नारों को जग सारा,करता याद।
भारत के थे वीर सिपाही, वह आजाद।।

बाद गिरफ्तारी बतलाया,अपना धाम।
नाम हमारा स्वतंत्रता है,  कर संवाद।।

जेल हमारा पता ठिकाना, सुन लो यार।
बेटा भारत मातु भारती , हूँ  औलाद।।

कहे आजाद आजादी ही , है कर्तव्य।
जन्म लिया उन्नाव जिला में, मैं उस्ताद।।

माॅं जगरानी देवी पापा,    सीताराम।
धनु  विद्या में माहिर हम है , अब फौलाद।।

आंदोलित हुए कम उमर में,वह संग्राम।
 नष्ट करुँ गोरो की हस्ती ,  प्रण बर्बाद।।

हाथ नहीं आऊॅंगा तेरे,उनका बोल।
भारत माता जय बोलूगाँ , जिन्दा बाद।।

चन्द्र भूषण निर्भय. बेतिया बिहार

लेखन ऐसा करिए अक्षर, अक्षर सत्य।
हिंदी पर अपना हो केवल,ही अधिपत्य।।
भावों में लालित्य रहे तो  होगा मान।
हिंदी हो सरताज हमारा,  लें संज्ञान।।

हिंदी में लिख भेजें प्रिय जन ,को संदेश।
लेखन ऐसा करिए हो यह, उन्नत देश।।
हिंदी अपनी आन बनी है, मां की शान।
लेखन ऐसा हो हिंदी की,   गूँजे  गान ।।

सरस सुगम है छंद लिखें, या फिर गीत।
लेखन ऐसा ही करिए ले, मन को जीत।।
हिंदी बोलें और पढ़ें सच ,हो  परिवेश।
पूर्ण राष्ट्रभाषा बन चमके,अपन देश।।
निश्चल छंद आधारितमुक्तक
बतलाएगा साल नया क्या, उनका हाल।
फुटपाथों  पर सोए हैं जो ,धरती  लाल। 
नया पुराना होता है सब ,एक समान,
बीते  सालों  के जैसे ही,  गुजरा साल। 

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शीत लहर से व्याकुल प्राणी, सुबहो शाम।
दुबके बैठे घर में लेते , प्रभु का  नाम।
दिनकर दादा रूठे बैठे, अपने धाम।
नहीं दिखाते मुखड़ा हमको, रवि विश्राम॥

बच्चे बूढ़े हैं आफत में, और किसान।
सीमा पर सैनिक की हालत,सर्द विमान।
धूप नहीं अब कैसे सूखे, पेंट कमीज।
निष्ठुर सर्दी को थोड़ी भी, नहीं तमीज़॥

निर्धन - बच्चे भूखे रोते, काटे रात।
शीत बड़ी दुखदाई अब है, सुन लो बात।
मजदूरी पर निकले कैसे, बूढ़े बाप।
हाथ-पाँव भी थर-थर काँपे,अपने आप।।

रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _  48 🍒
मेरे   दीनानाथ   कीजिये, पूरन   काम।
करके सुन्दर काम करूँमैं, जग में नाम।
जाति धर्म के किले बने हैं,उनको तोड़।
मानवता की ओर सकूँ मैं, उसको मोड़।1

भेद  भाव  की  सदा   बनाता, नर   दीवार।
मन  से  दुखी  बना  रहता  है, वह  बीमार।
जीवन में सुख शांति सदा जो, पाते   लोग।
उनको फिर प्रिय कहाँ लगें ये,जग के भोग।2
एवं 👇👇👇

                        मुक्तक
बहुत काल से होता आया, सदा विकास।
प्रगति छिपाये अंतस्तल में, बीज  विनाश।
चरम बिंदु पर पहुँच शुरू फिर, हुआ उतार,
पतन हुआ प्रारम्भ सृजन की, त्यागो आस।।

स्वार्थ भूल अपराध बसे जब,मानव पास।
कर्मानुसार   मिलता   रहता,उसको त्रास।
धन,जन,तन बल काम न आये,करे बचाव,
जीव सदा ही साबित होता, प्राकृत  दास।।

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शीत लहर का बजता डंका,मन की हार।
भूख प्यास से जीवन लगता, है  लाचार।।
पशु  पक्षी  हैरान  तड़पते  ,  देते   जान ।
चेहरे से गायब मिलती  है  , ये  मुस्कान।।
ज्ञान प्रकाश दुबे 
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _  50🍒
आधार छंद- निश्चल छंद
विधान - 23 मात्राऐ, 16,7 पर यति अन्त गाल अनिवार्य

               🌹मुक्तक🌹
छोड़  अयोध्या  राम  चले  बन, नंगे  पांव|
साथ चले  है  सीता  लक्ष्मण, भ्राता  छांव|
सेवा  करना  तुम  माता  की, जाओ  लौट
लौट  भरत  जल्दी  आऊँगा , अपने  गांव|

जाकर  तुम  माता  से  कहना, मेरा  ढोक|
माँ  बिन  लगता  सूना  सूना, सारा  लोक|
तकदीर  लिखा  होकर  रहता, जैसे  लेख
भाई यह लेख विधाता के,  मत कर शोक|

लगता है जाने  क्यों मुझको,आज अभाव|
जनमानस पर है कलयुग का,सिर्फ प्रभाव|
ऐ  कैसा  चहूँ  दिशा   छाया,  पाप  तमाम
चक्कर  है  सारा  माया  के,  साथ  लगाव|
                            स्वरचित
                 ✍️✍️ जे पी मधुकर
👇👇
आधार छंद- निश्चल छंद
विधान - 23 मात्राऐ, 16,7 पर यति अन्त गाल अनिवार्य

               🌹मुक्तक🌹
 जब   भी   सुखदाई   पुरवाई,  बहती  मंद|
कवि  लिखता  बैठा  बैठा  तब, सुन्दर छंद|
कुछ भी ज्ञान नहीं है मुझको, लय सुर बंध~
कविमन के कुछ अनुभव लिखता,बातें चंद|
                            स्वरचित
                 ✍️✍️ जे पी मधुकर
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _  51🍒
गीतिका   ,<पदांत- अपदान्त, समान्त-आल
**
यह जीवन ताना उलझन का, माया जाल |
सदा बचाना तुम हम सबको, हे गोपाल ||

रीत यहाँ की हर झूठी है, झूठी प्रीत |
सत्य नाम है केवल तेरा, यशुमति लाल ||

अपने ही सब ठगते रहते, देते दर्द |
कलयुग कैसा अब आया है, कैसा काल ||

रचा जगत ये तुमने खुद ही, हे जगदीश |
खुद ही देखो हे मनमोहन, इसका हाल ||

अपने को ही समझे रहता, सबसे श्रेष्ठ |
देखो मानव कैसा है ये, करे कमाल ||

माफ़ करो हमको हे केशव, हम हैं मूर्ख |
सदा करें नादानी जग में, तेरे बाल ||

मार्ग कभी भटके जो हम सब, रहना संग |
कृष्ण सदा ही लेना फिर तुम, हमें सँभाल ||
*****
डॉ. सोनिया गुप्ता/ 
जय माँ शारदे
गीत हमारे होठ तुम्हारे,           खुशी अपार।
प्रेम पुजारी तुम्हें पुकारे,                बारंबार।
सीमित जीवन की खुशियां हैं, जो अनमोल-
जितना लूट सके हम लूटें,        सच्चा सार।।

कोकिल गाती मधुर तराने,        सुन संगीत।
अब संक्रांति निकट है आई,  क्यों भयभीत।
सुख - दुख दोनों आते - जाते, हो अनुभूति -
जाती सर्दी आता फागुन,         होगी जीत।।

👇
जय माँ शारदे 
निश्चल छंद आधारित गीत 
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शुरू हुआ भ्रमरों का गुञ्जन,,, है उल्लास।
आमंत्रण हैं देती कलियाँ,,,,,, आओ पास।।

कठिन शीत की बीती रजनी, शीतल वात।
कंपित दिन भर रहते थे सब,थर-थर गात।
रश्मि रथी अब सज्ज हुए हैं,,,, बाँटे प्राण,
मुदित धरा है देखो लौटा,,, फिर मधुमास।। 

अलसाई सी रति फिर जागी,मगन अनंग। 
पञ्च बाण तूणीर उठा कर,, ,, करते तंग। 
बहलाते मीठी बातों से,,,,,,,,,,दे उपहार, 
स्वामी भाव भुलाए देखो,,,,, लगते दास।। 

पीत चूनरी ओढ़ सुहाती,,,,,, लिए उमंग। 
सजी चली है प्रकृति खेलने,, फागुन रंग। 
राग बढ़ा है मन में सबके, पल अनमोल, 
मदन मोहिनी कृपा करो अब, छूटे आस।। 
===========================
जय माँ शारदे
सरसी छंद आधारित गीत 
पीली साड़ी पहन उतरती,,,, अलसाई सी भोर।
शीत गुनगुनी अच्छी लगती,,, पक्षी करते शोर।।

मधुर मलगजी बहें हवायें,,,, लेकर साथ पराग।
उन्मत मधुकर गुंजन करते, जाग गया अनुराग।
मोहक कितना प्यारा लगता,आता यह मधुमास, 
हरियाली की चादर फैली,,,, धरती के हर छोर।।

पंचम स्वर में कोयल कूके,,,,आम्र नये नवनीत।
पछुआ पगली छेड़ रही है,,,,, फसलों में संगीत।
लहर लहर लहराती बाली,,,,,, मन में भरे तरंग-
लगे धीर उन्मत नायक अब, रहा कली को झोर।।

संवत्सर में मौसम प्यारा,,,,, यह होता है खास।
उम्मीदों की जगे सुहानी,,, बढती सबकी आस।
निठुर निर्दयी कब आओगे,,,,, राह रही मैं देख-
वक्ष भीगते भीगें अँगिया,,,,, नयन बहाते लोर।।

👇

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मन अनुरागी हुआ हमारा,,,,,,,,, झरे पराग।
बोल रहा फिर मुंडेरों पर,,,,,,,,,, बैठा काग।
कौन बताओ परिचय अपना, क्या ऋतुराज? 
आयेगा फिर से आँगन में,,,,, सुख सौभाग।।

साध रहा शर देखो मुझपर, कुटिल अनंग।
रति भी आकर बरसाती है,,,, मुझपर रंग।
मन मधुकर बौराया जैसे,,,,,,, पा मधुगंध-
पछुआ पगली करती मेरा,,,,, आसन भंग।। 

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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक _  53 🍒
निश्चल छंदाधारित "मुक्तक त्रय" 
अभिनंदन नव वर्ष! 

गुजरा समय पुरातन आया, अभिनव वर्ष, 
साथ  लिए आगे  बढ़ने  का, नव  उत्कर्ष। 
भूलें हम दुख की घड़ियों का, भीषण दर्द - 
नूतन पल का कर लें स्वागत, पुन: सहर्ष।।

आज कहे मन उलझी  सारी, गाँठें  खोल, 
मृदुल, सुभाषित बोली होती, है अनमोल। 
मिटती है रुसवाई  उस  पल, अपने आप - 
हृदय तराजू देखे जब भी, सब कुछ तोल।। 

सूर्य  किरण के जैसे  मन में, भर उत्साह, 
उधर बढ़ाएँ  कदम जिधर हो, उत्तम राह। 
विगत समझकर अंधेरे को, निकलें साथ - 
आनेवाले कल की लेकर, सुखमय चाह।। 

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सरसी छंद 
विधान - 27 मात्रा ; 16,11 पर यति 
विषम चरणांत चौकल, सम चरणांत गुरु लघु

गंगा तट

कुंदन सरिस चमकती  रेती, निर्मल, पावन नीर। 
अनुपम  धारा  देवनदी  की, शीतल  मंद समीर।।
निरख  रही  मैं यह  सुंदरता, रख  अंतर में धीर। 
चाह रहा मन सृजन करे कुछ, बैठे सुरसरि तीर।।

प्रात: काल दिवाकर आता, लेकर साथ उजास। 
सुप्त हृदय को जागृत करता, देता नव उल्लास।। 
स्वयं निराई कर खेतों की, कृषक निकालें घास। 
लख कर  फसलों की  उर्वरता, संजोएँ वे आस।। 

जमुना चाची भोर पहर उठ, गाती मोहक गीत। 
कर संचरित मधुर भावों को, मन लेती है जीत।। 
करते बात पखेरू मिलकर, बनकर सच्चे मीत। 
देते  हैं  संदेश  मनुज  को, प्रेरक  और  पुनीत।।

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निश्चल छंदाधारित गीत 
ग्राम श्री 

खिले  धूप  दोपहरी  में  जब, चमके रेत, 
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत। 

भाती है सबके  ही मन को, हल्की शीत, 
गूँजे  घर - घर  में  बासंती, मनहर  गीत। 
आए  गाँव नरायन गायक, शिष्य समेत, 
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत। 

लहराते हैं  ईख, विटप  सब, करते शोर, 
पवन चले  पुरवाई  मन को, दे झकझोर।
धरती सुत हो मुदित निहारें, अपने  खेत, 
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत।

जो शहरों  से  आकर्षित हो, छोड़े  गाँव, 
भूल  चुके  थे  अपना  ऐसा, सुंदर  ठाँव। 
लौटे  घर  वे  वापस  होकर, पुन: सचेत, 
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत।

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सरसी छंदाधारित "गीत" 
विधान - 27 मात्रा ; 16,11 पर यति 
विषम चरणांत चौकल, सम चरणांत गुरु लघु

मोहक ऋतुराज

आओ साथी मिलकर गाएँ, एक मनोरम गीत, 
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।

मोहकता अब आगे आकर, बिखराए नव रंग, 
कदम बढ़ाकर  हाथ मिलाएँ, सद्भावों के संग।
अगवानी  कर रही  हमारी, बाँह  पसारे  प्रीत, 
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।

उपवन में वह  श्यामल भौंरा, करता है गुंजार, 
आम वृक्ष पर  कूके  कोयल, प्रकट करे उद्गार। 
चलो सहजता से अपनाएँ, हम सुखदायी रीत, 
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।

पुष्पलताएँ  झूम  रही  हैं, हर्षित है   ऋतुराज, 
जरा हमें भी तो बतलाओ, क्या है इसमें राज? 
समझ उमंगों की परिभाषा, परखें भाव पुनीत, 
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।

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  1-
सच्चे मन से अगर पुकारो,आते श्याम।
फल शबरी के जूठे जाकर ,खाते राम।
रटना होगा निश-दिन हमको,इनका नाम।
राम-श्याम की सुन्दर छवि को,कोटि प्रणाम।।
                         2-
शुभ अवसर पर हम सब गाते,मंगल गान।
रागिनियाँ सब मिलकर छेडे़,मीठी तान।
मन के भीतर बजता रहता,अनहद नाद।
धुन वंशी की अब भी हमको,आती याद।

               3 - मुक्तक
कहाँ कहाँ से लेकर आते,सुन्दर छन्द।
थोडे़ से तो जाग्रत होते,हम मतिमन्द।
बैठे बैठे इन पर करते,कुछ अभ्यास-
हमको भी  मिलता तब इनका,नव मकरन्द।।
                          
👇
 हारे का बस एक सहारा,खाटू श्याम।
 श्री कृष्ण ने दिया था जिसको,अपना नाम।
 जिसके दर पर बनते सबके,बिगडे़ काम।
 सीकर में तुम जाकर देखो,उसका धाम।।

 हारे को था चला जिताने,मौर्वी लाल।
 अब भी हर दुखिया को करता,मालामाल।
 झोली भर-भर देते देखा,लखदातार।
 उसके जैसा और न होगा,बक्शनहार।।

 पौत्र भीम का,बचपन में था,बब्बर शेर।
 शीश काटकर दिया कृष्ण को, करी न देर।
 दर पर उसके लगता मेला ,ज्यों त्योहार।
 लीले घोडे़ पर आता वह,कलि अवतार।।
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 55
मन का आंगन सूना लगता, अब सर ताज।
दर्शन  दे  दो  विनती  करता,तुम पर नाज़।।
राधा ,मीरा ,सूरदास सम, चाहूं  ज्ञान।
आंख मिचौली बंद करो अब,आती लाज ।।

पंकज शर्मा "तरुण ".
पिपलिया मंडी,मध्य प्रदेश।
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 56 
#मुक्तक
ताटक छंद आधार 16/14 पर यति अंत मै 3 दीर्घ

दुनियाँ गंगा कहती मुझको,पाप मिटाया करती हूँ ||
जीवन की अंतिम यात्रा मै,साथ निभाया करती हूँ ||
पावनता मनुज भावना मै, इसीलिए ही मै पावन~
वरना नीर लिए बस मै तो, बहकर जाया करती हूँ ||

✍️✍️✍©brijesh sinha sagar ✍️✍️✍️
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 57

झड़प  नहीं  उत्तम  होती  है, लगे लगाम |
जहाँ मान का  प्राण बचे जो,सोच अवाम ||
मूर्खो  से  बचकर  ही  उत्तम, यही निदान |
चलना है जीवन में जो है, साक्ष्य  विधान ||

खुल्लम खुल्ला राज यहाँ पर, जो भी प्राण |
इनका भी अवलोकन करना, जीवन त्राण ||
शुद्ध सार्थ ही सूक्ष्म बिंब पर, फोकस मात्र |
बनकर जीना  है  बस  यूँ  ही, उत्तम  पात्र ||

रंग  भेद "अरु" रूप  नहीं  सब,,, इसमें  एक |
जहाँ  घुलन  में  प्रेम  भाव  मत, कैसा  नेक ||
अपने  में  भी  खेद  करो  प्रिय, मत बन श्रेष्ठ |
"पर" की गलती पर क्यों हँसते, बनकर जेष्ठ ||

झलक काम सब नेक नहीं ज्यों,सागर खार |
बंजर  भू  जो  लंबी  चौड़ी,    पीता   क्षार ||
तहकीकात  करें  तन  में  भी, क्या  है  सार |
झूठ  बड़प्पन  करने  वाले,,,, मिले  हजार ||

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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 58

क्यों  इतनी सुन्दर हो सजनी, नैन न मार।
मुख-आभा से विहँसे रजनी,बन गलहार।।
प्रणय-पीर की तुम हो शमनी,तुझसे प्यार।
धन्य हुई तुझ से यह अवनी, अरु  संसार।।

चंचल  चारु चक्षु चित रमनी, दे सुख चैन।
तिय  रजनीगंधा  सम  महके, मोहक रैन।।
कृष्ण केशिनी कंचन काया,कुमकुम भाल।
अधर  लालिमा  मन  को  मोहे, गोरे गाल।।

तुम अद्भुत गुणवती तुम्हारा,अनुपम रूप।
तूँ चमके ज्यों गगन सितारा,अमित अनूप।।
प्रतिपल पग पायल यूँ बाजे ,ज्यों संगीत।
हिय हर्षित हरदम हो जाए, पा तव प्रीत।।
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वन - उपवन इस वसुंधरा पर ,नाना फूल।
हो  हिय  हर्षित देखत उनको, मिटते शूल।।
सभी वनस्पति दुर्लभ औषधि,को मत भूल।
जड़ - चेतन इस  दुनिया के हैं, ईश्वर  मूल।।

बार - बार आभार तुम्हारा, हे! जगदीश।
यह जग कितना मोहक प्यारा,हे!प्रभु ईश।।
पंचभूत  ये  भू, जल, पावक,गगन समीर।
जिनसे निर्मित यह जग सारा,मनुज शरीर।।

ज्ञान  कर्म  की सभी इन्द्रियाँ, मोहक रूप।
मन साक्षात अंश प्रभु का है,अमित अनूप।।
ललित हरित ये प्रकृति सुहावन,के उपभोग।
मिला हमें सब  ईश - कृपा से, नहि संयोग।।

सूर्य   हमें  देते  नित  ऊर्जा,  शक्ति  स्वरूप।
खेतों   में   फसलें   लहराएं, पा  जल  धूप।।
धवल  चाँदनी  मोहक आभा, शीतल   सोम।
झिलमिल-झिलमिल करें सितारें,निर्मल व्योम।।
आओ मिल हम सभी पुकारें उनका नाम
जिनको सब जन कहते सबके, दाता राम 
पुरुषोत्तम  है मर्यादा के , जग विख्यात
नतमस्तक होकर हम उनको, करें प्रणाम.
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 मुक्तक. निश्चल छंद 16+7
1.
आया है बसन्त मतवाला,   वन रितुराज
सब ऋतुओं में है ये आला, बहुरंँग साज
खड़ खड़ पल्लव हरषित दिखते  ,बजते साज
सबको खुशियाँ देने वाला,सुखी समाज.
2.
फूल रहींं हैं सुरभित कलियाँ, झूमें भौंर
बाग-बाग उपवन हर गलियाँ, महके बौर
फूला है रसाल तरु पहने,सिर पर मौर
बोल रही काली कोयलिया, बैठी ठौर.
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 60

निश्चल छंद आधारित मुक्तक 
छंद महल परिवार को नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

मंगलमय हो आप सभी का,यह नव वर्ष,
व्याप्त रहे जीवन में हर पल,केवल हर्ष।
हों सुख दुख में सभी सदा  ही,हरदम साथ-
 हो हम सब का मिल कर,अब उत्कर्ष।
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निश्चल छंदाधारित गीतिका
समांत- अरते,पदांत - लोग

जाने कैसी कैसी बातें, करते लोग,
परपीड़क हो जाने में कब, डरते लोग।

आलस में ही डूबे रहते,दिन रात,
खेत पराया बड़ी शान से,चरते लोग।

जीवन भर करते ही रहते,कितने पाप,
अंत समय में दंड सदा ही,भरते लोग।

शुद्ध हृदय से करते हैं जो,सारे काम,
जीवन भर निर्मल निर्झर से, झरते लोग।

सुंदरता पल दो पल की है,समझो आप,
सुंदरता के पीछे फिर क्यों,मरते लोग।
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निश्चल छंदाधारित गीतिका
समांत - आम, अपदांत।

मातु पिता के चरणों में हैं, चारों धाम,
उनकी सेवा से ही बनते,सारे काम।

डगर डगर में नगर नगर में,अब है शोर,
लंका जय कर वापस आए, प्रभु श्रीराम।

अलग अलग तो पथ हैं सबके, मंजिल एक,
अलग अलग पर एक सभी हैं, प्रभु के नाम।

एक ही शक्ति एक ही भक्ति,लो यह जान,
नाम जपेंगे उसका ही हम,आठों याम।

काम किया दिन रात यहां पर,चढ़ी थकान,
करने दो थोड़ा सा हमको,अब विश्राम।

मंडी सजी धजी है यारों,आओ आज,
जैसी जिसकी क़िस्मत होती, मिलता दाम।

सोच समझ कर काम करो सब, रखना याद,
जैसी करनी होती वैसे,हों परिणाम।
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निश्चल छंदाधारित चतुष्पदी

चलो चलें हम आज मनाएं,दिन गणतंत्र।
गणतंत्र दिवस आजादी का, है बस मंत्र।
संविधान ताकत है इसकी,यह लो जान-
न्याय, प्रशासन,विधायिका है,इसके यंत्र।
********
गणतंत्र देश का मेरा है, सदा महान।
आओ मिलकर फूंके इसमें,हम अब जान।
छोड़ें सारे मतभेद सभी, लें अब ठान।
वतन सदा ही माने इसको, दें सम्मान।
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संजीव नाईक
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 61

जब - जब चलती  है  पुरवाई , देखो।    मीत!
तब - तब ले कर आ जाती है , दारुण    शीत।
वर्षा  -  बूँदी  -  पुरवाई    का , ऐसा      साथ।
ताल और लय के  बिन  जैसे , गीत    अनाथ।

आज नहीं चिड़िया ने  खोली , अपनी    चोंच।
बच्चों   को   चारा   लाने   में , लगी    खरोंच।
गो चारण को  आज नहीं जा , पाए      ग्वाल।
रँभा   रहे   हैं   भूखे  -   दूखे , ए  गो -   बाल।

हुई    शाम    बैठे    ही    बैठे , बिका न माल।
मुंशी    जी   व्यवसाय  बढ़ाते , चित्त   मलाल।
अब कल का दिन कैसा होगा , जानें       राम!
घिरे    रहेंगे    बादल   ही  या , होगा      घाम।

👇
संगम   के   पहले   ही टूटे , जो    संबंध।
अभी तलक मेरे  दिल में है , उनकी  गंध।
हम  दोनों  ने  कैसे   कैसे  ,  खेले   खेल ,
अगर लिखे जाते तो बनता , सरस निबंध।

तेरे  बिना  वसंत   बहुत    हूँ , मित्र!   उदास।
रहा  बुलाता  मगर   नहीं   तू ,  आया   पास।
मेरे   उपवन   से   विलुप्त  है ,  कोयल  कूक ,
शुक - सारिका नहीं करते   हैं , मधुर विलास।
👇
 बगिया में  मेरी   आती  है , अभी  बहार।
फूल रहे उस  में गुलाब भी , हैं  दो - चार।
सुबह - शाम दिखलाई देते , युगल कपोत , 
मौसम में  खिलते हैं उसमें , चंद    अनार।

चाहो  तो  अनुराग   पहन  ले , नया  लिबास।
नई  इबारत  लिख लें , आओ , फिर से पास।
मौलिक  परिवर्तन - परिवर्द्धन , बिना   दुराव , 
फूले   -   फले  वसन्त   हमारे , ग्रीष्म  प्रवास।


नाम   लिखा    करता   था    तेरा , क्यों  बेकार।
क्या मिल जाता था कुछ मुझ को , आखिरकार।
कभी   नहीं  वह   कह  पाता  था , जो था कथ्य , 
बहुत   बाद   में   पता   चला  था , यह  है प्यार।

भरे सरस  सौन्दर्य - सरोवर , सी      साकार।
यौवन के मधुमय  गीतों की , तुम      आधार।
कहूँ  रात  की   रानी  तो  है , बिल्कुल ठीक ,
छलक रहा है नयनों - वयनों , में         शृंगार।
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तांटक छंद
कितना सुंदर भारत अपना, मोती बैठ पिरोती हूँ।
देख दुर्दशा बस बेटी का, मन आँगना में रोती हूँ।

जब भी ढूँढू इसका हल तो, नींद नहीं फिर आती है,
इसका हल जल्दी निकलेगा, ढाँढस देकर सोती हूँ।

बच्चों से मैं बातें करती, कुछ कहती कुछ सुनती हूँ,
प्रश्न उठाती भाव जगाती, प्रेम बीज मन बोती हूँ।

सुवन सुता में फर्क न समझूं, नैतिक पाठ पढ़ाती हूँ,
अपना भारत सबसे प्यारा, इन सपनों में खोती हूँ।

नहीं मरे अब कोई बेटी, पूजा अर्चन करती हूँ,
पावन निर्मल सबका मन हो, कलुषित मन को धोती हूँ।

सेवा भाव जगाती मन में, मान बड़ों का करती हूँ,
द्वेष, कपट ना मन में रखती, अच्छे कर्म सँजोती हूँ।

कंचनलता चतुर्वेदी
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विधा- निश्चल छंद 16/7 
गौरव भारत भू   के नेता,      बड़े महान |
चंद्र सुभाष नाम था उनका, जो पहचान ||
वीर पुत्र वह भारत माँ का , कहते लोग |
तन संघर्षों में ढाला था, त्यागा भोग ||

रग- रग में जिनके जोश भरा, अद्भुत ज्ञान |
माॅंग खून की हुई हजारों, चले जवान ||
हस्ताक्षर कर दिए खून से, प्रतिभावान |
तन- मन से अभिसार हुए थे, पाते मान ||

भारत माँ का वह दीवाना, नहीं गुमान |
आजाद हिंद में शामिल हो, बन गुणवान ||
आजादी का बिगुल बजाया, सकल जहान |
आएगा अब नया सवेरा, रखना ध्यान ||

जय हिंद हिंद के नारे से, भरता जोश |
गुंजित होता सारा कोना, उड़ता होश ||
मानो कुर्बानी देने को , आतुर वीर |
मातृभूमि के लिए समर्पित, लाखों धीर ||

नया सवेरा नयी रौशनी, मिला वितान |
देश तभी आजाद हुआ था , हुआ निदान ||
हर उर में भी आज समाया, चंद्र सपूत |
नेह पुष्प हम करते अर्पित, हे अवधूत ||

सुनीता सिंह सरोवर उत्तर प्रदेश, देवरिया
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                      🌹  पृष्ठ क्रमांक 64
        मुक्तक   (1)
'राना' हँसता रहता जग में , मिलते यार |
दिए  हाथ से फूल किसी ने, बाँटी खार |
सुख-दुख का मैं जानू मेला, समझू खेल -
अच्छा नाविक बनना सीखू ,इस संसार | 

          मुक्तक  (2) 

क्या लेना - क्या देना  जग    में , जानू   बात |
कभी जीत मिल जाती हमको , या फिर मात |
हर्ष  विषाद रखें मत  मन में ,    चलता   राह - 
'ईश्वर    देता   जाता " राना"  , खुद  सौगात |

राजीव नामदेव " राना लिधौरी "
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