नव प्रभात सा खिलता ये मन,लगती आग।
बूढ़े,बच्चे, सभी जवां हो,गाते राग।
रंग बसंती ओढ़े धरती ,जागे भाग।
डाली-डाली नव दुल्हन से,फूल पलाश।
रंग टेसुआ जैसा सुंदर , पूर्व प्रकाश।
है मधुरस मोहित मनमोहक,जीवन आस।
साथ सखा का श्याम सलोने,लगते खास।
कली-कली मुस्काये जैसे,पहला प्यार।
अलि घूम-घूम घूमर घूमें ,हो लाचार।
मदन मगन मनमोहक करता,है व्यवहार।
नभ,धरती भी झूमे खोकर ,सब आचार।
स्वप्न मोहिनी है मन-मन में,प्यार सुबास।
मंद-मंद मदिरा जैसी ही ,बढ़ती प्यास।
मदमस्त सभी हैं बासंती ,रंग बहार।
झूमें सब नर-नारी जैसे,हों दिन चार।
सोच समझ सब खो बैठे,भूले द्वार।
अमिट छाप दे दिल पर इनके,रंग फुहार।
मन में महके ऐसे जैसे,गुल कचनार।
चोखी रंगत जीवन की ये,है सरोबार।
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भिन्न रूप हैं जाति भिन्न हैं ,उजले वेश।।
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,भारत देश।
उत्तर खड़ा हिमालय इसका ,है आधार।
अम्बर से धरती पर पावन,बरसे धार।।
कल कल करती नदियों के तट,सजती रेत।
ओढ़ चुनरिया धानी-धानी ,लहकें खेत।।
शस्य श्यामला भारत माता, देश सर्वेश ।
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,भारत देश।।
कश्मीर से कन्याकुमारी,भिन्न रिवाज़।
मीठी-मीठी धुन में बजते,सुन्दर साज।।
नृत्य ,संगीत, वेद का ज्ञान , नित सम्मान।
सोने की चिड़िया कहलाया,है वरदान।।
रत्नों की अनमोल संपदा,गर्व स्वदेश ।
सबसे प्यारा,जग में न्यारा,भारत देश।।
सरहद पर वीर सपूतों का,देखा जोश।
सर्द हवाओं को सहकर भी,रखते होश।।
कृषक खेत में स्वेद बहाता,उपजे अन्न।
परचम भारत का लहराता, दुश्मन सन्न।।
रहे शांति सुख सुविधाएं भी , अब धर्मेश
सबसे प्यारा,जग में न्यारा, भारत देश।।
अनपढ़ तो लड़ते-रहते हैं ,जो संतान।
तेरा-मेरा कह करते हैं, खींचा-तान ।।
दो टुकड़ों में बाँटे घर को, खींच-दिवार।
माँ-पितु लगते उनको तो बस,हैं भू-भार।।
भरा सभी कुछ खोल तिजोरी,हो अंजान।
तेरा-मेरा कह करते हैं, खींचा- तान।।
खटिया पर है बूढ़ी अम्मा, देखे नैन।
सिसक रही है हर करवट पर ,हो बेचैन।।
हिस्सा अपना माँग रहा सुत, बेसुर गान।
तेरा-मेरा कह करते हैं, खींचा-तान।।
चार पुत्र थे चार दिशा सम,सुंदर भोर।
देख लड़ाई रोते नैना, दुख हर ओर।।
खेल खेलती माया-नगरी, लेती जान।
तेरा-मेरा कह करते हैं, खींचा- तान।।
धन-दौलत की लालच में तो,दिखता लोभ।
भाग लगाने में मद के तो , कभी न क्षोभ।।
संस्कार क्या इतना दूषित ,भर निज खान ।
तेरा-मेरा कह करते हैं , खींचा-तान।।
••••एवं 👇
गिरिधर-माधव-मोहन-केशव,ब्रज-गोपाल ।
कमलनयन नैनों से फेंके, सब पर जाल ।।
हृदयविहारी-पालनहारी , नंदकिशोर ।
वेणु बजाकर उर हरते हरि, माखनचोर।।
पीतांबर-दामोदर-मधुरिपु , यशुदालाल।
कमलनयन नैनों से फेंके,सब पर जाल।।
करे प्रतिक्षा कीर्ति-किशोरी, बैठी शांत।
पावन निधिवन आते मिलने,कमलाकांत।।
प्रीति-सुमन के चुनती गोपी,सजती थाल ।
कमलनयन नैनों से फेंके ,सब पर जाल ।।
तार रहे प्रभु दनुज-मनुज को ,प्यारे श्याम ।
मुरलीवाला-कमलापति है ,अगणित नाम।।
हरिमय होकर झूम रहे सब, देते ताल।
कमलनयन नैनों से फेंके , सब पर जाल।।
हृदय-दीप मत बुझने देना, रखना आस।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,करो प्रयास।।
मंज़िल पाने में जो लेता, अगणित वर्ष।
संघर्षों के बाद मिला तो, आत्मिक हर्ष।।
लिख दो प्यारे आज यहाँ पर,शुचि इतिहास।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय, करो प्रयास।।
मत हारो तुम खाकर ठोकर, उन्नति नाश।
दृष्टि घुमा कर देखो ऊपर,वह आकाश।।
छूने को यह नभ बाकी है ,बन जा खास ।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,करो प्रयास।।
दृढ़ संकल्पित हो जा प्यारे , साधो राह।
पथ भटकाने वाले चाहे, सुन ले आह।।
उड़ो परिंदा बन नभ में भर, लंबी श्वास।
जीत तुम्हारी ही होगी प्रिय,करो प्रयास।।
••••एवं 👇
नहीं कभी कवि ऐसे लिखता, कविता-गीत।
संवेदित यह मन उसका है , अपना मीत ।
झकझोरा जो हर पल उसको, कर मजबूर --
वही लिया है कवि मन को बस,हँस-रो जीत।।
जब-जब सिसका है यह कवि मन,लेखन कर्म।
जाना है यह कवि भावों का, सच्चा मर्म।
कौन कहे बस वैद्य दवा दे , पढ़ कवि- राग--
आशाओं का दीप जलाना , ही कवि-धर्म ।।
सदा दूरदर्शी है कवि-मन , सभी समीप।
तपते मरु में भी खोजे वह, सुंदर सीप।
एक समय में दो जग जीता , हो सब पार--
गढ़-गढ़ कर वह नित्य जलाए,मन के दीप।।
एक डाल के हैं हम पंछी, लगते हैं सबको प्यारे।
एक ईश की सबमें सत्ता, छोड़ें करना छल सारे।।
ऊपर बैठा वह अंबर में, नीली छतरी को तानें।
बागडोर है उसके हाथों, हर कण में उसको जानें।।
अभय मिले सारे जीवों को, खुशियाँ आये तब द्वारे।।
एक ईश की सबमें सत्ता, छोडें करना छल सारे।।
राग-द्वेष की छोड़ गठरियाँ, सत्य धर्म पर चलना है।
कहते कुछ हो करते कुछ हो, वह तो केवल छलना है।।
लौट कर्म फिर से आता है, मान कर्म से सब हारे।।
एक ईश की सबमें सत्ता, छोडे़ं करना छल सारे।।
बढ़ा प्रीत से हाथ तुम्हारे, जग अपना बन जायेगा।
अगर बहेगी उल्टी धारा, दूरी सदा बढ़ायेगा।।
परहित होगा लक्ष्य हमारा, लगा सदा अब ये नारे।
एक ईश की सब में सत्ता, छोड़ें करना छल सारे।।
भेदभाव की तोड़े कारा, अपने सम सबको मानें।
ज्ञान ध्यान जीवन में धारें, व्यर्थ कलह को क्यों तानें।।
'हिम्मत' सपनें पूर्ण करें सब, लायें धरती पर तारे
एक ईश की सब में सत्ता, छोड़ें करना छल सारे।।
••••|एवं 👇
🍎गीत-🍎
सबसे बोलें मीठी वाणी, लगे न दाम।
दौड़-दौड़ कर आते सारे, बनते काम।।
इसमें करना मत कंजूसी, बन नादान।
खुले हाथ जब मिलती हमको, दे मुस्कान।।
मुश्किल हल हो जाती पल में, दे आराम।
दौड़-दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।
कोयल लगती सबको प्यारी, सुनते ध्यान।
काँव-काँव कौवा जब करता, खोता मान।
मिश्री सा जो बोले सबसे, करे सलाम।
दौड़ -दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।
शब्दों में ही भेद छिपा है, ले संज्ञान।
बोली ही है सच्चा गहना, दे पहचान।।
बोले जो भी कटु वचनों को, हो बदनाम।
दौड़-दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।
मधुर वचन ही काम बना दे, मीठा बोल।
एक लगा दे गाँठ दिलों में, मत मुख खोल।।
पाप काट दे 'हिम्मत' पल में , बोले राम।।
दौड़-दौड़ कर सारे आते, बनते काम।।
•••••एवं 👇
सार छंद, 16,12 मात्रायें-
कर्म किसे कब छोड़े जग में, किया स्वयं ही पाते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।
आदिनाथ घर-घर घूमे थे, नहीं मिली थी भिक्षा।
अन्तराय थी जो कर्मों की, देते हमको शिक्षा।।
महावीर प्रभु को देखा है, संकट जीवन आये।
दोषी माना बस कर्मों को, धीरज से सह पाये।।
अटल मानते जो कर्मों को, नहीं कभी घबराते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।
महासती सीता को देखें, घूमी थी वन-वन में।
राम सरीखे पति भी पाकर, कष्ट सहे जीवन में।
हरिश्चंद्र राजा को देखें, भरा डोम घर पानी।
राजपाट सब छूट गये थे, बेची तारा रानी।।
उदय प्रबल हो जब कर्मों का, क्या-क्या नहीं दिखाते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।
सीख हमें ये देते हर पल, सगे नहीं ये अपने।
कब राजा से रंक बना दे, नये दिखा दे सपने।।
सँभल-सँभल कर रहना हमको, सदा अशुभ से डरना।
साक्षी तेरे कर्म सदा ही, तेरा तुमको भरना।।
'हिम्मत' उदाहरण हैं कितने, पग-पग नाच नचाते।
जैसा किया हाथ से हमने, लौट वही फिर आते।।
👇
आज द्वार मैं चलकर आयी, दो वरदान।
सत्य लिखूँ मनभावन माते, सब दें कान।।
छल से दूर रहूँ आजीवन, जगे विवेक।
साथ तुम्हारा हर पल चाहूँ, पथ हो नेक।
रहे आपका सदा सहारा, बनूँ न भीत।
परहित काम सदा मैं आऊँ, होगी जीत।।
संकट चाहे कितने आये, तव हो ध्यान।
सत्य लिखूँ मनभावन माते, सब दें कान।।
सदा कामनाओं से उठ कर, हो बस कर्म।
जड़ चेतन को जान सकूँ मैं, समझूँ मर्म।।
मैं ही दुश्मन अपनी जानूँ, मैं ही मित्र।
स्थान मिले जीवन में इसको, स्वच्छ चरित्र।।
मिले कृपा बस माँ ये तेरी, ये अरमान।
सत्य लिखूँ मनभावन ऐसा, सब दें कान।।
बैर भाव से करूँ किनारा, बाँटूं प्यार।
मोती चुन लूँ गहरे जाकर, पाऊँ सार।।
दृष्टि बने ये निर्मल मेरी, कर उपकार।
अग जग मातु बसेरा तेरा, कर दो पार।
'हिम्मत' वंदन नित उठ तुमको, देना ज्ञान।
सत्य लिखूँ मनभावन माते, सब दें कान।।
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
1-
मेरी से ज्यादा क्यों उसकी, शर्ट सफेद।
कोई तो बतलाए मुझको, इसका भेद।।
मेरी जहाँ न गल पायी है, अब तक दाल।
उसने वहीं सफलता पायी, यही मलाल।।
2-
वह क्यों मुझसे अधिक सुखी यह,अखरे बात।
यही जगत में अधिसंख्यों को, है संताप।।
है आधार मात्र मिलने का, अपने कर्म।
वही सुखी जग में जिसने यह, जाना मर्म।।
3-
उसने ही पाया है जिसने, किया प्रयास।
बैठ आलसी भाग्य भरोसे, करता आस।।
मृग क्या सिंहों के मुख के खुद, आता पास।
सिंहों को ही करना पड़ता, उद्यम खास।।
4-
असफलता पर कभी नहीं हम, मानें हार।
कोशिश करनी होगी हमको, बारम्बार।।
हिलमिलकर जग में जो चलते, सबके साथ।
उनकी रक्षा हर पल करते, भोलेनाथ।।
•••एवं 👇
------------------------------------------------------
1-
कर्त्तव्यों के प्रति होते जो, लापरवाह।
बड़े बुजुर्गों की जो मानें, नहीं सलाह।।
चाटुकार करते हैं उनकी, झूठी वाह।
इस कारण से भी हो जाते, वे गुमराह।।
2-
लक्ष्य लोकमंगलकारी जो, लेते खास।
सत्पथ पर चलकर जो करते, स्वयं प्रयास।।
बाधाओं की कभी न करते, जो परवाह।
ईश्वर भी फिर सुगम बनाते, उनकी राह।।
•••एवं 👇
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
- निश्चल छंद -
16,7 पर यति, 23 मात्राएँ, चरणांत में 2,1
दो-दो पंक्तियों में समतुकांत
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
1-
शीत लहर है जाड़ा भारी, जीवन ठप्प।
बैठो ओढ़ रजाई घर में, मारो गप्प।।
जाड़े का घर में ही असली, है आनंद।
जिसका लुफ्त उठाना रहकर, घर में बंद।।
2-
धुंध कोहरा मुँह से निकले, दिनभर भाप।
दिखा रही है सर्दी अपना, प्रबल प्रताप।।
स्वेटर कंबल मफलर टोपी, और अलाव।
ऊनी कपड़े खूब रहे बिक , ऊँचे भाव।।
3-
सिकुड़ गए सर्दी के मारे, बाहर पेड़।
गाय भैंसियाँ ठिठुरे पंछी , बकरी भेड़।।
नहीं सुनायी चिड़ियों की भी, दे आवाज।
कभी-कभी कोई चिल्लाता, आलू प्याज।।
4-
मजदूरों को नहीं मिल रहा कोई काम।
उनको करना मजबूरी में, घर आराम।।
मगर परिस्थिति पहले से है, बदली आज।
रुपया किलो निर्धनों को अब, मिले अनाज।।
5-
जाड़ा दिखा रहा है अपना, असली रूप।
ओढ़ रजाई सूरज सोया, गायब धूप।।
गजक गुलगुले गरम मगौड़े , कॉफी चाय।
चौराहों पर आग जलाए, नगर निकाय।।
6-
खड़े रोंगटे लगे कँपकँपी, बजते दाँत।
घर में बैठे आग तापते, जमती आँत।।
स्वत: दाम्पत्य में पड़ता है, पानी खाद।
खत्म हुए है आपस के अब , सकल विवाद ||
•••एवं 👇
--------------------------------------------------
मकर संक्रांति पर्व सुहाना , करिए दान।
गंगा में डुबकी लेने का, पुण्य महान।।
साथ लोहड़ी पोंगल का भी, पावन पर्व।
तीज और त्योहार मनाएँ, मिलकर सर्व।।
2-
गजक रेवड़ी तिल गुड़ लड़डू , तापो आग।
नाचो कूदो मिलकर गाओ, सुंदर राग।।
प्रेम और सद्भाव बढ़ाए, यह संक्रांति।
शुभकामना सभी को मेरी, हो सुख शांति।
👇
1-
कुछ लोगों को भ्रम हो जाता, वही महान।
भक्त मंडली करती उनके, नित गुणगान।।
पर जो होते हैं नैसर्गिक, प्रतिभावान।
वही विवेकानंद सरीखा, पाते मान।।
2-
जीव जगत का जिनको होता, सच्चा ज्ञान।
सपने में भी उन्हें न होता, कभी गुमान।।
प्राणिमात्र का जो करते हैं, खुद सम्मान।
उन्हें मान देता है मन से, सकल जहान ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
🍎*महाजन चीन*🍎
चीन डालता दाना तब ही, जाल बिछाय ।
चलता चाल महाजन जैसी, फिर हड़काय ।।
क़र्ज़ा उसका नहीं चुका जो, कुछ भी पाय ।
उसकी धरती पर फिर अपना, पैर जमाय ।।
दिया पाक को कर्ज़ा इतना, दे कब पाय ।
चलता है नेपाल उसी पथ, मौत बुलाय ।।
नित्य देश जो छोटे-मोटे, को धमकाय ।
दाँत रखे वह भारत पर जब, मुंँह की खाय ।।
सब पर हावी होना चाहे, ड्रेगन चीन ।
बजने कब देती है दुनिया, उसकी बीन ।।
जनक मानता है कोरोना, का संसार ।
चीन आज खुद ही पीड़ित है, अपनी मार ।।
मुँह तोड़ चीन को भारत ने, दिया जबाव ।
पूरा विश्व कहे है उसको, बहुत खराब ।।
बेशर्मी की चादर ओढ़े, लगता चीन ।
उतर गई जब लोइ नहीं है, इसका दीन ।।
••••एवं 👇
*मुक्तक* विषय :- *हिंदी*
संस्कृत से भाषाएं सारी, कब संदेह ।
देवनागरी हिंदी पाती, उसका नेह ।।
फलीभूत पोषित भारत में, अब वह वृक्ष ~
विश्व पटल पर छाई हिंदी, जैसे मेह ।। १।।
काम सभी होते हिंदी में, सबको प्यार ।
सब भाषाएं प्यारी इसको, लेती धार ।।
कोई नहीं पराई जानी, देती हाथ ~
सरकारी या गैर सभी ही, दें सत्कार ।। २।।
कोष वृहद हिंदी का मिलता, सबको ज्ञान ।
विषय क्षेत्र अब शेष न कोई, है पहचान ।।
'प्रिंट मीडिया' हुआ पुराना, नवयुग देख ~
मोबाइल कंप्यूटर फिल्मों, की यह जान ।। ३।।
टेलीविजन रेडियो पर अब, हिंदी राज ।
संसद हो न्यायालय चाहे, हिंदी काज ।।
सम्मेलन हो देश-विदेशी, हिंदी भाष ~
हर भारतवासी की है अब, हिंदी ताज ।। ४।।
कवि-लेखक की सच में लगती, हिंदी प्राण ।
विश्व पटल पर दिखती हिंदी, देख प्रमाण ।।
बने राष्ट्र की भाषा अब बस, यह ही आस~
टूटें सब अवरोध चलाओ, ऐसा बाण ।।
एवं 👇
*दहेज*
हाथ करें बिटिया के पीले, रहा रिवाज़ ।
देकर सामान गृहस्थी का, करते नाज़ ।।
संबंधी-परिचित भी देते, कहते दान ।
लेने-देने वालों को था, कब अभिमान ।।
रिश्ता जब सम स्तर में होता, बनती बात ।
लड़की चाहे अच्छा लड़का, यह ज़ज्बात ।।
होती है तब सौदेबाजी, पर तकरार ।
लड़की वाला रखता है फिर, उस पर धार ।।
लालच देकर लड़की वाला, डाले फंद ।
फिर मुकरे बहुतों वचनों से, देता चंद ।।
बात बिगाड़ें रखते बेटी, बहुत सहेज ।
फिर कहते हैं लड़के की है, माँग दहेज ।।
दुरुपयोग है हित लड़की के, जो कानून ।
उल्टा चोर सिपाही डाँटे, है मजमून ।।
लड़की फाँसे ऊँचे लड़के, डाले जाल ।
हाथ नहीं आता है तो फिर, करे हलाल ।।
हर लड़की या घरवाले कब, ऐसे देख ।
ऊँचे पद वाले लड़के की, लम्बी रेख ।।
चहिए शिक्षित धनवाली वधु, संग सुशील ।
जरा कमी होती तो जाते, पत्नी-लील ।।
व्यापारी या लोभी रिश्ता, लो पहचान ।
देना पड़े दहेज बचाओ, अपनी जान ।।
सुधरें दोनों लोग तभी कब, यह अभिशाप ।
दान मिली बछिया-दाँतों को, गिनना पाप ।।
कष्ट मिटायेऺ क्लेश हटायेऺ, सीताराम।
सबकी सुनते पीड़ा हरते, राधेश्याम।
मौन खड़े थे भरी सभा में , सारे वीर।
दुस्सासन जब खींच रहा था,तन से चीर।
लाज बचाने दौड़े आये, राधेश्याम।
सबकी सुनते पीड़ा हरते, राधेश्याम।
शबरी कहती आओ भगवन,कर दी देर।
प्रेम सुधा में भीगे खाये, झूठे बेर।
नाम रटा तो चलकर आये, सीताराम।
कष्ट मिटायेऺ क्लेश हटायेऺ, सीताराम।
अवगुण छोड़ो स्वच्छ बनाओ,मन का द्वार।
जग के स्वामी सबका करते, बेड़ा पार।
हृदय खोलकर भक्त सदा ही, रटते नाम।
सबकी सुनते पीड़ा हरते, राधेश्याम।
•••••👇
हृदय पुकारे नयन निहारे,तेरी राह।
आ जाओ घनश्याम जगा है, प्रेम अथाह।
जन्म जन्म से हरपल रटती,तेरा नाम -
बढती जाये प्रतिदिन स्वामी,मन की चाह।
धीरे धीरे घट जाता है,हर अवसाद।
हृदय कमल में सदा गूंजता, अनहद नाद।
जीव जगत जड़ चेतन का तब, मिलता ज्ञान -
साधक ध्यान लगाकर करता, जब संवाद।
•••👇
उलझन से क्या नाता मेरा, रहता मस्त।
तूफानों से टकराते हैं, मेरे हस्त।
कभी न निकला इन आॕ॑खों से, कोई अश्क -
दुख रहता है दूर सदा ही, मुझसे पस्त।
अभी न होगा जग में मेरा, सूरज अस्त।
रोग शोक से कभी न होता,तन मन ग्रस्त।
पूर्ण सभी होते हैं मेरे, सुखमय स्वप्न -
कठिन काल जीवन में आये, करता ध्वस्त।
👇
निज तन मन से प्रतिदिन करता,जग उत्थान।
शीत तपन जल प्लावन सहकर,गाता गान।
हे वसुधा के वीर सदा ही, जय जयकार -
सकल धरा पर अन्न उगाता, धन्य किसान।
तन पर दिनभर बोझ उठाता,वह मजदूर।
स्वेद बहाकर घर को लौटे, थककर चूर।
सकल धरा पर वो ही करता,नव निर्माण -
हालातों से फिर भी रहता, वह मजबूर।
👇
मुक्तक
डाल डाल पर खिले हुये हैं,, पुलकित वृन्त।
मनुज हृदय में उमड़ रहे हैं , भाव अनन्त।
पीत वर्ण में सजी धरा भी,, हुलसित अंग।
प्रेम जगाये आए जब ऋतु, राज वसंत।
👇
नहीं रहा अब प्यार जगत में, नहीं किसी से छानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।
परिवारों में पड़ी दरारें, इज्जत गिरवी थानों में।
गली गली से निकल शराबी,झूम रहे मयखानों में।।
नहीं बचा अब भाईचारा,जहर घुला हर वाणी में।
फैल रही है हिंसा नफरत,गाॕ॑व शहर हर ढाणी में।।
समझदार लोगों की बातें, नहीं किसी ने मानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।
एक बाप के दो औलादें, फिर भी भूखा सोता है।
देख समय को आज बुढ़ापा,बिलख बिलख कर रोता है।।
जिस माता ने दूध पिलाया, दंश उसी को देते हैं।
जिनकी खातिर कष्ट सहे थे,छीन वही सुख लेते हैं।।
नहीं श्रवण सा पूत यहाॕ॑ पर, नहीं कर्ण सा दानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।
बदल गये त्योहार पुराने,बदला ढंग पढ़ाई का।
बच्चे भाषा पढे विदेशी,भूले ज्ञान अढ़ाई का।।
मौन हुये सब लोग पुराने,देख रहे नव पीढ़ी को।
जिस मंजिल पर टिकी इमारत,थाम रखी उस सीढ़ी को।
देख रहा बलकेश घरों में, होती खींचातानी है।
टूट रहे हैं रिश्ते नाते, घर घर नई कहानी है।।
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💐 *स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*💐
धरा नहीं कुछ नफरत में है, समझो यार ।
सिर्फ प्रेम ही जीवन का अब, है आधार ।
पूर घृणा की खाई उसके, थे उद्गार ।
'विगत वर्ष' कह चला गया है, सागर पार ।
काल चक्र के रथ पर आए, तुम इस पार ।
साथ तुम्हारे आशा खुशियां, प्रेम अपार ।
लुटा रहे सब तुम पर देखो, अपना प्यार ।
*स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*, बारंबार ।
नहीं समझती अब भी दुनिया, जीवन सार ।
आतंकी नित बढ़ा रहे हैं, धरती भार ।
शायद दुष्टों का तुम करदो, अब उपचार ।
देख रहा आशा से तुमको, यह संसार ।
बढ़ा हुआ है पाप धरा पर, आज उतार ।
बारूद बमों के ढेर लगे हैं, सब लाचार ।
एक दूसरे के दुश्मन हैं, सब नर नार ।
'समय' तुम्हीं हो जग के ईश्वर, कर उद्धार ।
ऐसे लोगों का रघु तू ही, कर संहार ।
*स्वागत है नव वर्ष तुम्हारा*, बारंबार ।
👇👇
रविवार पौष, शुक्ल पक्ष-दशमी - २०७९
1 जनवरी 2023, रविवार ।
अंग्रेजी नव वर्ष शुभ एवं मंगलमय हो!
खुशियों की लहरों पर आशा, ऊंची और उठाएं ।
चलो आज फिर जीवन पथ पर, कदम और बढ़ जाएं ।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।
अपने मन का कोना कोना, उत्साहों से भर लें ।
पूर्ण करें संकल्प यहां हम, ऐसा निर्णय कर लें ।
सबके साथ चलें हम मिलकर, सपने नए सजाएं ।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।
रूप नए में नई कहानी, नए वर्ष में रच लें ।
उत्कर्ष करें हम जन जन का, खुशियां घर घर भर लें ।
पढ़ने और पढ़ाने की हम, रीत नई अपनाएं।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।
जैसा भी था बीत गया कल, उसको आज भुलाएं ।
अपने सुख दुखियों में बांटें, जीवन नया बनाएं ।
सेवा की हम पौध लगा कर, फसलें नई उगाएं ।
नए वर्ष के स्वागत में कुछ, नए गीत हम गाएं ।
नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ-
👇
गीतिका - "वरदान"
मानव जीवन ईश्वर का ही, है वरदान ।
समझो हम सब ईश्वर की ही, हैं संतान ।
ऊंच नीच अरु भेद भाव का, कर दो त्याग -
सब अपने हैं सबको समझो, एक समान ।
व्यर्थ नहीं तुम करना जीवन, है अनमोल -
नेक कार्य में इसे लगा कर, पा सम्मान ।
अपने मन से अपने मन का, कर उद्धार -
शत्रु मित्र ही अपना मन है, सच्चा ज्ञान ।
खुद में ईश्वर औरों में भी, ईश्वर देख -
ईश्वर का फिर प्यार मिलेगा, पक्का जान ।
आज नहीं तो कल या परसों, जाना यार -
अतः सभी 'रघु' मन के गा लो, अपने गान ।
🙏🌹🙏 🙏🙏🌹🌹
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गीत ~✍️
(आधार छंद - निश्चल ,शिल्प विधान 16,7 पर.यति अंत में 21,पदान्त - सीख समान्त - अरना )
💐
स्नेह नीर से शुष्क उदधि को,भरना सीख,
छद्म बादलों का जल छल है, डरना सीख।
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मृग-छौने जब भरें कुलाँचें ,विहँसे भोर ,
मोती नभ के लगें चुराने , हंसा - चोर ।
नित्य व्योम के मौक्तक सँग-सँग,चरना सीख।
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जगती का कल्याण करे तब, हो उल्लेख,
निडर अबाधित हो निष्कंटक ,जीवन रेख।
विषदंतों का काल बनें पग,धरना सीख।
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देख शुभ्र सत्कर्म स्वयं को , गढ़ लें लोग,
लिख दे नव अध्याय अनूठे ,पढ़ लें लोग।
कर्म-रेख को विमल धवल अब,करना सीख।
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एक बिंदास गीतिका //बैठे-ठाले
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भेंट हुई है बहुत दिनों पर , राम जुहार!
मन मुकुलित है खिलती बाँछें, हर्ष अपार !!
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अब कुछ होगी नहीं शिकायत,पक्की बात,
शिकवे गिले गिना देना सब,अबकी बार !
-
सदा रोक देती है दूरी ,दिल की रेल,
रहे दूर तो रंज अलेखन ,मिले हजार।
-
तैरी नाव कभी पानी में, जब बेरोक ,
भावुक होकर उर सलिला में,बहे विचार।
-
अंगड़ खंगड़ लोहा लंगड़ ,सबसे मेल,
आँधी पानी सूखा ओले, अपने यार!
-
चर्चित होते तो बन जाते , हम भी खास ,
हैं फिलहाल अभी तो चुप ये,सब अखबार।
गीतिका ~
०
नील गगन का श्यामल बादल ,देता नीर,
करते रहते स्वप्न सुहाने, हमें अमीर।
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दर्द ,चुभन आदत में शामिल,रंच न क्लेश,
नहीं प्रीति की होती दुश्मन, हिय की पीर।
-
हँसते पल क्षण होते सबकी,जीवन धार,
श्वास श्वास में नित्य प्रवाहित ,मृदुल समीर।
-
मेले में है आपा-धापी ,चारो ओर,
ढूँढ़े मानव कहाँ खो गई ,है तकदीर।
-
अगर निशाने पर हैं खुशियाँ,नहीं मलाल,
हमें वक्त की प्रियकर लगती,यह शमशीर।
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🍎निश्चल छंद में मुक्तक🍎
🍒विधान-16-7 चौपाई चरण+7, पदांत गाल🍒
💐"कहर ढाहता घोर कुहासा"💐
पहन शीत की झीनी चादर, आई भोर।
लगा धुंध का पहरा जग में, चारों ओर।
ठिठुर रहा खगदल शाखा पर, बैठा मौन-
अस्त-व्यस्त जन-जीवन सारा, चले न ज़ोर।
कहर ढाहता घोर कुहासा, करे प्रहार।
बर्फ़ीली सी चलें हवाएँ, जन लाचार।
पीत पत्र गिरते तरुवर से, बिना प्रकाश-
वयोवृद्ध निर्बल पर भारी, ठंड अपार।
घास-फूस के छप्पर टूटे, गिरे मकान।
शिथिल पड़े सब सड़क किनारे, गुम पहचान।
ताप धरा का घटता जाता, जग बेहाल-
पूस महीना कर्कश आया, लेने जान।
डॉ. रजनी अग्रवाल "वाग्देवी रत्ना"✍️
वाराणसी उ. प्र.)
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🍎निश्चल छंद आधारित मुक्तक 🍎 16 , 7
माह जनवरी होती कितनी, ठंड प्रचंड।
नहीं दरश था दिनकर का भी, इतनी ठंड।।
ऐसे में ले आयी मुझको, मेरी मात।
था उसको माता बनने का, बड़ा घमंड।
👇
मोह नहीं है उनको मुझसे, समझी आज।
करती है सौतन क्या कोई, उनपर राज।
ओस गिरी ज्यों आँसू ढलके, भीगे गाल।
कजरा बहकर फैली मेरे, बिखरे बाल।
पिया नहीं आए हैं अब तक, आयी याद।
सेज पड़ी है सूनी मोरी, हूँ बरबाद।
ख्वाब सुनहरे क्यों दिखलाये, ओ प्राणेश।
मिल जाए वह सौतन फिर मैं, पकडूँ केश।
सूरज भी छिपता फिरता है, नयन सिकोड़।
नहीं आज कल खुल के खिलता , मुख को मोड़।
साँझ पड़े दीपक भी जलना, जाता भूल।
रैना बीते नहीं चुभाती, वह भी शूल।
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विधा: निश्चल छन्द मात्रा भार: 16+7(चार चौकल+चौकल+गुरु लघु) सबका ध्यान
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रार भुलाकर आपस में बस,करिए प्यार,
मौसम के हैं खेल निराले,समझो यार,
प्रेम-मुहब्बत ने सर्दी को,दी है मात-
एक रजाई को जब ओढ़े, बच्चे चार।
द्वारे आए भूखे को दें,रोटी दान,
बच्चो को दें थोड़ा-थोड़ा,अक्षर ज्ञान,
लोक हितो की जो करता है,सीधी बात-
उसको ही दुनिया वाले सब,कहें महान।
बाँट रहे जो हँसी सुहानी,हैं वे राम,
आओ हमसब झुककर उनको,करे सलाम,
अपनी सेवा से हैं रखते,सबका ध्यान-
सच्चे हरि के सेवक हैं यह,करो प्रणाम।
मातु-पिता गुरुजन की जिसने,मानी बात,
दूर सदा उससे रहते हैं,सब सदमात,
पहले चिन्तन-मनन करें तब,करते काम-
उन्हें सदा खुशियों की मिलती,है सौगात। ।
एवं 👇
सुखद विहान
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किरणों ने मुस्कान बिखेरी,गाया गान,
आँगन की तुलसी लाती है,सुखद विहान।
अलग-अलग खुशबू बिखराए, हर किरदार,
गुलदस्तों के फूलों-सा है,घर-परिवार,
पतझर देख नहीं घबराते,सूखे पात-
संकट से कैसे उबरेंगे,देकर ज्ञान,
लाते हैं जीवन में सबके,सुखद विहान।
हर मौसम को पढ़कर नित-नित,करते काम,
बना रहे हैं,घर-आँगन को,हरि का धाम,
अधरों पर मुस्कान लिए वे,करते बात-
स्वाद भरें सूखी रोटी में,कह पकवान,
साधु-समान वही लाते हैं,सुखद विहान।
खेतों में खुशियों को बोते,चुनते रार,
अन्त समय में पाते हैं वे,कन्धे चार,
मूँद नयन तब हँसकर गाते,यह नगमात-
चला मुसाफ़िर तज माया को,सुन फ़रमान,
जीवन का विज्ञान यही है,सुखद विहान।
-211001 मो: 8726195041
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भव सागर को पार कराते , हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते , हैं प्रभु राम ॥
शोषित वंचित त्यागी जन के ,हैं प्रभु मीत ।
भक्ति भाव शुचि प्रेम दया से , लें प्रभु जीत ॥
राम बिना श्रृंगार रहित है ,सुंदर गात ।
तरु बेवा सा लगे नहीं यदि , सुंदर पात ॥
भूले को सद मार्ग बताते, हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते , हैं प्रभु राम ॥
राम रत्न यदि मिले कहाँ कुछ , बचता शेष ।
खुश होते नर नारि मिला हो , जैसा भेष ।
केवट शबरी गिद्ध जटायू ,तारें आप ।
शरणागत पापी के धोयें ,सारे पाप ॥
सत्य मार्ग चल स्वयं सिखाते, हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते , हैं प्रभु राम ॥
पाया परमानन्द लिया जो , प्रभु को जान ।
भूल गया मद मोह किया जो ,प्रभु का ध्यान ॥
जिसे त्यागता जगत उसी के ,प्रभु जी थंभ ।
तन का होना राख रहे मन ,फिर क्यों दंभ ॥
गिरे हुए को सदा उठाते ,हैं प्रभु राम ।
हर मुश्किल से सदा बचाते ,हैं प्रभु राम ॥
जय श्री राम
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यहाँ बुरा ही क्यों दिखता है, सबका हाल।
सबके सब ही बुन रहे हैं, स्वारथ जाल।
परहित केवल मुख तक बसता,सबकी रीति-
"माही" सब ही बजा रहे हैं, थोथा गाल ।
••••••एवं 👇
निश्चल छंद
हरियाली ही नित सहती क्यों, पतझड़- वार।
साथ छोड़कर निकल चला है ,अब संसार।।
जैसे ही हरियाली आती, बनते मित्र।
दुनिया सच्ची है या कोई, है चल चित्र।।
दुनिया ही बेगानी होती, स्वारथ साध।
पाया कोई सच्चा साथी, क्या निर्बाध।।
क्या दुनिया के भीतर उपजा, कोई खोट।
"माही" क्यों दस्तूर बना है, करना चोट।।
👇
किसी ग्रंथ पर जब होती है, कोई बात ।
किसी धर्म पर क्यों होता है, तब आघात।
लिखे ग्रंथ की करे समीक्षा, हर परिवेश_
क्या सच्चाई का भी होता , कोई तात।
👇
गणतंत्र दिवस पर पटल परिवार को हार्दिक बधाई
प्रदीप छंद आधारित गीत
नाना धर्मों का जल पीकर, पलने दो इंसान को।
भारत नदियों का है संगम,समझो जगत महान को।।
मत घोलो इस पावन जल में, स्वारथ हित तुम बैर को।
अपनी थाती याद करो तुम, गले लगाये गैर को।
हवा अमन की बस बहने दो, जिंदा रखो गुमान को.......
सदियों जग सिरमौर कहाता,मानवता की खान है ।
भाईचारा, प्रेम लुटाओ,जो अपना अभिमान है।
मत मेटो जिंदा रहने दो, वीरों के बलिदान को.......
मत घोलो तुम जहर हवा में, मुझको भारत रहने दो।
संविधान से आस यही अब, दुख मुझको मत सहने दो।
मत हँसने दो मुझ पर जग को, रखना मेरी आन को.................
वीरों की जननी जो धरती, भरती साहस खास है।
रोको अपने स्वारथ को तुम, वरना जग उपहास है।।
नमन् जगत करता है सारा,"माही" जिसके ज्ञान को............
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🍎निश्चल छंद🍎
छंद महल की सुन्दर रचना , निश्चल छंद l
उत्तरायण रवि माघ मकर में , शोभित चंद ll
साधु संत की निर्मल वाणी , बहे समीर l
गंगा यमुना सरस्वती जल , संगम तीर ll
धर्म कर्म की महिमा न्यारी , तीर्थ प्रयाग l
आलौकिक सुख तीरथ संगम , देह विराग ll
माघ मकर महिमा गुण गाथा, सदा बसंत l
भवसागर का तारण तट है ,कहते संत ll
देवहूति कर्दम हि तनय का , कपिल हिं नाम l
हे सांख्य शास्त्र के शब्द प्रणेता कोटि प्रणाम ll
जयति -जयति जय -जय सुरसरिता , तेरा धाम l
मोक्षदायिनी देवनदी है , तेरा नाम ll
पापनाशिनी निर्मल गंगा , बहती धार l
शब्द नहीं हैं कवि कोविद के, पाएं पार ll
पूर्वज सगर तारिणी गंगा , मुनिवर श्राप l
कर लो दर्शन विष्णुपगा के, मिटते पाप ll
👇
हर हर गंगे की बोली से , मचता शोर l
अविचल प्रेम देखता कैसे , चंद्र चकोर ll
माघ मकर संक्रांति सुपावन , नाचे मोर l
भक्त नहाते गंगा तट पर , भाव विभोर ll
मन उपमेय भाव उपमानहिं , कृषकहिं खेत l
कवियों को प्यारा लगता है , उपमा देत ll
जाति मयूर वर्ग का प्राणी , चंद्र चकोर l
निष्ठां उसकी कितनी निर्मल , राजकिशोर ll
👇
अहम् हुआ जब बने प्रजापति , कनखल दक्ष l
सुर नर मुनि गन्धर्व निमंत्रित , ऋषिगण यक्ष ll
चंद्र रोहिणी लखि मुस्काते , जब स्वयमेव l
चलहि विमानहिं नभ ध्वनि होई , हर्षित देव ll
कनखल तीर्थ दक्ष की नगरी , प्रथमहि यज्ञ l
आहुति देव भाग निज लीन्हा , सुर तत्वज्ञ ll
यज्ञ समय जामाता शिव का, कर अपमान l
संहारक जय जय शिव भोले , शिव भगवान ll
सती देखि निज पति अपमाना , उपजा रोष l
यज्ञ कुंड प्राणाहुति दे दी , मानस दोष ll
शिवगण दक्ष युद्ध भा भारी , यज्ञहिं कुण्डl
शिवलीला जानहि सुर कैसे , बकरा मुंड ll
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जो सबके जीवन में बोते , रहते खार।
सोचो सुखमय उनका कैसे,हो संसार।
सुखी सदा रहने को अपना,बाँटो प्यार।
दीन -दुखी निर्बल पर करना , तुम उपकार।
*
सुबह सवेरे नित ही करना,ईश्वर गान।
मन से रे ओ! मानव सब दे,तज अभिमान।
निश्छल मन मानव की जग में ,रहती शान।
शुभ कर्मों के कारण होता, है कल्यान।
👇
हरी-भरी धरती सब मानव,रहा उजाड़।
अपने नित्य स्वार्थ को वो तरु,रहा उखाड़।
जीव -जन्तु का छिना बसेरा, सहते कष्ट।
फिक्र नहीं धरती माता की, मानव भ्रष्ट।
*१
बिन तरुवर आकुल -व्याकुल सब ,रहते आज।
जीव -जन्तु बहु सर्दी गर्मी, सहते आज।
दुश्मन बन मानव का मानव,छीने प्रान।
भार अधिक धर धरती पर वह,समझे शान।
*२
फिक्र नहीं धरती की चिनता, उच्च मीनार।
लख प्रकोप धरती का मानव, जाता हार।
सब कुछ छूट सदा को जाता,हो बेहाल।
खड़ा दिखाई देता उसको, अपना काल।
*३
जीवन सबका संकट में है , देखो आज।
जोशीमठ से छिना सभी का, अपना राज।
खिसक रहा पर्वत लगता है, होगा लुप्त।
माया ईश्वर की सब जाने,रहती गुप्त।
* ४
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तेइस मात्रिक होता है यह, निश्चल छंद।
सोलह सप्तम मात्रा पे यति, अनुपम बंध।।
चौपाई ने छेड़ दिया स्वर, चौकल तान।
गुरु लघु से चरणांत वहाँ फिर, निश्चल जान।।
छंदों में दोहा,चौपाई,भरते जान।
इनके बिन लगते ऐसे ज्यों, हों निष्प्राण।।
शब्द-शिल्प का हुनर गढ़े जब, रचना भव्य।
अलंकार, हो सरस शुद्ध सब अक्षर, हो ध्यातव्य।।
ज्ञानी जन को विनयावत हूँ, मैं मति मंद।
अंधकार से घिरी न आया, रचना छंद।।
अनगढ़ सी कुछ लिखीं पंक्तियाँ, हों स्वीकार।
जो भी अब तक रचा काव्य सब, गुरु साभार।।
👇
निश्चल छंद–
(23 मात्रिक छंद)16,7 पर यति चरणांत गाल।
(चौपाई+ 7 मात्राएं चरणांत गाल)
नैतिक मूल्य जरूरी हरदम, हों स्वीकार।
अंगीकार करें जीवन के, ये आधार।।
हैं मनुष्यता के गुण जिसमें, वही मनुष्य।
वर्तमान उजला-उजला हो, भला भविष्य।।
सही राह पर चलते रहना, हो उत्कर्ष।
संयम सदाचार अपनाकर, पाता अर्श।।
सार्थक पहल इसी क्षण से हो, कर प्रारंभ।
बड़ी-बड़ी बातें में फँसकर , भर मत दंभ।।
संस्कार की नींव हमारी, है मजबूत।
कुछ कठोर कुछ नियम लचीले, प्रत्याभूत।।
वचन-वद्धता निज-अनुशासन, अंगीकार।
वातावरण सुंदरम् घर का, दिल में प्यार।।
सत्यवादिता कण्ठाभूषण, सह- ईमान।
भाषा मर्यादित गह इसका, रखना ध्यान।।
मंजिल पाना लक्ष्य हमारा, दृढ़ संकल्प।
कठिन-परिश्रम- दूजा कोई, नहीं विकल्प।।
नैतिक,सामाजिक मूल्यों का, प्रतिदिन ह्रास।
आध्यात्मिक मूल्यों का भी है, नित उपहास।।
नैतिक मूल्यों को धारण कर, निज-कल्याण।
ऐसे निज-हित से होता है, जग-कल्याण।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
विषय -जिस देश में गंगा बहती है
जिस प्रदेश में गंगा बहती, पावन देश।
कण कण में भगवान बसे है , शुभ परिवेश।।
मैं उस भारत का वासी हूॅं , लो पहचान।
तपो भूमि ऋषि मुनियों की यह , इतना जान।।
बहे देश में गंगा भारत , निर्मल नीर।
उसकी तो कुदरत ने लिक्खी, भाग्य लकीर।।
प्यार बसा है प्रकृति मनोहर, लगता रूप।
देख हिमालय पर्वत चोटी, रूप अनूप।।
गंगा में डुबकी से कटते , सारे पाप।
ऐसा है बरदान यहाँ पर , जानें आप।।
पेड़ो की पूजा है होती, पीपल नीम।
तुलसी तो घर ऑंगन बसती,दूर हकीम।।
भाईचारा प्रेम यहां पर,है सम्मान।
फहरे ध्वजा तिरंगा प्यारा,है अभिमान।।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा है ,गिरजा शान।
घंटा बजता मंदिर मस्जिद, पड़े अंजान।।
👇
छंद महल निश्छल छंद
चन्द्र शेखर आजाद
उनके नारों को जग सारा,करता याद।
भारत के थे वीर सिपाही, वह आजाद।।
बाद गिरफ्तारी बतलाया,अपना धाम।
नाम हमारा स्वतंत्रता है, कर संवाद।।
जेल हमारा पता ठिकाना, सुन लो यार।
बेटा भारत मातु भारती , हूँ औलाद।।
कहे आजाद आजादी ही , है कर्तव्य।
जन्म लिया उन्नाव जिला में, मैं उस्ताद।।
माॅं जगरानी देवी पापा, सीताराम।
धनु विद्या में माहिर हम है , अब फौलाद।।
आंदोलित हुए कम उमर में,वह संग्राम।
नष्ट करुँ गोरो की हस्ती , प्रण बर्बाद।।
हाथ नहीं आऊॅंगा तेरे,उनका बोल।
भारत माता जय बोलूगाँ , जिन्दा बाद।।
चन्द्र भूषण निर्भय. बेतिया बिहार
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लेखन ऐसा करिए अक्षर, अक्षर सत्य।
हिंदी पर अपना हो केवल,ही अधिपत्य।।
भावों में लालित्य रहे तो होगा मान।
हिंदी हो सरताज हमारा, लें संज्ञान।।
हिंदी में लिख भेजें प्रिय जन ,को संदेश।
लेखन ऐसा करिए हो यह, उन्नत देश।।
हिंदी अपनी आन बनी है, मां की शान।
लेखन ऐसा हो हिंदी की, गूँजे गान ।।
सरस सुगम है छंद लिखें, या फिर गीत।
लेखन ऐसा ही करिए ले, मन को जीत।।
हिंदी बोलें और पढ़ें सच ,हो परिवेश।
पूर्ण राष्ट्रभाषा बन चमके,अपन देश।।
निश्चल छंद आधारित. मुक्तक
बतलाएगा साल नया क्या, उनका हाल।
फुटपाथों पर सोए हैं जो ,धरती लाल।
नया पुराना होता है सब ,एक समान,
बीते सालों के जैसे ही, गुजरा साल।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शीत लहर से व्याकुल प्राणी, सुबहो शाम।
दुबके बैठे घर में लेते , प्रभु का नाम।
दिनकर दादा रूठे बैठे, अपने धाम।
नहीं दिखाते मुखड़ा हमको, रवि विश्राम॥
बच्चे बूढ़े हैं आफत में, और किसान।
सीमा पर सैनिक की हालत,सर्द विमान।
धूप नहीं अब कैसे सूखे, पेंट कमीज।
निष्ठुर सर्दी को थोड़ी भी, नहीं तमीज़॥
निर्धन - बच्चे भूखे रोते, काटे रात।
शीत बड़ी दुखदाई अब है, सुन लो बात।
मजदूरी पर निकले कैसे, बूढ़े बाप।
हाथ-पाँव भी थर-थर काँपे,अपने आप।।
रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
मेरे दीनानाथ कीजिये, पूरन काम।
करके सुन्दर काम करूँमैं, जग में नाम।
जाति धर्म के किले बने हैं,उनको तोड़।
मानवता की ओर सकूँ मैं, उसको मोड़।1
भेद भाव की सदा बनाता, नर दीवार।
मन से दुखी बना रहता है, वह बीमार।
जीवन में सुख शांति सदा जो, पाते लोग।
उनको फिर प्रिय कहाँ लगें ये,जग के भोग।2
एवं 👇👇👇
मुक्तक
बहुत काल से होता आया, सदा विकास।
प्रगति छिपाये अंतस्तल में, बीज विनाश।
चरम बिंदु पर पहुँच शुरू फिर, हुआ उतार,
पतन हुआ प्रारम्भ सृजन की, त्यागो आस।।
स्वार्थ भूल अपराध बसे जब,मानव पास।
कर्मानुसार मिलता रहता,उसको त्रास।
धन,जन,तन बल काम न आये,करे बचाव,
जीव सदा ही साबित होता, प्राकृत दास।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शीत लहर का बजता डंका,मन की हार।
भूख प्यास से जीवन लगता, है लाचार।।
पशु पक्षी हैरान तड़पते , देते जान ।
चेहरे से गायब मिलती है , ये मुस्कान।।
ज्ञान प्रकाश दुबे
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आधार छंद- निश्चल छंद
विधान - 23 मात्राऐ, 16,7 पर यति अन्त गाल अनिवार्य
🌹मुक्तक🌹
छोड़ अयोध्या राम चले बन, नंगे पांव|
साथ चले है सीता लक्ष्मण, भ्राता छांव|
सेवा करना तुम माता की, जाओ लौट
लौट भरत जल्दी आऊँगा , अपने गांव|
जाकर तुम माता से कहना, मेरा ढोक|
माँ बिन लगता सूना सूना, सारा लोक|
तकदीर लिखा होकर रहता, जैसे लेख
भाई यह लेख विधाता के, मत कर शोक|
लगता है जाने क्यों मुझको,आज अभाव|
जनमानस पर है कलयुग का,सिर्फ प्रभाव|
ऐ कैसा चहूँ दिशा छाया, पाप तमाम
चक्कर है सारा माया के, साथ लगाव|
स्वरचित
✍️✍️ जे पी मधुकर
👇👇
आधार छंद- निश्चल छंद
विधान - 23 मात्राऐ, 16,7 पर यति अन्त गाल अनिवार्य
🌹मुक्तक🌹
जब भी सुखदाई पुरवाई, बहती मंद|
कवि लिखता बैठा बैठा तब, सुन्दर छंद|
कुछ भी ज्ञान नहीं है मुझको, लय सुर बंध~
कविमन के कुछ अनुभव लिखता,बातें चंद|
स्वरचित
✍️✍️ जे पी मधुकर
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
गीतिका ,<पदांत- अपदान्त, समान्त-आल
**
यह जीवन ताना उलझन का, माया जाल |
सदा बचाना तुम हम सबको, हे गोपाल ||
रीत यहाँ की हर झूठी है, झूठी प्रीत |
सत्य नाम है केवल तेरा, यशुमति लाल ||
अपने ही सब ठगते रहते, देते दर्द |
कलयुग कैसा अब आया है, कैसा काल ||
रचा जगत ये तुमने खुद ही, हे जगदीश |
खुद ही देखो हे मनमोहन, इसका हाल ||
अपने को ही समझे रहता, सबसे श्रेष्ठ |
देखो मानव कैसा है ये, करे कमाल ||
माफ़ करो हमको हे केशव, हम हैं मूर्ख |
सदा करें नादानी जग में, तेरे बाल ||
मार्ग कभी भटके जो हम सब, रहना संग |
कृष्ण सदा ही लेना फिर तुम, हमें सँभाल ||
*****
डॉ. सोनिया गुप्ता/
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जय माँ शारदे
गीत हमारे होठ तुम्हारे, खुशी अपार।
प्रेम पुजारी तुम्हें पुकारे, बारंबार।
सीमित जीवन की खुशियां हैं, जो अनमोल-
जितना लूट सके हम लूटें, सच्चा सार।।
कोकिल गाती मधुर तराने, सुन संगीत।
अब संक्रांति निकट है आई, क्यों भयभीत।
सुख - दुख दोनों आते - जाते, हो अनुभूति -
जाती सर्दी आता फागुन, होगी जीत।।
👇
जय माँ शारदे
निश्चल छंद आधारित गीत
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शुरू हुआ भ्रमरों का गुञ्जन,,, है उल्लास।
आमंत्रण हैं देती कलियाँ,,,,,, आओ पास।।
कठिन शीत की बीती रजनी, शीतल वात।
कंपित दिन भर रहते थे सब,थर-थर गात।
रश्मि रथी अब सज्ज हुए हैं,,,, बाँटे प्राण,
मुदित धरा है देखो लौटा,,, फिर मधुमास।।
अलसाई सी रति फिर जागी,मगन अनंग।
पञ्च बाण तूणीर उठा कर,, ,, करते तंग।
बहलाते मीठी बातों से,,,,,,,,,,दे उपहार,
स्वामी भाव भुलाए देखो,,,,, लगते दास।।
पीत चूनरी ओढ़ सुहाती,,,,,, लिए उमंग।
सजी चली है प्रकृति खेलने,, फागुन रंग।
राग बढ़ा है मन में सबके, पल अनमोल,
मदन मोहिनी कृपा करो अब, छूटे आस।।
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जय माँ शारदे
सरसी छंद आधारित गीत
पीली साड़ी पहन उतरती,,,, अलसाई सी भोर।
शीत गुनगुनी अच्छी लगती,,, पक्षी करते शोर।।
मधुर मलगजी बहें हवायें,,,, लेकर साथ पराग।
उन्मत मधुकर गुंजन करते, जाग गया अनुराग।
मोहक कितना प्यारा लगता,आता यह मधुमास,
हरियाली की चादर फैली,,,, धरती के हर छोर।।
पंचम स्वर में कोयल कूके,,,,आम्र नये नवनीत।
पछुआ पगली छेड़ रही है,,,,, फसलों में संगीत।
लहर लहर लहराती बाली,,,,,, मन में भरे तरंग-
लगे धीर उन्मत नायक अब, रहा कली को झोर।।
संवत्सर में मौसम प्यारा,,,,, यह होता है खास।
उम्मीदों की जगे सुहानी,,, बढती सबकी आस।
निठुर निर्दयी कब आओगे,,,,, राह रही मैं देख-
वक्ष भीगते भीगें अँगिया,,,,, नयन बहाते लोर।।
👇
==============================
मन अनुरागी हुआ हमारा,,,,,,,,, झरे पराग।
बोल रहा फिर मुंडेरों पर,,,,,,,,,, बैठा काग।
कौन बताओ परिचय अपना, क्या ऋतुराज?
आयेगा फिर से आँगन में,,,,, सुख सौभाग।।
साध रहा शर देखो मुझपर, कुटिल अनंग।
रति भी आकर बरसाती है,,,, मुझपर रंग।
मन मधुकर बौराया जैसे,,,,,,, पा मधुगंध-
पछुआ पगली करती मेरा,,,,, आसन भंग।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
निश्चल छंदाधारित "मुक्तक त्रय"
अभिनंदन नव वर्ष!
गुजरा समय पुरातन आया, अभिनव वर्ष,
साथ लिए आगे बढ़ने का, नव उत्कर्ष।
भूलें हम दुख की घड़ियों का, भीषण दर्द -
नूतन पल का कर लें स्वागत, पुन: सहर्ष।।
आज कहे मन उलझी सारी, गाँठें खोल,
मृदुल, सुभाषित बोली होती, है अनमोल।
मिटती है रुसवाई उस पल, अपने आप -
हृदय तराजू देखे जब भी, सब कुछ तोल।।
सूर्य किरण के जैसे मन में, भर उत्साह,
उधर बढ़ाएँ कदम जिधर हो, उत्तम राह।
विगत समझकर अंधेरे को, निकलें साथ -
आनेवाले कल की लेकर, सुखमय चाह।।
👇
सरसी छंद
विधान - 27 मात्रा ; 16,11 पर यति
विषम चरणांत चौकल, सम चरणांत गुरु लघु
गंगा तट
कुंदन सरिस चमकती रेती, निर्मल, पावन नीर।
अनुपम धारा देवनदी की, शीतल मंद समीर।।
निरख रही मैं यह सुंदरता, रख अंतर में धीर।
चाह रहा मन सृजन करे कुछ, बैठे सुरसरि तीर।।
प्रात: काल दिवाकर आता, लेकर साथ उजास।
सुप्त हृदय को जागृत करता, देता नव उल्लास।।
स्वयं निराई कर खेतों की, कृषक निकालें घास।
लख कर फसलों की उर्वरता, संजोएँ वे आस।।
जमुना चाची भोर पहर उठ, गाती मोहक गीत।
कर संचरित मधुर भावों को, मन लेती है जीत।।
करते बात पखेरू मिलकर, बनकर सच्चे मीत।
देते हैं संदेश मनुज को, प्रेरक और पुनीत।।
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निश्चल छंदाधारित गीत
ग्राम श्री
खिले धूप दोपहरी में जब, चमके रेत,
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत।
भाती है सबके ही मन को, हल्की शीत,
गूँजे घर - घर में बासंती, मनहर गीत।
आए गाँव नरायन गायक, शिष्य समेत,
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत।
लहराते हैं ईख, विटप सब, करते शोर,
पवन चले पुरवाई मन को, दे झकझोर।
धरती सुत हो मुदित निहारें, अपने खेत,
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत।
जो शहरों से आकर्षित हो, छोड़े गाँव,
भूल चुके थे अपना ऐसा, सुंदर ठाँव।
लौटे घर वे वापस होकर, पुन: सचेत,
सरिता के तट आकर उड़ते, हारिल श्वेत।
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सरसी छंदाधारित "गीत"
विधान - 27 मात्रा ; 16,11 पर यति
विषम चरणांत चौकल, सम चरणांत गुरु लघु
मोहक ऋतुराज
आओ साथी मिलकर गाएँ, एक मनोरम गीत,
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।
मोहकता अब आगे आकर, बिखराए नव रंग,
कदम बढ़ाकर हाथ मिलाएँ, सद्भावों के संग।
अगवानी कर रही हमारी, बाँह पसारे प्रीत,
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।
उपवन में वह श्यामल भौंरा, करता है गुंजार,
आम वृक्ष पर कूके कोयल, प्रकट करे उद्गार।
चलो सहजता से अपनाएँ, हम सुखदायी रीत,
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।
पुष्पलताएँ झूम रही हैं, हर्षित है ऋतुराज,
जरा हमें भी तो बतलाओ, क्या है इसमें राज?
समझ उमंगों की परिभाषा, परखें भाव पुनीत,
नेह भरे मृदुमय सुर छेड़ें, सबका मन लें जीत।
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1-
सच्चे मन से अगर पुकारो,आते श्याम।
फल शबरी के जूठे जाकर ,खाते राम।
रटना होगा निश-दिन हमको,इनका नाम।
राम-श्याम की सुन्दर छवि को,कोटि प्रणाम।।
2-
शुभ अवसर पर हम सब गाते,मंगल गान।
रागिनियाँ सब मिलकर छेडे़,मीठी तान।
मन के भीतर बजता रहता,अनहद नाद।
धुन वंशी की अब भी हमको,आती याद।
3 - मुक्तक
कहाँ कहाँ से लेकर आते,सुन्दर छन्द।
थोडे़ से तो जाग्रत होते,हम मतिमन्द।
बैठे बैठे इन पर करते,कुछ अभ्यास-
हमको भी मिलता तब इनका,नव मकरन्द।।
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हारे का बस एक सहारा,खाटू श्याम।
श्री कृष्ण ने दिया था जिसको,अपना नाम।
जिसके दर पर बनते सबके,बिगडे़ काम।
सीकर में तुम जाकर देखो,उसका धाम।।
हारे को था चला जिताने,मौर्वी लाल।
अब भी हर दुखिया को करता,मालामाल।
झोली भर-भर देते देखा,लखदातार।
उसके जैसा और न होगा,बक्शनहार।।
पौत्र भीम का,बचपन में था,बब्बर शेर।
शीश काटकर दिया कृष्ण को, करी न देर।
दर पर उसके लगता मेला ,ज्यों त्योहार।
लीले घोडे़ पर आता वह,कलि अवतार।।
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मन का आंगन सूना लगता, अब सर ताज।
दर्शन दे दो विनती करता,तुम पर नाज़।।
राधा ,मीरा ,सूरदास सम, चाहूं ज्ञान।
आंख मिचौली बंद करो अब,आती लाज ।।
पंकज शर्मा "तरुण ".
पिपलिया मंडी,मध्य प्रदेश।
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#मुक्तक
ताटक छंद आधार 16/14 पर यति अंत मै 3 दीर्घ
दुनियाँ गंगा कहती मुझको,पाप मिटाया करती हूँ ||
जीवन की अंतिम यात्रा मै,साथ निभाया करती हूँ ||
पावनता मनुज भावना मै, इसीलिए ही मै पावन~
वरना नीर लिए बस मै तो, बहकर जाया करती हूँ ||
✍️✍️✍©brijesh sinha sagar ✍️✍️✍️
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झड़प नहीं उत्तम होती है, लगे लगाम |
जहाँ मान का प्राण बचे जो,सोच अवाम ||
मूर्खो से बचकर ही उत्तम, यही निदान |
चलना है जीवन में जो है, साक्ष्य विधान ||
खुल्लम खुल्ला राज यहाँ पर, जो भी प्राण |
इनका भी अवलोकन करना, जीवन त्राण ||
शुद्ध सार्थ ही सूक्ष्म बिंब पर, फोकस मात्र |
बनकर जीना है बस यूँ ही, उत्तम पात्र ||
रंग भेद "अरु" रूप नहीं सब,,, इसमें एक |
जहाँ घुलन में प्रेम भाव मत, कैसा नेक ||
अपने में भी खेद करो प्रिय, मत बन श्रेष्ठ |
"पर" की गलती पर क्यों हँसते, बनकर जेष्ठ ||
झलक काम सब नेक नहीं ज्यों,सागर खार |
बंजर भू जो लंबी चौड़ी, पीता क्षार ||
तहकीकात करें तन में भी, क्या है सार |
झूठ बड़प्पन करने वाले,,,, मिले हजार ||
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क्यों इतनी सुन्दर हो सजनी, नैन न मार।
मुख-आभा से विहँसे रजनी,बन गलहार।।
प्रणय-पीर की तुम हो शमनी,तुझसे प्यार।
धन्य हुई तुझ से यह अवनी, अरु संसार।।
चंचल चारु चक्षु चित रमनी, दे सुख चैन।
तिय रजनीगंधा सम महके, मोहक रैन।।
कृष्ण केशिनी कंचन काया,कुमकुम भाल।
अधर लालिमा मन को मोहे, गोरे गाल।।
तुम अद्भुत गुणवती तुम्हारा,अनुपम रूप।
तूँ चमके ज्यों गगन सितारा,अमित अनूप।।
प्रतिपल पग पायल यूँ बाजे ,ज्यों संगीत।
हिय हर्षित हरदम हो जाए, पा तव प्रीत।।
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वन - उपवन इस वसुंधरा पर ,नाना फूल।
हो हिय हर्षित देखत उनको, मिटते शूल।।
सभी वनस्पति दुर्लभ औषधि,को मत भूल।
जड़ - चेतन इस दुनिया के हैं, ईश्वर मूल।।
बार - बार आभार तुम्हारा, हे! जगदीश।
यह जग कितना मोहक प्यारा,हे!प्रभु ईश।।
पंचभूत ये भू, जल, पावक,गगन समीर।
जिनसे निर्मित यह जग सारा,मनुज शरीर।।
ज्ञान कर्म की सभी इन्द्रियाँ, मोहक रूप।
मन साक्षात अंश प्रभु का है,अमित अनूप।।
ललित हरित ये प्रकृति सुहावन,के उपभोग।
मिला हमें सब ईश - कृपा से, नहि संयोग।।
सूर्य हमें देते नित ऊर्जा, शक्ति स्वरूप।
खेतों में फसलें लहराएं, पा जल धूप।।
धवल चाँदनी मोहक आभा, शीतल सोम।
झिलमिल-झिलमिल करें सितारें,निर्मल व्योम।।
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आओ मिल हम सभी पुकारें उनका नाम
जिनको सब जन कहते सबके, दाता राम
पुरुषोत्तम है मर्यादा के , जग विख्यात
नतमस्तक होकर हम उनको, करें प्रणाम.
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मुक्तक. निश्चल छंद 16+7
1.
आया है बसन्त मतवाला, वन रितुराज
सब ऋतुओं में है ये आला, बहुरंँग साज
खड़ खड़ पल्लव हरषित दिखते ,बजते साज
सबको खुशियाँ देने वाला,सुखी समाज.
2.
फूल रहींं हैं सुरभित कलियाँ, झूमें भौंर
बाग-बाग उपवन हर गलियाँ, महके बौर
फूला है रसाल तरु पहने,सिर पर मौर
बोल रही काली कोयलिया, बैठी ठौर.
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निश्चल छंद आधारित मुक्तक
छंद महल परिवार को नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
मंगलमय हो आप सभी का,यह नव वर्ष,
व्याप्त रहे जीवन में हर पल,केवल हर्ष।
हों सुख दुख में सभी सदा ही,हरदम साथ-
हो हम सब का मिल कर,अब उत्कर्ष।
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निश्चल छंदाधारित गीतिका
समांत- अरते,पदांत - लोग
जाने कैसी कैसी बातें, करते लोग,
परपीड़क हो जाने में कब, डरते लोग।
आलस में ही डूबे रहते,दिन रात,
खेत पराया बड़ी शान से,चरते लोग।
जीवन भर करते ही रहते,कितने पाप,
अंत समय में दंड सदा ही,भरते लोग।
शुद्ध हृदय से करते हैं जो,सारे काम,
जीवन भर निर्मल निर्झर से, झरते लोग।
सुंदरता पल दो पल की है,समझो आप,
सुंदरता के पीछे फिर क्यों,मरते लोग।
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निश्चल छंदाधारित गीतिका
समांत - आम, अपदांत।
मातु पिता के चरणों में हैं, चारों धाम,
उनकी सेवा से ही बनते,सारे काम।
डगर डगर में नगर नगर में,अब है शोर,
लंका जय कर वापस आए, प्रभु श्रीराम।
अलग अलग तो पथ हैं सबके, मंजिल एक,
अलग अलग पर एक सभी हैं, प्रभु के नाम।
एक ही शक्ति एक ही भक्ति,लो यह जान,
नाम जपेंगे उसका ही हम,आठों याम।
काम किया दिन रात यहां पर,चढ़ी थकान,
करने दो थोड़ा सा हमको,अब विश्राम।
मंडी सजी धजी है यारों,आओ आज,
जैसी जिसकी क़िस्मत होती, मिलता दाम।
सोच समझ कर काम करो सब, रखना याद,
जैसी करनी होती वैसे,हों परिणाम।
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निश्चल छंदाधारित चतुष्पदी
चलो चलें हम आज मनाएं,दिन गणतंत्र।
गणतंत्र दिवस आजादी का, है बस मंत्र।
संविधान ताकत है इसकी,यह लो जान-
न्याय, प्रशासन,विधायिका है,इसके यंत्र।
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गणतंत्र देश का मेरा है, सदा महान।
आओ मिलकर फूंके इसमें,हम अब जान।
छोड़ें सारे मतभेद सभी, लें अब ठान।
वतन सदा ही माने इसको, दें सम्मान।
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संजीव नाईक
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जब - जब चलती है पुरवाई , देखो। मीत!
तब - तब ले कर आ जाती है , दारुण शीत।
वर्षा - बूँदी - पुरवाई का , ऐसा साथ।
ताल और लय के बिन जैसे , गीत अनाथ।
आज नहीं चिड़िया ने खोली , अपनी चोंच।
बच्चों को चारा लाने में , लगी खरोंच।
गो चारण को आज नहीं जा , पाए ग्वाल।
रँभा रहे हैं भूखे - दूखे , ए गो - बाल।
हुई शाम बैठे ही बैठे , बिका न माल।
मुंशी जी व्यवसाय बढ़ाते , चित्त मलाल।
अब कल का दिन कैसा होगा , जानें राम!
घिरे रहेंगे बादल ही या , होगा घाम।
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संगम के पहले ही टूटे , जो संबंध।
अभी तलक मेरे दिल में है , उनकी गंध।
हम दोनों ने कैसे कैसे , खेले खेल ,
अगर लिखे जाते तो बनता , सरस निबंध।
तेरे बिना वसंत बहुत हूँ , मित्र! उदास।
रहा बुलाता मगर नहीं तू , आया पास।
मेरे उपवन से विलुप्त है , कोयल कूक ,
शुक - सारिका नहीं करते हैं , मधुर विलास।
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बगिया में मेरी आती है , अभी बहार।
फूल रहे उस में गुलाब भी , हैं दो - चार।
सुबह - शाम दिखलाई देते , युगल कपोत ,
मौसम में खिलते हैं उसमें , चंद अनार।
चाहो तो अनुराग पहन ले , नया लिबास।
नई इबारत लिख लें , आओ , फिर से पास।
मौलिक परिवर्तन - परिवर्द्धन , बिना दुराव ,
फूले - फले वसन्त हमारे , ग्रीष्म प्रवास।
नाम लिखा करता था तेरा , क्यों बेकार।
क्या मिल जाता था कुछ मुझ को , आखिरकार।
कभी नहीं वह कह पाता था , जो था कथ्य ,
बहुत बाद में पता चला था , यह है प्यार।
भरे सरस सौन्दर्य - सरोवर , सी साकार।
यौवन के मधुमय गीतों की , तुम आधार।
कहूँ रात की रानी तो है , बिल्कुल ठीक ,
छलक रहा है नयनों - वयनों , में शृंगार।
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तांटक छंद
कितना सुंदर भारत अपना, मोती बैठ पिरोती हूँ।
देख दुर्दशा बस बेटी का, मन आँगना में रोती हूँ।
जब भी ढूँढू इसका हल तो, नींद नहीं फिर आती है,
इसका हल जल्दी निकलेगा, ढाँढस देकर सोती हूँ।
बच्चों से मैं बातें करती, कुछ कहती कुछ सुनती हूँ,
प्रश्न उठाती भाव जगाती, प्रेम बीज मन बोती हूँ।
सुवन सुता में फर्क न समझूं, नैतिक पाठ पढ़ाती हूँ,
अपना भारत सबसे प्यारा, इन सपनों में खोती हूँ।
नहीं मरे अब कोई बेटी, पूजा अर्चन करती हूँ,
पावन निर्मल सबका मन हो, कलुषित मन को धोती हूँ।
सेवा भाव जगाती मन में, मान बड़ों का करती हूँ,
द्वेष, कपट ना मन में रखती, अच्छे कर्म सँजोती हूँ।
कंचनलता चतुर्वेदी
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विधा- निश्चल छंद 16/7
गौरव भारत भू के नेता, बड़े महान |
चंद्र सुभाष नाम था उनका, जो पहचान ||
वीर पुत्र वह भारत माँ का , कहते लोग |
तन संघर्षों में ढाला था, त्यागा भोग ||
रग- रग में जिनके जोश भरा, अद्भुत ज्ञान |
माॅंग खून की हुई हजारों, चले जवान ||
हस्ताक्षर कर दिए खून से, प्रतिभावान |
तन- मन से अभिसार हुए थे, पाते मान ||
भारत माँ का वह दीवाना, नहीं गुमान |
आजाद हिंद में शामिल हो, बन गुणवान ||
आजादी का बिगुल बजाया, सकल जहान |
आएगा अब नया सवेरा, रखना ध्यान ||
जय हिंद हिंद के नारे से, भरता जोश |
गुंजित होता सारा कोना, उड़ता होश ||
मानो कुर्बानी देने को , आतुर वीर |
मातृभूमि के लिए समर्पित, लाखों धीर ||
नया सवेरा नयी रौशनी, मिला वितान |
देश तभी आजाद हुआ था , हुआ निदान ||
हर उर में भी आज समाया, चंद्र सपूत |
नेह पुष्प हम करते अर्पित, हे अवधूत ||
सुनीता सिंह सरोवर उत्तर प्रदेश, देवरिया
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मुक्तक (1)
'राना' हँसता रहता जग में , मिलते यार |
दिए हाथ से फूल किसी ने, बाँटी खार |
सुख-दुख का मैं जानू मेला, समझू खेल -
अच्छा नाविक बनना सीखू ,इस संसार |
मुक्तक (2)
क्या लेना - क्या देना जग में , जानू बात |
कभी जीत मिल जाती हमको , या फिर मात |
हर्ष विषाद रखें मत मन में , चलता राह -
'ईश्वर देता जाता " राना" , खुद सौगात |
राजीव नामदेव " राना लिधौरी "
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