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6 - ब्लागडाट काम पर यह पत्रिका है हीं 💐
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भवदीय
सम्पादक मंडल
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1-अनुक्रमणिका
2- सम्पादकीय
3- शारदे वंदना एवं रचनाएँ
5-सुरेन्द्र कौशिक गाजियाबाद
7-रामानंद राव लखनऊ
8-श्यामराव धर्मपुरीकर गंजबासौदा
9-सुभाष सिंघई जतारा
15- रमानिवास तिवारी सीतापुर
16- अशोक मिश्रा अनंत बाँदा
19 - अंजुलिका चावला नागपुर
31- गजेन्द्र सिंह हमीरपुर
32- सुधा राठौर नागपुर
37- महेन्द्रप्रसाद दुबे'अमन'
43- जया शर्मा जी
44- सुशील सरना जी
50- कौशल कुमार पाण्डेय 'आस'
53 - रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार
55 - वर्षा अग्निहोत्री
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गीतिका आधार छन्द-चुलियाला छन्द
विधान-दोहा+रगण(212) समांत-आर, पदांत-दीजिए
माता मेरी शारदे, स्वर सप्तम का सार दीजिए।
लय गति छन्द विधान से, साहित्यिक आधार दीजिए।
पुस्तक कर में धार कर, आओ माता हंस वाहिनी,
भटके जब भी लेखनी, सुलभ सरस उपचार दीजिए।
भाव सजें उर में प्रबल, करो हृदय में वास शारदे,
चाहत सबकी मैं बनूँ, ऐसा सुचि व्यवहार दीजिए।
बुद्धि विलक्षण प्राप्त कर, जनहित से सब काम साध लूं,
ध्यान रहे परमार्थ में, सुधा समाहित प्यार दीजिए।
भूले भटके राह में, बनूं किरण विश्वास। हर्ष की,
जगे सरस सद्भावना, वही ज्ञान भंडार दीजिए।
करता "साथी" है विनय,सदा करो नित वास, कंठ में,
वीणा की अति कर्ण प्रिय,मधुर-मधुर झंकार दीजिए।
👇
चुलियाला छन्द गीतिका
विधान-दोहा+यगण(122) समांत-आना, अपदान्त
मन के शुभ संकल्प में, अपना पूरा ध्यान लगाना।
श्रम साहस सद्कर्म से,सुख सम्यक अरमान सजाना।
बाधाओं की बाढ़ हो,लगे कठिनतम राह कभी भी,
चिंतन कर धीरज धरो, जोश होश उत्साह बढ़ाना।
कभी उजागर मत करो,जो भी मन में लक्ष्य बिठाया,
करो निरन्तर साधना, पहले खुद को दक्ष बनाना।
नहीं असम्भव कुछ यहाँ, खुद पर हो विश्वास जरूरी,
सुनियोजित तरकीब से,सदा सफलता पास बुलाना।
प्रश्न चुभे कोई अगर, करते रहो प्रयास हमेशा,
हल निश्चित हो धैर्य रख,करो मनन इतिहास पुराना।
तज दे सुख आराम को,धुन हो केवल एक सुरीली,
तन मन धन सम्पूर्णता, लक्ष्य पूर्ण हो नेक सुहाना।
कभी जगत पागल कहे,कभी कहे नादान भिखारी,
नहीं किसी की सुन कभी,इन बातों से ध्यान हटाना।
श्वान भौंकते ही रहें, मस्त चले गजराज गली में,
"साथी"मंजिल ही मिले, होता सिर पर ताज लुभाना।
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दोहा छंद + 212 (पदांत)
माता वीणावादिनी, गिरा इला वागीश ज्ञानदा।
बुद्धि प्रदाता ईश्वरी, तुझे नवाऊँ शीश शारदा।।
हंसवाहिनी मैं करूँ, निशदिन तेरा ध्यान आरती।
'चुलियाला' का सिद्ध हो, मुझको शीघ्र विधान भारती।।
👇
- चुलियाला छंद या चूड़ामणि छंद -
विधान - दोहा + 212
पानी बिन पंछी हुए, गर्मी में बेहाल साथियो।
एक सकोरा टाँगकर, रखना उनका ख्याल साथियो।।
प्यासे को पानी मिले, जिसको हैं यह ध्यान साथियो।
उसके घर आकर करें,खग कुल कलरव गान साथियो।।
मूक परिंदों को रहे, हमसे इतनी आस बंधुओ।
चुगने को दाना मिले, पानी भी हो पास बंधुओ।।
जो घर की मुंडेर पर, रखे सकोरा एक बंधुओ।
उसको निश्चित मानिए,व्यक्ति बड़ा ही नेक बंधुओ।।
व्याकुल पंछी ग्रीष्म में, जल बिन रहें अधीर प्यास से।
पुण्य लाभ मिलता अगर, उन्हें पिलाएँ नीर प्यार से।।
जिसके भी दिल में रहे, प्राणिमात्र से प्यार बंधुओ।
खुशियों से महके सदा, उसका घर संसार बंधुओ।।
💐 - 'चुलियाला' या 'चूणामणि' छंद - 💐
विधान - दोहा + 122
सबके ही सहयोग से, बनते हैं सब काम हमारे।
यही सिखाते हैं हमें, पुरुषोत्तम श्रीराम हमारे।।
परपीड़ा शठ कर्म है, परहित सरस न धर्म कहा है।
इसी बात में सन्निहित, जीवन का है मर्म रहा है।।
होती है सहयोग से, हर मुश्किल आसान हमेशा।
जो करते सहभागिता, उन्हें मिले सम्मान हमेशा।।
एक दूसरे का जहाँ, हाथ बँटाते लोग सदा ही।
करते उसी समाज में, लोग सकल सुखभोग सदा ही।।
सदा ज़रूरतमंद का, करते जो सहयोग खुशी से।
जीवनभर सुख शांति से, रहते हैं वह लोग खुशी से।।
परहित में निस्वार्थ जो, सदा बढ़ाते हाथ स्वतः ही।
ईश्वर आड़े वक़्त पर, देता उनका साथ स्वतः ही।।
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मुक्तक युग्म, आधार #चुलियाला छंद
निर्धन और अमीर की, दूरी बढ़ती आज देश में।
धन बढ़ता है धनिक घर, गिरे दीन पर गाज देश में।
दब्बू बनकर रह गए, जो मेहनतकश लोग हैं यहाँ~
चाटुकार जो जन यहांँ, भरते हैं परवाज देश में।।
🇳🇪🇳🇪🇳🇪
राजनीति कैसी यहांँ, कैसे हैं सब लोग सयाने।
कुटिया में भूखे मनुज, महलों में हैं भोग सुहाने।
फुटपाथों पर सो रहे, तन पर जिनके वस्त्र नहीं हैं~
कड़क सर्द से लड़ रहे, पनप रहे हैं रोग पुराने।।
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#चुलियाला छंद युग्म, विधान-दोहा+१२२
माया यह कैसी प्रभो, कैसा है यह चक्र चलाया।
दुष्ट सुखों को भोगते, रखते हैं जो वक्र कमाया।।
अहंकार वश हो मनुज, खुद को सबका धीश बताते।
समय मगर कुछ बीतता, दण्ड मिले तब शीश झुकाते।।
--::::--
कान बड़े रखिए मगर, छोटी रखें जुबान हमेशा।
अधिक श्रवण से ज्ञान हो, अल्प वचन वरदान गणेशा।।
बढ़ा हुआ इस देश में, जो है भ्रष्टाचार सदा से।
कारण अंतस में मिला, मैं भी जिम्मेदार अदा से।।
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#चुलियाला छंद युग्म. दोहा+१२२
राधे-राधे जो जपे, खुश होते हैं कृष्ण उसी से।
सब कुछ दे देते उसे,भक्त न रहता तृष्ण खुशी से।।
जिनके घर राशन नहीं, नहीं दीप में तेल सखी री।
सभी श्रमिक बेहाल हैं,नहीं छुपा यह राज फकीरी।।
--::::--
दोहा+१२११
अपने मन की बात जो, करतीं पर उपकार सभी तुम।
उनको मत मन में रखो, बांँटो सब संसार अभी तुम।।
सबसे मत कहना सुनो, अपने मन की बात कभी तुम।
जिससे कहनी,जान लो, क्या उसकी औकात तभी तुम।।
#चुलियाला छंद युग्म
मांँ को कभी न भूलता, रखता हूँ मैं याद हमेशा।
मांँ मुझको भूले नहीं, करता हूंँ फरियाद हमेशा।।
पर्वत पर तुम जा बसीं, कैसे आऊंँ लोक तुम्हारे।
पथ है अधिक डरावना, कैसे हों आलोक तुम्हारे।।
--::::--
छवि मांँ की मेरे हृदय, संँजो रखी है यार सदा से।
हर पल होता ही रहा, अंतस में दीदार सदा से।।
सदा रहा है साथ में, माता का उपकार बहुत ही।
कृपा उसी की हो रही, हुए स्वप्न साकार बहुत ही।।
छंद युग्म #चुलियाला , पदांत २१२
आज रहे बढ़ विश्व में, अनगिन अत्याचार देख लो।
चोरी डाके पड़ रहे, होते ही अँधियार देख लो।।
नहीं सुरक्षित बेटियांँ, घर में भी हैं आज देख लो।
बाज नोचते हैं चिड़ी, बाजों के सिर ताज देख लो।।
--::::--
पदांत १२११
वही बड़ा नेता बने, जिसके सिर अपराध चुनें हम।
झूठ पाप का बोझ हो, उसको ही निर्बाध चुनें हम।।
रक्षक का वह रूप ले, भक्षक हो तत्काल पदों पर।
जनता को वह लूटता, बनता सुख का काल पदों पर।।
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विधा- मुक्तक, आधार- चुलियाला छंद
विधान:- दोहा+122 (पदांत)
पावन माटी देश की, बसती इसमें जान हमारी।
इसी गोद में हम पले, यही गोद है शान हमारी।
प्रेम धर्म मजहब दया,मानवता उपकार सिखाये,
होती है संसार में, इससे ही पहचान हमारी।।
विधान:- दोहा+122 (पदांत)
रीत सिखाता प्रीत की,बनकर के मनमीत तिरंगा।
सदा दिलाता शान से,स्वाभिमान की जीत तिरंगा।
प्राणों से प्यारा हमें, यही धरोहर एक हमारी,
स्वर सरगम संगीत का, प्यारा सा है गीत तिरंगा।।
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विधा- गीतिका आधार- चुलियाला छंद
विधान- दोहा+1112
8 मार्च महिला दिवस पर विशेष
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त्याग समर्पण शीलता, नारी की पहचान जगत में।
सदा बनी संजीवनी, एक सुखद मुस्कान जगत में।।
संयम और विवेक से,सबको किया परास्त स्वबल से,
नारी तू ही शारदे, सकल गुणों की खान जगत में।
दुनिया में आकर रचा, जिसने भी इतिहास कलम से,
जन्मे तेरी कोख से, बड़े- बड़े विद्वान जगत में।
दुनिया में बिल्कुल नहीं,नारी बिन अस्तित्व पुरुष का,
नारी घर की स्वामिनी, नारी कुल की शान जगत में।
अबला अब सबला बनी,फिर भी ये लाचार विवश क्यों,
पूछे जग से "धर्म" क्यों, मिला न इसको मान जगत में।।
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चुलियाला छंद आधारित "गीतिका" (दोहा+1112)
13,16 पर यति, समांत- आन, पदांत- जगत में।
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मातु पिता शिक्षक प्रथम,---बच्चो को दे ज्ञान जगत में।
फिर गुरु से शिक्षा मिला,पढ़ लिख बने महान जगत में।
गुरु या शिक्षक विश्व में ,ये प्रकाश के स्रोत समझ लो,
दूर करें अज्ञान को,------गुरु से ज्ञान सुजान जगत में।
सही मार्ग पर ही चलें,-----पहुँचाना दायित्व कठिन है,
इसीलिए तो श्रेष्ठ है,----- -शिक्षक का स्थान जगत में।
गुरु ही ब्रह्मा विष्णु हैं,-------कहें देव साक्षात नमन है,
सामाजिक गुरु ज्ञान से,----रखते हैं ये ध्यान जगत में।
मिले सभी को प्रेरणा,----मिलता आशीर्वाद हृदय से,
गुरु समान सबके लिए,--निर्धन या धनवान जगत में।
प्रथम शिक्षिका मातु हैं,--पढ़ते जीवन पाठ मगन हो,
अंधकार को दूर कर,------देती हैं पहचान जगत में।
ज्ञान पुंज हैं गुरु सभी,-- गहरा सिंधु अथाह बहुत है,
सुगम बनाते रास्ता,----चाँद यही दिनमान जगत में।
👇
चुलियाला छंद आधारित "गीत"
13,16 पर यति 29 मात्रा (दोहा+212)
"होली विशेषांक"
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होली का त्यौहार है,-------बस तेरा दीदार चाहता।
बुरा न मानो पर्व है,-----मैं तो केवल प्यार चाहता।।
मस्त महीना फागुनी,-----रंगों की बरसात गाँव में।
धूप लगे न आपको,-----बैठें दिन हम रात छाँव में।
रंग हमारा रस भरा,-------थोड़ा सा बौछार चाहता।
बुरा न मानो पर्व है,-----मैं तो केवल प्यार चाहता।।
बैठी सखियाँ हैं सजी,---कहाँ छिपी हो प्रेम राधिके।
रंग लगा कर अंग में,------मुझे पूछना क्षेम राधिके।
तेरा कान्हा ढूंढ़ता,--------दे दो प्यार उधार चाहता।
बुरा न मानो पर्व है,------मैं तो केवल प्यार चाहता।।
अंग-अंग को रंग से,---लाल गुलाल अबीर डालता।
रँगना गोल कपोल को,--पिचकारी से नीर डालता।
संग तुम्हारे सुन प्रिये,---खुशियों का संसार चाहता।
बुरा न मानो पर्व है,-----मैं तो केवल प्यार चाहता।।
घर अंदर से बोलती,नहीं निकलना आज जान लो।
नशा किए हो सब पता,--समझूँ तेरा राज जान लो।
होली में हुड़दंग है,--------जाना है या मार चाहता।
बुरा न मानो पर्व है,-----मैं तो केवल प्यार चाहता।।
मजनू बन जाते सभी,--पीकर भांग शराब नाचते।
गाते फूहड़ गीत को,----नाली बीच जनाब नाचते।
सीवर में ऐसे गिरे,----इनको अब उपचार चाहता।
बुरा न मानो पर्व है,----मैं तो केवल प्यार चाहता।।
👇
चुलियाला छंद आधारित "मुक्तक" (आठ चतुष्पदी में)
{1} दोहा+212
होली का त्यौहार है,मिलकर हम सब प्यार बाँटते।
वृद्धों से आशीष लें,------ छोटे संग दुलार बाँटते।
तंग नहीं करना हमें,---- पीना नहीं शराब भ्रात हे,
हम भारत के लोग हैं,-बस केवल व्यवहार बाँटते।
{2} दोहा+122
होली खेलें ढंग से,----बन जाती है एक कहानी।
कभी-कभी तो देखते,लगती कोई फेक कहानी।
मस्त हुए मदिरा पिए,----गिरे पड़े हैं पंक सहारे,
चूर नशे में जो रहे,- उनके साथ अनेक कहानी।
{3} दोहा+2111
लाल गुलाल अबीर लें,-नीला पीला रंग मीत सुन।
धीरे-धीरे प्यार से,----लगे सभी के अंग मीत सुन।
कष्ट नहीं हो अन्य को,पावन सुन्दर पर्व जान सब,
खेलें होली प्रेम से,--- नहीं करें हम तंग मीत सुन।
{4} दोहा+1112
गले मिलन का पर्व है, आपस में हैं मित्र हम सभी।
द्वेष भावना त्याग कर,केवल रहें पवित्र हम सभी।
भाईचारा ही रहे,--- कटुता का व्यवहार अब नहीं,
भारत देश महान है, इसके सुन्दर चित्र हम सभी।
{5} दोहा+11111
होली होती गाँव में,-----चलो देखतें छोड़ शहर अब।
संस्कार को देखिए,---नहीं वहाँ का तोड़ शहर अब।
हिंदू मुस्लिम सिख सभी,-रंग खेलते खूब मगन मन,
शुद्ध हवा मिलती वहाँ,दूषित वायु मरोड़ शहर अब।
{6} दोहा+1211
आपस में सद्भावना,--रखना सबसे प्यार लड़ो मत।
चार दिनों की जिंदगी,-समझ किरायेदार लड़ो मत।
गले लगाओ प्रेम से,--सब अपने ही लोग सुनो तुम,
जीवन से जीता नहीं,मिली सभी को हार लड़ो मत।
{7} दोहा+221
दीन गरीबों के लिए,----बन जाता है शर्म व्यापार।
शोषण हो इंसान का, कुछ लोगों का धर्म व्यापार।
मानव धर्म महान है,कहते ऋषि मुनि संत दे ज्ञान,
सदा सोच अच्छी रहे,--सबसे सुन्दर कर्म व्यापार।
{8} दोहा+1121
स्वर्ग नर्क सब कुछ यहाँ,किसने देखा लोक परलोक।
हँसी खुशी जीवन कटे,यहीं आप का शोक परलोक।
भ्रमित रहे यह मन सदा,--आते रहते भाव मत सोच,
भ्रम जैसे मन से हटा, स्वर्ग नर्क सब रोक परलोक।
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चुलियाला (चूड़ामणि) छंद दोहा+212
दो कुल की इज्जत बनी, रखतीं हैं सम्मान बेटियाँ।
अपने वे कर्तव्य से, रखतीं सबका ध्यान बेटियाँ।।
स्वर्ग बनातीं गेह को, आतीं सबको रास बेटियाँ।
पूजा करतीं पाठ ये, रहतीं व्रत उपवास बेटियाँ।।
बेटी से बढ़कर पिता, देते क्यों सम्मान पुत्र को।
रहें उपेक्षित बेटियाँ, उनसे ज्यादा ध्यान पुत्र को।।
लायक नालायक सही,करते हैं सब प्यार पुत्र को।
सब सहती हैं लड़कियाँ, देते हैं अधिकार पुत्र को।।
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चुलियाला (चूड़ामणि) छंद आधारित "गीत"
29 मात्रा,13-16 पर यति दोहा+122
हरे भरे इस बाग में,रहना फूल समान सदा ही।
रहे गर्दिशों में बना, चेहरे पर मुस्कान सदा ही।।
जीवन छोटा है यहाँ,मिलता विध्न अनेक सुनो जी।
सुख जाता है दुख मिले, कोई रहता एक सुनो जी।
इन्हे मिलाकर जो चला, होता बड़ा महान सदा ही।
रहे गर्दिशों में बना, चेहरे पर मुस्कान सदा ही।।
संकट आते ही रहे, हिम्मत रखना धार वहाँ भी।
काँटों पर चलना पड़े, कभी न मानो हार वहाँ भी।
हिम्मत के आगे नहीं, टिके कभी तूफान सदा ही।
रहे गर्दिशों में बना, चेहरे पर मुस्कान सदा ही।।
गर्दिश में खोए नहीं,अपना पौरुष होश कभी भी।
मुस्काते आगे बढ़ें,भरकर अपना जोश कभी भी।
आँधी या तूफान हो , चलना सीना तान सदा ही।
रहे गर्दिशों में बना,चेहरे पर मुस्कान सदा ही।।
दूर दिखाई दे रही , जीवन की ये राह सँगाती।
लेकर बढ़ते ही रहें, मन में सुन्दर चाह सँगाती।
कठिन राह बनता सुगम,होता है आसान सदा ही।
रहे गर्दिशों में बना, चेहरे पर मुस्कान सदा ही।।
👇
चुलियाला (चूड़ामणि) छंद आधारित "गीतिका"
समांत- आस, पदांत- जगत में।
13,16 पर यति, 29 मात्रा, दोहा+1112
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
नहीं रहा वह प्रेम अब,--जाती रही मिठास जगत में।
बिखर गए रिश्ते सभी,खोया अब विश्वास जगत में।
रिश्तों के गन्ने मिले,-----सूखे खेत विरान कसम से,
बैठा करते थे जहाँ, दिखती अब तो घास जगत में।
व्यस्त सभी हैं काम में,जैसे समय अकाल बहुत है,
मिलने का मौका नहीं,दिखते लोग उदास जगत में।
सोच रही दुनिया यही,केवल अपना स्वार्थ समझती,
नहीं चाहती अन्य का,थोड़ा बहुत विकास जगत में।
जहाँ बाग में खेलते,------करते थे उत्पात बहुत से,
उजड़ा-उजड़ा सा लगे,आता जरा न रास जगत में।
लगे पराये अब सभी,---रहते हैं क्यों दूर अपन से,
कौन पराया है यहाँ, किसे कहूँ मैं खास जगत में।
मयखाना अपना लगे, रहते सभी समान मगन में,
भेद नहीं छोटा बड़ा,बोतल एक गिलास जगत में।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
चुलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीत :-
विधान- दोहा + 212
करता जय-जयकार जग,महिमा अपरंपार शारदे।
कलम सतत चलती रहे, गहे बोध का सार शारदे।
करूँ वंदना मातु की, नवल रचूँ मैं छंद आपके।
नवल भाव पूरित सदा,मिटें सभी अब द्वंद्व जापके।
भाषा चिंतन हो नवल, नवलेखन में धार शारदे।
कलम सतत चलती रहे, गहे बोध का सार शारदे।
नवल लेखनी से लिखूँ, नवल प्रार्थना गीत वंदना।
मन-वीणा झंकृत करे, हृदय नवल संगीत भावना।
नवल सृजन रचना नवल, शब्द-सुमन नवहार शारदे।
कलम सतत चलती रहे, गहे बोध का सार शारदे।
जनगण की बाधा हरो, हे ममता आगार शारदे।
सुखी जियें जीवन सभी, माने जग आभार शारदे।
नवल ज्ञान मन भर रही, सरिता कल-कल धार शारदे।
कलम सतत चलती रहे, गहे बोध का सार शारदे।
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद
विधान- 13,11 + 5 , (दोहा + 212)
स्वागत में ऋतुराज के, उपजा मन अनुराग आज है।
तन-मन रोमांचित हुआ, नाचें सब अब फाग आज है।
वन में टेसू खिल रहा, मदन लगाता आग आज है।
कली-करे शृंगार यह , अली छेड़ता राग आज है।
वन उपवन पुहपन सजे, भ्रमर करें गुंजार बाग में।अधखिली कली खिल रही, कण-कण नव संचार बाग में।
महक उठा कचनार अब, महका हरशृंगार बाग में।
बौर-खिला यह आम पर, बहती मलय बयार बाग में।
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान-13,11+ 5 (दोहा + 212)
जितना मन है डूबता, जाता है उस पार साथियो।
अपने प्रियजन के लिए, याद बने पतवार साथियो।
करे डूबकर प्रार्थना, जागे मन विश्वास आज भी,
हृदय बसे मनमीत की, छवि होती साकार साथियो।
पिया-गए परदेश में, रही कामिनी सोच नित्य ही,
हृदय-व्यथा की यह कथा, कहती जल की धार साथियो।
डूब रहा है सूर्य भी, होती स्वप्निल शाम सुंदरी,
रंग सजे आकाश में, मन में सजता प्यार साथियो।
नारी सब कुछ ही सहे, उसकी रहे अवाक जिंदगी,
हर पल है वह चाहती, प्रिय सह हो अभिसार साथियो।
👇
चुलियाला /चूड़ामणि छंद पर आधारित मुक्तक:-
विधान- दोहा + 122.= 13,11+122(29 मात्राभार )
सुंदर स्वर्णिम देश यह, भारत सदा महान हमारा।
जग में न्यारा आज भी, जय-जय हिंदुस्तान हमारा।
करे सामना शत्रु से, होकर यह निर्भीक सदा ही -
आजादी-हित याद है, निर्भय वह बलिदान हमारा।
राम-नाम पतवार से, करना बेड़ा-पार किनारा।
अष्ट-याम वंदन करूँ , प्रभुवर देते यार सहारा।
गहूँ शरण मैं नित्य अब, मिले भक्ति वरदान सदा ही -
तजकर मन का स्वार्थ अब, पाऊँ प्रभुवर प्यार तुम्हारा।
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान- 11,13 +5 (दोहा+212 )
करूँ वंदना मातु की , करके गौरव गान भारती।
आज समर्पित भावना,तन-मन कर कुर्बान भारती।
उबल रहा है रक्त यह,रिपु का धोखा देख आजकल,
करें चीन का हाल वह, माँगे भीख निदान भारती।
बातचीत के चक्र में, उलझाता है धूर्त घात से,
सदा स्वार्थ की नींव पर, रहता उसका ध्यान भारती।
करे अनोखा युद्ध यह, भारत का गणतंत्र साथियो,
बने स्वदेशी अस्त्र अब, जीते जंग महान भारती।
रणबाँकुरे शेर अब, बिफर उठे हैं आज काल बन,
सावधान अब चीन तू, जागा हिंदुस्तान भारती।
चुलियाना/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान- 29 मात्राभार, 13,11+5 (दोहा + 2111).
माता का आशीष है, मत हो कभी उदास मित्रवर।
दर्शन करने के लिए, भाव भरा मन पास मित्रवर।
उपासना संजीवनी, फल की चिंता छोड़ना सतत,
मोक्ष-दायिनी भक्ति माँ, मन में है यह आस मित्रवर।
मातु-कृपा जब हो सहज, करे पुत्रवत प्यार मातु यह,
प्रेम-भावना जिस हृदय, माँ करती है वास मित्रवर।
सदा मातु की वंदना, करता गौरव गान नित्य नव,
ममता अपने भक्त पर, रखती माता खास मित्रवर।
सारे संकट दूर हों, विनय यही है आज मातु यह,
वरद-हस्त हो माथ पर, इतनी है अरदास मित्रवर।
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित मुक्तक:-
विधान- 29 .मात्राभार, 13,11 + 5 ( 2111)
बापू तेरे देश में, मची स्वार्थ की होड़ आजकल।
अपनी-अपनी सोच है, अपनी-अपनी तोड़ आजकल।
परेशान हैं आम जन, धन का वह आतंक है इधर-
भ्रष्ट हुआ जन-आचरण, दिया आपको छोड़ आजकल।
अन्वेषण के क्षेत्र में, चले सतत अभियान आजकल।
सुख सुविधा सम्पन्नता, जुटा रहा विज्ञान आजकल।
नभ-थल-जल में खोजते, ऊर्जा का भंडार है इधर-
भारतीय अभियान का, विश्व करे सम्मान आजकल।
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान- 13,11 +5 (दोहा + 212 )
कविता सरिता कामिनी, बहती कल-कल धार सुंदरी।
भाव सरस मृदु हासिनी, कविता है शृंगार सुंदरी।
जीवन सुंदर सब जिएँ, रहे नित्य निष्काम भावना,
जग में सबसे नेह हो, मृदुल रखें व्यवहार सुंदरी।
कविताई करते सुजन, प्यारा दें संदेश प्रेम का,
परहित चिंतन हो सृजन, स्वर्ग बने संसार सुंदरी।
राम-नाम रस माधुरी, रचना आठों याम कामना,
उभय-लोक को साधती, कविता अपरंपार सुंदरी।
मने विश्व कविता-दिवस, हम सबको है गर्व भारती,
रचें नित्य कविता नवल,, स्वागत सह आभार सुंदरी।
चूलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान- 13,11 + 5 (दोहा +212 )
कविता तू मनमोहिनी, कवि का तू संसार कामिनी ।
रहेँ मग्न कविवर सदा, जीवन का आधार भामिनी ।
नवल भाव सुंदर सरस, नवल सृजन नवछंद आज तू,
जय माँ वीणावादिनी, महिमा अपरंपार हंसिनी।
अलंकार नवरस अमिय, करे जगत नित पान धारती,
नूतन रचना कामिनी, करे नवल शृंगार शालिनी।
कविता सुंदर कोकिला, गाए अनुपम गान भा रहे,
वन उपवन सुंदर सजे, भ्रमर करें गुंजार यामिनी ।
कविता मंगल कामना, करे लोक कल्याण राधिके,,
परहित चिंतन नित सृजन, मनहर चले बयार दामिनी।
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चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद
दोहा छंद के पदांत में 1211 जोड़कर
गीतिका , समांत आर , पदांत यहाँ पर
उनकी जय होती सदा , जिनके नेक विचार यहाँ पर |
उन्हीं विचारों की झलक , करती है शृंगार यहाँ पर ||
बोल उठें जय लोग भी , कर उठते है वाह खुशी से ,
परहित के शुभ भाव से , मन के बजते तार यहाँ पर |
नेता की जय शोर है , प्रभु की करे विभोर सदा ही ,
जय बुलवाना बात कुछ , जय होना कुछ सार यहाँ पर |
मिलना जुलना हो जहाँ , जय- जय सीताराम कहे हम ,
हो जाए प्रभु नाम से , जग में बेड़ा पार यहाँ पर |
जय जैसे शुभ कर्म से , रहती खुशी अपार निजी मन ,
निज जय जो लगवा रहे , उस जय में है हार यहाँ पर |
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चुलियाला छंद दोहा + यति प्रयोग 122
(मुक्तक)
संसार का एक पहलू
फूल खिलें सब देर से , पहले काँटे शोर मचाते |
खलनायक सम्मुख मिले , तब ही नायक जोर लगाते |
कहे ' सुभाषा' आज भी, सुंदर रहते गेह हमारे -
मिलजुल कर हम सब रहें,सबको अपनी ओर बुलाते |
संसार का दूसरा पहलू
सभी पुराने दूर है , आज नए जो गान मिले है |
उनको बिखरा देखता , सबके सब अरमान हिले है |
गंध कपट की अब रहे , मिले दिखावट खार पुरानी -
नजर उठाकर देखता , बने हुए शैतान किले है |
आज गजब हालात है , रोते रहते ओज किनारे |
सूरज चंदा छिप गए , करते रहते खोज सितारे |
समय आज वेवश हुआ , सब कुछ बैठा हार उजाला -
बने काम सब टूटते , अब तो सब कुछ रोज हमारे |
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चुलियाला छंद में गीत -+ दोहा छंद में + पदांत प्रयोग 212 )
हर अक्षर में भर रही, साजन सुनो सुगंध नीति की |(मुखड़ा)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
पाती पाकर पवन भी , चला सजन के पास दौड़ता | (अंतरा
विरहा की सांसे लिए , साजन के तट खास छौड़ता ||
थोड़े में ही जानिए , साजन पूरा दर्द हटाना |
शब्द न मुझको मिल रहे, आकर तुम ही गर्द गिराना ||
तुम बिन जग सूना लगे, भर दो तुम आनंद जीत की |(पूरक)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
काजल बहकर गाल पर ,रोता है शृंगार शाम को (अंतरा)
सखियां आकर कह रहीं, कहाँ गया भरतार काम को ||
तू क्यों सँवरें रात- दिन , साजन क्यों परदेश धाम को |
प्रीतम क्या अब आ रहें, धरें भ्रमर परिवेश नाम को
करें इशारा नैन से , सजनी गाती छंद मीत की (पूरक)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
सब कहते मैं मोरनी , नयन आज चितचोर टेरते |(अंतरा)
चढ़े धनुष पर तीर सी , काजल की सब कोर हेरते ||
बनी बावरी घूमती , समझ न आती बात बोलते |
कब होती अब भोर है , कब होता दिन-रात तोलते ||
प्रीतम मेरे लो समझ , विरहा गीता छंद गीत की |{पूरक)
पाती लिखकर भेजती , नेह भरी मकरंद प्रीति की ||(टेक)
चुलियाला छंद (गीतिका) (13 - 16)
दोहा छंद + 1112 , समांत आर , पदांत- जगत में
बड़ी बात लघु रूप से , कविता कहती सार जगत में |
कविता के शुचि भाव ही , देते सबको प्यार जगत में |
कविता लिखना अति सरल , भावों का है खेल यतन से
शब्द चयन जब श्रेष्ठ हों , अनुपम है उपहार जगत में |
कवि जब कविता को लिखे, लिखकर होता धन्य कथन से
माँ शारद का पुत्र बन , पाता पुण्य अपार जगत में
कविता उनसे दूर है , लेन - देन जब चाह मनन में ,
भाव शून्य जब तुक रहें , अंधकार की खार जगत में |
शीत माह की धूप में , खिले सुबह से फूल चमन में ,
ऐसी ही कविता लगे , शुचिमय गंगा धार जगत में |
कविता को सब जानिए , है शारद का रूप सहज ही ,
जिसके चरणों में झुके , भक्तों का सत्कार जगत में |
कविता की आभा सदा , देती है संदेश चमक- सी
करती दर्पण काम यह , चलती हर दरबार जगत में |
कविता कवि मन भाव है , निर्झर होते गीत भगत के ,
जहाँ हृदय कविता रहें, दूनी करती चार जगत में |
कविता छोटी सी रहे , या लेवें आकार , धरनि में ,
आँचल इसका है बड़ा , करती है विस्तार जगत में |
कविता निकसत है हृदय , जोड़े कवि से तार नवल ही ,
कवि कविता पूरक रहें , करते रहें दुलार जगत में |
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चुलियाला छंद चतुष्पदी। दोहा छंद+१११२
शिव का सुंदर रूप है,नहीं दूसरा ओर कसम से।
बम बम भोले बोलते,भक्त मचाते शोर कसम से।।
करो नित्य पूजन हवन,श्रद्धा रखना खूब धरम का।
भांग धतूरा दूध से,करना तुम अभिषेक शिवम का।।
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चुलियाला छंद चतुष्पदी। दोहा छंद+१११२
फागुन आया रंग की, करने को बौछार बलम जी।
दूरी सह पाती नहीं, आओ कर लें प्यार सनम जी।।
जिएं मरेंगे साथ में,भूल गए इकरार सजन जी।
प्रिये करो मत देर अब,बुझे नहीं इस बार अगन जी।।
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चुलियाला छंद चतुष्पदी। दोहा छंद+१२२
आज प्यार के रंग से,आओ खेलें फाग चलो जी।
डफली पर छेड़ें मधुर, सखी सुरीला राग भलो जी।।
टेसू के यह फूल हैं, प्यार प्रीत के रंग सजाएं
शीतल कोमल साथ ही,सनातनी का अंग बनाएं।।
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चुलियाला छंद चतुष्पदी। दोहा छंद+१११२
मुखड़े गुलशन हो गए,महुआ लगे गुलाब सजनवा।
है होली की मस्तियां,पीना नहीं शराब सजनवा।
गुझिया पापड़ पापड़ी,मीठा खाओ खूब बलमवा।
मुरली धर के नेह में, आओ जाएं डूब सजनवा।।
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चुलियाला छंद चतुष्पदी (दोहा+१११२, १२२)
मतवालों की टोलियाँ, करतीं खूब धमाल मगन में
होली के हुड़दंग में, उड़ता रँग गुलाल गगन में।।
ब्रज में होली हो रही, मस्ती में सब ग्वाल सजन रे।
राधा के सँग गोपियाँ, गोपों सँग गोपाल सजन रे।।
आया फागुन संग में, लेकर रँग गुलाल खुशी से।
मतवालों की टोलियाँ, करतीं खूब धमाल खुशी से।।
फगुआ गाते गाँव में, बजते ढोलक झाल खुशी से।
मिलकर पीते ठंढई, करते सभी कमाल खुशी से।।
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चुलियाला छंद आधारित गीतिका (दोहा, १२२ )
अमर धरोहर देश की, भारत के त्यौहार हमारे।
एक सूत्र में बाँधते, सभी मित्र परिवार हमारे।।
सभी पर्व होते अलग, मौसम के अनुरूप हमेशा।
पर सबके शुभ भाव से, बढ़े आपसी प्यार हमारे।।
लोग संगठित हो करें, आपस में सब काम खुशी से।
भर जाते उत्साह से, भूल बैर व्यवहार हमारे।।
मेले लगते है यहाँ , होता भारी धूम-धड़ाका।
बच्चे वृद्ध जवान सब, हँसी-खुशी गुलजार हमारे।।
इसे बचा रखना हमें, यह पावन सौगात हमारी।
नैतिक मूल्यों से सजे, सुंदर हैं संस्कार हमारे।।
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चुलियाला छंद मुक्तक (दोहा, १२२)
शिव शंकर कैलाशपति, औघड़ भोलेनाथ भजो रे।
महाकाल के काल प्रभु, रहें भक्त के साथ भजो रे।
राम कृष्ण जिनको भजें, चंद्र विराजे माथ मुकुट बन-
हर मुश्किल आसान कर, धरें भक्त का हाथ भजो रे।
भव बाधा सबकी हरे, बमभोले का नाम पुकारो।
पूजन वंदन अर्चना, पूरण करते काम पुकारो।
महादेव प्रभु आइए, भक्त आपके धाम खड़े हैं-
नीलकंठ अति हैं सरल, सारे सुबहो शाम पुकारो।।
चुलियाला छंद (१३/११+१२२)
समाधान मुस्कान है, त्यागें तुच्छ तनाव हमेशा।
खुशियाँ आतीं दौड़ कर, दूर संकुचित भाव हमेशा।।
मानव वही अमीर है, करे सभी से प्यार हमेशा।
जब जाता जग छोड़ कर, याद करे संसार हमेशा।।
खुशी मिले संसार को, करिये ऐसा काम हमेशा।
मानवता को गर्व हो, बने यशस्वी नाम हमेशा।।
घड़ी हाथ में बाँध कर, चलते लोग तमाम हमेशा।
एक घड़ी बस में नहीं, वर्षों का दें दाम हमेशा।।
घटता सुंदर रूप है, जर्जर बने शरीर हमेशा।
अच्छाई रहती सदा, जैसे गंगा नीर हमेशा।।
संचय करिये पुण्य का, करें सार्थक कर्म हमेशा।
परहित में जीवन रहे, निभे आपका धर्म हमेशा।।
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विधा-चुलियाला छंद
चुलियाला छंद (दोहा + २१२)
माता हैं स्कन्द की, महिमा अपरंपार अम्बिके।
पंगु लाँघते हैं शिखर, कर्म करें लाचार अम्बिके।।
कल्याणी माता करो, भक्तों का उद्धार अम्बिके।
पाप नाशिनी आइए, खड़े आपके द्वार अम्बिके।।
महाबला के मोह से, मोहित है संसार अम्बिके ।
ज्ञान चक्षु माँ खोल दे, जग का कर उपकार अम्बिके।।
निशि दिन सुमिरन रत रहूँ, मन में माँ का भाव अम्बिके।
प्रेम सभी प्राणी करें, तज कर द्वेष-दुराव अम्बिके।।
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चुलियाला छंद आधारित मुक्तक
मात्रा 13,16. विधान दोहा + पदांत 212
नेह नदी बहती रहे ,ममता सरिता धार प्यार से।
माँ की तुलना है नहीं, इस नश्वर संसार प्यार से।।
निर्मल निश्छल नेह तो,मिलता मातृ प्रसाद रोज ही।
मां की सेवा तुम करो, मिलता है उपकार प्यार से।।
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चुलियाला छंद दोहा +पदांत 212
साधु संत रमते भले,है यह सच्ची बात मान लो।
पानी जैसे ही बहे,तरल सरल विख्यात छान लो।।
साधु वचन होते सदा,शिक्षाप्रद अनमोल ज्ञान लो।
जो जीवन में धार ले ,उसके सच्चे बोल जान लो।।
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चुलियाला छंद, मात्रा दोहा + ,1211 पदांत -
करो कृपानिधि तुम सदा,मैत्री भाव विकास दया कर।
भाई भाई मिल रहें, हो ऐसा अभ्यास मना कर।।
भरो कृपानिधि तुम सदा,पाप भीरुता आन सदा रम।
कष्ट किसी को दूं नहीं, मानूं स्वयं समान सदा सम।।
भक्ति कृपानिधि अब भरो, गुरुवर के प्रति आप कृपा कर।
गुण दर्शन गुरुवर करूं, हरो सभी संताप कृपा कर।।
कृपा कृपानिधि शुभ सदा,सिद्ध करो सब काम दया कर।
भक्ति भाव में लीन रहूं, मिल जाए तुझ धाम दया वर।।
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चुलियाला छंद. दोहा +१११११
प्रेम वाटिका है खिली , मधुर प्रीत व्यवहार सहजतम।
तन मन सब अर्पण किया ,बने प्यार आधार महजतम ।।
स्नेह प्रीत अनुराग है , प्रेम वाटिका फूल मधुरतम।
मिले हृदय से जब हृदय, हट जाते सब शूल कटुकतम।।
प्रेम वाटिका में मिले , प्रीतम सजनी संग मगन बन।
प्रेम भरी बातें करे, खिले प्रेम के रंग सघन बन।।
प्रेम वाटिका में किया, मधुर स्नेह श्रृंगार महक कर।
साजन जी से जा मिली, किया प्यार इजहार चहक कर
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चुलियाला छंद
"खुशियां "
दोहा +11111
दोस्ती दुश्मन से करो,जीतो देकर प्यार सरल बन।
करो विजय का तुम वरण ,खुशियां मिले अपार सहज बन।।
मीत बना कर स्वयं को ,करें स्वयं से प्यार सहज तम।
सुंदर सब कुछ तब लगे, खुशियां मिले हजार सहजतम।।
दोहा +212
घर शोभा कुल बहू है,रहती रौनक खास प्यार से।
स्नेह संग रहते सभी,खुशियां करे निवास प्यार से।।
जीवन में खुशियां मिले, लगता सब अनुकूल प्यार से।
हर्ष लहर फैले तभी,खिले फूल ही फूल प्यार से।।
दोहा+1112
सुखद संवाद जब मिला,जीत गए हम जंग सहज ही।
मन में खुशियां भर गई,लोग हुए सब दंग सहज ही।।
नया सवेरा आ गया,शुरू हुआ नव वर्ष मधुर सा।
खुशियां अपरम्पार है,होगा नव उत्कर्ष मधुर सा
दोहा+1112
माँ दुर्गा सुख दायिनी,हरती सारे क्लेश सहज ही।
उनके चरणों मे सदा,मिले खुशियां विशेष सहज ही।।
फुर्सत के क्षण जब मिले,कर तूँ तप जप ध्यान सहज ही।
जीवन मे खुशियां मिले,दूर हटे अज्ञान सहज ही।।
सरला भंसाली
अहमदाबाद
स्वरचित
सादर समीक्षार्थ
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मुक्तक प्रदीप छंद 16/13
भर पिचकारी राधा मारी, फागुन के त्योहार में ।
भीग गए तब श्याम सलोने, ब्रजरानी के प्यार में।।
कूक कूक कोयलिया गाए, रास रचाएं श्याम जी-
कान्हा कान्हा की ही अब तो, धुन बाजे संसार में।।
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लावणी छंद 16/14 गीत
सखी सहेली खेल रहीं हैं, प्रेम रंग की होली रे,
नीले पीले लाल गुलाबी, रंग लगाती भोली रे।।
होली का त्योहार निराला, खेले हर मतवाली रे,
रंग अबीर गुलाल मले सब, झूमे है हर आली रे।
बरसाने की होली भाई, आई देखो टोली रे,
सखी सहेली खेल रहीं हैं, प्रेम रंग की होली रे।।
भर पिचकारी सबने मारी, गीत फाग के गाएं रे,
प्यारा है त्योहार हमारा, सबके मन को भाए रे।
भिन्न-भिन्न हैं लोग यहाॅ॑ पर, भिन्न-भिन्न है बोली रे,
सखी सहेली खेल रहीं हैं, प्रेम रंग की होली रे।।
हरी भरी फसलें लहराएं, कोयल कूके डाली रे।
आम और महुआ बौराए, पाके गेहूं बाली रे।
शर्म हया के गहने पहने, पहने घाघर चोली रे।
सखी सहेली खेल रहीं हैं, प्रेम रंग की होली रे।।
सखी सहेली खेल रहीं हैं, प्रेम रंग की होली रे,
नीले पीले लाल गुलाबी, रंग लगाती भोली रे।।
👇
चुलियाला छंद चतुष्पदी ) दोहा छंद के सम चरणों में + 122
अक्षर-अक्षर जब मिले, बने तभी नव छंद सजीले।
भाव बनाते है सदा , कविता में मकरंद रसीले
नवल धवल हम छंद लिख, पाते है सम्मान रँगीले।
लिखते लिखते बंध फिर, दिखते हमको ज्ञान हरीले।।
चुलियाला छंद
बीत गए कितने बरस, नहीं गए हम गाॅ॑व राम से ।
मधुर मनोहर याद है, शरद नीम की छाॅ॑व राम से ।।
हरियाली वो खेत की, हृदय पुकारे आज राम से ।
मेरे प्यारे गाॅ॑व में, मेरा तो है राज राम से।।
चुलियाला / चूणामणि छंद (13/16)
दर्शन कर लो मातु के, आया है नवरात्र देखिए।
माॅ॑ कृपालु होती बहुत, भरती सबके पात्र देखिए।।
रखते हैं उपवास सब, गाते मंगल गीत देखिए।
देती माॅ॑ आशीष तब, मिलती जग में जीत देखिए।।
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चुलयाला छंद , विधान =दोहा +१२२
रखी फसल खलिहान में, जो था घर के पास हमारे।
ढ़ेरी दाहा दुष्ट ने, सब जन हुए उदास हमारे।
जिसमें मानवता नहीं, करते वो तो डाह बिचारे-
सबके सुख से जो जले, वो नर ही उपहास हमारे ।।
आया अब मधुमास है, रँग हैं चारो ओर हमारे।
अरे उदासी तोड़ के, कर ले थोड़ा शोर दुआरे।
धरती पे भी रंग है, वन का देखो मोर सजीला-
गुजरे फिर चुपचाप क्यों , तुम भी नाचो जोर दुलारे।।
विधान=दोहा +२१२
फागुन में बढ़ने लगी, विरहा मन की पीर जान लें।
ये उदास काजल कहे, कब तक रखती धीर जान लें।
सबकी चूनर लाल है, मेरी फटती चीर चीखती-
ओढ़ उदासी मैं कहाँ, खा पाऊँगी खीर जान लें।।
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आधार छन्द चुलियाला मात्रिक
विधान दोहा +५मात्राएँ( 212 ) १३,१६ पर यति
गीतिका , समान्त- आर !पदान्त- भारती!
कुन्द इन्दु के पुष्प सम,श्वेताम्बर तन धार भारती ।
माला पुस्तक हाथ द्वय , करतीं मंत्रोचार भारती।१।
श्वेत- पद्म आसीन माँ,जपती रहती नाम जनार्दन ।
सुन्दर वीणा वाद्य से, करती माँ झनकार भारती ।२।
गरुण ब्रह्मचारी महा, रखतीं अपने साथ शारदे ।
श्वेत -वर्ण के हन्स पर,होती माँ असवार भारती ।३।
उज्वल जिनके हैं हृदय,मानें उनको मान-सरोवर ।
कहते वेद पुराण यह , सज्जन- हृदय विहार भारती ।४।
हम आये तेरी शरण,रख दो सिर पर हाथ अभी माँ ।
उर के खोल कपाट तुम,कर दो शिल्प सुधार भारती ।५।
एक सूत्र में बाँध दो, रंग वर्ण परिवेश यहाँ का ।
जाति वंश के भेद को,कर दो तुम अब क्षार भारती ।६।
कुछ आतंकी सोच से,करते विघटन नित्य अचानक ।
धर के काली रूप माँ, दुष्टों को दो मार भारती ।७।
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चुलियाला छन्द मात्रिक
विधान दोहा +५ मात्राएँ १३,१६ पर यति
एकदन्त कपिलो सुमुख, महाराज गणराज पधारो ।
हे लम्बोदर शुभ करण ,जनगण मंगल काज सँवारो ।
विघ्न वियानक हे विकट, हे गौरी सुत लाज बचाओ।
धूम्र केतु हे शिव सुवन ,सुन्दर सुहृद समाज बनाओ।१।
करो रोग जड़ का शमन, शत्रु दलों का खाट हटाओ।
गणाध्यक्ष विकराल हे, भारत भूमि विराट बनाओ।
गज -आनन गज- कर्ण हे, सुन्दर देश ललाट उठाओ।
कृपा करो जगदम्ब सुत, छन्द महल सम हाट सजाओ।२।
वक्रतुण्ड काया वृहद , हर लो सब संत्रास हमारे ।
कोटि सूर्य द्विति के सदृश , करिए सदन निवास हमारे ।
पूरण कर दो कामना, भर दो घर उल्लास हमारे ।
लाज तुम्हारे हाथ है, रहो सदा प्रभु पास हमारे ।३।
पूजा करते भूत गण ,मूसक के असवार गजानन ।
कैथा जामुन फल प्रिये,मस्तक सिन्दुर धार गजानन ।
गिरिजानंदन सिद्ध- प्रद,तुम्हें नमन शत बार गजानन ।
प्रथम पुज्य हेरम्ब हे, कर दो तुम शुभकार गजानन ।४।
गीत
पशु पक्षी भी जानते, कैसा है व्यवहार तुम्हारा ।
तोता मैना अति चतुर,समझ रहा है प्यार तुम्हारा ।00
खग जैसी ही जीव की, होती सबकी सत्य कहानी ।
विधि को राजा रंक सम ,जो हैं लिखते अन्त्य कहानी ।
सँभले तुम न वसन्त भी,गया न तन का क्षार तुम्हारा ।
करता लोगों को दुखी,अप्रिय यह प्रतिकार तुम्हारा ।१।,,,,,
उड़ा विहग जब पींजड़ा ,फिर कैसे कब गेह पधारे ।
त्याग स्वबंधन आवरण ,फिर देखो कब देह पधारे ।
करना अच्छा काम ही,जीवन का है सार तुम्हारा ।
कर लो परहित दान सब,जो सुन्दर श्रृंगार तुम्हारा ।२।,,,,,,,,
प्राण त्यागकर गीध ने,नष्ट किया आतंक जगत का।
देश भक्ति की पंक्ति में,सुन्दर बना सुअंक जगत का।
सिन्धु नीर गिल्ली भरा ,किया राम उच्चार तुम्हारा ।
देश भक्ति कर्तव्य है,उचित जोड़ना तार तुम्हारा ।३।,,,,,,,,,,
कितने जन आये यहाँ, चले गये मुख मोड़ यहाँ से।
सब सम्पति ऐश्वर्य को,गये सकल जन छोड़ यहाँ से।
बलिदानी जीवित सदा,भगतसिंह सरदार तुम्हारा ।
शेखर वीर मनोज है,जलता सा अंगार तुम्हारा ।४।,,,,,,,,,,,
👇
चुलियाला छन्द मात्रिक. विधान 13,16 पर यति
मौसम के बदलाव से,चलता आज बुखार यहाँ पर।
खानें-पीनी में करें,हम सब उचित सुधार यहाँ पर।
आये तेज बुखार तो, करें सही उपचार यहाँ पर ।
मानों तुम शुभ बात अब,कर लो निज तन प्यार यहाँ पर।१।
तन होगा बलवान जब,कर सकते श्रमदान देशहित ।
हो आवश्यक यदि कभी,देना अपनी जान देशहित ।
आप आप चरना वही,होती पशु की वृत्ति धृष्टतम् ।
है सृजती दुर्वृत्ति जो,करती जन धन शक्ति धृष्टतम् ।२।
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आधार छन्द चुलियाला अर्द्धसममात्रिक
समान्त आज ,पदान्त- भोग हैं ! गीतिका
वीरों के ही शौर्य पर, हम सब करते राज भोग हैं ।
कर लें उन्हें प्रणाम हम,जिनसे पाये साज भोग हैं ।१।
वीर कर्म की मूर्ति हैं, जो सीमा पर काम कर रहे,
करते रक्षा देश की, लक्ष्य लिए जन काज भोग हैं ।२।
सुत माँ पत्नी त्याग कर,रहते सैनिक शून्य ताप पर ,
योगे जैसे सत व्रती, देते सकल समाज भोग हैं ।३।
नमन सैनिकों को करें,हम सब ऋणी कृतज्ञ भारती ,
सैनिक के ही कार्य से , हम सब करते आज भोग हैं ।४।
निष्ठामय कर्तव्य से, करते सारे काम अग्नि पथ ,
करते इन्हें प्रणाम हम, जिनसे पाये ताज भोग हैं ।५।
👇
चुलियाला छन्द अर्द्धसममात्रिक
समान्त- आर,पदान्त -हुये हैं ! गीतिका
हुई सदन की दुर्दशा, बहुत दिवस बेकार हुये हैं ।
लोगों का धन व्यर्थ में,गये नदी की धार हुये हैं ।१।
स्वेद बहाकर के किया ,जमा आय का शुल्क सभी नें।
लक्ष्यहीन तकरार से, बहुत शुल्क भी क्षार हुये हैं ।२।
बड़ों- बड़ों की सोच यह,तो क्या करे गरीब यहाँ का।
आज अपव्यय है बना,नये सृजित उद्गार हुये हैं ।३।
गाँवों की पंचायतें,गुरु से लेतीं सीख वही ही।
जहाँ नहीं संयम बहुत,वहीं व्यक्ति बीमार हुये हैं ।४।
आप सभी सम्मान्य जन,कर दें सत्रारम्भ अभी से ।
बंद करें यह रार अब,दुखी बहुत बाजार हुये हैं ।५।
बड़े- बड़े संघर्ष से, हुआ देश आजाद हमारा ।
लोक तंत्र को कूटते , ऐसे लट्ठामार हुये हैं ।६।
समय गये फिर क्या हुआ,करनें पश्चाताप तुम्हारे ।
हम सब मिलकर के करें,जैसे नव विस्तार हुये हैं ।७।
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छन्द-चुलियाला या चूड़ामणि
दोहा + पांच मात्रा
पदांत - लगागा
दो मनकों के मेल को,और बनाता खास यही है।
सबको भाता है सखे,वह सुन्दर मधुमास यही है।
प्रेम मिलन अति आतुरी, कर सजनी श्रृंगार सखी री।
प्रिय वदना काजल लगा,दर्पण रही निहार सखी री।1
पदांत -गालगा
बिना निहारे आपको काटे कटी न रैन सांवरे।
आँसू बन बारिश करें श्याम बदरिया नैन बावरे।
राधा पंथ निहारती, कब आयें घनश्याम यहाँ पर।
वन पथ रोज बुहारती, लेकर हरि का नाम वहाँ पर।2
👇
चुलियाला छन्द=दोहा + 5 समकल
विधा गीतिका समान्त-आत पदांत- साँवरे
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गीतिका
आना मत मेरी गली, सुनो हमारी बात साँवरे।
दूरी से दुखता हृदय, काटे कटे न रात साँवरे।
चैन नहीं हमको मिला,,बिन मुख निरखे रोज मीत रे,
दिल में पहले रम गया, अब करता क्यों घात साँवरे।
तुम हो ईश्वर जीव हम,कैसे तुलना होय आपसे,
तेरे सन्मुख हे प्रभू, मेरी क्या औकात साँवरे।
गोकुल तज मथुरा चले,छोड़ हमारा साथ आज तुम,
अबला प्रीति न जानती,आप हुये अभिजात साँवरे।
मधुवन अब सूना पड़ा,है गोकुल वीरान साजना,
बिना कन्हैया आपके, मुरझाया है गात साँवरे।
हमें छोड़ मत जाइए,हम मछली तुम नीर मानके,
वियोगिनी के दृग करें,आँसू की बरसात साँवरे।
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चुलियाला छन्द दोहा + गाल, समांत-अरी अपदान्त
मुक्तक
पिया मिलन सजनी सजी,दृग के नीर नहाय आजरी।
पाकर मुख की अग्नि को, भौतिक देह नसाय बावरी।
धाम धरा धन त्याग कर, सजनी चली निराश देख लो,
अंतिम कर्म विधान का, सुत पर दोष लगाय दाग री।।
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आधार छन्द- चुलियाला (दोहा+लललगा)=29 मात्रा
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मुक्तक
मां शारद तव वंदना, लिखूँ सुहाने गीत जगत में।
आय विराजो शीश पर,यह कविकुल की रीत जगत में।
सुमिर गजानन शिव तनय,शुरू करूँ नव कर्म सहज ही,
लक्ष्य साध तन्मय रहो, तब मिलती है जीत जगत में।
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चुलियाला छंद आधारित दोहा +212
प्रथम प्रयास - एक गीतिका
पदांत - साथियों समांत - आन
होते हैं कहते सुना,दीवारों के कान साथियों ।
किस आशय से ये कहा, नहीं सका मैं जान साथियों ।।
प्रचलन में फिर भी चली, यही कहावत खूब आज है।
जो बतला दो तथ्य तो,मानू मैं अहसान साथियों।।
पता सभी को लग गयी,किसी खास को गुप्त रूप से।
बंद कक्ष में जो कही, सबने ली वो मान साथियों।।
लाख छिपाओ मत छिपे, बड़ा अजब ये काम हो गया ।
बौराया मैं फिर रहा,हो कैसे संधान साथियों ।।
बुरा सदा जो चाहते, वही रहे हैं रोज मौज में।
भोग चुका फिर भी वही,करता हर इंसान साथियों ।।
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चुलियाला छंद आधारित गीतिका दोहा + 122
पदांत- यहाँ है समांत-समांत- आम
जनहित में जिसने कभी, किया नहीं कुछ काम, यहाँ है,
इस युग में पाते वही, मान ,प्रतिष्ठा ,नाम, यहाँ है ।
सीख नहीं पाये कभी, जीने की तरकीब, जरा भी,
उल्टी सीधी हरकतें, करते आठों याम यहाँ है।
नहीं देख पाते कभी, अपनी गलती स्वयं, करे जो,
कहीं बता दो आप तो, लगे खींचने चाम, यहाँ है।
चमकीला सा आवरण, नकली ढेरों फूल, लपेटे,
तन पर धारे घूमते, चाहे ऊँचे दाम यहाँ है।
नये मुखौटे धार कर, आते सबके बीच, सदा ही,
ऊपर से लगते भरे, होते खाली जाम, यहाँ है।
खुद को मानें श्रेष्ठतम, दूजे सब हैं हीन बिचारे,
रिश्तों में अपना रहे ,दंड भेद अरु साम, यहाँ है।
सामाजिक उत्थान की, किसने कब परवाह कभी की,
नून तेल के भाव में,जीते सुबहो- शाम, यहाँ है।
चुलियाला छंद अभ्यास के अंतर्गत मुक्तक त्रयी
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दोहा +122 पदांत -करें ----क्या समांत -आत
मौसम के अनुमान में, नहीं रही वो बात , करें क्या !
सूखे की हो घोषणा,हो जाये बरसात , करें क्या!
वैज्ञानिक भी क्या करें, वो भी हैं लाचार, यहाँ तो,
सभी आँकड़े पिट रहे,दिन हो चाहे रात, करें क्या!
(दोहा + 1112) पदांत -जगत में समांत - आर
अगर दया मन में नहीं, सब कुछ है बेकार , जगत में।
भगवन तेरे नाम की, ताकत बड़ी अपार , जगत में।
यत्र तत्र आनंद हो, करें समर्थन प्रेम अमन का,
हो मेहर यदि आपकी, पा लें सुख का सार, जगत में ।
(दोहा + 2111) पदांत - मित्रवर ------ समांत- आस
ऐसे मानव का कभी, करना मत विश्वास, मित्रवर।
पीछे से जो आपका, करता हो उपहास, मित्रवर।
कुछ लोगों का ध्येय है, करना बस व्यवधान रात दिन।
ऐसे साथी वक्त पर, करते सदा निराश, मित्रवर।
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चुलियाला छंद. , दोहा+1211
मुखड़ा पदांत- यहाँ पर/ समांत- अन्द
अंतरा समांत - आम, आंग, आव
पदांत - यकीनन, फटा फट, बुरे जन
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औरों के हित जो जियें, लोग बचे हैं चंद, यहाँ पर।
लगे शेष मानव सभी, खुद से करते द्वंद, यहाँ पर।।
करते कुछ भी हैं नहीं, फिर भी चाहे नाम, यकीनन,
अपनें में घुट घुट रहे,, इक दिन जाते धाम, यकीनन।
जनहित रत समुदाय की,गति बड़ी है मंद , यहाँ पर,
लगे शेष मानव सभी, खुद से करते द्वंद, यहाँ पर।।
कोई आगे बढ़ रहा, खींचे उसकी टाँग , फटा-फट,
बिना बात पैदा करें,कैसी कैसी माँग ,फटा- फट।
ऐसे लोगों की हुई,सब राहें है बंद , यहाँ पर,
लगे शेष मानव सभी, खुद से करते द्वंद, यहाँ पर।।
जिनके मन पलते रहे,सदा कुटिल ही भाव, बुरे जन,
वे हर दिन उठ खेलते, उल्टे सीधे दाव, बुरे जन।
वे दूजों पर डालते, देखो नित नव फंद , यहाँ पर,
लगे शेष मानव सभी, खुद से करते द्वंद, यहाँ पर।।
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(शशि कान्त पाठक, टोंक-राजo)
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विधा- चुलियाला छंद 13+16 (122 )
स्वस्थ रहे काया तभी, रवि से पहले आप उठोगे।
टहलो सुबहो शाम तो, निज मन का संताप हरोगे।
अगर हृदय निष्पाप हो, मन सुंदर खुशहाल रहेगा,
मान मिलेगा जगत में, जो सच संग मिलाप करोगे।
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चुलियाला छंद. 13+16 (122 )
(1)
तन मन संयम से बँधे, सांसें लम्बी मन्द चलेंगी।
रखती श्वास विशेष लय, ज्यों गति वैसा छंद रचेंगी।।
उग्र श्वास विचलित करें, मन में सदा तनाव रखेंगी।
छीने यह मुस्कान को, रह रह मन में द्वंद भरेंगी।।
( 2 )
मन जगता अध्यात्म तब, यदि कोमल व्यवहार हमारा।
हम सब एक समान हैं, सबके प्रति हो प्यार हमारा।।
एक जगह के हैं उपज, समझ जगत परिवार हमारा।
नहीं द्वेष मन का कपट, जीवन का हो सार हमारा।।
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चुलियाला छंद मुक्तक
नहीं कर्म हो अनुर्वर, द्वेष कपट की तोड़ टोकरी।
धागा ले अनुराग की, नेक कर्म से जोड़ टोकरी।
मन को धो सतसंग से, दया भाव की ओढ़ चूनरी ~
प्रणय पुष्प भर कर रखो, मगर दर्प की छोड़ टोकरी।।
चुलियाला छंद दोहा +16(1112 )
कच्चा हो यदि कान तो, चुगली करती शोर बहुत ही।
नैना जब दर्पण बने, नाचे तब मन मोर बहुत ही।
मन चंचल है वायु सम, कठपुतली बन नाच करत है।
कान जीभ की दोस्ती, खींचे मन की डोर बहुत ही।।
दोहा+16 ( 122 )
बद हो या सद्कर्म हो, करे हाथ सब काम हमारा।
अगर न होते पाँव तो, लगे दूर ज्यों धाम हमारा।
संचालक मस्तिष्क है, निर्भर रहे शरीर हमारा।
बड़ी भूमिका पेट की, जिससे बदन ललाम हमारा।।
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चुड़ियाला छंद आधारित मुक्तक पदांत 122
नीर भरे बदरा घिरे, रिमझिम परत फुहार सखी री।
नवल पात तरुवर लदे, बहत सुगन्ध बयार सखी री।
केश सजे मृदु मोगरा,नैनन कजरा धार सुहाना।
माहुर पैंजन पग सजे,करधन हँसुली हार सखी री।
माघ शुक्ल तिथि पंचमी,पावन दिन ऋतुराज तुम्हारे।
सरस्वती वंदन करूँ,सकल सँवारो काज हमारे।
मंद पवन बगिया चले,शीतल तरुवर छाँव सुहानी।
शीत ऋतु निज गेह चली, ग्रीष्म पसारे पाँव दिवानी।
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#1 दोहा +122
माघ शुक्ल तिथि पंचमी,पावन दिन ऋतुराज पधारे।
सरस्वती वंदन करूँ,सकल सँवारो काज हमारे।
श्री गौरी पुत्र विनायक, लंबोदर प्रथमेश सहारे।
गणपति तव वंदन करूँ,मेटो सकल कलेश पुकारे।
#2 दोहा + 212
धूप छाँव सहती रहूँ, सिमरन रुके न नाथ रामजी।
आँखें गर हों नम कभी, सिर पे रखना हाथ रामजी।।
किस विध मूरत मन बसे,किस विध सिमरूँ नाम नाथ हे।
चिंता मन विचलित करे, रसना रटती नाम राम जी।।
#3 दोहा+ 122
नीर भरे बदरा घिरे, रिमझिम परत फुहार सखी री।
नवल पात तरुवर लदे, बहत सुगन्ध बयार सखी री।।
केश सजे मृदु मोगरा,नैनन कजरा धार सुहाना।
माहुर पैंजन पग सजे,खोजत नन्द कुमार सखी री।
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विधा -चुलियाला / चूड़ामणि छंद
विधान - दोहा + 122
चमक रहा संसार में , प्यारा भारत देश हमारा ।
सबको शोभा भा रही , हिमगिरि धोता केश तुम्हारा ।।
कल कल नदियाँ बह रही, सुन्दरता को खूब बढ़ाती ।
हिमगिरि से हो कर विदा , ये सागर में डूब समाती ।।
भू पर हरियाली सजी , लगते इसके भाग सुहाने ।
टेड़ी मेड़ी धार है , बढ़ा रहे सब राग मुहाने ।।
हरियाली भरमार है , सरिता सारी कूल बढ़ाई ।।
खेतों की क्यारी सजी , देते इनमें फूल दिखाई ।।
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विधा - चुलियाला छंद / चूड़ामणि छंद
विधान - दोहा + 5 ( 212)
होली आई फाग ले , कई तरह के रंग हाथ में ।
पिचकारी सब मारते , मचा रहे हुड़दंग साथ में ।।
भाग रहे खलिहान में , छिप जाते कुछ लोग मेड़ में ।
ढूँढ़े तब मिलते नहीं , कई चढ़े दुख भोग पेड़ में ।।
गली गली अब शोर है , रंगों की भरमार हो रही ।
गारा गोबर डालते , आज प्रेम का सार खो रही ।।
फागुन महिना आ गया , होली का त्योहार प्यार का ।
सबके लगा गुलाल अब , खेल करे नर नार मार का ।।
कई तरह का खेल है , लठ्ठ मार त्योहार ये बड़ा ।
पत्थर फेंके लोग कुछ , कोई खाता मार है खड़ा ।।
न्यारे न्यारे हाल हैं , मना रहे कुछ लोग रंग से ।
झूम झूम कर नाचते , कहीं कहीं का योग ढंग से ।।
विधा - चुलियाला / चूडामणि छंदविधान - दोहा + 2111
प्यारा फागुन आ गया , खिलने लगते फूल वृक्ष पर ।
नव नव पल्लव फूटते , सरस बनी अब मूल नीर भर ।।
कोमल कोमल पात हैं , झूम रहे सब संग डाल पर ।
हरियाली अति छा रही , धरती सजती रंग धार कर ।।
मौसम बदले रोज ही , डरा रहा विकराल रूप कर ।
फसल खड़ी खेत में , कृषक हुआ बेहाल छोड़ घर ।।
कभी सुहाना नभ बने ,आता अति आनन्द देख कर ।
उपवन सब खिलने लगे , भौंरे ले मकरन्द पुष्प पर ।।
👇
विधा - गीतिका
आधार - चुलियाला / चूड़ामणि छंद
विधान - दोहा + 1211
जीना सीखो तुम सभी , अपनी अपनी शान बनाकर ।
दुर्लभ जीवन आपका , रखो इसे सब मान बनाकर ।
कर्म बड़े कोई रहे , पाया तन अनमोल यहॉं पर ,
मात पिता की भक्ति कर , इनको तू भगवान बनाकर ।
प्रेम भाव सबसे बड़ा , इसको दिल में धार रहा कर ,
धर्म कर्म की बात कर , इसे बताओ गान बनाकर ।
सत्य मार्ग पर सब चलो ,काँटों की भरमार मिले अति ,
बार बार जीवन कहाँ , सबको दिखा महान बनाकर ।
परहित ही परमार्थ है , त्यागो अपने स्वार्थ सभी जन ,
प्रभु "गिरधारी" ने यहाँ , प्रकट किया इंसान बनाकर ।
👇
विधा - मुक्तक
आधार - चुलियाला / चूड़ामणि छंद
विधान - दोहा + 1121
बिना गंध के फूल की ,महिमा होती अल्प सब दूर ।
बिना गुणों का आदमी , करता रहता गल्प भरपूर ।
शोभा पाते ये नहीं , नहीं रखे नजदीक बदहाल ,
गुण पूजे संसार में , व्यर्थ सभी ये कल्प बिन नूर ।।
पूजा है गुण गान की , बिन गुण सब बेकार जग बीच ।
नफरत करते जन सभी,बिन गुण सब नर नार कह नीच।
पास बिठाते ये नहीं , आयेगा क्या काम कह लोग ,
लालच में जीवन चले , बिना गुणों क्या सार सब कीच ।।
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चुलियाला/ चूड़ामणि छंद
(१३-१६पदांत -लघु गुरु गुरु)
#
कंचन काया कामिनी, अभिलाषा की खास कहानी।
सुंदर सब संसार में, मन को लगती पास सुहानी।।
पूजा इसकी सब करें, साधु-संत फकीर सुवेशा।
वाणी झूठी ना हुईं, उड़ता गगन लकीर हमेशा।।
#
कंचन धोखा जीव को, फाॅंसें माया राह सुहानी।
प्रतिदिन भागी जा रही, मन मानव की चाह सुहानी।।
देखें समझें बात को, मूंदे नयना खास जवानी।
दुविधा में खोई सदा,रहती जब तक पास रवानी।।
#
बात आपकी आपसे, मिली बढ़ाती डाह दुधारा।
मलमल रेशम साथ भी, लगती बेदम बाॅंह नकारा।।
खटपट करती थालियां, होती मानव देह नगारा।
चिकनी चुपड़ी बात से, किसने किसका गेह सुधारा।।
#
नेता जब गांधी बनें, कह जनता को झूठ सयानी।
शेखी स्वयं बघारता,कर जनता में ठूंठ बयानी।
देता धोखा सामने, रह कर के वेचैन हमेशा;
समझी बूझी बात से, काटे अपनी रैन दिवानी।।
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद ( पदांत 122)
-----------
शिक्षक गुण को साध कर, सेवा श्रूषा आज सजाया।
बेची बातें झूठ से, खुद के पथ का काज चलाया।।
अनधन सोना खो गया, खोया अपना राज दिखाया।
काम न आया राह में, अपना खर्चा ताज बचाया।।
**
हरा भरा सावन गया, गया नयन से कंत हमारा।
बढ़ा हिया में शूल अब, हुआ कहां मन संत सहारा।।
बातें सखियों की भली,जब तब बनती पंत किनारा।
देती सुख मुझको यही,खिला खिला सा कंत दुबारा।।
***
आपकी आपकी साधना, सत्य सनातन नूर सजाती।
कंचन काया कामिनी, खुद को ही मजबूर बनाती।
सोचा समझा धर गया,पथ पर मन को लूर सिखाती;
खड़ी मुसीबत सामने, मेरे मन को शूर बनाती।।
****
सबका जीवन जीव सा, जीते हम निज गेह यदा ही।
चाल चले गति साध कर,स्थिर नहीं यह देह सदा ही।।
अद्भुत काया भाॅंप सी, छोड़ चली सब राज यहां है ।
कभी न होती अमर यहां,रहते हैं सब साज जहां है |।
****
👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद
*
मंगल करो गणेश जी, बच्चों से कर बात यहां पर।
हुकुम मानते जीव सब,करे कभी ना घात जहां पर।।
मूषक जैसा जीव भी, ढोता वजन अपार यहां पर।
मीठा मोदक खाद्य ही, मनमाफिक उपचार जहां पर।
*
बिच्छू विष की खान है, पाती सुख का हाथ यहां पर।
साॅंप मोर सब संग ही,खेलें सुख के साथ जहां पर।।
शेर पाल कर मां हॅंसे, बैल रखें शिव नाथ यहां पर।
नहीं द्वेश की भावना, प्रेम तिलक हो माथ यहां पर।।
*
भरा-पुरा परिवार यह, लिए विषमता साथ यहां पर।
विषम विषम है हम सभी, लेकर बोझा माथ जहां पर।।
वो ही यह संसार लख, भव सागर का पाथ यहां पर।
रखे भरोसा आप पर, नयन प्रेम का हाथ जहां पर।।
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चुलियाला छंद
मुक्तक प्रथम-दोहा+212
दूसरा मुक्तक- पदानत 122
छेड़ो वीणा तान माँ, सभी मिटे छल द्वन्द शारदे।
उजियारा अग जग करो, लिखे सभी नव छंद शारदे ,
मंत्र बने सब शब्द वे, ऐसी कर दें आप लेखनी -
हस्त रखें मम शीश पर, मान मुझे मतिमंद शारदे।।
करो न हत्या गर्भ में, व्याकुल सुता पुकार रही है
कमतर मुझको मान कर, क्यों बिटिया को मार रही है।
युग करवट अब ले रहा, बदलो अपनी सोच पुरानी-
दूँगी खुशी अपार मैं, क्यों माँ 'हिम्मत' हार रही है
👇
मुक्तक चुलियाला छंद-दोहा+पदान्त 122, समान्त -आन
व्यथित हृदय जब-जब बने, करें ईश गुणगान सदा ही।
बनते सारे काम भी, धरना प्रभु का ध्यान सदा ही।
लाज बचाता भक्त की, दूर करे सब कष्ट हमारे-
जपना आठों याम ही, रखना नाम जुबान सदा ही।।1।।
मुक्तक - 2
समान्त आस स्वर, पदान्त -212
भले उम्र आई मुझे, प्यारा लगता खास मायका।
कैसे भूँलू मैं उसे, करता पूरी आस मायका।
आँगन सखियाँ गाँव वह, मातु-पिता का प्यार अनूठा-
हर औरत का मानिए, होता है विश्वास मायका।।
👇
चुलियाला छंद मुक्तक-, दोहा+ पदान्त 122
समान्त आर, पदान्त- हमारा
प्रेम बाँटिये हाथ से, धरा बने परिवार हमारा।
सुख-दुख में साथी बने, महक उठे संसार हमारा।
पग-पग पर मंगल रचें, करें आत्म कल्याण स्वयं का-
उठे कदम सब साथ में, प्रेम बने आधार हमारा।।1।।
पदान्त 122
आया पर्व सुहावना, बजा रहे हैं चंग पियाजी।
मलकर हाथ अबीर से, लगा रहे हैं रंग पियाजी।
तन-मन भीगे प्रेम से, चुनरी भी अब लाल हुयी है-
रात -रात भर नाचते, पीकर आये भंग पियाजी।।2।।
बदले सबका अब हृदय, कवि ऐसी तुम तान सुनाओ।
झूठ दिखे तुमको जहाँ, साधो कलम निशान लगाओ।
बिकना पैसों में नहीं, अपना तुम कर्तव्य निभाना-
भूले जो भी राह में, उन्हें धर्म का ज्ञान बताओ।।3।।
👇
चुलियाला छंद, दोहा+ पदान्त -212
समान्त-आन, पदान्त-मातु दो गीतिका-
आयी तेरे द्वार पर, आज एक वरदान मातु दो।
गहन तमस को दूर कर, अधर नवल मुस्कान मातु दो।।
उर के बंधन सब हटें, दूर रहे सब द्वन्द्व वेदना।
सुख से बीते जिंदगी, एक नई पहचान मातु दो।।
तू ही सक्षम है यहाँ, और कौन है बोल दूसरा।
मुक्त गगन में उड सकूँ, ऐसा नया वितान मातु दो।।
ज्ञान ज्योति जगमग करे, शरण मिले बस मातु आपकी।
छंदों से विनती करूँ, ऐसा मुझको ध्यान मातु दो।।
घूम जगत में देखली, तू ही है बस नेक आसरा।
और नहीं कुछ कामना, ऐसा मुझको ज्ञान मातु दो।।
वंदन बारम्बार है, धर दो सिर पर हाथ आप माँ।
'हिम्मत' करती प्रार्थना, मधुर स्वरों की तान मातु दो।।
चूलियाला छंद (मुक्तक) दोहा+ पदान्त1112
समान्त-अंग, पदान्त- समझ ले
मत गुमान कर देह का, पल-पल बदले रंग समझ ले।
अमर इसे जो मानता, उसने पी ली भंग समझ ले।
चलता जिसका रौब था, आज हुआ लाचार दिख रहा-
आत्म तत्व ही है अमर, बस उसका ही ढ़ग समझ ले।।1।।
समान्त-मान, पदान्त-212
नशा नहीं करना कभी, व्यसन बुरा ये मान छोड़िए।
नित्य कलह घर में रहे, लेता है ये जान छोड़िए।
इज्ज़त लगती दाँव पर, रहे न कोई पास मानना-
दुर्गुण इसके जानकर, बनें नहीं बेभान छोड़िए।।2।।
समान्त ओर, पदान्त 1211
कैसा आया काल ये, चले झूठ का शोर यहाँ पर।
सत्य आज लाचार है, कैसे हो शुभ भोर यहाँ पर।
अच्छाई रोती यहाँ, सिसक रही है आज सुनो सब-
छल बल जिसके पास है, दिखलाते वे जोर यहाँ पर।।
👇
2 मुक्तक चुलियाला छंद. दोहा + पदान्त
समान्त-आन, पदान्त 122
मन मेरा माने नहीं, भरता उच्च उड़ान सुनो जी।
समझाए समझे नहीं, ऐसा ये नादान सुनो जी।
बिना डोर ये घूमता, चले सदा अविराम अकेला-
परेशान इससे सभी, क्या सुर क्या इंसान सुनो जी।।1।।
समान्त-आन, पदान्त-1211
उतरी छमछम जब किरण, पक्षी गाए गान मनोहर।
देख उषा हर्षित हुई, किया बड़ा ऐलान मनोहर।
जागेगा जो भी समय, होगा मालामाल सदा वह-
लाभ मिले आरोग्य का, दिखे सदा इंसान मनोहर।।2।।
👇
चुलियाला छंद, मुक्तक
दोहा + पदान्त 1112
पदान्त- जगत में समान्त- ओग स्वर
लाठी जिसके पास है, डरते सारे लोग जगत में।
सत्ता आये हाथ तो, चाहे सारे भोग जगत में।
मेरे सब आधीन हो, मानें मेरी बात सिर झुका-
मनवाने निज बात को करते कई प्रयोग जगत में।।1।।
पदान्त - 212
समान्त- आर स्वर
नाश करे जो पाप का, उत्तम है नवकार मानिए।
सब मंत्रों में श्रेष्ठ है, मुक्ति का आधार मानिए।
मेटे मन की कामना, मंगलदायक मान मंत्र ये-
जाप करो नित उठ सदा, पूर्वों का ये सार मानिए।।
मुक्तक चुलियाला छंद दोहा+पदान्त
समान्त -आन,पदान्त 212
छंद महल का नाम ही, अलग एक पहचान मानिए।
बड़े मिले ज्ञानी यहाँ, बाँटे सबको ज्ञान मानिए।
ठीक करे सब त्रुटियाँ, देते नया निखार छंद को-
करना हमको काम, ऊँची रखना शान मानिए।।
समान्त-आन, पदान्त 1112
मात-पिता अवहेलना, मत कर रे नादान सँभल जा।
आयेगा तेरा समय, ले ले ये संज्ञान सँभल जा।
समय लौटता है सदा, देता है फल हाथ समझ ले-
नहीं भेज आश्रम इन्हें, कहना 'हिम्मत' मान सँभल जा।।
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चुलियाला/चूड़ामणि छंद
विधानः- कुल 29 मात्रा दोहा +122
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फाग उत्सव
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मस्त महीना फाग का, मस्ती का त्योहार सभी का।
बच्चे बूढ़े मस्त सब, ,,, नर-नारी हो प्यार सभी का।।
होली आई रंग ले, तन मन रँगती रंग सभी का।
लाल गुलाबी या हरा, नीला पीला अंग सभी का।।1।।
देखो फागुन मास में, वृद्ध जनों का ढ़ंग निराला।
डोगा छीना जेठ का, बुढ़िया का यह संग निराला।।
याद जवानी आ गई, ,,,, बूढ़े का था होश निराला।
गुत्थम-गुत्था हो गए, बूढ़ जनों का जोश निराला।।2।।
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"मन के मोती"...🖋
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चुलियाला/चूड़ामणि छंद
विधानः- कुल 29 मात्रा दोहा +212
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होली पर्व
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होली का त्योहार यह, नहीं किसी की खैर फाग में।
होता सबमें प्यार है, ,,, नहीं किसी का बैर फाग में।।
मिलते हैं हर तरह के, मीठे ये पकवान फाग में।
बच्चे वृद्ध जवान सब, रखते पूरा ध्यान फाग में।।1।।
नाचें गाएँ गीत सब, खुशी मनाते आप देख लो।
बच्चों का है टोल यह, ढोल नगाड़े थाप देख लो।।
रंगे सबके गाल हैं, ,,,,,,, तन पर सारे रंग देख लो।
उड़ता रंग गुलाल है, सबका यह हुड़दंग देख लो।।2।।
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👇
चुलियाला/चूड़ामणि छंद
विधानः- कुल 29 मात्रा दोहा + 212
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"गीतिका"✍ !! होली का हुड़दंग !!
समांत ः 'अंग' पदांत ः 'देश में''
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✍
देखो चारों ओर ही, 'होली का हुड़दंग' देश में।
उड़े अबीर गुलाल यह, रंगों की हो जंग देश में।।
✍
लेकर आया है खुशी, होली का त्योहार देख लो।
गुत्थम गुत्था हों सभी, ,, बहे रंग की गंग देश में।।1।।
✍
गली गली में शोर है, लोग खेलते फाग देख लो।
बच्चे वृद्ध जवान ये, ,,,,,,, खेलें सारे संग देश में।।2।।
✍
मस्त महीना फाग का, बहती मस्त बयार देख लो।
बरसे रंग फुहार यह, ,,,,, भरती गात उमंग देश में।।3।।
✍
गीत राग मल्हार का, बजता यह संगीत देख लो।
ढ़ोल मजीरे बज रहे, ,, बजते सभी मृदंग देश में।।4।।
✍
लोग लुगाई साथ में, करते खूब धमाल देख लो।
बुढ़िया भी मस्ता गयी, फड़के उसका अंग देश में।।5।।
✍
नाचे बालक मंडली, रंग जमाता नाच देख लो।
मस्ती करते आ गये, चढ़ी सभी को भंग देश में।।6।।
✍
प्रेम प्यार से खेलते, नहीं किसी का बैर देख लो।
जात-पात सब एक हैं, एक सभी का रंग देश में।।7।।
✍
रंग ढ़ंग ब्रज का अलग, होली यह लठमार देख लो।
कृष्ण संग वह राधिका, न्यारा 'रामा' ढ़ंग देश में।।8।।
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"मन के मोती"...🖋
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चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद
दोहा छंद के पदांत में 122
होली के दिन चार है, बजे गली में चंग सखी री।
ढोल- नगाड़े बज रहे, बजते मधुर मृदंग सखी री।।
सब सखियों के साथ में, प्रियतम पीते भंग सखी री।
दूर पिया जब से गए, फीके सारे रंग सखी री।।
चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद
दोहा छंद के पदांत में 1112
समांत अंग पदांत सजन रे
होली के दिन चार है, बजे गली में चंग सजन रे।
ढोल- नगाड़े बज रहे, बजते मधुर मृदंग सजन रे।।
सब सखियों के साथ में, प्रियतम पीते भंग सजन रे।
दूर पिया जब से गए, फीके सारे रंग सजन रे।।
फागण आया झूम के, गाये राग धमाल सजन रे।
मैं तो बिरहन रो रही, ढ़लके आंसू गाल सजन रे।।
रो-रो अंँखियांँ थक गई, हाल हुआ बेहाल सजन रे।
अब साजन आए नहीं, ले जाएगा काल सजन रे।।
अब की जो आए नहीं, कर लूंगी निज घात सजन रे।
साजन बोले फोन पर, सुन ले गोरी बात सजन रे ।।
गोरी बिन जीवन लगे, सावन बिन बरसात सजन रे।
मजबूरी है नौकरी, तड़प कटे हर रात सजन रे ।।
छोड़ सजन दे नौकरी, आजा मेरे पास सजन रे।
मुझसे बढ़कर कौन है,बलम बता दे खास सजन रे।।
दिन-दिन बढ़ती जा रही, पिया मिलन की आस सजन रे।
आजा बालम साथ में, खेले होली रास सजन रे ।।
आया साजन देश में, झूमें गोरी आज सजन रे।
नयन पिया से जब मिले, आई उसको लाज सजन रे।।
निकली जाए जान है, कैसा यह अंदाज सजन रे।
होली खेलें साथ में, छोड़ दे सारे काज सजन रे।।
घूंघट का पट खोल कर, मलमल रँगा गुलाल सजन रे।
पीले-नीले रंग से, भीगे लंबे बाल सजन रे।।
तन मन भीगा प्रेम से,बदल गई अब चाल सजन रे।
नृत्य पिया-गोरी करें, मिला ताल से ताल सजन रे।।
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चुलीयाला छंद. दोहा+2111
दुश्मन से लगने लगे, अपने ही माँ-तात आजकल।
कांटे जैसी ही चुभे, उनकी अच्छी बात आजकल।।
कानों को भाती नहीं, उनकी सच्ची सीख आजकल।
उनके सच्चे बोल, लगते जैसे चीख आजकल।।
कलयुग के इस दौर में , पूछे उन को कौन आजकल।
बन जाते लाचार वें, हो जातें हैं मौन आजकल।।
उनका है जीवन दुखी, हर घर यह हालात आजकल।
लेकर बोझा दर्द का, कटते हैं दिन रात आजकल।।
ताटंक छंद आधारित सृजन
मात्रा भार 30,
16-14 पर यति पदांत गा गा गा
*मैं भारत की नारी हूंँ*
फूल नहीं हूँ शूल नहीं हूंँ, नहीं राख चिंगारी हूँ।
मैं तो बस इतना ही कहती, मैं भारत की नारी हूँ।।
कभी लचीले घूँघट में मैं, शर्मीली सी शरमाई।
कभी युद्ध में बन कर काली, रणचंडी सी गुर्राई।।
शांति अहिंसा का दीपक मैं, कभी बनी तलवारी हूंँ।।
मैं तो बस इतना ही कहती, मैं भारत की नारी हूंँ।
मैं दुर्गा मैं ही लक्ष्मी हूँ, मैं विद्या मैं वाणी हूंँ।
सिर को काट निशानी देती, मैं ऐसी क्षत्राणी हूँ।।
जली आग में विष भी पीकर , आज नहीं बेचारी हूँ ।
मैं तो बस इतना ही कहती, मैं भारत की नारी हूँ।।
कला-ज्ञान खेलों-मेलों में, राजनीति में भी आगे।
प्रेम-विनय का ताना-बाना, बुनती रिश्तों के धागे ।
मुश्किल की हर घड़ियों में मैं, शक्तिपुंज अवतारी हूंँ।
मैं तो बस इतना ही कहती, मैं भारत की नारी हूंँ।।
सुत पर बलिहारी जाती हूंँ, प्रीतम प्राणों से प्यारे।
रहे चिरंजीवी दोनों ही , व्रत उनके हित ही धारे।।
कभी पुकारा सरहद ने तो, कोख-मांँग भी हारी हूंँ।
मैं तो बस इतना ही कहती, मैं भारत की नारी हुंँ।।
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चूलियाला ( चूड़ामणि ) छंद दोहा+ पदान्त 212
शीर्षक -सत्य
सत्य सदा ही जीतता, लगे भले ही देर मानले।
क्षणिक खुशी हो झूठ से, इसमें तनिक न फेर मान ले।।
सत्य अहिंसा त्याग से, जीवन बने महान मान ले।
पालन इनका जो करे, बन जाता भगवान मान ले।।
सत्य धर्म सबसे बड़ा, यह जीवन आधार मान ले।
मजहब कोई भी रहे, सबको यह स्वीकार मान ले।।
हिंदू मुस्लिम सिख सभी, गाते इसका गान मान ले।
सत्य हृदय जिनके रहे, बढ़ती उनकी शान मान ले।।
गीता और कुरान का, एक यही है सार मान ले।
आगम ग्रंथों का यही, बतलाते आधार मान ले।।
सच का जो दे साथ तो, नैया होती पार मान ले।
पग-पग पुण्य निधान हो, सत्य सदा सुख कार मान ले।।
आँच-साँच को है नहीं, पक्का है यह मंत्र मान ले।
शरण सत्य की जो गहे, राज करे सर्वत्र।।मान ले।।
मनमोहक सबको लगे, ऊँचा हो स्थान मान ले।
अधरों पर गूंजे सदा, मधुर सत्य की तान मान ले।।
पाना है यदि सत्य को, करना निज से युद्ध मान ले।।
राह सत्य की जो चले, उसकी आत्मा शुद्ध मान ले।।
सत्य कभी डरता नहीं,कभी न होता क्रुद्ध मान ले।।
पाठ सत्य का जो पढ़ें, होता वही प्रबुद्ध।।मान ले।।
काले बादल झूठ के, छाए चारों ओर मान ले।
सूर्य उगे जब सत्य का, लाये उजली
भोर मान ले।।
पाना शाश्वत सुख तुम्हें, थाम सत्य की डोर मान ले।
तोड़े से टूटे नहीं, कर ले चाहे जोर मान ले।।
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दोहा छंद + पदांत 1211
बड़भागी हम भारती, करें सदा गुणगान यहीं पर ।
देश प्रेम सदभाव का, मिला हमें वरदान यहीं पर ।।
मंदिर के घंटे बजें , मस्जिद करे अजान यहीं पर ।
होली क्रिसमस ईद का,सब मिल रखते मान यहीं पर।।
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विधा - चुलियाला छंद
मात्रा भार 13/16 पदांत 122 समतुकांत
मधुर स्मृतियां झांकतीं, सपनों में नित आन,हमारे ।
खो देती खुलते पलक, अधरों की मुस्कान, सहारे ।।
गर्व यही खुशियां हुईं, वतन हेतु वलिदान, हमारी ।
आँसू पीकर रह गई, जीवन की पहचान, विचारी।।
होली आई संग ले, खुशियों की सौगात, सखी री ।
बजे नगड़िया ढोलकी, सारी-सारी रात, सखी री ।।
साजे थाल गुलाल के, भर पिचकारी रंग,सखी री ।
नाचैं फगुआ ठुमक के, पी भोले की भंग,सखी री ।|
कहें सखीं खेलन चलो, रंग - रँगीली फाग, दुवारे ।
नाचें-गायें गीत मिल, बजा फगुनियां राग, सुखारे ।।
नहीं सखी ! साजन बिना,फीके मन के रंग, हमारे ।
पिया बसे परदेश मैं, खेलूं किसके संग, सहारे ।।
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विधा - चुलियाला छंद
मापनी - 13/11 + 5 पदांत 122
लेख विधाता का अमिट, लेता जब संज्ञान, सखी री
हो जाती है तब विवश, अधरों की मुस्कान, सखी री
अधरों की मुस्कान ने, दिये देश हित प्रान, सखी री
मधुर स्मृतियां झांकतीं,अब सपनों में आन, सखी री
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विधा - चुलियाला छंद का प्रयास समीक्षार्थ प्रस्तुत
मापनी- 13/11 + 5 =29 पदांत 212 ।
बेटी है वरदान प्रभु, दो कुल मध्ये सेतु, बेटियां ।
बसा नया संसार वे, नई सृष्टि का हेतु बेटियां ।।
बेटों से यह कम नहीं,नभ-तल भरें उड़ान बेटियां ।
आने दो भू पर इन्हें, रखें देश का मान, बेटियां ।।
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प्रदत्त-छंदाभ्यास-- चुलियाला छंद
विधा -- चुलियाला छंद मापनी- 122
नव संवत्सर विक्रमी, लाईं अपने संग, भवानी ।
चैत्र मास नवरात्रि की, पावन सुखद उमंग,भवानी।
बाजें ढोल मृदंग डफ, भक्त करें यशगान, भवानी ।
भक्तों की झोली भरें, दे सद्वुधि सद्ज्ञान, भवानी
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चुलियाला छंद, मात्रा भार दोहा + 11111(मुक्तक)
धूमिल रंग गुलाल है, फीका है संसार हमारा।
श्याम सलोने के बिना,सूना है घर द्वार हमारा।
सावन सा फागुन लगे,बरस रही हैं आँख सखी री-
लोग कहे मधुमास है,पतझड़ हुआ बहार हमारा।
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चुलियाला छंद मात्रा 13,16 विधान दोहा + पदांत 212
सत्य अहिंसा से बड़ा,नहीं जगत में धर्म यहाँ है।
क्षमा सत्य वरदान है, सही सत्य शुभ कर्म यहाँ है।
आज यहाँ तो कल वहाँ,एक कहानी आम हुई है।
बढ़ी हुई हैवानियत, हर कोशिश नाकाम हुई है।
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चुलियाला छंद आधारित गीतिका पदांत 212
समांत -आर पदांत -चाहिए
भाईचारा प्रेम ही, होली का आधार चाहिए ।
प्यार और सौहार्द से,मने रंग त्यौहार चाहिए।
बासंती परिवेश है,आओ बाँटे नेह आज से ,
द्वेष भावना दूर हो ,केवल उर में प्यार चाहिए।
हँसी ठिठोली हो भले, मर्यादा के संग ध्यान से,
जो बैठे मन मार के,गल बाँहों का हार चाहिए।
रिश्तों में भी स्नेह का ,भरा हुआ भंडार पूर्ण हो,
मातु पिता जो हैं बड़े, उन सब को सत्कार चाहिए।
कदम बढ़ाएं सोचकर,बदला है परिवेश आज का,
घोर उचक्के घूम रहे, उनसे बस किनार चाहिए।
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चुलियाला छंद 13+16- , 122
समांत -आर -पदांत -मिला है , गीतिका
जीवन सुंदर बाग यह, कुदरत का उपहार मिला है ।
दया धर्म ईमान का, अनुपम यह आधार मिला है।
जीवन श्रम है भ्रम नहीं, करना है संघर्ष खुशी से,
बिन श्रम जीवन में कभी,कहाँ सुखी संसार मिला है।
बेटा -बेटी द्वय हीं , मातु पिता के अंश कहाते ,
बेटी से पर क्यों अधिक , बेटों को सत्कार मिला है।
पाकर धन बल रूप को,होना मत मगरूर कभी भी,
सच्चा धन पाता जिन्हें, सुंदर सा व्यवहार मिला है।
ठोकर से हम सीख लें,जीवन में सद्ज्ञान बढ़ाना,
नेह हृदय बाँटे बिना, कहाँ किसी को प्यार मिला है ।
-चुलियाला छंद यति -122 पर
करना है शुभ कर्म को,जीवन यह दिन चार मिला है।
दुख- सुख जीवन अंग है, समझें यह गल हार मिला है।
होना नहीं अधीर बस,जीवन यह संघर्ष सभी का,
राजा हो या रंक दुख ,सब को हीं भरमार मिला है ।
कथनी में हैं ज़हर घुला, कर्मों में छल छद्म भरा तो,
उनका कुछ मत पूछिए,मन में जिनके खार मिला है।
अहम भाव का जब कभी,चढ़ने लगे बुखार निहारें,
मन के अंदर है भरा,सुंदर सद् व्यवहार मिला है।
मन में कलुष विचार को, कोशिश करिए दूर रहे वो,
कर्मों का फल मान लें, सच में अपरंपार मिला है।
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मुक्तक दोहे + १२२
चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा,नव संवत्सर भोर सुहाना।
भारतीय नववर्ष का, गूँज रहा है शोर सुहाना ।
मंगलमय नववर्ष का,लोग मनाते हर्ष खुशी से -
माँ अम्बा का आगमन,सुंदर है संयोग सुहाना।
मां तेरे उपकार का, कौन चुकाए मोल बताओ।
इतना देती अंबिका, कौन सका है तोल बताओ।।
माँ तेरा उपकार है, निभा रहें हम प्रीति भवानी।
घर-घर में नवरात्र का,गाते मिलकर गीत भवानी ।।
केसरिया ध्वज से सजा,है सारा घर द्वार यहाँ का।
झंडा जय श्रीराम से ,सज्जित सब दरबार यहाँ का।।
दिवस बड़ा अनमोल है,छाया बहु उल्लास दिखा है ।
माता के नवरात्र में, हर-घर में उपवास दिखा है ।।
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चुलियाला छंद - मुक्तक (13,16 )पदांत 2111
भगत चले कैलाश जब, रिमझिम पड़े फुहार बोल बम।
सावन में हिमपात हो, सिहरन भरे बयार बोल बम।
देह कष्ट व्यापे नहीं, शिव दर्शन की चाह बोल बम।
उर आनंदित हो गया, देखा शिव परिवार बोल बम।
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गीतिका -
छंद-चुलियाला /चूड़ामणि
मात्रा विधान -29 मात्रा 13,11 +1211
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लिये तिरंगा हाथ में, जय भारत दें बोल यही सच।
नाव डुबाते देश की, खुले न जब तक पोल यही सच।
कुरसी पाने के लिये, एड़ी-चोटी जोर लगा कर,
बड़े बड़े कर वायदे, खूब पीटते ढोल यही सच।
जनता की सेवा करें, खाते शपथ जनाब सभी तब,
कुरसी जैसे ही मिले, करने लगते झोल यही सच।
दंगा संसद में करे, पढ़े लिखे ये जीव लगें कब,
याद रखें भूलें नहीं , भवन पवित् अनमोल यही सच।
बेटी बचाओ भाषण, देते हैं दिन रात सदा सब,
बेटी लुटती नित यहाँ, पर ये रहें अडोल यही सच।
कुरसी प्यारी देश से, जिसमें अटकी जान अभी तक,
कथनी करनी एक हो, तो बदले भूगोल यही सच।
नमन शहीदों को सदा, खुद जल करें उजास धरा पर,
नेता जी कुछ सीखिये, रह जाएगा मोल यही सच।।
चुलियाला छंद - दोहा+ (122)
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सावन आया है सखी, भोले का त्योहार मनायें।
सदा सुहागन रह सखी, कर सोलह श्रृंगार मनायें।
सावन में शिवलिंग पर, करके हम जलधार मनायें।
आशुतोष भोले बड़े, कर दें बेड़ा पार मनायें।
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चुलियाला छंद , मुक्तक ,१३,१६+१२२
छीन रहे हर लेख को, देकर अपना नाम दुलारा।
यही रहे हालात तो, क्या होगा अंजाम हमारा।
इतना लिखते रोज हम,फिर भी हुआ न नाम सहारा।
हर लेखक है बिक रहा , गुठली के ही दाम बिचारा।
मुक्तक..
अति की बढ़ती लालसा , पैसे का व्यापार नकारा।
लेखक सबसे कह रहा,पढ़ लो मुझको यार दुबारा।
मन की खाली गागरी ,हर पल छलकत जाय हमारी-
यहाँ ज्ञान है खोखला, करती जल की धार किनारा।
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चुलियाला छंद १३,१६(१२२)
रंगों की होली सजी, रंग -बिरंगे रंग खिले हैं।
ले खुशियों के रंग ये,दिल मतवाले संग मिले हैं।
लगे रंग की धार ज्यों, पिचकारी से भंग चले हैं।
उड़े गुलाल, अबीर भी, हुए सजीले ढंग भले हैं।
चुलियाला छंद ,1112 के रूप मे
माँ की ममता से भरा ,आँचल का हर कोर जगत में।
सागर से गहरा रहे, इसका ओर न छोर जगत में।
जीवन देती है सदा , इसकी निर्मल धूप जगत में।
आँचल से ही सज रहा ,सबका सुंदर रूप जगत में।
जीवन मुख है खोलता,आँचल के ही द्वार जगत में।
आँचल में ही बस रहा ,हर जीवन आधार जगत में।
माटी ममता की लिये,आँचल है इक गाँव जगत में।
सच्चा जीवन है पले,आँचल की ही छाँव जगत में।
आँचल के सब हैं ऋणीं,चुकता कहाँ उधार जगत में।
क्या छोटे अरु क्या बड़े, हैं सभी कर्जदार जगत में।
यह आँचल ही दे रहा , उचित सभी संस्कार जगत में।
माँ का इक आँचल भला, सबसे पहला प्यार जगत में।
विधा.. गीत, चुलियाला छंद आधारित
जनम-जनम का साथ भी, करता है उपकार सजन रे।
कैसा बैरी हो गया, इस विरहन का प्यार सजन रे।
कहे कलंकी भी ननद, देवर देता लात धडम से।
शीश सदा ही नत किया, फिर भी हैं हालात नरम से।
दिया मान सम्मान ही, नहीं मिला सत्कार सजन रे।
कैसा बैरी हो गया, इस विरहन का प्यार सजन रे।
चाँद रात धुँधली हुई, स्वप्न बने हैं शूल कदम के।
सपना तो सपना रहा, झूठे सारे फूल सनम के।
सपने बैरी हो गये , मिली सदा दुत्कार सजन रे।
कैसा बैरी हो गया, इस विरहन का प्यार सजन रे।
विकट दुर्दशा हो गई, जीते जी अब नाथ सनम के।
माँ को भी भूली रही , सब हैं भूले साथ जनम के।
आँचल की छैंया नहीं , हुआ गलत व्यवहार सजन रे।
कैसा बैरी हो गया, इस विरहन का प्यार सजन रे।
हाथों-हाथों खेलती, रहा न कोई सार मरम से।
फूलों पर पाला मुझे ,मिला जनक का प्यार कसम से।
आज यहांँ है दीखता , काँटों का आधार सजन रे।
कैसा बैरी हो गया, इस विरहन का प्यार सजन रे।
मन में उठती हूक तो, धीरज करे कमाल किधर से।
उठे सिसकियाँ रोज ही, हुआ बुरा है हाल इधर से।
अश्रु सदा बहते रहे , किया न उल्टा वार सजन रे।
कैसा बैरी हो गया, इस विरहन का प्यार सजन रे।
चुलियाला छंद आधारित मुक्तक
भारी वर्षा चैत में, डूबे खेत खलिहान हाय रे।
चौपट होती सब फ़सल,रोता आज किसान हाय रे।
सबको है जो पोषता, आज उसे ही भूख खाय रे-
यही प्राकृतिक आपदा, लगती मौत समान हाय रे।
करते श्रम जब वर्ष भर,तब है मिले अनाज हाय रे।
बैठे रोते आज खेत में, आँसू करते राज हाय रे।
किस्मत की खेती खरी, खड़ी-खड़ी बेकार जाय रे-
ऐसी थी क्या दुश्मनी , हमपर गरजी गाज हाय रे।
बची-खुची जो है फसल ,वो भी ले लो आप हाय रे।
श्रम पर पानी फिर गया, जीवन करे विलाप हाय रे।
गरज-गरज कर मेघ भी, सबको रहे रुलाय शान से-
कभी बने वरदान जो , आज बने अभिशाप हाय रे।
उपमान छंद आधारित सृजन
मेरा जीवन खूब था , उस प्यारे घर में।
जाने की आदत बनी ,उस प्यारे दर में।
अपनापन है वारता,यह घर पल भर में।
साथ निभाता यह सदा, दुखों के सफर में।
सुंदर से सामान की, है याद पुरानी।
कुछ परियों की बात वो,जो कहती नानी।
बचपन की अठखेलियाँ, जो गढ़ें कहानी।
जीवन में जिनका कभी,तब रहा न सानी।
वो मामूली खेल भी , आज रुलाते हैं।
आकर सपनों में सदा, वो भरमाते हैं।
बाँधे सब संस्कार जो,आज सिखाते हैं।
मकां पुराने हो सभी, घर बन जाते हैं।
अनामिका कली
जयपुर, राजस्थान
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चुलियाला छंद. मात्रा 13,16, विधान दोहा + पदांत 212
फागुन आया साँवरे, हुए रँगीले रंग नैन में।
ह्रदय बाँवरा हो रहा,सजे सभी है अंग चैन में।
भर पिचकारी रंग से,खेल रहे उल्लास प्यार से।
फागुन के त्यौहार को,बाँधें रंग विश्वास धार से।।
डूब फाग के रंग में,गाओ फगुआ गीत गान भी
ढोलक मृदंग झाल से,डोल रहा मन मीत जान भी।।
होली के त्यौहार में, मतवालो का जोर शोर है ।
ऋतु वसंत में देखिए ,नाचे चारों ओर मोर है |।
नागेश्वरी चेन्नई ✍️👇
छंद महल , मासिक हिंदी ई पत्रिका , माह मार्च 2023
विधा - चुलियाला छंद का प्रयास समीक्षार्थ प्रस्तुत
मापनी- 13/11 + 5 =29 पदांत 212 ।
*बेटी*
बेटी घर की शान है ,ईश्वर का उपहार मानते।
उभय कुलों की मान से,लक्ष्मी का अवतार मानते ।।
सृष्टि का आधार है,नारी पर मत नाज छोड़ना।
भारत का अभिमान है,धरा गगन को आज जोड़ना।।
रानी बिटिया भाग्य से, मिलती है यह जान लो सभी।
शिक्षा से होता सदा,बेटी का उत्थान भी तभी।।
शिक्षित होकर ही पहन,गहना रूपी ज्ञान से सभी।
पढना लिखना है तुम्हें,निज विकास संज्ञान लो तभी।।
सुता पिता की जान है,नहीं कभी भी हार मानती।
करती सबसे नेह भी,परहित का उपकार जानती।।
बिटिया घर के बाग को,शुद्ध धार से प्यार साधती।
पत्नी बहना मातु का,हर रिश्ते में तार बाँधती।।
नागेश्वरी चेन्नई ✍️~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
चुलियाला छंद. मात्रा 13,16, विधान दोहा + पदांत 122
जली आग में होलिका, बचे भक्त प्रहलाद बिचारे।
नारायण भगवान को, करते रहते याद दुलारे।।
खेले होली प्यार से, तब से देखो लोग खुशी से-
आते रिश्तेदार घर, दहन होलिका बाद हमारे।।
होली के त्यौहार पर, मिलते अपने यार पुराने।
जो भी रूठे लोग हैं, जाओ उनके द्वार मनाने।।
होली पर अच्छा लगे, करें प्यार से बात सभी से-
नफरत से तो दूर सब, होते रिश्तेदार बिगाने।।
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चुड़ियाला छंद आधारित मुक्तक
चुलियाला छंद. मात्रा 13,16, विधान दोहा + पदांत 122
माँ की जो सेवा करे, अच्छा जग में लोग कहेंगे।
माँ के आशीर्वाद से, सारे सफल प्रयोग रहेंगे।।
सर पर माँ का हाथ हो, मुश्किल भी न संग रहेगी-
प्रभु की बरसेगी कृपा, नहीं रहेंगे रोग ढहेंगे।।
पिता अगर आकाश है, माता धरा समान हमारी।
जो इनकी पूजा करे, रहें सभी इंसान सुखारी।।
सेवा से माँ बाप की, खुश रहते हैं कृष्ण कन्हैया-
कष्ट अगर दोगे इन्हें, दे तुमको संतान तुम्हारी।।
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चुललियाला छंदाधारित गीतिका
पिचकारी भर रंग से, दी राधा पर छोड़ कन्हैया।
अब मत डालो रंग तन, कह राधा कर जोड़ कन्हैया।।
भीग-भीग कर रंग में, तबियत हुई खराब हमारी,
पहले से ही दर्द है, पंजा नहीं मरोड़ कन्हैया।
अपनी तो उर्जा घटी, नहीं बढ़ें ये पैर अगाड़ी,
तुम में काफी शक्ति है, नहीं तुम्हारी होड़ कन्हैया।
बचपन के जो भी सखा, आये हैं जो साथ तुम्हारे,
मोड़ो तुम अपनी तरफ, मेरी ओर न मोड़ कन्हैया।
'अत्री' यदि माने नहीं, तुम राधा की बात मुरारी,
अपनी तुमसे दोस्ती, तब मैं दूँगी तोड़ कन्हैया।
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चुलियाला छंद आधारित गीतिका
माता मेरी शारदे, कुंद कलम की धार हुई है।
इसीलिए तो लेखनी, की धीमी रफ्तार हुई है।।
अगर नहीं माँ तुम सुनो, और कौन फिर बात सुनेगा,
पार लगाओ नाव माँ, पड़ी बीच मझधार हुई है।
जगें नहीं यदि ठीक लेखनी, कवि सिर को दिन रात धुनेगा,
सोच-सोच कर मातु अब, तबियत भी बेकार हुई है।
बिन तेरे आशीष के, नहीं निकलते शब्द किसी के,
जिस पर हो तेरी कृपा, शब्दों की भरमार हुई है।
सुमिरन जब मैंने नहीं, माता तेरा नाम किया तो,
तब माता मेरी कलम, बहुत अधिक लाचार हुई है।
जब माता की हो दुआ, तन मन ने आनंद उठाया,
एक अनोखी शक्ति तब, अंतर्मन संचार हुई है।
हे माँ वीणा वादिनी, मन में मेरे शब्द तुम्हारे,
आये शब्द जुबान पर, तब पैदा झंकार हुई है।
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चुलियाला छंद आधारित मुक्तक
आयेंगी नवरात में, माता शेर सवार द्वार पर।
ले पूजा का थाल तू, माँ का कर सत्कार द्वार पर।।
बरसेगी माँ की कृपा, जला मनुज तू ज्योति मातु की-
सुना मातु की भेंट तू, लेकर सँग परिवार द्वार पर।।
मनोकामना पूर्ण हों, कर ले माँ का ध्यान बाबरे।
धन से तुझको लाद दें, बढ़ जायेगी शान बाबरे।।
तुझको मांँ ने दान दीं, जो भी तेरे पास चीज हैं-
दिल से अब तू मान ले, माता का अहसान बाबरे।।
चुलियाला छंद आधारित गीतिका
पहले जैसा अब नहीं, लोगों का व्यवहार देख लो।
नफरत की परतें जमीं, नजर न आता प्यार देख लो।।
जगी स्वारथ की भावना, परहित की अब सोच सो रही,
खिसक रहा विश्वास का, नीचे से आधार देख लो।
दुष्ट लोग बढ़ने लगे, करें पाप के काम रोज ही,
धरती माता पर बढ़ा, है पापों का भार देख लो।
ऐसे ही चलता रहा, आयेगा वह काल जल्द ही,
घट जायेगा जब यहाँ, सज्जन का आकार देख लो।
बाजारों में लूटते, हैं नारी की चैन आदमी,
दूर बैठकर देखता, झपटमार सरदार देख लो।
भरे पाप का एक दिन, घड़ा नहीं अब देर मीत रे,
शीघ्र रसातल में चला, जायेगा संसार देख लो।
झूठे की 'अत्री' सुनें, सत्य खड़ा चुपचाप देखता,
झूठा पाता मान है, सच्चे को फटकार देख लो।
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रचना विधा - चुलियाला छ्न्द(चूड़ामणि छ्न्द)
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चरण वंदना तक करें,हो स्वारथ की बात गजब हैं।
मौका मिलते ही करें,छिपकर वे प्रतिघात गजब हैं॥
दिनभर उपकारी बड़े,दिखे रात में जात गजब हैं।
सह जाते शह को मगर,टूटे मिलते मात गजब हैं॥
छ्न्द -चूड़ामणि छंद मुक्तक
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फूल कोपलें सज गये,जैसे वंदनवार सलोने।
सुरभि हुई सुरभित सुनो,फागुन आये द्वार सलोने॥
कूक रही है कोकिला,महके पेड़ रसाल लगे है ।
मौसम भी चहका हुआ,रंगों के त्यौहार सलोने॥
छ्न्द -चूड़ामणि छ्न्द
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कोई भी मजहब नहीं,अमन चैन अपवाद आज भी।
सबका एक सवाल है,क्यों फैला उन्माद आज भी॥
मानवता को मारकर,करते क्यों विस्तार आज भी।
यह तो निश्चय मानिये, वे सच्चे मक्कार आज भी॥
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चुलियाला ( चूड़ामणि ) छन्द
दोहा = 13 + 11+ 5 = 29. पदान्त - 122
1 )
गण-अधिपति,गणनायका,गौरीसुत गणराज पधारो।
विघ्नहरो , मंगल करो , हम विपदा में काज सँवारो।।
नैया है मझधार में , कर दो बेड़ा पार हमारा।
अन्देशा तूफान का , गिरने वाली गाज सँभारो।।
~~~~~~~~~~
2 )
नहीं सुरक्षित नार क्यों, पिता पुत्र के गाँव कभी भी।
धर्मराज खुद देखिये , लगा रहे हैं दाँव अभी भी।।
हिरणी सी भयभीत है , पग-पग पर दे घात दिखाई।
पीहर; पी- घर तो मिला , मगर मिले ना ठाँव कहीं भी।।
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3 )
चले पेड़ की शाख़ से , जीर्ण हुए जब पात स्वदेशा।
करतीं तब नव कोंपलें , टहनी से यह बात हमेशा।।
कहतीं जीवन चक्र में , किसे प्राप्त अमरत्व हुआ है।
मृत्यु द्वार में एक दिन, करता जर्जर गात प्रवेशा।।
चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद पर आधारित सृजन
दोहा + १२२
विषय - नारी
अति संवेदनशील है ,नारी- मन की थाह अनूठी
मिलें नेह के बोल तो , दिखलाती है राह अनूठी
हाड़ - मांस की वे नहीं , केवल संज्ञा एक सुनो जी
है उनके वात्सल्य में , हर इक की परवाह अनूठी
२.
एक दिवस के नाम पर , मत दीजे सम्मान कभी भी
नहीं आश्रिता जानकर , खुद बनिए बलवान कभी भी
जननी ,भार्या, बेटियाँ , हरतीं नर के त्राण सदा ही
फिर क्यों हों पाखण्ड के , झूठ - मूठ के नीर कभी भी
चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद पर आधारित सृजन
दोहा + १२२, विषय - रिश्ते
[ १ ]
कच्चे घर विश्वास के, ढहती सी दे प्रीत दिखाई
स्वारथ के तूफ़ान से , रिश्ते दें भयभीत दिखाई
रिश्तों को देते रहें , अपनेपन की खाद हमेशा
वरना जब विपदा घनी, पड़ते कहीं न मीत दिखाई
[ २ ]
विनम्रता की बोलियाँ , भाषा का परिधान बनेगी
सहजीवन की भावना , रिश्तों का अभिमान बनेगी
रखा मृदुल यदि आचरण, किया नहीं हो दर्प कभी तो
बाद मृत्यु इनसान की , वही अमिट पहचान बनेगी
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छंद चुलियाला_दोहे के अंत में पाँच मात्रा १२२लगाकर
समान्त आरे।
मोहन की छवि देखकर, उपजा मन अनुराग हमारे ।
ढोल मँजीरा ताश सँग,सखियाँ गायें फाग सुखारे ।
राधा लेकर आ गई,रंग भाग चल भाग किनारे।
बचने की सब सोचते, हृदय सभी का श्याम पुकारे।
दोहे में,१२२जोड़कर
पहले छंद में
समान्त आरी और आई
दूसरे में २१२जोड़कर समान्त अते और आव में
*
बीच भँवर में नाव है , मोहन मदन मुरार हमारी।
लगे किनारे इसलिए, खड़े हुए हैं द्वार बिहारी।
अपने भक्तों की सदा, तुमने गिरधर लाज बचाई।
दीन दुखी निर्वल खड़े , हम भी देखो आज कन्हाई।
१
कैसे नैया पार हो ,तुम बिन मदन मुरार सोचते।
कृपा तुम्हारी चाहिए,तब हो सब उद्धार बोलते ।
दंभ लोभ अज्ञान की, प्रभु जी है भरमार नाव में ।
कृपा करो भगवान तुम,हो जाये मत हार ताव में।
२
छंद चुलियाला
भूल नहीं सकता कभी,माँ तेरे उपकार सही में।
तूने यह जीवन दिया, तुझसे है संसार सही में।
करती तू उपकार ही,दूर करे हर खार सदा माँ।
भरती है भण्डार तू, करती है उद्धार सदा माँ।
१
माँ तेरे उपकार से,बने जगत में शान हमारी।
वरद हस्त रख शीश पर,हरती माँ अभिमान हमारी।
जगदाती जगदम्बिका,जग की पालनहार भवानी।
भक्त खड़े हैं द्वार पर,कर देना उस पार भवानी ।
(१)
दर्श दिखा मातेश्वरी, भक्त खड़े हैं द्वार भवानी।
कर दे पूरी कामना,मन से रही पुकार दिवानी ।
बढता ही माँ जा रहा,जग में अत्याचार तुम्हारे।
दुख हर लो अवतार लो, दूर करो मांँ खार हमारे।
१
दिव्य दरश माँ का हुआ, स्वप्न हुआ साकार सत्य है।
मन आनन्दित हो गया, मिला सुभग उपहार सत्य है।
शंख, चक्र, गल हार था, शीश चमकता ताज मातु के ।
माथे पे चंदा सजा,कमर कौंधनी आज मातु के।
२
चुलियाला छंद
दोहे में पाँच मात्रा (राम जी)१२२
मिटे अनट अबरेब सब,दूर रहे संताप प्रभो जी ।
इसी कामना से करें,,राम नाम का जाप प्रभो जी
कर सकते बस आप ही,हर मुश्किल आसान प्रभो जी।
कृपा हमें मिलती रहे,यह दिल का अरमान प्रभो जी।
१
दीनबन्धु दातार हो,पूजे सब संसार प्रभो जी।
विनय भाव से कह रहे,कर देना भव पार प्रभो जी।
हमें अटल विश्वास है,और प्रेम भरपूर प्रभो जी।
अपने भक्तों का सभी , कर देते दुख दूर प्रभो जी।
२
मंजु मित्तल 'मंजुल'
👇
छंद उपमान
१३/१०मात्रा पर यति
अंत चौकल दो दो समतुकान्त पद
*
किसको यहाँ रहना सदा, सबको ही जाना।
सफल जिन्दगी के लिए, ईश नाम गाना।
जीत सको सबके हृदय, मीठा ही बोलो।
जो बोलो तुझको सदा, तुम पहले तोलो।
*
दर्शन पाऊँ आपका,मन की अभिलाषा।
जीवन की मेरे !प्रभो,बदले परिभाषा।
तुम बिन भगवन जिन्दगी,सदा अधूरी है।
हर आशा प्रभु आपसे,मन की पूरी है।
*
भगवन अपना आपसे, जन्मों का नाता।
शरण रहें हम आपकी,हे!सुख के दाता।
कृपा बिना प्रभु आपकी,कब जीवन चलता।
कर्म नहीं इंसान का, कोई भी फलता।
*
रखते हो प्रभु आप ही, हर जन का खाता।
कर्म करे जैसा मनुज, वैसा फल पाता।
आलस ओढ़े जो यहाँ,दिनभर हैं सोते।
पीछे रहते वो सदा,सब कुछ हैं खोते।
*
कृपा बिना प्रभु आपकी,कब कुछ है मिलता।
जीवन में सुख का कभी,सरसिज कब खिलता।
चरण शरण जो आपकी, रहे करे वन्दन।
उस मानव की जिन्दगी,बन जाती चन्दन।
मंजु मित्तल मंजुल
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चुलियाला छंद-आधारित गीतिका
समान्त-आम पदान्त -मिलेगा
***
सुमिरन कर ले श्याम का, देख तुझे आराम मिलेगा |
दर्शन दीनानाथ का, तुझे सुबह युत शाम मिलेगा || 1
सारे जग को भूलकर, अपने प्रभु से प्रीत लगा ले |
थामा प्रभु का हाथ जो, सुख वैभव औ नाम मिलेगा || 2
क्यूँ चिंतित बेकार में, जब मोहन संग सदा हैं |
डोर सौंप गोविन्द को, सरल हुआ सब काम मिलेगा || 3
मानुष रखना याद तू, इस जीवन का भेद सदा ही |
कर्म किया जैसा यहाँ, वैसा ही परिणाम मिलेगा || 4
कैसी भी आए घड़ी, मत मोहन को भूल मनुज तू |
किया श्याम का ध्यान जो, प्रभु का पावन धाम मिलेगा || 5
***
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#चुलियाला (#चूड़ामणि )छंद - गीतिका
विधान - दोहा + पंच मात्रा (122)
समांत - आग , पदांत - रहेंगें
जलने वाले जल रहे , जलकर भी वह आग रहेगें |
पर सज्जन के मन सदा, सबको ही अनुराग रहेगें |
उन्नति का मिलता शिखर, चढ़ने का ही लक्ष्य रहेगा ,
पड़े फफोलें अब जिसे , उनको आगे दाग रहेगें |
मिले साँप जब सामने , डसने का ही काम करेगा ,
दाँत टूटते ही वहाँ , अंदर ही तब झाग रहेगें |
काम चुगल का देखना , आकर सबका काम बिगाड़ें,
कमी खोजते ही रहें , कपटी काले काग रहेगें |
सदा तड़फते वह रहें , #राना उनका हाल सुनो जी ,
जो हँसकर ही अब चलें , शुचिता के अनुभाग रहेगें |
***
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चुलियाला छंद पदांत गुरु लघु गुरु 2 ,1, 2 ( एक प्रयास)
================================
होली आयी रंग की , पर्व आज दमदार जानिए ।
नर नारी सब नाचते , पड़ती रंग फुहार मानिए ।
मस्ती में डूबे सभी , मलते रंग गुलाल देखते ।
भूले सारी वेदना , सुंदर शुचिमय ख्याल लेखते ।।
चुलियाला छंद दोहा विधान पदांत 122
=================================
सत्य पराजित हो नहीं , ऐसी सबकी सोच निराली ।
लिये सहारा झूठ का , देते मरहम मोच सवाली ।
सत्य झूठ के बीच में , फँसती दुनिया आज दिवानी।
कहें स्वार्थी झूठ सच , झूठा इसका राज कहानी ।
चुलियाला छंद दोहा विधान पदांत 122
बहुत दिनों से जल रही , होली हिन्दुस्तान जवानों।
जला न मन का पाप अब, रचिए नया विधान किसानों।
जागृत करें समाज को , चलें नीति की राह सयानों।
मिली चेतना यदि हमें , बढ़ी मुक्ति मन चाह दिवानों।।
चुलियाला छंद
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मंदिर मस्जिद एक से , पूजा और अजान राम जी ।
श्रद्धा भक्ति अपार अब , पूजें वेद कुरान रामजी ।।
अमन चैन जिनको नही , आता रास सुजान राम जी ।
करें कलह उन्माद सब , भोगे कष्ट प्रजान राम जी ।।
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विधान दोहा+यगण. "होली"
होली अपने देश में, रंगों का त्योहार मनायें।
रंग लगाकर के सभी, सब लोगों से प्यार बढ़ायें।।
रंग अबीर गुलाल से, सबको अपना मीत बनायें।
एक साथ मिलके सभी,फाग-राग के गीत सुनायें।।
जाति-पाति के भेद को,दूर भगा अवरोध मिटायें।
सबके दिल में प्रेम का,स्नेह-भाव के बोध जगायें।।
त्याग द्वेष दुर्भाव को,सबसे स्नेहिल भाव दिखायें।
सारे अपने लोग हैं, ऐसा ही सद्भाव बसायें।।
भाँग - ठंढई पीस कर,पीते जन रसभंग हमारे।
मादकता जब सिर चढ़े,करें सभी तब जंग पुकारे।।
आओ - आओ पोत दें, सभी करें हुड़दंग करारे।
अरि के शिकवे भूल कर, रंग पोतते अंग निहारे।।
चलो होलिका को सभी,मिलके यारों आग जलाने।
मनमुटाव सब मिटाकर, सबसे है अनुराग बनाने।।
रंजिश - बंदिश तोड़ दें,शत्रु-भाव को त्याग पुराने।
गायें ढोलक बजाकर, प्रेम-गीत अरु फाग सुहाने।।
चुलियाला (चूड़ामणि) छंद (दोहा छंद+1112)
गीतिका
बाबा जी वह ईश हैं,जो करते कल्याण जगत में।
पावन मन से जो भजे,देते दुख से त्राण जगत में।।
परमेश्वर वह एक हैं, सभी देव हैं भक्त अवनि पे,
ऊर्जा पथ प्रभु से मिले,होते सभी सशक्त जगत में।।
श्री राधारमण प्रभु जी,अतिशय पावन नाम जगत में।
महादेव शिव स्वयं हैं,अद्भुत अनुपम धाम जगत में।
निखिल विश्व को देखते,सबको आठो याम भवन से,
धन्य करौली - धाम है, करते सभी प्रणाम जगत में।
एक दिवस का कर हवन,बनतें सारे काम जगत में।
रोग-भोग सब दूर हों,जीवन हो अभिराम जगत में।
आस्था अरु विश्वास से,मिलते हैं शिव ईश सहज ही,
आशुतोष हैं शिव बड़े, साथ शक्ति जगदीश जगत में।
आश्रम लवकुश नाम है,कहे जन मुक्तिधाम जगत में।
माँ कामाख्या की कृपा, मिलती प्रातः शाम जगत में।
श्रद्धा दृढ़ अवलंब से, शिव,माँ हैं आराध्य मनुज के,
पावन साधन से सभी,इह सध जाते साध्य जगत में।
👇
चुलियाला(चूड़ामणि )छंद दोहा+212
चुलियाला(चूड़ामणि )छंद दोहा+212
कंचन काया कामिनी,कुसुमित कलित सुअंग सर्वथा।
मोहे मम मस्तिष्क मन, मोहित रती - अनंग सर्वथा।
मधुर - मधुर मधुमास में, फूल खिलें चहुओर सर्वथा।
फूल सदृश वनिता लगे, करतीं भाव - विभोर सर्वथा।।
कानन कूके कोकिला, मन को करे प्रसन्न सर्वथा।
सरस सुखद स्वर संगिनी, घोले रस आसन्न सर्वथा।।
सरस सुहावन सौम्य सी,सुरभित बहे समीर सर्वथा।
तिय तन तस तोषित करे,सींचे सुरभि शरीर सर्वथा।।
गाल गुलाबी गेंद सी ,मधुर मृदुल मुस्कान सर्वथा।
नैन नशीली नाज़नीं, खींचे सबका ध्यान सर्वथा।।
अप्रतिम आभा अधर ज्यों,पंखुड़ि लगें गुलाब सर्वथा।
चन्द्र - विंदु शुभ भाल पे, जैसे सरिता आब सर्वथा।।
कृष्ण केश घन घटा सी,निशा सदृश चहुओर सर्वथा।
मुखमंडल मुद मोहिनी,ज्यों कर तड़ित अजोर सर्वथा।
ताप मिटे ज्यों अवनि की, वर्षा हो घनघोर सर्वथा।
तोषित तन तरुणी करे, होकर भाव-विभोर सर्वथा।।
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गीतिका ~ छंद- चुलियाला ( मात्राएँ- 29 दोहा + 212)
हर्ष लुटाती है सदा,अधरों की मुस्कान होलिका,
प्रेम और सद्भाव की, सुंदरतम पहचान होलिका।
-
भेद भाव की भीति को,करे नष्ट सायास पर्व ये,
गले मिलाती प्रेम से,निर्धन क्या धनवान होलिका।
-
टूटे रिश्ते जोड़ कर,रचती अद्भुत नेह शृंखला ,
ज्वाल धवल है व्योम तक,ऊँची भरे उड़ान होलिका।
-
विविध रूप मतभेद के,कभी नहीं दृष्टव्य हैं कहीं ,
सजी- धजी नवरंग में, है स्वदेश की जान होलिका।
-
भाईचारा,एकता,देती नव संदेश राष्ट्र को,
समता में ममता बड़ी , कहे न करें गुमान होलिका।
-
ढफ, मृदंग ढोलक बजे, हुरियारों की भीड़ नाचती,
रंग- पर्व अभिमान है,रास रंग की खान होलिका।
गीतिका ~
(छंद- चुलियाला, 29 मात्राएँ -13, 16, चरणांत - 1112)
🙏
बिना प्रेम जीवन कठिन, सारा कुछ निस्सार समझना,
बहे सरस सलिला सदा ,मृदुल स्नेह की धार समझना !
-
क्रोध,कलुष, विद्वेष को, रंच न पाए त्याग अगर तो,
ऐसे मानव सृष्टि के, अनाहूत हैं भार समझना !
-
अपकर्मो की चाशनी, दें बतरस में घोल चतुर जो,
छद्म हँसी सँग बाँटते ,शूलों का उपहार समझना I
-
चाहे सुमन खिलाइए ,या बबूल प्रतिकूल चुभन के,
शब्दों की यह वाटिका, वाणी का उपकार समझना !
-
इन्हें न हलके जानिये, अश्रु बिन्दु अनमोल पलक के,
शुष्क दृगों को सींच ये, करते हैं मनुहार समझना !
-
सत्कर्मों का पुण्य-फल, पाते सदा सुजान सहज ही,
हृदयांतर तीरथ बसे , उर प्रयाग, हरिद्वार समझना !
-
मुख पर आभा तेज की,शुभ्रिम,उज्ज्वल भाल चमकता ,
संत वही जो कर गया,जगती का उद्धार ,समझना !
^
गीतिका
`````````````````
( चुलियाला छंदाधारित , दोहा + 212)गीतिका
*
जीवन की शैली नई, बदली है पहचान देखिए ,
बच्चे बूढ़े हो गए, बूढ़े हुए जवान देखिए।
-
घर की मुर्गी शेर अब ,शेर हो गया ढेर देख लो,
छोटे-छोटे खींचते, बड़े बड़ों के कान देखिए।
-
ना काहू से दोस्ती ,अब न किसी से बैर राखिए,
मोबायल में बंद है, पूरा एक मकान देखिए।
-
आना-जाना ठप हुआ, आभासी नेटवर्क जोर का,
घर बैठे ही आ रहा , उँगली पर सामान देखिए।
-
दुनियादारी में निपुण, अंकगणित में फेल हो गए,
राजनीति में पास अब, सारे चतुर सुजान देखिए।
___ प्रो.विश्वम्भर शुक्ल, लखनऊ✍️👇
छन्द - चुलियाला (विधान - दोहा +2111)
^
गीतिका ~
◆
उथल पुथल पुरजोर है ,चर्चित हुए चुनाव आजकल,
बालू में तैरा रहे,लोग इन दिनों नाव आजकल।
-
सबसे आगे कौन जो, चले व्यंग्य के तीर तानकर,
धूल चटा सद्भाव को, चढ़ा शिखर दुर्भाव आजकल।
-
लोग धकेलें गर्त में, जो चलते निर्भीक राह पर,
निंदा आभारी हुई ,जारी हैं प्रस्ताव आजकल ।
-
चंदन वाले वृक्ष से, लिपटाए कुछ व्याल ढाँपकर,
अब सबको द्रष्टव्य है , विष का सतत प्रभाव आजकल।
-
अपशब्दों की दौड़ में ,लोकतंत्र है पस्त हाँफकर,
आत्म-मुग्ध पढ़ते नहीं, कोई श्रेष्ठ सुझाव आजकल।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
चूलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित मुक्तक:-
विधान- दोहा + 5 (212)
समस्त आत्मीय जनों को रंगोत्सव की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🙏🙏🌹
प्रेम और सौहार्द का , रंगों का त्योहार होलिका ।
भाई-चारा बाँधती , प्रेम भरा उद्गार होलिका।।
हंँसी-ठिठोली से भरी , होली रस बौछार प्रेम की ~
बोझिल से इस काल में , आशान्वित आधार होलिका ।।
फागुन प्रेम उमंग का , खुशियों का है मेल साथियों ।
देता नित आनन्द ही , रंगों का यह खेल साथियों ।।
स्वागत प्रेमिल पर्व का , सब हिल मिलकर साथ में करें ~
पुष्पित कुसुमित हो सदा , अमर प्रेम की बेल साथियों ।।
👇
चुलियाला ( चूड़ामणि ) छंद #गीत_सृजन दोहा+ पदान्त 1112
आफत में जीवन हुआ , हमें बचा लो आन ससुर जी ।
ये जो बेटी आपकी , निशदिन खाती जान ससुर जी ।।
रोज जगाता हूंँ उसे , देकर प्याला चाय गरम सा ।
अब मुझको लगने लगा , यही काम बस हाय धरम सा ।।
मेरी कुछ चिंता नहीं , बस मेकप पर ध्यान ससुर जी ।
ये जो बेटी आपकी , निशदिन खाती जान ससुर जी ।। ,,,,,,
चाहे जब पीटा करे , बिगड़े जो लघु काम सहज ही ।
बेलन डंडा चीमटा , मारे सुबह शाम महज ही ।।
सूख - सूख कांटा हुआ , उड़े हवा में प्रान ससुर जी ।
ये जो बेटी आपकी, निशदिन खाती जान ससुर जी ।। ,,,,
खर्चे पर खर्चा करे , जिसे देख मम सांस निकलती ।
खाने में अव्वल रहे , खड़े- खड़े ही ग्रास निगलती ।।
ऑटो में बनती नहीं , क्विंटल का सामान ससुर जी ।
ये जो बेटी आपकी , निशदिन खाती जान ससुर जी ।। ,,,
मैं धरती सा शीत हूंँ , वो जलती नित तेज तपन में ।
हाथ रखूं तो दे झिड़क , देखी है बस सेज सपन में ।।
मेरी कुछ सुनती नहीं , अपनी खींचे तान ससुर जी ।
ये जो बेटी आपकी , निशदिन खाती जान ससुर जी ।। ,,,,
क्रमशः
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
चुलियाला/चूड़ामणि छंद पर आधारित गीतिका:-
विधान-13,11+ 5 (दोहा + 212)
चित्त निरोधक साधना , आलौकिक अनुराग साँवरे l
जड़ता मदनामृत विकल , सुखद फाग के भाग साँवरे ll
होली रंग अबीर से , स्वागत मित्र सुजान साथियों ,
फाग भाग्य अनुराग रस, अनुपम चित्रण फाग साँवरे ll
मृदुल मृदुल अहसास में, अनुपम प्रिय संयोग साध लो ,
स्वर्णिम बेला फाग की , कामी भोग विराग साँवरे ll
अन्तर्मन हरि हर सदन , योगी का संसार ज्ञान है
भक्तिभाव मन में रहे, पंकज पंक तड़ाग साँवरे ll
अस्त दिवाकर हो रहा , अनुपम कांति निहार आज का
रंग बिरंगी जिंदगी , देख रहा तरु काग साँवरे ll
👇
चुलियाला (चूड़ामणि) छंद दोहा+२१११मूल छंद मुहावरों मे प्रयोग करते हुए ---
=======
तीन पाँच करते रहे, चिड़िया चुग गइ खेत वर्षभर l
नौ दो ग्यारह हो गयी , रहे उड़ावत रेत मित्रवर ll
खेत नहीं है इंच भर , नाम धरे महिपाल ज्ञानधर l
सूर वीर खुद को कहे , रण मे होते खेत सालभर ll
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
चूड़ामणि छंद चुतष्पदी दोहा + 212
संग चलूँ तेरे सजन, चलते रहना हाथ थाम के।
संँग में जैसे जानकी, रही वनों में साथ राम के
जनम जनम का साथ है, कहते संत सुजान मान लो।
वरूँ तुम्हें ही हर जनम, मैंने ली है ठान जान लो।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#चुलियाला छंद = ( 13/11 + पदांत 212
सब के मन सद्भाव हो, सबके मन विश्वास रामजी ।
बॅ॑धे प्रेम की डोर फिर, सबका करे विकास रामजी ।।
सुगम सरल जीवन बने, दुनिया आए रास रामजी ।
होंगी खुशियां हर जगह, मन में रख तू आस रामजी ।।
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चुलियाला छंदाधारित मुक्तक व छंद मुक्तक (दोहा+212)
जमा किया हमने बहुत, जीवन भर सामान ढेर सा।
समा लिया हमने हृदय, कितना था अभिमान ढेर सा।
अंत समय नजदीक था,सोंचा क्या हम लाभ पा सके -
तब जा कर आया समझ, क्यों झेला अपमान ढेर सा।
********
छंद ( दोहा + 1211)
बोते रहें बबूल हम,पा न सकें हम आम कभी फिर,
छोड़ दिये थे जो यहां,पूरे हुए न काम कभी फिर।
राम नाम जपते रहें,तो न हुए बदनाम कभी फिर,
बसा लिया मन में उन्हें,दूर हुए कब राम कभी फिर।
रंगोत्सव की छंद महल परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
चुलियाला छंदाधारित गीतिका ( दोहा+122)
भर कर हृदय उमंग से,डालो सब पर रंग जरा सा,
होली का त्यौहार है,खेलो मिल कर संग जरा सा।
उड़ता गगन गुलाल है, धरती भी अब लाल हुई है,
भूलो सभी मलाल को,रहो न अब तो तंग जरा सा।
बदल गया जग आज है,सुधरे सारे काज अभी तो,
बदलो अपनी सोच को,बदलो अपना ढंग जरा सा।
मस्त ढोल की थाप है,रहे सभी हैं नाच नचाते,
भोगो इस आनंद को,पी कर अब तो भंग जरा सा।
रंगों का माहौल है, रंगों की ही धूम मची है,
इन रंगों में रंग कर,कर दो सबको दंग जरा सा।
चुलियाला छंदाधारित गीतिका (दोहा+ 212)
प्रभु प्रेम से मिला हमें, सुंदर सा उपहार जिंदगी,
कर देती यह तो कभी, स्वप्न सभी साकार जिंदगी।
मौत होती सदा अटल, रहना क्यों भयभीत चाहिए,
इस सच को पहचान कर,देती हरदम प्यार जिंदगी।
भला बुरा जो भी किया,वह हमको स्वीकार आज हो,
फिर तो देखें हम सदा,करें नहीं प्रतिकार जिंदगी।
सुख दुख दोनों ही रहें, जीवन के दो रंग साथियों,
हर हालत में मानती, प्रभु का ही आभार जिंदगी।
रिश्तों की होती परख,मिलते हैं जब कष्ट ढेर से,
फितरत पर ऐसी रही, जोड़े टूटे तार जिंदगी।
*******
चुलियाला छंदाधारित गीतिका ( दोहा+ 122 )
समांत -आग, पदांत -सभी के
मन हो पछतावा अगर,धुल जाते फिर दाग सभी के,
चलते आठों याम ही, कितने हैं खटराग सभी के।
हार मानता जो नहीं,मिलती उसको जीत सदा ही,
मात यहां जो मान ले,वही डुबाता भाग सभी के।
लालच ईर्ष्या मोह से, रहता है बेहाल जमाना,
इनसे बचने के लिए,आवश्यक हैं त्याग सभी के।
भाई भाई से लड़े,अहं करे टकराव सदा क्यों,
आत्मा में बैठे हुए, कितने काले नाग सभी के।
आपस में मिल कर रहें, रखें न मन में बैर कभी भी,
ऐसा कर के भाग्य तो,तय है जाना जाग सभी के।
चुलियाला छंदाधारित गीतिका (दोहा +122)
समांत-आर,पदांत-सदा ही
माता के दरबार में, झूठ न बोलो यार सदा ही,
वरना फिर तो व्यर्थ है,करना जय जय कार सदा ही।
देवी दृष्टि अचूक है,याद रखो यह बात जरा सी,
पकड़ेंगी हर झूठ को,कर देंगी लाचार सदा ही।
त्रिभुवन की हैं स्वामिनी,कोमल है स्वभाव उन्हीं का,
जीव जगत पर हो कृपा,महिमा रही अपार सदा ही।
जितनी माॅं करुणामयी, उतना ही है क्रोध दिखाती,
चंडी रूप धरें अगर, अनुचित हो व्यवहार सदा ही ।
भक्ति भावना से करो,उनका प्रतिदिन जाप यहां जो,
आशीषों की हो सतत,फिर तुम पर बौछार सदा ही।
चुलियाला छंद सृजन
आ कर बैठो पास तो, मानेंगे आभार तुम्हारा,
हमने चाहा है सदा,देखो केवल प्यार तुम्हारा।
सबके ही अंदाज हैं,अलग सदा अंदाज हमारा,
तेरे दिल पर तो सदा,रहना है बस राज हमारा।
ले कर प्रभु का नाम ही, करते हैं सब काम सदा ही,
इस हृदय में बसे हुए, हैं केवल प्रभु राम सदा ही।
आजाओ प्रभु आज फिर,बिगड़ रही हर बात अभी तो,
केवल कष्टों से भरे, मेरे हैं दिन रात अभी तो।
चुलियाला छंदाधारित गीतिका (दोहा+212)
समांत-आर , पदांत- राम का
पावन पुण्य प्रसंग है, धरती पर अवतार राम का,
जीव जगत मानें सभी, हरदम ही उपकार राम का।
राम नाम के जाप से,कट जाते हैं पाप आपके,
दया भाव से है भरा, देखो यह भंडार राम का।
अहंकार टिकता नहीं,बात सदा यह सत्य मान लो,
विनय भाव परिपूर्ण है, मित्रों हर संस्कार राम का।
एक राम को साध लो,जग को लोगे साध देखना,
सारी माया राम की,सारा ही संसार राम का।
जग पाता है आसरा,राम नाम के पुण्य धाम में,
सृष्टि सदा है राम की,और सभी संघार राम का।
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चुलियाला छंद, 13,11,5
आई होली रंग की, खेल रहे ले जोश हुरीले
पीकर प्याली भंग की,खो बैठे हैं होश नशीले
नशा चढ़ा है भंग का, लोग रहे हैं झूम नशे में
बरबस रंग लगा रहे, बचे रहे निर्दोष कबीले
होली के दिन आप यों, करो नहीं तकरार राधिके
होड़ लगा कर देख लो,मान न सकते हार राधिके
कब से आस लगा रहे, आये जब मधुमास माह के
मिलकर होली खेलते, बचना है बेकार राधिके
चुलियाला छंद. 13+11 +पदांत गुरु लघु गुरु
बीत चली है अब उमर ,मत करना अफसोस बाबरे |
झूठी माया है जगत, क्यों कर भरना कोष रावरे ||
ऊँचे रहती यहाँ मंजिले , जाते हैं सब छूट गांँवरे |
बंधु मित्र भाई सभी, कर. जाते हैं लूट मार रे ||
चुलियाला छंद. 13+11 +पदांत लघु लघु लघु गुरु
भाव भरे भगवान को, करते हैं जो याद लगन से |
दीन हीन का ध्यान कर , सुनते हैं फरियाद कथन से ||
सुमिरन करने से मिटे , जग के सारे फंद भजन से |
नित दिन पूजा पाठ से, मिटते सारे द्वंद यजन से ||
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चूड़ामणि/चुलियाला छंद. 212
आईं माता भवन में ,लाल चुनरिया धार पाटले
भक्त निराले कर रहे, बारबार जयकार पाटले
खन खन खनकें चूड़ियाँ, पग पायल झनकार दामिनी
ऐड़ी चुम्बित केश हैं, कंठ मौक्तिक हार. दामिनी
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चुलियाला छंद (प्रथम प्रयास ) , मुक्तक 13,16
तन्हा- तन्हा दिल जला , तन्हा जले चिराग रात में ।
तन्हाई में हिज्र के, तड़पे दिल के भाग रात में ।
साहिल पर था चश्म के, अश्कों का सैलाब आँख में -
करवट - करवट वस्ल की, सुलगी धीमी आग रात में ।
चुलियाला छंद मुक्तक
गजब हुस्न के जलजले,गजब हुस्न का ख्वाब सुहाना ।
होश हमारे ले गया,कातिल शोख शबाब सुहाना।
वो आँखों की दिल्लगी, उल्फत का अन्दाज निराला-
पढ़ पाया है हुस्न का , कौन हसीन जवाब सुहाना ।
चुलियाला छंद मुक्तक 13,16-212
मौन रैन में हो गए, मौन सभी प्रतिरोध प्यार में ।
तिमिर ओट में मौन के, पूर्ण हुए अनुरोध प्यार में ।
नजरों से नजरें करें, गुपचुप कुछ संवाद मौन में -
धीरे -धीरे मौन हुए, अर्पण युक्त विरोध प्यार में ।
****
प्यासी -प्यासी जिन्दगी, प्यासे इसके तीर रात में ।
आँखों से अविरल बहे, इच्छाओं का नीर रात में ।
पूरे होते ही नहीं, जीवन के अरमान प्यार में -
अतृप्ति की अन्त में, बहुत सताती पीर रात में ।
चुलियाला छंद मुक्तक 13,16-212
अधरों पर विचरित करे, प्रथम प्रणय आनन्द रात का।
अद्भुत होता प्रेम का, मन्द - मन्द मकरंद रात का।
चिर जीवित होती सदा, बाहुबंध की भोर प्यार की-
साँसों को सुरभित करे ,प्रथम छुअन के छन्द रात का।
* * * * *
हर आहट में आस है, हर आहट विश्वास प्यार की ।
हर आहट की ओट में, जीवित अतृप्त प्यास प्यार की।
आहट में रहता सदा, जीवित यह संसार प्रीत का -
साँसें लेती जिन्दगी , आहट में है आस प्यार की ।
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चुलियाला छंद. मापनी - दोहा + 1112
तोड़ स्वप्न सारे चले, जाने तुम किस देश सजनवा।
भीगे नैना याद में, रहते उलझे केश सजनवा।
तरु पर नव पल्लव खिले, चमन फूल मुस्काय सजनवा।
पीली सरसों खेत में, लहर-लहर लहराय सजनवा।
उन्मादी मौसम हुआ, हुआ शीत का अंत सजनवा।
हरी-भरी धरती हुई, आया झूम बसंत सजनवा।
प्रणय निवेदन अलि करें, देख कली शरमाय सजनवा।
देख मचलता यूॅं उन्हें, मन मेरा मुरझाय सजनवा।
तुम बिन सूना है लगे, अब तो ये संसार सजनवा।
कब तक बातें मैं करूॅं, खुद को खुद पर वार सजनवा।
बाट जोहती मैं खड़ी, कब से तेरे द्वार सजनवा।
बिन तेरे लगता मुझे, जीना अब दुश्वार सजनवा।
हवा बसंती छेड़ के, दिल के मेरे तार सजनवा।
करने को है अब चली, तुमसे नैनन चार सजनवा।
रोकूॅं कैसे मैं भला, उस पगली की राह सजनवा।
बड़े दिनों के बाद है, आया फागुन माह सजनवा।
संग हवा के भेज दे, दिल का तू पैगाम सजनवा।
हरपल तड़पत मैं फिरूॅं, भज मन तेरा नाम सजनवा।
दीप मिलन के मैं जला, तुझ से करूॅं गुहार सजनवा।
छोड़ धरा परदेस की, आजा घर के द्वार सजनवा।
चुलियाला छंद आधारित मुक्तक , दोहा + १२२
जग में लोगों से मिलन, होता है संयोग सखा रे।
हर मानव को मान दे, समझ न उसको रोग सखा रे।
ईश मान हर मर्त्य को, देव तुल्य तू पूज धरा पे,
मानवता की राह पे, लगा सभी से जोग सखा रे।
वयोवृद्ध रहते जहाॅं, वहाॅं बसें भगवान सखा रे।
वरद हस्त जब-जब उठे, समझ उसे वरदान सखा रे।
मानवता की राह है, सब राहों में शीर्ष सदा से ,
जो माने इस बात को, श्रेष्ठ वही इंसान सखा रे।
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विधा- चुलियाला छंद आधारित मुक्तक. दोहा+122
पूजन वंदन मातु का, हाथ जोड़ अरदास करें हम |
दीपक बाती ज्योति से, ध्यान जाप विश्वास करें हम ||
चरण - शरण में हम खड़े, उर में भर उत्साह लिए कुछ -
चैत्र महीना आ गया, माता से ही आस करें हम ||
विधा- चूड़ामणि छंद. पदांत 122
बासंती अनुराग है, भौरें छेड़े राग सखी री |
रजनी गंधा पुष्प से, महका मेरा बाग सखी री ||
बीती होली प्रेम की, नयनों में अरमान सजाएँ |
थिरक- थिरक पग झूम के, मनवा गाए तान सखी री ||
महकी- महकी ये हवा, देती है संदेश सखी री |
आमो पर है मंजरी, मौसम हैं विशेष सखी री ||
सेमर फूले लाल अब, छाई मस्त बहार सखी री |
सरसों तीसी पुष्प के, सतरंगी संसार सखी री ||
चुलियाला छंद- दोहा +212
सकल जगत यह राम का, बड़ा निराला धाम देखिए |
जन- जन के तन- मन बसे, सुंदर पावन नाम देखिए ||
भजले प्यारे राम को, मिटता कष्ट अपार देखिए |
मन से सुमिरन जो करे, भव से देते तार देखिए ||
बढ़ता जब - जब पाप तो, लेते प्रभु अवतार देखिए |
भक्तों के दुख को सदा, हर लेते सुखसार देखिए ||
राम नाम धन पोटली, पास रखे खुशहाल देखिए |
हर पल हर संग में, चलते हैं महिपाल देखिए ||
अवध नगर शुभ धाम में, लिए जन्म भगवान देखिए |
सिया वरण कर आप ने, दिया धरा मुसकान देखिए ||
भाई- भाई में प्यार था, अद्भुत भरत मिलाप देखिए |
मातु- पिता के वचन पर, खुद झेला संताप देखिए ||
रावण वध करके किया, उसका भी उद्धार देखिए |
साधु संत भी मानते, सदा राम उपकार देखिए ||
सुख- दुख चलते साथ में, दिया यही संदेश देखिए |
रामायण के पाठ से, बदले नित परिवेश देखिए ||
चूड़ामणि छंद!१३/११/५ मात्रा
दूर कभी मत जाइए , रहिए हरदम पास सजन जी!
लौट समय से आइए , करिए नहीं निराश सजन जी!
कौन तीसरा है यहाँ , तेरे - मेरे बीच सजन जी!
तुम्हें छोड़ जाऊँ कहाँ , कहलाऊँ क्या नीच सजन जी!
आते हैं परदेश में , दुख के मारे लोग सजन जी!
यहाँ कहाँ सुख भोगते , नदी - नाव संयोग सजन जी!
सेवा करना धर्म है , कभी न होगी चूक सजन जी!
रो लूँगी चुपचाप ही , अगर उठेगी हूक सजन जी!
शुक- पिक करते शोर हैं , फली आम की डाल सजन जी!
मुझ को भी दे दीजिए , एक बाल - गोपाल सजन जी!
देख रही श्री कृष्ण के , अद्भुत क्रिया-कलाप सजन जी!
नंदन वन मेरा हुआ , मुक्त शोक - संताप सजन जी!
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विधा -चूडामणि छंद. विधान -दोहा+ पांच मात्रा ( 122
नार पालती है जगत, समझे नहीं ज़हान कभी भी।
नारी अत्याचार क्यों,समझ नार उपकार अभी भी।।
कर्म भूमि यह है जगत,कर्म मनुज का धर्म सदा है।
सब वेदों में बात यह, यही शास्त्र ने मर्म कहा है।।
छंद महल मंच, चूड़ामणि छंद -दोहा+लगागा
कभी किसी भी रोज अब, नहीं रहे दीवार हमारे ।
अपना सच्चा साथ है, जन्म जन्म का प्यार हमारे।।
सदा रहा है इस जगत, सच्चा ही व्यवहार हमारे।
नहीं स्वार्थ की भावना, त्याग प्रेम आधार हमारे।।
रहे हमेशा इस जगत, त्याग समर्पण भाव हमारे।
चाह सदा दिल से रहे, सदा बसे समभाव हमारे।।
सदा जगत में मीत ये , रहा प्रेम अनुबंध हमारे।
बहती पुष्प बयार सम,आती मधुर सुगंध हमारे ||
चूड़ामणि छंद विधान -दोहा+लगागा या गालगा
मोल नहीं संसार में, झुका सत्य से आज जमाना।
ओढें चोला लोग अब, कभी नजरिया राज न जाना।।
जीते आखिर सत्य जग,सदा सत्य की जीत लगाना।
जानों निश्चित जीत अब, करो नही विपरीत बहाना।।
सदा खरा है स्वर्ण सम, सदा सत्य हित नीर बहाना।
झूठ कपट छल छंद को, सदा यहां से दूर भगाना।।
ओढे झूठ नकाब जग , नहीं बहक कर जाल बिछाना।
मानें जग सच मोल अब, पहन सत्य की ढाल व बाना।
विधा -चूड़ामणि छंद विधान -दोहा+122 या 212
चिड़िया बैठी डाल पर, करती शिशु की फ़िक्र जगत में।
नार करें यदि फिक्र घर,कौन करे ये जिक्र जगत में।।
विधवा नारी बैठ घर, करती सोच विचार जगत में।
कैसे भर लूं पेट घर,मुझ पर सारा भार जगत में।
तोता बैठा डाल पर, उड़ने को तैयार जगत में।
तभी अचानक आ गया,करने बाज शिकार जगत में।।
जिस पल जाये बाज ये, उड़कर अपने ठांव जगत में ।
जब चूजों को छोड़कर, जाऊं कोई गांव जगत में।।
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चुलियाला छंद आधारित गीत
जय-जय अग्नीश्वर अनघ, अति सुंदर हर नाम आपके।
जय-जय अकिलेश्वर अमल, शांति सदा दे धाम आपके ।।
ओंकारेश्वर-गौर-शिव , पावन मन को ईश तारते ।
भक्तों की ही भक्ति पर , सब कुछ निज जगदीश वारते।।
तारक-नागेश्वर तवस , अर्थ गढ़े अविराम आपके।
जय-जय अकिलेश्वर अनघ,शांति सदा दे धाम आपके।।
गौरीवल्लभ-प्रभु-प्रथम, रामेश्वर ही सत्य शर्व है।
हर-शाश्वत शितिकंठ से, होते जग में पूर्ण पर्व है।।
रट ले रे मन !सोम को , कह दो आठों याम आपके ।
जय-जय अकिलेश्वर अमल,शांति सदा दे धाम आपके ।।
सर्वेश्वर सर्वज्ञ भव , विश्वेश्वर से चले श्वास है।
मूल मंत्र जग मुक्ति का , होता शिव के सदा पास है ।।
पूजे कण-कण थल-गगन, अंबा-ब्रह्मा-श्याम आपके।
जय-जय अकिलेश्वर अमल,शांति सदा दे धाम आपके।।
चुलियाला छंद आधारित गीत
हरिवल्लभि ही शुभ-प्रदा,माँ लक्ष्मी की प्रीत बसाऊँ।
पद्म-गंधिनी-पद्मिनी, माता पर मैं गीत सुनाऊँ।।
शुभा-पुण्य-गंधा-रमा ,सत्या विमला नाम तुम्हारे ।
तारे माँ परमात्मिका , पूर्ण करे माँ काम हमारे।।
कंचन माँ के नाम हर,शब्दों की यह रीत दिखाऊँ।
पद्म-गंधिनी-पद्मिनी , माता पर मैं गीत सुनाऊँ।।
चंद्ररुपा देवी शिवा , माता हरिणी सिद्धि सदा है ।
मातु विष्णुपत्नी-जया,करूँ जयति जय मातु प्रदा है ।।
वाचि-विभा-वसुधारिणी,शब्द-पुहुप हर पीत चढ़ाऊँ।
पद्म-गंधिनी-पद्मिनी, माता पर मैं गीत सुनाऊँ।।
कामाक्षी-भुवनेश्वरी , मंगला देवी द्वार खड़ी हूँ।
शांता तुष्टि यशस्विनी ,दर्शन पाने आज अड़ी हूँ।।
शब्दांजलि दे तूलिका, भाव-भजन को मीत बताऊँ।
पद्म-गंधिनी-पद्मिनी, माता पर मैं गीत सुनाऊँ।।
चुलियाला छंदर- जाना ज़िंदगी , सच्चा मानव धर्म मान लो।
धरती पर छूटे सभी , साथ चलेगा कर्म जान लो।।
सुंदर कर लो कर्म प्रिय,जीवन का तुम अर्थ भान लो।
मत रख नफरत-क्रोध तुम,कभी न हो क्षण व्यर्थ ठान लो।
जलती तब ही 'वर्तिका',जब हो तम का भान हृदय में।
दंभी के हर शब्द से, दिखता है अभिमान हृदय में।।
आया अहं कुबेर में , धन का मिथक घमंड बसाया।
तोड़ा दम्भ गणेश ने, देकर गहरा दंड पढ़ाया।।
मुक्तक
मन भटका जब बुद्ध का ,खोजे घट-घट ज्ञान जगत् में।
रोग बुढ़ापा मृत्यु से , कब जीता धनवान जगत् में।
दुख पीड़ा ये जग सहे, नहीं कहीं भी शांति यहाँ है--
माया ठगनी जग ठगे, करते वह ऐलान जगत् में।।
चुलियाला छंद
मैं सागर की बूँद हूँ,यही हुआ अहसास सदा है।
सागर है परमात्मा,सब उनसे आभास सदा है।।
बनकर-मिटती देह है ,परमेश्वर में वास सदा है।
प्राप्त देह में लक्ष्य है,जीवन-उत्सव खास सदा है।।
चार दिवस की ज़िंदगी, चार चाँदनी रात जान लो।
उफ्फ चार ये लोग ही,चार सुनाये बात मान लो।।
चार लोग को छोड़कर,जी लो दिन ये चार सदा ही।
चार बात से चार दिन,भी मन हो बीमार सदा ही।।
चुलियाला छंद आधारित मुक्तक
ज्ञानी का तो ज्ञान ही, होता है श्रृंगार सदा ही।
खींचे अपने ओर वह,सबको ही हर बार सदा ही।
प्रज्ञा दमके रत्न सम,स्वर्णिम हो मुस्कान जहाँ भी--
नैनों की गम्भीरता, कहे सत्य का सार सदा ही।।
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चुलियाला छंद. शिल्प~ दोहा+ ।ऽऽ(१२२)
माता मुझको ज्ञान दो ,लिक्खूँ मोहक गीत सदा ही।
भक्ति भाव मन में रहे, चरणों में हो प्रीत सदा ही।।
स्वांस स्वांस में तू बसे , जग में पाऊं जीत सदा ही।
सब को बांटू प्रेम रस , बनूं सभी का मीत सदा ही।।
पाकर के तेरी कृपा , मूक होता वाचाल सदा ही।
निज सेवक का लीजिए, मेरी माता हाल सदा ही।
शरणागत है "आस" माँ,देना अपना प्यार सदा ही।
बाधाएँ हर जन्म की , देना सारी टार सदा ही।।
👇
चुलियाला छंद. शिल्प~ दोहा+ 1112
हरि ने हरि को देखकर, किया हृदय संतोष विहस के।
गरज गरज तड़पें बहुत , खोया अपना होश विहस के।।
मन की मन में रह गयी ,खोया मन संतोष तरस के।
प्यासे प्राणी चाटते , देखा मैंने ओस तरस के।।
सूख सरोवर तब गये , जब घन छोड़ा साथ पवन का।
पंक धंसे पंकज दिखे , मिले नहीं अब साथ पवन का।।
गगन बदरिया सज रही , तरुवर करें हुलास सजन जी।
सजनी नाचे झूम के , कहती है मधुमास सजन जी।।
👇
चुलियाला छंद (चूड़ामणि छंद)
पाप कर्म जो भी करें,देता उसको दण्ड विधाता।
रुष्ट बहुत अब हो रहा,देख देख पाखण्ड विधाता।।
मानव कर सदकार्य ले , खुश हो कर विश्वास विधाता।
भजन करो नित प्रात यदि,पूर्ण करें हर आस विधाता।।
चुलियाला छंद
बीत शीत ऋतु अब गई,बढ़ता सूरज ताप जगत में।
भक्ति भावना बढ़ रही,घटता जाता पाप जगत में।।
पौधे धानी वस्त्र में,वन उपवन का साज जगत में।
नित विकास पथ पर बढ़े,भारत देखो आज जगत में।।
आओ गायें गीत नव ,भर दें हम उल्लास जगत में।
साल नया अब आ गया, सबको दें विश्वास जगत में।।
हर्ष प्रकृति में है भरा, तजो युद्ध का भाव जगत में।
होली आकर कह गयी , हो स्नेहिल चाव जगत में।।
आपस में मिल बैठ कर, रहें सदा हम साथ जगत में।
द्वेष भावना को तजें , हम-तुम हों दो हाथ जगत में।।
शारदीय नवरात्र भी , देती है संदेश जगत में।
उपकारी बन कर जियो,रखो न उर आवेश जगत में।।
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चूडामणि छंद
विधान-13'16 मात्राएँ,दोहा + 212
जीवन भर दो ज्ञान से, यूँ कृपा करो मात शारदे|
तर जाऊँ भव पार मै, ऐसा वर दो मात शारदे |
चरणों में तेरे पड़ा, चाहें जाऐ बीत जिन्दगी
हाथ जोड़ विनती करूँ, जिह्वा पे बस मात शारदे|
जो सृजन करे देश हित, है उत्तम साहित्य साधना|
जग में उत्तम नर वही, जिसको आता लक्ष्य साधना|
जो नित सेवा रत रहे, नर नारायण भेद को मिटा
सेवा का फल ज्ञान है, जिसकी होती साक्ष्य साधना|
विधा- चूड़ामणि छंद
🌹मुक्तक🌹
दुनिया बहुत डरावनी, करता क्यों तू हेत बावरे|
बीती जाये जिन्दगी, मुठ्ठी से जूं रेत बावरे|
आए खाली हाथ है, जाए खाली हाथ लोग है -
करमो की खेती करो , बंजर होए खेत बावरे|
संतों संगत बैठकर, परम तत्व को जान लिया है|
सुन्दर सेवा रंक की, यह हम सबने मान लिया है|
तन मन सब अर्पित किया, सेवा के सर्वोच्च पदों से
जन्मो जन्मो तक इसे, करने की अब ठान लिया है|
🌹 मुक्तक🌹
देखो दुश्मन देश का, जहर देश में घोल रहा है|
हमें नजर अंदाज कर, औरों से कम तोल रहा है|
यह दुश्मन की हरकते , लगती है नापाक हमे अब
भारत की जयकार जब, बच्चा बच्चा बोल रहा है|
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*व्यंग्य* *चुलियाला छंद*
राजनीति के खेल में, नहीं नियम कानून देखिए।
कुर्सी मिलनी चाहिए, बिन कुर्सी सब सून देखिए
बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात देखिए।
दाने को मुहताज हैं, बीबी को सौगात देखिए।।
हाथ न्याय के हथकड़ी, अपराधी आजाद देखिए।
सत्य छुपाता मुँह खड़ा, झूठ बना उस्ताद देखिए।।
साधु बने शैतान हैं, धर्म बना व्यापार देखिए।
रक्षक ही भक्षक बने, जनता है लाचार देखिए।|
बिक जाता ईमान है, बैठै खरीददार देखिए।
रहता है आबाद सदा, ऐसा कारोबार देखिए।।
लोकतंत्र की आड़ में, लूटतंत्र का खेल देखिए।
कुर्सी हथियाने यहाँ, गठबंधन बेमेल देखिए।।
कलयुग इसका नाम है, उल्टा है सब काम देखिए।
सत्ता जिसके हाथ है, करते सभी सलाम देखिए।।
सस्ता मिलता दूध है, दारू ऊँचे दाम देखिए।
बड़े बड़े जो नाम हैं, रहे बड़े बदनाम देखिए।।
जितना ज्यादा नोट है, मिलता उतना वोट देखिए।
नीति न्याय की बात है, नीयत में है खोट देखिए।।
संसद देखो बंद है, हंगामे हैं रोज देखिए।
पैसा जनता की मगर, नेताओं के मौज देखिए।
कलम बड़ी तलवार से, पैनी इसकी धार देखिए।
"प्यारे"दिल पर चोट करे, गहरी इसकी मार देखिए।|
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चुलियाला (चूड़ामणि) छंद आधारित मुक्तक
13,16 पर यति, 29 मात्रा, दोहा+1112
••••••••••••••••••••••••••••••••••
कहाँ कंत जाकर बसा, हृदय मेरा उदास बहुत है।
उजड़ गए सपने सभी, सूखा अब विश्वास बहुत है।
याद लिए मन में सखी !जीवन लगता भार जगत में--
नयन नीर से हैं भरे, व्याकुल हृद में प्यास बहुत है।।
उजड़ा उर उपवन लगे, फिर भी मन विश्वास बहुत है।
सजना निष्ठुर है बना, करते जन उपहास बहुत है।
परदेशी बलमा हुआ, नैनन सुबहो शाम विकल है ...
पता बता अब तो पिया, तुमसे जीवन आस बहुत है।।
रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट " बेगूसराय, बिहार
👇
*चुलियाला (चूड़ामणि) छंद आधारित मुक्तक *
*दोहा +1112*
माटी पावन देश की, पावन धरा महान भुवन में ।
जन्म लिया था जिस धरा, राम कृष्ण भगवान भुवन में ।
छेड़ धरा को आपने, किया स्वहित के काज सहज ही ---
तभी भूमि पर झेलते, दण्ड सभी भुगतान भुवन में ।
राजा दशरथ की धरा, पावन पुण्य ललाम भुवन में ।
पावन गंगा बह रही, जन - जन के मुख राम भुवन में ।
सुवासित चहुँओर धरा,दिवस आज मधुमास सुखद है ...
पीत वर्ण धरनी लगे,फैला है अभिराम भुवन में ।।
रंजना सिंह "अंगवाणी बीहट "
बेगूसराय, बिहार
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चुलियाला छंद दोहा+212
टेसू में राधा रँगी, कान्हा हुए गुलाल प्यार में।
वृंदावन होली हुआ, करते ग्वाल धमाल प्यार में।
नोंक-झोंक रस घोलती, छलकाती उद्गार फाग में-
फगुनाहट ऐसी चढ़ी,यौवन किया हलाल प्यार में।
तन में बजती बाँसुरी, मन में बजे मृदंग फाग में।
सुधि बिसराकर राधिका,रँगी कृष्ण के रंग फाग में।
लोचन मदिरालय हुए, श्वाँस हुई मकरंद प्यार में-
अंतस घट केसर घुली, गदराए सब अंग फाग में।
मुखमंडल माधव मलें,चढ़ा प्रेम मन रोग जान लो।
गोरी उर ऐसी बसी, रुचे न दूजा भोग जान लो।
मोहन राधामय हुए, रँगे प्रीत के रंग साँवरे-
मधुरस प्याला जो पिया,मुखर हुआ उर जोग जान लो।
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विधा-चूड़ा मणि छंद
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राम लला सविनय नमन,'वर्षा' है अति आम अनुचरी।
सुंदर दर्शन चाहती, जपती रहती नाम सहचरी।
हे!दशरथ सुत राम जी, छूटे धरती धाम कचहरी।
कर साधन सेवा रही,चाहे प्रभात,शाम,दुपहरी।।(१)
जीवन नैया डूबती, आकर थामो राम हमारे।
बढ़ती हृदय अधीरता, बिगड़े सुधरें काम हमारे।
केवल तुमसे आश है, हो तुम ही विश्राम हमारे।
लखन सिया रघुवर सहित, लो स्वीकार प्रणाम हमारे।।(२)
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