परम पूज्य , बालयति ,भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महामुनिराज जी की बुंदेली बोली में पूजन
परम पूज्य , बालयति ,भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महामुनिराज जी की बुंदेली बोली में पूजन
कुकुभ /ताटंक छंद में
(16- 14 मात्रा भार , पदांत दो दीर्घ / तीन दीर्घ)
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स्थापना
सिंहासन पै फूल बिछा दय , नीचट भाव बनाये है |
गुरु विमर्श जी आन बिराजौ , हम पूजन खौं आये है ||
बिनतुआइ भी सबरी लगबें , पूजा मोरी स्वीकारौ |
चरनन खौं इस्थापन कर दौ ,तब मोखौ लगै सहारौ ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज , अत्र अवतर -अवतर संवोषट् आह्वाननम्
अत्र तिष्ठ- तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् | अत्र मम् सन्निहितो
भव -भव बषट् सन्निधिकरणम्
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जल
पानू से हम भरै कठौता , केवट बनके आये है |
चरन आपके धौकै मानें , राम अपुन से पाये है ||
पाप धुलै सब मौरे अब तो, हम खौ आस लगाने है |
गुरु विमर्श के चरनन छूकै, खुद हमखौं तर जाने है ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , जन्म- जरा -
मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
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चंदन
चड़ौ जगत्तर ताप टिपिरियन , सौ हम चंदन ल्याये है |
सबइँ ताप चटपट हो जाबैं , बिनतुआइ खौं आये है ||
हौरा से हम भुँजतइ राबैं , ताप जनम भर हम पाबै |
गुरु विमर्श जी हेरौ हमखौं , हम चंदन इतइँ चढ़ाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , संसार ताप विनाशनाय
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
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अक्षत
चाँउर हम तौ नौनें जानै , धो धा कै हम ल्यायै है |
मन मौरौ येसौई हौवै , बिनतुआइ खौ आयै है ||
सबइ तरा सैं हौय ऊजरै, मोपै किरपा हौ जाबै |
चरन अपुन के पछया-पछया , गैल मोक्ष की हम पाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , अक्षयपद प्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा |
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पुष्प
लुकलुकात हम भटकत रत हैं , कामी कीरा से साँसी |
जलत बरत भी भगत रहत हैं , करवाँ तइ पूरी हाँसी ||
काम कीचाड़े में ना परबै , रस चेतन फरै बराई |
जियै चखत हम सब पा जायै, गुरु जैसी ही प्रभुताई ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , कामबाण विनाशनाय
पुष्प निर्वपामीति स्वाहा |
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नैवेद्य
कितनउँ हम खा पी लै साँसउँ , भूक मिटत फिर भी नइयाँ |
नर खौ भरतइ जितनौ- जितनौ , उतनइँ बढ़तइ टुइ़याँ- टुइयाँ ||
मिट जाबै जा भूख मोइ अब , धरी इतइँ जा रै जाबै |
गुरु चरनन में बिनतुआइ है , जा मौखौं नईं सताबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरणकमलेभ्यो , क्षुधारोग विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा |
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दीप
दिया न चिंगीं जी में जलतइ , अँदयारौ नीचट राखै |
तौरो मौरो मोह भरौ है , लगत मुँदी हैं सब आखैं ||
दिया जला कै धरतइ चरनन, गैल मोक्ष की दिख जाबै |
गुरु विमर्श जी कृपा राखियौ , ज्ञान कभउँ ना धुँधलाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो ,महा मोहान्धकार
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा |
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धूप
इतनौ कूरा धरै जिया में , काँतक गुरुवर बतलाबैं |
सौचत रत है कैसे ई खौं , नाँय माँय हम सरकाबैं ||
धूप चढ़ा रय गुरू चरन में , पाप करम सब जर जाबै |
दोष न कौनउँ भीतर राबै , मनुआँ मोरौ हरसाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अष्ट कर्म दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा |
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फल
खटुआ फल मन के भीतर ही , फूलौ - फूलौ ही राबै |
करिया रस है जीकै भीतर , नाँय - माँय ढुरकत जाबै ||
गुरु विमर्श से बिनतुआइ है , अब तो फल होय गुरीरौ |
होय मोक्ष को साजौ नोंनौं , फल लगबै हमें कुरीरौ ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , महा मोक्ष फल प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा |
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अघ् र्य
सबइ भाव हम करें इकठ्ठे , एक जगाँ पर है जौरे |
अरघा जीखौ कात इतै है , जीमैं है भरै निहौरे ||
अक्षय साता मोखौ मिलबै , अब सबरै पाप नसाबै |
गुरु विमर्श जू कृपा दीजियौ , मुक्ती मोखौ मिल जाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद प्राप्तये
अघ् र्य निर्वपामीति स्वाहा |
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जयमाला
जै जै भूम जतारा हो गइ , धन्य हुई है वह कुलिया |
जनम लऔ जब खुद खौ तरबै , सबरन नै भी नेह दिया ||
मात भगवती पिता सनत ने , लैं कैयाँ है पुचकारौ |
बूड़ी दादी के हाथन कौ , उत भौतइ रहौ सहारौ ||
समय सटक कै आँगूँ जाबै , दिखै खाल पै जब लाली |
जा कौ जानत तौ है यह , आतम हित की उजयाली ||
धरौ नाम राकेश हतौ तौ , गुरु विराग ने जब परखौ |
तनक बात भइ जब कल्यानी,छौड़ दऔ तब निज घर खौ ||
कहै जिनागम पंथ सुहाना , हित आतम कौ हैं करते |
जीवन है पानू की बूँदें , सूदी साँची ही कहते ||
कातै है आचार्य गुरू जी , रओ धर्म में सब प्रानी |
सबखौ दे आशीष सुभाषा , बौलत मीठी है वानी ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद प्राप्तये
अघ् र्य निर्वपामीति स्वाहा |
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बुंदेली पूजा लेखक - सुभाष सिंघई
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
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जैन ध्वज गीत (लावणी छंद में )
छंद विधान 16 - 14 मात्रा , पदांत दो लघु , दो दीर्घ
जयजय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
शुचिमय शुभ सम्मेद शिखर जिन , यहाँ मुक्ति का वर दाता ||
गोमटेश जी खड़े अडिग है , नेमि चरण है गिरनारी |
महावीर जी पावापुर से , वर्तमान में अधिकारी ||
वर्तमान में वर्द्धमान को , नायक जिनशासन पाता |
जयजय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
जिनवाणी है मंगल दायक , मंगलमय शुभ जय गाथा |
साधु शरण हित मित प्रिय रहती, जन गण मन की बन नाथा ||
ध्वज लहराए नील गगन में , सत्य अहिंसा सनदेशा |
गीत सुभाषा गाता चल अब, रखकर सब शुचि परिवेशा ||
आशिष मागूँ जय- जय होवें , अब अपना शीष नवाता |
जयजय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
जम्बू दीपे आर्य खंड का , भरत क्षेत्र यह कहलाता |
जिनवर स्वामी यहाँ हुए है , जिनका ध्वज मैं फहराता ||
करूँ कामना काज सफल हों , बहे ज्ञान की शुभ धारा |
जिन शासन जयवंत रहे अब , सत्य अहिंसा जयकारा ||
जय जय करता नमन- नमन है , सबको शुभ गीत सुनाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो, जय जिनवर ध्वज फहराता |
जय हो -जिनवर श्री जय जय हो,
श्री जिन जय हो , जय शुभ हो -2
©® गीत रचियता - सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबाइल - 9584710660
विशेष नम्र निवेदन - यह गीत आप रचनाकार का नाम सहित ही फारवर्ड करें , कार्यक्रमों में गायें |
संकेत - कोई किसी तरह की काँट छाँट कर छंद का स्वरुप , मात्रा भार विधान , बिगाड़ने का दोष व पाप अपने सिर पर धारण न करे |
सादर
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