बुक चित्र पर क्लिक करें , एक मिनिट रुकें , पत्रिका अपलोड हो जाएगी |छंद महल , उपमान (दृढ़पद) छंद विशेषांक , माह अप्रैल 2023,


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6 - ब्लागडाट काम पर यह पत्रिका है हीं 💐
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भवदीय 
सम्पादक मंडल
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 1 🎈
1-अनुक्रमणिका 
7- रामानंद राव , नेहरुनगर , लखनऊ
8-सुभाष सिंघई जतारा 
9- पंकज शर्मा तरुण 
10- जयवीर सिंह अत्री
12-हिम्मत चौरड़िया "प्रज्ञा" 
13-रमानिवास तिवारी सीतापुर 
28- सरला सिंह चौहान 
33- सुधा राठौर नागपुर 
38 कौशल कुमार पाण्डेय आस 
40-वर्तिका अग्रवाल ,वाराणसी,उ.प्र.
41-अंजु कपूर गांधी  रोहतक
44 - सुशील सरना 
46- संजीव नाईक इन्दौर 
51-हरिओम श्रीवास्तव  भोपाल म.प्र.
52- महेन्द्रप्रसाद दुबे'अमन'

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 2 🎈

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 3 🎈
                  माँ शारदे वंदना
उपमान/दृढ़पद छंद पर आधारित गीत:-
विधान- 13,10 पर यति, अंत में चौकल. 

जयतु मातु हे शारदे,नित्य  तुझे  ध्याता। 
शब्द पुष्प माँ मालिके, सुंदर यश गाता।।

नवल भाव  माँ  छंद नव,  नित्य   वंदना   माँ।
गहूँ चरण नित मातु तव, विनय   प्रार्थना  माँ।।
नवल सृजन कर मातु नित, यश जग में पाता। 
शब्द  पुष्प  माँ  मालिके,  सुंदर   यश   गाता।। 

करता निशिदिन अर्चना, मनहर नव वाणी। 
मन  में  माता  कामना,   हे   वीणा  पाणी।। 
नव  आशा  संचार  माँ,   हे  बुद्धि  प्रदाता। 
शब्द पुष्प माँ मालिके,   सुंदर  यश  गाता।। 

अलंकार नवरस सजें,  अद्भुत नव रचना। 
कृपापूर्ण   वरदायिनी,  दोषमुक्त  रखना।।
परहित चिंतन नव सृजन , सदा रचूँ माता। 
शब्द पुष्प माँ मालिके,  सुंदर  यश  गाता।। 

मनन करूँ माता गहन,   चले  लेखनी  माँ।
नमन चरण माता शरण, अंक शायिनी माँ।।
सृजित छंद उपमान नव, दृढ़पद तव भाता। 
शब्द पुष्प  माँ  मालिके,  सुंदर  यश  गाता।। 
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 मुक्तक:-
वीर  शिवाजी  ने  हमें,  जीना  सिखलाया। 
आजादी  का  देश  में,   परचम   लहराया। 
जिये जिंदगी शान से, आन  देश  की  रख-  
निजता की पहचान का, सपना दिखलाया। 

मातु भवानी की कृपा,  मिले  सदा  हमको। 
वीर शिवाजी की अलख,  दीप हरे तम को। 
भारत माँ के लाल को,  कोटि-कोटि  वंदन-
रिपु का अब संहार कर, दिया ग्रास यम को।
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 मुक्तक:-
बिना अर्थ सब व्यर्थ है,   हो  घर   में   माया ।
बिना काम की जिंदगी, बस  दुख  की  छाया। 
चलता सूरज अनवरत,  खुद  को  कब  रोके -
केवल मानव आलसी,    काम न  कर  पाया। 

आलस थोड़ा त्याग कर,   जोड़ो अब माया। 
काम करो पहचान हो,   हटती  दुख-छाया। 
चलते   तारे   हैं   गगन,   चलता   है   चंदा -
यहाँ कर्म की धार से,    सबने  सब   पाया। 
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उपमान/दृढ़पद छंद पर आधारित गीत:-

जीवन में जो पल मिले, खुश होकर जीना। 
मानो हर पल आखिरी, जीवन  रस  पीना।। 

जियो जिंदगी इस तरह,    लगे नहीं फेरा। 
काम नहीं अवशेष हो,     उठे  यहाँ  डेरा।।
कर्म मर्म सौरभ सजे,. मधुरस   है  भीना। 
मानो हर पल आखिरी, जीवन रस पीना।।

समय नहीं बर्बाद हो, नियम सभी पालो। 
कठिनाई में जिंदगी,  की  आदत  डालो।।
जीवन के हर मोड़ पर,  छप्पन हो  सीना। 
मानो हर पल आखिरी, जीवन रस पीना।।

जग में रहकर प्यार कर, भला समय बीते। 
दीन-सदन उजियार कर, तमस-हृदय रीते।।
हाथ पसारे सब चले,  कफन-पड़ा  झीना। 
मानो हर पल आखिरी,  जीवन रस पीना।।
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उपमान/दृढ़पद छंद पर आधारित मुक्तक:-
विथान- 13,10 पर यति, अंत में गुरु गुरु .

बेमौसम  बरसात  ने,    खूब   कहर   ढाया। 
सहे त्रासदी खुद कृषक,   पेट न  भर  पाया। 
संकट  के  हालात  में,   मुश्किल  है  जीना-
कृषि की नव तकनीक को, नहीं आजमाया। 

ओलों की बरसात ने,  खूब  प्रलय  ला-दी। 
फसलें  चौपट  हो  गईं,    आई    बरबादी। 
भाग्य भरोसे है कृषक,  जीवन   दुखदाता -
अब भी पाता कष्ट वह, विधि उसने खो-दी। 
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उपमान/दृढ़पद छंद पर आधारित मुक्तक:-
विधान- 23 मात्राभार, 13,10 पर यति, अंत में गुरु गुरु.

माया के आधीन है,  जग  का  यह  मेला। 
कर्म यहाँ करते सभी, क्या गुरु क्या चेला। 
फल की इच्छा कब रुके, मन गाए गाथा -
जन्म-मृत्यु के चक्र में,   है  जीव  अकेला। 

आओ जी लें जिंदगी,    मस्त यहाँ यारो। 
ऐसा यह आनंद फिर,   मिले कहाँ यारो।
भवसागर के पार हो, लगे न फिर फेरा-
जीवन-सुख यह स्वर्ग में, नहीं वहाँ यारो। 
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उपमान/दृढ़पद छंद पर आधारित गीत:-
विधान- 13,10 पर यति,अंत में गुरु गुरु.

दौड़-भाग है जिंदगी, सोचो यह क्यों है। 
गुणा-भाग है जिंदगी, सोचो यह क्यों है।।

केवल अपने   लिए  यह,   व्यर्थ  यहाँ  जीना। 
बुझे-जगत की प्यास यह, सबको जल पीना।।
स्वार्थमयी  यह  जिंदगी,  सोचो  यह  क्यों है ।
गुणा-भाग  है   जिंदगी,  सोचो  यह  क्यों  है।।

साफ-स्वच्छ हो देश यह,   है मिशन हमारा।
जियें सभी अधिकार सह, है  जतन  हमारा।।
स्वप्न  हमारी  जिंदगी,   सोचो  यह  क्यों  है।
गुणा-भाग  है  जिंदगी, सोचो  यह   क्यों  है।।

चलना ही है जिंदगी, रुकना, मर जाना। 
बाधाओं को पार कर, चलते, पर जाना।।
जीत-हार है जिंदगी, सोचो यह  क्यों  है। 
गुणा-भाग है जिंदगी, सोचो यह क्यों है।।

धीरज रखना आस है,  जीवन  यह  प्यारा। 
हर पल अपना खास है, जीवन यह न्यारा।।
सुमन-खार सँग जिंदगी, सोचो यह क्यों है।
गुणा-भाग है जिंदगी,  सोचो  यह  क्यों  है।।
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                   🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 4 🎈
पदांत - २२✓ या (११२ भी मान्य)
देशद्रोही....
आवारा पशु  खेत  को, जैसे  चरते  हैं।
वैसे दुश्मन  देश  का,  घाटा  करते हैं।।
नहीं मरे दुश्मन अभी,  आहें  भरते  हैं।
जिंदा होकर ये पुन:,जन सुख हरते हैं।।
                  --::::--
ओलावृष्टि और कृषक....

ओले बरसे गगन से, कृषक हृदय रोया।
जिसकी उसको आस थी, सब कुछ है खोया।।
कैसे घर का खर्च अब, कृषक चलाएगा।
कैसे अब परिवार की, क्षुधा मिटाएगा।।


गद्दारों को देश से, अभी  भगा  दो  जी।
सोए सज्जन देश के,आज जगा दो जी।।
जब तक दुश्मन देश के, रहें  देश में जी।
तब तक मेरे देश को,  लूट  खायँगे  जी।।
                 --::::--
तोड़ रहे हैं देश को, अब दुश्मन मेरे।
दुश्मन देशों से मिले, बंद  करो फेरे।।
घर की खबरें दे रहे, दुश्मन देशों को।
बेनकाब करना पड़े,इन बहुवेशों को।।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 5 🎈
बड़ी मछलियाँ सिंधु में, छोटों को खाती।
तरु के नीचे भी कभी,घास न जम पाती।
ये  कैसा  दस्तूर  है,  सोच -सोच   हारा।
पराधीन क्यों दीन है, किस्मत का मारा।1।

ज्ञानी, ज्ञानी  के लिए,  जाल  बिछाता है।
मेघ, मेघ  को  देखकर, क्यों  टकराता है।
वाह वाह  का  खेल है, श्रेय  प्राथमिकता।
इसीलिए जो मौन है,वही अधिक पिसता।2।

चोर- चोर   होते   सदा,    मौसेरे   भाई।
कमी  परस्पर  जानते, दिल से  गहराई।
काँटे को  कांटा चुभे, कभी  नहीं  देखा।
ज्ञानी, ज्ञानी  के  लिए,  क्यों खींचें रेखा?3।
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सभी को हनुमान जयंती के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

चैत्र शक्ल तिथि पूर्णिमा, शुभ मंगल आया।
आनन्दित  माँ  अंजनी,  हनुमत  को  पाया।
तीनों  लोकों  में  खुशी,  करते  अभिनन्दन।
जय जय अंजनि लाल की,  बार-बार वंदन।

राम दूत  अतुलित बली, तेज  पुंज  धारी।
बुद्धि विवेकी ज्ञान निधि,अरि मर्दन हारी।
शरणागत को सुख मिले, सब संकट टारे।
"साथी" वंदन  कर  रहा,  हर्षित  हो  द्वारे।
                          
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कृष्ण प्रिया के बैन अब ,बदले सुर बोले ,
कहा कन्हैया हो चतुर ,रहे नहीं भोले !

माखन चोरी में निपुण,  जशुदा का लाला,
भोली सूरत, साँवरे,   तू मन का काला |

फिर भी तेरे पास क्यों, मन मेरा डोले ! 
कहा कन्हैया हो चतुर , रहे नहीं भोले !

रास रचाए रात भर,  झूमें सँग गोपी,
बाँसुरिया की वारुणी, हो सबने ज्यों पी ! 

कालिंदी के कूल पर, प्रीति सरस घोले !
कहा कन्हैया हो चतुर ,रहे नहीं भोले !

नाग नथैया हो गए,  यमुना मथ डाली,
वस्त्र - हरण करके छुपे, यह क्यों वनमाली ?

लीलाएँ तेरी अजब , पृष्ठ कौन खोले !
कहा कन्हैया हो चतुर , रहे नहीं भोले !

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 7 🎈
                         माँ
माँ का दर्जा सृष्टि में,---------कभी नहीं खोटा।
इससे ऊँचा पद नहीं,----------ईश्वर भी छोटा।।
निर्धन दीन गरीब हो,-----------रहे धनी कोई।
माँ होती सबकी भली,---------प्रेम बीज बोई।।

नेह लुटाती बाल पर,--------रात दिवस माता।
दूध पिलाती वक्ष से,--------बाल खुशी पाता।।
माँ का गहरा प्यार है,--- ----अंत नहीं इसका।
माँ से पैदा हैं सभी,-----अमिय दूध जिसका।।

बचपन में हम साथ थे,-------- युवा हुए दूरी।
सदा साथ माँ के नहीं,-------क्या है मजबूरी।।
सागर से गहरा कहीं,---- अश्रु मातु जल का।
माँ की इतनी ज्योति है,-----सूर्य ताप‌ हल्का।

साफ करे मल मूत्र को,-------कपड़े भी गंदे।
माँ होती है एक सी,---------भिन्न-भिन्न बंदे।।
धन्य यहाँ बेटा नहीं, -----किया ख्याल माता।
योग्य बनाया पाल कर, तब सुख वह पाता।।

दर्शन माँ का नित्य  कर,--जब पाँव पखारे।
मातु कृपा से ही कटे,------सब कष्ट हमारे।।
माँ सेवा मन हृदय  से,----जो कोई करता।
माँ के ही आशीष से,---धन दौलत भरता।।

माँ के  रिश्ता  से  बड़ा,----नहीं  ग्रंथ कोई।
इससे बड़ा पुनीत क्या,-----नहीं पंथ कोई।।
लायक  नालायक  रहे,-- माँ उसे खिलाती।
रोम-रोम माँ का यहाँ,---बस प्यार लुटाती।

उठा गोद पुचकारती,------पुत्र कहीं लेटा।
दिया सदा आशीष ही,-----जैसा भी बेटा।।
होता  पूत  कपूत  है,---माँ  नहीं  कुमाता।
भूखी रह उसको खिला,जो उसको भाता।।


             हास्य-व्यंग्य
पत्नी सोये खाट पर,-------- नया है जमाना।
पति बेचारा क्या करे,------ बना रहा खाना।।

बीबी बीए पास है,------------- अंग्रेजी बोले।
हाय हलो घर में कहे,--------जैसे मुख खोले।
लाई ढेर दहेज है,-------------मारे वह ताना।
पति बेचारा क्या करे,------ बना रहा खाना।।

फादर कहती ससुर को,-----सास बनी मम्मा।
पति को अपने तुम कहे,----बड़ा है निकम्मा।
जाना को वह "गो" कहे,"कम" कहती आना।
पति बेचारा क्या करे,-------बना रहा खाना।।

बहू शहर की है पढ़ी,--------- मम्मी देहाती।
कहती सुन यह ब्रेड है,-----वह कहे चपाती।
बोले सुन रे साजना,--------आ पैर दबाना।
पति बेचारा क्या करे,-----बना रहा खाना।।

पढ़ी-लिखी पत्नी मिले,पति अनपढ़ भोला।
फिर पत्नी का राज है,----खूब चले लोला।
सब कुछ करता है सहन, बना जो दिवाना।
पति बेचारा क्या करे,-----बना रहा खाना।।

लाज शर्म सब त्याग कर,---बढ़ता है आगे।
लिखा भाग्य में जो वही,- कैसे फिर त्यागे।
है समाज की बात यह,---इसे तो निभाना।
पति बेचारा क्या करे,----बना रहा खाना।।
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उपमान छंद आधारित "पद"

एक दिन सबको जाना।
यहाँ नहीं कुछ भी रहा,सब  कुछ  बेगाना।।
चलो छोड़ इस देश को,अब नहीं ठिकाना।
माया की दुनिया यही, लगता भरमाना ।।
मेरा   तेरा   सब   कहे,  है   एक  बहाना।
उड़ा अकेला हंस जब,साथ  नहीं  आना।।
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विधा- उपमान छंद 23 मात्रा 13-10 पर यति
          चरणान्त- गुरु गुरु

पंचशील का मंत्र है,----मानव  उपयोगी।
जो कोई पालन करे,----रहे न मन रोगी।।
पंचशील सुखमय करे,जीवन यह सारा।
चले धम्म की राह पर,लगे बहुत प्यारा।।

हत्या करें न जीव की,---- पंचशील बोले।
दया करो हर जीव पर, हृदय भाव खोले।।
जीने का अधिकार है,---जीव जंतु प्राणी।
छोटा कोई या बड़ा,-- मधुरिम हो वाणी।।

चोरी करना पाप है,--------सदा रहे दूरी।
घृणित काम करना नहीं,जो भी मजबूरी।।
पंचशील की सीख है,---महा पाप चोरी।
छीना झपटी मत करें,-- त्यागें बलजोरी।।

व्यभिचार से दूर हों,---अवगुण है भारी।
सारी बेटी बहन है,-----दुनिया की नारी।।
काम वासना त्याग कर,चलो बुद्ध रस्ता।
पंचशील सबके लिए, औषधि है सस्ता।।

सत्य मार्ग पर ही चलें,इसको अपनाएँ।
झूँठ बोलना है बुरा,----भूल नहीं जाएँ।।
झूँठ बोलने से बढ़े,-----यहाँ पाप सारे।
नाव बीच मझधार में, पतवार  सहारे।।

नशा पान मत कीजिए,--नशा रोग पाले।
दीन गरीबी जो मिले,-----खाने के लाले।।
नशा नाश जीवन करे,------होते हैं रोगी।
विषय वस्तु मद में रहे,व्यक्ति बने भोगी।।

              "रामानन्द राव"
          इन्दिरा नगर लखनऊ।
                

दौलत  जिसके पास है ,   उसको   पहचानो |
अंदर से   कितना दुखी ,  कुछ आकर जानो ||
दौलत  पाकर  भी   सदा , पैसा    चिल्लाता  |
बोझा    ढोता   रात  दिन  , ढेंचू‌   ही   गाता  ||

दौलत   जिसके  पास  है , नींद  नहीं  आती  |
पैसों  की   ही  रात   दिन , गर्मी    झुलसाती ||
जितनी  दौलत   जोड़ता  , उतनी     कंजूसी |
बातचीत   व्योहार    में ,  बालों  - सी  रूसी ||

दौलत   जिसके पास है  , भरता    है  आहें  |  
त‌ृष्णा मृग -सी  पालता , रखता  वह   चाहें  ||
पैसा भी उसको    सदा ,    तृष्णा   में लाता  |
महिमा   अपनी जानकर , उसको  भरमाता  ||

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 9 🎈
उपमान/दृढ़ छंद/मुक्तक
१३/१०पर यति अंत गुरु गुरु।

साज बजा लो प्यार का,सुर ताल मिलेंगे।
किए  गए  सब  पाप भी,तुरत ही धुलेंगे।।
नर तन दुर्लभ है मिला,नित कर लो पूजा।
हुए बंद जो द्वार सब, खुद सभी खुलेंगे।।

माथे  पर  चंदन  लगा, शीतल   यह रहता।
जीवन के सब दुख दर्द, हँस हँस कर सहता।।
नाम राम का जाप कर,सुबह सुबह जल्दी।
अंदर  अपने  झांक  ले,यह कबीर कहता।।
पंकज शर्मा "तरुण."
पिपलिया मंडी (म. प्र.)
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 10  🎈

जब से  कलुषित सोच ने, मातु बुद्धि घेरी। 
तब  से   माता  बुद्धि  ये, हुई   ह्रास  मेरी।। 
करता रोज  उपासना, हृदय बसा तुमको-
हो   जायेगी  ठीक  यदि, कृपा   हुई तेरी।। 

माता  की  अरदास कर, सफल  रहे अत्री। 
तनी   रहे  आशीष  की, सर   ऊपर  छत्री।। 
करे भजन यदि रोज तू, दिल से माता का-
कर  देगी माँ  ठीक फिर, जीवन की पत्री।। 

मातु  सरस्वती  ज्ञान की, वर्षा  कर  देना। 
कलम  शब्द से  रिक्त है, इसको भर देना।। 
लिखूँ बात में सत्य सब, जो भी घटना हो-
हिम्मत तुम  देना सदा, कभी  न डर देना।। 
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गीतिका 
मजदूरी  देखो  नहीं, इतनी  मिल पाती। 
महँगाई की  मार भी, ऊपर  पड़  जाती।। 

आमदनी  थोड़ी  रहे, खर्चा  है  ज्यादा, 
दाम  पढ़ाई  माँगती, तब डिग्री आती।

जो है तबका बीच का, उसे बहुत मुश्किल, 
कर   उसको  देना  पड़े,  दुखती  है छाती। 

नहीं  करे  भुगतान कर, चोर कहे शासन, 
इस तरहा की बात फिर, उसे नहीं भाती। 

बदतर  हाल  किसान का, रोता बेचारा, 
कुदरत जब भी खेत में, ओले बरसाती। 

बिगड़े काम अगर कभी, यारों  बंदे का, 
दुनिया उस इंसान को, उल्लू बतलाती। 

'अत्री' गम में तो  सभी, मायूस रहते हैं, 
खुशियों में इंसान की, तबियत हर्षाती। 
👇
उपमान छंदाधारित गीत

पाता  थोड़ा  मान  तो, मानव इतराता। 
औरों को फिर सामने, छोटा बतलाता।। 

मत    तुम   गफलत   में   रहो, ऐ  मेरे भाई। 
मिटा  अहम  की  एक  दिन , देती  परछाई।। 
मिटने में ज्यादा अधिक, वक्त न लग पाता। 
औरों  को   फिर   सामने, छोटा  बतलाता।। 

रावण को जब हो गया, अहम बहुत ज्यादा। 
गलत हुईं सब  सोच थीं, गलत ही   इरादा।। 
उसको  ही उल्टा कहे, जो  भी  समझाता। 
औरों   को   फिर सामने, छोटा   बतलाता।। 

ताकत भी हनुमान की, जान  नहीं  पाया। 
सम्मुख ही लंका जली, ध्यान नहीं लाया।। 
मूर्ख   रहे  इंसान जो, घर को  जलवाता। 
औरों  को  फिर  सामने, छोटा बतलाता।। 

बात मानकर भ्रात की, राम से मिल लेता। 
सीता को  सम्मान से, वापिस   कर  देता।। 
सिया राम के  कोप से, शायद बच जाता। 
औरों   को  फिर  सामने, छोटा बतलाता।। 

उपमान छंदाधारित मुक्तक

झूठ  बोलना  पाप है, पर  हम  सब बोलें। 
कहने  से   पहले   नहीं, शब्दों  को  तोलें।। 
सर पर  रखें  गुनाह  की, रोजाना  गठरी-
निकलें काफी झूठ यदि, हम गठरी खोलें।। 

अति से ज्यादा झूठ भी, ठीक नहीं होता। 
अपनों  में  विश्वास भी, जल्दी  से खोता।। 
कहें    टपोरी  लोग  फिर, एसे  बंदे  को-
झूठ लबादा ओढ़कर, बिस्तर पर सोता।। 

सच्चाई से जब मनुज, बचता  फिरता है। 
खाई में यह  झूठ की, आकर  गिरता  है।। 
निकल नहीं बाहर सके, यह आसानी से-
आस-पास में झूठ के, ऐसा   घिरता   है।। 

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                   🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 11🎈

रीति नीति सब खो रहे  ,  कैसा युग आया ।
सत्य राह को तज रहे , दिखती अब माया ।।
डूब रहे सब स्वार्थ में , मेर  नहीं  मन  की ।
दया धर्म दिखते नहीं ,  भूख बढ़ी धन की ।।

दाव खेलते अब कई ,  काम करे अपना ।
झूँठे झाँसे दे रहे ,   दिखता निज  सपना ।।
नहीं डरे अब लोग ये , जग मकड़ी जाला ।
कर्म सभी के देखता , सब  ऊपर  वाला ।।

चाल चलन न्यारे बने ,  कलयुग में सारे ।
नकल पराई कर रहे ,  नई  चलन  धारे ।।
बड़े बड़े अब डूबते ,    कौन उन्हे  रोके  ।
अपनी अपनी राह है , कौन किसे टोके ।।

संस्कृति अपनी छोड़ते, नियम रचे मन के ।
लाज शर्म अब खो रहे , ये नखरे तन के ।।
करे दिखावा लोग सब , स्तर से भी आगे ।
नया जमाना आ गया  , सब अपनी दागे ।।
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स्वार्थ बड़ा अब हो गया , करता ये दूरी ।
खास  पराये  हो  गए ,  कैसी  मजबूरी ।
मन में अन्धे हो रहे ,  दिखे नहीं  अपने ,
दुखमय बनकर जिन्दगी, हो जाती पूरी ।।

मानव पागल स्वार्थ में , निज रीश्ते खोता ।
लोभ गले कटवा रहा , धन से खुश होता ।
खास खुशी जाने नहीं ,  खुद करता दूरी ,
पाप घड़ा भरता चले ,  अन्त समय रोता ।।

मन तो ये भरता नहीं ,  नहीं भूख जाती ।
स्वार्थ बड़ा नासूर है ,  दुनिया दुख पाती ।
जीवन जाता लोभ में , नहीं मिटे तृष्णा ,
जग में माया जाल है , सबको लिपटाती ।।

जब से आया होश में ,  तभी स्वार्थ घेरा ।
दिन दिन मैं फँसता गया , कर मेरा तेरा ।
मालिक से दूरी बनी ,समय नहीं मिलता ,
जग में  पूरा  रम  गया , कर  रैन  बसेरा ।।
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विधा - गीत
चल चल रे राही सदा ,  तू चलते रहना ।
मंजिल होगी पास में,सीख कष्ट सहना ।

कांटे भी होंगे  यहाँ ,  दुख  होगा  भारी ।
जंगल होगा राह में , पशु भी बलकारी ।।
कदम नहीं तू रोकना ,  सुनले ये कहना ।
चल चल रे राही सदा , तू  चलते  रहना ।।

टेड़ा मेड़ा  पथ  चले ,  नदियां  ये  नाले ।
गहरे गहरे तट  रहे ,   बनो  जोश  वाले ।।
फिर पानी के साथ में ,  पड़े भले बहना ।
चल चल रे राही सदा ,  तू चलते  रहना ।।

वेग धार आँधी चले ,  फिरती  हो  आड़ी ।
तुझको अब थमना नहीं, सदा चले गाड़ी ।।
"गिरधारी "हिम्मत बना , तेरा अब गहना ।
चल चल रे राही सदा ,  तू  चलते  रहना ।।
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विधा - गीत 
आधार - उपमान / दृढ़ छंद 
विधान - १३,१०=२३ , चरणान्त चौकल 

बन्धे दिल को साफ रख , दिल  सबसे  प्यारा ।
साफ दिलों में हरि बसे ,  लगता  दिल  न्यारा ।

बुरे कर्म का फल करे, इस दिल को काला ।
काले  दिल  वाले  यहाँ  ,  फेर  रहे  माला ।।
दूर रहे भगवान  फिर ,   वश  नहीं  हमारा ।
बन्धे दिल को साफ रख ,दिल सबसे प्यारा ।।

जन्मा था तब साफ था ,  आप किया मैला ।
लोभ जाल में पाप का ,   भरता क्यों थैला ।।
आँखें  भी  शर्मा  रही ,    देख  देख  धारा ।
बन्धे दिल को साफ रख , दिल सबसे प्यारा ।।

क्या लाया था संग में ,  किसका दुख होता ।
सब मालिक का  है दिया ,  क्यों झूँठा रोता ।।
"गिरधारी" उजला  बनो ,  धोले  सब  गारा ।
बन्धे दिल को साफ रख , दिल सबसे प्यारा ।।
 गिरधारी लाल मीणा
बस्सी ( जयपुर ) राजस्थान
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समय सदा है कीमती, इसे नहीं खोना।
देता श्रम को मान जो, बनता वह सोना।
करे समय पर काम जो, बजे खुशी बाजा।
लोग उसे कहते सदा, बने यही राजा।।

माँ तेरे उपकार का, गुण सब नित गाते।
चरणों में जो भी रहे, खुशी सदा पाते।।
पूरी होती कामना, पूर्ण स्वप्न होते।
करे मातु अपमान जो, सदा वही रोते।।
👇उपमान /दृढ़पद छंद
13.10 मात्राएँ, पदान्त चौकल
गीत-

सदा बोलिए प्रेम से, माँ के जयकारे।
जंगल में मंगल करे, हाथ पकड़ तारे।।

महिमा अपरंपार है, सुर मुनि यश गाते।
करे भक्ति सब चाव से, दर तेरे आते।।
कितने तेरे रूप हैं, करुणा बरसाते।
भजता जो जिस भाव से, फल वैसा पाते।।
कृपा दृष्टि जिस पर रहे, हो न्यारे वारे।
जंगल में मंगल करे, हाथ पकड़ तारे।।

भयभंजक है माँ सदा, माँ सुख की दाता।
चरण शरण में जो रहे, तन-मन सरसाता।।
तीन लोक की स्वामिनी, कष्ट सभी हरती।
उजियारा करती सदा, मन वांछित करती।।
माँ का रटता नाम जो, कभी नही हारे।
जंगल में मंगल करे, हाथ पकड़ तारे।।

विध्न विनाशक तू सदा, अग-जग में डेरा।
दानव थरथर काँपते, नाम सुने तेरा।।
लाज रखे निज भक्त की, बदले माँ रेखा।
नहीं असंभव कुछ रहे, चमत्कार देखा।।
'हिम्मत' तेरे नाम को, नित उठ उच्चारे।
जंगल में मंगल करे, हाथ पकड़ तारे।।
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भगवान महावीर के जन्म कल्याणक पर सभी को शुभकामनाएं🙏🏻
उपमान छंद 23 मात्रा,13-10 पर यति, चरणान्त चौकल
गीत-

महावीर संदेश को, हम सब अपनाएँ।
सत्य धर्म पर हम चलें, खुशी सदा पाएँ।।

करें सभी से प्रेम हम, हिंसा को छोड़ें।
दंभ कपट से दूर हो, कर्मों को तोड़ें।।
धर्म अहिंसा है सुखद,जीवन में धारें।
मालिक खुद के हम बनें, नैया निज तारें।।
जीवन में समता रखें, सुखद भोर लाएँ।
सत्य धर्म पर हम चलें, खुशी सदा पाएँ।।

समय सदा अनमोल है, व्यर्थ नहीं करना।
जान लिया जिसने इसे, बहता सुख झरना।।
हर क्षण उपयोगी बने, सभी बात मानें।
शुभ भविष्य इसमें छिपा, सत्य यही जानें।।
आयेगा ये लौट कर, क्यों हम भरमाएँ।
सत्य धर्म पर हम चलें, खुशी सदा पाएँ।।

अनुपम मानें हम सभी, प्रभुवर की वाणी।
रक्षा हो षट् काय की, सुख पाते प्राणी।।
सबमें जीव समान है, 'हिम्मत' स्वीकारो।
अपने  सुख खातिर कभी, इन्हें नहीं मारो।।
जन्म जयंती पर सभी, हर्ष हम मनाएँ।।
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उपमान छंद 23 मात्राएँ
13,10 पर यति, चरणांत गुरु गुरु
गीतिका

चाहें जय हमको मिले, हम कदम बढ़ाएँ।
विपदा देखें सामने, क्यों हम घबराएँ।।

यदि काँटे पथ पर मिले, हार नहीं मानें।
करें उन्हें अनुकूल हम, खुद लक्ष्य बनाएँ।।

साथ न कोई दे अगर, हो रातें काली।
हिम्मत से हम काम लें, सृजन नव रचाएँ।।

नजरें हो नित लक्ष्य पर, समय नहीं खोना।
करें सतत अभ्यास हम, सबके मन भाएँ।।

रोके पथ जो राह में, उसे सबक देंगे।
तोड़ेंगे सब भ्रान्तियाँ, क्रांति नई लाएँ।।

मुश्किल का कर सामना, जय हमको पाना।
किसी काल हम कम नहीं, सबको बतलाएँ।।
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _1 3 🎈
एकदन्त करिवर वदन,शुभ मंगल कर दो ।
लेखन की प्रभु  शक्ति दो,भाव सही भर दो।
 हानि देश की हो नहीं ,सृजन कार्य वर दो।
रोको यह उन्माद अब, शुभदायक स्वर दो।१।

रेल नहीं  क्षति ग्रस्त हो,रोको  आतंकी ।
बहुत हुआ नुकसान है,रोको  नौटंकी 
बन्द करो बस फूँकना ,घटना बदरंगी ।
वक्रतुण्ड तुम शीघ्र ही,रोको हुड़दंगी ।२।

बढ़े न दुर्गति ओर जन,मेल भरो जन जन।
दे दो ऐसा ज्ञान प्रभु,बनें सही जन - मन।
स्वार्थ लिए जन मत गिरे,नहीं सभी कुछ धन।
सत्ता के लालच लिए,करें न जन विघटन ।३।

नाम अमर रहता सदा,आत्मा है अक्षर।
लोभ मोह के पाश में,बँधा हुआ है नर ।
देश बड़ा समुदाय से,सब जन यह मानें ।
कृपा करो गौरी सुवन,ध्वंसक शुभ जानें ।
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उपमान छन्द अर्द्धसममात्रिक 
13,10 पर यति अन्त गुरु गुरु से

सुन्दर हिन्दुस्तान का  ,  शुचि कोना-कोना ।
मणि शोभित सब  नाग हैं,उगले भू  सोना।
माणिक पर्वत पर मिलें,मुक्ता सिर हाथी ।
सर्व- धर्म समभाव है,जन- जीवन-  साथी ।१।

हर बालक हर बालिका,सिखे हाथ धोना ।
मेरा प्यारा देश है, अति भव्य  सलोना।
मणि जैसे नृप के मुकुट,लगे सही होना ।
तरुणी के श्रृंगार में, हो अभार ढोना ।२।

वैसे सज्जन व्यक्ति भी,जन्म जहाँ लेते।
मिले न वैसा मान फिर,ज्ञान वहाँ देते।
चेला बनता संत से,प्रिय प्रेम  पिरोना।
दूर देश जाकर मिले,उचित मान दोना ।३।

काश्मीर की  घाटियाँ,उगल रहीं केसर।
सुन्दरता की खान हैं,मोहें अगणित नर।
स्वाती जल हो सीप मुख  ,रत्न उदधि  बोना ।
सिंह दन्त बालक गिनें,भयभीत  करोना ।
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उपमान छन्द अर्द्धसममात्रिक 

सदा काम की बात ही;      है  अच्छी होती  ।
गहरे जल में नर घुसे ,       तब   पाता  मोती ।
बल की सार्थक हो दिशा,है गति बन जाती ।
सत्य और श्रम साधना ,   नयी क्रांति लाती ।१।

मन अकाम उद्देश्य दृढ़,सृजक नवल पथ का।
चक्र धैर्य बनात सदा  ,       उद्यम के रथ का।
शौर्य पताका व्योम में,       साहस से उड़ती ।
तूफानों में   शान से,      निशि दिन है  लड़ती।२।

बल विवेक के अश्व जब,      रथ लेकर चलते ।
उसके सम्मुख दिव्य रथ,     युद्ध  नहीं अड़ते ।
ईश भक्ति उर सारथी,         लाती मन दृढता ।
शत्रु रोग से तन सदा ,        जीवन भर लड़ता ।३।

नहीं हारना दु:ख से,         सबल हृदय रखना ।
दुख सुख आते नित्य हैं,        धैर्य पूर्ण सहना।
रोग शत्रु का का सामना,    डट कर ही करना ।
डरनें से होता भला,          जीते जी मरना ।४।

रमानिवास तिवारी!

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 14 🎈
जग जननी माँ शारदा , आप बुद्धि दाता ।
करें कृपा मांँ दीजिए  , शरण पड़े    माता।।
अज्ञानी मूरख महा   , आती पग बाधा ।
निष्कंटक हो पर सदा , करो कृपा राधा।।

भक्ति भाव मन में बसा ,  शरण  नहीं खोना ।
मिली दया यदि आपकी , बन जाता  सोना।।
ज्ञान बुद्धि बल दायिनी ,      हे देवी माता ।
करें कृपा पद्मासिनी   , हो जग की त्राता।।
 लगा चैत फसलें कटी , अन्न प्रचुर पाया ।
घर भर मिल उत्सव करें, आयी घर माया ।
पहन नवल परिधान सब , हैं खुश नर नारी।
दुनिया यही किसान की  , महके   फुलवारी।।

फसल ज़िन्दगी आपकी , रात दिन कमाते ।
भोजन करते साल भर , वस्तु सभी    पाते ।
मौसम देता साथ यदि  ,अन्न प्रचुर    होता।।
नहीं साथ उसने दिया  , सब कुछ ही खोता।।

खेती करते जान दे ,        नाम  अन्न दाता ।
ख्याति कभी मिलती नहीं , गुमनामी पाता ।
सिर पर साफा बाँधकर , हलधर   कहलाते ।
सेवा करते देश की   ,   पुण्य आप      पाते।।
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हे मांँ वीणा वादिनी , अम्ब बुद्धि देना ।
जड़ता हरना ज्ञान दे , सब तम ले लेना।।
सुत अज्ञानी आपका , राह सरल   चाहें ।
बार- बार वंदन करें  , झुका शीश  निगाहें।

पापी होता जगत सुत , माता न    कुमाता ।
सारे अवगुण माफ कर, जननी सुख   दाता ।
श्रद्धा सुमन हाथ में, पद रज मिल     जाता ।
रचना का संसार यह ,  निश्चित     अपनाता ।।

 हंस वाहिनी ज्ञान दें,    आप ज्ञान माता ।
श्वेत वसन पद्मासना , सरल चित्त  भाता ।
वीणा पुस्तक हाथ में, झंकृत स्वर    देता ।
जिह्वा पर जिसके  बसी , बनता जग नेता ।
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उपमान छंद दृढ़ पद
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राम लला पैदा हुए ,       चैत राम नवमी ।
लखन भरत भी साथ में, आये जग धरमी। 
बजे बधावा राज गृह , खुशी सकल नगरी।
करती मंगल गान सब , कलश लिए गगरी।।

याचक भिक्षुक जो मिला , बसन रत्न पाते ।
सुमन बरसता गगन से , खुश सुर हो  जाते।
रानी राजा बाँटते  , रतन बसन        मोती ।
हर्षित सारे देव गण , खोल दिव्य    ज्योती ।
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                  @ ज्ञान प्रकाश द्विवेदी प्रतापगढ़ उ प्र


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मुक्तक 

वीणा  पाणी शारदे,   वेदों   की   ज्ञाता ।
वंदन करते देव सब, महिमा  विख्याता।
भक्ति भाव से आपकी, नित्य करूँ पूजा -
बहुत  कार्य अटके पड़े, पूर्ण करें माता ।
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विधा -गीतिका 
वीणा-पाणी शारदे,   वेदों   की   ज्ञाता ।
वंदन करते देव गण, महिमा  विख्याता।

अखिल विश्व को तारिणी, त्रिभुवन कल्याणी,
बास करो मम कंठ में, जननी   सुख  दाता ।

दुर्गा काली सरस्वती,   तू‌  अद्भुत ज्ञानी, 
बहुत  कार्य अटके पड़े,  पूर्ण करो माता ।

पूजन वन्दन मातु मैं, तन-मन से करती ।
माता देना ज्ञान फल , शुभगे  वरदाता।

विद्या   बुद्धि   दायिनी , वेदों  ने  माना,
सर्व  प्रथम माँ  शारदे, को पूजा जाता।
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जन्मदिवस हनुमान का,आज मनाते हैं।
देव  प्रभु  बजरंगबली,  शीश  नवाते हैं।।
भक्त नही हनुमान सा,और मित्र प्यारा ।
राम  और हनुमान का, है  चरित्र न्यारा ।।

बानर रुप मे दिख रहे, हैं शिव अवतारी।
शक्ति बुद्धि भरमार है, महिमा है भारी ।।
झूम उठा दिल  देखकर,धाम बड़ा पावन।
मुख में जय हनुमान का,नाम मनो भावन।।
👇
विधा -उपमान छंद- आधारित -गीत 

जन्म दिवस हनुमान का,राम राम बोलो।
अंजनी सुत के नाम को, रसना में घोलो ।

देव प्रभु बजरंगबली, हैं संकट हारी,
प्राणों  के रक्षक सदा ,हरते दुख भारी,
संशय सारा छोड़कर,अंतर पट खोलो।

निश्चिय मन की कामना, भक्तों की फलती,
जीवन में सद्भाव की, ज्योति सदा जलती, 
चरण शरण प्रभु का गहो,इत उत मत डोलो।

सब पर करते हैं कृपा,हनुमत बलवीरा,
शंकर के अवतार हैं,  हरते सब पीरा,
एक सहारे नाम के, जीवन  को ढोलो।

अष्ट सिद्धि हनुमान जी,प्रभुवर हैं दाता,
मन क्रम बचन ध्यान से,भजता सुख पाता,
अतुलनीय महिमा सदा, पूजन कर तोलो।
👇
उपमान छंद , 13 - 10 , पदांत चौकल (दो दीर्घ) 
मुक्तक 
अपनी अपनी डफलियाँ,सभी बजाते हैं।
देख-देख पर अन्य को,जल भुन जाते हैं ।
मन आहत  होता तभी, जी है घबराता-
बात-बात  में घात कर, दोस्त कहाते हैं।

प्रमिला श्री'तिवारी'
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जो  माटी  पाली  तुझे, उसने  क्या  पाया,
कभी भूल से बुद्धि में , क्या विचार आया।

पालन पोषण माँ करे, निज सुधि बिसराये ,
किन्तु  जगत  में  आदमी, को  भाये  माया।

लगे    लुटेरे    लूट    में,  बच्चे    सहयोगी,
झेल  रही  संताप  अति, माता  की  काया।

मातृभूमि  के  कर्ज  को, कभी  नहीं  भूलो,
जो समझा दायित्व निज, सुत वही कहाया

मात  चरण  के  जब  रहे,  बेटे   अनुरागी ,
जगत  किया  है  वंदना,  यशोगान  गाया।

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प्रगति, लक्ष्य यदि चाहिए, आलस को त्यागो।
ज्ञान  ग्रहण  करते  रहो, श्रम  से  मत  भागो।
अनुभव  से  सीखा  करो, गुरु  उत्तम  होता,
वक्त  बहुत  है  कीमती, यह  जानो,  जागो।
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उपमान दृढ़पद छंद - मुक्तक

चूड़ी  कंगन  से  अधिक, प्रेम करे नारी।उन्होंने 
गहनों  में  उसको  लगे, चूड़ी  ही प्यारी।
जिसकी  जैसी  हैसियत, चूड़ियाँ  खरीदें,
चूड़ी  पर  हर ब्याहता, तन मन को वारी।

रंग    बिरंगी   चूड़ियाँ,   हाथों   में   साजें।
अनुराग सदन बरसता, खनखन जब बाजें।
जब  साजन  की  देहरी,  से  जुड़ता  नाता,
साथ  रहें   चूड़ीं  सदा,  हाथ में  विराजें।

बदला  युग  लेकिन  रही, चूड़ी  वैसी  ही।
प्राण  प्रिय  लगती  रही, पहले  जैसी  ही।
प्रीति  निभाईं  नारियाँ, खुश  रहीं  हमेशा,
चूड़ी  पाती  प्रेम  ही, हो  वह  कैसी  ही। 
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उपमान (दृढ़पद) छंद ( गीत )

हर  प्राणी  में  ईश  का,  नूर  समाया  है,
जिसने यह समझा वही, हरि को पाया है।

धन के पीछे भागकर, जो समय गँवाते,
अपनेपन  के  हेतु  वे, अक्सर पछताते।
जीवन संध्या देखकर, पढ़ते करनी को,
बचा न पाते  डूबती, जीवन  तरनी  को।
क्योंकि वक़्त बीता नहीं, वापस आया है....... ।

जो भी आया है जगत , उसको  जाना है,
कर्मों  का फल हाथ में, उसके  आना  है।
वृक्ष लगा उपकार का, यदि सुख पाना है,
हर  पल  होता  कीमती, उर  में  लाना है।
समझ सका जो बात यह, वह मुस्काया है....... ।

भेदभाव  के  बीज  को, जिसने  बोया  है,
भाई  चारे   का  शहद,  उसने   खोया  है।
आपस में विश्वास बिन, मुश्किल जीना है,
चैन   चुराया  स्वार्थ   ने,  रिश्ते  छीना  है।
हम सबको सत्संग ने, यही सिखाया है......... ।
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उपमान (दृढ़पद) छंद - गीत 

फँस कर माया मोह में, मन ने क्या पाया |
जान न पाया आदमी, कैसी  यह   माया।

विदित सभी को बात यह,  साथ न कुछ  जाना।
फिर  भी  धन  के  मोह  से, मुक्त  न  हो पाना।
इसे  कहें  क्या  आज  तक, समझ  नहीं  आया........ ।

बेटा   बेटी   हैं   सभी,  अपनी   संतानें।
किन्तु करें क्यों भेद हम, बात नहीं जानें।
दुत्कारा जब  लाड़ला, तब मन पछताया........।

कर्तव्यों से कर सका, कभी न मन यारी।
अधिकारों को माँग कर, जीभ नहीं हारी।
हमें गणित यह कब कहाँ, किसने पढ़वाया...... ।

सात वचन की पात्रता, क्यों हमको भूली।
जिन्हें  कहें  हम  देवियाँ, चढ़तीं  हैं  सूली।
शुभचिंतक को किसलिए , हमने  ठुकराया........ ।

जीवन  नैया  राम  ही,  पार  लगाते  हैं।
जान बूझकर आप क्यों, बात भुलाते हैं।
न्याय, नीति, सत्संग क्यों, हृदय न अपनाया......... ।


उपमान छंद - गीतिका 

स्वप्न मधुर है प्रियतमा, हाथ नहीं आता, 
जीवन पथ की धूल में, यह धुँधला जाता।

सहन न करती कल्पना, जग की सच्चाई,
तभी प्रिया को जग सदा, सपने में पाता।

शोभा है साहित्य की,छवि सुंदर प्यारी,
पुष्प सुहाना पर सदन, में कम मुस्काता।

कभी-कभी  संसार  में, होता ऐसा भी,
आँगन में मनमीत का, आँचल लहराता।

दौलत हो जब प्रियतमा, खोज रहे जारी,
तन्मय होकर आदमी, उसके गुण गाता।
उपमान छंद - मुक्तक ( रेगिस्तान)

जीवन  रेगिस्तान  का, बेहद तपता है।
पानी का संकट उसे, सहना पड़ता है।
रेगिस्तानी  भूमि  पर, जीवन   इंसानी,
गृह उद्योगों पर अधिक, निर्भर रहता है।

रेत किरकिरी आँख की, बनकर जीती है।
हर  मौसम  इंसान  के, आँसू  पीती  है।
मोल नहीं श्रम का मिले, कहते रहवासी,
गागर मिलती  प्यास की, हरदम रीती है।

स्वरचित - मधु शुक्ला .
सतना, मध्यप्रदेश .



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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 17 🎈
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             "गुण अवगुण"
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गुण के ग्राहक बहुत हैं, लगे हाथ बिकता।
मिलता जन सम्मान है, सदा साथ टिकता।।
कोयल मीठी बोलती, लोग सभी सुनते।
मधुर गीत संगीत का, ,,, तार तार गुनते।।1।।
काया अवगुण की भरी, भरा मैल मन में।
झूठ सदा लब बोलते, , पाप भरा जन में।।
धोखा देते रोज हैं, ,, मित्र पुत्र सारे।
मीत मिताई है कहाँ, शत्रु बने प्यारे।।2।।
कभी जगत में हो नहीं, आदर अवगुण का।
होता है अपमान जब, ,, खुले भेद घुण का।।
घर कर जाती बात मन, रोज रोज घटता।
जीवन खेल समाप्त हो, तब सांटा सटता।।3।।
काग बोलता बोल कटु, कोयल सुर मीठा।
दोनों काले रंग के, ,,,,,,,,,, एक बोल पीठा।।
कोयल को सब चाहते, काग अभावन हो।
भेद खुले आवाज से, जब रुत सावन हो।।4।।
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 "मन के मोती"...🖋
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🌿"गीत"      समांत - 'आमी'    अपदांत
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      🌻 "भगवान महावीर स्वामी"
🌿
तीर्थंकर चौबीसवें, ,, महावीर स्वामी।
जैन धर्म की हाथ में, बागडोर थामी।।
🌿
चैत्र शुक्ल तेरस दिवस, शुभ दिन पाया था।
पावन कुंडाग्राम में,  शिशुवर आया था।।
माँ त्रिशला ने जन्म दे, दूध पिलाया था।
उस वैशाली राज्य ने,   जश्न मनाया था।।

पूज्य पिता सिद्धार्थ वह, राजा थे नामी।
जैन धर्म की हाथ में, ,,,, बागडोर थामी।।1।।
🌿
वर्धमान के नाम से, सारा जग जाना।
भ्रात नंदिवर्धन बड़ा, सुदर्शना बहना।।
जसस वीर अतिवीर को,  सबने पहचाना।
दिव्य रूप को देखकर, सन्मति वह माना।।

मंत्रमुग्ध सब लोग थे, नर नार अवामी।
जैन धर्म की हाथ में, ,,, बागडोर थामी।।2।।
🌿
श्वेताम्बर दल मानता, तिय बनी यशोदा।
जन्मी पुत्री नाम था, ,, उसका अनवद्या।।
पक्ष दिगम्बर मानता, ,,,, बाल ब्रह्मचारी।
मौन साल बारह रहा, तन मन तप भारी।।

दोनों दल थे पक्षधर, सम्यक अनुगामी।
जैन धर्म की हाथ में, ,,, बागडोर थामी।।3।।
🌿
उम्र अवस्था तीस की, , उसने घर छोड़ा।
समण लिया संसार से, उसने मुख मोड़ा।।
वसन देह से त्यागकर, थामा मन घोड़ा।
ध्यान मग्न भगवान ने, नाता ईश जोड़ा।।

लेते सुख परपीर में,  ऐसे सब कामी।
जैन धर्म की हाथ में, बागडोर थामी।।4।।
🌿
त्याग तपस्या मौन से,  'केवलज्ञान' लिया।
सत्य अहिंसा अरु दया, सब उपदेश दिया।।
पशुबलि हिंसा जाति का, खूब विरोध किया।
सदाचार से ही रहा, ,,,,,,,, उसका शांत हिया।।

दिया पंच सिद्धांत वह, मन मैल हमामी।
जैन धर्म की हाथ में, ,,,,, बागडोर थामी।।5।।
🌿
आयु बहत्तर की हुई, काल निकट आया।
तन मन ढ़ीला हो गया,  जंग लगी काया।।
अंत समय सब छोड़ कर, सकल मोक्ष पाया।
'रामा' मानव धर्म ध्वज, जग में लहराया।।

सर्व धर्म समभाव का, था आठों यामी।
जैन धर्म की हाथ में, ,,, बागडोर थामी।।6।।
🌿
तीर्थंकर चौबीसवें, ,, महावीर स्वामी।
जैन धर्म की हाथ में, बागडोर थामी।।
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     "मन के मोती"...🖋
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🌿गीतिका     🌻 "हनुमत बालाजी"
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🌿
शिव का है अवतार यह, हनुमत बालाजी।
भक्त बड़ा है राम का, ,,, हनुमत बालाजी।।
🌿
मंगल है हनुमान का, शुभ दिन यह पाया।
करता मैं हर वार व्रत, ,,, हनुमत बालाजी।।1।।
🌿
करता जो फरियाद है, कष्ट सभी मिटते।
संकट मोचक यह बने, हनुमत बालाजी।।2।।
🌿
काम राम के जो मिले, किये सिद्ध सारे।
सेवा करता राम की, ,, हनुमत बालाजी।।3।।
🌿
सीता ढ़ूँढ़ी बाग में,   छान गया लंका।
तोड़े रावण दंभ भी, हनुमत बालाजी।।4।।
🌿
बने मूक जन दानवी, झुका दिया अरि को।
फिर करता लंका दहन,  हनुमत बालाजी।।5।।
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आकर वापिस दे दिया, समाचार 'रामा'।
गले मिले फिर राम से, हनुमत बालाजी।।6।।
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     "मन के मोती"...🖋
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        उपमान (दृढ़पद) छंद
23 मात्रा (13+10) चरणांत चौकल
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  🌻"छंद त्रयी"          !! माफी !!
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✍🌿
मानहानि के केस में, ,,,,, समाधान माफी।
बोले मुख मन मैल रख, बात नहीं काफी।।
पहले कर लो साफ मन, पीकर मन साफी।
झरते आँसू बोलते, ,,,,,, भर लो तुम जाफी।।1।।
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कोई माफी से बड़ा,   दंड नहीं होता।
आँसू पश्चाताप का, अमन चैन बोता।।
नहीं माँगता जो क्षमा, पाप बोझ ढ़ोता।
कंटक मन फंसा रहे,  जीवन भर रोता।।2।।
✍🌿
पापी को कर माफ दो, घृणा पाप से हो।
पापी जाए सुधर तो,   प्यार आप से हो।।
उसका हो उद्धार जब, कृपा राम की हो।
राम राम वह बोलता,   दया गाम की हो।।3।।
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 "मन के मोती"...🖋
© डॉ० रमेश खटकड़ 'रामा'
  जुलाना, हरियाणा
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 18  🎈

गुरुवर दर्शन है सदा,शुभ मंगलकारी।
उनके चरणों में सभी, जाएं बलिहारी।।

गुरुवर का सम्मान हो,हरदम मन मेरे।
गुरुवर की वाणी सदा,पावन सुखकारी।।

गुरुवर से ही त्राण है,हरपल शुभ होता।
गुरुवर प्रवचन से सदा,खिलती मन क्यारी।।

गुरुवर बसते मम हृदय ,दिन शुभ हो जाता।
आंखे उनकी है सदा ,अमृत रस वारी।।

मंद मुस्कान मुख पे,तन मन सरसाती।
मुख मंडल उनका सदा,है तेजो धारी।।

आभा मंडल आपका,आकर्षक लगता।
वलय सदा है शुभ यहां, दीप्त चमत्कारी ।।


उपमान छंद

जिसके सरल विचार हो,मानव शुभ होता।
रखे साफ जो मन सदा, कभी  नहीं रोता।।
"सरला"देना ध्यान तुम, मलिनता न आए।
रखो शुद्ध आचार सब, जीवन बन जाए।।

कृपा  गुरुदेवआपकी, तुम करुणा करना
क्षमा के दातार तुम,सब  समता भरना।।
हम हैं शिष्य विनीत ही,दयावान बनना।
गाएं तव गुणगान हम, सम भावी रहना।।

सरला भंसाली
अहमदाबाद
स्व्रचित
सादर समीक्षार्थ
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 19 🎈

उपमान/दृढ़पद छंद पर आधारित गीतिका :-
विधान- 13,10 पर यति, अंत में गुरु गुरु.

बांँच रही दुनिया सदा, निर्धन की पोथी।
सारे वादे खोखले ,बातें हैं थोथी।
आमदनी होती नहीं, खर्चा है भारी।
ताड़ सरीखी बेटियाँ ,सीने पर आरी।

बड़े बड़े धनवान है, लेते हैं ठेका।
मदद मगर देंगे नहीं, इतना है एका।
स्वेद बिंदु के मोल को, क्या जाने दुनिया।
उदर अगर खाली रहे, रोती है मुनिया।

एक हाथ से तो नहीं, बजती है ताली।
पर दे दो यदि काम कुछ , मिटती कंगाली।


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बिना योजना बढ़ रहा, जो मानव आगे।
वह रहता हर काम में,उलझा ज्यों धागे।।
अस्त व्यस्त जीवन जिये, नित उठ दुख पाता।
मदद माँगने ओर से,कैसे वह जाता।।(1) 

कुंठित जीवन भर रहे, दुख का अधिकारी ।
नित्य मिटाने की करे, खुद को तैयारी।।
नहीं समझ सकता कोई, उसकी बीमारी।
पूछ जरा देखो उसे, क्या है लाचारी।।(2) 

बहुतेरे चारो तरफ, मिलते जन ऐसे।
भाव निराशा का रखें, पार पड़े कैसे।।
जीवन है अनमोल ये, संयत हो जी लो।
 श्रेष्ठ नागरिक बनकर, जीवन रस पी लो।।
 मुक्तक 
मौसम के अनुमान में, नहीं रही  बातें।
सूखे की हो घोषणा,होती बरसातें ।
वैज्ञानिक भी क्या करें, उनकी लाचारी
सभी आँकड़े पिट रहे,दिन हो या रातें ।

निर्धन जन के पेट पर, नित पड़ती  लातें।
बिन भोजन के लग रहा,सूख गयी आँते।
दशा दिशा पर रोज ही, जग करता चर्चा, 
मिलकर वही कपास अब,आओ मिल कातें।
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एक गीतिका  पदांत - आयें  
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अवसर मौका दे रहा, छोड़े या छाएं।
सबका स्वागत है जिसे,आना हो आएं।।

आदत से लाचार कुछ, ध्यान नहीं देते ।
था मौका, आये नहीं,अब भगवन् ध्याएँ।।

परिवर्तन जग का नियम,था है अरु होगा ।
रुके नहीं रुकता जिसे,जाना हो जाएं।।

मन से ही हारे मनुज, मन से ही जीते।
जिसने चयनित कर लिया,पाना हो पाएं।।

जोर जबरदस्ती यहाँ, काम  नहीं आती।
श्रृध्दा से जो ला सके,लाना हो लाएं ।।

जग में सब उपलब्ध है, जो चाहो वो लो ।
जिस को जैसी भूख हो,खाना हो खाएं।।

अपनी-अपनी  ढपलियाँ, सुर न्यारे न्यारे ।
जिसका जैसा मन करे,गाना हो गाएं ।।
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विधा - गीतिका  पदांत - आये 
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सफल हुए है जन वही,जो आगे आये ।
जो रहते पीछे सदा, वो धक्के खाये ।।

सतत प्रयासो से मिले, विजय ज़माने में ।
उनसे क्या आशा करें,जो सोते पाये।।

विमुख रहे दायित्व से, कर लापरवाही।
लोगों को ऐसे मनुज, नहीं कभी भाये।।

जैसी संगत आपकी, हो रंगत वैसी ।
काम वही करना सखे, जो जग में छाये।।

एक बात का ध्यान तुम, रखना जीवन में ।
गहराई में जो गये,मोती चुन  लाये।।
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 21 🎈

महावीर के जन्म की, शुभ बेला आई।
आँगन में सिद्धार्थ के, खुशियांँ है छाई।।
पुण्य पुंज को देख कर,  त्रिशला हरषाई
स्वर्णिम उदित विहान है, बाजे शहनाई।।

चौसठ आए इंद्र है, पुलक रहे मन में  |
लाएँ हैं नवजात को, मेरु शिखर वन में ।।
इंद्र करें अभिषेक है,  नीर क्षीर  होता  |
मेरु हिला प्रभु ने दिया, जग को कुछ न्यौता ||

छोड़ राजसी सुख सभी , संयम अपनाया।
कठिन तुम्हारी साधना, जन-जन चकराया।।
पाया केवल ज्ञान को, सब ने हर्ष मनाया।
मानो सबको आत्मवत, प्रभु ने बतलाया।।

समवशरण रचना करे, देव धरा आए।
अद्भुत अनुपम दृश्य को, लख सब सुख पाए।।
अर्धमागधी बोलते, प्रवचन फरमाए।
हुई तीर्थ स्थापना, जय स्वर गूंजाए।
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उड़ी नीड़ से आज ही, छोटी सी चिड़िया।
देख-देख खुश हो रही, प्यारी सी गुड़िया।।
है प्रयास पहला अभी, देखे हर डाली।
चीं चीं चीं चीं कर रही, बनकर मतवाली।।

मेरे आंगन आ गई, वह चिड़िया रानी।
दाना खाती प्रेम से, पीती है पानी।।
पानी पीकर तृप्त हो, गाती मुस्काती
आहट से डरती बड़ी, फुर से उड़ जाती।।

पग पग पर खतरे यहाँ, माता यह कहती।
चतुराई से तुम रहो, संबल है भरती।
भरमाना मत तुम कभी, मीठी बातों में।
संभल कर बढ़ना सदा, काली रातों में।।

तिनका-तिनका जोड़ कर, नीड़ बना लेना।
बुरी नजर जो भी उठे, उसे झुका देना।।
आए जब मुश्किल घड़ी, कभी न घबराना।
हिम्मत रखना साथ में, आगे बढ़ जाना।।
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उपमान छंद 
मात्रा भार  दोहा का प्रथम चरण+ 10 पदांत 22 / 112
20-4-24

कहे लखन से उर्मिला, मत जाओ स्वामी।
बोलो मेरे प्रेम में, कहाँ रही खामी।।
तेरे बिन जीना कभी, रास न आएगा।
दर्द जुदाई का मुझे, बहु तड़पाएगा।।

हाथ थाम लक्ष्मण कहे, सुन हे सदनारी।
तू मेरा अभिमान है, प्राणों से प्यारी।।
खुशबू तेरे प्रेम की, हिय में महकेगी।
निश्चित तेरी याद में, आँखे छलकेगी।।

टूट कभी सकता नहीं, बंधन यह अपना।
आँखें देखेगी सदा, तेरा ही सपना।।
छोड़ रुदन हंँस कर जरा, विदा मुझे कर दो।
आज परीक्षा की घड़ी, हिम्मत तुम भर दो।।

नाजुक है परिस्थितियां, धर्म निभाऊँ मैं।
रघुकुल के सम्मान में, चन्द्र लगाऊँ मैं।।
सह लूंगी संताप मैं, धार लिया मन में।
परिचय दूंगी शौर्य का, जाओ तुम वन में।।

पूर्ण करो कर्तव्य को, बढ़ा चरण तेरे।
मम अनुशोचन छोड दो, जीवन धन मेरे।।
माफ किया मैंने तुम्हें, भ्रात संग जाओ।
कहती है अर्धांगिनी, यश ध्वज लहराओ।।

अनुशोचन-शोक, चिंता 

हर्षलता दुधोड़िया हैदराबाद

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सूर्य उदित हो पूर्व में  , भोर नवल लाता।
सप्त अश्व आरूढ़ हो, लाली छितराता।
उल्लासित वसुधा वधू, चूनर लहराती-
सौर भानु नित प्रेमरस, भू पर छलकाता।

खगदल उड़ते व्योम में , पिक मंगल गाती।
हलधर जोते खेत को, हरियाली भाती।
कली काल लख पुष्प को, अलिदल मँडराता-
नवल उमंगित,चेतना, जन उर हर्षाती।

सूर्य नमन कर जन सभी, पाते सुख भारी।
सुमिरन कर प्रभु नाम का, पूजें नर- नारी।
ओम् घंटिका शंख स्वर, भरता मन ऊर्जा-
श्री चरणों में भक्तजन, जाते बलिहारी।

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विधा-गीत
उपमान छंद 23 मात्रा,13-10 पर यति, चरणान्त चौकल

फाल्गुन में होली सखी, बैरन बन आई।
विरह गरल का पान कर, सुध-बुध बिसराई।।           

शूल चुभोती वात अब, पिक विरहा गाती।
तरु से लिपटी बेल भी, तन-मन झुलसाती।।
मेघ बरसते नैन से, पीड़ा दुखदाई।
विरह गरल का पान कर, सुध-बुध बिसराई।।       

क्रंदन श्वांसों में बसा, सिसक रहीं रातें।
खंडित सपने हो गए, झूठी सौगातें।।
परदेसी साजन हुए, खबर न भिजवाई।
विरह गरल का पान कर, सुध-बुध बिसराई।।        

पतझड़ जीवन आज तक, मुझे नहीं भाया।
संघर्षों से घिर कभी, चैन नहीं पाया।।
तृषित हृदय तड़पा किया, भोगी तन्हाई।
विरह गरल का पान कर, सुध-बुध बिसराई।।        

आन थाम लो वक्त को, प्रीत न ठुकराओ।
मन अँधियारा व्याप्त है, दीप जला जाओ।।
उत्पीड़ित उर मत करो, दिखला रुस्वाई।
विरह गरल का पान कर, सुध-बुध बिसराई।।        

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नमन करूँ माँ शारदे,अबला अभिमानी।
जीवन मेरा तब सफल,हो जाऊँ ज्ञानी।।
दो हमको वरदान तुम , हे भाग्य विधाता।
शिक्षा के संज्ञान से,तुम्हीं अन्न दाता।।
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साथी मेरे संग चल,हाथ नहीं छोड़ो।
सुख दुख में भी तुम कभी, वादा मत तोड़ो।।
यह जीवन तेरे बिना,अब लगे अधूरा।
मिलकर काँटे राह के, दूर करें पूरा।।

सदा सुहागन आपकी, अब प्रेम निभाना।
प्रियतम के सुख छाँव में,बस ह्रदय लगाना।।
नारी की शुचि भावना,त्याग मूर्ति देवी।
ममता के भंडार से,कहे जगत सेवी।।

रिश्ते नाते अब सभी,सुख साथी होते।
पति पत्नी ही सिर्फ रह,संग नहीं खोते।।
जीवन का हर दर्द तो,दोनों का मानो 
मरना जीना साथ में,बंधन यह जानो।।
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 24🎈
पाक हुआ कंगाल है, संकट यह भारी।
हुई सियासत दोगली, रोते नर-नारी।।
कंगाली ने कर दिया, सब आटा गीला।
भूखे प्यासे लोग हैं, पैजामा ढीला।।

राम भला कर दीजिए, संकट टल जाए।
रहे पड़ोसी चैन से, अमन रास आए।।
अक्ल ठिकाने पर रहे, सही सोच छाए।
भारत सबका मित्र है, भूल नहीं पाए।।

बोलो सब जय हिंद की, मानवता नारा।
जो भारत का मित्र है, वह हमको प्यारा।।
विश्व गुरु है बन रहा, भारत यह जानो।
छोड़ अकड़ बेकार की, तुम भी यह मानो।।
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प्रभु करते उनकी मदद, जो कर्मठ होते।
जो होते हैं आलसी, जीवन भर रोते।।
सूरज की पहली किरण, करती उजियारा।
एक पुंज प्रकाश मिटाती, अंधकार सारा।।

जिसके मन दृढ़ चाह है, वही जंग जीते।
मुश्किल से लड़ते सदा, घूँट सब्र पीते।।
काम क्रोध मद लोभ में, फँसा विश्व सारा।
स्वार्थ सदा से हर रहा, मानव का प्यारा।।

मर्यादा श्री राम की, बोलो जयकारा।
जीत हुई है सत्य की, अहंकार हारा।।
आओ मिलकर हम सभी, अहंकार मारें।
प्रभु के चरणों में सभी, लोभ मोह वारें।।
उलझन

कैसे तुमसे मैं कहूँ, यह उलझन सारी।
जीत नहीं पाया अभी, वह बाज़ी हारी।।
यत्न गए बेकार सब, हर मौका खाली।
अंतर्मन है कोसता, देता है गाली।।

मुश्किल में आ साथ कब, कंधा सहलाया।
रोया था जब टूटकर, कब मन बहलाया।।
यही बात है रोकती, बोल नहीं पाया।
मन की मेरे मन रही, भीतर दफनाया।।

आओ भूलें सब गिले, करलें फिर यारी।
तुम बिन अब कटती नहीं, रातें बेचारी।।
जब जागो होती पथिक, वही भोर बेला।
बहुत अकेले आज तक, सबका दुख झेला।।
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उपमान छंद / दृढ़पद छंद (१३,१० पर यति,अंत में चौकल)
परिवेश

किया परिश्रम भर दिवस, रात किया गस्ती।
खूब पढ़ाया पूत को, करे पुत्र मस्ती।
खून पसीना एक कर, यत्न किया भारी।
बेटा बसे विदेश में, साथ लिए नारी।।

कामी फँसता जाल में, समय नहीं साथी।
क्षणिक मात्र आशक्ति से, दलदल में हाथी।।
बुद्धि बदलती वासना, चढ़ जाता सूली।
लाख करे वह कोशिशें, दुनिया कब भूली।।

प्रभु सुमिरन से कीजिए, लिप्सा से दूरी।
योगी बन संयम करें, इच्छा सब पूरी।।
सत्य ईश का नाम है, झूठी यह माया।
नर्क द्वार का मार्ग है, ललचाती काया।।
👇
उपमान छंद/दृढ़पद छंद मुक्तक (१३,१० पर यति, अंत मे चौकल)

संग साधु के हरि मिलें, नहीं साथ छोड़ें।
भाव भजन सत्संग कर, सदा हाथ जोड़ें ।
सत्संगति से आपमें, सदाचार आता-
लोभ मोह का अंत कर, राह झूठ मोड़ें।

दया धर्म का मूल है, करें दीन सेवा।
करते पर उपकार जो, उन्हें मिले मेवा।
दीन और लाचार की, आह बड़ी भारी-
दयावान के कर्म से, खुश होते देवा।

नहीं लोभ का आचरण, करना संसारी।
इसी रोग से ग्रस्त हैं, सारे नर-नारी।
लोभ नर्क का मार्ग है, आगे है दलदल-
पड़ जाते जो मोह में, सहें कष्ट भारी।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 25🎈
🌹उपमान छंद मुक्तक🌹कृष्ण की पाती🌹
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मथुरा  से  श्री  कृष्ण  की,  पाती आई  है।
  दौड़ी  आईं  गोपियाँ,  जब  सुधि  पाई  है।
    पुनि  उद्धव  को  घेरकर, छीन  रहीं  पाती,
      राधा  रानी  शान्त  है,   कुछ  मुरझाई  है।।

टुकड़े-टुकड़े   हो  गई,  कान्हा  की  पाती।
  लगी  धड़कने  जोर से, उद्धव  की  छाती।
    दृश्य  अनोखा  देखकर,  उद्धव  से  ज्ञानी,
      बहे   प्रेम  रसधार  में,  गुमी  ज्ञान  थाती।।

सुन संदेशा श्याम का,व्यथित हुईं सखियाँ।
  टूटी ज्यों ही आस तो, भर  आईं  अखियाँ।
    योग-साधना  नाम  सुन,  विरहिन  बेचारीं,
      जमकर लगीं उधेड़ने, कान्हा कीं बखियाँ।।

विरह ताप की वेदना, हम सब  सह लेंगीं।
  कह देना उस कृष्ण से,तुझ बिन रह लेंगीं।
    छलिया  था   तू  आज  है,  बेदर्दी  भी  है,
      राधा  सा ही  पंथ अब, हम भी गह लेंगीं।।

कहते-कहते रो पड़ीं, सुध-बुध सब खोई।
  देख  गोपियों  की  दशा, धरती  भी  रोई।
    उद्धव भी  विचलित  हुए, नाम  रटें  राधे,
      प्रेम मार्ग  कितना कठिन, जाने है  कोई।।
👇
उपमान छंद🌹
संदर्भ-भगवान महावीर स्वामी जयन्ती 🌹
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तीर्थंकर    चौबीसवें,     महावीर    स्वामी।
जग में लाखों-लाख हैं, जिनके अनुगामी।।
सत्य-अहिंसा-न्याय  का, पाठ  पढ़ाने  को।
जन्मे थे  इस  भूमि  को, स्वर्ग  बनाने को।।

त्रयोदशी तिथि चैत्र की, शुक्ल-पक्ष प्यारा।
कुण्डग्राम पावन धरा, शिशु जन्मा न्यारा।।
माँ त्रिसला प्रियकारिणी, दूध  पिलाया था।
पूज्यपिता सिद्धार्थ नृप,गोद खिलाया था।।

तीस  वर्ष  की  उम्र  थी,  पूर्ण  युवावस्था।
माया इत     वैराग्य उत, जीवन अंतस्था।।
ताज त्याग तप मार्ग गह,बन केवल ज्ञानी।
सु-व्रत पाँच  दस धर्म के, हुए आप दानी।।

मानव के कल्याण हित,भ्रमण किए भारी।
सतत  दिगंबर  रूप  में,   रहे   ब्रह्मचारी।।
अनुयायी  हैं  आपके,   समरस   सत्कर्मी।
शान्त-सुखी-सम्पन्न  हैं, सभी  जैन  धर्मी।।

उम्र  बहत्तर  की  हुई, गमन निकट आया।
सहकर कठिन तपश्चरण,जीर्ण हुई काया।।
सच्चा मानव धर्म ध्वज, जग में  फहराया।
तभी  वीर अतिवीर  ने, सिद्ध मोक्ष पाया।।

प्रभो  आप के  मार्ग पर ,चलते  जो प्राणी।
सुनते  गुनते  ध्यान से, पावन  जिनवाणी।
जीवन भर  रहते  सुखी, सम्यक अनुरागी।
पा  लेते हैं  मोक्ष पुनि, बनकर  बड़भागी।।

टेकूँ  मैं   अतिवीर  के,  चरणों  में   माथा।
टूटे-फूटे    शब्द   हैं,  क्या  जानू   गाथा।।
कृपा दृष्टि  चाहूँ  प्रभो, जय जिनेन्द्र बोलूँ।
सर्वधर्म  समभाव  के, नित कपाट खोलूँ।।


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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 26🎈

(१) एक     बार   मुझसे   मिले , फिर     न   मिले  प्यारे।
      नयन कमल- दल से खिले , पुन:     न       रतनारे ।।
       मैंने      पूछा     नाम  तो  , टाल    गए       थे    वे  , 
       जुड़े  न  रिश्ते फिर  कभी , टूटे       जो          सारे।।

(२) राह रोक कर मैं खड़ा ,   रुके   नहीं      हैं     वे।
      चरणों पर उनके पड़ा ,   झुके  नहीं       हैं   वे।।
      मैं था  केवल  आदमी ,   बड़े     आदमी      वे ,
      मेरा सूरज  ढल  चुका ,   चुके   नहीं    हैं    वे।।

(३) मैं   उनकी  जागीर  हूँ , वे     मेरे     स्वामी।
      खींची  हुई  लकीर  हूँ , नहीं  कहीं   खामी।।
      उनकी नजरों में  गिरूँ , मुमकिन यह  कैसे ,
      वे     मेरे   आराध्य  हैं , मैं    हूँ    अनुगामी।।
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मुक्तक- 

आग  लगी  है  हिन्दमें , कौन  बुझाएगा।
भाई  -  भाई  लड़  रहे , कौन बचाएगा।।
जिनसे  थी  उम्मीद  वे , बना   रहे  बातें।
अमन - चैन की बाँसुरी , कौन बजाएगा।।

मेरे      हिंदुस्तान     को , राम    बचाना  है।
शस्य श्यामला  भूमिको , श्याम सजाना है।।
हरी - भरी   हैं   वादियाँ , देती   हैं    खाना।
इस धरती के  स्वर्ग को , भव्य   बनाना  है।।
उपमान छंद , मुक्तक युग्म , १३ , १० पर यति , पदांत - २ २!

फूलों   के  रँग   उड़   गए , इतनी  जल्दी  क्यों?
तितली  के  पर  मुड़  गए ,  इतनी जल्दी  क्यों?
छलिया!क्या वह  प्यारथा , या    थी    नादानी।
और  किसी  से  जुड़  गए , इतनी जल्दी  क्यों?

कितने   सावन   हैं  जिए , साथ - साथ    तेरे।
हृदय - पटल पर हैं लिखे , साफ - साफ  मेरे।।
आओ   बैठें    एक   दिन , कुछ वक्त निकालें।
खुशियों   के   भण्डार  से , कुछ  चित्र  उकेरें।।

-जयकृष्ण पाण्डेय ' कोविद' , उन्नाव , उत्तरप्रदेश।
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 , मुक्तक युगल!उपमान छंद!१३ १० २३, पदांत - १ २ २!

बिना  नाम सम्बंध को , क्या कहें  बटोही।
कुछ तो बंधन बाँध ले , प्यारे      निर्मोही !
नींद उड़ा  कर ले  गईं , हैं   आँखें     तेरी।
कहीं   बटोही  तू  नहीं , है  पक्का  टोही।।

नहीं   रहे  हैं  अजनबी , अब     रिश्ते    तेरे।
रोज   दुहाई    दे     रहे , हैं     सपने     मेरे।।
ऊँच - नीच कुछ हो गई , तो फिर क्या होगा?
मुँह   दिखलाऊँगी  तुझे , क्या साँझ - सबेरे।।

-जयकृष्ण पाण्डेय 'कोविद' , उन्नाव , उत्तरप्रदेश।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 27🎈
विनय सुनो माँ शारदे, द्वारे पर आया।
श्रद्धा सुमन सुभाव के, माता मैं लाया।
वीणा पाणी कामना, पूर्ण करो मेरी।
शीश झुका वंदन करूँ,करो नहीं देरी।
*
जगदम्बा माँ आपसे, नाता है प्यारा।
ममता को माँ आपकी,जग झुकता सारा।
दुष्टों का संहार माँ,पल में कर देतीं।
अपने भक्तों के सभी,दुख माँ हर लेतीं।
👇
उपमान ( दृढ़पद ) छंद - 23 मात्रा ( 13 - 10 ); पदान्त चौकल -
*
बीत रही है जिन्दगी,राम नाम गा ले।
करके वंदन राम का, मंजिल  को पा ले।
मोह जगत का छोड़ दे , काम नहीं आना।
आया खाली हाथ था,खाली ही जाना।
मानव जन्म अमोल है , मुश्किल से पाया।
बिना राम गुणगान के,मत करना जाया।
प्यारे जीवन में सदा ,राम नाम गाओ।
ईश कृपा से आप फिर,सारे सुख पाओ।

करो मशक्कत साथिओ, मंजिल पाने को।
सुख दुख चाहे जो मिले,सब अपनाने को।
कोई भी जग में कभी,साथ नहीं आये।
सबकुछ खुद करना पड़े,तब मन सुख पाये ।
*१
नित्य प्रभो का गान हो,उस दर जाने को।
मन निर्मल शीतल रखो, प्रभु गुण गाने को।
जीवन यह मिलता नहीं,सच में दोबारा।
सत्य डगर पर जो चला,वो कब है हारा।
*२

उपमान ( दृढ़पद ) छंद - 23 मात्रा ( 13 - 10 ); पदान्त चौकल -
*
 पावन अपनी है धरा, सबको बतलाओ।
राम -कृष्ण भगवान की, झाँकी दिखलाओ।
राम- श्याम के नाम को, जो नित हैं गाते। 
गहन सिंधु से सच सदा,वो नर तर जाते।
*
हम सब वेद पुराण की, गाथा गाते हैं।
श्रद्धा से भगवान को, शीश नवाते हैं।
कृपा बिना भगवान के, पार नहीं होते।
चौरासी में ही सदा,सब खाते गोते।

अपना भारत देश है,सबसे ही प्यारा।
 सागर, पर्वत, पेड़  से, सजा हुआ सारा।
 पावन अपनी है धरा, सबको बतलाओ।
राम -कृष्ण भगवान की, झाँकी दिखलाओ।
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#विरह
तुमसे क्या कैसे कहूं, है दुविधा भारी
जीत कहा पाई कभी , हार गई पारी।।
जीवन है फंसा रहा , खाली है झोली
मन मेरा है कोसता, लगता मन हारी।।

 साथ मिला तेरा मुझे,दिल को बहलाया।
पीर हृदय जागी कभी, तब तब समझाया ।।
कहने से मन रोकता ,  बोल   कहां  पाई
बातें मन भीतर रही , उनको सहलाया।।

 आओ बैठो निकट जरा, करलें हम बाते।
कितने दिवस बीत गए , सूनी   सी   रातें ।
चेत कहां था तब मुझे , विरह ज्वार भारी
बहुत अकेली मैं रही , जीवन   को खेते।
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उपमान छंद , मुक्तक युग्म , १३ , १० पर यति 
, पदांत - २ २!

जाने अनजाने लगे  ,   गहन  रही बातें 
जाने  कैसे  मिट गई  , भाव जगी  राते
छलिया!मन की बात थी , मेरी नादानी।
कभी तुझी से मन लगा , सजती बारातें।

साजन  तुम  से  पूछते ,  तुम  साथी  मेरे।
हृदय  भरा  है  प्यार  से , मृदुल भाव फेरे  
बैठो तुम जो साथ में  ,, कुछ पल तो बीतें 
खुशी फूल माधो खिले  , मन भाव  उकेरें।
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 29 🎈

1.
सत्ता सुख की चाह में , गलत राह जाते ।
देश-धर्म को भूल ये, फिर  हमें  लड़ाते ।।
दंगे - झगड़े  देख कर , मन में भय आया ।
आज मुझे क्यों लग रहा, संकट है छाया ।।
2. 
नित्य करो  आलोचना,  तुमको आजादी ।
हिंसा शब्दों से करो, अरु  पहनो  खादी ।।
नहीं समझते बात यह, तुम  सीधी-सादी ।
कटु  शब्दों  से  हुई  है,  अक्सर बर्बादी ।।
3.
एक  दूसरे  से  कभी ,  दूर  नहीं  जाओ ।
मन की कटुता भूल कर, निकट सभी आओ ।।
सात सुरों को जोड़ कर, गीत एक गाओ ।
अनेकता  में  एकता, भारत  दिखलाओ ।।
4.
आगे-पीछे भूल कर, कुछ झुक तो जाओ ।
अंहकार को त्याग अरु, अब गले लगाओ ।।
देखो  दुनिया  सब  यहां, दिखती है रण में ।
चिनगारी  बस  एक  ही, फूंकेगी  क्षण में ।।

विधा..सरसी छंद

सबको इंतजार है तेरा ,   आजा अब तो यार।
किया नहीं वादा दोस्ती ने ,करती है बस प्यार।
झूठ -साँच का लड़ना मेरा ,झूठी थी तकरार।
कस्में,वादे सभी भुलाकर ,आजा तू इक बार।

मन के सारे मैल भुला दे, दे गलबहियाँ हार।
बिन तेरे यह जीवन सूना, सूना  सब संसार।
साथी तू है छूटा जबसे,     छूटा है घर -द्वार।
साँसें भी हैं मद्धिम मद्धिम,रूठे सब त्यौहार।

सात-समंदर पार गया तू,   लेकर सभी बहार।
माँ से भी अब जा रूठा तू,लाख करी मनुहार।
सारी खुशियाँ साथ ले गया,देकर केवल खार।
भूल हुई जो तुझको छेड़ा,        सोचें बारंबार।

कभी न तुझको छेड़ेंगे अब,करते यह इज़हार।
हाथ जोड़ विनती करते हैं,     हम तो बारंबार।
हौले से तू आजा अब तो, करता क्यों इनकार।
प्यार,दोस्ती और मौहब्बत,बस जीवन का सार।
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उपमान छंद आधारित मुक्तक 

मस्त-मगन मनमोहिनी, इतराती जाती।
हाय! सजीली  रूपसी, सबको है भाती।
रूप सुकोमल चाँदनी,  तिरछे से नैना-
चंचल सी रस रागिनी, सबको भरमाती।

कोमल-कोमल कामिनी, क्यों रची विधाता।
स्वप्न सुंदरी देखकर,    मन फिसला जाता।
कंचन काया कांतिमय,   सुरमय सी बोली -
देख अप्सरा दामिनी,    मानव छल जाता।
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मुक्तक, उपमान छंद आधारित 

हमराही कोई यहाँ,     मुश्किल से मिलता।
पल दो पल का साथ दे,चलता फिर बनता।
खोलें सारे राज हम ,    खातिर ही उसकी -
पर मिले अविश्वास जब ,सबको है खलता।

मान-मनौव्वल खूब ही, हम सब हैं करते।
झूठ दिखावा कर चपल ,ये हमको छलते।
कस्में वादे भूलके,      छल हैं ये    करते -
रूप बदलते रोज ही,    सौ मुख ये धरते।

खोकर के विश्वास फिर, हाथ सभी मलते।
पश्चातापी आग में,     हम सब हैं जलते।
ले चिराग हम ढूँढते,      सच्चे हमराही -
आखिर में आस्तीन के ,विषधर ही पलते।
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#विधा-उपमान छंद आधारित मुक्तक 
एक चित्र आधारित सृजन 

बैठे दोनों साथ में ,  अम्मा सेंके रोटी।
रहते दोनों प्यार से,   झोपड़ है छोटी।
बहती रस की धार में,  जीमत हैं बाबा।
चूल्हे की   रोटी बनी ,    हो चाहे मोटी।

मीठा,सरस सुगंधमय, भोजन है पकता।
बाबा माँगें भात अरु,      बैंगन का भर्ता।
जीवन का यह भोज अब,रहा नहीं साझा-
जिस रोटी के साथ में,  अपनापन पलता।

प्यार भरा वह भोज है,जो अम्मा प्यारा।
दाल अनोखी है बनी , है तड़का न्यारा।
पाक कला में हैं  कुशल ,ये अम्मा-प्यारी -
अपनेपन का खूब ही  ,  परोसें नजारा।

 इन बातों से ही  बहे,  जीवन रसधारा।
 लकड़ी,चूल्हा,अग्नि से,जीवन है सारा।
 ढलती राहें उम्र की, चाह नहीं ज्यादा -
दाल भात से ही सदा, करते हैं गुजारा।

अनामिका कली जयपुर, राजस्थान

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 31 🎈

मिट जातीं बड़ी हस्तियां, हों जो अभिमानी
दो पल की है जिन्दगी, मत कर नादानी
गर्व रहित हो जिन्दगी, हो न परेशानी
जितना झुक कर के रहें,नल देता पानी

माटी का जो घट बना, शीतल दे पानी
माटी का ही तन बना, करता शैतानी.
प्रेम प्रीति विश्वास की, मत तोड़ो डोरी
टूट गयी फिर न जुड़ती, होती बस खोरी.
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पनघट सूने हो गये, दिखे न पनिहारी.
पीतल की गगरी नहीं ,जो थी उजयारी 
कूप बन्द सब हो गये, सरवर सूने है 
पाइप लाइन जुड़ गयीं,नीर भरें नारी.. 

दिखे  न लँहगा  घाघरा,  दिखे न अब चोली 
पहने कुछ अब  साड़ियाँ , दिखती अनमोली 
उन्नति   करती    लड़कियाँ, लड़के   हैं पीछे.
जगह जगह पर लड़किया , बोल  रही बोली 
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उपमान छंद 

कान्हा तेरी बाँसुरी ,बहुत सताती है
मीठा राग अलापती, हमें लुभाती है.
नहीं बजे जब बांसुरी,तब तड़पाती है
बज जाती जब रात को, नींद चुराती है.

बीच राह में घेर ली,      कान्हा ने राधा
सत्य बताओ मिलन में,डालो क्यों बाधा.
होती आधी रात जब, चाँद रहे आधा
उठने लगता है प्रिये, मन प्रेम अगाधा.

तुम मेरे मनमीत हो, सुन लो त्रिपुरारी 
ओ मेरे मनमोहना, मैं तुम पर वारी.
जन्मों की यह प्रीत है,सुन ओ गिरधारी
आधी कभी नहीं रहे,  प्रेम डगर न्यारी.

मैं तेरी मनमोहनी, प्रियतम तुम मेरे 
मेरे तेरे बीच में, बंधन बहुतेरे.
सारे बंधन तोड़ दो, तोड़ो सब घेरे 
किंतु लगाने छोड़ दो,गलियों के फेरे.

जया शर्मा✍️
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उपमान छंद 
बहुत खुशी पाई प्रिये ,पाई जब पाती
सत्य कहूँ तो गर्व से,फूल गई छाती
पढ़ने बैठा प्रेम से, भर आये नैना
धीरे धीरे पढ़ लिया,सो न सका रैना.

आ जाओ निज गेह में, याद बहुत आती
सच बतलाओ क्यों हमें, इतना तड़पाती.
आ जाओ प्रिय मान लो,क्या जाता तेरा  
सच कहता हूँ मैं तुम्हें , रोता दिल मेरा.

जया शर्मा

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 32🎈
उपमान छंद

मस्ती मन में धार कर,जीवन जी लेना।
सार नहीं संसार में,सबका यह कहना।
क्या लाया ले जाएगा,जोश जवानी के,
मिट्टी मिट्टी में मिले,तो फिर क्यों दहना।।

माया के जंजाल से,बच कर ही रहना।
अंत सभी का एक है,क्या रज क्या गहना।
बड़े बड़े सम्राट भी,आखिर हार गए।
तो फिर जग की धार में,क्यों कर के बहना।

हम खुद के खुद ही नहीं,अपना क्या होगा।
जिसका जैसा कर्म है,उसने वह भोगा।
चल देगा एक दिन वहां,जिसका नहीं पता,
जाने कैसा कब कहां,धारण कर चोगा।।

मेरे तेरे में फंसे,सच को सब भूले।
आंख बंद कर के सभी,झूल रहे झूले।
काल बाज की आंख से,बचे नहीं कोई,
घुस जाए पाताल में,या अंबर छू ले।।

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सुलगी सूरज की चिलम , प्राची में लाली |
लेकर  पर्वत  ओट  से , झाँके  करमाली ||
उष्मित  साँसें  छोड़ती ,  चलती  पुरवाई |
ज्यों-ज्यों दिन चढ़ने लगे , फिरती बौराई ||

तेवर  सूरज  के  प्रखर , आग बरसती  है |
सूखी नदिया, जल बिना, मीन तड़पती है ||
पेड़   हुए   निर्वस्त्र  हैं  , नीड़   बने   कैसे |
पंछी ने  स्वीकृत  किया , जीना अब  ऐसे ||

लपटों  में  उन्माद   है ,  ताप  चढ़ा  ऐसा |
गर्मी   आकर  दे  रही  , न्यौता  ये  कैसा || 
तृष्णा लिपटी  कण्ठ से , जिह्वा  है  सूखी |
पपड़ाए से  ओंठ  हैं , अँखियाँ  हैं  रूखी ||

सड़क  पड़ी  वीरान  हैं , गलियाँ  हैं  सूनी |
बेदर्दी   से    सूर्य   ने  ,  दुपहरिया   भूनी ||
ताप - पीड़िता   है  धरा , लगती  मटमैली |
सन्नाटा   है   दूर   तक , उकताहट  फैली ||

महिने  में बैसाख के , किरणों की ज्वाला |
बैठ  हवा  के  पंख पर , बाँट  रही  हाला ||
दरका  धरती  का हृदय , माँग  रहा पानी |
लेकिन क्यों चुपचाप है ,बादल  वो  दानी ||

उपमान छंद, 13 - 10 , पदांत चौकल ( दो दीर्घ )
विषय - जीवन

१ )
संध्या  बेला  उम्र  की ,  सोचूँ   क्या  पाया |
बचपन यौवन था यहीं , संग में  क्या लाया ||
दुख था तो रोता रहा , क़िस्मत  को  कोसा |
प्रभु का सुमिरन भूलकर , सुख में भरमाया ||

२ )
दुख अमावसी  रात- सा , सुख पूनम जैसा |
रैन- दिवस का आचरण , प्रकृति कहे वैसा ||
समय  चक्र  चलता  रहे , धूप कभी  छाया |
निस्पृह मन की साधना, फिर हो भय कैसा ||

३ )
कर्मठ रहे  मनुष्य जो , किस्मत लिख जाए |
मारा  जो  आलस्य  का , अक्सर  पछताए ||
किए  बिना फल कामना , श्रम में जो डूबा |
संतोषी  मन- वृत्ति  से , वो  ही  सुख  पाए ||

४ )
जीवन  नदिया  धार-  सा , पानी  का  रेला |
सजता  दो पल  के लिए , जीवन का मेला ||
जो  लहरों  से  जूझता ,  तट  उसने  पाया |
पार्थ- दृष्टि  हो  लक्ष्य पर , तब  भाए खेला ||

५ )
और अधिक  की लालसा , छीने सुख चैना |
जोड़  गुणा विचलित  करे , कटे  नहीं  रैना ||
मोक्ष  प्राप्ति  के  मार्ग पर ,  बन जाते  बैरी |
माया,  ममता,  मोह   के ,  उलझाते   बैना ||
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 34🎈
हे ! माता बगलामुखी, तू सुख की दाता  ।
द्वार पड़ा माँ दास ये, अरज सुनो माता  ।।
झोली  भरदो दीन की,  माता कल्यानी   ।
करो पार भव सिंधु से, जगदम्ब भवानी  ।।

काम  क्रोध  मद  लोभ  इन, असुरों ने घेरा  ।
मृगतृष्णा के जाल फंस, व्यथित हृदय मेरा  ।।
कृपा  कोर  करि दीन पर,  माँ मोहि उवारो  ।
चरण  धूल मम शीष धरि, असुरों को मारो  ।।
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विधा - उपमान छंद पर आधारित मुक्तक
मात्रिक भार - 13/10 पर यति पदांत गुरु-गुरु

मद  में  अंधे   मत  बनों,  बोलो  मृदु  वानी  ।
लांघो लछमन रेख मत दशमुख अभिमानी ।।
देख     रहा     है    ईश्वर,    करतूतें     तेरी  ।
मिल  जाये  कब  धूल  में,  कर मत नादानी ।।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 35🎈
प्रात उठो वंदन करो, रोज नहाओ जी।
आलस से कुट्टी करो, शीघ्र भगाओ जी।
कभी न मन कुंठित करो, हंसो हँसाओ जी।
इच्छा रखो प्रकाश की, लगन जगाओ जी।।

छूवे हम आकाश को,मन का कहना है।
कंटक आवे पथ भले, दृढ़ पग रखना है।
पहुँचेगें हम लक्ष्य तक, पल पल तपना है।
श्रम फल दे, तन्द्रा नहीं, प्रण ले उगना है।।
👇
चुलियाला छंद

मौन प्रश्न करती प्रकृति, मेरे मन प्रतिशोध नहीं है।
पर मानुष को क्या कहूँ, पर पीड़ा का बोध नहीं है।
जीते हैं उपकार में, हे मानुष! मन क्रोध नहीं है।
भूमि हृदय छलनी हुआ, इसका आज विरोध नहीं है।।

धरती पर दिखते नहीं, ऐसे दानव आज हुए हैं।
स्वयं मनुज की देन है, ऐसे ऐसे काज हुए हैं।
सिर ओखल में दे दिए, खुजलाते जो खाज हुए हैं।
और कहें क्या विश्व की, तहस-नहस सब ताज हुए हैं
👇
ढोल सुहावन दूर के, मन को भटकावे।
निज चीजें नीरस लगे, दूजा गुण गावे।।
बदले नहीं स्वभाव यह, आदत हर नर की।
दाल बराबर ही लगे, मुर्गी ज्यों घर की।।

असमंजस में बाँकुरा, क्यों ऐसा होता।
खोता जब उस वस्तु को, यादें ले रोता।।
कद्र करें निज वस्तु की, जो साथ निभाता।
बदलेंगे यदि रंग हम, कुछ हाथ न आता।।


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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 36🎈
चुलियाला छंद आधारित मुक्तक 

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नमन  करो  स्वीकार  माँ, तुमसे है पहचान शारदे।
कृपा  तुम्हारी  माँगता, रचना  में हो  जान  धार दे।
ईशन करती तुम सदा,स्वयं बनी जगदीश भवानी, 
बहुत भटक माता लिया,कर दे दया महान तार दे। 

पत्रकार बंधक  बने , कौन समय  के  राज सुनाए।
भला बचा अब कौन है,जनता की आवाज उठाए।
कविगण चारण लग रहे,नहीं रहे अब उग्र निराला,
चौथा खम्भा ढह गया,बजते जो सुर-साज रुलाए।

सिसकी भर कर सो गई,रही अधूरी बात अभागे।
हुई  मूर्त  संवेदना, खोद  रही  थी  गात  न जागे।
लेकर आये आज फिर , मीठे इतने  स्वप्न रसीले।
फटी रजाई आस की, काँप रही थी रात न तागे।।

मत  निकलो  घर से सखी, अमाँ घनेरा दूर प्रात है।
रोता कोई मंद स्वर, कठिन  विपद  मजबूर बात है।
आशंका भय छा रहा,खुदसे लड़ते लोग भला क्यों,
है विनाश सर पर खड़ा, हँसती देखो  क्रूर  रात  है।
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करता मन से कामना, तपता रहता है।
सो जाता है तू  कभी, जगता रहता है।
सपनो का संसार यह ,दिया और  बाती।
अन्तस् की आज्ञानता, मुक्ति नहीं पाती।।

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उपमान छंद
दिनांक ~ ५ अप्रैल २०२३

गुरु महिमा का गान कर, निज जन्म संँभालो।
दास भाव को भर हृदय, सहज कृपा पालो।।
भवसागर वह नर तरे,जो गुरु का प्यारा।
अखिल विश्व में भक्त ही, है सबसे न्यारा।।

राम शिष्य हनुमान ने, पार करी लंका।
रावण के ही सामने, बजा दिया डंका।।
देखिए गुरू की कृपा,का प्रमाण भारी।
महावीर जिससे बने,भक्तजन हितकारी।।
👇
उच्चकोटि की कल्पना,  छंदों में  भर लो।।
जन मन हर्षित हो उठे,भाव भरो ऐसे।
द्वेष भावना लुप्त हो, जतन करो वैसे।।

उपमान (दृढ़पद) छंद

मुक्तामणि सम मन रखो  , झूठ नहीं बोलो।
मधुर वचन ही बोलिए,जब भी मुख खोलो।।
त्यागो निजअभिमान को,जन मन पर छाओ।
उपकारी बन कर जियो, राम नाम गाओ।।

दीनों पर करके दया , दीनन हर्षाओ।
स्वार्थ भाव तज दीजिए, सतकर्म निभाओ।।
बैरी से भी बैर तज, निज हृदय सजाओ।
वैमनस्यता को मिटा , उर नेह जगाओ।।

कौशल कुमार पाण्डेय "आस"✍️
👇
उपमान छंद

सुमन खिले जब बाग में, भौंरे आ जाते।
पी   लेते   मकरंद  को , मस्ती  में  गाते।।
मौन सुमन बोले नहीं , भौंरे ठग  लेते।
यूँ ही नेता आज कल , धोखा दे  देते।।

वोट माँगने के लिए  ,  दरवाजे  आते।
वादों की बौछार वो ,आकर कर जाते।।
पा जाते जब वोट को, लौट नहीं पाते।
दंशक सम खूंं चूसते , मुँह नहिं दिखलाते।।

कौशल कुमार पाण्डेय आस

उपमान छंद - गीत 
शीर्षक - जीवन में रुकना नहीं

जीवन में रुकना नहीं, बस चलते रहना।
विध्न देखकर सामने, नहीं कभी थमना।।

स्याह  बहुत हो रात पर, तू मत घबराना।
रखकर दिल में हौसला, तू कदम बढ़ाना।।
निर्झरणी सम तू सदा, कल-कल कर बहना।
विध्न देखकर सामने, नहीं कभी थमना।।

मंज़िल पर बस हो नज़र, ध्येय यही तेरा।
बड़ी  सोच  को तू  बना, ले अपना  चेरा।।
साथ नहीं दे जग अगर, वाद नहीं करना।
विध्न देखकर सामने, नहीं कभी थमना।।

मानव जीवन जो मिला, व्यर्थ नहीं जाए।
नेक कार्य  का फल सदा, हिस्से में आए।।
सद्कर्मों  की पोटली, भरी  सदा रखना।
विध्न देखकर सामने, नहीं कभी थमना।।
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उपमान (दृढ़पद) छंद आधारित गीत
मात्रा भार - 23 (यति 13/10) 
पदान्त - चौकल 

शीर्षक - पति की व्यथा
__________________

बाल बचे बाकी नहीं, आगे क्या बोलूँ।।
बात राज  की ये भला, मैं कैसे खोलूँ।।

बीबी  लगती  है मुझे, प्राणों  से प्यारी।
साँसें  उस  पर वार दी, मैंने  हैं  सारी।।
मोटी है  लेकिन  नहीं, कहूँ  उसे भारी।
लगे  मुझे  वो  सुंदरी, रूपवती  नारी।।

उसकी  सब  फरमाइशें, पैसे  से  तोलूँ।
बात राज  की ये  भला, मैं कैसे खोलूँ।।

वो  जो  बोले  मैं  करूँ, कहूँ  उसे  भोली।
लगती उसकी हर अदा, फूलों की होली।।
दागे जिह्वा  से कभी, जब मुझ पर गोली।
लगे मुझे तब भी मधुर, उसकी है बोली।।

झाड़ू  पोंछा  संग  मैं, बर्तन  भी  धो  लूँ।
बात  राज़ की  ये भला, मैं कैसे  खोलूँ।।

कुपित कभी बन बैठती, वो बिगड़ी घोड़ी। 
बढ़ जाती तब  धड़कनें, मेरी  भी  थोड़ी।।
सोचूँ   बैठा  हाय!  मैं,  कैसी  यह  जोड़ी।
लगे मुझे तब  जिन्दगी,  जैसे  हो  रोड़ी।।

कभी-कभी है  मन करे,  थोड़ा मैं  रो लूँ।
बात  राज़  की  ये भला, मैं कैसे  खोलूँ।।


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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 40🎈
 मुक्तक

श्री राधा के हाथ पर ,लिखते हरि प्यारे।
गढ़ते प्रीति रहस्य को, भाव लिए सारे।
मंत्र- मुग्ध श्री राधिका ,सुध-बुध सब खो दी--
भोली- सी वृषभानुजा, श्याम हृदय हारे।।

एक बार की हरि कथा ,आज यहाँ गाऊँ।
हरि की लीला को भला ,कैसे बिसराऊँ।
यशुदा माँ अरु राधिका,कुपित हुए दोनों--
हरि-उर को लिखकर सदा,चैन यहाँ पाऊँ।।

पहुँचे मोहन रूप धर,वह तो बरसाने।
पाने राधा की झलक,लगते हरि गाने।
हाथ रचा लो प्रिय हिना,सुन कीर्ति-किशोरी--
और पूछते क्या लिखूँ,दर्श लगे पाने।।

कहती राधा तुम लिखो,नाम वही प्यारा।
सदा अधूरी राधिका,हरि पर उर वारा।
क्रोधित मैं तो हूँ क्षणिक, प्रभु जीवन मेरे--
कृष्ण-कृष्ण ही तुम लिखो,प्रेम लिये धारा।।

👇
उपमान छंद आधारित गीत

'तेरा-मेरा' का जगत्, बहुत झमेला है। 
सच है हर इंसान ही ,यहाँ अकेला है।।

जग चालाकी से लुटे,       लुटकर हँसता है। 
जाल बिछा कर एक दिन,खुद ही फँसता है।।
झूठे रिश्ते हैं सभी ,       झूठा खेला है ।
सच है हर इंसान ही,  बहुत अकेला है।।

चुप रह जा सब देखकर,गड़बड़झाला है।
अपना ही करता यहाँ,   बस घोटाला है।।
चिकनी-चिकनी बात का ,छोड़े रेला है।
सच है हर इंसान ही ,   यहाँ अकेला है।।

बच कर रहना प्रिय यहाँ,तुम फँस जाओगे।
सच जानकर बाद में,    फिर पछताओगे।।
ठगती है मासूमियत ,     छल का चेला है।
सच है हर इंसान ही ,     यहाँ अकेला है।।
उपमान छंद आधारित गीतिका

कुंठा में जो जी रहा,वह ही हारा है।
कर्म नहीं कुछ वह करे,फिरता मारा है।

रोने से मिलता नहीं,प्रिय फल लगता जो..
यत्न नहीं करता कभी,जो बेचारा है।

जीवन यह संघर्ष है,द्वंद यहाँ चलते..
जीतो अंतर्द्वंद्व को,बदले धारा है।

दृष्टिकोण बदलो सदा,ऊँचाई पाओ..
जी-भर भरो उड़ान को,यह नभ सारा है।

तम में बनना 'वर्तिका',मार्ग धवल देना..
उर शासन वो ही करे,जो भी प्यारा है।।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 41🎈

पनघट पर है ताक में , मोहन गिरधारी। 
मटकी गोपिन  देखकर  कंकरिया मारी। |
करें  शिकायत आज हम ,  बोली मिल सारी
गुण सब  देखे लाल के , यशुदा      महतारी।|

मैया   तेरा लाल भी , खूब सताता है। 
सिर पर मटकी देखकर ,  तोड़ गिराता है। 
जादू जाने कौन सा  इसको आता है। 
पड़ती झूठी  हम सभी, सच कहलाता है। 

सुन गोपिन  की बात सब , मोहन मुस्काते। 
बढ़ती जाती बात तब , मुरली दिखलाते |
मुरली की धुन सुनकर , सुध-बुध सब खोई। 
बचा कन्हैया एक ही ,  'अंजु' कहाँ कोई। 

            अंजु कपूर गांधी  रोहतक

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 42🎈

जन्म मरण हरि हाथ सब,जगत न कर पाता,
लिखे ईश  तकदीर  हक,     कौन छीन लाता।
बनता वही महान है,        जिसे ज्ञान भरता,
निर्णय उसके हाथ में,    हरि  जगत विधा ,

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उपमान छंद
विधान -13/10 चरणान्त -गा गा
दिनांक -11/4/2023

छलियों से बचकर रहें,  चोट सदा करते।
धोखा दें दिल तोड़ते, घाव बहुत सहते।।
भला न इनका साथ है,  झूठी सब बातें।
सज्जन संगत कीजिए, मिलती सौगातें।।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 43🎈

 एक गीत
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रह रहकर ढाता गजब,तेरा मुस्काना।
कर देगी तेरी अदा, हमको  दीवाना।।

चंदा  जैसी  चाँदनी, सूरज  सी  आभा।
सीख गया है फैलना, तूझसे ही नाभा।।
जुल्फों से श्यामल निशा,दिन ने छिप जाना।
कर   देगी   तेरी   अदा,   हमको   दीवाना।।

तुझे देख धरती सजी,ओढ़ चुनर धानी।
सीखा स्यात समीर ने,करना मनमानी।।
खिलना सीखा पुष्प ने, भँवरे  ने  गाना।
कर  देगी  तेरी  अदा,  हमको  दीवाना।।

देख  तुझे  मौसम  भरे, भावन अँगड़ाई।
नजरें तीर कमान सी,फिर भी सुखदाई।।
आनंदित करता हमें, तेरा शरमाना।
कर देगी तेरी अदा,हमको दीवाना।।

बिन  पीये ही  छा  गई,  कैसी   मदहोशी।
हलचल सी दिल में मची,बाहर खामोशी।।
"धर्म"हुआ मुश्किल बड़ा,खुद को समझाना।
कर   देगी   तेरी   अदा,    हमको   दीवाना।।
                        धर्मपाल धर्म✍️
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 44🎈
छुप-छुप कर होती रही, मधुर मिलन बातें ।
दिल  को  दिल देता रहा, स्वप्निल  सौगातें ।
बांहों में  थी  प्यार की , रिमझिम  बरसातें ।
दिल  को  आखिर ले  गई, दिलवाली  रातें ।

दो जिस्मों में रात फिर, छिड़ी वही  बातें ।
तन से तन को मिल गई, मीठी   सौगातें  ।
भोर तोड़ कर आ गई , सघन तिमिर रातें ।
नैन   घरौंदे    से   बही, खारी    बरसातें  ।
उपमान छंद 
13,10-चरणान्त -- गागा चौकल
मुक्तक 

बन सजनी के साजना, तड़प-तड़प  जाते ।
धक-धक करती धड़कनें, सपन भी सताते ।
उसके  दर  से जब  हवा , झूम- झूम आती-
करके  नैना  याद  फिर, अश्क  ही  बहाते ।
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 45🎈
मुक्तक 

गूंथें माली फन सजा, विधता तन मेरा।
वधु  पहनाती कूदती, हर्षित  मन मेरा।
मन को जोड़ा मान से,सुख पाती ऑंखें;
आज बजी शहनाइयां, झूमें  पग  मेरा।।
                         *
धीरे-धीरे    घूमता, ऑंखों   को   भाया।
घट मेंरा जल से सजा,सबको ही भाया।
रामलला  के  देश  में, मिलता जयकारा,
मीठा - मीठा  सा  लगे, मैंने  जो  पाया।।
                           *
दीक्षा शिक्षक  की उड़ी,आओं  मिल गाएं।
छुपी  हुई  बातें  सभी,जग को  दिखलाएं।
सुंदर  सुंदर  शैल  यह,इनकी  गहरी  रातें,
खुर्द बीन बनकर यहां,फूलों को  समझाएं।।
                           *
पर्वत - पर्वत   घूमता, देश  का   सिपाही।
शीतल करती नीर यह,मिट्टी सजी सुराही।
सर्वे  गणना  में  खड़ा, बना  राष्ट्र निर्माता;
बातें  शिक्षा  की  करें, करता फिरे उगाही।।
                          ***
👇
उपमान , दृढ़पद छंद (एक प्रयास)
                      ०
माटी माटी हो गई, सबको  यह चौंका।
जैसी करनी आपकी, वैसा  ही  मौका।।
तूने  रौंदा  सत्य  को, करके जग झूठा।
धोखे को धोखा मिला,चौके पर छक्का।
                       ०
द्रोही जब राजा बने, डाले  तन   बाना।
अपराधी सी भावना,करता जो ना-ना।।
धार बहे,प्रयाग लखे, ऑंखों  में  छाला।
सच्ची बातें भी  लगी, कानूनी   काला।।
                         ०
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 46🎈
उपमान छंदाधारित रचनाएं 

बारिश होती प्रेम की,बूंदें ममता की,
भेद भाव करते नहीं,चाहत समता की।
मानवता ही धर्म है,इसको अपनाएं,
त्यागें नींद अज्ञान की,अब तो जग जाएं।
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आदत अगर खराब हो,उसका त्याग करो,
जीवन में सद्भावना,मिल कर आज भरो।।
खोटा जो सिक्का हुआ, कभी न चल पाया,
जिसने बस छल ही किया,उसने छल पाया।
👇
उपमान छंदाधारित गीतिका 

बलिदानों की भूमि है,शत शत नमन करें , 
सहन नहीं करना उन्हें, जो विष वमन करें।

काम क्रोध मद लोभ तो, दुश्मन है सारे,
इनका जीवन से सदा, मिलकर शमन करें ।

सुंदर धरती स्वर्ग से,शोभा न्यारी है, 
सुख की वर्षा से इसे,आओ चमन करें।

भारत मां के वीर हैं,याद रखें दुश्मन,
आंख उठा देखा अगर,पल में दमन करें।

राम लला से पुत्र सब,आज्ञाकारी हैं,
तत्क्षण आज्ञा मान कर,वन को गमन करें।
उपमान छंदाधारित गीतिका
समांत - आना, अपदांत 

दुनियादारी में चले,बस रोना गाना,
किसने किसको है यहां,कब अपना माना।

इतनी सी यह सीख है,मान सको मानो,
अपना जो भी हो सगा, उसे न तरसाना।

सच्चाई की राह पर,कठिन सदा चलना,
होता पर आसान है,सबको उलझाना।

धमकी देना सरल है, करें नहीं पूरी,
सरल नहीं होता कभी,सच में मर जाना।

ज़ख्म सदा दे जिंदगी,हल्के या भारी,
होता है मुश्किल बड़ा,सदा प्यार पाना।

दौलत यह अनमोल है,नेमत यह जानो,
प्यार अगर सच्चा मिले, कभी न ठुकराना।

जीवन भर ढूंढा किये,मिले नहीं सजना,
तुमको मिल जाएं अगर, हमसे मिलवाना।
👇
उपमान छंदाधारित गीतिका 

रामायण अपना धर्म है,और कर्म गीता,
है शुभ कर्मों के  बिना,जीवन यह रीता।

जीवन में यह सीख लें,काम नहीं टालें,
तय यह करना है सदा, सार्थक पल बीता।

सोने की लंका जली,जय जय रघु वंदन,
याद किया पल पल सदा, प्रभु ने बस सीता।

राधा किशन सदा रहे,बन अनुपम जोड़ी,
बड़ी  राधिका  है सदा, कान्हा परिणीता।

यही जिंदगी का  सबक,सीख आज पाए,
जब लड़ते अपने अगर,लाभ न जग जीता।
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संजीव नाईक

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 47🎈

#विधा - उपमान / दृढ़पद आधारित गीत 

हास्य-व्यंग्य
"ससुराल "

सुबह सबेरे नित्य ही, बना रही खाना।
फिर भी देखो सासु माँ, मार रही ताना॥

प्यारे पति जी साथ में, मिली ननद रानी।
बैठे दोनों मौज में, भरती मैं पानी ।
राम कसम साजन कहे, मायके न जाना।
फिर भी देखो सासु माँ, मार रही ताना॥

पढ़ी - लिखी मैं नार हूँ, हिन्दी में बोलूँ।
कंत अँगूठा छाप है, राज कहाँ खोलूँ।
दिन को कहता रात है, एक आँख काना।
फिर भी देखो सासु माँ, मार रही ताना॥

हाल हृदय का क्या कहूँ, दिवा -रात्रि रोती ।
भाये तन को भी नहीं,जेवर या मोती।
हाल बुरा ससुराल का, अब मैंने जाना।
फिर भी देखो सासु माँ, मार रही ताना॥
👇
#छंद #उपमान (दृृढ़पद ) - 23 मात्रा , ( 13- 10) पदांत चौकल ,

सरल छंद उपमान यह, छंद महल शोभा।
अनुपम लेखन से सभी, जग का मन मोहा॥
तेरह दस के मिलन से, शब्द सार गहना।
शब्द - शिल्प लय भाव से, शब्द हार पहना॥

कर चौकल से अंत पद, गुरु की है वाणी।
उपमान छंद में बसे,अम्बे कल्याणी।।
कृपा दृष्टि माँ शारदा, छंद महल नामी।
हँसवाहिनी दया करे, तो हम सुर स्वामी।।

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चकित तकत हरि सांवरे,तट जमुना कारी।
भरन चली जल राधिका,     बरसाने वारी।
शीतल जल मटकी भरी, सर गगरी धारी।
राह चलत गज गामिनी,    भींग रही सारी।

थमत चलत पग मत धरे,    राधा मन भारी।
पुनि पुनि कुंजन दिश लखे,खोजत बनवारी।
श्याम दरस बिन कल नहीं, सखि हों मन हारी।
बेगि जतन       से ताप हर   ,ओ गुइयां प्यारी।

श्याम लखी गत राधिका,दरस देन धाए।
पुहुप माल उर साजते,श्यामल छवि भाए।
मकर नयन मनमोहनी,अधरन मुसकाए।
चकित तकत पिय राधिका,हरि सम्मुख आए।
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उपमान छंद पर आधारित गीत 
13 , 10 पर यति पदांत  2 2

चलो आज सोचें जरा, कैसा यह नाता। 
गर बच्चे नाराज हों, फिर क्या है भाता। 

वो ललकारें मातु पर, करतीं मनमानी। 
मैंने छोड़ा आप पर, कैसी नादानी। 
मातु सदा करती भला, फिर भी भरमाता।
गर बच्चे नाराज हों, फिर क्या है भाता। 

माता सोचे हर समय, बच्चों की खुशियाँ। 
उसकी तो बस एक है, प्यारी सी दुनियाँ। 
समझ नहीं पाता कभी, क्रोध उसे आता। 
गर बच्चे नाराज हों, फिर क्या है भाता। 

उम्र बढ़ेगी आपकी, समझोगे उस दिन। 
माता का संसार है, सूना सा तुम बिन। 
शर्मसार होगे कभी, काश समझ पाता। 
गर बच्चे नाराज हों,फिर क्या है भाता।
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 50 🎈

विधा-मुक्तक
छंद-उपमान

तिमिर नाश होते चले, अपने घर तारे।
चाँद चाँदनी के बिना, गुम सुम थे सारे।
हँसे कमल दल फिर सुखद, दूर निद्रा भागी,
विजयी दिनकर जो हुआ, हर संकट टारे।

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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 51🎈

💐                नमन छंद महल               💐
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                      -  सरसी छंद  -            
पृथ्वी सहित  सौर मण्डल में, होते  हैं  ग्रह आठ।
प्रकृति पढ़ाती है मानव को, जीवन का हर पाठ।।
जीवन केवल है पृथ्वी पर, यही अभी तक ज्ञात।
पृथ्वी के  घूर्णन  से  होते, दुनिया  में  दिन-रात।।

सूरज से तृतीय ग्रह पृथ्वी, जो  है  अंडाकार।
तकनीकी तो शून्य किंतु है, द्रव्यमान में भार।।
पश्चिम से यह घूम रही है, पूर्व दिशा की ओर।
पृथ्वी का भूपटल खंड में, होता बहुत कठोर।।

इकहत्तर प्रतिशत में पानी, भू केवल उन्तीस।
एक पूर्ण घूर्णन में लगते, घण्टे कुल चौबीस।।
पृथ्वी पर हैं सात समंदर, जीव-जंतु जलजात।
आधी पृथ्वी पर दिन होता,आधी पर तब रात।।

पृथ्वी  का  संरक्षण करना, हम  सबका  कर्तव्य।
इसमें ही  प्राकृतिक सम्पदा, भरी  हुई  है  भव्य।।
अग्नि हवा जल है पृथ्वी पर, खनिजों के भण्डार।
पृथ्वी  ही   माता   कहलाती, पृथ्वी  ही  संसार।।

दोहन किया प्रकृति का हमने, अनियंत्रित अविराम।
सूखा   बाढ़   महामारी   हैं,   इसके    दुष्परिणाम।।
घोर  आपदाओं से  जग  को, पाना  है  यदि  मुक्ति।
पर्यावरण  सुरक्षा  की  तब,  करनी   होगी   युक्ति।।

               - हरिओम श्रीवास्तव -
                       भोपाल म.प्र.
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                🎈  पृष्ठ क्रमांक _ 52🎈
उपमान(दृढपद)छंद 
विधान:-२३ मात्रा (१३-१०,पदांत चौकल )
विषय:- गुरु की महिमा

बिन गुरु तुम रहना नही,पहले  गुरु  मानो।
गुरु की महिमा है बड़ी,अब सच को जानो।।
कैसा  हो  गुरु  आपका, मन में अब ठानो।
मूढ़  मनुज  है  या  सुधी, उनको पहचानो।।

भूल  हुई   पहचान  में, मूर्ख   गुरू  पाया।
मान करो फिर भी सदा,गुरु हैं प्रभु छाया।।
(प्रभु ने दी है सुन  मनुज  यह  सुन्दर काया।
गुरु ही वह तो व्यक्ति है,प्रभु को बतलाया।।

एक   बार   की  बात  है, ग्रन्थों  में आया।
नारद  ने प्रभु  विष्णु से, बहुत  मान पाया।।
बाहर  निकले  जब  वही,कहा सुनो माया।
अभी करा दो  गोबरी, जह  ऋषि  बैठाया।।

बात  सुन  लिये  ब्रह्मसू, पूछा  क्यों ऐसा।
ईश विष्णु ने तब कहा, यह  सवाल कैसा।।
नारद जी ने जिद किया,कहा प्रभु!बताओ।
क्या  मैं  पावन  हूँ नही, बात मत घुमाओ।।

ऋषिवर आप हो निगुरे,कही मधुर बाणी।
भूमि  अपावन हो गयी, कहें  चक्रपाणी।।
नारद जी ने फिर कहा,किसे गुरु बनाऊँ।
गुरू  बनाने  के  लिये, प्रभू! कहाँ जाऊँ।।

ईश विष्णु ने फिर कहा,मृत्यु लोक जाओ।
मानव जो पहले  मिले, उसे गुरु बनाओ।।
नारद  ने   भू  लोक  में, देखा  मछुआरा।
लौट  गये  प्रभु  से कहे, उसे अक्ल मारा।।

(महा  मूर्ख  वह है  मनुज , गुरु होगा कैसे।
प्रण पूरी ऋषि अब करो, हो चाहे जैसे।।
विवश हुये ऋषिवर तभी,उसे गुरू माना।
गुरु को मूरख फिर कहे,शब्द कहे नाना।।

ईश विष्णु क्रोधित हुये, दिये श्राप भारी।
लख  चौरासी योनि  में, घूमो ऋषि रारी।।
हाथ जोड़ ऋषि ने कहा,मुक्ति दो मुरारी।
भेज,कहा गुरु से कहो, युति देगें न्यारी।।

गुरू पास ऋषि आ गये,सब कुछ बतलाये।
मछुआरे ने युति दिया,ऋषि को समझाये।।
सर्व  योनि  के  चित्र  को,प्रभु से बनवाना।
लेकर  उनको  पास  में, भू  पर आ जाना।।

चित्र बना कर प्रभु दिये, ऋषि भू पर लाये।
नारद   लेटे   चित्र  पर,  गुरुवर   घुमवाये।।
जाकर प्रभु जी से कहो, अब तो दें  माफी।
गुरुनिंदा फिर नहि करूँ,सीख मिली काफी।।

गुरु ईश्वर  का रूप है, 'अमन' न ठुकराओ।
ज्ञान मिले नहि बिन गुरू,दर्प अब मिटाओ।।
दास  बनो  नित गुरू का,  अहित नही होगा।
दृढ़  आस्था विश्वास से, मिले न दुख भोगा।।

महेन्द्रप्रसाद दुबे'अमन'
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