https://subhashsinghai.blogspot.com/जय श्री विमर्श चालीसा
ॐ नम: सिद्धेभ्या || श्री विमर्श सागराय नम:
|| जय श्री विमर्श चालीसा ||
दोहा ~ हे गुरुवर सच आप हैं , हम सबको वरदान |
ज्ञान गंग में करा रहे , जन - जन को स्नान ||
नगर जतारा जन्म है , पिता सनत का गेह |
मात् भगवती से सदा , पाया अनुपम नेह||
जय विमर्श अब हैं जगत , वैतरणी का नाम |
चलते फिरते तीर्थ हैं , रुकें जहाँ वह धाम ||
आप शरण में लीजिए ,विनती करे "सुभाष" |
अंधकार के मार्ग में , देना सदा प्रकाश ||
चौपाई छंद में चालीसा -
जय विमर्श जी मेरे गुरुवर |
ज्ञान शिखर आगम के तरुवर ||
सम्यक दर्शन की प्रति मूरत |
ज्ञान चारित्र की उजली सूरत || (1)
बूँद बना जीवन यह पानी |
हर मानव की यही कहानी ||
महाकाव्य इस पर रच डाला |
कालजयी रचना है आला ||(2)
जिनआगम की राह बताते |
चौथी युग चर्या अपनाते ||
सरगम जिनके कंठ विराजे |
रचे छंद शुभ प्रतिदिन ताजे ||(3)
आप आशुकवि मन अति कोमल |
हरी भरी सब मन की कोपल ||
ज्ञानगंग की अविरल धारा |
रहते जिसके भव्य किनारा || (4)
आत्मसाधना अनुपम चिन्तन|
जन-जन करता जिनका वन्दन ||
विश्व आपका ऋणी रहेगा |
मोक्ष मार्ग जयकार करेगा ||(5)
अलग - अलग जो बनते ग्रंथी |
बने जिनागम वह सब पंथी | |
बात सरल यह सदा बताते |
सूत्र एकता को अपनाते ||(6)
महावीर की वाणी मानो |
जिन शासन को अब पहचानो ||
अलग-अलग मत राग अलापो |
बात एक-सी मिलकर थापो ||(7)
आज समय हालात सुनाते |
रहो एक सब यह चेताते ||
नहीं कलुष के फेर न पड़ना |
रहता गुरुवर का यह कहना ||(8)
जैन धर्म का ध्वज लहराना |
जिन शासन जयवंत बनाना ||
रखो एकता अवसर आए |
समय काल जब संकट लाए ||(9)
प्रचर-गमथ-गतिपथ पहचाना |
गुजर- घाट सब नेक समाना ||
एक भाव सब कहने मिलते |
शब्द अनेकों भाषा खिलते ||(10)
गुरु विराग के है लघुनंदन |
महावीर चरणों के चंदन ||
शांतिनाथ को देकर नाबा |
है अहार के छोटे बाबा || (11)
संघ चतुर्विध संग में चलता |
समोशरण -सा जन को लगता ||
प्रवचन में जब रस है खिलता |
आत्म बोध का अमरत मिलता || (12)
वाणी गुरु की मन को भावे |
आकुलता मन से हट जावे ||
मिलती चिन्तन में गहराई |
थाह सभी ने यह है पाई || (13)
ज्ञान सरोवर में जल बढता |
कमल सदा ऊपर ही चढ़ता ||
ऐसी ही गुरुवर की काया |
जब भी देखा अनुपम पाया ||(14)
आगम ग्रंथों के अनुवादक |
देव शास्त्र गुरु के आराधक ||
पापी मन पावन हो जाता |
जो भी गुरु चरणों में आता || (15)
गुरुवर के चरणों की धूली |
नष्ट करे पापों की शूली | |
जिसने आकर चरण पखारे |
जग तापों के कष्ट निवारे ||(16)
चरण कमल में शिर धर दीन्हा |
गुरु ने उसको अपना लीन्हा ||
राह दिखाई उसको न्यारी |
मोक्ष मार्ग की दी तैयारी ||(17)
वचन सदा आल्हादित करते |
नूतन ऊर्जा मन में भरते | |
जो समीप चरणों में रहता |
अविरल गंगा नहवन करता || (18)
त्याग तपस्या मूरत लगती |
चर्या चरणों में आ बसती | |
पल- पल जिनका करे तपस्या |
रहे वहाँ पर कौन समस्या || (19)
चरण आपके मंगल करते |
सदा अमंगल जन के हरते ||
सिद्ध शिला के हो अधिकारी |
हम सब सेवक हैं वलिहारी ||(20)
सुनते श्रावक पावन वाणी |
जो होते आतम कल्याणी ||
मोक्ष मार्ग के बनते पाणी |
आते सुनने को जो प्राणी ||(21)
सदा साधना को अपनाते |
आदर्शों के चिन्ह बनाते ||
लक्ष्य आपका सिद्ब शिला है |
जिसमें निज का छिपा भला है ||(22)
भवसागर से पार लगाना |
शरण वीर की शुभ बतलाना ||
गुरुवर सच्चे हो उपदेशक |
ध्यान योग के हो परिवेशक ||(23)
हटवें मन से सदा विकारें |
अपने मन में नेक विचारें ||
निज के सँग जग हो कल्याणी |
रखते मन में शुभकर वाणी ||(24)
सदा ध्यान सामायिक करते |
भव पीड़ा आतम की हरते ||
जहाँ प्रतिक्रमण रहता पावन |
गुरुवर लगते हैं मन भावन ||(25)
आठ अंग हैं योग सुनाते |
पहला जिसमें 'ध्यान 'बताते ||
कहें 'धारणा'- 'यम' -'आसन' के |
और 'नियम'भी निज मन के || (26)
कहते 'प्रत्याहार' सुहाना |
सप्तम 'प्राणा़याम' बताना ||
गुरु विमर्श जी परिषह सहते |
श्रेष्ठ 'समाधि' अंतिम कहते ||(27)
कई ग्रंथों को सहज बनाया |
अर्थ बताकर है समझाया ||
लिखे काव्य है कवि भी बनकर |
धन्य सभी होते हैं सुनकर || (28)
कई ग्रंथ भी रच डाले है |
सभी मोक्ष के हित वाले है ||
नमन ' सुभाषा' सबको करता |
सदा उर्जा मन में भरता || (29)
'रयणसार' की टीका देखी |
आतम के हित सबने लेखी ||
पढ़ते जब 'जाहिद की गज़लें '|
आत्म तत्व की लगती फसलें ||30
भक्तामर की महिमा हितकर |
"मानतुंग के मोती" लिखकर ||
हम सबको है भक्त बनाया |
आदिनाथ की महिमा गाया || 31
प्रवचन का साहित्य बड़ा है |
लिए ग्रंथ आकार खड़ा है |
"योगोदय" "रत्नोदय" देखा |
जीवन को यह हितकर लेखा || 32
"शब्द शब्द अमृत" है पुस्तक |
" देशव्रतोदय"को नत मस्तक ||
"साम्योदय" को जिसने जाना |
निज जीवन उसने पहचाना || 33
"भरत बने घर में बैरागी" |
पढ़कर पुस्तक किस्मत जागी | |
"गूँगी चीख" अनोखी पुस्तक |
जिसे झुकाएँ हम सब मस्तक ||34
"प्रतिक्रमण एक अनुचिंतन" है|
कहती यह पुस्तक का मन है ||
पाँच भाग है "रणयोदय" के |
पढ़कर जागे भाग्य निलय के || 35
काव्य पाठ के पढ़कर संग्रह |
जन- जन देता है यह कह ||
आप महाकवि गुरु विमर्श है |
नगर जतारा एक हर्ष है ||36
लिखे "समर्पण स्वर" अलबेले |
"गीतांजलि" में गीत नबेले ||
लिखा "आइना" काव्य निराला |
"वंदनीय गुरुवर" उजियाला ||37
"कर लो गुरु का अब गुणगाना"|
लिखा काव्य लगता गुणधाना ||
"खूबसूरत लाइने" पढ़कर |
सभी काव्य लगते बढ चढ़कर || 38
"अप्पोदया प्राकृत टीका " |
ग्रंथ निराला सबसे नीका ||
काव्य अनेकों आप लिखे है |
बढ़ चढ़ कर ही सभी दिखे है || 39
नमन " सुभाषा" पुनि-पुनि करता |
भाव सहित चालीसा लिखता ||
लिखने में त्रुटि जिसको आबे |
करें सुधारा मन जो भाबे || 40
दोहा -
*राह* कहो या *रास्ता* , *पथ* कह दो या *पंथ* |
*मार्ग* कहो या *मग* कहो, पर मानो जिन ग्रंथ ||
चतुर्मास है आपका , स्वर्ण जयंती योग |
नगर जतारा धन्य है , धन्य यहाँ के लोग ||
चालीसा पढ़ भाव से , करना गुरु प्रणाम |
जय विमर्श जी बोलना , पाना अनुपम धाम ||
चालीसा चालीस दिन , पढ़ना बस इक बार |
गुरु विमर्श होगी कृपा , होगें कष्ट निवार | |
लेखक / कवि - सुभाष सिंघई एम०ए० (हिंदी साहित्य )
जतारा (टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबा० 9584710660
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
उल्लाला छंद परिचय - चार चरण , दोहे का प्रथम चरण जैसा ही , चारों चरणों में प्रयोग होता है , यानी इस छंद में प्रत्येक चरण में यति - रगण (212) या नगण (111) से होती है | प्रत्येक चरण तेरह मात्रा का होता है | पन्द्रह मात्राओं का भी उल्लाला छंद देखने मिलता है , पर 13 मात्रा का ही प्रचलित है , व यह छंद ल़य भी अच्छी देता है |
उल्लाला छंद में परम पूज्य आचार्य
""श्री विमर्शसागर मंगलाष्टक ""
"""गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् ""
आदिनाथ को कर नमन , जय विमर्श उच्चारिये |
वंदन करिए भाव से , मंगल चरण पखारिये ||
भाव सभी मंगल बनें , मंगल कारज कीजिए |
हटे अमंगल सब यहाँ , गुरु कृपा शिर लीजिए ||
आदि जहाँ पर हम करें , तब गुरुवर आशीष है |
हम सब ऐसा मानते , गुरु होता जगदीश है ||
ब्रम्हा गुरुवर मानकर , लिखे नमन को अब कलम |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || ( 1)
गुरु विमर्श है मंगलम् , युग नायक श्री संत हैं |
चर्या पावन देखते , मोक्ष लक्ष्मी कंत हैं ||
जहाँ आचरण गंग है , सत्यम के प्रतिविम्ब हैं |
मोक्ष मार्गी जीव को , बने आज अवलम्ब है ||
तारण हारे आप है , दिशा ज्ञान प्रतिमान है |
त्याग सूर्य के पुंज है , मंगल अभियुत्थान है ||
शरण आपकी तोड़ती , जग नातों का है भरम |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || ( 2)
संघ चतुर्विध आपका , समोशरण अनुभाग है |
वीतरागिता देखकर , हमें धर्म अनुराग है ||
दिव्य भव्य सब आपका,शिव स्वरूप मनुहार है |
गुरु विमर्श जी है नमन , वंदन बारम्बार है ||
वचन आपके है हिती , करते जन कल्याण हैं |
जीवन को मंगल करें , पावन होते प्राण हैं |
गुरुवर का दर्शन मिले , सभी टूटते तब अहम् |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (3 )
संत भाव लिंगी बने , सच्चे गुरुवर आप है |
वेश दिगम्वर देखते , वीतरागिता माप है ||
सभी राष्ट्रयोगी कहें , गुरु पुंगव भी मानते |
श्रमणाचार्या में गिनें , कवि महान पहचानते ||
धर्म दिवाकर भूप हो , शीत ऋतू में धूप हो |
भव सागर में तारने , गुरुवर आप अनूप हो ||
चौथी युग चर्या रहें , करे साधना तप धरम |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (4 )
काल जयी अब काव्य है , पानी जीवन बूँद है |
यह तन जो हम देखते , केवल एक फफूँद है ||
कब मिट जाए बुलबुला , कहते गुरु सटीक हैं |
दिखी सनातन से सदा, हम सबको यह लीक हैं ||
गुरु विमर्श का ग्रंथ यह , महाकाव्य का रूप है |
सदा धरोहर है जगत , युग को बना अनूप है ||
नमन करूँ इस काव्य को ,लगे हितैषी सच परम |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (5 )
ग्रंथ अनेकों आपके , प्रवचन शुचि साहित्य है |
टीकाओं के देखते , जिनमें आगम सत्य है ||
काव्य अनेकों जो लिखे ,आतम हित की बात है |
युगों-युगों तक यह अमर ,रहें सदा सौगात है ||
कलम आपकी दे सदा , एक नया चिंतन यहाँ |
गुरु विमर्श को छोड़कर , श्रावक जाए अब कहाँ ||
प्रवचन में सुनते सदा , कल्याणी वाणी नरम |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (6 )
चरण आपके छू सभी , हो जाते हम धन्य हैं |
कर कमलों आशीष से , जग जाते सब पुन्य हैं ||
करूँ आरती आपकी , अंधकार सब नाश हो |
नव जीवन बगिया खिले , उजला नया प्रकाश हो ||
चरण धूल से रोग भी , सभी शमन हम देखते |
यह "सुभाष" अनुभव किया , और हृदय में लेखते ||
पतित यहाँ पावन बनें , और सुधरते है करम |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (7 )
नमन -नमन गुरुवर नमन , स्वीकारो अब दास को |
चरणों में अर्पण करूँ , भक्ति और विश्वास को ||
हित मित प्रिय है सब वचन, शुभ मय सब संदेश है |
गुरु विमर्श जी आपका , पंथ जिनागम वेश है ||
समरसता की बात कर , सत्य ज्ञान प्रतिविम्ब है |
जैन धर्म के ध्वज तले , आप सत्य अवलम्ब है ||
जिसको भी सानिध्य मिले , दूर करेगा वह वहम् |
गुरु विमर्श जी कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (8 )
लेखक / कवि- सुभाष सिंघई , एम० ए० (हिंदी साहित्य )
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र० , मोबा० 9584710660
~~~~~~~~~~~~~~
यह सभी मंगलाष्टक गुरु कृपा हेतु , भक्ति स्वरुप सुखदायी व मंगलकारी है ,
फिर भी विशेष रुप से - प्रथम - कार्य प्रारंभ हेतु | द्वितीय - भ्रमित अवस्था में मार्ग प्रशस्त हेतु | तृतीय - परिवार एकता व विखराव बचाव हेतु | चतुर्थ-परिवार में धर्म वृद्धि हेतु | पंचम - बचपन में बालक में बुद्धि और शिक्षा हेतु |षप्टम - बालक की उच्च शिक्षा हेतु | सप्तम -रोग शोक कष्ट निवारण हेतु , |अष्टम - वृद्ध परिजनो के कष्ट निवारण हेतु | गुरु की भक्ति विशेष की जा सकती है |
लेखक की यह अनुभूति है |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
परम पूज्य , बालयति ,भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महामुनिराज जी की बुंदेली बोली में पूजन
कुकुभ /ताटंक छंद में
(16- 14 मात्रा भार , पदांत दो दीर्घ / तीन दीर्घ)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
स्थापना
सिंहासन पै फूल बिछा दय , नीचट भाव बनाये है |
गुरु विमर्श जी आन बिराजौ , हम पूजन खौं आये है ||
बिनतुआइ भी सबरी लगबें , पूजा मोरी स्वीकारौ |
चरनन खौं इस्थापन कर दौ ,तब मोखौ लगै सहारौ ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज , अत्र अवतर -अवतर संवोषट् आह्वाननम्
अत्र तिष्ठ- तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् | अत्र मम् सन्निहितो
भव -भव बषट् सन्निधिकरणम्
~~~~~~~
जल
पानू से हम भरकै डबला , केवट बनके आये है |
चरन आपके धौकै मानें , राम अपुन से पाये है ||
पाप धुलै सब मौरे अब तो, हम खौ आस लगाने है |
गुरु विमर्श के चरनन छूकै, खुद हमखौं तर जाने है ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , जन्म- जरा -
मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~
चंदन
चड़ौ जगत्तर ताप टिपिरियन , सौ हम चंदन ल्याये है |
सबइँ ताप चटपट हो जाबैं , बिनतुआइ खौं आये है ||
हौरा से हम भुँजतइ राबैं , ताप जनम भर हम पाबै |
गुरु विमर्श जी हेरौ हमखौं , हम चंदन इतइँ चढ़ाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , संसार ताप विनाशनाय
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~~~
अक्षत
चाँउर हम तौ नौनें जानै , धो धा कै हम ल्यायै है |
मन मौरौ येसौई हौवै , बिनतुआइ खौ आयै है ||
सबइ तरा सैं हौय ऊजरै, कृपा सबइँ अब हौ जाबैं |
चरन अपुन के पछया-पछया , गैल मोक्ष की हम पाबैं ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों , अक्षयपद प्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~
पुष्प
लुकलुकात हम भटकत रत हैं , कामी कीरा से साँसी |
जलत बरत भी भगत रहत हैं , करवाँ तइ पूरी हाँसी ||
काम कीचाड़े में ना परबै , रस चेतन फरै बराई |
जियै चखत हम सब पा जायै, गुरु जैसी ही प्रभुताई ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , कामबाण विनाशनाय
पुष्प निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~
नैवेद्य
कितनउँ हम खा पी लै साँसउँ , भूक मिटत फिर भी नइयाँ |
नर खौ भरतइ जितनौ- जितनौ , उतनइँ बढ़तइ टुइ़याँ- टुइयाँ ||
मिट जाबै जा भूख मोइ अब , धरी इतइँ जा रै जाबै |
गुरु चरनन में बिनतुआइ है , जा मौखौं नईं सताबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरणकमलेभ्यो , क्षुधारोग विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~~
दीप
दिया न चिंगीं जी में जलतइ , अँदयारौ नीचट राखैं |
तौरो मौरो मोह भरौ है , लगत मुँदी हैं सब आखैं ||
दिया जला कै धरतइ चरनन, गैल मोक्ष की दिख जाबै |
गुरु विमर्श जी कृपा राखियौ , ज्ञान कभउँ ना धुँधलाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो ,महा मोहान्धकार
विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~
धूप
इतनौ कूरा धरै जिया में , काँतक गुरुवर बतलाबैं |
सौचत रत है कैसे ई खौं , नाँय माँय हम सरकाबैं ||
धूप चढ़ा रय गुरू चरन में , पाप करम सब जर जाबै |
दोष न कौनउँ भीतर राबै , मनुआँ मोरौ हरसाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अष्ट कर्म दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~~~~
फल
खटुआ फल मन के भीतर ही , फूलौ - फूलौ ही राबै |
करिया रस है जीकै भीतर , नाँय - माँय ढुरकत जाबै ||
गुरु विमर्श से बिनतुआइ है , अब तो फल होय गुरीरौ |
होय मोक्ष को साजौ नोंनौं , फल लगबै हमें कुरीरौ ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , महा मोक्ष फल प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~
अघ् र्य
सबइ भाव हम करें इकठ्ठे , एक जगाँ पर है जौरे |
अरघा जीखौ कात इतै है , जीमैं है भरै निहौरे ||
अक्षय साता मोखौ मिलबै , अब सबरै पाप नसाबै |
गुरु विमर्श जू कृपा दीजियौ , मुक्ती मोखौ मिल जाबै ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद प्राप्तये
अर्घ्यम्. र्निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~
जयमाला
जै जै भूम जतारा हो गइ , धन्य नगाइच है कुलिया |
जनम लऔ जब खुद खौ तरबै , सबरन नै भी नेह दिया ||
मात भगवती पिता सनत ने , लैं कैयाँ है पुचकारौ |
बूड़ी दादी के हाथन कौ , रवँ है कुछ भौत सहारौ ||
समय सटक कै आँगूँ जाबै , दिखै खाल पै जब लाली |
जा कौ जानत तौ है यह , आतम हित की उजयाली ||
धरौ नाम राकेश हतौ तौ , गुरु विराग ने जब परखौ |
तनक बात भइ जब कल्यानी,छौड़ दऔ तब निज घर खौ ||
कहै जिनागम पंथ सुहाना , हित आतम कौ हैं करते |
जीवन है पानू की बूँदें , सूदी साँची ही कहते ||
कातै है आचार्य गुरू जी , रओ धर्म में सब प्रानी |
सबखौ दे आशीष सुभाषा , बौलत मीठी है वानी ||
ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी
महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद प्राप्तये
अघ् र्य निर्वपामीति स्वाहा |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बुंदेली पूजा लेखक - सुभाष सिंघई
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र० 9584710660
~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जैन ध्वज गीत (लावणी छंद में )
छंद विधान 16 - 14 मात्रा , पदांत दो लघु , दो दीर्घ
(गीत प्रणेता - परम पूज्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज )
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
शुचिमय शुभ सम्मेद शिखर जिन , यहाँ मुक्ति का वर दाता ||
गोमटेश जी खड़े अडिग है , नेमि चरण है गिरनारी |
महावीर जी पावापुर से , वर्तमान में अधिकारी ||
वर्तमान में वर्द्धमान को , नायक जिनशासन पाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
जिनवाणी है मंगल दायक , मंगलमय शुभ जय गाथा |
साधु शरण हित मित प्रिय रहती, जन गण मन की बन नाथा ||
ध्वज लहराए नील गगन में , सत्य अहिंसा सनदेशा |
गीत सुभाषा गाता चल अब, रखकर सब शुचि परिवेशा ||
आशिष मागूँ जय- जय होवें , अब अपना शीष नवाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,जय जिनवर ध्वज फहराता |
जम्बू दीपे आर्य खंड का , भरत क्षेत्र यह कहलाता |
जिनवर स्वामी यहाँ हुए है , जिनका ध्वज मैं फहराता ||
करूँ कामना काज सफल हों , बहे ज्ञान की शुभ धारा |
जिन शासन जयवंत रहे अब , सत्य अहिंसा जयकारा ||
जय जय करता नमन- नमन है , सबको शुभ गीत सुनाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो, जय जिनवर ध्वज फहराता |
जय हो -जिनवर श्री जय जय हो,
श्री जिन जय हो , जय शुभ हो -2
©® गीत रचियता - सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबाइल - 9584710660
विशेष नम्र निवेदन -
कोई किसी तरह की काँट छाँट कर छंद का स्वरुप , मात्रा भार विधान , बिगाड़ने का दोष व पाप अपने सिर पर धारण न करे |
सादर
~~~~~£~£~~~~~~~~~~~
जैन साहित्य
श्री आदिनाथ स्तुति (पंच दोहावली)
मंगलमय आदिश्वरम् , ऋषभदेव जगदीश |
मनोहरम् कैलाश गिर ,नमन करें जन शीश ||
कांति धवल चंद्रेश्वरम् , मुक्तेश्वर श्रीनाथ |
मोक्षवरम् प्रभु है ऋषभ , सुर नर झुुकते माथ ||
धर्मा चक्र प्रवर्तकम् , मोक्षेश्वर जिनदेव |
कांति धवल चंद्रेश्वरम् , इंद्रीश्वरम् स्वमेव ||
ऋषभदेव परमेश्वरम् , मनोहरम् शशि रूप |
वाणी से विमलेश्वरम् , धर्मेश्वरम् अनूप ||
प्रथम देव छत्रेश्वरम् , देते सदा प्रकाश |
जग में है जयवंतकम् , श्री जय करे 'सुभाष' ||
©® सुभाष सिंघई ,जतारा
~~~~~~~~
प्रदीप छंद
तर्ज - आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ , झाँकी हिंदुस्तान की
श्री पार्श्वनाथ अर्चना
जय-जय बोलूँ संकट मोचक, करुणा क्षमा निधान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
पौष कृष्ण दसमी को जन्में , नगर बनारस जानिए |
मध्य रात्रि का क्षत्र विशाखा , नील वर्ण शुभ मानिए ||
मात् आपकी वामा देवी , अश्वसेन सुत आप थे |
राजमहल था भव्य सुहाना , कुल में सूर्य प्रताप थे ||
नाम आपका पारस प्यारा , यथा नाम गुण ज्ञान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
नवम् हाथ थी देह आपकी , आयुष शतक विधान था |
मोक्ष मार्ग हित जीवन अंतिम ,आगे लिखा निदान था ||
तीर्थंकर का जब पद पाया, गणधर आठ प्रमाण है |
यक्ष- यक्षणी पदमावत सँग , धरणेन्द्रम् शुचि प्राण है ||
चिंताहरणी दर्शन प्रभुवर, गाथा है यश गान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
भाई पिछले भव का तापस, भवभूती इक जीव था |
किए सदा उपसर्ग आप पर , पापाचारी नीव था ||
बचा नाग के जोड़े को जब , आप किया उद्धार था |
कमठ बना वह दस भव तक भी, खाए बैठा खार था ||
सहकर उसके उपसर्गों को, फिर भी क्षमा प्रदान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
रहे बालयति पारस प्रभु जी , धारा जब वैराग्य था |
निज चेतन पर ध्यान लगाया, किया आत्म का जाग्य था ||
पंच महाव्रत धारण करके , पाया केवल ज्ञान है |
चैत्र माह की कृष्ण चतुर्थी , गाती मंगल गान है ||
सभी देव गण चर्चा करते , प्रभु के अभियुत्थान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
शुक्ल सप्तमी श्रावण आई , किया मोक्ष प्रस्थान है |
टौंक शिखर सम्मेद बनी तब , जग को शुभ वरदान है ||
पारस प्रभु की महिमा गाकर, अब "सुभाष" का ध्यान है |
प्रभु वंदन से निज आतम का ,करना कुछ रस पान है ||
पारस प्रभु की जय-जय करता , अपनाए सौपान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
©® सुभाष सिंघई , जतारा
~~~~~~
Comments
Post a Comment