https://subhashsinghai.blogspot.com/जय श्री विमर्श चालीसा

ॐ नम: सिद्धेभ्या   || श्री  विमर्श सागराय नम: 


              ||  जय श्री विमर्श चालीसा  ||
                    
दोहा ~ हे गुरुवर सच आप हैं , हम सबको वरदान | 
           ज्ञान गंग में करा रहे ,  जन - जन को स्नान ||

           नगर जतारा जन्म है , पिता  सनत का गेह |
          मात् भगवती से सदा , पाया  अनुपम    नेह‌|| 
         
           जय विमर्श अब हैं जगत , वैतरणी का नाम |
           चलते फिरते तीर्थ हैं , रुकें   जहाँ वह  धाम ||

           आप  शरण में लीजिए ,विनती करे "सुभाष" |
           अंधकार  के मार्ग में  ,     देना सदा प्रकाश ||

चौपाई छंद में चालीसा -

जय विमर्श जी मेरे गुरुवर | 
        ज्ञान शिखर आगम  के तरुवर ||
सम्यक दर्शन की प्रति मूरत | 
          ज्ञान चारित्र की उजली सूरत || (1)

बूँद बना जीवन यह  पानी |  
          हर मानव की यही कहानी ||
महाकाव्य इस पर रच डाला |
           कालजयी रचना है आला ||(2)

जिनआगम  की राह बताते | 
         चौथी  युग चर्या   अपनाते ||
सरगम जिनके कंठ विराजे | 
           रचे छंद शुभ प्रतिदिन ताजे ||(3)

आप आशुकवि मन अति कोमल | 
               हरी भरी सब मन की कोपल ||
ज्ञानगंग की अविरल धारा |
            रहते  जिसके भव्य किनारा || (4)

आत्मसाधना अनुपम चिन्तन|
           जन-जन करता जिनका वन्दन ||
विश्व आपका ऋणी रहेगा | 
             मोक्ष  मार्ग जयकार   करेगा ||(5)

अलग - अलग जो बनते ग्रंथी |
             बने जिनागम वह सब पंथी | |
बात  सरल यह सदा   बताते | 
             सूत्र   एकता को अपनाते ||(6)

महावीर की  वाणी   मानो  |
              जिन शासन को अब पहचानो ||
अलग-अलग मत राग अलापो |
             बात एक-सी मिलकर थापो ||(7)

आज  समय हालात सुनाते |    
               रहो एक सब यह चेताते ||
नहीं कलुष के फेर न पड़ना | 
             रहता गुरुवर का यह कहना ||(8)

जैन धर्म का ध्वज लहराना |
            जिन शासन जयवंत बनाना ||
रखो एकता अवसर आए | 
             समय काल जब संकट लाए ||(9)

प्रचर-गमथ-गतिपथ पहचाना |  
               गुजर- घाट सब नेक समाना ||
एक भाव सब कहने मिलते |
                शब्द अनेकों भाषा खिलते ||(10)

गुरु विराग के है लघुनंदन | 
              महावीर चरणों  के चंदन ||
शांतिनाथ को देकर नाबा | 
           है अहार के   छोटे   बाबा || (11)

संघ चतुर्विध  संग में चलता |
          समोशरण -सा  जन को  लगता ||
प्रवचन में जब रस है खिलता |
           आत्म बोध का अमरत मिलता || (12)

वाणी गुरु की मन को भावे | 
           आकुलता मन से हट जावे || 
मिलती  चिन्तन में गहराई | 
          थाह   सभी  ने यह है  पाई || (13)

ज्ञान सरोवर में जल बढता | 
            कमल सदा ऊपर ही चढ़ता ||
ऐसी ही  गुरुवर  की काया  | 
           जब भी देखा अनुपम पाया ||(14)

आगम ग्रंथों के अनुवादक | 
             देव शास्त्र गुरु के आराधक || 
पापी मन   पावन हो जाता | 
           जो भी गुरु चरणों में आता || (15)

गुरुवर के चरणों की धूली |
              नष्ट करे पापों की शूली | |
जिसने  आकर चरण पखारे |
            जग तापों  के कष्ट निवारे ||(16)

चरण कमल में शिर धर दीन्हा | 
              गुरु ने उसको अपना लीन्हा ||
राह    दिखाई   उसको न्यारी |    
            मोक्ष  मार्ग  की दी तैयारी ||(17)

वचन सदा  आल्हादित करते |
                 नूतन ऊर्जा मन में भरते | |
जो समीप चरणों में रहता | 
             अविरल गंगा नहवन करता || (18)

त्याग तपस्या मूरत लगती |
             चर्या  चरणों  में आ बसती | |
पल- पल जिनका करे तपस्या |
             रहे वहाँ पर कौन समस्या || (19)

चरण आपके मंगल  करते |
               सदा अमंगल जन के हरते ||
सिद्ध शिला के हो अधिकारी |
             हम सब सेवक हैं वलिहारी ||(20)

सुनते श्रावक पावन वाणी  | 
              जो होते आतम कल्याणी ||
मोक्ष मार्ग के बनते पाणी   | 
             आते सुनने को जो प्राणी ||(21)

सदा साधना  को अपनाते | 
              आदर्शों     के   चिन्ह बनाते ||
लक्ष्य आपका सिद्ब शिला है |
            जिसमें निज का छिपा भला है ||(22)

भवसागर से पार लगाना  |  
            शरण वीर की शुभ बतलाना ||
गुरुवर सच्चे हो उपदेशक |
              ध्यान योग के   हो परिवेशक  ||(23)

हटवें मन से सदा    विकारें  | 
               अपने  मन में नेक विचारें  ||
निज के सँग जग हो कल्याणी | 
            रखते मन में  शुभकर वाणी  ||(24)

सदा ध्यान सामायिक करते | 
             भव पीड़ा आतम की‌ हरते ||
जहाँ प्रतिक्रमण रहता पावन | 
             गुरुवर लगते हैं  मन भावन ||(25)

आठ अंग हैं योग सुनाते  |
             पहला  जिसमें 'ध्यान 'बताते ||
कहें 'धारणा'- 'यम' -'आसन' के |
           और 'नियम'भी निज मन के || (26)

कहते 'प्रत्याहार' सुहाना   | 
                   सप्तम 'प्राणा़याम' बताना ||
गुरु विमर्श जी परिषह सहते |
                 श्रेष्ठ 'समाधि' अंतिम कहते ||(27)

कई ग्रंथों  को सहज बनाया | 
              अर्थ बताकर है समझाया ||
लिखे काव्य है कवि भी बनकर |
              धन्य सभी होते हैं सुनकर || (28) 

कई ग्रंथ भी रच डाले  है |  
              सभी मोक्ष के  हित वाले है ||
नमन ' सुभाषा' सबको करता |
              सदा उर्जा मन में भरता || (29)

'रयणसार' की टीका देखी | 
              आतम के हित सबने लेखी ||
पढ़ते जब 'जाहिद की गज़लें '| 
             आत्म तत्व की लगती फसलें ||30 

भक्तामर की महिमा हितकर | 
             "मानतुंग के मोती" लिखकर ||
हम सबको है भक्त बनाया | 
              आदिनाथ की महिमा गाया || 31 

प्रवचन का साहित्य बड़ा है | 
              लिए ग्रंथ आकार  खड़ा है | 
"योगोदय" "रत्नोदय" देखा | 
             जीवन को यह हितकर लेखा || 32

"शब्द शब्द अमृत" है पुस्तक |
              " देशव्रतोदय"को नत मस्तक ||
"साम्योदय" को जिसने जाना | 
               निज जीवन उसने पहचाना || 33 

"भरत बने घर में बैरागी" | 
             पढ़कर पुस्तक किस्मत जागी | |
"गूँगी चीख" अनोखी पुस्तक | 
            जिसे झुकाएँ हम सब मस्तक ||34 

"प्रतिक्रमण एक अनुचिंतन" है|
                कहती यह पुस्तक का मन है ||
पाँच भाग है "रणयोदय" के | 
               पढ़कर जागे भाग्य निलय के || 35 

काव्य पाठ के पढ़कर संग्रह | 
                   जन- जन देता है यह कह ||
आप महाकवि गुरु विमर्श है | 
                  नगर जतारा एक  हर्ष है ||36

लिखे "समर्पण स्वर" अलबेले | 
                 "गीतांजलि" में गीत नबेले ||
लिखा "आइना" काव्य निराला | 
               "वंदनीय गुरुवर" उजियाला ||37 

"कर लो गुरु का अब गुणगाना"| 
               लिखा काव्य लगता गुणधाना ||
"खूबसूरत   लाइने"  पढ़कर  | 
            सभी काव्य लगते बढ चढ़कर || 38 

"अप्पोदया प्राकृत  टीका "   | 
              ग्रंथ   निराला सबसे नीका || 
काव्य अनेकों आप लिखे है | 
            बढ़ चढ़ कर ही सभी दिखे है || 39 

नमन " सुभाषा" पुनि-पुनि करता | 
              भाव सहित चालीसा लिखता ||
लिखने में त्रुटि  जिसको आबे |
               करें सुधारा  मन जो भाबे || 40

दोहा - 
*राह* कहो या *रास्ता* , *पथ*  कह  दो   या *पंथ* |
*मार्ग* कहो या *मग* कहो,  पर  मानो    जिन  ग्रंथ ||

चतुर्मास  है  आपका , स्वर्ण  जयंती   योग |
नगर जतारा धन्य है ,     धन्य यहाँ के लोग ||
चालीसा पढ़ भाव से , करना  गुरु    प्रणाम |
जय विमर्श जी बोलना , पाना अनुपम धाम || 
चालीसा चालीस दिन , पढ़ना बस  इक बार |
गुरु विमर्श होगी कृपा    , होगें   कष्ट  निवार | |

लेखक / कवि सुभाष सिंघई एम०ए० (हिंदी साहित्य ) 
जतारा (टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबा० 9584710660 




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उल्लाला छंद परिचय - चार चरण , दोहे का प्रथम चरण जैसा  ही , चारों चरणों में प्रयोग होता है , यानी इस छंद में प्रत्येक चरण में यति - रगण (212) या नगण (111) से होती है | प्रत्येक चरण तेरह मात्रा का होता है | पन्द्रह मात्राओं  का भी उल्लाला छंद देखने मिलता है , पर 13 मात्रा का ही प्रचलित है , व यह छंद ल़य भी अच्छी देता है |

उल्लाला छंद में परम पूज्य आचार्य 
""श्री विमर्शसागर मंगलाष्टक ""

"""गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन  में  मंगलम् ""

आदिनाथ को कर नमन , जय‌  विमर्श उच्चारिये  |
वंदन   करिए भाव से , मंगल  चरण    पखारिये ||
भाव  सभी मंगल बनें  ,  मंगल  कारज  कीजिए  |
हटे अमंगल सब यहाँ , गुरु  कृपा  शिर  लीजिए || 
आदि जहाँ पर हम करें , तब  गुरुवर आशीष  है | 
हम  सब  ऐसा  मानते   , गुरु होता  जगदीश है || 
ब्रम्हा गुरुवर मानकर , लिखे नमन को अब कलम |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन  में  मंगलम् || ( 1)

गुरु  विमर्श  है  मंगलम्  , युग नायक श्री संत  हैं  |
चर्या   पावन   देखते ,     मोक्ष   लक्ष्मी    कंत हैं  || 
जहाँ  आचरण गंग है , सत्यम   के   प्रतिविम्ब हैं | 
मोक्ष मार्गी   जीव  को , बने  आज   अवलम्ब है || 
तारण  हारे  आप   है ,   दिशा  ज्ञान   प्रतिमान है | 
त्याग सूर्य के पुंज है  , मंगल   अभियुत्थान    है ||
शरण आपकी तोड़ती , जग  नातों  का   है भरम |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन  में  मंगलम् || ( 2)

संघ चतुर्विध आपका , समोशरण   अनुभाग है | 
वीतरागिता    देखकर , हमें  धर्म   अनुराग   है || 
दिव्य भव्य सब आपका,शिव स्वरूप मनुहार है | 
गुरु विमर्श जी है नमन    , वंदन   बारम्बार   है ||
वचन आपके है  हिती , करते जन कल्याण हैं  | 
जीवन  को  मंगल  करें ,   पावन  होते  प्राण हैं | 
गुरुवर का दर्शन मिले , सभी  टूटते तब  अहम् |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (3 )

संत  भाव लिंगी बने  ,  सच्चे  गुरुवर आप है |
वेश   दिगम्वर  देखते  ,  वीतरागिता  माप  है ||
सभी  राष्ट्रयोगी कहें  ,   गुरु  पुंगव  भी मानते |
श्रमणाचार्या में  गिनें   , कवि महान पहचानते || 
धर्म दिवाकर भूप हो , शीत   ऋतू  में  धूप हो | 
भव सागर में  तारने , गुरुवर आप   अनूप हो || 
चौथी  युग चर्या ‌रहें  , करे  साधना तप  धरम |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (4  )

काल जयी अब काव्य है , पानी जीवन बूँद है |
यह तन जो हम देखते , केवल एक  फफूँद है || 
कब मिट जाए बुलबुला , कहते गुरु  सटीक हैं  | 
दिखी सनातन से सदा, हम सबको यह लीक हैं || 
गुरु विमर्श का ग्रंथ यह , महाकाव्य का रूप  है |
सदा धरोहर   है जगत , युग को  बना   अनूप है ||
नमन करूँ इस काव्य को ,लगे हितैषी सच परम |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (5 )

ग्रंथ अनेकों आपके ,    प्रवचन शुचि  साहित्य है |
टीकाओं   के  देखते ,   जिनमें  आगम  सत्य  है ||
काव्य अनेकों जो लिखे ,आतम हित की बात है |
युगों-युगों तक यह अमर  ,रहें  सदा   सौगात  है ||
कलम आपकी   दे सदा , एक नया  चिंतन  यहाँ  | 
गुरु विमर्श को छोड़कर , श्रावक जाए अब कहाँ ||
प्रवचन में ‌सुनते सदा  , कल्याणी   वाणी  नरम |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (6 )

चरण आपके छू सभी ,  हो  जाते  हम  धन्य‌ हैं  | 
कर कमलों आशीष से ,  जग जाते सब पुन्य हैं ||
करूँ  आरती आपकी , अंधकार  सब  नाश   हो | 
नव जीवन बगिया खिले , उजला नया प्रकाश हो || 
चरण धूल से रोग भी ,  सभी   शमन  हम  देखते | 
यह "सुभाष" अनुभव किया , और हृदय‌ में  लेखते ||
पतित यहाँ पावन बनें  , और    सुधरते   है  करम | 
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (7 )

नमन -नमन गुरुवर नमन , स्वीकारो अब दास को  | 
चरणों में अर्पण करूँ , भक्ति   और   विश्वास  को ||
हित मित प्रिय है सब वचन, शुभ मय सब संदेश है | 
गुरु विमर्श जी आपका  , पंथ   जिनागम   वेश  है || 
समरसता की बात कर , सत्य   ज्ञान   प्रतिविम्ब है |
जैन धर्म के ध्वज तले , आप   सत्य   अवलम्ब है ||
जिसको भी  सानिध्य मिले , दूर करेगा वह  वहम् |
गुरु विमर्श जी  कीजिए , मम जीवन में मंगलम् || (8 )

लेखक / कवि- सुभाष सिंघई , एम० ए० (हिंदी साहित्य )
जतारा (टीकमगढ़) म०प्र० , मोबा० 9584710660
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 यह सभी मंगलाष्टक गुरु कृपा हेतु , भक्ति स्वरुप सुखदायी व मंगलकारी है ,
फिर भी विशेष रुप से - प्रथम - कार्य प्रारंभ हेतु | द्वितीय - भ्रमित अवस्था में मार्ग प्रशस्त हेतु | तृतीय - परिवार एकता व विखराव बचाव हेतु | चतुर्थ-परिवार में धर्म वृद्धि हेतु | पंचम - बचपन में बालक में बुद्धि और शिक्षा हेतु |षप्टम - बालक की उच्च शिक्षा हेतु | सप्तम -रोग शोक कष्ट निवारण हेतु , |अष्टम - वृद्ध परिजनो  के कष्ट निवारण हेतु | गुरु की भक्ति विशेष की जा सकती है |
लेखक की यह अनुभूति है |
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परम पूज्य  , बालयति ,भावलिंगी संत   आचार्य श्री 108 विमर्श सागर महामुनिराज जी की बुंदेली बोली में पूजन 
कुकुभ /ताटंक  छंद में
 (16- 14 मात्रा भार , पदांत दो दीर्घ / तीन दीर्घ)
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स्थापना 

सिंहासन पै  फूल बिछा दय   ,  नीचट  भाव    बनाये  है |
गुरु   विमर्श जी  आन  बिराजौ , हम  पूजन खौं आये  है ||
बिनतुआइ  भी  सबरी   लगबें  , पूजा    मोरी   स्वीकारौ |
चरनन खौं  इस्थापन  कर दौ ,तब   मोखौ   लगै  सहारौ  ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी  
महामुनिराज , अत्र अवतर -अवतर संवोषट् आह्वाननम् 
अत्र तिष्ठ- तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् | अत्र मम् सन्निहितो 
भव -भव बषट्  सन्निधिकरणम् 
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जल 

पानू से हम भरकै डबला  , केवट बनके  आये  है‌ |
चरन आपके धौकै मानें ,  राम   अपुन  से पाये है ||
पाप धुलै सब मौरे अब तो, हम खौ आस लगाने है |
गुरु विमर्श के चरनन छूकै, खुद हमखौं तर जाने है  ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
महामुनिराज चरण कमलेभ्यों ,  जन्म-  जरा - 
मृत्यु  विनाशनाय  जलं निर्वपामीति स्वाहा |

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चंदन 

चड़ौ जगत्तर ताप टिपिरियन , सौ हम चंदन  ल्याये है |
सबइँ ताप चटपट   हो जाबैं , बिनतुआइ खौं आये है ||
हौरा से हम भुँजतइ राबैं , ताप   जनम  भर हम पाबै |
गुरु विमर्श जी हेरौ हमखौं , हम  चंदन  इतइँ  चढ़ाबै  ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यों  , संसार ताप  विनाशनाय 
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा |
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अक्षत 

चाँउर हम तौ नौनें जानै ,   धो  धा कै  हम   ल्यायै है |
मन  मौरौ   येसौई   हौवै ,    बिनतुआइ  खौ आयै है || 
सबइ  तरा सैं  हौय  ऊजरै, कृपा सबइँ अब हौ  जाबैं |
चरन अपुन के पछया-पछया , गैल मोक्ष की हम पाबैं ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यों  , अक्षयपद प्राप्तये  
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा |

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पुष्प 

लुकलुकात हम भटकत रत हैं  , कामी कीरा से साँसी |
जलत  बरत भी भगत रहत हैं , करवाँ तइ  पूरी  हाँसी ||
काम कीचाड़े   में ना परबै , रस   चेतन    फरै    बराई |
जियै चखत हम सब पा जायै, गुरु  जैसी ही   प्रभुताई ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यो  , कामबाण   विनाशनाय 
पुष्प निर्वपामीति स्वाहा |

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नैवेद्य 

कितनउँ  हम खा  पी लै साँसउँ , भूक मिटत फिर  भी नइयाँ |
नर खौ भरतइ जितनौ- जितनौ , उतनइँ बढ़तइ टुइ़याँ- टुइयाँ ||
मिट   जाबै  जा भूख  मोइ अब , धरी   इतइँ    जा   रै  जाबै |
गुरु   चरनन   में   बिनतुआइ   है ,  जा   मौखौं  नईं  सताबै ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री  108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरणकमलेभ्यो , क्षुधारोग  विनाशनाय 
नैवेद्यं  निर्वपामीति स्वाहा |

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दीप 

दिया न चिंगीं  जी में जलतइ , अँदयारौ   नीचट  राखैं  |
तौरो मौरो   मोह भरौ है , लगत  मुँदी   हैं   सब आखैं || 
दिया जला कै धरतइ चरनन, गैल मोक्ष की दिख जाबै |
गुरु विमर्श जी कृपा राखियौ , ज्ञान कभउँ ना धुँधलाबै ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यो  ,महा मोहान्धकार 
  विनाशनाय  दीपं  निर्वपामीति स्वाहा |
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धूप 

इतनौ कूरा धरै जिया  में , काँतक गुरुवर बतलाबैं  |
सौचत रत  है कैसे ई खौं , नाँय माँय हम सरकाबैं  ||
धूप चढ़ा रय गुरू चरन में , पाप करम सब जर जाबै |
दोष न  कौनउँ  भीतर राबै ,  मनुआँ   मोरौ  हरसाबै ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यो  , अष्ट कर्म दहनाय 
धूपं  निर्वपामीति स्वाहा |

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फल 
खटुआ फल मन के भीतर ही , फूलौ - फूलौ  ही राबै |
करिया रस है जीकै भीतर , नाँय - माँय ढुरकत जाबै ||
गुरु विमर्श से बिनतुआइ है , अब तो फल होय गुरीरौ |
होय मोक्ष को साजौ नोंनौं  , फल लगबै  हमें   कुरीरौ ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यो  , महा मोक्ष फल प्राप्तये 
फलं  निर्वपामीति स्वाहा |

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अघ् र्य

सबइ भाव   हम  करें  इकठ्ठे , एक जगाँ  पर है जौरे |
अरघा जीखौ कात इतै  है  , जीमैं   है   भरै    निहौरे ||
अक्षय साता मोखौ मिलबै , अब  सबरै   पाप  नसाबै |
गुरु विमर्श जू कृपा दीजियौ , मुक्ती मोखौ मिल जाबै ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद  प्राप्तये 
अर्घ्यम्.  र्निर्वपामीति स्वाहा |
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जयमाला 

जै जै भूम   जतारा हो गइ ,   धन्य   नगाइच  है   कुलिया |
जनम लऔ जब खुद खौ तरबै , सबरन नै  भी  नेह  दिया ||
मात  भगवती   पिता सनत  ने   , लैं    कैयाँ  है   पुचकारौ | 
बूड़ी   दादी   के   हाथन    कौ , रवँ है  कुछ भौत  सहारौ ||

समय सटक कै आँगूँ जाबै , दिखै   खाल  पै जब  लाली |
जा  कौ  जानत तौ  है यह , आतम  हित की   उजयाली ||
धरौ नाम   राकेश  हतौ  तौ ,   गुरु  विराग  ने  जब परखौ |
तनक बात भइ जब कल्यानी,छौड़ दऔ तब निज घर खौ ||

कहै जिनागम पंथ सुहाना , हित  आतम कौ हैं   करते |
जीवन   है  पानू  की  बूँदें ,   सूदी    साँची  ही  कहते ||
कातै  है  आचार्य   गुरू   जी , रओ  धर्म  में  सब प्रानी |
सबखौ दे  आशीष  सुभाषा , बौलत  मीठी  है   वानी ||

ॐ हृूँ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी 
 महामुनिराज चरण कमलेभ्यो , अनर्घपद  प्राप्तये 
अघ् र्य   निर्वपामीति स्वाहा |

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बुंदेली पूजा लेखक - सुभाष सिंघई
 जतारा (टीकमगढ़) म०प्र० 9584710660

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जैन ध्वज गीत (लावणी छंद में ) 
छंद विधान 16 - 14 मात्रा , पदांत दो लघु , दो दीर्घ 
(गीत प्रणेता - परम पूज्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ) 

जय‌ जय जिन पथ आगम जय हो ,जय  जिनवर ध्वज फहराता |
शुचिमय शुभ सम्मेद  शिखर जिन , यहाँ  मुक्ति   का   वर दाता ||
गोमटेश  जी  खड़े   अडिग   है ,   नेमि   चरण  है   गिरनारी |
महावीर      जी    पावापुर  से  ,    वर्तमान    में   अधिकारी ||

वर्तमान   में   वर्द्धमान   को   , नायक      जिनशासन     पाता |
जय‌ जय जिन पथ आगम जय हो ,जय  जिनवर ध्वज फहराता |

जिनवाणी है   मंगल दायक ,    मंगलमय ‌  शुभ   जय‌  गाथा |
साधु शरण हित मित प्रिय रहती, जन गण मन की बन नाथा ||
ध्वज  लहराए    नील   गगन में ,  सत्य   अहिंसा  सनदेशा |
गीत सुभाषा गाता चल अब, रखकर  सब  शुचि  परिवेशा ||

आशिष  मागूँ  जय-  जय होवें ,    अब  अपना   शीष   नवाता  |
जय‌ जय जिन पथ आगम जय हो ,जय  जिनवर ध्वज फहराता |

जम्बू दीपे आर्य  खंड  का , भरत  क्षेत्र   यह   कहलाता |
जिनवर स्वामी यहाँ हुए  है , जिनका ध्वज मैं   फहराता ||
करूँ कामना काज सफल हों , बहे  ज्ञान  की  शुभ धारा  |
जिन शासन  जयवंत रहे अब , सत्य  अहिंसा   जयकारा  ||

जय जय करता नमन-  नमन है , सबको   शुभ  गीत   सुनाता  |
जय‌ जय जिन पथ आगम जय हो, जय जिनवर ध्वज फहराता |

जय हो -जिनवर श्री जय   जय‌ हो,  
श्री जिन जय हो , जय शुभ हो -2

©® गीत रचियता - सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबाइल - 9584710660

विशेष नम्र निवेदन -
कोई किसी तरह की काँट छाँट कर छंद का स्वरुप , मात्रा भार विधान ,  बिगाड़ने का दोष व पाप अपने सिर पर धारण न करे | 
सादर
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जैन साहित्य 
श्री आदिनाथ स्तुति (पंच दोहावली)

मंगलमय    आदिश्वरम् , ऋषभदेव  जगदीश | 
मनोहरम्   कैलाश   गिर ,नमन करें जन शीश ||

कांति   धवल     चंद्रेश्वरम् , मुक्तेश्वर   श्रीनाथ |
मोक्षवरम् प्रभु है ऋषभ , सुर नर झुुकते माथ ||

धर्मा  चक्र   प्रवर्तकम्    , मोक्षेश्वर   जिनदेव |
कांति  धवल  चंद्रेश्वरम् ,  इंद्रीश्वरम्    स्वमेव || 

ऋषभदेव परमेश्वरम् ,  मनोहरम्  शशि रूप  | 
वाणी से    विमलेश्वरम् ,  धर्मेश्वरम्   अनूप || 

प्रथम  देव  छत्रेश्वरम् ,    देते   सदा   प्रकाश |
जग में है जयवंतकम् , श्री जय करे 'सुभाष' ||

©® सुभाष सिंघई ,जतारा 

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प्रदीप छंद 
तर्ज - आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ , झाँकी हिंदुस्तान की 

श्री पार्श्वनाथ अर्चना 

जय-जय बोलूँ संकट मोचक, करुणा क्षमा निधान  की |
गुण गाकर  मैं अर्चन  करता , पार्श्वनाथ   भगवान   की ||

पौष कृष्ण दसमी को जन्में , नगर   बनारस   जानिए | 
मध्य रात्रि का क्षत्र   विशाखा , नील वर्ण शुभ मानिए || 
मात्   आपकी   वामा देवी ,  अश्वसेन   सुत आप  थे | 
राजमहल था भव्य सुहाना  , कुल में  सूर्य  प्रताप थे ||

नाम आपका  पारस प्यारा , यथा नाम गुण ज्ञान की |
गुण गाकर  मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||

नवम् हाथ थी देह आपकी , आयुष  शतक विधान था  |
मोक्ष मार्ग हित जीवन अंतिम ,आगे लिखा  निदान था  ||
तीर्थंकर का जब  पद  पाया, गणधर  आठ प्रमाण है |
यक्ष- यक्षणी पदमावत सँग , धरणेन्द्रम्  शुचि प्राण है ||

चिंताहरणी  दर्शन   प्रभुवर,  गाथा  है  यश गान  की | 
गुण गाकर  मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ   भगवान की ||

भाई पिछले भव का तापस, भवभूती इक  जीव  था | 
किए सदा   उपसर्ग आप   पर ,  पापाचारी  नीव  था ||
बचा नाग के   जोड़े को जब ,  आप किया उद्धार  था | 
कमठ बना वह दस भव तक भी, खाए बैठा खार था ||

सहकर उसके उपसर्गों को, फिर भी क्षमा  प्रदान की  | 
गुण गाकर  मैं अर्चन  करता , पार्श्वनाथ भगवान  की ||

रहे बालयति  पारस   प्रभु  जी , धारा  जब   वैराग्य  था  | 
निज चेतन पर ध्यान लगाया, किया आत्म का जाग्य था || 
पंच   महाव्रत   धारण  करके ,   पाया   केवल   ज्ञान  है | 
चैत्र  माह  की   कृष्ण  चतुर्थी ,    गाती  मंगल   गान   है ||

सभी देव गण चर्चा करते  ,  प्रभु  के अभियुत्थान की |
गुण गाकर  मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ  भगवान  की ||

शुक्ल  सप्तमी   श्रावण आई , किया   मोक्ष  प्रस्थान है | 
टौंक शिखर सम्मेद  बनी तब , जग को शुभ  वरदान है || 
पारस प्रभु की महिमा गाकर, अब "सुभाष" का ध्यान है | 
प्रभु वंदन से  निज आतम का ,करना कुछ  रस पान है ||

पारस प्रभु की जय-जय करता , अपनाए  सौपान की |
गुण गाकर मैं अर्चन  करता , पार्श्वनाथ  भगवान   की ||

©® सुभाष सिंघई , जतारा
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