https://subhashsinghai.blogspot.com/श्री विमर्श सागराय नम:
*परम पूज्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी के प्रथम शुभाशीष --मुनि श्री 108 विचिन्त्य सागर जी ---
सिंघाड़ा शुभ ग्राम के , भैया श्री राजीव |
गुरु विमर्श के शिष्य हैं , पारस प्रथम अतीव || 1
माह मार्च छब्बीस शुभ , दो हजार दस एक |
कोटा में विचिन्त्य मिला , दीक्षा नाम सुनेक || 2
पिता पदम श्रावक गुणी , श्री माँ जैन सरोज |
प्रखर सूर्य को जन्म दे , जग को सोंपा ओज || 3
गुरु विमर्श के चिन्ह पग , सदा बनाते माप |
मुनि विचिन्त्य सबको लगें , गुरुवर की ही छाप || 4
चर्या गुरु समान है , लिखे आपने काव्य |
गुरू कृपा शिर पर जहाँ , सब कुछ है सम्भाव्य || 5
गुरु विमर्श लिख जीवनी , काव्य मयी विस्तार |
कह "सुभाष" गुरु के चरण, लीन्हें आप पखार || 6
प्रवचन गुरुवर के सुनें , लिखते जाते सार |
सम्पादन का आप ही , सदा उठाते भार || 7
सब मुनियों में ज्येष्ठ है , रखते सबका ध्यान |
संघ आपका भी करे , आदर्शों का गान || 8
गुरु विमर्श के भक्त जब , मिलें आपसे आन |
आशीषों उल्लास से, देते शुभ मुस्कान || 9
मिले आपसे प्रेरणा , कहता सत्य 'सुभाष' |
गुरुवर पर लेखन करें , डाले आप प्रकाश || 10
कितना लिख दूँ आप पर , आप सदा गुरु रूप |
धूप आप ऋतु शीत में , जहँ गुरु दिव्य अनूप || 11
लिखते पूर्व प्रसंग हम , दो हजार सन् तीन |
आठ मई थी ग्रीष्म की , प्रस्फुट कथा नवीन || 12
है अशोक सुंदर नगर , ग्रीष्म वाचना काल |
दर्शन कर राजीव जी , होते यहाँ निहाल ||13
मुनि विमर्श आए नगर , धन्य सभी नर नार |
वाणी है अमरत मयी , आतम हित सुखकार || 14
जीवन कहते गीत में , पानी की है बूँद |
आल्हादित है सब यहाँ , ज्ञान गंग में कूँद || 15
पुण्य जीव था इस नगर , होनी थी पहचान |
गुरु विमर्श के हैं चरण , रागों का अवसान || 16
योग बनाता है समय , दर्शन के दौरान |
नमन करें राजीव जी , गुरुवर को पहचान ||17
दर्शन करते ही जगा , यहाँ शिष्य का भाग्य |
बीज अंकुरित हो गया , जिसे कहे वैराग्य || 18
दर्शन करते सोचते , यहाँ युवा राजीव |
गुरु चरणों में ही बने , मोक्ष मार्ग की नीव || 19
दर्शन करते भाव से , भरते नव उल्लास |
हर्षित मन राजीव का , देखे यहाँ उजास || 20
पहला दिन यह जानिए , सम्यक दर्शन ज्ञान |
गुरू मानकर शिष्य नें , किया गलित निज मान || 21
गुरु ने देखा शिष्य को , बहुत दिया आशीष |
शिष्य नमन पुनि कर रहा , कहे उन्हें जगदीश || 22
सदा समय ने हैं लिखे , कर्म देखकर भाग्य |
कौन फँसे संसार में , और किसे वैराग्य || 23
गुरु विमर्श की ले शरण , शिष्य यहाँ निश्चिंत |
समय काल ने तब लिखा , यह मुनि है विचिन्त्य ||24
कौन समय को जानता , आगे क्या सौपान |
मोक्ष मार्ग पद पर सदा , निश्चित रहे निशान || 25
क्रमशा: करना साधना , सम्यक लेना ज्ञान |
सम्यक रख चारित्र ही , बन सकते भगवान || 26
युवा यहाँ राजीव ने , लिया मार्ग पहचान |
गुरु विमर्श के गह चरण , करता है उत्थान || 27
भव्य जीव संसार में , सम्यक चाहें थाह |
सम्यक दर्शन जब मिले , लेते वही पनाह ||28
सोच लिया राजीव ने , गुरुवर अगम अथाह |
श्री विमर्श के अब चरण , देगें हमें पनाह || 29
दृड़ता के संकल्प हों , राह बने आसान |
यही हुआ राजीव सँग , जगे हृदय संज्ञान || 30
ग्रीष्म काल के बाद में , बारिश काल सुजान |
थी चतुर्मास स्थापना , धर्म ध्यान हित गान || 31
पूरे वर्षा काल में , जुटे रहे राजीव |
सेवा गुरू विमर्श की , करते रहे अतीव || 32
गुरु के मिलते थे चरण , सेवा करने रोज |
आते तब वैराग्य में , भरते रहते ओज || 33
दृड़ निश्चय भी तब करें , करना है कल्याण |
गुरु विमर्श की ले शरण , पावन करना प्राण || 34
बने भाव से संयमी , व्रत हो अंगीकार |
ब्रम्हचर्य अवधारणा , समझें पहले सार || 35
ब्रम्हचर्य व्रत साधकर , करे योग अभ्यास |
वर्षा काल प्रवास में , रहें गुरू के पास || 36
चौदह थी तारीख शुभ , माह दिसम्बर जान |
दो हजार सन् तीन था , करने निज उत्थान || 37
करें निवेदन भाव से , गुरुवर करो निहार |
ब्रम्हचर्य व्रत दीजिए , करने को स्वीकार ||38
गुरु विमर्श तब देखते , कहते रखना पास |
करने निज कल्याण को , शुभाशीष है खास || 39
व्रत मिलते राजीव जी , समझें निज को धन्य |
गुरु विमर्श सोचें यहाँ , जगा जीव का पुन्य || 40
साधक करते साधना , लगती बड़ी कठोर |
तप की भट्टी में तपें , चलें परीक्षा दोर ||41
सदा परखते शिष्य को , गुरुवर रहे सचेत |
कैसे करते साधना , निज आतम के हेत ||42
चलती आगे साधना , ब्रम्हचर्य को धार |
पर तन पर दिखते यहाँ , संसारी शृंगार || 43
वह दिन भी अब आ गया , परिवर्तन थे वस्त्र |
लिया श्वेत परिधान तन , डोला धारा हस्त ||44
बारह थी अप्रैल शुभ , दो हजार सन् चार |
महावीर का अवतरण , दिवस बना शुभ कार ||45
अब भैया जी वेश था , नाम वही राजीव |
आगे अब अभ्यास था , साधू पथ की लीक || 46
चर्या पालन सीखते , गुरु विमर्श के संग |
आज्ञा सब स्वीकारते , रखते सदा उमंग || 47
भैया श्री राजीव जी , आदर सूचक नाम |
जय जिनेन्द्र सब बोलकर , करते इन्हें प्रणाम || 48
गुरु विमर्श अब ध्येय है , गुरु आज्ञा सर्वोच्च |
बना लक्ष्य राजीव का , कभी न आता लोच || 49
शुचिता के थे सब वसन ,रहे न इनसे राग |
फिर भी सब राजीव जी , करना चाहें त्याग || 50
हर पल हर पग सीखते , बनते साधक श्रेष्ठ |
श्रावक भी कहने लगे, शिष्य बना यह ज्येष्ठ ||51
मुनि चर्या की साधना , नहीं राह आसान |
गुरु विमर्श को देखकर , सीखे सब प्रतिमान || 52
सात साल की साधना , ब्रम्हचर्य परिवेश |
गुरु विमर्श परखें सदा , मोक्ष मार्ग उद्देश्य || 53
तपकर कुंदन बन रहे , समय रहा है देख |
बने यहाँ राजीव जी , गुरुवर की शुभ रेख || 54
पढ़ते रहते ग्रंथ है , गुरु से समझें सार |
निरत स्वाध्याय में रहें , रख शुचिता व्यवहार || 55
दो हजार ग्यारह सुनो , समय खोलता राज |
माह मार्च छव्बीस शुभ , करता है शुभ काज || 56
कहते गुरु विमर्श यहाँ , सुनो शिष्य राजीव |
दीक्षा करूँ प्रदान अब , देकर संयम नीव || 57
शहर हुआ था तब चयन , कोटा राजस्थान |
जगह दशहरा का बड़ा , था भारी मैदान || 58
खबर फैलती देश में , दौड़े आए लोग |
खुद "सुभाष" कोटा गया , स्वयं देखने योग || 59
प्रात काल लुंचन हुआ , हटे सभी थे केश |
जिसके दृश्य सुभाष भी , रखता अभी हृदेश ||60
लुंचन में जब खींचते , बहुत घने थे बाल |
रक्त झलकता शीष पर , लेकर समता ढाल || 61
गुरु विमर्श भी आ गये , लुंचन करने केश |
निर्विकार राजीव जी , थे प्रज्ञा परिवेश || 62
चर्या हुई आहार की , गुरु का था आदेश |
यह बस इक अभ्यास था , आगे के परिवेश || 63
सामायिक के बाद में , गुरुवर आए मंच |
पीछे श्री राजीव थे , और साथ थे पंच || 64
हुआ मंगला शुभ चरण , थमा सभी था शोर |
विनय करें राजीव जी , दीक्षा की अब ओर || 65
गुरु विमर्श कहते यहाँ , कठिन दीक्षा राह |
छोड़ अभी तुम जा सको , जो रखते हो चाह || 66
भूख प्यास सहना पड़े , वंचित रहे अहार |
फिर भी करना साधना , रखकर दूर विकार || 67
कहते है राजीव तब , रहूँ आपके साथ |
हमको तो बस चाहिए , गुरु का शिर पर हाथ ||68
गुरु विमर्श तब कह उठे , रहना पड़े सचेत |
रिश्ते नाते जो जगत , होते है वह रेत || 69
कहते है राजीव तब , रिश्ते में बस आप |
गुरुवर सब कुछ आप है , हरने जग के ताप || 70
कहते गुरुवर तब यहाँ , जो मिलता है वेश |
राग न कोई गेह से , और न अंदर द्वेश || 71
प्रतिउत्तर तब गूँजता , छोड़ गेह का राग |
मैं तो बस अब आपका , हूँ छोटा सा भाग || 72
गुरु विमर्श कहते यहाँ , होता रहे विहार |
थक जाते है पैर भी , होते है लाचार || 73
कहते है राजीव तब , होगी नहीं थकान |
गुरु चरणों में रह सदा , लाऊगाँ मुस्कान || 74
जन समूह आवाक था , सुनता था संवाद |
कठिन परीक्षा थी चली , है 'सुभाष' को याद || 75
सफल हुए राजीव थे , गुरुवर थे संतुष्ट |
शंकाएँ निर्मूल कर , बोले कुछ स्पस्ट || 76
यहाँ मंच पर दिख रहें , हमको भी विद्वान |
अपना अभिमत दें यहाँ , बैठे सब श्रीमान || 77
योग्य अगर राजीव हैं , अनुमोदन दें आप |
क्या चर्या यह कर सके, साधू के जो माप || 78
टीकमगढ़ के तब वहाँ , उठे वहाँ विद्वान |
जयकुमार निशांत जी ,जो गुण की है खान ||79
कहते गुरुवर श्रेष्ठ है , भैया श्री राजीव |
अनुमोदन मैं कर रहा ,साधक लगे अतीव || 80
कहे पवन दीवान जी , हैं यह दीक्षा योग्य |
लगता भी संसार के , छोड़ चुके यह भोग्य ||81
इसी तरह विद्वान सब , उठकर करें प्रणाम |
दीक्षा इनको दीजिए , कहते है अविराम || 82
अनुमोदन भी कर उठी , कोटा जुड़ी समाज |
जय विमर्श गुरुदेव जी , गूँज रही आवाज || 83
गुरु विमर्श संकेत पर , दिया चौक को पूर |
बैठे तब राजीव जी , लगे दिव्य वह नूर || 84
संस्कार दीक्षा हुए , गुरु विमर्श के हाथ |
कहते तब राजीव जी , अब मैं हुआ सनाथ ||85
खोल दिए तन वस्त्र जब , ऐलक का था रूप |
मोक्ष मार्ग की राह में , यह था रूप अनूप || 86
पिछी कमंडल जब दिया , है विचिन्त्य शुभ नाम |
गुरु विमर्श कहते यहाँ , करो ध्यान अविराम || 87
बना महोत्सव था यहाँ , लाखों आए भक्त |
गुरु विमर्श आशीष ले , साधक हुआ सशक्त || 88
ऐलक पद को धारकर , करें आत्म कल्याण |
गुरुवर के सानिध्य में , पावन रखते प्राण || 89
एक लँगोटी क्यों यहाँ , आता कभी विकल्प |
गुरु भी समझें भाव को , साधक का संकल्प || 90
माह नवम्बर जन्म है , गुरु विमर्श सूचांक |
दो हजार तेरह सुनो , पन्द्रह रही दिनांक || 91
मुनि दीक्षा की घोषणा , ऐलक श्री विचिन्त्य |
गुरु विमर्श जी कर गए , सभी हुए निश्चिन्त्य || 92
साक्षी बनता भिंड है , करता मन से हर्ष |
मुनि रुप में हो गए , यहाँ विचिन्त्य के दर्श || 93
लिखे विचिन्त्य जी सदा , गुरुवर पर अनुकाव्य |
एक-एक हर पल लिखे , जो भी हो सम्भाव्य || 94
संत भाव लिंगी लिखा , महाकाव्य जयघोष |
गुरु विमर्श की जीवनी, तपो मूर्ति शुभ कोष ||95
भाव लिंगी गुरू प्रवर , लिखकर संत विधान |
जन मानस में कर दिया , गुरु विमर्श का गान ||96
गुरु विमर्श स्त्रोत लिख , सहस्त्र नाम से मान |
संस्कृत भाषा जानिए , जिससे गुरु गुण गान ||97
थुदि विमस्य प्राकृत लिखी , गुरु विमर्श स्त्रोत |
जय विमर्श है साष्टकस , संस्कृत भाषा ज्योत || 98
गुरु विमर्श संजीवनी , शतक जुड़ा है नाम |
लिखा भक्त्याराष्टकम् , गुरु विमर्श शुभ धाम || 99
शांतिनाथ स्त्रोत लिख , किया कलम को धन्य |
शिखर सम्मेद वंदना , लिखा काव्य है पुन्य || 100
जो कुछ लिखा विचिन्त्य पर , नहीं जानिए रेख |
गुरु विमर्श की है कृपा , और उन्हीं का लेख || 101
********* ********
गुरुवर के चरणों में विनय -
लिखा विचिन्त्य पर नहीं , लिखा गुरु आशीष |
पत्थर सोना बन गए , हैं विमर्श जगदीश || 1
पारस गुरुवर आप है , छूकर देते तार |
यह प्रयोग सब देखते , करते जय जयकार || 2
संघ चतुर्विध आपका , समोशरण अनुभाग |
गुरु विमर्श जय घोष कर , करूँ चरण से राग ||3
तर जाए हम एक दिन , मंशा यही " सुभाष "|
सदा शरण रखना मुझें , देना सदा प्रकाश || 4
कलम सदा करती रहे , गुरु विमर्श गुण गान |
कवि मन को देना सदा , चरणों में स्थान || 5
दोहाकार
सुभाष सिंघई (एम०ए०) हिंदी साहित्य
जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
मोबा० 9584710660
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Comments
Post a Comment