https://subhashsinghai.blogspot.com/ग़ज़ल (दोहा गीतिका )एवं अन्य विधाएँ

दोहा ग़ज़ल – शिल्प दोहे का लें और ग़ज़ल के माफ़िक़ पहले दोहे [मतले] के बाद के ऊला-सानी टाइप दोहे [शेर] कहे जाएँ। इसको पं० गोपाल दास नीरज जी पहले इसको दोहा ग़ज़ल कहते थे , पर बाद में कुछ साहित्यक अंतर्विरोधों से वह बाद में इसे दोहा गीतिका कहने लगे थे , किंतु आम श्रोताओं व पाठकों ने इसे दोहा ग़ज़ल ही कहना जारी रखा , बहरहाल कुछ भी हो , है तो यह एक विधा ही |
विधा : गीतिका आधार छन्द : दोहा
पदान्त : आर
दोहा गीतिका ( अपदांत )
सजनी मन अब झील है, दिखता नीर अपार |
चाहे साजन नाम का , गाएँ गीत मल्हार ||
प्यार मोम सा हो गया , विरह बना है आग ,
कहती सजनी हीन है , मेरा सब शृंगार |
सजनी व्याकुल ही रहे , साजन हो जब दूर ,
झरने भी अनुराग के, लगे अग्नि की झार |
लगन लगाना मानती , कोई नहीं गुनाह ,
कहती सजनी प्यार ही , जीवन का आधार ||
कौन अछूता प्यार से , कर लो जग में खोज ,
फिर भी यह क्यों बोलते , होता प्यार बुखार |
करना सबको चाहिए ,प्यार जानिए नूर ,
इसकी हस्ती भी रहे , जब तक है संसार |
करें प्यार वह जानते , कैसा इसका मान ,
नहीं “सुभाषा” मानता , इसको कोई भार |
सुभाष सिंघई
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विधा : गीतिका आधार छन्द : दोहा
पदान्त : आर. दोहा गीतिका ( अपदांत )
जहाँ आवरण दर्प का , वहाँ ज्ञान बेकार |
मोती है यदि सीप में , कीमत तब लाचार ||
पानी-सा ज्ञानी रहे, निर्मल दिखे स्वभाव ,
मन गंगा चंगी दिखे , नहीं पाप का भार |
अपने अंदर खोजिए , कितने भरे उसूल ,
दूजे में कुछ झाँकना , बेमतलब की रार |
पाखंडी को ही मिले , सुख साधन भरपूर,
पुण्यवान निर्धन दिखे , पाता जग से खार |
कहते मधुरस शहद को , मधुरस कहें शराब ,
काव्य श्रवण मधुरस लगे, मन के छिड़ते हार |
अभिमानी रहते जहाँ , दूर रहें सम्मान ,
खिलती जब विष बेल है , करे न कोई प्यार |
सुन ‘सुभाष’ यदि छिपकली, छिपे राम तस्वीर ,
रहे यथावत आचरण, होता नहीं सुधार |
सुभाष सिंघई
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विधा : गीतिका आधार छन्द : दोहा
पदान्त : आर. दोहा गीतिका
समांत – अने , पदांत – मतलब का संसार
कथन न मतलब का गुने, मतलब है लाचार |
निज मतलब की सब सुने, मतलब का संसार |
बिठलाते है मित्र को , करते मीठी बात ,
अपना हित पहले चुने , मतलब का संसार |
चार लोग मिलकर चलें , अपना मतलब देख ,
घुने चने पहले भुने , मतलब का संसार |
धानी भी चलती रहे , मतलब का हो तेल ,
बीजों को रुइ-सा धुने , मतलब का संसार |
मतलब जब जाता निकल , नहीं रहे जब काम ,
कहे चना यह सब घुने , मतलब का संसार |
सुभाष सिंघई
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दोहा ग़ज़ल (या दोहा गीतिका )
समांत (या काफिया) – ऐरे ,
पदांत (या रदीफ़ )- चोर
मतला-
जो जो अब रक्षक दिखें, है मौसेरे चोर |
आज हमारे जानिए , कल है तेरे चोर |
ग़ज़ल के शेर –
कौन करे विश्वास अब , धोखे की जब धार ,
ऐरे गेरे सब बने , नत्थू खेरे चोर |
कौन यहाँ छोटा बड़ा , कौन करे कद नाप ,
मिलें एक ही घाट पर , कौन नबेरे चोर |
चापलूसता डंक से , सबको लेते काट ,
आ जाते डसने सदा , बड़े सबेरे चोर |
बचें कहाँ तक लोग भी , करते मीठी बात ,
नजर उठाकर देखिए , ऐरे गैरे चोर |
झूठें भी सब जानकर , होता नहीं बचाव,
जाल बिछाकर आपको , हरदम हेरे चोर |
मक़्ता
सदा सजगता अब रहे , विनती यहाँ ‘सुभाष’,
अनजानी जब राह हो , तुमको घेरे चोर |
सुभाष सिंघई
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दोहा गीतिका (दोहाग़ज़ल)
दया नहीं , पत्थर ह्रदय , उपज नहीं भू भाग ,
वचन जहाँ , कटुता भरे , खोजो नहीं पराग |
सुनो मित्रता नाग से , कीजे सोच विचार ,
जहर वमन उपहार में , मिले दंश का दाग |
कहीं लोमड़ी नाचती , हिरणी सा श्रृंगार ,
नगर वधू ज्यों मंच पर , गेय सती का राग |
बेवश दिखता देश है , लोकतंत्र लाचार,
कोयल भौंचक देखती , कुरसी बैठे काग |
मूरख हो यदि सामने , मत करना तकरार ,
बेमतलव की रार में , कीचड़ से हो फाग |
राजनीति के मंच पर , अजब गजब किरदार ,
नेता अपने देश में , फेंक रहे विष झाग |
==सुभाष सिंघई ===
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दोहा गीतिका (दोहा ग़ज़ल)
जख्मों के तन पर दिखें , जग के दिए निशान |
लोग देखकर कह उठें , सही नहीं इंसान ||
फल के सँग छाया मिले , खूब लगाए आम ,
पैने पत्थर मारकर , लूटें यहाँ सुजान |
जब-जब भी हालात को, हल का किया प्रयास ,
हाथ जलाकर आ गए , खोकर हम सम्मान |
यत्र तत्र बनते रहे , मतलब के सब यार ,
मिली मुसीबत जिस जगह,खड़ा रहा सुनसान |
सुन सुभाष संसार में , तरह-तरह के लोग ,
सबके अपने रोग है , अपने -अपने गान |
अकल सभी के पास है , समझाना बेकार ,
नहीं मुफ़्त में बाँटना , अपना जाकर ज्ञान |
लोग मुफ्त की चीज में , कमी निकाले खोज ,
कचरा बिकता रोड पर , जग देता है घ्यान |
==© सुभाष सिंघई===
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बुंदेली दोहा ग़ज़ल (गीतिका) अपदांत
दौलत ब्याड़े जान दो , नइँ हौ बसकी बात |
पाँव फँसा लूलै बनैं , करियौ नईं उलात |
ऊखौ ब्याड़े जान दौ , जौन न आबै काम ,
बनतइ मूसर चंद है , खाकै उल्टी घात |
उसकौ ब्याड़े जान दौ , भलै मिलत हौ दाम ,
हाथ लगातइ ही जितै , कौचाँ जितै पिरात |
भइया ब्याड़े जान दो , दौ मौका खौ टार ,
लबरन की संगत जितै, मिलतइ हौ सौगात |
ब्याड़े में संगत गई , रानै सबखौ दूर ,
किलकिल मचबै खेंच कें , उल्टी मौं की खात |
टाँय- टाँय-सी फिस्स हौ , उतै न जाऔ आप ,
ब्याड़े में हम तुम फिरै , बड़ै सयानै कात |
ब्याड़े में हम बिद गये , अच्छे बनै गवाह ,
दिन भर पेशी है करत ,पसरौ रत है भात ||
ब्याड़े में पंगत गई , कत सुभाष है आन ,
गुली तेल लडुवाँ जितै , चिपकत दौनों हात ||
सुभाष सिंघई
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दोहा ग़ज़ल
गुरु विमर्श की कर रहे , सभी भक्त जयकार |
नमन जिनागम पंथ को , रहे आज उच्चार ||
जग में सम्यक ज्ञान से , कभी न होते भेद ,
गुरु विमर्श कहते यहाँ ,सम्यक करो निहार |
जिनवाणी में कह रहे , कुंदकुंद आचार्य ,
जयदु जिणागम पंथ है , करने भव को पार |
पंथ मार्ग पथ राह मग , सभी एक से अर्थ ,
सभी जिनागम से जुड़े , करें अर्थ व्यवहार |
जिनवाणी का कर श्रवण , करिए सब कल्याण ,
गुरु विमर्श उपदेश सब , जीवन में हैं सार |
चले आइए गुरु चरण , छूकर लीजे ज्ञान ,
गुरु विमर्श जय-जय करो , लो जीवन को तार |
जयति जिनागम पंथ की , करता विनय ” सुभाष” ,
गुरु विमर्श की रज चरण , करती है उद्धार |
©®सुभाष सिंघई जतारा
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दोहा ग़ज़ल (या दोहा गीतिका )
समांत (या काफिया) – अगें
पदांत (या रदीफ़ )- हुजूर
म़तला
समझ न अब तक आ रहा , रूठे लगें हुजूर |
इंतजार हम कर रहे , कब तक जगें हुजूर |
दोहा ग़ज़ल के शेर
हम दीवानें है सदा , मानें उनकी बात ,
खुद ही सब यह चाहते , आकर ठगें हुजूर |
सूरज चंदा मानते , उनका रूप अनूप ,
अंधकार आकाश में , आकर उगें हुजूर |
फीका -फीका सब लगे , लगता यहाँ श्वेत ,
लेकर अनुपम तूलिका , सबको रँगें हुजूर |
मक़्ता
ईश्वर यहाँ हुजूर हैं , मालिक कहे ‘सुभाष’ ,
रक्षा हित मैदान में , आकर खँगें हुजूर |
सुभाष सिंघई
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इस प्रकार भी दोहा ग़ज़ल (अपदांत गीतिका) लिख सकते है
दोहा ग़ज़ल (या अपदांत दोहा गीतिका )
पदांत (या रदीफ़ )- ऊर
मतला
लगा हुआ दरबार है , बैठे हुए हुजूर |
चेहरे पर सब देखते , अद्भुत न्यारा नूर ||
दोहा ग़ज़ल के शेर
सब सेवा में है लगे , छूते आकर पैर ,
विनय सभी करते वहाँ , देखो हमें जरूर |
शरण सभी है चाहते , करते सभी प्रणाम ,
कहते हमको मत रखो , अब अपने से दूर |
याचक बनकर माँगते , जौड़े दोनों हाथ ,
कहते कर दो माफ सब , जो भी हुए कुसूर |
सदाचार से हम रहें , सच्ची होवें राह ,
कभी न मन में हो उपज , जिसमें रहे फितूर |
दामन मेरा भरा रहे , आशीषें दे आप ,
दुनिया के जंजाल में , कभी न हो मजबूर |
मक़्ता
मेरे आका राम है , कहता यहाँ ‘ सुभाष ‘ ,
प्याला उनके नाम का , जग में है मशहूर |
सुभाष सिंघई
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समांत - ई , पदांत आर
सांसी सांसी बोलकै , मिली पठौनी खार | नरदा की विनती करी, बैठे बखरी हार ||
माते जू कौ निबूआ , कहें संतरा लोग , हमने खट्टो कह दयो , हो गई तुरतयीं रार ||
मुखिया जी का शौक है , दारू पीना रोज , ऊनै कै दइ टुन्न है , घली पिछारी मार |
भड़याई लरका करे , बाप बनो सरपंच , रामदुलारी चीन्ह के ,अब हो गयी बेकार ||
दारू मुरगा चींथ कै , कत ,सुभाष, बै बोल, मेरी सदा जुगाड़ से ,नैया आयी पार
सुभाष सिंघई
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दोहा ग़ज़ल(दोहा गीतिका)
काफ़िया (समांत ) स्वर - अन
रदीफ़ ( पदांत ) - मदहोश
रंग बिरंगा माह है , गोरी मन मदहोश |
लौटे प्रिय परदेश से , लगता तन मदहोश |
गोरी भावुक लग रही , सुलझाती है बाल ,
लगती अब शृंगार में , है बन ठन मदहोश |
नैना चंचल हो गए , ले काजल की कोर ,
मिलन महकता झूमकर ,है अपनापन मदहोश |
पग धरती पर नाचते , मिले पवन से ताल ,
प्रेम मगन गोरी दिखे , बने मिलन मदहोश |
धरती पीली लाल है , सुंदर खिलते फूल ,
गोरी तन्मय गा रही , है यौवन मदहोश |
छनछन पायल बज रही , थिरक रहे सब अंग ,
अगड़ाई भी आ गई , मन का धन मदहोश |
प्रीतम भी कुछ मन लिए , आया गोरी पास ,
तीन लोक की सम्पदा , प्रेम रतन मदहोश |
आज मिलन मस्ती चढ़ी , मन में बजें मृदंग ,
नेह पिया का देखकर , लगे चमन मदहोश |
रसिया मन भँवरा लगे , रहा पुष्प को चूम |
गोरी झूले चाँद पर , लगे गगन मदहोश ||
भँवरा भी मड़रा रहा , सुनता गान " सुभाष ",
आज सेज के पास में , है उपवन मदहोश |
सुभाष सिंघई
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दोहा ग़ज़ल (दोहा गीतिका )
काफ़िया (समांत) स्वर - आरों
रदीफ़ ( पदांत)- के रंग
आज हुए भदरंग हैं , त्यौहारों के रंग |
हर पल बदले देखते, अब यारों के रंग ||
फीके - फीके स्वाद में , जीते हैं मिष्ठान |
अब कच्चे ही सब बने , उपकारों के रंग ||
मेंढ़क सिर पर कूँदते , चूहें कुतरें कान |
डाक्टर बने सियार है , उपचारों के रंग ||
लाज शर्म वैश्या रखे , सती चले बेढंग |
बजे कपट अब ढोल से , गद्दारों के रंग ||
अब असत्य का शोर है , रखे सत्य मुख बंद |
वाह- वाह अब पा रहे , तलवारों के रंग ||
योगी से तप दूर है ,चंदा दिखे क्लांत |
बदल रहे आकाश में , अब तारों के रंग |
मिलते नीम हकीम हैं, कुछ तो तिकड़म बाज |
अब "सुभाष" भी देखता , हैं नारों के रंग ||
सुभाष सिंघई , जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
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*दोहा_गीत*
(मुखड़ा और टेक )
बेटा घर का बाग है , तब बेटी निज भाग |
बेटा घर का राग जब , बेटी मन अनुराग ||
(अंतरा )
बेटा जहाँ उमंग है , बेटी वहाँ तरंग |
बेटा भी भैया बने , जब बेटी हो संग ||
कुल दीपक बेटा जहाँ , बेटी वहाँ प्रकाश |
वंश बेल बेटा बने , बेटी कुल आभाश ||
(पूरक और टेक )
बेटा है दीपावली , बेटी रँग की फाग |
बेटा घर का राग जब, बेटी मन अनुराग ||
(अंतरा )
बेटा घर का मान है , पर बेटी सम्मान |
बेटी तीरथ सी लगे , बेटा घर का गान ||
उत्तरदायी सुत बने, सुता रहे उल्लास |
माने सुत को कामना, सुता ह्रदय अनुप्रास ||
(पूरक और टेक )
बेटी खुश्बू सी रहे , बेटा स्वर्ण सुहाग |
बेटा घर का राग जब बेटी मन अनुराग ||
(अंतरा )
बेटा बेटी दूर हो , दीजे आप पुकार |
बेटी आए दौड़कर , बेटा करे निहार ||
बेटा घर का भाग्य है , सचमुच घर की शान |
पर बेटी सौभाग्य है , किसको इसका भान ||
(पूरक और टेक )
कैसे वर्णन हम करें , जो बेटी का त्याग |
बेटा घर का राग जब , बेटी मन अनुराग ||
सुभाष सिंघई
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पद काव्य खंड
हिलमिल के अब राने |
जय बुंदेली झंडा ताने , आगें सबखौं आने ||
प्यारे मीठे बोल हमारे , जिनै . हमें चमकाने |
सबइ जगा के जुर कै भैया, आपस में पहचाने ||
दोहा चौकड़िया भी लिखके , सबइ छंद अजमाने |
पदावली भी चौकड़िया से , बनतइ सुने सयाने ||
टेक लगाकर सवसे ऊपर, तुक. में उसे मिलाने |
हाथ जोड़कर कहत सुभाषा , खोजो शब्द खजाने ||
पदावली , ( आधार छंद चौकड़िया )
बेमतलब नहिं नचने |
लुखरगड़े से सबखौ बचने, जितै रार है मचने ||
कैने बात नीति कै सबसे , तबइ सबइ खौं पचने |
अकल अजीरण बहुत मिलेगें, बात न जिनखौं जचने ||
कहत सुभाषा नौनों करने , साजौ सबखौ रचने ||
बनो रहन दो जो जैसो है , नहिं काऊ पै खिचने ||
सुभाष सिंघई
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पद काव्य (आधार दोहा छंद)
बप्पा रहे हृदेश |
गणपति सब मंगल करें, खुलें ज्ञान दृग केश ||
विध्न विनाशक आप है , ,सुखमय करें प्रदेश |
गौरी के सुत लाड़ले , जगपति पिता महेश ||
हिमगिरि आलय जानिए , मूषक चिन्ह गणेश |
प्रथम़ पूज्य पद प्राप्त है, सदा पूज्य परिवेश ||
आप ज्ञान भंडार हैं , कहते स्वयं उमेश |
हाथ सुभाषा जोड़ता, हरना सभी क्लेश ||
(इस पद में एक त्रुटि रखी है , जिससे आप समझ सकें
हृदेश और प्रदेश -- इन दोनो के पदांत शब्दों में देश - देश आया है |
छंदो के पदांत में अर्थ अलग होने के बाद भी यह समांत दोष कहलाता है
विशेष ~
(आप सात युग्म तक पद काव्य ले जा सकते है , पर न्यूनतम तीन युग्म आवश्यक है , व हर चरण की तुकांत एक बार प्रयोग होती है , इतनी तुकांते मिलती भी नहीं है ,व पद बोझिल न हो जाए तब चार पांच युग्म तक लिखना चाहिए |
सवसे ऊपर की टेक भी युग्म में शामिल मानी जाती है , व गायन में टेक किसी भी चरण के बाद भी गायक गाते है
साहित्यकार बंधु , पद काव्य सुनकर सोचते हैं कि यह प्राचीन कवियों की धरोहर है , हम इस पर नहीं लिख सकते हैं |
जबकि समझने पर आसान भी है।
पद काव्य रचना एक गेय शैली है
जिसमें पहली पंक्ति आधी या चरण टेक के रूप में होता है बाकी अन्य चरण दो भागों में , यति के माध्यम से विभक्त होते हैं।
पहले भाग में मात्रा अधिक होती हैं, और दूसरे भाग में पहले भाग से कम मात्रा होती हैं।पदावली किसी भी गेय मात्रा भार छंद में लिखी जा सकती है |
शंका समाधान -
शंका - जैसे दोहा में चार चरण होते है , यहां पद में प्रथम चरण जो टेक है, उसमें दोहे के चरणों का एक भाग नहीं है | तब कैसे आप दोहा पद काव्य कह सकते हैं?
समाधान - बिल्कुल सही कह रहे हैं आप ! और अभी तक जितने भी पद गेय छंद मापनी से लिखे गए हैं वह सभी एक नाम " पद" से पुकारे गए हैं | पर किस छंद को हम आधार बनाएं , यह विचार तो करना पढ़ता है , तब उस का आधार तो लिख सकते है
किसी भी गेय छंद में , प्रथम चरण की पृथक करने पर शेष भाग को टेक का रुप देकर , आगे छंद विधानानुसार लिखने पर पद काव्य आसानी से लिख जाता है |
हम सभी साहित्य सेवा के फकीर हैं
कोई लकीर का फकीर है - तो कोई लकीर से हटकर फकीर है।
सादर ,सनम्र
सुभाष सिंघई
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बुंदेली है बड़ी गुरीरी , लगतइ सबखौं नीरी |
भुनसारे से दिनडूबें लौ ,बोलें सखा -सखी री ||
हल हाँकें जब भरी दुपारी , खाकें सिकी पँजीरी |
कात सुभाषा बाँध मुडीछों , गातइ खूब फकीरी ||
हओ कैतई है हर बातन , किस्सा सुनवें रातन |
घंटन लोरत मुनसेरू भी , मोड़ा मोड़ी तालन ||
दाँती कौनउँ नहीं पुसावें , बात न करतइ खातन |
डुकरा कोले कहै सुभाषा डारें सीकें दातन ||
ढुलक मजीरा देखो हातन , देखों हमने गातन |
घुसौ कान में हल्ला गुल्ला , लोग दिखे है आतन |
मंदिर में जब बँटी पँजीरी , ले रय सबने हाथन ||
कात सुभाषा मुड़ी झुका कें ,सबखों देखों जातन ||
माते डुरयायें थे मातन , संगे ल़य थे नातन |
पैरें घूमें खिचउँ पनैया , अपनी दौनों लातन ||
लोंड़ी खिली कान की भैया , पान तमाकू पातन |
कात सुभाष जच रय माते ,कछु बने नहिं कातन ||
चौकड़िया छंद (एक नए प्रयोग के साथ )
गड़िया घुल्ला धरै धुरइयाँ, पैरे खिचऊँ पनइयाँ |
पौच गओ ससुरारे जल्दी , थैला टाँगे कइयाँ ||
थैला टाँगे कइयाँ सइयाँ , जौरू मसकत बइयाँ |
साराजै सब देख कहत है , चैन सुभाषा नइयाँ ||
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घूमत गाँव गली गैलारे, तरपट कर दय द्वारे |
जौन लरै थे सरपंची खौ, खूब लगा कै नारे ||
बेइ उबाडें बोलत है अब , जो भी कर्रे हारे |
कात सुभाषा बच के राने, फिरने है परवारे ||
बदन लगत है पूरौ झइयाँ, चैन काल से नइयाँ |
पुरा पड़ोसी जुरकें पूँछत , कैसी कर लइ मुइयाँ ||
कात सुभाषा पंगत गय ते , काल हती दो ठइयाँ |
ठैंस- ठैस के पुआ दचक लय, सौ आ रइँ उबकइयाँ ||🥰🙏√
भूखे रहते बाप मताई , गुजिया खात लुगाई |
भुन्सारे से दारू पीके, खेलत जुआ अथाई ||
घर में बैठी बिन्नु सयानी, कैसे होत पराई |
कहत सुभाषा ऐसे नर खौं , जानो बड़ो कसाई ||√
जुरीं हार पै सबरी गुइयाँ , लटकी सबकी मुइयाँ |
परौ घाम है चरपट्टे कौ , नहीं खेलवें छइयाँ ||
कहत सुभाषा लाईं भैया , लादें अपनी कइयाँ |
खेतइ इनके बाग बगीचा , काँसे करें बधइयाँ ||√
सुभाष सिंघई जतारा
मूरख मिले गाँव में न्यारे , बोले बिना विचारे |
उनके सुनके मत गुथ जइयो, कहें जतारा बारे ||
नाँय माँय से उनखौ टारौ , खड़े न होवे द्वारे |
कहत सुभाषा उरजट्टे से , बरकौ सुजन हमारे ||√
भैया लुखरगड़े से बचने, साजौ सबखौ रचने |
लिखो हमेशा उम्दा भैया , तबइ सभी खौं पचने ||
अकल अजीरण बहुत मिलेगें, बात न जिनखौ जचने |
कहत सुभाषा अच्छो करके, मन से सबखौं नचने ||
उन्ना फींछत झाँसी बारी , बात करत है प्यारी |
पटल बनो है जय बुंदेली , महिमा उसकी न्यारी ||
राना जू ने सबखौ जोडों ,बने कलम जो धारी |
कहत सुभाषा मान राखतइ , सबखौ देके भारी ||
चौकड़िया छंद ( राखी पर्व पर)
रामा तुमसे मोरो कहना , सुखी रहे घर बहना |
संकट ऊपै कभउँ न आवें , नौनों होवै रहना ||
माथ टीक कै खुश हौतइ वह,भइये डोरा पहना |
कात सुभाषा ऊकीं राखी , बनत कलाई गहना ||√
रामा विनती भी सुन लइयो , बैन सबइ खौ दइयो |
माथ टीकवें चौक पूरवें , हर घर बैन भिजइयो ||
खबर- दबर लेबें के रानें , बैन न छोेड़े भइयो |
गलती भइया की जब होवै , लेतइ मूड़ छतइयो ||√
सुभाष सिंघई
कुम्भ चौकड़ियाँ
भइया चलो कुंभ में सपरन , मिलें सबइ के दरसन |
तिरवेनी की धार सपर के , करियो पाप विसरजन ||
बन्न- बन्न के साधू मिलबें , नागा है आकरसन |
कात सुभाषा भजन करो सब,सफल करो जो नरतन ||
है प्रयाग अब कुछ अलबेला , लगो कुम्भ कौ मेला |
नागा बाबा मुलकन आये , गुरू संग सब चेला ||
जौन तरफ भी नजर उठायै, दिखतइ रेलम रेला ||
चलौ सुभाषा सबइ सपरबे , लैवँ हाथ में थैला ||
सुभाष सिंघई
कोउँ काउँ कौ जग में नइयाँ , साँसी कै रइ गुइयाँ |
तीन दिना से ताप चढ़ौ है , कौनउँ नइँ पुछइ़याँ ||
बलम गये परदेश हमारे , ठौकत रात गकइयाँ |
कात सुभाषा आकै मौसें , तौरी लटकी मुइयाँ |
जिनकी नियत न अच्छी होती, किस्मत उनकी रोती |
जहाँ फूूल को खिलना होता , राहें काँटे बोती ||
दिखे चाँदनी चार दिना की , फिर अँधयारा ढोती |
कह सुभाष बेईमानो घर, कभी न चमके मोती ||
वर्तमान हालात पर चौकड़िया
आज बिलैया रबड़ी खाती , हौरा भूँजत छाती |
चरराटो दय गाँव भरे में , दद्दा जू कौ नाती ||
मंतर उसको कात सुभाषा , झटक दलाली आती |
कनकच्चू वो थाने कर दे , सबखौ पुलिस बुलाती ||
दो रस भरी चौकड़िया -
हाड़ माँस में ताकत नइयाँ , समझ न पाबै सइयाँ |
ताप चढ़ौ है तीन दिना से , जानत सबरी गुइयाँ ||
कौन जगाँ से चंद्र चकोरी , लगतइ मोरी मुइयाँ |
बनो वैद्य अब कात सुभाषा , छू लो प्रीतम बइयाँ ||
मोरे कत है मुझसें सइयाँ , गाँव भरे में नइयाँ |
मैं लगतइ हूँ चंद्र चकोरी , उजरी मोरी मुइयाँ ||
नगर जतारा रहत सुभाषा , कात उतै की गुइयाँ |
बड़भागिन वह नारी जीकीं , प्रीतम लेत बलइयाँ ||
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चौकड़िया
कविता सुनिए सब कवियन की , गुन गाते नदियन की |
गंगा जमुना पुजतीं भारत , गाथायें सदियन की ||
केन बेतवा चम्बल कृष्णा, मदद करत कइयन की |
नदी नर्मदा उल्टी राखे , निज रथ गति पहियन की ||
सुभाष सिंघई
चौकड़िया
अपनी करत रात बड़बाई , लबरा देत दिखाई |
घर कै हाल बतातइ नइयाँ , भूखन मरत लुगाई ||
दाँत निपौरत गली-गली में ,सबकी करत हँसाई |
सबरौ जाने हाल सुभाषा , पर का करने भाई ||
गोरी को घरवारौ येड़़ा , देखत में है भेड़ा |
रात दिना फुसकारत ऊपै , लगत साँप है गेड़ा |
करम ठोक के अपनो गोरी , मौ पै राखत बेड़ा |
कात सुभाषा घरवारै खौं , मिलबै चार लतेड़ा ||
गोरी घर में जगबे रातन , बनत न ऊपै कातन |
जुआ खेलकै प्रीतम आबै, अपने दौनों हातन ||
घर में नइ़याँ तनिक कनूका , दर्द भरौ है छातन |
शरम लगत है भौत सुभाषा , उयै मायकै जातन ||
बीदौ रत है बो बस तासन , घर कै बिक गय बासन |
गोरी कौ घरवारौ सूदा , आ जातइ है झासन ||
बैठ जात है पुंगन के सँग ,लैन जात जब रासन |
कबै सुभाषा गोरी काबै, इनै सुदारै शासन ||
चौकड़िया
माते समझत हमखौं बिटुआ , ककरी जैसो किटुआ |
उनको लरका मौज मनावें , लगतइ सबखौ मिटुआ ||
दोनों समझत गाँव भरै खौं , जैसे सब हो चिटुआ |
कहत सुभाषा बच के राने , जब ऐसे हो घिटुआ ||
सुभाष सिंघई
हिंदी दिवस पर , एक चौकड़िया से हिंदी को नमन
आज किवरियाँ दिल की खोलो , हिंदी की जै बोलों |
भारत माँ की बिंदी- हिंदी , भाव उठत है मोलों ||
देशज भाषा सब हिंदी की, बैन सरीखी तोलों |
कात सुभाषा हिंदी से ही , सदा प्रेम रस घोलों ||
सुभाष सिंघई
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मूढ़ जोरिया बाँदे लल्ला , घिसत पनैया तल्ला |
संगै लग गव पाछे-पाछे , ठलुआ लरका कल्ला ||
शादी खौ भय दो मइना है , परै न ऊकै पल्ला |
कहत सुभाषा गौने खौ वह , करै दौदरा हल्ला ||
परै न मोरे कुछ भी पल्ला, का चाहत है लल्ला |
कनकुच्चु खौं करतइ हरदम , नथु कौ मोड़ा मल्ला ||
मुड़ी मारके भींटन से वह , करतइ ऊमै दल्ला |
कहत सुभाषा गौनो खौ वह , करै दौदरा हल्ला ||
समदी ऊकौ पूरो टल्ला , परत सबइ पै झल्ला |
चैत काट कै घर में लाने , पैले हमखौ गल्ला ||
विदा पछारी करने हमखौ , चाहे आए अल्ला |
कहत सुभाषा गौने कौ अब , करौ न कौनउँ हल्ला ||
रखते बातों का वह भन्ना , बनते सबके नन्ना |
पके बांस को कहते सबसे , बड़ो गुरीरो गन्ना ||
चतुर मानतइ खुद को भइया ,बाकी सबखौ मुन्ना |
उनै छानवे कहत सुभाषा , बनो न कोई छन्ना ||√
राजा राज महल में नामी, साँप रहत है वामी |
ज्ञान खोजता साधू हरदम, कीचड़़ खोजे कामी ||
हंसा मोती चुनता रहता , पसंद करे न खामी |
कहत 'सुभाषा'' कागा जानो, सदा कुटिलता गामी ||
सज्जन जब खुद दर पर जाता,लोग न जोड़े नाता |
दुर्जन का सब स्वागत करते , कहते उसको भ्राता ||
मक्कारों को मिले सफलता ,सत्य पराजय पाता |
कलयुग के यह हाल सुभाषा , कागा रबड़ी खाता ||
रामदुलारी रही चिमानी , पीकर ठंडा पानी |
आँख फाड़ के देखत जावे , बनती कौन कहानी ||
भड़या पारें घर में माते , चुपके खबर भिजानी |
थाने माते पहुँच गए है , याद करें अब नानी ||
उदरें सब भींटन से धपरा , बिकन लगें सब खपरा |
करम सुनें है जिनके खोटे , बचें न घर. में टपरा ||
मुँइयाँ पूरी लटकत रावे , आँखें होवें चपरा |
कहत सुभाषा नै कै चलियो , अपने मन खौ सपरा ||
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बकें तला पै फींछत उन्ना , बात - बात में टन्ना |
कौन. बात पै भुज्जी रुठी, गल्ती कर गय नन्ना ||
मार मुगइया उन्ना कर दय, फटे चिथे से छन्ना |
कहत सुभाषा निकर गये है , नन्ना बचवें पन्ना ||
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कक्का लगते है खिसयाने , बातन खौं वे ताने |
देबें धोंसे सब लरकन खौं , पोंचा दें हम थाने ||
करें गिलइयाँ बाप मताई , मोरे आन ठिकाने |
कहत सुभाषा कोउ न चूके, आ कै उन्हें चिढ़ाने ||
ओरी कत ती मोखौं सपरा , बिटुआ करो न नखरा |
पियो गटक कै दूध हमेशा , जब तक चढ़े न अफरा ||
प्यास. लगे पै पानू पीना , धरो घिनोची गगरा |
कहत. सुभाषा ओरी मोरी , दूर करे सब. खतरा
हम तौ बस इतनौ सौ जाने , कैसे धरै फलाने | सला मानकै जो भी चलबै , हरजा अपनौ माने || थुथरी चलतइ है बुकरा-सी , फिरत राँय गर्राने |कात सुभाषा काज बिलौरें, चुखरा जैसे दाने ||
का कै दै अब तौसे गुइयाँ , ठिगने मौरे सइयाँ | पाँच हाथ कौ पंचा पैरें , उकली फटी पनइयाँ | खेत हार खौ कड़ जावें वें , भुन्सारे लौलइयाँ | कात सुभाषा कावैं गोरी ,नइयाँ चइयाँ मइयाँ||
दद्दा मोरी ताइँ न हेरत , बस भइया खौ टेरत | बिटिया कत है मौड़ी हौबौ , लगबें जनम ठबेरत || भइया हमखौ खुद है प्यारौ , साजौ उयै नबेरत |पर दद्दा की रुसबाई अब , मोरी खाल उदेरत||
चौकड़िया ( बुन्देली में )
गोरी खेलन आई होरी , धुतिया पैरैं धोरी |
मुइयाँ ऊकी पूरी उगरी , लग रइ चंद्र चकोरी ||
लाल रंग हुरयारे लय है , और हात में रोरी |
गयी निचुर है पूरी गोरी, लाज शरम सब टोरी ||
यही चौकड़िया ( खड़ी हिंदी में परिवर्तित की है )
🙏👇
गोरी खेले मन से होली , साड़ी पहने पीली |
आज नहीं है घूँघट चुनरी, लगती बहुत रसीली ||
लाल रंग सब डाल रहे हैं , लिए हाथ में रोली |
भींजी मन से गोरी पूरी , देख " सुभाषा " टोली ||
चुटिया में वह खुरसैं फूला, डुरयायें है दूला |
लटक झटक कैं चलती गोरी , मटकत हैं तब कूला ||
नाँय माँय बा गटा घुमातइ , जैसे हौ बे झूला |
बँदै मुड़ी पै हिलबें ऊकै , बारन के घरघूला ||
गोरी चौकड़िया (होली मंगल हो )
गजब लगी गोरी की हेरन , हुरयारे गय देखन |
कातइँ सबसे होरी खेलो, भंग करो सब सेवन |
रँग गुलाल अब जितनी मिलवे,भर लो अपनी जेवन |
तनिक दूर से फेकौ मौ पै , आकैं करौ न छेवन ||😁
चौकड़िया छंद ( ईसुरी / नरेन्द्र छंद / टहूका छंद )
चार पद की एक चौकड़िया
(16 - 12 , प्रथम पद में यति व पदांत में तुकांत अनिवार्य )
गुरु बनता जब कुछ अभिमानी , कर उठता शैतानी |
चना झाड़ पर खुद ही चढ़ता , कहता मैं हूँ दानी ||
लोग मजे भी लेने लगते , हाँ से बने कहानी |
निंदा के जब मिले थपेड़े , शिष्य न देते पानी ||
दिखें ज्ञान में शिक्षा क्षमता , गुरु में होवें समता |
हृदय सहज ही बनकर सुंदर , रखे क्षीर- सी ममता ||
अनुभव सबको सहज सुनाए , योगी हो वह रमता |
जहाँ भाव अभिमानी आवें , वहाँ नहीं गुरु थमता ||
सुभाष सिंघई
नए साल की सादर शुभकामनाएँ
चार बुंदेली चौकड़ियों से 🌹🌹🌹🌹
नौनीं लगबै आज उरइयाँ , खिली धूप चटकइयाँ |
नयै साल की दैत बधाई , हौबे चइयाँ मइयाँ ||
राम -राम है सबइ जनन खौं, जोरत हाथ नुगइयाँ |
कात सुभाषा ईसुर दैबे , सबखौं अपनी छइयाँ ||
पूजौ बाप मताई पइयाँ , और पली जो गइयाँ |
दूध पियाबै भरौ कटोरा, आबै अगर बिलइ़याँ ||
नयै साल कौ अरघा देना , सूरज देख उरइयाँ |
मंदिर जाकै मत्था टेकौ , माँगों ईसुर छइयाँ ||
सब बूड़न के परकै पइयाँ , छौटन खौ दो कइयाँ |
ऊ सजनी से हँस के बोलो , जीकै तुम हौ सइयाँ ||
नयै साल की दैव बधाई , रखौ खिली सब मुइयाँ |
कात सुभाषा आज चलन दो , खूबइ सगुन बधइयाँ ||
आज पतंग-सी लगे चिरइयाँ, करती गगन घुमइयाँ |
लगे भुरभरी भोर सुहानी , सजनी से कत सइयाँ ||
नये साल पै आज बनन दो , घी में डुबी गकइयाँ |
कात सुभाषा भर्त भटा से , खइयौ सब दो ठइयाँ ||
चौकड़ियाँ
देरी आँगन नहीं उरइयाँ , और सार में गइयाँ |
सबइँ पौर से बातें खौ गइँ,प्यारी सी चटकइयाँ ||
बउँ धन घूँघट अब ना काडें , फिरे उगारें मुइयाँ |
सोइ सुभाषा खेते जा रय, पैरें खिचउँ पनइयाँ ||
बउँ धन दैबें भौत उरानों , दद्दा काम नसानों |
नईं खेत पै सइयाँ जा रय , लैतइ पेट बहानों ||
गोबर कंडा सास न पाथे, हम सैं कत तुम जानो |
भार पटक दवँ मोरे ऊपर, सड़ गवँ घरै अथानों ||
कविता सुनिए सब कवियन की , गुन गाते नदियन की |
गंगा जमुना पुजतीं भारत , गाथायें सदियन की ||
केन बेतवा चम्बल कृष्णा, मदद करत कइयन की |
नदी नर्मदा उल्टी राखे , निज रथ गति पहियन की ||
गणतंत्र दिवस पर सभी का हार्दिक
अभिनंदन शुभकामनाएँ🌹🌹🌹🌹
चौकड़िया छंद
लगता है यह पर्व सुहाना ,
हम सबनें पहचाना |
दिवस इसे गणतंत्र कहे सब,
लोकतंत्र का आना ||
ध्वज फहराते सदा तिरंगा ,
दें डोरी से ताना |
सावधान हो स्वर से गाते ,
जन मन गण शुभ गाना ||
भारत संविधान है न्यारा ,
गंगा यमुनी धारा |
है समान अधिकार सभी को ,
शुभ गणतंत्र हमारा ||
सभी धर्म को आदर मिलता ,
जिसने इसे निहारा |
नमन सुभाषा करके इसको ,
हम सबने स्वीकारा ||
जब -जब मेरा ध्वज लहराए ,
मन पूरा हरषाए |
हाथों में भी थाम तिरंगा ,
राष्ट्रगीत शुभ गाए ||
है अनेकता रहे एकता ,
भाषा शुचिता लाए |
पावन है गणतंत्र हमारा ,
विश्व पटल पर छाए ||
पढ़कर संविधान ही सबने,
बोला अब क्या कहने |
भीमराव का लोहा माना ,
सफल लगें सब सपने ||
लोकतंत्र शुभ कायम मिलता ,
हित के मिलते गहने |
नमन सुभाषा करता हरदम ,
दिखें एकता झरने ||
मिलकर ही सब ध्वज फहराना ,
राष्ट्र गान मिल गाना ||
रहे एकता भारत भू पर ,
दिन गणतंत्र मनाना ||
रहे देश में भाई चारा ,
ऐसा कदम उठाना |
देश हमारा रहे सुरक्षित ,
यह भी धर्म निभाना |
चौकड़िया
बैठी घर में धना रिसानी, बोले अपनी बानी |
डुबकी लैन कुम्भ की जाने,सो प्रयाग की ठानी ||
दिखी नहातन गुइयाँ ऊखौ , टी बी पै मुसकानी |
गट्ट बीद गइ कात सुभाषा , देख भीड़ अकुलानी ||
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सौलह मात्रा बाले छंद
टाँग हमाई वै अब खैचे ,
महुआ अपने दाखन बैचें ,
हमने कै दइ जो का करतइ -
बौले बिट्टू उतरौ नैचें |
भुँजी भांग घर में है नइयाँ ,
फटी धरी है खिचऊँ पनैया,
फाँकत है लाखन की बातें -
मटका- मटका अपनी कइयाँ |
नाँय माँय की बात भिड़ातइ ,
थुथरी अपनी खूब चलातइ ,
कानौ अपनौ टैट न देखै -
दूजी आँखें बींग बतातइ |
बनत फिरत है अब बै सूदे ,
साँसी कै गव इतै रबूदे ,
सेठ घरै गय भड़याई खौ -
टाँग टौर लइ भागे कूदे ,
दही न उनको देखो जमतइ ,
शकल देख कै दुद्दू फटतइ ,
घास कौउ ना डारै उनखौ ,
फिर भी अपनी पै पै करतइ |
खिरविर्री मूँछन खौ ऐठैं ,
पंचायत में आगे बैठे ,
कौउ न उनखौ जब पुर्रैटे -
काढ़ै नकुआ सै वैं घैटें |
उनकी काँ तक कहे कहानी ,
नहीं काँउ खौं देवैं पानी ,
लुचइँ मसकवै आगे रत है -
फिर भी कत अपने खौं दानी |
सबइ जगाँ पै दाँत निपौरे ,
फिरत रात है दौरैं दौरें,
लत्ता कौ वै साँप बनातइ -
दूजी स्वापी खूब लटौरें
काम करत वै सब अड़बंगौ ,
दोस्त करैं बातन से नंगौ ,
पूँछ उठा कै बाँड़ी बैठी -
सबसे लैवें आकै पंगौ |
बना-बना बातन कौ भतुआ ,
बुकरा सौ है चलतइ चबुआ ,
नाँय माँय से खबर सूँघ ले
धरै गिद्द से उनकै नकुआ |
सुभाष सिंघई
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बुंदेली कविता ( सौलह मात्रा मुक्तक में )
एक सजनियाँ कौ अपने बालम के नाम संदेश - )
दैत न बलमा तुमै उरानों ,
सबइ निपुर गव धरौ खजानों ,
चुखरयाइ सब घर के कर रय -
बचौ न घर में खाबै दानौं |
देवर करतइ रोज धिगानों ,
सबइ चपेटो गुरिया गानों ,
देवरानी भी धमकी दैबें -
तुमै घुमा दें अब हम थानों |
सटका पौनी घर में मानों ,
कात नंद है पेट पिरानों ,
काँतक कुठिया में गुर फोरें -
हँसत देख कै हमें जमानों |
साँसउँ मौखौं आज दिखानों ,
टिड़का सबखौं रोग पुरानौ ,
समझाबैं खौ काँसै लाबै -
कौनउँ कैबै इतै अहानों |
ससुरा मौरो बड़़ौ सयानों ,
कँत है पइसा हम लौं रानों ,
पूछत रातइ हमसें डुकरा -
कितने भर कौ बनौ तिगानों |
सास हमारी कम ना जानों ,
रखतइ पूरौ मन गुड़यानों ,
सब बहुअन खौ खूब लराबें -
चुगली चटनी और अथानों |
जेठी बाँटें खूब जिठानों ,
देबै गारी फिकै मखानों ,
बैथा भर की जीभ काड़बै -
मचौ घरै है अब भैरानों |
आगें साजन नईं ठिकानों ,
घर में चल रव खूब मुरानों ,
अपनौ -अपनौ हाथ बना रय -
ककिया सासो घालै तानों |
अजिया ससुरा है टन्नानों
तीन दिना से है भन्नानों
खाली डिब्बा नहीं तमाकू -
परौ पौर में है सन्नानों |
सुभाष सिंघई , जतारा
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हाल चाल सब न्यारौ है
बुदुआ सबखौ प्यारौ है
कनवाँ राजा सगुन विचारे
दिया तरै अँदयारौ है
फाँकाँ फूँकी बारौ है
मौं पै नइयाँ पारौ है
सूकी धरती पै कत है
बिखरौ खूब गिलारौ है
दिया तरै अंँदयारौ है
जौन रात उजयारौ है
बै कत चंदा कारौ है
बनै लड़इया इतै घूमतइ
जिनने बगदर मारौ है
दिया तरै अँदयारौ है
घर कौ मुखिया सारौ है
आँगन में नरदा डारौ है
चीं चीं कर रय सबरै
बिना कुची कौ तारौ है
दिया तरै अँदयारौ है
पानी पीबै खारौ है
मीठौ बगरा डारौ है
गुनिया कातइ भूत लगौ है
पीकै पउवा झारौ है
दिया तरै अँदयारौ है
घरै बुलाकै टारौ है
छाती पै घूसा मारौ है
पौल खोलबै इतै सुभाषा
बौ महुआ छिवला बारौ है
दिया तरै अँदयारौ है
सुभाष सिंघई
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अब बेटा पढ़कर आया है
प्रश्न संग में कुछ लाया है
बेटा -
क्या रक्खा है अब गॉव में ?
बूड़े बरगद की छॉव में ??
मूरख दिखते बने लठैत
मूँछें लम्बी ~लगें डकैत
चौपालों पर बैठे ठलुआ
बीड़ी फूंके लल्लू कलुआ
गलियाँ से छाले पॉव में
क्या रक्खा है अब गॉव में ?
चुगली को फुर्सत है नारी |
परेशान दिखती महतारी ||
टूटा फूटा घर खपरैल |
रहता सँग में बूड़ा बैल ||
मारा मारी मची चुनाव में
क्या रक्खा है अब गॉब में ?
मॉ-------
माँ बोली जन्नत गॉव में |
अनुभव बरगद की छॉव में
सबकी रक्षा करें लठैत |
पास न फटकें यहॉ डकैत ||
चौपालो में हें परमेश्वर |
निश्चल हृदय यहॉ हर नर ||
मेहनत रहती है पॉव में |
माँ बोली जन्नत है गॉव में ||
ममता रखे यहाँ की नारी |
करती काम सदा उपकारी ||
माना घर है कुछ खपरैल
दिल के अंदर नही है मैल
मन की दरिया मौज नाव में
माँ बोली --जन्नत है गाँव में
(सुभाष सिंघई
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गीत खंड
बुंदेली में गीत
आधार " सार छंद" मापनी 16- 12 में 16 की
यति चौकल के चारों रुप से व चरणांत दीर्घ से |
मुख खौ फाँड़े नाक फुला रय , जैसे बज रय भाड़े ।
चार जनन में पोल खुली है , माते रै गय ठाड़े ||
रामदुलारी बोल गई है , थुथरी मत खुलबाओ |
भड़या काय परै तै घर में , कारण हमें बताओ ||
रमुआ के घर . परी डकैती , काहे रहे चिमाने |
हाथ तुमारो पूरो उसमें , बन. रय. बड़े सयाने ||
चुरीं रात भर. पूड़ी घर में , बने पुआ. थे माड़े |
चार जनन में ~~~`~~~~~~~~~~~~~~~||
गाँव भरे में मूँछें ऊँची , सबरे कत. है कक्का |
काम करत हो औछे तुम तो , लगत सभी खौ धक्का ||
कीसे हम अब कैसी कै दे , तुमरी अजब कला पै |
तोरो लरका बिटियाँ छेड़त , सपरत. देख तला पै |
धी खौं चाटत कथरी औढ़े , बरसा गरमी जाड़े |
चार जनन में ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ||
फूट डाल दइ सट्टू के घर , बहू ने ले लओ डंडा |
पकड़ चुटइया सास घसीटी , काड़े ऊ कै कंडा ||
घी डारो आगी में तुमने , बात सभी सब जाने |
मजा लूट रय परे- परे तुम , घर. में पसरा दाने ||
लच्छन. हमने पूरे जाने , करम तुमारे ताड़े |
चार जनन में ~~~~~~~~~~~~~~~~~||
सुभाष सिंघई , जतारा
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विधा : गीतिका ,आधार छन्द : लावणी छन्द
( १६+१४ मात्रा अन्त २ या ११ )
समान्त : "आर" स्वर. पदान्त : "करे"
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गीतिका खंड. लावणी छंद , {गीतिका }
पैसा -पैसा माँगे मानव , तब ईश्वर बौछार करे | मैल हाथ का यह होता है , कौन इसे स्वीकार करे |
पैसा पाने देखा सबने , लँगड़े भी दौड़ा करते , अंधा तक भी उसको पाने , हाथों को तैय्यार करे |
पागल देखा चौराहों पर , होश नहीं कुछ भी रखता , पर वह पैसा को पहचाने , हर द्वारे गुंजार करे |
अजब -गजब पैसों का सागर ,सभी चाहते लें डुबकी , दमखम जौर लगाने मानव , पैसा ही पतवार करे |
भाई - भाई लड़ जाते है , बँटवारे की बात चले , पैसा करता मूल्यांकन है , हम सबको लाचार करे |
अपना- अपना स्वर है रटते , बन जाते सब दुश्मन है ,कौन मानता कड़वा सच यह, अमरत जलकर खार करे |
महिलाएँ भी नर्तन करती , सभी दिशा में शोर मचे , चूल्हा बँटकर फूटा रहता , चक्की की भी हार करे |
पाई- पाई चिल्लाती है , लेने देती चैन नहीं |इंच-इंच पर दिखे "सुभाषा', झगड़ा बढ़कर मार करे |
सुभाष सिंघई
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अपदांत गीतिका
समान्त : "आना" स्वर. , पदान्त- अपदान्त
मापनी: ( १६ मात्रा अन्त २२ )
हुआ राम का अद्भुत आना ।
भावी पीड़ी को समझाना |
सदी पाँच सौ बीत गईं थी ,
तब ही सबने था कुछ ठाना |
बाबर की वर्बरता कुचली,
तब ही मंदिर बना सुहाना |
बहुत हुआ संघर्ष यहाँ है ,
लगे जरूरी यह बतलाना |
स्वाभिमान की बात रही है ,
पहना तब केसरिया वाना |
सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
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**नकल में अकल कुछ लगाने लगे हैं **
मापनी 122 ×4 समांत-आने , पदांत -लगे हैं
नकल में अकल कुछ लगाने लगे हैं |
जहाँ छंद बिखरे चुराने लगे हैं ||
मिली छूट पूरी यहाँ पर जिसे है
दही कह मठा ही लुटाने लगे हैं |
'महल छंद' में जो बिखेरा गया है ,
वहाँ का लिखा निज बताने लगे हैं |
जहाँ छंद की मूँछ दिखती वहीं से ,
दिखे हिंदु मुल्ला बनाने लगे हैं |
जुड़े है हजारों यहाँ आप देखो
नयन के इशारे नचाने लगे हैं |
मदारी बने बंदरों के शहर में
समय देख ढपली बजाने लगे हैं |
लगी आग पूरी न जल है बुझाने ,
धुआँ देख गलती छुपाने लगे हैं |
नहीं शर्म कोई रखे वें " सुभाषा "
हवा देख लाठी घुमाने लगे हैं |
सुभाष सिंघई
~~~~~~~~
पद काव्य
अक्सर देखा है अभिमानी |
काम करे वह ऐसा कोई , दिख जाती नादानी ||
अक्कल रखता पहले गिरवी , करने को शैतानी |
मित्र देखकर भी भड़के वह , करे रार की ठानी ||
दे कुतर्क वह चिल्लाता है , बनता खुद ही ज्ञानी |
सबसे कहता मेरे जैसा , नहीं यहाँ है सानी ||
उसके अंदर नहीं दिखेगा , लाज शर्म का पानी |
वाह "सुभाषा" सबसे चाहे , अपनी कहे कहानी ||
सुभाष सिंघई
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