जैन साहित्य सृजन
श्री आदिनाथाय नम:
श्री आदिनाथ स्तुति (पंच दोहावली)
मंगलमय आदिश्वरम् , ऋषभदेव जगदीश |
मनोहरम् कैलाश गिर ,नमन करें जन शीश ||
कांति धवल चंद्रेश्वरम् , मुक्तेश्वर श्रीनाथ |
मोक्षवरम् प्रभु है ऋषभ , सुर नर झुुकते माथ ||
धर्मा चक्र प्रवर्तकम् , मोक्षेश्वर जिनदेव |
कांति धवल चंद्रेश्वरम् , इंद्रीश्वरम् स्वमेव ||
ऋषभदेव परमेश्वरम् , मनोहरम् शशि रूप |
वाणी से विमलेश्वरम् , धर्मेश्वरम् अनूप ||
प्रथम देव छत्रेश्वरम् , देते सदा प्रकाश |
जग में है जयवंतकम् , श्री जय करे 'सुभाष' ||
©® सुभाष सिंघई ,जतारा
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हंसगति छंद , मुक्तक
(दोहा का समचरण + , 324)
जैन सत्य के साथ , अड़ा आज है |
और अहिंसा द्वार , पड़ा आज है |
साधू त्यागें प्राण , धर्म के खातिर -
श्रावक कहे समाधि, खड़ा आज है |
महावीर पहचान, आज क्यों भूले |
भूले सभी दहाड़ , बने है लूले |
जो करते है वार , मसीहा माने -
गाते उनका गान , हिलाते कूले |
राजनीति में हाथ , रखें जो अपना |
सहे धर्म पर वार, देखते सपना |
कब बोले है वीर , बने हम कायर -
प्रतिरोधी हथियार,तान लो अपना |
सुभाष सिंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
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प्रदीप छंद
तर्ज - आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ , झाँकी हिंदुस्तान की
श्री पार्श्वनाथ अर्चना
जय-जय बोलूँ संकट मोचक, करुणा क्षमा निधान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
पौष कृष्ण दसमी को जन्में , नगर बनारस जानिए |
मध्य रात्रि का क्षत्र विशाखा , नील वर्ण शुभ मानिए ||
मात् आपकी वामा देवी , अश्वसेन सुत आप थे |
राजमहल था भव्य सुहाना , कुल में सूर्य प्रताप थे ||
नाम आपका पारस प्यारा , यथा नाम गुण ज्ञान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
नवम् हाथ थी देह आपकी , आयुष शतक विधान था |
मोक्ष मार्ग हित जीवन अंतिम ,आगे लिखा निदान था ||
तीर्थंकर का जब पद पाया, गणधर आठ प्रमाण है |
यक्ष- यक्षणी पदमावत सँग , धरणेन्द्रम् शुचि प्राण है ||
चिंताहरणी दर्शन प्रभुवर, गाथा है यश गान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
भाई पिछले भव का तापस, भवभूती इक जीव था |
किए सदा उपसर्ग आप पर , पापाचारी नीव था ||
बचा नाग के जोड़े को जब , आप किया उद्धार था |
कमठ बना वह दस भव तक भी, खाए बैठा खार था ||
सहकर उसके उपसर्गों को, फिर भी क्षमा प्रदान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
रहे बालयति पारस प्रभु जी , धारा जब वैराग्य था |
निज चेतन पर ध्यान लगाया, किया आत्म का जाग्य था ||
पंच महाव्रत धारण करके , पाया केवल ज्ञान है |
चैत्र माह की कृष्ण चतुर्थी , गाती मंगल गान है ||
सभी देव गण चर्चा करते , प्रभु के अभियुत्थान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
शुक्ल सप्तमी श्रावण आई , किया मोक्ष प्रस्थान है |
टौंक शिखर सम्मेद बनी तब , जग को शुभ वरदान है ||
पारस प्रभु की महिमा गाकर, अब "सुभाष" का ध्यान है |
प्रभु वंदन से निज आतम का ,करना कुछ रस पान है ||
पारस प्रभु की जय-जय करता , अपनाए सौपान की |
गुण गाकर मैं अर्चन करता , पार्श्वनाथ भगवान की ||
©® सुभाष सिंघई , जतारा
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जैन ध्वज गीत (लावणी छंद में )
छंद विधान 16 - 14 मात्रा , पदांत दो लघु , दो दीर्घ
(गीत प्रणेता - परम पूज्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज )
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,
जय जिनवर ध्वज फहराता |
शुचिमय शुभ सम्मेद शिखर जिन ,
यहाँ मुक्ति का वर दाता ||
गोमटेश जी खड़े अडिग है ,
नेमि चरण है गिरनारी |
महावीर जी पावापुर से ,
वर्तमान में अधिकारी ||
वर्तमान में वर्द्धमान को ,
नायक जिनशासन पाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,
जय जिनवर ध्वज फहराता |
जिनवाणी है मंगल दायक ,
मंगलमय शुभ जय गाथा |
साधु शरण हित मित प्रिय रहती,
जन गण मन की बन नाथा ||
ध्वज लहराए नील गगन में ,
सत्य अहिंसा सनदेशा |
गीत सुभाषा गाता चल अब,
रखकर सब शुचि परिवेशा ||
आशिष मागूँ जय- जय होवें ,
अब अपना शीष नवाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो ,
जय जिनवर ध्वज फहराता |
जम्बू दीपे आर्य खंड का ,
भरत क्षेत्र यह कहलाता |
जिनवर स्वामी यहाँ हुए है ,
जिनका ध्वज मैं फहराता ||
करूँ कामना काज सफल हों ,
बहे ज्ञान की शुभ धारा |
जिन शासन जयवंत रहे अब ,
सत्य अहिंसा जयकारा ||
जय जय करता नमन- नमन है ,
सबको शुभ गीत सुनाता |
जय जय जिन पथ आगम जय हो,
जय जिनवर ध्वज फहराता |
जय हो -जिनवर श्री जय जय हो,
श्री जिन जय हो , जय शुभ हो -2
©® गीत रचियता - सुभाष सिंघई
जतारा ( टीकमगढ़ ) म०प्र० , मोबाइल - 9584710660
विशेष नम्र निवेदन -
कोई किसी तरह की काँट छाँट कर छंद का स्वरुप , मात्रा भार विधान , बिगाड़ने का दोष व पाप अपने सिर पर धारण न करे |
सादर
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विषय दोहावली - कौड़ी
कौड़ी रखता साधु है , रखे चार की आस |
फूटी कौड़ी जानिए , उसको सदा 'सुभास' ||
चार नहीं हैं गृहस्थ घर , लाने नहीं विचार |
दो कौड़ी का मानिए , उसका यह व्यवहार ||
कौड़ी से कौड़ी बढ़े , आगे बनें करोड़ |
यह करोड़ भी टूटता , यदि कौड़ी में तोड़ ||
कौड़ी का क्या मोल है , भूल गया इंसान |
फिर भी कौड़ी आज है , इज्जत का प्रतिमान ||
दो कौड़ी -फूटी कहें , इज्जत के परिधान |
कह 'सुभाष' संसार में , कौड़ी है पहचान ||
दो कौड़ी के लोग वह, जिनकी अधम जुवान |
ऐसौ की सुनता नहीं , कोई भी इंसान ||
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कड़वे दोहे -
चर्चायें सड़ने लगी , दिखने लगे प्रलाप |
कहाँ धर्म हित मैं खड़ा ,और कहाँ पर आप ||🙆♂️
परिचर्चा में हो रहे , आज विषम संवाद |
हम सब किसको भूलकर , करें किसे अब याद ||🤔
दूध दही तक आ गये , खान -पान संज्ञान |
क्या खाएँ अरु क्या पियें , बतला दो भगवान || 🙄
कटहल दक्षिण भक्ष्य है , उत्तर कहे अभक्ष्य |
लौकी उत्तर शुचि कहे , दक्षिण कहे मलक्ष्य ||🙄
संयम सौरभ साधना , लगती हमको दीन |
व्हाटशाप पर बज रहीं , सभी तरह कीं बीन || 🙏
प्रेम एकता भंज है , इनका दिखता त्याग |
पंथों में अब संत है , दिखें बँटे अनुभाग ||🙏
मत "सुभाष" आगे लिखो , लड़ बैठेगें लोग |
जिन पर छाया आजकल , तर्क कुतर्की रोग || 🙏
अपने -अपने ज्ञान पर , सबको है अभिमान |
मैं "सुभाष". चुपचाप हूँ , बना रहूँ नादान ||🙏
सुभाष सिंघई,
डिग्री और उपाधियाँ , नहीं पूछना यार |
रखूँ प्रेम सबके लिए , यही पास है सार ||
परिचय मेरा दे कलम , जन्म जतारा याद |
कभी रहूँ इंदौर में , कभी हैदराबाद ||
सुभाष सिंघई,
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कड़वें दोहा मुक्तक 🙏
मुनियों के हित ग्रंथ है , आगम मूलाचार |
जिसको पढ़ते साधु है , और करें व्यवहार |
प्रश्न यहाँ पर यह उठे , कितने श्रावक आप -
कितनें रखते आचरण , ग्रंथ श्रावकाचार |
ब्याज स्तुति हो रही , पंथ बाद उच्चार |
कौन यहाँ पर कर रहा,उचित सभी व्यवहार |
जो श्रावक के गुण लिखे ,क्या करते है आप -
काणें अब करते नहीं , अपना नैन निहार |
अंग उपगुहन त्यागकर , चिल्लाना स्वीकार |
अंग स्थिति करण से , नहीं करें उपचार |
डंका पीटे धर्म का , और फोड़ते ठोल -
णमोकार की आड़ में , करते हा-हाकार |
पढ़े श्रावकाचार जी , श्रावक समझें सार |
रखें मुनि भी आचरण , पढ़कर मूलाचार |
रहे धर्म की शान भी , मिलकर रहें "सुभाष" -
जिनशासन जयवंत हो , सजे सत्य दरबार |
सुभाष सिंघई जतारा ((टीकमगढ़ ) म०प्र०
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पंथ बनाए - संत छाँटकर
संत बने है - ग्रंथ काटकर
ग्रंथ सुनाया - मंच बनाकर
मंच बनाया - पंच बुलाकर
मैने पूछा - यह कौन कर्म है
बोले -
यही धर्म है - यही धर्म है ||
प्रवचन सुनकर -मिले न शांति
मन में आवें - जहाँ भ्रांति
पूछों जब भी - डाँट लगाते
मूरख हमको - वें बतलाते
कहते जब अब - लगे शर्म है
बोले
यही धर्म है - यही धर्म है
छोटे लगते -अब महावीरा
आगे आए -कुछ रणधीरा
चौबीस से -पच्चीस बने है
व्हाट शाप पर -आज तने है
मै जब कहता बात गर्म है
बोले
यही धर्म है - यही धर्म है
सुभाष सिंघई
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विषय - सत्य
जीत उसी की जानिए , जहाँ सत्य का भान |
नहीं कभी यह हारता , पर रहता हैरान ||
परेशान भी सत्य है , पर मिल जाती जीत |
दुनिया के दस्तूर से , खिल जाती है प्रीत ||
मंदिर में जो सत्य है ,वहाँ अखाड़े बाज |
भगवानों के नाम पर , ओछे करते काज ||
आज सत्य को कठघरा , झूठों को साम्राज |
मनमाना होता चयन , जो भी होते काज ||
श्रद्धा ताली पीटती , सत्य रहे अब मूक |
धन भी आगे बैठने , कभी न करता चूक ||
झूठों को माला मिले , माइक मिले व मंच |
देखा करता सत्य है , अब तो सभी प्रपंच ||
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मुक्तक (सार छंद)
सोमनाथ का मंदिर टूटा , रहे भजन तब करते |
बनी बाबरी मस्जिद यारो ,रहे राम सब जपते |
जहाँ आस्था कायर होती , धर्म पराजय पाता -
रहे वीरता जहाँ साथ में , मंदिर ही तब रहते |
जैन मूर्तियाँ मंदिर टूटे , रटते रहे अहिंसा |
पंथ बनाए संत बाँटकर ,व्याख्या करें अहिंसा |
नहीं अहिंसा की गहराई, कभी समझ हम पाए -
क्षमा वीर हम घातें खाकर ,लाठी सहे अहिंसा |
कहे लोग अब बनिये टनिये , पहिये पंचर कहते |
कायर भी कह देते जैनी , जब वह पथ पर चलते |
पंथ वाद के आज प्रचारक , नहीं एकता माने ~
जहाँ एकता दिखती इनको , फूट बीज का चुनते |
चलो पंथ पर जो भी मानो ,जिसमें लगे भलाई |
पर दूजो पर भी मत थोपो , अपनी वह अगुवाई |
करें एकता भाई बनकर , सबको आदर देकर ~
निंदा करना भी सब छोड़ें , जिसको कहें बुराई |
एक प्रश्न को यहाँ विचारों , नहीं धर्म जब होगा |
जयतु शासनम जैन धर्म का ,कैसे तब कब होगा |
हस्ती मिटकर सिमट जायगी , पकड़ हाथ में पन्ने -
रोनी सूरत लेकर हम तुम , मिलना क्या तब होगा |
पंथवाद में आनंदित जो , देते मुख से गाली |
जैन चमन के ऐसे होते , क्या रक्षक वनमाली |
आत्ममुग्ध जो हर्षित दिखते , स्वयं सूरमा माने -
उन पर छाया जो आयेगी , वह होगी तब काली |
रचनाकार कवि - सुभाष सिंघई
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मुक्तक (कुकुभ छंद )मापनी 16- 14
शेर जहाँ पर होता यारो , श्वान सामने कब आते,
शोर दूर से गीदड़ करते , हर अवसर पर छिप जाते ,
अडिग खड़ी है कुछ चट्टाने, जो भी इनसे टकराते -
मिर्ची पीछे लग जाती है ,चीं चीं करके चिल्लाते |
लंका एक बनाई अपनी ,घोषित होकर खुद स्वामी |
फुसकारा करते रहते है , बैठे अपनी निज वामी |
वस्त्र पहिन कर मोक्ष पधारो,वाह-वाह जी कहने क्या -
रखें गंदगी निज भावों में , खोजें दूजों में खामी |
सुभाष सिंघई
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कुंडलिया
सहते गरमी शीत हैं , यहाँ दिगम्वर संत |
छाले पैरों में पड़ें , पैदल चलें अंनत ||
पैदल चलें अनंत , अंतराय भी सहते |
कितना सूखे कंठ , नहीं वह मुख से कहते ||
आलोचक हैं लोग, वचन कटु भी जो कहते
रखते तप क्या पास,और यह परिषह सहते ||
मुनि निंदा से मोक्ष है , लिया जिन्होंनें ठान |
व्हाटशाप पर वीर बन, बाँट रहे है ज्ञान ||
बाँट रहे है ज्ञान , स्वयं को अच्छा माने |
वर्तमान में त्याग , तपस्या कितनी जाने ||
बचा एक ही काम , विवादो को रख जिंदा |
सामूहिक लो भाग, जहाँ पर हो मुनि निंदा ||
दिन भर निंदा साधु की , करने में जो लीन |
मोक्ष मार्ग पर जा रहे , खुद को कहे प्रवीन ||
खुद को कहे प्रवीन , धर्म के बनते ज्ञानी |
नया बनाया पंथ , दिखें सबको अभिमानी ||
वचनों में अपशब्द , बोलते रहते गिनकर |
व्हाटशाप पर वीर, जमे दिखते है दिन भर || 🙏
अनगित जैन समूह अब , सबके अलग अलाप |
जैन धर्म सिद्धांत पर , करते सदा प्रलाप ||
करते सदा प्रलाप , धर्म का मर्म न जाना |
बस पंथों का गान , परस्पर हँसी उड़ाना ||
यही रहा जब हाल , मिलेगी आगे दुरगित |
कब समझेगें लोग , कष्ट भी आगे अनगित ||
श्रावक क्या उनको कहें , जो रखते है खोट |
कमी सदा ही खोजकर, करते मुनि पर चोट ||
करते मुनि पर चोट, पंथ का लेकर डंका |
शंका की दीवाल , बनाते मन की लंका ||
वर्तमान परिवेश , धर्म में कैसी आवक |
करें सदा मतभेद , कहें क्या उनको श्रावक |
मेरा पंथ महान है , बाकी सब बेकार |
क्या हम ऐसी सोच का , उचित कहें व्यवहार ||
उचित कहें व्यवहार , करें बातों से रगड़ा |
विषम करें संवाद , उतरते करने झगड़ा ||
अपनी श्रद्धा पाल , उजाला रखना घेरा |
जहाँ जैन की बात , नहीं हो तेरा मेरा ||
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दोहा
बिन सूरज की है सुबह , शब्द आज खामोश |
विद्यासागर आप बिन , कैसे आए होश ||
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परम पूज्य गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर को नमन
हृदयोगार एक कुंडलिया के माध्यम से -
चंदा सूरज क्या कहूँ , आसमान के नूर |
धरती पर सागर रहे , ज्ञान कुंभ भरपूर ||
ज्ञान कुंभ भरपूर , शिष्य भी सभी सितारे |
विद्यासागर नाम ,जगत में गुरुवर न्यारे ||
चले गये है धाम , तजा संसारी फंदा |
दिखते सभी उदास ,संग में सूरज चंदा ||
(कुछ लोग अपवाद खोजते ही रहते है , व सदैव धर्म पर चोट करते है ) तब यह कुंडलिया लिखी है 🙏
धर्मी क्या उनको कहें , जो रखते है खोट |
कमी सदा ही खोजकर, करते रहते चोट ||
करते रहते चोट, पंथ का लेकर डंका |
शंका की दीवाल , बनाते मन से लंका ||
वर्तमान परिवेश , अजब ही दिखते कर्मी |
करें सदा मतभेद , कहें क्या उनको धर्मी ||
सुभाष सिंघई
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