https://subhashsinghai.blogspot.com/हिंदी छंद माला (भाग दो )


गणपति  जी  की  वंदना ,   मैं    चाहूँ  आशीश |
सेवक   बना   सुभाष  है , कृपा  करें  जगदीश ||

मात्  शारदे  आइए  , बनी    कलम है   द्वार |
कीजे आप निवास अब , करिए कृपा अपार ||


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क्रमणिका (भाग एक से आगे , इस भाग दो में 
22 धारा छंद 
23 मरहटा छंद 
24 - हीर छंद 
25 वास्त्रग्विणी छंद" 
26 - चामर एवं पंचचामर छंद 
27 -पद्धरि छंद ,अरिल्ल छंद , अड़िल्ल छंद
28 -नलिनी छंद 15 वर्ण 
29- विधाता छंद 
30- वाभुजंगप्रयात छंद (20 मात्रा )
31- चवपैया छंद , 30 मात्रा
32- महामोदकारी छंद (क्रीड़ाचक्र छंद  )  (18 वर्ण
33-मानस हंस छंद 
34-तारिणी  वर्णिक छंद का विधान 
35-माधव मालती (28 मात्रा ) मापनी युक्त मात्रिक 
36-विधाता छंद (28 मात्रा ) मापनी युक्त मात्रिक 
37- माहिया छंद (पंजाबी छंद )
38- शोकहर छंद विधान (शुभांगी छंद)
39- दिगपाल छंद{मृदुगति छंद )एवं दिग्वधू छंद
40- सवैया छंदों के नाम व मापनी  (सउदाहरण )
41-घनाक्षरी छंदों  के नाम  विधान सउदाहरण 
42-नील छंद (वर्णिक)  - ५भगण +गुरु
43- हरिगीतिका छंद (श्रीगीतिका )
44 - गिरधारी छंद 
45- कहमुकरी छंद
46- पुनीत /लीला(गोपी) गुपाल छंद 
47- रजनी छंद
48- सरसी छंद
49-शृंङ्गार छंद 
50 महाश्रृंङ्गार_छंद
51- रूपमाला छंद
52- गंगनाँगना छंद 
53- विधा -काव्य वृद्धिसमानिका छंद  22  मात्रा
 54 - विधा- शारद वर्णिक छंद विधान एवं उदाहरण 
55 आनंदवर्धक / पीयूष छंद
56- कर्ण छंद
57- वात्यल्य छंद 
58 पद्मावती छंद
59 - सुंदर छंद 
60 भूषण छंद
61- चौपाई विधान और लय दुर्घटना ( सउदाहरण)
62 - अंजनेय / आंजनेय / हनुमत छंद 
63 -महाचण्डिका छंद ,(महाधरणी छंद ) 
64-  ममता छंद 
65  - मोहन छंद 
66-जनक छंद‌ विधान  


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21 -त्रिभंगी छंद
त्रिभंगी  ३२ मात्राओं का छंद है जिसके हर पद की गति तीन बार भंग होती है
प्रथम यति १० मात्रा पर, दूसरी ८ मात्रा पर, तीसरी ८ मात्रा पर तथा चौथी ६ मात्रा पर हो। हर पदांत में गुरु हो

त्रिभंगी के चौकल ७ मानें या ८ , जगण का प्रयोग सभी में वर्जित है।

. त्रिभंगी के तीसरे चरण के अंत में लघु या गुरु कोई भी मात्रा हो सकती है किन्तु कुशल कवियों ने सभी पदों के तीसरे चरण की मात्रा एक सी रखी है।

दो दो  पदों के अंत में तुकांत हो ,  चारों पदों की तुकांत  होने या न होने का उल्लेख कहीं नहीं मिला।
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मेरा प्रयास

जय जय हरि देवा , तेरी‌   सेवा ,  देती   मेवा ,  दानी  को |
जब ज्ञान बखाना, गीता माना, मिला खजाना , ज्ञानी‌ को ||
जय जय गिरधारी , लीला न्यारी , सूरत  प्यारी , उर धारें |
हे नटवर नागर , लीला सागर , तुझको पाकर , सब  हारें  ||
(मुक्तक हेतु -‌ समझे पाकर , पानी को)

जब गोरी चलती  , हलचल मचती  , चौराहों  में ,  राहों में

गोरी जब हँसती ,बगिया खिलती ,चितवन रहती, बाहों में

पगपायल बजती, महफिल सजती, सजनी उलझे,बातों में 

मुखड़ा भी चमके , नथनी दमके , चन्दा  झलके , रातों   में 
(मुक्तक हेतु -रात गुजरती,  चाहों में)

 जय मात् भारती , तेरी आरती , तिरंग धारती , हम जाने |बेटे बलिदानी , अमिट कहानी ,  कुंदन  पानी , जग  माने ||भारत का बच्चा ,जानो सच्चा , मूल न कच्चा ,  दीखा है ||जय  बंदे  गाना ,  रहे   तराना ,   आगे   आना ,  सीखा‌  है |(मुक्तक हेतु - पग ठाने)

सुभाष सिंघई एम•ए• 

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22 धारा छंद

29 मात्रा , मापनी मुक्त मात्रिक छंद  , 15 - 14 , यति गाल , पदांत गा           ** मुक्तक **

सुख की भी  हम देखे शान , दुख भी  कहकर  कब आता |कहाँ  करें   हम अब विश्वास , यह  सबको   ही  निपटाता |बचपन‌  यौवन   होता   हीन , जर्जर    होती   है   काया - कितना   भी   हम  जोड़े  द्रब्य ,  यहीं  छूटता   सब जाता |

   मौसम   हरदम  आते पास , बदले  भी  सदा महीना |पता  नहीं पर चलती राह , कब  आए  कहाँ पसीना |            सूरज   चंदा   करें   प्रकाश , ताप  शीत के  हैं दानी-    जग में पाते दोनों मान , सिखलाते   सबको   जीना |

सुभाष सिंघई ~

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23 मरहटा छंद 

मरहटा छंद  29 मात्रिक छंदचार चरण , प्रतिचरण 29 मात्रा ,क्रमशः 10 -8-11मात्रा पर यति,पदांत गुरु लघु 

दो दो अथवा चारों चरण सम तुकांत ।

मरहटा छंद मुक्तक 

हम सब यह माने , इतना जाने , भारत    प्यारा    देश  |रहता  है पावन , मन को भावन , शुचिमय सब परिवेश |यह लगता महान , देखे   जहान ,शांति   और  सद्भाव - रहते है हिलमिल , साफ रखें दिल , भूले  सारे  द्वेष |

मरहटा छंद 

   तिथि रही  बाईस , दिखे  जगदीश , अवध पुरी में राम        दूर हुए सब गम , भागा है तम , जन-जन  करे प्रणाम || चहुँ दिशा उल्लास , हटे सब त्रास , सजा अयोध्या धाम |जागा स्वाभिमान , राम का गान ,      करता है हर ग्राम || 

दिन लगता पावन,    है मन भावन,  धन्य सुबह है शाम   | जन सब मिल गाते , खुशी मनाते , नगर अयोध्या धाम ||है प्राण प्रतिष्ठा ,    प्रभु में निष्ठा ,    करते उन्हें   प्रणाम |सब मंगल देखें , मन में    लेखें ,  बोले    जय  श्रीराम ||

     सब बीती बातें   , काली रातें  , नहीं   रहीं अब क्रूर |               बैठे  अब रघुवर , हँसते तरुवर  ,दिव्य भव्य है नूर ||       है भारत प्यारा , लगता न्यारा , जगा   सनातन शूर |जय मथुरा काशी , जो अविनाशी , नहीं दिखे अब दूर ||

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24 हीर छंद 

हीर मात्रिक छंद-विधान 

कुल२३ मात्राएँ हैं

दो दो पद या चारो पद तुकान्त। 

६,६,११  पर यति होता है।।

चरणांत - २१२ से एवं यति में पदानुप्रास अति आवश्यक है। 


जब  देखा , यह लेखा , बातें    बेकार  है |

सभी मौन , कहे कौन , फूटा यह  द्वार है ||

जब सुयोग , हटें रोग , खिलते घर फूल है |

करो कर्म , नहीं शर्म , तब सब अनुकूल है ||


जब सपने , हो अपने ,  दुनिया   अनुकूल  है |

जो रोते , वह   खोते ,   करते   भी   भूल  है || 

है अपना , निज चलना , मंशा   यदि साफ है |

जग कहता , जो तपता, वह खुद में  माफ है ||

मुक्तक 

हर घर में , दर-दर में ,   नेमत है बेटियां ,

खुशयाली , हरयाली ,   सेहत  है बेटियां , 

ये रब की , हम सबकी,नूर ही  सुभाष है ~

करे नाम , है   धाम ,   देवत  है   बेटियां |

है उमंग , ह्रदय रंग , सजती   है  बेटियाँ , 

है विचार , मधुर प्यार,  रहती  है बेटियाँ , 

कह 'सुभाष' , हैं प्रकाश ,आँगन की शान भी 

आस पास , शुभ उजास , करती है बेटियाँ  |

सुभाष सिंघई

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25 " वास्त्रग्विणी छंद" छंद मापनी 

212      212   212   212

प्रीत का माह शुभ  फागुनी  रंग  है |

सजन भी दूर है  विरह अब अंग है |

देखते दूर से    लोग भी‌ भ्रमर बन , 

आस है  टूटती  हृदय‌ में  जंग   है |

सुभाष सिंघई


#आयोजन:"स्रग्विणी वर्णिक छंद"
#मापनी:२१२-२१२-२१२-२१२

भक्ति की शक्ति से ,  ईश  को जानिए |
प्रेम   की  भावना   ,  श्रेष्ठ ही  मानिए ||
धर्म की   राह हो ,    कर्म    शालीनता |
जान लो  है नहीं  ,   पास   में  हीनता ||

आहटें  आ   रही ,  देश  को   देखिए |
कौन क्या सोचता , आज ही लेखिए ||
घात  जो   दे  रहे  ,    मित्रता  वेश से |
दूर  ही  कीजिए ,   शत्रु  को  देश से ||

चाहतें जो   रखे , देश   की  आन से |
लोग  है  मानते  ,   चाहते   शान   से |
देश  में    भान   है , प्रेम   की ‌ नूरता |
जानता  विश्व  ये  ,  पास है    शूरता  ||
  
सुभाष सिंघई
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आधार छंद -वास्रग्विणी छंद 20 मात्रा , (मापनी युक्त मात्रिक )
गीतिका मापनी- २१२×४
समांत - आतीं  ,पदांत - रहीं

हम   इशारे करें  तुम  हटातीं रहीं |
देख के भी मुझे सिर हिलातीं रहीं |

आहटें भी नहीं कुछ जरा सी सुनी ,
दिलजलों के सुरों को सजातीं रहीं |

देखता मैं  वहाँ   चाहतें  सब  रुकीं  ,
आरजू  भी  सभी तुम दबातीं  रहीं |

कौन  है  जो चले इश्क की राह पर ,
सोचकर तुम सदा दिल छिपातीं रहीं  |

सोचना भी   तुम्हारा  रहा कौन हम 
हम  सजाते रहे   तुम मिटातीं   रहीं  |

समझना  भी नहीं चाहतीं तुम जरा ,
दिलजला बोलके    गीत गाती रहीं |

बोल   मेरे   सुभाषा   नहीं   सोचना ,
हम   उठाते रहे  तुम  गिरातीं   रहीं |

सुभाष सिंघई

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26- चामर एवं पंचचामर छंद
(विधान सउदाहरण )
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चामर छंद -
मापनी-    212   121     212.  121.  212
             रगड़   जगड़   रगड़   जगड़   रगड़‌
पक्ष वर्ण = पंद्रह वर्ण का वर्णिक छंद।
(गुरु लघु ×7)+गुरु = 15 वर्ण
चार चरण दो- दो या चारों चरण समतुकान्त।

धर्म-अर्थ  काम  मोक्ष  चार  द्वार साधना |
लोभ मोह क्रोध छोड़ सत्य नित्य कामना ||
प्रीति  नीति  है  महान  जिंदगी  सुधारना |
देखना  सुभाष  हीन  पास  हो न भावना ||

मान  सावधान  है  गुरू  उसे  न छोड़ना |
मित्र  फूल   है  जहान  में उसे न तोडना ||
प्रीत गीत न्याय नीति भाष को सुधारना |
आसपास  है  प्रभू  जरा उसे   पुकारना ||

क्रोध क्षोभ छोड़-छाड़ प्रेम को सजाइए |
नेह  नूर  का  प्रकाश   नेह  से  उगाइए ||
खार-रार  मारकाट   आप  ही  भगाइए |
भावना  महान  नेकता  सुजान  गाइए ||

आपकी सुने सभी  सदा यहाँ प्रकाश हो |
नेक  राह  चाह  संग  द्वार में  सुभाष हो ||
आपका जहान शान गान का निवास हो |
फूल भी खिले पुनीत जो नहीं उदास हो ||

©सुभाष सिंघई
  एम• ए• हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र०
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पंचचामर छंद 16 वर्ण
(लघु गुरु ×8 = 16 वर्ण )
           जगण  रगण   जगण रगण. जगण दीर्घ
मापनी- 121.  212  121   212.  121  2 ( 24 वर्ण )
चार चरण दो- दो या चारों चरण समतुकान्त।

उगे  यहाँ  जहाँ-तहाँ ,   तड़ाग में सरोज है |
चले जहाँ रहे बढ़े  , मिली  पुनीत  खोज है ||
रही " सुभाष" वीरता , दिखी अतीत शान है |
स्वदेश  के  सुने  यहाँ , ‌ सदा सुजीत गान है ||

डटे  यहाँ‌   किसान  हैं , खड़े  रहे जवान है |
मिशाल  देखिए  यहाँ , पुनीत देश  गान है ||
महान  देश सदा से  , ध्वजा  तिरंग  मानते |
अनंत है कथा यहाँ   , स्वदेश भूमि  जानते ||

अतीत की मशाल है , मिशाल  देख मान  है |
सभी कहें  यहाँ अभी  ,  पुनीत  संविधान  है ||
नदी  पहाड़  श्रृंखला ,   बसंत का  सुगान  है |
सुनो‌ सुबोल  भारती , सभी यहाँ   महान  है ||

सभी दिशा पवित्र  हैं , प्रभा  सदा  बिखेरती |
धरा  बहे  भगीरथी  ,  अनंत  पाप   तोड़ती ||
करें   सदैव   बंदना ,  सभी   उसे   पुकारते |
मिले   जुले   संग  रहे , व   आरती  उतारते ||

©सुभाष सिंघई
  एम •ए• हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र
जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र०

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27 -पद्धरि छंद ,अरिल्ल छंद , अड़िल्ल छंद

पद्धरि छंद – 

16 मात्रा , चार चरण, सम मात्रिक छंद, दो दो पद समतुकांत। 

यति १० - ६ पर या ८ - ८ पर  , सभी चरण का अंत जगण(१२१)

पद्धरि छन्द मात्रिक

मात्रा बाँट - ४ + ४ + ४ + ४ = १६ मात्रिक , अन्त  १२१

( २ + ८ + २ + जगण  )

10-6

मधु वाणी से भी ,   हो मलाल  | 

करना  होगा तब , यह ख़याल ||

समझों  यह नर  है,  घोर  दीन | 

अपनेपन से  है ,  रस  विहीन || 

8 - 8 

बात सुनी  पर   ,करता   वबाल‌‌  | 

सुनते है   तब  , उठते    सबाल || 

इसकी  वाणी , फिर क्यों  निढाल |

दुनिया का  यह , अद्भुत   कमाल ||


पद्धरि छंद आधारित मुक्तक

फागुन  की जब  आती  बहार |

गोरी  मन की खिलती  किनार |

अंगो  की     मादकता  अनंग - 

प्रीतम हो सँग  करती  विचार |


देखें सब गोरी मन की  उमंग |

नेह  दिखे   तन  लम्बी  सुरंग |

सांसों में   है   चढ़ता    उतार -

महके लगते   है  रोम   अंग  |


सुभाष सिंघई


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#अरिल्ल छंद – 

16 मात्रा , चार चरण, सम मात्रिक छंद, 

चरणान्त में भगण 211 या यगण 122


अ-चरणांत २११ 

लोभ  कपट रहता जब  आकर | 

दुखिया में   रहता  सब    पाकर ||

मान न   माने   वह सब   लेकर | 

पछताता   रहता‌   सब   खोकर ||


ब-चरणांत-१२२ 

जग   चिड़िया    है  रैन   बसेरा | 

फिर  भी  कहता यह  सब मेरा ||

माया   का   रहता   जब   घेरा |  

रहता     कुहरा    पास   घनेरा ||

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#अड़िल्ल छंद –16 मात्रिक  सम मात्रिक छंद, 

 चरणान्त में दो लघु  -दो गुरु

मुक्तक -

जिसने ‌प्रभुवर   को अपनाया | 

प्रभुवर  ने  उसको‌  चमकाया ||

हम तो   उनको   गुरुवर  माने ~ 

सीखा हमने   जो  सिखलाया |


प्रभुवर के सँग  जो  रहता‌  है |

गान हमेशा  वह  करता    है |

कौन   उसे आकर उलझाए  ~ 

वह कब  संकट  से  डरता है 


जिस घर  दुख  डेरा   रहता है | 

निज साया   निज से डरता है |

डर भी   जाता  है   उजियारा -  

तब कोई मदद  न  करता  है ||

सुभाष ‌सिंघई 

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28 -नलिनी छंद 15 वर्ण 

(इसको भ्रमरावली छंद भी कहते है )

ललगा ×5  , पिंगल सूत्र - स× 5.  (मुक्तक )


जिसके दिल का शुभ  सुंदर बोल नहीं |

उसका समझो कुछ भी अब मोल नहीं |

कहता दिल से    सबसे   मिलके  रहता -

उसके दर  की समझो  तब  तोल नहीं |


चलते पग जो हित मानव का करते |

सबके दिल में  वह साहस है  भरते |

अनमोल कहें सब लोग झुकें चरणों -

अभिनंदन में  वह शूल  सदा  हरते |

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29- विधाता छंद ( 28 मात्रा ) मापनी युक्त मात्रिक छंद

मापनी- लगागागा ×4.   (1222×4 )

विषय‌ - होली 

छिपी गोरी कहे जाओ ,   नहीं होली मनानी है |

कहा मैने जरा आओ  ,   यहाँ  यादें  सुहानी है |

कहे भूलूँ  नहीं तेरी  ,  कहानी   जो सुनाई थी-

छुओगे गाल हाथों से ,    कहोगे धार  पानी  है  |


सुनी होली रसीली है,  बहारों  की कहानी  है |

नहीं  गोरी रुके राहों  , कहे   मेरी  रवानी‌‌   है ||

हँसे   देखे कहे   बोले ,  तुम्हारा देखती साया - 

इसी से जान लो प्यारे , हमारा  कौन पानी  है |

सुभाष सिंघई ~~

गीतिका आधार -  विधाता छंद 

लगा गा गा - लगा गा गा-  लगा गा गा-  लगा गा गा 

समांत स्वर - आना , पदांत -था जरा आके

तुम्हें हमसे  हुई चाहत  ,       बताना था जरा आके |

सुरों  से  शब्द जो निकले ,    सुनाना था जरा आके |


मुझे  क्यों दूर  रखकर ही , लिया  था  फैसला तुमने ,

दिले हालात का कागज  ,   सजाना था  जरा आके |


मुझे  भी  दूर से देखा ,    नहीं  तुम   पास आई  हो , 

कभी भी   हाथ हौले   से ,   दबाना  था जरा  आके |


जमाने  से रहीं  डरतीं ,    कहेगें  लोग  क्या हमको , 

हुआ है प्यार हमको भी  ,   जताना था जरा आके |


मिले मौके   सदा तुमको , नहीं   इजहार कर पाई, 

मिलाकर भी कभी नजरें  ,  झुकाना था जरा आके |


करो तुम  याद मेरी वह  ,  जहाँ आँखें  मिलाई थी , 

तुम्हें भी आँख की पुतली , नचाना था जरा आके |


गईं  थी छोड़कर मुझको , तभी से  सोचता रहता , 

पकड़कर बाँह मेरी भी ,  हिलाना  था  जरा आके |


मिली हो आज फिर से तुम , शिकायत कर रहीं मुझसें, 

हमीं से कह रहीं  तुमको ,   मनाना    था   जरा  आके |


चलो स्वीकार  करता  मैं , "सुभाषा"  साथ देगा अब , 

समय की चूक कहती है ,     लजाना था जरा आके |

सुभाष सिंघई , जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र० 

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30- वाभुजंगप्रयात छंद (20 मात्रा )

लगागा × 4    (मापनी:१२२-१२२-१२२-१२२)

समान्त- आने-स्वर की बंदिश,  पदान्त- कहाँ हैं 


हमें गीत होली सुनाने कहाँ  हैं | 

सभी हाल पूरे बताने कहाँ  हैं |


यहाँ बात मीठी  रँगों की कहानी , 

पता ही नहीं है  ठिकाने कहाँ है |


मिले है हमें भी यहाँ ख्याल वाले ,

रखे खैर  मेरा  दिवाने    कहाँ है |


रँगों की कहानी सभी भूल जाते , 

नए लोग आते   पुराने  कहाँ है |


दिखे लोग व्यापार वाले हमें भी , 

कहें आग गोले जलाने कहाँ है |


जिसे  देखता हूँ वही  है मसीहा , 

पूछों तो कहेगें   वेगाने कहाँ है |


अकेला चला है  यहाँ ये 'सुभाषा' , 

पता कौन पूछें    खजाने कहाँ है |

सुभाष स़िंघई जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०


भुजंगप्रयात छंद  मापनी 122 (यगण)


सोमराजी छंद-   दो यगण – 122 122  


हमारा तुम्हारा |

बनेगा  सहारा ||

वहाँ भी चलेगें |

जहाँ वे मिलेगें ||

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 सार्द्ध सोमराजी छंद - (तीन यगण )- 122 122 122 


जहाँ   राम जैसे  उजारे |

वहीं है सभी के किनारे ||

भजेगें उन्हीं को सुखारे |

रहें  रोशनी में   सितारे ||

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भुजंगप्रयात छंद

चतुर्भिमकारे भुजंगप्रयाति' अर्थात भुजंगप्रयात छंद की हर पंक्ति यगण की चार आवृत्तियों से बनती है।

 (लघु गुरु गुरु) के समभारीय पंक्तियों से भुजंगप्रयात छंद का पद बनता ?

 (चार  यगण )- 122 122 122 122 


कहे नारि देखो   यहाँ रैन खाली |

मुझे छोड़ रूठी वहाँ सौत पाली ||

रहेंगे वहीं वे    जहाँ का उजाला | 

जरा छू लिया तो मिले दाग काला ||

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मुक्तक 

नहीं नैन आंसू सभी मौन साधे  |

खुले कान  मूँदें  भगे ‌  दूर आधे |

बिना बात खारा हुआ नीर सारा~

जले  लोग बोले कहो बोल राधे |

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गीतिका आधार भुजंगप्रयात छंद

(चार  यगण )- 122 122 122 122 

समांत स्वर आने , पदांत लगे हैं 


मुझे भी सखी वें  बुलाने लगे हैं |

कभी पास आके  सताने लगे हैं |


नहीं दूर जाते   छिपे   देखते हैं, 

 यही रात में स्वप्न आने लगे हैं |


बताएं तुम्हें हम नहीं  शब्द सूझे ,

सरे  आम दिल वे  चुराने लगे है | 


हदें  भी बड़ी है जरा छूट ले ली

पकड़ हाथ मेरा दबाने लगे  है |


हँसी देख मेरी कहें  पास आओ, 

अदाएँ  बताकर रिझाने लगे हैं 


कहेंगे हमी से नहीं  हम  सुनेंगे

अभी से सभी हक जमाने लगे हैं 


लगे देख अच्छा सुभाषा   हमें भी, 

दिले   बाग मेरा  खिलाने लगे हैं |


सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र० 

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31- चवपैया छंद , 30 मात्रा (मापनी मुक्त मात्रिक )10 - 8- 12 पर यति , अंत - ललगागा (10- 8 की यति तुकांत अनिवार्य      {मुक्तक}

जग का हर  कंकर , बनता शंकर , उनकी  ही सब माया |

लगते   बैरागी , पर बड़भागी , जो   जाने   शिव   काया |

देते    संदेशा , हर   परिवेशा ,   कभी   नहीं   यह   भूलो - 

है सत्य स्वरूपा , शिव है भूपा , उनकी   मुझ पर   छाया |


जो नर  संसारी , दुनियादारी ,    करते   है  कटु  घातें  |

सब    गुत्तमगुत्था , फोड़े   मत्था , सार हीन सब  बातें |

वह नहीं सुनेगें , राह चुनेगें , हों   जिस पर  कटु  काँटें - 

करवट बदलेगें ,  निपट    रहेगें , काली   पाकर  रातें |


जगत में श्री राम , बनाते  काम , करो   आज   मिल  पूजा |

मिलता शुचि उजास, सभी को खास, और न सम्मुख दूजा |

खुद है   हरियाली , लगते  आली ,   करना   वंदन   जानो ~

आकर मन  आँगन , करते   पावन ,  प्राणों    का बलबूजा |


दुनिया में आएँ, हर्ष मनाएँ, सबसे  रखकर यारी |

मिले यहाँ मेला ,करने  खेला, हँसें सभी नर नारी |

दौलत को बाँटे,रुचि से छाँटे, माने सब कुछ मेरा -

रखी रहे  माया, छोड़ें   काया  आती है जब बारी |

सुभाष सिंघई

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32- महामोदकारी छंद (क्रीड़ाचक्र छंद  )  (18 वर्ण) 

लगागा ×6  (पिंगल सूत्र य×6 ) मुक्तक 

सहारे नहीं चाह मेरी  ,   जहाँ   राह होगी  चलेगें |

अँधेरे  मिलेगें  जहाँ भी   , वहीं   दीप मेरे जलेगें |

जहाँ बाग देगें बुलावा  , वहीं  की सुनेगें कहानी - 

नजारे सभी  देख लेगें,   तभी   भाव  मेरे  बनेगें |


हमारा  नहीं है इरादा , किसी को यहाँ दें  बलाएँ |

कथाएँ  पुरानी उखाड़ें  , तमाशा  नया  ही बनाएँ |

झमेले सभी छोड़ आए , जहाँ  थे  नजारे  पुराने - 

बनाने सुहानी कहानी , सभी को सही ही बताएँ |

सुभाष सिंघई

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33-मानस हंस छंद 

ललगालगा   ललगालगा   ललगालगा 

(पिंगल ‌सूत्र स ज ज भ र ) 15 वर्ण 


जब देखते हम  जिंदगी   कुछ  बेतुकी |

यह सोचते पग चाल आकर क्यों रुकी |

कुछ भी नहीं फल फूल है जब शाख पै - 

सुनके   नसीहत शर्म से वह  क्यों झुकी |


अब लोग भी लगते  मुझे कुछ वेंतुके |

चलते रहे वह  देखने फिर   क्यों रुके |

दिखता हमें कुछ मैल भी मन में भरा  

रहने यहाँ वह  प्रेम से अब क्यों झुके |


कब कौन आकर बात   को पहचानता | 

जग देखता शुभ तथ्य को कब जानता |

हठ धर्म भी सिर  पै चढ़ा  जब बोलता - 

वह बात भी  सब  देर से कुछ  मानता |

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 34-तारिणी  वर्णिक छंद का विधान 

पिंगल सूत्र -नगण सगण यगण सगण

१११    ११२.   १२२.   ११२


वतन   मन में   सदा ही रहता |

नमन  करके सभी से कहता |

लगन रहती  इसी   भारत से - 

चमन सुखदा  यहाँ  ही बहता  |

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मन मगन है   वहाँ पै   शबरी  |

कब समझती  यहाँ  पै शबरी  |

झट सरस‌ बेर   लाई प्रभु को - 

परस  करती जहाँ  पै   शबरी |

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सिय‌ लखन देखते ही कहते |

नमन  लख  भावना में बहते |

भजन यह राम का है जग में - 

शरण  प्रभु धाम   ऐसे  रहते |

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35-माधव मालती (28 मात्रा ) मापनी युक्त मात्रिक 

गाल गा गा -  गाल गा गा -गाल गा गा -गाल गा गा 


न्याय  भाता     है उसे  ही    जो यहाँ  ईमान वाला |

सत्य को ही       मानता है   जो हमेशा  शान आला |

राह में भी         जो मिलेगें   साथ आएँ  होंसलों से -

चाँद तारे        भी चलेगें      और  देगें    वें  उजाला |


चार पैसे        हाथ आएँ    ‌‌लोग  खोटा   बोलते  हैं |

चूर  होते       गर्व  में  भी     दौलतों से     तोलते हैं |

भूलते है       साथ के भी     मित्र  जो होते   पुराने -

बात  होती     न्याय की तो  तेल - सा ही खोलते हैं |


चाह देखी   है   यहाँ   भी  कीमती   हो  गेह  मेरा |

सामने का  भी    मिले जो  देखता  हूँ  आज  तेरा |

चाहतों के    ये फसाने    लोग  जाने  फायदे  भी - 

हाथ  में  लेके सजाते  स्याह  काला ही    अँधेरा |

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36-विधाता छंद (28 मात्रा ) मापनी युक्त मात्रिक 

लगा  गा गा -  लगा गा गा -लगा गा गा -लगा गा गा 


जमाने में  अलग   देखे ,  बने  है लोग  दीवाने | 

कहेगें  आइएगा   भी    , बुलाते पर नहीं खाने |

चले जाते वहाँ पर भी , जहाँ देखें निजी  झंडा - 

फटे में टाँग  देने को , सभी अब गा   उठे गाने | 


विधाता  भी बने कुछ है , कहे हम ‌सूरमा आली |

हमारा ही चमन देखो , जहाँ  बजती  सदा ताली |

लिखा हमने सही मानो , नहीं   नुक्ता करो  चीनी - 

जुड़े   है  लोग  हमसे , करें   जो  रोज रखवाली |


बनाया बाग अपना है , नहीं पर  फूल खिलते  है | 

करो बस वाह मेरी ही, सदा यह सीख लिखते  है |

सुभाषा  सोचता रहता , कभी  तो   वक्त आएगा - 

खिलेगें फूल भी सुंदर   , जहाँ पर शूल दिखते है |

सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०~

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गीतिका आधार -  विधाता छंद 

लगा गा गा - लगा गा गा-  लगा गा गा-  लगा गा गा 

समांत स्वर - आना , पदांत -था जरा आके


तुम्हें हमसे  हुई चाहत  ,       बताना था जरा आके |

सुरों  से  शब्द जो निकले ,    सुनाना था जरा आके |


मुझे  क्यों दूर  रखकर ही , लिया  था  फैसला तुमने ,

दिले हालात का कागज  ,   सजाना था  जरा आके |


मुझे  भी  दूर से देखा ,    नहीं  तुम   पास आई  हो , 

कभी भी   हाथ हौले   से ,   दबाना  था जरा  आके |


जमाने  से रहीं  डरतीं ,    कहेगें  लोग  क्या हमको , 

हुआ है प्यार हमको भी  ,   जताना था जरा आके |


मिले मौके   सदा तुमको , नहीं   इजहार कर पाई, 

मिलाकर भी कभी नजरें  ,  झुकाना था जरा आके |


करो तुम  याद मेरी वह  ,  जहाँ आँखें  मिलाई थी , 

तुम्हें भी आँख की पुतली , नचाना था जरा आके |


गईं  थी छोड़कर मुझको , तभी से  सोचता रहता , 

पकड़कर बाँह मेरी भी ,  हिलाना  था  जरा आके |


मिली हो आज फिर से तुम , शिकायत कर रहीं मुझसें, 

हमीं से कह रहीं  तुमको ,   मनाना    था   जरा  आके |


चलो स्वीकार  करता  मैं , "सुभाषा"  साथ देगा अब , 

समय की चूक कहती है ,     लजाना था जरा आके |


सुभाष सिंघई , जतारा (टीकमगढ़ ) म० प्र० 

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37- माहिया छंद (पंजाबी )

माहिया एक पंजाबी छंद है और इस छंद में प्रेम रस की प्रधानता रहती है।
 विधान - सममात्रिक छंद है , तीन पंक्तियों का छंद है 
पहली और तीसरी पंक्ति में 12 मात्रा होती है व 4 दूसरी पंक्ति में 10 मात्रा होती है , मात्रा विन्यास  द्विकल रहता  22 22 22
दो लघु को एक गुरु मान्य 
 इसमें पाँच मात्रा वाले शब्द जैसे 212 या 122 या 221 का उपयोग न करें 
यदि 221 शब्द का प्रयोग करते हैं तो तुरंत बाद वाला शब्द 122 रखें ,  जगण शब्द भी वर्जित है ,  चरणांत गुरु अनिवार्य है, 
प्रथम और तृतीय चरण तुकांत |

साजन जब घर आया 
लाया फूलों को 
देकर वह मुस्काया |

सजनी के मन भाया 
थामा हाथों से 
मन हर्षित भी पाया |

मन दरबाजे खोले 
साजन देखा है
नैनों से वह  बोले |

आया प्रीतम होले
मन के अंदर ही 
वह भी कुछ बिन बोले |

मेरे घर आँगन में 
साजन जब रहता 
छिपता मेरे मन में |

सूरत देखी दर्पण 
बोला तेरा  है 
पावन पूरा यह क्षण |

काली रातें आती 
साजन बिन तन को 
मन को भी  भरमाती |

कोयल जब भी गाती 
मन तड़फा करता 
साजन यादें आती |
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दिन भर भाषण बोलें
नेता हैं अच्छे 
संझा बोतल खोलें |

चमचे आए होले 
हम समझें सच्चे 
पर निकलें वह पोले ||

अपना मतलब जानें
बनते है भोले 
घातें देकर मानें |

अंधों में है कानें
राजा कहलाते 
देते है फिर तानें ||

रचना--स्वरचित व मौलिक

सुभाष सिंघई , जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०
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38- शोकहर छंद ( शुभांगी छंद)  विधान सउदाहरण

30 मात्राओं का "#समपद" मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में चारों पद समतुकांत या  दो दो पद तुकांत किए जाते है |
छंद  मात्रा विन्यास निम्न है-
अठकल + अठकल + अठकल + छक्कल
2222, 2222, 2222, 222 (S)
8+8+8+6 = 30 मात्रा।
प्रत्येक पद के दूसरे चौथे और छठे चौकल में लगाल ( जगण) नही होना चाहिए
चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं।
जगण वर्जित है
प्रथम दो आंतरिक यति की समतुकांतता आवश्यक व उत्तम है व तीनों यति की समतुकांतता सर्वोत्तम है।
अंत में एक गुरु का होना अनिवार्य है।

नानी आती , घर महकाती , लड्डू लाती , फल केला  |
कहती प्यारा , मेरा तारा ,  राज  दुलारा ,   अलबेला ||
मन को खोले , दृग से तोले , सबसे बोले , यह नाती  |
मेरे मन में  , इस जीवन में , इन आँखन में , है बाती ||

मेरी नानी ,  बोल  कहानी , बहुत पुरानी , जो  भाए |
करती ताजा , रानी राजा, गाना बाजा   , भी  गाए ||
हम सब बच्चे , जितने कच्चे , बनते  सच्चे ,पा नानी |
वह भी हँसती,सबसे कहती ,अच्छी लगती , नादानी ||
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कविता लिखते  , कभी न चिढ़ते, पाठक मिलते , है उसको |
कवि कहलाता , सुंदर    गाता  , है वह पाता , शुभ रस को  ||
पर जो भटके ,   मग में अटके,  खाता झटके ,   सविता‌ में |
तब भरमाए  , ठोकर खाए    , भाव  न आए ,    कविता  में ||

पथ पहचाना , चलते  जाना , फल भी पाना  ,‌‌‌   होता   है |
करने  पालन ,  बीज   सुहावन  , अपने  आँगन , बोता है ||
तृृष्णा करते , हठ में रहते , तब   वह सहते ,   घातों   को |
उनके गानें  , देख पुराने ,  जगत   न   मानें ,    बातों को ||
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हे दीवानो , वीर जवानो , और किसानो , आ जाओ |
रखकर यारी , खेलें पारी ,  जिम्मेदारी , को   लाओ  ||
हम सब जानें , इतना  मानें, माँ  के  गानें , चाहत है |
सबसे न्यारा , देश हमारा , लगता प्यारा ,   भारत है |

प्यारा नाता , दिल भी गाता  ,भारत माता , न्यारी है |
मिट्टी  पानी , है बलिदानी , सार  कहानी  , भारी  है ||
शुचिता  पाले, नूर  उजाले ,  हम रखवाले ,  दीवाने |
चलते जाते , हाथ  उठाते , जनगण गाते ,   मस्ताने ||~

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शोकहर छंद (मुक्तक )

करकें  बातें , देते  घातें  , मारें   लातें ,     जब अपने  , 

हमको माने ,वह  पहचानें ,   यह अनजानें,  हैं  सपने , 

चलते जाते, ठोकर खाते , फिर उठ जाते , दुनिया में - 

होता खेला    , उठता मेला ,  चले अकेला ,    थपने |


यहाँ अकेला , आया मेला ,कूदाँ   खेला ,     अब  जाना , 

जो कुछ पाया , सब अपनाया , बाँटा खाया , सब खाना , 

आया रोड़ा , तोड़ा मोड़ा , फिर कुछ  जोड़ा , दुनिया   में - 

सब कुछ मेरा , देकर      घेरा , बनता  शेरा ,    दीवाना |

©® सुभाष सिंघईए म•ए• हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र

जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०

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39- दिगपाल छंद{मृदुगति छंद ), 24 मात्रा 

प्रति पद का सम मात्रिक छंद है।

यह 12 और 12 मात्रा के दो यति खंड में 

विभक्त रहता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

गागाल गालगागा   गागाल गालगागा 

देखो जरा  उन्हें भी,  कैसे  करें   किनारा |

पाते नहीं  किसी से,   कोई कभी सहारा |

देखा करे जमाना  ,  बोले  नहीं  वहाँ  भी - 

उम्दा जहाँ  हमारा,  भी था  कभी नजारा |

सुभाष सिंघई 

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दिगपाल ‌छंद में अंतिम गा हटा देने पर 

दिग्वधू छंद बन जाता है 

दिग्वधू 22 मात्रा , मापनी युक्त मात्रिक 

गागाल गालगागा  गागाल गालगा

आना यहाँ हुआ है  चहका  मिजाज है |

दुनिया कहे तुम्हारा  महका मिजाज है |

शोला दिखें सभी ही  नखरे गुलाब से -

लगते सभी सुहाने  दहका मिजाज है |

सुभाष सिंघई 

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सवैया छंदों के नाम व मापनी  (सउदाहरण )

1-दुर्मिल (चंद्रकला )सवैया || 2-सुंदरी  (मल्ली/ सुखदानी ) सवैया || 3-किशोर ( सुख / कुन्दलता /कुन्तलता ) सवैया || 4-महामंजीर सवैया || 5- अरविंद सवैया,|| 6-मदिरा  (मालिनी /उमा/ दिव्या )  सवैया  || 7 -मत्तगयंद ( मालती/ इन्दव )  सवैया ||

8- चकोर सवैया, || 9 - किरीट सवैया ||, 10- अरसात सवैया, 11-सुमुखी (मानिनी , मल्लिका) सवैया,||12- वाम (मंजरी, मकरंद, माधवी) सवैया || 13 - मुक्तहरा सवैया || 14--लवंगलता सवैया ||,

15--वागीश्वरी सवैया || 16- महाभुजंगप्रयात सवैया || 

17 -#गंगोदक (गंगाधर /लक्ष्मी/खंजन )सवैया ||

18 -#मंदारमाला सवैया ||19--सर्वगामी (अग्र) सवैया  ||

20- आभार सवैया ||

सवैया  मापनीयुक्त वर्णिक छंद है।  सवैया छंद के प्रत्येक चरण में वर्णों की संख्या निश्चित है , हर वर्ण का मात्राभार भी निश्चित है 

  सवैया के चरण में वर्णों की संख्या 22 से 26 तक होती है। 

इसके चरण में एक ही गण की कई आवृत्तियाँ होती है जिसके अंत में एक से तीन तक वर्ण अलग से जुड़े रहते  हैं।

सवैया के चारों चरण सम तुकांत होते हैं और उनमें वर्णों की संख्या एक समान होती है। 

      कुछ महाकवियों ने कुछ ऐसे भी सवैया रचे हैं जिनके चरणों में वर्णों की संख्या असमान होती है। ऐसे सवैया छंद  विधान पर  आधारित नहीं  हैं , अपवाद है ,   सम्मान में इन्हें उपजाति सवैया के रूप में स्वीकार कर लिया गया है

सवैया छंद का प्रभाव  मारक क्षमता अन्य छंदों से सवाई अर्थात सवा गुनी होती है इसलिए संभवतः इसका नाम सवैया रखा गया है। 

कुछ सवैया उदाहरणार्थ लिखे है ,जो आपके‌ सामने है 

1- #दुर्मिल (चंद्रकला) सवैया छंद

दुर्मिल सवैया में 24 वर्ण होते हैं, आठ सगणों (112)  और 12, 12 वर्णों पर यति , अन्त सम तुकान्त  ललितान्त्यानुप्रास होता है।

अब तो रहना सबको सँग में , 

                   हम  भारत का जय गान करें |

रहती धरती  यह पावन है ,

                  मुनि  संत  यहाँ  सब  ज्ञान  भरें ||

शिव गंग यहाँ बहती शुभ है  ,

                  सब संकट भी  अभिमान  टरें |

हरि बोल रहें हर सेवक के , 

                 हरि आकर भी  सब  हान  हरें ||

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2- #सुंदरी (मल्ली/ सुखदानी )सवैया- 

25 वर्ण.  8 सगण + गा

112   112   112.  112.  112   112.  112   112   2 

अर्थात 112 X 8 +2 

विशेष-, दुर्मिल (चंद्रकला) सवैया छंद  (112 ×8  सगण )

में " गा" जोड़ने पर सुंदरी सवैया बन जाता है)

जब साजन ने  निरखी सजनी,

               कहता यह तो रस- सी बहती है |

नथनी नग भी चमके दमके ,

            हिलती झुमकी  मन की कहती  है ||

पग पायल के घुँघुरू बजते  ,

               सुर- ताल  बराबर  भी  रहती  है |

कटि झालर भी हिलती लटकी ,

                 कुछ भार रहे  पर वो  सहती है |

दूसरा उदाहरण 

#सुंदरी सवैया- 25 वर्ण.  8 सगण (112) + गुरु (2)

जब साजन की सजनी घर में  ,गहना  पहने  तन को  सजती है |

नथनी नग भी  चमके दमके , हिलती झुमकी धुन  से बजती  है ||

पग पायल घायल है करती,  सुर- ताल  बरावर  भी  मिलती  है |

चलती वह है जब आँगन में, शशि की छवि ही मुख पै‌ खिलती है ||


सुभाष सिंघई

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3--#किशोर / सुख / कुन्दलता /कुन्तलता सवैया 26 वर्ण 

(सगण 112 ) ललगा ×8 + दो लघु ( ग ग )

(विशेष सुंदरी (मल्ली/ सुखदानी )सवैया- में 

25 वर्ण.  8 सगण( 112 ) + गा को " ग ग " करने पर किशोर सवैया बन जाता है )

जब साजन ने  निरखी सजनी,

               कहता यह तो रस- सी बहती अब |

नथनी नग भी चमके दमके ,

            हिलती झुमकी  मन की कहती  अब  ||

पग पायल के घुँघुरू बजते  ,

               सुर- ताल  बराबर  भी  रहती  अब |

कटि झालर भी हिलती लटकी ,

                 कुछ भार रहे  पर वो  सहती अब ||

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4--#महामंजीर सवैया- 

26 वर्ण। आठ सगण + लघु गुरु 

112 112 112 112 112 112 112 112 + 12 

अथवा 112 X 8 + 12

सजनी मिलती जब साजन से , 

          कहती तुम भी हमको छल भी गये |

विरहा रहती उजड़ा सब है ,    

             दहके जलते   मन के बल भी गये ||

निरखो मुझको अब साजन भी, 

              अरमाँ  मन के तन के ढल भी गये |

सविता मन  की सब ही विसरा,

               अपने‌पन के सपने   जल भी गये ||

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 5-#अरविंद सवैया- 

25 वर्ण. आठ सगण + एक लघु ।

112 112 112 112 112 112 112 112 + 1 

अथवा 112 X 8 + 1

सब छूट गया परिवार यहाँ , 

             अब क्या करना हमको उपकार |

जग में  दिखती घनघोर घटा , 

              चलती रहती कटुता  तलवार ||

चमके बिजली गिरती घर में , 

                छिड़ती दिखती सबको ‌तकरार |

सुर ताल सभी अब रोकर के ,

                 सिसकें  रहते सब  है  उस पार ||

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6--#मदिरा (मालिनी /उमा/ दिव्या )सवैया- 

यह आकार में सबसे छोटा है। इसमें 22 वर्ण होते हैं। यह भगण की 7 आवृत्तियों के बाद एक गुरु जोड़ने से बनता है। सरलता से समझने के लिए इसकी वर्णिक मापनी को निम्नप्रकार लिखा जा सकता है- 

211.  211   211   211. ,    211.  211.  211.  2 

संक्षेप में 211 X 7 + 2 भी लिख सकते हैं। 

भारत में अब सैनिक चाहत , 

                  देश सदा पथ निर्मल हो |

कंटक काट करें अब रक्षण ,

                   चाल चली मत  दुर्बल हो ||

देव भजे हम  जाग रखें कुछ, 

                   पावन गंग सदा जल हो |

सुंदर हो परिवेश यहाँ तट ,

                    शान करें हम जो पल हो ||

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7--मत्तगयंद (मालती/ इन्दव ) सवैया- 

इसमें 23 वर्ण होते हैं। यह भगण की 7 आवृत्तियों के बाद दो गुरु जोड़ने से बनता है।  सरलता से समझने के लिए इसकी वर्णिक मापनी को निम्नप्रकार लिखा जा सकता है- 

211  211  211.  211   211.  211   211   22  

संक्षेप में 211 X 7 + 22 भी लिख सकते हैं। 

(विशेष मापनी से स्पष्ट है कि मदिरा सवैया  के अंत में एक गुरु जोड़ने से मत्तगयंद बनता है अर्थात- मत्तगयंद = मदिरा + गा )

हे शिव शंकर सर्प रहें सिर ,

               तुंग हिमालय‌ आलय तेरा |

शीष झुकाकर चंदन अर्पण 

                 लो  चरणों पर वंदन  मेरा ||

चाहत है अब  गंग धुलें सब, 

                     पाप तजें मन के अब डेरा |

पावन है शिवधाम गुनें हम  ,

                      चाहत का रखते  शुभ घेरा ||

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8--#चकोर सवैया- 

23 वर्ण.  7 भगण और ल ,   मापनी- 

211 211 211 211 211 211 211 21 

( विशेष -मदिरा सवैया में  + लघु करने पर =चकोर सवैया बन जाता है ) 

भारत में अब है यह चाहत , 

                देश रखे  अब  निर्मल राह |

कंटक काट करें सब रक्षण ,

                   चाल चलें शुचि पाकर चाह ||

देव भजें हम  जाग रखें सब, 

                      पावन गंग रखे   कुछ थाह  |

सुंदर हो परिवेश यहाँ पर ,  

                    दूर रहे  मन  ‌ की  सब  दाह ||

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9-- #किरीट सवैया-  24 वर्ण  , आठ भगण

211  211  211.  211   211   211   211  211   

अथवा 211 X 8 

 दो प्रभु दान दया मुझको अब, 

           सेवक माँगत शीष नवाकर |

चाहत है बस दान दया शुभ , 

            पास रहे नित मंगल आकर ||

है विनती मम एक सुनो शिव ,

             दास कहे यह  नाथ सुनाकर |

दो वरदान सदा रह सेवक , 

              सेव करूँ बस माथ  झुकाकर ||

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10 - #अरसात सवैया- 

24 वर्ण.  7 भगण + गालगा 

211   211   211   211.,  211   211.  211  

अथवा 211 X 7 + 212, 

चाहत है अरदास करूँ अब , 

           वैभव की सब चाहत छोड़ दी   |

पूजन ही प्रभु पावन पाकर ,

              हर्ष धरोहर   ही शुभ  जोड़ दी   ||

बोल सुनें हम प्रेम भरे रस , 

              पाप भरी तब  गागर  फोड़ दी  |

शीष झुकाकर चेतन पाकर , 

               गेह  शिवालय‌ को शुभ  मोड़ दी ||

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11 #सुमुखी   (मानिनी , मल्लिका) सवैया- 

23 वर्ण.  7 जगण + लगा 

121.  121    121   121   121   121   121.   12 

अथवा 121 X 7 + 12, 

पुकार दुखी जन देख "सुभाष," 

            वहाँ कुछ काम सुधार करो |

सुगान रहे मन ज्ञान सुजान , 

              विवेक  यथा उपकार  करो ||

अनेक  जहाँ  उपकार सनेह  , 

               वहाँ  मत  मान  निहार करो |

महेश कहें‌  सुन  जीव अनादि ,

                 गणेश  बनो  उपचार करो ||

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12---#वाम / मंजरी / मकरंद /माधवी सवैया 24वर्ण 

121 सात जगण + एक यगण   लगाल ×7 + लगागा

(विशेष सुमुखी(मानिनी/मल्लिका) सवैया में  एक और "  गा "जोड़ने पर माधवी सवैया हो जाता है )

पुकार दुखी जन देख सुभाष, 

            वहाँ कुछ काम सुधार करो जी  |

सुगान रहे मन ज्ञान सुजान , 

              विवेक  यथा उपकार  करो जी ||

अनेक  जहाँ  उपकार सनेह  , 

               वहाँ  मत  मान  निहार करो जी |

महेश कहें‌  सुन  जीव अनादि ,

                 गणेश  बनो  उपचार करो जी  ||

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13--#मुक्तहरा सवैया- 

24 वर्ण। आठ जगण। मापनी- 

121 121 121 121 121 121 121 121 

अथवा 121 X 8 

(विशेष -  #सुमुखी   (मानिनी , मल्लिका) सवैया-  7 जगण + लगा में एक " ल" और जोड़ने पर , अर्थात पूरे 8 जगण करने पर , मुक्तहरा सवैया बन जाता है ) 

पुकार दुखी जन देख सुभाष,

            वहाँ कुछ काम सुधार जरूर |

सुगेय मिले  शुभ ज्ञान विवेक , 

                  वहाँ सब छोड़‌ गुमान कुसूर  ||

अनेक  जहाँ  उपकार सनेह ,  

                   वहाँ मत देख लकीर सुदूर  |

महेश कहें सुन   जीव अनादि, 

                     गणेश  बनो  उपचार शूर  ||

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14-- #लवंगलता सवैया 25 वर्ण 

121 जगण ×8 + एक लघु (ग)

(विशेष - मुक्तहरा सवैया- 24 वर्ण। आठ जगण। मापनी में एक लघु " ग" जोड़ने पर लवंगलता सवैया बन जाता है )

पुकार दुखी जन देख सुभाष, 

            वहाँ कुछ काम सुधार करो अब  |

सुगान रहे मन ज्ञान सुजान , 

              विवेक  यथा उपकार  करो अब  ||

अनेक  जहाँ  उपकार सनेह  , 

               वहाँ  मत  मान  निहार करो अब |

महेश कहें‌  सुन  जीव अनादि ,

                 गणेश  बनो  उपचार करो अब ||

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15- #वागीश्वरी सवैया- 

23 वर्ण. , सात यगण + लघु गुरु 

122.  122   122   122.  122.  122  122  + 12 

अथवा 122 X 7 + 12 

बने काम पूरा- सही आपका ही , 

                      रहे गान पूरा -तभी  शान है |

चलेगें जहाँ भी -मिलेगा उजाला , 

                    दिखे हाल पूरा - सही ज्ञान है ||

पताका  रहेगी- सुखारी करों   में , 

                  जमाना झुकेगा - जहाँ  आन है |

निभाती चलें  जो - कही बात आली  , 

                    जहाँ भी कहेगा - उगा  भान है ||

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16--#महाभुजंगप्रयात सवैया

24 वर्ण। सात यगण

122 122 122 122      122 122 122 122 

अथवा 122 X 8  

(विशेष-  वागीश्वरी सवैया-  सात यगण + लघु गुरु में एक गुरु और जोड़ दिया जाए , अर्थात पूरे आठ यगण हो जावें , तब महाभुजंगप्रयात सवैया बन जाता है )

कहे नारि  देखो  , यहां  रैन सूनी  , 

                 मुझें  छोड़ रूठी ,  वहाँ सौत पाली |  

बने  आप मौनी, नही  बात   मानी , 

                   तजे  साज  मेरे,   यहाँ की उजाली  ||

सभी  नैन आँसू,  यहाँ सूख बोलें   , 

                   बना  बाग रोगी   , दिखे  हीन  माली |

बिना बात खारा,  हुआं नीर सारा , 

                     जलें  लोग देखों , बनी  रात काली ||

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17 -#गंगोदक (गंगाधर /लक्ष्मी/खंजन )सवैया- 

24 वर्ण। आठ रगण। मापनी- 

212     212.    2 12    212  212.  212   212  212 

अथवा 212 X 8 

बोलते बोल जो सोचिए आप ही  , 

              बात में धीरता‌  क्या  वहाँ  पास है |

नूर  जो देखते , आपका ही दिखे ,  

           प्रीति की डोर भी , क्या वहाँ खास है  ||

यातना  वेदना   भी  रही  दूर क्या  , 

             धर्म  का क्या रखा , आपने वास है |

जानिए आप ही , भाव भी सोचिए  , 

   ‌‌‌‌‌          देखिए   आप ही  ,कौन-सा रास है |

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18 -#मंदारमाला सवैया- 

22 वर्ण। सात तगण +गुरु अथवा 221 X 7 + 2

221.  221   221   221.  221   221.  221 +2

गंगा तजे धाम  -आया नया  नाम 

                      भागीरथी धार‌ -पूरी रही | 

रोकें महादेव -जूटा रखे खोल , 

                     देखें उसे  शीष -नूरी  रही ||

भागीरथी बोल -सोचो जरा देव, 

                      संसार से पूर्ण  -दूरी  रही |

छोड़ो इसे भूमि- दीजे ‌हमें आप , 

                जानो मुझे  ये जरूरी   रही ||

========================

19--#सर्वगामी (अग्र) सवैया- 

23  वर्ण। सात तगण +गुरु गुरु  अथवा 221 X 7 + 2 2

221.  221   221   221.  221   221.  221 +22 

(,विशेष- मंदार माला सवैया में एक और "गा" जोडने पर सर्वगामी सवैया बन जाता है ,)

गंगा तजी धाम  -आया नया  नाम 

                      भागीरथी धार‌- पूरी रही है | 

रोकें महादेव - जूटा रखे खोल , 

                     देखे उसे  शीष -नूरी  रही है  ||

भागीरथी बोल -सोचो जरा देव, 

                      संसार से पूर्ण - दूरी  रही है  |

छोड़ो इसे भूमि- दीजे ‌हमें आप , 

                जानो मुझे   ये जरूरी   रही है ||

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20- #आभार सवैया- 

24 वर्ण। आठ  तगण अथवा 221 X 8 

221.  221   221   221.  221   221.  221 221

(विशेष- मंदार माला सवैया के अंत में  एक  "गाल "  जोडने पर एवं  सर्वगामी सवैया में एक  " ल " अंत में जोड़ने से आभार सवैया बन जाता है , अर्थात तगण आठ (221 ×8 )हो जाते है )

गंगा तजी धाम  -आया नया  नाम 

                      भागीरथी धार‌ पूरी रही लेख | 

रोकें महादेव-  जूटा रखे खोल , 

                     देखे उसे  शीष -नूरी  रही लेख ||

भागीरथी बोल -सोचो जरा देव, 

                      संसार से  पूर्ण -दूरी  रही लेख |

छोड़ो इसे भूमि- दीजे ‌हमें आप , 

                जानो मुझे   ये जरूरी   रही लेख ||

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सभी उपरोक्त सवैया , स्वरचित मौलिक है , 

©®सुभाष ‌सिंघई 

एम•ए• हिंदी‌ साहित्य , दर्शन शास्त्र 

जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०

आलेख- सरल सहज भाव शब्दों  से छंदों को समझानें का प्रयास किया है , वर्तनी व कहीं मात्रा दोष हो तो परिमार्जन करके ग्राह करें 

सादर~

~~~~~~~~~~~~~~~

41-घनाक्षरी छंदों  के नाम  विधान सउदाहरण 

मनहरण (मनहर) घनाक्षरी  ||••||  जनहरण घनाक्षरी ||

जलहरण घनाक्षरी || ••••••••♪•• ||कलाधर घनाक्षरी  ||

रूप.    घनाक्षरी || ••••••••••••••||   कृपाण घनाक्षरी || 

डमरू घनाक्षरी || •••••••••••••• || विजया घनाक्षरी || 

देव घनाक्षरी ||••••••••••••••••••    ||सूर घनाक्षरी ||

घनाक्षरी छंद को कवित्त  मुक्तक भी कहते है , यह मापनी युक्त दंडक छंद है |

घनाक्षरी में मनहरण घनाक्षरी सबसे अधिक लोकप्रिय है । इस लोकप्रियता का प्रभाव यहाँ तक है कि बहुत से  मित्र  मनहरण को ही घनाक्षरी का पर्याय समझ बैठते हैं । इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 7 वर्ण होते हैं ( प्रत्येक चरण में 16, 15) के विराम से 31 वर्ण हुए | इसमें चार चरण होते है ,  चारों पद के अंत में समान तुक होता है ।

 प्रत्येक पद का अंत गुरू से होना अनिवार्य है किन्तु अंत में लघु-गुरू का प्रचलन अधिक है । शेष वर्णो के लिये लघु गुरु का कोई नियम नहीं है 

इस छंद में भाषा के प्रवाह और गति पर विशेष ध्यान आवश्यक है

छन्द की गति को ठीक रखने के लिये 8, 8, 8 और 7 वर्णों पर

 'यति' अच्छी रहती है 

जहाँ तक हो, सम वर्ण के शब्दों का प्रयोग करें तो पाठ मधुर होता है। यदि विषम वर्ण के शब्द आएँ तो , दो विषम एक साथ हो, 

,  वर्ण कलन --, त्रिकल त्रिकल द्विकल उचित है , पर द्विकल त्रिकल त्रिकल या त्रिकल द्विकल त्रिकल , उचित नहीं कह सकते है 

रही बात इस विधा में तुकान्त की।  पहले 8 अक्षर की यति और दूसरे 8 अक्षर की  यति का तुकांत उत्तम है । तीसरे 8 अक्षर यति  की भी  तुकांत, मिल जाए तब सोने पर सुहागा है |

अलग भी रख सकते है

     इसी प्रकार 7 अक्षरों  की  यति  तुकान्त चारों पद में  मिलाना आवश्यक है।

मनहरण घनाक्षरी छंद का शुद्ध रूप तो ८-८-८-७ ही है. अर्थात (१६-१५, ) इसमें आधा अक्षर गणना में नहीं लिया जाता है |

गणना के समय एक व्यंजन या व्यंजन के साथ संयुक्त हुए स्वर को एक वर्ण माना जाता है. संयुक्ताक्षर को एक ही वर्ण माना जाता है

छन्द शास्त्र के नियमानुसार इस घनाक्षरी  छन्द के कुल नौ भेद पाये जाते हैं, पर वर्तमान विद्वानों नें यह संख्या दंडक छंद सी परिधि से  बढ़ा दी है |

कवि लेखक के  शिल्प की पहचान छंद में देखने मिल जाती है , ऐसा नहीं है कि वर्ण गिनाकर कोरम पूरा कर दिया ,   वर्ण कलन और शब्द कलन का मेल छंद में देखने मिल जाए , तब लय  देखकर वाह ही निकलती है 

जैसे - 

मूर्ति मनुहार  (शब्द. कलन भी सही है  3 5  )

  व छंद के हिसाब से  वर्ण कलन भी सही है - 24 

इसी तरह - पूज्य दरबार  (शब्द कलन  35 )

              वर्ण कलन - 2. 4.

हालांकि मनहरण घनाक्षरी में शब्द कलन का प्रावधान नहीं है ,क्योंकि  वर्णक छंदों में सिर्फ वर्ण गिने जाते है , पर यह कवि का शिल्प है कि वह छंद में कैसे समन्वय प्रदान कर लय लाता है  

कुछ शिल्पगत त्रुटियुक्त घनाक्षरी लिखते  है. नियम तो नियम होते हैं. नियम-भंग महाकवि करे या नया कवि , दोष ही कहलाएगा.

 कभी महाकवियों के या बहुत लोकप्रिय या बहुत अधिक संख्या में उदाहरण देकर गलत को सही नहीं कहा जा सकता है

कवि भी अपने शुरुवाती दौर की लिखी रचनाओं में त्रुटि मानते देखे गए है , पर उनके शुरुवाती दौर की रचनाएं , लोग उदाहरण देकर विवाद प्रलाप पर उतर आते है , 

काव्य सृजन में नियम न मानने पर कोई दंड निरुपित नहीं है,  सो हर रचनाकार अपना निर्णय लेने में स्वतंत्र है.

उदाहरणार्थ 

#मनहरण घनाक्षरी 

आज सुनो  मेरी नाथ, झुका रहा निज  माथ ,

               शीष  रखो शुभ  हाथ , करता  पुकार है |

लखकर  तेरी  छवि , शर्म  यहाँ  खाए रवि , 

               आकें बोलें  भाव  कवि   ,मूर्ति  मनुहार है ||

मिले दया  शुभ  दान  , पाते भी है शुचि  ज्ञान 

                रखें सभी यह  ध्यान, पूज्य  दरबार  है |

कहे  "सुभा" देखो  अब , नेह रहे   मीठा सब

                भक्त झुकें जब-जब  , मिले  उपचार  है |

मनहरण घनाक्षरी 

चौराहों के किनारों  में ,समाचार विचारों में , 

गलियारों सितारों में  , राम का ही नाम है |


लोगों की हर बात में , सभी यहाँ  की जात में , 

हो रहे  दिन रात में , अयोध्या ही धाम है |


दुकान में मकान में , खेतन खलिहान में , 

बूड़े  बच्चे  युवान में , राम चर्चा काम है | 


बन गये माहौल में , बात की हर तौल में , 

राम  हुए हर बोल में  , आज हर ग्राम है |


सुभाष सिंघ

=========ैेे

#जनहरण घनाक्षरी 

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण होते हैं । 

प्रत्येक पद का 31 वां वर्ण गुरू होगा , शेष सभी वर्ण लघु होते हैं । चारों पद के अंत में समान तुक होता है ।

रघुकुल पढ़   कवि  , दशरथ सुत रवि  ,  

               अनुपम लख छवि , कह प्रभु   सुनिए |

मनहर पग  लख  , हटकर रस  चख  , 

             विनय वचन  रख , कह   प्रभु    गुनिए ||  

निकसति ध्वनि धन  ,  अरपन शुभ मन   , 

                   मम घर उपवन   , महकत  रखिए |

सियपति चरनन , परम सुजन मन 

                 भजत  विनय धुन   , मम  उर बसिए ||

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#जलहरण घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । 31वां एवं 32वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये

अर्थात अंत में दो लघु होना चाहिये ।

 चारों पद के अंत में समान तुक होता है ।

महादेव शिव  शंभू , बना  रखें  नभ  तंबू 

                  है त्रिशूल शुभ बम्बू  , गिरिराज हिमालय | 

शीष जटा सिर गंगा , सदा  रखें   मन चंगा , 

                    राख लगी तन अंगा  , चंद्र दिखे भालोदय ||

वेश बना  अवधूता  ,संग रहें सब भूता , 

             झुककर जो भी  छूता, होता  पापों  का भी क्षय |

भक्त रखें  सब  नाता  , बने आप शुभ दाता  , 

                   छाया जो भी पाता  ,  दूर   रहे सब  भय‌ |

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#कलाधर छंद घनाक्षरी~

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद 8,8,8,और 7 वर्ण होते हैं । प्रत्येक चरण में क्रमश:  गुरू-लघु 15 बार आता है और अंत में 1 गुरू होता है । 

इस प्रकार 31 वर्ण प्रति चरण। चारों चरण सम तुकांत 

हैं गुरू वसंत  पंत    , नेह  नेक सार  संत ,

               ज्ञान दान   है अनंत ,  कुंज   पुंज   नूर  हैं |

बात सार की सुभाष , शिष्य में रखें उजाश , 

                 चंद्र  नेह  के  प्रकाश  , आसमान   सूर   हैं ||

हाव भाव  है अनूप   , भूप  रूप  शीत-धूप ,

                  मेघ  छाँव ज्ञान  रूप  ,  मात  तात पूर  हैं |

ज्ञान दान भूप मान  , तीन लोक शान जान , 

                   फूल -सी सुगंध शान  , मानिए न   दूर  है  ||

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#रूपघनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । 32 वां वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये ।अर्थात गाल होना चाहिए ,  विषम सम विषम वर्ण प्रयोग उचित नहीं है , चारों  पद के अंत में समान तुक होता है 

जनता लेकर नोट , जाती  जब देने   वोट ,

            सहें लौट‌कर  चोट,   दिखें  बड़े   मज़बूर  |

सही न जिनका कर्म , चाहते उनसे धर्म , 

              नहीं   समझते    मर्म , अद्भुत  यहाँ  हुजूर   ||

नेता चाहे पूरी शान ,  बना  रहे‌‌‌‌  मेरा   गान ,

               बाकी सब हो  नादान , बना रहे मम   नूर 

बनें कहें  हम आली , मेरे    घर  उजयाली 

                   शेष रहें सब  खाली , पर  हम  भरपूर  ||

==============≠

#कृपाण घनाक्षरी

कृपाण घनाक्षरी – यह एक वर्णिक छंद है।इसमें कुल 32 वर्णों का प्रयोग होता है।इस छंद में 8,8,8,8 वर्णों पर यति होती है और प्रथम तीन  यतियों  पर अंत्यानुप्रास का प्रयोग होता है। चरणांत में गुरु लघु (ऽ।) वर्ण का प्रयोग अनिवार्य होता है

दिखें देश में जो माली , सही   नहीं रखबाली , 

              कोष करें सब खाली, फैलाते रहते खार |

गलत आदतें  डालीं , भाषण  में   देते  गाली ,

               लोग बजा देते ताली, बढ़ती   है तकरार ||

लगे   बात भी वेमानी ,नेताओं की खोटी बानी , 

                जिससे  होती  हानी , दूर रहे सब  प्यार |

कौन यहाँ समझाए , सच पूरा बतलाए , 

               यहाँ कौन भरभाए , मिले सदा अब हार ||

                    =================

#डमरू घनाक्षरी-

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी 32  वर्ण अनिवार्य रूप से लघु होना चाहिये अर्थात सभी वर्ण लघु होना चाहिये । चारों  पद के अंत में समान तुक होता है ।़

हिमगिर हरिहर , बम बम कह नर  ,

            नमन चरण कर , हरषत रत मन , |

भजत रहत नर  ,हिमगिरि  हरिहर 

             नमन करत नर   , शिव मग हर जन  ||

भसम लिपट तन , रहत मुदित मन  , 

              गणपति सुत धन , वितरित निज पन 

भजन  करत  जग   , अमन चमन मग ,  

                धवल कमल पग  ,सब कुछ  अरपन ||

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#विजया घनाक्षरी- चरणांत   लगा 

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी पदो के अंत में लघु गुरू(12 ) या नगण 111)मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारों पद के अंत में समान तुक होता है 

गिरिराज हिमालय ,  हिमगिरि है आलय ,

              जाते   शिव  देवालय, बम  बम  ताल रहे |

तन  पर मृग छाला ,   जटा जूट रुद  माला , 

               महादेव मृग छाला , चंद्र सदा भाल रहे  ||

पूजा हित जन जाता  ,बम भोला तब गाता , 

              भक्ति शक्ति वह  पाता, अनुपम   ताल रहे |

बना रहे शुभ नाता , आए घर सुख साता  

          दास सुभाषा हो नाता   ,चरणों  की ढाल  रहे ||

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#विजया घनाक्षरी-  (नगण ‌चरणांत )

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 8 के क्रम में 32 वर्ण होते हैं । सभी पदो के अंत में लघु गुरू( १२) या नगण (१११)मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारों पद के अंत में समान तुक होता है,  अंत नगण 

सैनिक का धर वेश, रखकर आगे देश , 

                 दुश्मन रहे न शेष, बैसे आगे  हो  कदम  ||

शत्रुु दल गाते गीत , बढ़ाते  उनसे  प्रीत 

                   बने जो उनके मीत ,तोड़ो उनका वहम || 

धधकी दिल में आग , भारत को देते दाग , 

               तोड़ दो उनका बाग  , मत करना रहम |

समय सुभाषा आज , बचाना भारत लाज, 

                  करो सदा ऐसे   काज , जाएँ शत्रु  भी सहम.||

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#देव घनाक्षरी

इस घनाक्षरी के प्रत्येक पद में 8,8,8 और 9 के क्रम में 33 वर्ण होते हैं । सभी पदों के अंत में नगण मतलब तीन लघु होना चाहिये । चारों पद के अंत में समान तुक होता है ।

रहें  सदा हिल  मिल  , नेक रखें हम दिल , 

                सुखमय  हर  पल ,  भारत  है   सदा  चमन |

जहाँ तहाँ  हरियाली , प्रतिदिन है  दीवाली , 

                 बजाते   विजया  ताली ,भारत  में  रहे   अमन ||

सहज  सजग  हम , नहीं  दिखें कुछ कम , 

                   हर  पल   हरदम ,   भारत  सजग  वतन |

शत्रु दल ‌यह जाने, अंतरमन ‌से माने , 

                   न्याय नीति पहचाने , कहता है सत्य कथन  ||

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#सूर घनाक्षरी 

(8,8,8,6 वर्ण चरणान्त में लघु या गुरु दोनों मान्य

हिमगिर शोभा न्यारी  , रहे शिवा  सुखकारी 

               जटा जूट शुभ धारी  , बाधा हरते है |

जग ताप निकंदन , गणपति श्री‌ नंदन ,

              माता गौरा के आँगन  ,खेला करते है ||

शिव सिर शोभे गंगा , दर्शन से मन चंगा , 

                भसम भभूति रंगा , तन मलते   है |

शरण सुभाषा पाता  , आशीषें दें गौरा माता , 

               कष्ट नहीं कोई आता , सब कहते  है ||

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©®सुभाष ‌सिंघई 

एम•ए• {हिंदी साहित़्य , दर्शन शास्त्र)

(पूर्व) भाषा अनुदेशक , आई•टी •आई •  )टीकमगढ़ म०प्र०

निवास -जतारा , जिला टीकमगढ़‌ (म० प्र०)

आलेख- सरल सहज भाव शब्दों  से घनाक्षरी प्रकार को समझानें का प्रयास किया है ,  वर्तनी व  कहीं मात्रा दोष हो तो परिमार्जन करके ग्राह करें 

सादर

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42-नील छंद (वर्णिक)  - ५भगण +गुरु

२११ २११ २११ २११ २११ २

राम लला अब मंदिर में निकले रहने  ,

छूट गया अब टेंट यहाँ सबके कहने , 

देख रही दुनिया अब आकर भारत में -

जश्न यहाँ पर   है पहने शुचिता  गहने |

~~~~

नील छंद (वर्णिक)  - ५भगण +गुरु

विधा गीतिका समान्त  "आन"  स्वर. पदान्त रहे ।

मापनी -२११। २११। २११। २११। २११। २

"विषय - एक अभिमानी की अभिलाषा "

लोग कहे हम जाल   बुने  तुकतान  रहे |

जो हमने अब गान  किया वह भान रहे ||

आकर लोग कहे  हमसे  तुम  नूर  यहाँ , 

आप सदा वरदान    बने  बलवान   रहे |

मान मिले जग में जब भी कुछ खास मिले , 

लोग झुकें जय  बोल सुनें मम शान   रहे |

आदत लोग कहे शुभ  प्यार   भरी जग में , 

देख  यहाँ   सच मान   मुझे  पहचान  करे |

ताकत से  जग   में  सबका अरमान  बनूँ   

गेह खड़ी  जग की   जनता    दरवान   रहे |

चाल  चलें जब  लोग कहें  सब आप धनी , 

पूज मिले  कुछ संग   सदा  भगवान  रहे |

कौन यहाँ  पर  आकर दे गति बोल 'सुभा' , 

मैं गति की पहचान रहूँ    अरमान रहे |

सुभाष सिंघई

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43- हरिगीतिका छंद (श्रीगीतिका )

विशेषता-  (इसको वर्णानुसार (ह रि गी ति‌‌ का )चार बार 16 - 12 में लिख दिया जाए , तब हरिगीतिका छंद बन जाता है व यदि मापनी हटा दी जाए , तब यह सार छंद कहलाएगा |

कुछ छंदाचार्या का यह भी कथन है कि यदि मापनी  2122 लिखें , तब इसे "श्रीगीतिका "कहना चाहिए | किंतु छंद  एक ही है , कुछ भी मापनी लिख लो |

(हरिगीतिका   हरिगीतिका  हरि  , गीतिका   हरिगीतिका )

११२१२      ११२१२      ११  ,    २१२     ११२१२   = 28   

प्रभु आपका जब  नाम लेकर , सोचता मन छंद है |          इस लोक में तब देखते कवि , आप में रवि चंद  है ||          गुण आपके जब गान में रख ,  देखते  ‌जब  वृंद‌ है |           जड़ चेतना फल फूल में  शुभ , आप का मकरंद है ||

 प्रभु आपका हम  नाम लेकर ,   सोचते‌ जब धर्म है |            तब ग्रंथ से शुचि ज्ञान लेकर  , जानते  शुभ कर्म है ||          कटुता हवा जब पास आकर   , घेरती मन  मर्म है |             तब बोधि से प्रभु नूर पाकर , भागती  सब शर्म है || 

 चमकें सदा अब भाल भारत, कर्म का सद्ज्ञान हो | | जिसमें दिखे सुख भारती यश, धर्म से जन गान हो ||            प्रभु आप ही जब राम होकर , मानते जग  धाम  है |तब धाम के उस राम को हम  ,जानते सुख नाम है ||

2212×4 श्रीगीतिका / हरिगीतिका{ मुक्तक }

2212    2212.  2.        212.  2212

देखें  जहाँ भी  सत्यता है  , गीत गाते आदमी |                दूरी नहीं  होती   वहाँ  भी , मीत पाते आदमी |                   हारें  नहीं पूँजी जरा भी ,   जीत जाते आदमी -     है देवता  भी  साथ  देने   , ये  सुनाते आदमी |

©®सुभाष सिंघई  एम•ए• हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र 

जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०

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44-गिरिधारी छंद विधान (सउदाहरण )

 [ सगण नगण यगण सगण ]

( 112  111  122  112)

  12 वर्ण,4 चरण  (दो-दो चरण समतुकांत)

चलते सतपथ  जो भी नर है |

उनका  जगमग जानो  दर है ||

रखते सरल  सुहाना   मनको |

दुनिया सब कुछ देती उनको ||


बहती कल -कल गंगा जमना |

कहती  बहकर सीखो‌  बढ़ना ||

जग में सब कुछ मानो अपना |

पहले  हितप्रिय  पालो  सपना ||


उनसे   झुककर बातें  कहना |

जिनकी शरणम्  होता  रहना ||

जग  में  वह   सरदारी   करते |

जिनके  सृजन   उड़ानें   भरते ||


रहती  जिस मन   प्यारी कथनी | 

दिखती हर  पग  में   है  करनी ||

कहते   जन- जन   पूरे  मिलके |

तुम हो  रहवर   नेता   दिल  के ||

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45 कहमुकरी (मुकरियाँ ) छंद विधान (सउदाहरण )

मुकरिया  एक लोक छंद है, इसको आ०  'अमीर खुसरो' जी ने बहुत   लिखा था |आ० अमीर खुसरो जी फारसी भाषा कवि / शायर थे , इसलिए उन्होनें इस छंद को फारसी शब्द से नाम दिया था |

"मुकर " फारसी शब्द है , जिसका अर्थ है , अपनी कही गई बात को नकार देना  , ना प्रत्यय लगाकर " मुकरना " एक क्रिया हो गई , इसी‌  तरह‌  इया प्रत्यय लगाकर , मुकरिया शब्द बना (मुकरने वाला ) जो एक संज्ञा है , व साहित्य में कहलाया " मुकरने ‌वाला छंद _ मुकरिया , 

और इनका  समूह  " मुकरियाँ " कहलाया 

  इसके बाद भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी ने भी इस पर लिखा व इसे  खड़ी हिंदी में  "कहमुकरी"  { कहना और मुकर जाना} के नाम से प्रतिष्ठित किया  है | यह अन्योक्ति रोचक छंद है , वर्तमान में कई मित्र यह छंद लिखते है |

यह चार पदों का छंद है , दो दो पद तुकांत , 

  सोलह मात्राओं का चौपाई चाल छंद  है | अंतिम दो पद - चौबोला छंद चाल से 15 मात्रा में , "गाल"  चरणांत करके भी लिख लिखते है ,  

पहेली_जिज्ञासा और गेयता ही   इस छंद की ‌विशेषता  है।

यह छंद दो सखियों के मनोविनोद वार्ता का  दृश्य उपस्थित करता है | एक सखी दूसरी सखी से  तीन पदों में  ऐसा चित्र  बनाती कि दूसरी को लगता है कि वह बालम  के बारे में बता रही है , 

 लेकिन जब वह चौथे पद में  स्पस्ट करना चाहती  है , तब कहने वाली सहेली  मुकर जाती है व दूसरी और संकेत करने लगती है ,

चौथा पद दो भागों में बँट जाता है , एक भाग में सुनने वाली सखी स्पस्ट करना चाहती है , व दूसरे भाग में कहने वाली सखी मुकर जाती है 

इस लिहाज से मुकरियाँ  एक तरह से अन्योक्ति हैं.

 १६ मात्राओं के चार चरण , व प्रत्येक चरण के अंत में ११११, ११२,२११,२२ का प्रयोग उचित रहता है , 

किंतु गेयता ध्यान रखते हुए " गाल"  का प्रयोग  तीसरे- चौथे चरण में या किसी एक चरण में भी कर सकते है  , क्योंकि " गाल" करने पर १५ मात्राएँ लय में आ जाती  हैं | जो स्वीकार होती है | वस गेयता रहनी चाहिए | 

~~~~~~~~~~~~~~~~

अमीर खुसरो जी व भारतेन्दु जी की कई मुकरियाँ पढ़ने पर , उपरोक्त👆 सही विधान  उभरकर सामने आता  है  | मेरा कहीं कोई किसी पर संकेत आक्षेप नहीं है , कि कौन इस छंद के साथ क्या तोड़ मरोड़ कर रहा है | न तीन पदों की तुकांते उचित है , और न सत्रह मात्रा तक का प्रयोग | (अपवाद के उदाहरण से  विधान नहीं बनते है ) गाल चरणांत में  15 मात्रा का प्रयोग स्वाभाविक लय युक्त है | 

 सादर 

सुभाष सिंघई

एम० ए० ( हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र )

जतारा  (टीकमगढ़ ) म०प्र०

उदाहरण - 

मेरा    सिर   गोदी  में    रखता |

मुझकों  भी तब अच्छा  लगता |

आती नींद   बड़ी   ही   सुखिया , 

क्या सखि बालम ? ना सखि तकिया |1


मेरे तन का    चूमें  माथा |

यहाँ  सुहागन बनती गाथा |

सब जाने तब   मेरी   हिंदी ,

क्या सखि बालम? ना सखि  बिंदी |2


मेरे सिर  अधिकार जमाए |

इधर उधर से वह सहलाए |

हरकत  होती  छोटी- मोटी, 

क्या सखि साजन ? ना सखि चोटी |3


लिपटे मुझसे जगती  सोती  |

आबाजों  की  प्रस्तुति होती |

मैं भी रहती  उसकी कायल , 

क्या सखि प्रीतम ? ना सखि पायल |4


कमर घेरकर  मुझ से लिपटे |

कभी न हम वह रहते छिटके |

उसको पाकर  दिखूँ सलोनी , 

क्या सखि बालम? ना करधौनी |5


उसे देखकर मन भी हँसता |

मेरा मुख उससे जब लगता |

बने   रसीली वहाँ भी  थाम - 

क्या सखि साजन ? ना सखि- आम |6


पाने उसको खुद  में जाती |

छूकर उसको   मैं हरसाती  |

शीतल  होती तन  की नगरी, 

क्या सखि बालम ? ना सखि गगरी |7


बीच राह में छेड़े मुझको |

जैसे कहता जानू तुझको |

घूँघट पलटे   दिखे अधीर , 

क्या सखि साजन?,न सखि समीर |8


हँसता रहता  हरदम हिलकर |

अच्छा लगता उससे मिलकर |

करूँ  ‌प्रशंसा उसके   गुन का , 

क्या सखि साजन ? ना सखि -झुमका |9


मुझ पर अपनी धाक जमाई |

रँग की ताकत भी दिखलाई |

खुश्बू देकर भी हद   कर दी , 

क्या सखि बालम ? ना सखि मेहँदी |10


गहन निशा में  हमें  सुलाता |

नरम -नरम अहसास कराता |

स्वप्न दिखाता सुंदर कल का ‌, 

क्या सखि साजन ? ना सखि-  पलका |11


मैं सोती जब निकट रहे वह |

मेरे  ऊपर   नजर रखे   वह |

मुझको    देता हरदम आदर |

क्या सखि बालम ? ना सखि -चादर |12


रहे   नैन  में   सदा   हमारे |

तिरछी चितवन भी वह ढ़ारे |

मैं भी उसको रखती हर पल , 

क्या सखि साजन ? ना सखि काजल |13


रखता है  वह हमसे   नाता |

हमको भी वह बहुत सुहाता |

देता    रहता  चुम्बन  अंकुर , 

क्या सखि साजन ? ना सखि सेंदुर |14


हमको अपने पास बुलाता |

मीठी   बातों   से भरमाता |

वादे भी   वह   सुंदर  देता , 

क्या सखि साजन ? ना सखि -नेता |15


देता   हमको    है   मुस्काने |

करे    इशारा  पास   बुलाने |

मेरे  अरमानों     को    खेता , 

क्या सखि बालम ? ना सखी -नेता |16


पास सदा वह  जब भी आता |

धीमी    सीटी  कान   बजाता |

लिखे    खून से  वह भी अक्षर , 

क्या सखि साजन ? ना सखि- मच्छर |17


जब भी  मिलती वह बिठलाता |

मुझको   पूरे     भाव    सुनाता |

आती    उसको      दुनियादारी , 

क्या सखी प्रीतम? ना  पंसारी |18


मेरी  पकड़े  सदा   कलाई |

कहता मुझसे करूँ भलाई |

मुख को देखे सदा खासकर , 

क्या सखि प्रेमी ? ना सखि -डाक्टर |19


जब भी जाती हाथ पकड़ता |

अपने हाथों  उन्हें   जकड़ता |

शृंगार   करे  हाथों  का   घेरा , 

क्या सखि प्रीतम? न सखि -लखेरा |20


मेरे   आकर   होंठ   रचाता |

मैं मुस्काती -  वह  मुस्काता |

उसके गुण लख - मैं   हैरान ,

क्या सखि साजन ? ना सखि -पान |21


मन में बसकर हाथ जकड़ता |

शोर करें वह  जहाँ भिनकता |

सजी सेज पर-   दे अपनापन , 

क्या सखि साजन ? ना सखि कंगन |22


जब वह मुझको निकट बुलाता |

अपनी   गर्मी   सब  दे    जाता  |

कहता   कभी   न   होगा भूला , 

क्या सखि बालम ? ना सखि चूला |23


ध्यान पैर का रखता  हरदम |

संग घूमता बनकर सरगम |

करे सुरक्षा रखता अक्कल - 

ऐ री साजन? नाँ री चप्पल |24


हर पल का वह ज्ञान कराए |

समय मूल्य का बोध सुनाए |

देखूँ उसको  मैं बैठ   खड़ी -

ऐ री बालम ? नाँ री घड़ी | 25


करता   छाती  से   रँगदारी |

उस बिन आती  है  लाचारी |

नहीं मिलै तो भारी   आँसें -

का री  साजन ? नाँ री साँसें |26


उस बिन  मैं   भी अकुलाती |

जब दिख जाता मैं मुस्काती ||

हाथ पकड वह सँग में लेटा - 

ऐ री बालम ? नाँ    री बेटा |27

~~~~~~~~~~~~~~

आ० भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने , इस विधा में दूसरे चित्र भी खींचें , जिसका तात्पर्य है कि - 

ऐसा भी नहीं है कि हर चित्र बालम साजन का खींचा जाए , किसी का भी खींचा जा सकता है , पर संवाद दो के मध्य रहेगा , मेरी निम्न मुकरियाँ देखें - 


ऊधम करने   घर में  आता  |

घर वालों को  बहुत सताता   |

फैलाता   है  घर   में    कूरा - 

क्या है बच्चा ? ना ना  धूरा |


मूँछें  ताने   अपनी   आते  | 

आकर सब पर धौंस जमाते  | 

खर्चा होती   घर की नकदी - 

यहाँ   दरोगा? ना ना  समदी ‌|

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यह आपने देखा होगा कि कभी - कभी हम आप भी बात कहते- कहते ,जब ऐसा लगता कि यह नहीं कहना चाहिए था , तब तत्काल पलटी मार लेते है , यह भाव भी मुकरियों में ला सकते है , जैसे 


चले चलें   हम  तेरे  संगे |

जिधर  फँसे है सब अड़बंगे |

सब  होगें   काम तरीछे से -

क्या तुम आगे  ? ना पीछे से |


उपरोक्त 👆 में आप देखें कि साथ चलने वाला , किस‌ तरह पलटी लेकर  ( मुकर ) गया व आगे  की जगह पीछे चलने लगा | क्योंकि उसे कहते - कहते अहसास हो गया कि हम कुछ अधिक बोल रहें है , समस्या आ सकती है मुझे |


इसी तरह यह दूसरा 👇


तुम मत उससे बिल्कुल डरना  |

कुछ बोले  तब   मेरी   कहना |

बात  न करना   शीष झुकाकर  |

क्या लड़ बैठै ?   नाँ समझाकर  ‌|


उपरोक्त में कितना हौसला दिया जा रहा था , पर जब लड़ाई  करने की पूछी तब , पलट गया  व समझाने  की बात  करने लगा 

सुभाष सिंघई जतारा

~£££££££

बुंदेली_मुकरियाँ 


जब हम पकरै बौ झुक जाबै |

अपने मन कौ रस  लुड़काबै  |

मौखौ  लगबै   हल्कौ  छैला-

का  री बालम ?  नाँ री घैला |


मौरी मुड़िया   ओली   रखता |

तन मन खौं तब नौनों लगता |

निदिया आती  बनती सुखिया , 

ऐ री  बालम ? नाँ री  तकिया |


चमक दमक है जैसे  मोती  |

मैं भी लख कै उसमें  खोती |

हौ जाती मैं    ऊकी ‌कायल , 

ऐ री  प्रीतम ? नाँ री  पायल |


मौरी   मुड़िया   हाथ लगाए |

ऊकै संगै  खिल   कै  भाए |

मटकत संगै   हरकत छोटी - 

का री साजन ? नाँ री चोटी |


करयाई   से   आकै  लिपटो |

दूर न भगबै  यैनइ    चिपटो |

मौखों गुइयाँ   लगौ  सलोना  - 

ऐ री बालम? नाँ  -करदौना  | 


उसकी जब जब परै जरुरत |

होती    पूरी    मौरी   हसरत |

शीतल  होती तन  की नगरी, 

ऐ री  बालम ! नाँ री  गगरी | 


बहुत तँगाबै आकै मुझको |

जैसे कहता  जानू तुझको |

घूँघट पलटे   दिखे अधीर , 

ऐ री साजन ,नाँ री समीर |


दाँत निपौरे   हरदम हिलकर |

नौनों  लगतइ ऊसै  मिलकर |

दयँ कानन  पै    पूरौ धमका - 

ऐ री साजन ? नाँ री  -झुमका |


मौपै अपनी    धौंस  जमाई |

रँग की ताकत भी दिखलाई |

खुश्बू देकर भी हद   कर दी , 

का री  बालम ? नाँ री महँदी |


अँदयारे  में    हमें    सुलाता |

लगत गुलगुलो   हमें सुहाता |

स्वप्न दिखाता सुंदर कल का ‌, 

का री साजन ? नाँ री  पलका |


मैं सोती तब  लेंगर   रहता |

मौरे ऊपर.  नेह    परसता ||

मुझको    देता हरदम आदर |

ऐ री बालम ? नाँ री  -चादर |


रयै  नैन  मे   सदा   हमारे |

तिरछी हेरन.  भी वह ढ़ारे |

मैं भी उसको रखती हर पल , 

का री  साजन ? नाँ री काजल |


राखत    मौसे  पूरा    नाता |

मौखौं भी वह भौत  सुहाता |

देत मुड़ी सैं  अपनौ  अंकुर - 

का री साजन ? नाँ री सेंदुर |


दोरे    आकैं  हमें  बुलाता |

मीठी   बातों   से भरमाता |

वादे भी   वह   सुंदर  देता , 

का री  साजन ? नाँ री -नेता |


मुड़ी हिला  कै दै    मुस्काने |

कातइ  तत्पर  साथ निभाने |

मेरे  अरमानों     को    खेता , 

का री बालम ? नाँ री -नेता |


नेंगर ‌   जाती   वह.  बिठलाता |

अपने    पूरे     भाव    सुनाता |

आती    उसको      दुनियादारी , 

क्या प्रीतम ?  , नाँ   री -पंसारी  |


मेरी  पकरै  हात   कलाई |

कहता तौरी  करूँ भलाई |

मुइयाँ तकबै सदा खासकर , 

का री प्रेमी ? नाँ री -डाक्टर | 


जब भी जाती कौंचा  पकरै |

ऐसौ    लगतइ  जैसे   दुचरै |

शृंगार   करे  हाथों  का   घेरा , 

का री बालम ? नँ री  -लखेरा |


मौरे  आकै    होंठ   रचाता |

मैं मुस्काती -  वह  मुस्काता |

उसके गुण लख - मैं   हैरान ,

का री साजन ? नाँ री  -पान | 


मन में बसकर हाथ जकड़ता |

शोर करें वह  जहाँ भिनकता |

चार जनन  में -दे इज्जत पन , 

का री साजन ? नाँ री कंगन | 


लेंगर  मुझको सदा   बुलाता |

तन  की  ‌ गर्मी  हमें  बताता  |

कहता मैं कब तुमको  भूला , 

का री बालम ? नाँ री  चूला |


ध्यान रखत मौरे गौड़न कौ |

संग दैत है   अपनेपन  कौ |

करत सुरक्षा राखे  अक्कल - 

ऐ री साजन? नाँ री चप्पल |


सदा समय कौ  ज्ञान कराए |

कितनी कीमत  बोध सुनाए |

देखूँ उसको  मैं बैठ   खड़ी -

ऐ री बालम ? नाँ री घड़ी | 


करता   छाती  से   रँगदारी |

उस बिन आती  है  लाचारी |

नहीं मिलै तो भारी   आँसें -

का री  साजन ? नाँ री साँसें |


उस बिन  मैं   भी अकुलाती |

जब दिख जाता मैं मुस्काती ||

हाथ पकड वह सँग में लेटा - 

ऐ री बालम ? नाँ    री बेटा |


सुभाष सिंघई




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46-पुनीत /लीला (गोपी) / गुपाल छंद (विधान - सउदाहरण ,

पुनीत छंद (मात्रिक छंद)
15 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। पर चारों चरण का तुकांत मनोहारी होता है , बैसे कुछ विद्वान सिर्फ़ अंत में गागाल मानते है पर 
इसकी सही मात्रा मापनी निम्न  है-
चौकल +छक्कल + तगण (गुरु गुरु लघु) = 15 मात्राएं ।

(चौकल में -2-2.  ,211. ,1111 या 112 हो सकता है,
छक्कल में - 2 2 2,    2 4,   4 2,   3 3 हो सकता है।)

लोगों    का  देखा   व्योहार |
मतलब का मतलब से प्यार ||
चलता  यहाँ    आर से  पार |
मतलब   छूटे  तब है  खार ||

धोखे ‌से  मिलता है   ताज |
करते  जनता पर तब राज ||
जिनकी नजर  बनी है बाज |
उनको कब  आती है लाज ||

उनकी मिली जुली है‌  ताल |
बनते  है वह  माला   माल ||
जनता रहे   बजाती   गाल |
उनकी पौ- बारह  है  चाल ||

खाने    में      पूरे    लंगूर |
चुगते  जनता  का  अंगूर ||
रहते   निकट नहीं है  दूर |
शोषण करके वह है शूर ||

सुभाष सिंघई
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पुनीत छंद (मात्रिक छंद)
मुक्तक

जनता गूँज रही   आबाज |
रखना सुंदर अब   है  राज |
सुनकर जाति-पात के भेद -
आती सबको अब  है लाज |

रखना  भारत माँ की  शान |
गाना जन गण मन का गान |
दुनिया  जब  खोजेगी   नूर -
बनना प्रखर रश्मि  के  भान |
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पुनीत छंद (मात्रिक छंद) गीतिका
समांत आना , पगांत यार

चलते जाना  गाना यार |
भारत वतन बताना यार |

माटी  यहाँ  सुहानी  नूर ,
सोंधी खुश्बू  पाना  यार |

सूरज चंदा  माने  पूज्य ,
इनसे प्रेम   सुहाना यार |

पावन गंगा यमुना वेग ,
इनसे नेह निभाना यार |

साहस रखकर चलना चाल ,
दुश्मन शीश   झुकाना यार |

भारत नहीं झुका है शीष ,
है   इतिहास पुराना  यार |

संस्कृति रखती उजला रूप ,
मेरा   देश   खजाना    यार |

सुभाष सिंघई
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#लीला छंद (गोपी)(15 मात्रिक )
प्रारंभ क्रमशा:  त्रिकल द्विकल  से , चरणांत दीर्घ
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लीला छंद

अकल के दुश्मन मिल जाते |
ज्ञान  भी   अपना   बतलाते ||
बोल   भी  मद  का  रहता  है  |
निजी  स्वर सबसे  कहता   है ||
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लीला(गोपी) छंद (15 मात्रिक )
प्रारंभ त्रिकल द्विकल  से , चरणांत दीर्घ
( मुक्तक)

मनुज है अब   बड़ा सयाना |
चाहता सब कुछ वह  पाना |
पराया   माल  झटकने  में ~
घूमता    बनकर    दीवाना |

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#लीला छंद (गोपी छंद )(15 मात्रिक ) √√
प्रारंभ त्रिकल द्विकल  से , चरणांत दीर्घ
गीतिका , स्वर यैर , पदांत - नहीं है

झूँठ का  सिर पैर नहीं है |
देखता  कुछ  खैर नहीं है |

रखें  वह हमसे कुछ दूरी
जबकि कुछ भी बैर नहीं है |

अजब दास्ता सुनने मिलती ,
कहे  मेरा    मैर    नहीं   है |

मानते  हम फिर भी अपना
जान लो   वह गैर  नहीं है |

सुभाषा किससे क्या कहना ,
हमारा उनसे   कैर नहीं  है |

कैर = शत्रुता , बिना पत्ती का कंटीला पेड़
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गुपाल  छंद (15 मात्रिक )
चरणांत लगाल (जगण ) होने पर-गुपाल छंद

आगे खोजो सदा  प्रकाश |
अंधकार का करो विनाश ||
यश फैलाओ   बड़े   सुदूर |
साहस  रखना  तुम भरपूर ||

जग में वही  लोग  मजबूर |
नहीं जानते जो  निज  नूर ||
रहता   उनसे यश भी  दूर |
बने रहें   जो मुँह से  शूर ||
~~`~~~~~~~~~~~

गुपाल  छंद (15 मात्रिक )
चरणांत लगाल (जगण ) मुक्तक

जग में रहते सदा अनाथ |
रहें ठोकते अपना   माथ |
बने आलसी करें न कर्म -
बाँधे रहते जो निज हाथ |

कहता सच्ची  बात सुभाष |
उनको मिलता सदा प्रकाश |
रहते    है    जो  साहसवान -
उनके  घर हो  सुंदर   प्राश |
~~~~~~~~~~
गुपाल  छंद (15 मात्रिक )
चरणांत लगाल (जगण ) गीतिका

आओ मिलकर  करें प्रभात |
निज जीवन में  भरें   प्रभात |

कर्म हीन  की करो न  बात ,
वह तो निज का हरें प्रभात |

लगन  जहाँ  है  सुंदर   नूर ,
उनके घर यश  धरें  प्रभात |

आदर्शों  को   रखो  उदार ,
नित नूतन तब  झरें प्रभात |

करें मधुरता का सुख  गान ,
उनके कदमों   बहें   प्रभात |

©®सुभाष_सिंघई ,  जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

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47-रजनी छंद  विधान सउदाहरण (मापनी युक्त ) २३ मात्रा

  यति - १४ यति ९ विराम                                                                                              मापनी -

२१२२       २१२२ ,   २१२२ २

देखते  नेता लगाते   ,  वोट  के मेले |

कौन रोकेेगा  जहाँ में, हो रहे   खेले ||

दूर से ही   देखते हैं ,    फेंकते  धेले  | 

जानते मेला घुसे हैं    , साँप के चेले ||

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रजनी छंद  विधान सउदाहरण (मापनी युक्त ) २३ मात्रा

  यति - १४ यति ९ विराम                                                                                              मापनी - मुक्तक

२१२२       २१२२ ,   २१२२ २  

लोग आते जानने को , हाल   है कैसा  |

क्या पुराना दर्द भी है  , पूर्व का जैसा |

है भलाई बोल दो ये , आपकी   छाया - 

चाहते हैं आप जो भी , हाल है    बैसा |

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रजनी छंद  विधान सउदाहरण (मापनी युक्त ) २३ मात्रा

  यति - १४ यति ९ विराम                                                                                              गीतिका मापनी - 

२१२२       २१२२ ,   २१२२ २

समांत स्वर - आते , पदांत -  हैं


लोग देते  ज्ञान  पूरा , अब  सिखाते  हैं |

तोड़ना घरों को कैसे , अब   बताते   हैं ||


बोलते   है  योजना   भी ,  ये हमारी  है,

कौन से तोड़ा घरों को , सब   सुनाते  हैं |


योजना   पूरी   बनाते , चाल  आगे   की , 

देख  मौका   आग  पूरी , तब लगाते   हैं |


कौन-सा है  काम इनको, जो नहीं आता , 

है गुरू संसार  में  वह , यह   जताते   हैं |


काम   भी   पूरा  करेगें ,  ले  रहे  ठेका , 

पीठ अपनी ठोकते हैं  ,   थपथपाते  हैं | 


राह में अड़चन नहीं है , चाल   ऐसी  है , 

पैदलों को भी  बजीरों ,  से   लड़ाते  हैं |


अब सुभाषा मान लेना , जानना   पूरा , 

गेह लोगों के  जले जो , ये  जलाते   है |

सुभाष सिंघई

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48-सरसी छंद और विधाएं


#सरसीछंद~

इसे तीन अन्य नामों से भी जाना जाता है।

#हरिपद छंद /#सुमंदर छंद/#कबीर छंद

किंतु प्रचलित नाम सरसी छंद है {( सरसी का शाब्दिक अर्थ होता है ,- जलाशय जो छंद के गुणानुरुप नाम है )

इस छंद का, अष्ट छाप के कवियों में सूरदास जी नंददास जी ने , व तुलसीदास जी मीराबाई जी ने अपने कई पद काव्यों में बहुत प्रयोग किया है , जिससे इसे भिखारीदास जी ने हरिपद (भगवान की स्तुति करने वाला ) #हरिपद छंद कहा है }।


होली के दिनों में गाया जानेवाला कबीर भी इसी छंद में गाया जाता है। जिसके अंत में #जोगीरा #सा #रा #रा #रा, लगाया जाता है, इसीलिए इसे #कबीर छंद नाम भी मिला है


इस छंद में कथ्य भाव सागर की गहराई सा पाया गया है, इस लिए इसे समंदर / #सुमंदर छंद नाम भी मिला है ।


#चौपाई का एक चरण (नियम सहित ) + #दोहे का सम चरण (नियम सहित ) = #सरसी छंद……..


सरसी छंद में चार चरण और 2 पद होते हैं । इसके विषम चरणों में 16-16 मात्राएं ( चौपाई चाल में ) और सम चरणों में 11-11 मात्राएं होती हैं ।( दोहे के सम चरण की तरह ) । इस प्रकार #सरसी छंद में 27 मात्राओं के 2 पद होते हैं । मूल छंद की दो दो पंक्तियांँ अथवा चारों पंक्तियांँ सम तुकान्त होती हैं।


१६ मात्राओं की यति २२ या ११२ या , २११ या ११११.से अधिमान्य‌ होती है ।

#तगण (२२१), #रगण (२१२), #जगण ( १२१) #वर्जित हैं

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आप इस छंद में छ: विधाएं लिख सकते हैं।

1- मूल छंद

2- मुक्तक

3- कबिरा जोगीरा

4- गीत

5 – गीतिका

6 – पद काव्य


सरसी छंद 

छंद जानिए प्यारा सरसी , सोलह-ग्यारह भार |

कहे सुमंदर हरिपद कबिरा, चार नाम उपहार  ||

विषम चरण है चौपाई‌ सा, सम दोहा का मान |

चार चरण में इसको जानो, यह सुभाष संज्ञान ||


कपटी करते मीठी बातें ,     खूब  दिखाते  प्यार |

हित अनहित को नहीं विचारें , करें पीठ पर बार ||

बने  शिकारी   दाना   डालें , पीछे   करें  शिकार |

सज्जन को यह घाती बनते ,    सबको देते खार ||


सरसी छंद 


मैया भारत वतन हमारा ,    देना इस पर ध्यान |

यहाँ सभ्यता वैदिक मेरी,    जिससे पाता ज्ञान ||

अरिदल भंजन करते रहना , रहकर सिंह सवार |

कृपा देश पर इतनी करना , मिट   जाएँ   गद्दार ||


पूजन अर्चन वंदन चंदन , नमो नमन शत बार |

जग के क्रंदन करो निकंदन , मैया अपने द्वार ||

काटो मेरे  भव के फंदन , कर दो रंजन  आन |

गुंजन उपवन मन का होवें , गाकर  तेरा  गान ||

अब यही छंद. मुक्तक में


कपटी करते मीठी बातें ,     खूब  दिखाते  प्यार |

हित अनहित को नहीं विचारें , करें पीठ पर बार ||

बने  शिकारी   दाना   डालें       , पीछे देते मात -

सज्जन को यह घाती बनते ,    सबको देते खार ||

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सरसी  छंद ( मुक्तक ) शीर्षक - उसको कहते बाप 


सभी चुनौती   जो स्वीकारे , रहे  नहीं  चुपचाप |

संकट सिर पर ले लेता है  , करता नहीं विलाप |

पीड़ा  अंदर सहकर हँसता , देता  सबको  धैर्य -

सदा मिले कर्तव्य निभाता , उसको कहते बाप |


कपड़े किसको क्या लाना है,  रखता कद के माप |

बनी मित्रता किससे किसकी ,कैसा  यहाँ मिलाप |

रहे आचरण  किसका कैसा , कैसे  किसके  बोल -

संस्कार की बात   करे जो , उसको  कहते  बाप |


बीमारी आई है किस पर  , कितना तन का ताप |

रहकर घर में कोई कारण , करता कौन  विलाप |

क्या बांछाएँ वह रखता है , समझे   वह   संकेत - 

उचित मानकर पूरण कर दे , उसको कहते बाप |


गलती घर का कोई कर दे ,   खुद पर  लेता   श्राप |

क्षमा माँग कर वापिस आता , अच्छी रखकर छाप |

समझाता संतानो को भी ,    गलती    का परिणाम - 

हित अनहित को  जो बतलाए ,उसको कहते बाप |


संतानों की ‌करनी का भी ,   मिले बाप को थाप |

अच्छे और बुरे की  पगड़ी , लेता   खुद ही आप |

दोष स्वयं लेता है आकर ,   अच्छा हो जब श्रेय - 

संतानो का ही  बतलाए  , उसको  कहते   बाप |


गले लगाने   चाहे बेटे , पर   रहता   खामोश |

माँ जैसा वह नहीं बना है  , खुद को देता दोष |

मकसद पाले रहता मन में , सुत का हो उत्थान- 

कहते उसको बाप सभी जन , जो देता है जोश |


सुभाष सिंघई जतारा

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इस छंद में जोगीरा बहुत सुंदर गाया जाता है 

सरसी छंद (कबिरा जोगीरा ) 


मिला फैसला  देकर लाखों, अफसर बड़ा महान |

सौ रुपया ले फाइल खोजी ,        बाबू बेईमान ||

जोगीरा सा रा रा रा


एक फीट की गहराई में , शौचालय निर्माण |

जाँच कमेटी माप गई है, मीटर आठ प्रमाण ||

जोगीरा सा रा रा रा


कर्ज मिले जब भी सरकारी, समझो तुम बादाम |

नेता देते माफी भैया,          जब चुनाव हो आम ||

जोगीरा सा रा रा रा


ओढ़‌ रजाई घी पी लेना , अवसर अच्छा जान |

इसी तरह यह भारत चलता ,     नेता देते दान ||

जोगीरा सा रा रा रा


नहीं खोजने जाना तुमको , मिल जाएँगे लोग |

एक बुलाओ दस आएँगे , पालो चमचा रोग ||

जोगीरा सा रा रा रा


सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़


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सरसी छंद में हिंदी गीत (कम से कम तीन और अधिकतम चार अंतरा )


समाधान को  खोज निकाले , कहलाता है धीर |{मुखड़ा)

संकट जब-जब भी आता है , खुद निपटाता वीर |(टेक)


हँसी उड़ाते पर पीड़ा में , जो भी मेरे यार | (अंतरा )

रोते हैं वह बैठ सदा ही , खुद पर जब तलवार ||

लोग‌ साथ से हट जाते‌ हैं , मिलती उसको‌ हार‌ |

जिसने बांँटे दोनों हाथों , सबको हरदम खार ||


इसीलिए तो सज्जन कहते , रखो‌ दया का‌ नीर |(पूरक)

संकट जब- जब भी आता है , खुद निपटाता वीर || (टेक)


अपनी-अपनी ढपली बजती , अपना-अपना राग (अंतरा)

अवसर पाकर देते है‌ बस , बदनामी‌ का  दाग ||

लोकतंत्र में गजब तमाशा , जुड़ जाते हैं काग |

खूब फेंकते बिषधर बनकर, दूर- दूर तक झाग ||


सदा अंँगूठा दिखलाकर ही , खल खाते हैं खीर |(पूरक)

संकट जब-जब भी आता है , खुद निपटाता‌ वीर ||(टेक)


खल करते संदेश प्रसारित,लोग‌ न देते ध्यान (अंतरा)

यहाँ सनातन से देखा है ,सबका हुआ निदान ||

लोग‌‌ साथ भी दे़ देते हैं , रखते‌ ऊँची शान |

अपनाकर सद्भाव सदा ही, करते हैं उत्थान ||


धैर्य वान की कीमत होती , जैसे पन्ना हीर |(पूरक)

संकट जब -जब भी आते हैं , खुदनिपटाता वीर (टेक )|~`~~~~~~~~~~~~~~


सरसी छंद ( अपदांत गीतिका) समांत-आन,

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फितरत, नफरत की ईंटों से , पूरा बना मकान ,

लेकर झंडा शोर मचाते, यह है आलीशान |


नहीं बात में कुछ रस रहता , बाते‌ंं रहतीं फेंक ,

तानसेन के पिता‌ बने हैं , उल्टा‌ सीधा गान |


खड़े‌ मंच. पर नेता जी हैं , भाषण लच्छेदार ,

ताली चमचे पीट रहे हैं , वाह-वाह की तान |


छिन्न-भिन्न सब करते रहते , फिर भी‌ हैं उस्ताद ,

फिर भी वह अपनी गलती पर , कभी न देते ध्यान |


नहीं सृजन में हाथ रहा है , नहीं मनन में खोज ,

मीन – मेख के महारथी हैं, बांँट रहे हैं ज्ञान |


बने देवता हिंदी के हैं , समझ न आती बात ,

खतना करते हिंदी की जब , मुझे दर्द का भान |


सच “सुभाष” ने जब बोला है , रुष्ट हुए है‌ं लोग ,

दूजों को मूरख बतलाते , खुद बनते‌ श्रीमान |


~`~~~“~

सरसी में पद काव्य


मैया ! मेरी रखियो आन |

द्वार खड़ा हूँ माता तेरे , करता‌ हूँ गुणगान ||

भाव सहित है अर्चन वंदन ,चरणों में नित ध्यान |

संकट कटते तेरी शरणा , मिले कृपा का दान ||

मंगल मूरत तेरी मैया , जग की दया निधान |

शरण सुभाषा पूजा करता , मैया की अब शान ||

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विधा - सरसी छंद /मात्रिक 

भक्ति की कथाओं में से एक क्षेपक कथा 

"राम नाम का मोल"


वणिक बोलता बजरंगी से    , देता नहीं उधार |

कुछ लेकर ही हम करते हैं , आगे का व्यापार ||

जो कुछ भी हो पास तुम्हारे, पलड़ा  देगा तोल  |

तुम्हें चाहिए क्या है मुझसे ,कह दो अपने  बोल ||


कहें वणिक से तब  बजरंगी ,  मैं    चाहूँ    सिंदूर |

यह  पुड़िया अब  रखी तराजू , कीमत लो भरपूर  ||

पुड़िया पलड़ा उठा न ऊपर,गया वणिक तब डोल |

चढ़ा गया  सब   सोना  चाँदी , हीरा  भी  अनमोल ||


तभी काँपते पुड़िया खोली , लगा  वणिक ने हाथ  |

राम नाम ही अंकित पाया , घूम   गया तब   माथ ||

तभी बोलते बजरंगी हैं , और   नहीं   कुछ   खास |

राम नाम का धन ही रखता , मैं   तो अपने   पास ||


हाथ जोड़ता  वणिक वहाँ पर , क्षमा  करो हनुमान |

मैंने जाना अब इस जग में , आया   मुझको   ज्ञान ||

कौन लगा सकता है जग में ,   राम नाम का   मोल |

भव सागर से जब तर जाते ,  राम- राम को   बोल ||


सुभाष सिंघई


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सरसी छंद 

शीर्षक   - उसको कहते बाप 


सभी चुनौती   जो स्वीकारे , रहे  नहीं  चुपचाप |

संकट सिर पर ले लेता है  , करता नहीं विलाप ||

पीड़ा  अंदर सहकर हँसता , देता  सबको थाप |

सदा मिले कर्तव्य निभाता , उसको कहते बाप ||


कपड़े किसको क्या लाना है,  रखता कद के माप |

बनी मित्रता किससे किसकी ,कैसा  यहाँ मिलाप ||

रहे आचरण  किसका कैसा , कैसा  रखता ताप  |

संस्कार की बात   करे जो , उसको  कहते  बाप ||


बीमारी आई है किस पर  , कितना तन का ताप |

रहकर घर में कोई कारण , करता कौन  विलाप ||

क्या बांछाएँ वह रखता है , समझे  सबकी छाप |

उचित मानकर पूरण कर दे , उसको कहते बाप ||


गलती घर का कोई कर दे ,   खुद पर  लेता   श्राप |

क्षमा माँग कर वापिस आता , अच्छी रखकर छाप ||

समझाता संतानो को भी ,   गलती  का   दे   माप |

हित अनहित को  जो बतलाए ,उसको कहते बाप ||


संतानों की ‌करनी का भी ,   मिले बाप को थाप |

अच्छे और बुरे की  पगड़ी , लेता   खुद ही आप ||

दोष स्वयं लेता है आकर ,  करता नहीं  विलाप |

संतानो को हर सुख देवे   , उसको  कहते  बाप ||


गले लगाने   चाहे   बेटे , पर   रहता   खामोश |

माँ जैसा वह नहीं बना है  , खुद को देता दोष ||

मकसद पाले रहता मन में , सुत की सुंदर थाप |

सभी जगह वह  गुंजन चाहे, उसको कहते बाप ||


सुभाष सिंघई


सुभाष सिंघई ( एम•ए• हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र)


आलेख- सरल सहज भाव शब्दों से छंद को समझाने का प्रयास किया है , वर्तनी व कहीं मात्रा दोष , समांत पदांत दोष हो तो परिमार्जन करके ग्राह करें!!

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49- शृंगार छंद विधान एवं उदाहरण

शृंगार छंद बहुत ही मधुर लय का 16 मात्रा का चार चरण का छंद है। तुक दो दो चरण में या चारो चरण में होती है , | इसकी मात्रा बाँट 3 – 2 – 8 – 3 (ताल) है। प्रारंभ के त्रिकल के तीनों रूप मान्य है जबकि अंत का त्रिकल केवल दीर्घ और लघु (21) होना चाहिए। द्विकल 1 1 या 2 हो सकता है। अठकल के नियम जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त न होना, 1 से 4 तथा 5 से 8 मात्रा में पूरित जगण का न होना और अठकल का अंत द्विकल से होना मान्य हैं।

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इस छंद में आप – मूलछंद , मुक्तक , गीतिका , गीत लिख सकते है कुछ उदाहरण मैं ( सुभाष सिंघई ) प्रस्तुत कर रहा हूँ( दो दो चरण तुकांत – उत्तम )

हमारे भगवन् है अतिवीर |

हरें जो जन जन की सब पीर ||

सियापति रघुकुल है पहचान |

रखें जो भक्तो का सम्मान ||


पूजता मंंदिर में साकार |

राम को मानू मैं आधार ||

जानता लीला अपरम्पार |

जगत में राम नाम उपचार ||


सुना है बजरंगी का काम |

बने थे सब कुछ जिनके राम ||

बचाए लछमन जी के प्राण |

हुआ था रण में तब कल्याण ||


( चारों चरण सम तुकांत- सर्वोत्तम)


आचरण जिनकी है पहचान |

चरण रज पावन है प्रतिमान ||

शरण भी प्रभुवर की है शान |

करे जन सुबह शाम गुण गान ||


दीन की कभी न पूछो जात |

बना वह सेवक है दिन रात |

सहे वह सबके अब आघात |

हाथ में रखता हरदम मात ||

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श्रृंङ्गार छंद ( मुक्तक)


जगत के पालक हैं श्री राम |

बनाते भक्तों के सब काम |

‘सुभाषा जिनका पूरा दास ~

शरण में करता है विश्राम |


लखें जब गोरी का शृंगार |

सभी के दिल में चुभे कटार |

चमकते घूँघट से जब नैन ~

हिलोरे लेता मन में प्यार |

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शृंङ्गार छंद 


उठे जब पायल की झंकार |

हँसी की लगती वहाँ फुहार |

देखते गोरी का श्रृंङ्गार |

सभी के बजते वीणा तार |


लोग भी जुड़कर करते भीड़ |

बना घर गोरी का है नीड़ |

गए सब गोरी को दिल हार |

नहीं अब दिखता है उपचार |


देखते नथनी न्यारी आज |

लगे अब गोरी को भी लाज |

झूलता पड़ा गले का हार |

झुकाने ग्रीवा को तैयार |


दमकता सूरज वहाँ विराट,|

लगी है बिंदी जहाँ ललाट |

‌’सुभाषा’ खोज रहा उपचार |

लगी है दिल में जहाँ कटार |


नैन भी गोरी के अनमोल |

फूल~से लगते उसके बोल |

करे सब गोरी से मनुहार |

चाहते गोरी से सब प्यार |

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शृंगार छंद 

श्री हनुमान जन्मोत्सव पर सभी को शुभकामनाएं 


आपकी जय‌ करता हनुमान |

राम के सेवक तुम  ‌बलवान ||

विनय हम सब करते है आज |

भारती माँ की  रखना   लाज ||


लुटेरे   लूटे    हिंदुस्तान |

बने है कुर्सी पर श्रीमान ||

लगे है घपलो के अम्बार  |

देश का होता नहीं सुधार ||


अखरते कुछ को है श्रीराम |

करें वह भक्तों  को बदनाम ||

जुबाँ  से  फैलाते    उन्माद |

वतन को करते   है वर्बाद ||


देश में फैलाते जो रार |

बनाकर लंका देते खार ||

पूँछ से फिर से करो कमाल |

विनय यह सुनो अंजनी लाल |

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शृंगार छंद

रामनवमी पर सभी के लिए मंगलकामनाएं 


रहे  है   सदा  सहायी  राम |

बनाते  जग में सबके काम ||

सियापति रघुकुल है पहचान |

भक्तजन करते  मन से  गान ||


राम नवमी  प्यारी  है आज | 

रखेगें प्रभुवर सबकी लाज ||

सनातन से हम रखते ज्ञान |

रामजी सबके   है भगवान ||


नवम् तिथि  आज हुई साकार |

रामजी  सुखद लिया अवतार ||

जगत में  राम   नाम   उपचार |

'सुभाषा समझा   है यह सार ||


राम से   सभी  रखो   पहचान |

चरण रज पावन  है  प्रतिमान ||

करे जो   सबह शाम गुणगान |

रखेगें   प्रभुवर   उसकी  शान |


दीन की  सुनते है  प्रभु बात  |

न्याय की  रखते है वह जात ||

हर्ष से   होता आज.  विभोर |

देखता अब तो प्रभु की ओर ||


नेत्र की  पीड़ा  है अब  दूर | 

राम की कृपा  रही भरपूर ||

छंद पर  करूँ निरंतर काम  |

चाहते   मेरे   प्रभुवर.  राम ||


श्रीराम जी के चरणों में शत शत नमन 

सुभाष सिंघई

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शृंगार छंद में एक शृंगार गीत


लगा है गोरी का दरबार |

देखते सब उसका शृंगार ||

खिली है ,धवल कुमुदिनी आज |

भ्रमर सब खोल. रहे है राज ||


भरे है हाला से दो नैन |

नशा खुद करता सबको सैन ||

गजब है काजल की अब रेख |

कटारी लगती उसको देख ||


उमड़ता मन में सबके प्यार |

लगा है गोरी ~~~~~~~||


नथनियाँ करती खूब कमाल |

उदित ज्यो सूरज होता लाल ||

कर्ण पर झुमके लगते फूल |

उगे ज्यो सरवर के हो कूल ||


बजे है मन वीणा के तार |

लगा है गोरी ~~~~~~~||


गाल के तिल पर भी है ध्यान |

करे वह योवन का रस पान ||

मची है गोरी की अब धूम |

रहे सब उसको लखकर झूम ||


सुभाषा”करता है मनुहार |

लगा है गोरी ~~~~~~~||

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गीत ( आधार छंद श्रृंङ्गार)


आज हम क्या लिख दे अविराम , बताओ हे मेरे घन श्याम | (मुखड़ा)

करूँ मैं पूजा आठों याम , आपकी सेवा मेरा धाम ||(टेक)


हमारे भगवन् ‌तुम अतिवीर ,हरण भी करते जन की पीर |(अंतरा)

यशोदा नंदन है पहचान ,भक्त सब. करते हैं गुणगान ||

सभा में किया द्रोपदी काम , बचाई लाज वहाँ अविराम | (पूरक)

करूँ मैं पूजा आठों याम , आपकी सेवा मेरा धाम ||टेक


पूजता मंंदिर में साकार , आपको मानूँ मैं आधार ||(अंतरा)

जानता लीला अपरम्पार , जगत में कृष्ण नाम उपचार ||

जगत के पालक हो घन श्याम , बनाते भक्तों के सब काम |(पूरक)

करूँ मैं पूजा आठों याम , आपकी सेवा मेरा धाम ||(टेक)


कृपा ही बनी हुई. पहचान | चरण रज पावन है प्रतिमान ||(अंतरा)

सुदामा रखी आपने शान | करे जन सुबह शाम गुण गान ||

‘सुभाषा लेना प्रभुवर थाम ~ शरण में देना अब विश्राम |(पूरक)

करूँ मैं पूजा आठों याम , आपकी सेवा मेरा धाम ||(टेक)

आलेख व उदाहरण ~ #सुभाष_सिंघई , एम. ए. हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र , निवासी जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र

आलेख- सरल सहज भाव शब्दों से छंद को समझाने का प्रयास किया है , वर्तनी व कहीं मात्रा दोष, व अन्य विधान सम्मत दोष हो, तो परिमार्जन करके ग्राह करें |

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50 महाश्रृंङ्गार_छंद

यह महाशृंगार छंद, शृंगार छंद के विधानुसार ही लिखा जाता है , पर 16 पर यति देकर 32 मात्रा पर चरणांत करना होता है |

शृंगार छंद बहुत ही मधुर लय का 16 मात्रा का चार चरण का छंद है। तुक दो दो चरण में या चारो चरण में होती है , | इसकी मात्रा बाँट 3 - 2 - 8 - 3 (ताल) है। प्रारंभ के त्रिकल के तीनों रूप मान्य है जबकि अंत का त्रिकल केवल दीर्घ और लघु (21) होना चाहिए। द्विकल 1 1 या 2 हो सकता है। अठकल के नियम जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त न होना, 1 से 4 तथा 5 से 8 मात्रा में पूरित जगण का न होना और अठकल का अंत द्विकल से होना मान्य हैं।

विधान-16,16 पर यति कुल 32 मात्राएँ प्रति चरण।

कुल चार चरण। चरण का प्रारंभ  त्रिकल फिर द्विकल से 

एवं चरणान्त गाल (21) से अनिवार्य।

चरणान्त  दो दो चरण  की तुकान्त हो तो #उत्तम ।

दो दो चरणों में यति पूर्व की तुकान्त दूसरे चरण की यति पूर्व सम हो तो #सर्वोत्तम।

चारों चरण की हो तो #अति_सर्वोत्तम होती है।

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इस छंद में आप #मूलछंद , #मुक्तक , #गीतिका #गीत  लिख सकते है |

जिनके उदाहरण मैं ( सुभाष सिंघई ) सृजन कर प्रस्तुत कर रहा हूँ

करें  अब राधा   का  शृंगार ,    गूँथते वेणीं  में  मधु   फूल |

नदी  का  माने  वह उपकार ,    बैठने  देता  है  जो   कूल ||

कहे अब राधा हे घन श्याम,  हुआ    है  मान  महाशृंगार |

जानती तेरा  हूँ  यह काम , सभी मैं  समझी हूँ अभिसार‌ ||

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अब मुक्तक में 

समय का नहीं   रहा   विश्वास , चले है  कैसे अब यह दौर |

भरोसा नहीं किसी पर खास , कहाँ पर कैसा मिलता ठौर |

मिले जब  घातों  पर  ही  घात , समझ लो खतरे में है बात

बचो अब दुश्मन से दिन रात , करो  मत कोई अपनाशौर |

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अपदांत गीतिका ( आधार महाश्रृंङ्गार छंद ) 

चली है पगडंडी पर नार , झलकती मुख पर थोड़ी लाज | 

किया है उसने जो  शृंगार , दर्श में खिले कुमदिनी आज ||


कान की बाली बजती झूम , अनोखा बिखरे अब संगीत , 

गाल को लेती बढ़कर चूम , करे वह खुद पर थोड़ा नाज |


सिकुड़कर गोरी होती दून , बनी है सबको वह चितचोर , 

बना है  घूघट अब मजमून , बोलता   जैसे  पूरा  साज |


गाँव में भारी होता शोर ,  चले नर नारी   उसकी ओर , 

नैन की घायल करती कोर , देखते  छैला बनकर बाज |


हारता मन को यहाँ "सुभाष" , अमिट है गोरी की अब छाप , 

रूप का करना चाहे प्राश , लगे  वह  सबको अपना ताज | 

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गीत (आधार महाश्रृंङ्गार  छंद 

राधिका  यमुना  के  है  कूल  , बने  है  भोले   भाले श्याम | मुखड़ा 

कहे   अब  तेरे  चेहरे    धूल  ,  छुड़ाता  हाथों से अविराम ||टेक 


इशारा   करती  राधा    देख , श्याम  की   पूरी मंशा जान |अंतरा 

कहे   तू    छूने  करता‌  लेख , यहीं   मैं  जानू    तेरा  मान ||

आज भी नटखट करता काम , श्याम भी हँसते है उस शाम |पूरक

कहे   अब  तेरे  चेहरे    धूल  ,  छुड़ाता  हाथों से अविराम ||टेक 


खिले है कमल नदी के नीर ,   हरे  सब  मन की  पूरी पीर |अंतरा 

राधिका हँसती कृष्णा देख , लगे भी श्यामा   बड़े  अधीर ||

कहें  क्यो रोके लेकर नाम , दिखा  है तिनका नथनी थाम |पूरक 

कहे   अब  तेरे  चेहरे    धूल  ,  छुड़ाता  हाथों से अविराम ||टेक 


चली है पवन वहाँ कर शोर , नाचते  दिखते है  अब मोर |अंतरा 

सुहाना   लगता है सब ओर , श्याम भी राधा करे निहोर ||

बोलते  मानो  मेरी  बात  , नहीं है  खर्चा  कुछ  भी  दाम |पूरक 

कहे   अब  तेरे  चेहरे    धूल,  छुड़ाता  हाथों से अविराम ||टेक 

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#सुभाष_सिंघई , एम. ए. हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र , निवासी जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

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51- रूपमाला छंद (मदन छन्द) 

संरचना-212 2   2122   2122   21

एक  चंदा  आसमाँ   ‌में  ,  फैल  जाता   दूर |

एक   पंछी  भी  सुनाता  ,  बोल   मीठे   नूर ||

एक  माला  फूल से   भी ,   दूर  होती  खार |

कामयाबी  एक  से  ही  ,  लक्ष्य  जोड़े  चार ||


कामयाबी   आपकी   है,  आपका  आधार |

नेह   का   भी  दूर  फैले , जानिए   व्यापार ||

फैलती है  आपकी   जो ,  कर्म वाली  बेल |

देखते   है   लोग   पूरा ,  आपका ‌ही  खेल ||


चाह के आगाज को भी , जो बनाते  खेल |

बूँद पानी की‌‌ मिटा  दे , आपका  ही   मेल ||

प्यार की   तासीर में  भी , देखिए आवाज |

टूट  जाती बंदिशें  भी ,  खोलते   है  राज ||

सुभाष सिंघई    एम•ए• हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र 

जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०

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52- गगनाँगना छंद [सम मात्रिक]  

विधान-25 मात्रा,16,9 पर यति,

चरणांत -  212 (रगड़) 


बीते  पूरी  शाम    सुहानी  ,  आगे रात भी  | 

इसके आगे फिर आएगा  , नया प्रभात ही || 

यहाँ सभी  नव  छंद रचेगें, फिर विश्वास  से |

रीति पुरानी सदा निभाएँ , हम सब आस से ||


मिले   कर्म फल पूरा   सबको , इतना  मानिए |

जो भी बोता वह  फल उगता , यह भी जानिए ||

रागी कभी न जानेगा यह  ,क्या सुख त्याग का |

उसका  हरदम   बोल  रहेगा ,  अपने  राग का ||


मरहम हो  सकती  है प्यारे    , बोली आपकी  |

परछाई  भी   दूर   रहेगी ,   जग के  ताप की || 

पुष्प खिला सकते बंजर पर , निज को जानिए |

बोल  आपके  मीठे   हों दो  ,   इतना   मानिए || 


काम सदा मरहम का करती   , अच्छी कामना |

सदा  महकती  फूलों  जैसी  , मन की भावना ||

मीठी   बोली    निर्धन  जाने ,   देना    जानता  | 

अपना जैसा सरल हृदय वह  , सबका मानता ||


बैल बना  देखा है  मानव   , ढोता भार को | 

अपने हित में लगा रहे वह ,  भूले प्यार को || 

जोड़ तोड़ में  लगा रहे वह , किसी करार में |

नगद  जोड़ता  पर देखा  है , रहे उधार  में  ||


जहाँ  हौसले  तूफानों  को , जब    संदेश हों  | 

करें सामना संकट का हम  ,यह  परिवेश हों ||

सदा सफलता करे समर्पण , निज मुस्कान से |

वीर  साहसी   उपमा  देती ,  तुमको  शान से  ||

नील छंद (वर्णिक)  - ५भगण +गुरु

२११ २११ २११ २११ २११ २


राम लला अब मंदिर में निकले रहने  ,

छूट गया अब टेंट यहाँ सबके कहने , 

देख रही दुनिया अब आकर भारत में -

जश्न यहाँ पर   है पहने शुचिता  गहने |

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53- विधा -काव्य वृद्धिसमानिका छंद  22  मात्रा 


मापनी‌युक्त मात्रिक छंद
गालगा  लगालगा  गालगा लगालगा

आज  नेकता    सभी  शर्मसार देखिए  |
कौन  बोलता   यहाँ  आज हार देखिए ||

मौन आज गौड़   है  प्रश्न कौन  पूछता,
लोग ला रहे नए   ये   विचार  देखिए |

नेकता  विचार भी   लोग मानते सभी ,
पालते  कभी   नहीं   जानकार देखिए |

जानकार  हैं  सभी   सोच   भी रखें गुणी ,
खोलते  कड़ाह  में     तेल  धार देखिए |

रोज ही  मिलान है कौन आज मानता ,
झूठ भी सफेद है    आर  पार देखिए |


धर्म की दुकान है , मोल ज्ञान  लीजिए ,
सिद्ध मंत्र भी यहाँ  , है  उधार  देखिए |

राह में  "सुभाष" है  खोजने प्रकाश को ,
वेवशी मुझे मिली  कार्य भार  देखिए |


 54 - विधा- शारद वर्णिक छंद विधान एवं उदाहरण 

शारद  वर्णिक छंद का विधान , यह एक सम वर्ण वृत्त छंद है। इसके प्रत्येक चरण में १८-१८ वर्ण होते हैं।  ९ वर्ण पर यति का विधान है।

दो,दो पंक्तियांँ समतुकांत हो सकती है।

पिंगल सूत्र - तगण भगण रगण सगण जगण जगण।  

अंकावलि 

२२१    २११.    २१२.    ११२   १. २१.     १२१

देता सदा सबको‌ यहाँ   , पर  साधता  वह   मौन |

खोले नहीं मुख को कभी, कहता नहीं  वह कौन  ||

बोला वहाँ  जब सत्य ने    ,यह  ईश का  उपकार  |

थामे सभी कहने लगे , यह   चाहिए  अब   प्यार |

सुभाष सिंघ

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55 आनंदवर्धक / पीयूष छंद


मापनी - 2122  2122. 212

हार मेरे   पास होगी जानिए |
जीत देंगे आपको ही मानिए |
काम पूरा ही   बनेगा ठानिए |
दूध जैसा सत्य को पैचानिए ||
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आनंद वर्धन छंद
मापनी - 2122  2122. 212  मुक्तक

लोग बोलेंगे यहाँ क्या शोर है |
बोल देना   भाव से ये भोर है |
है उजाला आपको देते यहाँ -
भावना के वेग का ही जोर है |
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आनंद वर्धन छंद
मापनी - 2122  2122. 212 
गीतिका
समांत - आना ,पदांत - था वहाँ

आपका जब पास आना था वहां |
दौर  तक   पूरा पुराना   था वहाँ |

थे  नहीं कुछ दूर तक कोई गिले ,
नेह  का गुजरा जमाना था वहाँ |

आप मानो यह तुम्हारी शान थी ,
जो हमें आकर खजाना था वहाँ |

जानते हम आपका वह  नूर था,
जो लगा सबको सुहाना था वहाँ |

बात पूछें  आप आकर ही सदा,
सिलसिला आगे बढ़ाना था वहाँ |

आज भी संसार में बातें वहीं ,
सोचता कोई फसाना था वहाँ |

आज भी जलते सुभाषा लोग हैं,
बोलते कोई   लुभाना   था वहाँ |

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56 कर्ण छंद विधान -

कर्ण छंद, समपाद मात्रिक छंद , 

 कुल ३०मात्राएं  १३,१७. पर यति चरणांत गुरु गुरु

दो या चारों चरण समतुकांत।

यति के अंत में गाल और शुरू में लगा आवश्यक है। 

मापनी - २२२ २२२१,१२२२ २२२ २२


मग में चलते श्री राम , लखन  सँग सीता जी सुकुमारी |

वन  काँटे   है   लाचार , समस्या  भी  वह समझे  भारी |

कैसे  पग लूँ  मैं चूम   , छुए  तब   पीड़ा होगी प्रभु को - 

उड़कर मग करते साफ,    करें दर्शन से मन सुखकारी |        

=====सुभाष सिंघई ==============

57- विधा:"वात्सल्य छंदाधारित मुक्तक"

          (वात्सल्य छंद २३ मात्रिक,१४-९ यति,अंत लल , 14 मात्राएँ कलन लय अनुसार  + 3 4 2 प्रयुक्त  है 

                   कहे सुभाषा इस जग में ,  भगत  तेरे सब |                        मन से भाव निकलते है , जगत  तेरा  तब  |

                  कौन यहाँ पर रोके तुमको , सभी तेरे  मग -                        यही सोचता पकडूगाँ   , चरण   तेरे  कब 


लोग सामने कब बोले , जानिए  कुछ सच |

वह   पूरे षड्यंत्र कहें  ,   सभी   लाए  रच |

सभी बने निर्दोष यहाँ , बने  धवला    सब - 

जरा आँच को पाकर ही ,    सभी देते नच |


नहीं भीड़ का हिस्सा हूँ, बात कहते  हम |

सदा सत्य को पहचाने , भरा  करते  दम |

क्या बिगाडे़गा दुश्मन भी , राह मेरी लख - 

गति गज यहाँ रहेगी रे   , दूर  होगे   गम |


जो  भी तेरे  अंदर है  , ईश के दर  कह |

उसकी जो रेखाएँ है  , उसी   में तू   रह |

मन की गंगा चंगी है , सत्य  सँग  है तब - 

साथ निभाने आएगा   ,  दूर रहे  न  वह |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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58-पद्मावती छंद विधान, सउदाहरण 

पद्मावती छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जिसमें क्रमशः 10, 8, 14 मात्रा पर यति आवश्यक है। चरणांत गा गा

प्रत्येक चरण के प्रथम दो यतियों  में समतुकांतता आवश्यक है।

चार चरणों के इस छंद में दो दो या चारों चरण समतुकांत होते हैं।

मुक्तक 

करता  मस्तक नत,पाकर पुस्तक,पूजों वीणा माता की |

शुभ दिव्य मनोहर , शब्द सरोवर , पाते कृपा विधाता की |

माने लेखक-कवि , भावों को रवि , कागज पर उन्हें उकेरे -

सब कहें शारदे , मुझकों वर दे , रिश्ता   सुत  से  नाता  की ‌|

छंद 

नेता की यारी  , दुनियादारी   , पड़े मुसीबत कुछ भारी |

फँसते नर नारी , तब मक्कारी , लगती भी है सुखकारी ||

अक्कल बेचारी,फिरती मारी, कष्ट रहें जब कुछ जारी |

तब  खद्दर  धारी , बंटा ढ़ारी , आकर  सिर करें सवारी ||


गिरिराज हिमालय ,शंकर आलय , सुत गणेश गौरी माता |

शुभ नंदी सजकर , वाहन बनकर ,रखते है अनुपम नाता ||

सब भूत पिशाचा , करते नाचा ,   होता  है  खूब   तमाशा |

प्रभुवर कैलाशी,सब अभिलाषी,करने को नमन ' सुभाषा ||


किया  कुम्भ दर्शन , पूजा अर्चन , डुबकी  ले आए गंगा |

मन  ताप मिटाया , खूब नहाया , लोटे तन को कर चंगा ||

देखे   थे    नागा , बाँधे   धागा  , तन  धूनी भस्म अनंगा |

अच्छी तैय्यारी ,  जनता भारी  , मेला   था  रंग   बिरंगा ||

सुभाष सिंघई

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59 - "द्विगुणित सुंदर ‌छंद "

श्रद्धेय आचार्य #दयानंद_जड़िया "अबोध "जी की  (कृति -"ऐसा वर दो " से साभार विधान की जानकारी ली  है )

#सुंदर_छंद को दुगना कर , #द्विगुणित_सुंदर‌_छंद आयोजित‌‌  है। जब छंद को दुगना करके लिखा जाता  है , तब महा /दीर्घ या द्विगुणित की संज्ञा दी‌ जाती है |

द्विगुणित सुंदर छंद - 12 - 12 मात्रा , चार पद  , प्रत्येक  पद में 

यति और‌  चरणांत में दो गुरु २२ अनिवार्य है‌। 

( गुरु को वाचिक दो लघु करना ××निषेध है |

चारों पदों  की  तुकांत सर्वश्रेष्ठ एवं ,  दो-दो पद तुकांत सामान्य  

उदाहरण 

माँ शारदे वंदना 

विनय शारदे माता  , आया शरण तुम्हारी |

हर अक्षर में चाहूँ , कृपा  आपकी  न्यारी ||

आप बुद्धि की दाता , करती  हंस सवारी |

लिए हाथ में  वीणा , धवल वस्त्र हो धारी ||

श्री गणेश वंदना 

लम्बोदर     कहलाते ,    पार्वती   हैं   माता |

पिता आपके भोले , शंकर  जगत  विधाता ||

रिद्धि-सिद्धि तुम देवा , जग के बुद्धि प्रदाता |

शरण  सुभाषा चाहे , हो  मंगल   शुभ साता |


भारत माता की वंदना 

जय जय भारत माता , अपना शीष झुकाता |

लिए    तिरंगा  झंडा , जन गण मन मैं गाता ||

तेरी  शान   निराली , जग को   मैं  बतलाता |

गीत प्रेम के सीखूँ ,  सबको   यहाँ  सुनाता ||

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राधा आकर   बोली    , कहाँ  प्रेम में बाधा |

यह जीवन बिन तेरे , लगता मुझको आधा ||

सदा साथ हो तेरा ,  इसी  भाव  को  साधा |

कहें श्याम तब राधा , तुझे  न  आए  व्याधा ||


शिव शंकर बम  भोले  , लीला  तेरी  न्यारी ‌|

कहलाते   कैलाशी ,    नंदी    बैल   सवारी ||

रहे   जटाओं    गंगा , ब्रम्ह   पुरी  अवतारी |

नाग- चंद्र सिर शोभें,    भक्त रहें  बलिहारी ||


चली मटककर गोरी , बनकर  चंद्र चकोरी |

कहे गाँव की नारी  ,‌  है यह भाव  विभोरी ||

दिखें कमल-सी आँखें‌,लाल गाल ज्यों रोरी |

होती रूप  प्रसंशा, जन -जन करे  निहोरी ||


सबका अपना पानी ,  कहते हैं यह ज्ञानी |

कोई  है   अभिमानी , कोई  दाता  दानी ||

कोई चलता चालें , रचता  खोट  कहानी |

कोई बन उपकारी ,जग में दिखता सानी ||


करते-करते बातें ,  कट जाती   है   रातें |

होती रस की चर्चा , मिल जाती सौगातें ||

षड्यंत्रों  की  चालें , सबको  मारें  लातें ‌|

जिनसे बचते  ज्ञानी, दूर रखें  सब घातें ||

सुभाष सिंघई

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मुक्तक -( द्विगुणित सुंदर ‌छंद )

गौ और गंगा की वंदना (मुक्तक ) 

गौ माता-गंगा का, रखते मान  सभी  हैं|

जानें  सब मर्यादा , रखते आन सभी हैं |

पावन इनको मानें , करते मिलकर पूजा -

करता नमन 'सुभाषा' , करते गान सभी हैं |


बजरंगी वंदना 

महावीर   बजरंगी ,    रामदूत   कहलाते |

तन पर लाल लँगोटी , हम दर्शन में पाते |

साधक इनको चाहें , महिमा यह भी जानें -

राम नाम जो लेते , उन पर  कृपा लुटाते |


द्विगुणित सुंदर छंद , मुक्तक 

चौराहों    पर  चर्चा ,   जब  होती  नादानी |

सभी लोग  चिल्लाते , कह   देते   अज्ञानी |

साधक दर्द छिपाता, बोल न   मुख से बोले-

निकट सफलता लाता, बदले स्वयं कहानी |


खा जाते  हम धोखा   , बड़ा  सिकंदर जानें |

करता मिलता  चोरी,   जिसे   कलंदर  मानें |

हरकत नटवर जैसी , खुल भी जाती आँखें - 

फिर भी सब सुन लेते  ,  उस बंदर के  गानें  |


जिसको सूरज मानें, निकले जब वह धब्बा‌ |

काली हो   करतूतें , ज्यों कीचड़ का  डब्बा |

मद में भी  वह भूले , चिल्लाए   मैं    ज्ञानी - 

उसे सुभाषा जानों  , है वह  सड़ा   मुरब्बा |


कभी देर से  आँखें , जब जैसीं  खुल जातीं |

लोग सजग हो जाते , घातें  पास  न  आतीं |

मानव निपटा लेते  ,     समाधान  भी  देखें - 

पर मूरख कब चेतें  , जलती   पकड़ें बातीं |


छंद चोर अब देखा , गुरु का पहने बाना |

चोरी   सीना  जोरी ,   सीखा   है गुर्राना ‌||

सुंदर  छंद चुराया ,कहता उसे   भिखारी - 

दूजों से लिखवाता ,कहता निज का गाना |

सुभाष सिंघई

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गीतिका   -(  द्विगुणित सुंदर ‌छंद )

समांत - आग ,  पदांत लगाए 


जिस पर करो भरोसा  , वह ही आग  लगाए |

यह    दुनिया   अलबेली , भाई  दाग  लगाए |


जगह-जगह मक्कारी , छाया काला घेरा , 

गाते  मिलते  यारा ,    अपना  राग लगाए |


मिलते कई फसाने , गुणा  जोड़‌  है  बाकी , 

करते हैं  कुछ दोस्ती ,  अपना भाग लगाए |


जहाँ एक को खोजो ‌, मिलते वहाँ हजारों , 

पर  मिलते  हैं यारो   , गंदा  झाग लगाए |


दिखते खिले बगीचे , पर मिलता है धोखा , 

मिले  चमन  में  माली , फूलों आग लगाए |


आती  है  जब बारी ,  सोने को जब जाते , 

नींद शोर कर देती ,    उल्टा  जाग लगाए |


कहता सुनो सुभाषा , कर दो बंद भरोसा ,

तुझे काटने बैठा     , आशा   नाग लगाए |

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द्विगुणित सुंदर छंद मुक्तक 

राणा  को दी गाली ,    वाह-वाह तब लूटी |

जब सबने धिक्कारा, कहते किस्मत  फूटी |

करे   बैठकर   रोना , कोसे   करणी सेना - 

कर्म न अपना देखा , मर्यादा    क्यों   टूटी  |


जिसने  राणा साँगा  , को दी आकर गाली |

सबने उस पर थूका , धूली  आक‌र डाली   |

‌सहन नहीं अब होगा , करतूतें ‌‌जब ओंछीं -

जनता भी मुख  धोती , लाकर पानी नाली |


घाव लगे थे अस्सी , एक आँख भी फूटी |

दुश्मन से ले लोहा , एक  बाँह  भी   टूटी |

लड़ा अंत तक साँगा , आकर किला बचाया - 

फिर भी नव नेता ने  , राणा  इज्जत‌  कूटी‌ |


समाचार सुन कानों , जन -जन ने धिक्कारा |

कुछ ने  पकड़ा सीधा,    लानत से   उच्चारा |

अब करता  है  रोना , कर्म   न  अपना  देखा  - 

फिरे   माँगता  माफी ,   जनता  करे  किनारा  |

सुभाष सिंघई

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नया वर्ष  है आया , सुनो  सनातन भाई |

छंद महल से देता , सबको आज बधाई ||

मंगल कारज होवें , बाजे   मन  शहनाई |

लेखन सुंदर आए ,    पावन रहे   स्याही |

(९२)

(मुक्तक)

मुझको समय नहीं है , कुछ नफरत को पालें |

जलने   भुनने  वाले ,  देखें   और   सम्हालें |

प्यार मुझे जो   देते ,    उनका   मैं   दीवाना - 

सम्मुख जब मिल जाएँ,तब हम शीष झुका लें |


गुरू करें  अब  चोरी ,  चेले‌‌   जिन्हें   सम्हालें |

महिमा मंडन गाएँ   , सिर पर उन्हें  बिठा लें |

सब प्रमाण ठुकराएँ , गुरु का‌ ‌  करें   बखाना-

लूट करें  छंदों   की , ‌   सीधा  डाका   डाला |


द्विगुणित सुंदर छंद गीतिका 

समांत स्वर - आव   पदांत - की डोरी 


नहीं किसी से बाँधी,  बैर भाव की डोरी  |

सौंपी सबके हाथों , प्रेम  नाव  की डोरी ||


अभिमानी गुरु देखा ,जिसकी पकड़ी चोरी , 

उल्टा  वह   गुर्राता  ,‌ रखे  ताव  की  डोरी |


एक  स्वयंभू   देखा  , निकला चतुर सयाना , 

पोल शिष्य ही खोलें   , रख दुराव की डोरी  ||


गुरु   स्वार्थी भी  देखा  , अपना  हित ही साधे , 

बढ़ता  शिष्य    गिराए   , खींच दाव की डोरी |


दूजों से  लिखवाता , देता   अपना ठप्पा , 

पकड़ा राज सुभाषा  , दिखी हाव की ‌डोरी |


कितने  छंद  चुराए , सब गिनती  में आए ,

नहीं साँच को आँचें , मिली घाव   की ‌डोरी |


चिंतन करे "सुभाषा" , सबकी  आँखें खोलूँ , 

कब तक राज छिपेगा,  जली  चाव  की डोरी 

सुभाष सिंघई 

आलेख व उदाहरण - सुभाष सिंघई, 

एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र 

पूर्व भाषाअनुदेशक , आई टी आई 

मोबाइल - 9584710660 

जतारा , टीकमगढ़ म०प्र०, 

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भूषण छंद विधान सउदाहरण और विधाएँ

भूषण  छंद  (कुल 28 मात्रा ). 14 - 14  मात्रा , चार पद  , प्रत्येक  पद में , #यति और‌  #चरणांत में #दो_लघु  ( लल)  अनिवार्य है‌। 

( दो लघु को एक गुरु  करना ××निषेध है ) 

चारों पदों  का  तुकांत सर्वश्रेष्ठ एवं ,  दो-दो पद तुकांत सामान्य।

विशेष संज्ञान -  जिन मात्रिक छंदों में प्रारंभ शब्द का संकेत न हो , सिर्फ पदांत का संकेत हो , उन छंदों में प्रारंभ कलन नियम से करना चाहिए ,( समकल के बाद समकल व विषम कल के बाद विषम कल )तभी लय आती है , इस  भूषण छंद में  भी ऐसा करना  है |

 भूषण छंद 👇में , लय‌ और कलन निम्न प्रकार 

समझ सकते हैं,  व पद में  किसी भी चरण में 

कोई भी कलन और लय‌ ले सकते हैं 


गीत  सुहानें   गाता  चल,       तेरे   होंगे ‌ ‌ सुंदर  पल |

बोलो बस‌ तुम बोल मधुर,   सदा मिलेगा मीठा  फल ||

दुनिया में निज के अनुभव, अब ‌'सुभाष' बतलाता चल |

कलन "छंद भूषण" की लय, करो निवेदन सबसे  हल ||

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उदाहरण - 

माँ शारदे वंदना 

मात शारदे देना वर ,   गाऊँ जग में गीत मधुर |

स्वर तंत्री को भाव सहज, देता जाए मेरा  उर ||

कृपा आपकी मैं पाकर,धन्य करूँ मैं सदा कलम |

मेरा लेखन बने अमर , जिसमें  रहे  न कोई तम  ||

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श्री गणेश वंदना 

छंद सम्हालों हे गणपति ,   तेरा  करता   मैं वंदन |

अर्पित करता देख चरण, भाव भरा मैं शुभ चंदन ||

रिद्धि-सिद्धि के तुम नायक, मूरत लगती है मंगल |

नमन सुभाषा करता अब, मंगल चाहूँ मैं हर पल ||

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श्री महावीर वंदना 

महावीर का  वंदन कर , बोलूँ  मुख से सन्मति जय‌ |

णमोकार का वाचन कर , रखूँ हृदय में सम्यक लय‌‌ ||

सांसारिक हैं जितने नर , सभी   भटकते  हैं  हरदम |

करें 'भावना योग' नियम , हटता देखा जिससे तम ||

(मुनि प्रमाण सागर जी ने 'भावना योग ' बतलाया है)

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 गंगा माता की वंदना 

दीप जलाकर करुँ नमन ,और  आरती करूँ सहज |

गंगा माता निर्मल जल , और   पूजता  पावन  रज ||

मोक्ष दायनी माता तुम ,  करती  पाप  निवारण तुम  |

श्रद्धा रखते जो भी  नर , करतीं  उनका  तारण तुम || 

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भारत माँ की वंदना 

भारत माता तेरी जय ,       सविनय करता हूँ वंदन | 

गान करूँ मैं जन-गण-मन , अर्पित रक्षा में यह तन ||

लाल आपके हैं तत्पर , सीमा  पर हैं   सदा   सजग |

बड़े वीर हैं   तेरे सुत ,      चयन करें बलिदानी मग ||

सुभाष सिंघई

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अन्य उदाहरण ( छंद )

( छंद )

गीत सुहाने गाता चल   , मिले सुनहरा आगे कल |

करो परिश्रम डटकर तुम , आगे  ‌होंगे सुंदर  पल ||

संकट घेरें जब आकर , निकलेगा उसका भी हल |

रखो भरोसा तुम खुद  पर ,  दूर  हटेंगे   पूरे  छल ||


मिलें राह में पीड़ित‌ जन , मदद करो उनकी  आकर |

मानवता सीखो  सुंदर    , साथ उन्हीं का तुम पाकर ||

ईश  रहे  उनके अंदर ,   सेवा   उनकी   पूजा    सम |

वहीं   मिले संतोषी फल  , नहीं  मानिए उनको कम ||


जहाँ राष्ट्र में जन-गण-मन , वह  कहलाता है  भारत |

जिसके हम  गीत मनोहर , गाकर ही  लिखें इबारत‌ ||

चलना जानें  कंटक पथ , चढ़  जाते ऊँचे  गिरि  पर |

दुश्मन  भी काँपे  थर-थर , पर हम रहते सदा निडर ||


आजादी का था भाषण , नारा था  जय    हिंद वतन |

मुझे खून दो भारत सुत,   आजादी  सँग मिले अमन ||

नमन करें हे सुभाष  हम ,बोल उठा था हर जन-जन ||

तेरे पीछे  अब चलकर ,      देखू‌ँगा   आजाद  मगन ||


राम यहाँ आदर्श रतन  , राम   यहाँ  हैं सबके मन |

तन-मन-धन सब रामामय , राम हमारे यहाँ सुजन ||

भाषा बोली गले मिलन , राम-राम मुख  यहाँ वचन |

रखें राम को सदा निकट , राम   हमारे मन के धन ||


सुभाष सिंघई

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मुक्तक 

आज धर्म का मर्म सहज, लोग न करते कभी मनन |

बहुत दिखावा चलता अब , धर्म बनाया है निज धन |

आच्छादित है आडम्बर, स्वयं साधु अब करते छल -

वर्तमान  है  ऐसा  जब , आगे   होगें    कैसे   जन  |


भीष्म पितामह रहते चुप , चीर   द्रोपदी जहाँ हरण |

हों अधर्म के काज सहज , वहाँ  फैलते  पाप चरण |

अभिमन्यू योद्धा बिन जल, मरा समर में जब घिरकर - 

पापी बनकर कर्ण सहज , करे मौत का यहाँ  वरण |


द्रोड़ाचार्य खड़े गुरुवर ,   जहाँ   पाप  का‌  है  मंडप  |

कहें कृष्ण तब यह जाकर , क्षीर्ण आपका पूरा तप |

गुरुवर ज्ञानी भी होकर, किया पाप है  खुद चलकर -

अब प्रयास सब हुए विफल ,नहीं  बचाए कोई  जप |


अब भी हैं धृतराष्ट्र यहाँ ,  पुत्र  बनाते  हैं  कुलकर |

सबकी रहती यह चाहत, बेटे की जय‌ हो खुलकर |

जाल बिछाते नेता अब , तिकड़म  बेटे की खातिर - 

खुश होते कुर्सी देकर  ,  चाल सिखाते हैं छुपकर |

गीतिका   (अपदांत)

मिले मोल अब अपनापन , खुले आम अब  बिके जहर |

रहे   सोचता गंगा जल ,   तारूँ अब   मैं   कौन    शहर |


गीत गवैया  डगर-डगर ,    सबकी  अपनी  नई ग़ज़ल , 

पर है   तुकतान   नदारद , मिलती  जिनमें नहीं   बहर | 


भाईचारा    है    गायब  ,    सभी   सयाने ‌ लगते अब, 

दुनिया भी रह जाती चुप , तांडव  करता जहाँ  कहर |


जाते अपने  जहाँ  बदल , घात मिलेंगी ‌ तब  प्रति पल , 

ठुकराएगें  वह  सागर ,   राह   चलेंगे    जहाँ    नहर |


लोग करे मनमानी अब , अलग   दिखाते   हैं  मंजर ‌, 

कपटी  करते दिखें मदद , बात   करेंगे ‌  वहाँ   ठहर |


नहीं वफा का मान सनम ,   है मनमर्जी का  आलम , 

नहीं प्यार की बातें  अब ,   सन्नाटा   है  सभी   प्रहर |


कसमें-वादे टूट बिखर , गए  लौट सब   अपने  दर  , 

दुल्हन  रोती   आई   घर , छोड़ा अपना सभी महर |

सुभाष सिंघई

~~~~~~~~~~~~~~~~

गीतिका - गुरु चरणों में आता चल , 

समांत - आता , पदांत - चल 

भटक रहा है क्यों मानव ,        गीत मनोहर गाता चल |

करने अपने सुंदर पल,    सिर  गुरु चरण झुकाता चल |


जहाँ उठाते आज नजर ,  राग-द्वेष के दिखते नभ , 

तुझे अगर है घबराहट ,  छाया  गुरु की पाता चल |


तेरा जब से हुआ जनम , पाया  तूने सदा भरभ , 

सच्चा दर्शन करने अब , श्रद्धा शीष झुकाता चल |


किसने देखा है ऊपर ,       या देखा   कोई  रहवर , 

कृपा सामने गुरु भू पर ,  जिसको तू अपनाता चल |


कहे 'सुभाषा' यहाँ कथन , करता गुरु को सदा नमन , 

तू भी सच्ची राह पकड़,  गुरु को सदा बुलाता  चल |

सुभाष सिंघई

~~~~~~~~~~~~~~~~~~

गीत -   ‌‌‌गीत बनाकर गाता चल  

सपनों  को  भी  पूरा   कर , हल सबको बतलाता चल |

दुनिया में   अपने   अनुभव ,   गीत बनाकर गाता चल |


जहाँ पसीना निकले  तन  , मानों उसको अपना  धन  |

कहता जाता वह बहकर , रखो   इसी से  अपनापन  ‌||

तेरी चाहत  हो मेहनत‌  , जिसका  होगा   मीठा  ‌‌फल |

जीत भरोसा रखना  तुम ,  आज नहीं तो होगी कल ||


करे परिश्रम जो भी नर ,    वह   ही पाता    जाता  हल |

दुनिया में  अपने  अनुभव ,  गीत   बनाकर गाता  चल ||


अपने   और  पराए  जन , आ  जाएँगे   सभी   निकट |

करें लाभ की चर्चा शुभ , नहीं  समस्या   रहे   विकट ||

दिखलाएँ सब अपनापन , धुली   दिखाएँ   सब चादर |

बिखरा देगें बोल मधुर ,  देगें   स्वारथ   वश    आदर ||


हो सकते हैं कुछ सज्जन ,    और.   सामने  होगें  खल |

दुनिया में  अपने  अनुभव ,  गीत   बनाकर गाता  चल ||


सज्जन  भी  रहें  नदारद , मिलने  आएँ  जग के ठग |

बोलेंगे  कुछ यह आकर ,     साथ   चलेंगे  तेरे   मग ||

धोखा देंगे पग-पग पर ,  चलना    कर   देंगे मुश्किल | 

छोड़ेंगे  वह  तेरा   कर   ‌, चोटें   वह  देंगे  तिल- तिल ||


चलते रहना साहस रख     , कायम रखना अपना बल |

दुनिया में  अपने  अनुभव ,  गीत   बनाकर गाता  चल ||

सुभाष सिंघई 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


61 -चौपाई विधान और ल़य दुर्घटना (सउदाहरण)

एक प्रश्न आया कि चौपाई में #आठवी_नौवीं_संयुक्त_मात्रा_में
 #लय_दुर्घटना  क्या है ??
#समाधान 👇👇 

चौपाई छंद #चौकल और #अठकल के मेल से बनता है।
 समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।मात्रा बाँट निम्न है। 
4-4-4-4,      8-8,    4-4-8,       8-4-4.     4-8-4,
इनमें देखें तब 
4-4-4-4,      8-8,    4-4-8,       8-4-4. में योग तो दो अठकल के ही बन रहे हैं | पर हम चर्चा करते हैं - 👉  4-8-4, की।

 अठकल  बनते हैं 👉-- 44.   332    35.
से... 

जय हनुमान ज्ञान गुन  सागर 
का विशेष उदाहरण आठवीं नौवीं संयुक्त मात्रा में आता है , फिर भी लय है , सभी स्वीकार भी करते हैं क्योंकि  4 8 4 है!!

जय‌ हनु मान ज्ञान गुन सागर 
  जय हनु =4.      मान ज्ञान गुन 8      सागर 4 

कोई लय  दुर्घटना  नहीं हैं ,और 4 8 4 है व हनुमान उच्चारण करने पर हनु मान दो भागों में उच्चारित होता है 

पर हर कोई तुलसीदास जी नहीं हैं, कि लय सम्हाल ले जाएँ ,
देखा-देखी  आठवीं नौवीं को,  मित्र गण संयुक्त कर देते हैं।

 जैसे-  #बड़े_दयालु_वीर_बजरंगी
            3.   4.  ‌ 3.    2.  4 = 16 मात्रा गिन लीजिए 
  व आठवीं नौवीं संयुक्त  है  , कलन पाठक गण मिलाते रहें |

अब इसे चौपाई की 484 की मात्रा बाँट में ले जाएँ 

बड़े  दया लु +वी   र + बज  रंगी 
  3.   3.     3.         3.        4.   = चार त्रिकल एक साथ आ रहे ×××

अब इसे  (" ले जोड़ा की फौज"  या "भानुमति के पिटारे " ) से सही सिद्ध करते हैं।
बडे +द.    यालु  वीर  बज . रंगी
      4.       3.     3.   2.      4  =    4 8 4 बाँट हो गया 
बड़े + द    से जगण बन रहा है , पर तर्क हेतु खंडित जगण है। 

बस इसे ही  "लय दुर्घटना " कहते हैं 🙏 क्योंकि ""  बड़े दयालु"' 
 गेय करने के बाद प्रवाह में थोड़ा रुकना पड़ेगा , तभी " वीर बजरंगी " गेय आगे बढ़े़गा |
पर एफ बी पर मित्र  मात्रा गिनाते हैं।
प्राचीन कवि लय से चलते थे | 

इसीलिए विद्वान आठवीं नौवीं संयुक्त करने से वचाव का परामर्श देते हैं | बहुत कुशल जन ही आठवीं नौवीं संयुक्त  करके लय ला पाते हैं 

पिछले दिनों एक तथाकथित आचार्य जी ने भी अपने दोहे के 
पंचकल प्रारंभ चरण को ऐसे ही ""ले जोड़ा कि फौज"" से कलन बनाए थे | 

यह आलेख किसी विशेष पर उल्लेखित नहीं किया गया है , आए प्रश्न का उत्तर हैं।
जो सबके लिए उपयोगी हो सकता है। इसीलिए प्रकाश  डाला है। 
स्वीकार  या अस्वीकार करना पाठक  / कवि मित्रों का अधिकार है |
सादर - सुभाष सिंघई

~~~~~~

कुछ कवि मित्रों को देख रहा हूँ कि चौपाई‌ विधान में ही भ्रमित हैं। 
चौपाई छंद ( संक्षिप्त विधान पुनः समझें)👇👇
 चार चरण, 16 मात्रा प्रति चरण 
#चरणान्त में चौकल -  22.   211.     112.     1111
#कलन - अठकल  + अठकल 
#अठकल -   332    या 44.   या 35 
#लय_दुर्घटना 🥰🙏 जब आठवीं नौवी मात्रा संयुक्त होने लगे।

लोभी धन का+  ढेर लगाता | 
पास नहीं सं + तोषी माता ||
हाय-हाय में +. खुद ही पड़ता |
दोष सुभाषा + सिर पर मढ़ता ||

कहीं -कहीं नग+ दी में जुटता | 
कभी उधारी +. करके लुटता ||
कभी सृजन ‌हो + जाता भारी | 
कहीं सृजन में +  बंटाधारी ||

ग्रीष्म ताप को +चढ़े जवानी |‌
 बने प्यार का +बादल दानी |
रोम-रोम में +खिले कहानी | 
बरसे जब भी + पहला पानी | 

( यह चौपाई चाल का ,/कलन उदाहरण है 
~~~~~~~~~

चौपाई छंद विधान (मात्रिक छंद परिभाषा)

चौपाई छंद 16 मात्रा का छंद है। यह चार चरणों का सम मात्रिक छंद है। चौपाई के दो चरण अर्द्धाली या पद कहलाते हैं। जैसे-

“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।।”

ऐसी चालीस अर्द्धाली की रचना चालीसा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके एक चरण में आठ से सोलह वर्ण तक हो सकते हैं, पर मात्राएँ 16 से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। चरणान्त गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

चौपाई छंद चौकल और अठकल के मेल से बनती है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।
4-4-4-4,      8-8,    4-4-8,    4-8-4,     8-4-4

चौपाई में कल निर्वहन केवल चतुष्कल और अठकल से होता है। अतः एकल या त्रिकल का प्रयोग करें तो उसके तुरन्त बाद विषम कल शब्द रख समकल बना लें। जैसे 3+3 या 3+1 इत्यादि। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।

चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं।

(1) चौकल में पूरित जगण (121) शब्द, जैसे विचार महान उपाय आदि नहीं आ सकते।
(2) चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता।
चौकल में 3+1 मान्य है परन्तु 1+3 मान्य नहीं है। जैसे ‘करो  न’ न करो अमान्य है । ‘करो न’ पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है। 

3+1 रूप खंडित-चौकल कहलाता है जो चरण के आदि या मध्य में तो मान्य है पर अंत में मान्य नहीं है। ‘करे  न कोई’ से चरण का अंत हो सकता है ‘कोई करे न’ से नहीं।

अठकल = 8 – अठकल के दो रूप हैं। प्रथम 4+4 अर्थात दो चौकल। दूसरा 3+3+2 है जिसमें त्रिकल के तीनों (111, 12 और 21) तथा द्विकल के दोनों रूप (11 और 2) मान्य हैं।

(1) अठकल की 1 से 4 मात्रा पर और 5 से 8 मात्रा पर पूरित जगण – ‘सुभाष ’ ‘सदैव ‘प्रकाश’ जैसे शब्द नहीं आ सकते।
(2) अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। आप करो जप  सही है जबकि ‘जप आप करो ’ गलत है क्योंकि आप  शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।

चौपाई में अंजनेय  छंद 
यदि चौपाई के चारों चरण , 11 वर्ण के बन जाए , तब उसे अंजनेय / आंजनेय / हनुमत छंद कह सकते है 

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
म०प्र०

चौपाई विधान और ल़य दुर्घटना 

एक प्रश्न आया कि चौपाई में #आठवी_नौवीं_संयुक्त_मात्रा_में
 #लय_दुर्घटना  क्या है ??
#समाधान 👇👇 

चौपाई छंद #चौकल और #अठकल के मेल से बनता है।
 समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।मात्रा बाँट निम्न है। 
4-4-4-4,      8-8,    4-4-8,       8-4-4.     4-8-4,
इनमें देखें तब 
4-4-4-4,      8-8,    4-4-8,       8-4-4. में योग तो दो अठकल के ही बन रहे हैं | पर हम चर्चा करते हैं - 👉  4-8-4, की।

 अठकल  बनते हैं 👉-- 44.   332    35.
से... 

जय हनुमान ज्ञान गुन  सागर 
का विशेष उदाहरण आठवीं नौवीं संयुक्त मात्रा में आता है , फिर भी लय है , सभी स्वीकार भी करते हैं क्योंकि  4 8 4 है!!

जय‌ हनु मान ज्ञान गुन सागर 
  जय हनु =4.      मान ज्ञान गुन 8      सागर 4 

कोई लय  दुर्घटना  नहीं हैं ,और 4 8 4 है व हनुमान उच्चारण करने पर हनु मान दो भागों में उच्चारित होता है 

पर हर कोई तुलसीदास जी नहीं हैं, कि लय सम्हाल ले जाएँ ,
देखा-देखी  आठवीं नौवीं को,  मित्र गण संयुक्त कर देते हैं।

 जैसे-  #बड़े_दयालु_वीर_बजरंगी
            3.   4.  ‌ 3.    2.  4 = 16 मात्रा गिन लीजिए 
  व आठवीं नौवीं संयुक्त  है  , कलन पाठक गण मिलाते रहें |

अब इसे चौपाई की 484 की मात्रा बाँट में ले जाएँ 

बड़े  दया लु +वी   र + बज  रंगी 
  3.   3.     3.         3.        4.   = चार त्रिकल एक साथ आ रहे ×××

अब इसे  (" ले जोड़ा की फौज"  या "भानुमति के पिटारे " ) से सही सिद्ध करते हैं।
बडे +द.    यालु  वीर  बज . रंगी
      4.       3.     3.   2.      4  =    4 8 4 बाँट हो गया 
बड़े + द    से जगण बन रहा है , पर तर्क हेतु खंडित जगण है। 

बस इसे ही  "लय दुर्घटना " कहते हैं 🙏 क्योंकि ""  बड़े दयालु"' 
 गेय करने के बाद प्रवाह में थोड़ा रुकना पड़ेगा , तभी " वीर बजरंगी " गेय आगे बढ़े़गा |
पर एफ बी पर मित्र  मात्रा गिनाते हैं।
प्राचीन कवि लय से चलते थे | 

इसीलिए विद्वान आठवीं नौवीं संयुक्त करने से वचाव का परामर्श देते हैं | बहुत कुशल जन ही आठवीं नौवीं संयुक्त  करके लय ला पाते हैं 

पिछले दिनों एक तथाकथित आचार्य जी ने भी अपने दोहे के 
पंचकल प्रारंभ चरण को ऐसे ही ""ले जोड़ा कि फौज"" से कलन बनाए थे | 

यह आलेख किसी विशेष पर उल्लेखित नहीं किया गया है , आए प्रश्न का उत्तर हैं।
जो सबके लिए उपयोगी हो सकता है। इसीलिए प्रकाश  डाला है। 
स्वीकार  या अस्वीकार करना पाठक  / कवि मित्रों का अधिकार है |
सादर - सुभाष सिंघई

~~~~~~

कुछ कवि मित्रों को देख रहा हूँ कि चौपाई‌ विधान में ही भ्रमित हैं। 
चौपाई छंद ( संक्षिप्त विधान पुनः समझें)👇👇
 चार चरण, 16 मात्रा प्रति चरण 
#चरणान्त में चौकल -  22.   211.     112.     1111
#कलन - अठकल  + अठकल 
#अठकल -   332    या 44.   या 35 
#लय_दुर्घटना 🥰🙏 जब आठवीं नौवी मात्रा संयुक्त होने लगे।

लोभी धन का+  ढेर लगाता | 
पास नहीं सं + तोषी माता ||
हाय-हाय में +. खुद ही पड़ता |
दोष सुभाषा + सिर पर मढ़ता ||

कहीं -कहीं नग+ दी में जुटता | 
कभी उधारी +. करके लुटता ||
कभी सृजन ‌हो + जाता भारी | 
कहीं सृजन में +  बंटाधारी ||

ग्रीष्म ताप को +चढ़े जवानी |‌
 बने प्यार का +बादल दानी |
रोम-रोम में +खिले कहानी | 
बरसे जब भी + पहला पानी | 

( यह चौपाई चाल का ,/कलन उदाहरण है 

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चौपाई छंद विधान (मात्रिक छंद परिभाषा)

चौपाई छंद 16 मात्रा का छंद है। यह चार चरणों का सम मात्रिक छंद है। चौपाई के दो चरण अर्द्धाली या पद कहलाते हैं। जैसे-

“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।।”

ऐसी चालीस अर्द्धाली की रचना चालीसा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके एक चरण में आठ से सोलह वर्ण तक हो सकते हैं, पर मात्राएँ 16 से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। चरणान्त गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

चौपाई छंद चौकल और अठकल के मेल से बनती है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।
4-4-4-4,      8-8,    4-4-8,    4-8-4,     8-4-4

चौपाई में कल निर्वहन केवल चतुष्कल और अठकल से होता है। अतः एकल या त्रिकल का प्रयोग करें तो उसके तुरन्त बाद विषम कल शब्द रख समकल बना लें। जैसे 3+3 या 3+1 इत्यादि। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।

चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं।

(1) चौकल में पूरित जगण (121) शब्द, जैसे विचार महान उपाय आदि नहीं आ सकते।
(2) चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता।
चौकल में 3+1 मान्य है परन्तु 1+3 मान्य नहीं है। जैसे ‘करो  न’ न करो अमान्य है । ‘करो न’ पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है। 

3+1 रूप खंडित-चौकल कहलाता है जो चरण के आदि या मध्य में तो मान्य है पर अंत में मान्य नहीं है। ‘करे  न कोई’ से चरण का अंत हो सकता है ‘कोई करे न’ से नहीं।

अठकल = 8 – अठकल के दो रूप हैं। प्रथम 4+4 अर्थात दो चौकल। दूसरा 3+3+2 है जिसमें त्रिकल के तीनों (111, 12 और 21) तथा द्विकल के दोनों रूप (11 और 2) मान्य हैं।

(1) अठकल की 1 से 4 मात्रा पर और 5 से 8 मात्रा पर पूरित जगण – ‘सुभाष ’ ‘सदैव ‘प्रकाश’ जैसे शब्द नहीं आ सकते।
(2) अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। आप करो जप  सही है जबकि ‘जप आप करो ’ गलत है क्योंकि आप  शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
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62- चौपाई में अंजनेय  छंद 
यदि चौपाई के चारों चरण , 11 वर्ण के बन जाए , तब उसे अंजनेय / आंजनेय / हनुमत छंद कह सकते है 
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62 -अंजनेय / आंजनेय / हनुमत छंद 

अंजनेय छंद/ आंजनेय / हनुमत छंद,  शास्त्रीय वर्णिक  छंद है जो , संस्कृत साहित्य में  सर्व सिद्ध मनोकामना छंद मंत्र है | 

यह छंद  विशेषकर  श्री हनुमान जी  की  वीरता, शक्ति -भक्ति स्तुति में किया जाता है , किंतु हनुमान जी के ही आराध्य भगवान श्रीराम - सीता  ,  शिव , दुर्गा -  या  किसी भी इष्ट की स्तुति  या किसी धर्म  कथा /आध्यात्मिक तथ्य कहने में प्रयुक्त करना भी उचित है  |

शृंगार या अन्य राजनैतिक / सामाजिक / हास्य व्यंग्य  प्रायोजनों में अंजनेय छंद का प्रयोग नहीं करना चाहिए |🙏

संरचना-एक पद में  11 वर्ण की ‌ संरचना , चार पद , दो- दो पद या चारों पद सम तुकांत 

 संज्ञान -घनाक्षरी की तरह वर्णिक नियमानुसार,    मात्रा  लघु हो अथवा दीर्घ हो , भार एक ही अक्षर/वर्ण गिनें , व आधा अक्षर की गिनती ही न करें |

 उचित प्रयास संरचना से 11 वर्ण  ,  चौपाई‌ मात्रा भार  व कलन में बहुत अच्छी तरह ढल जाते  हैं |

तुलसीकृत रामचरितमानस में कई चौपाईयों का कोई एक  चरण 11 मात्रा में हैं | पर इस अंजनेय छंद चौपाई में सभी चरण 11 वर्ण में ही रचित होते है‌ं   , तभी इसे अंजनेय छंद  चौपाई  कहा  है |
 
मैनें  ने भी बड़े श्रद्धा भाव से , स्वान्ताय सुखाय हित यह / आंजनेय  /हनुमत/ अंजनेय छंद चौपाई लिखा है | 🙏

वंदना माँ शारदे 

कृपा सिंधु  शुभ शारद माता |
हर अक्षर   की  ज्ञान  प्रदाता ||
भाव जहाँ पर कवि का आता |
तुमको   सम्मुख अपने पाता ||1

वंदना श्री गणपति जी की 

गणपति बप्पा  आप सहारे |
प्रथम पूज्य जग में हो न्यारे |
भगत जहाँ चरणों में आता ||
उसको तुम हो बुद्धि  प्रदाता | 2

सुभाष सिंघई
~~~~~~~~~~~~~
जय हनुमते नम: 
अंजनेय छंद  चौपाई  ( विधान 11 वर्ण )

 """"" अंजनेय चालीसा """"""

दोहा - 
बजरंगी को कर नमन, मन में  भर  आनंद  |
पढ़ता ग्यारह वर्ण का  , अंजनेय शुभ छंद ||

जय‌     देवा  हनुमान  हमारे |
राम चंद्र को तुम अति  प्यारे ||
भक्त विनय से  जहाँ  पुकारें |
आकर संकट आप   निवारें || 1

चैत्र शुक्ल तिथि पूनम जानो |
प्रकट हुए श्री मारुति  मानो ||
लाल सूर्य फल लख हर्षाए |
कोतूहल वश मुख में लाए || 2

लगे   देवता  सब   घबराने |
चले इंद्र   भी तब  समझाने ||
यहाँ   बालहट  मारुति पाए |
देव   इंद्र तब  वज्र  चलाए  || 3

पवन देव तब  गुस्सा   भारी |
थम जाती यह  दुनिया सारी ||
सबने मिलके   विपदा टारी |
हनुमत को   वर देते  भारी ||4

बालापन  में   हनु  अवतारी |
लीला नटखट   करते न्यारी  ||
मिला श्राप तब भूला बल है |
याद कराया निकला हल है | 5

मातंगी गुरु कुटिया आकर | 
ज्ञानी होते  गुरुकुल पाकर ||  
पवन देव से    सीखा उड़ना |
कद ऊँचाई  घटना -बढ़ना ||6

बचपन से   यौवन   में  आते |
सहज साथ  सुग्रीव  निभाते ||
सोचें    हनुमत    राम पधारें  |
सेवा  हित वह  राह  निहारें || 7

महाबली    काका  थे  बाली |
अभिमानी वह  वानर आली ||
गदा युद्ध में   जब  वह हारे‌ |
बोले‌ मारुति तुम‌‌‌  सच न्यारे  || 8

राम चंद्र  पर    संकट  आया |
खोकर सीता अति दुख पाया ||
मिलते  जब हैं   श्री  बजरंगी |
सुनते   घटना   बनते     संगी || 9

सचिवालय‌ सुग्रीव  सम्हाला |
वानर कुल को दें उजियाला ||
रामादल में शामिल   करते |
तेज प्रताप सभी में भरते || 10

सौ योजन सागर का  लँघन |
कौन  करेगा इसका  मर्दन ||
राम नाम   करके जयकारा |
हनुमत छूते  लंक  किनारा || 11

बजरंगी अब  खोजें  सिय को |
रामचंद्र प्रभु  भोली  प्रिय को ||
मिले वाटिका सिय से जाकर |
लंक जलाते  पूँछ  घुमाकर  || 12

शक्ति लखन से करती क्रीड़ा |
रामचंद्र  मन   बसती   पीड़ा ||
आप    कपीश्वर  ब्रह्मचारिणे |
लखन  लाल  के  बने तारिणे ||13

द्रोणागिरि  संजीवन  लाकर |   
प्राण बचाते  उनके   आकर  ||
शोक निवारक   सबने जाना |
दुख भंजक भी सबने  माना  ||14

अहिरावण ने जाल  बिछाया |
राम लखन  पाताल  छिपाया ||
जाकर   हनुमत  तोड़ें   रेखा |
पंच दीप  जब जलते  देखा || 15

पंचमुखी   हनु  रूप   बनाते |
एक साथ सब ‌  दीप  बुझाते ||
दैत्य वहाँ  से  तब   ही  हटते |
द्वय भ्राता  के  बंधन कटते ||16

हयग्रीवा - नरसिंह  सुजाना |
वाराह- गरुङ -श्री  हनुमाना ||
पंचमुखी  बन काज संँवारा | 
राम नाम  देकर  जयकारा  ||17

बनते हैं  कपि  सेना  नायक |
रामा दल होता  सुख दायक ||
चलता  रण  भीषण  संहारा |
और  राम तब  रावण   मारा || 18

जनक नंदिनी सम्मुख आते |
माता कहकर  शीष नवाते || 
जीत   सूचना  देकर  झुकते  |
राम नाम की  महिमा  कहते ||19

पूज्य  कपिश्वर अंजनिलाला |
जनक केसरी सुत हैं  आला ||
रामदूत शुभ  जग में   नामी |
कहें भक्त जन तुमको  स्वामी ||20 

वानराय   लंकापुर     दाहक |
भक्त  विभीषण के संवाहक ||
वज्रकाय‌    हैं  हनुमत  वीरा | 
भगत जनों की हरते  पीरा || 21

महावीर कपि   संकट  हर्ता |
बनते ‌ सिय अन्वेषण कर्त्ता ||
रुद्रवीर्य   शिक्षक  उन्नायक |
सत्य पराविद्या शुभ दायक || 22

आप धर्म के ध्वज संवाहक |
हो अधर्म के जग में दाहक ||
परम प्रतापी  दंडक ‌  धारी |
सभी ग्रहों के तुम अधिकारी || 23

सर्व  लोक में   सदा विचरते | 
भक्त जनों के दुख को हरते ||
राम नाम भी  जिससे सुनते |
कृपा बाँटने  उसको  चुनते || 24

तत्व ज्ञान शुभ  आप  प्रदाता |
छल माया‌वी निकट न आता || 
बाग   अशोका   मर्दन  करते |
सभी   राक्षस  भगते   डरते || 25

सिया मुद्रिका  सहज  प्रदाता |
रखा  पुत्र  का  सुखकर नाता ||
राम   नाम  शुभ  तन   सिंदूरी |
हृदय चीर में    छवि  है  पूरी || 26

जिसके मन में घोर निराशा |
परम शौर्य की तुम‌से आशा ||
सर्वतंत्र रुपणे जग   स्वामी |
चिरनजीवने तुम हो   नामी ||27

हरिमर्कट   हो मन से ‌रामा  |
कालनेमि पर अंतिम नामा ‌||
महाबली तुम  ज्ञान प्रतापी |  ‌ 
दीनबंधु हो चहुँदिश व्यापी ||28

आप अनघ है  श्री   बजरंगी |
तत्त्वगम्य  बोधक  सतसंगी ||
कामरूपिणे  विद्या  सहचर |
आप महात्मा‌ आते बनकर || 29

पांडव भीमा के हो  गुरुवर  |
ज्ञान  बाँटते   बैठे   तरुवर ||
अर्जुन रथ के ध्वज में आए |
धर्मयुद्ध रण , लख   हर्षाए ||30

विनय‌ बुद्धि शुभ  विद्या दाता |
अष्टसिद्धि नवनिधि के ज्ञाता |।
मात सिया के यह  वर जानो | 
राम कृपा शुभ   इसमें मानो || 31

लंका में शनि करते  क्रंदन |
काटें  तब   बजरंगी बंधन ||
वचन तभी से  शनि ने हारा |
भगत आपके करूँ किनारा || 32

शनि देवा अब तुमको मानें |
नाम सुने वह महिमा जानें ||
जहाँ आपका सहज बसेरा |
त्यागें शनि  हैं उस  घर डेरा  || 33

निकट न आवें भूत पिशाचा |
जहाँ  नाम    बजरंगी वाचा ||
राम  नाम जो  सहज उचारे |
बजरंगी तब   बनें    सहारे ||34

हनुमत का  जो   होता  वंदन |
भक्ति भाव का यदि हो चंदन ||
पुण्य उसी क्षण घर  आते  हैं |
सिया-राम  मय जग पाते  हैं ||35

विनय      हमारी   तेरे   चरणा |
चाहूँ  हनुमत   तेरी      शरणा ||
रोग शोक हों    सभी निवारण |
आदि व्याधि भी सब हों तारण ||36

लिखे छंद सब  श्रद्धा  कारण |
ध्यान न   देना प्रभु उच्चारण ||
भाव पुष्प का   करूँ समर्पण |
कथा तुम्हारी   तुमको अर्पण ||37

छंद पढें   हम  यह चालीसा |
करें कृपा भी  तब जगदीशा ||
कलयुग में    हैं श्री  बजरंगी | 
भगत जनों के  बनते   संगी ||38

राम चरण  के बनना  अंगी  |
एक  सहारा  तब  बजरंगी ||
विनती कौशिक और सुभाषा |
रोग दूर हो   यह अभिलाषा || 39  

हनुमत छंद लिखे जो देवा |
स्वीकारो भगवन यह सेवा ||
करे सुभाषा  तुमसे विनती |
सेवक जन हो  मेरी गिनती || 40 

दोहे 
बजरंगी अब   मेटिए , जग के सब संताप |
राम नाम रक्षा करे , यह   वर  दीजे  आप ||🙏

एक भरोसा आप हैं     , विनती  करे  सुभाष  |
धाम मिले श्री राम का, उजला नवल प्रकाश ||🙏
   *****               ****†

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श्री हनुमान जी महाराज के 108 नामों से कुछ नाम चालीसा में प्रयोग किए हैं , जैसे ---
  वानराय ,   रुद्रवीर,  सत्यपराविद्या , सर्वतंत्ररुपणे
चिरनजीवने,  हरिमर्कट,  अनघ ,कामरूपिणे,  तत्वगम्यबोधक
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सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०   
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श्री अंजनेय जी की आरती  (अंजनेय छंद में )
16 मात्रा / 11 वर्ण

करूँ आरती श्री हनुमत की |
सियाराम पद सेवा रत  की ||

राम  भक्त हैं   अनुचर संगी |
बलशाली श्री जय बजरंगी ||
कंटक प्रभु के सभी  हटाए |
लखन भ्रात के प्राण बचाए ||

राम नाम श्री  प्रभु चाहत की |
करूँ आरती श्री हनुमत की ||

राम लखन से जहाँ  मिले थे |
उसी मार्ग तब फूल खिले थे ||
तब  निवास   सुग्रीव  गए थे |
मित्र मिलन   संदेश  नए थे ||

ऋष्यमूक श्री  शुभ पर्वत की |
करूँ आरती श्री हनुमत की ||

सियाराम को  हृदय बसाते |
सीना चीर सहज दिखलाते ||
सहन राम से कभी न दूरी |
प्रेम मगन   बनते सिन्दूरी ||

राम कृपा धारित मस्तक की |
करूँ आरती श्री हनुमत की ||

रामाज्ञा से  कलयुग  रहते  | ‌ 
राम भक्त के संकट  हरते ||
रामकथा में   सहज पधारें |
भगत जनों के भाव निहारें ||

करें सुरक्षा  सब आगत की |
करूँ आरती श्री हनुमत की ||

करे आरती   नमन "सुभाषा" |
चाहे हर  पल सदा  प्रकाशा ||
अंजनेय यह   आरति  गाई |
हनुमत  हौवें    सदा  सहाई ||

लाज रहे अब   मेरे नत   की |
करूँ आरती श्री हनुमत की ||

सुभाष सिंघई
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संकेत - अंजनेय छंद से सिर्फ इष्ट आराधना करें 

है यह "हनुमत" छंद न्यारा |
आराधन हित एक सहारा ||
किसी इष्ट को सहज मनाने |
छंद रचें  सब  यही  सुहाने  ||

ग्यारह अक्षर   शुभ   चौपाई |
छंद सृजन  जानो  सुखदाई ||
अंजनेय  यह   छंद  सुहाना |
किसी इष्ट को सहज मनाना ||

बना भक्ति को मिलता वर्णन |
है निषेध   भी अन्य प्रयोजन ||
नहीं निवेदन   जो यह  माने |
क्या कह दूँ वह अपनी जाने ||

हमने  इसकी महिमा  जानी |
कर प्रयोग ही  यहाँ बखानी ||
‌और मंच  पर  इसको लाया |
छंद महल को धन्य बनाया ||

आयोजन में विनय‌‌ लिखी है |
पढ़ने सबको  खूब दिखी है ||
किसी इष्ट का जब हो वंदन |
भक्ति भाव से करना अर्चन ||

गीत भजन भी  पूजा अर्चन |
कथा कहानी महिमा वर्णन ||
और आरती विनय सुनाओ |
शेष प्रयोजन किंतु न लाओ ||🙏

सुभाष सिंघई

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माँ दुर्गा स्तुति (अंजनेय छंद चौपाई  ) 11 वर्ण के चार पद 

नमन करें हम     दुर्गा माता |
नवम् रूप  का   दर्शन पाता ||
पुण्य पुष्प भी मन में खिलते 
संतोषी   फल आकर मिलते ||  1

चरणों में  जब  तेरी आकर |
करें आरती   दीप जलाकर ||
ताप सभी मन के  मिट‌ जाते |
कृपा आपकी जब हम पाते ||  2

आदि शक्ति माँ तुम कहलातीं |
दुष्ट दलन   को  भू  पर आतीं ||
शुंभ   निशुंभ    निशाचर मारे |
लगे धर्म के   तब   जयकारे ‌||  3

सुभाष सिंघई 
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श्री शिव स्तुति (अंजनेय छंद चौपाई ) 11 वर्ण के चार पद 

भोले  शंकर गेह  हिमालय |
बना बर्फ का रहने आलय ||
कहते शिव को सब कैलाशी |
चाहें दर्शन जगत  निवासी || 1

सिर पर देखी  बहती  गंगा |
औघड़ मन को  रखते चंगा ||
कटि पर देखी है मृग  छाला |
भक्त कहें  सब डमरू वाला || 2

जटा जूट सिर पर है   चंदा |
बम भोला  कहता हर बंदा ||
भसम लगी है  सभी शरीरा | 
है त्रिशूल शुभ  हरने  पीरा || 3

सुभाष सिंघई 
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शिव स्तुति  (गीत) 
(अंजनेय छंद चौपाई  ) 11 वर्ण 

किसने‌  समझा  है   पहचाना |
शिवशंकर को  किसने जाना ||

यहाँ नशा अब प्रश्न  हमारा |
शिवा जोड़कर नाम सहारा ||
खुद पीने जन  आड़ लगाते |
शिव शंकर का नाम बताते ||

नशा करें शिव  किसने  माना |
शिवशंकर को  किसने जाना || 1

सागर मंथन में विष  आया |
शिव शंकर के कंठ समाया |
नही उदर में   वह है आया |
तब संदेशा  जगत  सुनाया || 

नहीं नशा को  हृदय   समाना |
शिवशंकर को  किसने जाना ||2

महादेव   ही  शिव  शंकर है |
भू नभ देवा शुभ  कंकर हैं ||
नहीं   जरुरत  नशा   करेंगे  | 
गलत  तथ्य   संसार कहेंगे  ||

सही तथ्य अब किसको पाना  |
शिवशंकर को  किसने जाना ||3

सुभाष सिंघई 

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ॐ त्र्यम्बकं यजामहे     सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
   *** महामृत्युंजय  मंत्र सृजन गाथा ***
ऋषि  मृकण्ड संतान विहीना |
योग नहीं सुत  प्रभु ने  दीना  ||
करें तपस्या  शिव को जपते |
साथ  उमा का पूजन  करते || 1

देख  तपस्या शिव खुश होते | 
कुछ विषाद से खुशियाँ बोते |
सोलह साल  जिएगा बालक |
आप  बनोगे  इसके पालक ||2

ऋषि ने तत्क्षण वर स्वीकारा |
मिला  मार्क कण्डेय  सहारा  ||
सभी उसे    अल्पायु  ‌चिढा़ते  |
तभी  सोच  वह   मंत्र बनाते  ||3

महामृत्युंजय   मंत्र    बुना है   |
जपते रहना   कर्म   चुना है  ||
महामंत्र की जब ध्वनि छाए  |
यमदूतों  का  बल घट जाए ||4

शिव से बोले  तब   यमराजा |
मंत्र बिगाड़े  यह सब  काजा ||
शिवा कहें   यह मंत्र  घना  है |
शुभ रक्षा शिवमंत्र  बना   है ||5

आयु   बढ़ाकर  रक्षा  करता |
मैं भी  इसके  वश  में रहता ||
हाथ जोड़ते  यम  घर जाते |
महामृत्युंजय  महिमा   गाते ||6

महामृत्युंजय  महिमा  जानो |
शिव आराधन  इसको मानो ||
दीर्घ  आयु यह   मंत्र बनाता |
रोग शोक घर का टल जाता ||7

करे सुभाषा शिव  से  विनती |
अपने गण में  करना गिनती ||
मंत्र जपूँ मैं  शिव  वर   पानें  |
हनुमत छंद  रचा   ही  जानें ||8

🙏|| जय श्री महाकाल ||🙏

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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शनि देव जी काले और विकलांग क्यों हैं ? 
दधीची पुत्र पिप्पलाद की  कथानुसार--
(अंजनेय छंद  चौपाई  ) 11 वर्ण के चार पद 
जहाँ दधीची तन को तजते |
माँस पिंड सब आगी जलते ||
सती वहाँ  पर  पत्नी बनती |
पीपल खोली में सुत रखती || 1

पीपल के फल बने  सहारे |
बड़ा हुआ तब  पुत्र विचारे ||
परिचय मेरा   कौन बताए |
निकले नारद हाल ‌‌सुनाए || 2

महादशा यह  शनि की जानों |
मरण पिता जननी का मानों ||
पिप्पलाद तुम  करो  तपस्या |
मेटो अपनी  सहज  समस्या  || 3

जग ब्रह्मा  जब तप से माने |
पिप्पलाद  ने  यह वर ठाने ||
नयन  हमारे    उसे  जलावें |
आवाहन कर   जिसे बुलावें || 4

ब्रह्मा   वर ने   दिया  सहारा |
पिप्पलाद तब शनि उच्चारा  ||
आँख खोलकर लगे जलाने |
सूर्य  पिता जी  तब घबराने || 5

ब्रह्मा  ने    तब  रोका  जाकर  |
देते फिर  से  दो   वर आकर  ||
बालक पर शनि कभी न आवे |
पीपल  पूजन से  शनि  जावे   || 6

पिप्पलाद  तब   पैर  मारते  |
झुलसे शनि को तभी तारते ||
लँगड़ाते   शनि  धीरे   चलते |
झुलसा काला तन वे  रखते || 7

लिखें  उपनिषद ज्ञानी संता |
पिप्पलाद जी ,तप भगवंता ||
वृहद  ज्ञान  का शुभ भंडारा |
हैं दधीच   सुत  इस संसारा || 8

सुभाष सिंघई

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श्री शिव जी को चम्पा पुष्प क्यों नहीं चढ़ाया जाता है ?
चम्पा का पराग क्यों सूख गया ?
 अंजनेय छंद  चौपाई  ( मुक्तक ) से - 11 वर्ण के चार पद 

चम्पा रानी अति शुभ सुंदर |
खुश्बू रखती मन  के अंदर ||
पर उसके भी   आँसू बहते -
पीड़ा दिखती भरा  समुंदर | 1 

बाँझ भ्रमर भी कह जाता है |
नहीं निकट भी वह आता है |
उसके बिन   शृंगार  अधूरा - 
प्यार नाम पर  इठलाता   है | 2

कथन 'सुभाषा' सुनो कहानी |
नहीं सहज सुख चम्पा रानी |
बिन पराग की  रहती चम्पा - 
भ्रमर न देता  प्यार  निशानी | 3

 चम्पा का पराग क्यों चला गया ?
धार्मिक मान्यता- 

चम्पा थी जब    शिव को प्यारी |
छल    करती   है  उनसे   भारी |
नारद    शापित   करते    चम्पा - 
बिन पराग की  अब  तू    नारी | 4

एक दैत्य था  निपुण   सयाना  |
चाहे शिव   वर   पता ठिकाना |
चम्पा उसको   विधि  बतलाती - 
पुष्प    सौंपती   चुनकर  नाना | 5 

नारद    जी   तब  क्रोधित होते |
चम्पा अतिशय में  दुख   बोते ||
कहते तू  अब    होगी  शापित -
सुनो  शिवा अब  तुझको खोते | 6

अब   पराग से  होगी  वंचित |
करे न भौंरा   तुझको सिंचित |
रोकर  चम्पा  तब अकुलाती -
नारद होते तब ‌ हैं    चिंतित | 7

 (नारद जी से श्रापित चम्पा 
हरि और राधा जी के शरणागत हुई )

हरि   से बोले नारद जाकर  |
पाप हरो अब चम्पा आकर |
हरि कहते जब  होगी  राधा ~
पाप घटेंगे   मुझको पाकर | 8

चम्पा रहती    हरि के चरणा 
और राधिका -मन के शरणा |
भ्रमर बोलता  इसीलिए  ही- 
करूँ नहीं मैं इसका वरणा |

तुलसी जी शिव को नहीं चढ़ती है )

शालिग्राम हरि जग के देवा |
करती‌ं तुलसी  उनकी सेवा |
शिव जी मानें उनको बहिना - 
नहीं बने  तुलसी दल लेवा ||10

(कनेर और कमल भी
 शिव जी स्वीकार नहीं करते है)

रहे  लक्ष्मी  जू   कमलासन |
है कनेर भी  उनको  भावन |
नहीं शिवा को तब ये चढ़ते - 
बेल पत्र ही  तब   आवाहन | 11 

सुभाष सिंघई

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पंचमुखी ब्रह्मा जी का एक शीष कैसे गिरा ? 
केतकी पुष्प रानी को सर्प क्यों डसते है ? 
 (गीतिका )(अंजनेय छंद चौपाई  ) 11 वर्ण 

ब्रह्म केतकी  जगत  कहानी |
चहुँ दिश फैली   यह नादानी ||1

शिव से कहते   ब्रह्मा आकर , 
मापन  हमने  तुम  है  ठानी | 2 

हरि जाएँगे    नभ  में   ऊपर , 
हम करते   पाताल    रवानी | 3

नहीं छोर  ऊपर है   मिलता , 
सच बोलें  हरि  होकर ज्ञानी | 4

ब्रह्मा  तब  षडयंत्र  रचाते , 
कहते हमको  जड़ें दिखानी || 5

झूँठ  गवाही   बनत  केतकी , 
कहती पिंडी जड़ दिखलानी | 6

शीष ब्रह्म का पंचम गिरता ,
झूँठे मुख तब मिटे निशानी | 7

नाग केतकी को अब डसता , 
सपना मिटता बनना रानी | 8

डसते  रहते नाग  केतकी , 
सूरत उसको पड़े छिपानी |9 

चार मुखी अब रहते  ब्रह्मा , 
पंचम सिर का उतरा‌  पानी | 10

नहीं केतकी शिव छूू सकती ,
छूट गई है    शिव रजधानी |11 

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

~~~~~~

अंजनेय छंद  चौपाई  ) 11 वर्ण के चार पद 
(गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ) णमोकार  (णमो = नमो ) पर विशेष , लेखन जो आप एक वार जरुर समझें | 🙏कि यह क्या है ? 

णमोकार  जपते  नर   नारी |
महामंत्र  के  पद  सुखकारी ||
मंत्र अनादी   निधन  पुराना |
पाँच  पदों में  नमन  सुहाना |1

आर्या छंद लिखित यह जानों |
प्राकृत लिपि में लेखन मानों || 
अरिहंत सिद्ध  गुरु आचार्य‌ा | 
उपाध्याय-मुनि चिंतन धार्या  ||2

अठ्ठावन  शुभ  मात्रा गिनती |
मिलें वर्ण पैंतिस की  विनती ||
स्वर मिलते चौतीस   सुहाने |
रहते व्यंजन   तीस   तराने ||3

~~~~~~~
1--- णमो अरिहंताणम् 🙏

सृष्टि नें उन सभी ( एक को नहीं ) भगवानों को नमन हैं 🙏, 
जो पाप रहित है  बुराइयों का अंत कर चुके हैं  (अरिहंत ) है व अपनी इंद्रियों को जीत चुके है / नियंत्रण कर चुके हैं |

णमो  जहाँ है  अरिहंताणम |
निकट   न   रहते  पापातम ||
जिसने तप कर  इंद्री   जीती  |
सहज मोक्ष रस चेतन  पीती||4
,***
2--णमो सिद्धाणम् 🙏

सृष्टि में उन को नमन है 🙏
जो निराकार है  , परम ब्रम्ह सिद्धालय में हैं 

णमो कहें जब श्री सिद्धाणम |
निर्गुण  पूजा करें  यहाँ  हम  || 
सिद्धालय  पर ध्यान लगाएँ |
निजानंद  रस  पूरण  पाएँ  ||5
***
3- णमो आइरियाणम् 🙏

सृष्टि में उन सभी गुरुओं को नमन 🙏 है , 
जो संसार के माया जाल में  न फँसकर , वैराग्य पथ पर अपनी 
आत्मा का कल्याण करते है ,या कर चुके है  व सुयोग्य शिष्य बनाकर उन्हें दीक्षित करते है |

आइरियाणम णमो  सुखारा |
होता गुरु का शुभ जयकारा |
गुरु भी सच्चा  पथ  बतलाते |
और शिष्य सब शीश झुकाते  ||6
***
4-णमो उवज्झायाणम् 🙏

सृष्टि में उन सभी उपाध्यायों को नमन हैं 🙏, जो गुरु संघ में दीक्षित 
साधुओं को पढ़ाते हैं व अपनी साधना करते है या कर चुके हैं 

उपाध्याय जब णमो पुकारा |
पुस्तक पाठन ज्ञान सुधारा ||
गुरुवर जैसे    वें  कहलाते |
गुरू संघ को सहज पढ़ाते ||7
*******
5-  णमो लोए सव्वसाहूणम् 🙏 ? लोए = लोक | सव्व = सभी 

लोए (लोक)  में उन सभी साधुओं को नमन है 🙏 जो आचार्य से दीक्षित होकर , साधु बने उनके बताए पथ पर चलकर अपनी  आत्म साधना करते है या कर चुके हैं |

सर्व साधु को नमन जहाँ है |
भक्ति भावना सहज वहाँ है ||
मंत्र  बना है  शुभ  नवकारा |
णमो करें यह निज  उद्घारा ||8 🙏

विशेष - कह सकते यह मंत्र , किसी एक को स्मरण / नमन नहीं करता , वल्कि उन सभी को स्मरण नमन करता , जो उपरोक्त पात्रता में है , इसीलिए यह मंत्र किसी एक धर्म का संदेश या प्रतीक नहीं है , वल्कि सभी का है |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़
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63-महाचण्डिका  (महाधरणी) छंद) विधान (सउदाहरण )

भागवत जाति का सम मात्रिक छंद है , 
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण ,  अठकल -रगण (8- 5 , 8-5 ) 
दो-दो या चारों पद  सम तुकांत |  
सहजता -  दोहा छंद के दो  विषम चरण से  एक पद बनाता है।
अंतर केवल अठकल के बाद रगण ( 212) की अनिवार्यता है। 
  अर्थात प्रत्येक चरणांत, रगण (212 )के दीर्घ को वाचिक लघु -लघु करना×× निषेध है |
~~~~~~~~~~~~~~~

वंदनाएँ 
महाचण्डिका  (महाधरणी )छंद 
26 मात्रा (13- 13 ) आठ चरण, अर्थात चार पद।
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

नमन करूँ माँ शारदे , छंद  महल   से आरती |
युगल हस्त भी जोड़ते, हम सेवक सब भारती ||
महाचण्डिका छंद का, आयोजन   इस बार है |
कृपा रहे बस आपकी  , पावन यही विचार है ||

गणपति देवा  आइए , मंगल करना काज है |
महाचण्डिका छंद से, यह निकली आवाज है ||
मंगल मूरत आप हैं ,  रिद्धि-सिद्धि के देव जू |
स्वीकारो इस बार भी , छंद महल की सेव जू ||

महाचण्डिका  श्री  नमो ,  दुष्टों   को  संहारतीं |
खंड-खंड कर अंग भी, शुंभ-निशुंभ विनाशतीं ||
कंठ मुंड की  माल भी , खप्पर  ‌कर में धारतीं |
दुष्ट सभी अब नष्ट हों , चारों  तरफ निहारतीं  ||

छंद लेखन के लिए सरलता - 

महाचण्डिका छंद   की , लिखूँ    सरलता  मैं    यहाँ |
विषम चरण दोहा लिखो , ध्यान रखो कुछ जी वहाँ ||
रगण बने यतियाँ जहाँ , सहज  तभी   स्वीकार  लो |
चरण मिलाकर दो यहाँ   , बना  एक  पद  धार  लो ||

सुभाष सिंघई 
~~~~~~~~~~~~~~~
छंद 
महाचण्डिका (महाधरणी )छंद 
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

सबकी अपनी शान है , सबके अपने काफिले |
बढ़ा चले अब लोग हैं , आपस में  ही फासिले ||
दिखते हमको द्वंद भी , बनते सब चालाक हैं|
खाली रहते  हाथ  तो , बन  जाते  बेबाक हैं ||

अभिमानी के पास में , दया कभी मत खोजिए |
नहीं लालची दान दे ,   लेना  भी   मत  सोचिए ||
विषधर तुमको छोड़ दे , पर   कपटी है काटता |
दुग्ध छोड़‌कर  गंदगी ,  काग चोंच से  चाटता  ||

स्वारथ के अब गीत  हैं , नहीं नेह के  नैन हैं | 
हड़प नीति की प्रीति से , रहते सब  बैचैन हैं ||
धोखा   देना जानते , आज यही हथियार हैं |
भाई-भाई साथ हैं ,  पर छल के  व्यापार हैं ||

माल पुराने  को कहें  ,  इसमें  देखो नव्यता |
नए जमाने की रखी , मैंनें  आकर  भव्यता ||
बातों  का   व्यापार  है , लेने  वाला  मानता  |
पर व्यापारी रंग को ,ग्राहक कभी न जानता ||

कुछ कहना बेकार है  , मूरख जब हो सामने |
वह रहता   तैयार   है , सदा  रार  को ठानने ||
चुप रहना ही सीखिए,अवसर को पहचानिए |
मूरख से भिड़ना यहाँ ,खुद को मूरख मानिए ||

लेखन दीन न जानिए,  देता यह  ललकार है |
शब्द बाण ही  मानिए, जिसमें  पैनी  धार है ||
कलम धनुष ही मानना ,जाने लक्ष्य निशान को |
प्रत्यंचा संधान को  ,  जानें  सब  ‌  विज्ञान को ||

अंतस के जब भाव का , कलम बनाती चित्र है  |
शब्द सभी हैं बोलते   , जैसे   महका    इत्र‌  है  ||
यह "सुभाष' नादान है  , नहीं जानता  कौन है | 
महिमा कलम बखानती, तब ही खोले मौन है || 

ज्ञानी  प्रवचन  में  कहे , सब   माया  जंजाल है |
उनकी कुटिया देख लो , बँगला बड़ा विशाल है ||
जो  हमको समझा गए,  दुनिया बड़ी बवाल  है |
उनके घर से ही चले , सबसे घातक  चाल   है ||

सबको  आकर जोड़िए, कहता  अच्छी बात है |
कहने   वाला  तोड़ने ,  लगा हुआ  दिन- रात है ||
खुदा  नहीं  रुपया यहाँ, कहने भर की  बात है |
पर रब से भी कम नहीं, दिखता यह दिन रात है ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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मुक्तक

महाचण्डिका  (महाधरणी )छंद 
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

पैर कुल्हाड़ी    मारते  , पर नेता  को पालते |
मजबूरी में  वोट भी , जाकर उसको डालते || 
जिनको हम ही पालते, करते वही  शिकार हैं - 
रखे द्वार पर  श्वान हैं  ,  दरवाजे से    टालते |

जीवन के दिन चार हैं ,  रटा  खूब  था ज्ञान को |
दो कट झगड़े में गए  , दो  सोंपे   अभिमान को |
जीवन  खोया खेल में ,   किया  स्वयं  बेकार है -
अंत समय पछता  रहे  ,याद  करें भगवान को |

जीवन के दिन चार हैं   ,गुणा न जिसमें  भाग है |
फिर  भी  उसमें  आदमी , पाता -देता   दाग  है |
जीवन मस्ती में कटा , लिया न प्रभु का‌ नाम भी -
फिर  मरघट की राह क्यों , राम नाम  का राग है |

जीवन   के  दिन  चार  हैं, करता संत  सचेत है |
सोने   जैसे    हाथ से   ,थामे   मानव     रेत  है |
जो कहते  थे  हैं  सदा  ,  यारा     तेरे  साथिया -
संकट आया देख के ,    छोड़ गए  सब खेत हैं ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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गीतिका 
महाचण्डिका (महाधरणी) छंद
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

गीतिका , समांत अंग , पदांत हैं

सबके अपने दंभ हैं , अपने- अपने   रंग  हैं |
सीधा सच्चा सामने , उस पर सभी दबंग हैं ||

नहीं  समय पहचानते  , चलना है किस राह में , 
रखे स्वार्थ अब आदमी ,  रिश्ते होते‌‌   भंग  हैं |

गेह  किसी के  झाँकते   ,जाकर भी हैं टोकते  , 
अपने मतलब से सदा , बात   करें  बेढंग   हैं |

समझ न पाते भाव हैं , चलते टेड़ी चाल से , 
बनते  हम हैं  तोपची , खुद ही ज्ञानी गंग हैं |

इस दुनिया की भीड़ में  , सबके अपने नीड़ भी , 
छीना झपटी  है मची , चलती रहतीं   जंग  हैं |

नियत सत्यता नेकता , देखी जिनके पास में  , 
उनको  निश्चित जानिए , मिलती राह अनंग हैं |

है "सुभाष" हर राह में , काँटों का अम्बार भी , 
शूल उन्हीं से दूर हों   , जिनके अच्छे  संग हैं |

सुभाष सिंघई जतारा
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गीतिका 
महाचण्डिका (महाधरणी )छंद
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

गीतिका , समांत स्वर आने  , पदांत आदमी 

पाले  रहते रोग हैं , बहुत   सयाने आदमी |
दूजों को बीमार का  ,  मारें  तानें आदमी ||

टूटी घर में खाट है , पर   दूजों  की झाँकते , 
उसके कटु हालात को , लगते गानें ‌ आदमी |

दुनिया में हम   देखते ,  अलबेले कुछ  लोग हैं , 
जाते मतलब से सदा  ,खाज  खुजानें आदमी |

घर  में  फैली  गंदगी , पर गलियों पर ज्ञान है  , 
कचरा को सरकार में  , नहीं   उठानें  आदमी |

सभी कहें हम श्रेष्ठ हैं , नया जमाना देखते , 
दकियानूसी लोग हैं  , बहुत   पुरानें आदमी |

परदे में घर बेटियाँ ,‌    दूजों की रुखसार हैं , 
इज्जत करते तार  हैं , देख ठिकानें आदमी |

बनते जो दमदार हैं,    डींगें  अपनी    फाँकते , 
जब 'सुभाष' कुछ बोल दे, करें फँसानें आदमी |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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गीतिका

महाचण्डिका  (महाधरणी )छंद
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

लिखता हिन्दी छंद से, महाचण्डिका गीतिका |
हिंदी‌  को पहना रहा, यह  भावों की  प्रीति‌का‌ ||‌

मूँछ काटते   छंद की  , वर्ण  शंकरी  ज्ञान से , 
गुरू बने कुछ  तोड़ते , हैं अब  ताला‌ नीति का |

कलन हटाकर जो कहें, दोहा लिखो समांत जी, 
हैं  गड़बड़ आचार्य जी ,डसते चंदन  रीति का |

नुक्ता  मकता  थोपते , हिंदी ‌ छंद  विधान  में , 
जोड़ जमूरे चार ही , पाचन  करें  ‌अतीतिका   |

चेतो‌  हिंदी  ज्ञानियों , समझो  मेरी  बात भी , 
माता  हिंदी छोड़ के , खाला क्यों है मीतिका |

सुभाष सिंघई

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गीतिका 
महाचण्डिका  (महाधरणी )छंद
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

गीतिका , समांत स्वर - आर.  पदांत - से 

मूरख   बैठा   सामने  , ‌‌बचे  रहें  तकरार  से  |
बे मतलब की रार से, कीचड़  के उस पार से  ||

यह  आया  बदलाव  है , चुप  बैठे अब  हंस हैं ,
नागनाथ से  दूर  हैं  ,  बचे   रहें  फुसकार  से |

न्याय  कटघरे में  खड़ा, मिलता नहीं गवाह है , 
आरोपो की  सुंदरी, फँसा  रही  रुखसार  से  |

बदल  गए अब  देखिए, हिंदी  के विद्वान  भी , 
मूँछ काटते   छंद   की , उर्दू   की  तलवार से |

हिंदी के गण  भूलते , छंद लिखें अरकान से , 
हम कहते उस्ताद जी , तब बनते वह खार से |

बदल गए हालात  हैं , नहीं यहाँ  कुछ सोचना |
चलना सच्ची  राह से, अपने शिष्ट विचार से  ||

कड़वा कहता क्यों सदा, मिर्ची लगती गात में  |
अब "सुभाष " मधु बोलना,बात कहूँ मैं प्यार से   ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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महाचंडिका (महाधरणी )छंद
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

गीत 

स्वाभिमान के साथ में ,वंदे  भारत गान  है |
मेरे  प्यारे  देश   का  , सदा तिरंगा शान है ||

केसरिया  रँग  त्याग का , और बना बलिदान है 
हरित क्रांति का जानिए , हरा   रंग   पहचान है 
श्वेत  शांति  का  दूत  है , नीला चक्र निशान  है 
धर्म चक्र गति मानिए , जो विकास प्रतिमान  है

इसकी रक्षा भी करें  ,  बच्चा  तक  दीवान है |
मेरे  प्यारे  देश   का  , सदा    तिरंगा शान  है ||

खड़ा हिमालय भी कहे, साहस ही प्रतिमान है |
शौर्य पुंज इस देश का,  सीमा खड़ा जवान है ||
करें  परिश्रम   खेत  में , दाता अन्न किसान है |
सबको देने कर्म का ,   फल   देने भगवान है ||

सदा धर्म से कर्म का , यहाँ  प्रमुख ईमान   है |
मेरे  प्यारे  देश   का, सदा  तिरंगा   शान  है ||

अतिथि  देव हम मानते, रहता सबको भान है |
करते  हैं सत्कार  भी, आता  जो  मेहमान  है ||
दूर शिकायत भी  करें , होता गले मिलान   है |
भारत वासी भी सदा,  नेक  दिखे   इंसान है ||

रखते हम सब एकता , मैत्री   यहां  निशान है |
मेरे  प्यारे  देश  का  , सदा  तिरंगा   शान  है ||

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महाचण्डिका (महाधरणी )छंद
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212)

गीत 

शक्कर को ही देखिए   , घुल जाता  मिष्ठान  में  | (मुखड़ा)
नहीं   गुणों को‌  भूलता , आ   जाता  पहचान में || टेक 

सृजन धर्मिता  नष्ट  हो , समझो  वहाँ  अनिष्ट है | अंतरा 
कथ्य  भटकता  सा मिले , कर्म वहाँ  तब भ्रष्ट है ||
लगता अच्छा  है नहीं, खल  को  भी  उपदेश  है |
बस मतलब की बात से , उसका सब परिवेश है ||

पर सज्जन  की बात है ,  रहता सदा विधान में | पूरक 
नहीं   गुणों को‌  भूलता ,  आ जाता  पहचान  में || टेक 

ग्राहक यदि  गुनियाँ  मिले , वहाँ  बेचिए  माल को |
मूरख जब हो  सामने   ,  नहीं  बजाओ  गाल को ||
वचन जहाँ कटुता  भरे,  समझो  उगली   आग है  |
प्रेम  हीन  यह  शूल  है,    जिसमें  नहीं  पराग है ||

बादल भी  कहता  ‌‌सदा ,सहन शीलता   भान में |
नहीं  गुणों  को‌ भूलता , आ  जाता  पहचान   में ||

नागनाथ   से  मित्रता  ,  ‌कीजे  सोच  विचार से  |
मिले दंश उ‌सका  सदा , जहर वमन भी प्यार से  || 
विवश रही हो  मित्रता   ,  मानव   भी लाचार  है  |
घर कागा का था बना,   कोयल का अधिकार है।।

फँस  जाता है आदमी, कभी  किसी अहसान  में |
नहीं   गुणों   को‌  भूलता , आ जाता  पहचान  में ||

*सुभाष सिंघई* 
एम०ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र 
पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई 
जतारा (टीकमगढ़ )म०प्र०
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गीतिका महाधरणी छंद 
26 मात्रा (13- 13 ) चार पद , 
मात्रा बाँट - अठकल- रगण (212) ,  अठकल -रगण (212
गीतिका    ई स्वर , पदांत नुक्कड़   वाली राह में |

मुलाकात भी थी भली , नुक्कड़   वाली राह में |
याद  स्वप्न -सी थी जगी, नुक्कड़  वाली राह में |

आँसू  सूखे थे सभी  ,  वहाँ    पिघलने भी  लगे,
गंगा भी बहने  लगी   , नुक्कड़   वाली  राह  में |

वहाँ एकटक देखना , , होंठ नहीं  कुछ खोलना , 
चल रही कुछ थी ठगी , नुक्कड़ वाली राह  में |

नहीं अंजाम था पता , बदली  गलियों  की  हवा, 
खता आवाज ही मिली , नुक्कड़ वाली राह  में |

छोड़ "सुभाषा "  तू गली   ,दूर  इल्जाम हैं  अभी ,
सभी खिड़कियाँ है जली , नुक्कड वाली राह  में |

सुभाष सिंघई जतारा

महाचण्डिका छंद (मुक्तक )
अठकल + रगण ×2. चार पद 

दर्पण का क्या दोष है ?,क्रोध सभी तज दीजिए  | 
जहाँ धूल मुख दाग हैं ,साफ   स्वयं ही कीजिए |
सदा  आचरण आपके , होते  जग में  माप हैं - 
मदिरा,अमरत सामने,खुद निर्णय कर पीजिए |🙏

होती  हैं  त्रुटियाँ जहाँ  , संकेतों  को   देखिए   |
है सुधार तब कीजिए ,   छंद सुहाना लेखिए ||
आप सभी गुणवान  हैं,बहुत लिखा साहित्य को -
भूल- चूक सब देखिए , नहीं क्षोभ मन  रौपिए |🙏

वर्तमान    साहित्य को  ,    मंच  एफ-बी केन्द्र  हैं|
जगह-जगह पर हैं  गुरू , घोषित स्वयं उपेन्द्र हैं |
चाहे जैसा भी  लिखो ,     नहीं सृजन पर रोक है - 
नमन उन्हें लिखते रहो , तब सब कुछ  क्षेमेन्द्र  हैं ||🙏

महाचण्डिका  /महाधरणी छंद
चार पद , 26 मात्रा -  अठकल+ रगण ×2

पत्थर  भी देखा यहाँ ,   बन  जाता भगवान है |
 पत्थर मानव  है बना , धरती  खुद   हैरान है ||
घिसकर  तीली आग दे , बनती भी  वरदान है |
पाल द्वेषता भी यहाँ ,   जलता खुद इंसान है ||

दिल इंसानों के  कभी , लेते  पत्थर  रूप हैं |
कहीं उजाले कर्म  के, लगें  गुनगुनी धूप  हैं ||
ईश्वर को सब जानते , रहते  सदा  अनूप हैं |
पर अभिमानी के यहाँ,  सभी रूप विद्रूप हैं ||

चतुर काग  इंशा  बने ,  बाँधे  रहता  ज्ञान  को |
दो रुपया के दान से ,  चाहे  वह  भगवान को ||
मंदिर के दर फेकता , नजर  उठाता  शान  से |
कहता प्रभु अब दो कृपा, तुम अपने वरदान से ||

(एक विशेष संकेत - मंदिर में कभी भी पैसे फेककर 
नहीं चढ़ाना चाहिए 🙏) और न प्रभु की मूर्ति के सम्मुख 
दान पात्र रखना चाहिए , दान पात्र सदैव ऐसी जगह
अगल - बगल में रखना चाहिए कि प्रभु की दृष्टि 
में न आए  ) 🙏

सुभाष सिंघई


64- मोहन छंद  छंद-लक्षण ,जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति 5 - 6 -6- 6 , चरणांत गुरु लघु , लघु गुरु

वन गमन, अब होता  ,‌ राम -सिया    संग चले |  
और तब  , पीछे भी, अनुज लखन, अंग चले |
अयोध्या , विलख उठी, नर  नारी  , साथ रहे |
दौड़ते,    हैं    पीछे ,  जुड़े  सभी  , हाथ  रहे ||

द्रौपदी  , बिलख रही , चीर हरण , पीर  रहे  |
दुशासन , खींच रहा , कृष्ण बढ़ा , चीर रहे ||
सभासद, भीष्म द्रोण , मौन रहे , माथ मले |
धृतराष्ट्र  , फटे वस्त्र ,उडे दिखे , हाथ जले ||

अभिमन्यु ,प्यास लगी ,दिया गया , नीर नहीं |
परिणाम , मिला कर्ण, अब दानी, वीर  नहीं ||
मिट गया, दान वीर,  पुण्य क्षीण , जौत मिली |
बना जब  ,अंत काल ,चक्र फँसा , मौत मिली  ||

गुरु द्रोण , देख रहे ,  पुत्र    मोह , पाप करे |
कौरवों , संग रहे  , गलत   कार्य, आप करे ||
रचा था , चक्र व्यूह ,अर्जुन सुत , प्राण  तजे ‌|
युद्ध तब, अधर्म का , प्रतीक बन , घ्राण सजे ||

धृतराष्ट्र , अंधा था , शेष   सभी , लेख रहे | 
द्रौपदी , चीर हरण , सभा बीच , देख रहे ||
मौन था  , धर्म यहाँ,  नारि सभा , बीच लुटे |
कर्म का ,मार्ग गलत , कौन कहे ,कीच जुटे ||

सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़ ) म०प्र०
~~~~~
65-विधा:"ममता छंद"मात्रिक।

#विधान:४-७-३-१० मात्रा पर यति,  चरणांत लघु लघु(लल)

प्रसंग चयन किया है - विरहिणी नायिका

सोचे  ,  सजनी बैठ,  सजन , जी  आएँ अब  घर  |
लेकर , प्रेम अनंग , सहज  , सजनी  के   हों  उर   ||
खोले  , हृदय कपाट , लगे   , सब  अनुपम  सुंदर   |
उठती , रहे तरंग , नहीं  ,  पर    कोई     दे   स्वर   ||1

काजल , बनकर नीर , सलिल , बहता है दृगतल |
साजन , बैसे  दूर , हृदय , में   रहते   हर    पल ||
व्याकुल , सजनी द्वार  ,खड़ी  , आई है   चलकर |
‌करती  , आहट खोज , मिलन ,को चाहे  पल भर ||2

साजन ,आएँ द्वार , मगन ,   सजनी का  था  मन |
बारिस , करके  मेघ ,जरा  , पुलकित कर दें  तन ||
नैनन , में  तब  नेह , बरस , करता  है    हलचल |
झूमें , मन की डाल , वहाँ   , भींगा   है  हर पल ||3

उपवन , में क्यों पुष्प , खिले , करने   को हलचल |
विरहा , को है शूल , सजन , बिन व्याकुल हरपल ||
वरसें , बाहर   मेघ , नयन ,      भी   भींगें  आकर |
कह दे , कोई  मित्र , सजन , से  सब कुछ  जाकर ||4

भँवरे , आते द्वार  , उड़ें   ,     सब  आकर  चौखट  |
कहते , आकर कर्ण , विरह , से    करते   खटपट ||
सखियाँ , करतीं ज्ञात , सखी , कितना    है  वेदन |
साजन , कितनी दूर  , करे  , जो   आकर    मेटन ||

~£~£~~~~

66- जनक छंद‌ विधान  सउदाहरण

जनक छंद‌ विधान  सउदाहरण 
जनक छंद कुल तीन चरणों का छंद है , जिसके प्रत्येक चरण में 13 मात्राएँ ठीक दोहे के विषम चरण वाली होती हैं।
 यह छंद व्यंग, कटाक्ष कथ्य के लिए  है।
तुकांत  के आधार पर जनक छंद के पाँच भेद माने गए हैं। यह पाँच भेद हैं:—

1- पूर्व जनक छंद; (प्रथम दो चरण समतुकांत )

यहाँ वहाँ वह बोलते |
लड़ने को वह डोलते  |
पर दबंग  से दूर  रह |

मंत्र न बिच्छू जानते |
सर्प पकड़ना ठानते |
बातों  के   पैसे  रहें |

घटना स्थल   सूँघकर |
श्वान बढ़ा तब कूँदकर |
पकड़ लिया दीवान को |

विषधर बिल में डर रहा |
झाड़ फूँक वह कर रहा |
बाहर  नेता  हैं     खड़े |

अग्नि जलाते वह‌‌ रहे |
लोग  लड़ाते वह रहे |
 चुने हुए  सब देवता |

हमने जिसको जब चुना  |
उसने हमको  अब धुना  |
 जैसै को       तैसा रहा  |

~~~~~~~~~~~~~~~
2- उत्तर जनक छंद; (अंतिम दो चरण समतुकांत)

खुद ही बनते तोपची -
नुक्ता चीनी जानते |
नहीं किसी की मानते |

तीस मार खाँ बन गए -
चिड़ियाँ तीतर मारकर |
पहलवान से   हारकर |

टाँग      फँसाते राह में - 
लँगड़े चलते अब उछल |
बहरे ‌सुनते  अब गजल  ||

आग लगाकर चुप हुए - 
पंच सभी   हुश्यार   है |
दोषी   लम्बरदार    है ||

~~~~~~~~~~
3- शुद्ध जनक छंद; (पहला और तीसरा चरण समतुकांत)

मोदी की आलोचना |
नत्थू खेरे कर रहे - 
सुबह शाम अब वाचना |

तीन पाँच करते रहे‌ं |
नहीं किसी की मानते ~
जुर्माना भरते    रहें |

पंच सभी  हुश्यार  है |
गेह बुलाए  चौर है 
डाकू लम्बरदार है ||

~~~~~~~~~~
4- सरल जनक छंद; (सारे चरण अतुकांत)

प्रजातंत्र में छूट है 
जितना चाहे बोलिए 
उल्टी रखिए चाल को 

छंद चोर अब गुरु  बना  |
कहे नमन पहले लिखो |
फिर रचना को शुरु करो |

बस जनता का  दोष है , 
हारे  लोग   चुनाव   है , 
कौन करेगा अब  मदद |

~~~~~~~~~~
5- घन जनक छंद। (सारे चरण समतुकांत)

कौन रोकता आपको |
धक्का मारो बाप को |
सिर पर रख लो पाप को |

संसद में अब शोर है |
देखा    चारों ओर है |
शांति श्वान के ठोर है |

तोता रटते   राम हैं |
नेता रटते   काम हैं |
बस कामों के दाम हैं |

श्वानों  जैसा  पालते  |
रोटी टुकड़े डालते |
चमचों को पुचकारते  |

नेता  आया   द्वार हैं   |
सेवक बना उधार हैं |
वश वोटों की मार हैं |

पिछली बातें छोड़िए  |
वोटों का रुख मोड़िए |
रुपयों से खुद जोड़िए |

देखा    सबका   राज है  |
जो अब तिकड़मबाज है 
उसके सिर पर ताज है |

जनता  जहाँ सवार है |
फँसी नाव  मझधार है |
अब शासन लाचार है |

भड़या  नाकेदार   हैं |
सरकारी औजार   हैं |
जनता को अवतार हैं ||

हिस्ट्रीशीटर  चोर   हैं |
बनें आज शिरमौर हैं |
अच्छे दिन के  दौर हैं | 

डाकू अब श्रीमान हैं |
ऊपर  तक पहचान हैं |
जनता के भगवान हैं |

गधे  आज गुणवान ‌हैं |
अच्छी अब पहचान  हैं |
जनता के  जयगान हैं |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

~~~~~~~~~~~~~~
बुंदेली भाषा में  तेवरी 

बुंदेली भाषा में तेवरी ‌बहुत अच्छी तेवरी लिखी जा सकती है , क्योंकि बुंदेली शब्दों में वह मारक क्षमता है कि , गूँज दूर तक सुनाई पड़ती है |

बुंदेली तेवरी  

1- जनक छंद (घन )  (सारे चरण समतुकांत)
      (इस भेद से बहुत अच्छी तेवरी बनती है ) 

कुत्ता जैसौ मार  कैं |
दौ कौरा फिर डार कै -
पुटया रय पुचकार कै || 

नेता   ठाड़ै  दौर   पै |
कै रय हम हैं ठौर पै- 
दैव समर्थन छौर  पै ||

पिछली बातें भूल कै |
रुपया ले लौ हूल कै - 
वोट पटक दो चूल कै  ||

तकतइ उनकौ राज हैं |
जौ अब तिकड़मबाज है - 
जिनने   बेची    लाज है ||

भग गय लम्बरदार  है |
फँसी नाव मझघार है - 
जनता जितै सवार है ||

भड़या  नाकेदार   हैं |
सरकारी औजार   हैं -
जनता खौं औतार हैं ||

हिस्ट्रीशीटर  चोर   है |
बनो आज शिरमोर है - 
पुज रव सबके दोर है | 

डाकू अब श्रीमान है |
ऊँचे तक पैचान है - 
जनता खौं भगवान है ||

गदा आज गुनवान ‌है |
खच्छर भी श्रीमान   है -
जनता में पहचान  है ||
~~~~~~~~~~~~
तेवरी
2-  जनक छंद (,पूर्व )  (प्रथम दो चरण समतुकांत)

आगी  सुलगाते   रहत  |
बात भिड़ानी सब कहत |
जनता इनखौ जानतइ  |

हमने जीखौं  था चुना |
उनने जाल ऐसा   बुना |
रुइ -सी जनता गइ धुनक |

लुकुर लुकर नँइँ करियौ |
नेतन   से   सब डरियौ |
साँपन से है नँइँ दौसती |
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तेवरी
3- जनक छंद ( उत्तर ) (अंतिम दो चरण समतुकांत)

चढ़ी बिदै रय पैर में - 
लूलै  हौ  गय सूद में  |
कै रय कड़ने फूँद में   ||

आग लगा कै आय है - 
माते अब    हुश्यार है |
बिद गय लम्बरदार है ||
~~~~~~~~~~~~~~~
तेवरी
4-  जनक छंद (शुद्ध)  (पहला और तीसरा चरण समतुकांत)

मातै भी हुश्यार  है |
घर में पारौ चौर खौ - 
बीदौ   लम्बरदार है ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
तेवरी
5- जनक छंद (सरल )  (सारे चरण अतुकांत)

बस जनता खौ दोष है , 
जौ हारे हम चुनाव है , 
नइयाँ अब कौनउँ मदद |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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