रंग भरो सत्संग का , खिलें दिखें रस फूल |
ज्ञान जहाँ जो भी मिले , उसे करो अनुकूल ||
मिले जहाँ सत्संग कुछ, जीवन करो निहाल |
हृदय कलीं खिलती दिखे , जग भी कहे कमाल ||
साधु गुणी जब भी मिले , खूब करो सत्संग |
हृदयांतर में खोजिए , सही कौन -सा रंग ||
रंग भरो सत्संग का , हृदय पटल पर आप |
जग में भी शुभ कर्म से , सदा छोड़िए छाप ||
जग में भी सत्संग से , सुंदर खींचों चित्र |
आएगें सब देखने , वाह करेगें मित्र ||
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हिंदी दोहे - विषय - भूल
अनजाने में भूल भी , बन जाती है शूल |
लोग नहीं तब चूकते , देने लगते तूल ||
भूल जहाँ होनें लगे , सबक लीजिए आप |
आगे जो भी काम हो , रखना पहले माप ||
होती जब भी भूल कुछ , देती है परिणाम |
दोषी की सूची बने , प्रथम जुड़ेगा नाम ||
अनजाने में भूल हो , सज्जन करते माफ |
दुर्जन करते शोर हैं , करें नहीं मन साफ ||
भूल जहाँ अहसास दे , सदा कीजिए याद |
नहीं पुन: फिर चूक हो , बढ़े नहीं तादाद ||
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एक निवेदन 🙏
चूरण जैसे पा चरण , लिखकर लें सम्मान |
इसी तरह हम कर रहे , हिंदी अभियुत्थान ||
कविवर तुम भी धन्य हो , चरण खोजते रोज |
व्याकुल रहते प्रात से , कब मिल जाए डोज ||
भाव आपके सो गए , क्या समझें हम आज |
खुद ही सोचें कुछ नया , कब प्रकटेगा राज ||
कलम साधकर मंच पर , निज मन रखिए आप |
नहीं चरण स्वीकारिए , लगी किसी की छाप ||
लत लग जाए आपको , चरण मिले तब लेख |
नहीं कभी हम चाहते , आए ऐसी रेख ||
कुंडलिया दोहा लिखो , लिखिए मुक्तक छंद |
भाव सभी हो आपके , रहे हर्ष आनंद ||
नहीं किसी पर तंज है , खुली रखी है बात |
शब्द विषय तक है उचित , आगे कवि मन घात ||
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मधुमास
बीत गया मधुमास है , यह क्यों किया विचार |?
मन में जब मधुमास है , तन पर भी शृंगार ||
प्रीति सदा शुचि पालते , मन में रखें उमंग |
बीत गया मधुमास है , सुनकर हम है दंग ||
बीत गया मधुमास है , सुनकर हुए उदास |
शीत पवन का मेल ही , क्या रचता मधुमास ||?
बीत गया मधुमास है , यह कवियों के बैन |
मापदंड माने नहीं , सजनी की शुभ रैन ||
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विषय - संकल्प
जहाँ करें संकल्प हम , प्रथम करें विश्वास |
रखते ही अपना कदम ,खोजें वहाँ उजास ||
पहले मन में कीजिए , अपना दृढ़ संकल्प |
दीर्घ कार्य करने सहज ,समय लगेगा अल्प ||
मन में यह संकल्प रख , करुणा हो प्रतिमान |
जिसकी छाया में सदा , करें दया का दान ||
निज मन के संकल्प से ,सदा मिलेगी जीत |
और यहाँ व्यवहार से , निकट रहेगी प्रीत ||
मेरे मन संकल्प है , कभी न त्यागूँ धर्म |
इसकी छाया में सदा , उदय करें शुभ कर्म ||
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गिरती धार पहाड़ से , बनती सरिता नीर |
शहर नगर कानन बहे, हरती जन की पीर ||
वृक्ष हीन अब दिख रहे , कानन और पहाड़ |
सरिता भी सूखी मिले , सूखे मिलते झाड़ ||
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हिंदी विषय - बात
लोग पकड़ते बात को , करते खूब बवाल |
जख्म कुरेदें खूब वह , पकड़ बाल की खाल ||
बात-बात में आपकी , लोग करें जब बात |
तब तुझमें कुछ बात है , जो रब की सौगात ||
परिचय देती बात है , कितने गहरे आप |
गई कुए में डोर ही , दे गहराई माप ||
सोच समझकर बात जब , करते आकर लोग |
समझों मख्खन ने दिया, घृत का शुभ संयोग ||
ज्ञानी करते बात जब , घृत सम निकले सार |
मूरख रहते दूर है , पकड़ें उड़ती खार ||
बात निरर्थक है वहाँ , शोर-गोल हो खूब |
कुचली जाती भीड़ में , हरी खिली भी दूब ||
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हिंदी दोहे - अक्षय
शुक्ल पक्ष वैशाख में , तिथि तीजा संज्ञान |
अक्षय मंगल दिन कहें , जग में सभी सुजान ||
अक्षय सुख भंडार की , करें कामना लोग |
भगवन से विनती करें , चाहे सब शुभ योग ||
अक्षय सुख धन सम्पदा , हर मानव की चाह |
पर वह इसके लिए , सही न चुनता राह ||
अक्षय सब भंडार हों , तन भी रहे निरोग |
यश गाथा संसार में , बने आपको योग ||
अक्षय वैभव भी मिले , कहते सदा त्रिदेव |
सदाचरण शुचिमय रखो , कीजे जन की सेव ||
सुभाष सिंघई
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हिंदी दोहे -लपट/लू
खरबूजा तरबूज की , ज्येष्ठ माह में शान |
लपट बचाने ग्राह है , समझें सब श्रीमान ||
आम प्याज को भूनकर , जल में कर दो घोल |
लपट भगाने आपका , पेय बने अनमोल ||
हवा ग्रीष्म में गर्म हो , बदले अपना रूप |
मानव तन लगती लपट , झुलसाती है धूप ||
शीतल जल को पीजिए , नीबू का रस डाल |
लू को चम्पत कीजिए , कीजे बदन निहाल ||
एसी कूलर चल गए , पर जो दिखें गरीब |
शीत लपट सब झेलने , मिलता उन्हें नसीब ||
हिंदी दिवस -कालनेमि
कालनेमि भी आज है , भ्रम है जिसका नाम |
भ्रमित करें जन को यहाँ , बने बिगाड़ें काम ||
कालनेमि से जब भ्रमित , वीर बली हनुमान |
मिला एक संकेत तब , गए तभी पहचान ||
त्रेता युग से आज तक , कालनेमि के पूत |
पैदा होते ही रहे , बने कपट के दूत ||
छल बल को ही जानना , कालनेमि प्रतिबिम्ब |
जो दुष्टों को दे सदा , आकर के अवलम्ब ||
कालनेमि मारा गया , जिंदा दिखें प्रपंच |
छल ही जिसके रूप हैं , रखें सजाकर मंच ||
सुभाष सिंघई
मंगलवार-4-6-24 हिंदी दिवस -पुरवाई
पुरवाई गणतंत्र की , चले देश में आज |
जिसके अच्छे कर्म फल ,मिले उसी को राज ||
तप जाते जब नौ पता, वर्षा गिरे फुहार |
पुरवाई लगती मधुर , भू पर लगे निखार ||
पुरवाई की मधु लहर , हरे ग्रीष्म का ताप |
बादल की अठखेलियाँ , देती शीतल छाप ||
हँसते बाग तड़ाग हैं , पत्ते दें गुंजार |
पुरवाई भीनी महक , करे प्रकृति शृंगार ||
कवि मन भी लिखते सदा , पुरवाई पर गीत |
गोरी चाहे पास में , आज रहे मनमीत ||
- धर्म
कर्म धर्म जैसे जहाँ , बैसे बनें विचार |
यह विचार ही आपके ,पथ करते तैयार ||
दर्पण जैसा मानिए ,सच्चा धर्म स्वरूप |
बतलाता वह कर्म है , कैसे बनो अनूप ||
चलते है जो धर्म पथ , मिलें उचित संयोग |
आकर इस संसार में , कैसे रहें निरोग ||
धर्म भावना से सदा करना जग में काम |
सदा आपके साथ में ,रहें सहायी राम ||
कर्म हीन मानव सदा , रहें आलसी सुस्त |
धर्म लीन जो भी रहे , रहता वह है मस्त ||
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हिंदी --प्राण
नश्वर सब संसार में , तन भी नश्वर जान |
नहीं प्राण नश्वर कभी , किसको है संज्ञान ||
जाना इस संसार से , कौन करे निर्वाण |
तेरा मेरा बाँटनें , लगे रहें यह प्राण ||
तन में रहता प्राण है , खेला करता खेल |
फुरसत वह लेता नहीं , करनें प्रभु से मेल ||
क्षण भंगुर है जिंदगी , निकले तन से प्राण |
पछताता है अंत में , नहीं मिले निर्वाण ||
अंत समय में सोचता , यह मानव आरोह |
पर जीवन की सोच में , रहे प्राण व्यामोह ||
सुभाष सिंघई
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विषय - काल (मृत्यु)
अंत समय में काल भी , कहता कर विश्राम |
पर मानव कहता सदा , अभी और हैं काम ||
काल कहे कर ले मरण ,जर्जर हुआ शरीर |
मानव करता हाय तब , होने लगे अधीर ||
काल कहे लेकर जनम , जिए बहुत है साल |~
पर मानव कहता सदा , बाकी अभी कमाल ||
कल- कल करता मन यहाँ , तन को दे आराम |
सम्मुख आया काल जब , कहता बाकी काम ||
जन्म-मरण के चक्र हैं , मिला काल को काम |
परिवर्तन कर देह की , जिसकी बीती शाम ||
आज समय को काल पर , कभी न देना डाल |
आएगा जब काल वह , छूटें सभी सवाल ||
सुभाष सिंघई
हिंदी दिवस , विषय - हर्ष
प्रेम दया करुणा रहे , और साथ में हर्ष |
हृदयांतर उल्लास हो , फल मिलता उत्कर्ष ||
जहाँ विम्ब उल्लास के , वहाँ हर्ष बौछार |
मिले सदा निष्कर्ष की , अविरल बहती धार ||
जीवन में उल्लास बिन , मृत सम रहती देह |
जहाँ हर्ष की है किरण , लगे स्वर्ग सम गेह ||
बने रहें जो आलसी , रखें नहीं उल्लास |
उनका जीवन हर्ष बिन, दिखे न कुछ भी खास ||
उजला रहता है सदा , कहें जिसे उल्लास |
हर्ष सदा निष्कर्ष है, जिसमें रहे सुवास ||
हिंदी - कलंक ,
एक बार जो लग गया , धुलता नहीं कलंक |
जली होलिका आग में ,बचा भक्त था अंक ||
जब कलंक माथे लगे , रहे सदा चिरकाल |
रावण जलता आग में , अब भी है हर साल ||
कुल को लगे कलंक भी , जिसके खोटे कर्म |
पर नारी को छेड़ता , करे नहीं जो शर्म ||
जिसके खोटे कर्म को , सुनकर आए लाज |
है कलंक माथे लगा , गूँज उठे आबाज ||
मर जाता है आदमी , जिस दिन लगे कलंक |
चार लोग के बीच में , मुख पर उछले पंक ||
विषय - मंगल
मंगल रहता उस जगह , जहाँ सत्य का वास |
शुचि प्रकाश देता सदा , होता नहीं उदास ||
मंगल रहते पल जहाँ , मिल जाती है जीत |
दुनिया के दस्तूर से , खिल जाती शुभ प्रीत ||
मंदिर मंगल नाम पर , मिलें अखाड़े बाज |
भगवानों के नाम पर , ओछे करते काज ||
आज सत्य के नाम पर , झूठों की आबाज |
पर मंगल ईश्वर करें , हो जाते हैं काज ||
श्रद्धा ताली पीटती , कभी न होती मूक |
मंगल करने काज को , सत्य करे कब चूक ||
झूठों को माला मिले , माइक मिले व मंच |
परम सत्य मंगल जहाँ , चलते नहीं प्रपंच ||
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नेता बनने के लिए,लगे न कुछ भी दाम |
उल्टा-सीधा बोलिए, चल जाएगा काम ||
यदि माफिया आप है, रहते सदा दबंग |
नेता बनने के लिए , यह है चोखा रंग ||
गुंडो को यदि पालते , रखते है हथियार |
नेता बनने के लिए , यह गुण है उपहार ||
ईश्वर भी अब रूठता , समझ न आबें नीर |
सूखा के सँग बाढ़ है , जन मानस की पीर ||
आफत दर आफत दिखे , लगे रहे जंजाल |
जन मानस की पीर भी , सूख हुई कंगाल ||
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दादी- नातिन नाक की , करते लोग मिलान |
दादा-नाती की नहीं , लोग करें पहचान ||
दफनाया दादा गया , जिनकी बनी मजार |
दादी को दी है चिता , गजब लगा व्यवहार ||
असली गांधी वंश के , लगते हैं लाचार |
नकली गांधी कर रहे , राजनीति व्यापार ||
कभी जनेऊ सँग तिलक , बनते पंडित बाज |
गोल कभी टोपी लगा , पढ़ते दिखें नमाज ||
राज मानिए आप सब, अकल न करिए खर्च |
इनके असली रूप का , वर्णन करता चर्च ||
खिचड़ी है पूरी सड़ी , कहीं नहीं हैं स्वाद |
नकली गांधी नाम से , देश नहीं आजाद ||
हिंदी विषय - पंडित
ज्ञानी पंडित कौन है ? , उत्तर सब लाचार |
मानव मन के लुप्त हैं , प्रीति भरे व्यवहार ||
ज्ञानी पंडित जो दिखें , मिलें दम्भ के चिन्ह |
मानव का यह आचरण , दिखता है अब भिन्न ||
जितने पंडित हैं मिले , सबके अलग उसूल |
ज्ञान फूल के नाम पर , उगते दिखते शूल ||
पंडित मन को मारकर ,लोभ द्वेष पाखंड |
कपट आज संसार में , देता सबको दंड ||
पंडित अब खोजें कहाँ , आकर यहाँ सुभाष |
सूरज का चोरी हुआ , उजला दिव्य प्रकाश ||
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जातिवार गणना करो , करते कुछ है माँग |
जाति लिखो दुकान पर ,तब क्यों सिकुड़े टाँग || 1
जनगणना में जाति हो , वंचित रहे दुकान |
मापदंड दुहरे रहे , छिपी रहे पहचान ||2
समाचार अखबार में , टीवी पर है व्यान |
पढ़कर ऐसा लग रहा , सब सनकी सुल्तान ||3
नफरत की चर्चा नहीं , यहाँ धर्म की बात |
मर्यादा को पालने , मिले सदा सौगात ||4
नहीं थुका भोजन मिले , नहीं माँस हो भोज |
यह विचार सावन नहीं , सदा रहे यह खोज || 5
एक कौम को कष्ट है , तब मत लिखिए नाम |
पर हम लिख सकते यहाँ , यह दुकान घन श्याम ||6
हो जाए पहचान तब , जिनका शाकाहार |
खा पी सकते है वहाँ , रखकर शुद्ध विचार ||7
हम दुकान पर नाम लिख , देवें खुद ही शोध |
सनातनी हम आर्य है , दे ग्राहक को बोध ||8
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विषय - पौधारोपण
पौधारोपण कीजिए , मौसम है बरसात |
देखभाल उम्दा करें , सुंदर बने प्रभात ||
हवा प्रदूषित हो रही , करो सभी आगाज |
बहुत जरूरी हो गया , पौधारोपण आज ||
उदासीन है जिंदगी , बिना वृक्ष के रोज |
पौधारोपण हो कहाँ , सभी कीजिए खोज ||
चमक दमक है आजकल , जिसमें फँसा किसान |
पौधारोपण पर नहीं , रहता उसका ध्यान ||
पौधारोपण सब करें , जिसमें है कल्याण |
हरित भूमि ही जानती , शुद्ध वायु निर्माण ||
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विषय ग्रहण
सूर्य ग्रहण या चंद्र हो , छिपते इनके नूर |
राहु केतु कुछ देर को , बन जाते है शूर ||
ग्रहण समय की मार है , समझो यह संकेत |
स्वर्ण रजत दीवार को , ढक सकती है रेत ||
जब विचार खोटे ग्रहण, करता है इंसान |
तब यह निश्चित मानिए , होता कुछ नुकसान |
दान ग्रहण कुछ शुभ कहे , जिसका रहता मान |
पाणिग्रहण शुभ दान है, जिसकी शुचि पहचान ||
शुद्ध ग्रहण आहार भी , सदा कीजिए आप |
शाकाहार विचार हो , जिनकी शुभमय छाप ||
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बुढ़ापा
कमर झुकी नजरें घटीं , हो गय बाल सफेद |
यही बुढ़ापा जानिए , मन में करो न खेद ||
लोग बुढ़ापा जानकर , याद करें हरिनाम |
उनसे तब होते नहीं , उल्टे- सीधे काम ||
सदा बुढ़ापा काटिए , घर में रह चुपचाप |
जब सलाह माँगे बहू, तभी दीजिए आप ||
गड़बड़ बड़बड़ यदि किया , मुख को रखा न शांत |
यहाँ बुढ़ापा आपका , होगा तब उद् भ्रांत ||
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दोहावली - परिवार में बच्चे की परवरिश
(दोहाकार - सुभाष सिंघई जतारा )
मात पिता यह सच सुने , समझें यह व्यवहार |
उचित और अनुचित गुनें , सही चुनें उपचार ||
बच्चे को यदि पीटते , करने आप सुधार |
प्रतिभा तज कायर बने , घर का राजकुमार ||
जिसे चिड़ाया गेह में , कहा मूर्ख अनजान |
बालक बंद प्रयास कर , बन जाता नादान ||
जिस बच्चे का गेह में , होता है उपहास |
खो जाता है तब सदा , उसका निज विश्वास ||
नहीं भरोसा मिल सके , बच्चे की तब छाप |
कर देती विद्रोह है , नहीं समझता बाप ||
नहीं प्रशंसा मिल सके , अच्छा भी हो काम |
बालक तब खुद में करे , लापरवाही नाम ||
बच्चे को वस दीजिए , समय कीमती आप |
बारिश करिए प्रेम की , संस्कार हो छाप ||
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विषय - सुप्रभात ( सु प् र भा त) 6 मात्रा
सुप्रभात में जागकर , करते ईश प्रणाम |
मन भी रहता शांत है , करने जग के काम ||
झरने नदियाँ देखिए , सुप्रभात में आप |
कितना लगता है मधुर , बसे नैन में छाप ||
सुप्रभात में सूर्य की , किरण रहे कुछ मंद |
उजयाली अच्छी लगे , आता है आनंद ||
चिड़ियाँ चहके मोद में , कोयल करती गान |
मुर्गा जगकर बाँग दे , सुप्रभात की शान ||
सुप्रभात में जागकर , लोग करें अस्नान |
हर हर गंगे बोलते , यथा शक्ति दें दान ||
सुभाष सिंघई जतारा
तनक शब्द जानो नगण , भार "एक-दो" मान |
विषम चरण के अंत में , रखें गुणीजन ध्यान ||🙏
तीन वर्ण हों लघु अगर , यहाँ तनक दे ध्यान |
भार "एक- दो" जानकर , याद रखें संज्ञान ||🙏
एक उदाहरण रख रहा , तनक दीजिए ध्यान |
बात समझ आ जायगी , विनय सुने श्रीमान ||🙏
दोहा लिखना स+रल है , तनक गलत यह जान |
दोहा लिखना है सरल , सही चरण यह मान ||🙏
लिखते लिखते जानता , हो जाए अभ्यास |
तनक आप करते रहे , मन से पूर्ण प्रयास ||🙏
विषय - नारियल
पिता नारियल-सा दिखे , सबको बहुत कठोर |
गरी रखे वह नेह की , जल है कर्म हिलोर ||
मंगल होता नारियल , करता नहीं प्रमाद |
तन भी अपना तोड़कर , बनता मधुर प्रसाद ||
निम्न दो दोहों में एक परिकल्पना -
जटा जूट रख नारियल , रखे तीसरा नेत्र |
शिव पिंडी-सा है बदन , मंगल पूरा क्षेत्र ||
आकर बैठे नारियल , सदा गजानन देव |
लगे पिता की गोद में , हर्षित यहाँ स्वमेव ||
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बाल- त्रिया सँग राजहठ , तीन सुने हठ कार्य |
चौथा हठ कलिकाल में , दिखता है आचार्य ||
गुरुवर जिनके हैं हठी , दिखें शिष्य के रंग |
लिख साहित्यक गालियाँ, मन में रखें उमंग ||
जब जिद पर हो बाबा अली , लेकर पूरी गैंग |
तब आगे चालीस भी , चलें जमी पर रैंग ||
सुंदर चित्र बिगाड़कर , जो करते निर्माण |
तब दर्शक भी कम नहीं , देते वह निर्वाण ||
चोटी रख खतना करें ,मिलता तब परिणाम |
खुद की खतना हो उठे , चौराहे पर आम ||
तुलसी सूर कबीर के , जो बनते है बाप |
चौराहे पर फूटते , एक दिवस सब पाप ||
करते आकर पाप है , तोड़े अब शुभ छंद |
बने नहीं तब छाप से , मधु जैसा गुलकंद ||
सुभाष सिंघई
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छंदो की सुन्नत करें , लगे काफ़िया ताज |
लखकर ऐसे कृत्य को , रोती है अब लाज ||
अरबी के अब काफ़िए , छंदों में हों नूर |
बात समझ में आ रही , क्या मंशा भरपूर ||
छंद यहाँ पर क्या करें, दिखें सिसकते आज |
खतना अपने कर रहे , खतरे में है लाज ||
क्या दोहे के बाद में , चौपाई पर गाज |
सनातनी इन छंद की , लुटे मंच पर लाज ||
हिंदी के गण त्यागकर , समझाते अरकान |
विनय सुने गुणीजन यहाँ , गण से दो पहचान ||
विनती में सबसे करूँ , छिड़े नहीं संग्राम |
हिंदी गण से कीजिए , छंद सृजन अविराम ||
सुभाष सिंघई
~~~`
श्रद्धेय श्री ओम नीरव जी को सादर समर्पित दोहें
नीरव जी विनती सुने , पढ़े आपके लेख |
उत्तर आए तीन है ,आज रहा मैं देख ||
जिसने गुरुवर है लिखा , सही निभाया धर्म |
हाँ में हाँ भरकर यहाँ, किया शिष्यवत कर्म ||
दूजीं वह हैं टिप्पणी , जिनमें मिला नकार |
यह दोहे के साथ में , उचित नहीं व्यवहार ||
तीजे भी कुछ आपसे , रखें मित्र व्यवहार |
जरा ध्यान कुछ दीजिए , बता रहे उपचार ||
किसकी माने आप भी , रखिए सही विवेक |
लगे आपको श्रेष्ठ जो , कार्य कीजिए नेक ||
प्रश्न रखा है आपने , सबने दिए जवाब |
निर्णय खुद अब लीजिए , दिखने लगे हिसाब ||
सहमत मैं भी हूँ नहीं , स्पस्ट किया था चित्र |
फिर भी मन से चाहता , रहूँ आपका मित्र ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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विषय - धन
धन तेरस से जानिए , पंच पर्व का गान |
दीपोत्सव लगता सुखद , जगमग दिखे विहान ||
धन तेरस पर लाइये , दीप धूप सामान |
पूजन अर्चन भी करें धनवंतरि भगवान ||
धन दौलत किस काम की , रहे दान से दूर |
बस संग्रह की लालसा , बनी रहे भरपूर ||
ऐसे धन का क्या करें , तरसे खुद परिवार |
अवसर पर ही बंद हो , जहाँ तिजोड़ी द्वार ||
दुखदाई धन है वहाँ , जिसे उठा लें चोर |
घर के भी मत खा सकें , दो रोटी के कोर ||
रहे जोड़ते धन सदा , कहलाए धनवान |
नहीं बने हम भक्त हैं, किया सदा निज गान ||
विषय - उत्सव
होते उत्सव अर्थ मय, रहता जिनमें हर्ष |
वह भी कुछ संकेत से, दें जीवन प्रादर्श ||
उत्सव है कुछ राष्ट्र के , कुछ संबंधित धर्म |
अर्थ सभी के गूढ़ हैं , रखते है सब मर्म ||
उत्सव सभी मनाइए , अपना समय निकाल |
हर्ष सदा हो पास में , जिसमे रहो निहाल ||
उत्सव यदि दीपावली , चमके घर बाजार |
पाँच दिवस दीपक जलें , बिखरा रहता प्यार ||
हैं सुभाष उत्सव सदा , जो देते संदेश |
मानव या निज राष्ट्र हो , सुखी रहे परिवेश ||
विषय - कदंब (पेड़)
आज डाल पर श्याम जी , बैठे राधा संग |
छवि लगती अनुपम युगल , हरषे हृदय उमंग ||
यमुना तट पर झूमती , जब कदंब की डाल |
पवन वहाँ तब नाचती , सुमधुर देती ताल ||
मधुवन में आकर खिलें , जब कदंब के वृक्ष |
क्रीड़ा करते श्याम जी , लगते सबको दक्ष ||
जब कदंब का संत भी , करते प्रत्याख्यान |
एक ब्रम्ह में देखते , जुड़े पंख है भान ||
हरि कदंब सानिध्य को , करते सभी प्रणाम |
मैं "सुभाष" भी भाव से , भजता राधेश्याम ||
सुभाष सिंघई
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हिंदी - चाह
विश्व गुरू भारत बने , मन में जागी चाह |
सदाचरण शुचिता रहे, उपकारी हो राह ||
मन में अंदर चाह है , राम राज संदेश |
फैलाएँ हम विश्व में ,सदा शांति परिवेश ||
चाह रखें हम यह सदा , रचे नए आयाम |
मानव हित के कर्म हों ,हो गीता पैगाम ||
यह भी रखता चाह है , जय बुंदेली मंच |
सिखलाता सबको रहे , छंदो के सब पंच ||
राना जी लगते सरल ,सबका देते साथ |
सुंदर मेरी चाह है ,यश रक्खें यह माथ ||
सुभाष सिंघई
दोहे- ( कुछ कड़वें है 🙏)
छेड़छाड़ साहित्य में , एक बड़ा टेलेन्ट |
बनते रहते हैं जनक, करते निज पेटेन्ट ||
जहाँ सनातन छंद है , नवाचार के काम | ?
जैसे पकड़ा है पिता , चले बदलने नाम || 🙏
जहाँ सनातन छंद शुभ , है विधान प्राचीन |
नवाचार के नाम क्या , इज्जत लोगे छीन ||🙏
खतना करना सीखना , काम बड़ा आसान |
सोया यहाँ सनातनी ,रोता हिंदुस्तान ||
हाँ हाँ वाले रख लिए , शेष हटाए मित्र |
आए दिन अब देखना ,करतव बड़े विचित्र ||
पुस्तक छंद विधान है , लेखक देव " विभोर " |
उनका सृजन निचोड़कर, उद्गम करें हिलोर ||
हाँ हाँ वाले जोड़कर , चुनकर चेले चार |
बनते अब साहित्य में , एक नए अवतार || |
जहाँ असहमति सामने , उसे शत्रु लें मान |
वह भी यह कब सोचते , कर्म यहाँ नादान ||
सत्य सनातन धर्म में , जन्मे हिंदुस्तान |
फिर बनते उस्ताद क्यों , देकर खतना ज्ञान ||
ज्ञानी भी सब जानते , प्रस्तुत है जो खेल |
किस किसान के धान्य का , है यह पूरा तेल ||
दूजों का जो माल हो , करो न उसका पान |
है कीचड़ स्नान यह , इतना रखिए ध्यान ||
दोहा चौपाई लिखो , इनसे कितने छंद |
छंद महल से पी चुके, ज्ञानी जन मकरंद ||
ज्ञानी कहते ज्ञानफल ,जहाँ झुका दे डाल |
आदर मिलता है स्वयं , गला पहनता माल ||
ऐंठू बनकर कब मिले , कहीं कभी सम्मान |
ज्ञान -प्रेम के तथ्य हो , रहें वहाँ भगवान ||
हिंदी दिवस , विषय - करुणा
करुणा जिसके उर बसे , रहता नम्र स्वभाव |
बोली में रस प्रेम का , करता है छिड़काव ||
करुणा के जब भाव से , देखें लोग गरीब |
करते उसकी है मदद , अपना समझ नसीब ||
दान दया करुणा बसे , समझें जग में पीर |
ऐसे मानव ही सदा , बनें धर्म के वीर ||
हम सब कहते ईश को , करुणा दया निधान |
झुका शीष दर पर कहें , शरण आज भगवान ||
करुणा से ही निभ सके , जग में मानव धर्म |
रहें परस्पर प्रेम से , अपने करते कर्म ||
सुभाष सिंघई
हिंदी दिवस , विषय -भविष्य
है भविष्य उज्ज्वल सदा , कर्म जहाँ हैं नेक |
फल मिलते शुचि रूप में , सदा एक से एक ||
मात - पिता सब चाहते , सुत करवें उत्थान |
शुभ भविष्य उनका रहे , अपने हिंदुस्तान ||
हैं भविष्य के बीज भी , बोकर देखें आप |
कर्म भूमि में यह उगे, जैसा मिले प्रताप ||
ललना गुण पलना दिखें ,करते लोग बखान |
आशय यहाँ भविष्य है , ज्ञानी का संज्ञान ||
कौन जानता है यहाँ , माथे की तकदीर |
पर भविष्य कुछ बोलती , हाथों खिची लकीर ||
श्री कबीरदास जी से क्षमा प्रार्थित होते हुए 🙏
चंद दोहे (सुभाष सिंघई )
निंदक नियरे क्यों रखें , विनती सुनें कबीर |
करते अब अनफेंड्र हैं , चलें फेसबुक तीर ||
माला फेरत जुग गया , हुआ हाथ में दर्द |
अब गूगल पर ज्ञान दे , मोबाइल है मर्द ||
पत्थर चक्की बंद है , रोने का क्या काम |
मोबाइल अब आ गया, हँसो सुबह से शाम ||
अब मुल्ला कब बाँग दें, पंडित क्यों चिल्लाँय |
लगा दिए साउन्ड हैं , ध्वनि अम्बर पहुचाँय ||
मोबाइल गाकर भजन , याद करें भगवान |
इंसानों को फल मिलें , सुनो कबीरा गान ||
मंगलवार -17.12.24 हिंदी दिवस
विषय - पढ़ाई
अगर पढ़ाई छोड़कर , घूमें आप फिजूल |
शिक्षा होगी दूर तब , मिलें न उनके फूल ||
नेक पढ़ाई से मिले , अच्छा ज्ञान प्रकाश |
सूरज करता है सदा , अंधकार का नाश ||
जीवन को जो मानता , सदा कर्म अभियान |
उसे पढ़ाई से दिखे , जग में उगता भान ||
जिसे पढ़ाई काटती , अक्षर लगते शूल |
उनके पास न देखते , कभी ज्ञान के फूल ||
श्रेष्ठ पढ़ाई से मिले , सदा हमें ही ज्ञान |
मिलकर यहाँ समाज भी, दे जाता सम्मान ||
मंगलवार -24.12.24 हिंदी *हृदय*
हृदय हमारी भूमि है , बनते बीज विचार |
फसल पकेगी कर्म से , जाने यह संसार ||
हृदय बसाकर राम सिय , अमर हुए हनुमान |
कलयुग में भी भक्त की , मिल जाती पहचान ||
दधि को मटकी में मथें , घृत ऊपर लहराय |
भाव हृदय में जब उठे , मुख पर वह दिखलाय ||
हृदय आपका जब रखे , अंतर में शुभ भाव |
बिन हलचल तन गंग में , बहती जाती नाव ||
परहित के जब कर्म हों , भाव रहें निष्काम |
बसे हृदय में तब वहाँ , प्रभुवर जय श्रीराम ||
मंगलवार -31.12.24 हिंदी दिवस *गप्प* (झूठी बात)
(इन्हें विभावना अलंकार में दोहे भी मान सकते है )
प्रथम गप्प ज्ञानी सुने , कागा शुभ आभाष |
पंछी चले जमीन पर , ढ़ोर उड़ें आकाश ||
मोर नृत्य भूले सभी , गधे गए हैं सीख |
गप्प नहीं यह मानिए , कृपड़ बाँटते भीख ||
सभी सपेरे नाचते , नाग बजाता बीन |
गप्प नहीं यह सत्य है , थल में घूमे मीन ||
गायक के सुर खो गए , गूँगे भरे अलाप |
गप्प बोल प्रचलित हुए , लिया गगन को माप ||
राजनीति में नीति अब , छल के है आधीन |
गप्प गपोड़ी ही दिखें , सत्ता मद में लीन ||
मंगलवार -7.1.25 हिंदी दिवस - विश्व
आज विश्व में देखते , सबके अलग विचार |
कोई करता खोट है , कोई करे सुधार ||
दर्पण सम्मुख जाइए ,सच्चा दिखे स्वरूप |
आप विश्व में हीन है , या है सच के भूप ||
मनोकामना विश्व में , देती है संयोग |
कर देती बीमार को, वह भी कभी निरोग ||
आए हो जब विश्व में , करना अच्छे काम |
यहाँ कर्म का फल मिले, करें मदद श्री राम ||
कर्म हीन मानव सदा , रहता लापरवाह |
चाहत रखता विश्व से , बना रहूँ मैं शाह ||
दोहे - कुम्भ
मेला लगते कुम्भ के , जहाँ तीर्थ अनुभाग |
मकर संक्रांति काल में , रहते पुण्य पराग ||
मंथन सागर का हुआ , निकला कुम्भ महान |
अमरत जिसमें था भरा , बनकर के वरदान ||
दैत्य झपटते कुम्भ पर , गिरते भू पर अंश |
चार तीर्थ तब बन गए , जो है अमरत वंश ||
नासिक सँग उज्जैन है , गिनो तीर्थ हरिद्वार |
है प्रयाग चौथा सुनो , लगें कुम्भ दरबार ||
अमरत जैसा फल मिले , करके कुम्भ नहान |
हर - हर गंगे बोलते , करते जय -जय गान ||
आता बारह साल में , जहाँ कुम्भ उल्लास |
करते सभी नहान है , तीर्थ लगे तब खास ||
बारह बारह साल जब , जुड़ते बारह बार |
महाकुम्भ संयोग का , अवसर तब सुखकार ||
महाकुम्भ अवसर बने , अनुपम तीर्थ प्रयाग |
शाही सभी नहान हों , संगम के भू भाग ||
महाकुम्भ में देखते, संतों का जयगान |
मिलें एक से एक हैं , नागा साधु सुजान ||
हिंदी - *मूर्ति*
लगे मूर्ति मंगल मधुर , नगर अयोध्या धाम |
मंदिर बना विशाल है , जहाँ विराजे राम ||
मंगलमय मंगल करण , मंगल मूर्ति महान |
खड़गासन श्री राम जी , दिव्य अयोध्या गान ||
धनुष बाण है हाथ में , मधुर लगे मुस्कान |
अनुपम कहते मूर्ति है , धाम अयोध्या मान ||
दिव्य मूर्ति अब विश्व में , सभी जानते राम |
नमन करें हर देश के , नगर अयोध्या धाम ||
दर्शन करके धन्य है , सेवक यहाँ #सुभाष |
राम मूर्ति मेरे हृदय , देती दिव्य प्रकाश ||
मिले मूर्ति नगरों शहर , संविधान सरताज |
भीमराव अम्बेडकर , जिन पर हमको नाज ||
हिंदी दिवस विषय - *दही*
बनता है जब भाव का , दही नवल सुखकार |
कविता प्रकटे तब हृदय , सुखद लगे संसार ||
दही धवल मथकर सदा , देता जब अनुदान |
लगता घृत तब देखकर , जैसे प्रकटा ज्ञान ||
दुग्ध तपे फिर बाद में , जमे दही आकार |
यही बात ज्ञानी कहे , तप बनता आधार ||
दही जमाना है कला , अनुभव की यह बात |
बनता है अभ्यास से , सबको यह सौगात ||
मावा मक्खन या दही , रबड़ी और पनीर |
बनते है यह दुग्ध से , संग जानिए खीर ||
सुभाष सिंघई
मंगलवार -4.2.25 हिंदी - *मलाई*
जनता पीती छाँछ है , नमक मिर्च को डाल |
चखें मलाई देश के , नेता करें कमाल ||
चखे मलाई रोज ही , चमचा मूँछें ऐंठ |
जनता बिरचुन खा रही , घर के कौनें बैठ ||
खूब मलाई खा रहे , साथ खड़े बलराम |
मात यशोदा बोलती , रहने दो अब श्याम ||
मिले मलाई दूध की , और साथ बादाम |
पहलवान तब बोलते , आज सुखद है शाम ||
मिले मलाई में जहाँ , किशमिश सँग अंजीर |
कमजोरी तब भागती , हटती तन की पीर ||
दूध औंटती औरतें , ऊपर उठे हिलोर |
उसे मलाई सब कहें , देखें उसकी ओर ||
घुटी भंग सँग लीजिए , आप मलाई स्वाद |
दूना तब आनंद है , यह सुभाष को याद ||
सुभाष सिंघई
संत शरण मधुमय वचन , मिलते जहाँ अनंत |
तब बसंत-सी पंचमी , लगती सभी दिगंत ||
दिवस अवतरण शारदे , मौसम बने सुगंध |
है बसंत शुभ पंचमी , अमरत सब मकरंद ||
सुभाष सिंघई
मोबाइल
देखा जग का हाल है ,ऐसा क्यों भगवान |
मोबाइल से देखता, चिपक गया इंसान ||
पति पत्नी के बीच में , मोबाइल दीवार |
छुपे हुए इनबाक्स में, सबके अपने यार ||
कोई रहता फेसबुक , व्हाटशाप पर व्यस्त |
कोई ट्यूटर पर जमा , यूट्यूबर में मस्त ||
बिस्तर तरसें अब यहाँ , पलंग हुए खामोश |
अजब नजारे देखता , मोबाइल पर जोश ||
सब्जी जल काली हुई , रोटी हुई उदास |
पत्नी लाइक कमेंट में , अब्बल दर्जे पास ||
बेटा भी स्कूल को , खड़ा हुआ तैयार |
पिता अभी निज पोस्ट का, वर्णन रहा निहार ||
माता करे पुकार भी , बेटी बोले ताप |
मैसेजर पर फ्रेंड से , चैट करे चुपचाप ||
बेटा कहता जोर से, नहीं करो व्यवधान |
अभी गर्ल रिकवेस्ट है, देना मुझको ध्यान ||
मोबाइल की लीड भी , रहती कान सवार |
बातचीत का चल रहा , उम्दा कारोवार ||
दिखे चेट पर चेट अब , अर्द्ध रात के बाद |
गजब इश्क फरमा रहे , मँजनू की औलाद ||
हिंदी -*विमल* (साफ)
निर्मल मन होता विमल, तब विचार शुभ गान |
समदर्शी होते नयन , सबको दें सम्मान ||
हृदय सरल वाणी विमल , ईश वंदना भाव |
उस मानव की पार हो , भव सागर से नाव ||
नहीं विमल मन जब बने , मनुज दिखें लाचार |
मन के दिखते लुप्त हैं , प्रीति भरे व्यवहार ||
जहाँ विमल मन है नहीं, वहाँ दम्भ के चिन्ह |
मानव का तब आचरण , दिखता सबको भिन्न ||
जहाँ विमल मन; दूर तब , लोभ द्वेष पाखंड |
कपट पराजय मानता , करनी पाती दंड ||
हिंदी दिवस *सुगंध*
है सुगंध भीनी मधुर , भ्रमर कहे हट भाग |
कहता चम्पा बाँझ तू , रखती नहीं पराग ||
रख सुगंध मधु केतकी, रहती मलिन उदास |
डसते उसको सर्प है , रखें न शिव जी पास ||
(केतकी अपनी करनी से शिव जी से शापित है )
चंदन रखे सुगंध को , डसते आकर नाग |
फिर भी वह ज्ञानी बना, विष की झेले आग ||
है सुगंध केशर भली , छूकर लो संज्ञान |
अंश मात्र ही लाभ दे , अधिक करे नुकसान ||
जो सुगंध तुझमें बसी , मानव खुद पहचान |
मृग समान मत दोड़ना , देने अपने प्रान ||
लोहा*
फौलादी यह धातु है , लोहा जिसका नाम |
अस्त्र शस्त्र बनते सदा , जहाँ युद्ध का काम ||
लोहा भी अब मानना , एक कहावत आम |
लोहा टकराना सुना , और सुना परिणाम ||
सुना भिलाई नाम है , लोहा कारोबार |
बड़े बने सब यंत्र का , होता है व्यापार ||
लोहा है मजबूत तब , बनती लम्बी रेल |
कृषि उपकरण आदि भी , छोटे मोटे खेल ||
लोहा जैसा दिल रखा , वल्लभ श्री पटेल |
आजादी का था समय , डाली खूब नकेल ||
विषय - खजूर
बड़ा हुआ अच्छा हुआ , जैसे पेड़ खजूर |
वर्ना लाठी लोग ले , करते चकनाचूर ||🥰🙏
दास कबीरा कुड़ गये , देखा पेड़ खजूर |
फल-छाया दोनों नहीं , नीचे खड़े हुजूर ||😜🙏
जिनके पास जुगाड़ है , वह है आज हुजूर |
तिकड़म से चढ़ पेड़ पर , खाते खूब खजूर ||🤔
है खजूर मीठा सुनो , उत्तम रखता स्वाद |
ऊँचाई पर ही रहे , तब रहता आबाद ||😉
मेहनतकश ही खा सकें , चढ़कर लगे खजूर |
बोला करते आलसी , खट्टे है अंगूर ||😜
हिंदी दिवस - विषय - भव्य
भव्य हमारे तीर्थ है , दर्शन करते हर्ष |
लेते रहते प्रेरणा , लगते शुभ आदर्श ||
वह बनते आदर्श शुभ , जिनके भव्य विचार |
शुचिता के रख आचरण , करते हैं उपकार ||
बने भव्य हैं कुछ किले , अपने हिन्दुस्तान |
दर्शक भी दर्शन करें , और करें गुणगान ||
दिखे गुणीजन इस जगत , जिनके भव्य विचार |
जिनको सुन संतोष का , मन में रहे प्रसार ||
भव्य हिमालय गिरि सुनो , साथ सुनो कैलाश |
शिव शंकर रहते वहाँ , देते सदा प्रकाश ||
- विषय -वीर
रखें बात की आन जो , वह होते हैं वीर |
धर्म निभाते फर्ज का , हरते जन की पीर ||
सैनिक भारत देश का, होता वीर जवान |
साथ सभी यह मानते , होता शूर किसान ||
कर्तव्यों के जो धनी , उन्हें वीर लो मान |
पीर पराई देखकर , करते सदा निदान ||
वीर दिखाते वीरता , कायर काले काम |
कोयल गाती गीत है , कागा करे हराम ||
करें धर्म की बात जो ,चलें धर्म के तीर |
रक्षा करते धर्म की , वही मानिए वीर ||
1 अप्रैल , हिंदी दिवस ,विषय आकांक्षा
विश्व गुरू भारत बने , मन में रखते चाह |
आकांक्षा भी पालते , उपकारी हो राह ||
आकांक्षा मेरे हृदय , राम राज संदेश |
फैलाएँ भी विश्व में ,सदा शांति परिवेश ||
आकांक्षा रहती सदा, रचें नए आयाम |
मानव हित के कर्म में , हों गीता पैगाम ||
यह आकांक्षा पालते , रखकर दूर प्रपंच |
करें प्रेम से बात सब , रखें बनाकर मंच ||
सभी मित्र लगते सरल , मिलता रहता साथ |
आकांक्षा भी हो उदित, यश आवें शुभ माथ ||
हिंदी दिवस , विषय - विमान
जब विमान अम्बर उड़े , दिखता छोटा रूप |
लेकिन देखा पास जब , हमको लगा अनूप ||
सदियों से सब देखते , करें लोग पहचान |
उड़े हवा में तेज गति , उसको कहें विमान ||
रामायण के काल में , पुष्पक रहा विमान |
रावण ने सीता हरण , किया इसी पर आन ||
जितने होते देवता , सबके रहते चिन्ह |
द्रुत गति रखें विमान-सी, कभी न होते भिन्न ||
सज्जन जो होते मनुज,आता जब है काल |
लाते धर्म विमान हैं , इज्जत दें हर हाल ||
सुभाष सिंघई
15.4.25- मंगलवार (हिंदी)-
विषय -मर्म (भेद, रहस्य , स्वरूप)
आज धर्म का मर्म भी , भूल गए सब लोग |
बहुत दिखावा चल रहा, उल्टे मिलें नियोग ||
भीष्म पितामह ने लखा , हरण द्रोपदी चीर |
तभी कर्म के मर्म से , लगे बदन में तीर ||
दिया नहीं अभिमन्यु को , प्यास लगे पर नीर |
तभी कर्म के मर्म से , सही कर्ण ने पीर ||
गुरुवर द्रोड़ाचार्य ने , दिया पाप का साथ |
तभी कर्म के मर्म से , बेटा हुआ अनाथ ||
रावण ने अभिमान ,में , सबको बाँटी पीर |
तभी कर्म के मर्म से , कटकर गिरा शरीर ||
अंधा जब धृतराष्ट्र भी , रहा पुत्र में लीन |
तभी कर्म के मर्म से , कुल से हुआ विहीन ||
सुभाष सिंघई
विषय - उदित
सूरज पूरब से उदित , चलकर करता काम |
पश्चिम में वह डूबकर , करता है आराम ||
भाग्य उदित जिनका हुआ , मिला राज सम्मान |
कर्म बुरे जिनने किए , देखा तब अवसान ||
पुष्प उदित हों डाल पर , खिलते दिखें प्रसन्न |
पूजा- गोरी - शव चढ़े , काज करें सम्पन्न ||
उदित हुआ संसार में , वह सब नश्वर जान |
समय चक्र जग की धुरी , ज्ञानी करें वखान ||
उदित ज्ञान जिनका हुआ , वह सब हैं विद्वान |
सभी लोग आदर करें , देकर के सम्मान ||
सुभाष सिंघई
(हिंदी)- - प्रपंच
सब प्रपंच नाकाम हों , जहाँ रहे ईमान |
अटल सत्य मुख खोलकर , अपना देता व्यान ||
करते लोग प्रपंच हैं , बनते गुरु घंटाल |
वेनकाब जब हो उठें, मुख दिखता तब लाल ||
करते अब भी लोग हैं , पीछे से कुछ वार |
रचते रहें प्रपंच भी , सभी भूल उपकार ||
नाम ख्याति जब यश मिले , अपने रचें प्रपंच |
खड़ा करेगें आपको , फिर तोड़ेगें मंच ||
हर प्रपंच में आपके , अपनों के किरदार |
आँख खोलकर देखना , सभी करेगें वार ||
विषय - रस्सी
रस्सी जलकर राख है , पर देती पहचान |
बल जलकर भी बोलते , यह थी मेरी शान ||
धागे जितना बल रखें , बनें लिपटकर एक |
मजबूती में देखिए , रस्सी बनती नेक ||
धागे जब कमजोर हों ,जब चाहे दो तोड़ |
पर रस्सी में जब गुँथें , बन जाते वेजोड़ ||
रस्सी के बल देखिए , ताकत रखती पास |
खीचें अच्छे यंत्र सब,अवसर जब हों खास ||
रस्सी जैसी एकता , धागों का यह मेल |
देता भी संदेश है, कर ताकत से खेल ||
20.5.25-मंगलवार-हिंदी- गांठ
गाँठ अगर मजबूत है , राह बने आसान |
अगर बीच में खुल गई , होते तब हैरान ||
रैमन कवि भी लिख गए , गाँठ न अच्छी मान |
मिटें न इसके चिन्ह हैं , रहती कुछ पहचान ||
अच्छी होवे मित्रता , हो जावे मतभेद |
आगे बढ़ मनभेद से , गाँठ पड़ी दे खेद ||
नहीं गाँठ में रस दिखे , रैमन लिखें सुजान |
दर्द अलग हो देखकर , मिटते नहीं निशान ||
मन में पड़ती गाँठ जब , देती रहती दर्द |
जरा-जरा -सी बात की , आस पास हो गर्द ||
सुभाष सिंघई
27.5.25-मंगलवार- हरियाली
(कुछ अलंकारित दोहे )
हरियाली हर चाहता , जपते हरिहर बोल |
हरि भी अब हर के सहित , हरा रखें भूगोल ||
मौसम हो बरसात का , हरियाली हर ओर |
हरि जन्म जब भाद्र में , मन का नाचें मोर |
हरि पूजन हर के सहित , करते मंडप गान |
हरियाली चारों तरफ , देते परिजन तान ||
हरियाली हरिया लखे , आ बैठे जब डाल |
हरि+आ -हरि+आ टेर सुन , हरि आएँ तत्काल ||
हरयाला बन्ना सुना , हरियाली वधु मान |
हरि- हर सँग सियराम जू , करें नारिया गान ||
3.6.25-मंगलवार-हिंदी सिंदूर (आपरेशन सिंदूर)
उजड़ा जब सिंदूर था , घाटी थी कश्मीर |
बदला सेना ने लिया , दुश्मन दल को चीर ||
खेला था सिंदूर से , पापी पाकिस्तान |
तब सेना-सिंदूर ने , किया उसे हलकान ||
कीमत भी सिंदूर की , क्या जाने नादान |
पिटकर आई अब अकल ,कैसा हिंदुस्तान ||
बहनों के सिंदूर का , बदला लेकर आज |
अच्छा सेना ने किया , मोदी जी का राज ||
आज विश्व भी पूछता , यह कैसा सिंदूर |
जिसके तेज प्रताप से , दुश्मन चकनाचूर ||
17.6.25-मंगलवार-हिंदी- सिद्ध ( दुमदार दोहे )
घर का योगी छोड़कर , ले आए जो गिद्ध |
अब साबित वह कर रहे , है यह पूरा सिद्ध ||
मचा है अच्छा हल्ला ||
सिद्ध वही है इस जगत , रखे आचरण शुद्ध |
चर्या में शुचिता रहे , हो वाणी से बुद्ध ||
सूर्य उजला ही रहता ||
सिद्ध महात्मा हो गए , भारत भूमि महान |
देकर शुभ संदेश ही , किया जगत प्रस्थान ||
आज भी पूजे जाते ||
मंत्र सिद्ध होते जिन्हें , करते जन कल्याण |
लाखों लोगों के सदा , रहें बचाते प्राण ||
सभी जन गुण को पूजें ||
मंत्र न बिच्छू जानते , करते साँप उतार |
ऐसे लोग बनावटी , दिखते है संसार ||
ढोल सब खाली रहता ||
सुभाष सिंघई जतारा
24.6.25-मंगलवार-हिंदी-- दोष
करता क्या है आदमी, रहे उसे कब होश |
बिगड़ें जब भी काम कुछ ,दे कर्मो को दोष ||
बिना बिचारे काम में , घुसकर करें ततोष |
कमीं निकालें हर जगह , सबको देकर दोष ||
साथ रखें गद्दार को, पर भरते है जोश |
देते है हर प्रांत में , सरकारों को दोष ||
कौन यहाँ निर्दोष है , करता कौन सवाल |
सबके अंदर है भरा , थोड़ा बहुत मलाल |
प्रभुवर के आगे सदा , सभी उगलिए दोष |
करुणाकर करुणा करें , देगें तब नव जोश ||
1.7.25-मंगलवार-हिंदी-- लक्ष्य
लक्ष्य सदा पहले रखो , पूरा सोच विचार |
कैसे करना काम है, बन जाए उपहार ||
बिना लक्ष्य जब हम चलें , भटकेगें तब राह |
और परिश्रम को नहीं , कभी मिलेगी वाह ||
सदा लक्ष्य का कीजिए , जाकर अनुसंधान |
तभी मिलेगा यश तुम्हें , करने को कुछ मान ||
बिना लक्ष्य के काम सब , कभी न होते पूर्ण |
जो भी आता पास में , वह सब होते चूर्ण ||
दृढ़ पग रखकर लक्ष्य का , पीछा करिए आप |
पहुँचों मंजिल पर सदा , नहीं रखो संताप ||
8.7.25-मंगलवार-हिंदी - अनुमान
पूरी सुनकर बात भी , लग जाता अनुमान |
क्या चाहे यह आदमी, कितना चतुर सुजान ||
ललना गुण पलना मिलें , गुणी करें अनुमान |
हाव भाव की भंगिमा , देती कुछ पहचान ||
लंक गए हनुमान जी लगा लिया अनुमान |
राम भक्त कोई यहाँ , करता प्रभु गुणगान ||
जहाँ विभीषण की कुटी , गए ध्वजा पहचान |
राम नाम आबाज सुन ,लगा लिया अनुमान ||
महिलाएँ घर की सदा , सही करें अनुमान |
पकी सही अब चीज है , कर सकते अनुपान ||
15.7.25-मंगलवार-हिंदी-249- चौराहा
चौराहा पर आदमी ,खड़ा रहा यह सोच |
जाऊँ मैं किस राह पर , लगे नहीं पग मोच ||
धर्म कर्म निष्ठा लगन , खड़े एक ही साथ |
चौराहा सम जानिए , प्रेम सने हैं हाथ ||
चौराहा होता जहाँ , लिखे रहें संज्ञान |
जाना है किस मार्ग से , रखना पड़ता ध्यान ||
चौराहा पर जब कभी , आते सज्जन लोग |
अभिवादन कर हाथ से , करें गुणों का योग ||
चौराहा सद्भाव का, बनता कभी प्रतीक |
मिलें जुलें निर्णय करें ,और बनाएँ लीक ||
22.7.25-मंगलवार-हिंदी राजनीति
सभ्य आचरण हैं कहाँ ?, सेवा भावी योग |
राजनीति करने लगे, दो कोड़ी के लोग ||
राजनीति में देख लो , क्या होता है आज |
आज साथ जो चल रहे , वह कल धोखे बाज ||
राजनीति में चल रहे , भाषण लच्छेदार |
जनता का हक मारकर , लेते नहीं डकार ||
राजनीति करने लगी , वोटों का व्यापार |
और लूटने सम्पदा , बना लिया दरबार ||
राजनीति - बगुला भगत , साडू भाई नाम |
हाथ जोड़ते लोग सब , करते इन्हें प्रणाम ||
राजनीति में छूट अब , खूब मचाओं लूट |
जनता को करके भ्रमित , डालो उनमें फूट ||
29.7.25-मंगलवार-हिंदी- मरघट
मरघट की कहती चिता , हुआ आज अवसान |
होगें अब तो राख सब ,पले हुए अरमान ||
अंतिम मरघट केन्द्र है ,आता हर इंसान |
होता खाली हाथ भी, चुप रहते अरमान ||
जलती रहती है चिता ,मरघट करता हर्ष |
कहता मैं संसार को , सदा एक प्रादर्श ||
आया खाली हाथ है , जाना खाली हाथ |
जन्म लिया था गेह में, मरघट अंतिम साथ ||
ऐसी बैसी है नहीं , यह मरघट की राख |
अच्छे-अच्छे शूरमा , यहां हुए हैं खाक ||
5.8.25-मंगलवार-हिंदी- चतुर
ठगकर आते गेह हैं , सदा चतुर ही लोग |
हुश्यारी खामोश हो , उल्टे जुड़ते योग ||
मूरख लम्पट लालची , सँग हो चतुर सुजान |
इन चारों की चोट सें , मन पर लगें निशान ||
चतुर सयाने लोग ही , करते चुपड़ी बात |
अवसर पर चूकें नहीं ,देकर जाते घात ||
कागा होता है चतुर , एक आँख का जीव |
कोयल धोखा दे उसे , रखकर कुल की नीव ||
जंगल की भी लोमड़ी , दिखे चतुर चालाक |
बिन शिकार खाती रहे , भोजन भी नापाक ||
12.8.25-मंगलवार-हिंदीं - मित्र
जहाँ भले सब मित्र हों , कहता सच्ची बात |
सदा निभाना जानिए , मिलकर यह सौगात ||
अच्छा मिलता मित्र जब , अच्छे हों दिन चार |
सत्संगति के पुष्प भी , खिलते हैं मनुहार ||
अच्छे रखना मित्र हैं , सोच रखो कुछ नूर |
दुर्जन का यदि साथ हो ,खट्टा मिले जरुर ||
त्रेता युग के राम जी , कहलाते भगवान |
जब भी बोले प्रेम से , कहें मित्र हनुमान ||
सही मित्र वह है नहीं , छोड़े जो सत्संग |
और वचन की आग से , झुलसा दें सब अंग ||
19.8.25-मंगलवार-हिंदी अजगर
कुछ मानव अजगर बनें , करते दिखें घमंड |
सम्बंधों को लीलते , उगले गरल प्रचंड ||
अहंकार में आदमी , भूले सदा विवेक |
अजगर -सा जीवन जिए , काम न करता नेक ||
अजगर होता आलसी , करे न कुछ भी काम |
फिर भी रखता है असर , होकर भी बदनाम ||
अहंकार में डूबकर , रावण राजा कंश |
अजगर बनकर चल बसे , सभी मिटाकर वंश ||
अहंकार अच्छा नहीं , सब जाने इंसान |
पर अजगर के रूप को , धारेंं कुछ श्रीमान ||
खुद ही लगा तराशने, खुद को खोद सुभाष।
खुदा खुदाई लख कहे, खुद कर बनो प्रकाश।।
खुदा खड़ा हूँ सामने, आधा खुद कर आज |
पूरा करना ऐ! खुदा, यह खुद की आवाज ||
खुदा बनूँ , सब चाहते, करें न खुद कुछ काम |
मैं 'सुभाष' खुद,खुद रहा, खुदा कृपा अविराम ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
26.8.25-मंगलवार-हिंदी- अँगूठा
एकलव्य ने जब दिया , काट अँगूठा दान |
अर्जुन के गाण्डीव का , यहाँ झुका था मान ||
बनें अँगूठा छाप हैं, प्रचलित है यह तंज |
बिना पढ़े जो भी रहें , वह करते हैं रंज ||
हस्ताक्षर की जब जगह,करे अँगूठा काम |
बिना पढ़े की छाप से , होते हैं बदनाम ||
एक अचम्भा देखता , दिखा अँगूठा ठोक |
रुपया गिनने में कभी , नहीं करें वह रोक ||
पढ़ने बालक जब गया , करता रहा प्रलाप |
जिसका यह परिणाम है ,बना अँगूठा छाप ||
2.9.25-मंगलवार-हिंदी-- अंकित
अंकित प्रभु के हैं चरण , चित्रकूट के पाट |
नदी सुनो मंदाकिनी , कुंड जानकी घाट ||
अंकित रहते राम जी , सदा हृदय हनुमान |
दिखी भक्ति की शक्ति यह , जाने सभी जहान ||
उदाहरण अंकित हुए , बना गए इतिहास |
जिनके अच्छे कर्म ने , जीत लिया विश्वास |
अंकित मिलते है चरण , तीर्थंकर भगवान |
शिखर बना सम्मेद है , जाने सभी सुजान ||
अंकित हैं सब ग्रंथ में , राम और घन श्याम |
हरिहर ब्रह्मा जानिए , हैं खुद में यह धाम ||
विषय - अज्ञान
ज्ञानी अब खामोश हैं , बोल रहा अज्ञान |
वर्तमान हालात पर , क्या कह दें विद्वान ||
दंभ और पाखंड भी , फैला है चहुँ ओर |
न्याय बना अज्ञान अब , खुले घूमते चोर ||
कुछ करते अज्ञान पर , मूरख छाप घमंड |
बोलें भाषा लठ्ठ की , सृजन करें सब खंड ||
राजनीति में देखता , छाया है अज्ञान |
नवमीं कक्षा फेल को , झुकते हैं विद्वान ||
तम रहता अज्ञान में , रखता ज्ञान प्रकाश |
इसीलिए शुभ काज से , मतलब रखो सुभाष ||
हिंदी बिषय- अपना
अपना-अपना सब करें, कहे पराया कौन |
जिसका अपना माल है , वह बैठा है मौन ||
यह जीवन अपना कहें , देना वाला मौन |
जीवन सपना मानिए , बात सुनेगा कौन ||
अपना घर परिवार है , अपने रिश्तेदार |
अपने मन से बसा लिया , मायावी संसार ||
अपना बोला कब कहाँ , हैं मेरे भगवान |
मंदिर को याचक समझ , दो रुपया है दान ||
अपना सबको मानते , नहीं शत्रुता पास |
पर जो रखता खार है , करता वह बकवास ||
बिषय:-हिंदी -, सीढ़ी,
सीढ़ी चढ़ो विकास की, करो आज से काम |
सुदृढ़ बने यह राष्ट्र भी , करिए अपना नाम ||
आज हमारा है अभी , सीढ़ी चढ़ो विकास |
भाव सदा निष्काम हों, मंजिल होगी पास ||
सीढ़ी एक प्रतीक है , मानों उसे प्रयास |
आज नहीं तब कल मिले , पूरा उसे उजास ||
सीढ़ी चढ़कर आदमी , पाता सदा मुकाम |
अर्थ निकलता है यहाँ , किया परिश्रम नाम ||
साहस से सीढ़ी चढ़ो , फल मानो मकरंद |
लोग सभी सम्मान दें , यश भी दे आनंद ||
30.9.25-मंगलवार-हिंदी- राधा
मिले भगत जब सामने , हरि राधा लो बोल |
नैन झुका हरषे ह्रदय , मन के द्वारे खोल ||
अवला हो जहाँ द्रौपदी , कातर करे पुकार |
राधा मोहन बोलकर , बनो कृष्ण अवतार ||
राधा मोहन बोलकर , हम आए जिस द्वार |
मालिक आकर कह गया , गलती करूँ सुधार ||
राधा मोहन बोल से , कलयुग जाता डोल |
चिंतन के सँग चेतना ,मन की देता खोल ||
हमने बोला सामने , राधा मोहन बोल |
चौकन्ना वह हो गया , पहना सच का खोल ||
राधा जैसी प्रीति की , दूजी नहीं मिशाल |
राधा श्यामा हो गई , श्यामा राधेलाल ||
मोहन मन राधा बसी , राधा का मन श्याम |
राधा श्यामा है जगत , सबसे सुंदर नाम ||
मोहन में राधा घुली , राधा में हैं श्याम |
राधा जैसी प्रीत का ,पूरे जग में नाम ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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7.10.25-मंगलवार-हिंदी-261- संत
दया बसे सज्जन हृदय , या फिर संत-फकीर |
कह सुभाष यह पुष्प-सी , महकत रहे अबीर ||
दया रहित मानव सदा , संत कहें शैतान |
पाप पुण्य के बेल की , करें नहीं पहचान ||
सदा दया उर में बसा , रहता संत सुजान |
जग में सबको बाँटता , सदा सहज में ज्ञान ||
दया क्षमा करुणा जहाँ , होते मीठे बोल |
आभूषण यह संत के , होते हैं अनमोल ||
दया धर्म मत छोड़ना , हो कोई परिवेश |
संत सदा देते रहें , सबको यह. संदेश ||
14.10.25-मंगलवार-हिंदी- हीरा (रत्न)
पन्ना से हीरा निकल , जाते देश विदेश |
रखते अपना मोल हैं , जो भी हो परिवेश ||
हीरा जग में जानिए , होता है अनमोल |
परख जौहरी ही करें , फिर दे कीमत बोल ||
हीरा कब मुख से कहे , लाख हमारा मोल |
कहे कहावत लोग सब , और गुणी से बोल ||
हीरा उनका पुत्र है , तुलना करते लोग |
अच्छे गुण पहचान का , हीरा बनता योग ||
यथा नाम के गुण अगर , जो है हीरा लाल ||
इज्जत करते लोग तब , होकर सदा निहाल ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र
21.10.25-मंगलवार-हिंदी-263- मोक्ष
मानव इस संसार में ,करे मोक्ष की चाह |
पर जाता है नहीं , कभी भजन की राह ||
हाँड़ पिंजरा देह यह , जाना इसको छोड़ |
मोक्ष साधना के लिए , मिल भी जाते मोड़ ||
ईश मोक्ष की कामना , करते संत सुजान |
करते तप से साधना , जीवन अनुसंधान ||
मोक्ष कठिन है या सरल , यह मत सोचो आप |
पर निज की शुभ साधना , पक्की रखना छाप ||
भक्ति शक्ति जो रखे , जपे भजन जय राम |
कर्म सदा निष्काम हो , उसे मोक्ष सुख धाम ||
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-हिंदी-सतरंगी
सतरंगी संसार है , रंग सभी पहचान |
रंग जमाना रंग से , पर रखना ईमान ||
सतरंगी के तीन रंग , भारत ध्वज की शान |
केसरिया है लाल का , श्वेत हरा शुभ आन ||
इंद्रधनुष नभ में बने , सतरंगी ले रूप |
वह भी वर्षा के समय, लगता बड़ा अनूप ||
सतरंगी भी स्वर बने , सप्तसुरों का गान |
ले अलाप गायक कहें , सभी सुने श्रीमान ||
सतरंगी भी फूल सब , गोरी का मन जान |
करते वह शृंगार हैं , रखते उसका ध्यान ||
सुभाष सिंघई
4.11.25-मंगलवार-हिंदी-जीव
जन्म मरण इस जीव नें , किया अनेकों बार |
पर किसको यह ज्ञात है , कब-कब किया सुधार ||
गतियाँ कहते ग्रंथ सब , हैं चौरासी लाख |
भटके अटके जीव यह, तन को करता राख ||
मोह मान का रस पिए , जीव फिरे संसार |
कभी कर्म के साथ में , करें धर्म व्यापार ||
जीव अनादि काल से , घूम रहा संसार |
किस भव से वह मुक्त हों, करता नहीं विचार ||
राम नाम लेता वहाँ , जब आते है कष्ट |
बड़ा स्वार्थ यह जीव का, दिखता है स्पस्ट ||
-हिंदी उदार (दयालु)
धरती बादल पेड़ सब , करते हैं उपकार |
मानव को दातार हैं , मन भी रखें उदार ||
सूरज चंदा रोशनी , धरती के फल फूल |
रखते हृदय उदार हैं , रखते कड़े उसूल ||
हैं उदार सज्जन पुरुष , जग को हैं वरदान |
दिखलाते शुभ राह हैं , बनकर वह इंसान ||
हैं उदार जग संत भी , वचन कहें अनमोल |
मानव जिनको मानकर , सीखें सुंदर बोल ||
शिव जी भोले भक्त पर , रहते सदा उदार |
जपना वह स्वीकार कर , करते कृपा अपार ||
18.11.25-मंगलवार-हिंदी-267- विवेक
मूँछदार दोहे ( दोहे व्यंग्य विधा में हैं )🙏
फूटी आँख विवेक की, कहता शुभ अँधियार |
जला झोपड़ी रोशनी , सड़क करो गुलजार ||
लोग भी वाह सुनाकर
चने के झाड़ चढ़ाकर ||
फूटी आँख विवेक की , जोकर अब सौगात |
दीवाने कुछ नाचते , जुगनू की बारात ||
मना है भाई हँसना |
नहीं कुछ मुझको कहना ||
फूटी आँख विवेक की , नाटक बड़ा विचित्र |
उल्लू का दीवाल पर , लगा लिया घर चित्र ||
गजब है यह दिलदारी |
गधे पर करें सवारी ||
फूटी आँख विवेक की ,क्या-क्या कर लें याद |
आज विदेशी डालडा , बाँट रहा है स्वाद ||
अक्ल अब करता फ्राई |
बजाता उल्टी शहनाई ||
अब विवेक से कीजिए , आप सभी शुभ काम |
आँख फोड़कर कब दिखे , तुमको माया राम ||
एक दुम अभी हटाई |मूँछ अब दोग्ध लगाई |
|25.11.25-मंगलवार-हिंदी-- वैभव
वैभव उनका जानिए , लोग करें सम्मान | मिले प्रसंशा हर जगह , चलता रहे सुगान ||
वैभव हीरा का रहा , दबा रहा वह धूल | बाहर आया जब निकल , बना जगत में फूल ||
वैभव धन से जोड़ते , पर धन होता हीन | यश वैभव जिसको मिले , होता नहीं मलीन ||
कभी गर्व करना नहीं , जब वैभव हो पास | लदीं फलों की डालिया , झुकती हैं कुछ खास ||
वैभव का क्या अर्थ है , सबके निजी विचार | पर वैभव यश से जुड़े , तब सुभाष मनुहार ||
सुभाष सिंघई
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13.1.26-मंगलवार-हिंदी रेल
अंजुम रहवर की गजल , जीवन है इक रेल |
छुक-छुक करती ही रहे, करे सभी से मेल ||
सदा रेल छूती रहे , जो भी मिले पड़ाव |
जो भी आते बैठने , सबको देती भाव ||
रेल भेद रखती नहीं , सब उसके मेहमान |
जात- पात मानें नहीं , शुभ रखती संज्ञान ||
( मेहमान में मात्रा पतन होता है , पाँच भार )
जुड़ना सीखो रेल से , चलना सीखो साथ |
इंजन से मुखिया बनो ,थामों सबके हाथ ||
रेल हमारे देश में , रहती है गतिमान |
पहुँचाती है यह पथिक ,रखती सबका ध्यान ||
सुभाष सिंघई जतारा
गोरी आई बाग में , हुए रसीले आम | वह भी छूकर पेड़ को , देती नेह इनाम ||
गोरी के नैना चले , लगे आम के अंग | सबका मन मीठा हुआ, साथ हुआ सतरंग ||
महुआ को आया नशा , देखा गोरी रूप | गिरता आकर गाल पर , मोती बना अनूप ||
गन्ना का रस भी छलक , गाता है यह गान | मैं भी मीठा हो गया , दिखने लगा जवान ||
2.12.25-मंगलवार-हिंदी लाठी
लाठी पर मूँछदार दोहे व्यंग्य में प्रस्तुत है
गठबंधन ठगबंधनी , करें न नौका पार |
लाठी करती काम है , देख रहे सब यार ||
जहाँ भी इसे बजाया |
सफल ही इसको पाया ||
लाठी जब भी बोलती , समझें सब इंसान |
जी सर हाँ जू सब कहें , और कहें श्रीमान ||
प्रतापी उसको माने |
निकट सब झुकना जाने ||
लाठी जब होती खड़ी , सब हो जाते मौन |
सबके मोबाइल बजे , सदा एक ही टौन ||
लठ्ठ की अपनी भाषा |
दनाकन करे तमाशा ||
लाठी बनती आसरा , बूड़ा जहाँ शरीर |
श्वान ढ़ोर सब दूर हों , हरे पैर की पीर ||
मानिए बड़ा सहारा |
मिलेगा सदा किनारा ||
लाठी जिसके हाथ में , उसकी होती भैंस |
सत्य कहावत मानिए , लीजे मन में ठैंस ||
करो सब लाठी पूजा |
रक्ष हित और न दूजा ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
27.1.26-मंगलवार-हिंदी-276- गाय
सदा गाय सेवा करो , प्रात काल से शाम |
मात पिता भी जोड़ कें , घर को माने धाम |
गाय पाल श्री कृष्ण जी , कहलाए गौपाल |
ग्वाला भी सब बोलते , और साथ नदलाल ||
माता सचमुच गाय है , दूध जानिए ओज |
पीकर चेतन तृप्त हो , निकला है यह खोज ||
दूध संत कुछ पी सदा , करें अन्न का त्याग |
गाय मानते ब्रह्म फल , सदा करें अनुराग ||
गाय दूध का जानिए , अमरित सम है पान |
सेवा इनकी जो करे , खुश रहते भगवान ||
गाय गुणी सब मानते , महिमा अपरम्पार |
इनकी सेवा कर गए , आकर के अवतार ||
जिनके घर में गाय है , समझो गेह अनूप |
ज्येष्ठ माह में शीत है , शीत माह में धूप ||
जब तक हरि का नाम है , तब तक समझो गाय |
दूध दही घी भी मिले , बनती सबकी राय ||
नाम जपो हरि का सदा , सेवा को रख गाय |
घर में तब आनंद हो , खूब बढ़ेगी आय ||
सेवा करके गाय की , होता है आनन्द |
भाव सरल पावन बने , कर्म बने शुभ छंद ||
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