https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें , दोहा सुभाष (एक हजार हिंदी दोहे)

                       जय‌ माँ शारदे
माता   मेरी    शारदे ,  देती   सदा   प्रकाश |
पंच लिखूँ दोहावली , सेवक  यहाँ  'सुभाष' ||

लिखी "बराई" "बाँसुरी"  , "कुंड"  "दीप"  हैं  नाम |
दोहावली "सुभाष" से   , माँ   को  किया  प्रणाम  ||

हैं  माता  आशीष   से,     दोहे   पाँच    हजार ||
पाँच  खंड  जिसके बने ,    मानूँ   माँ  उपकार ||
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बाल रूप श्री   राम  का ,   दिव्य  भव्य   है   दर्श |
मोहक मुख की आभ शुचि , शुभ कपोल पर हर्ष ||

कमलासन  भवितव्य   है , स्वर्ण  रजत  से  श्रेष्ठ |
योगासन  आकार   पर ,     लला  विराजे  ज्येष्ठ ||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ -अर्चना 

प्रथम अर्चना में करें  , गणपति का सम्मान |
दूजे में   त्रय देव  हों    , और  शारदा गान ||

तीजे में   सब   देवियाँ , करें अर्चना   आप |
बजरंगी  भी  मानिए ,  जो   हरते   संताप || 

चौथी करना अर्चना  , मात्   पिता   गुरुदेव | 
पंचम में  माँ   भारती  , षष्टम  सत्य स्वमेव || 

सप्तम   करिये अर्चना, जहाँ   न्याय  ईमान |
अष्टम करिये सब नमन,जो गुण की हों खान ||

नवम् अर्चना  भी करो , जो  भी   हुए  शहीद | 
दसवीं में  उनको गिनो , जिनके  आप मुरीद ||

जो भी छूटें देव है , जिनका   दिखे  प्रताप | 
उनकी करिए अर्चना  , जो   हरते   संताप ||

गौ माता  की  अर्चना  , नहीं   भूलना  आप |
वंदन   करना भूमि का , मानो  सदा  प्रताप || 

बहुत अर्चना शेष है , रखना  यहाँ  विवेक |
उनका वंदन भी करो , जहाँ पात्र हों नेक || 
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माँ   तेरे   दरबार   में ,   मिलता   मुझें प्रकाश |
लिखूँ  छंद हिंदी सदा  , विनती  करे  'सुभाष' ||

माँ  तेरे  दरबार में ,    हर्षित ‌सभी अपार |
गरबा   खेलें नारियाँ, कर  सुंदर   शृंगार ||

गरबा  पूजा आरती , यह   सब  मंगल काम |
माँ  तेरे   दरबार   में ,      दिखते चारों धाम ||

दीप जलाकर मध्य में, नाचें   देकर   ताल |
माँ तेरे  दरबार  में ,  होते   सभी    निहाल ||
     
जहाँ नमन में ले लिया ,  मन  से माँ का नाम |
कलम वहाँ तब कह उठी , दर्शन  चारों धाम || 
             
सुभाष सिंघई
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चुनाव 
आया नया चुनाव है , सभी करो मतदान |
चुनकर नेता श्रेष्ठ दो , अपने    हिंदुस्तान ||

आया नया चुनाव है , पहले   करो    विचार |
देना किसको वोट शुभ , चला सके सरकार ||

आया नया चुनाव है ,   माँग रहे जो वोट | 
उनको पहले जानिए , दूर रखें क्या खोट ||?

आया नया चुनाव है ,   घूम रहे कुछ सर्प |
जहर उगलते मंच से, रखते निज मन दर्प ||

हिंदी दिवस - विद्यालय

विद्यालय मंदिर सदा , देता सबको ज्ञान |
मात् शारदे  गेह है ,  लगता स्वर्ग समान || 

विद्यालय में  देखिए , शिक्षा   सूर्य प्रकाश |
ज्ञान उजाला दे सदा, तम का करता‌ नाश ||

विद्यालय शिक्षक सदा , कहलाते  गुरुदेव |
खिलते रहते आचरण , जानो यहाँ स्वमेव ||

कृष्ण सुदामा है यहाँ , नहीं  यहाँ   पर भेद |
विद्यालय में शुभ खुशी , यहाँ न रहता खेद ||

विद्यालय में  ज्ञान का , अतुलित  है भंडार |
जितना भी सामर्थ्य हो , उतना लो स्वीकार ||
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सदा हौसलें  ही भरें , नभ में उच्च उड़ान | 
चलते पंछी ‌ पंख सब,  करें साथ में गान || 

देखा है साहित्य में  , मन  जब  भरें उड़ान |
माता शारद भी वहाँ ,   देती  उसको ज्ञान  ||

जब उड़ान की सोचना , इतना  रखना ध्यान |
लिख जाए इतिहास में , मानव का  कल्यान ||

लखनलाल के प्राण हित , हनुमत भरें  उड़ान |
जग में यश   चर्चा हुई ,    दिया  राम ने  मान || 

रावण   से  संघर्ष   कर ,  तजे  जटायु  प्रान |
अमर  जगत में हो गई , उसकी  यहाँ  उड़ान ||
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पत्नी को सब मानिए  , जीवन में  शुभ गान |
उसके आते घर लगे , ज्यों आई     मुस्कान || 

पत्नी शांत न बैठती ,  यदि पति का अपमान |
अवसर जब ऐसा  मिले ,करें तर्क वह आन  || 

रौद्र  रूप  जब धारती , बनती  चंडी  मात |
प्यार मिले  पतिदेव का,  बनती पूनम रात  || 

भिड़ जाती यमराज से , बन   सावित्री   रूप |
पत्नी रानी रूप  ले  , पति    को समझे भूप ||

रहता पति के प्यार पर , पत्नी  का अधिकार | 
जीवन में   रंगीन  तब , उसका शुचि   शृंगार ||


बड़ी   तपस्या   से मिले  , पत्नी  नखरे  बाज |
रखो  समस्या गेह में    , रहे  गुप्त  यह  राज || 

पत्नी जब तक  प्रेमिका , शक्कर -सा है   प्रेम |
जिस दिन बनती मालकिन, बज उठता है गेम || 

सुबह शाम बस देखिए  ,  दिखे   प्रेमिका ओज |
शेष समय पत्नी  तनी , चिक-चिक करती रोज ||

सपने  में  आती    रहे   , देकर  जो   मुस्कान |
बनकर   पत्नी   गेह  में   , लाती  है     तूफान || 

पत्नी  जब तक प्रेमिका , हम सब है  गुलफाम |
पर  जोरू के एक  दिन  , बनते  सभी   गुलाम ||

जिसको  उपमा में लिखा , पुष्पों  की  मकरंद |
जिस दिन पत्नी बन गई , सभी बिसरते   छंद ||

चाँद   सितारे  तोड़ता  ,  देकर  जो   आबाज  | 
वह पत्नी आदेश.  पर  , छीला  करता प्याज ||

पत्नी जब   तक   प्रेमिका , लगती  है  ब्रम्हांड  |
जिस दिन घर में आ गई, बनती विकट डिमांड ||

दोहे  लिखे विनोद  यह  , पत्नी घर  की  शान  | 
कह सुभाष मानो उसे  , जीवन  में  शुभ गान ||

पत्नी का  सानिध्य है , ग्रीष्म  ऋतु  में  शीत | 
शीत काल में ग्रीष्म है , सदा    तुम्हारी  मीत || 
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जिससे भी  वादा करो, सदा  निभायें  आप |
यही विश्वास आधार ले ,दे  जीवन  में  छाप || 

आन वचन की जो रखे , सब करते विश्वास |
करता ईश्वर  भी मदद , दूर  करे सब त्रास || 

प्राण दाँव पर  जब लगे  , जहाँ वचन के धर्म |
ईश्वर  पर  विश्वास  से , निभ  जाते  है  कर्म || 

आहत मन  होता  सदा ,  टूटे  जब‌  विश्वास |
जो भी   इसको  तोड़ता , भोगें  आगे  त्रास || 

ईश्वर पर विश्वास रख , करो  नेक सब काम |
जीवन  के  आनंद   में ,     दर्शन   देगें  राम || 
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हिंदी दिवस , विषय मुठ्ठी‌

जिसकी मुठ्ठी बंद है , उसकी कीमत  लाख | 
खुली जहाँ पर देखते , लगती सबको राख ||

दुनिया  का  दस्तूर  है  , जिसकी   मुठ्ठी‌ बंद | 
उसको सब  सम्मान दें , और‌‌  सुनें सब छंद || 

खाक खुली  मुठ्ठी कहें ,   कहते  बंद  हजार | 
है  रहस्य कुछ    बंद ‌में , कहें  खुली  बेकार || 

मुठ्ठी  बाँधें  आप  जब , ताकत भरती  ओज |
इसमें  कितना  राज है ,  करते दुश्मन खोज ||

तानी  मुठ्ठी  जब  कहीं  , बन  जाती तलवार | 
दुश्मन   पीछे  भागता , करता  सोच  विचार || 
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दोहे -राम

आज अवध को  देखिए , राम नाम जयकार | 
रामलला अब जा  रहे , जन्म भूमि   के द्वार || 

राम  सत्य  विश्वास  शुभ , राम   हमारे   भान  |
जो समीप आता नहीं  ,  जानो  मृतक समान ||

राम रटो या राम कह , राम सुमिर लो नाम | 
है समीप जो राम के  ,  मिले राम का धाम ||

अवध पुरी के  राम से ,  रामामय   संसार | 
पवन पेड़ पत्ते हरे ,    सबमें   राम   बहार || 

राम हमारे प्राण  है , अवध पुरी शुभ धाम | 
हम समीप हो राम के,     सो रटते श्रीराम ||

राम-राम      अभिवादनम् , राम  हमारे  हर्ष | 
राम कृपा बस लक्ष्य है , मिले अवध नृप दर्श ||

सुभाष सिंघई 

है दिनांक बाईस शुभ , माह जनवरी जान |
दो हजार चौबीस को , मुदित हुए हनुमान ||

मुदित हुए  हनुमान है , सुन मंदिर निर्माण |
रामलला के  हो गयेे  , यहाँ प्रतिष्ठित  प्राण || 

जिसे राम से चिढ़ लगे , पीटे अपना   माथ | 
नहीं उन्हें बुलबा रहे  , धाम  अयोध्या नाथ || 

पप्पू   पप्पी  पोनिया  , अड़गे   जी भी दूर | 
नहीं भाग्य इनके लिखा , राम दर्श का नूर ||

ठुकराया श्री राम का , मिला निमंत्रण मान |
कहाँ मंथरा चाहती , रहे   राम   की   शान || 
मंथरा   बेटी    जेठी 
पोनिया लगती  हेठी ||

डला  अंडगा है  जहाँ  , अड़गे जी की छाप |
पप्पू   पप्पी  पोनिया , घर    बैठे   चुपचाप ||
वोट की चिन्ता  करते  |
कहीं से   दम को भरते ||

नहीं    अयोध्या    जायगें ,  कहें   पोनिया    साफ |
कल मस्जिद भी बन रही , क्या उस दिन भी माफ || ?
पूछता  इनसे    भारत |
लिख दो आज इबारत ||

विगत पाँच सौ वर्ष  तक  , रहा  राम वनवास | 
अब दिनांक बाईस को ,  बदल रहा इतिहास || 
राम को जपते जपना |
मानना मेरा कहना ||

वहाँ  निमंत्रण क्या करे , फूटे  जहाँ   नसीब |
दर्शन उसको  ही मिले, जो   है राम  करीब ||
पोनिया  किससे समझे |
जहाँ  पर पप्पू   उलझे ||

मिला निमंत्रण राम का , आया था सौभाग्य |
अपनाया दुर्भाग्य है , किया निमंत्रण त्याग्य ||
पोनिया   पप्पू    पप्पी |
त्याग दी प्रभु की झप्पी || 

राजनीति चलती रही , हुआ बहुत नुकसान |
पर  मंदिर निर्माण का ,  करना था सम्मान ||
कौन उनको समझाये |
अक्ल जब चरने जाये ||
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हिंदी- बच्चे

बच्चे होते है सदा , भोले-से  भगवान |
रहे कपट से दूर वह , रहते  है नादान || 

बच्चे नन्हें  फूल सम ,   देते  हैं  मुस्कान |
खिलते रहते  गेह में ,लगे उदित से भान ||

बच्चे सच्चा मन रखें  , छल से रहते दूर |
बनते नेह प्रतीक हैं ,  घर में  दिखते नूर || 

बच्चे जब गल्ती करें , कह  देते नादान | 
देते उसको सीख हैं, और खींचते कान ||

बच्चे को देते सदा , घर   में सभी दुलार |
सदाचरण अंकुर करें , जो लगते उपहार  ||

बच्चे बूड़े जा रहे ,   सँग में  दिखे जवान |
धाम अयोध्या जा रहे , करें राम गुणगान || 

मात-पिता बच्चे चले , आज अयोध्या धाम |
जन्म भूमि पर आ रहे, रघुपति राजा राम || 
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हिंदी विषय - रोग 

मन के भी कुछ रोग है , जिनको  पालें लोग |
कहते जिन्हें विकार हम , तन से करें नियोग ||

कोई   हठ पर  है अड़ा , हठी  रोग  पर  गर्व |
कोई  रहकर शांत भी   , कर्म   मानता  पर्व || 

जिनकी रोगी   कामना ,उनका अलग विलाप |
चिल्लाते   कुछ  रोग  हैं , कुछ रहते चुपचाप ||

लोभ रोग जिनको लगा , करते सदा ‌कमाल |
अपने  हित को देखकर ,करते  रहें   वबाल ||

मिटें न  मन   के रोग हैं ,  तन के करें  इलाज |
कह "सुभाष" संसार में,सबके अलग मिजाज ||
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हिंदी विषय - मदहोश 

आज दिखें संसार में , लोग  बहुत  मदहोश  |
खुद को वह निर्दोष कह , दें दूजों को दोष ||

रहें सदा  मदहोश  जो , बंद रखें  वह कान | 
नेत्र  नहीं निज  खोलते ,    पर   बैचें  ईमान || 

कोई  धन में  है  जुटा , जोड़ रहा  है कोष  | 
लगा रहा अम्बार है  , रहता  वह   मदहोश || 

कोई मद पीकर यहाँ , रहता  खुद मदहोश |
बात गलत सबसे करे , दिखलाता है जोश ||

खो देते मदहोश में , जन जब यहाँ विवेक |
करते हरदम है बहस  ,छोड़ काम सब नेक || 
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हिंदी दिवस , विषय - पथिक 

सूरज चंदा दो पथिक , करते सदा उजास  | 
हँसते रहते गगन में   ,  होते  नहीं  उदास || 

दौलत रहती है पथिक , करती भागम भाग |
चंचल मन इसको कहा , नहीं किसी से राग ||

जीव जगत में है पथिक , कब करता आराम | 
हाँपा करता   रात दिन , सुबह दोपहर  शाम || 

नारद   रहते  है  पथिक , नहीं  करें  विश्राम | 
खबर विश्व की जानने  , घूम  रहे  अविराम ||

हम- तुम भी हैं इस जगत , एक पथिक के रूप | 
मिलो प्रेम  से आनकर , रखकर   भाव  अनूप || 

नाक का सवाल - (मुहावरा दोहावली) 
राजनीति में नाक ही , अब  बनती  है  ढाल  |
नेता भी  हर  बात  में , इसका रखते ख्याल  ||1

हर अवसर पर नाक की ,इज्जत रहे  सवाल |
हार जीत का खेल ही  , देता    हर्ष   मलाल || 2

ऊँची ‌होती नाक जब  ,  होते   भाव   विभोर |
नीची  दिखती    है जहाँ , सब  करते  है शोर  || 3

गलत काम पर  नककटा , कहता सदा समाज |
ऊँची   होती   नाक  है , जब अच्छा  हो  काज ||4

नाक कटाकर कब मिले ,दुनिया में  सम्मान |
शूर्पनखा   को  देख   लो , घूम  रही  मैदान  || 5

हार जीत   के खेल   में , हाथ  पैर  का  काम |
फिर भी मिलती हार जब, कटे नाक की चाम  ||6

सीमा  रेखा  लाँघते ,  मन के   सँग  दो  पैर  |
दाग लगे पर नाक पर , सहती   सबसे   बैर ||7

कह भी  देते लोग है ,  कौन  लगाकर  नाक |
आए फिर से   आप हो , यहाँ  जमाने  धाक || 8

आँख ‌करे   अश्लीलता , हाथ  पैर    नापाक  | 
मन का धन यह तन करे , पर कटती है नाक ||9

बड़ी नाक जब आपकी , क्यों  हैं  छोटे  काम |
कह देते सब लोग हैं , मुख पर   ही  अविराम || 10

आँसू दुनिया पोंछ दे , पर  मत  पोंछे नाक |
लोग यहाँ बस देखते , कहाँ नाक पर चाक ||11

नाक बचाना अब कठिन , रखकर इसका नूर |
लोग  काटने  घूमते ,    करें     घात    भरपूर ||12

मख्खी   बैठे  नाक पर , खुद जाता है ध्यान |
लोग देखकर  हँस   पड़े , करते  है  अपमान ||13

नाक नरम भी जानकर , नथनी   देते  डाल |
अंग  बता   शृंगार का , करते  उसे  हलाल || 14

चश्मा चढ़कर नाक पर , करे सुरक्षित नैन |
गड्डे    पड़ते  भार   से ,  रहती    है  बैचैन || 15

बेटे की भी   बाप   से , करते   नाक  मिलान |
जिसकी मिलती है जरा ,असल कहें पहचान  ||16

नाक   प्रियंका  देखकर , आए थे कुछ व्यान |
लगती   दादी   इंदिरा , खूब ‌‌‌   चले‌   थे  गान  || 17

नाक  बिचारी  क्या  करे ,शीत ताप के काल |
रोने   लगती  छिद्र  से ,  हो   जाती ‌ है  लाल ||18

दिखते सबको नाक के ,कुछ- कुछ अलग स्वरूप |
चपटी   चौड़ी  लम्बवत , कुछ   की  लगती   कूप ||19

नाक साफ  रखते  सभी , सेवक   है  रूमाल |
कुछ तो अपने   हाथ    से , देते   रहते   ताल | |20

अब "सुभाष" जितना लिखा , मैने नाक पुराण |
सत्य लिखा या है गलत ,   देखें   आप  प्रमाण ||21

©®सुभाष सिंघई  जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
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हिंदी दिवस,  विषय - नदी / नदियाँ 

नदियाँ सब अनमोल हैं , जग में  शुभ वरदान | 
जल बारिश से जब भरें , प्रमुदित रहे किसान ||

गंगा यमुना  शुभ   नदीं , भारत  के भू  भाग |
मिलीं   शारदा  गुप्त हैं  , पावन तीर्थ  प्रयाग || 

नदी रोककर बाँध भी  , जल भी रखें अथाह |
खेतों  को जब सींचते , फसल बोलती  वाह ||

नदियाँ उद्गम हों जहाँ , दिखतीं  तब  लघु रूप |
दीर्घ  जहाँ आकार लें  ,   लगती   बड़ी  अनूप || 

नदियाँ  भारत   देश   में , मैया   माने  लोग |
आदर भी जन दे यहाँ ,   जाने   सदा सुयोग ||

नदियों  का    संदेश   है   , कोई नहीं  अछूत | 
देती  सबको   अंक  है , मानें   अपना    पूत |

नदियाँ  आहत हो रहीं  , सहती हैं अब  कष्ट | 
मानव  डाले  गंदगी  ,   पावनता   कर   नष्ट || 

सुभाष सिंघई
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मूँछ पर दोहे  (मूँछ-मुच्छड़ पुराण दोहावली )

मूँछ पर दोहे  (मूँछ-मुच्छड़ पुराण दोहावली )

मुच्छड़   ऐसा   मानते , मूँछ   मर्द की शान |
भिन्न रखें आकार कुछ , दें अपनी  पहचान ||1

कुछ रखते हैं मूँछ का , पूरे  मन  से  ख्याल |
हाथ   लगाकर   ऐंठते ,चलते हाथी   चाल || 2

मूँछ देखकर नाक  भी , होती  सदा  प्रसन्न |
रक्षक अपना मानती , कहती   हम   है टन्न || 3

पतली   मोटी  मूँछ   रख , देते   हैं आकार |
रखें नुकीली  लोग भी , जैसे   हो   तलवार || 4

झगड़ा झंझट हो जहाँ , दें  मूँछों  को  भाव  | 
दुश्मन भी जाता सहम , देख मूँछ का ताव ||5

करते  ऊँची  मूँछ भी ,जब मिलती  है जीत | 
चार लोग सम्मान में   ,  आकर करें  प्रणीत  || 6

मुच्छड़ कहते   हैं कभी , यहाँ  मूँछ  का बाल |
कीमत रखता लाख यह , रत्न समझता लाल || 7

पहलवान भी   मूँछ   से , पहले   देता  ताल | 
कुश्ती जीते तानता ,    पुन:   मूँछ   के बाल ||8

मूँछ नहीं तो कुछ नहीं , मिल जाता है ज्ञान |
इससे बढ़कर मूँछ का , और कहाँ सम्मान ||9 ?

मानव तन में शान की ,  मूँछें   बनी  प्रतीक |
इस पर अच्छे कथ्य हैं , लगते सभी सटीक || 10

मूँछ मुड़ानें की  कहें   , जहाँ  शर्त की  बात |
मूँछ  लड़ाई भी सुनी , जब चल उठती घात || 11

रौब जमाते मूँछ से , करते  कुछ   विस्तार | 
कहते यह संसार  में ,   मर्दो   का  शृंगार || 12

मान मिला जो मूँछ को , बैसा है  किस ओर |
मुख मंडल की शान यह , मानें  इसका जोर ||13

बाल बहुत रखता वदन , पर मूँछों के बाल |
बेशकीमती सब रहें , कीमत  में हर   हाल ||14

दुश्मन से भी बोलते , मत  करना  तू  बात  |
मेरी  मूँछों  सम   नहीं , तेरी कुछ औकात ||15

रखो  मूँछ की शान सब , अच्छा रखो चरित्र |
मूँछें  चमके  आपकी , जैसे   खिलता    इत्र ||16

इज्जत रखते  मूँछ की , सभी   जानते   धर्म |
इसीलिए मुच्छड़ करें , सोच  समझकर कर्म ||17

बिना  मूँछ   का आदमी ,क्या   जानेगा  शर्म  | 
मूँछें    देतीं     ताजगी ,  नहीं  जानता  मर्म ||18

बिना मूँछ का नर यहाँ , बिना   पूँछ का ढ़ोर |
यह दोनों  कब जानते , इज्जत है किस ओर  || 19

बहुत  कहानी   है  पढ़ी , जहाँ  मूँछ के बाल |
दिखला आए शौर्यता , जिसमें  दिखा कमाल ||20

खिल भी जाती मूँछ है , जब  आती   मुस्कान |
लिखकर मूँछ पुराण ही , आया मुझको ज्ञान ||21

मूँछें  रखकर   देखिए ,   जानो  जरा   प्रताप |
मुच्छड़ के   सम्मान  से   , हर्षित  होगें आप || 22

मूँछ कटाना पाप है, जिस दिन किया विचार | 
उस दिन जानो आप है ,     मर्दो  के  सरदार || 23

मूँछ     देखकर  नारियाँ  , देती   हैं   बहुमान |
आदर  सँग सत्कार दें   , अपना   घूँघट  तान ||24

जब तक जिंदा है पिता , हिंदू   रीति  रिवाज |
नहीं मुड़ाते   मूँछ को , जाने   सकल समाज || 25

बाबा दादा  सुत पिता , दिखें   मूँछ  के चित्र  |
मुच्छड़ यह परिवार है , कहते मिलकर मित्र ||26 

मूँछें  बढ़ती   गाल तक , आगे  बँधती कान | 
बुक गिनीज में दर्ज का , मिल जाता सम्मान || 27

एक विनय सबसे करुँ , यदि हो उचित सलाह |
मुच्छड़ हो  हर आदमी , कहे  लोग वश वाह ||🙏28

मूँछ  हमारी   शान   हो , मूँछ   बने   पहचान |
मुच्छड़ घोषित हो दिवस , अपने    हिंदुस्तान ||🤑29

मूँछ  चिन्ह ध्वज में  बने,   लहराए  आकाश |
कायरता  आए   नहीं   ,    रहे शौर्य आभाष || 🤔30

मुच्छड़ श्री   सम्मान का , होवें   शुभ   आरंभ |
किसी तरह वश मूँछ का , बना रहे अब  दम्भ ||🤓31

मूँछकटे  है   मुँछकटा ,    हो  ऐसा  फरमान | 
नाक कटा   ज्यों  नककटे ,  कहलाते  इंसान || 🤓32

राजा -महराजा   हुए ,  चित्र   देखिए  आप |
सबने अपनी मूँछ का , उच्च  रखा  है  माप ||33🙋

मुच्छड़ सेना भी बने,  जिसकी रहे दहाड़ |
दुश्मन को ऐसा लगे, सम्मुख खड़ा पहाड़ ||34🙄

नकली मूँछों से अभी  , मुच्छड़ बना  सुभाष |
आगे असली अब रखूँ  ,आया  हृदय  प्रकाश ||😄🙏35

©®सुभाष सिंघई
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जन्म दिवस शुभकामना दोहे 

प्रियवर करता आपका , अभिनंदन  शत बार |
जन्म दिवस शुभकामना,करो आप स्वीकार ||🌹

आज  बधाई  दे   रहा , जीवन की पग चाल  |
सदा  यशस्वी  ही  रहे,   उन्नत  करती  भाल || 🌹

मित्र  आपके  इत्र  हों , सदा   निभाएँ  साथ |
जीवन  के  संग्राम  में  , रखें शक्ति द्वय हाथ ||🌹

नाम आपका यश लिए , कुल गोकुल हो   गेह | 
मिले कृष्ण- सा आपको , सबका अनुपम नेह ||🌹

हर्षित   मेरा   है  हृदय ,   भेज    रहा   संदेश | 
सदा धर्म की छाँह में   , शुचिमय   हो परिवेश ||🌹
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शब्द- फाग / फागुन (दोहा ) 

भीगे  चूनर  प्रेम  से , फागुन का क्या   काम |
गोरी कहती धन्य मैं  , अगर  पिया  ले  थाम ||

प्रीतम खेलें फाग अब  , करती मन में ख्याल |
सजन न आए अब तलक ,गोरी करे   मलाल ||

आई   होली   फाग   है  , जलती  गोरी   देह |
सजन  नहीं    परदेश से ,   लौटे  करने   नेह ||

गोरी   का  घर  पास  है , रखते  भी कुछ चाह |
फाग खेलने को मिले , जब   वह   आए   राह || 

फागुन   लगे  सुहावना , उड़ती    रंग   गुलाल | 
गायन चलता फाग पर ,  होते    सभी  निहाल || 

बजती चंग  मृदंग है  , ढोलक  पर  भी  तान |
फागुन  माह सुहावना , चले  फाग  पर  गान || 
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हिंदी विषय - नम्रता  ( न म् र ता )

दिखे  नम्रता  नीर  में , पत्थर  में  अभिमान |
पत्थर  टूटे   चोट   से , नीर   न   टूटे  आन ||

जहाँ  नम्रता  डाल में  , झुकती  फल के हेत |
रखवाली   रक्षा   मिले ,   माली   रहे  सचेत || 

रहती  रस में  नम्रता  ,जब  पकता  है आम | 
आकर वह  बाजार में ,  मँहगा  रखता दाम ||

रखे धनुष भी नम्रता , जब   चढ़ता  है बाण |
करे लक्ष्य संधान वह , इसका मिले प्रमाण || 

दिखलाते   जब  नम्रता , ऊँचे  पद   के  लोग | 
जय-जय जग करता सदा , मानें उसे  सुयोग ||
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विषय दोहावली - कौड़ी 

कौड़ी रखता साधु है , रखे चार  की आस |
फूटी कौड़ी जानिए , उसको सदा 'सुभास' || 

चार  नहीं हैं गृहस्थ घर ,  लाने  नहीं  विचार |
तब दो कौड़ी आदमी  ,  माने   यह   संसार ||

कौड़ी दर  कौड़ी  बढ़े, बनते  वहाँ   करोड़‌ | 
यह करोड़ तब  टूटता , जो  कौड़ी दें छोड़‌ || 

कौड़ी का क्या मोल है , भूल     गया   इंसान |
फिर भी कौड़ी आज है , इज्जत का प्रतिमान || 

फूटी  कौड़ी भी यहाँ , सबकी   ‌सुनी  जुवान  |
तब 'सुभाष' ऐसा लगा, यह रखती  पहचान  ||
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विषय - अवनि

पूज्य अवनि को   मानते , देते  है सम्मान |
तभी विश्व में नाम   है , अद्भुत  हिन्दुस्तान ||

कहते माता है अवनि , करें  नदी  की  सेव  |
सूर्य अग्नि शुभ चंद्र को  , माने भारत  देव ||

पानी आँचल में   रखे  , अवनि  उगाती अन्न |
वृक्ष  फूल फल  गेह दे ,  रहते जीव   प्रसन्न || 

अपना  अच्छा   आचरण , बनता    है  आधार |
अवनि   साथ  देती  सदा , करने जन  उपकार || 

आसमान में जो चलें,  नियम अवनि के  छोड़ | 
उसको  जीवन   में   मिलें  , आड़े   टेड़े   मोड़‌ || 
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होली (फाग )  पर दोहे 

भींजे  चुनरी प्रेम की , फागुन का यह  काम  |
गोरी कहती  धन्य हों ,अगर  पिया  लें  थाम ||

सैयाँ खेलें फाग अब  ,आता   मन में  ख्याल |
पर वह बाहर खेलते    ,गोरी   रखे    मलाल ||

बिना बलम की फाग है,  जलती  गोरी   देह |
सजन  नहीं    परदेश से ,   लौटे  करने   नेह ||

गोरी   का  घर  दूर  अब , रखते  सब हैं  चाह |
फाग खेलने   रंग से  ,   गुजरे    वह इस राह || 

फागुन  लगे सुहावना , उड़ती    रंग   गुलाल | 
फागें  सुनकर ‌ ईसुरी ,   होते   सभी  निहाल || 

बजती चंग  मृदंग है  , ढोलक  भी   दे  तान |
फागुन  माह सुहावना , चलें   फाग पर गान || 

होली सखियाँ खेलतीं  , लाल हुए है गाल |
झूमर जैसे लग रहे  ,  लटकत काले बाल || 

गाल चिकोटी  काटतीं , सखियाँ करें  कमाल |
होली   सैंया  घर   हुई , सभी बताओ   हाल || 

हुरयारे  बाहर  खड़े  ,   लेकर  रंग   गुलाल | 
गोरी  अंदर है  छिपी , बाहर  दिखे  धमाल ||

होली की कहतेे सभी  , चढ़ता  अजब खुमार |
जो भी आता    सामने ,     करे   रंग से   वार || 

ब्रज की होली देखिए  ,  होती   लठ्ठम   मार | 
पिटते  रहते लोग सब , सहे    पीठ पर  वार ||

होली है  यह जिंदगी , इसके  रंग  अनेक |
करने हमको कर्म भी  , मिलें  एक से एक ||
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दोहे- हवा   चली कुछ  इस तरह

हवा   चली कुछ  इस तरह , वसन उड़ें ले  मोड़ |
अपनी संस्कृति  सभ्यता , लाज-शर्म   दी छोड़‌ ||

कहते   यह   शृंगार  है   , कवि  माने साहित्य |
मंचों पर जो पढ़ रहे  , कवियत्री   लालित्य ||

हम सुभाष यह सोचते   , समझ न आवे कृत्य |
कवियत्री हो  मंच  पर , कवि क्यों करता नृत्य || 

कविगण आज परोसते , हास्य  व्यंग्य  के नाम |
लगता पूरा चुटकुला  , कवि सम्मेलन शाम ||

आज हवाएँ कह रहीं     ,युग   परिवर्तन शील |
रक्षक भक्षक  बन  गये , रहे  सभी  को   लील || 

समय नजाकत  देखकर  , देव  हुए   खामोश |
सदाचरण के नाम पर  ,  असुर दिखाते  जोश ||
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हिंदी विषय - झूला 

झूला डाले   डाल पर , लली  रही  है   झूल |
गीत मधुर भी गा रही , सुनकर हँसते  फूल  ||

मोर  आज  है नाचता , बादल अति घनघोर |
झूला हिलते  डाल के , पवन चले झकझोर ||

सावन में  झूला दिखें , झुक-झुक जातीं डाल |
ललनाएँ  सब  झूलतीं ,    होतीं  सदा निहाल ||

यसुदा  झूला  डालती ,   बैठे  नंद  किशोर |
डोरी लेकर खींचती , होती  भाव   विभोर || 

यमुना के वट वृक्ष पर , राधा के संग श्याम |
झूला  झूले   प्रेम  से , लगे    सुहानी  शाम ||
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चरण- तेरे अपने कर्म 

जो भी फल मिलता यहाँ   , तेरे  अपने कर्म |
कब जाना   इंसान ने,   विधि का गहरा मर्म ||

तेरे    अपने   कर्म  से ,  बनते   है  परिणाम |
भटकेगा   संसार  ‌में    ,  या  पाए प्रभु धाम ||

जो आया  है  हाथ में ,      तेरे  अपने  कर्म |
गौरव करना  मान ले , या कर ले कुछ शर्म || 

तेरे  अपने  कर्म ‌ शुभ   , बन जाते   है फूल |
खोटापन यदि कुछ रहे , उग  आते तब शूल ||

तेरे  अपने    कर्म  ही ,    देते  है    सम्मान |
खोटी जब संज्ञा  रहें , तब मिलता विषपान ||
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चरण -"खुदगर्जी की प्रीत"

सबके अपने स्वार्थ है , खुदगर्जी    की प्रीत |
अच्छा कौन विचारता , कौन चले अब नीत ||

देखें हम संसार में , खुदगर्जी  की  प्रीत |
सभी चाहते यह सदा , मेरी हो अब जीत ||

खुदगर्जी की प्रीत में , नहीं    दिखे कुछ सार |
मतलब का ही रस दिखे , नहीं रहें कुछ प्यार ||
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चोर दरोगा साथ हों  , रह जाना तब मौन |
लूटपाट की छूट हो , रोकेगा  फिर  कौन || 

रोकेगा फिर कौन अब , जहाँ खुली है छूट |
लोकतंत्र के   नाम  पर , करते रहिए  लूट || 

उगता हर दिन सूर्य ज्यों , लेकर अपनी छाप |
बैसी   देना  रोशनी , जग    को   सुंदर आप ||

उगता हर दिन सूर्य ज्यों , लेकर धवल प्रकाश |
देता तब संदेश शुभ , तम  का  करो   विनाश ||

उगता हर दिन सूर्य ज्यों , देता गति से ओज |
बैसा करिए आप सब , मन में रखकर खोज  ||

गला काट थी गालियाँ , रहे विषम  सम्वाद  |
राजनीति में मित्र बन , पिछला करें न याद  ||
यही   नेता   की   जातें |
समझना मुश्किल बातें ||

कौन किसे अब  दे रहा , राजनीति में भाव |
गठबंधन में भी देखिए , सबके अपने  दाव ||
बने सब  ताकत वाले |
लगाते   अपने   ताले ||

आज देश में कर रहे ,   नेता  खूब  सबाल |
वेशर्मी  खुद ओढ़ते , मोटी   करके   खाल ||

अनुदानों की भीख का, लालच रहे  दिखाय  |
जनता की बस जेब में,  वोट इन्हें दिखलाय  ||

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पढ़ता रहता है पिता, निज बेटे का चाव  |
माँ बेटी की  आँख  के, पढ़ती पूरे  भाव ||

कभी बहकते देखता , कभी  सम्हलते पाँव |
दोनों हालत में पिता,   देत   नसीहत  छाँव || 

सह लेती माँ भूख को , दे संतानों को अन्न |
खाते जब मिष्ठान वह  , होती  सदा प्रसन्न ||

बेटी की हर बात का , माँ के   पास जवाब |
बेटे  का रखता पिता , पूरा   सदा  हिसाब || 

किलकारी घर में रहे , करता पिता प्रयास |
माता जिसे सँवारती , भरती   सदा उजास ||
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उल्टे दुमदार दोहे~

निंदक का मुँह देखकर  , अपना   लेना मोड़ |
जो कुछ   बोले आपसे , देना  उसको  छोड़ || 
मुफ्त के मिली सलाहें  |
दिलाती  सदा   कराहें ||

बड़ा हुआ   अच्छा लगे   , जैसे पेड़  खजूर | 
नीचा   रहता वह   अगर,  होता  चकनाचूर || 
जमाना    पूरा    बदला |
नहीं जी सकता अबला ||

मिले बड़ों का संग जब   , लघु   दीजिए  डार |
लघुओं को डर दीजिए  , दिखलाकर तलवार ||
‌सदा वह काम करेगें |
घर को साफ रखेगें ||

चलती  चक्की    देखकर,  खूब करो खरयाट  |
लोहा     उसमें    डालकर, फोड़ो  उसके  पाट  ||
देखकर कभी न रोना |
चैन से घर में  सोना ||

जो तुझकों काँटा बुबै,  उसको  बोना   बम्ब |
एक बार में वह दिखे , उछले दस फिट खम्ब ||

माला फेरत जुग गया , थककर है जो चूर  |
ऐसी माला  टाँग दो ,  मौज   करो  भरपूर ||
जिंदगी  मस्ती की है |
बताने   हस्ती  की है ||

कंकण पत्थर जोड़कर, करना खड़ा मचान  |
दुनिया वालो से कहो ,  अच्छा बना मकान || 
किसे है  समय देखने |
रूतबा   लगो  पेलने ||

ज्ञान पढ़ो जल्दी नहीं,  जीवन   लम्बा जान  |
फुरसत में पढ़ लीजिए ,जब हो मन में गान  ||

दोहे जब सीधे करो , करना   तभी   विचार  |
कह "सुभाष" संसार में ,सत्य कहाँ अखबार || 
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टी वी पर जो देखते , नेता   नए   किसान |
ज्ञात नहीं उनको जरा , कैसी उगती धान ||

लाखों लेकर  फैसला , अफसर बड़ा महान |
फाइल   खोजी   बीस में ,   बाबू    बेईमान ||

दो   फिट  गड्डा   खोदकर , शौचालय    निर्माण |
रिश्वत की दम देखिये , दस फिट मिला  प्रमाण ||
 
हाप   कमीशन काटकर , दिया   कर्ज का दान |
बोट दिया माफी मिली , खुश है आज किसान ||

बैठ गये है राम जी ,जन्म भूमि  निज धाम |
अब जनता भी कह उठी, आगे मोदी काम ||

फूफा सब फूले रये ,     रहे काज से दूर | 
पुचके-पुचके अब दिखे,लगते है मजबूर ||


गठबंधन की आड़ में , ठगबंधन की बात |
ठगियाँ ठगने घूमते,   लेकर  मीठा  भात ||

कुर्सी गठबंधन दिखे , मिलते  नहीं  उसूल |
राजनीति चौसर बिछी , चालें चलें फिजूल ||

राजनीति   में आ  गये ,  जब   मेरे  श्रीराम |
तब हम करते वोट है  , आज राम के  नाम ||

चुनकर वह नेता बने , चुनना उनका काम |
जैसे  को  तैसा  करें , नेता  जी  अविराम ||
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दोहावली -  बाबा ऊटपटाँग 

राजनीति में दिख रहे , अजब तरह के स्वाँग |
कई   तरह के  व्यान है ,  लगते   ऊटपटाँग ||

कुछ तो   ऊटपटांग.  है , पर   नेता   की छाप |
कुछ पप्पू कुछ दीदियाँ , कुछ की अपनी खाप ||

तामझाम  पूरा  चले ,  लम्बा  ऊटपटाँग | 
सार हीन वक्तव्य दें ,  जैसी  खाई  भाँग ||

यह  मोदी भी देश में , अपनी  रखते माँग |
कैसे  गद्दी  पर जमे   ,  बाबा  ऊटपटाँग || 🤑🤭

भाषण सुनकर सोचता , करना  है स्वीकार |
बाबा   ऊटपटाँग का  , उदय हुआ अवतार || 🤭🙄

बाबा ऊटपटाँग  का ,  मजेदार   है   ज्ञान  |
डाल रहा है  कोयला , जहाँ तेल की आन  ||😁🤑

 आजादी का था "पथिक"  , नाम  रखा "आजाद" |
आज शहीदी पुण्य तिथि, हम   सब करते   याद ||

दोहावली , गुस्सा वाली बीवियाँ 🤑

गुस्से वाली   बीवियाँ , होती   हैं   जिस   गेह |
काम समय पर हों    सदा , बना रहे शुभ नेह ||

पति    आता है शीघ्र घर , चुपके-चुपके  पाँव |
गुस्सा बीवी    दूर कर,     दे   बच्चों को छाँव ||

गुस्सा बीवी जब करे,    कुल का  मिले वखान |
याद तभी इतिहास कर, खुद की कर पहचान ||

गुस्सा   बीवी जब   करे ,  रहे   पड़ोसन   दूर | 
वर्ना उसकी    कुंडली‌ , खुल   जाती   ‌भरपूर ||

गु‌स्से  वाली   बीवियाँ  , घर    में पुंज  प्रकाश |
बिन माचिस के देखिए , घर   में  रहे   उजाश || 

बीवी   यदि   गुस्सैल   है ,  बड़भागी ‌हैं  आप |
सदा  मुहल्ला भी डरे  , मिल मत  जाए  श्राप  || 

गुस्सा   वाली  बीवियाँ  , होती   है    दमदार | 
मँजनू  घर  के सामने , टिकें  नहीं  पल चार ||

शक्ति प्रदर्शन नारि का , दिया शर्ट को कूट |
धोने बाली  बाइ ने , किया   अधमरा   शूट ||
पजामा सिर को पकड़े |
मिले है    झटका तगड़े ||🤔🤓🙄😄🙏
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हिंदी - जन्मदिन

जब भी आए जन्मदिन , करिए आप विचार |
घटा वर्ष  अब  एक है , जो   पाए   थे   चार ||

सभी मनाते   जन्मदिन , करते   हर्ष   अपार |
पर अब तक है क्या मिला , करते नहीं विचार ||

यह   काया   माया  यहाँ , फैलाती  है  जाल |
जिसमें आता जन्मदिन , हर्षित हम हर साल ||

कहता यह  भी जन्मदिन , चिंतन करिए आज |
क्या पाया   खोया  यहाँ , जग में करके काज  ||

जब भी आए जन्मदिन , चिंतन करो " सुभाष " |
इस जीवन की राह में , कितना  मिला  प्रकाश || 

सुभाष सिंघई
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चरण - क्या जाएगा साथ में
(दोहे हम हास्य व्यंग्य में ले गये है , पर सच्चाई लिए है )

क्या जाएगा साथ में , करता कौन विचार |
वर्तमान में मग्न हैं , रहकर   घर   परिवार ||🤔🙏

क्या जाएगा साथ में , अभी नहीं अवकाश |
इस पर करें विचार क्यों , समझों बात 'सुभाष' ||🤗🙏

अभी  जवानी है  चढ़ी , छाया  कुछ उन्माद |
क्या जाएगा साथ में , अभी करें   क्यों याद ||🤑🙏

मस्ती का आलम मिला, घर  मेरा  आबाद |
क्या जाएगा साथ में , अभी करें क्यों याद || ? 🤗🙏

क्या जाएगा साथ में , बूड़े    करें   विचार |
अभी हमारा    मस्त है , पूरा  घर   संसार ||🤭🙏

नेता    का   भावार्थ   है,  जन नेतृत्व ‌सुयोग |
आदर्शों  प्रतिमान से, हर्षित हों  सब लोग ||

नेता  का    भावार्थ  है ,   जन    सेवा   संकल्प |
निर्णय लेवें राष्ट्र हित   , समय दिखे  जब अल्प ||

छल बल धन बल बन गया , दुनिया का दस्तूर |
दीन    धर्म   मजबूर है ,  कपट  दिखे  भरपूर ||

दुनिया का  दस्तूर अब ,  ले आया  नव   माप |
दिखे स्वार्थ की हर जगह , काली सबको छाप ||
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राहें काँटों से भरीं ,   रखिए   सदा   विवेक |
नहीं उलझकर छोड़िए , मिलें काम जो नेक ||

राहें    काँटों से भरीं  ,    चलें देखकर आप |
रखें  कदम जो राह में  , रखना उनका माप ||

कठिनाई संघर्ष में ,   कायम  रखें  विवेक |
करिए वह सब काम भी , जो होते है नेक ||

सदा परिश्रम कीजिए   , निकले तन से स्वेद |
अनुभव की ही  धूप से , करिए  केश  सफेद ||

टपकें महुआ चैत्र में , मिले दिवाकर ताप |
गेंहूँ  के खलिहान में , चले पवन की थाप ||

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आदमी

दल  रहा है आदमी , बनता   जाता सर्प |                      दया जहाँ पर चाहिए , वहाँ मिले अब दर्प ||

मतलब के अब आदमी , किसको दें अब दोष |
पनप रहा   संसार   में , कटुता‌   देता ‌   रोष ||

बदले  जग के आदमी ,  करते  आज प्रलाप | 
खुद की करनी है अलग , गलत बजाती थाप ||

यत्र तत्र अब  आदमी , सभी   करें  यह गान |
क्यों बदलाहट हो   रही , करिए   अनुसंधान ||

बदल गया है आदमी , बदल.  गए हम आज |
बदल गए सिद्धांत कुछ  , बदल गए है ताज  ||
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विषय - सत्संग 

रंग भरो सत्संग का ,   खिलें दिखें  रस फूल |
ज्ञान जहाँ  जो भी मिले , उसे करो अनुकूल ||

मिले जहाँ सत्संग   कुछ,  जीवन  करो  निहाल |
हृदय कलीं खिलती दिखे , जग भी कहे कमाल ||

साधु गुणी जब भी मिले  , खूब  करो  सत्संग  |
हृदयांतर  में   ‌‌ खोजिए ,   सही  कौन -सा रंग  || 

रंग भरो सत्संग का ,    हृदय   पटल पर आप |
जग में भी   शुभ   कर्म से , सदा छोड़िए छाप ||

जग में  भी  सत्संग से , सुंदर  खींचों   चित्र |
आएगें    ‌सब     देखने , वाह   करेगें   मित्र || 
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हिंदी दोहे - विषय - भूल

अनजाने  में   भूल  भी , बन जाती  है  शूल |
लोग नहीं  तब   चूकते   ,   देने  लगते   तूल || 

भूल जहाँ  होनें लगे    , सबक लीजिए आप |
आगे  जो  भी काम हो , रखना   पहले माप || 

होती जब भी  भूल कुछ  , देती  है  परिणाम | 
दोषी   की   सूची  बने , प्रथम जुड़ेगा   नाम ||

अनजाने में भूल हो   , सज्जन   करते माफ | 
दुर्जन  करते  शोर हैं ,  करें  नहीं  मन ‌ साफ || 

भूल  जहाँ  अहसास दे , सदा  कीजिए ‌याद | 
नहीं  पुन: फिर   चूक हो , बढ़े  नहीं  तादाद ||
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एक निवेदन 🙏

चूरण जैसे पा चरण , लिखकर लें सम्मान |
इसी तरह हम कर रहे , हिंदी अभियुत्थान ||

कविवर तुम भी धन्य हो , ‌चरण खोजते रोज |
व्याकुल रहते प्रात से , कब  मिल जाए डोज ||

भाव आपके सो गए , क्या समझें हम आज |
खुद ही सोचें  कुछ नया , कब प्रकटेगा राज ||

कलम साधकर मंच पर , निज मन रखिए आप |
नहीं चरण स्वीकारिए    , लगी किसी की  छाप ||

लत लग जाए आपको , चरण मिले तब लेख |
नहीं कभी   हम    चाहते , आए   ऐसी    रेख  ||

कुंडलिया दोहा लिखो ,  लिखिए  मुक्तक छंद  |
भाव  सभी  हो    आपके , रहे    हर्ष   आनंद ||

नहीं किसी   पर  तंज है ,   खुली  रखी है बात |
शब्द विषय तक है उचित , आगे कवि मन घात || 
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मधुमास 

बीत गया मधुमास है , यह क्यों किया विचार |? 
मन  में जब मधुमास है , तन  पर भी  शृंगार || 

प्रीति सदा शुचि  पालते  , मन में रखें उमंग |
बीत गया  मधुमास  है , सुनकर  हम है दंग || 

बीत गया मधुमास है ,     सुनकर हुए  उदास |
शीत पवन का  मेल ही , क्या रचता मधुमास ||? 

बीत गया मधुमास है   , यह कवियों के  बैन |
मापदंड माने नहीं ,       सजनी की शुभ रैन ||
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विषय - संकल्प 

जहाँ करें संकल्प हम , प्रथम   करें    विश्वास |
रखते ही अपना  कदम ,खोजें   वहाँ  उजास ||

पहले मन में कीजिए  , अपना दृढ़   संकल्प |
दीर्घ कार्य करने  सहज ,समय  लगेगा अल्प  ||

मन में यह संकल्प रख  , करुणा हो प्रतिमान |
जिसकी छाया में सदा  , करें   दया  का  दान ||

निज मन के संकल्प से  ,सदा मिलेगी  जीत |
और   यहाँ व्यवहार से  , निकट रहेगी  प्रीत ||

मेरे  मन संकल्प है  , कभी   न  त्यागूँ   धर्म |
इसकी  छाया में सदा  , उदय करें शुभ कर्म ||
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गिरती धार पहाड़ से ,    बनती सरिता नीर |
शहर नगर कानन  बहे, हरती जन की पीर ||

वृक्ष  हीन अब दिख रहे , कानन और पहाड़ |
सरिता भी सूखी मिले , सूखे  मिलते  झाड़‌ || 
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हिंदी विषय - बात 

लोग   पकड़ते   बात  को , करते  खूब बवाल |
जख्म कुरेदें  खूब वह ,  पकड़ बाल की खाल ||

बात-बात में आपकी , लोग   करें जब   बात |
तब तुझमें कुछ बात है , जो  रब की सौगात ||

परिचय  देती  बात  है ,   कितने   गहरे आप | 
गई  कुए   में  डोर   ही ,  दे   गहराई   माप ||

सोच समझकर बात जब , करते आकर लोग | 
समझों मख्खन ने दिया, घृत का  शुभ संयोग || 

ज्ञानी करते बात जब , घृत सम निकले सार |
मूरख रहते    दूर  है  , पकड़ें  उड़ती   खार || 

बात निरर्थक है ‌वहाँ  , शोर-गोल   हो  खूब | 
कुचली  जाती भीड़ में , हरी खिली  भी दूब ||
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हिंदी दोहे  - अक्षय 

शुक्ल पक्ष वैशाख में ,  तिथि   तीजा  संज्ञान |
अक्षय‌ मंगल दिन कहें , जग में सभी  सुजान ||

अक्षय  सुख भंडार की , करें   कामना‌‌  लोग | 
भगवन से विनती  करें , चाहे सब शुभ  योग ||

अक्षय  सुख धन सम्पदा , हर मानव की चाह |
पर वह   इसके लिए ,  सही  न   चुनता  राह || 

अक्षय सब भंडार हों  , तन  भी  रहे   निरोग |
यश गाथा   संसार   में , बने   आपको  योग || 

अक्षय वैभव   भी   मिले , कहते   सदा  त्रिदेव |
सदाचरण शुचिमय‌‌  रखो , कीजे जन की सेव ||

सुभाष सिंघई
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हिंदी दोहे  -लपट/लू 

खरबूजा   तरबूज   की ,  ज्येष्ठ माह में शान |
लपट बचाने ग्राह  है  , समझें  सब  श्रीमान ||

आम प्याज को भूनकर , जल में कर दो घोल |
लपट   ‌भगाने  आपका , पेय   बने  अनमोल ||

हवा   ग्रीष्म में   गर्म हो , बदले   अपना  रूप |
मानव तन लगती लपट , झुलसाती   है   धूप || 

शीतल जल को पीजिए , नीबू  का  रस डाल |
लू को चम्पत कीजिए  , कीजे  बदन निहाल ||

एसी  कूलर चल गए , पर  जो  दिखें  गरीब |
शीत लपट सब झेलने , मिलता उन्हें नसीब ||
हिंदी दिवस -कालनेमि

कालनेमि भी आज है , भ्रम है जिसका नाम |
भ्रमित करें जन को यहाँ , बने बिगाड़ें  काम || 

कालनेमि  से जब भ्रमित , वीर बली हनुमान |
मिला एक   संकेत तब , गए   तभी पहचान ||

त्रेता युग से आज तक  , कालनेमि के  पूत |
पैदा  होते   ही   रहे ,   बने‌‌  कपट  ‌के  ‌दूत ||

छल बल को ही जानना , कालनेमि प्रतिबिम्ब  |
जो दुष्टों    को दे सदा ,  आकर   के अवलम्ब  ||

कालनेमि  मारा  गया ,  जिंदा  दिखें    प्रपंच |
 छल ही  जिसके रूप हैं , रखें ‌सजाकर मंच ||

सुभाष सिंघई

मंगलवार-4-6-24  हिंदी दिवस -पुरवाई 

पुरवाई    गणतंत्र    की , चले   देश  में   आज |
जिसके अच्छे कर्म फल ,मिले उसी  को  राज ||

तप जाते जब   नौ  पता, वर्षा  गिरे   फुहार |
पुरवाई  लगती मधुर , भू पर  लगे   निखार || 

पुरवाई  की मधु लहर  , हरे  ग्रीष्म का  ताप |
बादल की अठखेलियाँ  , देती शीतल  छाप ||

हँसते    बाग    तड़ाग  हैं , पत्ते  दें   गुंजार | 
पुरवाई  भीनी महक , करे  प्रकृति  शृंगार ||

कवि मन भी लिखते सदा , पुरवाई पर गीत | 
गोरी  चाहे   पास में , आज   रहे   ‌मनमीत ||

- धर्म 

कर्म धर्म   जैसे जहाँ  ,  बैसे  बनें  विचार  | 
यह विचार   ही आपके ,पथ करते तैयार ||

दर्पण  जैसा मानिए   ,सच्चा  धर्म  स्वरूप | 
बतलाता वह  कर्म  है , कैसे   बनो   अनूप  ||

चलते है जो धर्म पथ , मिलें  उचित  संयोग | 
आकर इस  संसार में   , कैसे  रहें   निरोग || 

धर्म  भावना से सदा   करना जग में   काम |
सदा  आपके   साथ में    ,रहें  सहायी  राम || 

कर्म  हीन मानव सदा , रहें   आलसी   सुस्त |
धर्म लीन जो भी  रहे ,    रहता  वह है  मस्त || 
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हिंदी --प्राण
नश्वर सब  संसार में , तन भी   नश्वर  जान |
नहीं प्राण नश्वर कभी , किसको है संज्ञान || 

जाना इस संसार  से , कौन करे   निर्वाण |
तेरा  मेरा  बाँटनें    ,  लगे  रहें   यह प्राण || 

तन में रहता प्राण है , खेला करता  खेल |
फुरसत वह लेता नहीं , करनें प्रभु से मेल ||

क्षण भंगुर है जिंदगी , निकले तन से प्राण |
पछताता है अंत में , नहीं   मिले   निर्वाण || 

अंत समय में सोचता , यह मानव आरोह |
पर जीवन की सोच में , रहे प्राण व्यामोह || 

सुभाष सिंघई
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विषय - काल (मृत्यु) 

अंत समय में काल भी , कहता कर विश्राम |
पर मानव कहता सदा , अभी और हैं  काम || 

काल कहे कर ले  मरण ,जर्जर हुआ  शरीर |
मानव  करता हाय तब  , होने  लगे  अधीर || 

काल कहे लेकर जनम , जिए बहुत है साल |~
पर मानव कहता सदा , बाकी अभी  कमाल || 

कल- कल करता मन यहाँ , तन को दे आराम |
सम्मुख आया काल जब , कहता बाकी काम ||

जन्म-मरण के  चक्र हैं , मिला काल को काम |
परिवर्तन कर  देह की    , जिसकी बीती शाम || 

आज समय  को काल पर , कभी न देना  डाल |
आएगा  जब   काल वह ,    छूटें सभी  सवाल || 

सुभाष सिंघई
हिंदी दिवस , विषय - हर्ष 

प्रेम दया करुणा रहे , और   साथ  में   हर्ष |
हृदयांतर उल्लास हो , फल मिलता उत्कर्ष || 

जहाँ   विम्ब उल्लास के , वहाँ  हर्ष   बौछार | 
मिले सदा निष्कर्ष की , अविरल बहती धार || 

जीवन में उल्लास बिन , मृत  सम रहती देह |
जहाँ हर्ष की है किरण , लगे स्वर्ग सम   गेह || 

बने  रहें  जो   आलसी‌ ,    रखें   नहीं  उल्लास |
उनका जीवन हर्ष बिन, दिखे न कुछ भी खास || 

उजला  रहता  है  सदा , कहें  जिसे उल्लास | 
हर्ष  सदा  निष्कर्ष  है‌, जिसमें  रहे   सुवास || 

हिंदी - कलंक , 

एक बार जो लग गया , धुलता नहीं कलंक |
जली होलिका आग में ,बचा भक्त था अंक ||

जब कलंक माथे लगे , रहे   सदा  चिरकाल |
रावण जलता आग में , अब भी है हर साल || 

कुल को लगे कलंक भी , जिसके खोटे कर्म |
पर   नारी  को   छेड़ता , करे  नहीं  जो शर्म ||

जिसके खोटे कर्म को , सुनकर आए  लाज |
है कलंक   माथे  लगा , गूँज  उठे   आबाज || 

मर जाता है आदमी , जिस दिन लगे कलंक |
चार लोग के  बीच में ,  मुख पर उछले पंक ||

 विषय - मंगल 

मंगल रहता उस जगह , जहाँ सत्य का वास  |
शुचि  प्रकाश देता सदा  , होता  नहीं  उदास ||

मंगल रहते पल जहाँ , मिल जाती  है जीत |
दुनिया के दस्तूर से , खिल जाती शुभ प्रीत || 

मंदिर मंगल नाम पर  , मिलें  अखाड़े बाज |
भगवानों के नाम पर , ओछे करते  काज ||

आज सत्य के नाम पर  , झूठों की  आबाज |
पर मंगल  ईश्वर   करें  , हो   जाते  हैं काज || 

श्रद्धा  ताली   पीटती ,  कभी  न  होती मूक | 
मंगल करने काज को  , सत्य करे कब चूक || 

झूठों को माला  मिले , माइक मिले व मंच | 
परम सत्य मंगल जहाँ  , चलते नहीं प्रपंच || 
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नेता बनने के लिए,लगे न कुछ भी दाम |
उल्टा-सीधा बोलिए, चल जाएगा काम ||

यदि माफिया आप है,  रहते सदा दबंग |
नेता बनने के लिए ,    यह है चोखा रंग || 

गुंडो को यदि पालते , रखते है हथियार |
नेता बनने के लिए , यह गुण है उपहार ||

ईश्वर भी अब रूठता , समझ न आबें नीर |
सूखा के सँग बाढ़ है , जन मानस की पीर ||

आफत दर आफत दिखे , लगे रहे जंजाल |
जन मानस की पीर भी , सूख  हुई कंगाल || 
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दादी- नातिन नाक की , करते लोग मिलान  |
दादा-नाती   की नहीं  , लोग  करें  पहचान ||

दफनाया दादा गया ,  जिनकी  बनी  मजार |  
दादी को दी है चिता , गजब  लगा  व्यवहार  ||

असली गांधी   वंश  के , लगते   हैं  लाचार |
नकली गांधी कर रहे    , राजनीति व्यापार || 

कभी जनेऊ सँग तिलक , बनते पंडित बाज |
गोल कभी  टोपी लगा ,   पढ़ते दिखें नमाज || 

राज मानिए आप सब, अकल न करिए खर्च |
इनके असली रूप का , वर्णन करता    चर्च ||

खिचड़ी  है  पूरी  सड़ी , कहीं  नहीं  हैं स्वाद |
नकली गांधी नाम से ,  देश    नहीं  आजाद ||

हिंदी विषय - पंडित 

ज्ञानी  पंडित  कौन है ?   ,  उत्तर  सब   लाचार |
मानव   मन के  लुप्त हैं ,   प्रीति  भरे  व्यवहार ||

ज्ञानी पंडित जो दिखें  , मिलें   दम्भ  के   चिन्ह |
मानव का यह  आचरण , दिखता है अब भिन्न || 

जितने पंडित  हैं मिले  ,  सबके अलग  उसूल |
ज्ञान  फूल के नाम पर    , उगते  दिखते  शूल || 

पंडित मन को    मारकर  ,लोभ  द्वेष ‌  पाखंड |
कपट  आज   संसार   में  ,  देता  सबको  दंड ||

पंडित अब  खोजें ‌ कहाँ  , आकर  यहाँ  सुभाष |
सूरज  का चोरी  हुआ  ,   उजला  दिव्य  प्रकाश ||
~~~~~~

जातिवार गणना करो ,  करते  कुछ   है   माँग |
जाति लिखो दुकान पर ,तब क्यों सिकुड़े  टाँग || 1

जनगणना में  जाति हो , वंचित रहे दुकान |
मापदंड   दुहरे   रहे ,   छिपी  रहे  पहचान  ||2

समाचार अखबार   में ,  टीवी   पर है व्यान |
पढ़कर ऐसा लग रहा , सब सनकी सुल्तान ||3

नफरत की चर्चा नहीं , यहाँ धर्म की बात |
मर्यादा   को  पालने , मिले  सदा सौगात ||4

नहीं थुका भोजन मिले , नहीं माँस हो भोज |
यह विचार सावन नहीं , सदा रहे  यह खोज  || 5

एक कौम को कष्ट है ,   तब   मत लिखिए नाम |
पर हम लिख सकते यहाँ , यह दुकान घन श्याम ||6

हो जाए पहचान तब ,   जिनका शाकाहार |
खा पी सकते है वहाँ , रखकर शुद्ध विचार ||7

हम दुकान पर नाम लिख , देवें खुद ही शोध  |
सनातनी हम आर्य है ,     दे ग्राहक को बोध ||8
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  विषय - पौधारोपण 

पौधारोपण कीजिए , मौसम है बरसात |
देखभाल उम्दा करें ,  सुंदर बने प्रभात || 

हवा प्रदूषित हो रही , करो सभी  आगाज |
बहुत जरूरी हो गया ,  पौधारोपण आज ||

उदासीन    है   जिंदगी , बिना वृक्ष के रोज |
पौधारोपण हो कहाँ , सभी कीजिए  खोज ||

चमक दमक है आजकल , जिसमें फँसा किसान |
पौधारोपण   पर   नहीं ,    रहता   उसका  ध्यान ||

पौधारोपण सब  करें ,    जिसमें  है   कल्याण | 
हरित  भूमि ही जानती ,     शुद्ध वायु निर्माण || 
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विषय ग्रहण
सूर्य ग्रहण   या  चंद्र हो  , छिपते इनके नूर |
राहु केतु कुछ देर को   , बन जाते  है  शूर || 

ग्रहण समय की मार है , समझो यह   संकेत |
स्वर्ण रजत दीवार को , ढक  सकती है  रेत ||

जब विचार  खोटे  ग्रहण,    करता है इंसान |
तब यह निश्चित मानिए , होता कुछ नुकसान |

दान ग्रहण कुछ शुभ कहे , जिसका रहता मान  |
पाणिग्रहण शुभ दान है, जिसकी शुचि पहचान ||

शुद्ध ग्रहण आहार भी , सदा  कीजिए आप |
शाकाहार विचार हो , जिनकी शुभमय छाप ||
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बुढ़ापा 

कमर झुकी नजरें घटीं , हो गय बाल सफेद |
यही  बुढ़ापा जानिए , मन में  करो न  खेद ||

लोग बुढ़ापा  जानकर  , याद करें हरिनाम |
उनसे तब   होते नहीं ,   उल्टे- सीधे काम ||

सदा बुढ़ापा काटिए , घर में  रह चुपचाप |
जब सलाह माँगे बहू,  तभी दीजिए आप ||

गड़बड़ बड़बड़ यदि किया , मुख को रखा न शांत |
यहाँ  बुढ़ापा आपका ,          होगा  तब उद् भ्रांत ||
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दोहावली - परिवार में बच्चे की परवरिश 
       (दोहाकार - सुभाष सिंघई जतारा )

मात पिता यह सच सुने , समझें यह व्यवहार |
उचित और अनुचित गुनें ,  सही चुनें उपचार || 

बच्चे को  यदि   पीटते , करने   आप सुधार |
प्रतिभा तज कायर बने , घर का राजकुमार ||

जिसे चिड़ाया गेह में  ,    कहा  मूर्ख अनजान  |
बालक बंद प्रयास कर , बन    जाता  नादान ||

जिस बच्चे का  गेह में  ,   होता  है  उपहास |
खो जाता है तब सदा ,  उसका निज विश्वास || 

नहीं भरोसा मिल सके , बच्चे की तब छाप  |
कर देती   विद्रोह  है  , नहीं समझता  बाप ||

नहीं प्रशंसा मिल सके ,  अच्छा भी हो काम |
बालक तब खुद में करे ,     लापरवाही नाम || 

बच्चे को वस दीजिए  , समय कीमती आप | 
बारिश करिए  प्रेम की , संस्कार  हो   छाप ||
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विषय - सुप्रभात ( सु प् र भा त) 6 मात्रा 

सुप्रभात में जागकर ,   करते  ईश  प्रणाम |
मन भी रहता शांत है , करने जग के काम ||

झरने नदियाँ देखिए , सुप्रभात  में  आप |
कितना लगता है मधुर , बसे नैन में छाप ||

सुप्रभात में सूर्य की , किरण रहे कुछ मंद |
उजयाली अच्छी लगे ,   आता  है आनंद ||

चिड़ियाँ चहके ‌मोद में , कोयल करती गान |
मुर्गा जगकर बाँग दे  ,   सुप्रभात की शान || 

सुप्रभात  में जागकर , लोग करें अस्नान |
हर हर गंगे बोलते  , यथा   शक्ति दें दान || 

सुभाष सिंघई जतारा

तनक शब्द जानो  नगण , भार "एक-दो" मान  |
विषम चरण के अंत में  , रखें गुणीजन ध्यान  ||🙏

तीन वर्ण हों लघु अगर , यहाँ   तनक दे ध्यान |
भार "एक- दो" जानकर ,   याद रखें   संज्ञान ||🙏

एक उदाहरण रख रहा , तनक दीजिए ध्यान |
बात समझ आ जायगी ,  विनय सुने श्रीमान ||🙏

दोहा लिखना स+रल है , तनक गलत यह जान |
दोहा लिखना है सरल , सही चरण यह मान ||🙏

लिखते लिखते जानता , हो जाए अभ्यास |
तनक आप करते रहे , मन से पूर्ण प्रयास ||🙏

विषय - नारियल 

पिता नारियल-सा दिखे , सबको बहुत कठोर |
गरी रखे वह नेह की ,  जल है   कर्म  हिलोर ||

मंगल  होता   नारियल ,   करता नहीं  प्रमाद |
तन भी अपना तोड़कर , बनता  मधुर प्रसाद ||

निम्न दो दोहों में एक परिकल्पना - 

जटा जूट रख  नारियल  , रखे  तीसरा नेत्र  |
शिव पिंडी-सा है बदन ,   मंगल  पूरा  क्षेत्र ||

आकर  बैठे  नारियल , सदा  गजानन  देव |
 लगे पिता की गोद में  , हर्षित यहाँ स्वमेव ||
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बाल- त्रिया सँग राजहठ , तीन सुने हठ कार्य |
चौथा हठ कलिकाल में , दिखता है  आचार्य ||

गुरुवर जिनके हैं हठी ,   दिखें  शिष्य   के  रंग |
लिख साहित्यक  गालियाँ, मन में   रखें  उमंग  ||

जब जिद पर हो बाबा अली , लेकर  पूरी  गैंग |
तब आगे चालीस  भी  , चलें   जमी   पर  रैंग ||

सुंदर  चित्र बिगाड़कर  , जो  करते  निर्माण |
तब दर्शक भी कम नहीं ,   देते  वह निर्वाण ||

चोटी  रख  खतना करें  ,मिलता तब परिणाम |
खुद की खतना हो उठे     , चौराहे पर  आम  ||

तुलसी   सूर कबीर   के , जो   बनते  है बाप |
चौराहे   पर   फूटते ,  एक दिवस सब  पाप ||

करते आकर  पाप है , तोड़े   अब  शुभ छंद |
बने  नहीं तब  छाप से , मधु जैसा  गुलकंद ||

सुभाष सिंघई

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छंदो  की सुन्नत करें  , लगे  काफ़िया ताज |
लखकर ऐसे कृत्य को , रोती है अब लाज ||

अरबी के अब काफ़िए  ,   छंदों   में  हों नूर |
बात समझ में आ रही , क्या मंशा   भरपूर  ||

छंद यहाँ पर क्या करें, दिखें सिसकते  आज |
खतना अपने कर रहे    ,  खतरे में  है  लाज || 

क्या दोहे  के बाद  में ,  चौपाई   पर गाज |
सनातनी इन छंद की , लुटे मंच पर  लाज ||

हिंदी के  गण त्यागकर  , समझाते   अरकान |
विनय सुने गुणीजन यहाँ  , गण से दो पहचान ||

विनती  में सबसे करूँ  , छिड़े  नहीं   संग्राम |
हिंदी गण से कीजिए , छंद सृजन  अविराम ||

सुभाष सिंघई

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श्रद्धेय श्री ओम नीरव जी को सादर समर्पित दोहें

नीरव जी विनती सुने , पढ़े  आपके लेख |
उत्तर आए तीन है  ,आज रहा मैं  देख ||

जिसने गुरुवर है लिखा ,   सही  निभाया  धर्म |
हाँ में  हाँ भरकर यहाँ,  किया  शिष्यवत कर्म ||

दूजीं  वह हैं टिप्पणी , जिनमें  मिला  नकार |
यह दोहे के साथ में ,    उचित नहीं  व्यवहार ||

तीजे भी कुछ आपसे , रखें  मित्र व्यवहार |
जरा ध्यान कुछ दीजिए , बता रहे उपचार ||

किसकी माने आप भी , रखिए सही विवेक |
लगे आपको श्रेष्ठ  जो , कार्य कीजिए नेक ||

प्रश्न रखा   है आपने ,    सबने  दिए   जवाब |
निर्णय खुद अब लीजिए , दिखने लगे हिसाब ||

सहमत मैं भी हूँ नहीं , स्पस्ट किया था चित्र |
फिर भी मन से चाहता  , रहूँ  आपका मित्र ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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विषय - धन 
धन तेरस   से    जानिए  , पंच   पर्व  का गान |
दीपोत्सव लगता सुखद , जगमग दिखे  विहान || 

धन तेरस पर लाइये , दीप धूप   सामान |
पूजन अर्चन भी करें  धनवंतरि भगवान ||

धन दौलत किस काम की , रहे  दान से  दूर |
बस संग्रह की लालसा , बनी  रहे   भरपूर || 

ऐसे   धन का क्या करें  , तरसे  खुद परिवार |
अवसर पर ही बंद हो  , जहाँ तिजोड़ी ‌  द्वार || 

दुखदाई धन है वहाँ   , जिसे  उठा   ‌लें    चोर |
घर के भी मत खा सकें   , दो   रोटी  के  कोर ||

रहे    जोड़ते  धन   सदा , कहलाए   धनवान |
नहीं बने  हम भक्त हैं,  किया सदा  निज गान || 

विषय - उत्सव 

होते उत्सव अर्थ  मय, रहता जिनमें हर्ष |
वह भी कुछ संकेत से,  दें जीवन प्रादर्श ||

उत्सव है कुछ राष्ट्र के , कुछ संबंधित धर्म |
अर्थ सभी के गूढ़ हैं ,    रखते है सब मर्म || 

उत्सव सभी मनाइए , अपना समय निकाल |
हर्ष सदा हो   पास में , जिसमे  रहो  निहाल ||

उत्सव‌ यदि  दीपावली  ,    चमके घर बाजार |
पाँच दिवस दीपक जलें , बिखरा रहता प्यार || 

हैं   सुभाष उत्सव   सदा , जो   देते   संदेश |
मानव या निज राष्ट्र हो ,   सुखी रहे परिवेश ||

 विषय - कदंब (पेड़) 

आज डाल  पर श्याम जी , बैठे  राधा   संग |
छवि लगती अनुपम युगल , हरषे हृदय उमंग ||

यमुना तट पर झूमती , जब कदंब की डाल |
पवन वहाँ तब नाचती , सुमधुर   देती ताल ||

मधुवन में आकर खिलें   , जब कदंब के वृक्ष |
क्रीड़ा  करते श्याम जी ,  लगते  सबको  दक्ष || 

जब कदंब का संत भी , करते  प्रत्याख्यान  |
एक ब्रम्ह में देखते  ,‌      जुड़े पंख है  भान  || 

हरि कदंब सानिध्य को , करते  सभी  प्रणाम  |
मैं "सुभाष" भी भाव से ,    भजता ‌ राधेश्याम ||

सुभाष सिंघई

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हिंदी - चाह 

विश्व गुरू भारत बने , मन में जागी चाह |
सदाचरण शुचिता रहे, उपकारी ‌हो  राह ||

मन में अंदर चाह है , राम   राज संदेश |
फैलाएँ हम विश्व में ,सदा शांति परिवेश ||

चाह रखें हम यह सदा , रचे नए आयाम |
मानव हित  के कर्म हों ,हो  गीता पैगाम ||

यह भी रखता  चाह है , जय   बुंदेली  मंच |
सिखलाता   सबको रहे , छंदो के सब पंच ||

राना जी लगते सरल ,सबका   देते  साथ  |
सुंदर मेरी  चाह  है ,यश   रक्खें  यह माथ ||

सुभाष सिंघई


दोहे- ( कुछ कड़वें है 🙏) 
छेड़छाड़  साहित्य  में , एक  बड़ा      टेलेन्ट |
बनते  रहते हैं   जनक,   करते निज  पेटेन्ट ||

जहाँ    सनातन छंद है , नवाचार   के  काम | ? 
जैसे   पकड़ा है पिता   , चले  बदलने  नाम || 🙏

जहाँ सनातन छंद शुभ  , है विधान प्राचीन |
नवाचार के ‌नाम क्या  , इज्जत लोगे  छीन ||🙏

खतना‌  करना सीखना  , काम बड़ा  आसान |
सोया  यहाँ   सनातनी     ,रोता     हिंदुस्तान || 

हाँ  हाँ वाले रख लिए   ,  शेष   हटाए  मित्र |
आए दिन अब देखना  ,करतव बड़े  विचित्र ||

पुस्तक छंद विधान है , लेखक देव   " विभोर " |
उनका सृजन  निचोड़कर, उद्गम  करें  हिलोर || 

हाँ हाँ   वाले  जोड़कर  , चुनकर  चेले   चार |
बनते  अब साहित्य में ,     एक नए अवतार || |

जहाँ असहमति सामने , उसे  शत्रु लें   मान |
वह भी यह कब सोचते  , कर्म  यहाँ  नादान ||

सत्य   सनातन  धर्म  में , जन्मे    हिंदुस्तान |
फिर बनते उस्ताद क्यों , देकर खतना ज्ञान ||

ज्ञानी भी सब जानते  , प्रस्तुत है जो   खेल |
किस किसान के धान्य का , है यह पूरा तेल ||

दूजों  का जो माल हो ,  करो न उसका  पान |
है  कीचड़  स्नान यह  ,  इतना  रखिए ध्यान ||

दोहा चौपाई  लिखो ,‌  इनसे  कितने    छंद |
छंद महल से पी चुके,   ज्ञानी जन   मकरंद  ||

ज्ञानी कहते ज्ञानफल  ,जहाँ  झुका  दे  डाल |
आदर मिलता है स्वयं  , गला पहनता   माल ||

ऐंठू  बनकर कब मिले , कहीं   कभी  सम्मान |
ज्ञान -प्रेम के  तथ्य    हो , रहें  वहाँ  भगवान || 


हिंदी दिवस , विषय - करुणा 

करुणा जिसके उर बसे , रहता नम्र स्वभाव |
बोली में रस प्रेम का , करता  है   छिड़काव  ||

 करुणा के  जब भाव से ,  देखें  लोग  गरीब |
करते उसकी है  मदद , अपना समझ नसीब ||

दान दया करुणा बसे ,   समझें  जग में पीर |
ऐसे   मानव   ही  सदा   , बनें  धर्म के  वीर ||

हम सब कहते ईश को , करुणा‌ दया  निधान |
झुका शीष दर पर कहें , शरण आज भगवान ||

करुणा से ही निभ ‌  सके , जग में  मानव धर्म |
रहें    परस्पर  प्रेम से ,     अपने   करते  कर्म ||

सुभाष सिंघई
हिंदी दिवस , विषय -भविष्य 

है भविष्य उज्ज्वल सदा , कर्म जहाँ हैं नेक |
फल मिलते शुचि रूप में , सदा एक से एक ||

मात - पिता सब चाहते , सुत करवें उत्थान |
शुभ भविष्य उनका रहे ,   अपने हिंदुस्तान ||

हैं भविष्य के बीज भी , बोकर देखें  आप |
कर्म  भूमि में यह उगे,   जैसा मिले प्रताप  || 

ललना  गुण पलना दिखें ,करते लोग बखान  |
आशय   यहाँ भविष्य है ,  ज्ञानी का  संज्ञान ||

कौन   जानता है  यहाँ ,    माथे  की   तकदीर |
पर भविष्य कुछ बोलती , हाथों  खिची लकीर || 

श्री कबीरदास जी से क्षमा प्रार्थित होते हुए 🙏
चंद दोहे                         (सुभाष सिंघई )

निंदक नियरे क्यों रखें , विनती ‌ सुनें  कबीर |
करते  अब अनफेंड्र हैं ,  चलें  फेसबुक तीर  ||

माला फेरत जुग गया ,    हुआ  हाथ  में  दर्द |
अब   गूगल पर ज्ञान दे  ,  मोबाइल  है  मर्द ||

पत्थर चक्की  बंद है ,    रोने  का क्या काम |
मोबाइल अब आ गया,  हँसो सुबह से  शाम ||

अब मुल्ला कब बाँग दें, पंडित क्यों  चिल्लाँय |
लगा   दिए साउन्ड   हैं , ध्वनि अम्बर पहुचाँय ||

मोबाइल गाकर भजन  ,  याद  करें  भगवान |
इंसानों  को फल मिलें ,   सुनो   कबीरा  गान ||
मंगलवार -17.12.24 हिंदी दिवस 
विषय - पढ़ाई 

अगर पढ़ाई छोड़कर , घूमें आप फिजूल |
शिक्षा होगी दूर तब , मिलें न उनके फूल ||

नेक  पढ़ाई से मिले , अच्छा ज्ञान प्रकाश |
सूरज करता है सदा  , अंधकार  का नाश ||

जीवन को जो मानता , सदा कर्म अभियान |
उसे पढ़ाई से दिखे , जग   में   उगता‌  भान || 

जिसे पढ़ाई  काटती , अक्षर   लगते   शूल |
उनके पास न देखते , कभी  ज्ञान  के फूल ||

श्रेष्ठ पढ़ाई से मिले ,    सदा   हमें  ही ज्ञान |
मिलकर यहाँ समाज भी, दे जाता  सम्मान || 
मंगलवार -24.12.24 हिंदी  *हृदय*

हृदय   हमारी भूमि   है , बनते  बीज  विचार |
फसल पकेगी कर्म से    , जाने    यह संसार  ||

हृदय बसाकर राम सिय , अमर  हुए हनुमान |
कलयुग में भी भक्त की , मिल जाती पहचान ||

दधि को मटकी में  मथें ,   घृत  ऊपर  लहराय |
भाव हृदय में जब उठे , मुख पर वह दिखलाय ||

हृदय आपका जब रखे ,   अंतर में शुभ भाव |
बिन हलचल तन गंग में ,    बहती जाती नाव ||

परहित के जब कर्म हों , भाव   रहें  निष्काम |
बसे हृदय में तब वहाँ  , प्रभुवर  जय श्रीराम ||
मंगलवार -31.12.24 हिंदी दिवस  *गप्प* (झूठी बात)
(इन्हें विभावना अलंकार में दोहे भी मान सकते है )

प्रथम  गप्प ज्ञानी सुने  , कागा शुभ आभाष  |
पंछी चले  जमीन  पर , ढ़ोर  उड़ें   आकाश ||

मोर  नृत्य  भूले  सभी  , गधे  गए  हैं  सीख |
गप्प नहीं यह मानिए  , कृपड़  बाँटते  भीख ||

सभी   सपेरे  नाचते  ,  नाग   बजाता   बीन |
गप्प नहीं यह  सत्य है   , थल में  घूमे  मीन ||

गायक  के  सुर  खो  गए  ,    गूँगे  भरे  अलाप |
गप्प बोल प्रचलित हुए   , लिया गगन को माप  ||

राजनीति में नीति अब ,  छल के  है  आधीन  |
गप्प गपोड़ी  ही  दिखें  , सत्ता  मद  में  लीन   || 

मंगलवार -7.1.25 हिंदी दिवस - विश्व 

आज विश्व में देखते , सबके अलग विचार |
कोई  करता खोट है ,   कोई   करे  सुधार ||

दर्पण सम्मुख जाइए   ,सच्चा  दिखे स्वरूप | 
आप  विश्व में  हीन है ,   या है सच के  भूप || 

मनोकामना  विश्व  में  ,   देती  है    संयोग | 
कर देती  बीमार को,  वह भी कभी निरोग || 

आए हो  जब   विश्व में , करना अच्छे  काम |
यहाँ कर्म  का फल मिले, करें मदद श्री  राम || 

कर्म हीन  मानव  सदा ,   रहता    लापरवाह  |
चाहत रखता विश्व से ,        बना रहूँ मैं शाह ||

दोहे - कुम्भ

मेला लगते  कुम्भ के , जहाँ   तीर्थ  अनुभाग | 
मकर संक्रांति काल में , रहते   पुण्य   पराग  ||

मंथन सागर का हुआ , निकला कुम्भ महान |
अमरत जिसमें था भरा , बनकर के वरदान ||

दैत्य‌ झपटते कुम्भ पर , गिरते भू पर  अंश |
चार तीर्थ तब बन गए , जो है अमरत वंश ||

नासिक सँग उज्जैन  है , गिनो तीर्थ हरिद्वार |
है प्रयाग चौथा  सुनो ,  लगें  कुम्भ   दरबार || 

अमरत जैसा फल मिले , करके   कुम्भ नहान  | 
हर - हर गंगे    बोलते ,  करते जय -जय गान  ||

आता  बारह साल में , जहाँ कुम्भ उल्लास |
करते सभी नहान है , तीर्थ  लगे तब खास ||

बारह बारह साल जब  ,  जुड़ते  बारह   बार |
महाकुम्भ संयोग का , अवसर तब  सुखकार ||

महाकुम्भ  अवसर बने , अनुपम   तीर्थ   प्रयाग |
शाही सभी  नहान हों  , संगम    के  भू भाग || 

महाकुम्भ  में     देखते,  संतों   का  जयगान |
मिलें  एक से एक हैं ,  नागा   साधु   सुजान ||

हिंदी - *मूर्ति*

लगे मूर्ति मंगल मधुर , नगर अयोध्या धाम |
मंदिर बना विशाल है , जहाँ   विराजे  राम || 

मंगलमय मंगल करण , मंगल   मूर्ति   महान |
खड़गासन श्री राम जी , दिव्य अयोध्या गान ||

धनुष बाण है हाथ में , मधुर लगे  मुस्कान |
अनुपम कहते मूर्ति है , धाम अयोध्या मान ||

दिव्य मूर्ति अब विश्व में , सभी जानते राम |
नमन करें हर देश के , नगर अयोध्या धाम ||

दर्शन करके धन्य है , सेवक  यहाँ #सुभाष |
राम मूर्ति  मेरे   हृदय ,   देती दिव्य प्रकाश ||

मिले मूर्ति नगरों शहर , संविधान   सरताज |
भीमराव अम्बेडकर , जिन पर हमको नाज ||

हिंदी दिवस विषय - *दही*

बनता है जब भाव का , दही नवल सुखकार |
कविता प्रकटे तब हृदय , सुखद  लगे संसार || 

दही धवल मथकर सदा , देता जब  अनुदान |
लगता घृत तब देखकर , जैसे   प्रकटा  ज्ञान || 

दुग्ध तपे  फिर बाद में , जमे   दही  आकार  |
यही बात  ज्ञानी कहे , तप   बनता   आधार ||

दही जमाना है कला , अनुभव की यह  बात |
बनता है अभ्यास से ,  सबको  यह   सौगात || 

मावा मक्खन या दही  , रबड़ी और पनीर |
बनते है यह दुग्ध से , संग    जानिए  खीर || 

सुभाष सिंघई

मंगलवार -4.2.25 हिंदी - *मलाई*

जनता पीती छाँछ है , नमक मिर्च को डाल |
चखें मलाई   देश के    , नेता  करें  कमाल ||

चखे मलाई  रोज ही ,  चमचा  मूँछें   ऐंठ |
जनता बिरचुन खा रही , घर के कौनें  बैठ ||

खूब  मलाई खा रहे ,  साथ  खड़े  बलराम |
मात यशोदा   बोलती , रहने दो अब श्याम ||

मिले मलाई दूध की ,   और  साथ   बादाम |
पहलवान तब बोलते , आज सुखद है शाम  ||

मिले मलाई में जहाँ , किशमिश सँग अंजीर |
कमजोरी तब भागती ,   हटती तन की पीर ||

दूध  औंटती   औरतें     , ऊपर उठे  हिलोर |
उसे   मलाई  सब कहें , देखें  उसकी  ओर || 

घुटी भंग सँग लीजिए , आप मलाई   स्वाद |
दूना तब आनंद है ,     यह सुभाष को याद ||

सुभाष सिंघई
संत शरण मधुमय वचन , मिलते  जहाँ अनंत |
तब बसंत-सी पंचमी , लगती    सभी   दिगंत ||

दिवस अवतरण शारदे , मौसम बने  सुगंध |
है बसंत शुभ पंचमी , अमरत सब मकरंद ||

सुभाष सिंघई

मोबाइल
देखा जग का हाल है ,ऐसा क्यों भगवान |
मोबाइल से  देखता,  चिपक गया इंसान ||

पति पत्नी के बीच में ,  मोबाइल   दीवार |
छुपे हुए इनबाक्स  में, सबके अपने  यार ||

कोई  रहता फेसबुक , व्हाटशाप  पर व्यस्त |
कोई   ट्यूटर पर जमा ,  यूट्यूबर में   मस्त ||

बिस्तर तरसें अब यहाँ , पलंग हुए  खामोश |
अजब नजारे  देखता  , मोबाइल  पर जोश ||

सब्जी जल काली हुई , रोटी   हुई   उदास  |
पत्नी लाइक कमेंट में ,  अब्बल दर्जे पास ||

बेटा भी   स्कूल   को ,  खड़ा    हुआ  तैयार  |
पिता अभी निज पोस्ट का, वर्णन रहा निहार ||

माता करे   पुकार   भी   , बेटी  बोले  ताप  |
मैसेजर पर   फ्रेंड  से , चैट   करे  चुपचाप ||

बेटा कहता  जोर  से,  नहीं  करो व्यवधान  |
अभी गर्ल रिकवेस्ट है, देना मुझको  ध्यान || 

मोबाइल की लीड भी ,  रहती  कान  सवार |
बातचीत  का  चल रहा , उम्दा     कारोवार  ||

दिखे चेट पर चेट अब , अर्द्ध रात के बाद |
गजब इश्क फरमा रहे , मँजनू की औलाद ||

        हिंदी -*विमल* (साफ)

निर्मल मन होता  विमल, तब  विचार शुभ गान |
समदर्शी  होते   नयन ,  सबको  दें      सम्मान || 

हृदय सरल   वाणी विमल , ईश   वंदना  भाव |
उस मानव की  पार  हो , भव   सागर  से नाव ||

नहीं विमल मन जब बने   , मनुज दिखें लाचार |
मन के दिखते लुप्त हैं  ,   प्रीति   भरे  व्यवहार ||

जहाँ विमल मन है नहीं, वहाँ  दम्भ  के   चिन्ह |
मानव का तब आचरण , दिखता सबको भिन्न || 

जहाँ विमल मन; दूर तब  ,   लोभ  द्वेष ‌  पाखंड |
कपट    पराजय    मानता ,  करनी पाती    दंड ||

          हिंदी दिवस *सुगंध*

है सुगंध भीनी मधुर , भ्रमर कहे हट भाग  |
कहता  चम्पा बाँझ तू , रखती नहीं पराग ||

रख सुगंध मधु केतकी,  रहती मलिन उदास |
डसते उसको सर्प है , रखें न शिव जी पास ||
(केतकी अपनी करनी से शिव जी से शापित है )

चंदन रखे सुगंध को ,    डसते  आकर नाग |
फिर भी वह ज्ञानी बना, विष की झेले आग  ||

है सुगंध   केशर  भली , छूकर   लो   संज्ञान |
अंश मात्र ही लाभ दे , अधिक करे नुकसान ||

जो सुगंध तुझमें बसी , मानव खुद पहचान |
मृग समान   मत दोड़ना , देने   अपने  प्रान ||

 लोहा*

फौलादी यह धातु है , लोहा   जिसका नाम |
अस्त्र शस्त्र बनते सदा , जहाँ युद्ध का काम ||

लोहा  भी अब मानना , एक कहावत आम |
लोहा टकराना सुना , और   सुना परिणाम ||

सुना भिलाई नाम है , लोहा   कारोबार |
बड़े बने सब यंत्र का , होता है व्यापार ||

लोहा है मजबूत तब , बनती लम्बी रेल |
कृषि उपकरण आदि भी , छोटे मोटे  खेल ||

लोहा जैसा दिल रखा , वल्लभ श्री पटेल |
आजादी का था समय , डाली खूब नकेल ||

विषय - खजूर

बड़ा  हुआ अच्छा हुआ , जैसे पेड़ खजूर |
वर्ना लाठी  लोग   ले  , करते ‌ चकनाचूर ||🥰🙏

दास कबीरा कुड़ गये , देखा  पेड़  खजूर |
फल-छाया दोनों नहीं , नीचे‌‌‌‌  खड़े  हुजूर ||😜🙏

जिनके पास जुगाड़ है , वह है आज हुजूर |
तिकड़म से चढ़ पेड़ पर , खाते खूब खजूर ||🤔

है खजूर मीठा सुनो , उत्तम रखता स्वाद |
ऊँचाई पर ही रहे ,     तब रहता आबाद ||😉

मेहनतकश ही खा सकें , चढ़कर लगे खजूर |
बोला   करते   आलसी   ,   खट्टे  है   अंगूर  ||😜
हिंदी दिवस - विषय - भव्य 

भव्य हमारे   तीर्थ है , दर्शन करते हर्ष |
लेते रहते  प्रेरणा , लगते  शुभ आदर्श ||

वह बनते आदर्श शुभ  , जिनके भव्य विचार |
शुचिता के रख आचरण  , करते हैं  उपकार ||

बने भव्य‌‌ हैं कुछ किले , अपने  हिन्दुस्तान |
दर्शक भी दर्शन करें ,  और करें   गुणगान  ||

दिखे गुणीजन इस जगत , जिनके भव्य विचार |
जिनको  सुन संतोष का , मन  में   रहे   प्रसार ||

भव्य हिमालय गिरि सुनो  , साथ सुनो कैलाश |
शिव शंकर  रहते   वहाँ  , देते  सदा    प्रकाश ||

 - विषय -वीर 

रखें बात की आन जो , वह  होते हैं  वीर |
धर्म निभाते फर्ज का , हरते ‌जन की पीर ||

सैनिक भारत देश का,  होता  वीर  जवान |
साथ सभी यह मानते , होता  शूर  किसान ||

कर्तव्यों के  जो  धनी , उन्हें  वीर ‌ लो मान |
पीर   पराई  देखकर , करते  सदा  निदान  ||

वीर दिखाते वीरता , कायर काले काम |
कोयल गाती गीत है , कागा करे हराम ||

करें धर्म की बात जो ,चलें धर्म के तीर  |
रक्षा  करते धर्म की , वही मानिए वीर ||
1 अप्रैल , हिंदी दिवस ,विषय आकांक्षा 

विश्व गुरू भारत बने , मन में रखते  चाह |
आकांक्षा भी पालते   , उपकारी ‌हो  राह ||

आकांक्षा  मेरे  हृदय , राम   राज संदेश |
फैलाएँ भी  विश्व में ,सदा शांति परिवेश ||

आकांक्षा  रहती  सदा,  रचें नए आयाम |
मानव हित के कर्म में  , हों  गीता पैगाम ||

यह आकांक्षा पालते  , रखकर दूर प्रपंच |
करें प्रेम से बात सब , रखें बनाकर  मंच ||

सभी मित्र लगते सरल , ‌‌मिलता रहता  साथ  |
आकांक्षा भी हो उदित, यश आवें शुभ  माथ ||

हिंदी दिवस , विषय - विमान 

जब विमान अम्बर उड़े , दिखता छोटा रूप |
लेकिन देखा पास जब , हमको लगा अनूप ||

सदियों से सब देखते , करें  लोग  पहचान |
उड़े हवा में तेज गति , उसको कहें विमान ||

रामायण के काल में , पुष्पक  रहा  विमान |
रावण ने सीता हरण , किया  इसी पर आन ||

जितने   होते   देवता , सबके   रहते    चिन्ह |
द्रुत गति रखें विमान-सी, कभी न होते भिन्न ||

सज्जन जो होते मनुज,आता जब है काल |
लाते धर्म विमान हैं , इज्जत  दें  हर  हाल ||

सुभाष सिंघई 

15.4.25- मंगलवार (हिंदी)-
 विषय -मर्म (भेद, रहस्य , स्वरूप)

आज धर्म का मर्म भी , भूल गए सब लोग |
बहुत दिखावा चल रहा, उल्टे मिलें नियोग ||

भीष्म पितामह ने  लखा   , हरण द्रोपदी चीर |
तभी कर्म  के मर्म  से ,     लगे बदन में तीर ||

दिया नहीं अभिमन्यु को , प्यास लगे पर नीर |
तभी कर्म के  मर्म  से  , सही   कर्ण  ने पीर ||

गुरुवर द्रोड़ाचार्य ने ,   दिया   पाप का  साथ |
तभी कर्म के मर्म   से  , बेटा   हुआ अनाथ ||

रावण ने   अभिमान ,में , सबको   बाँटी  पीर  |
तभी कर्म के मर्म से  ,     कटकर गिरा  शरीर ||

अंधा   जब  धृतराष्ट्र भी  ,  रहा   पुत्र  में लीन |
तभी कर्म  के मर्म से     , कुल से हुआ विहीन ||

सुभाष सिंघई

विषय - उदित 

सूरज पूरब से उदित , चलकर करता काम |
पश्चिम में    वह  डूबकर , करता है आराम ||

भाग्य उदित जिनका हुआ , मिला राज सम्मान |
कर्म बुरे   जिनने  किए ,  देखा  तब  अवसान ||

पुष्प उदित हों डाल पर , खिलते दिखें प्रसन्न |
पूजा- गोरी - शव चढ़े ,    काज करें   सम्पन्न ||

उदित हुआ संसार में , वह सब नश्वर जान |
समय चक्र जग की धुरी , ज्ञानी करें वखान ||

उदित ज्ञान जिनका हुआ , वह सब हैं विद्वान |
सभी लोग आदर करें ,      देकर के  सम्मान ||

सुभाष सिंघई
(हिंदी)- - प्रपंच

सब प्रपंच   नाकाम  हों    , जहाँ    रहे    ईमान |
अटल सत्य मुख खोलकर , अपना देता  व्यान ||

करते  लोग  प्रपंच  हैं   , बनते  गुरु     घंटाल | 
वेनकाब जब हो उठें, मुख  दिखता तब लाल || 

करते अब भी लोग हैं , पीछे से कुछ वार |
रचते रहें प्रपंच भी ,  सभी  भूल उपकार ||

नाम ख्याति जब यश मिले , अपने रचें  प्रपंच |
खड़ा  करेगें  आपको  , फिर    तोड़ेगें    मंच ||

हर प्रपंच  में आपके ,     अपनों   के किरदार |
आँख खोलकर देखना , सभी  करेगें     वार ||

विषय - रस्सी 

रस्सी जलकर  राख है , पर   देती  पहचान |
बल जलकर भी  बोलते , यह थी मेरी शान ||

धागे जितना बल रखें , बनें लिपटकर एक |
मजबूती में  देखिए  ,   रस्सी बनती   नेक ||

धागे जब कमजोर हों  ,जब चाहे दो  तोड़ |
पर रस्सी में जब गुँथें , बन  जाते   वेजोड़ ||

रस्सी के बल देखिए , ताकत रखती  पास |
खीचें अच्छे यंत्र सब,अवसर जब हों खास ||

रस्सी जैसी एकता  , धागों का  यह मेल |
देता भी  संदेश  है, कर ताकत से  खेल ||

20.5.25-मंगलवार-हिंदी- गांठ

गाँठ अगर मजबूत है , राह बने आसान |
अगर बीच में खुल गई , होते तब हैरान ||

रैमन कवि भी लिख गए , गाँठ न अच्छी मान |
मिटें न  इसके  चिन्ह हैं , रहती  कुछ  पहचान ||

अच्छी होवे मित्रता , हो जावे  मतभेद |
आगे बढ़ मनभेद से , गाँठ पड़ी दे खेद ||

नहीं गाँठ में रस दिखे , रैमन   लिखें  सुजान |
दर्द अलग हो देखकर , मिटते  नहीं  निशान ||

मन में पड़ती गाँठ जब , देती रहती दर्द |
जरा-जरा -सी बात की , आस पास हो गर्द ||

सुभाष सिंघई

27.5.25-मंगलवार- हरियाली
(कुछ अलंकारित दोहे )

हरियाली   हर   चाहता ,   जपते  हरिहर बोल |
हरि भी अब हर के सहित , हरा रखें  भूगोल || 

मौसम हो बरसात का ,  हरियाली   हर ओर |
हरि जन्म जब भाद्र में ,    मन का नाचें  मोर |

हरि पूजन हर के सहित , करते मंडप गान  |
हरियाली चारों तरफ , देते  परिजन   तान  ||

हरियाली हरिया   लखे , आ     बैठे   जब  डाल |
हरि+आ -हरि+आ टेर सुन  , हरि आएँ  तत्काल ||

हरयाला बन्ना ‌सुना  , हरियाली वधु मान |
हरि- हर सँग सियराम जू , करें नारिया गान ||

3.6.25-मंगलवार-हिंदी  सिंदूर (आपरेशन सिंदूर)

उजड़ा जब सिंदूर था , घाटी थी कश्मीर |
बदला सेना ने लिया , दुश्मन  दल को चीर ||

खेला था सिंदूर से  ,  पापी पाकिस्तान |
तब सेना-सिंदूर ने , किया उसे हलकान ||

कीमत भी सिंदूर की , क्या जाने नादान  |
पिटकर आई अब अकल ,कैसा  हिंदुस्तान ||

बहनों के सिंदूर का , बदला लेकर आज |
अच्छा सेना ने किया , मोदी जी का राज ||

आज विश्व भी  पूछता , यह   कैसा सिंदूर |
जिसके तेज प्रताप से , दुश्मन  चकनाचूर ||

17.6.25-मंगलवार-हिंदी-  सिद्ध ( दुमदार दोहे )

घर का योगी छोड़कर , ले   आए जो  गिद्ध |
अब साबित वह कर रहे , है यह पूरा  सिद्ध ||
मचा है अच्छा हल्ला ||

सिद्ध वही है इस जगत , रखे आचरण शुद्ध |
चर्या में शुचिता रहे   ,   हो  वाणी  से  बुद्ध ||
सूर्य उजला ही रहता ||

सिद्ध महात्मा हो गए , भारत भूमि महान |
देकर शुभ संदेश ही , किया जगत प्रस्थान ||
आज भी पूजे जाते ||

मंत्र सिद्ध होते जिन्हें , करते जन कल्याण |
लाखों लोगों के सदा     , रहें  बचाते प्राण ||
सभी जन गुण को पूजें ||

मंत्र न बिच्छू  जानते , करते साँप उतार |
ऐसे लोग बनावटी ,    दिखते है  संसार ||
ढोल सब खाली रहता ||

सुभाष सिंघई जतारा

24.6.25-मंगलवार-हिंदी-- दोष

करता क्या है आदमी,   रहे उसे कब होश |
बिगड़ें जब भी काम कुछ ,दे कर्मो को दोष ||

बिना बिचारे काम में ,    घुसकर करें ततोष‌ |
कमीं निकालें हर जगह , सबको देकर दोष ||

साथ रखें  गद्दार  को, पर  भरते  है  जोश |
देते है हर प्रांत में    ,    सरकारों को दोष ||

कौन यहाँ निर्दोष है , करता कौन सवाल |
सबके अंदर है भरा , थोड़ा बहुत मलाल |

प्रभुवर के आगे सदा , सभी उगलिए दोष |
करुणाकर करुणा करें , देगें तब नव जोश ||

1.7.25-मंगलवार-हिंदी-- लक्ष्य 

लक्ष्य सदा पहले रखो , पूरा सोच विचार |
कैसे करना काम है,   बन  जाए उपहार ||

बिना लक्ष्य जब हम चलें , भटकेगें तब  राह |
और परिश्रम को  नहीं , कभी  मिलेगी वाह ||

सदा लक्ष्य का कीजिए , जाकर अनुसंधान |
तभी मिलेगा यश तुम्हें , करने को कुछ मान ||

बिना लक्ष्य के काम सब , कभी न होते पूर्ण |
जो भी आता पास में , वह सब होते चूर्ण ||

दृढ़ पग रखकर लक्ष्य का , पीछा करिए आप |
पहुँचों मंजिल पर सदा , नहीं रखो  संताप ||

8.7.25-मंगलवार-हिंदी - अनुमान 

पूरी सुनकर बात भी ,   लग जाता अनुमान |
क्या चाहे यह आदमी, कितना चतुर सुजान  ||

ललना गुण पलना मिलें , गुणी करें अनुमान |
हाव भाव की भंगिमा , देती  कुछ  पहचान ||

लंक गए हनुमान जी  लगा लिया अनुमान |
राम भक्त कोई यहाँ , करता प्रभु गुणगान ||

जहाँ विभीषण की कुटी , गए ध्वजा पहचान |
राम नाम आबाज सुन ,लगा लिया अनुमान ||

महिलाएँ घर की सदा ,     सही करें  अनुमान |
पकी सही अब चीज है , कर सकते अनुपान ||

15.7.25-मंगलवार-हिंदी-249- चौराहा

चौराहा पर आदमी ,खड़ा   रहा   यह  सोच |
जाऊँ मैं किस राह पर , लगे नहीं  पग मोच ||

धर्म कर्म निष्ठा लगन , खड़े एक ही साथ |
चौराहा सम जानिए , प्रेम सने हैं   हाथ ||

चौराहा  होता   जहाँ ,    लिखे  रहें  संज्ञान |
जाना है किस मार्ग से , रखना पड़ता ध्यान ||

चौराहा पर जब कभी , आते  सज्जन   लोग |
अभिवादन कर हाथ से , करें गुणों का  योग ||

चौराहा सद्भाव का, बनता कभी प्रतीक |
मिलें जुलें निर्णय करें ,और बनाएँ लीक ||
22.7.25-मंगलवार-हिंदी राजनीति

सभ्य आचरण हैं कहाँ ?,  सेवा भावी योग | 
राजनीति   करने लगे,  दो  कोड़ी के ‌लोग ||

राजनीति में देख लो ,    क्या   होता है आज |
आज साथ जो चल रहे , वह  कल धोखे बाज ||

राजनीति में चल रहे ,     भाषण लच्छेदार  |
जनता का हक मारकर ,   लेते नहीं डकार ||

राजनीति  करने लगी  , वोटों का  व्यापार |
और लूटने  सम्पदा ,  बना  लिया  दरबार ||

राजनीति - बगुला भगत , साडू  भाई नाम |
हाथ जोड़ते लोग सब , करते   इन्हें प्रणाम ||

राजनीति में छूट अब ,  खूब  मचाओं     लूट |
जनता को करके भ्रमित ,  डालो    उनमें फूट ||
29.7.25-मंगलवार-हिंदी- मरघट

मरघट की कहती चिता , हुआ आज अवसान |
होगें अब तो  राख सब   ,पले    हुए  अरमान ||

अंतिम मरघट‌  केन्द्र  है ,आता  हर  इंसान |
होता  खाली   ‌हाथ भी, चुप रहते अरमान ||

जलती रहती है चिता   ,मरघ‌ट‌  करता हर्ष |
कहता मैं  संसार को ,  सदा   एक प्रादर्श ||

आया खाली हाथ है ,     जाना खाली हाथ |
जन्म लिया था गेह में, मरघट अंतिम साथ ||

ऐसी बैसी है नहीं , यह मरघट ‌की राख |
अच्छे-अच्छे शूरमा , यहां हुए हैं खाक ||

5.8.25-मंगलवार-हिंदी- चतुर

ठगकर आते गेह हैं , सदा चतुर ही लोग |
हुश्यारी खामोश हो ,    उल्टे जुड़ते योग ||

मूरख लम्पट लालची , सँग हो  चतुर ‌सुजान |
इन  चारों की चोट ‌सें , मन पर  लगें निशान ||

चतुर सयाने लोग ही , करते चुपड़ी बात |
अवसर पर चूकें नहीं  ,देकर जाते घात ||

कागा होता है चतुर ,     एक आँख का जीव |
कोयल धोखा दे उसे , रखकर कुल की नीव ||

जंगल की भी लोमड़ी , दिखे  चतुर चालाक |
बिन शिकार खाती रहे , भोजन भी नापाक ||
12.8.25-मंगलवार-हिंदीं - मित्र

जहाँ भले सब मित्र हों   , कहता   सच्ची  बात |
सदा   निभाना जानिए , मिलकर यह  सौगात ||

अच्छा मिलता मित्र जब , अच्छे हों दिन चार |
‌सत्संगति के पुष्प भी ,  खिलते  हैं    मनुहार ||

अच्छे रखना मित्र हैं , सोच रखो कुछ नूर  |
दुर्जन का यदि साथ हो ,खट्टा मिले जरुर‌ ||

त्रेता युग के राम जी  , कहलाते    भगवान |
जब भी बोले प्रेम से ,  कहें मित्र   हनुमान  ||

सही मित्र वह है नहीं , छोड़े    जो    सत्संग |
और वचन की आग से , झुलसा दें सब अंग ||

19.8.25-मंगलवार-हिंदी  अजगर

कुछ मानव अजगर बनें , करते‌ दिखें  घमंड |
सम्बंधों को लीलते  ,    उगले   गरल प्रचंड ||

अहंकार  में  आदमी‌ ,     भूले   सदा      विवेक |
अजगर -सा जीवन जिए , काम न करता   नेक || 

अजगर होता आलसी  , करे न कुछ भी  काम | 
फिर भी रखता है असर  , होकर  भी  बदनाम || 

अहंकार  में   डूबकर ,        रावण  राजा कंश |
अजगर बनकर चल बसे  , सभी  मिटाकर वंश || 

अहंकार अच्छा  नहीं ,     सब  जाने  इंसान | 
पर अजगर के रूप को  , धारेंं कुछ  श्रीमान  ||
खुद ही लगा तराशने,  खुद को खोद सुभाष।
खुदा खुदाई लख कहे, खुद कर बनो प्रकाश।।

खुदा खड़ा हूँ सामने,  आधा खुद कर आज |
पूरा करना  ऐ! खुदा, यह खुद   की आवाज ||

खुदा बनूँ , सब चाहते, करें न खुद कुछ काम |
मैं 'सुभाष' खुद,खुद रहा, खुदा कृपा अविराम ||

‌सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
26.8.25-मंगलवार-हिंदी- अँगूठा

एकलव्य ने जब दिया , काट    अँगूठा   दान |
अर्जुन के  गाण्डीव का  , यहाँ झुका था मान ||

बनें अँगूठा छाप है‌ं,   प्रचलित है यह तंज | 
बिना पढ़े जो भी रहें , वह   करते हैं  रंज ||

हस्ताक्षर की जब जगह,करे अँगूठा काम |
बिना पढ़े की छाप से  , होते  हैं  बदनाम ||

एक अचम्भा देखता  , दिखा अँगूठा  ठोक |
रुपया गिनने  में कभी , नहीं करें वह रोक ||

पढ़ने बालक जब गया , करता रहा प्रलाप | 
जिसका यह परिणाम है ,बना अँगूठा छाप ||
2.9.25-मंगलवार-हिंदी-- अंकित

अंकित प्रभु के हैं चरण , चित्रकूट के पाट‌ |
नदी सुनो मंदाकिनी ,   कुंड जानकी घाट ||

अंकित रहते राम जी    ,‌ सदा  हृदय   हनुमान |
दिखी भक्ति की शक्ति यह ,  जाने सभी जहान ||

उदाहरण अंकित हुए , बना   गए इतिहास |
जिनके अच्छे कर्म ने , जीत‌  लिया विश्वास |

अंकित मिलते है  चरण , तीर्थंकर भगवान |
शिखर बना  सम्मेद है , जाने   सभी सुजान ||

अंकित हैं सब ग्रंथ में , राम और घन  श्याम |
हरिहर ब्रह्मा  जानिए , हैं खुद   में यह धाम ||


विषय - अज्ञान 

ज्ञानी अब खामोश हैं  , बोल रहा अज्ञान | 
वर्तमान हालात पर , क्या कह दें विद्वान ||

दंभ और पाखंड भी  , फैला है चहुँ ओर |
न्याय बना अज्ञान अब  , खुले घूमते चोर ||

कुछ करते अज्ञान पर , मूरख छाप घमंड |
बोलें भाषा लठ्ठ की , सृजन करें सब खंड ||

राजनीति में देखता     , छाया है  अज्ञान |
नवमीं कक्षा फेल को ,  झुकते हैं विद्वान ||

तम रहता  अज्ञान में ,      रखता ज्ञान प्रकाश |
इसीलिए शुभ काज से , मतलब रखो सुभाष ||

हिंदी बिषय-  अपना

अपना-अपना सब करें, कहे पराया कौन |
जिसका अपना माल है , वह बैठा है मौन ||

यह जीवन अपना कहें , देना वाला मौन |
जीवन सपना मानिए  , बात सुनेगा  कौन ||

अपना घर परिवार है ,     अपने   रिश्तेदार |
अपने मन से बसा लिया , मायावी  संसार ||

अपना  बोला कब कहाँ ,  हैं  मेरे  भगवान |
मंदिर को याचक समझ , दो रुपया है दान ||

अपना सबको मानते , नहीं  शत्रुता पास |
पर जो रखता खार है , करता वह बकवास ||

बिषय:-हिंदी  -, सीढ़ी,

सीढ़ी चढ़ो विकास की,  करो आज से  काम |
सुदृढ़  बने यह राष्ट्र भी , करिए  अपना  नाम ||

आज हमारा है अभी , सीढ़ी चढ़ो विकास |
भाव सदा निष्काम हों, मंजिल होगी पास ||

सीढ़ी एक प्रतीक है ,    मानों  उसे   प्रयास |
आज नहीं तब कल मिले , पूरा उसे उजास ||

सीढ़ी चढ़कर आदमी , पाता   सदा  मुकाम |
अर्थ निकलता है यहाँ , किया परिश्रम नाम ||

साहस से सीढ़ी चढ़ो  ,   फल   मानो  मकरंद |
लोग सभी सम्मान दें ,  यश  भी   दे   आनंद ||

30.9.25-मंगलवार-हिंदी- राधा

मिले  भगत जब सामने , हरि राधा लो बोल |
नैन झुका  हरषे  ह्रदय ,  मन के द्वारे  खोल ||

अवला हो जहाँ द्रौपदी , कातर करे पुकार |
राधा मोहन बोलकर , बनो  कृष्ण  अवतार ||

राधा मोहन बोलकर  , हम आए  जिस  द्वार |
मालिक आकर कह गया , गलती करूँ सुधार ||

राधा मोहन बोल से , कलयुग जाता डोल |
चिंतन के सँग चेतना ,मन की देता खोल ||

हमने     बोला   सामने ,   राधा मोहन   बोल |
चौकन्ना वह हो गया , पहना सच का खोल ||

राधा  जैसी प्रीति की , दूजी नहीं मिशाल |
राधा श्यामा  हो गई ,  श्यामा‌‌   राधेलाल ||

मोहन मन राधा  बसी , राधा का मन श्याम  |
राधा श्यामा  है जगत  , सबसे  सुंदर  नाम ||

मोहन में राधा घुली , राधा में हैं  श्याम |
राधा जैसी प्रीत का  ,पूरे  जग‌ में नाम ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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7.10.25-मंगलवार-हिंदी-261- संत

दया बसे सज्जन हृदय , या फिर संत-फकीर |
कह सुभाष यह पुष्प-सी , महकत रहे अबीर ||

दया   रहित  मानव सदा , संत  कहें    शैतान  |
पाप पुण्य के बेल की , करें    नहीं    पहचान ||

सदा  दया उर  में बसा , रहता   संत  सुजान |
जग में  सबको बाँटता , सदा   सहज में ज्ञान || 

दया क्षमा करुणा जहाँ  , होते  मीठे  बोल |
आभूषण यह संत के  ,  होते हैं  अनमोल ||

दया धर्म मत  छोड़ना , हो   कोई   परिवेश |
संत सदा देते रहें   , सबको  यह.  संदेश ||

14.10.25-मंगलवार-हिंदी- हीरा (रत्न)

पन्ना से  हीरा निकल ,     जाते देश विदेश |
रखते अपना मोल हैं , जो भी हो परिवेश ||

हीरा जग में जानिए ,       होता है अनमोल |
परख जौहरी ही करें , फिर दे कीमत बोल ||

हीरा कब मुख से कहे ,      लाख हमारा मोल |
कहे कहावत लोग सब , और  गुणी से बोल ||

हीरा उनका पुत्र है ,     तुलना करते लोग |
अच्छे गुण पहचान का , हीरा बनता योग ||

यथा नाम के गुण अगर , जो है हीरा लाल ||
इज्जत करते लोग तब , होकर सदा निहाल ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र
21.10.25-मंगलवार-हिंदी-263- मोक्ष

मानव इस संसार में ,करे  मोक्ष की चाह |
पर जाता है  नहीं  , कभी भजन की राह ||

हाँड़ पिंजरा देह यह , जाना  इसको   छोड़ |
मोक्ष साधना के लिए , मिल भी जाते मोड़ ||

ईश मोक्ष की कामना , करते संत सुजान |
करते तप से साधना , जीवन  अनुसंधान ||

मोक्ष कठिन है या सरल , यह मत सोचो आप |
पर निज की शुभ साधना , पक्की रखना छाप ||

भक्ति शक्ति जो रखे , जपे भजन जय‌ राम |
कर्म सदा निष्काम हो , उसे मोक्ष सुख धाम ||

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-हिंदी-सतरंगी

सतरंगी संसार है , रंग  सभी   पहचान |
रंग जमाना रंग से , पर   रखना ईमान ||

सतरंगी के  तीन रंग , भारत ध्वज की शान |
केसरिया है लाल का , श्वेत हरा शुभ आन ||

इंद्रधनुष नभ में बने , सतरंगी   ले   रूप |
वह भी वर्षा के समय, लगता बड़ा अनूप ||

सतरंगी भी स्वर  बने , सप्तसुरों का  गान |
ले अलाप गायक कहें , सभी सुने श्रीमान ||

सतरंगी भी फूल सब ,  गोरी का  मन  जान |
करते  वह  शृंगार हैं , रखते   उसका  ध्यान ||

सुभाष सिंघई

4.11.25-मंगलवार-हिंदी-जीव

जन्म मरण इस   जीव  नें , किया   अनेकों  बार |
पर किसको यह ज्ञात है , कब-कब किया सुधार ||

गतियाँ   कहते  ग्रंथ  सब   , हैं   चौरासी लाख |
भटके अटके जीव यह,     तन को करता राख ||

मोह मान का रस पिए , जीव   फिरे  संसार |
कभी कर्म के साथ में ,    करें धर्म  व्यापार ||

जीव अनादि काल से ,     घूम    रहा  संसार |
किस भव से वह मुक्त हों, करता नहीं  विचार ||

राम नाम लेता वहाँ ,     जब आते  है कष्ट | 
बड़ा स्वार्थ यह जीव का, दिखता है स्पस्ट ||

-हिंदी उदार (दयालु)

धरती  बादल   पेड़  सब , करते हैं  उपकार |
मानव को दातार हैं ,    मन भी  रखें  उदार ||

सूरज चंदा रोशनी , धरती   के फल फूल |
रखते हृदय उदार हैं , रखते   कड़े  उसूल ||

हैं उदार सज्जन पुरुष , जग को हैं वरदान | 
दिखलाते शुभ राह हैं , बनकर वह  इंसान ||

हैं उदार जग संत भी ,  वचन कहें अनमोल |
मानव जिनको मानकर , सीखें  सुंदर बोल ||

शिव जी भोले भक्त पर , रहते  सदा उदार |
जपना वह स्वीकार कर , करते कृपा अपार ||

18.11.25-मंगलवार-हिंदी-267- विवेक

मूँछदार दोहे ( दोहे व्यंग्य विधा में हैं )🙏

फूटी आँख विवेक की, कहता  शुभ अँधियार |
जला झोपड़ी रोशनी , सड़क  करो  गुलजार ||
लोग भी वाह सुनाकर
चने के झाड़ चढ़ाकर   ||

फूटी  आँख विवेक की , जोकर अब  सौगात |
दीवाने  कुछ     नाचते  , जुगनू  की    बारात ||
मना है    भाई     हँसना |
नहीं कुछ मुझको कहना ||

फूटी  आँख विवेक की , नाटक  बड़ा  विचित्र  |
उल्लू का दीवाल पर ,    लगा लिया घर  चित्र ||
गजब है  यह दिलदारी |
गधे पर  करें  सवारी ||

फूटी आँख विवेक   की ,क्या-क्या कर लें याद  |
आज विदेशी   डालडा ,   बाँट  रहा  है   स्वाद ||
अक्ल अब करता फ्राई |
बजाता उल्टी शहनाई ||

अब विवेक से कीजिए , आप सभी शुभ काम |
आँख फोड़कर कब दिखे , तुमको  माया राम ||
एक दुम अभी हटाई |मूँछ अब दोग्ध लगाई |

|25.11.25-मंगलवार-हिंदी-- वैभव

    वैभव उनका जानिए , लोग करें   सम्मान |                            मिले प्रसंशा हर जगह , चलता रहे सुगान ||

      वैभव हीरा  का  रहा ,    दबा   रहा  वह  धूल |                      बाहर आया जब निकल , बना जगत में फूल ||

       वैभव धन से जोड़ते , पर   धन होता   हीन |                          यश वैभव जिसको मिले , होता नहीं मलीन ||

      कभी गर्व करना नहीं , जब   वैभव   हो  पास |                    लदीं फलों की डालिया , झुकती हैं कुछ खास ||

    वैभव का क्या अर्थ है , सबके निजी विचार |                         पर वैभव यश से जुड़े , तब  सुभाष  मनुहार ||

सुभाष सिंघई 

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13.1.26-मंगलवार-हिंदी  रेल


अंजुम रहवर ‌की गजल  , जीवन है इक रेल |

छुक-छुक करती ही रहे,   करे सभी से मेल ||


सदा रेल छूती रहे ,    जो भी मिले पड़ाव |

जो भी  आते    बैठने , सबको देती भाव ||


रेल भेद रखती नहीं , सब उसके मेहमान | 

जात- पात मानें नहीं , शुभ रखती संज्ञान  ||

( मेहमान में मात्रा पतन होता है , पाँच भार )


जुड़ना सीखो रेल से , चलना सीखो साथ |

इंजन से मुखिया बनो ,थामों सबके हाथ ||


रेल हमारे देश में , रहती है गतिमान |

पहुँचाती है यह पथिक ,रखती सबका ध्यान ||


सुभाष सिंघई जतारा

     गोरी आई बाग में ,   हुए   रसीले   आम |                             वह भी छूकर पेड़ को , देती   नेह  इनाम ||

      गोरी के   नैना   चले ,  लगे  आम  के अंग |                           सबका मन मीठा हुआ, साथ हुआ सतरंग ||

      महुआ को आया नशा , देखा   गोरी  रूप |                           गिरता आकर गाल पर , मोती बना अनूप ||

     गन्ना का रस भी छलक , गाता है यह गान  |                           मैं भी मीठा हो गया ,   दिखने लगा जवान ||

2.12.25-मंगलवार-हिंदी लाठी

लाठी पर मूँछदार दोहे  व्यंग्य में प्रस्तुत है 


गठबंधन ठगबंधनी ,     करें न नौका पार |

लाठी करती काम है  , देख  रहे  सब यार  ||

जहाँ भी    इसे बजाया |

सफल ही इसको पाया ||


लाठी जब भी  बोलती ,  समझें   सब इंसान |

जी सर हाँ जू सब कहें , और   कहें  श्रीमान  ||

प्रतापी       उसको  माने  |

निकट सब झुकना जाने ||


लाठी जब होती खड़ी  , सब हो जाते मौन |

सबके मोबाइल बजे , सदा एक ही  टौन ||

लठ्ठ की अपनी भाषा |

दनाकन करे तमाशा ||


लाठी बनती  आसरा ,   बूड़ा  जहाँ  शरीर |

श्वान ढ़ोर सब दूर हों ,     हरे पैर की  पीर ||

मानिए बड़ा ‌सहारा |

मिलेगा सदा किनारा ||


लाठी  जिसके हाथ में , उसकी  होती  भैंस |

सत्य कहावत मानिए ,  लीजे  मन  में  ठैंस ||

करो सब लाठी पूजा |

रक्ष हित और न दूजा ||


सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

27.1.26-मंगलवार-हिंदी-276- गाय

सदा गाय  सेवा करो , प्रात  काल से शाम |
मात पिता भी जोड़ कें , घर को माने धाम |

गाय पाल श्री कृष्ण जी , कहलाए  गौपाल |
ग्वाला भी सब बोलते , और साथ नदलाल ||

माता सचमुच गाय है , दूध    जानिए  ओज |
पीकर चेतन तृप्त हो , निकला है यह खोज ||

दूध संत कुछ पी सदा , करें अन्न का त्याग |
गाय मानते ब्रह्म फल , सदा   करें अनुराग ||

गाय‌ दूध का जानिए , अमरित सम है पान |
सेवा इनकी जो करे , खुश  रहते भगवान ||

गाय गुणी सब मानते , महिमा अपरम्पार |
इनकी सेवा कर गए , आकर के अवतार ||

जिनके घर में गाय है , समझो गेह अनूप |
ज्येष्ठ माह में शीत है , शीत माह  में धूप ||

जब तक हरि का नाम है , तब तक समझो गाय |
दूध दही घी भी मिले , बनती सबकी राय ||

नाम जपो हरि का सदा , सेवा को रख गाय |
घर में तब आनंद हो ,      खूब बढ़ेगी आय ||

सेवा करके गाय की  ,  होता है  आनन्द |
भाव सरल पावन बने , कर्म बने शुभ छंद ||







9.12.25-मंगलवार-हिंदी  विकास

विज्ञापन में दिख रहा , भारी   हुआ   विकास |
आफिस के कागज कहें , काफी हुआ उजास ||

हैं विकास यह मानते , पर  कुछ का है खास |
कोई   हँसता    घूमता ,   कोई    रहे  उदास ||

गाँव गली में जब कभी , होता  रहे  विकास |
नहीं ठहरता देर तक , रहता  कभी न पास ||

भारत विकसित मानते, जिसको कहें  विकास |
कुछ जन अच्छा भी कहे,  कुछ करते उपहास ||

धरती  अच्छा  सोचती , देती   है   उपहार |
यह विकास कर्तव्य कह , खोले रहती द्वार ||

16.12.25-मंगलवार-हिंदी  शुभ

बूँदें  गिरें  आषाढ़ में   ,  तब शुभ है   संज्ञान | 
खेतों को अमरत मिले , कृषकों  को  वरदान || 

खेती को  यह शुभ रहे, ओस पड़े जब  रात |
हर्षित  रहे किसान   तब , मानें  वह सौगात ||

जीवन में शुभ लाभ का , होता  है  अहसास |
यह  देते हैं  हौंसला,  रहकर   हरदम  पास ||

बूँदें   गिरें  पलाश  पर , लगती  चंद्र  समान | 
बनती शुभ हैं  सीप  में , दें  मोती  संज्ञान || 

शुभ होते जब काम हैं , खुशी दिखे हर ओर | 
लाती  एक प्रवाह   हैं , मन  का  नाचे  मोर ||

सुभाष सिंघई 
6.1.26-मंगलवार-हिंदी- नृत्य 

नृत्य किया नटराज ने , तांडव जिसका नाम |
सभी मनाते देवता ,    तजकर अपना धाम ||

नृत्य दिवाली मोनिया,      बहुत हुआ मशहूर |
लोक नृत्य की ख्याति से , लगे सभी को नूर ||

विष्णु देव  नारी बने, नृत्य मोहिनी रूप।
अमरत पीते देवता , बनते सभी अनूप ||

लोक नृत्य जितने दिखें  , करते  मन को शांत।
कला रूप में प्रिय बने , उजली दिखती कांत |

सबसे मोहक नृत्य है , नाचे  वन में  मोर।
या गिरिधर का जानिए , है लीला में शोर ||

हिंदी- गाय

सदा गाय  सेवा करो , प्रात  काल से शाम |
मात पिता भी जोड़ कें , घर को माने धाम |

गाय पाल श्री कृष्ण जी , कहलाए  गौपाल |
ग्वाला भी सब बोलते , और साथ नदलाल ||

माता सचमुच गाय है , दूध    जानिए  ओज |
पीकर चेतन तृप्त हो , निकला है यह खोज ||

दूध संत कुछ पी सदा , करें अन्न का त्याग |
गाय मानते ब्रह्म फल , सदा   करें अनुराग ||

गाय‌ दूध का जानिए , अमरित सम है पान |
सेवा इनकी जो करे , खुश  रहते भगवान ||

गाय गुणी सब मानते , महिमा अपरम्पार |
इनकी सेवा कर गए , आकर के अवतार ||

जिनके घर में गाय है , समझो गेह अनूप |
ज्येष्ठ माह में शीत है , शीत माह  में धूप ||

जब तक हरि का नाम है , तब तक समझो गाय |
दूध दही घी भी मिले , बनती सबकी राय ||

नाम जपो हरि का सदा , सेवा को रख गाय |
घर में तब आनंद हो ,      खूब बढ़ेगी आय ||

सेवा करके गाय की  ,  होता है  आनन्द |
भाव सरल पावन बने , कर्म बने शुभ छंद ||


-हिंदी-- घड़ी

चलना मेरी है नियति  ,घड़ी हमारा नाम |
जग वालो के लिए  , समय बताना काम |

चलती रहती जग घड़ी , कहे घड़ी यह बोल |
मानव को संसार में ,   घड़ी  बड़ी अनमोल ||

बोल घड़ी सुन लीजिए , करो नहीं आराम |
चलने के उद्देश्य से , करते रहिए काम ||

टिक-टिक करती है घड़ी , टिककर करिए काम |
कहती रुकना छोड़कर , धन्य करो निज नाम ||

घड़ी - घड़ी पहचान कर , और घड़ी को देख |
चलकर इस संसार में , अपनी   खींचो  रेख |



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