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https://subhashsinghai.blogspot.com/ बुक चित्र पर क्लिक करें , बुक खुल जाएगी , छंद संज्ञान एवं दोहा छंद का लय (गेयता) विज्ञान (टंकण)

 दोहा छंद संज्ञान एवं दोहा छंद का लय विज्ञान (सउदाहरण )
                      

लेखक के विनम्र भाव.    🙏 -

इस ई बुक ( पुस्तक ) में मैंने (लेखक ) ने कोई नई बात नहीं लिखी है , पर दोहा उपयोगी , सरलता से दोहा  छंद संज्ञान ,एवं दोहा का लय विज्ञान दोहा छंद में लिखा है | कुछ आलेख भी सरल भाषा में सउदाहरण लिखे हैं |   दोहा लिखते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए , काव्य दोष क्या है , यह सब सउदाहरण लिखने का प्रयास किया है | चौपाई चाल भी सही किस तरह होती है , इस पर भी प्रकाश डाला है |वैसे मेरे कई आलेख स्फुट गूगल पर  हैं , पर इनमें दोहा उपयोगी कुछ आलेख एक जगह , इस बुक में हैं |
              मेरे परामर्श दाता , और मुझे   सदैव सही संकेत देने   वाले आदरणीय दादा श्री सुरेन्द्र कौशिक जी का मैं सदैव आभारी रहता हूँ , मेरे भाव सदैव कौशिक दादा के प्रति विनम्र  रहते हैं   एवं अनुज जैसे  मित्र  "  श्री राजीव नामदेव " राना लिधौरी जी   मुझे लापरवाह नहीं होने देते हैं, विशेष आलेख अनुरोध से लिखवाते रहते हैं , व अपनी पुस्तकों में प्रकाशित करते रहते हैं ,  प्रकाशित पुस्तक   " बुंदेली दोहा कोष " व त्रैमासिक पत्रिका अनुश्रुति एवं आकांक्षा में भी वह यह सब आलेख  प्रकाशित कर चुके है

सादर - सुभाष सिंघई

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        🥬🥗 कहाँ क्या किस पृष्ठ पर 🥗🥬

1 से 6- दोहा छंद संज्ञान (दोहा छंद में )

7- दग्धाक्षर ||

  8 व 9 दोहा यति व दोहा भाव ||

10- अनुस्वार /अनुनासिक || 

 11 व 12 दोहा कथ्य ||

13- दोहा में शतुर्गर्वा दोष ||

 14 से 19 नगण भार व प्रयोग

20 से 27 - दोहे की बारीकियाँ ||

 28 व 29 दोहा  शिल्प सौन्दर्य ||

30 से 34 दोहों में देशज शब्द ||

35 से 43 उच्चारण आधार पर विशेष शब्दमात्रा भार , लय आधार पर सउदाहरण ||

44 से  58 दोहा छंद में काव्य दोष ||

59 से 62 न और ना में अंतर ||

63 से 67  ए और ये का सही प्रयोग ||

68 से 72 पंचमाक्षर अनुस्वार की कहानी ||

73 से 75 अनुनासिक (चंद्र बिंदु ) कहानी

76 से 82 चौपाई (16 मात्राओं का गठन )

83 -84  मात्रा पतन शब्द (दोहा उपयोगी ,) 

85 - संयुक्ताक्षर भार (कुछ  दोहा उपयोगी )

86 - आप सबके अभिमत
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🌹🌹🌹 *जय‌ माँ शारदे*🌹🌹🌹

दोहा छंद संज्ञान एवं
                    दोहा का लय विज्ञान (सउदाहरण )

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देना     माता   शारदे ,    दोहा    का  संज्ञान |
और साथ में चाहता , लय का शुभ प्रतिमान ||


             लिख विधान दोहा सरल , दग्धाक्षर   के  वर्ण |
            अनुनासिक अनु स्वार के प्रस्तुत  करता पर्ण ||


समकल के सँग कल विषम , लिखता जगण विचार |
दोहा में  लय   किस  तरह ,     रखती  अपनी  धार  ||


       लय खो  जाती  किस तरह , डाला  यहाँ  प्रकाश |
       काव्य दोष संकेत भी , लिखता प्रमुख  "सुभाष"||


तीन वर्ण जब लघु मिलें ,  बने   एक-दो भार |
नगण बोल गिन लीजिए   , उच्चारण आधार ||
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पृष्ठ क्रमांक 1.  🥗🥗.                            ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
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कुछ शब्दों  के  भार पर , चलते  जहाँ   विवाद |
उच्चारण आधार    से  ,  मिटते  सभी   विषाद  ||


         दोहा    गेयक  छंद शुभ  , लय   है   इसका प्राण |
        नहीं साँच   को आँच   है , प्रस्तुत  करूँ   प्रमाण ||


दोहा लिखना सीखिए , शारद माँ धर ध्यान |
तेरह ग्यारह ही नहीं , होता   पूर्ण    विधान ||


         गेय‌ छंद दोहा लिखो , लय का रखिए ख्याल |
          बने  कलन में  मेल जब , सुंदर  लगती  चाल  ||


चार चरण सब जानते , तेरह - ग्यारह  भार |
कलन चूक से चल उठे , दोहा पर  तलवार ||
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पृष्ठ क्रमांक 2  🥗🥗🥗                       ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
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अष्टम नौवीं ले  जहाँ , दो  मात्रा  का भार  |
दोहा   लय  अटके  वहाँ , गाकर  देखो यार ||

          जगण जहाँ  पर कर रहा  , दोहे का आरंभ |
           आप  सभी यह मानिए , लय  का टूटे दंभ ||

पूरित चौकल पर जगण, देता  लय व्यवधान |
करके आप प्रयोग भी , ले    सकते    संज्ञान ||

कलन पंच  प्रारंभ भी , लय‌ को जाता लील |
खुद गाकर ही देखिए , पता   चलेगी   ढील ||

                <<<<<<<<~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~पृष्ठ क्रमांक 3   🥗🥗🥗                    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

अब कलन ( समकल- विषमकल )को समझिए ~


तीन-तीन-दो  , से   करें ,    पूरा    अठकल     एक |
जोड़ रगण "दो- एक -दो"  , विषम  चरण तब  नेक ||


            चार - चार का जोड़ भी   , होता  अठकल  मान |
             विषम चरण तब यति रगण  , सुंदर   देती  तान ||
                   (रगण = 212 ,
  

विषम चरण यति जानिए , करे रगण से गान  |​                         अथवा करता हो नगण , दोहा   का   उत्थान ||

नगण = 111) उच्चारण भार 12

                   यह  लय  देते  हैं सदा , गुणी  जनों का शोध |
                   खुद गाकर  ही   देखिए , हो   जाएगा  बोध ||

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पृष्ठ क्रमांक 4 🥗🥗🥗.                   
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सम चरणों को जानिए , तीन - तीन- दो -तीन |
चार- चार सँग तीन गिन,  पर है  'गाल' प्रवीन ||

               दोहा का है  सम चरण , तब  पदांत  है  गाल |
                अर्थ दीर्घ लघु जानिए ,  हल है  यहाँ सवाल ‌||

षटकल का चरणांत भी , सम में करता  खेद  |
दोहा खोता लय   यहाँ , लिखे 'सुभाषा ' भेद ||

दो चौकल=अठकल  बनें , त्रिकल-त्रिकल- दो =आठ |
विषम चरण दोहा जुड़े , बने  रगण      यति    पाठ  ||

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पृष्ठ क्रमांक 5    🥗🥗🥗.         
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नगण प्रयोग समझिए 🙏नगण (,तीन लघु वर्ण )
का मात्रा भार एक - दो होता है


निम्न दो दोहो में पहला चरण गलत लिखा व उसे
सही करके तीसरे चरण में बतलाया गया है कि
इस तरह लिखना √ सही होता है |


दोहा लिखना सरल है , चरण बना यह दीन | ××
दोहा लिखना है सरल , चरण नहीं अब हीन ||✓✓


            दोहा लिखें आप सभी , नहीं  चरण तुक तान |××
           आप सभी दोहा लिखें , दिखे   चरण में गान ||✓✓


भरपाई‌   मात्रा   करें ,    माने   दोहा  आप |
गलत राह पर जा रहे , छोड़ कलन के माप ||

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पृष्ठ क्रमांक 6  🥗🥗🥗    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

अब दग्धाक्षर प्रयोग पर ~


दग्धाक्षर   से  मत करें ,   दोहा का प्रारंभ |
कहता पिंगल ग्रंथ है , सभी विखरते दंभ ||


         #इन्हें ह झ र भ ष जानिए , रखें   सदा संज्ञान |
             पाँच वर्ण यह लघु सदा ,  मानें  सभी  सुजान  ||


पाँच वर्ण  यह दीर्घ  हों , करिये   खूब  प्रयोग |
विनय  "सुभाषा" आपसे , दूर तभी सब रोग ||


विशेष ~ दोहा में यदि कथ्य हो , तथ्य   युक्त  संदेश |
             अजर - अमर दोहा रहे ,   कोई  हो परिवेश ||


   तुकबंदी  दोहा  बना , नहीं   तथ्य पर तूल |
    ऐसे   दोहे   जानिए , होते   केवल   भूल ||

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पृष्ठ क्रमांक 7 🥗🥗🥗           
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चार चरण दो पंक्तियाँ , अक्षर अड़तालीस |
दोहा   छंद सुहावना  , है  स्वतंत्र  जगदीश |


               कलन छोड़ दोहा लिखा , लय अटके हर हाल |
               अठकल यदि निर्दोष हो , कभी न बिगड़े चाल ||


हाथ  पाँव   चारों  चरण , भाव  मानिए  प्राण |
इनमें मेल मिलाप हो    , दोहा  है तब    बाण ||


               चरण विषम  में यति रगण, सम पदांत है ताल |
               विषम और  समकल सही,  दोहा वहाँ  निहाल ||


दोहा  के   गुण  पर  कहें , चरण बने   हैं  चार |
चारों  में  यदि  मेल हो  , पढ़ने  मिलता  सार  ||

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पृष्ठ क्रमांक 8 🥗🥗🥗     
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नगण -रगण की यति नहीं , कलन -भार सब दूर |
चरण   भाव   जुड़ते  नहीं , तब   दोहा   है   धूर ||


             सभी सुनो अब श्रेष्ठवर ,     बनना    दोहकार |
               वाचिक में   लेता  नगण , एक और दो  भार ||


यदि   छंदों   में   गेयता , लाना    है  श्रीमान |
मात्रा-कलन-विधान का , रखना होगा ध्यान  ||


              कुंडलिया  दोहा   लिखें , रहे   गेय   पहचान  |
               यही गेयता   छंद की , समझो   होती  जान ||


उच्चारण  से  देख लो  ,   मात्राओं  का भार |
ज्ञात सहज हो जायगा ,  यही एक  उपचार ||


          जगण चरण में आदि हो , लय को करता  नष्ट |
             ज्ञानी   करके   देख   लें , समझ जायगें  कष्ट
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पृष्ठ क्रमांक 9 🥗🥗🥗.   
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अनुस्वार( ं बिन्दु) और अनुनासिक , ँ चन्द्र बिन्दु )


हिंदी या  देशज लिखो,  रखो  शब्द   की  आन  |
अनुनासिक अनु स्वार के, कभी न बदलो गान ||


               अनुस्वार का  बिंदु जब  , लगे वर्ण लघु आन  |
                दो मात्रा  गिन लीजिए , उच्चारण की तान ||


अनुस्वार यदि दीर्घ पर , बढ़े   न   मात्रा  भार‌ |
बड़ा सरल है व्याकरण ,  यही निकलता सार ||


               अनुनासिक  लेता  नहीं , कोई   मात्रा   भार |
                 करते    इसे   प्रयोग    हैं , देखा    छंदाकार ||


शब्द लीजिए मंगलं , ल पर  चढ़े  अनु स्वार |(मंगलम् )
उच्चारण यह कह  रहा   , है दो मात्रा भार ||


           दोहा में   लिखकर  यहाँ ,    बतलाया जो सार |
  ‌          ज्ञानी गुनकर यदि लिखें , पाएँ  सदा  निखार ||

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पृष्ठ क्रमांक 10 🥗🥗🥗  
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दोहा छंद के बारे में विशेष


तथ्य युक्त यदि कथ्य का , दोहा में  हो  गान |
होता दोहा तब अमर, जग  करता  सम्मान ||     

 
                सार   हीन  दोहा लिखा , तेरह  ग्यारह   भार |
                छिलका समझो धान का ,सहता  मूसल मार  ||


दोहा हो बिन तथ्य का , ले   जाता   है  डूब |
नहीं  हृदय  में  तैरता  , पढ़कर  होती  ऊब‌  ||


                 सरल  शब्द  दोहा‌  रखो ,  बनी  रहे  तासीर  |
                श्रुति कटुत्व के दोष की , दोहा   सहे न पीर ||


चार चरण दोहा कथन  , करे   जोर  से चोट  |
मन का करके जागरण , दूर  भगाए   खोट ||


                 दोहा लिखने के लिए , करें कथ्य की खोज |
                सीधे सरल सपाट ही ,  रखें तथ्य की ओज ||

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पृष्ठ क्रमांक 11🥗 🥗~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

दोहा करता  है विनय  , रखें  कलन का माप  |
घट बढ़ मात्रा भार को , शब्द न  तोड़ें   आप ||

 
                  सम चरणों को देखना , सुंदर चुनो    तुकांत |
                  नहीं एक से शब्द हों , इसका   रखना ध्यान ||


दोहा   गायन   छंद है ,   गाकर   देखो    यार |
अटक जहाँ पर दे खटक , करना कलन विचार ||


               दोहा   लिखिए   प्रेम से  , रखें तथ्य की  बात |
               भूलचूक  संकेत   को , माने   सब    सौगात ||


माता   की आराधना , नहीं   ज्ञान   अभिमान |
यह  गुण  देता  है  सदा , नित  नूतन  उत्थान ||


                तेरह  ग्यारह  गिन लिया, नहीं  पूर्ण यह  चाह  |
                 हटे  कलन की   राह का  , दोहा   उठे  कराह |

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पृष्ठ क्रमांक 12🥗🥗🥗       
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शुतुर्गुर्बा दोष

वरिष्ठ साहित्यकार आद०  अनिल " चेतन " जी की एक पोस्ट पढ़ी , जिसमें उन्होनें दो संकेत किए थे ,

1-  तुम के साथ( तू -तेरे -तेरी-तुझे  )न लगाएँ। 

 शुतुर्गुर्बा दोष है।


2- कर के  ,  साथ के , अनुचित है। आद० चेतन जी ने सही संकेत किया है  या संकेत गलत है , तब मैने  यह 👇दोहा लिखा


मित्र गलत सब साथ के , कर के   दें  नुकसान |××
कब समझोगो बात तुम , तुझे  नहीं  कुछ ज्ञान ||××


ऐसा लिखने पर गहराई से देखने पर हमें भी -:"साथ के" , "कर के" व "तुम" के साथ "तुझे" अटपटे लगे , तब परिमार्जित  किया


मित्र गलत जब साथ हों ,  कर देते   नुकसान |✓✓
कब समझोगे बात तुम , और   रखोगे ध्यान || ✓✓


यह तथ्य दोहा लेखन की बाराकियाँ ही हैं, मैं चेतन जी के संकेत से सहमत हूँ , पर आप सहमत हैं या नहीं , आपका विवेक है।


मुझे जो संज्ञान आया ,वह निवेदित और सबसे साँझा किया है |
सादर - सुभाष सिंघई

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पृष्ठ क्रमांक 13🥗🥗🥗       ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

नगण 111 (तीन लघु वर्ण शब्द का मात्रा भार)


(एक बार पढ़कर  अपना सृजन करें )

 
करीब 90 %० पटल मित्र ( नगण ) तीन लघु अक्षर का मात्रा भार  समझकर सही लिखते  हैं , केवल दस प्रतिशत ही ध्यान नहीं देते है 

 
दोहा छंद में , प्रथम और तीसरे चरण की यति   ,
उच्चारण से  - रगण (212 ) से होना चाहिए ,

 
अर्थात दोहा की ग्यारहवी मात्रा लघु ,
व बारहवीं तेरहवीं मिलाकर दीर्घ


या तेरहवी मात्रा स्वतंत्र रुप से दीर्घ होना चाहिए


तरल तरह सहज प्रहर कहर नमन कथन वचन मनन सृजन गहन मगन चमन लगन नयन इत्यादि शब्द उच्चारण करके

 देखिए ~
सभी में अंतिम दो मात्राएं दीर्घ बन रही हैं
तरल ~ त+ रल√  उच्चारण कर पाओगे  - ~ तर +ल नहीं

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पृष्ठ 14.                                  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

इसी तरह अन्य सभी शब्द हैं , अर्थात नगण का
मात्रा भार 👉 लघु दीर्घ (12) ही है।

अब उदाहरण से समझें 🙏 खुद उच्चारण करते हुए 🙏

जैसे-  यदि हम ऐसा दोहा लिखें, तब क्या सही होगा? 👇

गोकुल जी के कथन हैं ××, भाव भरे गम्भीर |
है प्रमोद के वचन शुभ ××, बुंदेली  शुचि नीर ||

क्या उपरोक्त 🖕दोहा सही है ?

दोहा का पहला चरण देखें 👇

गोकुल जी के कथन हैं , भाव भरे गम्भीर |

क +थन + है , = 1. + 2. +2 = यानी यति चौकल हो गई है ,

 चौपाई की तरह या यति 122 हो गई है , अत: इसमें
पहला चरण ×× हो गया है ।

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पृष्ठ 15                                
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तीसरा चरण देखें 👇🙏


हैं प्रमोद के वचन शुभ  , बुंदेली  शुचि नीर ||


(व+ चन +सब =   1 + 2.  + 2 👉 अत: तीसरा चरण  ×× है )
अत: दोहा सही व परिमार्जित होगा 👇


गोकुल जी के हैं कथन  , भाव भरें गम्भीर | √√
है प्रमोद के शुभ वचन  , बुंदेली  शुचि नीर || √√


अब हम यदि दूसरा दोहा इस प्रकार लिखें👇 तब  क्या सही है ?

संजय‌ जी जब निकलते ××, रंग   मंच की  ओर |
अभिनय में वह उतरकर×× , करते भाव विभोर ||


संजय‌ जी जब निकलते , रंग   मंच की  ओर |
            निकलते ---नि+ कल+ ते = 122 ××


अभिनय में वह उतरकर , करते भाव विभोर ||
 

उतरकर ---उ+तर+कर =122 ××यति चौकल में 

जा रही है

अत: सही व परिमार्जित दोहा होगा

संजय  जी के हैं   कदम   , रंग  मंच  की  ओर |
अभिनय में ही वह उतर    , करते भाव विभोर ||√√

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पृष्ठ 16                                   ‌             ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


*अब यदि हम तीसरा दोहा ऐसा लिखे 👇

तब क्या सही होगा ?


शशि    सूरज से  चमकते , वर्मा   आशाराम |
लिखते हैं  नादान  खुद , पर ज्ञानी  में  नाम ||


(इस दोहे में भी (चमकते )शब्द ( नगण + ते ) है ××
सही दोहा होगा 👇


शशि    सूरज -सी ले चमक , वर्मा   आशाराम |
लिखते   हैं  नादान   खुद , पर  ज्ञानी  में नाम ||√√

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पृष्ठ 17                                         ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

यदि हम चौथा दोहा ऐसा  लिखें 👇


तब. क्या सही होगा ?


देवदत्त जी  सरस सच ,   दोहों    के  सम्राट |
चार जोड़ते  चरण जब  , खिलें छंद के  पाट ||××


( यहाँ  पर भी पहले और तीसरे चरण में  ,
तेरह मात्रा पर यति गलत गिर रही है।


अत:  सही व परिमार्जित दोहा होगा 👇

देवदत्त जी  सच सरस ,   दोहों    के  सम्राट |
चार जोड़ते  जब   चरण ,खिलें छंद  के  पाट ||√√

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पृष्ठ 18                                   ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

ऐसा नहीं है कि प्रत्येक पाँच लघु अक्षर का शब्द अंत में नहीं आ सकता है , कई शब्द ऐसे हैं कि  ,जो उच्चारण से 212 में आते हैं ,

जैसे - रह +गु+ जर ,  हम+व+तन,  हम+स+फर


एस आर जी कहें सरल , रखना  प्रेम अथाह   |
बने देश हित हमसफर , रखकर मन में चाह || √√√

(यहाँ हमसफर का उच्चारण करके देख लीजिए ,


हम +स+ फर 212 ही है | √


आशय यह है , यदि आप यति का *उच्चारण*
करके लिखेगें तो कभी त्रुटि नहीं होगी |


यह "नगण " ( तीन लघु अक्षर ) सम्बंधी संकेत था 🙏

आशा है आप संकेत को सकारात्मक भाव से ग्राह करेगें , आशा है कि कवि मित्र अपने दोहों में नगण संबंधी दोष से बचाव अवश्य  करेगें |
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पृष्ठ 19                              
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*दोहा में ध्यान देने योग्य बातें , दोहे_की_बारीकियाँ)
(सउदाहरण


अक्सर लेखक/ कविगण  दोहे के प्रथम चरण में त्रुटि कर जाते हैं , जिससे लय चली जाती है।


नगण के बारे में विस्तृत रुप से पिछले पृष्ठों पर अवगत करा चुके हैं। यहाँ प्रसंगवश संक्षेप में - 

         (1-नगण )
111 मात्रा भार के शब्द (जैसे नमन न + मन  |कथन क+थन | सहज स+हज | सरल स+ रल  इत्यादि ) (जिसका मात्रा भार लघु गुरु (12) होता है  , व 13 की यति  रगण 212  से आती है व (12 लगा  ) नगण के पूर्व  दीर्घ वर्ण रखने से रगण 212 बन ही जाता है।


उदाहरण -    हम सब करते मनन हैं××


उच्चारण करके देखें  , आप  म +नन उच्चारण कर पा रहे हैं।
आप मन + न नहीं कह पा रहे हैं, तब  दोहा का उपरोक्त चरण
हम सब करते मनन हैं , की यति 122 में चली गई है जो गलत है।
सही चरण होगा    ~~~ हम सब करते ‌हैं मनन √

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पृष्ठ क्रमांक 20.   🥗🥗  🥗.  
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                       *2 -  पंचकल *

दोहे के किसी भी चरण में (चारों में ) - पंचकल से प्रारंभ किया हुआ दोहा  लय नहीं देता है।

जैसे - दोहे का प्रथम चरण यदि ऐसा  लिखें -

हमारा रहे गान अब ×  (लय आ ही नहीं सकती है )
   5.   3. 


रहे हमारा गान अब √ ( लय आ गई है )
3.   5

 
एवं


सजनिया चली  गेह से  × (लय आ ही नहीं सकती है )
   5.          3


चली सजनिया गेह से  √( लय आ गई है )
  3.      5

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पृष्ठ क्रमांक 21 . 
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                        * 3- षटकल *
-षटकल का चरणांत भी लय नहीं देता है  -जैसे -

बात हमारी सुन यहाँ   , मान कुछ  रामलाल |×××

उपरोक्त  समचरण में  (रामलाल ) षटकल से  चरणांत है ,

 अत: षटकल का चरणांत लय  नहीं दे रहा है व पंचकल से समचरण प्रारंभ हो  रहा है जो लय नहीं देता है, तब सही होगा -


बात हमारी सुन यहाँ   , रामलाल कुछ मान |√√√


षटकल की कोई भी यति भी लय  नहीं देती है।

जैसे - 
सभी मिलकर  देख रहे  ×××, आगे का सब हाल |

देख रहे ,  

षटकल यति से लय नहीं है , व यति भी
रगण 212 नहीं हो रही है , तब सही होगा -


देख रहे मिलकर सभी √√√ लय आ गई

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पृष्ठ क्रमांक 22 .  🥗🥗  🥗.  
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                  *4 - आठवी नौवीं मात्रा *
आठवी- नौवी मात्रा सं‌युक्त हो जावें तब भी  लय‌ अटक जायेगी -

जैसे -  माता की रही अब तो , ××

(रही) में( ही ) आठवी नौवी मात्रा संयुक्त हो रही है , इसीलिए  लय अटक रही है ,

 अत:    माता की अब तक रही √


अत: निर्दोष अठकल , सभी चरणों के प्रारंभ में  बनाया जाता है।


अठकल में पूरित जगण भी लय भंग करता है।


जैसे "  सुभाष  " जगण शब्द है , अब इसे हम इस तरह प्रयोग करेगें तो अठकल में भी लय नहीं आयेगी।


जैसे -- पूजो  सुभाष अब यहाँ  =13 (किंतु लय चली गई है )


(पूजो   )पूरित चौकल  शब्द है व सही है पर ( सुभाष ) पूरित जगण  है ) लय अटकाव आ‌ गया है ,  

   लेकिन - 
अब सुभाष  पूजो यहाँ " जगण शब्द इस तरह लय में आ जाता है।

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पृष्ठ क्रमांक 23 .  🥗🥗  
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               *~ छंद में चौकल और जगण समझें *

चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप
(1111~ 11 2~2 11,~22) मान्य रहते हैं।

जगण- (121)  जैसे सुभाष  प्रकाश प्रकार  आदि शब्द  है । जो जगण है , यह जगण शब्द पूरित चौकल के बाद , प्रयोग करने से अटकाव प्रदान करते हैं -

(जैसे -कहता सुभाष देखकर   )

यहाँ दो चौकल हैं पर लय इसलिए नहीं है कि (कहता ) चौकल के बाद (सुभाष) पूरित जगण है।

पर इसे - (कह सुभाष अब देखकर ) लिखने से जगण शब्द लय में आ गया है।
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पृष्ठ क्रमांक 24 .
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पूरित जगण अठकल की तीसरी या चौथी मात्रा से भी प्रारंभ हो सकता है क्योंकि 1 और 5 से वर्जित है तथा दूसरी मात्रा से प्रारंभ होने का प्रश्न ही नहीं है, 

कारण कि प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता।  जैसे - अब सुभाष सबसे कहे |√ √


अब सुभाष सब  में जगण तीसरी मात्रा से प्रारंभ हो कर ‘(अब सु ’) और ‘(भाष  )ये दो त्रिकल तथा( ‘सब) ’द्विकल बना रहा है।=अठकल √ इसी तरह चौथी मात्रा से जगण प्रारंभ हो सकता है जैसे -( पाप सुभाष न देखना )=13 √ 

पाप सुभाष न’ में जगण चौथी मात्रा से प्रारंभ होकर ‘पाप सु  ’ और ‘भाष  न’ के रूप में दो खंडित चौकल बना रहा है।√ है।


निष्कर्ष - दोहा का कोई भी चरण हो , जगण से प्रारंभ , व  पूरित जगण लय नहीं देता है।

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पृष्ठ क्रमांक 25 . 
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  *  6-  ‌एक वर्ण से छंद प्रारंभ नहीं होता है ‌ *


चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता। दोहे के प्रारंभ के चौकल में( 3+1 चलो  न  ) √√ मान्य है परन्तु (1+3  न चलो  )मान्य नहीं है।


इसीलिए कोई भी छंद एक वर्ण से प्रारंभ नहीं किया जाता है।


(‘चलो   न’ )पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है।


(चलो  और न )दो अलग अलग शब्द हैं।


वहीं चौकल में (‘न चलो ’) मान्य नहीं है क्योंकि न वर्ण चौकल की प्रथम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।

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पृष्ठ क्रमांक 26
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* 7-  -दोहा के अठकल में -

द्विकल त्रिकल त्रिकल अमान्य *

अठकल में पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता।
(‘देश काज हित)  सही है जबकि (‘हित देश  काज ) गलत है।
क्योंकि( हित  देश )  पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
और पंचकल का प्रारंभ दोहा लय नहीं देता है।


एवं
- एक साथ तीन पूरित त्रिकल भी दोहे में लय नहीं देते हैं।
जैसे - धीर वीर चलो अब तो ××××,  देना सबका साथ |


तीन त्रिकल के साथ , यति चौकल में जा रही है।
धीर वीर अब तो चलो √√√सही है

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पृष्ठ क्रमांक 27 .  
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* 8- शिल्प काव्य सौन्दर्य *~( काव्य सौन्दर्य बीरीकी ~)


काव्य सौन्दर्य कोई पुस्तक या विधान नहीं है , पर यह सृृजन   चेतना का शिल्प  है , -चूँकि आप सभी ने दोहे बहुत लिखे हैं  , अत: दोहों के माध्यम से ही अपनी बात रख रहा हूँ ।


                   यह चार   दोहे हैं , सभी में कुछ अंतर  है


चिंतन रहता जिस जगह, वहाँ  चेतना   प्राश |
जहाँ ज्योति दीपक जले, छीने कौन  प्रकाश ||(१)


           चिंतन रहता जिस जगह, रहे   चेतना   प्राश |
             जलता  दीपक है जहाँ ,  रहता वहाँ  प्रकाश ||(२)


~~~~~~~इसी तरह ~~~~


गए खोजने यार  हैं ,     मक्खी   है  किस दाल |
घर  की  देखी दाल  तो , निकला मकड़ी जाल || 3


          गए  खोजने यार जब ,       मक्खी  है  किस दाल |
        खुद की देखी‌ लौटकर   , निकला   मकड़ी  जाल || 4


चारों दोहे सही हैं , पर शिल्प काव्य सौन्दर्य में कौन श्रेष्ठ हैं


मेरा मत पहले -दूसरे में दूसरे के साथ है , व तीसरे -चौथे में चौथे के साथ है , 

अगर बात समझ में आ गई हो तो यही शिल्प सौन्दर्य है

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~~पृष्ठ क्रमांक 28 .
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काव्य की भाषा में दोहा -दुहा हुआ निचोड़‌ है (रस है )


" नाम" के आधार पर दोहा का अर्थ " भगवान की कृपा , पूर्वाह्न " है |  

पूर्वाह्न का अर्थ है -सवेरे से दोपहर तक का समय, (दिन का पहला भाग ) अर्थात " पहला शीर्ष" भाग


दोहा - स्वतंत्र , क्रिया प्रधान, अग्रणी,  , मजबूत इच्छा शक्ति वाला , सकारात्मक, ऊर्जावान, उद्यमी, उत्साही होता है।


चार चरण - दो हाथ -दो पैर हैं  | "तत्य युक्त कथ्य इसके कर्म बोल हैं , एक दोहा दूसरे दोहा पर आश्रित नहीं होता है , चार चरण में ही अपनी बात पूर्ण कह देता है |
मात्रा भार, कलन ,  तुकबंदी  के साथ  संदेश / कथ्य युक्त तथ्य परक होना चाहिए , यह विद्वानों का अभिमत है।
दोहे की भाषा सरल सहज बोधगम्य होना चाहिए।
कठिन शब्दों से भी दोहा श्रुतिकटुत्व की श्रेणी में चला जाता है।


अलंकार सहज  स्वाभाविक रुप से आ रहे हों  , व बोधगम्य हों 


तभी लाना चाहिए , जबरदस्ती लाने से दोहा कथ्य से भटकता
है     ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~पृष्ठ क्रमांक 29                ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

              * हिंदी और देशज * शब्द *
हिंदी छंदों में मात्रा घटाने बढ़ाने के लिए शब्दों की तोड़ फोड़ नहीं चलती है , और न हम आपको उचित मानना चाहिए |🙏


न की जगह ना              कोई की जगह कोइ
माई की जगह माइ         भाई की जगह भाइ
गाई की जगह गाइ          नहीं की जगह नहिं
शहनाई की जगह शहनाइ      सफाई की जगह सफाइ
इत्यादि कई शब्द हैं।

खड़ी हिंदी के दोहों में खाय पाय हौय तोय आय जाय , जैसे देशज शब्द नहीं चलते हैं

इसका कारण क्रिया है , 

जैसे  आय से आना क्रिया नहीं है , आय‌ का हिंदी में अर्थ आमदनी है , पर देशज  में आय शब्द आन (इन कमिंग )में प्रचलित है ,

 इसी तरह गाने की हिंदी में  गाय क्रिया नहीं है  , गाय का हिंदी में आशय गौमाता है

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पृष्ठ क्रमांक 30.                 
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एवं  ऐसे शब्द इसलिए स्वीकार नहीं हैं क्योंकि
यह  खड़ी हिंदी  के नहीं हैं।


रोना क्रिया से रोय नहीं बनता है
सोना क्रिया से सोय नहीं बनता है।
होना क्रिया से होय  नहीं बनता है
कोय की जगह सही शब्द  कोई है
जाना क्रिया से जाय नहीं बनता है
पाना क्रिया से पाय नहीं बनता है
करना" क्रिया से  करेय नहीं बनता है।
देना क्रिया से  देय नहीं बनता है ,हिंदी में देय का अर्थ है बकाया राशि ||   
 

 जाना क्रिया से जात नहीं बनता है   ,

गाना क्रिया से गात नहीं बनता है 

 इत्यादि बहुत सी बातें हैं


पर यह देशज बोली  में चलते हैं। 

अत: खड़ी हिंदी के दोहों  में देशज शब्दों से बचकर चलने का परामर्श दिया जाता है।
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पृष्ठ क्रमांक 31         
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मेरा किसी की रचना पर संकेत नहीं है , अमूमन हम अपनी देशज भाषा से बच नहीं पाते हैं  

पर प्रयास करने पर , राष्ट्रभाषा शुद्ध खड़ी हिंदी में लिख सकते हैं |

एक बार  मित्रों को सादर परामर्श देना आवश्यक लगा, सो निवेदन कर दिया है |

 सृजन में शुद्ध हिंदी लेखन का सही अभ्यास आपको करना है या नहीं , आपके अपने विवेक के ऊपर है |

तर्क हेतु

साथी मित्र तुलसी कृत पूज्य रामचरितमानस का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं , 

तब निवेदन करना पड़ता है कि तुलसीकृत मानस हिंदी के साथ मूलत: *अवधी_भाषा* में लिखी गई है , जिसमें बबेरू ( बाँदा ) के शब्दों के साथ  , कुछ बुंंदेली शब्दों का भी प्रयोग है |


पहले लोग  मानस को कंठस्थ  याद करते थे , और तुलसीकृत रामचरितम  मानस , हिंदुस्तान के हर प्रांत अंचल में पहुँची है , गायकों ने भी जनश्रुति में  अपनी बोली में मुखसुख के  हिसाब से गाया , जिसमें कुछ शब्द बदल गए  हैं।

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पृष्ठ क्रमांक 32           
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आज भी किसी के अंचल के गायक से ज्ञात कर लीजिए कि , गायन के समय जब मात्रा घटती बढ़ती है , व लय टूट का खतरा‌ रहता है , तब वह शब्द की मात्रा को कैसे आरोह अवरोह में चबा जाते हैं |


पानी और वाणी हर दस कोस ( मील) पर बदलती है , जिसकी चपेट में शब्द आ ही आते हैं |


रामचरित मानस कई प्रकाशन के दौर से गुजरी है ,

 जिसमें  बम्बई छापाखाना की छपी पहले प्रसिद्ध हुई , पर इसके आगे , पूज्य हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने गीता प्रेस की स्थापना कर ,सही  मानस ग्रंथ को प्रकाशित किया है ,  परिष्कृत किया है |


पर दोहा विधान मानस का और आज का सही है , इसी तरह सूरदास जी के पद ब्रजभाषा में लिखे गये हैं , एवं मीराबाई ने अपने पद ब्रजमिश्रित राजस्थानी में लिखे हैं , रहीम जी ने भी ब्रजभाषा में लिखा है |
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पृष्ठ क्रमांक 33            
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पर जब राष्ट्र भाषा में स्कूली पाठ्यक्रम में रीतिकाल भक्तिकाल कवियों का साहित्य शामिल किया गया , तब पुस्तक सम्पादकों ने कई देशज शब्दों को हिंदी में बदल दिया |


जैसे  - कबीर जी के ,  काल करे वाले दोहे का पदांत अब्ब की जगह अब कर दिया , कब्ब की जगह कब कर दिया , जिससे सम चरण की मात्रा 10 हो गई , अब कोई वह दोहा उदाहरण देकर दस मात्रा को सही ठहराए तो क्या कर सकते हैं |


               रहीम जी ने ब्रजभाषा में अपने दोहे में खुद को #रैमन लिखा , पर पुस्तक सम्पादकों ने #रहिमन कर दिया , उन्हें दग्धाक्षर या दोहे के पदांत "_ताल " से क्या मतलब ?
                कबीर जी ने पत्थर को पाथर लिखा , पर सम्पादकों ने
पाहन पूजै हरि मिलें ,कर दिया है ,   

कई उदाहरण हैं ,
पर  हम यहाँ  हिंदी शब्दों के तोड़ फोड़ की बात कर रहे हैं , एवं खड़ी हिंदी जो हमारी राष्ट्र भाषा है ,उसमें लिखने की बात कर रहे हैं |आशा है आप हमारे मनोभावों को समझ गये होगें। 

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पृष्ठ क्रमांक 34           
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*उच्चारण आधार पर मात्रा भार  ( सउदाहरण )*

मात्रा  भार सदैव उच्चारण पर निर्भर करता है।

आधार -  प्राचीन  पुस्तक "छन्दप्रभाकर" -

स्तुति= इस् तुति--4.             स्मृति =इस् मृति 4
स्नेह=इस् नेह 5.                  स्थान =अस् थान  5
,स्नान =अस् नान ,5.            स्कूल= इस् कूल = 5

👉 केवल य,र, ल,व के पूर्व जब स् आता है तब उसका बलाघात नहीं पड़ता है।   जैसे- स्वयं 12     स्वस्थ 21
इसमें पहले स् का बलाघात शून्य है और न ही इनके उच्चारण के लिए  अस् इस् की आवश्यकता है।


          मात्रा भार उच्चारण और बलाघात पर ही निर्भर करता है।
क्योंकि छंदो में लय उपरोक्त गणना से ही आ सकती है।

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पृष्ठ क्रमांक 35 ‌‌‌‌               
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   *  दोहा के प्राण , उसकी लय ही है *

मेरा आप यह एक दोहा देखें -    जैसे -

                   बच्चे बस्ता लादकर , चले    गये   स्कूल |                         बोझा ढ़ोना अब रहा , रहे बात  हम भूल ||

उपरोक्त दोहे के , दूसरे चरण में स्कूल पाँच मात्रा का भार लेकर ही लय दे रहा है , यदि हम इसे तीन मानकर , दो मात्रा और जोड़ते हैं

तब दोहा बनता है।

        बच्चे बस्ता लादकर , चले    गये  हैं  स्कूल |
         बोझा ढ़ोना अब रहा , रहे बात  हम भूल ||

(चले गये हैं स्कूल    ) या  (  चले गये अब स्कूल ) करते हैं

 , तब आप खुद गुनगुनाकर देख लीजिए उपरोक्त दोनों दोहों में  लय है क्या ? उत्तर आएगा , लय नहीं है | 

जबकि ऊपर के दोहे , चले गए  स्कूल में लय है | अब यदि कोई मित्र , स्कूल को तीन मात्रा में गिनकर , लय लाता है , तब हम उनका अभिनंदन करते हैं।
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पृष्ठ क्रमांक 36              
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                *अब आप मेरा दूसरा दोहा देखें *

स्कूलों   की   भीड़  में ,  गायब  वह   स्कूल |
स्तुति से हमको मिले  ,जहाँ ज्ञान  के फूल ||


(दोहे के तीन चरणों में  आघा स् - इस् का उचारण कर रहा है )

मै खुद ज्ञानी होने का भ्रम नहीं पालता हूँ , 

पर जो कुछ आता है , आपके समझ सउदाहरण रखता हूँ

मानना या न मानना आपके विवेक के  ऊपर है।

    आये दिन फेसबुक पटलों पर कई शब्दों के मात्रा भार पर तर्क वितर्क , कुतर्क में बदलते देखे हैं | 

जिन आचार्यों ने  पिंगल शास्त्र पढ़ा व व्याखित सउदाहरण किया , हम उनको शिरोधार्य करते हैं।

पहले मैं भी त्रुटि देखकर , तर्क वितर्क में उलझ जाता था | पर अब  इन सबसे अपने को  दूर कर लिया है।

आप उपरोक्त शब्दों में कितनी  मात्रा मानकर लिख रहे हैं , वह ही आम पाठक की तरह हम भी मान्य कर आपके भाव को नमन करते रहते हैं , सही / गलत ,आप क्या सीख रहे हैं , यह आप सभी के अपने विवेक पर है |

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पृष्ठ क्रमांक 37              
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स्मृति  मात्रा  चार हैं , पाँच गिने  स्कूल |
संस्कार में छै लगें , चार संस्कृति  मूल ||

उच्चारण के आधार पर , दोहों में मात्रा भार
आप गुन गुना कर स्वंय तय करें , व लय देखें

जहाँ बुढ़ापा देखते , लगती  स्मृति  है  क्षीण |    
अथवा
जहाँ बुढ़ापा देखते , लगती  स्मृति  क्षीण |

कौन चरण सही है ?


जहाँ बुढ़ापा देखते , लगती  स्मृति  क्षीण |  √

स्मृति में 4 भार मानते हैं , तभी लय आ रही है |
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पृष्ठ क्रमांक 38                
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पूजा जाकर सब  करें , जहाँ  देव का   स्थान |
या
पूजा जाकर सब करें , जहाँ  देव स्थान |

कौन चरण सही है ?

पूजा जाकर सब करें , जहाँ  देव स्थान |√ √सही है
स्थान में 5 भार है
                               **
हाथ जोड़कर आज मैं , करता  स्तुति अब ईश |?
या
हाथ जोड़कर आज मैं, करता स्तुति ईश | ?

कौन चरण सही है ?

हाथ जोड़कर आज मैं, करता स्तुति ईश |√√√सही है
   स्तुति में 4 भार है

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पृष्ठ क्रमांक 39                      
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है प्रयाग में कुंभ शुभ , करो आप सब  स्नान |?
या
है प्रयाग में कुंभ शुभ   करो आप स्नान | ?

कौन चरण में लय है ?

है प्रयाग में कुंभ शुभ  , करो आप स्नान | √√सही है
स्नान में 5 भार है (अस्नान )
            ***
हिंदी का  है यह पटल , सभी रखें अब स्नेह |?
या
हिंदी का  है यह पटल , सभी रखें स्नेह |?

कौन चरण में लय है ?  

हिंदी का  है यह पटल , सभी रखें स्नेह |√√सही है
स्नेह में 5 भार है (इस्नेह)


यह मात्रा भार , उच्चारण आधार पर मात्रिक छंदों में है , पर वाचिक छंदों में यह भार लागू नहीं होते हैं।

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पृष्ठ क्रमांक 40                     
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संस्कार शब्द का मात्रा भार

एक प्रश्न मेरे पास आया था संस्कार में मात्रा भार पाँच नियमानुसार गणना में आती हैं क्योंकि संस्कृत में स्पष्ट नियम है की संयुक्त के पूर्व का दीर्घ  होगा ,  अब क्योंकि सम में दो दो मात्राएं हैं तो फिर एक बटे दो 1/2 मात्रा नहीं बढ़नी चाहिए |

तब मैने प्रत्युत्तर दिया -

पाँच मात्रा नियम से आती हैं  , ठीक है | मैं भी सहमत |

अब आप दोहा  के सम चरण में  लय लाइए , संस्कार में पाँच मात्रा हैं तब दोहे का कोई चरण पंचकल से प्रारंभ  तो प्रारंभ होता नहीं‌ है , पर दोहे में " गाल " वाले पंचकल से तो पदांत हो सकता है - जैसे


आज धरा पर है नहीं  ,‌कोई भी  महिपाल |
न्याय नीति की राह चल , दूर करे जंजाल || (लय है)√√

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पृष्ठ क्रमांक 41              
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अब संस्कार को पंचकल मानकर दूसरे और तीसरे चरण में प्रयोग कर रहे हैं 👇,अब आप देखें कि क्या लय है ? 🙏
आज प्रफुल्लित  हैं  नहीं , कोई भी संस्कार |
चले  संस्कार मार्ग पर ,    और करें उपचार ||

(क्या लय है ? ) क्या आप (सन् स् कार ‌)सही उच्चारण लय के साथ कर पा रहे हैं , या संस्कार उच्चारण करते समय , शब्द चबाकर लय दे रहे हैं या संस्कार की जगह सस्कार उच्चारण कर रहे हैं।


ल़‌य‌ लेकर उच्चारण प्रयोग करें | 🙏 मैं तो उच्चारण में संस +कार कर पा रहा हूँ | अब संस्कार शब्द‌ को   पाँच मात्रा मानकर  दोहे के मध्य में लाते हैं 👇


मिले हमें संस्कार हैं  , रखो संस्कार‌‌‌  पास‌‌  |
बात यहाँ संस्कार की , रहें  संस्कार खास‌||


अब क्या दोहा 👆लय में है , 🙏🤔. उत्तर होगा कि नहीं है.

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पृष्ठ क्रमांक 42                     🥗🥗🥗  पृष्ठ पलटिए 🤏
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अब ‌संस्कार को षटकल मानकर प्रयोग करता हूँ 👇

संस्कार मिलते हमें ,    संस्कार   रख पास |
संस्कार  देते सदा   , जग में  सदा उजास‌ ||

यह तथ्य भी कहीं हमनें ‌पढ़ा था , पर ठीक से याद नहीं है कि कहाँ पढ़ा था  कि कुछ शब्द ऐसे हैं कि संस्कृत के नियम व उच्चारण मात्रा भार व हिंदी के प्रयोग उच्चारण मात्रा भार में एक मात्रा का अंतर  आ जाता है , जिसमें संस्कार शब्द भी है।


अब कैसा क्या है , ज्ञानी जाने  , जितना जानते , वह निवेदित है  वैसे  कोई भी  पाँच माने या छै:  , पर दोहा लय में रहना चाहिए , इतना जानता हूँ |


हिंदी के कई विद्वान व आचार्य भी  हिंदी के कुछ शब्दों पर मात्रा भार पर एक मत नहीं हैं ,कोई  पाँच मानते हैं तो कोई छै मानते हैं, 

मैं छै मात्रा भार  में लय पाता हूँ , अब कोई पाँच मात्रा भार में लय स्पष्ट लाता है , तो उसका भी हम निषेध नहीं  करते हैं, सादर -
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पृष्ठ क्रमांक 43                 
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काव्य दोष

*(जिनको_दोहा_छंद_में_प्रमुखता_से_दूर_रखने_ का_ प्रयास_करना_चाहिए)*


काव्य के वे तत्व जो रस के स्वाद  में बाधा उत्पन्न करें अथवा रस का अपकर्ष करें उसे ‘काव्य दोष’ कहते हैं।

कई आचार्यो ने काव्य दोषों की ओर संकेत किया है , और कई दोषों  के भेद वर्गीकृत किए हैं।


दोषों का विभाजन करना दुष्कर है , काव्यप्रकाश में 70 दोष बताए गये हैं 

इन्हें पांच श्रेणियों में  विद्वान मानते हैं। 
१-पद दोष २- पदांश दोष ३- वाक्य दोष. ४- अर्थ दोष ५- रस दोष

उनमें से कुछ प्रमुख दोष (दोहा के सृजन उपयोगी) मैं सोदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ :-
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पृष्ठ क्रमांक 44.  ‌                         
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1- श्रुति कटुत्व दोष (शब्द दोष )

जब काव्य के सृजन में कठोर लगने वाले शब्द प्रयोग होते  हैं। जो सुनने में अच्छे नहीं लगते हैं, उसे "श्रुति कटुत्व " दोष कहते हैं। जैसे-  उदाहरण👇


उत्तेजक हो जब  सृजन  , कथन  सभी  गूढ़ार्थ |
अन्वेषण हो अनवरत  ,क्या "सुभाष"  भावार्थ ||

(यह 🖕दोहा "श्रुति कटुत्व दोष"  में माना जाएगा )

यदि इसको पांडित्य प्रदर्शन की अपेक्षा सरलीकरण से लिखें तब लिखा जा सकता है 👇जो सदैव जन साधारण में प्रचलित रहेगा |


मत विचार ऐसे लिखें  , समझ न आए अर्थ |
कठिन शब्द करते सदा , भाव आपके व्यर्थ ||

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2 -च्युत संस्कृति दोष  (शब्द दोष)
काव्य में जहाँ व्याकरण विरोधी शब्दों का प्रयोग होता है उसे" च्युत् संस्कृति " काव्य दोष कहते हैं।  उदाहरण~👇

बागों   की  लावण्यता , दे  सुंदर  परिवेश |
मन  मयूर भी नाचता, शीतल  रहे  हृदेश ||


🖕"बागों  की लावण्यता"के स्थान पर , "बागों का लावण्य भी "
होना चाहिए  ‘लावण्यता’  व्याकरणिक दोष है। सही है 👇
बागों   का  लावण्य भी , दे   सुंदर  परिवेश |
मन  मयूर  भी  नाचता , शीतल रहे   हृदेश ||


अरे अमरता के चमकीले पुतलो   ‘तेरे’ वे जयनाद’
(कामायनी की पंक्तियाँ)
               इस उदाहरण में ‘तेरे’ के जगह ‘तुम्हारे’ आना चाहिए था |
यहाँ विद्वान समीक्षकों ने व्याकरणिक दोष कहा  है।  

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3- ग्राम्यत्व काव्य दोष (शब्द दोष)

जब खड़ी हिंदी के  काव्यों  में कवि अपनी काव्य भाषा में देशज  या ग्रामीण  शब्दों का प्रयोग करे वहाँ "ग्राम्यत्व काव्य दोष " होता है।

जब  'सुभाष' दर्शन करे ,  जोड़े दोनों  हाथ |
मुड़ी धरे माँ के   चरण , माँगें   उनसे  साथ ||

(यहाँ 🖕मुड़ी की जगह शीष शब्द का प्रयोग करना चाहिए , हिंदी में रचित काव्य में "मुड़ी " "ग्रामत्व शब्द  दोष"  है
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4- अश्लीलत्व काव्य दोष (शब्द दोष)


काव्य में जहाँ अश्लील, लज्जा, घृणा आदि सूचक शब्दों का प्रयोग  होता है। वहाँ "अश्लीलत्व काव्य दोष"  होता है।   उदाहरण
लगा   चाटने    थूककर ,   आकर  वह  नादान  |
अब "सुभाष" मैं क्या कहूँ , बात हुई   अवसान |

थूककर चाटना’ लज्जा जनक शब्द  है। अतः यहाँ "अश्लीलत्व काव्य दोष"  है।


इसको इस तरह भी लिखा जा सकता है 👇


बदल गया कहकर कथन , आकर  वह  नादान  |
अब "सुभाष" मैं क्या कहूँ , बात  हुई  अवसान ||
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दूसरा उदाहरण -

 
जलवा दिखा जवानियाँ , रहीं   नदी   में    तैर |
अब "सुभाष" तुम  चुप  रहो , पीछे  मोड़ो  पैर  ||


इस दोहे का🖕 पहला चरण ’ लज्जा जनक ' है। 

अतः यहाँ "अश्लीलत्व काव्य दोष" है
इसको इस तरह लिखा जा सकता है 👇


नहा   रहीं  हैं  युवतियाँ ,  यहाँ   नदी   में    तैर |
अब "सुभाष" तुम  चुप  रहो , पीछे   मोड़ो  पैर  ||

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5- क्लिष्टत्व काव्य दोष ( शब्द दोष )

जहाँ काव्य में ऐसे दुरूह शब्दों का प्रयोग किया जाए।


जिनका अर्थ बोध होने में कठिनाई हो उसे
"क्लिष्टत्व काव्य दोष ' कहते है।  उदहारण

दृश्यम सब  वीभत्स हैं , महाकाल   का ‌जाल  |
भूत मंडलम् है यहाँ ,   हिमगिरि   उन्नत भाल ||

(यह 🖕"क्लिष्ठ काव्य दोष " है ,

 इसका सरलीकरण निम्न है 👇


दृश्य यहाँ  कुछ है अजब , शिखर हिमालय देख |
महाकाल   की  मंडली ,  खींच  रही  कुछ   रेख  ||

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पृष्ठ क्रमांक 49                        
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6- न्यून पदत्व काव्य दोष (शब्द दोष)

जिस काव्य रचना में किसी ‘शब्द’ या ‘पद’ की
कमी रह जाए वहाँ "न्यून पदत्व दोष" होता है।
उदाहरण
दया चाहता मैं सदा , झोली    रखता साथ |
होना भी मत चाहता , आकर यहाँ अनाथ ||

(🖕उपरोक्त दोहे में , कुछ शब्दों की कमी है ,
जैसे आप  "किसकी" दया चाहते है ? 

 अत: सही  दोहा होगा - 👇

दया आपकी चाहता  , मनसा  रखता   साथ |
मिले नेह की  छाँव जब  , होगा कौन अनाथ ||

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7 -अधिक पदत्व काव्य दोष (शब्द दोष)

जहाँ काव्य में आवश्यकता से अधिक पदों  का

प्रयोग किया जाता है।

 वहाँ "अधिक पदत्व काव्य दोष" 

माना जाता है।   उदाहरण -

सदा भ्रमर ही घूमता , पीने   पुष्प  पराग |
फँस जाता है लोभ में , बंद कली के भाग ||

इस🖕 उदाहरण में ‘पुष्प’ शब्द अधिक पदत्व काव्य  दोष है।

  क्योकि  पराग पुष्प में ही होता है

अतः यहाँ "अधिक पदत्व काव्य दोष"  है। 

सही होगा 👇

सदा भ्रमर   ही घूमता , पीने  मधुर  पराग |
फँस जाता है लोभ में , बंद कली के भाग ||

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8- अक्रमत्व काव्य दोष: (शब्द दोष)

जहाँ व्याकरण की दृष्टि से पदों का क्रम सही नहीं हो। वहाँ "अक्रमत्व काव्य दोष" होता है।  
उदाहरण-


चल पग जब श्री राम ने , किया    मार्ग  तैयार |××
तब "सुभाष"  सीता लखन , करें उसे स्वीकार ||

( उपरोक्त 🖕दोहे में "चल पग " क्रम सही नहीं है
सही क्रम है - पग चल 👇अत: सही होगा

पग चल जब श्री राम ने , किया    मार्ग  तैयार |√√
तब "सुभाष"  सीता लखन , करें उसे स्वीकार ||

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9- दुष्क्रमत्व काव्य दोष

जहाँ शास्त्र अथवा लोक मान्यता के अनुसार दो का क्रम सही नहीं हो वहाँ "दुष्क्रमत्व काव्य दोष" होता है। 

उदाहरण -

गोरी ने  गागर   भरी ,  सहज   नदी‌  का    नीर | 
फिर "सुभाष" छोटा कलश , भरा कुवाँ के तीर  ||

( 🖕जब नदी के जल से गागर भर ली है ,  तब कुवाँ के तट से छोटा कलश भरना,   "दुष्क्रमत्व काव्य दोष" है )

सही होगा 👇

गोरी ने  गागर   भरी ,  सहज   नदी‌  का   नीर | 
फिर "सुभाष" छोटा कलश , भरा उसी के तीर  ||

दूसरा उदाहरण

अगर नहीं   सौ नोट हैं  ,    दीजे  आप   हजार |
हो "सुभाष "यदि लाख भी , वह भी हैं स्वीकार ||

उपरोक्त 🖕दोहे में सभी क्रम सही नहीं हैं, यह "दुष्क्रमत्व काव्य दोष" है सही होगा - 👇


लाख नोट यदि दूर हैं  ,    दीजे   आप   हजार |
पर   हजार भी जब नहीं , तब सौ का स्वीकार ||

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10- वाक्य भंजक दोष


दोहा छंद का प्रत्येक चरण एक पूर्ण वाक्य होता है। अतः जहाँ एक वाक्य (चरण) के पद दूसरे वाक्य में प्रविष्ट हों अथवा वाक्यों  में परस्पर सामंजस्यता न हो, "वाक्य भंजक दोष " माना जाता है,
 

जैसे 

बदल जमाना अब रहा  , कुछ भी नहीं   विचित्र |
तरह - तरह अब  छद्म के,   उद्गम   दिखें चरित्र ||

उपरोक्त🖕 दोहेे में दूसरा चरण ,किसी भी चरण से तदात्म स्थापित  नहीं कर रहा है , 

अत: वाक्य भंजक दोष आ रहा है , क्योंकि जब जमाना बदल रहा है , व तरह - तरह के छद्म चरित्र दिख रहे हैं ,

 तब सब विचित्र ही देखने मिल रहा है , 

जबकि उपरोक्त दोहे का दूसरा चरण कह रहा है कि " कुछ भी नहीं विचित्र "

 अत: दोहे में वाक्य भंजक दोष होगा | इस प्रकार सही होगा👇


बदल जमाना अब रहा  ,दिखते  दृश्य    विचित्र |
तरह - तरह अब  छद्म के,   उद्गम   दिखें चरित्र ||

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11- वचन दोष -


जब काव्य के चरण , एक वचन - बहुवचन का ध्यान
न रख पाएँ   तब "वचन दोष"  माना जाता है। जैसे -

आया है जब  इस जगत ,कर "सुभाष " शुभ काम |
दाम    गुठलियों के मिलें   , जब हो  मीठा   आम ||

🖕उपरोक्त दोहा  में "वचन दोष"  है , गुठलियाँ बहुवचन है  और आम एक वचन है , एक आम  से एक ही गुठली मिलेगी

तब सही होगा 👇


चर्चा   करता यह   जगत , यदि "सुभाष " शुभ काम |
गुठली  रखती  मोल    है ,  जब   हो    मीठा   आम ||

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12- लिंग शब्द दोष


स्त्रीलिंग और पुलिंग शब्दों का प्रयोग सही न हो , तब "लिंग शब्द दोष " माना जाता है

ऊपर वाला  एक   है , हम सब उसके अंश |
फिर अवतारी  ले जनम, आगे  करते   वंश ||

ऊपर बाला पुलिंग है व वंश भी पुलिंग है , पर  अवतारी इया स्त्रीलिंग प्रत्यय है ,  तब सही होगा 👇

ऊपर वाला  एक   है , हम सब उसके अंश |
फिर  आए अवतार है , और चले है    वंश ||

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13- पुनरुक्त काव्य दोष- (अर्थ दोष)

जहाँ अर्थ की पुनरुक्ति हो अर्थात एक ही बात को दो अलग-अलग शब्दों के माध्यम से कहा जाए.
वहाँ " पुनरुक्ति अर्थ काव्य दोष " होता है।

मत "सुभाष" अब जाइये, जाना है बेकार |
अंघे -बहरे   हैं  वहाँ , सूरदास   नर   नार ||

इस 🖕उदाहरण में जाइये -जाना व  अंघे- बहरे - सूरदास एक ही अर्थ के घोषक है  अतः "यहाँ पुनरुक्ति अर्थ काव्य दोष"  है।  सही होगा 👇


मत "सुभाष " अब जाइये, श्रम करना  बेकार |
रहते    बहरे   जब  वहाँ  , कौन  सुनेगा  सार | |

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14- प्रसिद्धि-विरुद्ध काव्य दोष (अर्थ दोष)

काव्य में जहाँ लोक या शास्त्र विरुद्ध वर्णन हो,

वहाँ"प्रसिद्धि-विरुद्ध अर्थ काव्य दोष "होता है।  

उदाहरण-

मदिराचल सब  पूजते  , देखें  शिवा   पिनाक |
नत मस्तक  हैं  देवता, समझें  उसकी   धाक ||

इस पंक्ति में पिनाक अर्थात शिव धनुष का संबंध मदिराचल  से है। जो लोक और शास्त्र के विरुद्ध है।

 पिनाक का संबंध शिव व  हिमालय  पर्वत से है। अतः यहाँ " प्रसिद्धि-विरुद्ध अर्थ दोष ' है     , सही होगा 👇


सभी हिमालय‌  पूजते  , देखें  शिवा   पिनाक |
नत मस्तक  हैं  देवता , समझें  उसकी  धाक ||

उपरोक्त प्रमुख दोष है , जिनसे काव्य सृजन करते समय सावधानी रखनी चाहिए , और भी दोष है , जिन पर आगामी दिनों में प्रकाश डालेगें, दोहा सृजन में उपरोक्त दोषों से बचाव करना चाहिए |
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कई बार मित्र पूछते हैं कि   ' न और ना " में अंतर क्या है ?

और (डिक्शनरी ) वृहत हिंदी शब्द कोष या हिंदी शब्द कोष खोलकर उनमें एक ही अर्थ  देखते हैं ,तब प्रश्न करने लगते हैं कि जब डिक्शनरी में एक ही अर्थ है, तब हिंदी छंद काव्य में ना का निषेध क्यों  है | 

तब यहाँ यह समझना आवश्यक है कि डिक्शनरी प्रचलित शब्दों का  संग्रह है ,काव्य विधान नहीं है , काव्य का अपना एक शिल्प विधान है , जो स्वराधारित भी है ।

न --  न किसी भी उत्पन्न कथन  को #प्रारंभ से  ही मना/ इंकार  कर देने की प्रक्रिया के लिए होता है।

उदाहरण से समझिए -  कथन  - वहाँ पचास  लोग हैं  ?
उत्तर - न  ( कोई भी नहीं है ,अर्थात एक भी नहीं है )

 उच्चारण स्वर  भी हल्का होगा व विनम्रतापूर्ण होगा ,

 न हिंदी भाषा में  मान्य है , उर्दू में कम ही प्रयोग होता है ,

 न निषेध क्रिया/भाव  का‌ भी संकेत ‌ देता है    

        जैसे -      मांँगी‌‌  नाव , न केवट आना

                       जैसे-          तुम न करोगे तो वह करेगा।
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और     ना -- ना  का प्रयोग किसी भी उत्पन्न कथन  को सिर्फ नकारा  करने  के लिए होता है |

कथन---वहाँ पचास लोग हैं          उत्तर - ना

( आशय - हो सकता है चालीस  हो , तीस हो , हो , कितने भी हों या नहीं हों , पर पचास नहीं  है )

ना का प्रयोग उर्दू फारसी  में बहुत मिलता है , ना का उपसर्ग लगाकर विलोम बनाने में बहुत होता है- 

जैसे - नाफरमानियाँ, नाइंसाफी ,नादानियाँ , नाउम्मीद , नासमझ , नाकाबिल,


पर - यहाँ ना की जगह न का प्रयोग नहीं हो सकता है 

जैसे नउम्मीद , नसमझ - इत्यादि शब्द नहीं बनते हैं 

हिंदी और संस्कृत में ना की जगह निषेधात्मक उपसर्ग हेतु


अ - का प्रयोग होता है -
जैसे   -  न (नहीं) धर्म = अधर्म. ( नाधर्म नहीं हो सकता है )
न (नहीं) मानवीय = अमानवीय ( नामानवीय नहीं हो सकता है )
न (नहीं) ज्ञान = अज्ञान.  ,( नाज्ञान नहीं हो सकता है )

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ऊपर सभी तत्सम शब्द हैं , पर तद्भव में भी ऐसा प्रयोग मिलता है , जैसे  ~न ( नहीं ) पढ़ = अनपढ़


हिंदी में ''ना' का प्रयोग क्रियाओं के निर्माण में ही किया जाता है।


धातु( क्रिया का मूल रूप) में 'ना' जोड़ने पर क्रियाओं का निर्माण होता है।


जैसे:- लिख+ना=लिखना।  पढ+ना =पढ़ना ,  सुन +ना सुनना ,


तैर +ना तैरना , इसमें लिख पढ़ सुन तैर धातु है , व‌  ना क्रिया है।


इसी तरह
एक फिल्मी गीत से  भी समझें :--


कहो ना प्यार है -( अर्थ - कहने  की क्रिया करे कि प्यार है ) हिंदी में यहाँ ना क्रिया अनुरोध है ।


यदि‌  ना  का अर्थ( मत / नहीं) लगाया जाए , तब तो अर्थ और आशय ही बदल जाएगा | कि प्यार नहीं है ....

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हिंदी में " न" का प्रयोग  निषेध भाव में मिलता है व प्रयोग होता है |

  उर्दू में ना का प्रयोग उचित माना जाता है , चूकिं हिंदुस्तान में दोनों भाषाओं में साहित्य बंधु लिखते हैं , इसीलिए न और ना‌‌  में फर्क नहीं कर पाते  हैं , 

पर हमारा कहना यह है कि दोनों भाषाओँ में लिखें , पर एक दूसरे की खिचड़ी मत करें ।


उर्दू में - खुदा ना-ख़ास्ता √    खुदा न -खास्ता ×


हिंदी ‌में - आप ऐसा  न करे √   आप ऐसा ना करे ×


😂🙏हास्य अंतर - बोलकर देखिए  - मेरे लिए काम करोगे ?
न - हल्का स्वर ( झगड़े  की कम सम्भावना है  , मना करने के वाबजूद भी विनम्रता झलक रही है  )


ना - जोर से ही बोला जाएगा 

(झगड़े की पूरी सम्भावना,कठोरता )


अब आपको ( न/ ना ) कहाँ कैसा प्रयोग करना है , आप स्वतंत्र हैं , पर हिंदी छंदों में  निषेध क्रिया / आशय के लिए (न) का प्रयोग ही मान्य है , 

अब कुछ मित्र हिंदी छंदों में मात्रा घटाने बढ़ाने के लिए न को ना - नहीं को नहिं , और को अरु , लिखकर,  मात्रा घटा बढ़ाकर छंद को पूरा करते हैं , पर ऐसा करने पर छंद का सौन्दर्य चला जाता है |    व छंदाकार दोहाकार की अकुशलता झलकती है   ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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ए और ये


किसी शब्द के अंत में “ए” का प्रयोग ज़्यादातर तब किया जाना चाहिए जब हम किसी वाक्य में अनुरोध  हों,  नम्रता व सम्मान मृदुता के भाव हों

  जैसे ~ दीजिए , कीजिए, आइए, बैठिए, सोचिए,  ,शुभकामनाएँ , भावनाएँ , कामनाएंँ, इत्यादि | 

उदाहरण
आप यहाँ पर बैठिये , करिये कुछ आराम |
कहना मेरा  मानिये , फिर करते हैं  काम ||××


ऐसा लगता है कि आदेश दिए जा रहे हों 🖕‌  

 सही होगा 👇


आप यहाँ पर बैठिए , करिए कुछ आराम  |
कहना  मेरा मानिए , फिर करते  हैं काम ||√√ 

विनम्रता  लगती है🖕


लेकिन जब वाक्य में आदेश भाव परिलक्षित हो तब “ये” देखने में आता है  ।

 जैसे~  बुलायें , हँसायें , बनायें , खिलायें, सजायें , लुटायें  बजायें, दिखायें, सुनायें आदि |👇


खाना उन्हें खिलायें , और   सजायें  ‌द्वार |
अपना प्यार लुटायें , करके कुछ सत्कार ||√√

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वाक्य. विन्यास की दृष्टि से हिन्दी के कुछ शब्दों में ~

जैसे ~ लिये/लिए,~~~   गये/गए,~~   दिये/दिए)

में " ये " और " ए " के प्रयोग के यदि  नियम पर विचार करें  तो.....


मुझें  इतना पता है कि जब दो, एक जैसे शब्द एक के बाद एक आते हैं तो पहले  में ~ " ये " और दूसरे में  "ए " का उपयोग होता है।  

   (जैसे~ वह चुन लिये गये  हैं ×

            वह चुन लिए गए हैं ×  

     वह चुन लिये गए हैं √

             परन्तु  जहां एक ही शब्द उपयोग में आ रहा हो
जैसे ~ " राम ने उसके  लिये काम किया है " या " श्याम ने  उसके लिए काम किया है " दोनो सही थे ? और दोनो में  से कोई भी उपयोग करते थे और आज भी प्रयोग कर रहे है , 

किंतु सन् 1959 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा गठित राज भाषा हिंदी समिति द्वारा हिंदी में बहुत कुछ सुधार व दूसरी भाषा के कई शब्द  हिंदी में अपनी शर्तो पर स्वीकार किए हैं |" ये " जहाँ  अस्वीकृत किया गया है, वहाँ " ए ' का प्रयोग सही माना है


जैसे ~ चाहिये × / चाहिए √      | नये × नए √

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निर्णय उचित लगता है ,

 जहां तक ‘उसके लिए’ (संप्रदान कारक हेतु)  पदबंधों में ‘लिए’ का सवाल है, यह मुझे सही लगता है ‘लिये’ की तुलना में " लिए " सही है ।


इस प्रकार ~ गये की जगह गए √ 

दिये की जगह दिए √ उचित है


"‘लेना’". क्रिया पदो के लिए "  लिये " प्रचलित  था किंतु आधिकारिक मानक हिंदी में ‘लिए’  की संस्तुति है ।


" ‘जाना’"  के क्रियापद से  "गये " ‘गया’ (या गआ ) तथा ‘गयो’ (स्थानीय बोली में प्रयुक्त गओ?) स्वीकारते थे , 

तो नियमों की एकरूपता व मानक हिंदी के लिए ‘गयी’, ‘गये’ की जगह " गई, गए " स्वीकृत किया गया है |

 हिंदी व्याकरण में अभिरुचि और भाषा में सम्वर्धन के पक्षधर यह परिवर्तन स्वीकार कर लिखते हैं , जो मुझे भी उचित लगता है |


किंतु जिन शब्दों में मूल रूप से   'य'  श्रुतिमूलक अंग है , तब वह  बदला नहीं जा सकता।

 ( श्रुति मूलक = स्पष्ट वर्ण सुनाई देना  )  जैसे -   पराया - पराये √  पराए × ||    , पहिया - पहिये  √  पहिए × ||  

 रुपया - रुपये √ रुपए ×  || करुणामय - करुणामयी √ (  स्थायी, अव्ययीभाव आदि) करुणामए ×
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अब जो मानक हिंदी से हटकर पुराने ढर्रे से लिखते हैं, तब हम आप क्या कर सकते हैं, 

वह लोग तो आज भी होय, रोय, कोय, तोय, मोय का प्रयोग करके लिखते हैं ,

कुछ कहते हैं कि  यह देशज शब्द हैं , लेकिन  -
क्रिया पदानुसार -   होय से होना , रोय से रोना , कोय से कोई  तोय से तेरा , अर्थ ही नहीं निकलता है |

 फिर आप यहाँ पूँछेगें कि यह रो़य तोय क्या हैं ? यहाँ हम आपसे निवेदन करना चाहेगें कि यह हिंदी में  " मुख सुख " शब्द कहलाते हैं , जिनका उच्चारण तो करते हैं , पर इनका स्थान साहित्य या आम लेखन में भी नहीं है ।


जैसे - मास्टर साहव को मुख सुख से #मास्साब कह देते हैं , अब मास्साब को किसी छंद या आवेदन पत्र में उपयोग तो नहीं करते हैं


तहसीलदार को तासीलदार , कम्पाउन्डर को कम्पोडर , साहब को साब इत्यादि।


आप कहेंगे कि प्राचीन कवियों ने उपयोग किया है ,  लेख लम्बा करने की अपेक्षा संक्षेप में इतना कहूँगा कि पहले सब गायकी और लोक भाषा में लोगों को समझाते थे , कोई विधानावली नहीं थी |

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इसी तरह   व्यंजन ‘य, र, ल, व’ तथा स्वर ‘इ, ऋ, ऌ, उ’ के क्रमशः समस्थानिक हैं । 

ऐसी स्थिति में ‘य्+ई’ के उच्चारण ‘यी’ तथा ‘ई’ में अंतर साफ-साफ मालूम नहीं पड़ता है । 

यही बात ‘वू’ एवं ‘उ’ के साथ भी है । ‘र्+ऋ’ के साथ भी यही है, जो कइयों को ‘रि’ सुनाई देता है।

औ (दरअसल बोला ही वैसे जाता है!) लौकिक संस्कृत तथा हिंदी में ‘ऌ’ तो लुप्तप्राय है । 

‘ऋ’ भी केवल संस्कृत मूल के शब्दों तक सीमित है । 

परंतु इस प्रकार की समानता का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि ‘कायिक’ के स्थान पर ‘काइक’ और ‘भावुक’ के बदले ‘भाउक’ उचित मान लिया जाए |


भारत सरकार के  मानव संसाधन मंत्रालय ( शिक्षा मंत्रालय ) में  हिंदी राजभाषा ‌समिति है , जिसमें हिंदी भाषा से सम्बन्धित निर्णय‌ हिंदी विद्वान लेते हैं , 

एक निर्णय यह भी लिया गया है कि #उर्दू के शब्द यदि हिंदी में लिखे जाएं तो #नुक्ता लगाने की बाध्यता नहीं है


कारण कि उर्दू में नुक्ता लगाने का आशय वर्ण को आधा करना है , 

जबकि हिंदी में आधा वर्ण लिखने की सुविधा है , तब नुक्ता की जरुरत ही नहीं है।
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अनुस्वार( बिन्दु) और अनुनासिक ( चंद्रबिन्दु) का प्रयोग


अनुस्वार या बिंदु (ं) ------“अनुस्वार” जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, अनुस्वार स्वर का अनुसरण करने वाला व्यंजन है यानी कि स्वर के बाद आने वाला व्यंजन वर्ण “अनुस्वार” कहलाता है,

 इसके उच्चारण के समय नाक का उपयोग होता है, ऐसा आभास होगा जैसे नाक से कहा हो |


एक कहानी के माध्यम  से  मैं हिंदी वर्ण माला के  अनुस्वार या बिंदु (ं) पंचमाक्षर के प्रयोग को निवेदित कर रहा  हूँ।


एक. प्रदर्शनी  लाइन लगाकर दिखाई जा रही थी , सबसे आगे एक शरीफ युवा था , उसके पीछे एक छोटा नटखट बच्चा था  , और उस बच्चे के पीछे उसी बच्चे का दादा खड़ा था |


ठीक उसी के पीछे फिर एक युवा खड़ा था , युवा के पीछे  दूसरा नटखट  बच्चा खड़ा था पर उस बच्चे के पीछे कोई दादा या परिवार का मुखिया नहीं था  ,

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घटनाक्रम बढ़‌ चला , दादा जी ने अपने नटखट बच्चे को‌ प्रोत्साहन दिया कि आगे खड़े युवा के कंधे पर चढ़कर प्रदर्शनी देख लो , 

नटखट बच्चा प्रोत्साहन पाकर युवा के कंधे पर चढ़ गया , और युवा कुछ कह नहीं पाया , क्योकि उसके पीछे मूंंछे ऐठता उसका दादा खड़ा था |


लेकिन दूसरे नटखट बच्चे के पीछे दादा प्रोत्साहन और रक्षा को नहीं था , सो वह बच्चा चुपचाप जमीन में नीचे ही  ख़डा रहा |


बस यही कहानी हिंदी के पंचमाक्षर की है


पंचमाक्षर समझाने के लिए इतना अधिक लिखकर समझाया जाता है कि सामने वाला भाग खड़ा होगा या सिरदर्द से मस्तक रगड़ने लगेगा  ,

पर मैं सपाट सरल शैली में एक कहानी बतौर प्रयोग ही  बतला रहा हूँ ।
सरल सपाट ठेठ शैली में समझिए , बस यह खानदान समझे‌-
परिवार. के  दादा  ताऊ                              नटखट बच्चे
क वर्ग ---     क. ‌‌ ‌    ख.    ग.      घ‌‌‌‌‌‌                 ङ,
च वर्ग ~       च ‌‌      पलटिए ज.      झ.               ञ,
ट वर्ग ~        ट.        ठ.    ड      ढ.                ण
त.वर्ग.           त         थ.     द.   ध.                 न     
प वर्ग --         प.        फ.     ब.   भ.              म   

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   पहले आप समझिए कि  ङ, ञ, ण, न म जब यह आधे रुप में आते है तब  नटखट  बच्चे बन जाते हैं जिनकी  बिंदी ं बनती है व अनुस्वार का रुप ले लेते हैं

बच्चे के पीछे यदि दादा बाबा उसी कुल वर्ग का‌ है तो बच्चा आगे‌ वाले के कंघे पर चढ़ जाएगा , 

क्योंकि पीछे उसको हौंसला देने सम्हालने देखभाल को उसका बाबा दादा है।


सन्दर्भ को संदर्भ लिख सकते हैं , क्योंकि आधा न (बच्चे के पीछे ]उसके कुल त वर्ग का द वर्ण बाबा बनकर पीछे खड़ा है ,व बच्चे को प्रोत्साहित कर रहा है, कि बेटा आगे वाले के कंधे पर चढ़ जा , मैं तो हूँ तेरी रक्षा को ,


इसलिए स के कंधे पर आधा न चढ जाएगा और स बेचारा  कुछ कह नहीं पाएगा  |


छंद में छ की छाती पर आधा न् चढ़ जाएगा , क्योंकि त वर्ग का द दादा गिरी करते हुए आधा न् (अपने नटखट बच्चे ) को प्रोत्साहित कर रहा है , अत: 'छंद' ऐसे लिख दिया जाता है।

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पृष्ठ क्रमांक     ‌70                 
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गङगा = गंगा
क वर्ग का ग आगे पीछे है , अत:  बेफ्रिक ङ. ग के कंधे चढ जाएगा


कण्ठ = कंठ. - में  आधा ण( बच्चा ) क के ऊपर चढ़ जाएगा क्योंकि सहारे को ट वर्ग का उसका दादा ठ है। सहारे को , बेचारा क कुछ कह नहीं पाएगा।


गन्धारी = गंधारी -- आधा न के पीछे उसका दादा ध खड़ा है , अत: आधा न बच्चा ग के कंधे पर चढ़ गया , बेचारा ग चुप ही रहेगा


लेकिन , किसी नटखट बच्चे के पीछे उसके कुल ( वर्ग) का दादा बाबा नहीं खड़ा हो तो बच्चा कुछ नहीं कर पाएगा।
जैसे  - सन्मति ~  यहाँ 'संमति' नहीं लिख सकते।


कारण आधा न् (बच्चे के पीछे उसके कुल वर्ग का दादा बाबा नहीं है।  अत: बच्चा अपने स्वतंत्र रुप में आएगा

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य. र ल व श ष स ह क्ष  इनका कुल वर्ग नहीं है  , 

यह अपने  आधे रुप में यथा स्थान आएगें,किसी के ऊपर नहीं चढ़़ेगें |


आधा र का जरुर रेफ बनकर पीछे के वर्ण पर जाएगा
इसकी एक संस्कृत सूक्ति मुझे  कुछ कुछ याद है।


जल तुम्बिका न्यायेन रेफस्य‌ च ऊर्द्धगमनम्


जिस प्रकार जलतुम्बी हवा रहित होने से जल में ऊर्द्धगमनम् हो जाती है उसी न्याय अनुसार  " र" यदि बिना स्वर का हो तब पीछे  की ओर  ऊर्द्धगमनम् ( शिरोरेखा के ऊपर ) हो जाएगा

  त्र ज्ञ का आधा रुप होता नहीं है

इसी तरह यह बहुत ही नया आसान तरीका है समझने का 
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अनुनासिक या चंद्रबिंदु (ँ)


अनुनासिक, स्वर होते हैं, इनके उच्चारण करते समय मुँह से अधिक और नाक से बहुत कम साँस निकलती है। 

इन स्वरों के लिए चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग होता है और ये शिरोरेखा यानी शब्द के ऊपर लगने वाली रेखा के ऊपर लगती है। ऐसे कुछ शब्द हैं- 


उदाहरण-  माँ, आँख, माँग, दाँव, डाँट, दाँत. चाँद  आदि। यह ँ चंद्रबिंदु इसलिए शोभित है कि इसके साथ कोई और मात्रा नहीं है ,


अनुस्वार बिंदी ं लगाना उचित नहीं है , जैसे - मां आंख मांग दांव डांट दांत  चांद , आप इन शब्दों में अनुस्वार का उच्चारण करके देख लीजिए , 

आपको अनुभव हो जाएगा कि आप क्या उच्चारण कर रहे हैं।

पर इसे "कलम सुख" के  कारण बिंदी (अनुस्वार ) लगाकर प्रचलित कर दिया है
कई बार अनुनासिक या चंद्रबिंदु के स्थान पर बिंदु का भी प्रयोग किया जाता है, ऐ
सा

 तब होता है जब शिरोरेखा के ऊपर कोई और मात्रा भी लगी हो। जैसे- इ, ई, ए, ऐ, ओ, औ की मात्राओं वाले शब्दों में चंद्रबिंदु होने के बाद भी इन मात्राओं के साथ बिंदु के रूप में ही अनुनासिक को दर्शाया जाता है।

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ऐसे कुछ शब्द है  - – कहीं नहीं, मैं  सिंह ,  आदि  , (कहीँ  नहीँ   मैँ   सिँह  )उच्चारण में अनुनासिक हैं  , पर शिरोरेखा के ऊपर पहले से मात्रा है , इसीलिए जगह की कमी के कारण अनुस्वार को लगाते हैं


कई बार अनुनासिक की जगह अनुस्वार का प्रयोग शब्द अर्थ को भी बदल देता है: जैसे– हंस (जल में रहने वाला एक जीव),
       हँस (हँसने की क्रिया) हँसना सही है , पर हंसना × है


स्वांग(स्व+अंग) अपना अंग,      स्वाँग (नाटक)


आँगन √   आंगन × है             पूँछ √ (दुम) पूंछ × है


अनुस्वार और अनुनासिक में अंतर
अनुस्वार व्यंजन है      और अनुनासिक स्वर है।


अनुस्वार को पंचम अक्षर में बदला जा सकता है,

 अनुनासिक को बदला नहीं जाता। 

अनुस्वार बिंदु के रूप में लगता है और 

अनुनासिक चंद्रबिंदु के रूप में।
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शिरोरेखा के ऊपर मात्रा लगी हो तो अनुनासिक भी अनुस्वार या बिंदु के रूप में लिखा जाता है जबकि अनुस्वार कभी चंद्रबिंदु के रूप में नहीं बदलता।


अब आजकल कुछ विचित्रताओं को मान्यताएं मिल रही हैं
रंग (सही रुप है -  रङ्ग ) पर की बोर्ड की अनुलब्धता व हिंदी राज भाषा समिति ने ङ को अनुस्वार रुप बिंदी ं में लिखना प्रारंभ किया , किंतु र पर अनुनासिक  चंद्र बिंदु ँ लगाकर रँग लिखना कहाँ से प्रारंभ किया गया है , मुझे संज्ञान नहीं है , इसी तरह अंग व अँग है | छंदों में मात्रा घटाने बढ़ाने में इनका उपयोग देखते  है।


फेस बुक पर अब प्रलाप चल पड़ा है  , बहुत से तर्क करने की जगह कुतर्क पर आ जाते  हैं  |  तब क्या कह सकते है |
जिनको हमारा आलेख अच्छा लगे उनका आभारी हूँ। व जो असहमत हों उनसे  भी क्षमा प्रार्थी हूँ

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सौलह मात्रिक छंदों  का सही गठन* ( लय‌ विज्ञानुसार)


*(सौलह मात्रिक छंदों  का  परिभाषा"* *उदाहरण सहित गहन और सूक्ष्म बिन्दुवार आलेख ~"*


एक सफल छंदकार का ,सौलह मात्रिक छंद (चौपाई छंद की गेय चाल पर अधिकार होना अत्यंत आवश्यक है) ,

 आल्हा, ताटंक, लावणी, सार, सरसी , रास छंद , निश्चल छंद  , शंकर छंद  विष्णुपद  इत्यादि प्रमुख छंदों का आधार चौपाई ही है


              क्योंकि इन छंदों के पद का प्रथम 16 मात्रिक चरण चौपाई का ही चरण है। मात्र 16 मात्रा गिना देना काफी नहीं है , जरुरी है 16 मात्राओं का सही गठन | जिनसे गेयता आती है |


16 मात्रा का लोकप्रिय  छंद है। यह चार चरणों का सम मात्रिक छंद है। चौपाई के दो चरण अर्द्धाली या पद कहलाते हैं। 

जैसे~
ग्रीष्म ताप को चढ़े जवानी |‌  बने  प्यार  का बादल  दानी ||
रोम-रोम  में खिले कहानी  | बरसे  जब भी पहला  पानी ||

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इसके एक चरण में सौलह मात्राएं होती हैं, दो दो चरण समतुकांत होते हैं। चरणान्त चौकल से 

( 22 - 112- 211 - 1111 से 99 प्रतिशत मिलता है |


इसी यति / पदांत  विधान से 99 प्रतिशत चौपाई व अन्य छंद सृजित है , एक प्रतिशत चौपाई में यति रगण 212 से भी है ,


यह क्यों व कैसे है , हम इस विषय पर कुछ नहीं कहना चाहते हैं , हम 99 प्रतिशत के साथ सहमत है |


चौकल से यति  / चरणांत करने पर जो छंद में गेयता निखार आता  है , वह रगण से करने पर नहीं आता है  , यह मेरा अनुभव है | किसी अन्य के अनुभव की कह नहीं सकता हूँ


चौपाई छंद चाल  चौकल और अठकल के मेल से बनती है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।
4-4-4-4,      8-8,      4-4-8,    4-8-4,     8-4-4

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अठकल = 8 – अठकल के दो रूप होते  हैं। 

प्रथम 4+4 अर्थात दो चौकल। एवं 3+3+2 है , 

किंतु चौपाई में प्रथम अठकल में 3 3 2
के कोई भी रुप ला सकते है ,

 परन्तु दूसरे अठकल में 332 का इस प्रकार प्रयोग करें  कि यति या पदांत चौकल हो ~~~~जैसे -


लोभी धन  का  ढेर लगा+ता | पास  नहीं  संतोषी   माता ||
हाय-हाय में खुद ही‌ पड़ता |दोष सुभाषा सिर पर मढ़ता  ||


उपरोक्त चौपाई चाल  में ~ 

लोभी धन का ( एक अठकल + ढ़ेर +लगा +ता  दूसरा अठकल ) √
हाय हाय में ( एक अठकल +खुद ही पड़ता | दूसरा अठकल )


चौपाई चाल  में कलन (समकल विषमकल)  निर्वहन केवल चतुष्कल और अठकल से होता है।

 अतः एकल या त्रिकल का प्रयोग करें तो उसके तुरन्त बाद विषम कल शब्द रख समकल बना लें। 

जैसे 3+3 या 3+1 इत्यादि। चौकल और अठकल के नियम  जिनका पालन आवश्यक है। तभी चौपाई की गेय लय बनती है |
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चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (1111~ 11 2~2 11,~22) मान्य रहते हैं। 

चौकल में पूरित जगण (121) शब्द,

 जैसे सुभाष  प्रकाश प्रकार   आदि प्रयोग करते हैं ,तब गेय  लय नहीं आ सकती है और गेयता ही छंद के प्राण होते हैं।


(जैसे -कहता   सुभाष देख जमाना  ) यहाँ चार चौकल है पर लय इसलिए नहीं है कि कहता के बाद सुभाष पूरित जगण है


चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता।


चौकल में 3+1 करो न  मान्य है परन्तु 1+3 ( न करो)मान्य नहीं है।
‘करो  न’ पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है। करो और न दो अलग अलग शब्द हैं। 

वहीं चौकल में ‘न करो’ मान्य नहीं है क्योंकि न शब्द चौकल की प्रथम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।

 और छंद एक वर्ण से प्रारंभ नहीं होता है
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    3+1 रूप खंडित-चौकल कहलाता है जो चरण के आदि या मध्य में तो मान्य है पर अंत में मान्य नहीं है।

‘करे  न कोई’ से चरण का अंत हो सकता है ‘कोई करे  न’ से नहीं हो सकता है , यह सब लय के हिसाब से नियम है |

चौपाई चाल कभी भी जगण 121 से प्रारंभ नहीं हो सकती है
जैेसे - सुभाष बोला सुनो सभी अब (लय नहीं आ सकती है }

अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। ‘राम काज हित  सही है 

जबकि ‘हित राम काज " गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।
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पूरित जगण अठकल की तीसरी या चौथी मात्रा से ही प्रारंभ हो सकता है

 क्योंकि 1 और 5 से लय आ ही नहीं सकती  है , 

तथा दूसरी मात्रा से प्रारंभ होने का प्रश्न ही नहीं है, 

कारण कि प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता। ‘
जैसे - तुम  सुभाष अब आगे बढ़ना |√


तुम सुभाष अब ’ में जगण तीसरी मात्रा से प्रारंभ हो कर ‘तुम सु ’ और ‘भाष  ये दो त्रिकल तथा ‘अब ’ द्विकल बना रहा है।


इसी तरह चौथी मात्रा से जगण प्रारंभ हो सकता है जैसे  - ताप प्रकाश न उसने देखा |


‘ताप प्रकाश न’ में जगण चौथी मात्रा से प्रारंभ होकर ‘ताप प्र ’ और ‘काश न’ के रूप में दो खंडित चौकल बना रहा है।√ है

इसी तरह से  यह निम्न नियम से  चरण यति  देखें-
वह सुभाष से रखे न नाता |√

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“वह सुभाष से” अठकल तथा तीसरी मात्रा से जगण प्रारंभ।√ है


“रखे न” खंडित चौकल “नाता” चौकल। √ है
पर यति पर


“नाता रखे न” लिखना ×  है क्योंकि खंडित चौकल चरण के अंत में नहीं आ सकता।

यह आलेख आप सम्हाल कर रखे, क्योंकि बहुत से छंदों में 16 मात्रा विषम चरण में होती हैं , जो चौपाई चाल से चलती हैआपके सदैव काम आ सकती है

सादर
*आलेख ~सुभाष सिंघई ,  एम•ए• हिंदी साहित्य ,

पूर्व भाषानुदेशक , आई टी आई 
*निवासी जतारा जिला टीकमगढ ( म०प्र०)*

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मात्रा पतन  उर्दु ग़ज़लों में प्राय: मिलता है , पर हिंदी छंदों में  जब हम उर्दु, अरबी शब्दों का प्रयोग करते हैं , तब उच्चारण आधार  लेते हैं | मात्रा पतन पर विस्तृत आलेख की जगह मैं सिर्फ़ दोहा छंद को ध्यान में रखकर , कुछ शब्दों पर ही संकेत कर रहा हूँ। 

जैसे - मेहदी  , मेहनत , मेहमान , मेहरबान इत्यादि उर्दु / अरबी शब्द हैं , जो लेखन में उपरोक्त तरह लिखे जाते हैं ,

 पर उच्चारण करते समय( मे) से  ( म ) का ‌ ही उच्चारण कर पाते हैं  , तब( मे) को एक मात्रा ही गिनते हैं , व लय भी मात्रा गिराकर ही आती है |

मेहदी शब्द पर हिंदी और उर्दु दोनों अपना दावा करते हैं।

     विभिन्न वर्तनी में लिखा मिलता है - जैसे मेहदी , मेंहदी , मेहँदी , महदी , मेह्दी  पर मैं इस तर्क में नहीं जाना चाहता , 

अनावश्यक प्रलाप हो उठते हैं, 

मैं मेहदी लिखकर बात कर रहा हूँ | आप अपनी वर्तनी चुन सकते हैं , इनमें से किसी भी वर्तनी में "मेहदी" का का मात्रा भार 4 है |

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उदाहरण - 

मेहरबान होकर  सनम , लाए मेंहदी आज |

मेहनत से यह रच गई ,छुपा प्यार के राज ||


मेहदी पर मेहनत हुई , कहते  हैं  मेहमान |

मेहरबान है हाथ पर , दिखलाती  है  शान  ||


मेहरबान  मेहदी   हुई ,     आए   जो मेहमान |

स्वागत करके हाथ से , दिखलाती निज शान ||


उपरोक्त तीनों दोहों में , (में) उच्चारण में  (म) आ रहा है ,

 अत: एक मात्रा ही मान्य करेगें ,तभी लय आ रही है। 

 पर उर्दु अरबी टंकण  में जैसा लिखा जाता है ,

वैसा ही  हिंदी में लिखते हैं। 

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 संयुक्ताक्षर का मात्रा भार जिसका आधार पारंपरिक उच्चारण है |

देखना यह होता है कि उच्चारण में आधे अक्षर का भार किसके साथ जुड़ रहा है, पूर्व वर्ण के साथ या बाद के वर्ण के साथ।

उच्चारण आधार पर मात्रा भार , जो  दोहों में अक्सर आते हैं। 

(विस्तृत रुप से आप व्याकरणिक पुस्तकों में पढ़ें )

इन सभी 👇में आधे अक्षर का भार पूर्व वर्ण की बजाय संयुक्ताक्षर के साथ ही रहता है। इसलिए यहाँ पूर्व लघु वर्ण के मात्रा भार में कोई वृद्धि नहीं होती है। जैसे

जैसे- तु  म्हें=12,      जि न्हें=12 , 

तु म्हा रा      तु  म्हा री     तु म्हा  रे=122

 जि न्हों ने =  122.  कु  ल्हा  ड़ी=122   क न्है या=122

  कु म्हा र=121 .   म ल्हा र=121, 

किन्तु - कुल्हड़=211 को कुल्+ह ड़ पढ़ा जाता है।

क्योंकि अर्ध वर्ण "ल्" का भार पूर्व वर्ण "कु" पर पड़ रहा है।   ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~पृष्ठ क्रमांक 85~

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86 - आपके अभिमत -

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