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अनुक्रमांक

 70- महामंगला ( महामंगल ) छंद -                 

71 -महाताण्डव छंद                                

  72 त्रिलोकी छंद  विधान (मात्रिक छंद )

73- महागंग छंद विधान 

74 - भानु‌ छंद विधान 

75. किशोर छंद विधान सउदाहरण

76 - वासुदेव छंद 

77  महा चंडरसा छंद / जय शुभचंडी छंद

78 महा शशिवदना छंद 

79. - #रासा छंद , (चार पद ) 16 मात्रा 

80 - अरुण छंद 

81 - सार्द्ध मनोरम छंद 

82 हंसी छंद 

83 महा भक्ति छंद 

84 मनोरम छंद

85 पुष्प माला ( वारातागा ) छंद 

86 - रगण ध्रुवक (विद्युत) छंद 

87-प्रणव छंद 

88 - मदलेखा छंद 

89 दुर्दर छंद

90 महारंगी छंद 

91 दीर्घ मारकृति छंद

92 रतिवल्लभ छंद


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70 महामंगला ( महामंगल ) छंद - 

छंदों में एक मात्रा कम -अधिक होने से , यति-  पदांत निर्धारित होने से  नाम बदल जाते हैं , तब कुछ ज्ञानी  व नव छंदकार भ्रमित हो जाते हैं |
22 मात्रा में 12 -10 के कई छंद हैं ।

पर अभी में 22 मात्रा के( 11- 11 )पर संकेत कर रहा हूँ |

1-मंगलवत्थू छंद (11-11 मात्रा)  त्रिकल यति त्रिकल , पदांत दीर्घ
2-मंगलमाया - (11-11 मात्रा )गाल यति लगा , पदांत दीर्घ

3- 👇यह #महामंगल_छंद" अन्वेषण अध्ययन में मिला।

केवटिया तब कहत , रामहि निज हों पार |
खेवटिया तुम  जगत , मोहि न  दीजो भार ||
राखत मंगल चरन , छुवत  बनत है   नारि |
ऐसहि जब  पग धरन , कैसहि होई उतारि |

(केवट कहता है कि राम जी आप खुद ही नदी  पार करें , आप संसार सागर में कुशल नाव खेने वाले खेवटिया  हैं , यह भार मुझे मत दें , आप अपने चरण कमल रखते हैं कि छूने भर से नारी बन जाती है , अगर मेरी नाव में पग धरने से ऐसा हो गया , तब कैसे पार उतार  सकूँगा|)

      जब  मुझे अपने अन्वेषण स्वभाव में उपरोक्त छंद  पढ़ने को  मिला , तब इसको आप सभी के सम्मुख ला रहा हूँ।
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महामंगला ( महामंगल ) छंद -
22 मात्रा ( 11- 11)  यति नगण , पदांत गाल
चार पद , दो -दो या चारों  पद समतुकांत।

मात्रा बाँट - अठकल +नगण (तीन लघु) से यति ,  + अठकल + गाल ( दीर्घ-लघु) से पदांत

अनुसंधान-  #सहजता_संकेत -दोहा  छंद के दो  समचरण एक पद बनाते हैं

पद के दोनों चरणों की कलन मापनी दोहे के  सम चरण जैसी है , किंतु पहले चरण में यति #नगण हैं और दूसरे चरण में #यथावत_गाल. (दीर्घ-लघु ) है |

महामंगला / महामंगल छंद विधान ,

दोहा के दो सम चरण ,  बन पद  दें आनंद |
चार   पदों का  सृजन  ,  महामंगला   छंद ||
जिसमें यति है  नगण, शुभ पदांत भी गाल |
चारों  या  दो उदित , लय  तुकांत की ताल ||

#छंद -
शारद माँ   को   नमन ,  करता   बारम्बार  |
लेखन में हों कथन ,  जिसे करें  सब प्यार  ||
ग्राह सभी को सहज , सही   निकालें  अर्थ |
हे माँ मेरा  सृजन ,    कभी न  जाए   व्यर्थ ||

लेता गणपति शरण , चरण पकड़कर आज |
वंदन पूजन नमन ,‌   सब शुभ करता काज ||
रिद्धि सिद्धि का सहज , दे दो  प्रभु  वरदान |
कहीं न आए  अटक , पाऊँ     ऐसा  ज्ञान ||

पूजो  श्री हरि   चरण , लेकर  आरति  थाल |
शरण  करूँ मैं वरण , पद रज रखता भाल ||
हाथ‌‌ जोड़   कर नमन ,  करता   हूँ  भरपूर |
श्रद्धा से   प्रभु  नयन  , लगें भक्त को   नूर ||

करता वंदन नमन , कृपा करो जिनराज |
लेकर अपनी शरण , छाया  देना  आज ||
मंगलमय प्रभु चरण , करें भक्त जब नेह |    
मिल जाती है  शरण , हो मंगल मन गेह ||

माता के शुभ चरण ,   आएँ   अपने  द्वार |
पूजन अर्चन नमन  ,  करिए   माँ  दरबार ||
निर्मल रखकर हृदय , देतीं   माँ  आशीष |
हरें कष्ट सब सहज , स्वयं  कहें  जगदीश ||

वंदन अर्चन कर नमन , पूजन  माँ दरबार |
भाव भरे जब हृदय ,करते   चरण पखार ||
माता  रानी सहज ,  करतीं  तब  उपकार |
रखती हैं निज शरण , सुख   देतीं उपहार ||

करते सब हैं नमन  , माँ    दुर्गा  दरबार  |
गरबा खेले सहज,‌  सभी  नारियाँ  द्वार  ||
पूजा‌ में हैं   सुमन  ,  गाती   मंगल गीत  |
जगराते में  भजन , सुनती रखकर प्रीत ||

महामंगला ‌भवन , नृप  दशरथ  का धाम |
जन्म हुआ है  प्रकट ,जग में  आए   राम ||
भरत शत्रुघन लखन , तीनों  भाई    साथ |
ज्येष्ठ राम के अनुज ,धन्य  मानते   माथ ||

छंदों का है   महल ,    करता  अनुसंधान |
हो अन्वेषण ‌सुखद , लय का   पूरा‌ मान ||
मूल छंद भी पटल , करता   रहता   खोज |
संस्कृत के भी सहज, लाता रखकर ओज ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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#गीत -
महामंगल ( महामंगला ) छंद - 22 मात्रा ( 11- 11)
यति नगण , पदांत गाल
चार पद , दो -दो या चारों  पद समतुकांत
#सहजता_संकेत - छंद पद के दोनों चरणों की कलन मापनी
#दोहे_के_सम_चरण जैसी है , किंतु पहले चरण में यति #नगण हैं
गीत

राज तिलक का मुकुट , पहने   राजाराम |
राम राज का है नगर , धन्य  ओरछा धाम |

चैत्र शुक्ल तिथि नवम, महामंगला   दीप |
जन्म आरती सुखद ,  होती  राम समीप ||
रहें ओरछा दिवस , रात  अयोध्या  वास |
परम सत्य यह कथन,सभी  जानते खास ||

रात अयोध्या  पहुँच  , करें    राम विश्राम |
राम राज का है नगर , धन्य  ओरछा धाम ||

रखकर प्रभु को  हृदय, करते जन हैं  काज |
धन्य ओरछा    नगर ,   जहाँ राम   का राज ||
गार्ड   सलामी    सुबह , और   लगाते  शाम |
शासन   भी   हर  प्रहर , माने      राजाराम ||

नहीं यहां पर अतिथि , बनता   कोई  नाम  |
राम राज का है नगर , धन्य  ओरछा धाम ||

शासन सैनिक सहज , रक्षण करते द्वार |
रामराज को नमन ,सँग करते  जयकार ||
नहीं चित्र का चलन ,   सरकारी आदेश |
दर्शन करिए सरल  , प्रजा  भक्त परिवेश ||

राजमहल में भजन ,जय‌-जय  राजा‌राम |
राम राज का है नगर , धन्य ओरछा धाम |

मंगल है हर  दिवस ,  महामंगला  खास |
दीप  आरती सहज , होती  रहे  सुभास‌ ||
पट खुलने का समय , मानें सब फरमान |
प्रातकाल का अलग, रखें शाम का ध्यान  ||

जो  करते हैं  विनय ,  बनते बिगड़े काम |
राम राज का है नगर , धन्य ओरछा धाम |
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गीत

पूजन करता  जगत , माँ को दे    सम्मान  |
उपकारी  माँ  सरल , देती  रहती    ज्ञान ||

जननी माँ का अमिय‌, अमरत सम अनुपान |
आँचल जिनका चमन, त्याग और बलिदान ||
माँ की ममता अमर ,   लगा न उस पर दाग |
होता रहता  झरण ,  अनुपम   सदा  पराग ||

करके  ममता खनन ,    संतानों  को  दान |
उपकारी   माँ   सरल , देती   रहती   ज्ञान ||

तीर्थ धाम है चरण ,      हस्त सदा आशीष |
माता की शुभ शरण ,  धन्य  कहें  जगदीश ||
ममता   माँ की  मधुर  ,  जिसमें  है  मकरंद |
लिखते कविवर सहज  , माँ  पर सुंदर  छंद‌ ||

माँ  कर देती सहज , जीवन अभियुत्थान |
उपकारी   माँ   सरल , देती   रहती   ज्ञान ||

माँ  चरणों  में  सलिल, दिखे  गंग  की धार |
माँ  भावों की   पवन , करती प्रकट  बहार ||
जन्नत माँ के   चरण , बरकत  माँ   के हाथ |
हसरत उसके नयन , रहमत  माँ का   माथ |।

आशीषों  में   गगन , माता   की   पहचान |
उपकारी   माँ   सरल , देती   रहती   ज्ञान ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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गीतिका

पूजो माँ के चरण , रहमत  करते   हाथ |
छाया माँ की शरण , बरकत भरते  हाथ ||

आशीषों में गगन ,  बन करती  बरसात ,
करें बलाएँ  गलन ,  कभी न डरते हाथ |

चिन्ता करती सहज , संतानों  की रोज ,
करे भलाई चयन , अमरत झरते  हाथ |

देखा करती  लगन , जब देती वह  साथ ,
संकट  करती शमन ,सदा निखरते  हाथ |

माँ  होती है चमन , हम सब उसके फूल ,
शीष माथ पर अधिक,मात  ठहरते हाथ |

सुभाष सिंघई

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मुक्तक

कभी भूलकर दमन  , करो न माँ  नाराज |
सदा उसी की लगन , जीवन में  आगाज ||
संतानों   में   मगन , करे    स्वप्न.  साकार -
माता खुद में चमन ,    कोहिनूर -सा ताज |

माँ करती है सफल , देती    सबको  हर्ष |
सब कंटक दे झटक, माता का शुभ दर्श ||
बला हटाते    नयन , रखती इतना ओज |
उन्नति हो किस तरह,करती  रहती  खोज ||

माँ की  ममता अमर ,  लगती  बड़ी अनूप  |
ज्येष्ठ माह में शरद  ,  पौष  माह   है  धूप ||
हर मौसम में सजग , रखे सदा   ही   खैर -
सूखे में   है   जलद ,  माँ का ममता  रूप ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०~

महामंगल (महामंगला )छंद

अठकल + नगण , अठकल + गाल 

🌹🥗  माँ शारदे वंदना 🥗🌹 

 वीणा हैं  कर   युगल  ,   नमो  शारदे  मात |                          करें हंस पर गमन , करनें    नवल   प्रभात ||                         दर्शन  करते  भगत  , विद्या   माता   रूप |                            भक्ति भाव से सृजन  ,  करते   रहें  अनूप  ||

                         मात शारदा  वरद , हस्त रखें  कवि शीष |                           तब शुभ आकर मदद ,स्वयं करें जगदीश |                           लेते आदर सहित, कवि जन माँ का नाम |                             लेखन में भी सहज , करते सदा  प्रणाम ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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महामंगल (महामंगला )छंद

अठकल + नगण , अठकल + गाल 

रावण उवाच - 

रावण का था दहन , बोला तब  वह चीख |                             देकर मुझको जलन, क्या लेते हो  सीख ||                            खोटे हों जब करम , बुरे   मिलें  परिणाम |                           किसने सीखा यतन , पूज्य   यहाँ श्रीराम ||

 हाल देखकर  जगत ,   रावण है  नाराज |                          कहता मानव चतुर , कभी न आए बाज ||                             अवगुण मेरे   पकड़ , करता  खोटे  काम |                            बनकर  बगुला भगत  , पूजा  करता राम ||

  जितने बगुला भगत , शरण न   देगें राम |                          रावण का है कथन , तज दो  खोटे काम ||                             विजया दशमी दिवस , जीतो प्रथम विकार |                          फिर करना तुम दहन , रावण का हर बार ||

रावण जिंदा  जगत ,  और विभीषण भ्रात |                        कुम्भकरन-सा शयन  , नेता  करें  न प्रात  ||                           मेघनाथ-सी अकड़ ,   छल  मामा  मारीच |                       मिल जाते हैं सहज , कालनेमी  से कीच ||

 अच्छा  भारत  वतन  ,   लोक तंत्र है शान |                          पर जोकर का कथन , वस  मेरा  सम्मान ||                          रावण कहता सहज, सुन लो आज उवाच |                             रोको   कोई  गरल , राजनीति  का  नाच ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०


महामंगल (महामंगला)छंद 

अठकल + नगण , अठकल + गाल (चार पद)  

 गीत 

गाते सब हैं  अजब ,   नहीं    सुरों में   ताल ||

नाट्य करें पर गजब  , बजा- बजाकर गाल ||


हँसते   कंटक  सहज  ,  रोते   रहें गुलाब |

बुरे  स्वप्न   हैं   निडर , डरते  सुंदर ख्वाब ||

सज्जन का चुप अमन,दुर्जन पुजता क्रोध |

सम्मानित है   नकल , नहीं सत्य का बोध ||


लोकतंत्र में  सहज ,  गर्दभ   हैं   महिपाल |

नाट्य करें पर गजब, बजा- बजाकर गाल ||


दर्प रहा  है  छलक , बातों   का   भण्डार |

छल के दिखते चमन , हैं    झूँठे  व्यापार ||

मायावी  है  गगन ,    हंस   बनें  हैं  काग |

उल्लू बाँटे  गरल ,    कहकर मधुर पराग ||


सभी  लालची चतुर ,  लिए  हाथ  में जाल |

नाट्य करें पर गजब, बजा- बजाकर गाल ||


हवा   बढ़ाती     घुटन ,   टूट   रहे  विश्वास |

जिसको कहते प्रगति , उसका रूप विनाश ||

कैसा  मंगल  भवन ,   बैठे   जहाँ   सियार |

जो वह करते हवन , उसमें    बस है  खार ||


खल डालें अब खलल , जो खुद में हैं   दाग |

नाट्य करें पर गजब  , बजा- बजाकर गाल ||


सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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महामंगल (महामंगला)छंद 

अठकल + नगण , अठकल + गाल (चार पद)  

 दो-दो या चारों पद समतुकांत 


दीन  सुदामा सरल , गए  कृष्ण के पास |

प्रभुवर नंगे चरण , मिले  दौड़कर खास ||

दोनों के जब नयन ,  लगे   बहाने   धार |

कहें सभी यह मिलन , याद रखे संसार ||


हुई   मित्रता अमर ,   बना   गई  इतिहास |

कृष्ण सुदामा मिलन , दीन-ईश  विश्वास  ||

भेदभाव भी निकट , कभी न आता पास |

जो लेता  प्रभु शरण ,  रहता नहीं उदास ||


प्रश्न करें  कुछ  कथन , गाते  कुंठित    गान |

कुछ विशेष पर रहम , क्यों   करते भगवान  ||

क्यों  कुछ   होते  सफल , कुछ   रोते  संसार |

है उत्तर  निज   करम ,  बन   जाता  आधार  ||

 

कथनी करनी अलग , नहीं   धर्म  से  कर्म | 

मानवता कर हनन ,    कभी न करते शर्म ||

आएँ  संकट   विकट , तभी   पुकारें  राम |

कर्म नहीं खुद उचित , करें  धर्म   बदनाम ||


सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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महामंगल छंद  , अठकल नगण , अठकल गाल 


पहले करना पकड़ , करता यह  जो बात  |

बिगड़े   पर्यावरण ,  दीवाली    की   रात ||

भेजों भी  बिन टिकट , उनको अब यूक्रैन |

जहाँ बम्ब का   हवन ,   देगा उनको  चैन ||🤥👏


पैलू  खाँ   हर जगह , देते   रहते    ज्ञान |

टाँग फँसाते सहज , करते   हैं अभिमान ||

करते हैं वह खलल , जहाँ  हिन्दु त्योहार |

देखें    पर्यावरण , अपनी   नजर पसार ||🙄


इन्हें ट्रम्प तक सहज , भेजे अब सरकार |

इजरायल का हवन , जहाँ  धुवाँ  अम्बार ||

वहाँ औजौन   परत ,  इनकी    रिश्तेदार |

मिलने आए सहज , करनें  नजर   उतार ||😚


धनतेरस  से   उदित ,   दीवाली  त्योहार |

रूप चतुर्दिश   मुदित , करता है   शृंगार ||

दीपक जलते क्रमिक, दीवाली   की रात |

प्रथम दूज का दिवस ,लगता नया  प्रभात ||🌹


सुभाष सिंघई


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71- महाताण्डव छंद ,  12 ×2 =  24 मात्रा).(आदित्य जाति)
चार पद अथवा दो दो पद समतुकांत

शास्त्रीय सूत्र में  - चरणारंभ लघु व यति  पदांत लघु 

किंतु आचार्या अभिमत - चरणारंभ  ""लगा"" एवं
यति / पदांत - ""गाल या जगण "
(उपरोक्त 🖕अभिमत में सूत्र  निहित है

हमारा अन्वेषण-  प्रारंभ लगा व यति पदांत गाल सही है ,  अगर जगण (121 ) से यति/ पदांत बन रहा है , तब भी यति /पदांत "गाल"  ही कहलाएगा  |

सूत्रानुसार लय से महाताण्डव छंद की  मापनी  है
👉-यगण + चौकल + गाल
यगण 122 को वाचिक लघु कर सकते हैं , तब -
लघु +  चौकल + चौकल+ गाल = 12 मात्रा × 2 =24 मात्रा )

हमारी विनती आज,  सुनो माँ  शारद  आप |
महातांडव शिव  छंद , लगा दो इस पर थाप ||
महल  है छंद सुजान ,  सजाकर रखता द्वार |
झुकाऊँ अपना माथ,  करो अब आप पधार ||

शिवा  हैं  तप  अवधूत  , महादेवा  जगदीश |
हिमालय शुभ कैलाश, जहाँ तप करते  ईश ||
रखें  वह  तेज प्रचंड , हलाहल  कंठ समेट |
हरें भक्तों के  ताप ,  करें   दारुण  आखेट ||

महातांडव जब नृत्य , करें  शिव जी  कैलाश |
प्रलय-सा होता  शोर, सभी को हो आभाष ||
सभी गण जोड़ें  हाथ ,   दिखें सब ही बेचैन |
करें विनती भी आन  , झुकाकर अपने  नैन ||

हिले नभ भू  सम्पूर्ण , महाताण्डव जब नृत्य |
शिवा भी  होते रुष्ट ,  गलत जब होते  कृत्य ||
महा क्रोधित हों रुद्र  , सहज ही  लें आकार |
दिशाएँ  जाती काँप , नहीं   सूझें   उपचार  ||

नहीं जब दिखती रोक , चलें जग में  पाखंड |
तभी सब करते सोच  , कौन अब  देगा दंड ||
जनम लेकर अवतार,  तोड़ते   सभी  घमंड |
सिमटते हैं सब  दुष्ट, बिखर कर होते  खंड ||

हमारे  रहे उसूल  , सभी   का  हो  सम्मान |
नहीं हम तोड़ें पुष्प , खिलें जो आँगन शान |
सिखाता हमको ज्ञान , रखो जग में संज्ञान ||
पराया अपना कौन , रखो बस यह पहचान ||

समय का चलता चक्र , उलझते आकर लोग |
लगाते चक्कर खूब , स्वयं  ही  पालें   रोग ||
करें  खुद की तारीफ , जुड़ें तब बुरे  कुयोग |
सुभाषा करे विचार , समय के ‌कैसे   भोग ||

हमारी जिनसे   ताल   , बनेंगे    उनके  मित्र |
करेंगे खुलकर बात , रखेंगे  दिल     में चित्र ||
कटेंगे  जब संताप , डरें    क्यों  वहाँ  सुभाष |
विनय से करते काम,विजय का रखें प्रकाश ||

सिखाते हमें जवान  , प्रथम हम रखते  देश |
हृदय से चाहें खूब , रहें  हम   हर  परिवेश ||
सहें जाड़ा बरसात,   तपें वह   सीमा   द्वार |
करें वह फिर भी प्यार, वतन को खूब सँवार||

हमारा भारत श्रेष्ठ ,   हिमालय  एक प्रखंड |
समझिए उत्तर भाग , वतन का रक्षक दंड ||
हमारे सैनिक वीर , सजग  रहते  दिन रात |
तड़पता रहता चीन  , नहीं  दे   पाए  घात ||

जहाँ हों निजी विचार , कभी मत थोपो यार |
रहेंगे  सदा  उसूल ,    करेंगे    जो  उपकार ||
मिलेगा  उनको   लाभ , चलें जो सच्ची राह |
मदद भी करते ईश ,   दिलाते   उन्हें पनाह ||

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मुक्तक

दिखे अब  चारों ओर, विकट है हा- हा कार|
मची  है  पूरी लूट , गलत हैं आज विचार |
नहीं अब होती टोक , सभी हैं राजा आज -
सुभाषा भी चुपचाप , नहीं करता तकरार |

समय का आया फेर, गधों की अब औकात|
लगाते  हैं  फटकार,  चला  सिंहों  पर लात |
कहीं भी जोड़ें भीड़, करें  सब  खूब प्रलाप -
बने हैं सब आजाद , वतन   से   करते घात |

करें तांडव  नटराज ,  भरें  वह नाद   हुँकार |
कड़क तब बिजली क्रोध,चमक से करती मार|
शिलाओं के  पाषाण , विखरते  टूट  जहान -
करें सब पूर्ण प्रयास, शिवोहम   हो   गुंजार |

कभी डाकू  ‌सरदार , न कोई खोले राज |
न जीरा सूँघे ऊँट , न मूरख करते  काज |
मगर से करके बैर , न रहते  जन तालाब -
न रहता वहाँ ‌सुकून, जहाँ पर उड़ते बाज |

लिया है जग को देख , हृदय‌ में है अभिमान |
खड़े  तब उनके द्वार , सभी कटुता  सौपान |
विनय को तजकर लोग , चले हैं जो भी राह -
नहीं  दिखती  तलवार,  हिलाते रहते  म्यान |

जहाँ  गाँठें  मजबूत,   वहाँ  रस्सी की शान |
कहीं है  खुली सुभाष , बिगड़ती  पूरी आन |
अगर रिश्तों का जाल , कुतर दें आकर लोग -
वहाँ  फिर होगा  नष्ट, सहज  पूरा सम्मान ||
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गीतिका
समांत स्वर - आला   , पदांत आज

करें जो आकर राज  , हृदय  है  काला आज |
सुनाकर  मीठी  तान , चुभाते  भाला  आज |

पराया अपना मान ,  छलें जनता को खूब ,
हड़पते   पूरा  माल ,    लगाते ताला आज |

भगत है बगुला श्वेत ,  निशाना साधे‌  चोंच ,
लगाते सही निशान , जपें   जो माला आज |

बुने जब मकड़ी जाल, फँसे खुद जाला छत्र ,
समझने   होती   देर , पड़ा    है  पाला आज |

छिपे हैं   भारत   देश , बहुत  से  हैं   गद्दार ,
उन्हीं का दिखता ओज , बने हैं लाला आज |

रखा  है मन में खोट ‌,   मिटा अब पूरा ओज ,
नमन अब करने तीर्थ  , चली है खाला आज |

कहें यह अमरत पेय , बनेंगे   धूर्त  "सुभाष"  ,
बुलाकर   करते  प्रेम ,  पिलाते  हाला आज |

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गीत

हटें  हैं   सारे    कष्ट ,   पधारें   हैं   भगवान |
जपा जिसने हरि नाम, मिला उसको वरदान||

दुखी की सदा पुकार , सुनें हरि  सबकी टेर |
हृदय के श्रद्धा  भाव , सदा   ही   लेते   हेर ||
चले आते हैं द्वार  , भगत    का   रखते मान |
जपा जिसने हरि नाम , मिला उसको वरदान ||

बढ़ाकर साड़ी  चीर , रखी नारी  की लाज |
पुकारा था जब  नाम ,बचाया था गजराज ||
बना अमरत हरि ध्यान , करे मीरा विष पान |
जपा जिसने हरि नाम, मिला उसको वरदान ||

हटाते  हरि संताप   , धरा पर  होते  पाप |
मिटे हैं कौरव कंस , हटी है   इनकी थाप ||
सुदामा  से हैं मित्र ,   हुआ उनका  सम्मान |
जपा जिसने हरि नाम, मिला उसको वरदान ||

अमर भी करते प्रेम , रखें  राधा का मान |
हृदय से रख संज्ञान , सदा ही  देते ध्यान ||
जगत को है उपदेश ,   सदा गीता का ज्ञान |
जपा जिसने हरि नाम, मिला उसको वरदान ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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72- त्रिलोकी छंद विधान (मात्रिक छंद )

प्रति पद 21 मात्रा - (11-10 मात्रा  )

दोहा का सम चरण (11 मात्रा + 10 मात्रा 

10 मात्रा - त्रिकल +- द्विकल +द्विकल + लगा (लघु गुरु )

(स्पस्ट कथन - त्रिकल के बाद जगण चौकल मान्य नहीं , शेष चौकल  मान्य हैं ) अत: 

"दोहा का समचरण_ + त्रिकल + चौकल + लघु गुरु  "

( जगण चौकल अमान्य ). ||दो दो पद या चारों पद समतुकांत ||~~~~~~~~~~~~~~~~

नमन माँ शारदा 

बोलो मीठे बोल , सदा   प्रभु को  भजो |

करो   बुराई  त्याग ,  मोह  माया  तजो ||

अच्छाई के संग ,  चले     साथी चलो |

स्वयं जलाकर हाथ , नहीं  अपने मलो ||


 लेने से प्रभु नाम , सदा  संकट   कटें  | 

बाधाएँ   हों  दूर , वहाँ   खल भी हटें || 

गीता  का है ज्ञान ,  कर्म अपना करो |

जो भी मिले  प्रसाद ,नहीं  लेने  डरो |


शुभ चरित्र की राह ,ज्ञान सम्यक  मिलें |

सच्चा दर्शन भान , पुष्प पावन   खिलें ||

कहते हैं सब संत, ग्रंथ  सम्यक  पढ़ो |

साधक बनकर आप ,मोक्ष सीढ़ी चढ़ो ||


फैल रहा  है  पाप  , सभी  व्याकुल रहें |

जो रखते संतोष , वह    निराकुल   रहें ||

कहते जो भी   लोग , खार सागर भरा |

उनके  अंदर  मैल   , हृदय  गागर भरा  ||


करके अच्छे काम , रखो  शुभ  भावना |

पूरण करते ईश ,   सदा  शुचि कामना || 

करते  जो   कर्तव्य    नमन  आराधना |

उस साधक की पूर्ण ,सफल हो साधना ||


सच्चे  जो   गुरुदेव , साधना पुंज  है |

मानो   ज्ञानी गंग ,  सरलता  कुंज है ||

सम्वेदन  सन्मार्ग , रोशनी   सूर्य  हैं  |

शिष्यों  को वरदान, सत्य के तूर्य हैं  ||

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मुक्तक 

कैसे - कैसे लोग ,     यहाँ   संसार   में  |

बाबा जी भी आज ,  फँसे   व्यापार में |

बुनते रहते जाल , अजब दिखती कथा - 

कहते   डूबा   धर्म  , कहीं   मझधार में |


जिनमें  गुण शुभ चार,दिखें दिन रात हैं |

रखते हैं  वह   वीर , सृष्टि  में  बात   हैं |

हर्ष  दर्श निष्कर्ष ,निकलता ही  दिखे - 

अंत  छोर  प्रारंभ ,  स्वयं   सौगात   हैं |


नहीं झुके आकाश ,सभी यह जानते |

देखा  करते   दूर , झुका  तब मानते |

झूठा दिखता सत्य, कौन यह रोकता - 

बेमतलब की  रार  , सदा जन ठानते |


पंचायत में लोग , देख मुँह   बोलते |

जो भी आता सत्य , उसे भी तोलते |

रोता है  ईमान , पंच  हँसते  दिखें -

पाते  ही विश्वास , जहर वे  घोलते | 


मैं करता अवसान , चिता मरघट कहे |

जल जाते अरमान , हृदय में जो  रहे ||

अंतिम मरघट‌  केन्द्र ,सभी यह जानते -

फिर भी करते पाप ,ताप भीषण सहे |

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गीतिका 

रखकर खाली हाथ ,    यहाँ  आना रहे |

और सभी कुछ छोड़  , वहाँ जाना रहे |


कफन चले जो साथ , चिता मरघट जले।

दो    मुठ्ठी  है    राख ,   यही  गाना  रहे |


मरघट करता हर्ष , सदा जलता कहे , 

जले सभी श्रीमान   ,कभी साना  रहे |


मरघट का मैदान   , नहीं  गिनती करे , 

बनते सब हैं   धूल , नहीं दाना    रहे |


गिनती करे "सुभाष", कौन बचके गया , 

लगे सभी को दाग , नहीं   नाना  रहे |

सुभाष सिंघई

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गीत 

देखें हमने काम ,  सभी  अटपट करें |

अच्छे खासे लोग , यहाँ  खटपट करें ||


दुनिया जानो  मंच , पात्र    मानव बना |

सभी तरह के वेश , पहिन कर है तना ||

बनते सभी   शरीफ , सत्य वादी   बनें |

पर रखते अभिमान ,  खड़े   रहते तनें ||


अपना देखें लाभ , तभी झटपट करें |

अच्छे खासे लोग. यहाँ  खटपट करें ||


आज धर्म का मर्म , सभी  अपना कहें |

कहते कभी यथार्थ , कभी सपना कहें ||

भूल गए सब लोग,   कर्म  पहचानना |

टाँग अड़ाना सीख , करें   अवमानना ||


उल्टे सीधे काम , सभी अटपट करें |

अच्छे खासे लोग , यहाँ  खटपट करें ||


अभिमन्यु  को  नीर , नहीं  रण  में ‌ मिला  |

धर्म  रहा   क्यों  मौन  , जाल  कैसे सिला ||

मिला  कर्म फल  मौत ,  कर्ण  दानी   मरा |

लगे भीष्म को तीर , मरे    गिरकर   धरा ||


विधि के सब यह लेख , सभी   नटखट करें |

अच्छे खासे लोग  ,    यहाँ  खटपट   करें ||

सुभाष सिंघई


73-महागंग छंद (आंक जाति ) 18 मात्रा , 9-9
यति -दो दीर्घ  और पदांत भी  दो दीर्घ ( दो लघु को एक दीर्घ मानना #निषिद्ध)
चार पद , दो दो या चारों पद सम तुकांत
#छंद -
करके    इशारे  , मोहन   बुलाते |
निकट तरु   बैठे , बंशी   बजाते ||
कहे जो राधा ,  धुन   वह  सुनाते |
मुदित मन दोनों ,स्वर को मिलाते  ||

श्याम बिन राधा , लगती अधूरी |
रास बिन लीला , होती   न पूरी ||
श्याम को खोजे , सदा दीवानी |
यमुना  सुनाती , सबको कहानी ||

ग्वालिन दही को , थोड़ा   चखाए  |
श्रीकृष्ण लल्ला , आँगन  नचाए  ||
माखन    बँटेगा , लालच  दिखाए |
धन्य‌ यह   लीला , सबको सुहाए  ||

सखी सब दौड़ीं , ग्वाल भी आते ||
रंग की होली ,    मिलकर मनाते ||
रंग   राधा   को , मोहन    लगाते |
देवगण   हर्षें    , पुष्प   बरसाते ||

लोक तज  ब्रह्मा ,चल पड़ी गंगा |
वेग था भारी , रुप  था   अनंगा ||
जटा शिव आतीं , उसमें समातीं |
शिवा लट खोलें , तभी गति पातीं ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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#मुक्तक

बहुत  हैं   देखे , यहाँ  तुम जैसे |
बोल यह  खट्टे ,   सुनें  जो  ऐसे   |
जान अभिमानी , उसे मत छोड़ो -
त्यागकर पूछो ,  हाल अब कैसे |

शपथ जो खाने  , हर बार आता |
निज प्रशंसाएँ  ,  सबको ‌सुनाता |
मक्कार मानो , क्रिया भी  यारो -
ज्यों पंक में हो  , सूकर   नहाता |

तोड़े  भरोसा , फिर दे  सफाई |
छोड़कर ऐसे   ,  दूर रह   भाई |
विश्वास धागे, जब   कहीं   टूटें-
रखो तब दूरी , अपनी  भलाई |

आया अकेला , जोड़  ली माया |
चंदन लगाया  , सजा ली काया |
सभी निज माना,कहीं कुछ छीना-
हाथ पर खाली , गमन में  पाया |

बना  है कोई  , स्वयं  जग शूरा |
दिखे पर पूरा , सबको  अधूरा |
नहीं स्वीकारे , कमीं कुछ थोड़ी -
उठा मुख घूमें ,  बनकर  लँगूरा |

सुभाष सिंघई
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#गीतिका

स्वर - स्ते , पदांत में

अभिमान  देखो  , जहाँ  रिश्ते  में |
प्रेम को  डालो  , वहाँ    बस्ते   में |

मिलते  सयाने , कर   चाटुकारी ,
माल   सब चाहें , यहाँ  सस्ते में |

कुछ नर हठीले , सदा अड़ जाते ,
मत रखो यारो , निजी   दस्ते  में |

सिरदर्द होते , लोग कुछ ज्ञानी ,
कर  उठे बातें  , बीच  रस्ते में |

जहर भी डालें , अवसर न छोड़ें ,
स्वर्ण को खोजें , लोग   जस्ते में |

सुभाष सिंघई
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#गीत

गा रहा ज्ञानी ,  निज का बखाना |
दूजे  सब पापी ,     मारता ताना ||

ज्ञान की  गंगा ,      गेह   है   मेरे |
पूछता  ज्ञानी ,  हाल    क्या  तेरे ||
बुद्धि बल देखो , मेरा    खजाना |
दूजे  सब पापी ,     मारता ताना ||

संसार  देखो ,  मुझे   ही  पूजे |
सामने जो भी, तुच्छ सब  दूजे ||
मूर्ख सब प्राणी , बना मैं  साना |
दूजे  सब पापी ,  मारता ताना ||

कहता 'सुभाषा' , बोल सुन ढ़ोंगी |
सुन ले बाबा ,   बने   हो   पोंगी ||
गलत मैं मानू , हक को जमाना |
दूजे  सब पापी ,     मारता ताना ||

सुभाष सिंघई

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74- भानु छंद  विधान सउदाहरण

पूज्य छंदाचार्य श्री जगन्नाथ प्रसाद " भानु" जी की छंद प्रभाकर पुस्तक में वर्णित ""भानु छंद"
(  यह त्रैलोक जाति-  सम मात्रिक छ्न्द ) चार चरण ।

भानु छंद-  21 मात्रा (6-15 ) चरणांत गाल ( गुरु- लघु )
इसका मात्रा विन्यास निम्न है-
षटकल  , अठकल चौकल गाल  (अंत गुरु- लघु (2 1)
(षटकल   - 3+3 या 4+2 या 2+4 हो सकते हैं )
अठकल 4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।
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सहजता - षटकल + आल्ह (वीर छंद का सम चरण )
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और अधिक सहजता
आप  षटकल +  चौकल शब्द लिखकर +,दोहा का सम चरण जोड़ दीजिए , भानु छंद का एक पद बन जाएगा |
उदाहरण देखें |
नोट - यति अल्प विराम( , )षटकल के बाद एक ही लगाना है , अभी उदाहरण में समझाने दूसरा अल्प विराम प्रयोग कर रहा हूँ |👇

हे माता,     शारद   ,      मेरी  सुनो   पुकार |
भानु छंद ,   लेकर ,       आया  हूँ इस  बार ||
कलम उठा ,     तेरे  ,      शरणागत हूँ  द्वार |
कृपा दृष्टि,      चाहूँ  ,  मुझ पर करो निहार  ||

छंद महल ,    देवा ,    गणपति  करो पधार |
करते हो ,     आकर ,   हरदम  ही उपकार ||
रिद्धि -सिद्धि,    दाता ,    तेरी  सदा  बहार |
श्री गणेश , करते   , जन- जन  नाम उचार‌ ||

पुष्प उदित,   डाली  ,  खिलती दिखे प्रसन्न |
गर्वित भी ,  होती   ,    दिखती  है  सम्पन्न ||
उदित हुआ , जो भी  ,    जग में नश्वर जान |
समय चक्र , कहता  ,     ज्ञानी करें बखान ||

रावण ने ,  जब  थी    सबको   बाँटी  पीर  |
तभी कर्म , जागा ,     कटकर गिरा  शरीर ||
अंधा था  , पर जब ,   रहा   पुत्र  में   लीन |
कौरव तब , सब मिट, कुल से हुए  विहीन ||

सूरज भी  , चलकर  , करता अपना  काम |
पश्चिम में ,   डूबे ,     करता    है   आराम ||
भाग्य उदित , करते ,  आकर  शुभमय धर्म |
पर  रोते  सब  हैं  ,     जिनके  खोटे  कर्म ||
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उपरोक्त 🖕 दोहा का  सम चरण प्रयोग करके , लेखन सहजता के ‌लिए संदर्भित किया है , अब षटकल + वीर छंद के  पंद्रह मात्रा के सम चरण का प्रयोग करके उदाहरण ‌संकेत करते हैं👇

वीर छंद सम चरण-अठकल चौकल गाल या चौकल अठकल गाल

जय‌ शारद , मात  भवानी  ‌मैहर   जान |
वरदानी   , आल्हा ऊदल की ‌ थी आन ||
उच्चारण , दोनों भाई करते    जयकार |
रण कौशल, दिखलाते  लेकर  तलवार ||

नंदलाल  , कहलाते   श्रीहरि अवतार |
लीलाधर , बनकर करते  जन उद्धार ||
द्वापर युग , दुष्ट दलन का  करते योग |
योगीश्वर ,कहते  इनको  जग के लोग  ||

जितना बल,  धागे पाएँ  बनते     एक |
मजबूती , में रस्सी भी     बनती   नेक ||
धागे जब, बिखरे  रहें   दो उनको  तोड़ |
पर रस्सी , में  गुँथकर   बनते    बेजोड़‌ |

रस्सी के ,  बल   ताकत  रखते    हैं  पास |
अवसर पर , लगें सभी को वह कुछ खास |
खींचें सब ,  जहाँ   बाँधकर   अच्छे   यंत्र |
चमत्कार , कर    देते   ज्यों   पढ़ते    मंत्र ||

सुभाष सिंघई
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मुक्तक

सब प्रपंच , मिटते   कहता  यह   ईमान |
अटल सत्य , अवसर पर  देता है  ब्यान |
बेनकाब , जब होते मुख  दिखता  लाल |
चुप रहकर  , तब खल भागे अपने थान |

कुछ  प्रपंच , करते हैं    पीछे    से  वार |
पर सज्जन   , उन पर भी करते उपकार |
प्रथम करें ,  स्वागत  फिर  तोड़ेंगे   मंच -
हर प्रपंच, में  अपनो   के   हैं   किरदार |

विश्व गुरू , भारत हो    रहती  यह   चाह |
सदाचरण , शुचिता   उपकारी   ‌हो  राह |
मन में यह , चाहत    राम   राज  संदेश -
फैलाएँ , जग में  सबको  मिले    पनाह |

चाह रखें  , हम कुछ  रचकर नव  आयाम |
मानव हित, माने     गीता     का   पैगाम |
धर्म कर्म , शुभ  मय    रखकर  दें  संदेश -
राम श्याम , सभी जानिए  अब अविराम |

रस्सी भी  , जलकर   देती  है    पहचान |
उसके  बल , सभी   देखिए  रहें निशान ||
रहते हैं  , लिपटे  आपस   में   बन  नेक -
विखरे सब , एक साथ ही रखकर  आन ||

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अपदांत  गीतिका आधार छन्द भानु

दर्प रखे ,  ज्ञानी   वहाँ  ज्ञान  बेकार |
बंद सीप , मोती तब  कीमत लाचार ||

पानी-सा,  ज्ञानी निर्मल दिखे स्वभाव ,
मन सरिता , मैली  लगे पाप  का द्वार‌ ||

खोज करें ,  अंदर  कितने भरे उसूल ,
दूजे घर ,  झाँकना , बेमतलब की रार |

पाखंडी,   को ही  सुख साधन भरपूर,
पुण्यवान , निर्धन    ढोता रहता  भार |

कहे शहद , मधुरस बोलें  कहीं  शराब ,
दोनों के , ग्राहक    रहते    हैं  संसार |

जहर बेल ,बढ़ जाती बिन पानी खाद,
वृक्ष सदा , उसको   देता रहता प्यार |

चुपके से , छिपी  छिपकली प्रभु के चित्र ,
रही  यथा ,   आकर   करता कौन सुधार |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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(  गीतिका ). समांत एरे ,पदांत  चोर

सभी जुड़े ,  रक्षक   हैं    मौसेरे   चोर |
अभी गेह , मेरे   कल  हैं     तेरे   चोर |

कौन करे, स्वागत  धोखे की जब धार ,
धोखों    के,     राजा  ऐरे -गेरे   चोर |

कौन बड़ा , लघु है करे  कौन कद माप  ,
दिखें  एक ,    सूरत  कौन   नबेरे  चोर |

चापलूस ,  पूरे    सबको   लेते  काट ,
आ जाते , डसने  शीघ्र     सवेरे  चोर |

बचें कहाँ,  तक हम  करते मीठी ‌बात ,
हर घर में ,     जाते    गेरे  ऐरे    चोर |

करते भी , हम सब होता नहीं बचाव,
जाल डाल , सबके    हरदम हेरे चोर |

रहो सजग , अब सब विनती यहाँ ‘सुभाष’,
अनजाने , पथ   ही   तुमको   घेरे     चोर |

सुभाष सिंघई
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गीतिका
समांत-स्वर - आरों  , पदांत- के रंग

नष्ट     हुए ,    पूरे    त्योहारों   के   रंग |
हर पल ही ,  बदलें अब  यारों   के रंग  ||

स्वाद लगें , फीके  जो   बनते   मिष्ठान |
अब कच्चे , दिखते   उपकारों  के  रंग  ||

मेंढ़क सिर ,  कूँदें    चूहे  कुतरें  कान |
वैद्य बना ,     कागा  उपचारों  के रंग  ||

लाज रखे , वैश्या   सती  चले  बेढंग |
बजे कपट  , ढोलक  गद्दारों  के  रंग  ||

असत्य दिखे , हँसता रखे  सत्य मुख बंद |
कटते अब , अपने    तलवारों  के  रंग   ||

योगी अब , भोगी  चंदा  दिखे क्लांत  |
बदल रहे ,नभ  में ,अब तारों  के  रंग |

कुछ हकीम, मिलते कुछ तो तिकड़म बाज  |
अब "सुभाष",भी चुप लख  नारों  के  रंग ||

सुभाष सिंघई , जतारा ( टीकमगढ़ ) म० प्र०

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आधार-  भानु छंद -गीत

बाग बना , बेटा  तब   बेटी  निज भाग |
बेटा यदि ,   चिराग बेटी तब  अनुराग  ||

है    बेटा,    उमंग   बेटी   वहाँ  तरंग |
बेटा भी  ,  भैया जब  बेटी  हो   संग ||
बेटा कुल , दीपक बेटी  वहाँ  प्रकाश |
वंश  बेल,   बेटा तब  बेटी   आभाष ||

दीवाली , बेटा   तब  बेटी  रँग   फाग |
बेटा यदि ,   चिराग बेटी तब  अनुराग  ||

मान रहे ,   बेटा    पर   बेटी  सम्मान |
बेटी  है , तीरथ   बेटा  घर  का  गान ||
सुत हुलास ,  होता  सुता  रहे  उल्लास |
यमक पुत्र , बनता सुता हृदय अनुप्रास  ||

बेटी है,   खुश्बू   बेटा   स्वर्ण  सुहाग |
बेटा यदि ,चिराग बेटी तब  अनुराग  ||

दूर रहे  , बेटी   दीजे   आप    पुकार |
आएगी , दौड़ी     बेटा  करे    विचार ||
बेटा घर , में  रखता   है  सचमुच शान |
पर बेटी तुलसी किसको  इसका  भान ||

कैसे  हो वर्णन   जो  बेटी  का  त्याग |
बेटा यदि ,   चिराग बेटी तब  अनुराग  ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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और अधिक सहजता
यह दो दोहे हैं 👇
सूरज भी चलकर (यहाँ ) , करता   अपना  काम |
पश्चिम में   डूबे   (सदा)    , करता    है     आराम ||
भाग्य उदित  करते (जगत )  , आकर  शुभमय धर्म |
पर रोते  सब  हैं   (यहाँ )  , जिनके   खोटे    कर्म ||

(कोष्ठक वाले शब्द हटा दीजिए और
यति अल्प विराम  षटकल के बाद लगा दीजिए
भानु छंद तैयार { अपने दोहे ही प्रयोग कर लो}...
परिभाषा/व्याख्या और मात्रा बाँट , में आपके दोहे फिट हो जाएँगें ~~~~~~~~~~~~~

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75-किशोर छंद विधान सउदाहरण

किशोर छंद विधान सउदाहरण (मात्रिक छंद)
चार पद प्रति पद में 22 मात्राएँ , यति 16 व 6 मात्राओं पर,
पद की मात्रा बाँट –
अठकल +अठकल (चौपाई चरण ) + मगण ( तीन दीर्घ )
इस छंद में चारों पद समतुकांत रखे जाते हैं।

विशेष निवेदन – मगण (तीन दीर्घ ) का वाचिक लघु बनाना निषेध है
एवं दो – दो पद तुकांत निषेध हैं (चारों पद समतुकांत मान्य होते हैं |

किशोर छंद विधान – किशोर छंद में –

चौपाई की सौलह मात्रा , का मेला |
इसके आगे तीन गुरू का , है खेला ||
सम तुकांत में पद भी चारों , हैं चेला |
यह किशोर में छंद सुहानी , है बेला ||

(सुभाष सिंघई)

#लेखन सहजता संकेत –

#चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध )

वंदना
कृपा सिंधु शुभ शारद माता , आ जाओ |
है किशोर शुभ छंद रचाया , मुस्काओ ||
हर अक्षर में ज्ञान ‌सुहाना , ही लाओ |
कवि कविता के सुंदर भावों , में आओ ||

गणपति बप्पा आप हमेशा , आ जाना |
है किशोर यह छंद‌‌ अनूपा , मुस्काना ||
छंद महल में शुभ आशीषों , को लाना |
मंगल मूरत मंगल करने , है आना ||
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आज देश में , बाढ़ तबाही , पानी से |
उफन रहीं हैं नदियाँ शाही , पानी से ||
परेशान हैं पूरे राही , पानी से |
बीमारी अब आती स्याही ,पानी से ||

(पानी पदांत 🖕चारों चरणों में लिया है , तब यति के पहले तुकांत मिला सकते है ) अब यह 👇छंद देखें , जिनमें यति के पहले कोई
तुकांत नहीं है , बल्कि यति के बाद तुकांत हैं |

नहीं समझते लोग यहांँ पर , पानी को |
मूर्ख मानते कुछ अज्ञानी , दानी को ||
जिनका खोता याद करें वह , नानी को |
बैठ आलसी करता आना , कानी को ||

जान बूझकर करते रहते, नादानी |
घर पर बैठे फिर करते हैं , हैरानी ||
मिले सफलता उसको पूरी , जो ठानी |
जिसने आज्ञा सदा बड़ों की , है मानी ||

जो भी गुरु के दर पर श्रद्धा ,‌ से आते |
ज्ञान दान आशीष सदा वह , हैं पाते ||
गुरु ब्रह्मा हरि शंकर जिनको , हैं भाते |
ईश भजन वह मोक्ष महल में , हैं गाते ||

जीव जगत देखा संसारी , क्यों रोता |
लादे बोझा सिर पर भारी, क्यों ढोता ||
कठपुतली सा आकर नाचे , है रोता |
कभी प्रशंसा कभी तमाचों , में खोता ||

लोभी धन का ढेर लगाता , जाता है |
पास नहीं रहती संतोषी ,माता है ||
कितना आए हाय – हाय ही ,गाता है |
जीवन उसका चैन नहीं कुछ, पाता है ||

जहाँ कहीं भी लुटती देखी , है नारी |
पीछे इज्जत वालों की है , तैयारी |
मजबूरी के सँग पैदा जब , लाचारी |
आ जाते हैं अस्मत के तब ,व्यापारी ||

रात दिवस भी , मेहमानी को , आते हैं |
कब क्या करना मर्जी उनसे , पाते हैं ||
उठो बैठना सोना जगना , लाते हैं |
सुबह चहकते संध्या लोरी , गाते हैं ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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#चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध )

#मुक्तक किशोर छंद

सभी जगह पर कपटी अक्सर , होते हैं |
नकली आँसू भी कुछ भरकर , रोते हैं |
नहीं किसी को यह कुृृछ देते , है पक्का –
सभी जगह वह खटपट लाकर , बोते हैं |

सदा सृजन ‌में जो भी करता, चोरी है |
पकड न जाए रहता डरता , चोरी ‌ है |
कुछ सबूत की हँसी उड़ाते , वेशर्मी –
उल्टा बोलें मेरी सृजता , चोरी हैं |

अक्सर. देखा बंटाधारी , रोते हैं |
करके सबसे भी मक्कारी , रोते हैं |
कर्म सुधारें कभी न अपने , दीवाने –
किस्मत पर सब बारी- बारी, रोते हैं |

हर पचड़े में जो भी पड़ता , दीवाना |
नया-नया कुछ अपना गढ़ता, है गाना |
नहीं मानता आदत से वह , लाचारी –
चना झाड़ पर देता चढ़ता , है ताना |

यत्र -तत्र सबको भरमाता , लोभी है |
सबसे मिलकर काम बनाता , लोभी है |
‌‌सगा नहीं वह खुद का होता , है मानो –
पानी का ही दही जमाता , लोभी है |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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#चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध )

किशोर छंद

विधा – #गीतिका
समान्त स्वर – आते _ पदान्त पापा जी

कड़क हमेशा रूप दिखाते , पापा जी |
अंदर से जल धारें लाते , पापा जी |

पाठ कीमती अनुशासन का , ही बाँटेन ,
हानि लाभ को सदा पढ़ाते, पापा जी |

त्याग तपस्या कब समझेंगीं , संतानें
कैसे वह इंसान बनाते , पापा जी |

कैसी रखते वह अरमानों , की डोरी ,
अपने मुख से कभी न गाते, पापा जी |

रख विशाल वह गहरी अंदर, छाती को,
अपने अनुभव से समझाते , पापा जी |

संस्कार की रखते हरदम , थाथी को ,
बाँटा करते जाते – जाते , पापा जी |

बरगद बनकर छाया पातीं , औलादें,
तब सुभाष हम तीरथ पाते , पापा जी |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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#चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध 

#गीत आधार छंद #किशोर

विध्न हटाने सुत ही उनका , आता है |
जब मेरा मन जय‌ शिवशंकर , गाता है ||

वाम अंग शुभ गौरा रानी , हैं माते |
कार्तिकेय के मोर सवारी ,से नाते ||
मुख्य द्वार पर नंदी बाबा , को पाते |
भूत प्रेत सब स्वागत करने , हैं आते ||

डमरू का तब डम-डम ध्वनि से , नाता है |
जब मेरा मन जय‌ शिवशंकर , गाता है ||

लघु बन जाती सिर पर गंगा , जो भारी |
चंद्र भाल पर शीतलता के , हों धारी ||
महादेव की अद्भुत लीला , है न्यारी |
देव राक्षस मिलने आते , हैं पारी ||

देखा करता भक्त कृपा को , पाता है |
जब मेरा मन जय‌ शिवशंकर , गाता है ||

गेह हिमालय कहलाते प्रभु , कैलासी |
जिनके दर्शन अभिलाषी जग , के वासी ||
जग का भी हर कंकर शंकर , है काशी |
मानव भी शिव का बन सकता ,है भाषी ||

नमन सुभाषा रूप तुुम्हारा , भाता है |
जब मेरा मन जय‌ शिवशंकर , गाता है ||

सुभाष सिंघई जतारा (टीकमगढ़) म०प्र०
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किशोर छंद (दो अठकल + मगण )
(नाम से जुड़े धनुषों के नाम )

शुभ #पिनाक को शिवा धनुष हम , गाते हैं |
राम धनुष #कोदंड सुहाना , पाते हैं ||
धनुष #गाँधरी लक्ष्मण वन ले , जाते हैं ||
रावण के #पौलत्स्य धनुष से , नाते हैं ||

अर्जुन का #गाण्डीव धनुष था , है माना |
था #महेन्द्र भी धनुष युधिष्ठिर , है जाना |
धनुष #वायव्य भीष्म पितामह , ने ताना |
और कर्ण ने #विजय धनुष को ,संधाना ||
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(कुछ इतिहास प्रसिद्ध घोड़ें / घोड़ियों ‌के नाम )

श्री प्रताप राणा का #चेतक , घोड़ा था |
वीर शिवा का #मोती_गजरा , जोड़ा था |
रानी झाँसी ने गोरों को , तोड़ा था |
कूद किले से #बादल ने रुख , मोड़ा था ||

सिंह रणजीत श्री की #लैला , घोड़ी थी |
और सिकन्दर घोड़ी #फालस , जोड़ी थी |
बाबा भारत पढ़ी कहानी , थोड़ी थी |
क्यों लगाम घोड़ा #सुल्ताना , छोड़ी थी |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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#मुक्तक
किशोर छंद , अठकल + अठकल + मगण
#प्रमुख_शंखों का विवरण

#वामावर्ती शंख घरों में , होता है |
#दक्षिणवर्ती श्रेष्ठ करों में , होता है |
इन्हें बजाकर मिलता साहस, भारी है –
यथा नाम गुण शंख स्वरों में , होता है |

#पांचजन्य था चक्र सुदर्शन , धारी का |
#देवदत्त अर्जुन जैसे उप , कारी का |
शंख #अनंत_विजयी युधिष्ठिर, जानो जी-
#पौंड बजाते भीम बली निज , पारी का |

#मणि_पुष्पक सहदेव बजाते , जाते हैं |
शंख #सुघोष नकुल जी थामे , आते हैं |
#गणपति शंख मिला मंथन से , जानो जी –
#पद्म शंख भी कमलाकृति में , पाते हैं |

शंख बजाना तन मन को शुभ , कारी है |
मंगल ध्वनि शंखों की जग में , भारी हैं |
हटे नकारापन तन मन का , जानो जी –
सभी बजाकर देखो महिमा , न्यारी है |

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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किशोर छंद (अठकल अठकल मगण )
#जगन्नाथ_पुरी_का_रथोत्सव

#नंदीघोष कहें #गरुड़ा के , हैं नारे |
#कपिलाध्वज भी भक्त कहें मिल ,के सारे ||
#जगन्नाथ के रथ में लगते , जैकारे |
#सौलह_पहिए सूरज चंदा , हैं तारे ||

#चवालीस है फीट सुहानी , ऊँचाई |
#फस्सी_धौरा_सहजा लकड़ी , हैं भाई ||
#सम्वत पंद्रह सौ पचहत्तर , है आई |
चली पुरी में यह रथ यात्रा , हर्षाई ||

#तालध्वज बलराम बली रथ, भी जानें |
#चौदह पहिए इसमें लगते , भी मानें ||
लाल हरा ही रंग लगाते , मस्ताने |
सभी खींचते रथ को जाकर , दीवाने ||

#पद्म सुभद्रा का रथ भी जब , आता है |
#दर्पदलन भी कहकर जुड़ता , नाता है ||
#रंग लाल कुछ काला नीला , छाता है |
#बारह पहिए घुँघरू स्वर तब , गाता है ||

#चंद्र_चूर्ण रस्सी से खींचा , जाता है |
तीन किलोमीटर यात्रा पथ , भाता है ||
यहाँ #गुन्डिचा मंदिर तक रथ , आता है |
जो रिश्ते में #मौसी माता , नाता है ||

रात ठहरने मौसी घर रुक , जाते हैं |
बड़े प्रेम से खिचड़ी सादा , खाते हैं ||
जगन्नाथ जी हम जन आए , गाते हैं |
बटे प्रसादी में तब खिचड़ी ,पाते हैं ||

माह आषाढ़ शुक्ल पक्ष सब , जानो जी |
जगन्नाथ की रथ यात्रा को , मानो जी ||
दूजी तिथि होती है यह पहचानो जी |
जगन्नाथ का भात सुहाना , छानो जी ||

जगन्नाथ की मिलकर सब जय , को बोलो |
भात प्रसादी पाने को मुख , को खोलो ||
भक्ति भावना में अपनेपन , को तोलो |
रथ यात्रा में रस्सी पकड़े , ही डोलो ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

पूर्व से प्रचलित किसी का दोहा 👇

जगन्नाथ के भात को , जगत पसारे हाथ |
जिसको खाने मिल गया,उसका ऊँचा माथ ||

जय जगन्नाथ 👏👏👏👏👏👏👏👏
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#तेरहवें_ज्योतिर्लिंग_कुंडेश्वर_महादेव_की_महिमा
किशोर छंद ,अठकल अठकल मगण

रहे गाँव में भोली धन्ती ,‌बाई है |
निकट पहाड़ी लघु गड्ढे पर ,आई है |
धान कूटने मोटा मूसल , लाई है |
मूसल चलते धार लहूू‌ की , पाई है ||

तब घबड़ाकर धन्ती बाई , चिल्लाती |
खून सने चावल को सम्मुख , है पाती ||
जुड़े सभी ग्रामीण जनो को , ले आती |
जिसने मंजर देखा धड़की , है छाती ||

खबर मदन राजा को मिलती, आते हैं |
शिव पिंडी जो थोड़ी निकली, ध्याते हैं ||
खोदी पिंडी पंच मुखी को , पाते हैं |
मंदिर बनता जन शिव शंकर, गाते हैं ||

पिंडी खोदी काफी नीचे , जाते हैं |
शिव की महिमा छोर नहीं तब , पाते हैं ||
जयकारा जय कूड़ा देवा , गाते हैं |
खबर फैलती बुंदेली जन , आते हैं ||

(बुंदेली में कुंड को कूड़ा बोलते हैं )
( मदन राजा जू का कार्यकाल सम्वत
बारह सौ के आसपास है )

कुंडेश्वर भगवान सभी जन , बोले हैं |
चावल जितने बढ़ते रहते , चोले हैं ||
ऊँचाई में लम्बे पूरे , गोले हैं |
कुंडेश्वर श्री धाम बना बम , भोले हैं ||

चार मील की टीकमगढ़ से , दूरी है |
दर्श करें तब होती मंशा , पूरी है ||
आभ शिवा की लगती सबको ,सूरी है |
निकट बहे जमड़ार नदी भी ,नूरी है ||

ऐतिहासिक प्रचीन मान्यताएं

बाणासुर की बेटी दर्शन , पाती थी |
छिपे कुंड में शिव को ऊषा , ध्याती थी ||
प्रातकाल ही पूजन करने , आती थी |
हे शिव शंकर कृपा निधाना , गाती थी |

निकट‌ बाणपुर नगर बसाया , है भाई |
जबसे ऊषा आराधन को , है आई ||
दैत्य सुता ने शिव की किरपा , है पाई |
भक्ति शक्ति निज जीवन में शुभ, है लाई ||

दैत्य राज बाणासुर बेटी , आती थी |
यथा नाम गुण ऊषा ही वह , भाती थी ||
गुप्त तपस्या कारण वह छिप , जाती थी |
शिव के आराधन में खुद को , पाती थी ||

निर्जन वन था एक पहाड़ी , वीरानी |
शिव आराधन ऊषा करती , दीवानी ||
भैरव बनके दर्शन देते , थे ज्ञानी |
छिपे कुंड में शिव जी रहते , थे ध्यानी ||

महादेव जी जबसे बाहर , आए हैं |
नव ज्योतिर्लिंग सभी तेरह , पाए हैं ||
चमत्कार के मिलते रहते , साए हैं |
कथा “सुभाषा” सुनके हम लिख, लाए हैं ||

मिलता है अभिषेक अभी भी , हैं पाते |
बिल्व पत्र भी चढ़ते मिलते , मुस्काते ||
पट खुलने के पहले के यह , हैं नाते |
सुनते बाणासुर ऊषा ही , हैं आते ||

चमत्कार श्रद्बा के यह सब , होते हैं |
पंचमुखी शिव पिंडी में जन , खोते हैं |
कह सुभाष यह श्रद्धा सागर , गोते हैंं |
वंदन करके पुण्य सभी जन , बोते हैं ||

#जय_कुंडेश्वर_भगवान_महादेव_की*

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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किशोर छंद , अठकल अठकल मगण
#ओरछा_राज्य_की_गाथा ,
राजा मधुकर शाह जू देव कृष्ण उपासक व
उनकी रानी कुँवर गणेशी बाई जू श्री राम उपासक थीं , पर दोनों एक दूसरे की उपासना का सम्मान व ध्यान रखते थे।
(पहले राजा मधुकर जू की गाथा )
#मुक्तक ::–

राज्य ओरछा मधुकर राजा , बैठे थे |
तिलक लगा था , मूँछें अपनी ,ऐंठे थे |
‌अकबर का दरबार बुलावा,-आया था –
राज-काज की गहराई से , जेठे थे |

मुल्ला बोला तिलक लगाकर , क्यों आते |
मूँछें अपनी ऐंठे रहते , मुस्काते |
अकबर बोले बिना तिलक के, आना है –
हुक्म हमारा पक्का जानो , फर्माते |

दिवस दूसरा जब आया तब , पाते हैं |
तिलक लगा कर लम्बा मधुकर ,आते हैं |
तिलक हमारा धर्म यहाँ है , क्यों छोड़ें –
उत्तर सुनकर अकबर चुप रह , जाते हैं |

कृष्ण भक्ति भी मधुकर जू की , आई है |
नगर ओरछा संध्या वंदन , छाई है |
नेत्र बंद कर हाथ चलाते , है देखा ~
कहा, कृष्ण पर पावक जलती, पाई है।

पड़े फफोले अकबर देखें , हाथों में |
मधुकर कहते आगी लेखें , हाथों में |
नगर ओरछा वस्त्र जले हैं , कृष्णा के –
थाल आरती कारण रेखें , हाथों में |

पता लगाकर तब अकबर ने, बोला है |
तुम्हें हाजरी बंधन से अब, खोला है |
सच में आगी वहाँ लगी थी , जाना है –
कृष्ण रूप मय मधुकर जू का , चोला है |
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रामराजा सरकार ओरछा की गाथा
रानी कुंवर गणेशी जू , जो श्री राम उपासक थी
(चित्र कमेंट बाक्स में देखें )
किशोर #छंद

कृष्ण भक्त थे मधुकर राजा , जाना है |
राज्य ओरछा साख बहुत थी , माना है ||
कुँवर गणेशी रानी ने कुछ , ठाना है |
नगर ओरछा रामलला को , लाना है ||

मधुकर कहते प्रियवर आओ, रानी जू |
आप अयोध्या पहले जाओ , रानी जू ||
नगर ओरछा राम बुलाओ , रानी जू |
पुण्य प्रताप प्रबल तुम पाओ ,रानी जू ||

कुँवर गणेशी पहुँच‌ अयोध्या, बोली है |
सजी ओरछा से यह लाई , डोली है ||
स्वागत वंदन तिलक लगाने , रोली है |
और उठाने डोली को भी, टोली है |

लिए प्रार्थना हर मंदिर में , जाती हैं |
चलो ओरछा मेरे प्रभुवर , गाती हैं ||
सुबह नहाने जब सरयू में , आती हैं |
डुबकी लेकर राम लला को ,ध्याती हैं ||

प्रण करती हैं राम लला ले , जाऊंँगी |
चले ओरछा अन्न तभी मैं , खाऊँगी ||
राम भक्ति में लीन रहूँगी , ध्याऊँगी |
नगर अयोध्या से अनुकम्पा ,पाऊँगी ||

डूबा होता राम लला जी , आ जाते |
हाथों में विग्रह श्री प्रभु का , हैं पाते ||
सपने में प्रभु अपनी शर्तों ,को लाते |
राम चलेगें यह सुनकर सब , हर्षाते ||

#राम_जी_की_शर्ते,जो रानी ने स्वीकार कीं-

पुष्य नखत में गमन रहेगा , ये जानो |
नगर ओरछा राजा होंगे , भी मानो ||
एक बार ही जहाँ कहोगी , बैठेंगे |
जगह दूसरी देने पर हम , ऐंठेंगे ||

प्रभु लीला मंदिर पूर्ण न बन, पाया है |
तब महलों में सीधा डोला , आया है ||
भोजन शाला में प्रभुवर की , माया है |
अडिग राम की तब से विग्रह, काया है ||

राजाराम यहाँ पर रहते , जाना है |
गार्ड सलामी प्रतिदिन होती , माना है ||
छोड़ ओरछा तब राजा ने , ठाना है |
टीकमगढ़ रजधानी से यश , पाना है ||

राम ओरछा दिवस रहें जी , जाना है |
रात अयोध्या सोने जाते , माना है ||
राम ओरछा राजा जी हैं , ठाना है |
यहाँ प्रजा बन सदा कृपा को , पाना है ||

#मुक्तक –
राजमुकुट सिर पर ही रहता , लेखा है |
राजाराम सभी जन कहते , देखा है |
यहाँ सलामी शासन ही अब , देता है –
लाल न बत्ती यहाँ जलेगी , रेखा है |

(इस नगर में कोई भी मंत्री या अधिकारी अपनी गाड़ी की लाल बत्ती नहीं जलाता है जिसने जलाई है , उसे दुष्परिणाम स्वरुप अपना पद गँवाना पड़ा है )
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कुछ इतिहासकारों के मत से – मुगलों के आक्रांता स्वभाव को देखते हुए , एक योजना के तहत राम जी के मूल विग्रह को , कुछ संतों ने ओरछा भेजा था |क्योंकि रानी कुँवर गणेशी परम राम भक्त थी
(तब राम जी का मूल विग्रह ओरछा में ही कहलाया )
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लेकिन पुष्य नक्षत्र गमन , नए बने चतुर्भुज मंदिर में राम जी का न जाना ( वह मंदिर आज भी बिना मूर्ति का वीरान है )
व राजमहल में ही विराजमान होना ,व ओरछा में राज मुकुट धारण कर राजा के रुप में प्रतिष्ठित होना , व बुंदेली राजा जी का ओरछा छोड़कर , अपनी राजधानी टीकमगढ़ ले जाना , राजाशाही परम्परा का आज तक गार्ड आफ आनर सुबह शाम शासन द्वारा देना , ओरछा में लाल बत्ती न जलाना ,बुंदेली लोक गायन में सरयू से राम का प्रकटीकरण एवं रानी कुँवर गणेश का वर्णन , यह भी नजर अंदाज नहीं किए जा सकते हैं | कथानक कुछ भी कहीं से जुड़े हों , किंतु ओरछा में राम जी , राजाराम हैं , व भक्त जन उनकी प्रजा हैं
सादर

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

किशोर छंद अठकल +अठकल +मगण

सभी प्रेम से जय मिल बोलें , माता की |
दर्शन करने पट को खोलें , माता की ||
भक्ति भावना चरणों तोलें , माता की |
छंद महल में सब रस घोलें , माता की ||

आए हैं प्यारे नवराते , माता के |
गीत भजन भी सब हैं गाते , माता के ||
भाव भरे सब पुष्प चढ़ाते , माता के |
भक्तों से हैं सुंदर नाते , माता के ||

जग जननी भी कृपा निधानी , माता हैं |
नवम् रूप में शुभ वरदानी , माता हैं ||
जग कल्याणी भी पहचानी , माता हैं |
सिंह सवारी से अगवानी , माता हैं ||

सुभाष सिंघई 

76- वासुदेव छंद ,( संस्कृत साहित्य का  सम  मात्रिक छंद )
चार पद ,  14 मात्राएँ  ( अठकल ,~  षटकल )
आठवीं  मात्रा पर यति  लघु मात्रा से,
एवं  षटकल का चरणांत दीर्घ मात्रा से
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अठकल का सार्वभौमिक लय सिद्धान्त है -
332.      44.     35.( यह सही अठकल हैं )

पर अबकि बार , आयोजित छंद के #अठकल में भी #बाध्यता है।
कि #अठकल_का_अंत_लघु_वर्ण_से_हो , व #षटकल_का_अंत
#दीर्घ_वर्ण से हो | और यही  सतर्कता कुशलता व अनुपालन इस छंद के सृजन का मूल आधार है।
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(वासुदेवक नाम से भी एक छंद  वर्णिक  है  , जो फिर कभी आगे आयोजित करेगे , अभी मात्रिक वासुदेव छंद आयोजित है
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा ( अठकल - षटकल 8- 6)
अठकल यति लघु , व षटकल चरणांत दीर्घ

वासुदेव    शुभ  ,   छंद    मिला  |
अठकल - षटकल , भार खिला  ||
अठकल यति   लघु ,   वर्णन   है |
षट   पदांत   गुरु ,       दर्शन   है ||

वासुदेव     यह ,    छंद गुनों  |
अठकल षटकल , भार बुनों |
अठकल में यति , लघु रखना -
तब पदांत  षठ  , दीर्घ  चुनों |
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

प्रार्थना -
हे  माँ    शारद ,   वर    देना |
सभी तिमिर अब , हर   लेना ||
दिव्य    मनोहर , ज्ञान  मिले |
पुष्प सुगंधित , हृदय  खिले ||

देवा गणपति , आ    जाओ |
विध्न सभी अब, निपटाओ ||
लाए  मोदक ,   भाव    भरे |
लिखे छंद यह  , नवल   हरे ||

छंद महल पर , कृपा  करो |
वासुदेव अब  , बुद्धि  भरो ||
छंद सफल यह , लिख पाएँ  |
गाथा  लिखकर , हम गाएँ ||

वासुदेव सुत   ,  है   विनती  |
हो सेवक दल ,  मम गिनती ||
मेरा  स्वारथ   , तुम   जानो |
मिले चरण रज , बस मानो ||

वासुदेव सुत ,  कृष्ण   रहें |
गोकुल में सब, श्याम कहें ||
नंद गेह शुभ  , धाम    बना |
यशुदा आँगन , पुण्य घना ||

वासुदेव     यह ,   छंद बने |
बने  भक्ति रस , खूब सने ||
छंद सभी   यह , गिरधारी |
स्वीकारो  प्रभु  , अवतारी ||

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

नारद  ऋषिवर ,  हैं  ज्ञानी |
जानें हर  घट ,  का पानी ||
तीरथ हैं   खुद ,  पर  घूमें  |
इनके भू नभ  , पग चूमें ||

ब्रह्मा के सुत ,   कहलाते |
सभी जगह पर , हैं जाते ||
भजन मगन यह , हैं रहते |
श्री  नारायण , हरि कहते ||

सभी खबर यह , भी रखते |
सोच विचारक , सब कहते ||
नहीं कहीं पर , यह  रुकते |
इन्हें देखकर , सब झुकते ||

कहते नारद  , सुखी  रहो |
बे मतलब मत , दुखी रहो ||
यह  तन  नश्वर ,  है   तेरा |
दिवस चार  यह , है  डेरा ||

जाना है फिर , प्रभु शरणा |
इसीलिए मन, रख करुणा ||
राह दिखे जब ,  कल्याणी |
चलना उस पर, हर  प्राणी ||

किसका है जग , यह दावा |
कौन जलाकर , यह  लावा |
लाया   है  सँग ,  दिखलाने |
बना अमर अब , सब  पाने ||

करते है  छल , आपस  में |
घोल रहे विष , अब रस में ||
अपना मतलब , सब जाने |
हित अनहित सब, पहचाने ||

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ
मुक्तक -

छंद  महल  पथ ,    पहचानो |
सृजन कलम शुभ,निज जानो |
माता   शारद ,      अनुकम्पा  -
देगी   साहस  ,    यह  मानो ||

मनुज चतुर अब, चाल चले |
पड़ें मित्र  अब , सभी  गले |
दोष रोपकर,  किसको   दें -
मिलता जब तम , दीप तले |

पिघले    पत्थर , बातों से |
चंद्र  हँसे   शुभ , रातों  से |
कपटी रह चुप , बात सुने -
पिघले कभी न  , नातों से |

देश कहे सुत  , लाल सुनो |
पहले आकर , तथ्य   गुनो |
लाज धर्म जब  , संकट में -
रक्षण बल पथ, प्रथम चुनो |

मित्र  मिले अब,  मतलब से |
कहे  बात   वह , आ सब से |`
यार मदद अब , भी   करता -
रिश्ता कायम , रख  रब से ||

चार लोग   जब , भी  मिलते  |
श्रेष्ठ बुरे  फल  , ही    खिलते |
होता  निर्णय   , जब  अच्छा -
नहीं वहाँ जन ,   तब  हिलते |

हाल अजब अब , कुछ ज्ञानी |
करते    खुलकर ,    नादानी ||
कपटी    गुरुवर,    के   चेला ~
कहें  गुरू  अब ,      तूफानी |

झगड़े झंझट   सदा करें |
देखे   लम्पट   नहीं   डरें |
परेशान जन  , हैं    रहते -
घरवाले ‌ सब , नैन  भरें  ||

मामा  ही  जब , षड्यंत्री |
समझे  मोहन , सब तंत्री |
कंस मारकर , हर्ष किया -
बनते  उद्धव   तब  मंत्री |

~~~~~~~~~`
वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

हास्य मुक्तक

किसका आकर , कौन यहाँ |
प्रश्न खड़ा अब,   मौन  यहाँ ||
जिसकी  सूरत ,  थी  मीठी -
निकला है   वह,   नौन  यहाँ | 🥰🙏

जिसका सुंदर ,  था‌   आना |
निकला मेंढक ,  का   गाना |
टर्र-टर्र  सब  ,   सुनते    हैं-
पकड़े सिर अब , सुल्ताना | 🥰🙏

चला कीट   रस , पीने को  |
मस्ती  के   पल , जीने को |
उसकी बोतल , को छीना-
हाथ मारकर  ,   सीने को |🥰🙏

सुभाष सिंघई जतारा
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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

गीतिका (वासुदेव छंद आधारित  )

तुमने भी जब ,   किए गिले |
तभी मुझे  नव ,  गीत मिले |

हो   स्पंदन ,   साँसों     का,
लगता तब मन  , फूल खिले |

मधुर  मुस्कान , छवि   तेरी ,
नयन प्यार सुख , लगे  किले |

क्या पराग रस , अधर  लगा ,
चखते  आकर   , केश   हिले |

अंग-रंग   सब  , देख  रहा ,
एक जगह सब  , नूर सिले  |

तुझे शिकायत , क्यों मुझसे ,
दिए प्यार फल , सदा छिले |

राज करो तुम , हुक्म चला ,
दिए तुझे अब, सभी  जिले |

सुभाष सिंघई जतारा

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ
गीत

कभी न  प्रभु  दर , जो आते |
नहीं कहीं  वह  ,सुख   पाते ||

लिए शिकायत , जो घूमें |
ठोकर दर-दर , जो  चूमें ||
बात सुनाकर , जो   रोते |
बोझा मतलब  , का ढोते ||

अपना स्वारथ ,  जो   गाते |
नहीं कहीं वह  ,सुख   पाते ||

अपना नाटक ,  हैं   करते |
अवसर पाकर , घर  भरते |
रहता    लालच , में   बंदा |
खाने  तत्पर   , हो    चंदा ||

घाट- घाट पर , जो    जाते |
नहीं कहीं  वह  ,सुख पाते ||

छलके गागर , जब धरती  |
खाली   होकर , है  घटती  ||
कचरा भरकर ,   इठलाती |
उसकी अक्कल , मर जाती ||

मुख की हरदम  , जो खाते |
नहीं कहीं  वह  ,सुख  पाते ||

~~~~~~~~~~~

वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

गीत

राम सुधा  रस,  पीने  के  |
नष्ट किए  दिन, जीने  के  ||

घूम     रहा   नर,   बौराया |
पागलपन अब , अपनाया ||
अपनों से कर , वह  रगड़ा |
उन्मादी   पन , के  झगड़ा ||

अरमाँ  चौपट ,  सीने  के |
नष्ट किए  दिन, जीने  के  ||

अपने तजकर , खलपन से |
हाथ मिलाकर  , दुश्मन  से ||
अपनों  ही  पर,  वार   करे |
अवसर पाकर , खार   भरे  ||

कर्म मिलें सब , छीने  के |
नष्ट किए  दिन, जीने  के  ||

गंदी आदत ,  को लाया  |
भ्रष्ट आचरण , अपनाया ||
सभी कर्म फल , हैं   गंदे  |
डाल रखे खुद , गल फंदे ||

खाता जूठन  , बीने    के |
नष्ट किए  दिन, जीने  के  ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

वासुदेव छंद ,मुक्तक 

मत बवाल कुछ , किया  करो

 पावन शुचि जल  ,पिया  करो 

जब भी लेखन , सृजन   करें -

शब्दों  में तब   ,  जिया  करो |


अभिमानी  पल , आते है |

पर जल्दी,  वह , जाते  है |

सोच सदा यह,शुभ रखना -

हर्षित पल  सब , पाते  है  |

~~~~~~~~~~~

वासुदेव छंद ,गीतिका 

राह‌   देखकर ,  चला करो |

जितना सम्भव , भला करो |


लोग   बुलाकर , भ्रमित करें ,  

पर तुम निज धुन‌, ढला करो |


राहें   भी   अब , स्वयं   चुनो, 

मीठा भी  खुद  , गला  करो |


लोग वाह  स्वर , दे     जाएँ , 

ऐसी चलकर ,    कला  करो |


छल से  छल अब‌ , मरता है , 

दुर्जन को तब , छला ‌  करो |


संकट   आकर , जब     घेरें  , 

बाधाएँ    तब ,    दला   करो |


जहाँ  जिसे  कुछ , दाग ‌मिलें  , 

उन्हें रगड़कर ,   मला   करो , 


जहाँ   घेरकर ,  शत्रु  चलें , 

दूर  सभी   तब , बला   करो , 


मिलते  सज्जन , गुण   वाले , 

तब सुभाष शुभ , सला  करो |

सुभाष सिंघई जतारा

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वासुदेव छंद , 14 मात्रा (8- 6) यति लघु , चरणांत दीर्घ

गीतिका , समांत अहा , पदांत नहीं 

 जब  मेरा    पथ   , ढहा  नहीं |                                            वर्षा    में   तब   ,  बहा   नहीं |

खेल   खेलकर , मत   बोलो ,                                          ,  तासों   में अब    , दहा  नहीं |

 वचन जहाँ कटु , है   बोला   ,                                              तब प्रभाव कुछ,  रहा नहीं

   सभी सुनाकर  , प्रश्न  जहाँ                                                 ,तुमने अब  कुछ , कहा नहीं |

   अब "सुभाष" चुप , रहता है ,                                            ऐ़सा     मंजर ,  सहा   नहीं |

सुभाष सिंघई जतारा~

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                   77  महा चंडरसा छंद / जय शुभचंडी छंद

 (सरल विधान  - चार लघु + दो दीर्घ ×2  = 12 वर्ण।(जय शुभचंड़ी के वर्ण यथावत ×2  करने पर एक पद बन जाता है।   

(गण गणन---- नगण यगण ×2 = 12 वर्ण , चार पद 

य शुभचंडी , नमन  करूँ मैं  |                                       शुभ वर चाहूँ , मनन  करूँ मैं ||                                       झुक-झुक जाऊँ , दर पर तेरे |                                         शमन सभी हों ,खट  पल मेरे ||

 हरिहर  मेरे  ,   हरि सँग आओ  |                                     हर विपदा को, तुम सुलझाओ ||                                    समझ न पाते ,  जग  नर  नारी |                                      प्रभु  सम कोई , कब अधिकारी  ||

बन अभिमानी,  हम नर जीते |

जग दुख भोगें , विष कटु पीते |

शरण नहीं भी, प्रभु दर  जाते  |

निज मद जीते , हठ रस  पाते  ||


शरण   नहीं जो ,  रघुवर  लेता |

जग दुख भोगे , नमन  न  देता ||

वह अभिमानी , तब  कहलाता |

चलकर   टेढ़ा ,  वह  इठलाता ||


भगत पुजारी , भजन सुनाता |

कटु मन धारी, अगन लगाता ||

विषधर देखा , जब-जब आए |

चुभन लगाए ,   डसकर जाए ||


भजन   सुनाते , हर पल गाते |

प्रभुवर  देखा , उस तक आते |

मन हरषाते    , विपद   हटाते |

सहज सहारा , जन-जन पाते ||


रवि   शशि  तारे , गगन  रहेंगे | 

अवनि सुहानी ,   चमन  रहेंगें ||

परहित ऊँचे  ,   ‌ मनन   रहेंगे |

तब जग में भी  , सृजन रहेंगे |


हरिहर  भोले    , सुनकर   प्राणी |

बम- बम बोले,  निज मुख वाणी |

वचन  सुने    ‌भी , ‌‌‌‌  हृदय  उतारें  |

प्रभु दर  जाके  , चरण   पखारें ||


तरु फल मीठे   ,  झुककर आते  |

कड़क सदा ही ,  पक कर  पाते ||

नरियल ऊँचा,   थल पर  आता  |

गिरकर ही श्री ,  फल कहलाता ||

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मुक्तक - 

हटकर देखो  , चमन  हमारा |

जगमग चंदा,  वतन  हमारा |

हल सब होतीं , अब विपदाएँ-

पथ अब आगे, अमन  हमारा |


जब हम जागें,  उदित सवेरा |

कलरव पंछी , मुदित  बसेरा |

हँसकर  आते  , उड़कर नाना - 

दरशन  पाते , लघु खग डेरा |

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 महा चंडरसा छंद / जय शुभचंडी छंद

  (सरल विधान  - चार लघु + दो दीर्घ ×2  = 12 वर्ण 

(जय शुभचंड़ी के वर्ण यथावत ×2  करने पर एक पद बन जाता है 

(गण गणन---- नगण यगण ×2 = 12 वर्ण , चार पद )

गीत 

अनुभव अच्छा , वह जन पाते |

गिरकर जो भी , उठकर आते |


गिरि पर चींटी ,   चढ़कर  माने |

निज कुल  जाने , सहज तराने ||

जब -जब जैसा , अवसर आए |

मिलजुल  वैसा , पथ अपनाए ||


कठिन तराने ,  सहज  सुहाते |

गिरकर जो भी , उठकर आते |


जब कुछ आती , अति कठिनाई |

हँसकर  लेते , सिर    पर  आई ||

निपट   अकेले , तब  वह   सोचे |

अब इसमें क्यों , यह सब  लोचे ||


हल   करते  हैं ,   विपद  मिटाते |

गिरकर जो   भी , उठकर  आते |


जब मिलते हैं , अवसर  पक्के |

तब वह मारें   , जमकर छक्के ||

जिस जिसकी भी,मदद मिलेगी |

तब   उसकी  भी , सुयश रहेगी |


रखकर जानें ,  सुखकर   नाते |

गिरकर जो  भी , उठकर आते ||

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महा चंडरसा छंद / जय शुभचंडी छंद

  (सरल विधान  - चार लघु + दो दीर्घ ×2  = 12 वर्ण 

(जय शुभचंड़ी के वर्ण यथावत ×2  करने पर एक पद बन जाता है 

(गण गणन---- नगण यगण ×2 = 12 वर्ण , चार पद )

गीत

निलय किसी के, खल जन जाएँ  |

प्रथम  उसी को ,   छल कर आएँ ||


बनकर  भोले ,  नमन    करेंगे  |

ढलकर लोटा ,    जलद  भरेंगे ||

अदब बजाते  , जिस घर जाएँ |

अमन वहाँ का ,   हरकर  लाएँ ||


जिस घर  पूरी  , हिकमत   ‌‌लाएँ  |

प्रथम  उसी को , छल कर आएँ ||


अजब तराना , यह   सब   गाते | 

नमन  सुहाना ,     दर पर  लाते ||

हुनर    दिखाते ,    हटकर  पूरा |

कसर  न   छोड़ें , सनद अधूरा ||


सुर धुन गाना  , जिस  घर  गाएँ |

प्रथम  उसी को , छल कर आएँ ||


गजब   मिले  हैं   , चतुर   सयाने |

सहज   बनेंगे  ,   स्वजन    पुराने |

हड़प    करेंगे ,     अवसर   पाते |

प्रगति   बताएँ  ,     उड़ते   छाते ||


प्रलय   मचाएँ , जिस‌   घर  खाएँ |

प्रथम  उसी को , छल कर आएँ ||

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 महा चंडरसा छंद / जय शुभचंडी छंद

  (सरल विधान  - चार लघु + दो दीर्घ ×2  = 12 वर्ण 

(जय शुभचंड़ी के वर्ण यथावत ×2  करने पर एक पद बन जाता है 

(गण गणन---- नगण यगण ×2 = 12 वर्ण , चार पद )

गीतिका 

बनकर  भोले   , कपट करेंगे |

सरल दिखें जो , खटक करेंगे |


अवसर  खोजें , परिचय लाएँ , 

निकट रहें भी  ,  झपट करेंगे |


समय निकालें ,  हर घर जाएँ , 

खटपट सोचें  , अटक  करेंगे |


यह जग मेला , खल जन ढेरों ,

मिलकर सारे   , घटक  करेंगे |


चलकर जाना , सहज नहीं है , 

पथिक    लुटेरे ,  गटक करेंगे |


झुककर वाणी   , मधुरम बोलें ,

ठगकर पूरा  , सटक    करेंगे |


सहज "सुभाषा" , सब कुछ जाने, 

अवसर खोजे   , चटक करेंगे |

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महा चंडरसा छंद / जय शुभचंडी छंद

  (सरल विधान  - चार लघु + दो दीर्घ ×2  = 12 वर्ण 

(जय शुभचंड़ी के वर्ण यथावत ×2  करने पर एक पद बन जाता है 

(गण गणन---- नगण यगण ×2 = 12 वर्ण , चार पद )

गीतिका

मिलकर नेता , चमन करेंगे |

वतन चबाते ,    हवन करेंगे |


जमकर खाएँ , कपट बराती , 

हजम नहीं हो  ,  वमन  करेंगे |


हटकर बोलें , हरदम अच्छा |

चखकर   मेवा , गमन करेंगे |


चलकर उल्टे , निज पग आएँ , 

छलकर पूरा ,     दमन करेंगे |


हितकर मानें  , निज तन चोला , 

नयन नचाते ,    भजन  करेंगे |


आग लगाने  , कुशल बने जो , 

हर पल बोलें  , अमन    करेंगे |


जब पकड़ा है  , सहज "सुभाषा' , 

वह तब बोले ,  शमन    करेंगे |


सुभाष सिंघई 

जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र 

पूर्व भाषानुदेक आई टी आई 

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  78 महा शशिवदना छंद 

10 - 10 मात्रा , यति और पदांत दीर्घ से,

(दीर्घ का वाचिक लघु -लघु करना निषेध है ) 

चार पद , दो दो पद अथवा चारों पद समतुकांत। 


सरल विधान - अठकल+दीर्घ, --अठकल +दीर्घ। 


अठकल के बारे में कई बार , विस्तृत निवेदन कर चुके हैं। 

सही अठकल - 44.   332.   35 ✅✅ और 35 के अठकल में भी  त्रिकल के बाद #तगण 221 #सही_नहीं होता।


 सही अठकल को विस्तृत रुप से समझने हेतु इस पोस्ट के पहले कमेंट में  लिंक दी गई है , व पटल पर फीचर पर क्लिक करके  अठकल पोस्ट प‌ढ़‌ सकते हैं 


विद्रूप /गलत - अठकल - 233.  323.   53 ❌ लय‌ हनन 

(विद्रूप अठकल का प्रयोग करना ,छंद लेखक की अकुशलता है)

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यह निषेध शब्द हम इसलिए प्रयोग करते हैं, कि  करीब दो सौ छंदों के साथ वर्तमान के एक तथाकथित जी ने‌ घाल मेल कर दिया है,  सर्व मान्य छंद पुस्तक "छंद प्रभाकर " ( ले० जगन्नाथ प्रसाद भानु) में वर्णित छंदों में ,  दीर्घ का वाचिक दो लघु कर दिया , तो कही दो लघु का दीर्घ कर दिया व कुछ छंदों को ऐसा ही कुछ करके ,उसके जनक प्रणेता बन गए हैं | हम प्रयास करते हैं, कि वर्णित लघु - दीर्घ यथावत रहें |सरलीकरण एवं स्व यश नाम के लाभ में छंदों की मूँछ हटाकर पूँछ लगाना हम उचित नहीं मानते।👏👏👏

पूज्य जगन्नाथ भानु जी लिखते भी हैं कि- 

मत्त वरण गति यति नियम, अंतहि समता बंद ।

जा पद रचना में मिले, "भानु" भनत स्वइ छंंद ।।

मत्त = मात्रा ,,, वरण = वर्ण ,

"मात्राओं व वर्णों की रचना गति तथा यति का नियम और चरणाांत में समता /पदांत नियम जिस कविता में पाई जावे, उसे छंद कहते हैं ।"

छंद की पहचान इन्हीं लक्षणों के आधार पर की जा सकती है—

किसी छंद (एक ही प्रकार के छंद) में  मात्राओं अथवा वर्णन की निर्धारित संख्या होती है ।

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🌹🥗  माँ शारदे वंदना 🥗🌹

वीणा  है कर में,  नमन करूँ माता | 

हंसवाहिनी  हो  , शब्दों  की  दाता  || 

शरण आपकी दे,जिसको भी छाया |

ज्ञान सदा  मिलता , ऐसी तव माया ||


सुन लेना  माता  , सेवक की  विनती |

शरण 'सुभाषा' की,चरणों में  गिनती |

छंद महल सज्जा  , कृपा  तुम्हारी   है |

हर कवि में तेरी   ,  ममता   न्यारी है ||


  🌹🥗 श्री गणपति अर्चना 🥗🌹


प्रथम पूज्य सबके, जय गणपति देवा |

सुर, नर, मुनि करते , तेरी नित  सेवा ||

भोले   शंकर   जी , पिता   तुम्हारे   हैं |

सुत   माता  गौरी ,  आप   हमारे    हैं ||


🌹  महा शशिवदना छंद संरचना 🌹


छंद सुहाना है , रुचिकर    शशिवदना |

महा शब्द  पहले  ,‌रहता    है  कहना  ||

यति-पदांत गुरु है, दस-दस शुभ मात्रा |

समझें कवि ज्ञानी , शशिवदना   यात्रा  ||


शशिवदना लगता  , छंद  सुहाना  है |

महा कहें  पहले , गेय‌    खजाना  है ||

कलन सही मिलते  , गायन में लेखा |

वाद्य थाप चलती , यह भी सब देखा ||

🌹 अपनी बात / नम्र निवेदन 🌹

हम सुभाष करते, कौशिक से  चर्चा  |

तभी  छंद  लाते ,  सही  बना   पर्चा ||

मिलकर दोनों का , एक  किनारा  है |

छंद महल तब ही , बना   सितारा है ||

🌹.   महा शशिवदना  छंद     🌹

जीवन जब पाया, कुछ करके  जाना |

संकट भी  सहना , पर मत घबराना ||

सत्य सदा  रखना,  धीरज  अपनाना |

रखकर विनम्रता , निज यश फैलाना  ||


चार भले अच्छे , खल   बारह  छोड़ो  |

मानी  यदि ज्ञानी ,  उससे मुख मोड़ो ||

संगत   दे  कटुता , तब  रिश्ता  तोड़ो |

गुण रखते हैं जो  , उनको  ही जोड़ो ||


जीत वही अच्छी ,  जिसमें   सच्चाई |

यदि    बेईमानी ,  की  कुछ  परछाई ||

चैन नहीं मिलता , रहती   व्याकुलता |

लज्जित भी होते , भेद जहाँ  खुलता ||


जब हाथी चलता , श्वान भौंकते  हैं |

यश सुन ज्ञानी का , दुष्ट   चौंकते हैं ||

खल फितरत करते, जाल बनाते  हैं |

रस में  विष  घोलें , गाल बजाते  हैं ||

सुभाष सिंघई

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🌹.   महा शशिवदना छंद (  मुक्तक) - 🌹

कुछ जन मिलते हैं ,चमचागिरि करते |

निज  मतलब   साधें , रहते दम भरते |

घातें   वह   देते ,    स्वारथ   ही  साधें-

सज्जन   चुप   रहते , रह  लेते   डरते |


कह"सुभाष" आगे, जो रिश्ते मिलते |

कुछ खुश्बू देते , कुछ  लगते हिलते |

उन्हें निभाना भी ,   होती    मजबूरी - 

कभी वही अच्छे , बनके भी खिलते |


हम सबसे अच्छे  ,जो  पीटें  डंका |

उन पर ही करते , जन पहले शंका |

काले को   कहते , हैं  पीला  सोना- 

उनकी ही जलती , पहले  से  लंका |

सुभाष सिंघई

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🧶महा शशिवदना छंद🧶

📣गीत 📢

अब सबसे न्यारा ,  देश   हमारा  है | 

हर  सैनिक जानो ,एक  सितारा  है ||


अरिदल भी डरता , थर- थर वह काँपे |

ताकत है   कितनी  , बैठा   वह  भाँपे ||

गीदड़ बन जाता , भभकी   भर  देता |

छिपकर भी रहता  ‌, लोह  नहीं  लेता ||


जय भारत माता ,   गुंजित नारा  है |

हर सैनिक जानो , एक   सितारा है ||


दुश्मन मिल जाते  चीन- पाक जानों |

कुंठाएँ      रखते , भारत  से    मानों ||

हिंदुस्तानी    भी ,    प्रत्युत्तर     देते |

सबक सिखाते हैं   , बदला भी  लेते ||


चला शत्रु  लड़ने , तब-तब  हारा है |

हर सैनिक जानो , एक   सितारा है ||


सदा विश्व में भी, अलख जगाया है |

भारत का झंडा , शुभ   फहराया है  ||

शांति दूत हम हैं ,  दुनिया  ने  जाना | 

आदर्शों को भी , शुभकर  है   माना ||


विश्व गुरू बनने  , अब जयकारा  है |

हर सैनिक जानो, खिला  सितारा है ||


सुभाष सिंघई

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🧶महा शशिवदना छंद🧶

📣गीत 📢

राधा यमुना में , पैर युगल डाले |

चला रही चप्पू , वह  बैठे-ठाले ||


नहीं श्याम आए , वादा भी तोड़ा |

आज अकेले ही , राधा को छोड़ा ||

मौन आज धारा , है उदास बहती |

दर्श कृष्ण चाहूँ ,यमुना भी कहती ||


दर्शन सुख देगा ,   यह इच्छा पाले |

चला रही   चप्पू ,  वह   बैठे-ठाले ||


उपवन   के    पत्ते , आज   नहीं  हिलते |

यहाँ श्याम बिन भी, नहीं कमल खिलते ||

मोर  देख  लौटे ,    नहीं  श्याम    आए |

विरह  मोरनी का , कौन   समझ   पाए ||


सब जड़वत लगता , लगे  मौन ताले |

चला   रही   चप्पू , वह  बैठे - ठाले ||


हंस   किनारे   हैं ,  करें   नहीं  क्रीड़ा |

कौन समझता है , अब उनकी ‌पीड़ा ||

है  उदास चकवी  , मन में  अब रोती |

खोज रही चकवा ,  यादों में   खोती ||


दूर  खड़े  देखें , कृष्ण सखा ग्वाले |

चला रही   चप्पू , वह   बैठे-ठाले ||

सुभाष सिंघई 

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💎महा शशिवदना छंद💎

🔔गीतिका 🔔 स्वर समांत  आन , पदांत गंदा 

दर्प रखे ज्ञानी   वहाँ    ज्ञान गंदा |

बंद सीप मोती , सभी मान  गंदा  ||


पानी-सा ज्ञानी,  निर्मल रहता   है , 

मन सरिता मैली, लगे  पान  गंदा |


बतलाता सबको , है   उसूल कितने , 

पर चुगली सुनके, किया  कान गंदा |


अब पाखंडी  ही , सुख साधन चाहें ,  

पुण्यवान बनते , सुने    गान    गंदा |


जहर बेल बढ़ती , बिन  पानी  जानो , 

भेंट दिया जिसको,  किया दान गंदा |


छिपे  छिपकली भी , प्रभु चित्रों पीछे , 

रही  यथा   मंशा ,  है   ढ़लान   गंदा |


क्यों करता गिनती , चल सुभाष घर को , 

बनी शोहरत    का , किया   शान   गंदा |


सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

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🌹महा शशिवदना छंद🌹

🎈गीतिका 🎈 ( अपदांत ) 

सज्जन गुण ज्ञानी ,अक्सर चुप रहते |

जहाँ उचित लगता ,बात  वहीं  कहते |


लोग बोलते जो , हम  बढ़कर सबसे , 

वह खाली डिब्बा , से  हरदम  बजते | 


शेर सभी बनते ,  राजा  सब  घर  के , 

आहट  दरवाजे ,  तब  दिखते  डरते |


सबने   यह   देखा , हँसी  उड़़ाते  जो,

जब वह ही  घिरते,  रहें  हाथ   मलते  |


चलना बस सीखो  , यह जग है मेला , 

बुरे और अच्छे ,   मिलते   हैं   चलते |


भला बुरा करते , अवसर जब मिलता ,

करें याद नानी ,    जब खुद  ही ढलते  | 


कभी 'सुभाषा' तू , बुरा  नहीं  करना , 

जैसे   को   तैसा , देखा  है     सहते  |


सुभाष सिंघई

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🌹महा शशिवदना छंद🌹

🎈गीतिका 🎈 ( अपदांत ) 

खुले आम ही   जो , देश गीत  गाते |

तब आकर उनसे,  रखते सब  नाते ||


चोरों   की   टोली ,   करती   गद्दारी , 

बनकर भक्षक ही , रक्षक   बतलाते |


खाना भारत का ,   गाना   पाकिस्ताँ , 

लाठी इनको  ही ,  कुछ जन बनवाते |


शर्म   हया  बेची , कुछ   नेताओं   ने ,

खातिर वोटों की  , कलमा पढ़‌ जाते |


राजनीति अब है , बस फितरत बाजी , 

नेता  जनता   को,  सीधा   ही  खाते |


आज धमाकों को , सुनते   हर कोने , 

बम्ब फोड़  मरते , जनता   ठुकराते |


धर्म बना कैसा , काफिर  कह   मारो , 

मरने    पर   हूरें  , मिलना     दुहराते |

मांँ शारदे से प्रार्थना (मुक्तक)

🌹मुक्तक -🌹

बात   सुनो   मेरी   , नम्र   भाव  कहता  |

नहीं मान कुछ मैं  , निज मन में  रखता |

देता  आदर    हूँ   , सबको   मन से  ही -

जो   रखते  कटुता  ,  उन्हें  नहीं  सहता |


जलती आगी के ,भाग नहीं   मिटते |

जहाँ काज खोटे , दाग  नहीं  मिटते |

जब चरित्र  फिसले, बलबूजे  उठते - 

तब  आसानी  से , झाग नहीं मिटते | 

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🌹महा  शशिवदना छंद (गीत )🌹

अब इस दुनिया में , कुछ करके जाना |

लगन परिश्रम  से , सब  कुछ है पाना ||


लोग सयाने हैं ,   कान  खूब  भरते |

तिकड़म करने से , नहीं कभी डरते |

उठा भरोसा है , अब तो  अपनों ‌से -

देते वह  धोखा , जो   सँग में  रहते |


तब विवेक आगे ,‌सम्मुख कुछ लाना |

लगन परिश्रम से, सब  कुछ है पाना ||


दुनियादारी में   , सीखो अब जीना |

कभी हलाहल भी , पड़ता है पीना |

लोग जलाकर ही ,  तारीफें   करते - 

अवसर पाते  ही   ,छेद करें  सीना |


तब बचकर रहना , नहीं जाल आना |

लगन परिश्रम से,  सब कुछ है पाना ||


लोग चले आते ,  जब स्वारथ होता |

अपनापन दिखला,  दुखड़े भी रोता |

स्वारथ सध जाए,तब सब कुछ भूले -

दूर खड़ा  देखे , या    कटुता  बोता  |


अब  सुभाष गाता ,  तन्मय  हो  गाना |

लगन परिश्रम  से , सब  कुछ है पाना ||

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🌹गीतिका 🌹

जहाँ भरोसा हो , तुमको निज बल का ‌|

करो सामना भी , डटकर तुम छल  का |


नहीं   चूकते   हैं ,  लोग   जमाने   के , 

खेल बिगाड़ो जी , सदा आप खल का |


ऊँचाई   चढ़ना ,   अपने   साहस   से , 

मजबूती  रखना , सदा खड़े  तल का |


लोग   आज  जीतें  ,   मनमानी   करते , 

मौज उड़ाते  हैं  ,  ध्यान  नहीं  कल का |


सज्जन   रहते  हैं  , सदा  एक से  ही, 

कब  करती लाठी , बँटवारा जल का |


पक्षी  उड़ते   हैं , नील   गगन में  ही , 

ध्यान रखें नीचें , हिस्सा वह थल का |


संत   सदा होते , परहित    उपकारी ,

हैं हिसाब रखते, वह भी हर पल का 

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मुक्तक महाशशिवदना छंद 


आज देश में ही , कुछ   ऐसे  आते |

भारत माता   के , गीत   नहीं  गाते |

राष्ट्रधर्म त्यागें , वह किस लायक हैं -

गद्दारी  तमगा ‌,  जो  खुद  अपनाते  |


उगते सूरज का , अभिनंदन होता |

खुश्बू  आती है , जब  चंदन होता |

बातें  करना  ही , नहीं  परिश्रम है -

जहाँ परिश्रम हो  ,खुद वंदन होता |


सुभाष सिंघई


महा शशिवदना छंद  मुक्तक  

(हिंदी और अँगरेजी )


है अमीर हिंदी , शब्द  बहुत  मिलते |

फूफा मामा हैं  , चाचा  जी  खिलते |

पर अंकल सबको,  कहती अँगरेजी - 

एक डोर पर ही , सब लटके  हिलते ||


पुत्र आत्मज है  , सुत भी कह सकते  |

ज्येष्ठ   अनुज  भाई , भ्राता ही  बनते |

ब्रदर बना अब ब्रो , अँगरेजी  कहती -  

नहीं सहोदर-सी  , भाषा  यह  कहते  |


माता   जननी    माँ , है  बाई  मेरी |

मदर शब्द ही  है  ,   अँगरेजी  तेरी  ||

मोम बनी अब तो ,  गायब  है ताई -

इन ला कह पत्नी, रिश्तों की  भेरी |


अँगरेजी भी क्या  , रिश्तों को जाने |

मीठापन कितना , क्या वह पहचाने |

एक शब्द में ही ,   रिश्ते   लटकाते -

एक तार  पर ही ,  गाते  सब  गाने |


ताऊ मौसा  को, अंकल ही कहते।

एक शब्द में ही, सब बंँध कर रहते।

सम्बोधन मिलते, हिंदी    में   सारे-

क्यों अंग्रेजी के, बंधन को सहते।।


मौसी  ताई को, आंटी   ही कहते। 

सब साला भाई, ब्रो बनकर रहते। 

न्याय नहीं, कैसे, रिश्ते    पहचानें-

अंँगरेजी धुंँधली, भ्रम में सब रमते।।

सुभाष सिंघई 

जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र 

पूर्व भाषानुदेक आई टी आई 

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काव्याचार्य श्री रामदेवलाल विभोर जी की  छंद विधान पुस्तक , पेज क्रमांक 222 पर उल्लिखित 

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79. - #रासा छंद , (चार पद ) 16 मात्रा 

मापनी-  444 दीर्घ-दीर्घ ( पदांत में दो दीर्घ अनिवार्य ) 

देखने में यह चौपाई छंद जैसा लगता है , पर #रासा_छंद का गठन अपनी मापनी लिए हुए है , तीन चौकल बनने के बाद दो दीर्घ यथावत रखने होते है , यदि त्रिकल का प्रयोग करते है , तब  बहुत सावधानी रखनी होती है 

जैसे - राम का+ज हित  (चौपाई का अठकल ) सही है पर #रासा_छंद में ××गलत है , क्योंकि दो चौकल नहीं बन रहे है 

राम ह+मारे  ( का अठकल बनाते है , तब दो चौकल बन रहे है)√√

इसी तरह - चीर दे+खते का अठकल गलत है , ××

पर - चीर ह+रण है - का  अठकल सही है √

पूरित जगण चौकल अमान्य है , पर खंडित जगण लय देता है √

जैसे - राम ह+मारे  सदा र+ हेंगे = सदा र = खंडित जगण √ 

 जैसे पूरित जगण - चलते सुभाष अब पथ जाने ××

 चौकल "चलते"के बाद , " सुभाष " पूरित जगण है ××


शारद   माता  नमन  करूँ मैं  | 

शुभ वर चाहूँ  मनन  करूँ मैं ||

झुक-झुक जाऊँ  दर पर तेरे |

शमन सभी हों खट  पल मेरे ||


गणपति बप्पा जय- जय तेरी | 

सब निपटाओ विपद   घनेरी ||

विनय  सुनाने   दर  पर आया |

शरण   मिलेगी  सुन  हरषाया ||


रासा   छंद   सुहाना    आया |

छंद महल पर जिसे सजाया ||

चौकल त्रय हैं  दीर्घ वहाँ दो | 

सौलह मात्रा भार   यहाँ दो ||


कृष्ण  कन्हैया  रास‌  रचाते |

प्यारी  बंशी   मधुर  बजाते ||

कहती सखियाँ सुन ले राधा |

आज नहीं  है   कोई  बाधा ||


साल नया हो  मंगल  कारी |

सभी सुखी हो हे गिरिधारी ||

रस‌ शुभ सुंदर  जीवन पाए | 

नेकी  घर  में   हरदम आए ||


मधुवन आया   धेनु  चरैया |

नाम बताए  कृष्ण कन्हैया ||

ग्वाला कहते  बंशी बजैया ‌|

राधा  कहती  रास‌  रचैया ‌||


हरिहर  मेरे   हरि   सँग आओ  |

हर विपदा को तुम सुलझाओ ||

समझ न पाते   जग  नर  नारी |

प्रभु  सम कोई  कब अधिकारी  ||


बन अभिमानी   हम नर जीते |

जग दुख भोगें  विष कटु पीते |

शरण नहीं भी  प्रभु दर  जाते  |

निज मद जीते  हठ रस  पाते  ||


शरण   नहीं जो   रघुवर  लेता |

जग दुख भोगे  नमन  न  देता ||

वह अभिमानी  तब  कहलाता |

चलकर   टेढ़ा   वह  इठलाता ||


भगत पुजारी  भजन सुनाता |

कटु मन धारी अगन लगाता ||

विषधर देखा  जब-जब आए |

चुभन लगाए    डसकर जाए ||


भजन   सुनाते  हर पल गाते |

प्रभुवर  देखा उस तक आते |

मन  हरषाते   विपद   हटाते |

सहज सहारा  जन-जन पाते ||


रवि   शशि  तारे  गगन  रहेंगे | 

अवनि सुहानी    चमन  रहेंगें ||

परहित ऊँचे     ‌ मनन   रहेंगे |

तब जग में भी  सृजन रहेंगे |


हरिहर  भोले   सुनकर   प्राणी |

बम- बम बोले निज मुख वाणी |

वचन  सुने    ‌भी   हृदय  उतारें  |

प्रभु दर  जाके  चरण   पखारें ||


तरु फल मीठे    झुककर आते  |

कड़क सदा ही  पक कर  पाते ||

नरियल ऊँचा  थल पर  आता  |

गिरकर ही श्री फल कहलाता ||


~~~~~~~~~~~~~~

मुक्तक - 


हटकर देखो   चमन  हमारा |

जगमग चंदा  वतन  हमारा |

हल सब होतीं  अब विपदाएँ-

पथ अब आगे अमन  हमारा |


जब हम जागें   उदित सवेरा |

कलरव पंछी मुदित  बसेरा |

हँसकर  आते  उड़कर नाना - 

दरशन  पाते  लघु खग डेरा |


~~~

गीत 

अनुभव अच्छा  वह जन पाते |

गिरकर जो भी  उठकर आते |


गिरि पर   चींटी   चढ़कर  माने |

निज कुल  जाने  सहज तराने ||

जब -जब जैसा  अवसर आए |

मिलजुल  वैसा  पथ अपनाए ||


कठिन तराने    सहज  सुहाते |

गिरकर जो भी , उठकर आते |


जब कुछ आती  अति कठिनाई |

हँसकर  लेते , सिर    पर  आई ||

निपट   अकेले  तब  वह   सोचे |

अब इसमें क्यों  यह सब  लोचे ||


हल   करते  हैं     विपद  मिटाते |

गिरकर जो   भी , उठकर  आते |


जब हैं मिलते    अवसर  पक्के |

तब वह मारें   , जमकर छक्के ||

जिस जिसकी भी,मदद मिलेगी |

तब   उसकी  भी  सुयश रहेगी |


रखकर जानें    सुखकर   नाते |

गिरकर जो  भी  उठकर आते ||

~~~~~~~~~~~


गीतिका 


बनकर  भोले  कपट करेंगे |

सरल दिखें जो खटक करेंगे |


अवसर  खोजें  परिचय लाएँ , 

निकट रहें भी   झपट करेंगे |


समय निकालें  हर घर जाएँ , 

खटपट सोचें  अटक  करेंगे |


यह जग मेला खल जन ढेरों ,

मिलकर सारे   घटक  करेंगे |


चलकर जाना  सहज नहीं है , 

पथिक    लुटेरे  गटक करेंगे |


झुककर वाणी   मधुरम बोलें ,

ठगकर पूरा   सटक    करेंगे |


सहज "सुभाषा" सब कुछ जाने, 

अवसर खोजे    चटक करेंगे |

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गीत


निलय किसी के  खल जन जाएँ  |

प्रथम  उसी को ,   छल कर आएँ ||


बनकर  भोले  नमन    करेंगे  |

ढलकर लोटा   जलद  भरेंगे ||

अदब बजाते  जिस घर जाएँ |

अमन वहाँ का  हरकर  लाएँ ||


जिस घर  पूरी   हिकमत   ‌‌लाएँ  |

प्रथम  उसी को छल कर आएँ ||


अजब तराना  यह   सब   गाते | 

नमन  सुहाना     दर पर  लाते ||

हुनर    दिखाते    हटकर  पूरा |

कसर  न   छोड़ें  सनद अधूरा ||


सुर धुन गाना  जिस  घर  गाएँ |

प्रथम  उसी को छल कर आएँ ||


गजब   मिले  हैं  चतुर   सयाने |

सहज   बनेंगे    स्वजन    पुराने |

हड़प    करेंगे   अवसर    पाते |

प्रगति   बताएँ     उड़ते   छाते ||


प्रलय   मचाएँ जिस‌   घर  खाएँ |

प्रथम  उसी को छल कर आएँ ||


~~~


गीतिका


मिलकर नेता   चमन करेंगे |

वतन चबाते   हवन करेंगे |


जमकर खाएँ   कपट बराती , 

हजम नहीं हो   वमन  करेंगे |


हटकर बोलें  हरदम अच्छा |

चखकर   मेवा गमन करेंगे |


चलकर उल्टे  निज पग आएँ , 

छलकर पूरा     दमन करेंगे |


हितकर मानें  निज तन चोला , 

नयन नचाते    भजन  करेंगे |


आग लगाने   कुशल बने जो , 

हर पल बोलें  अमन    करेंगे |


जब पकड़ा है  सहज "सुभाषा' , 

वह तब बोले  शमन    करेंगे |


रासा छंद , तीन चौकल दो दीर्घ 


नदियाँ  बोलें  कब पानी से |

तेरा   है   बोझ   रवानी  से |

तरुवर कब कहते डालों   से - 

तू वजनी  हरित निशानी  से |


राह न बोले   कुछ  राही से |

बोझ लगे तू   पथ  ग्राही से |

नीव न  चाहे , नाम  हमारा - 

लिखवाना तुम अब स्याही से |


स्वार्थ न रखते सूरज चंदा |

चाह न  करते   पूजे  बंदा |

अपना काम सहज ही जानें - 

इस दुनिया को अपना मानें |


सज्जन करते   काम निराला |

शुभ  कर्मों  से  करें  उजाला |

चुप रहकर सब कुछ कर जाते- 

चाह न   रखते   पहनें  माला |


सुभाष सिंघई जतारा

~~~~~~~~~~~~`~

गीतिका , रासा छंद , तीन चौकल दो दीर्घ 


अपनापन  भारी  दिखलाते |

खंजर  पीछे  वही    लगाते |


बैर  पुराना  कर लें  यारी , 

गले लिपट वह खूब सताते |


गम में लाते   नकली   आँसू  , 

भरकर आते , और   दिखाते | 


मित्र न सच्चा उसको मानो , 

जो   रोते   हैं  और  रुलाते |


सिखलाते  जो  दुनियादारी, 

वह  खुद ही अब  लूट मचाते |


किसने  पुस्तक  पूरण देखी   , 

अधकचरा  सब ज्ञान सिखाते |


इकतारा    ले  चला   सुभाषा , 

जो भी  मिलता   राम  सुनाते |


सुभाष सिंघई


~~~~~~~~

गीतिका , रासा छंद , तीन चौकल दो दीर्घ 


अपनापन  भारी  दिखलाते |

खंजर  पीछे  वही    लगाते |


बैर  पुराना  कर लें  यारी , 

गले लिपट वह खूब सताते |


गम में लाते   नकली   आँसू  , 

भरकर आते , और   दिखाते | 


मित्र न सच्चा उसको मानो , 

जो   रोते   हैं  और  रुलाते |


सिखलाते  जो  दुनियादारी, 

वह  खुद ही अब  लूट मचाते |


किसने  पुस्तक  पूरण देखी   , 

अधकचरा  सब ज्ञान सिखाते |


इकतारा    ले  चला   सुभाषा , 

जो भी  मिलता   राम  सुनाते |


सुभाष सिंघई

~~~~~~~~~~

मुक्तक , रासा छंद , तीन चौकल दो दीर्घ 


कैसे- कैसे  लोग यहाँ  हैं |

दुश्मन जैसे  योग यहाँ हैं |

हिंद वतन के बने निवासी -

पर पाकी दिल रोग यहाँ हैं |


बंदे भारत     गीत न  गाते |

घातक   घटनाएँ कर जाते |

शर्म न करते कुछ अब नेता - 

जोड़े    रहते  उनसे   नाते |


घुसपैठी जो  भारत  आए |

कहते वोटर   माना   जाए |

कौन उन्हें अब समझाएगा- 

जो नेता    उनको हैं  लाए |


प्रश्न यहाँ पर  करे    सुभाषा |

क्या उनसे रख सकते आशा |

हिंदु  सदा जो  काफिर माने - 

मिलती जिनसे सदा निराशा |


सुभाष सिंघई


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रासा छंद मुक्तक , तीन चौकल दो दीर्घ 


सदा   घमंडी  ठोकर   खाता |

झूठ पकड़ भी उसका जाता |

फिर भी वह सब झुठलाता है-

अपने   मद में  उल्टा   गाता |


छिपे छिपकली कीड़े खाते |

शिव के   पीछे हर-हर गाते |

हाल यही मानव  का जानो - 

पाप    धुलाने   गंगा   जाते |


करनी का फल सब ही पाएँ |

आज नहीं तो कल पछताएँ |

पाप हुआ   रावण  से भारी- 

तब ही हम हर साल जलाएँ |


त्रेता  रावण आज जलाएँ |

करनी खोटी  उसमें  पाएँ |

दाग लगा कलयुग तक आया - 

हर पीड़ी को हम समझाएँ |

गीतिका  रासा छंद , तीन चौकल , दो दीर्घ 


कभी पिता से दूर न जाना |

आशीषों को  हरदम पाना ||


जिंदा अब  या चले  गए  है ,

यादें उनकी   रखो खजाना | 


सदा रहे तुम उनको प्यारे , 

जीवन भर तुम रहे तराना |


पूरे  जीवन  तुम्हें  सँवारा , 

हो ऊँचाई   मन में  ठाना |


हाथ सदा ही , रखते आगे , 

अवसर देते   तुम्हें सुहाना  |


क्षमता भर सब  तुझे दिलाया, 

अपना सुख सब किया रवाना |


बोल न कड़वें ,  उनसे बोलो  , 

उनको उल्टा नहीं  सिखाना |


सुभाष सिंघई

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रासा छंद गीतिका 

(एक बहिन का अपनी भावी से निवेदन  )


भावी    माना  यह  दर तेरा |

पर यह   बापू  का घर मेरा ||


चाह नहीं मैं  अब कुछ  माँगू  ,

सदा कहे यह अब  वर   मेरा |


रक्षा   बंधन पर    मैं  आती , 

दूर    करें   भाई  डर   मेरा |


जब तक   घर में   मेरे बापू ,

कह  लेती  हूँ  बस हर मेरा  |


भावी यह मत  मुझसे बोलो , 

यहाँ  न हक  रत्ती भर मेरा |


बोला करती सदा पिया को , 

उड़ने इस  घर है   पर मेरा |


बापू का घर   मान  सुभाषा , 

दम से आती  कहकर  मेरा |


सुभाष सिंघई



सुभाष सिंघई 

जतारा टीकमगढ़ म०प्र०

एम० ए० हिंदी साहित्य , दर्शन शास्त्र 

पूर्व भाषानुदेक आई टी आई 

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80- अरुण_छंद
यह महादैशिक जाति का #मात्रिक छंद है अत:
#वाचिक भार मान्य है #परन्तु #चरणांत शुद्ध - गुरु -लघु-गुरु
से होना चाहिए। इसके चार चरण होते है। प्रति चरण २० मात्राएँ होती है। यति ५-५-१० पर होती है। इसे सरलता से ऐसे समझ सकते है।
(रगण) × 4 मात्रा इस प्रकार. 
212  , 212 , 212 वाचिक हो सकते हैं किंतु पदांत  का रगण 212  यथावत रहना चाहिए , इस छंद को बारीकी से समझकर लिखें
प्रारंभ के तीन रगण तोड़कर वाचिक भार ला सकते है , पर वाचिक भार उच्चारण में सही हो |
जैसे -शारदा √   मा त अब ( 212 ) √ , दर्श शुभ 212 √ दीजिए√
किंतु
शारदा √अब मात 221× शुभ दर्श 221 × दीजिए √

दो व+रद 212.√सही है    व+रद दो 122 × है
उच्चारण से रगण को वाचिक कर सकते है
कहने का आशय यह है , वाचिक में , उच्चारण रगण वाचिक होना चाहिए
एक संज्ञान - नगण शब्द (तीन लघु )का वाचिक भार - एक दो होता है
जैसे म+ नन.   स+जन , क+थन इत्यादि

शारदे वंदना
शारदा , मात अब , दर्श शुभ दीजिए |
द्वार पर हूँ खड़ा ,  नेह  अब कीजिए ||
छंद का , ज्ञान दो ,   लेख  में  धार दो |
दो वरद ,हस्त शुभ , दास को  तार दो ||

काव्य हित ,शब्द को  , आप ही राह दें |
शारदा ,  सार दे  , नेह   की   चाह   दें ||
छंद शुभ ,ज्ञान हो , शुभविधा लेख  में  |
चाह हो  वाह हो ,       भार  हो रेख में ||

गणेश वंदना
विध्न  भी , दूर हो ,   देव जू  आइए |
पूजता , आपको , लेखनी   लाइए ||
लिख सकूँ , छंद में , बुद्धि के देवता |
शीष गज, धारणे    , दे रहा  नेवता ||

लेख  में, भाव में,   है  यही  कामना |
लड़खडा , रुक चलें  ,हाथ प्रभु थामना |
हर जगह  साथ दो ,भर  रहा भावना |
दास भी, चाहता  , हो   सफल  साधना |

छंद

देश के, मान का , विश्व में गान  हो |
सत्य को देखकर , हर्ष का  पान हो |
कर्म गति ,धर्म मय, देखकर  हर्ष हो |
आत्म सुख मानकर, ईश का दर्श हो |

जातियाँ, लड़ रही  , देश को घात दे |
एकता, दूर कर ,   दूर तक  मात  दे ||
शत्रु बन , युद्ध-सा ,खेल अब खेलते |
वार पर , वार  हैं  , हाल अब  देखते ||

कृष्ण का योग अब ,   विश्व में मानिए |
साधना हो जहाँ ,    देखकर  जानिए ||
आत्म का  दर्श है  ,   ईश  से  मेल  है |
जानना निज यहाँ ,जिंदगी का खेल है ||

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मुक्तक
कृष्ण की, बांसुरी, बज उठी छाँव में |
बन गई  मोरनी   , राधिका  गाँव  में |
बन गई तितलियाँ , गोपिया  घूमती -
हाथ की चूड़िया  , बज रही ठाँव में |

आसमाँ में दिखे , आज कुछ गर्जना |
शंख-सा घोष दें    , मेघ  की अर्चना |
उड़ पवन बोलते , स्वर बनी  राधिका -
आज है शुभ घड़ी  ,रास की सर्जना |

बाग में  देखते ,  हँस  रहे  फूल है |
गंध अब फैलती , नूर नद  कूल है |
रास लीला अभी , सज रही जानिए -
कृष्ण जी आ गए  , साधने  भूल है |

श्याम कर जोड़कर , राधिका  देखते |
किस तरह मान हो , भाव भी लेखते |
हँस पड़ी राधिका , देख के श्याम को-
रास को    जानती , नेह  यह  भेजते |
~~~~~~~~~
गीतिका

प्यार भी, लोग कुछ  , लगे अब  तोलने |
आजमा ,  हूँ  रहा   ,  हैं    लगे    बोलने |

बात  भी‌ कर  रहे ,  छल भरे  होंठ  से, 
रूठकर ,अब लगे   , राज सब खोलने |

कौन यह ,जानता , क्या कहाँ  सोच है ,
लोग सब , हैं चतुर ,   रंग   बद  घोलने |

पास  में,    टेरते    , दूर  तब  भागते ,
बिन बुला, आ गए , अब यहाँ   डोलने  |

उड़ गए , हंस थे , रूठकर   दूर  भी ,
अब बने ,लालची ,  दिख रहे  लोटने |

टाँग को,  भी अड़ा , लोग जो चुप रहे,
आज आ बोलते ,    दे    रहे   टोचने

देखकर , हाल यह  , सोच में हैं सभी ,
बैठकर भी 'सुभा' , अब लगा सोचने |
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गीत

हार में,  जीत का, कद जरा जानिए |
जीत है, अब खड़ी  , गेह में मानिए ||

चोंचले,  जीत के ,चार   दिन  ही  रहें |
बाद में वह , खड़े , सत्य सब ही कहें ||
रुक गए ,  जीतकर , बात पहचानिए |
हार में ,जीत का ~~~~~~~~~~||

रात में,  दिन मिले , ख्वाब हम पालते |
नीर भी ,  ठूँठ  में ,    व्यर्थ हम डालते ||
कार्य के , पूर्व ही , प्रण  जरा   ठानिए |
हार में ,जीत का ~~~~~~~~~~||

आम का , रस रखा , स्वाद हित  पीजिए |
हाथ से  , थामिए ,  पान   रस‌  कीजिए ||
बात भी,  सब सरल , नीर मत   छानिए |
हार में ,जीत का ~~~~~~~~~~||

सुभाष सिंघई 

अरुण छंद , चार रगण , अंतिम रगण (212)यथावत , 

चरणांत के पहले दो यतियाँ | 


गीतिका 

अरुण छंद , चार रगण , अंतिम रगण ( 212 ) यथावत , 

चरणांत के पहले दो यतियाँ 


लिख रहा , प्रेम‌‌ से  , आज यह गीतिका |

खोलने  , आपसे ,    राज यह   गीतिका |


प्यार  के,   सूत्र  हैं , गूँथ  कर  ला रहा , 

आप पढ़‌ , लीजिए , ताज यह गीतिका |


भेद   सब , खोलती , प्रेम   के ‌  रंग हैं , 

छोड़ती , भी नहीं , लाज  यह गीतिका |


है  मिलन , पास में   , दूर  आबाज  है , 

दे निभा ,पूर्णता ,   काज‌‌ यह गीतिका |


भाव से  , शब्द कुछ  , हैं  लिखे पत्र में , 

देखते  , कुछ बनी , नाज ‌‌यह ‌ गीतिका |


नैन के , सेन  कुछ , हैं  सभी  भाव भी‌ , 

ताल सुर ,  देखिए   , साज यह गीतिका |


बोलता,  है जगत , राज मत   खोलिए , 

पर 'सुभा' , दे धड़क , गाज यह गीतिका |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~~

छंद है    , यह मधुर ,   भाव से ही लिखें |

हैं रगण ,   चार ही  , जो सभी को दिखें ||

वाचिकी ,   हो सके  , आखरी  पूर्ण   है |

है अरुण , छंद यह  , गेयता    तूर्ण   है ||


देश   में    ,  देखते ,   टूटती    ताल है |

हर जगह ,   शोर है,  छूटती    चाल है ||

बोल में ,   विष वमन , आज हम देखते |

सब भटक , घूमते , अब गलत लेखते ||


गौर अब ,कीजिए , खेलते   आग से |

दुश्मनी , ठानते ,  स्वार्थ निज राग से ||

कौन यह , पूछता , सत्य या त्याग से |

पथ चले ,सोचकर , कौन अनुभाग से ||


सुभाष सिंघई


~~~~~~

अरुण छंद , चार रगण , अंतिम रगण (212)यथावत , 

चरणांत के पहले दो यतियाँ | 


राम के  , संग में , श्री   लखन   लाल हैं |

सिय चलें , साथ में ,वन गमन ख्याल हैं ||

यहाँ  विधि  , लेख  से  ,  हो रहे मेल  हैं |

बन  रहे , योग अब  ,  देखने  खेल   हैं ||


मिल गए , योग   से , वीर   हनुमान हैं |

राम के , दूत बन   , वेग   गतियान  हैं ||

लंक में , देखते , जब  सिया मात को  |

हर्ष की, दें खबर , राम  जी  तात को ||


जानकी, की खबर ,  प्राप्त कर राम जी |

बोलते , लंक   में ,   शीघ्र अब काम जी ||

शत्रु को ,  युद्ध   में ,  मृत्यु   उपहार  दो |

श्री जनक , नंदिनी ,  कष्ट अब  तार दो ||


लंक तब , जीतकर , राम सिय ‌से मिले |

अश्रु भी  , मौन थे ,मिट चले तब गिले ||

बोलती , सिय वहाँ , एक वस  नाम  से  |

काट दी , सब विपद , ध्यान धर राम से ||


सुभाष सिंघई


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अरुण छंद , चार रगण , अंतिम रगण (212)यथावत , 

चरणांत के पहले दो यतियाँ | 


बीज विष , आ गए  , लड़ उठीं जातियाँ |

जाति पर , धर्म पर , चल   पडीं लाठियाँ |

वर्ग‌   के , छेद  में    ,  डाल  बारूद को - 

लोग  कुछ , मग्न ‌ हैं ,  पीटने  तालियाँ ||


एकता , दूर अब , खुद रहीं खाइ़याँ |

देश में , फैलतीं , जाति  परछाइयाँ |

ठोकते, ताल  हैं ,  बैठकर  पास  में - 

तोड़ दी, बज रहीं , अब शहनाइयाँ |


राज ने , नीति चल , अब   आबाज से |

भेद कर , वोट हित , दी लगा खाज से |

हम सभी , लड़ रहे , बैठ वह  हँस रहे  - 

कष्ट दें , अब हमें   , अटपटे  राज  से |


सुभाष सिंघई


मुक्तक 


अरुण छंद , चार रगण , अंतिम रगण (212) यथावत , 

चरणांत के पहले दो यतियाँ 


चोट या, घाव पर , जो नमक डालते |

दुष्टता , भी हृदय‌‌,‌‌   लोग तब पालते |

चैन भी , दूर कर , त्रास को    बाँटते - 

कटु वचन , बोलते , जो ह्रदय सालते |


प्रेम का, नीर जो , प्यास में दें  पिला | 

तब बहुत दूर के   , छूटते  हैं  गिला |

खिल उठे,फूल भी, तब सभी नेह के - 

बोल तब , गूँजते , साथ शुभ है मिला |


वीर भी  जब  वचन , , आनकर   हारते |

पूर्ण भी ,  तब करें , सुख निजी त्यागते |

धर्म भी , मानते , जब वचन   लाज  हो - 

लाज की,  रक्ष    हो  , वीरता    धारते ‌|


देश की,  नारियाँ    , देवियाँ  योगनी |

हो विपद ,   तब बने , कर्म से शेरनी |

काट दें ,जाल को   ,रक्ष कर ढाल दें-

रूप‌ से , अंक  प्रिय‌ , दर्श में मोहनी |


लक्ष्य‌ को , साधते , तीर मशहूर हैं |

दूर तक , है गए  ,कुछ  बने नूर हैं |

मीन को भेदकर,  है वरण द्रोपदी -

चंद्रवर  ,छंद सुन, तीर भी शूर  हैं |


सुभाष सिंघई


अरुण छंद 


छंद का ,यह महल , आपका खास है |

शुभ सृजन ,है यहाँ , और  विश्वास है  |

सीखते , मिल सभी , देखते  लालसा- 

छंद नव , ही लिखें ,यह सदा आस  है |


दे रहे  , मान भी  , नम्रता    पास    है |

आपके , साथ ही , सब सृजन खास है |

रूठना , छोड़िए ,   ठान लो   सीखना - 

पूर्णता , प्राप्त हो , यह   सदा आस है |


आ रहे , जा रहे , रोक लो   पाँव  को |

छंद का, यह महल , देख लो ठाँव को |

सब सृजन , कीजिए , रात दिन ही रहें - 

आपका , ही यहाँ ,  जानिए गाँव को |


कागजी,  प्रश्स्तियाँ , बस यहाँ दूर हैं |

लेखनी , आपकी ,  बन रही नूर   है |

दे रहे , मान हम , आप    स्वीकारते - 

पत्रिका , के कदम , अग्र  भरपूर  है |


सुभाष सिंघई

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81- सार्द्ध मनोरम छंद - 2122 × 3 , (  चार. पद )
आदि दीर्घ से ,व तीसरी दसवी सत्रहवीं मात्रा लघु अनिवार्य
वाचिक कर सकते है , प्रारंभ दीर्घ से ही होगा व
          पदांत यगण 122  या भगण 211 से
#विधान_सरलता - #गाल+#दो_दीर्घ_×3‌ 
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पद के मध्य में -#दो_यतियाँ,   #लेखन / #गणना / #समीक्षा हितार्थ रखें  है  , यति चिह्न लगाना जरुरी नहीं है |

शारदे माँ ,  छंद में भी,    गान आए |
दास भी माँ , आप से ही, मान पाए ||
पूजना है , प्रेम से ही , आज जानों |
द्वार में ही , पुष्प डालूँ , मातु  मानों  ||

देव देवा , श्री गणेशा , आप  आओ |
थाल में है , मोद मीठा , आप पाओ ||
शीष मेरा  , हाथ  तेरा ,   देखना   है  |
आप दाता , भाव नाता ,  लेखना ‌है ||

कौन कैसा, आदमी है , जान   लेना |
देख ज्ञानी , ज्ञान का भी , दान लेना |
बोलता जो, सत्य को ही , मान लेना |
और पूरी , बात  जानें , ध्यान   लेना ||

लोग जो भी , बोलते हैं  , झूँठ  पूरा  |
जान लेना, आदमी वो   , है  अधूरा |
देखने     में , नेत्र  पैनै ,‌‌ खोलता  है |
सत्य छोड़े ,तीक्ष्ण वाणी, बोलता है ||

आलसी का , हाल कैसा , कौन  जानें |
गेह में  ही,   है   पराया ,    लोग मानें ||
भोज्य में ही, मस्त देखा , और  सोता |
देखता  है , नींद  में   ही , स्वप्न  बोता ||

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#यथा_सार्द्ध_मनोरम_छंद,  मुक्तक
#विधान_सरलता - गाल+दो दीर्घ ×3‌ 

आज आओ, और छोड़ो , जो बुराई  |
पाट देना , है  खुदी  जो  ,कूप  खाई |
लोग आए ,  प्रेम   बाँटे  , नेह    लेवें-
देख भी लें  , मान पूरा , है   भलाई |

विश्व में भी, युद्ध की है , आज भेरी |
कौन माने , हानि होगी , शान   मेरी |
ठानते है , रार   अच्छी , खार  बाँटें -
बोलते है  , जानता मैं  , जाति  तेरी |

सुभाष सिंघई जतारा 


82 - हंसी छंद - तैथिक जाति  ,15 मात्रा   चार पद 

तीन चौकल + लघु गुरु ,( लगा) 

छंद के पद गठन में तीन चौकल बने दिखना चाहिए  |


जैसे - चलो आज अब आगे यहाँ 

चलो आ +ज अब +आगे यहाँ ❎ पंचकल / त्रिकल बन रहा है ❎

         आज च +लो अब +आगे +यहाँ ✅


विशेष सावधानी - कुछ मित्र बंधु   , चौकल- चौकल  सुनकर , चौपाई चाल में  , अठकल बना लेते हैं,जिसमें कहीं पंचकल बन जाता है 

जैसे -चले राम हैं ❎.    राम चले हैं ✅. 

 व संकेत करने पर , अपने ईगो से जोड़‌ लेते है  |🙏

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माता शारद को मानते |

विद्या देवी  भी जानते ||

ज्ञान प्रदायक माता रहे |

वेद हमारे  ज्ञाता  कहे ||


गणपति देवा नायक  रहें | 

पूज्य प्रथम आराधक रहें ||

साध्य हमारे  साधक कहें |

ज्ञान प्रदाता लायक  कहें ||


किसको कौन यहाँ  तोलता |

गलत सही भी कब बोलता ||

मतलब   से  मानव  डोलता |

राज नहीं भी  कुछ  खोलता ||


ज्ञानी   बाँटे  जब  ज्ञान को |

रखता  सबके  सम्मान को ||

मूरख  आए   जब   सामने |

घूमें   झगड़ा   को   ठानने ||


ज्ञानी  करता  जब   बात है |

लगता सबको   सौगात  है ||

वाणी में  मधुरस  भी   रहे |

बात सरस भी मीठी  कहे ||


सुभाष सिंघई

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मुक्तक 


बातें   मूरख      उल्टी  करे |

नहीं कभी   पिटने को   डरे |

अड़ियल कुछ  टट्टू भी बने -

हठी   रहे   हठ   में ही   मरे |


तेज    प्रतापी     वंदित  रहे |

सत्य सदा निज मुख से कहें |

निकला वचन सभी मान लें - 

अडिग रहे वह कभी न ढहें |


संत हृदय को भी  जानिए |

दुनिया को अब पहचानिए |

स्वार्थ हमेशा पथ में  मिलें - 

दूरी    रखना   ही   ठानिए |


सुभाष सिंघई


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गीतिका


यार पुराने   जब   भी   मिले |

नैन कमल तब हर्षित खिले |


याद  पुरानी  जगकर  कहे , 

आगे भी अब हों सिलसिले |


चर्चा ‌करते क्या    दिन  रहे , 

बातों के जब बँधते   किले |


कच्चे फल भी तोड़े   लगे , 

कभी मिले खाने पिलपिले |


खूब  लड़ाई   करते   रहे , 

और  सुभाषा हटते गिले |


सुभाष सिंघई

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गीतिका 


गीतों    को   गाना  चाहिए |

स्वर भी कुछ आना चाहिए |


मिलना जुलना ‌सबसे रखो , 

हर्षित  हो   जाना   चाहिए |


समय सभी अब पहचानिए , 

बाना    को   ताना    चाहिए |


लोग निकट भी आएँ  सदा , 

मन में  जल  दाना   चाहिए |


गीतों का  हो अब सिलसिला, 

सुर  शुभ  अब पाना   चाहिए |


सुभाष सिंघई

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83- महाभक्ति छंद 

सरल विधान - दो दीर्घ , दो लघु , तीन दीर्घ,  × 2 =  14 वर्ण 

गण गणन = तगण यगण गुरु ×2 


माता विनती  हंसा ,    पूजूँ दर  मैं तेरा |

देता तुझको भावों , पूरा   शुभ मैं  फेरा ||

जाने जग वाले भी,जाने जग के ज्ञानी हैं |

जानूँ   यह  मैं पूरा ,   माता    वरदानी  है  |


राधा चलती सीधी ,  जाए   यमुना  तीरे |

बोलीं सखियाँ काँटे , देखो पग को चीरे ||

भोली  बनती  राधा , बोली मन है डाली | 

ऐसा हम  झूमेंगे , होगा पथ भी  खाली ||


आएँ जब भी ज्ञानी  , गाएँ जब भी  गीता |

चर्चा करके बोलें   , मानो जग को  रीता ||

आते  रहते    योद्धा ,  देखा  बनते  जंगी |

जाना सबको  होता , राजा बन  या  रंगी ||


मैने  अब तो जाना , है  ईश्वर   की   माया |

देता जिसको काया , बाँटे  उसको  छाया ||

जो भी शरणा पाए ,    गाना  उसका गाए |

चोला तन को माने , धामा   उसके  जाए ||


जो भी  सबको बाँटे   , नीला  विष भंडारा |

होगा  वह तो   पापी , जानें  सब  हत्यारा ||

बोलें  उससे  ब्रह्मा , होगा  अब  तू  पापी |

मेरी रचना भूला   , जो तू  ‌‌करता   तापी ||


जो कुछ भी होना है, आगे अब क्या रोना |

पाना जब होगा भी , जो पाया सब खोना ||

चक्की चलती देखी , देखे    पिसते   दाने |

बाधा कुछ हैं आतीं  , होते   सब    बेगाने ‌||


सुभाष सिंघई 


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मुक्तक 


ज्ञानी सच बोलेंगे , जाने  दुनिया सारी |

धोखे जब आएँगे , होगी  तब लाचारी |

मौके पर   देखेंगे ,  ज्ञानी    परखेंगे भी - 

अच्छा तब ही होगा, खेलें सच की पारी |


साथी कुछ बोले थे , यारी मुझसे  मानो |  

आती कठिनाई में , देंगे  सँग भी जानो |

आई  विपदा बोली , लाओ अपने साथी -

दूरी  दिखलाई   है ,  पूरी  तब  यारानों |


धोखे   मिलते जाते  ,   ज्ञानी   हँसते   बोलें  |

क्या कारण आया है,  छोड़ो मुख क्यों खोलें |

होगी   मजबूरी   ही , सोचें   कुछ  लाचारी - 

छोड़े   गहराई   भी ,  है   बात   नहीं   तोलें |

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गीतिका 


रोते रहते   नाते ,   जाना  जब  होता है |

खाली  रहती   मुठ्ठी , बेटा  तट  रोता है |


पत्नी कहती तोड़ूँ ,   जन्मों तक के वादे , 

यादें कर प्रीतों की ,    पूरा  मन  खोता है |


दादा कहता जाता,   क्यों जिंदा  मैं बूढ़ा , 

बेटा अर्थी  काँधे ,   बाबा  कब  ढोता ‌ है |


बेटी   कहती   पापा , मेरी  करके  शादी , 

जाना तब ही  आगे ,  लेने  भव  गोता  है |


दीदी  कहती भैया , कैसा  अब ‌ है वादा , 

रक्षा अब हो कैसी , कैसा अब न्योता है |


सुभाष सिंघई

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84#मनोरम_छंद - (मानव वर्ण संज्ञा जाति )

मापनी-2122 × 2 = 14 मात्रा (दो अथवा चारों चरण समतुकांत)


  #विधान_सरलता - गाल+दो दीर्घ ×2 =14 मात्रा 

  वाचिक कर सकते हैं  , 

किंतु  प्रारम्भ #दीर्घ से ही  , व #पदांत यगण 122  या भगण 211 से करना आवश्यक है 


#ध्यानाकर्षण - ऐसी स्थिति में प्रथम मापनी के दो दीर्घ ही वाचिक कर सकते हैं , अत: विधान सरलता - गाल + दो दीर्घ × 2 को ध्यान में रखकर लिखें | पदांत में  दो दीर्घ यथावत रखें 

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#मनोरम_छंद

#शास्त्रीय_मापनी - 2122 × 2 =14 मात्रा  (चार पद)

#पदांत - यगण 122  या भगण 211  से 

#विधान_सरलता - गाल+दो दीर्घ ×2 = 14 मात्रा 


शारदे वंदना 


शारदे माँ   छंद  गाऊँ |   

द्वार पर  आनंद  पाऊँ ||

दास तेरा आज आया |

भाव सुंदर  नेक लाया ||


पूजता हूँ  पुष्प   लाकर |

गीत गाता आज आकर ||

आपसे     आशीष  माँगूँ |

मैं सृजन हित मातु जागूँ ||


है   हमारा  भाव   सुंदर |

और  निष्ठावान   अंदर ||

पूजना है  आज  जानो |

द्वार पर हूँ  आप मानो ||


गणपति वंदना


देव   देवा  आप  आओ |

खूब मोदक आप पाओ ||

मंगला  है  रूप  न्यारा |

नाम गणपति है उचारा ||


आज  करता   वंदना हूँ  |

भावनाओं   से  सना  हूँ ||

पूज्य गणपति दर्श देना |

अर्घ  निष्ठा आप  लेना ||


छंद 

कौन कैसा  आदमी   है |

जान लेना क्या कमी है ||

देख ज्ञानी , पास जाना |

हर्ष रखकर , ज्ञान पाना ||


बोलता जो    ज्ञान सुंदर |

नेह उसका  है   समुंदर ||

सत्य का ही  मान होता |

झूठ मिलता  राह   रोता ||


बात  जानें  ध्यान  देना |

हो सरस तब ज्ञान  लेना ||

ज्ञान   ज्ञानी   बोलते   हैं |

कथ्य  पहले  तोलते   हैं ||


बोलता  जो    झूठ  पूरा  |

जानिए  नर  है   अधूरा ||

जो  सहारा  खोजता  है | 

बाल  अपने  नोचता  है  ||


सत्य जो भी   बोलता है |

हर्ष  घर  में  डोलता   है ||

खेद रहता  भी  नहीं   है |

लोग कहते सब सही है ||


आलसी को  कौन  जानें | 

मूर्ख  उसको लोग  मानें ||

भोग करता  और सोता |

नींद में   है  स्वप्न  बोता ||


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#मनोरम_छंद,(  मुक्तक )

#विधान_सरलता - गाल+दो दीर्घ ×2 


आज   छोड़ो  सब  बुराई |

पाट    देना    कूप   खाई |

लोग  आएँ     नेह    लेवें-

देख भी लें   , है   भलाई |


युद्ध की   है  आज  भेरी |

बोलते   सब  शान   मेरी |

रार    ठानें    खार   बाँटें - 

बोलते खल  जाति  तेरी |


देश अपना  मानते  जो |

रक्ष  करना   जानते जो |

ईश उनको दें  मदद भी -

हों सफल वह ठानते जो |


आज आए  गुरु हमारे |

बोलते हैं   बोल  प्यारे |

लोग जाते सिर झुकाते - 

मानते गुरु  हैं   सितारे |


नारियाँ  हैं आज आगे |

खिन्नता भी  दूर  भागे ||

है कदम में जोश  पूरा - 

लोग   पूरे आज जागे |

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#मनोरम_छंद,(  गीतिका) 

#विधान_सरलता - गाल+दो दीर्घ ×2 


आज मैंने   लक्ष्य  जाना |

देश का हित प्रीति माना |


देश के हम हैं  सिपाही , 

युद्ध होगा ओज ठाना  |


बाँटकर जो राह खोजे , 

है अधूरा   यह तराना |


भाषणों को  आज देखें , 

डालते   हैं  रोज  दाना |


नाम अपना लोग चाहें , 

और लूटें  अब खजाना |


चाल चलते हाल पूछें , 

वार   पूरा   है  पुराना |


कौन बोले    यह सुभाषा , 

जाँघ पर जब खुद निशाना |


सुभाष सिंघई 

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मनोरम_छंद,(  गीत  )

#विधान_सरलता - गाल+दो दीर्घ ×2 


वीरता की रख   निशानी |

धन्य करना अब जवानी ||


आज आशा   है    हमारी |

वीरता    से  अब सवारी ||

काट अरिदल रक्त लाओ  

भारती माँ  पग  धुलाओ ||


गूँज    लेवें  नव  कहानी |

धन्य करना अब जवानी ||


शौर्यता का भाल देखें  |

भारती के लाल  देखें ||

सिंह चलती चाल देखें  |

वार करने   ताल देखें  ||


हर्ष की   हो    राजधानी |

धन्य करना अब जवानी ||


आग दिल में जोश मारे |

हौंसलों के अब सितारे ||

बोलते   हैं  आज राजी |

जीतनी   है  पूर्ण बाजी ||


माँग    लेगा    शत्रु  पानी |

धन्य करना अब जवानी ||

सुभाष सिंघई

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85   पुष्पमाला  (वारातागा ) छंद ( बारह मात्रा)

विधान - (गाल - सम षटकल - लगा )

(सम षटकल = चौकल द्विकल #या द्विकल चौकल )
(दो लघु का भी  एक  द्विकल बना सकते हैं   )
(त्रिकल - त्रिकल शब्द का षटकल निषेध )
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एक और सरल विधान -
यथावत मूल ( 212 ) रगण  - रगण  के मध्य - दीर्घ या दो लघु
उदाहरण-
(रगण.    द्विकल.    रगण )
  👇.        👇.    ‌‌‌‌‌‌   👇
चाहिए    अब       राम को
देश में   घन      श्याम को |
भारती     माँ     ‌‌‌‌ बोलती -
कीजिए  अब     काम को |

यहां 🖕प्रथम रगण में-  दो एक (गाल) को एवं
अंतिम रगण में -एक दो( लगा). को तोड़ना वर्जित।

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इस तरह से भी 🖕  समझकर , लेखन कर सकते है | आपका सृजन पुष्प माला छंद  विधान में स्वत: आ जाएगा |
विधान -"गाल ~सम षटकल ~लगा "
              21.       6.              12

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   #वंदना              
मातु      मेरी   शारदे |
ज्ञान का कुछ सार दे ||
लेख में    भी  धार दे |
भक्त को कुछ प्यार दे ||

देव  गणपति  आइए  |
भोग   मोदक  पाइए  ||
सिद्धि  का   वरदान दें |
रिद्धि  का यश गान दें ||

#विधान
पुष्प    माला छंद   है |
लेख   में   आनंद   है |
गाल षटकल है लगा |
भाव सुंदर लो   जगा ||

पुष्प माला  छंद  में |
भाव हों  आनंद में ||
लेखनी जब घूमती |
गीत का दर चूमती ||

#छंद
गीत रचकर गाइए |
प्रीत  सुंदर  पाइए ||
लोग सुनते भाव से |
झूमते  हैं  नाव से ||

आज भारत  देश में |
चोर  हर परिवेश  में ||
बोलते हम   पाक हैं |
लूटने    चालाक   हैं ||

आज जिनकी धाक है
शर्म  छोड़ी   नाक  है ||
लूट‌  लें   वह  सामने  |
मित्र बनकर  वह घने ||

कौन    जानेगा  यहाँ |
दौर कैसा   था   वहाँ ||
पोल उनकी है खुली |
काम में थी चुलबुली ||

मान   अब  टूटा  यहाँ
गान   खंडित है   वहाँ
बोल जब कटुता  भरे |
ज्ञान भी तब क्या करे ||

बोलते   हैं  जो  सही |
टालते  उनकी  कही |
कौन किसका है यहाँ |
खोज आया मैं जहाँ ||

लोग जो  हुश्यार  हैं |
वे  बने   तलवार  हैं।|
विश्व का उपहार है |
दीन अब लाचार है |।

श्वान के स्वर से जगे |
काग अब  गाने  लगे ||
तान कोयल सुन रही |
जाल मछली बुन रही ||

लोमड़ी   दीवान    है |
श्वान  भी  सुल्तान  है ||
न्याय बोली   बंद   है |
तोड़   डाला   छंद  है |

गीदड़ों  के यार जो  |
बोल से  बेकार जो ||
आज   तानाशाह हैं |
बोलते  खुद वाह हैं ||
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#मुक्तक

बात  पूरी  जानिए |
रार सम्मुख ठानिए |
पीठ पीछे  चुप  रहो -
श्रेष्ठ निज को मानिए ||

नेह का प्रतिमान हो |
रीति का भी गान हो |
देखने  में  शुभ लगे  -
मित्रता   उत्थान  हो |

चोर  करते  चोरियाँ |
दुष्ट     बाँटें   दूरियाँ |
सत्य रहता है अड़ा -
दूर हों   मजबूरियाँ |

छंद नव अब आ रहे |
लेखनी   से गा   रहे |
मित्र क्यों नाराज हों-
छोड़कर जो जा रहे |

ज्ञान भी अभिशाप दे  |
क्रोध का वह ताप दे |
बोल कड़वे हो  उठें -
भाव में  भी  पाप दे |
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#गीतिका

मित्र भी उपहार से |
लूटता है  प्यार से |

देखते  उसकी अदा  ,
छीनता  तकरार  से |

काम उसके अटपटे ,
डाल जादू   भार से |

बोलता है पर खरा ,
नेह की रस धार से |

मैं "सुभाषा" मानता ,
मित्रता की मार से |
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#गीत

गाँठ मन की खोलिए |
हिंद की जय बोलिए ||

आपसी तज द्वेषता |
भूल जाएँ हम खता ||
ताल भी अब एक हो |
काज भी सब नेक हो |

बैर को   मत तोलिए |
हिंद की जय बोलिए ||

हिन्दु मुस्लिम एकता |
विश्व में  सबको बता ||
कर्म   से   दें   सूचना |
द्वेषता है  अब   मना ||

नेह का  रस   घोलिए |
हिंद की जय बोलिए ||

सत्य का अब गान हो |
राष्ट्र ध्वज का मान हो ||
धर्म का  रस पान  हो |
कर्म  में  भी शान हो ||

भाव   सुंदर  डोलिए |
हिंद की जय बोलिए ||

सुभाष सिंघई
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#गीतिका

ईश घर  जाने लगे |
गीत हम गाने  लगे |

छोड़ दी है खिन्नता ,
यार अब आने लगे |

रात में  जो रुष्ट   थे ,
प्रात  मुस्काने  लगे |

भूल कर पूरी खता,
लोग  दीवाने   लगे |

जो 'सुभाषा' से जले ,
ताप  खुद  खाने लगे |

सुभाष सिंघई
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मुक्तक‌( पुष्प माला छंद )

(गाल+ सम षटकल+ लगा =12 मात्रा)


हाल   यह इंसान  के |

गीत वह  भगवान के |

स्वार्थ में   ही गाएगा - 

अन्यथा हट  जाएगा |


चोर के घर चोर है  |

गीदड़ो  का शोर है |

कर्ण बोलें चुप रहो -

आज उनका जोर है |


तोड़ते कमजोर को |

जोड़ते धन वीर को |

सर्प डसकर बोलता-

दोष पूरा    मोर को |


बोलती आबाज को |

दौड़ते भी काज को |

रोक  नेता   बोलते - 

देख मेरे  ताज को |


दर्प भी जब पास हो |

गर्व का अहसास हो |

बोल में हम क्या कहें -

दुष्ट भी जब खास हो |


राम के  भी राज  में |

विध्न आए काज में |

छोड़ माता जानकी - 

हर्ष  खोया ताज में ||


मामला जब गर्म है |

कौन रखता शर्म है |

रार ही सब ठानते - 

बोलते  यह  कर्म है |


हिंद में   जो लोग हैं |

जानते शुभ योग हैं |

धर्म की है  नीतियाँ - 

पास में  पर रोग है |


आप बीती   बोलिए |

दर्द  अपना खोलिए |

दूसरे   भी  सीख  लें -

भाव अपने  तोलिए | 


गीत हम भी  गा  रहे |

नीतियाँ  शुभ ला रहे |

देखते   पर    भावना - 

पाप   करने जा   रहे |


राम   के   बजरंग   हैं |

वीरता    के  अंग   हैं |

स्वर्ण की लंका जली -

देख के  सब  दंग  हैं |


~~~`~~

( पुष्पमाला छंद )

(गाल+ सम षटकल+ लगा =12 मात्रा)


गीतिका 


आज दुनिया  जान ले  |

हिंद   को   पहचान ले  |  


कर्म  भी  सब श्रेष्ठ हैं  , 

धर्म  का   संज्ञान  ले |


लोग   पाते   पूर्णता , 

भाव  का भी गान ले |


गंग भी बहती यहाँ , 

पाप भी अवसान ले |


धाम है  हर  कोण में , 

पुण्य का जन दान ले |


बोलते जय  देव की, 

आसरा   भगवान ले |


है 'सुभाषा'  मान भी , 

हिंद की शुभ आन ले |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~~~~~~~

 पुष्पमाला छंद )

(गाल+ सम षटकल+ लगा =12 मात्रा)

गीतिका 


लूटते     हैं  शोर  से  |

साजिशों की  डोर से  |


कत्ल   होती भावना , 

आज भी हर ओर‌ से  |‌  


छीन   नेता   ले  गए , 

माल भी  कुछ जोर से |


रात   बीती   जागते , 

सो गए सब   भोर से |


मध्य को जब  ले बचा  , 

लूट   होती   छोर  से |


दुश्मनी   में    टूटते 

मौन रहते   ढोर से |


हो सुभाषा जब खुशी , 

नाचते  तब   मोर  से |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~~


( पुष्पमाला छंद )गीतिका

(गाल+ सम षटकल+ लगा =12 मात्रा)


आज दुनिया  जान ले  |

हिंद   को   पहचान ले  |  


कर्म  भी  सब श्रेष्ठ हैं  , 

धर्म  का   संज्ञान  ले |


लोग   पाते   पूर्णता , 

भाव  का भी गान ले |


गंग भी बहती यहाँ , 

पाप भी अवसान ले |


धाम है  हर  कोण में , 

पुण्य का जन दान ले |


बोलते जय  देव की, 

आसरा   भगवान ले |


है 'सुभाषा'  मान भी , 

हिंद की शुभ आन ले |


सुभाष सिंघई


~~~~~~~~~~~

पुष्प माला छंद  (मुक्तक )√

गाल - समकल - लगा 


आज टेड़ी बात   से |

और चलती घात से |

मान जाता  आदमी - 

कष्ट की  सौगात‌ से |


प्रेम से जब  बोलते |

ताप-सा वह खोलते |

पालते है  जो  बला- 

पैर  नाहक  डोलते |


है    सुभाषा   बोलता |

राज भी कुछ खोलता |

घूमते    तकलीफ  में- 

फालतू   जो डोलता |


जानकर  अंजान हैं | 

मूँछ  बिन  दीवान हैं |

रूठना जो  जानते -

खोटियाँ श्रीमान  हैं |


राज में   अब   गोटियाँ |

छीनती   है     रोटियाँ |

दीनता को भी  जला - 

हों खड़ीं अब कोठियाँ |


सुभाष सिंघई


~~~~~~~~~~~


पुष्प माला छंद ( मुक्तक)√

गाल - सम षटकल - लगा 


सूर्य भी कब ठंड  दे |

चंद्र   ताप  प्रचंड दे |

आदमी जैसा  जहाँ -

भाव का ही खंड दे |


नीर भी  जलता  नहीं |

पीर सुख ढलता नहीं |

वेग धीरज  कब रखे -

ज्ञान कर मलता नहीं |

(कर =हाथ )


हाथ में  तलवार   हो |

सामने   प्रतिकार हो |

ज्ञान  सुनता कौन है -

क्रोध जब अंगार  हो |


जीभ भी जब बोल दे |

राज    पूरा  खोल  दे |

फैल जाती   बात  है - 

सामने  सब  तोल दे |


सुभाष सिंघई


पुष्पमाला छंद √

गाल - सम षटकल- लगा 


गीत गाता  मैं   चला |

सोचकर  सबका भला |


लोग मिलते राह में , 

देखते हम भी  कला |


ज्ञान सब ही  थोपते , 

भोग वह बाँटें जला |


डालते  हैं   डोर को , 

टालते ‌ अपनी बला |


बैठ जाते हम जहाँ , 

दौड़ कर पकड़े गला |


राह पूँछे  एक   से , 

दें अनेकों तब सला |


है   सुभाषा  मार्ग में , 

झूठ ने  हमको छला |


बादलों ने कह दिया 

घोर संकट कब टला |


मैं बना  बहरा   यहाँ , 

कर्ण सबने तब मला | 

सुभाष सिंघई

पुष्प माला छंद 

गाल - सम षटकल - लगा 


पुण्य जड़‌ ऊपर मिले |

पाप जड़  नीचे   हिले |

लोभ  जड़ पहचानिए - 

डाक्टरों के घर खिले |


कीट खाकर छिपकली |

राम   घर  बनती भली |

सोचती   मंदिर   यहाँ- 

पाप  धुलकर हों बली |


लूटकर  जो  दान दे  |

मंच  भी सम्मान  दे  |

सोचते   वह  मैं बड़ा - 

मोक्ष भी अब शान दे |


जा रही हज बिल्लियाँ |

छूट   जाएँ     इल्लियाँ 

मूषकों का वध  किया - 

माफ हो सब गिल्लियाँ |

सुभाष सिंघई


पुष्प माला छंद

गाल - सम षटकल- लगा 


गीत लेखन नव करो |

भावना भी शुभ भरो |


लोग जलते  जा  रहे , 

ताप सबका अब हरो |


कामनाएँ     फैलती , 

पाप से  लेकिन  डरो |


आसरा क्यों खोजते , 

शीष प्रभु के दर धरो |


मानिए  दुनिया  नहीं , 

है यहाँ  जीना   मरो |


हाथ क्यों  फैला  रहे , 

राम के पद  में  तरो |


है सुभाषा जव नशा ,

देश हित जीवन झरो |


सुभाष सिंघई


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86 #सत्रह मात्रा  का ,चतुष्पदी सममात्रिक छंद

हिंदी में - #रगण ध्रुवक_छंद  ( प्राकृत में - #विद्युत_छंद कहते हैं )

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )


#तीन_चौकल का लेखन  गणन #विशेष ध्यान से लिखें 

राम ह+मारे जग में ✅  || पदांत रगण👉 पूज्य है ✅/ जानिए ✅

राम दे+खते ❎ जग में 

#विशेष सरल मापनी 👇👇

 22 22 22 212 वाचिक अथवा वर्णिक


छंद   महल में  शारद  आइए |

आप दया शुभ अपनी लाइए ||

वंदन भी माँ अब  स्वीकारिए |

सेवक सब शरणागत तारिए ||


विनती करने  गणपति द्वार हूँ |

लाया छंद    महल उपहार हूँ ||

सिद्धि सजेगी अब हर काज में ||

रिद्धि  मिलेगी  हर  परवाज में |


छंद ध्रुवक को तत्पर जब दिखें |

त्रय चौकल ही पहले तब लिखें  ||

रगण पदांत   रहे  बस ध्यान हो |

चार पदों का  लिखना ज्ञान  हो ||


भारत को अब सुंदर लेखना |

अपनेपन  से   पूर्ण   देखना ||

वंदन  भारत    करने  आइए |

जन गण मन की गीता गाइए ||


सत्य सदा ही रहता जीत में |

राह  बताए  सुंदर  प्रीत  में ||

नूतनता  है  आती   कर्म से |

कार्य सभी हो अनुपम धर्म से ||


यश पाते हैं सज्जन कर्म से |

कर्म करेंगे जब वह  धर्म से ||

आकर  दुर्जन खोटी खोट दें |

करके ऊधम दिल पर चोट दें ||


सुभाष सिंघई 

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रगण ध्रुवक ( विद्युत ) छंद 

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )

#मुक्तक 


लोग  जमाना  आकर कोसते |

काम नहीं कुछ करना सोचते ||

चाल बनाकर खोटी  चुप रहें - 

अवसर पाकर दुनिया नोंचते |


राम कहें जब श्री हनुमान से |

लंका जाना उड़कर ध्यान से |

तुम बलशाली जग में वीर हो - 

सफल करो सब अपने ज्ञान से |


रास रचे जब  आए  राधिका |

बनती आकर  सुंदर नायिका |

सखियाँ कहतीं राधा धन्य तू -

वह योगीश्वर है तू  साधिका |


कैलाशी शिव कुछ स्वीकारते |

श्री  गंगा को   सिर पर धारते |

जग कल्याणी बन  संसार में - 

भागीरथ   के   वंशज  तारते |


मिलना होता   रिश्तेदार  से |

आव-भगत ‌हो सुंदर प्यार से |

लेना   देना   रुपया  पास हो - 

रिश्ते टूटे    तब  तकरार से |


सुभाष सिंघई 

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रगण ध्रुवक ( विद्युत ) छंद 

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )

#गीतिका 


जो भी प्रीत निभाना जानते |

दुनिया में सज्जन पहचानते |


बात करेंगे   मीठे  स्वाद की, 

सार प्रथम वह आकर छानते |


बनते गुण अवगुण के  पारखी ,

तथ्य  सही   वह  पूरे   मानते |


चलना जानें  राहें  सत्य की , 

लक्ष्य हमेशा   पाना   ठानते |


करते निकट 'सुभाषा' दूरियाँ , 

बात समझने   डोरी   तानते |


सुभाष सिंघई

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86-रगण  ध्रुवक ( विद्युत ) छंद 

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )

गीतिका  समांत स्वर आना , पदांत‌- चाहिए 


बंदे     भारत   गाना   चाहिए |

भाव सरल शुभ आना चाहिए |


घात करे जब दुश्मन  पीठ में , 

तब पहले  निपटाना  चाहिए |


देश सदा ही  पहले ही  रखें , 

सबको सत्य बताना चाहिए |


कभी नहीं हम माने आपदा , 

विजय हमेशा पाना चाहिए |


डरकर कर लेते  जो दूरियाँ , 

उनको तब समझाना चाहिए |


जिनकी वाणी  खोटी बोलती , 

उसको    सदा डराना चाहिए |


अमन रहे  अब  अपने देश में , 

सबको फर्ज  निभाना चाहिए |


सुभाष सिंघई

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रगण ध्रुवक ( विद्युत ) छंद 

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )

#गीत 


चलते रहना पथ पर  ध्यान से |

करते जाना शुभ पथ ज्ञान से ||


दुनिया है मतलब की मानिए |

अपना और  पराया जानिए ||

पग- पग पर हैं  काँटे देखिए | 

संकट पैदा   करते  लेखिए ||


राहों पर मत चल अनुमान से |

करते जाना शुभ पथ ज्ञान से ||


लोग मिलेंगे तुमको राह में |

बात करेंगे स्वारथ  चाह में ||

धोखा देने   पहले   यार हों |

अवसर पाते वह तलवार हों ||


हलचल सुनना उनकी कान से |

करते जाना शुभ पथ ज्ञान से ||


लेना   देना  क्या    संसार  से  |

हरिहर भजना सीखो प्यार से ||

भव सागर में खुद को तार लो |

अपना बेड़ा प्रभु   के द्वार लो ||


घन्य बनो खुद  प्रभुरस पान से |

करते जाना शुभ   पथ ज्ञान से ||


सुभाष सिंघई


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रगण ध्रुवक ( विद्युत ) छंद 

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )

गीत 

देख परख  से कुछ अनुमान कर |

दुनिया में   आकर  पहचान  कर |


मुख से  राम रटेंगे  चोर भी |

लूट करेंगे वह  हर ओर भी ||

बगुले पहनें चोला  राम का |

घात लगाना सीखें दाम का ||


ऐसे   मिलते चादर   तानकर |

दुनिया में आकर पहचान  कर |


छंदों के जग  में  सरदार  है |

छंद    चुराने   में  हुश्यार हैं ||

पीड़ित इनसे तुलसीदास हैं |

कौन सुनेगा इनकी भाष है ||


चोर  उजागर  करना ठानकर |

दुनिया में आकर पहचान कर ||


बने मदारी   बोलें  जोर से |

और जमूरे भी हर ओर से ||

वाह गुरू जी सुंदर लेखनी |

ऐसे ही अब आगे  देखनी ||


शर्म हया छोड़ी ज्यों  दान कर |

दुनिया में आकर पहचान कर ||

सुभाष सिंघई 

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रगण ध्रुवक ( विद्युत ) छंद 

मापनी - तीन चौकल+ रगण ( यथावत या वाचिक )

गीत 

संतानों  की  रखता  थाप   है |

उसको दुनिया कहती बाप है ||


गेह   चुनौती  जो  स्वीकार्यता |

पूरण करता सब अनिवार्यता ||

संकट सबके  सिर पर धारता |

खुद की अभिलाषा को मारता ||


पीड़ा सहता  जो चुप चाप है |

उसको दुनिया कहती बाप है ||


कपड़े किसको लाना याद है |

सबको   देता आशीर्वाद   है ||

सबकी चिन्ता से भी युक्त है |

पर अपनी को रखता मुक्त है ||


देता घर   खुशयाली  छाप है |

उसको दुनिया कहती बाप है ||


बीमारी  ‌ सबकी  पहचान ले |

और निदानी   बन संज्ञान ले ||

रखता सबका भी अनुमान है |

देता सबको  आकर  ज्ञान है ||


देता ज्ञान   पिपासा   ताप  है |

उसको दुनिया कहती बाप है ||


त्रुटियों को भी  करता दूर है |

खुशियों का झोला भरपूर है |

सबको माने  घर का नूर है |

कंटक भी वह काटे शूर है ||


करता सबके   दूर विलाप  है |

उसको दुनिया कहती बाप है ||

सुभाष सिंघई 

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हास्य व्यंग्य मुक्तक

गा सकते तब गाना चाहिए |

यार  बुलाए   जाना चाहिए |

कोई   पूछे  पता   तुम्हारा - 

दूरी  तब  बतलाना चाहिए | 🥰🙏


सुनते   राज प्रजा का गान  है |

पश्चिम से निकला रवि भान है |

कल तक करता था जो  चोरियाँ - 

नेता बनकर  वह  श्री मान  है | 🙄


सूँघ चला घटना थल श्वान है |

दोड़ा तब  जनता   हैरान   है |

थाने में वह घुसकर फर्ज से - 

पकड़ लिया आकर दीवान है |😴

सुभाष सिंघई जतारा

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87-#प्रणव_छंद.     (वर्णिक,  पंक्ति जाति ) 

गण गणन 👉-मगण नगण यगण गुरु 

222. 111 122  2 = दस वर्ण  ( वाचिक करना निषेध है)

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#प्रणव_छंद का #सरल_विधान✅✅


#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु = 10 वर्ण ✅


लेखन  में 10 वर्ण में 5  , 5 पर यति चिह्न लगा सकते है 

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यह पावन छंद है , प्रणव का अर्थ 'ॐ' (ओम) या 'ओंकार' है, जो सबसे पवित्र शब्द और ब्रह्मांडीय ध्वनि मानी जाती है।

प्राकृत में इसे ओंकार छंद कहा जाता है 

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#प्रणव_छंद 

#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु = 10 वर्ण 


आए  पूजन  करने   माता |

छंदों का शुभ बनने  ज्ञाता ||

जो भी आकर रखते नाते |

ज्ञानी ही वह बनके जाते ||


हे   मेरे  गणपति  जू   देवा |

स्वीकारो मम विनती  सेवा ||

हिंदी भी अब यश को पाए |

छंदों में  सरगम भी  आए ||


ब्रह्मा छंद प्रणव  होता   है |

देखा विष्णु चरण धोता ‌है ||

ओंकारी शिव मिल जाते हैं |

देवों   की  पद  रज पाते हैं ||


होते  तीन गुरु  सुहाने जी  |

आगे चार लघु बखाने जी ||

पीछे भी त्रय‌  गुरु आते है |

गाने को छंद प्रणव पाते है |


क्या है जो  महक रही लाली |

छाई  है  नभ   पर   दीवाली ||

झूमे  सुंदर   तरु  की  डाली |

कूके कोयल सुर की  ताली ||


जाते हैं   कुछ  करने  आगे |

साथी भी तब मिलते जागे ||

धागे से सब  जुड़  जाते हैं |

रस्सी ही  बनकर आते  हैं ||


मेरी है कुछ  सबसे  आशा |

छंदों का यह घर हो खाशा ||

सीखें और सृजन को लाएँ |

मित्रों से  परिचय भी पाँए ||


सोया जीवन जिनका होता |

पा खालीपन   रहता  रोता ||

लेटे   बिस्तर   सपने  बोता |

भारी पत्थर मन से   ढोता ||


संदेशा शुभ जब  भी आए |

बागों-सा मन खिलता जाए |

पूछें   आकर घर  की नारी |

क्या मेरी अब  इसमें पारी ||


हारा  हूँ  पर  कब   मैं  टूटा |

खाई  ठोकर कब  मैं फूटा ||

जीता भी जब रण था प्यारा |

नीची  ही  गरदन  स्वीकारा ||


हारा  हूँ  पर  उससे  सीखा |

धोखे का रुदन नहीं चीखा ||

धोखा खाकर  सबसे बोला |

मानी है त्रुटि खुद को तोला ||


सुभाष सिंघई 

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#प्रणव_छंद_मुक्तक 

#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु = 10 वर्ण 


दीवाना जब कुछ गाता है |

पीड़ा का वह मन लाता है |

रंगों की शुभ दुनिया देखी -

ओंठों से वह   दुहराता है |


नेता भी ‌कुछ रहते आली |

बोले भाषण बजती ताली |

चिंता भी कुछ करते देखे -

देखा है पर उनको खाली |


पाते जीवन सुख के झूले |

संसारी  बन   रहते  भूले |

बूड़े   होकर  करते चिंता - 

आड़े होकर झुकते कूल्हे |


पाती प्रीतम भिजवाता है |

बैचेनी वह लिख जाता है |

पाती भी पढ़कर मुस्काती - 

गोरी का दिल खिल आता है |


आया मौसम अलबेला  है |

जानू भी यह कुछ मेला है ||

बागों  की अब अमराई  में |

यारों का नटखट खेला है ||


मेरे ही  निज अपने  रुठे |

मर्यादा  तजकर  हैं  टूटे |

जोड़े बाहर कुछ है साथी-

माने भी सब उनको झूठे |


रिश्ते चाहत खुद हैं पाते |

जोड़ें भी  रहकर ये नाते |

भारी संकट जब भी देखें -

हाथों को वह पहले लाते |


सुभाष सिंघई


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#प्रणव_छंद_गीतिका

#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु = 10 वर्ण 


ऊँचा ही अब स्वर लाना है |

बंदे    भारत  जय  गाना है |


पापी पाक दमन से माने , 

सीमाओं पर निपटाना है |


मौका  पाकर  फटकारेंगे , 

हस्ती भी सहज दिखाना है |


सोचा है अब सबने पक्का , 

झूठे  को अब  लुटवाना है ,


देखी है कुछ अब गद्दारी , 

पाकी से सरल निभाना है |


घेरा भी उन  पर  डालेंगे , 

ठोकेंगे हम यह ठाना है |


दीवाने हम  अलबेले है , 

शाही भारत कर जाना है |


सुभाष सिंघई 

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#प्रणव_छंद_गीत

#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु = 10 वर्ण 


आए  भारत  अवतारी  हैं |

जाना भी सब उपकारी हैं  ||


सीता-राम जगत   आए  हैं |

पापी भी तब मिट  पाए  हैं  ||

कृष्णा भी शुभ अवतारी हैं  |

जो गोवर्धन  गिरिधारी   हैं ||


भोले  शंकर   त्रिपुरारी  हैं |

जाना भी सब उपकारी हैं ||


गंगा माँ शुचिकर आती  हैं |

पापी तारण कर  जाती है ||

जो प्राणी झुककर आया है |

देखा है सब  उसने पाया है |


श्री नारायण  यश जारी हैं |

जाना भी सब उपकारी हैं ||


कैलाशी हरिहर माना  है |

पीना मंथन विष ठाना है ||

देवा है सकल हमारे जो -

ऊँचा है पद कद जाना है |


भोले शंकर सबसे भारी हैं |

जाना भी सब उपकारी हैं ||


#प्रणव_छंद. ( 10 वर्ण  )  गण :- 

मगण नगण यगण दीर्घ )  

    #मुक्तक 

( #सरल_विधान -#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु )


जो सोया  वह जग जाता है |

चुप्पी  में  नर   भरमाता  है |

आँखों को ढककर जो जागे-

सच्चों को वह झुठलाता  है |


चंदा  सूरज पथ गामी है |

गंगे पावन  यश नामी है |

लेता   मानव चतुराई  से - 

देता लाकर निज खामी है |


पेडों में   बरगद  माना है |

देवा पीपल शुभ जाना है |

होते जंगल मन मोही भी - 

गाते मंगल  शुभ गाना है |


सुभाष सिंघई


#प्रणव_छंद. ( 10 वर्ण  ) गण -म न य दीर्घ )  (वाचिक निषेध )

( #सरल_विधान -#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु )


गीतिका


जाना है पर   कुछ गाना है |

आगे का पथ अब ठाना है |


गाया   है  बनकर   दीवाना , 

सांँसों में अब  हरि लाना है |


दूजों की  सरगम  को देखा, 

आगे का निज स्वर पाना है |


आली  है हम बलशाली थे ,

लेखा सम्मुख अब आना है |


गाना  भी अमर रहेगा जी ,

ये   आवागमन पुराना  है |


बूँदें  जीवन  जल की फूटें , 

ऐसा ही अब समझाना है |


खेला तो सहज "सुभाषा"है,

बल्ले से  विजय बनाना  है |


सुभाष सिंघई


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#प्रणव_छंद. ( 10 वर्ण  )

( #सरल_विधान -#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु )


डोली दुल्हन घर से  जाती |  

रोती माँ तब पकड़े  छाती ||

यादों की  नम बहती  धारा |

बेटी जो   हरपल थी तारा ||


राही  भी कब अनजाना है |

चंदा  सूरज   पहचाना   है ||

बोला भी तब  करते ज्ञानी | 

मर्यादा  यह  रखते  सानी ||


गीता को जब पढ़ डाला है |

क्या पाया  सरल उजाला है ||?

या अंधे   बन  बहरे    लाए |

सोए या   जगकर भी आए ||


रोते  हैं   अब जग    में  नाते |

धोखा भी निज जन से खाते ||

घातें भी  अब   गहरीं   होती |

मर्यादा  खुलकर  ही   रोती ||√


सुभाष सिंघई 

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#प्रणव_छंद. ( 10 वर्ण  ) ।‌(वाचिक करना निषेध है)

( #सरल_विधान -#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु )

#गीतिका 

पाया  भी जग अलबेला है |

 देखा  सात दिवस मेला  है |


डूबा  है   दलदल    में  पूरा  , 

जाना भी  यह तन  ढेला  है |


छाते हैं  अब छल के  घेरे   , 

चोरी  में गुरु   सँग चेला  है |


रूठे हैं  परिजन  भागें भी 

दौड़ाते  सरपट  ठेला है |


संसारी  नर कब   जानेगा 

जाने  को निपट अकेला है |


पाया जीवन जब जाएगा , 

जानेंगे  जग यह   रेला है |


सीखेगा हुनर "सुभाषा" भी, 

अंधा आकर जब  खेला है |


सुभाष सिंघई

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#प्रणव_छंद. ( 10 वर्ण  )(गण -म न य दीर्घ )  (वाचिक निषेध )

( #सरल_विधान -#तीन_गुरु , #चार_लघु , #तीन_गुरु )

#गीत 


धोखा देकर   रखते  नाते |

रिश्तेदार  गजब  हैं  आते ||


आते हैं  अब अजमाने को |

पूरा ही सब  खुद पाने  को ||

माया के छल  बुनते  जाले |

मक्कारी पल दिखते काले ||


बाजी को जब पलटा पाते |

रिश्तेदार  गजब  हैं  आते ||


गाथाएँ  नित नव आ जाती |

कुंठाएँ  तब  दलतीं   छाती ||

कोई भी   तब  बनता नूरा |

बोले भी हम   अब हैं शूरा ||


उल्टे आकर  तम हैं छाते  |

रिश्तेदार  गजब  हैं आते ||


झूठों का चमन "सुभाषा" है |

सच्चों का कथन निराशा है ||

लाठी के   दमखम धारी  हैं |

देखे   भी मतलब कारी  हैं ||


पाएँ  मौसम तब ही खाते |

रिश्तेदार  गजब  हैं  आते ||

सुभाष सिंघई

प्रणव छंद गीतिका 

तीन दीर्घ ,  चार लघु , तीन दीर्घ 


हे मोबाइल कुल  के देवा |

तेरी  मैं प्रतिदिन  लूँ सेवा |


मेरी आदत तुम भी जानो ,

पूरे  नेट  हरण   के लेवा |


चर्चा से     हम सब हर्षाएँ , 

रिश्तों के गतिमय  हो खेवा |


हर्षा  है अब जग   तेरे से  , 

लोगों के नद  मन हो रेवा |


माना है अब तुमको राजा , 

मीठे  हो चलकर के  मेवा |


डाटा भी जब चट हो जाता , 

खाली भी तब करते  जेवा |


तेरी तो अब शुभ पूजा हो , 

पाते भी  हर घर जो ठेवा |( ठहरना)


सुभाष सिंघई


सुभाष सिंघई एम. ए़. ( हिंदी साहित्य दर्शन शास्त्र ) 

पूर्व भाषानुदेशक आई टी आई 

जतारा ( टीकमगढ़) म०प्र०

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88- #मदलेखा_छंद- 

#सरल_विधान - #तीन_दीर्घ  - #दो_लघु - #दो_दीर्घ 

और सरलता-      गागा   गालल  गागा = 7 वर्ण 

                       ( माता   शारद आओ )

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गण गणन - मगण सगण गुरु ( सात वर्ण ) 

                  222. 112. 2 = ( वाचिक करना निषेध ).

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#शारदे_वंदना 


माता   शारद आओ |

वीणा आज बजाओ ||

पूजूँ   माँ   दर  तेरा |

योगी  है   मन  मेरा ||


#गणपति_वंदना 


गौरी के सुत  आना |

गाऊँ   मंगल  गाना ||

तेरी    सुंदर   माया |

है   लम्बोदर  काया ||


#छंद_विधान 


मैंनें     सुंदर   देखा |

छंदों में  #मदलेखा ||

गागा गालल गागा |

मेरा  लेखन जागा ||


#मदलेखा_छंद- 

#सरल_विधान - 

#तीन_दीर्घ  - #दो_लघु - #दो_दीर्घ 


होते   बालक कच्चे |

बोली से शुभ सच्चे ||

आगे जो  चलते  हैं |

माया में  ढलते  हैं ||


बच्चे भी   सब  न्यारे |

होते   हैं    शुभ  तारे ||

अच्छा जो सिखलाता  |

वैसा  ही  ढल  जाता ||


देते   दीप   उजाला |

भागे भी तम काला ||

पाते भी हित आला |

जाने   है  रखवाला ||


प्राणी की रुचि बोती |

वाणी भी सच होती ||

होते  जो अभिमानी | 

रोते  हैं  वह  ज्ञानी  ||


माता भारत मानो |

सच्चे से पहचानो |

चाहें जो हम पाना |

वंदे भारत  गाना ||


देवी माँ घर आओ |

मेरा मान  बढ़ाओ ||

माता तू  शुभकारी |

लीलाएँ सब न्यारी ||


सोचेँ भी  बजरंगी |

लंका में  यह संगी ||

बोले  राम  सुहाना |

देगा ठोर ठिकाना ||


सुभाष सिंघई 

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#मदलेखा_छंद- #मुक्तक

#सरल_विधान - 

#तीन_दीर्घ  - #दो_लघु - #दो_दीर्घ 


सोचा भी मिलना  है |

शब्दों को सिलना है |

गाथाएँ     अवतारी -   

छंदो में  लिखना  है |


है   रामायण आला |

गंथ्रो की शुभ माला |

पूजें  भारत   वासी - 

खोलें जो मन ताला |


जो लाए  शुभ गाना |

गाए   राम   सुहाना |

पा जाता वह अच्छा -

जानेगा  प्रभु  पाना |


होनी   होकर  माने |

देखे भी जग  जाने |

होनी भी अनहोनी -

पूरी    होकर ठाने |


संसारी  यह   माया |

देखी है निज काया |

चारों ओर    अँधेरा - 

खोजेगा पर छाया |


सुभाष सिंघई 

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मदलेखा_छंद- #गीतिका 

#सरल_विधान - 

#तीन_दीर्घ  - #दो_लघु - #दो_दीर्घ

समांत स्वर ई , पदांत दुनिया है 


भोली भी दुनिया है |

गोली सी  दुनिया है |


जो भी   ईश्वर  माने 

भक्तों की दुनिया है |


जाना भी यह सच्चा ,

ये रूठी   दुनिया है |


पाँसा ही जब उल्टा , 

हारेगी   दुनिया   है | 


बोली ही अब  काँटा , 

ये  मैली   दुनिया  है |


सुभाष सिंघई

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मदलेखा_छंद- #गीत 

#सरल_विधान - 

#तीन_दीर्घ  - #दो_लघु - #दो_दीर्घ


दंगा दरभंगा नंगा जंगा रंगा पंगा भिखमंगा 


पाया है मन  चंगा |

गीतों की सुन गंगा ||


देखे    हैं  नभ तारे |

जानें भी  हम प्यारे |

चंदा भी जब आता |

नाचें भी  हरषाता ||


पीला   सूरज  रंगा |

गीतों की सुन गंगा ||


पाई  आदत सच्ची |

खोई है सब कच्ची ||

पाया है  तन  योगी |

भागा है मन  रोगी ||


भागा भी  अड़बंगा |

गीतों की सुन गंगा ||


जाते  हैं  जब आगे |

काला भी तम भागे ||

देखे    सूरज  बंदा |

तारे  हो शुभ  चंदा ||


दूरी लें  सब   पंगा |

गीतों की सुन गंगा ||

सुभाष सिंघई

सममात्रिक छंद - दुर्दर छंद   4 5 5 4 +लगा  (12)= 21 मात्रा 

शीर्षक - अनुभूतियाँ ( गीत ) 


दिखती कर्म की राह में जब खूबियाँ |

करती सोच की परीक्षा  अनुभूतियाँ ||


गहरा    अहसास   संवेदनाएँ  रहें  |

खट्टे मिष्ठ की जहाँ   सरिताएँ बहें ||

राही सीखकर गान से  आगे  चले |

अपने कर्तव्य से कर्म पथ में  ढले ||


प्रशस्त मार्ग में शुभ लाभ की पूँजियाँ  

करती सोच की परीक्षा   अनुभूतियाँ ||


हर्षित राह में  कष्ट के  कंटक  खिलें |  

परिजन गेह के दुश्मनों के घर  मिलें || 

कटुता  द्वेषता  देखते भय  के किले | 

करते  उपेक्षा बोलते   अपने   गिले || 


बिखरी मिलेगी  राह  कोड़ी  फूटियाँ |

करती सोच की परीक्षा अनुभूतियाँ ||


देखो  जब कभी कर्म भी मरता रहे |

जोड़ा  संगठन बिखरता ‌ डरता रहे ||

मिलता त्रास है तब पीर भी  सामने |

करते सहन  हैं यह  वीर भी सामने ||


घिसने लगें  जब पैर की भी जूतियाँ |

करती सोच की परीक्षा  अनुभूतियाँ ||


सुभाष सिंघई     (224 )

~~~~~~~~

प्रतिष्ठा जाति का वर्णिक छंद
90 महारंगी छंद
रगण गुरु रगण गुरु  (8 वर्ण )

शारदे    माता  जहाँ  हैं |
नेह   के नाते   वहाँ   हैं ||
गीत   गाता  भाव  से हूँ |
हर्ष    लाता  चाव  से हूँ ||

मातु    वीणा  वादिनी  हैं |
लेखकों की   साधिनी  है ||
काव्य की श्री स्वामिनी है |
आरुढ़ी    हंसासिनी    है ||

पूजते    हैं  राम  जी  को |
राधिका के श्याम जी को |
योगिनी  श्री  राधिका  हैं |
और  सीता  साधिका हैं  ||

वीरता  को   श्रेष्ठ  मानो |
देश का भी  मान जानो ||
तोड़   देंगे  दुश्मनों   को |
लक्ष्य  साधो  युद्ध ठानो ||

देवता   हैं  आज  नेता |
सर्प जानो   हैं  गणेता ||
शुद्ध   खादी  धारते हैं |
दंश    देते   मारते   हैं ||

बोलना है   बोल  देना |
राज पूरा   खोल देना ||
सार आना शर्त  मानो |
लक्ष्य पाना काम ठानो ||

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महारंगी छंद ( वर्णिक)  #मुक्तक
रगण गुरु  ,रगण गुरु  (8 वर्ण )

आपसी में  रार  लाते |
बाँटने को  बैठ  जाते |
बाँटते   हैं  दाल  जूते -
और देखा  लोग खाते |

आपसी भी तोड़ते  है‌ं |
मित्रता  भी छोड़ते हैं |
त्याग  गंगा  गंद  पाते-
सत्य को जो मोड़ते हैं |

सत्य देखो    झूठ छोड़ो |
लोग न्यारे  साथ जोड़ो |
हौसलों  को , राह  देना -
दुश्मनी के  तार तोड़ो |

है   तिरंगा  मान  मेरा |
गीत में भी  शान मेरा |
देश को भी प्राण दे दें -
जानता है ध्यान मेरा |

युद्ध देता   हानि  पूरी |
कामना भी हो अधूरी |
कौन माने ज्ञान ऐसा -
जंग होगी जो धतूरी |

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महारंगी छंद ( वर्णिक ) गीतिका
रगण गुरु रगण गुरु  (8 वर्ण )

शक्ति लाना चाहते हैं |
भक्ति पाना चाहते हैं |

संकटों से क्यो डरें भी ,
शौर्य  गाना  चाहते  है‌ं |

युद्ध  चर्चा भी सुनी  है ,
वीर  आना   चाहते  हैं |

कायरों को त्यागते हैं ,
तीर  जाना  चाहते हैं |

भारती हैं पूत अच्छे,
पाक खाना चाहते हैं |
( यमक पंक्ति)

सुभाष सिंघई
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महारंगी छंद ( वर्णिक ) गीत
रगण गुरु रगण गुरु  (8 वर्ण )

राम की गंगा भली है |
तारने ‌भू को चली है ||

बोल में भागीरथी है |
साधना राहों मथी है ||
मुक्ति देने को ढ़ली है |
तारने ~~~~~~~||

आज देखे विश्व पूरा |
पूर्णता दे जो अधूरा ||
लोग माने श्री बली है |
तारने ~~~~~~~||

पूजते हैं   मानते हैं |
अर्घ देना  ठानते हैं |
मोक्ष राही को गली है |
तारने ~~~~~~~||
~~~~~~~~~~~~~
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नोट - यदि किसी कवि मित्र को , इसको दुगना करके गीत / गीतिका लिखना है , तब " द्विगुणित महारंगी छंद लिखकर प्रयोग कर सकता है | पर छंद और मुक्तक में यही आठ वर्ण प्रयोग करें
गीत और गीतिका भी आठ वर्ण से तो लिख ही सकते हैं

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सममात्रिक चतुष्पदी मात्रिक छंद 

91 #दीर्घ_मारकृति_छंद 

#विधान - चौकल - त्रिकल - चौकल × 2 = 22 मात्रा 

                       अथवा 

चौकल - पंचकल - द्विकल × 2 = 22 मात्रा 

 

 बात एक ही है , (यति पदांत में  निश्चित बंधन नहीं है )


#दीर्घ_मारकृति छंद 

चौकल- त्रिकल- चौकल ×2 = 22 मात्रा अथवा 

चौकल - पंचकल  - द्विकल ×2   ( यति / पदांत बंधन नहीं )


हम सब शारदे को , मिलकर  पूजते  हैं  |

लिखते   छंद   सुंदर , पढ़कर  झूमते हैं ||

मिलता भाव अनुपम , चारों और  बिखरा ‌|

हर्षित  छंद लगते , पाते   सृजन निखरा ‌||


जाना आज मैंनें   , कैसा    प्यार  होता |

देखा  कौन जग में ,  घर में   बैठ  रोता ||

पूरे  योग  से  जो ,  सत्यम   राह  जाने |

हर्षित नूर  होगा    ,हम  यह बात माने ||


बोले बोल   जिसने ,   सुंदर   नेह  लाकर |

बिखरा हर्ष  मन में, शुचिता साथ पाकर ||

भावों    का   रहेगा ,   पूरा  खेल  सच्चा |

ज्ञानी ज्ञान जाने    , तजकर  रंग कच्चा ||


रहत  सदा  यादें  , हमको  भलाई  की |

रहती टीस  भारी , सबको   बुराई   की ||

जब हम सोचते हैं , गहरी जहाँ    बातें |

यादें  चोट  देतीं ,    आतीं   याद   घातें ||


छोड़ो यार बातें  , अब कुछ श्रेष्ठ  करते |

फूटा घड़ा त्यागें , लाकर  नया   भरते ||

उड़ते हौसले से , नभ  को   नापते   हैं |

तारे चंद्र   सूरज , सबको   ढाँकते   हैं ||


सुभाष सिंघई 

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#दीर्घ_मारकृति  छंद #मुक्तक 

चौकल- त्रिकल- चौकल ×2 = 22 मात्रा अथवा 

चौकल - पंचकल  - द्विकल ×2   ( यति / पदांत बंधन नहीं )


देते वचन जिसको  , करना पूर्ण  जानो |

साहस साथ देगा  ,  , ईश्वर  संग मानो |

छोड़ो  खोट मन की  ,देना  मान सबको - 

आएँ काम सारे , साहस   सदा   ठानो |


उज्ज्वलता रहेगी    , शुभता  कर्म मानो |

कहना रहे सच्चा ,    करना   पूर्ण  ठानो |

लेता   परीक्षा भी ,   रुककर  समय देखें - 

मिलता कर्म फल ही,दुनिया नियम जानो |


देखो आज पहले  , कल का त्याग करिए |

बनिए सत्य शोधक , अनुुपम पुण्य भरिए | 

होती   चाह    पूरी , पर्वत   भी   पिघलते - 

सूरज  शीत  देता,  बादल   पवन  जरिए |


मन से  खोज पूरण , होती आप  जानो |

रुककर सत्य खोजो , संशय जरा  मानो |

रहता  झूठ  उथला , देता   कष्ट   पीछे - 

करना दूर इसको , पहले   कर्म   ठानो ||


छिछला दिखे पिछला, जाना चेत यारो |

त्यागो भी   बुराई  , मन में  भी विचारो |

ठाना जहाँ कुछ है , साथी  तब मिलेंगे ~

पूरा  साथ   देगें , उनको जरा  पुकारो |


सुभाष सिंघई

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दीर्घ_मारकृति  छंद #गीतिका 

चौकल- त्रिकल- चौकल ×2 = 22 मात्रा अथवा 

चौकल -पंचकल  - द्विकल ×2   ( यति / पदांत बंधन नहीं )


मौसम दिखे अच्छा ,  गाना चाहिए तब |

स्वागत मान  करने  , जाना चाहिए तब ||


आते मौसमी फल , मिलता स्वाद मीठा , 

उड़ते पंछियों को ,   दाना  चाहिए  तब |


आता  प्रेम लेकर  , कोई  निजी  अपना , 

उसके साथ मिलकर, खाना चाहिए तब |


होती  भीड़  भारी   , मेला  बोलते   हैं , 

चीजें काम की सब  , लाना चाहिए तब |


जाते  रहें    मंदिर  , करने  ईश   पूजा , 

सुंदर भाव दिल में ,  छाना चाहिए तब |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~~~~~~~~


दीर्घ_मारकृति  छंद #गीत 

चौकल- त्रिकल- चौकल ×2 = 22 मात्रा अथवा 

चौकल - पंचकल- द्विकल ×2   ( यति / पदांत बंधन नहीं )


होता गर्व   हमको , जग   में   रोज आला |

जन गण गीत गाता  ,   भारत  देश वाला ||


बहती गंग धरती , सबको तारती है |

उसकी शान जानो , माता भारती है ||

पापी पाप धोते , उनको  जानती है |

आएँ   द्वार  मेरे  , धोना  ठानती  है ||


जो भी  पास  आए , देती  है  उजाला |

जन गण गीत गाता, भारत  देश वाला ||


सैनिक वीर  मेरे ,  सीमा पर मिलेंगे |

गर्मी शीत वारिश , रक्षा  हित डटेंगे ||

दुश्मन देख सम्मुख , आगे ही बढ़ेंगे |

देंगे सबक उनको , पीछे नहीं  हटेंगे ||


रखते लाज भारत , पहने  शौर्य माला |

जन गण गीत गाता, भारत देश वाला ||


शंकर  विष्णु ब्रह्मा , ईश्वर   हमारे   हैं  |

कहते  दीन दाता , सबके   सहारे   हैं ||

करता कर्म मानव , देखे    धर्म  पहले |

उसमें ध्यान रखता,कहता वतन अहले |


अच्छे  भाव रखते , लगता है निराला |

जन-गण गीत गाता, भारत देश वाला||


सुभाष सिंघई 

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92 - #रतिवल्लभ_छंद 19 मात्रा , 5 5 5 4 = 19 मात्रा 

विधान - #तीन_पंचकल + #एक_चौकल


रगण 212 , यगण- 122‌‌  , तगण- 221‌

किसी भी प्रकार के पंचकल यथावत या वाचिक प्रयोग कर सकते हैं | एवं चारों प्रकार का चौकल 

पदांत का बंधन भी  नहीं है , यह सममात्रिक चतुष्पदी  छंद है |


#शारदे_वंदना 

शारदा   मनाने     टेकता  माथा |

छंद के  महल से गा  रहा गाथा ||

मातु भी लेखकों की आस  जाने |

विनय को सहज ही अर्चना माने ||


#गणपति_वंदना 

सिद्धि में रिद्धि  शुभ देव है गणपति |

ज्ञान का  सार दें  विज्ञान  रच  गति  ||

आशीष   संधान   लक्ष्य   भी  देते |

ब्रह्मांड   धर्म  की    परीक्षा   लेते ||


#छंद_गठन 

पंचकल तीन है , चयन कर लेखो  |

बाद में चौकली , जोड़कर  देखो  ||

उन्नीस  कीजिए  कलम से  मात्रा |

रतिवल्लभा  बने छंद  की  यात्रा ||


#छंद

मोह तज संसार  के साधु जाते |

तप ज्ञान साधना वह स्वयं पाते  ||

आचरण उपदेश बोल  अपनाते |

पूजते तब लोग सिर को झुकाते ||


आसमाँ नजारे  देखता   जग  के |

बाग के पुष्प तरु हाल भी मग के ||

लालची लालसा  द्रव्य सब  लेखे |

धूर्तता     कर   रहे   ‌लुटेरे   देखे ||


आमना-सामना    वीर    ही  करते |

युद्ध की शांति की बात वह कहते ||

देश हित धर्म से   कर्म  वह  जानें |

सौम्यता  भी रखें लक्ष्य   पर ठानें ||


सृष्टि में सृजन को जब मिले आदर |

धरा भी दे  उसे   रत्न    की  चादर ||

कर्तव्य  भाव   से जो  करे  आकर |

शौर्यता    चूमती तव  माथ  जाकर ||


कर   भलाई  छोड़  अहसान  जाओ | 

दूसरे   कर्म   का  गान  फिर  गाओ ||

तब प्रथम कर्म का फल खिला जानो |

द्वार पर   सत्कार   का  पुष्प   मानो ||


सुभाष सिंघई 

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#रतिवल्लभ_छंद 19 मात्रा , 5 5 5 4 = 19 मात्रा 

#तीन_पंचकल + #एक_चौकल 


#मुक्तक


देवता भी धरा  पर अभी आते |

मानवी  रूप में धर्म सिखलाते |

सृष्टि में उदय यह दिख रहे होते -

लोग भी  कर्म से पहचान जाते |


कृष्ण की बाँसुरी सुन रही राधा |

मग्न है मुदित भी हट रहीं  बाधा |

राधिका   बोलती श्याम  हैं  मेरे - 

प्रेम की राह पर चल उन्हें साधा |


आजकल मित्रता स्वार्थ  में डूबी |

दिख रही हर और हमें यह खूबी |

कौन यह बोलता सामने सच को-

क्यों लोग  चाहते मुफ्त में रूबी |


सोचना हमें भी पथ कौन आगे |

जा रहे दूर तक जव सभी जागे |

सामना संकटों  का  सभी टालें- 

और  मिल रोक लें   टूटते  धागे |


सुभाष सिंघई

~~~~~~~~~~~

रतिवल्लभ_छंद 19 मात्रा , 5 5 5 4 = 19 मात्रा 

#तीन_पंचकल + #एक_चौकल 


#गीतिका 


लोग  हैं पहनते   धर्म   का ‌चोला |

बोलते  मुख खोल पाव को तोला |


जानते    लोग हैं  वेश   पहचानें , 

लालची द्रव्य का  लटकता  झोला |


लगाते तिलक हैं  पहनते   माला , 

ठग रहे  बैठकर प्रभु नाम बोला |


देखते  संसार में   लोग  झुकते, 

बोल हैं   मोहनी रुप लगे भोला |


प्रश्न जब  धर्म के ग्रंथ का  पूछा , 

बन गए तभी वह आग का गोला |


जानता  जमाना  धर्म का  धंधा ,

चल रहा आजकल उठ रहा शोला |


सुभाषा    सामने   हाथ  से   रोके , 

हो रहे  नाराज   , राज क्यों  खोला |


सुभाष सिंघई 

~~~~~~~~~~~


रतिवल्लभ_छंद 19 मात्रा , 5 5 5 4 = 19 मात्रा 

#तीन_पंचकल + #एक_चौकल 


#गीत


गोपियाँ  पूछतीं   कौन   है  आया |

फूल सब खिल उठे हर्ष भी छाया ||


राधिका बोलती श्याम जी  जानो |

आ रहे  छिप रहे   बात यह  मानो |

बाँसुरी   बजेगी  मुग्ध   सब  होंगे - 

रास भी सजेगा ‌श्याम  सँग ठानो |


बाग भी   मस्त है भ्रमर   भरमाया |

फूल सब खिल उठे हर्ष भी छाया ||


मोर भी  नाचते  पंख  को  फैला |

पंछियों का उड़ा आज  नभ रैला |

पवन भी मंद हो  सुर साथ  लाए -

मालिनी  दे गई   पुष्प के    थैला |


फैलती दिख रही श्याम की  माया  |

फूल सब खिल उठे हर्ष भी छाया ||


चित्त की चोरनी श्याम की राधा |

प्रेम के   पाश से उन्हें   है साधा |

श्याम को दोष दें अजब हैं सखियाँ -

बोलती मिलन   में है  नहीं  बाधा |


कहे अब  'सुभाषा'  आनंद   पाया |

फूल सब खिल  उठे हर्ष भी छाया ||


सुभाष सिंघई 

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