https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें || किशोर छंद ( अठकल + अठकल + मगण (तीनगुरु )||
किशोर छंद विधान सउदाहरण (मात्रिक छंद)
चार पद प्रति पद में 22 मात्राएँ , यति 16 व 6 मात्राओं पर, पद की मात्रा बाँट –
अठकल +अठकल (चौपाई चरण ) + मगण ( तीन दीर्घ )
इस छंद में चारों पद समतुकांत रखे जाते हैं।
विशेष निवेदन - मगण (तीन दीर्घ ) का वाचिक लघु बनाना निषेध है
एवं दो - दो पद तुकांत निषेध हैं (चारों पद समतुकांत मान्य होते हैं |
#लेखन सहजता संकेत - #चौपाई_चरण+ #मगण
चौपाई की सौलह मात्रा , का मेला |
इसके आगे तीन गुरू का , है खेला ||
सम तुकांत में पद भी चारों , हैं चेला |
यह किशोर में छंद सुहानी , है बेला ||
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कृपा सिंधु शुभ शारद माता , आ जाओ |
है किशोर शुभ छंद रचाया , मुस्काओ ||
हर अक्षर में ज्ञान सुहाना , ही लाओ |
कवि कविता के सुंदर भावों , में आओ ||
गणपति बप्पा आप हमेशा , आ जाना |
है किशोर यह छंद अनूपा , मुस्काना ||
छंद महल में शुभ आशीषों , को लाना |
मंगल मूरत मंगल करने , है आना ||
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किशोर छंद में - (नाम से जुड़े धनुषों के नाम )
राम धनुष #कोदंड सुहाना , पाते हैं ||
धनुष #गाँधरी लक्ष्मण वन ले , जाते हैं ||
रावण के #पौलत्स्य धनुष से , नाते हैं ||
अर्जुन का #गाण्डीव धनुष था , है माना |
था #महेन्द्र भी धनुष युधिष्ठिर , है जाना |
धनुष #वायव्य भीष्म पितामह , ने ताना |
और कर्ण ने #विजय धनुष को ,संधाना ||
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श्री प्रताप राणा का #चेतक , घोड़ा था |
वीर शिवा का #मोती_गजरा , जोड़ा था |
रानी झाँसी ने गोरों को , तोड़ा था |
कूद किले से #बादल ने रुख , मोड़ा था ||
सिंह रणजीत श्री की #लैला , घोड़ी थी |
और सिकन्दर घोड़ी #फालस , जोड़ी थी |
बाबा भारत पढ़ी कहानी , थोड़ी थी |
क्यों लगाम घोड़ा #सुल्ताना , छोड़ी थी |
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#मुक्तक
किशोर छंद , अठकल + अठकल + मगण
#वामावर्ती शंख घरों में , होता है |
#दक्षिणवर्ती श्रेष्ठ करों में , होता है |
इन्हें बजाकर मिलता साहस, भारी है -
यथा नाम गुण शंख स्वरों में , होता है |
#पांचजन्य था चक्र सुदर्शन , धारी का |
#देवदत्त अर्जुन जैसे उप , कारी का |
शंख #अनंत_विजयी युधिष्ठिर, जानो जी-
#पौंड बजाते भीम बली निज , पारी का |
#मणि_पुष्पक सहदेव बजाते , जाते हैं |
शंख #सुघोष नकुल जी थामे , आते हैं |
#गणपति शंख मिला मंथन से , जानो जी -
#पद्म शंख भी कमलाकृति में , पाते हैं |
शंख बजाना तन मन को शुभ , कारी है |
मंगल ध्वनि शंखों की जग में , भारी हैं |
हटे नकारापन तन मन का , जानो जी -
सभी बजाकर देखो महिमा , न्यारी है |
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किशोर छंद (अठकल अठकल मगण )
#नंदीघोष कहें #गरुड़ा के , हैं नारे |
#कपिलाध्वज भी भक्त कहें मिल ,के सारे ||
#जगन्नाथ के रथ में लगते , जैकारे |
#सौलह_पहिए सूरज चंदा , हैं तारे ||
#चवालीस है फीट सुहानी , ऊँचाई |
#फस्सी_धौरा_सहजा लकड़ी , हैं भाई ||
#सम्वत पंद्रह सौ पचहत्तर , है आई |
चली पुरी में यह रथ यात्रा , हर्षाई ||
#तालध्वज बलराम बली रथ, भी जानें |
#चौदह पहिए इसमें लगते , भी मानें ||
लाल हरा ही रंग लगाते , मस्ताने |
सभी खींचते रथ को जाकर , दीवाने ||
#पद्म सुभद्रा का रथ भी जब , आता है |
#दर्पदलन भी कहकर जुड़ता , नाता है ||
#रंग लाल कुछ काला नीला , छाता है |
#बारह पहिए घुँघरू स्वर तब , गाता है ||
#चंद्र_चूर्ण रस्सी से खींचा , जाता है |
तीन किलोमीटर यात्रा पथ , भाता है ||
यहाँ #गुन्डिचा मंदिर तक रथ , आता है |
जो रिश्ते में #मौसी माता , नाता है ||
रात ठहरने मौसी घर रुक , जाते हैं |
बड़े प्रेम से खिचड़ी सादा , खाते हैं ||
जगन्नाथ जी हम जन आए , गाते हैं |
बटे प्रसादी में तब खिचड़ी ,पाते हैं ||
माह आषाढ़ शुक्ल पक्ष सब , जानो जी |
जगन्नाथ की रथ यात्रा को , मानो जी ||
दूजी तिथि होती है यह पहचानो जी |
जगन्नाथ का भात सुहाना , छानो जी ||
जगन्नाथ की मिलकर सब जय , को बोलो |
भात प्रसादी पाने को मुख , को खोलो ||
भक्ति भावना में अपनेपन , को तोलो |
रथ यात्रा में रस्सी पकड़े , ही डोलो
पूर्व से प्रचलित किसी का दोहा 👇
जगन्नाथ के भात को , जगत पसारे हाथ |
जिसको खाने मिल गया,उसका ऊँचा माथ ||
जय जगन्नाथ 👏👏👏👏👏👏👏👏
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किशोर छंद ,अठकल अठकल मगण
रहे गाँव में भोली धन्ती ,बाई है |
निकट पहाड़ी लघु गड्ढे पर ,आई है |
धान कूटने मोटा मूसल , लाई है |
मूसल चलते धार लहूू की , पाई है ||
तब घबड़ाकर धन्ती बाई , चिल्लाती |
खून सने चावल को सम्मुख , है पाती ||
जुड़े सभी ग्रामीण जनो को , ले आती |
जिसने मंजर देखा धड़की , है छाती ||
खबर मदन राजा को मिलती, आते हैं |
शिव पिंडी जो थोड़ी निकली, ध्याते हैं ||
खोदी पिंडी पंच मुखी को , पाते हैं |
मंदिर बनता जन शिव शंकर, गाते हैं ||
पिंडी खोदी काफी नीचे , जाते हैं |
शिव की महिमा छोर नहीं तब , पाते हैं ||
जयकारा जय कूड़ा देवा , गाते हैं |
खबर फैलती बुंदेली जन , आते हैं ||
(बुंदेली में कुंड को कूड़ा बोलते हैं )
( मदन राजा जू का कार्यकाल सम्वत
बारह सौ के आसपास है )
कुंडेश्वर भगवान सभी जन , बोले हैं |
चावल जितने बढ़ते रहते , चोले हैं ||
ऊँचाई में लम्बे पूरे , गोले हैं |
कुंडेश्वर श्री धाम बना बम , भोले हैं ||
चार मील की टीकमगढ़ से , दूरी है |
दर्श करें तब होती मंशा , पूरी है ||
आभ शिवा की लगती सबको ,सूरी है |
निकट बहे जमड़ार नदी भी ,नूरी है ||
बाणासुर की बेटी दर्शन , पाती थी |
छिपे कुंड में शिव को ऊषा , ध्याती थी ||
प्रातकाल ही पूजन करने , आती थी |
हे शिव शंकर कृपा निधाना , गाती थी |
निकट बाणपुर नगर बसाया , है भाई |
जबसे ऊषा आराधन को , है आई ||
दैत्य सुता ने शिव की किरपा , है पाई |
भक्ति शक्ति निज जीवन में शुभ, है लाई ||
दैत्य राज बाणासुर बेटी , आती थी |
यथा नाम गुण ऊषा ही वह , भाती थी ||
गुप्त तपस्या कारण वह छिप , जाती थी |
शिव के आराधन में खुद को , पाती थी ||
निर्जन वन था एक पहाड़ी , वीरानी |
शिव आराधन ऊषा करती , दीवानी ||
भैरव बनके दर्शन देते , थे ज्ञानी |
छिपे कुंड में शिव जी रहते , थे ध्यानी ||
महादेव जी जबसे बाहर , आए हैं |
नव ज्योतिर्लिंग सभी तेरह , पाए हैं ||
चमत्कार के मिलते रहते , साए हैं |
कथा "सुभाषा" सुनके हम लिख, लाए हैं ||
मिलता है अभिषेक अभी भी , हैं पाते |
बिल्व पत्र भी चढ़ते मिलते , मुस्काते ||
पट खुलने के पहले के यह , हैं नाते |
सुनते बाणासुर ऊषा ही , हैं आते ||
चमत्कार श्रद्बा के यह सब , होते हैं |
पंचमुखी शिव पिंडी में जन , खोते हैं |
कह सुभाष यह श्रद्धा सागर , गोते हैंं |
वंदन करके पुण्य सभी जन , बोते हैं ||
#जय_कुंडेश्वर_भगवान_महादेव_की
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किशोर छंद , अठकल अठकल मगण
राजा मधुकर शाह जू देव कृष्ण उपासक व
उनकी रानी कुँवर गणेशी बाई जू श्री राम उपासक थीं , पर दोनों एक दूसरे की उपासना का सम्मान व ध्यान रखते थे।
(पहले राजा मधुकर जू की गाथा )
#मुक्तक ::--
राज्य ओरछा मधुकर राजा , बैठे थे |
तिलक लगा था , मूँछें अपनी ,ऐंठे थे |
अकबर का दरबार बुलावा,-आया था -
राज-काज की गहराई से , जेठे थे |
मुल्ला बोला तिलक लगाकर , क्यों आते |
मूँछें अपनी ऐंठे रहते , मुस्काते |
अकबर बोले बिना तिलक के, आना है -
हुक्म हमारा पक्का जानो , फर्माते |
दिवस दूसरा जब आया तब , पाते हैं |
तिलक लगा कर लम्बा मधुकर ,आते हैं |
तिलक हमारा धर्म यहाँ है , क्यों छोड़ें -
उत्तर सुनकर अकबर चुप रह , जाते हैं |
कृष्ण भक्ति भी मधुकर जू की , आई है |
नगर ओरछा संध्या वंदन , छाई है |
नेत्र बंद कर हाथ चलाते , है देखा ~
कहा, कृष्ण पर पावक जलती, पाई है।
पड़े फफोले अकबर देखें , हाथों में |
मधुकर कहते आगी लेखें , हाथों में |
नगर ओरछा वस्त्र जले हैं , कृष्णा के -
थाल आरती कारण रेखें , हाथों में |
पता लगाकर तब अकबर ने, बोला है |
तुम्हें हाजरी बंधन से अब, खोला है |
सच में आगी वहाँ लगी थी , जाना है -
कृष्ण रूप मय मधुकर जू का , चोला है |
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रामराजा सरकार ओरछा की गाथा
रानी कुंवर गणेशी जू , जो श्री राम उपासक थी
(चित्र कमेंट बाक्स में देखें )
किशोर #छंद
कृष्ण भक्त थे मधुकर राजा , जाना है |
राज्य ओरछा साख बहुत थी , माना है ||
कुँवर गणेशी रानी ने कुछ , ठाना है |
नगर ओरछा रामलला को , लाना है ||
मधुकर कहते प्रियवर आओ, रानी जू |
आप अयोध्या पहले जाओ , रानी जू ||
नगर ओरछा राम बुलाओ , रानी जू |
पुण्य प्रताप प्रबल तुम पाओ ,रानी जू ||
कुँवर गणेशी पहुँच अयोध्या, बोली है |
सजी ओरछा से यह लाई , डोली है ||
स्वागत वंदन तिलक लगाने , रोली है |
और उठाने डोली को भी, टोली है |
लिए प्रार्थना हर मंदिर में , जाती हैं |
चलो ओरछा मेरे प्रभुवर , गाती हैं ||
सुबह नहाने जब सरयू में , आती हैं |
डुबकी लेकर राम लला को ,ध्याती हैं ||
प्रण करती हैं राम लला ले , जाऊंँगी |
चले ओरछा अन्न तभी मैं , खाऊँगी ||
राम भक्ति में लीन रहूँगी , ध्याऊँगी |
नगर अयोध्या से अनुकम्पा ,पाऊँगी ||
डूबा होता राम लला जी , आ जाते |
हाथों में विग्रह श्री प्रभु का , हैं पाते ||
सपने में प्रभु अपनी शर्तों ,को लाते |
राम चलेगें यह सुनकर सब , हर्षाते ||
#राम_जी_की_शर्ते,जो रानी ने स्वीकार कीं-
पुष्य नखत में गमन रहेगा , ये जानो |
नगर ओरछा राजा होंगे , भी मानो ||
एक बार ही जहाँ कहोगी , बैठेंगे |
जगह दूसरी देने पर हम , ऐंठेंगे ||
प्रभु लीला मंदिर पूर्ण न बन, पाया है |
तब महलों में सीधा डोला , आया है ||
भोजन शाला में प्रभुवर की , माया है |
अडिग राम की तब से विग्रह, काया है ||
राजाराम यहाँ पर रहते , जाना है |
गार्ड सलामी प्रतिदिन होती , माना है ||
छोड़ ओरछा तब राजा ने , ठाना है |
टीकमगढ़ रजधानी से यश , पाना है ||
राम ओरछा दिवस रहें जी , जाना है |
रात अयोध्या सोने जाते , माना है ||
राम ओरछा राजा जी हैं , ठाना है |
यहाँ प्रजा बन सदा कृपा को , पाना है ||
#मुक्तक -
राजमुकुट सिर पर ही रहता , लेखा है |
राजाराम सभी जन कहते , देखा है |
यहाँ सलामी शासन ही अब , देता है -
लाल न बत्ती यहाँ जलेगी , रेखा है |
(इस नगर में कोई भी मंत्री या अधिकारी अपनी गाड़ी की लाल बत्ती नहीं जलाता है जिसने जलाई है , उसे दुष्परिणाम स्वरुप अपना पद गँवाना पड़ा है )
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कुछ इतिहासकारों के मत से - मुगलों के आक्रांता स्वभाव को देखते हुए , एक योजना के तहत राम जी के मूल विग्रह को , कुछ संतों ने ओरछा भेजा था |क्योंकि रानी कुँवर गणेशी परम राम भक्त थी
(तब राम जी का मूल विग्रह ओरछा में ही कहलाया )
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लेकिन पुष्य नक्षत्र गमन , नए बने चतुर्भुज मंदिर में राम जी का न जाना ( वह मंदिर आज भी बिना मूर्ति का वीरान है )
व राजमहल में ही विराजमान होना ,व ओरछा में राज मुकुट धारण कर राजा के रुप में प्रतिष्ठित होना , व बुंदेली राजा जी का ओरछा छोड़कर , अपनी राजधानी टीकमगढ़ ले जाना , राजाशाही परम्परा का आज तक गार्ड आफ आनर सुबह शाम शासन द्वारा देना , ओरछा में लाल बत्ती न जलाना ,बुंदेली लोक गायन में सरयू से राम का प्रकटीकरण एवं रानी कुँवर गणेश का वर्णन , यह भी नजर अंदाज नहीं किए जा सकते हैं | कथानक कुछ भी कहीं से जुड़े हों , किंतु ओरछा में राम जी , राजाराम हैं , व भक्त जन उनकी प्रजा हैं
सादर
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आज देश में , बाढ़ तबाही , पानी से |
उफन रहीं हैं नदियाँ शाही , पानी से ||
परेशान हैं पूरे राही , पानी से |
बीमारी अब आती स्याही ,पानी से ||
(पानी पदांत 🖕चारों चरणों में लिया है , तब यति के पहले तुकांत मिला सकते है ) अब यह 👇छंद देखें , जिनमें यति के पहले कोई
तुकांत नहीं है , बल्कि यति के बाद तुकांत हैं |
नहीं समझते लोग यहांँ पर , पानी को |
मूर्ख मानते कुछ अज्ञानी , दानी को ||
जिनका खोता याद करें वह , नानी को |
बैठ आलसी करता आना , कानी को ||
जान बूझकर करते रहते, नादानी |
घर पर बैठे फिर करते हैं , हैरानी ||
मिले सफलता उसको पूरी , जो ठानी |
जिसने आज्ञा सदा बड़ों की , है मानी ||
जो भी गुरु के दर पर श्रद्धा , से आते |
ज्ञान दान आशीष सदा वह , हैं पाते ||
गुरु ब्रह्मा हरि शंकर जिनको , हैं भाते |
ईश भजन वह मोक्ष महल में , हैं गाते ||
जीव जगत देखा संसारी , क्यों रोता |
लादे बोझा सिर पर भारी, क्यों ढोता ||
कठपुतली सा आकर नाचे , है रोता |
कभी प्रशंसा कभी तमाचों , में खोता ||
लोभी धन का ढेर लगाता , जाता है |
पास नहीं रहती संतोषी ,माता है ||
कितना आए हाय - हाय ही ,गाता है |
जीवन उसका चैन नहीं कुछ, पाता है ||
जहाँ कहीं भी लुटती देखी , है नारी |
पीछे इज्जत वालों की है , तैयारी |
मजबूरी के सँग पैदा जब , लाचारी |
आ जाते हैं अस्मत के तब ,व्यापारी ||
रात दिवस भी , मेहमानी को , आते हैं |
कब क्या करना मर्जी उनसे , पाते हैं ||
उठो बैठना सोना जगना , लाते हैं |
सुबह चहकते संध्या लोरी , गाते है |
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चौपाई_चरण+ मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध
सभी जगह पर कपटी अक्सर , होते हैं |
नकली आँसू भी कुछ भरकर , रोते हैं |
नहीं किसी को यह कुृृछ देते , है पक्का -
सभी जगह वह खटपट लाकर , बोते हैं |
सदा सृजन में जो भी करता, चोरी है |
पकड न जाए रहता डरता , चोरी है |
कुछ सबूत की हँसी उड़ाते , वेशर्मी -
उल्टा बोलें मेरी सृजता , चोरी हैं |
अक्सर. देखा बंटाधारी , रोते हैं |
करके सबसे भी मक्कारी , रोते हैं |
कर्म सुधारें कभी न अपने , दीवाने -
किस्मत पर सब बारी- बारी, रोते हैं |
हर पचड़े में जो भी पड़ता , दीवाना |
नया-नया कुछ अपना गढ़ता, है गाना |
नहीं मानता आदत से वह , लाचारी -
चना झाड़ पर देता चढ़ता , है ताना |
यत्र -तत्र सबको भरमाता , लोभी है |
सबसे मिलकर काम बनाता , लोभी है |
सगा नहीं वह खुद का होता , है मानो -
पानी का ही दही जमाता , लोभी है |
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चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध
समान्त स्वर - आते _ पदान्त पापा जी
कड़क हमेशा रूप दिखाते , पापा जी |
अंदर से जल धारें लाते , पापा जी |
पाठ कीमती अनुशासन का , ही बाँटेन ,
हानि लाभ को सदा पढ़ाते, पापा जी |
त्याग तपस्या कब समझेंगीं , संतानें
कैसे वह इंसान बनाते , पापा जी |
कैसी रखते वह अरमानों , की डोरी ,
अपने मुख से कभी न गाते, पापा जी |
रख विशाल वह गहरी अंदर, छाती को,
अपने अनुभव से समझाते , पापा जी |
संस्कार की रखते हरदम , थाथी को ,
बाँटा करते जाते - जाते , पापा जी |
बरगद बनकर छाया पातीं , औलादें,
तब सुभाष हम तीरथ पाते , पापा जी |
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#चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध
विध्न हटाने सुत ही उनका , आता है |
जब मेरा मन जय शिवशंकर , गाता है ||
वाम अंग शुभ गौरा रानी , हैं माते |
कार्तिकेय के मोर सवारी ,से नाते ||
मुख्य द्वार पर नंदी बाबा , को पाते |
भूत प्रेत सब स्वागत करने , हैं आते ||
डमरू का तब डम-डम ध्वनि से , नाता है |
जब मेरा मन जय शिवशंकर , गाता है ||
लघु बन जाती सिर पर गंगा , जो भारी |
चंद्र भाल पर शीतलता के , हों धारी ||
महादेव की अद्भुत लीला , है न्यारी |
देव राक्षस मिलने आते , हैं पारी ||
देखा करता भक्त कृपा को , पाता है |
जब मेरा मन जय शिवशंकर , गाता है ||
गेह हिमालय कहलाते प्रभु , कैलासी |
जिनके दर्शन अभिलाषी जग , के वासी ||
जग का भी हर कंकर शंकर , है काशी |
मानव भी शिव का बन सकता ,है भाषी ||
नमन सुभाषा रूप तुुम्हारा , भाता है |
जब मेरा मन जय शिवशंकर , गाता है ||
सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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नाम - सुभाष सिंघई
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955
जन्म स्थान - जतारा , जिला टीकमगढ़ (म०प्र०)
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल
2 - शिल्पी सूर्या - नितिन जैन
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई
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आदरणीय सुरेन्द्र कौशिक जी गाजियाबाद
प्रधान सम्पादक छंद महल ( हिंदी ई पत्रिका )
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लेखन की विधा -
1 - सभी छंद
पाँच हजार से अधिक हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के करीब कुंडलिया , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है |
कई छंदों के विधान सउदाहरण लिखे है , अनेक गूगल पर भी आपको मिल जाएँगे
2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है
वर्तमान में छंदों पर लेखन कर रहे है , छंद महल पटल से ई बुकों का प्रकाशन कर रहे हैं
संस्थापक - सृजन सरोवर , छंद महल पटल
3- ब्लाग डाँट काम एवं अन्य एप्स पर ई बुक प्रकाशित कृतियाँ -
1- दोहा दीप (एक हजार दोहे )
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे )
3- दोहा सुभाष (एक हजार)
4- बुंदेली बराई ( एक हजार )
5. बुंदेली बांसुरी( एक हजार दोहे )
6-मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य
7 कलम से उद्गम. ( विभिन्न रचनाएँ )
8 -कुंडलिया कुंड
9 गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
10- हिंदी छंद माला भाग एक व भाग दो
11- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी
12- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन , मुनि विचिन्त्य शतक दोहा वली
13- गर्भ से गमन तक
14- बुंदेली अहाने
15- आलपिनें
16- जैनागम साहित्य सृजन
17 - गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है
18 - ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें हैं
व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है
19 वर्तमान में सम्पादन -
1- छंद महल ( हिंदी ई पत्रिका ) जिसके 30 विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके हैं
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है
20 - यूट्यूब - सृजन चैनल का संचालन
21- कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
22- अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है
©® सुभाष सिंघई
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660
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