https://subhashsinghai.blogspot.com/बुक चित्र पर क्लिक करें || किशोर छंद ( अठकल + अठकल + मगण (तीनगुरु )||

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किशोर छंद विधान  सउदाहरण  (मात्रिक छंद)
 चार पद  प्रति  पद में 22 मात्राएँ , यति 16 व 6 मात्राओं पर,   पद की मात्रा बाँट – 
अठकल +अठकल (चौपाई चरण ) + मगण ( तीन दीर्घ )
इस छंद में चारों पद समतुकांत रखे जाते हैं।

विशेष निवेदन  - मगण (तीन दीर्घ ) का वाचिक लघु बनाना निषेध है 
एवं दो - दो पद तुकांत निषेध हैं (चारों पद समतुकांत मान्य होते हैं |
#लेखन सहजता संकेत -    #चौपाई_चरण+ #मगण


चौपाई की   सौलह मात्रा ,   का  मेला |
इसके आगे  तीन गुरू का ,   है  खेला ||
सम तुकांत में पद भी  चारों , हैं  चेला  |
यह किशोर में  छंद  सुहानी ,  है बेला  ||
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कृपा सिंधु  शुभ शारद माता  , आ जाओ | 
है किशोर  शुभ   छंद रचाया ,   मुस्काओ || 
हर अक्षर  में   ज्ञान  ‌सुहाना  , ही  लाओ | 
कवि कविता के सुंदर  भावों   , में आओ || 

गणपति बप्पा  आप हमेशा , आ जाना |
है किशोर यह छंद‌‌ अनूपा  , मुस्काना ||
छंद महल में शुभ आशीषों , को लाना |
मंगल मूरत  मंगल   करने  , है आना ||
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शुभ #पिनाक को शिवा धनुष हम , गाते हैं   |
राम   धनुष    #कोदंड    सुहाना ,   पाते हैं  ||
धनुष   #गाँधरी लक्ष्मण वन  ले   , जाते हैं  ||
रावण के  #पौलत्स्य धनुष    से ,  नाते  हैं ||

अर्जुन का #गाण्डीव धनुष था , है माना  |
था #महेन्द्र भी धनुष युधिष्ठिर , है  जाना  |
धनुष #वायव्य भीष्म पितामह , ने ताना  |
और कर्ण ने  #विजय धनुष को  ,संधाना || 
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श्री  प्रताप राणा का #चेतक  , घोड़ा  था |
वीर शिवा का #मोती_गजरा , जोड़ा था |
रानी झाँसी ने  गोरों   को   ,    तोड़ा    था |
कूद किले से #बादल ने   रुख , मोड़ा था ||

सिंह रणजीत श्री की #लैला ,    घोड़ी थी |
और सिकन्दर घोड़ी #फालस , जोड़ी  थी |
बाबा   भारत पढ़ी   कहानी   ,  थोड़ी  थी |
क्यों लगाम घोड़ा #सुल्ताना  , छोड़ी  थी  |
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#मुक्तक 
किशोर छंद , अठकल + अठकल + मगण 
#वामावर्ती शंख   घरों में ,   होता  है |
#दक्षिणवर्ती श्रेष्ठ   करों में  , होता है | 
इन्हें बजाकर मिलता  साहस, भारी है -
यथा नाम गुण शंख  स्वरों  में , होता है  |

#पांचजन्य था चक्र  सुदर्शन , धारी    का |
#देवदत्त  अर्जुन  जैसे   उप , कारी   का |
शंख #अनंत_विजयी युधिष्ठिर, जानो जी-
#पौंड बजाते भीम बली निज , पारी   का |

#मणि_पुष्पक  सहदेव  बजाते , जाते हैं |
शंख  #सुघोष नकुल  जी  थामे , आते हैं |
#गणपति शंख मिला मंथन से , जानो जी - 
#पद्म शंख  भी  कमलाकृति में ,   पाते  हैं |

शंख बजाना तन मन को शुभ , कारी है |
मंगल ध्वनि शंखों की जग में  , भारी  हैं |
हटे नकारापन तन मन का , जानो   जी - 
सभी  बजाकर देखो   महिमा , न्यारी है |
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किशोर छंद (अठकल अठकल मगण )
#नंदीघोष  कहें  #गरुड़ा    के ,    हैं  नारे |
#कपिलाध्वज भी भक्त कहें मिल ,के सारे ||
#जगन्नाथ   के   रथ  में   लगते  ,   जैकारे |
#सौलह_पहिए  सूरज  चंदा ,       हैं  तारे  ||

#चवालीस है   फीट    सुहानी  ,  ऊँचाई |
#फस्सी_धौरा_सहजा  लकड़ी , हैं भाई ||
#सम्वत पंद्रह  सौ    पचहत्तर   , है  आई  |
चली   पुरी में    यह     रथ  यात्रा  , हर्षाई ||

#तालध्वज बलराम बली रथ,  भी जानें |
#चौदह पहिए इसमें  लगते ,  भी   मानें ||
लाल  हरा   ही   रंग   लगाते ,    मस्ताने |
सभी   खींचते   रथ  को  जाकर , दीवाने  ||

#पद्म सुभद्रा का रथ भी जब , आता है |
#दर्पदलन भी कहकर जुड़ता , नाता है ||
#रंग लाल कुछ काला नीला , छाता है |
#बारह पहिए घुँघरू स्वर तब , गाता है ||

#चंद्र_चूर्ण  रस्सी से खींचा ,    जाता  है |
तीन किलोमीटर  यात्रा पथ   ,  भाता  है ||
यहाँ  #गुन्डिचा मंदिर तक रथ , आता है |
जो  रिश्ते   में #मौसी माता   ,  नाता है ||

रात   ठहरने  मौसी  घर रुक , जाते  हैं |
बड़े प्रेम से  खिचड़ी   सादा  , खाते  हैं ||
जगन्नाथ जी   हम जन  आए  , गाते हैं |
बटे प्रसादी में तब   खिचड़ी  ,पाते   हैं ||

माह आषाढ़ शुक्ल पक्ष सब , जानो जी |
जगन्नाथ की  रथ यात्रा को  , मानो जी ||
दूजी तिथि  होती है  यह  पहचानो   जी |
जगन्नाथ का भात  सुहाना , छानो जी ||

जगन्नाथ की मिलकर सब जय , को बोलो |
भात प्रसादी पाने को  मुख ,  को   खोलो ||
भक्ति भावना  में अपनेपन  ,   को   तोलो |
रथ यात्रा   में    रस्सी  पकड़े ,  ही  डोलो 

पूर्व से प्रचलित किसी का दोहा 👇

जगन्नाथ के भात को ,     जगत पसारे हाथ |
जिसको खाने मिल गया,उसका ऊँचा माथ ||

जय जगन्नाथ 👏👏👏👏👏👏👏👏
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किशोर छंद ,अठकल अठकल मगण 
रहे  गाँव  में  भोली   धन्ती ,‌बाई   है |
निकट पहाड़ी  लघु गड्ढे  पर ,आई  है |
धान कूटने   मोटा    मूसल , लाई  है |
मूसल चलते धार लहूू‌ की ,  पाई  है || 

तब घबड़ाकर धन्ती बाई   , चिल्लाती |
खून सने चावल को सम्मुख , है पाती ||
जुड़े सभी ग्रामीण जनो को , ले आती |
जिसने मंजर देखा धड़की  , है   छाती ||

खबर मदन राजा को मिलती,  आते हैं   | 
शिव पिंडी जो थोड़ी  निकली, ध्याते  हैं ||
खोदी   पिंडी पंच मुखी को  ,  पाते  हैं |
मंदिर बनता जन   शिव शंकर, गाते  हैं ||

पिंडी   खोदी   काफी   नीचे ,   जाते  हैं |
शिव की महिमा छोर नहीं तब  , पाते हैं ||
जयकारा   जय   कूड़ा   देवा ,  गाते  हैं |
खबर   फैलती  बुंदेली जन ,  आते  हैं ||

(बुंदेली में कुंड को कूड़ा बोलते हैं )
( मदन राजा जू का कार्यकाल सम्वत 
बारह सौ के आसपास है )

कुंडेश्वर भगवान सभी जन , बोले   हैं |
चावल जितने  बढ़ते  रहते ,  चोले  हैं  ||
ऊँचाई  में   लम्बे    पूरे ,    गोले     हैं |
कुंडेश्वर श्री धाम  बना  बम  , भोले हैं  ||

चार मील की टीकमगढ़   से , दूरी    है |
दर्श करें  तब होती    मंशा ,    पूरी   है ||
आभ शिवा की लगती सबको ,सूरी  है |
निकट बहे जमड़ार नदी भी    ,नूरी  है ||


बाणासुर  की  बेटी   दर्शन  ,  पाती थी |
छिपे कुंड में शिव को ऊषा , ध्याती थी ||
प्रातकाल   ही पूजन करने ,  आती थी |
हे शिव शंकर कृपा निधाना , गाती  थी |

निकट‌ बाणपुर नगर बसाया  , है   भाई |
जबसे  ऊषा  आराधन  को ,  है  आई ||
दैत्य सुता ने शिव की किरपा  , है   पाई |
भक्ति शक्ति निज जीवन में शुभ, है लाई ||

दैत्य राज  बाणासुर  बेटी ,   आती    थी |
यथा नाम गुण ऊषा  ही वह , भाती थी ||
गुप्त तपस्या कारण वह छिप , जाती थी |
शिव  के आराधन में खुद को , पाती थी ||

निर्जन वन  था   एक   पहाड़ी , वीरानी |
शिव आराधन  ऊषा   करती , दीवानी ||
भैरव    बनके   दर्शन  देते  , थे   ज्ञानी | 
छिपे कुंड में शिव जी रहते , थे  ध्यानी ||

महादेव    जी   जबसे   बाहर , आए हैं |
नव ज्योतिर्लिंग सभी तेरह   , पाए   हैं ||
चमत्कार के   मिलते   रहते ,   साए   हैं |
कथा "सुभाषा" सुनके हम लिख, लाए हैं ||

मिलता है अभिषेक अभी भी , हैं  पाते |
 बिल्व पत्र भी चढ़ते मिलते   , मुस्काते  ||
पट खुलने के पहले   के  यह , हैं नाते  |
सुनते बाणासुर   ऊषा   ही ,  हैं  आते  ||

चमत्कार श्रद्बा  के यह सब ,  होते हैं |
पंचमुखी शिव पिंडी  में जन , खोते हैं |
कह सुभाष यह श्रद्धा सागर , गोते हैंं |
वंदन करके पुण्य सभी जन , बोते हैं ||

#जय_कुंडेश्वर_भगवान_महादेव_की
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किशोर छंद , अठकल अठकल मगण
 राजा मधुकर शाह जू देव कृष्ण उपासक व 
उनकी रानी कुँवर गणेशी बाई जू श्री  राम उपासक थीं , पर दोनों एक दूसरे की उपासना का सम्मान व ध्यान रखते थे। 
(पहले राजा मधुकर जू की गाथा ) 
#मुक्तक  ::--

राज्य ओरछा मधुकर राजा , बैठे थे |
तिलक लगा था , मूँछें अपनी ,ऐंठे थे |
‌अकबर का दरबार बुलावा,-आया था -
राज-काज  की गहराई से ,   जेठे थे |

मुल्ला बोला तिलक लगाकर , क्यों आते |
मूँछें    अपनी   ऐंठे  रहते ,       मुस्काते |
अकबर बोले बिना  तिलक के, आना है - 
हुक्म  हमारा    पक्का     जानो , फर्माते |

दिवस दूसरा जब  आया तब , पाते   हैं |
तिलक लगा कर लम्बा  मधुकर ,आते हैं |
तिलक हमारा धर्म  यहाँ  है , क्यों छोड़ें - 
उत्तर सुनकर  अकबर चुप रह , जाते हैं |

कृष्ण भक्ति भी मधुकर जू की , आई  है |
नगर ओरछा    संध्या    वंदन  , छाई है  |
नेत्र  बंद कर   हाथ  चलाते  , है  देखा ~ 
कहा, कृष्ण पर पावक जलती, पाई  है।

पड़े फफोले अकबर देखें    , हाथों में |
मधुकर कहते आगी  लेखें   , हाथों में |
नगर ओरछा वस्त्र जले हैं , कृष्णा के - 
थाल आरती कारण   रेखें , हाथों   में  |

पता लगाकर  तब अकबर ने,   बोला है |
तुम्हें    हाजरी  बंधन  से अब, खोला  है |
सच में आगी  वहाँ लगी  थी , जाना  है  - 
कृष्ण रूप मय मधुकर जू का , चोला  है   |
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रामराजा सरकार ओरछा की गाथा 
रानी कुंवर गणेशी जू , जो श्री राम उपासक थी 
(चित्र कमेंट बाक्स में देखें )
किशोर  #छंद 

कृष्ण भक्त थे  मधुकर राजा  , जाना है |
राज्य ओरछा साख बहुत थी  , माना है ||
कुँवर गणेशी   रानी ने  कुछ ,  ठाना   है |
नगर ओरछा रामलला   को  , लाना  है ||

मधुकर कहते प्रियवर आओ, रानी  जू |
आप  अयोध्या  पहले जाओ , रानी जू  ||
नगर ओरछा राम  बुलाओ ,   रानी  जू  |
पुण्य प्रताप प्रबल तुम पाओ ,रानी जू  ||

कुँवर गणेशी पहुँच‌ अयोध्या, बोली  है |
सजी  ओरछा  से यह लाई  , डोली है ||
स्वागत वंदन  तिलक लगाने , रोली है |
और उठाने   डोली को  भी,   टोली है |

लिए प्रार्थना हर मंदिर में ,   जाती   हैं |
चलो ओरछा मेरे प्रभुवर    , गाती  हैं ||
सुबह नहाने जब  सरयू  में , आती  हैं |
डुबकी लेकर राम लला को ,ध्याती  हैं ||

प्रण करती हैं  राम लला ले , जाऊंँगी |
चले   ओरछा  अन्न तभी मैं , खाऊँगी ||
राम भक्ति में लीन रहूँगी  ,   ध्याऊँगी |
नगर अयोध्या से अनुकम्पा  ,पाऊँगी ||

डूबा   होता  राम लला जी , आ जाते |
हाथों में विग्रह श्री प्रभु  का , हैं  पाते ||
सपने  में प्रभु  अपनी शर्तों ,को  लाते |
राम चलेगें यह  सुनकर   सब , हर्षाते ||

#राम_जी_की_शर्ते,जो रानी ने स्वीकार कीं-

पुष्य नखत में  गमन रहेगा , ये जानो |
नगर ओरछा राजा  होंगे , भी  मानो ||
एक बार ही  जहाँ  कहोगी ,   बैठेंगे |
जगह   दूसरी    देने पर  हम , ऐंठेंगे ||

प्रभु लीला मंदिर पूर्ण न बन,    पाया है | 
तब महलों में  सीधा   डोला , आया है ||
भोजन शाला में प्रभुवर   की , माया है |
अडिग राम की तब से विग्रह, काया है ||

राजाराम   यहाँ   पर    रहते  , जाना  है |
गार्ड सलामी प्रतिदिन होती   , माना  है ||
छोड़ ओरछा तब  राजा   ने ,   ठाना है |
टीकमगढ़ रजधानी से यश ,   पाना   है ||

राम ओरछा दिवस  रहें जी  , जाना  है  |
रात अयोध्या सोने   जाते ,    माना  है  ||
राम  ओरछा  राजा जी  हैं  ,  ठाना  है |
यहाँ  प्रजा बन सदा कृपा को , पाना है ||

#मुक्तक - 
राजमुकुट सिर पर ही रहता , लेखा है |
राजाराम सभी जन   कहते , देखा  है |
यहाँ सलामी शासन ही अब , देता है - 
लाल न बत्ती   यहाँ जलेगी , रेखा  है |

(इस नगर में कोई भी मंत्री या अधिकारी अपनी गाड़ी की लाल बत्ती नहीं जलाता है जिसने जलाई है , उसे दुष्परिणाम स्वरुप अपना पद गँवाना पड़ा है ) 
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कुछ इतिहासकारों के मत से - मुगलों  के आक्रांता स्वभाव को देखते हुए , एक योजना के  तहत राम जी के मूल विग्रह को , कुछ संतों ने ओरछा भेजा था |क्योंकि  रानी कुँवर गणेशी परम राम भक्त थी 
(तब राम जी का मूल विग्रह ओरछा में ही कहलाया )
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    लेकिन पुष्य नक्षत्र गमन , नए बने चतुर्भुज मंदिर में राम जी का न जाना ( वह मंदिर आज भी बिना मूर्ति का  वीरान है )
व राजमहल में ही  विराजमान होना ,व ओरछा में राज मुकुट धारण कर  राजा के रुप में प्रतिष्ठित होना , व  बुंदेली राजा  जी का ओरछा छोड़कर , अपनी राजधानी टीकमगढ़ ले जाना ,   राजाशाही परम्परा का आज तक गार्ड आफ आनर सुबह शाम शासन द्वारा देना , ओरछा में लाल बत्ती न जलाना ,बुंदेली  लोक गायन में सरयू से राम का प्रकटीकरण एवं रानी  कुँवर गणेश का वर्णन , यह भी नजर अंदाज नहीं किए जा सकते हैं | कथानक कुछ भी कहीं  से जुड़े हों , किंतु ओरछा में राम जी , राजाराम हैं , व भक्त  जन उनकी प्रजा हैं 
सादर 
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आज देश में  , बाढ़  तबाही , पानी से |
उफन रहीं हैं  नदियाँ शाही , पानी से ||
परेशान   हैं    पूरे      राही ,  पानी से |
बीमारी अब आती   स्याही  ,पानी से ||

(पानी पदांत 🖕चारों चरणों में लिया है  , तब यति के पहले तुकांत मिला सकते है ) अब यह 👇छंद देखें , जिनमें यति के पहले कोई 
तुकांत नहीं है , बल्कि यति के बाद तुकांत हैं |

नहीं समझते लोग यहांँ पर , पानी को |
मूर्ख मानते  कुछ अज्ञानी   , दानी को ||
जिनका खोता याद करें वह , नानी को |
बैठ आलसी  करता आना , कानी को ||

जान  बूझकर   करते  रहते,   नादानी |
घर पर बैठे   फिर करते  हैं  ,   हैरानी ||
मिले सफलता उसको पूरी , जो  ठानी |
जिसने आज्ञा सदा बड़ों की  , है मानी ||

जो भी गुरु के दर पर श्रद्धा ,‌ से  आते |
ज्ञान दान आशीष सदा  वह , हैं पाते ||
गुरु ब्रह्मा हरि शंकर जिनको , हैं भाते |
ईश भजन वह मोक्ष महल में , हैं गाते ||

जीव    जगत  देखा संसारी , क्यों रोता |
लादे बोझा  सिर  पर  भारी, क्यों ढोता ||
कठपुतली सा  आकर  नाचे  ,  है रोता |
कभी  प्रशंसा  कभी  तमाचों , में खोता ||

लोभी धन  का  ढेर लगाता , जाता है |
पास  नहीं   रहती    संतोषी ,माता है ||
कितना  आए  हाय - हाय  ही ,गाता है |
जीवन उसका चैन नहीं कुछ, पाता  है ||

जहाँ कहीं भी   लुटती देखी , है नारी |
पीछे इज्जत   वालों की  है  , तैयारी |
मजबूरी  के सँग पैदा  जब , लाचारी |
आ जाते हैं  अस्मत के तब   ,व्यापारी ||

रात दिवस भी , मेहमानी को , आते हैं |
कब क्या करना  मर्जी उनसे  , पाते हैं ||
उठो   बैठना   सोना   जगना ,  लाते हैं |
सुबह चहकते    संध्या लोरी ,  गाते है |
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 चौपाई_चरण+ मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत 
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध

सभी जगह पर  कपटी अक्सर  , होते हैं |
नकली  आँसू भी  कुछ भरकर , रोते  हैं |
नहीं किसी को यह कुृृछ देते , है  पक्का -
सभी जगह वह खटपट लाकर , बोते  हैं  |
  
सदा सृजन ‌में जो भी करता,   चोरी   है |
पकड न जाए     रहता डरता , चोरी  ‌ है |
कुछ  सबूत की  हँसी    उड़ाते ,   वेशर्मी - 
उल्टा   बोलें  मेरी  सृजता   ,   चोरी    हैं | 

अक्सर. देखा   बंटाधारी , रोते  हैं |
करके सबसे भी  मक्कारी , रोते हैं | 
कर्म सुधारें कभी न अपने , दीवाने - 
किस्मत पर सब बारी- बारी, रोते हैं |

हर पचड़े  में जो  भी  पड़ता , दीवाना |
नया-नया कुछ अपना गढ़ता,  है गाना |
नहीं मानता आदत से वह   , लाचारी - 
चना झाड़ पर देता  चढ़ता , है   ताना  |

यत्र -तत्र  सबको भरमाता , लोभी    है |
सबसे मिलकर काम बनाता , लोभी है |
‌‌सगा नहीं वह खुद का होता , है  मानो - 
पानी का ही दही जमाता , लोभी     है | 
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चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध 

समान्त स्वर - आते _ पदान्त पापा जी 

कड़क हमेशा रूप दिखाते ,  पापा जी |
अंदर  से  जल धारें  लाते  ,  पापा जी |

पाठ कीमती अनुशासन का , ही बाँटेन , 
हानि लाभ को  सदा पढ़ाते, पापा जी |

त्याग तपस्या  कब समझेंगीं ,  संतानें 
कैसे     वह   इंसान बनाते , पापा जी |

कैसी रखते  वह अरमानों  , की  डोरी , 
अपने मुख से कभी  न गाते, पापा जी |

रख विशाल वह गहरी अंदर, छाती  को, 
अपने अनुभव से  समझाते , पापा जी |

संस्कार की  रखते   हरदम , थाथी को , 
बाँटा करते जाते - जाते , पापा    जी |

बरगद  बनकर छाया   पातीं , औलादें, 
तब सुभाष हम तीरथ पाते , पापा जी |
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#चौपाई_चरण+ #मगण ( तीन दीर्घ ) चारों चरण सम तुकांत ,
(दो दो पद तुकांत करना निषेध व गुरु का दो लघु करना निषेध 


विध्न हटाने  सुत ही उनका   , आता है |
जब मेरा मन जय‌ शिवशंकर , गाता  है ||

वाम अंग शुभ गौरा रानी  , हैं   माते | 
कार्तिकेय के मोर   सवारी  ,से नाते  ||
मुख्य द्वार पर नंदी बाबा , को   पाते |
भूत प्रेत सब स्वागत करने , हैं आते ||
                     
डमरू का तब डम-डम ध्वनि  से , नाता है |
जब मेरा मन जय‌   शिवशंकर ,  गाता  है ||

लघु बन जाती सिर पर गंगा , जो भारी |
चंद्र भाल पर शीतलता के   , हों  धारी ||
महादेव की  अद्भुत   लीला  ,  है  न्यारी |
देव     राक्षस   मिलने   आते  , हैं पारी ||

देखा करता भक्त कृपा को ,  पाता    है |
जब मेरा मन जय‌  शिवशंकर ,  गाता  है ||

गेह हिमालय  कहलाते प्रभु ,   कैलासी  |
जिनके दर्शन अभिलाषी जग , के वासी ||
जग का भी  हर कंकर शंकर , है काशी |
मानव भी शिव का बन सकता ,है भाषी ||

नमन सुभाषा रूप तुुम्हारा ,  भाता     है |
जब मेरा मन जय‌ शिवशंकर ,  गाता  है ||

सुभाष सिंघई जतारा टीकमगढ़ म०प्र०
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लेखक का परिचय


नाम - सुभाष सिंघई 
जन्म दिनांक - 12 - 6- 1955 
जन्म स्थान - जतारा , जिला टीकमगढ़ (म०प्र०)
शिक्षा - एम० ए० ( हिंदी साहित्य, दर्शन शास्त्र  )
धर्मपत्नी- श्रीमति विजयलक्ष्मी सिंघई 
पुत्री 1- रानी - सपन गोयल
       2 - शिल्पी सूर्या  - नितिन जैन 
पुत्र -पुत्र वधू - शिल्पी सिंघई - संदर्भ सिंघई 
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आदरणीय सुरेन्द्र कौशिक जी गाजियाबाद 
प्रधान सम्पादक छंद महल ( हिंदी ई पत्रिका ) 
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लेखन की विधा - 
1 - सभी  छंद 
पाँच  हजार से अधिक  हिंदी /बुंदेली दोहे , हजार के  करीब कुंडलिया  , चौकड़िया , बुंदेली और हिंदी में लिख चुके है |
कई  छंदों के   विधान सउदाहरण लिखे है , अनेक गूगल पर  भी आपको मिल जाएँगे

2 - शताधिक व्यंग्य लेख , राजनैतिक समीक्षाएं विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित है 
 वर्तमान में  छंदों पर लेखन कर रहे है , छंद महल पटल से ई बुकों का प्रकाशन कर रहे हैं  

संस्थापक - सृजन सरोवर , छंद महल  पटल 

3- ब्लाग डाँट काम एवं अन्य एप्स   पर  ई बुक प्रकाशित  कृतियाँ - 

1- दोहा दीप (एक हजार दोहे ) 
2- दोहा कुंड ( एक हजार दोहे ) 
3- दोहा सुभाष (एक हजार)
4- बुंदेली बराई ( एक हजार ) 
5. बुंदेली बांसुरी( एक हजार दोहे )
 6-मेरे स्वर ( गज़ल़ , गीतिका , गीत, चौकड़िया व अन्य 
7 कलम से उद्गम. ( विभिन्न रचनाएँ )
8 -कुंडलिया कुंड 
9 गौरव गढ़ कुंडार (दोहा छंद में )
10- हिंदी छंद माला भाग एक व भाग दो 
11- खंड काव्य - नगर जतारा ध्रुवतारा ( ताटंक छंद में आचार्य विमर्शसागर जी की जीवनी 
12- बुंदेलखंड (जतारा) में जन्मे गुरुवर पर -, आचार्य विमर्श सागर चालीसा , विमर्श मंगलाष्टक , विमर्श काव्योदय , विमर्श बुंदेली पूजन , मुनि विचिन्त्य  शतक दोहा वली 
13- गर्भ से गमन तक 
14- बुंदेली  अहाने ‌
15- आलपिनें 
16- जैनागम साहित्य सृजन 
17 - गूगल साहित्य पीडिया पर , अनेक छंद आलेख व छंद विधान अपलोड है 
18  - ब्लाग डाँट काम पर ई बुकें हैं 
       व सम्पादित ई पत्रिकाएँ है 
19  वर्तमान में सम्पादन - 
1- छंद महल ( हिंदी ई पत्रिका ) जिसके  30  विशेषांक अब तक विभिन्न छंदो पर हो चुके हैं 
2- निर्झर ( अर्द्ध वार्षिक  हिंदी ई पत्रिका) जिसके दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके है 

20 - यूट्यूब - सृजन चैनल का‌‌ संचालन

21- कुछ समय आई टी आई में भाषानुदेशक पद पर शासकीय सेवा की है |
22- अन्य उपलब्धि- तीस बर्ष प्रिंट मीडिया पत्रकारिता की है ,कई आलेख प्रकाशित है

©®  सुभाष सिंघई 
मेन मार्केट , जतारा , जिला टीकमगढ़ ( म०प्र० )
मोवाइल नम्वर - 9584710660 
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